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बुधवार, 13 जुलाई 2016

" दिव्य आत्मा का निवास-दुर्ग: सहानुभूति नाड़ीग्रन्थि (सीम्पेथेटिक गैंग्लियोन) में है ! " [एक नया युवा आन्दोलन -३] " Heart and Soul "/

 ' हृत्पिण्ड (दिल) और आत्मा '  
हमलोगों ने स्वामी जी से सुना है कि 'व्यक्तियों के समूह को ही समाज' कहते हैं । इसलिए यदि हम अलग अलग व्यक्तियों का निर्माण सही ढंग से करें, तो हम एक अच्छे समाज का निर्माण भी कर सकते हैं । प्रश्न उठता है कि कोई साधारण व्यक्ति स्वयं को कैसे एक उन्नततर मनुष्य में रूपान्तरित कर सकता है ? यदि वह अपने तीन प्रमुख अवयव (3H) शरीर (Hand), मन (Head)और ह्रदय (Heart) को उचित रूप से विकसित करने की जिम्मेदारी अपने कन्धों पर उठा ले तो वह एक अच्छा मनुष्य बन सकता है । बट कैन वी फील आवर सोल ? क्या हमलोग अपनी आत्मा का अनुभव भी कर सकते हैं ? 
आमतौर से हमलोग अपने हृदय के ऊपर हाथ रखकर आत्मा की ओर ईशारा करते हैं, जो संवेदनाओं को महसूस करता है।  एक दिन स्वामीजी के मन में भी प्रश्न उठा-" हमारा यह आत्मा रहता कहाँ है ?" क्या वह हमारे शरीर में रहता है ? संस्कृत भाषा में हमें एक शब्द मिलता है -ह्रदय। ( 'शतं चैका च हृदयस्य नाड्य:'--हृदय की नाड़ियाँ १०१ हैं) स्वामी जी ने हमारे शरीर में आत्मा के छुपे होने के सभी संभावित स्थानों को एक एक करके स्कैन (पर्यवेक्षण) किया। उन्होंने सिर से स्कैनिंग करना प्रारम्भ किया और क्रमशः नीचे उतरते हुए, हृत्पिण्ड या दिल के पास पहुँचकर स्कैनिंग को बन्द कर दिया। उन्होंने देखा कि शरीर के दूरस्थ अंगों में आत्मा के छुपे होने की सम्भावना बहुत कम है। क्योंकि यदि हम अपनी दोनों भुजाओं में से एक को काट डालें, या एक पैर को काट डालें तो भी हमारी मृत्यु नहीं हो जाती है। हम जानते रहते हैं कि हमारी आत्मा अभी भी बनी हुई है, अब भी शरीर में अवस्थित है ! किन्तु यदि हमारे सिर को कुचल दिया जाय या छाती के पिंजर (thoracic cage ) को तोड़ दिया जाय, तो हम सामान्य रूप से जीवित नहीं रह पाते हैं। उनका इस ढंग से विश्लेषण करते हुए देखना- बिल्कुल एक साइंटिफिक एप्रोच था।या वैज्ञानिक पद्धति के अनुसार आत्मा का अनुसन्धान करना था। अतः वे वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि-आत्मा के छुपे होने की सम्भावना, इन्हीं दो स्थानों (सिर या हृदय) में ही हो सकती है। पुनः 'प्रोसेस ऑफ़ इलिमनैशन' या युक्ति-तर्क की कसौटी पर सभी संभावनाओं का परीक्षण करने से उन्होंने पाया कि  सिर तो मस्तिष्क (brain) के कामकाज के साथ बहुत ज्यादा व्यस्त रहता है, उसे अनुभव करने की फुर्सत ही कहाँ है?  फिर उन्होंने देखा कि  बुद्धि की जरूरत तो है, किन्तु यह कई बार हमें स्वार्थी बना देती है, और हमें दूसरों के बारे में ज्यादा सोचने के लिए अनुमति ही नहीं देती है।
 हमारी 'आत्मा' पूर्णतः निःस्वार्थी है, अपने-पराये का भेद भूल कर सबों से प्रेम करती है-  इसलिए उस "आत्मा (या निःस्वार्थपरता) का प्रतिनिधित्व यह 'बुद्धि' भी नहीं कर सकती! इस प्रकार 'साइंटिफिक विजुअलाइजेशन' (वैज्ञानिक दृश्यीकरण)  एवं निराकरण की त्रुटि-संधान की प्रक्रिया के माध्यम से वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि -यदि हमारी आत्मा, हमारे इस शरीर में कहीं विद्यमान है,तो जैसा हमारे पूर्वजों ने अनुमान से निर्णय किया था, उसे हमारे दिल के पास, इस 'ब्लड पम्पिंग मशीन' के निकट ही  कहीं न कहीं निवास करना चाहिये।
नरेंद्रनाथ (स्वामी विवेकानन्द) एक बहुत ही मेधावी छात्र थे। उन्होंने - इतिहास, धर्म, दर्शन आदि का अध्यन करने के साथ ही साथ फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी, फिजियोलॉजी, एनाटोमी ,आदि सभी प्रमुख विषयों का अध्यन किया था। उन्होंने पढ़ रखा था, कि हमारे शरीर के भीतर बहुत सारे गैंगग्लीअन्स या नाड़ी केन्द्र होते हैं।  मेडिकल के छात्र इस बात को निश्चित रूप से जानते हैं । उन्होंने ने जब पाया कि हमारे वास्तविक हृत्पिण्ड (दिल या ब्लड पम्पिंग मशीन) के निकट एक विशेष नाड़ीग्रन्थि है, जिसका वैज्ञानिक नाम ही  'सीम्पेथेटिक गैंग्लियोन' (सहानुभूति नाड़ीग्रन्थि) दिया गया है। और तब, वे इस अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचे कि "यदि आत्मा मानव-शरीर में कहीं निवास करती होगी, तो उसे इस 'सीम्पेथेटिक गैंग्लियोन' में ही वास करना चाहिये !"   
क्योंकि स्वामी विवेकानन्द ने वैज्ञानिक पद्धति से निरिक्षण-परीक्षण करने के बाद यह प्रमाणित कर दिया है कि इस मानवशरीर में हमारी 'दिव्य आत्मा' का निवास वास्तविक हृदय (ब्लड पम्पिंग मशीन) के निकटस्थ सहानुभूति नाड़ीग्रन्थि 'सीम्पेथेटिक गैंग्लियोन' में ही है ! अतः हमें यह बात आसानी से समझ में आ जानी चाहिये कि कोई व्यक्ति कैसे अपनी अन्तर्निहित दिव्यता ( या ईश्वरत्व) को पूर्णतः अभिव्यक्त करने में समर्थ हो सकता है, और स्वयं को एक उन्नततर मनुष्य (पूजनीय व्यक्तित्व) में रूपान्तरित कर सकता है? केवल वही व्यक्ति - जो साधारण मनुष्यों की तुलना में अत्यधिक सहानुभूतिशील हो। उदाहरण के लिए बुद्ध के जीवन को देखें, यीशु मसीह,श्री चैतन्य आदि के जीवन को देखें, आधुनिक युग के भगवान श्रीरामकृष्ण के जीवन को देखें, माँ सारदा देवी और स्वामी विवेकानंद के जीवन को देखें, तो हम पायेंगे कि वे सभी केवल " लम्प ऑफ़ लव " हैं, अर्थात केवल प्रेम द्वारा गढ़ी हुई मानव-मूर्तियाँ हैं ! प्रेम-स्वरूप हैं! 
एक बार जब स्वामी विवेकानन्द को उनके गुरु श्रीरामकृष्ण के विषय में कुछ कहने के लिये बहुत अधिक दबाव दिया गया, तो उन्होंने उनके विषय में बोलने में अपनी असमर्थता को स्वीकार कर लिया।  उन्होंने कहा वे इतने महान हैं, कि मैं उनके विषय में कुछ नहीं कह सकता ! अंत में बहुत कोशिश करने के बाद उन्होंने केवल इतना कि वे केवल 'LOVE' (प्रेम) हैं ! " प्रेमस्वरूपः" - जैसा कि हमारे शास्त्रों में भी भगवान के बारे में कहा जाता है- 'श्रीरामकृष्ण केवल प्रेम हैं !'  - "स ईशः अनिर्वचनीयप्रेमस्वरूपः"  भगवान अनिर्वचनीय प्रेम के सार हैं ! और हमलगों का सच्चा स्वरूप भी वही ( प्रेम) है, तथा हृदय (Heart) के
उस अन्तर्निहित 'ईश्वरत्व' या प्रेम को अभिव्यक्त करने के ही लिये हम अपने मन (Head) और शरीर (Hand) की शक्तियों की सहायता लिया करते हैं।  
ऐसा प्रयास - अपने शरीर और मन के माध्यम से अपने हृदय के प्रेम और सहानुभूति को अभिव्यक्त करने का प्रयास- हम व्यक्तिगत रूप से भी कर सकते हैं। क्योंकि ' प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है';  इसीलिये यह सम्भावना प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान है। किन्तु आज हमारे समाज का वातावरण जितना अधिक दूषित हो चुका है, उसके बीच  रहते हुए, विशेष रूप से  कुछ युवाओं के द्वारा अलग-अलग, निजी तौर पर अपनी अन्तर्निहित पूर्णत्व को अभिव्यक्त करने के लिये उद्यम करना बहुत कठिन है। यदि हमलोग केवल निजी तौर पर ऐसा करने का प्रयत्न करेंगे, तो कुछ समय के बाद हम ऐसा सोच सकते हैं कि, शायद इतनी जटिल परिस्थितियों में इस प्रकार के प्रयास द्वारा कभी सफलता प्राप्त नहीं होगी। और अन्ततोगत्वा हम अपनी अन्तर्निहित ईश्वरत्व को अभिव्यक्त करने का प्रयास करना ही छोड़ देंगे, और वर्तमान में जैसी भौतिकवादी बयार बह रही है, हमलोग भी उसी के साथ बहने लग जायेंगे। किन्तु, यदि बड़ी संख्या में कुछ युवा लोग एक साथ संघबद्ध हो जायें,और अपने जीवन को ऐक युवा-संगठन के माध्यम से गठित करने के लिए अपनी इच्छाशक्ति को समन्वित करके एक दूसरे को अनुप्रेरित और उत्साहित करते रहें, तो यह चरित्र-निर्माणकारी और मनुष्य-निर्माणकारी आंदोलन निश्चित रूप से सफल हो सकता है। और इस संगठन 'अखिल भारत विवेकानंद युवा महामंडल' का उद्देश्य भी यही है। 
यह संगठन इसी कार्य को करने के लिये निर्मित हुआ है, ताकि सभी युवा  अपने जीवन को गठित करने के लिये इस संगठन की बज्रांकित पताका के तले संघबद्ध होकर एक दूसरे की सहायता कर सकें, एक दूसरे को अनुप्रेरित कर सकें।  यदि  महामण्डल इस तरह के संगठित प्रयास के माध्यम से, भारत के ८० करोड़ युवा जनसंख्या में से केवल कुछ लाख युवाओं को भी 'यथार्थ मनुष्य' में रूपान्तरित करने में सक्षम हो जाता है, तो अविलम्ब - केवल कुछ ही वर्षों में हमारे सम्पूर्ण समाज की दशा बहुत हद तक परिवर्तित हो जाएगी। ठाकुर कहते थे - " यदि किसी कमरे में १००० वर्षों से अँधेरा भरा हो, तो उसके जाने में भी १००० वर्ष नहीं लगते, एक माचिस की तीली जलाते ही, उसी क्षण वह सारा अँधेरा भाग जाता है !"  
समाज-विज्ञान हमें बतलाता है, कि किसी समाज-विशेष (बंगाली समाज, अग्रवाल समाज) का प्रत्येक व्यक्ति ही उस समाज के लिये कोई अलग या विशिष्ट विचारधारा,फैशन स्टाइल, या मानदण्ड को तय नहीं करता। बल्कि किसी समय-विशेष की अवधि में, उस समाज के कुछ विशेष- शक्तिशाली लोगों की एक संगठित मण्डली ही उस समाज-विशेष की ट्रेन्ड-सेटर होती है, अर्थात उस समाज की विचारधारा के रुझान की दिशा को निर्धारित करती है। तुम स्वयं भी इस सच्चाई को परख कर देख सकते हो। आज हमलोग कहते हैं कि हमारे समाज में एन्टी सोसल एक्टिविटीज बहुत अधिक बढ़ गया है। किन्तु क्या तुम ऐसा 
सोचते हैं,या कोई भी व्यक्ति क्या यह विश्वास करता है कि आज हमारे समाज के लोगों की अधिकांश संख्या या लोगों का बहुमत, मेजोरिटी ऑफ़ पीपल-ही एन्टी सोसल या समाज-विरोधी हो गया है ? नहीं, ऐसी बात बिल्कुल नहीं है!
हमारे समाज में रहने वाले केवल थोड़े से समाज-विरोधी लोग ही ऐसे हैं, जो ताकतवर (टेरेरिस्ट) बन गए हैं, और ये समाज- विरोधी अल्पसंख्यक लोग ही सम्पूर्ण समाज को आसानी से डराते-धमकाते रहते हैं। इस बात से तुम कोई सीख क्यों नहीं लेते ? क्या तुम उत्तम और योग्य युवाओं की एक मण्डली को गठित नहीं कर सकते? क्या तुम, ऐसे युवाओं को - जो शरीर से बलवान, चरित्र से शक्तिशाली, मन से ओजस्वी, 
संकल्प पर अटल, ह्रदय से इतने विशाल, जो दूसरों के दुःख-दर्द को अपने हृदय में महसूस करने की क्षमता रखते हों; को एकत्रित और संगठित नहीं कर सकते? यदि तुम सभी युवा अपने अपने व्यक्ति-जीवन को गठित करते हुए संघबद्ध हो जाओ तो तुम्हारी युवाशक्ति बहुत आसानी से सम्पूर्ण समाज के जनरल स्टाइल ऑफ लाइफ को या सार्वजनिक जीने के ढंग को ही परिवर्तित कर देगी।  
एक दिन स्वामी जी जिस रास्ते जा रहे थे, (तब वे वाराणसी में थे) तो एक बंदर उनका पीछा करने लगा। और 'बंदर-घुड़की' देते हुए उनको डराने की कोशिश करने लगा, तो स्वामीजी पहले दौड़ कर उससे बचने की कोशिश करने लगे। किन्तु यह देखकर वह बंदर और भी डरावने ढंग से उनका पीछा करने लगा। उस समय एक साधु भी उसी रास्ते से होकर जा रहे थे, उन्होंने चिल्ला कर कहा - " अरे भाई, रुक जाओ और घूम कर उस बंदर का सामना करो ! डरो मत !" और स्वामीजी ने उनके परामर्श पर अमल किया, तुरन्त वे घूम गए और डट कर उस बंदर के सामने खड़े हो गए, तथा घूर कर उस बंदर की आँखों में देखा। इसका परिणाम यह हुआ कि बंदर तुरंत ही वहाँ से भाग खड़ा हुआ। ठीक उसी प्रकार यदि हम समाज-विरोधी लोगों की बंदर-घुड़की से, और समाज की सभी बुराइयों से डर कर भागने लगें, उसका सामना न करें तो हम असफल हो जायेंगे । किन्तु यदि हमलोग भी, सिर्फ सिर को घुमा लें और अपने चरित्र की शक्ति और मन के दृढ़ संकल्प के साथ खड़े हो जायें, तो न केवल हम समाज की समस्त अशुभ बातों को ही घटित होने से रोक सकेंगे, बल्कि अपने हाथों में हमलोग पूरे समाज का बागडोर भी ले सकते हैं। 
महामण्डल  स्वामी विवेकानन्द के जीवन और उनकी महान शिक्षाओं को भारत के सभी युवाओं के सामने रख देना चाहता है। यदि सभी युवा संघबद्ध हो कर प्रयत्नशील हो जायें, तो वे न केवल समाज से बुराइओं को ही दूर करेंगे, बल्कि वे राष्ट्र को एक यथार्थ रूप से विकसित कराकर एक नए और महान भारत का पुनर्निर्माण भी कर सकेंगे। 
अतः, हम यह कह सकते हैं कि महामण्डल के सामने लक्ष्य है- भारत का कल्याण ! उसके नागरिकों का सर्वांगीण विकास ! देश के लोगों की वर्तमान दशा में सुधार तथा सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति बहुत आवश्यक है, किन्तु उस लक्ष्य को मूलभूत रूप से केवल कुछ रिलीफ वर्क, या सामान्य समाज-सुधार 
सेवाओं के माध्यम से प्राप्त नहीं किया जा सकता। स्वामी जी की शिक्षाओं के आलोक में यह स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि हमलोग यदि केवल अपने जीवन को सुन्दर रूप से (आध्यात्मिक या ज्ञानमयी दृष्टि से) गठित करें, तथा एक अच्छे उद्देश्य (चरित्र-निर्माण आंदोलन का प्रचार-प्रसार) के लिए संघबद्ध होकर कार्य करें- तभी अपने देश की महानतम सेवा और सर्वाधिक कल्याण करने योग्य बन सकते हैं।  
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"ब्लेस्ड आर दी प्योर इन हर्ट, फॉर दे शैल सी गॉड."      
" तुम चाहे समस्त किताबों को कण्ठस्त कर डालो, परन्तु फिर भी विशेष लाभ न होगा। केवल हृदय ही अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचा सकता है। शुद्ध हृदय बुद्धि के परे देख सकता है, वह अन्तःस्फुर्त हो जाता है। हृदय वे बातें जान लेता है , जिसे तर्क कभी नहीं जान सकता। निर्मल हृदय (अहंकार का मुण्डन हो जाने के बाद) ही सत्य के प्रतिबिम्ब के लिये सर्वोत्तम दर्पण है। सर्वदा हृदय का ही संस्कार करो , उसे अधिकाधिक पवित्र बनाओ, क्योंकि हृदय के ही माध्यम से ईश्वर बोलता है , कार्य करता है, और बुद्धि के माध्यम से तुम स्वयं। " 
भाव की शुद्धि से समस्त पदार्थ, क्रिया आदि की शुद्धि हो जाती है। अतः महत्त्व भाव का ही है, वस्तु- व्यक्ति- कर्म आदि का नहीं। वह भाव हृदय में होने से हृदय की बहुत महत्ता है। हृदय सत्त्वगुण का कार्य है। इसलिये भी भगवान् हृदय में विशेषरूप से रहते हैं।
[ गीता (१५. १५) में भगवान् श्रीकृष्ण यह रहस्य प्रकट करते हैं कि मैं स्वयं सब प्राणियों के हृदयमें विद्यमान हूँ - ' सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो'। अतः किसी भी साधक को (मेरे से दूरी अथवा वियोग का अनुभव करते हुए भी) मेरी प्राप्ति से निराश नहीं होना चाहिये। इसलिये पापी-पुण्यात्मा, मूर्ख-पण्डित, निर्धन-धनवान्, रोगी-निरोगी आदि कोई भी स्त्री-पुरुष किसी भी जाति- वर्ण- सम्प्रदाय- आश्रम,  देश- काल- परिस्थिति आदि में क्यों न हो, भगवत्प्राप्ति का वह पूरा अधिकारी है। आवश्यकता केवल भगवत्प्राप्ति की ऐसी तीव्र व्याकुलता की है, जिस में भगवत्प्राप्ति के बिना रहा न जाय।
तात्पर्य यह हुआ कि सम्पूर्ण प्राणी, पदार्थ परमात्मा की सत्ता से ही सत्तावान् हो रहे हैं। परमात्मा से अलग किसी की भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। प्रकाश के अभाव (अन्धकार) में कोई वस्तु दिखायी नहीं देती। आँखों से किसी वस्तु को देखने पर पहले प्रकाश दीखता है, उसके बाद वस्तु दीखती है अर्थात् हरेक वस्तु प्रकाश के अन्तर्गत ही दीखती है किन्तु हमारी दृष्टि प्रकाश पर न जाकर प्रकाशित होनेवाली वस्तु पर जाती है। इसी प्रकार यावन्मात्र वस्तु, क्रिया, भाव, आदि का ज्ञान एक विलक्षण और अलुप्त प्रकाश -- ज्ञान के अन्तर्गत होता है, जो सब का प्रकाशक और आधार है। प्रत्येक वस्तु से पहले ज्ञान (स्वयंप्रकाश परमात्म-तत्त्व) रहता है। अतः संसार में परमात्मा को व्याप्त कहने पर भी वस्तुतः संसार बाद में है और उसका अधिष्ठान परमात्मतत्त्व पहले है। अर्थात् पहले परमात्मतत्त्व दीखता है, बाद में संसार। परन्तु संसार में राग होनेके के कारण मनुष्य की दृष्टि उसके प्रकाशक (परमात्मतत्त्व) पर नहीं जाती। 
हृदय में निरन्तर स्थित रहने के कारण परमात्मा वास्तव में मनुष्य मात्र को प्राप्त हैं परन्तु जडता (संसार) से माने हुए सम्बन्ध के कारण जडता की तरफ ही दृष्टि रहने से नित्यप्राप्त परमात्मा अप्राप्त से प्रतीत हो रहे हैं अर्थात् उनकी प्राप्तिका अनुभव नहीं हो रहा है। परमात्मा का अंश होते हुए भी जीव भूल से परमात्मा से विमुख हो जाता है और अपना सम्बन्ध संसारसे मानने लगता है। इस भूलका नाश होने पर मैं भगवान् का ही हूँ, संसार का नहीं ऐसा साक्षात् अनुभव हो जाना ही स्मृति है (गीता 18। 73)। स्मृति में कोई नया ज्ञान या अनुभव नहीं होता,  प्रत्युत केवल विस्मृति (मोह) का नाश होता है। ]
[साभार http://www.gitasupersite.iitk.ac.in]  
स्वामी विवेकानन्द ( २१ फरवरी, १९०० को लिखित एक पत्र में) कहते हैं - " विद्या (डिग्रियाँ) और पाण्डित्य बाह्य आडम्बर हैं और बाह्य भाग केवल चमकता है; परन्तु सब शक्तियों का सिंहासन हृदय होता है। ज्ञान,शक्ति,क्रिया स्वरुप आत्मा का निवासस्थान मस्तिष्क में नहीं वरन हृदय में है।  'शतं चैका हृदयस्य नाड्य:'--हृदय की नाड़ियाँ १०१ हैं, इत्यादि। हृदय (बल्ड पम्पिंग मशीन) के निकट, (The chief nerve-center) मुख्य नाड़ी का केन्द्र जिसे संवेदक समूह (sympathetic ganglia) कहते हैं, होता है; और यही आत्मा (शरीर रूपी रथ में सवार राजा) का निवास दुर्ग है। जितना अधिक तुम हृदय का विकास कर सकोगे , उतनी अधिक तुम्हारी विजय होगी। मस्तिष्क की भाषा तो कोई कोई ही समझता है, परन्तु हृदय की भाषा ब्रह्मा से लेकर घास के तिनके तक सभी समझ सकते हैं। " ७/४१० 
"हृदि हि एषः आत्मा - यह प्रसिद्द जीवात्मा हृदय देश में रहता है !" (प्रश्नोपनिषद ३.६)]अमेरिका में 'आत्मानुभूति के सोपान' विषय पर भाषण देते हुए स्वामी जी (३/१०७ STEPS TO REALISATION: Vol 1.) 
"तुम्हारी पाश्चात्य शिक्षा-पद्धति का एक बड़ा दोष यह है कि तुम केवल बौद्धिक-शिक्षा (Head) के ही पीछे पड़े हो, हृदय (Heart) की ओर ध्यान ही नहीं देते। इसका फल यह होता है कि मनुष्य दस गुना अधिक स्वार्थी बन जाता है। यही तुम्हारे नाश का कारण होगा। यदि हृदय (Heart)और बुद्धि (Head)  में विरोध उत्पन्न हो, तो हृदय का अनुसरण करो, क्योंकि बुद्धि केवल एक तर्क के क्षेत्र में ही काम कर सकती है। वह उसके परे नहीं जा सकती। केवल हृदय ही हमें उच्चतम भूमि में ले जाता है, जहाँ बुद्धि कभी नहीं पहुँच सकती। 
( A pure heart sees beyond the intellect; it gets inspired; it knows things that reason can never know, ) हमारा हृदय ही बुद्धि का अतिक्रमण कर जिसे हम 'अन्तःस्फुरण' कहते हैं, उसे पा लेता है। बुद्धि कभी अन्तःस्फुरित (इंस्पायर्ड)  नहीं हो सकती। केवल उद्बोधित हृदय ही अन्तःस्फुरित हो सकता है ! (Intellect can never become inspired; only the heart when it is enlightened, becomes inspired. )
केवल बुद्धिप्रधान, किन्तु शुष्क-हृदय मनुष्य कभी अन्तःस्फूर्त नहीं बन सकता। प्रेममय पुरुष (लोक-शिक्षक या नेता ) की समस्त क्रियायें उसके हृदय से ही अनुप्राणित होती हैं, वह एक ऐसा उच्चतर साधन प्राप्त कर लेता है, जिसे बुद्धि कभी नहीं दे सकती, और वह साधन है हृदय का अन्तःस्फुरण ! [इन्स्पाइअर्ड या
 सेल्फ-पल्सेशन ? / self-pulsation,] जिस तरह बुद्धि (Head)  ज्ञान का साधन है, उसी तरह हृदय (Heart) भी अन्तःस्फुरण का साधन (instrument या device) है। (Just as the intellect is the instrument of knowledge, so is the heart the instrument of inspiration ?) 
निम्नावस्था में (पशु-अवस्था में) हृदय उतना शक्तिशाली नहीं होता, जितनी बुद्धि। किसी अनपढ़ मनुष्य को कोई दुनियावी ज्ञान नहीं होता, किन्तु वह यदि थोड़ा-बहुत भावना-प्रधान होता है। अब उसकी तुलना उस प्रोफेसर से करो जो अपने विषय का प्रकाण्ड विद्वान् है, लेकिन उसकी शिक्षा यदि केवल बुद्धि तक ही सीमित हो, तो वह एक ही साथ बुद्धिमान और शैतान हो सकता है। लेकिन एक हृदयवान मनुष्य कभी शैतान नहीं हो सकता। 
यदि हृदय का योग्य संस्कार किया जाय (कैसे ? प्रणव को धनुष बनाकर आत्मा या मन को तीर बनाकर लक्ष्य - अपने हृदय में बैठे ब्रह्म (ठाकुर) में भेदन का अभ्यास या मनःसंयम का अभ्यास किया जाय) तो हृदय में परिवर्तन हो सकता है और वह बुद्धि का भी अतिक्रमण कर अन्तःस्फुरण में परिवर्तित हो जाता है। अन्त में मनुष्य को बुद्धि के परे जाना ही पड़ेगा।
 [Properly cultivated, the heart can be changed,(हाऊ टु कल्टिभेट दी हर्ट ?)   and will go beyond intellect; it will be changed into inspiration. Man will have to go beyond intellect in the end.] 
मनुष्य की प्रज्ञा, उसके अनुभव, उसका विवेक, उसकी बुद्धि, उसका हृदय -ये सब इस संसार रूपी क्षीरसागर के मन्थन में लगे हुए हैं। दीर्घकाल तक मथने के बाद उसमें से मक्खन (नवनीत या butter) निकलता है और यह मक्खन है ईश्वर ! हृदयवान मनुष्य 'मक्खन' पा लेते हैं और कोरे बुद्धिमानों के लिये सिर्फ 'छाछ' बच जाती है। " 
साधन चतुष्टय -'मुमुक्षुत्वं'- अर्थात मुक्ति पाने की इच्छा के बाद आवश्यक साधना है -'नित्यानित्य-विवेक' ! या 'विवेक-प्रयोग '- यह बहुत कठिन है। सत्य क्या है और मिथ्या क्या है ? क्या शाश्वत है और क्या नश्वर है? इस भेद को जान लेना ही 'नित्यानित्य-विवेक' कहलाता है। केवल ब्रह्म (आधुनिक युग के भगवान श्रीरामकृष्ण -या प्रेम) ही शाश्वत है और बाकी सब कुछ नश्वर है। प्रत्येक वस्तु क्रमपरिवर्तनशील है -इसीलिये असत्य नहीं है, किन्तु मिथ्या है। एकमात्र ठाकुर-माँ-स्वमीजी ही ऐसे हैं, जिनके प्रेम में परिवर्तन कभी नहीं होता, और जितना ही हम उनके समीप जायेंगे प्रकृति (प्रोपेन्सिटी) का उतना ही हम पर कम अधिकार चलेगा। और जब हम उस तक पहुँच जायेंगे, तो हम प्रकृति (आदतों पर ?) पर विजय प्राप्त कर लेंगे, हम पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। ३/१०६         

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