कुल पेज दृश्य

शनिवार, 30 जुलाई 2016

" संघ और नेतृत्व "- की आवश्यकता ! [ एक नया युवा आन्दोलन - ४] (The Need of Organization and Leadership )

महर्षि  वेदव्यास की एक विख्यात उक्ति है - 
त्रेतायां मंत्रशक्तिश्च, ज्ञानशक्तिः  कृते युगे।
द्वापरे युद्धशक्तिश्च, संघशक्तिः कलौ युगे।। 
-सत्ययुग में ज्ञान शक्ति, त्रेता में मन्त्र शक्ति तथा द्वापर में युद्ध शक्ति का बल था। किन्तु कलियुग में संगठन की शक्ति ही प्रधान है। 
स्वामी विवेकानन्द तो संगठन की अवधारणा पर ही मुग्ध  थे। उन्होंने संगठन-शक्ति अर्थात संघबद्ध होकर प्रयास करने की शक्ति के श्रेष्ठता की अत्यंत प्रशंसा की है। वे हमारे देश के प्राचीन समय के संगठनों की सफलताओं और कमियों को अच्छी तरह से जानते थे। फिर भी वे केवल लोगों के दुःख-कष्टों को दूर करने के लिये ही नहीं, बल्कि उन्हें सही दिशा में प्रशिक्षित करने के लिये भी संगठन बनाकर कार्य करने के पक्षधर थे। उन्हें यह ज्ञात था कि हमारे देश की साधारण जनता  के स्वभाव में वह उत्साह ही अनुपस्थित है, जो किसी संगठित प्रयास को सफल बनाने के लिये आवश्यक होता है। 
उन्होंने कहा था - ' हमारे स्वभाव (प्रकृति या प्रोपेन्सिटीज) में ही संगठन की शक्ति का पूर्णतया अभाव है, फिरभी अब हमें इस भावना को अपने देशवासियों में संचारित करना पड़ेगा!' और तत्काल इसके मुख्य कारण की तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करते हुए उसमें जोड़ देते हैं - " इसका सबसे बड़ा रहस्य है- ईर्ष्या का अभाव। " वे खेद व्यक्त करते हुए कहते हैं - " (इसीके कारण ) तुम तीस करोड़ मनुष्य अपनी इच्छाशक्ति को एक दूसरे से पृथक किये रहते हो।" इसीलिये महामण्डल अपने अस्तित्व में आने के समय से (१९६७ से) ही स्वामी विवेकानन्द के इस सन्देश को सुनाता चला आ रहा है कि " यदि भारत को महान
 बनाना है, उसका भविष्य उज्ज्वल बनाना है, तो इसके लिये आवश्यकता है संगठन की, शक्ति-संग्रह की और बिखरी हुई इच्छाशक्ति को एकत्र कर उसमें समन्वय लाने की।महामण्डल के संघगीत (Anthem) में भी हमलोग स्वामी विवेकानन्द के इन्हीं शब्दों को भाव से गाते हैं, जब उन्होंने कहा था, " अथर्ववेद संहिता की एक विलक्षण ऋचा याद आ रही है, जिसमें कहा गया है , तुम सब लोग एक मन हो जाओ, सब लोग एक ही विचार के बन जाओ, एक मन हो जाना ही समाज गठन का रहस्य है!"    
"बिखरी हुई इच्छाशक्ति में समन्वय लाने' - के रहस्य को जान लेने के बाद, किसी भी संगठन को फलने-फूलने के लिये जो वस्तु सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, वह है - 'प्रॉपर लीडरशिप' ! अर्थात किसी सच्चे नेता का मार्गदर्शन ! 
किन्तु आमतौर से ऐसा माना जाता है कि - "लीडर्स आर बॉर्न एंड नॉट मेड." अर्थात 'नेता जन्मजात रूप से पैदा होता है, बनाया नहीं जाता !' यह लोकोक्ति किस बात की ओर इशारा करती है ? यह कथन इस बात पर जोर देती है कि -'राइट टाइप ऑफ़ लीडरशिप इज डिफिकल्ट टु  एक्वायर' - अर्थात नेतृत्व-क्षमता  (रहनुमाई या मार्गदर्शन करने की योग्यता)  प्राप्त करना बहुत कठिन कार्य है।
यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि ' मैं इस चरित्र-निर्माणकारी आन्दोलन का नेता बनना चाहता हूँ' किन्तु उसमें नेतृत्व करने की क्षमता न हो (उसका अपना चरित्र ही गठित न हुआ हो) , तो उसे तुरन्त ही नेता कैसे बनाया जा सकता है ? इसीलिये आगे स्वामी विवेकानन्द चेतावनी देते हैं - " यदि तुम ('आर्य' और 'द्रविड़', 'ब्राह्मण ' और 'अब्राह्मण ' जैसे)  तुच्छ विषयों को लेकर 'तू-तू, मैं- मैं' करोगे, झगड़े और पारस्परिक विरोध भाव को बढ़ाओगे, तो समझ लो कि तुम उस शक्ति-संग्रह से दूर हटते जाओगे, जिसके द्वारा भारत का भविष्य बनने जा रहा है। "
 वे आगे कहते हैं- " एव्री वन वान्ट्स टु कमांड ऐंड नो वन वान्ट्स टु ओबे. - हर एक व्यक्ति हुकूमत चाहता है, पर आज्ञा पालन करने के लिये कोई भी तैयार नहीं है; पहले आदेश पालन करना सीखो, आदेश देना फिर स्वयं आ जायेगा। पहले सर्वदा दास (अपने गुरु का आज्ञाकारी सेवक) होना सीखो, तभी तुम स्वयं 'गुरु या नेता' होने के योग्य बन सकोगे। 
यदि तुम्हारे वरिष्ठ तुम्हें इस बात की आज्ञा दें कि तुम नदी में कूद पड़ो और एक मगरमच्छ को पकड़ लाओ, तो तुम्हारा कर्तव्य यह होना चाहिये कि पहले तुम आज्ञा-पालन करो, और फिर कारण पूछो। भले ही तुम्हें दी हुई आज्ञा ठीक न हो, परन्तु फिर भी तुम पहले उसका पालन करो और फिर प्रतिवाद करो। यदि संगठन के अनुयायिओं में गुरुजनों की आज्ञा को शिरोधार्य करने भावना न रहे, तो संगठन की शक्ति का केन्द्रीयकरण नहीं हो सकता। 'नो ग्रेट वर्क कैन बी डन विदाउट दिस सेंट्रलाइजेशन ऑफ़ इंडिविजुअल फोर्सेज" - एवं प्रत्येक सदस्य की बिखरी हुई शक्तियों को संगठन के उद्देश्य और कार्यक्रम में केन्द्रीभूत
 किये बिना कोई महान उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। " 
[ 'नो ग्रेट वर्क कैन बी डन विदाउट दिस सेंट्रलाइजेशन ऑफ़ इंडिविजुअल फोर्सेज. 'रजिस्टर्ड  सिटी ऑफिस ऑफ़ महामण्डल' इस युवा चरित्र-निर्माणकारी आन्दोलन का प्रमुख केन्द्र है। सभी दूसरी शाखाओं के सदस्यों को चाहिये कि केन्द्र की नियमावली के अनुसार एक साथ मिलकर दत्तचित्त होकर कार्य करें। ईर्ष्या तथा अहंभाव को दूर कर दो -संगठित होकर दूसरों के लिये कार्य करना सीखो। हमारे देश में इसकी बहुत बड़ी आवश्यकता है । जबकि  भारत में प्रत्येक व्यक्ति नेता बनना चाहता है, आज्ञा-पालन करने वाला कोई भी नहीं है। आज्ञा देने की क्षमता प्राप्त करने के पहले प्रत्येक व्यक्ति को आज्ञा-पालन करना सीखना चाहिये। आज्ञा-पालन के गुण को अर्जित करो, लेकिन अपने धर्म विश्वास को न खोना।
स्वामी विवेकानन्द ने " श्रीरामकृष्ण- नरेन्द्रनाथ वेदान्त परम्परा: (या गुरु-शिष्य परम्परा) में 'लीडरशिप ट्रेनिंग' को प्राप्त किया था, इसीलिये उनके शब्द बड़े सपाट और स्पष्ट होते हैं, तथा उन शब्दों की व्याख्या करने की भी जरूरत नहीं पड़ती। वे सीधे-सीधे कहते हैं, " हम आलसी हैं, हम कार्य नहीं कर सकते; हम पारस्परिक एकता स्थापित नहीं कर सकते, हम एक दूसरे से प्रेम नहीं करते, हम बड़े स्वार्थी हैं, हम तीन मनुष्य एकत्र होते ही एक दूसरे से घृणा करते हैं, ईर्ष्या करते हैं।" " यदि सफल होना चाहते हो, तो पहले 'अहं' का नाश कर डालो। तुम अपने भाइयों का नेता बनने की कोशिश मत करो, बल्कि उनके सेवक ही बने रहो।  यदि तुम स्वयं नेता के रूप में प्रदर्शित करने की चेष्टा करोगे तो इससे ईर्ष्या उत्पन्न होगी; और इससे हर चीज बर्बाद हो जाएगी। शासक बनने की कोशिश मत करो -सबसे अच्छा शासक वह है जो सबकी सेवा कर सकता है।"
यदि हम अपने संगठन के आदर्श कर्मी बनना चाहते हैं, और इस 'नये युवा आन्दोलन' का सफल नेतृत्व करने की योग्यता अर्जित करना चाहते हों, तो हमें स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रदत्त नेतृत्व संबन्धी इन विचारों को अवश्य सुनना होगा, इस पर चिंतन-मनन करना होगा, इन विचारों को आत्मसात कर लेना होगा। एवं हमें अपनी नेतृत्व-क्षमता का निर्माण भी श्रीरामकृष्ण- नरेन्द्रनाथ वेदान्त परम्परा में 'लीडरशिप ट्रेनिंग' में प्राप्त विचारों के (या गुरु-शिष्य परम्परा) के अनुरुप ही करना होगा। ताकि जो लोग इस 'चरित्र-निर्माण आंदोलन' में  सम्बद्ध हो रहे हैं; उन्हें (वुड्बी भी लीडर्स को) भी उचित मार्गदर्शन प्राप्त हो। यदि इस 'नये युवा आन्दोलन' (ब्रह्मवेत्ता मनुष्य बनो और बनाओ आन्दोलन) के अग्रणी -नेताओं में इन आवश्यक गुणों की कमी होगी, तो अनुयायी वर्ग (या भावी नेता) भी इस असली रचनात्मक कार्य के मर्म को नहीं समझ पायेंगे, और जो हमारा मुख्य लक्ष्य है, उसे प्राप्त करने में सहायक सिद्ध नहीं होंगे। अतः जो इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं, उन्हें (वेदान्त के ) इन बुनियादी गुणों को अवश्य अर्जित करना चाहिये और उसके साथ साथ निम्नलिखित बातों पर भी ध्यान देना चाहिये : १. इस नये युवा आंदोलन के 'नेता' में किसी प्रकार का अहं, नाम-यश पाने की कामना या अन्य कोई निजी लाभ पाने की कामना नहीं रहनी चाहिये। शान्त मन से विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता रहनी चाहिये, महामण्डल के आदर्श और उद्देश्य को कभी नजरों से ओझल नहीं होने देना चाहिये । 'सीखना ही मेरा धर्म है' पर अटल रहते हुए - प्रत्येक अनुभव से कुछ न कुछ अवश्य सीखना चाहिये
२. मन, वाणी और कर्म से अवश्य पवित्र रहना चाहिये। पहले स्वयं त्याग करो, तभी दूसरों से अनुकरण की अपेक्षा करनी चाहिये। दूसरों को कार्य करने का आदेश देने से पहले, स्वयं करना चाहिये। 

३. नेवर एटेम्पट टु  गाइड ऑर रूल अदर्स, ऐज द याँकीज से, "बॉस"अदर्स. बी द सर्वेन्ट ऑफ़ आल.  कभी दूसरों को मार्ग दिखाने का या उन पर हुक्म चलाने का यत्न न करना, जैसा की अमेरिकन लोग कहते हैं, बॉसिज्म मत करो। सबके दास बने रहो।

४.जब तक दूसरे लोग तुम्हें अपना नेता न बनायें, तुम्हें एक अनुयायी या शिष्य की तरह कार्य करते रहना चाहिये। प्रत्येक के मन में यह विश्वास रहना चाहिये कि वह एक नेता बन सकता है, तथा उसे एक नेता के गुणों को भी अवश्य आत्मसात करते रहना चाहिये। जब कभी परिस्थितियों का तकाजा हो, उस अवस्था में अपनी सेवा अर्पित करने के लिये, तुम्हें अवश्य आगे आना चाहिये; किन्तु नेतृत्व करने में जल्दीबाजी नहीं दिखानी चाहिये। किन्तु तुम्हें इस आधार पर बैठे भी नहीं रहना चाहिये, कि 'मुझसे तो किसी ने कहा ही नहीं? ' या पहले ही तुम्हें जिम्मेदारी का कार्य क्यों नहीं सौंपा गया? अपने हृदय को निर्मल रखो, कि तुम जो कुछ भी कर रहे हो, वह इसीलिये कर रहे हो कि तुम्हें इस श्रीरामकृष्ण- नरेन्द्रनाथ वेदान्त परम्परा में लीडरशिप ट्रेनिंग" पर पूरा विश्वास है; तथा तुम इस आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिये ही कर रहे हो, किसी निजी उद्देश्य को पाने की कामना से नहीं।  

५. 'बिकम वन ऑफ़ दोज हुम् यू आर टु लीड.' इस नये युवा आंदोलन के जिन भावी नेताओं के उचित मार्गदर्शन करने की जिम्मेवारी यदि तुम पर सौंपी गयी है, (अर्थात 'मन को एकाग्र करने की विद्या और चरित्रनिर्माण की पद्धति' आदि विषयों पर क्लास लेने की जिम्मेवारी तुम्हें सौंपी गई है) तो क्लास लेते समय तुम्हें उन्हीं में से एक बन जाना चाहिये। याद रखो शिक्षा देने वाला बड़ा नहीं है, जो तुमसे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं वे 'शिवजी ' हैं, तुम्हारे हृदय को विकसित करने का अवसर देकर वे तुमपर उपकार कर रहे हैं। इसीलिये अपने को ऊँचाई पर रखकर उन्हें मत देखो -'निल डाउन एंड गिव '! तुम्हारे बिना यह आंदोलन आगे ही नहीं बढ़ेगा, ऐसी शेखी मत बघारो ! किन्तु अपना देय हिस्सा उस कार्य में अवश्य दो जिसका उत्तरदायित्व तुम्हें मिला है। जो असत्य है, और नैतिक नहीं है, उसके साथ समझौता मत करो । कभी झूठ न बोलो।

६. तुम्हारी योजना या कार्यक्रम,यदि उन आदर्शों की पूर्ति के अनुकूल नहीं हैं, जिसे तुमने पूर्वनिर्धारित कर रखा है, तो वे बिल्कुल तुच्छ हैं, बल्कि अपमान जनक भी हो सकते हैं । सदा याद रखो जैसा तुम करोगे दूसरे भी उसी का अनुकरण करेंगे। 'योर थॉट शुड गाइड योर एक्शन्स.तुम्हारे विचार, वाणी और कार्यों में एकरूपता दिखनी चाहिये।

७. किसी भी अनुष्ठान को करने के पूर्व विवेक-प्रयोग तथा दूरदर्शिता रखते हुए उसकी योजना और चेकलिस्ट बना लो। जोशीला या साहस होना अच्छा है, लेकिन इसका दिखावा, या आडम्बर नहीं होना चाहिये। वार्तालाप के समय अपनी बोली को नियंत्रण में रखो, अपने विचार और हावभाव से शालीन बनो। अपने जीवन को दूसरों के लिए प्रेरणास्पद बनाओ। 

८. संगठन के आमद-खर्च के मामले में बिल्कुल साफ-सुथरा रहो। "एक्वायर बोथ करैक्टर एंड एफिशिएंसी" तुम्हें चरित्र और उचित मार्गदर्शन करने की क्षमता दोनों अर्जित करनी चाहिये। यदि किसी व्यक्ति में  'क्षात्रवीर्य और ब्रह्मतेज '  में से कोई एक ही गुण हो तो वह व्यक्ति नेता नहीं बन सकता। सभी प्रकार के पूर्वाग्रह से पीछा छुड़ा लो। बिना मशीन बने नियमशील बनो । यथेष्ट रूप से बोलो पर वाचाल मत बनो।  

९. यदि ये  गुण तुममें अनुपस्थित हों, तो अभी नेता बनने के लिए  हड़बड़ी मत करो । पहले इन विचारों को समझो, इन पर चिंतन -मनन करो, और इन आदर्शों को अर्जित करो । समय आने पर तुम्हें भी कई लोगों का मार्गदर्शन करना होगा। पहले इस काम के लिए अपने आप को योग्य तो बना लो । स्वामीजी ने जो जिम्मेवारी युवाओ पर सौंपा है, उसका स्मरण करो - " जो सच्चे हृदय से भारत के कल्याण का व्रत ले सकें तथा जो उसे ही अपना एकमात्र कर्तव्य समझें -ऐसे युवकों के साथ कार्य करते रहो। उन्हें जाग्रत करो, संगठित करो तथा उनमें त्याग का मंत्र फूँक दो । भारतीय युवकों पर ही यह कार्य सम्पूर्ण रूप से निर्भर है।  काम करो, भावनाओं को, योजनाओं को कार्यान्वित करो, मेरे बालकों, मेरे वीरों, सर्वोत्तम साधुस्वभाव मेरे प्रिय जनों, पहिये पर जा लगो, उस पर अपने कन्धे लगा दो। नाम, यश अथवा अन्य तुच्छ विषयों के लिये पीछे मत देखो। "

१०. अब तुम्हें स्वयं ऋषि बनना होगा। तुम भी वैसे ही मनुष्य हो, जैसे कोई बड़ा से बड़ा व्यक्ति कभी पैदा हुए, यहाँ तक कि तुम अवतारों के सदृश हो। ऋषि के क्या अर्थ हैं ? ऋषि का अर्थ है पवित्र आत्मा।  पहले पवित्र बनो, तभी तुम शक्ति पाओगे। ' मैं ऋषि हूँ ' कहने मात्र से ही न होगा, किन्तु जब तुम यथार्थ ऋषित्व लाभ करोगे, तो देखोगे दूसरे आप ही आप तुम्हारी आज्ञा मानते हैं ! तुम्हारे भीतर से कुछ रहस्यमय वस्तु निःसृत होती है, जो दूसरों को तुम्हारा अनुसरण करने को बाध्य करती है, जिससे कि वे तुम्हारी आज्ञा का पालन करते हैं। यहाँ तक कि अपनी इच्छा के विरुद्ध अज्ञात भाव से वे तुम्हारी योजनाओं की कार्यसिद्धि में सहायक होते हैं । यही ऋषित्व या लीडरशिप है !

११. जातियों में समता लाने का एकमात्र उपाय है उस चरित्र और शिक्षा को अर्जन करना जो उच्च वर्णों का बल और गौरव है। यदि तुम यह कर सको तो जो कुछ तुम चाहते हो, वह तुम्हें मिल जायेगा। भविष्य में जो सत्ययुग आ रहा है, उसमें ब्राह्मणेतर सभी जातियाँ फिर ब्राह्मण रूप में परिणत होंगी।

१२. अंतिम बात, किन्तु कम महत्वपूर्ण नहीं, वह यह कि  इस श्रीरामकृष्ण- नरेन्द्रनाथ वेदान्त परम्परा में लीडरशिप ट्रेनिंग" में चर्चा का मुख्य विषय या (theme) 'BE AND MAKE' पर दृढ़ विश्वास रखो, तथा 
इस उद्देश्य (ब्रह्मवेत्ता मनुष्य बनने और बनाने) को प्राप्त करने के लिये 'विवेकानन्द साहित्य' का अध्यन ध्यानपूर्वक और नियमित रूप से करते रहो। ऐसा न करने पर तुम अपने लक्ष्य - 'यथार्थ मनुष्य' (ब्रह्मवेत्ता मनुष्य) बनने के लक्ष्य से  - पथभ्रष्ट भी हो सकते हो।  

(आत्मानुभूति के सोपान, व्यावहारिक जीवन में वेदान्त आदि विषयों पर) उनके द्वारा दिये गये परामर्शों को पुनः पुनः पढ़ो। अपनी डायरी में नेतृत्व के उन गुणों को दर्ज करो जो तुम्हारे भीतर हैं, तथा यह भी लिखो कि कितने अंश में हैं। और गुणों को भी ध्यान से नोट करो, जो तुम्हारे भीतर न हों, किन्तु निराश न होना। जो तुममें नहीं हैं, उन गुणों को अर्जित करने की चेष्टा करो , और जो हैं उन्हें और अधिक बढ़ाने की चेष्टा करो। छह महीने के बाद नए सिरे से आत्ममूल्यांकन तालिका बनाओ और श्रेणी  के आधार पर अपनी प्रगति पर निशान लगाओ।  तुम्हें सभी प्रेम करने लगेंगे, और उनसे सम्मान मिलेगा, और कार्य करने में आनन्द निरंतर बना रहेगा। 
और इसका परिणाम यह होगा कि तुम  ' करैक्टर एंड एफिशिएंसी' अर्थात  ' ब्रह्मतेज और क्षात्रवीर्य ' दोनों को विकसित हो जाओगे। जब तुम 'लायन ऑफ़ वेदान्ता' बन कर दहाड़ने लगोगे - केवल तभी यह संगठन अपने उद्देश्य - 'तेजस्वी युवकों के दल को गठित करने और उनके हृदय में  मातृभूमि और उसके संतानों के लिए  प्रेम, शक्ति, बल, सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, त्याग और सेवा की भावना, साहस आदि के प्रति उत्साह की अग्नि  को प्रज्ज्वलित करने के लिये उन्हें संघबद्ध करने में सफल हो जायेगा। ' -ताकि वे एक नए भारत का निर्माण करने योग्य मनुष्य बन सकें । 
================
'अवतार-जिज्ञासु वेदान्त परम्परा में लीडरशिप ट्रेनिंग'
 [भूमिका : यह पुस्तक अंग्रेजी भाषा में पहली बार १९८६ ई० में प्रकाशित हुई थी, एवं १९९१ में इसका द्वितीय वर्धित संस्करण प्रकाशित हुआ था। १९८८ ई० में इसका प्रथम हिन्दी संस्करण भी प्रकाशित हुआ था। कतिपय कारणों से, बहुत अनुरोध करने के बावजूद इसका बंगला संस्करण प्रकाशित करना सम्भव नहीं हो पा रहा था। इस पुस्तक का प्रथम बंगला संस्करण १९९४ ई० में प्रकाशित हुआ, तथा अंग्रेजी पुस्तक का बंगला में अनुवाद श्रीमती नन्दिनी गोस्वामी ने किया है। 
किसी भी रचनात्मक आन्दोलन की सफलता के लिये नेतृत्व अति आवश्यक है परन्तु, सामान्यतः हमलोगों के मन में नेतृत्व की कोई स्पष्ट अवधारणा नहीं होती। इस विषय पर अन्यत्र कोई पुस्तक मिलने की सम्भावना भी बहुत कम है। हाल ही में इस विषय पर एक पुस्तक अमेरिका में प्रकाशित हुई है, किन्तु उसमें केवल कुछ अमेरिकी राष्ट्रपतियों की जीवनी तथा उपलब्धियों का ही वर्णन है। भारत में 'चुनाव जीतने का कौशल' - जैसे विषयों पर कुछ पुस्तकें बाजार में अवश्य आयी हैं; किन्तु समाज को समुचित दिशा देने के लिये किस प्रकार के नेताओं की आवश्यकता है, अथवा  किसी संगठन या आंदोलन को उसका लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में अग्रसर रखने के लिये किसी नेता में कौन कौन से गुण रहने चाहिये, और उन गुणों को कैसे अर्जित किया जाता है ? इस विषय में हमारे पास कोई स्पष्ट अवधारणा ही नहीं है। देश की युवा पीढ़ी को राष्ट्र की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर देने के लिये उत्प्रेरित करने में सक्षम नेता की विशेषता क्या होती है -इन उद्देश्यपूर्ण प्रश्नों के ऊपर हम कभी गम्भीरता से विचार करने की चेष्टा भी नहीं करते। 
महामण्डल के वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर में विगत ४९ वर्षों से इसी विषय पर विचार-विमर्श और परिचर्चाएँ होती रही हैं, तथा जिन्हें समय समय पर महामण्डल की संवाद पत्रिका 'विवेक-जीवन' में प्रकाशित भी किया जाता रहा है, यह पुस्तक उसी संवाद-पत्रिका में छपे कुछ सम्पादकीय लेखों को आधार बनाकर लिखी गई है। आशा की जाती है कि यह पुस्तक न केवल उन युवाओं के लिये उपयोगी सिद्ध होगी जिन्हें भविष्य में इस आन्दोलन को संचालित करने का उत्तरदायित्व निभाना पड़ेगा, बल्कि उनके अतिरिक्त अन्य जो कोई भी व्यक्ति समाज का कल्याण करने के किसी भी कार्य से संयुक्त वे सभी इस पुस्तक से लाभ उठा सकते हैं।]  

'नेतृत्व की अवधारणा तथा उसके प्राकट्य का सिद्धान्त'
वर्तमान समय में 'नेता' शब्द इतना बदनाम हो गया है कि नेता शब्द सुनने मात्र से ही मन वितृष्णा से भर उठता है। किन्तु, हमें इसे केवल गलत अर्थों में न लेकर, इसके यथार्थ मर्म को भी समझने की चेष्टा करनी चाहिये। आइये, हमलोग यह समझने का प्रयास करें कि नेतृत्व या लीडरशिप आखिर कहते किसे हैं, हमें अपने जीवन में क्यों और कहाँ एक मार्गदर्शक नेता की आवश्यकता का अनुभव होता है, तथा सच्चे नेता वास्तव में कौन होते हैं ?
हमलोग यह जानते हैं कि यद्यपी सभी मनुष्य एक ही 'वस्तु' (ब्रह्म) द्वारा निर्मित हुए हैं, तथापि गुण और सामर्थ्य की दृष्टि से सभी मनुष्य एक समान नहीं हैं। फिर भी हम सभी लोग हर दृष्टि से एक समान होना चाहते हैं, किन्तु व्यक्तावस्था में दिव्यता (ब्रह्मत्व) की अभिव्यक्ति में तारतम्य रहता ही है, इसीलिये प्राकृतिक तौर से सभी मनुष्य कभी एक समान नहीं हो सकते। (मिट्टी का हाथी और मिट्टी का चूहा में अंतर हमेशा रहता है, किन्तु मिट्टी की अवस्था में दोनों एक हैं)
 विविधता ही सृष्टि का आधार है, इसीलिये सृष्ट जगत में विविधतायें स्वाभाविक तौर पर रहती हैं सृष्टि का अर्थ ही होता है, भिन्न भिन्न प्रकार की वस्तुऐं। विविधताओं से रहित सृष्टि की कल्पना भी नहीं की जा सकती। [पेपर पिन बनाने वाली फैक्ट्री के मालिक कहते हैं, यद्यपि सारे पिन एक ही मशीन से निकलते हैं, तथापि बनावट की दृष्टि से प्रत्येक पिन एक दूसरे से भिन्न हो जाता है]
हमलोगों की गीता-उपनिषद की प्राचीन विरासत के अनुसार, हमारे अपने देश के ऋषि-मुनियों के दर्शन के अनुसार एक 'ब्रह्म' ही मात्र वस्तु (परमसत्य) हैं, और उसी 'एकमेवाद्वितीयम' - एक मात्र वस्तु से यह सारी सृष्टि अभिव्यक्त हुई है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि सृष्टि के प्रारम्भ से पहले केवल साम्य और संतुलन की अवस्था थी। उस समय जब केवल एक ही वस्तु विद्यमान हो, उस समय समता न हो, ऐसा हो नहीं सकता। किन्तु जैसे ही उस मौलिक या आदि साम्यावस्था में विक्षोभ उत्पन्न हुआ कि, उसी क्षण सृजन-लीला का प्रारम्भ हो गया। 
[ Quotes: of Sir Julian Huxley: 1. Trans-humanism (1957) 2. The New Divinity (1964)
    The earth was not created; it evolved. So did all the animals and plants that inhabit it, including our human selves, mind and soul as well as brain and body. So did religion.
        The entire cosmos is made out of one and the same world-stuff, operated by the same energy as we ourselves. "Mind" and "matter" appears as two aspects of our unitary mind-bodies.
There is no separate supernatural realm: all phenomena are part of one natural process of evolution. There is no basic cleavage between science and religion; they are both organs of evolving humanity.
    One thing is certain, that the well-developed, well-integrated personality is the highest product of evolution, the fullest realization we know of in the universe.
    We define the possessor of personality as a self-conscious individual, or as an individual whose individuality is more extensive both in space and time than the material substance of his body.
    The Individual in the Animal Kingdom" ; to Selfish Genes: In man, personality is usually defined with reference to self-consciousness rather than to individuality.
    (with thank sourced from https://en.wikiquote.org)] 

इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि सृजन (या मेनिफ़ेस्टेशन अभिव्यक्ति) के किसी भी स्तर में विविधताओं का अस्तित्व तो रहेगा ही - इस मूल बात को हमे अपने मन में बैठा लेना होगा। इस वैषम्य को कभी टाला नहीं जा सकता, किन्तु इसी विविधता में एकता छुपी हुई है - यह बात भी समझनी होगी। इसीलिये हमारा सारा प्रयास इसी बात के लिये होना चाहिये कि सतही तौर से दिखाई पड़ने वाले ऊँच-नीच आदि असमानताओं की उपेक्षा करके सम्पूर्ण विश्व में एक सार्वभौमिक समानता एवम साम्यभाव स्थापित हो जाययही हमारे जीवन का लक्ष्य है। वैषम्य और असामनता से परिपूर्ण इस विश्व को भी इसी लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर कराने के लिये-(सम्पूर्ण विश्व को आर्य बनाने या शूद्र को भी ब्राह्मण बनाने के लिये) हमें प्रयासरत रहना होगा। यही नेतृत्व की मौलिक अवधारणा है, इसीको आधार बनाकर हमलोगों का आत्मविकास,समाज
-कल्याण और मानव-कल्याण के सभी प्रयास संचालित करने होंगे। हमलोगों की समस्त गतिविधियाँ और कार्यक्रम नेतृत्व के इसी मौलिक सिद्धान्त के आधार पर संचालित होंगी। 
प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है, किन्तु पूर्णता की अभिव्यक्ति में तारतम्य रहने के कारण, समाज में एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य की अवस्था में -सांस्कृतिक, आर्थिक, नैतिक, सामाजिक, राजनैतिक, और धार्मिक दृष्टि से जो अंतर दिखलाई पड़ता है; उसे भी हमें स्वीकार करना पड़ेगा। इसी तारतम्यता के कारण  एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य में शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी अन्तर रहता है, उनके चेहरे की बनावट, क्षमता और रूचि में असंख्य अंतर रहता ही  है।  सृष्टि का अर्थ ही विभिन्नता है, इस वस्तुस्थिति को स्वीकार करके भी हमें समाज के सबसे पिछली पंक्ति में खड़े मनुष्यों को विकास, प्रगति, पूर्णता, समानता और साम्यावस्था को प्राप्त करने में सहायता करनी चाहिये(यदि जातिभेद रहना अनिवार्य ही है तो धन के आधार पर भेद करने से अच्छा है त्याग और पवित्रता के आधार पर वर्ग-भेद रहे। ) नेता को मनसा-वाचा-कर्मणा अपनी सारी शक्ति समाज के सबसे पीछे खड़े मनुष्य को भी उन्नत मनुष्य बनने के लिये अनुप्रेरित करने में नियोजित करना चाहिये
किन्तु, थोड़ा रुककर हमें पहले यह विचार कर लेना चाहिये कि इस कार्य का प्रारम्भ समाज के किस स्तर पर रहने वाले व्यक्ति से किया जाय ? यदि गम्भीरता से इस बात पर विचार किया जाय तो हम पायेंगे कि जो मनुष्य सर्वाधिक निम्नावस्था से, या सर्वाधिक साधारण अवस्था से थोड़े ऊँचे स्तर को प्राप्त कर चुके हों, वहीं से इस कार्य को प्रारम्भ करना अच्छा होगा। क्योंकि जो व्यक्ति स्वयं चेतना, बुद्धि और अनुभूति की दृष्टि से साधारण मनुष्यों से थोड़ा ऊँचे स्तर तक उठ चुका है , वह यदि प्रयास करे तो समाज के जो मनुष्य-चेतना, बुद्धि और अनुभूति की दृष्टि से उसकी अपेक्षा अभी निचले सोपान पर खड़े हैं- उन्हें ऊपर उठने में सहायता प्रदान कर सकता है! और यहीं से नेतृत्व के गुणों का प्रकाट्य या उद्गम (जेनेसिस ऑफ़ लीडरशिप ) होता है ! 
सृष्ट जगत में या समाज में जातिभेद और विषमतायें सदा से रहती आयी हैं, और रहेंगी इसको स्वीकार करते हुए भी हमलोग (५-अभ्यासों के माध्यम से) समाज को समानता, साम्यावस्था (विविधता में एकता) या पूर्णत्व प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होने में थोड़ी-बहुत सहायता अवश्य कर सकते हैं। हममें से प्रत्येक व्यक्ति जो ५-अभ्यास {स्वाध्याय (संकल्प-ग्रहण और स्वपरामर्श), मनःसंयोग, विवेक-प्रयोग, व्यायाम और प्रार्थना} के माध्यम से '3H' को विकसित करके थोड़ा उन्नततर मनुष्य बन गया है, अपनी अपेक्षा निम्नतर सोपान पर खड़े मनुष्य को ऊपर उठने में सहायता प्रदान कर सकता है। और सच्चे नेतृत्व की उत्पत्ति भी यहीं से होती है।
हमने देखा कि इस जगत में सभी मनुष्यों के एक जैसा दिखने पर भी, उनके गुण, बोधशक्ति, और अनुभव क्षमता में तारतम्य रहता है, और इसी आधार पर व्यक्त जगत में, और समाज में कई तरह की विभन्नतायें रहती हैं। इस भेदभाव और विषमताओं से परिपूर्ण इस जगत में जिस किसी भी व्यक्ति में निर्भीकता और आत्मश्रद्धा (ब्रह्मतेज और क्षात्र-वीर्य) जैसे विशिष्ट गुण दूसरों की अपेक्षा अधिक मात्रा में हों, वह व्यक्ति समाज और देश के कल्याण के लिये, अपने से नीचे सोपान पर खड़े मनुष्यों को ऊपर उठने में या उन्नततर मनुष्य बनने में अवश्य सहायता प्रदान कर सकता है नेता और नेतृत्व की यही मौलिक अवधारणा है।  

नेता कौन हैं ? कैसा व्यक्ति नेता होने के योग्य है ? इन दिनों यह शब्द प्रमुख रूप से चर्चा का विषय बना हुआ है। क्यों कि आज के समाज में नेता शब्द गौरव का परिचायक नहीं रह गया है। आमतौर से हम लोग केवल राजनीती के क्षेत्र के नेताओं को ही नेता समझते हैं। इसीलिए बहुत से लोगों के मन नेता बनने से ही वितृष्णा हो गई है, कि कहीं दूसरे लोग उसे भी गलत व्यक्ति तो नहीं समझ लेंगे? किन्तु केवल इसी कारण से हमलोग मानव जाति के सच्चे मार्गदर्शक नेताओं की अवहेलना नहीं कर सकते, तथा किसी प्रकाश-स्तम्भ के भाव में अँधरे रास्ते पर नहीं चल सकते। मानवजाति के सच्चे मार्ग-दर्शक नेता प्राचीन समय से ही रहे हैं, आज भी हैं , और भविष्य में भी रहेंगे। 
अतः कुछ शब्दों के वास्तविक अर्थ और प्रचलित अर्थ को लेकर जो पूर्वाग्रह है, उसे हमें दूर हटाना होगा, तथा उसे उनके सही अर्थों में ग्रहण करना होगा। मानव सभ्यता के इतिहास में मनुष्य जाति को ऊपर उठाने, सन्मार्ग दिखलाने और नेतृत्व प्रदान करने के दायित्व को अपने कन्धों पर उठा लेने वाले सच्चे नेताओं या अवतारों का प्राकट्य शताब्दियों और सहस्राब्दियों से होता चला आ रहा है। उन्हीं में से कुछ को आज हमलोग श्रीराम, पार्थसारथी श्रीकृष्ण, बुद्ध, ईसा, मोहम्मद, श्रीचैतन्य, श्रीरामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द के नाम से जानते हैं। ये सभी मनुष्य जाति के सच्चे नेता हैं। 
जब हमलोग लीडरशिप के ऊपर चर्चा करते समय Leader लिखते हैं, तो उस समय कैपिटल L से उसकी शुरुआत करनी पड़ती है। 'L' अक्षर से आरम्भ होने वाले जितने भी सुन्दर शब्द हैं, उन सब में 'LOVE' से बढ़कर सुन्दर दूसरा और कोई शब्द नहीं है। एक बार स्वामी विवेकानन्द को बार बार अनुरोध किया गया कि अपने गुरु श्रीरामकृष्ण के ऊपर कुछ कहिये। वे उनके परम प्रेम के धन थे, उनके पथप्रदर्शक और गुरु थे, उनके सर्वस्व थे -उनके लिए उन्होंने अपना सारा जीवन न्योछावर कर दिया था। किन्तु, उनके बारे में एक शब्द बोलने में भी स्वामीजी अपने को असमर्थ पा रहे थे, वैसे तो वे जगत के विभन्न विषयों पर लम्बे व्याख्यान दे सकते थे, कई ग्रन्थ लिख सकते थे, किन्तु उन्होंने कहा मैं उनके विषय में कुछ नहीं कह सकता। उनको संकोच हो रहा था कि उनके मुख से निकला कोई शब्द उनके जीवन-सर्वस्व उनके मार्गदर्शक नेता की महानता को, उनकी महिमा को कहीं सीमित तो नहीं कर देगा ?  वे तो इतने विशाल हैं, इतने अगाध समुद्र जितने गहरे हैं, आकाश जैसे अनन्त हैं ! कैसे उनकी सर्वव्यापकता को मापा कैसे जाय, वे सोच भी नहीं पा रहे थे कि उस विशालता को शब्दों में व्यक्त किया जाय? किन्तु, जब बार-बार अनुरोध किया जाने लगा -तो अवतार वरिष्ठ, आधुनिक युग के भगवान और मानवजाति के सच्चे मार्गदर्शक नेता के अद्भुत व्यक्तित्व को केवल एक शब्द में व्यक्त करते हुए कहा था - वे 'LOVE' हैं, श्रीरामकृष्ण मूर्तमान प्रेम हैं ! (श्रीठाकुर लव पर्सोनिफाइड हैं!)
कोई व्यक्ति सच्चा नेता केवल तभी बन सकता है, जब उसके हृदय में इस अनन्त प्रेम की अग्नि का एक छोटा सा स्फुलिंग, या एक छोटा सा कण भी उसे प्राप्त हुआ हो। जिस व्यक्ति के हृदय में इस प्रेम का एक छोटा सा अंश भी विद्यमान नहीं है, कभी सच्चा पथ-प्रदर्शक या नेता नहीं बन सकता। वह किसी भी मनुष्य को उन्नततर मनुष्य बनने, आत्म-विकास करने या अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करने की दिशा में अग्रसर होने में उसका मार्गदर्शन नहीं कर सकता। अतः अवतार-जिज्ञासु वेदान्त परम्परा, या श्रीरामकृष्ण -विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में नेतृत्व-सम्बन्धी इस नूतन सिद्धान्त के आलोक में - लीडरशिप ट्रेनीज़, वुड बी लीडर्स या भावी नेताओं को अपने हृदय में विद्यमान इसी अनन्त प्रेम को अभिव्यक्त या विकसित करने के लिये प्रयासरत रहना चाहिये। अब हमलोग यह देख सकते हैं कि श्रीकृष्ण, गौतम बुद्ध, ईसामसीह, मोहम्म्द, श्रीरामकृष्ण, स्वामी विवेकानन्द आदि मानवजाति के विभिन्न  मार्गदर्शक नेताओं में केवल वही अनंत प्रेम मूर्तमान हुआ थावे केवल उसी प्रेम की विभिन्न अभिव्यक्तियां थे। उन विविध नाम-रूपों में, या विभिन्न आकृतियों में केवल अनंत प्रेम ही मूर्तमान हुआ था।
 क्या हमलोग भी नेता नहीं बन सकते ? क्या उस अनंत प्रेम का एक छोटा सा अंश भी अपने हृदय में जागृत नहीं कर सकते ? क्या अपने आस-पास रहने वाले लोगों से थोड़ा भी प्रेम नहीं कर सकते ? क्या हम उन्हें इस अनित्य और दुःखपूर्ण संसार के कष्ट, अभाव और विवशता के दल-दल से निकलने में उनकी कोई सहायता नहीं कर सकते,उन्हें थोड़ा भी ऊपर नहीं उठा सकते ? निश्चय ही हममें से प्रत्येक व्यक्ति जो महामण्डल के द्वारा निर्देशित ५ -अभ्यासों को आत्मसात करने में निष्ठापूर्वक लगा है,-ऐसा कर सकते हैं; और हमलोग ऐसा ही करेंगे भी। 
हमलोग भी सच्चे नेता बनेंगे। और ऐसा नेता बन जाने के बाद कितनी धन्यता का अनुभव करेंगे, स्वयं को स्वामीजी का सैनिक और होली ट्रायो का दास समझेंगे! आज हमारे देश को इसी प्रकार के लाखों नेताओं की आवश्यकता है। अभी हमलोग कितने क्षुद्र, कितने दुर्बल, कितने अभावग्रस्त हैं ! किन्तु, यदि हमलोग स्वयं को बड़ा (बृहद या ब्रह्म) बनना चाहते हैं, सबल होना चाहते हैं तथा दूसरों को भी बड़ा (ब्रह्म) बनने में सहायता करना चाहते तो, हमें पहले महामण्डल द्वारा निर्देशित ५ अभ्यासों का पालन करके अपने चारित्रिक गुणों और कार्यक्षमता को विकसित करना होगा, साथ ही साथ अपने आस-पास रहने वाले लोगों को भी इन पाँच अभ्यासों के महत्व को समझाकर उसका दैनन्दिन जीवन में पालन करने के लिये अनुप्रेरित करना होगा, ताकि वे भी बड़ा (बृहद-ब्रह्म को जानकर ब्रह्मविद मनुष्य) या यथार्थ मनुष्य बन सकें! 
[इंकार्नेशन-एस्पिरेंट वेदान्त परम्परा, श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में अनंत प्रेम पर आधारित] लीडरशिप-ट्रेनिंग या नेतृत्व-प्रशिक्षण के सम्बन्ध में इस संक्षिप्त जानकारी से परिचित होने के बाद क्या हमें ऐसा अनुभव नहीं होता कि 'नेतृत्व की अवधारणा तथा उसके प्राकट्य का सिद्धान्त' अपने आप में एक उदार तथा महान विषय है ? सचमुच वे लोग एक महान नेता थे, मानवजाति के सच्चे पथ-प्रदर्शक थे, और हमलोगों को भी उस 'ऋषि-जिज्ञासु वेदान्त परम्परा' में प्रशिक्षित नेता बनकर दूसरों को भी ऐसा नेता (ऋषि) बनने के लिये अनुप्रेरित करना चाहिये क्योंकि जिस प्रकार के सच्चे नेता पहले थे, आज देश को उससे भी बड़ी संख्या में सच्चे नेताओं की आवश्यकता है। 
हमने यह देखा है कि इस सृष्ट-जगत में विभिन्नतायें और असमानतायें प्राकृतिक तौर विद्यमान हैं, और रहेंगी। इस वस्तुस्थिति को स्वीकार करते हुए भी, जो लोग 'श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा' के अनंत-प्रेम पर आधारित नेतृत्व प्रशिक्षण के सिद्धान्तों को आत्मसात करने में समर्थ हैं,तथा समाज के दूसरे लोगों को नेतृत्व प्रशिक्षण देने के लिए इच्छुक हों, उन्हें आगे आना चाहिये और इस नेतृत्व प्रशिक्षण-पद्धति का प्रचार-प्रसार करने में सहायता करनी चाहिये
 श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा के अनन्त प्रेम पर आधारित नेतृत्व का यह अभिनव सिद्धान्त आज भी क्रियाशील है। स्वामी विवेकानन्द ने अपने जीवन काल में ही भविष्यवाणी करते हुए कहा था- " इस अवतार-जिज्ञासु वेदान्त परम्परा में नेतृत्व प्रशिक्षण के अभिनव सिद्धान्तों की तरंगें ऊँची उठ चुकी हैं। अनंत प्रेम के उस प्रचण्ड जलोच्छ्वास का कुछ भी प्रतिरोध न कर सकेगा, आध्यात्मिकता की बाढ़ आ गयी है। निर्बाध, निःसीम, सर्वग्रासी उस प्लावन को मैं भूपृष्ठ पर अवतरित होता देख रहा हूँ। इस ज्वार ने लगभग सम्पूर्ण विश्व को ही ढक लिया है। अब इसे कोई रोक नहीं सकता, कोई भी शक्ति इन प्रेम-तरंगों को फिर से वापस समुद्रतल में ढकेल नहीं सकती। यह ज्वार आगे बढ़ते हुए सम्पूर्ण धरातल को आच्छादित कर लेगा, ये विचार सभी के मस्तिष्क में प्रविष्ट हो जायेंगे, सम्पूर्ण मनुष्य जाति (जाति-धर्म का भेदभाव किये बिना) इन विचारों से प्रभावित हो जायेगी। "
हमलोग 'नेतृत्व की अवधारणा और उसके प्रकाट्य' के सिद्धान्तों (५-अभ्यासों) को जीवन और व्यवहार में अपनाकर स्वयं अपनी अंतर्निहित पूर्णता या (ब्रह्मत्व) को अभिव्यक्त करेंगे, तथा अपने आस-पास रहने वाले कुछ दूसरे लोगों को भी इसके लिये अनुप्रेरित करेंगेतथा उन्हें भी अपने साथ लेकर आगे बढ़ते जायेंगे
हमे केवल स्वयं शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक दृष्टि से समृद्ध बनने की चेष्टा करने, और अपने आस-पास रहने वाले अन्य लोगों को असत विचारों की अग्नि में झुलसते छोड़ देने से, सन्तुष्ट नहीं होना चाहिये, बल्कि उन्हें भी आत्मविकास करने के लिए अनुप्रेरित करते रहना चाहिये। नेतृत्व की अवधारणा का सारांश है, स्वयं शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध होना और दूसरों को भी भ्रान्त धारणा और चिन्ता में न छोड़कर, अपने साथ-साथ आगे बढ़ाना।
 श्रीरामकृष्ण कहते थे- " कुछ तख्ते इस प्रकार की लकड़ियों से बने होते हैं कि उस पर यदि एक कौवा भी बैठ जाये तो वह डूब जाता है; पर कुछ तख्ते ऐसी लकड़ियों से बने होते हैं जो स्वयं डूबे बिना अपने साथ- साथ अपने ऊपर लदे बोझ को भी नदी के उस पार तक पहुँचा सकते हैं। " जो लोग मनुष्य जाति के सच्चे नेता होते हैं -वे इसी प्रकार के न डूबने वाले तख्ते जैसे होते हैं
वे दूसरों के भार (५ अभ्यासों के लिए अनुप्रेरित करते रहने के दायित्व) को भी अपने कन्धों पर उठा लेते हैं। तथा इसके बदले में वे कोई पारिश्रमिक, लाभ या पुरष्कार पाने की आशा नहीं रखते बल्कि केवल लोक-कल्याण की इच्छा से दूसरों का भार उठाते हैं । उनके सामने जीवन का केवल एक ही लक्ष्य रहता है - दूसरों की उन्नति, सुधार, विकास, समानता और पूर्णत्व को अभिव्यक्त करने में सहायता करना, तथा इस उद्देश्य के पीछे इच्छा और आग्रह का जो प्रेरणा श्रोत होता है, वह होता है -'LOVE'! प्रेम ही ईश्वर है ! (उसके हृदय में विद्यमान यह अनंत प्रेम उसे अपना ईश्वरत्व -या विष्णुत्व या नेतापन भूलने ही नहीं देता। हमारे हृदय में विद्यमान आधुनिक युग के भगवान श्रीठाकुर) भगवान प्रेमस्वरूप हैं, तभी तो वे मनुष्य को भगवान बनाने के लिये बार बार इस धरती पर मनुष्य के रूप में अवतरित होते रहते हैं !
---------------------- 
नेता की विशिष्ट शक्ति
 विश्व के इतिहास का सिंहावलोकन करने से हमें पता चलता है कि केवल वैसे ही व्यक्तियों को मानवजाति का सच्चा मार्ग-दर्शक नेता माना गया है, जिनके भीतर सांसारिक ज्ञान के अतिरक्त एक दूसरी विशिष्ट योग्यता भी थी। और वह विशिष्ट योग्यता थी, उन सबों में विद्यमान आध्यात्मिक शक्ति! विशेष रूप से भारत में तो आध्यात्मिक शक्ति को नेतृत्व की कसौटी मानने की परम्परा रही है। यहाँ केवल उसी व्यक्ति को मानव-समाज का नेता माना जाता है, जिनके भीतर आध्यात्मिक शक्ति अनिवार्य रूप से रहती है। मानव इतिहास के प्रारम्भ से ही भारत भूमि पर इस प्रकार के कई नेता आविर्भूत हुए हैं, जिन्होंने न केवल भारत का अपितु सम्पूर्ण मानवजाति को ज्ञान के प्रकाश द्वारा मार्गदर्शन किया है। 
आज न्यूनाधिक सम्पूर्ण विश्व में यह स्वीकार किया जाने लगा है कि मानव-सभ्यता को ज्ञान के आलोक द्वारा समृद्धि प्रदान करने में भारतवर्ष का अंशदान प्रचुर रहा है; और इसका सबसे ताजा प्रमाण है यूएनओ द्वारा २१ जून को अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित करना ! किन्तु इसका अर्थ यह नहीं समझ लेना चाहिये कि भारत
केवल योग-विद्या,अध्यात्म-विद्या या उपनिषद-विद्या में ही अग्रणी देश था, अपितु भारत ने उपग्रह विज्ञान, चिकित्सा-विज्ञान, शिल्प-कौशल, इंजिनयरिंग के विभिन्न क्षेत्रों में तो कम से कम ५००० वर्ष पूर्व ही यथेष्ट ज्ञान अर्जित कर लिया था। किन्तु इन सबके अतिरिक्त भारत योग-विद्या, परा-विद्या या आध्यात्मिक ज्ञान सम्पन्न ऋषियों-मुनियों की जन्मस्थली भी रहा है। यही वह कारण है जिसके चलते भारत के महापुरुषों ने अपने जीवन और सन्देश के द्वारा न केवल भौतिक उन्नति के लिये मार्गदर्शन किया है, अपितु आत्मविकास के द्वारा जीवन पुष्प को प्रस्फुटित करने में भी मनुष्य जाति के सच्चे मार्गदर्शक नेता बने रहे हैं।
तथा स्वामी जी का मानना था कि जैसे सच्चे धर्म और विज्ञान में कोई विरोध नहीं है , उसी प्रकार विज्ञान और सच्ची आध्यात्मिकता में भी कोई विरोध नहीं है। केवल पाश्चात्य इतिहास में ही हमलोग धर्म और विज्ञान के बीच शत्रुता और वैर-विरोध देखते हैं। उसका कारण यह है कि पाश्चात्य धर्म केवल विश्वास के ऊपर आधारित है, और भारत का धर्म प्रारम्भ से ही वैज्ञानिक पद्धति के ऊपर प्रतिष्ठित है।
स्वामीजी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग धर्म के क्षेत्र में भी किया जाना चाहिए। और जो धर्म वैज्ञानिक-परीक्षण की  कसौटी पर खरे नहीं उतरते उनका समाप्त हो जाना ही उचित है। उसी में मनुष्यों का कल्याण है। जो धर्म वैज्ञानिक प्रणाली के ऊपर प्रतिष्ठित नहीं हैं, वे चिरकाल तक टिक नहीं सकते, एवं मनुष्यों का कल्याण भी नहीं कर सकते। अतः जितनी जल्दी हो सके उन्हें अलविदा कदिया जाना अच्छा है। 
अवतार -जिज्ञासु परम्परा या श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में हमलोग व्यावहारिक वेदान्त को या वैज्ञानिक धर्म को जीवन में प्रयुक्त होते हुए देख सकते हैं। जब श्रीरामकृष्ण और स्वामी विवेकानन्द का प्रथम साक्षात्कार होता है,उसी समय जिज्ञासु नरेंद्रनाथ, आधुनिक युग में भगवान के अवतार श्रीरामकृष्ण से पूछते हैं -' महाशय, आपने क्या ईश्वर को देखा है ? ' और आन्तरिक विश्वास के साथ सरल उत्तर मिलता है, ' हाँ, देखा हूँ, तुमको जिस प्रकार देख रहा हूँ, उससे भी स्पष्ट रूप से देखा हूँ, और चाहोगे तो तुम्हें दिखा भी सकता हूँ !' श्रीरामकृष्ण नरेन्द्रनाथ के समक्ष एक बिल्कुल विज्ञानसम्मत प्रस्ताव रखते हैं। 
इस प्रस्ताव से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि परमसत्य (ब्रह्म या ईश्वर) को जानने की एक सार्वजनिक वैज्ञानिक पद्धति अवश्य है ! और विश्व का जो कोई भी मनुष्य इस सार्वभौमिक वैज्ञानिक पद्धति से अग्रसर होगा, उसे एक ही परिणाम प्राप्त होगा इस पद्धति में कोई मनुष्य - स्त्री हो पुरुष, बहिष्कार करने योग्य नहीं है या अपवाद स्वरूप कोई नहीं है !
इसको ही कहते हैं, (गीता-उपनिषद पम्परा में) धर्म के क्षेत्र में भी वैज्ञानिक प्रणाली से अग्रसर होना।
यदि तुम स्वयं भी इस विज्ञानसम्मत पद्धति (महामण्डल के ५ अभ्यास  के द्वारा यम-नियम का पालन करते हुए ) मन को वाह्य विषयों से खींचकर अपने हृदय में विद्यमान अल्ला, गॉड या भगवान अथवा आत्मा में एकाग्र करने का अभ्यास करो तो तुम्हें भी वही आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होगी, जो तुमसे पहले योग-विद्या क्षेत्र के वैज्ञानिकों या ऋषियों को प्राप्त हुई थी। तुम्हें भी उसी 'एकमेवाद्वित्य ब्रह्म' (परम-सत्य) की अनुभूति होगी जो तुमसे पहले असंख्य ऋषियों को हो चुकी है जो कोई भी इस पद्धति 'श्रीरामकृष्ण-नरेन्द्रनाथ वेदान्त परम्परा के पथ से अग्रसर होगा, उसे एक ही परिणाम प्राप्त होगा - उसे अपरिवर्तन- शील या अविनाशी
 परमसत्य की उपलब्धि कहें, या अल्ला, ईश्वर, गॉड किसी भी नाम से पुकारें। अतः हिन्दू हो या मुसलमान प्रत्येक मनुष्य को व्यावहारिक जीवन में आध्यात्मिक-शक्ति प्राप्त करने महत्व को समझना जरूरत है। क्योंकि मनुष्य केवल एक जन्तु या विवश होकर अधीन रहने वाला दो पैरों से चलने वाला कोई बुद्धिमान पशु ही नहीं हैअथवा मनुष्य आर्थिक नियमों द्वारा चालित, कोई राजनैतिक प्राणी भी नहीं है, वास्तव में प्रत्येक मनुष्य ही -'अव्यक्त ब्रह्म है' या एक आध्यात्मिक सत्ता है ! 
मनुष्य को यदि अपनी अन्तर्निहित सम्भावना को विकसित करना हो, अपने यथार्थ स्वरूप को अनावृत करना हो, महान बनना हो तो, उसे इस विज्ञानिक-आध्यात्मिक पद्धति की सहायता लेनी ही होगी। अन्य कोई उपाय नहीं है। जिसको हमलोग धर्मनिरपेक्ष-शिक्षा (अपरा विद्या) कहते हैं, वह भी धार्मिक-शिक्षा (परा विद्या) का ही एक अंग है। 
इस बात को समझने की चेष्टा करनी होगी। क्योंकि एक ही अध्यात्मिक 'सत्ता' जिसको हमलोग आत्मा, ब्रह्म, परमसत्य या अल्ला कहते हैं, प्रत्येक वस्तु में परिव्याप्त हैं ! उस सर्वव्याप्त सत्ता को  विज्ञान कभी अपनी प्रयोगशाला में (सर्न की लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर में ?) आविष्कृत नहीं कर सकता। किन्तु आधुनिक विज्ञान क्रमशः परमसत्य के निकट आता जा रहा है। यह किसी दिन इसके अत्यन्त निकट तक भी पहुँच सकता है (हाल ही में गॉड-पार्टिकल को खोजने का दावा किया है किन्तु अन्ततोगत्वा विज्ञान को भी - प्रयोगशाला में वैज्ञानिक उपकरणों और भौतिक इन्द्रियों के माध्यम से उस परमसत्य (आत्मा -जिससे सब वस्तु निकली है, जिसमें स्थित है, जिसमें लीन हो जाती है) का अनुसन्धान करने की ज़िद को छोड़कर इस विज्ञानसम्मत आध्यात्मिक प्रणाली 'व्यावहारिक वेदान्त' की शरण में आना ही पड़ेगा। एक दिन विज्ञान को अपनी छुक-छुक गाड़ी का त्याग करके आध्यात्मिक-राकेट (मनःसंयोग रूपी प्रक्षेपास्त्र) में कूदकर चढ़ना ही पड़ेगा। इक्कीसवीं शताब्दी में जो सबसे बड़ी घटना घटने वाली है, वह है 'विज्ञान और धर्म' एक दूसरे से हाथ मिलाकर आगे बढ़ेंगे, विज्ञान और आध्यात्मिकता के बीच एक प्रगाढ़ सम्बन्ध स्थापित हो जायेगा दोनों का सम्मिलन होगा-स्वामी विवेकानन्द ने यह भविष्यवाणी उन्नीसवीं सदी में ही कर दी थी। 
मशीनी मानव को हृदयवान मनुष्य में रूपांतरित करना : 
हममें से प्रत्येक मनुष्य को अपने अंतर्निहित दिव्यता या ब्रह्मत्व के ऊपर, नचिकेता के समान अटूट श्रद्धा और विश्वास रखते हुए 'बाह्य-प्रकृति और अंतःप्रकृति' को चारों योगों (या ५-अभ्यास) के माध्यम से वशीभूत करके उस ब्रह्मत्व को अभिव्यक्त करने के प्रयत्न में जुट जाना होगा ! 
अब हमें अपने जीवन को इस प्रकार गढ़ना होगा जो दूसरों के लिए उदाहरण स्वरुप हो। मानवजाति के सच्चे मार्गदर्शक नेताओं के जीवन और सन्देश से हमें यह शिक्षा ग्रहण करनी ही होगी। हममें से प्रत्येक के भीतर अनंत-प्रेम, अनंत ज्ञान और अनंत ऊर्जा का एक श्रोत (श्रीठाकुर ) विद्यमान है, यह मानव-जीवन उसी श्रोत को उद्घाटित करने के लिए प्राप्त हुआ है; अतः हमें अपने हृदय में पड़े अहं रूपी पत्थर या अवरोध को हटाकर उस श्रोत को अवश्य उद्घाटित कर लेना चाहिए !
क्योंकि महामण्डल के नेताओं का अपना जीवन और चरित्र इतने सुंदर रूप से गठित होना चाहिये, उनका हृदय उस आध्यात्मिक शक्ति -अनन्तप्रेम से इतना भरा हुआ होना चाहिए- कि वह उनके आस-पास रहने वाले लोगों में चरित्र-निर्माण के लिये प्रेरणा, उत्साह और शक्ति को संचारित करने में समर्थ हो ! यदि हमलोग नेतृत्व के सम्बन्ध इस आध्यात्मिक-शक्ति (अनन्तप्रेम) की अनिवार्य क्षमता आत्मसात कर लेते हैं, तो हममें से प्रत्येक व्यक्ति मानवजाति का सच्चा पथ-प्रदर्शक या नेता बनने की योग्यता अर्जित कर सकता है। इस आध्यात्मिक शक्ति को प्राप्त कर लेने के बाद ही हमलोग अपने आस-पास रहने वाले भाइयों को भी भावी नेता बनने के लिये अनुप्रेरित कर सकते हैं। और समाज के प्रति हमारी सच्ची सेवा भी यही होगी। 
प्रत्येक सच्चे नेता में जो एक विशिष्ट आध्यात्मिक शक्ति रहती है, वह उन्हें अपनी अंतर्निहित सार-वस्तु, (आत्मा के ब्रह्मत्व) की अनुभूति जन्य धारणा से ही प्राप्त होती है ! 
अतः हमें इस दुर्लभ मानव-जीवन के मूल्य को अवश्य समझना चाहिये, तथा अपनी अन्तर्निहित दिव्यता या चरित्र के उत्तम २४ गुणों को अभिव्यक्त करने,और १२ दोषों को दूर हटाने के लिये सतत प्रयत्नशील रहते हुए ऐसा पवित्र-जीवन जी कर दिखाना चाहिये-जो दूसरों के लिये उदाहरण स्वरूप होऐसे पवित्र-जीवन को हम किस प्रकार गठित कर सकते हैं ? हमें इसकी शिक्षा -- आधुनिक युग में मानवजाति के तीन सच्चे मार्गदर्शक नेता, 'श्रीठाकुर-माँ सारदा और स्वामी विवेकानन्द' जिन्हें 'होली ट्रिनिटी' या पवित्र-त्रिदेव भी कहा जाता है, के जीवन और सन्देशों से ही ग्रहण करनी होगी
'मन ही मनुष्यों के बन्धन और मुक्ति का कारण है' - अतः हमें अपने मन को अवश्य नियंत्रण में रखना होगा, अपनी इन्द्रियों को वशीभूत करना होगा, लालच को कम करते हुए भोगाकांक्षाओं को अवश्य सीमित करना होगा, इसके साथ साथ हृदय (अनन्तप्रेम) को भी विस्तृत करना होगा -खुली आँखों से ध्यान करते हुए यह समझना होगा कि कोई पराया नहीं है, सभी मेरे अपने हैं ! हमें अपने मन से समस्त स्वार्थपूर्ण विचारों, समस्त घृणा और सारी ईर्ष्या को दूर हटा देना होगा। केवल तभी हमलोग अच्छे नेता बन सकते हैं। जब हमारे मन-वचन और कर्मों से पवित्र-जीवन और आचरण अभिव्यक्त होने लगेगा केवल तभी हम एक अच्छे नेता बन पायेंगे और अपने आस-पास रहने वाले लोगों (या भावी नेताओं) को भी अनुप्रेरित करने में अपना प्रभाव डाल सकेंगे। हमारा सच्चा स्वरूप आत्मा है, हमलोग जड़ शरीर और मन ही नहीं हैं, जड़ तो हमारा दास है - हमलोग मन के ऊपर अवश्य विजय प्राप्त करेंगे यही विश्वास हममें से प्रत्येक के मन रहनी चाहिए !
 जो लोग नेता बनना चाहते हैं उनको दूर-दृष्टि अवश्य रखनी चाहिये। उन्हें यह देखने में समर्थ होना चाहिये कि यदि हमलोग संघबद्ध होकर यदि लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ें तो इस प्रकार के सच्चे नेताओं के निर्मित होने में कितना समय लगेगा ? हमें अपनी चिंतन-क्षमता को विकसित कर इसकी एक स्पष्ट धारणा बना लेनी चाहिये। स्वामी विवेकानन्द विश्वास करते थे कि " भारत अतीत में बहुत महान था, किन्तु निश्चित तौर पर उसका भविष्य और भी महान होने वाला है!" वे कहते थे-" मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि भारतवर्ष शीघ्र ही उस उच्चतम श्रेष्ठता को प्राप्त करेगा, जिसका स्पर्श उसने अभी तक नहीं किया है। प्राचीन ऋषियों की अपेक्षा श्रेष्ठतर ऋषियों का आविर्भाव होगा और तुम्हारे पूर्वज अपने वंशधरों की उन्नति को देखकर अत्यन्त सन्तुष्ट होंगे। भारत का भविष्य ऐसी अपूर्व महिमा से मण्डित होगा कि उसकी तुलना में भूतकाल के सारे गौरव फीके पड़ जायेंगे।" 
इस कार्य की जिम्मेवारी उन्होंने भारत के युवाओं के ऊपर ही सौंपी है। अतः हमें अपनी यथार्थ आध्यात्मिक उन्नति की ओर ओर सतत ध्यान केन्द्रित रखना चाहिये और आत्म-साक्षात्कार करके यथार्थ मनुष्य बन जाना चाहिये। क्योंकि केवल तभी हमलोग अपनी आंतरिक ऊर्जा श्रोत, या आध्यात्मिक शक्ति की सहायता से समाज की वर्तमान अवस्था में परिवर्तन लाने में सक्षम नेता बन सकेंगे! और आज हमें इसी प्रकार के हजारों नेताओं की आवश्यकता है। ऐसे नेताओं की आवश्यकता केवल देश और राज्य की राजधानियों में ही नहीं है, वरन छोटे-बड़े शहरों के गली-मुहल्लों, गाँवों तथा देश के कोने कोने में हैतथा ऐसे ही नेताओं का निर्माण करना महामण्डल का उद्देश्य है! और चाहे कम परिमाण में ही सही -इस प्रकार के मानवजाति के सच्चे मार्गदर्शक नेताओं का निर्माण करने की दिशा में अग्रसर भी है। 
यथार्थ मनुष्य बनना और बनाना - यही सर्वश्रेष्ठ समाज सेवा है! किन्तु, अभी हम लोगों ने स्वयं मनुष्य बनने के बजाये, मशीनों को ही अपना ईश्वर बना लिया है, और स्वयं उसके दास बन गए हैं। इसीलिये, हमलोग स्वयं भी एक हृदयहीन मशीन में रूपान्तरित हो गए हैं। 'श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में यथार्थ मनुष्य बनने और बनाने का प्रशिक्षण देने के बजाये, पाश्चात्य शिक्षा पद्धति के द्वारा हमने इस प्रकार के हृदय शून्य मशीनी मानवों का निर्माण किया है, जो केवल लेना ही जानते हैं, किन्तु देना नहीं जानते ! (देश से भी दामाद की तरह केवल लेना चाहते हैं, पुत्र की तरह निःस्वार्थ सेवा नहीं करना चाहते) वर्तमान शिक्षा के द्वारा हम सभी इस प्रकार के मशीनी-मानव या 'रोबोट' बन चुके हैं -जो अभी अत्यन्त स्वार्थी है, तथा भविष्य में आइ.ए.एस परीक्षा पास करके या उच्च पदों पर आसीन होकर घोर-स्वार्थी नरभक्षी राक्षस बन जाने की कामना रखते हैं ! 
यही कारण है कि आजादी के ६५ वर्ष बाद भी भारत की सामान्य जनता दुःख और दारिद्र से त्रस्त है। अभी हाल ही में उड़ीसा के कालाहाँडी में एक गरीब आदिवासी को एम्बुलेंस के आभाव में पत्नी की लाश को १० km तक कन्धों पर लाद कर पैदल चलना पड़ा है! कम से कम अब भी तो रॉबर्ट ब्राउनिंग की कविता के उस करुण-क्रंदन को चारों ओर फ़ैल जाना चाहिये, जहाँ वे कहते हैं - " Make no more giants, God! But elevate the race at once!" अर्थात हे ईश्वर ! कम से कम अब तो और अधिक राक्षसों को पैदा मत करो, बल्कि मनुष्य-जाति को अविलम्ब उन्नत करो ! 
किन्तु केवल करुण-स्वर से प्रार्थना करते रहने से ही काम नहीं चलेगा, मानव-जाति का मार्ग-दर्शक नेता बनने और बनाने को एक आंदोलन के रूप में देश के कोने कोने तक पहुँचा देना होगाइस सोये हुए विशालकाय तिमिंगिल को जागृत करना होगा। ये सभी ऋषि मुनियों की संताने हैं, किन्तु अभी अपनी महिमा के प्रति सोये हुए हैं। इस सवा सौ अरब की जनसँख्या वाले राष्ट्र को केवल वैसे युवा ही जाग्रत कर सकते हैं, जो स्वामी विवेकानन्द के आह्वान को सुनकर स्वयं जाग चुके हैं! इसके लिये सर्वप्रथम आवश्यक कार्य है स्वयं यथार्थ मनुष्य (५ अभ्यास के द्वारा ब्रह्मवेत्ता मनुष्य) बन जाना, और दूसरों को भी यथार्थ मनुष्य बनने की वैज्ञानिक पद्धति समझाकर नेता बनने के लिये अनुप्रेरित करना। 
इस प्रकार महामण्डल के कार्यों को करते करते हमारी चित्त-शुद्धि होगी और जैसे जैसे हमारा जीवन पवित्र होता जायेगा, हमलोग "श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा" में लीडरशिप ट्रेनिंग के उन समस्त सिद्धान्तों से अवगत होते जायेंगे, जिनके ऊपर महामण्डल का यह 'मनुष्य-निर्माण आंदोलन' आधारित है। हमें महामण्डल के आदर्श वाक्य -'BE AND MAKE' को अपने हृदय में सर्वोच्च स्थान देना चाहिये क्योंकि इससे बढ़कर कोई समाज-सेवा नहीं है, और देश तथा मानवता के लिये इससे अधिक श्रेष्ठ कोई दूसरा कार्य भी नहीं है। 
किन्तु इस 'मनुष्य निर्माण आंदोलन' के वास्तविक मर्म को भली-भाँति समझ लेना उतना आसान भी नहीं है श्रीरामकृष्ण-नरेन्द्रनाथ वेदान्त परम्परा में आधारित इस 'मनुष्य निर्माण आंदोलन' को सम्पूर्णता की दृष्टि से देखने पर ही हमलोग यह समझ सकते हैं कि हमारा यह आंदोलन इससे जुड़े सभी कर्मियों को उन्नततर मनुष्य में रूपांतरित करके, किस प्रकार उनके अंतर्निहित पूर्णत्व को अभिव्यक्त करने की दिशा अग्रसर करा देता है; इसके गूढ़ रहस्य या सारांश को समझने के लिये मानवता के इतिहास को अभी लम्बी यात्रा करनी होगी। 
मनुष्य अंतर्निहित अनंत सम्भावना ही जीवन के साथ साथ सामान्य रूप से ही पूर्णत्व प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होती जा रही है किन्तु इस 'पूर्णत्व' शब्द को सम्यक रूप से समझ लेना बहुत कठिन है , हमारे शास्त्रों (ईशावास्योपनिषद के शान्ति पाठ) में परमसत्य (ब्रह्म) को 'पूर्ण' कहा गया है -

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। 
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

'पूर्णमदः' अर्थात वह ब्रह्म पूर्ण हैं- ब्रह्म से बाहर कुछ भी नहीं है। फिर देखते हैं -'पूर्णमिदं'-इदं का अर्थ है यह (शरीर) अभिव्यक्त जगत । यह जगत भी पूर्ण है ! कैसे ? क्योंकि वही 'पूर्ण ' इस विश्व ब्रह्माण्ड में भी परिव्याप्त हैं। एवं ' पूर्णस्य पूर्णमादाय ' का अर्थ है यदि तुम स्वयं इस तथ्य की अनुभूति कर सको कि वही 'पूर्ण' या देश- कालातीत सत्य इस विश्व ब्रह्माण्ड के कण कण में ओत-प्रोत है (यह जगत 'ऐज इट इज' अभी जैसा भी दीखता हो 'ब्रह्ममय' ही है), तो इस दृष्टि से -ज्ञानमयी दृष्टि से, उस पूर्ण के बाहर शेष क्या बचा ? इसी को कहा गया - ' पूर्णमेवावशिष्यते'! अर्थात अब तुम तो खुली आँखों से ध्यान करते हुए यह देखने की चेष्टा करो कि यहाँ जो कुछ भी जगत के रूप में दृष्टिगोचर हो रहा है जगत (शरीर-मन आदि सापेक्षिक सत्य) भी ब्रह्म (निरपेक्ष सत्य) के सिवा और कुछ नहीं है ! 
सभी मनुष्यों के जीवन का लक्ष्य इसी पूर्णता को प्राप्त करना है -अर्थात हृदय में पहले से विद्यमान इस 'पूर्णत्व' को अभिव्यक्त करना है ! मनुष्यों के जीवन में जो सुख-दुःख आदि की घटनाएं घटती रहती हैं, वे उसे क्रमशः इसी पूर्णता तक पहुँचने में सहायता करती हैं। मनुष्य क्रमशः पूर्ण बनने की ओर अग्रसर हो रहा है- 'मैन इज मार्चिंग टुवर्ड्स परफेक्शन ' -यही है मनुष्य के जीवन की सच्ची कहानी, यही मानव-सभ्यता का सच्चा इतिहास है । 
[इसीलिये भगवान श्रीरामकृष्ण देव कहते हैं - " वे ही सब कुछ हुए हैं। संसार उनसे अलग नहीं है। 
गुरु वशिष्ठ के पास वेद पढ़कर श्रीरामचन्द्र को वैराग्य हो गया। उन्होंने कहा संसार अगर स्वप्नवत है, तो इसका त्याग करना ही उचित है। इससे दशरथ डरे। उन्होंने राम को समझाने के लिये गुरु वशिष्ठ के पास भेज दिया। वशिष्ठ जी ने कहा -'राम, हमने सुना है-तुम संसार छोड़ना चाहते हो ? तुम हमे समझा दो कि संसार ईश्वर से अलग एक वस्तु है। यदि तुम समझा सको कि ईश्वर से संसार नहीं हुआ तो तुम इसे छोड़ सकते हो। राम तब चुप हो रहे, कोई उत्तर न दे सके। " 
" सब तत्व अंत में आकाश-तत्व में लीन हो जाते हैं। सृष्टि के समय आकाश-तत्व से महत्-तत्व,महत्-तत्व से अहंकार, ये सब क्रमशः तैयार हुए हैं। अनुलोम और विलोम। भक्त इन सब मानता है। भक्त अखण्ड सच्चिदानन्द को भी मानता है, और जीव-जगत को भी।
" उत्तम भक्त कहता है वे ही सब कुछ हुए हैं, जो कुछ मैं देख रहा हूँ, सब उन्हीं के एक एक रूप हैं। नरेन्द्र पहले मजाक करके कहता था, अगर वे ही सब कुछ हुए हैं , तब तो लोटा भी ब्रह्म है, और थाली भी।
" परन्तु योग में विघ्न है -कामिनी -कांचन । यह मन जब शुद्ध हो जाता है, तब योग होता है। मन का निवास है कपाल में (आज्ञाचक्र में) , परन्तु दृष्टि रहती है मूलाधार (लिंग,गुदा और नाभि) में -अर्थात कामिनी और कांचन में। साधना करने पर उस मन की ऊपर की ओर दृष्टि होती है।
" विद्यारूपिणी स्त्री वास्तव में सहधर्मिणी है। वह स्वामी के ईश्वर-पथ में जाने में विशेष सहायता करती है। 
एक-दो बच्चे होने के बाद दोनों आपस में भाई-बहन की तरह रहते हैं। दोनों ही ईश्वर के भक्त हो जाते हैं -दास तथा दासी! " (हाजरा कभी कहता है,'मछली नहीं खाऊँगा।' पर फिर खाता है !) 
" मेरी इच्छा है कि मुझे दो चित्र मिलें।  एक चित्र में योगी धुनि जलाकर बैठा है,'अ योगी सीटेड बिफोर अ लाइटेड लोग'', और दूसरा चित्र, योगी गांजा का चिलम मुँह में लगाकर पि रहा है, और उसमें से एकाएक आग जल उठती है। 'अ योगी स्मोकिंग हेम्प ऐंड दी चारकोल ब्लैज़िंग अप ऐज ही पूल्स !" [वचनामृत 'गृहस्थ तथा संन्यासियों के लिये नियम' (रविवार, मार्च 9, 1884)]   
किन्तु साधारण मनुष्य इस बात को नहीं समझते, उनके पास सच्चे ज्ञान का आलोक नहीं पहुँच पाता है -इसीलिए उपनिषदों (बृहदअरण्यक उपनिषद-१.३.२८)। में ऋषि प्रार्थना करते हैं - 
'ॐ असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्माऽमृतं गमय। 
हे प्रभु! मुझे अन्धकार से प्रकाश की और ले चलो, अचैतन्य अवस्था (बेहोशी या अचेतावस्था) से मुझे सत्य के जगत में ले चलो, मृत्यु से अमरता की ओर मेरी गति हो। यही है क्रमशः उन्नततर मनुष्य बनने का मार्ग, इसी उन्नति के मार्ग पर हमें स्वयं भी चलना होगा, और अपने साथ साथ दूसरों को भी ले चलने की चेष्टा करनी होगी। 
[गीता-उपनिषद परम्परा, या अवतार-जिज्ञासु वेदान्त परम्परा में ] यह देखा गया है कि युगों युगों से इस धराधाम पर भगवान स्वयं मनुष्य शरीर धारण करके अवतरित होते रहे हैं, तथा साधारण जिज्ञासु शिष्यों या भक्तों को इसी चिरस्थाई या शाश्वत उत्थान के पथ पर आरूढ़ करा देने समर्थ होते हैं , इसीलिये उनको 'युग-नायक' या मानवजाति का सच्चा नेता कहा जाता है।
परन्तु, आज 'नेता' शब्द सुनते ही किसी राजनैतिक नेता का चेहरा सामने आ जाता है, और मन वितृष्णा से भर उठता है। किन्तु ऐसे (१५० दागी) नेता एक अलग प्रकार के अलीबाबा टाइप नेता, या गिरोह के सरदार होते हैं, नेता नहीं होते हमलोग महामण्डल में जब नेता के विषय में चर्चा करते हैं, तो उसका तात्पर्य 'विष्णुसहस्रनाम' में विष्णु का एक नाम है 'नेता'! उससे है; और उन्हीं के जैसे किसी नेता का चेहरा या जीवन को अपने सामने रखना होगा। जैसे बुद्ध, ईसा, मोहम्म्द, श्री चैतन्य और श्रीरामकृष्ण जो आधुनिक युग में ब्रह्म के अवतार हैं -यह बात उन्होंने नरेन्द्रनाथ से स्वयं कही थी ! हममें से प्रत्येक के मन में यह इच्छा रहना उचित होगा कि -मैं चाहे कुछ ही अंशों में सही पर उन्हीं के जैसा नेता बनूँगा! यही है लीडरशिप की सच्ची अवधारणा। 
अधिक धन होने और ऊँची डिग्री: हममें से प्रत्येक व्यक्ति को, चाहे छोटे से अंश के रूप में ही सही वैसा नेता बन जाने की चाहत अपने मन में अवश्य रखनी चाहिये। स्वामी विवेकानन्द ने कहा है कि न तो कोई घोर दरिद्र व्यक्ति और न कोई अत्यधिक धनी-मानी व्यक्ति ही समाज की सच्ची भलाई कर सकते हैं। उसी प्रकार न तो कोई उच्च डिग्री प्राप्त तथाकथित रूप से अत्यन्त शिक्षित व्यक्ति और न कोई घोर अज्ञानी व्यक्ति ही समाज की सच्ची भलाई कर सकते हैं। धन और शिक्षा की दृष्टि से समाज के निम्नतम स्तर पर रहने वाले मनुष्य और न समाज के उच्चतम स्तर पर रहने मनुष्य ही कभी समाज की सच्ची भलाई कर सकते हैं; बल्कि इन दोनों अतियों में मध्य में रहने वाला व्यक्ति ही समाज को सही दिशा देने का कार्य कर सकता है। क्योंकि दोनों प्रकार के अतियों में जीने वाले व्यक्ति कभी पूर्णतया निःस्वार्थी नहीं बन सकते हैं। क्योंकि सामान्य तौर से अत्यधिक धन और अत्यधिक डिग्रियां किसी भी मनुष्य को अहंकार या 'मद' से भर देता है 
किन्तु जिनको श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द उपनिषद परम्परा में प्रशिक्षण प्राप्त होता है, वे ५ अभ्यास की पद्धति को सीखकर 'मद' उलटकर 'दम' में परिवर्तित कर लेते हैं। महाभारत में कहा गया है -कोई राजा जब 'मद' या अपनी भोगाकांक्षाओं को आत्मसंयम के द्वारा 'दम' में रूपांतरित कर लेता है, तभी उसके हृदय में लोक-कल्याण की इच्छा प्रेम बनकर प्रवाहित होने लगती है
यदि हमारे हृदय में अनन्तप्रेम का एक छोटा सा कण भी उपस्थित न हो, तो हमारे मन में बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की सहायता करने या निष्काम सेवा करने की शुभ और अत्यन्त महान इच्छा का उदय हो ही नहीं सकता। इसी प्रेम से अनुप्रेरित होकर स्वामी विवेकानन्द ने
मद्रास के एक भाषण में भारतवर्ष के कल्याण के लिये जिस योजना को भारत के युवाओं के सामने प्रस्तुत किया था, उसका शीर्षक है 'My Plan of Campaign' अर्थात 'मेरी क्रन्तिकारी योजना'! और महामण्डल विगत ५० वर्षों से उसी कार्य-योजना को क्रियान्वित करने के लिये प्रयासरत है
 आखिर क्या थी वह योजना ? यही कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को महापुरुष या उन्नततर मनुष्य में रूपांतरित कर दो! स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " परिवर्तन अचानक नहीं हो सकते (मन को एक ही दिन में वशीभूत नहीं किया जा सकता !) इस समय प्रचलित धर्म को धीरे धीरे (चरित्र-निर्माण प्रशिक्षण द्वारा) उच्चतम आदर्श मनुष्य (ब्रह्मविद ऋषि ) तक पहुँचा देना ही एक मात्र उपाय है। क्योंकि सनातन धर्म का प्रधान सिद्धान्त ही है, क्रम-विकासवाद! हमारे धर्म का मूल तत्व यही है कि इन सब नाना प्रकार की अवस्थाओं (८४ लाख) में से होकर ही आत्मा उच्चतम लक्ष्य पर पहुँचती है। (परमसत्य और सापेक्षिक सत्य को स्पष्ट रूप से देखने वाला ऋषि -ब्रह्मवेत्ता मनुष्य बनने और बनाने में समर्थ नेता) अतः ये सभी अवस्थायें आवश्यक और मनुष्य बनने में हमारी सहायक हैं ! भला कौन इनकी (वाराहावतार और नरसिंह अवतार की)  निन्दा कर सकता है ? आजकल मूर्ति-पूजा को गलत बताने की प्रथा सी चल पड़ी है, और सब लोग बिना किसी आपत्ति के उसमें विश्वास भी करने लग गये हैं मैंने भी एक समय ऐसा ही सोचा था और उसके दण्डस्वरूप मुझे ऐसे व्यक्ति के चरणों में बैठकर शिक्षा ग्रहण करनी पड़ी, जिन्होंने सब कुछ मूर्ति-पूजा के द्वारा ही प्राप्त किया था, मेरा अभिप्राय श्रीरामकृष्ण परमहंस से है 
यदि मूर्ति-पूजा के द्वारा श्रीरामकृष्ण परमहंस जैसे महापुरुष (नेता) उत्पन्न हो सकते हैं, तब तुम क्या पसन्द करोगे सुधारकों का धर्म (कम्युनिस्ट), या मूर्ति-पूजा ? मैं इस प्रश्न का उत्तर चाहता हूँ। यदि मूर्ति पूजा के द्वारा इस प्रकार के श्रीरामकृष्ण परमहंस उत्पन्न हो सकते हों, तो और हजारों मूर्तियों की पूजा करो। प्रभु तुम्हें सिद्धि दें। जिस किसी भी उपाय से हो सके इस प्रकार के महापुरुषों (नेताओं) का निर्माण करो ! और इतने पर भी मूर्ति-पूजा की निंदा की जाती है ! क्यों? यह कोई नहीं जानता। शायद इसलिये कि हजारों वर्ष पहले किसी यूहीदी ने अपनी मूर्ति को छोड़कर और सब मूर्तियों की निंदा की थी ? "५/११३    
[ If such Ramakrishna Paramahamsas are produced by idol-worship, what will you have — the reformer's creed or any number of idols? I want an answer. Take a thousand idols more if you can produce Ramakrishna Paramahamsas through idol worship, and may God speed you! Produce such noble natures by any means you can. Yet idolatry is condemned! Why? Nobody knows. Because some hundreds of years ago some man of Jewish blood happened to condemn it?]
स्वामी जी की योजना है कि युवाओं को इस प्रकार से प्रशिक्षित किया जाय कि शारीरिक,मानसिक तथा आर्थिक दृष्टि उन्नत मनुष्य बनने के साथ ही साथ उनके हृदय को इतना उदार बना दिया जाय कि उसमें निजी भोगाकांक्षा या स्वार्थपरता के लिये थोड़ी सी भी जगह न रहे! क्षणिक-सुख भोगने की हल्की सी गन्ध में उसके हृदय शेष नहीं बचे ! स्वस्थ शरीर और सबल मन के साथ साथ फूलों से भी कोमल और बज्र से भी कठोर हृदय विकसित बनाने के लिए प्रशिक्षण देना चाहिए। भगिनी निवेदिता को 3 नवम्बर 1897 को लिखे पत्र में उन्होंने कहा था, "अत्यधिक भावुकता कार्य में बाधा उत्पन्न करती है, 'वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि' (वज्र से भी कठोर और पुष्प से भी कोमल) हमारा मूलमंत्र होगा।"
वज्रादपि कठोराणि मृदुनि कुसुमादपि ।
लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विक्षातुमर्हति ॥
 
 महापुरुषों का हृदय अति विशिष्ठ प्रकार से गढ़ा हुआ होता है, (बाहर से) वज्र जैसे कठोर और भीतर से पुष्प जैसा कोमल होता है। (इसी विशिष्टता के लिये ही वे समाज में प्रतिष्ठित और प्रसिद्ध 'नेता' होते हैं।)   
ऐसे लोकोत्तर अंतःकरण को कौन समझ सकता है ?
वे स्वयं को उन्नततर मनुष्य में रूपांतरित करने के संकल्प पर अटल रहने में आवश्यकतानुसार वज्र के समान कठोर होते हैं, किन्तु दूसरों को मनुष्य बनने में सहायता करते समय, उनकी असमर्थता को देखकर उनके प्रति प्रेम और सहानुभूति का अनुभव करने में पुष्प के समान कोमल भी हो जाते हैं, (मुर्गा बनने को नहीं कहते, कान पकड़ कर चाटा मारने का भी हुक्म नहीं सुनाते हैं)
प्रत्येक नेता के हृदय में यह अति विशिष्ट आध्यात्मिक शक्ति अवश्य होती है (श्रीठाकुर में अनंत थी काली-मंदिर की छत पर चढ़ कर युवाओं को ऐसा ही 'हृदयवान-नेता' बनने का आह्वान किये थे, जो आजतक युवाओं को आकर्षित कर रहा है !) हमलोग जिस समाज में रहते हैं, वहाँ हमारे आस-पास बहुत से ऐसे युवा रहते हैं -जिन्हें इन सब बातों बिल्कुल अनभिज्ञ रखा गया है। उन्होंने कभी सुना ही नहीं है कि मनुष्य में अंतर्निहित अनंत संभवनाओं तथा मनुष्य जीवन के लक्ष्य को समझ लेने से उन्हें कितना बड़ा लाभ हो सकता है-उनका मनुष्य जीवन भी धन्य हो सकता है! वे नहीं जानते कि जीवन क्या है ? मनुष्य-जीवन को देव-दुर्लभ क्यों कहा जाता है ? मनुष्य जीवन का उद्देश्य क्या है ? इसीलिये न तो मनुष्य जीवन के बारे में उनका अपना कोई दृष्टिकोण है, और न उन्होंने अभी तक अपने जीवन का कोई लक्ष्य ही निर्धारित किया है। 
अतः हमलोग अपने आस-पास रहने वाले युवा भाइयों को नेतृत्व प्रदान कर सकते हैं । हमलोग उनके पास जाकर कहेंगे- भाइयों आओ हमारे पाठचक्र और युवा-प्रशिक्षण शिविर में, आकर देखो अपने घर-परिवार में रहते हुए भी कैसे, 'श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द उपनिषद परम्परा' में अपने तीनों प्रमुख अवयवों -शरीर, मन और हृदय को विकसित करके यथार्थ मनुष्य बना जा सकता है !
शायद तुम नहीं जानते कि मनुष्य जीवन कितना मूल्यवान है, शायद तुम नहीं जानते कि इस मानव-देह को प्राप्त करके इसका सर्वोत्तम उपयोग कैसे किया जाता है ! तुम यदि अपनी पढाई-लिखाई करने के साथ-
साथ अपने जीवन को सुंदर ढंग से गठित करने का ५ अभ्यास करते रहो, तो अपने जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकोगे और अपने घर-परिवार और देश के लिये बहुत बड़ी सम्पदा बन सकते हो। अपने जीवन को सुंदर ढंग से गठित कर लेने के बाद ही हमलोग परिवार, समाज और देश की सर्वोत्तम सेवा करने के योग्य बन सकते हैं। इसीलिये चरित्रवान मनुष्य बनना और बनाना सबसे उत्कृष्ट समाज सेवा है। शायद तुम इस बात को नहीं समझते कि मनुष्य शरीर प्राप्त होने वाला सर्वश्रेष्ठ लाभ क्या है ? ब्रह्म को जानकर ब्रह्म हुआ जा सकता है ! हमलोग भी मानवजाति के महान नेताओं -बुद्ध, और होली ट्रिनिटी की तरह अपने 'सम्पूर्ण जीवन' को दूसरों के कल्याण के लिए न्योछावर करके अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं ! हमलोग वैसे नेता बन सकते हैं - और हममें से प्रत्येक के मन में मानवजाति का सच्चा नेता बनने की महत्वाकांक्षा अवश्य रहनी चाहिये ! इसी को अपने जीवन का लक्ष्य बना लेना चाहिये ! इससे बढ़कर और कोई सौभाग्य की बात नहीं है। यही है मनुष्य जीवन का चरम उद्देश्य या लक्ष्य !
भागवत में जब तरुण श्रीकृष्ण अपने गोप मण्डली के बीच लीडरशिप या नेता की भूमिका निभा रहे थे, उस समय उनके मुख से एक बहुत सुन्दर श्लोक निकला है, (श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध के २२ वें अध्याय में श्लोक ३२-३५ ) एक दिन भगवान श्रीकृष्ण बलराम जी और ग्वालबालों के साथ गौएँ चराते हुए वृन्दावन से बहुत दूर निकल गये । ग्रीष्म ऋतु थी। सूर्य की किरणें बहुत ही प्रखर हो रही थीं। परन्तु घने-घने वृक्ष के नीचे गौएँ विश्राम कर रही थीं। उन सबके  ऊपर वृक्ष के पत्ते छाता का काम कर रहे थे। वृक्षों को छाया करते देख किशोर श्रीकृष्ण ने ग्वाल बालकों का नेतृत्व करते हुए कहा - 
  
पश्यतैतान्महाभागान्परार्थैकान्तजीवितान् ।
वातवर्षातपहिमान्सहन्तो वारयन्ति नः ॥
अहो एषां वरं जन्म सर्व प्राण्युपजीवनम् ।
सुजनस्येव येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिनः ॥

‘मेरे प्यारे मित्रों! देखो, ये वृक्ष कितने भाग्यवान हैं! इनका सारा जीवन केवल दूसरों की भलाई करने के लिये ही है। ये स्वयं तो हवा के झोंके, वर्षा, धूप और पाला - सब कुछ सकते हैं, परन्तु हम लोगों की उनसे रक्षा करते हैं । मैं कहता हूँ कि इन्हीं का जीवन सबसे श्रेष्ठ है। क्योंकि ये सब प्राणियों को उपजीवन (सहारा) देते हैं,अर्थात इनके द्वारा सब प्राणियों का जीवन-निर्वाह होता है। जैसे कोई सज्जन पुरुष किसी याचक को खाली नहीं लौटाता, वैसे ही ये वृक्ष भी लोगों को खाली हाथ न लौटाकर उन्हें कुछ न कुछ अवश्य देते हैं।
वृक्ष किस प्रकार दूसरों के कल्याण में अपना सबकुछ न्योछावर कर देते हैं? यह सहब विस्तारपूर्वर समझाते हुए श्री कृष्ण आगे कहते हैं-
पत्रपुष्पफलच्छाया मूलवल्कलदारुभिः ।
गन्धनिर्यासभस्मास्थि तोक्मैः कामान्वितन्वते ॥

एतावत् जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु ।
प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेयआचरणं सदा ॥

अर्थात् ये वृक्ष पत्र (पत्ती), पुष्प, फल, छाया, मूल (जड़), वल्कल (छाल), दारू या लकड़ी, गंध, निर्यास या गोंद, भस्म (राख), अस्थि (कोयला), तोक्म (बीज) आदि पदार्थों के द्वारा हमारा उपकार करते हैं। इन वृक्षों की भाँति ही मनुष्य को 'प्राणैः अर्थैः धिया वाचा' अपने शब्दों के माध्यम से, अपनी धी या बुद्धि से, या अपने मन के द्वारा, और यदि आवश्यक हो तो प्राणैः - अपने जीवन का बलिदान या अर्थ का त्याग करके भी केवल सद्कर्म ही करना चाहिये। 
इतने सरल शब्दों में वे अपने गाय चराने वाले मित्रों के नेता के रूप में अपने भाइयों को मनुष्य जीवन की सार्थकता क्या है, उसे समझा रहे हैं। कहते हैं, मेरे प्यारे मित्रों! संसार में प्राणी तो बहुत हैं; परन्तु उनके जीवन की सफलता इतने में ही है-  कि जहाँ तक हो सके-इन वृक्षों की भाँति ही मनुष्य को 'प्राणैः अर्थैः धिया वाचा' अपने शब्दों या विचारों के माध्यम से, अपनी धी या बुद्धि से, या अपने मन के विवेक-विचार से, अर्थ का त्याग करके, और आवश्यकता पड़ने पर- प्राणैः, अर्थात अपने प्राणों की आहुति देकर भी केवल
ऐसे  कर्म किये जायँ, जिनसे दूसरों की भलाई हो। यही तो है संसार के समस्त धर्मों में निहित गूढ़ तत्व, या धर्म का वास्तविक रहस्य ! जैसा कि महाभारत में कहा है - 
वेदाहं जाजले धर्मं सरहस्यं सनातनम्।
सर्वभूतहितं मैत्रं पुराणं यं जना विदुः।।
 - हे जाजले ! मुझे सनातन धर्म सार-तत्व का पता चल गया है । वह क्या है ? जो व्यक्ति सर्वभूतों के सुहृत हैं और निरन्तर समस्त जीवों का हित करने में लगे रहते हैं, वास्तव में उन्हीं को धर्मज्ञ कहा जा सकता है। जो लोग सच्चे धर्मज्ञ हैं, जो सनातन या प्राचीनतम धर्म को सर्वभूत के लिये हितकर रूप में जान लेते हैं, (जैसे जाजले ऋषि जानते थे) वे अपने निकट आने वाले मनुष्यों को भी यही सनातन धर्म समझाते हैं -अर्थात
सभी मनुष्यों के लिए मंगल कामना करने और सभी मनुष्यों से प्रेम करने की ही शिक्षा देते हैं (वे कभी आतंकी जाकिर नाईक के जैसा किसी को सुसाईड बॉम्बर बनने की सीख नहीं दे सकते हैं।)
जीवन को सार्थक बनाने के विषय में स्वामी विवेकानन्द भी हमें ठीक ऐसी ही सलाह देते हैं । वे कहते हैं- "यह जीवन क्षणस्थायी है, संसार के भोग-विलास की सामग्रियाँ भी क्षणभंगुर हैं। वे ही यथार्थ में जीवित हैं, जो दूसरों के लिये जीवन धारण करते हैं। बाकि लोगों का जीना तो मुर्दों की तरह जीने जैसा है। " 
जब सनातन धर्म के इस गूढ़ रहस्य को हमलोग अच्छी तरह से समझ लिये हैं, तब हमारे आस-पास जितने युवा भाई रहते हैं, उनके हृदय में भी धर्म-ज्ञान की इस ज्योति को प्रज्ज्वलित करने का प्रयत्न करना चाहिये।
किन्तु दूसरों के मन को परिवर्तित करने का कार्य वही व्यक्ति कर सकता है, जिसने स्वयं अपने मन को को वशीभूत कर लिया हो! क्योंकि सच्चे नेता का कार्य दुर्बल मन को बलशाली मन में परिवर्तित करने का ही होता है। साधारण ढंग की समाज सेवा -चन्दा माँगकर या अपने धन से भोजन-वस्त्र आदि से बाढ़ पीड़ितों तक या जरूरत-मन्दों तक पहुँचा देने का कार्य बहुत सी समाजसेवी संस्थायें और सरकारी एजेंसियाँ करती ही रहती हैं। और ऐसा करना बहुत अच्छा भी है, किन्तु सबसे उत्कृष्ट समाज सेवा है, दूसरों के मन को उन्नत बना देना। ताकि हमारे युवा भाई उच्च और महान विचारों को आत्मसात करके स्वयं यथार्थ मनुष्य बन जायें और दूसरों को भी 'मनुष्य' बनने में सहायता कर सकें।
स्वामी जी ने इसी ढंग की समाज-सेवा करने की प्रेरणा दी है। वे कहते हैं -" भारत में किसी प्रकार का सुधार या उन्नति की चेष्टा करने के पहले धर्म-प्रचार आवश्यक है। सर्वप्रथम, हमारे उपनिषदों, पुराणों और अन्य सब शास्त्रों में जो अपूर्व सत्य छिपे हुए हैं, उन्हें सब ग्रन्थों के पन्नों से बाहर निकालकर, मठों की चहारदीवारियाँ भेदकर, वनों-आश्रमों से बाहर निकालकर, कुछ सम्प्रदाय-विशेषों के हाथों से छीनकर देश में सर्वत्र बिखेर देना होगा।
सबसे पहले हमें यही करना होगा। और जो भी व्यक्ति अपने शास्त्रों के महान सत्यों को -(चार महावाक्यों को) दूसरों को सुनाने में सहायता पहुँचायेगा -वह आज एक ऐसा कर्म करेगा, जिसके समान कोई दूसरा कर्म ही नहीं है। महर्षि व्यास ने कहा है, " इस कलियुग में मनुष्यों के एक ही कर्म शेष रह गया है। आजकल यज्ञ और कठोर तपस्याओं का कोई फल नहीं होता। इस समय दान ही एकमात्र कर्म है। और दानों में धर्मदान, अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान का दान ही सर्वश्रेष्ठ है। "५/११६ पराशरस्मृतिः १/२३ में भी कहा गया है - 
तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानं उच्यते ।
द्वापरे यज्ञं एवाहुः दानं एव कलौ युगे ।।
 
विवेकानन्द कहते हैं - " इसीलिये, मेरे मित्रो, मेरा विचार है कि मैं भारत में कुछ ऐसे शिक्षालय (युवा प्रशिक्षण शिविर) स्थापित करूँ, जहाँ हमारे नवयुवक अपने शास्त्रों के ज्ञान में दीक्षित होकर भारत तथा भारत के बाहर अपने धर्म का प्रचार कर सकें। ' मनुष्य' , केवल मनुष्य भर चाहिये। बाकि सब कुछ अपने आप ही हो जायेगा। आवश्यकता है वीर्यवान, तेजस्वी, श्रद्धा-सम्पन्न और दृढ़विश्वासी निष्कपट नवयुवकों की। ऐसे सौ मिल जायें, तो संसार का कायाकल्प हो जाय। इच्छाशक्ति संसार में सबसे बलवती है। उसके सामने दुनिया की कोई चीज नहीं ठहर सकती; क्योंकि वह भगवान -साक्षात श्रीठाकुर जी के पास से आती है। विशुद्ध और दृढ़ इच्छाशक्ति सर्वशक्तिमान है! क्या तुम इसमें विश्वास नहीं करते ? सबके समक्ष अपने धर्म के सनातन सत्यों का प्रचार करो, संसार इसकी प्रतीक्षा कर रहा है!" ५/११८

महामण्डल यही चाहता है कि स्वामीजी देखें कि हमने उनके परामर्शों को सुना है। १२ राज्यों में अपने ३१५ युवा पाठचक्र और युवा प्रशिक्षण शिविरों के माध्यम से मनुष्य बनने और बनाने के कार्य में विगत ५० वर्षों से लगा हुआ है। स्वामी जी का अनुयायी होने का यह अर्थ नहीं है कि हम उनके जन्म-दिवस को बड़े धूम-धाम से मनाते रहें और बड़े नामी-गिरामी लोगों को बुलवाकर जनता को भाषण पिलवा दिया जाय इसका अर्थ यह भी नहीं है कि हम जगह-जगह स्वामी जी की मूर्ति या मन्दिर स्थापित करते रहें। उनका अनुयायी बनने का अर्थ है, ५ दैनन्दिन अभ्यासों का पालन करके अपने जीवन को सुंदर ढंग से गठित कर यथार्थ मनुष्य बन जाना। और दूसरों को भी यथार्थ मनुष्य बनने के लिये उनके हृदय को उदार और सुंदर विचारों से परिपूर्ण कर देने में सक्षम नेता बन जाना ! 
आज भारत में इसी प्रकार के नेताओं की आवश्यकता सैकड़ो-हजारों में है। महामण्डल इसी प्रकार के नेताओं का निर्माण करने का आंदोलन है। इस वर्ष यह आंदोलन अपना स्वर्ण जयंती वर्ष -५० वाँ वर्ष मना रहा है। किन्तु किसी राष्ट्र के जीवन में केवल ५० वर्ष की क्या गणना है ? भारतवर्ष को केवल आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा ही पुनरुज्जीवित किया जा सकता है। और एक बार फिर से आध्यात्मिकता के प्रचण्ड ज्वार के फाटक को श्रीठाकुर देव ने खोल दिया है। और अपने हृदय को विस्तृत और उदार बना लेना ही आध्यात्मिक मनुष्य बन जाना है। स्वार्थपरता, और भोगाकांक्षा पर संयम रखने के सिवा आध्यात्मिकता और कुछ नहीं है। सम्पूर्ण मानवता के प्रति प्रेम और परहित में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने के सिवा आध्यात्मिकता और कुछ नहीं है। 
अतः आइये, हम सभी लोग आध्यात्मिक मनुष्य बनें, हम सभी पूर्ण हृदयवान मनुष्य बनें ! आइये हमलोग अपने आस-पास रहने वाले सभी युवा भाइयों को इसी प्रकार का आध्यात्मिक मनुष्य बन जाने के लिए अनुप्रेरित करें। हमलोगों को स्वामीजी के आदेशानुसार " हमारे उपनिषदों, पुराणों और अन्य सब शास्त्रों में जो अपूर्व सत्य छिपे हुए हैं, उन्हें सब ग्रन्थों के पन्नों से बाहर निकालकर, मठों की चहारदीवारियाँ भेदकर, वनों-आश्रमों से बाहर निकालकर, कुछ सम्प्रदाय-विशेषों के हाथों से छीनकर देश में सर्वत्र बिखेर देना होगा, ताकि ये सत्य (४ महावाक्य-५ अभ्यास) दावानल के समान सारे देश को चारों ओर से लपेट लें-उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक सब जगह फ़ैल जायें -हिमालय से कन्याकुमारी और सिन्धु से ब्रह्मपुत्र तक सर्वत्र वे वेदान्ती सिद्धांत धधक उठें ! सभी को इन सब शास्त्रों में निहित उपदेश सुनाने में समर्थ नेताओं का निर्माण करने के लिए ही महामण्डल को आविर्भूत होना पड़ा है! " अतः  इसी कार्य को (पहले सुनने -फिर मनन करने और उसके बाद निदिध्यासन) करने में समर्थ नेता हमें स्वयं बनना है और दूसरों को भी ऐसा ही मानवजाति का मार्गदर्शक नेता बन जाने के लिए अनुप्रेरित करना है !
===========
'सेवा करो और प्रेरणा भरो !'
हमलोगों में से अधिकांश वरिष्ठ लोग जो अपने को किसी संगठन या समाज का हेड समझते हैं, वे क्या चाहते हैं ? वे यही चाहते हैं कि उनके मातहत काम करने वाले लोग उनका सम्मान करें, उनकी सेवा करें, उनके आदेशों का पालन करें। अब जरा आप स्वयं से यह प्रश्न पूछकर देखिये कि क्या आप दूसरों को पूजनीय दृष्टि से देखकर उनकी सेवा कर सकते हैं ? यदि हाँ, तो नेता बनने का पहला गुण आप में विद्यमान है ! क्या आप अपने से छोटों के सम्मान का भी ध्यान रखते हैं? क्या आप अपने से बड़ों की आज्ञा का पालन करते हैं ? इसी प्रकार प्रत्येक नेता को विनम्र, विनयशील और अहंकार रहित बनने की चेष्टा करनी चाहिये।
महामण्डल के नेता को यही सोचना चाहिये कि यह तो मेरा सौभाग्य है कि 'होली ट्रिनिटी' की कृपा से मुझे उनकी संतानों और अपने अन्य युवा भाइयों का नेतृत्व करने, उन्हें गीता-उपनिषद की शिक्षाओं को सुनाकर अपना जीवन धन्य करने का अवसर मिला है। नेता को कभी यह नहीं सोचना चाहिये कि यह सौभाग्य केवल मुझे ही प्राप्त हो, उसे अपने जीवन के द्वारा यह दिखाना चाहिए कि कैसे ५ दैनंदिन अभ्यास के द्वारा मैं भोगाकांक्षाओं और इन्द्रियसुखों को त्याग कर अपना सुंदर और पवित्र जीवन गठित कर सका हूँ। ताकि वे भी मेरे जीवन को देखकर अनुप्रेरित हों, और यथार्थ मनुष्य बनकर अपने जीवन को दूसरों की सेवा में समर्पित करने का सौभाग्य प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर हों। वे भी नाम-यश पाने के लिये या अपने को बॉस जैसा दिखाने की इच्छा रखे बिना चुप-चाप सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त करें। नेता को भगवान के जैसा कार्य करना चाहिये, वे सबकुछ करते हैं -किन्तु कभी सामने दिखाई नहीं पड़ते!
जिस श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में नेतृत्व प्रशिक्षण पद्धति द्वारा स्वामी जी ने अपने भक्तों या अनुयायियों को 'शिष्य' नहीं बनाकर 'नेता' बना दिया था-उसी पद्धति का अनुकरण हमें भी करना चाहिये। आमतौर से सामान्य लोग जिस प्रकार की समाज-सेवा करते हैं,रोड-मुहल्ला सफाई, या प्लेग और बाढ़ से पीड़ित लोगों की सेवा - जैसे समाज सेवा के कार्य स्वामी जी ने भी बहुत किये थे। किन्तु इस समाज-सेवा की अपेक्षा कई गुना अधिक श्रेष्ठ समाज-सेवा है गीता-उपनिषद के सुंदर और अनुप्रेरक विचारों को सुनाकर कई भावी नेताओं के जीवन को इस सीमा तक रूपान्तरित कर देना कि वे भगवान हैं या मनुष्य इसका निर्णय करना कठिन हो जाये! उनके जीवन और सन्देश के प्रभाव से बहुत से लोगों का जीवन मानव- कल्याण की बलि- वेदी पर चढ़ाने योग्य सुंदर नैवेद्य (पुष्प) के समान गठित हो गया था! उनके विचारों से प्रभावित होकर इंग्लैण्ड की मार्गरेट नोबल, भारत माता के कल्याण में निवेदित-प्राणा, भगिनी निवेदिता में रूपांतरित हो गयी थीं। हमलोगों में भी दूसरों के जीवन को इसी प्रकार भारत-कल्याण के नैवेद्य स्वरूप गढ़ देने की क्षमता होनी चाहिये। यही नेतृत्व का मौलिक सिद्धान्त है।
दूसरों की सच्ची सेवा करने में समर्थ नेता कैसे बना जाता है ? उसका एक उदाहरण देते हुए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं -   " मैं उस महापुरुष का शिष्य हूँ, जिन्होंने सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण (चट्टोपाध्याय) होते हुए भी एक पैरिया (चाण्डाल) के घर को साफ करने की अपनी इच्छा प्रकट की थी। अवश्य वह इस पर सहमत हुआ नहीं -और भला होता भी कैसे ? एक तो सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण, उस पर भी संन्यासी, वे आकर घर सफाई करेंगे ? इस पर क्या वह कभी राजी हो सकता था ? निदान,  एक दिन आधी रात को उठकर गुप्त रूप से उन्होंने उस पैरिया के घर में प्रवेश किया और उसका शौचालय साफ कर दिया, उन्होंने अपने लम्बे बालों से उस स्थान को पोंछ डाला।
और यह काम वे लगातार कई दिनों तक करते रहे, ताकि वे अपने को सबका दास बना सकें ! (श्रीठाकुर के मन में यह बात बैठ जाये कि -अवतार होकर भी मैं सबका दास हूँ !) मैं उन्हीं महापुरुष के चरण कमलों को अपने मस्तक पर धारण किये हूँ ! वे ही मेरे आदर्श हैं -मैं उन्हीं आदर्शपरुष (मानवजाति के सच्चे मार्गदर्शक नेता) श्रीरामकृष्ण परमहंस के जीवन का अनुकरण करने की चेष्टा करूँगा ! सबका सेवक बनकर (शिवज्ञान से जीव सेवा करते हुए ही) ही एक हिन्दू (धर्मरहस्य को जाननेवाला ब्रह्मवेत्ता मनुष्य) अपने को उन्नत करने (अपने स्वरूप में अटल रहने ) की चेष्टा करता है। हमें इसी रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा के अनुरूप भारत की सर्वसाधारण जनता को उन्नत करना चाहिये न-कि पाश्चात्य समाज-सेवा (रोटरीक्लब जैसी) पद्धति का अनुकरण करके ! हमारे इन सुधारकों या तथाकथित समाज- सेवियों (क्लब और समिति के सदस्यों) में से एक भी, ऐसा जीवन गठन करके दिखाये दिखाये तो सही जो एक पैरिया की भी सेवा के लिए तत्पर हो ! फिर तो मैं भी उसके चरणों में बैठकर शिक्षा ग्रहण करूँ, पर हाँ -उसके पहले नहीं ! लम्बी-चौड़ी बातों की अपेक्षा थोड़ा कुछ कर दिखाना लाख गुना अच्छा है ।"५/१०६ 
दो प्रकार का विज्ञान सीखना: हमारे युग के अंग्रेज जीव-विज्ञानी, प्राध्यापक और दार्शनिक सर जूलियन हक्सले, (१८८७- १९७५) कहते हैं -" जिस प्रकार एक 'साइंस ऑफ़ फिजिकल वर्ल्ड' होता है, जिसके द्वारा हमलोग भौतिक पदार्थों और प्राकृतिक शक्तियों का कुशल प्रबंधन करके उन्हें मानवता के लिये उपयोगी बना लेते हैं; उसी प्रकार एक 'साइंस ऑफ़ इन्टरनल वर्ल्ड' भी होता है जिसके द्वारा हमलोग अपने अंतःकरण या अंतःप्रकृति में विद्यमान प्रचुर संसाधनों को मानवता के लिए उपयोगी बनाना सीख सकते हैं। "
और जैसा कि आप सभी जानते हैं, स्वामी विवेकानन्द ने भी अपने अंतर्निहित ब्रह्मत्व को अभिव्यक्त करने के लिए बाह्य प्रकृति और अंतःप्रकृति दोनों के ऊपर विजय प्राप्त करने का परामर्श दिया हैअंतःप्रकृति में विद्यमान प्राकृतिक संसाधनों को मानवोपयोगी बना लेने वाले विज्ञान को सर जूलियन हक्सले ने 'साइंस ऑफ़ ह्यूमन डेवलपमेन्ट' कहा है। 
[सर जूलियन हक्सले का 'ट्रांस-ह्यूमनिज्म' (परा-मानवतावाद) : "The human species can, if it wishes, transcend itself — not just sporadically, an individual here in one way, an individual there in another way, but in its entirety, as humanity.  We need a name for this new belief. Perhaps 'Trans-Humanism' will serve: man remaining man, but transcending himself, by realizing new possibilities of and for his human nature."] अतः पूर्ण मनुष्य बनने के लिये हमलोगों केवल बाह्य प्रकृति का उपयोग करने वाली टेक्नॉलजि पढ़ने से ही काम नहीं चलेगा, हमलोगों को साइंस ऑफ़ ह्यूमन डेवल्पमेंट -3H विकास द्वारा अंतःप्रकृति को जीतने वाला विज्ञान- या हक्सले का ट्रांस-मानवतावाद भी सीखना होगा! अल्बर्ट आइंस्टीन इन दोनों विज्ञानों को टू-साइंसेज न कहकर टू-रिलीजन्स कहा हैक्योंकि मनुष्य जीवन को सुखमय बनाने के लिये दोनों आवश्यक हैं | हमारे बाह्य जीवन के मंगल के लिये जिस प्रकार विज्ञान आवश्यक है, उसी प्रकार आन्तरिक जीवन में सुख शान्ति बनाये रखने के लिये अन्तःजगत का विज्ञान - धर्म या आध्यात्म, या विवेक-प्रयोग की पद्धति (मनःसंयोग) सीखना भी आवश्यक है।
' मुण्डक-उपनिषद ' में एक प्रसंग आता है कि आज से हजारों साल पहले शौनक नामक शिष्य अपने गुरु महर्षि अंगिरा के पास शास्त्र विधि के अनुसार हाथ  समिधा की लकड़ी लेकर श्रद्धा के साथ पहुँचता है, और विनय पूर्वक पूछता है -' कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति ' अर्थात, हे भगवन! क्या ऐसी कोई विद्या है, जिसको जान लेने से - ' इदं-सर्वम  ' यह सब कुछ ( गो-गोचर जगत है) निश्चय पूर्वक जाना हुआ हो जाता है ?
उत्तर में  गुरु कहते हैं- " द्वे विद्ये वेदितव्ये " - हाँ, शौनक ! ब्रह्मज्ञ ऋषियों का कहना है कि इसके लिये
'दो विद्याओं' को सीखना आवश्यक है, एक है ' परा-विद्या ' और दूसरी है ' अपरा-विद्या '। तुम इस 'अपरा-विद्या' (Science of External World) को सीख कर इस भौतिक जगत के बारे में सबकुछ जान सकते हो, और दूसरी ' परा-विद्या ' को सीख कर तुम आन्तरिक जगत के बारे में भी सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकते हो !
हमारे प्राचीन युग के ऋषि दो प्रकार की विद्या या टेक्नॉलजि सीखने का परामर्श देते हैं, तो आधुनिक युग के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन दो टेक्नॉलजि की बात न कहकर दो धर्मों को सीखने का परामर्श देते हैं।
एक को वे कॉस्मिक रिलिजन (ब्रह्माण्डीय धर्म) कहते हैं, दूसरे को वे 'रिलिजन ऑफ़ इंटरनल वर्ल्ड' कहते हैं। इस प्रकार हमलोग यह देख सकते हैं कि बीसवीं शताब्दी का अंत आते -आते विज्ञान और धर्म अर्थात आध्यात्मिकता एक-दूसरे के बिल्कुल निकट आ पहुँचे हैं।
 हमलोग जैसा विश्वास करते हैं कि मनुष्य केवल पाँच भौतिक तत्वों का बना यह शरीर मात्र ही नहीं है, मनुष्य इस जड़ शरीर और मन से भिन्न और भी 'कुछ' है। उस और भी 'कुछ' (दिव्यता) को हम तभी अभिव्यक्त कर सकते हैं, जब हमें 'परा-विद्या' अर्थात 'आंतरिक जगत' को जानने का विज्ञान या धर्म भी हो। अतः हमारे नेतृत्व में यह क्षमता अवश्य रहनी चाहिये कि वह आधुनिक जीवन-शैली और पाश्चात्य शिक्षा में पले-बढ़े युवकों और युवतियों को इन दोनों धर्मों से परिचित करा देने में समर्थ हो । क्योंकि सच्चा नेता वही हो सकता है जिसके पास सबल शरीर हो और दूसरों के दुःख को अपने हृदय में अनुभव करने की संवेदना के साथ-साथ इतना प्रखर मस्तिष्क भी हो कि दूसरों के समस्त दुःखों का मूल कारण को खोज कर , उसे हटाने का उपाय बताने में भी सक्षम हो। ऐसा नेता जहाँ कहीं भी जायेगा, वहाँ के युवाओं को एकत्र करके इन्हीं प्रेरणादायक विचारों से उनके मन को जाग्रत करने की चेष्टा करेगा।
बियॉन्ड टाइम ऐंड स्पेस : [ बाहर से देखने पर यह दुनिया कैसी दिखती होगी ? हमलोग इसका उत्तर अंतरिक्ष विज्ञान और भौतिक विज्ञान में खोजने की चेष्टा करते हैं। जब हम इसको भीतर से देखने की चेष्टा करें तो यह कैसा दिखेगा ? इस प्रश्न का उत्तर हम नॉन-फिजिकल साइंस या गीता-उपनिषद से पाने की चेष्टा करते हैं।  
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
           एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः।।13.2।।
श्रीभगवान् बोले -- हे कुन्तीपुत्र अर्जुन इस नाम-रूपसे कहे जानेवाले शरीर को क्षेत्र कहते हैं, और इस क्षेत्र को जो जानता है; उसको ज्ञानी लोग क्षेत्रज्ञ नाम से कहते हैं।
व्याख्या: क्षेत्र का शाब्दिक अर्थ है -खेत या जमीन। शरीर को खेत इसीलिये कहा जाता है कि कर्मों का सुख-दुःख रूपी फल (फसल) इसीके माध्यम से काटनी पड़ती है। स्थूल-सूक्ष्म और कारण शरीर (physical, mental and the causal bodies) तीनों से मिलकर यह खेत बनता है। अकेले भौतिक शरीर को ही खेत नहीं कहते हैं। जो ज्ञान के द्वारा इस क्षेत्र को अपने आत्मस्वरूप से पृथक जान लेते हैं, उन्हीं को ज्ञानी लोग क्षेत्रज्ञ कहते हैं।
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते -- हमलोग जिस प्रकार अपने से भिन्न किसी भौतिक वस्तु को इंगित करते हुए, इदंता से अर्थात् यह रूप से कहते हैं - यह पशु है, यह पक्षी है, यह वृक्ष है, नदी है, पहाड़ है - किन्तु इस शरीर को कभी 'मैं' रूप से तथा कभी 'मेरा' रूप से कहते हैं। परन्तु वास्तव में अपना कहलाने वाला शरीर भी इदंता से कहलाने वाला ही है। चाहे स्थूल-शरीर हो, चाहे सूक्ष्म-शरीर हो और चाहे कारण- शरीर हो, पर वे हैं सभी इदंतासे कहलाने वाले ही। हमारा स्थूल शरीर पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश -- इन पाँच तत्त्वोंसे बना हुआ है। इसका दूसरा नाम अन्नमय-कोश भी है क्योंकि यह अन्नके विकारसे ही पैदा होता है और अन्नसे ही जीवित रहता है। अतः यह अन्नमय या अन्न-स्वरूप ही है। इन्द्रियोंका विषय होनेसे यह शरीर इदम् (यह) कहा जाता है।
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, मन और बुद्धि -- इन सत्रह तत्त्वों से बने हुए को सूक्ष्मशरीर कहते हैं। इन सत्रह तत्त्वोंमेंसे प्राणों की प्रधानता को लेकर यह सूक्ष्म-शरीर प्राणमय-कोश, मन की प्रधानता को लेकर यह मनोमय-कोश और बुद्धिकी प्रधानताको लेकर यह विज्ञानमय-कोश कहलाता है। ऐसा यह 'सूक्ष्म-शरीर' भी अन्तःकरणका विषय होनेसे 'इदम्' कहा जाता है
अज्ञान को कारण-शरीर कहते हैं। मनुष्य को बुद्धि तक का तो ज्ञान होता है, पर बुद्धि से आगे का ज्ञान नहीं होता, इसलिये उसे अज्ञान कहते हैं। यह अज्ञान सम्पूर्ण शरीरों का कारण होने से कारण-शरीर कहलाता है -- अज्ञानमेवास्य हि मूलकारणम् (अध्यात्म0 उत्तर0 5। 9)। इस कारण-शरीर को ही आदत, प्रोपेन्सिटी, स्वभाव और प्रकृति भी कहते हैं। और इसी कारण-शरीर को ही आनन्दमय-कोश भी क्यों कहते हैं ?  जाग्रत्-अवस्था (कान्शस-स्टेट ऑफ़ माइंड) में स्थूल-शरीर की प्रधानता होती है और उसमें सूक्ष्म तथा कारणशरीर भी साथ में रहता है। स्वप्न-अवस्था (सब्कान्शस माइन्ड) में सूक्ष्म-शरीर की प्रधानता होती है और उसमें कारण-शरीर भी साथमें रहता है। सुषुप्ति-अवस्था (अन्कान्शस माइन्ड या गहरी नींद की अवस्था) में स्थूल-शरीर का ज्ञान नहीं रहता, जो कि अन्नमयकोश है और सूक्ष्म-शरीर का भी ज्ञान नहीं रहता, जो कि प्राणमय, मनोमय एवं विज्ञानमय-कोश है अर्थात् बुद्धि अविद्या (अज्ञान)में लीन हो जाती है। अतः सुषुप्ति-अवस्था कारण-शरीर की होती है। जाग्रत् और स्वप्नअवस्थामें तो सुख-दुःख का अनुभव होता है, पर सुषुप्ति-अवस्था में दुःख का अनुभव नहीं होता और सुख रहता है। इसलिये कारणशरीरको आनन्दमय-कोश कहते हैं। कारण-शरीर को भी स्वयं का विषय होने, या स्वयं के द्वारा जानने में आनेवाला होने से इदम् कहा जाता है। 
उपर्युक्त तीनों शरीरों को शरीर कहनेका तात्पर्य है कि इनका प्रतिक्षण नाश होता रहता है। इनको कोश कहने का तात्पर्य है कि जैसे चमड़े से बनी हुई थैली में तलवार रखने से उसकी म्यान संज्ञा हो जाती है, ऐसे ही जीवात्मा के द्वारा इन तीनों शरीरों को अपना मानने से; अपने को इनमें रहने वाला मानने से इन तीनों शरीरों की कोश संज्ञा हो जाती है।
शरीरको क्षेत्र कहने का तात्पर्य खेत से है। जैसे खेत में तरह तरह के बीज डालकर खेती की जाती है, ऐसे ही इस मनुष्य शरीर में अहंता-ममता करके जीव, तरह-तरह के कर्म करता है। उन कर्मों के संस्कार,
अन्तःकरणमें पड़ते हैं। वे संस्कार जब फलके रूपमें प्रकट होते हैं, तब दूसरा (देवता- पशुपक्षी- कीटपतङ्ग आदिका) शरीर मिलता है। जिस प्रकार खेतमें जैसा बीज बोया जाता है, वैसा ही अनाज पैदा होता है।  उसी प्रकार इस शरीर में जैसे कर्म किये जाते हैं, उनके अनुसार ही दूसरे शरीर, परिस्थिति आदि मिलते हैं। तात्पर्य है कि इस शरीरमें किये गये कर्मोंके अनुसार ही यह जीव बार-बार जन्म-मरण रूप फल भोगता है। इसी दृष्टिसे इसको क्षेत्र (खेत) कहा गया है। 
घट द्रष्टा घटात भिन्न: अपने वास्तविक स्वरूप से अलग दीखने वाला यह शरीर प्राकृत पदार्थों से, क्रियाओं से, वर्ण-आश्रम आदि से, इदम् (दृश्य) ही है। यह है तो इदम् पर जीव ने भूल से इसको अहम् मान लिया और फँस गया। स्वयं परमात्माका अंश एवं चेतन है, सबसे महान् है। परन्तु जब वह जड (दृश्य) पदार्थोंसे अपनी महत्ता मानने लगता है- (जैसे मैं धनी हूँ, मैं विद्वान् हूँ आदि) तब वास्तवमें वह अपनी महत्ता घटाता ही है। इतना ही नहीं, अपनी महान् बेइज्जती करता है क्योंकि अगर धन, डिग्री आदि से वह अपने को बड़ा मानता है, तो धन विद्या आदि ही बड़े हुए उसका अपना महत्त्व तो कुछ रहा ही नहीं !  वास्तव में देखा जाय तो महत्त्व स्वयं का ही है नाशवान् और जड धनादि पदार्थों का नहीं क्योंकि जब स्वयं उन पदार्थों को स्वीकार करता है, तभी वे महत्त्वशाली दीखते हैं।
इसलिये भगवान् (नेता) श्रीकृष्ण - इदं शरीरं क्षेत्रम् पदों से शरीरादि पदार्थों को अपने से भिन्न इदंता से देखने के लिये कह रहे हैं। एतद्यो वेत्ति -- जीवात्मा इस शरीरको जानता है अर्थात् यह शरीर मेरा है, इन्द्रियाँ मेरी हैं, मन मेरा है, बुद्धि मेरी है, प्राण मेरे हैं -- ऐसा मानता है। यह जीवात्मा इस शरीर को कभी मैं कह देता है अर्थात् मैं शरीर हूँ -- ऐसा भी मान लेता है और यह शरीर मेरा है -- ऐसा भी मान लेता है। 
तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ  इति तद्विदः -- जैसे दूसरे अध्याय के सोलहवें श्लोक में सत्-असत् के तत्त्व को जानने वालों को तत्त्वदर्शी कहा है? ऐसे ही यहाँ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के तत्त्वको जाननेवालोंको तद्विदः कहा है। क्षेत्र क्या है और क्षेत्रज्ञ क्या है -- इसका जिनको बोध हो चुका है, ऐसे तत्त्वज्ञ महापुरुष इस जीवात्मा को क्षेत्रज्ञ नाम से कहते हैं। तात्पर्य है कि क्षेत्र की तरफ दृष्टि रहने से, क्षेत्र के साथ सम्बन्ध रहने से ही इस जीवात्मा को वे ज्ञानी महापुरुष क्षेत्रज्ञ कहते हैं। अगर यह जीवात्मा क्षेत्र के साथ सम्बन्ध न रखे, तो फिर इसकी क्षेत्रज्ञ संज्ञा नहीं रहेगी यह परमात्मस्वरूप हो जायगा (गीता 13। 31)।
यह नियम है कि जहाँ से बन्धन होता है, वहाँ से खोलने पर ही (बन्धनसे) छुटकारा हो सकता है। अतः मनुष्य-शरीर से ही बन्धन होता है और मनुष्य-शरीर के द्वारा ही बन्धन से मुक्ति हो सकती है। अगर मनुष्य का अपने शरीर के साथ किसी प्रकार का भी अहंता-ममता रूप सम्बन्ध न रहे, तो वह संसार से मुक्त ही है। 
अतः भगवान् शरीर के साथ माने हुए अहंता-ममता रूप सम्बन्ध का विच्छेद करने के लिये शरीर को क्षेत्र बताकर उसको इदंता (पृथक्ता) से देखनेके लिये कह रहे हैं! जो कि वास्तव में हमारे सच्चे स्वरूप से पृथक् ही है। शरीर को इदंता से देखना केवल अपना कल्याण चाहने वाले साधकोंके लिये ही नहीं, प्रत्युत मनुष्य-
मात्र के लिये परम आवश्यक है।  
कारण कि अपना उद्धार करने का अधिकार और अवसर मनुष्य-शरीर में ही है। यही कारण, है कि गीताका उपदेश आरम्भ करते ही भगवान ने सबसे पहले शरीर और शरीरी का पृथक्ता का वर्णन किया है। इदम् का अर्थ है -- यह अर्थात् अपने से अलग दीखने वाला। सबसे पहले देखने में आता है -- पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश से बना यह स्थूल-शरीर। यह दृश्य है और परिवर्तनशील है। अतः पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ (कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका) भी दृश्य हैं। कभी क्षुब्ध और कभी शान्त, कभी स्थिर और कभी चञ्चल -- ये मन में होने वाले परिवर्तन बुद्धि के द्वारा जाने जाते हैं। अतः मन भी दृश्य है। कभी ठीक समझना, कभी कम समझना और कभी बिलकुल न समझना -- ये बुद्धिमें होनेवाले परिवर्तन स्वयं(जीवात्मा) के द्वारा जाने जाते हैं। अतः बुद्धि भी दृश्य है। 
किन्तु बुद्धि आदि के द्रष्टा स्वयं(जीवात्मा) में कभी परिवर्तन हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं और होना सम्भव भी नहीं। वह सदा एकरस रहता है अतः वह कभी किसी का दृश्य नहीं हो सकता।इन्द्रियाँ अपने-अपने विषय को तो जान सकती हैं, पर विषय अपने से पर (सूक्ष्म? श्रेष्ठ और प्रकाशक) इन्द्रियोंको नहीं जान सकते। इसी तरह इन्द्रियाँ और विषय मन को नहीं जान सकते। मन, इन्द्रियाँ और विषय बुद्धि को नहीं जान सकते तथा बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और विषय स्वयं को नहीं जान सकते। न जाननेमें मुख्य कारण यह है कि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि तो सापेक्ष द्रष्टा हैं। अर्थात् एक-दूसरे की सहायता से केवल अपने से स्थूल रूप को देखने वाले हैं किन्तु स्वयं (जीवात्मा) शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि से अत्यन्त सूक्ष्म और श्रेष्ठ होने के कारण निरपेक्ष द्रष्टा है।  अर्थात् दूसरे किसीकी सहायताके बिना खुद ही देखने वाला है। उपर्युक्त विवेचन में यद्यपि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिको भी द्रष्टा कहा गया है, तथापि वहाँ भी यह समझ लेना चाहिये कि स्वयं (जीवात्मा) के साथ रहने पर ही इनके द्वारा देखा जाना सम्भव होता है।  
 कारण कि मन, बुद्धि आदि जड प्रकृति का कार्य होने से स्वतन्त्र द्रष्टा नहीं हो सकते। अतः स्वयं ही वास्तविक द्रष्टा है। दृश्य पदार्थ (शरीर) देखने की शक्ति (नेत्र, मन, बुद्धि) और देखनेवाला (जीवात्मा) -- इन तीनों में गुणों की भिन्नता होने पर भी तात्त्विक एकता है। कारण कि तात्त्विक एकताके बिना देखने का आकर्षण, देखने की सामर्थ्य और देखनेकी प्रवृत्ति सिद्ध ही नहीं होती। यहाँ यह शङ्का हो सकती है कि स्वयं (जीवात्मा) तो चेतन है। फिर वह जड बुद्धि आदिको (जिससे उसकी तात्त्विक एकता नहीं है।) कैसे देखता है इसका समाधान यह है कि स्वयं जड से तादात्म्य करके जड के सहित अपने को मैं मान लेता है। यह 'मैं' (मिथ्या अहं)  न तो जड है और न चेतन ही है। जड में विशेषता देखकर यह जड के साथ एक होकर कहता है कि मैं धनवान हूँ मैं विद्वान हूँ आदि और चेतनमें विशेषता देखकर यह चेतनके साथ एक होकर कहता है कि मैं आत्मा हूँ मैं ब्रह्म हूँ आदि। 
यही प्रकृतिस्थ पुरुष है,जो प्रकृतिजन्य गुणों के सङ्ग से ऊँच-नीच योनियों में बार-बार जन्म लेता रहता है (गीता 13। 21)। तात्पर्य यह निकला कि प्रकृतिस्थ पुरुष में जड और चेतन -- दोनों अंश विद्यमान हैं। चेतन की रुचि परमात्मा की तरफ जाने की है किन्तु भूलसे उसने जडके साथ तादात्म्य कर लिया। तादात्म्यमें जो जडअंश है, उसका आकर्षण (प्रवृत्ति) जडता की तरफ होने से वही सजातीयता के कारण जड बुद्धि आदिका द्रष्टा बनता है।  
यह नियम है कि देखना केवल सजातीयता में ही सम्भव होता है अर्थात् दृश्य, दर्शन और द्रष्टाके एक ही जाति के होने से देखना होता है, अन्यथा नहीं। इस नियम से यह पता लगता है कि स्वयं (जीवात्मा) जबतक बुद्धि आदिका द्रष्टा रहता है, तब तक उसमें बुद्धि की जाति की जड वस्तु है अर्थात् जड प्रकृतिके साथ उसका माना हुआ सम्बन्ध है। यह जड़ शरीर और मन के साथ माना हुआ सम्बन्ध- या तादात्म्य ही सब अनर्थोंका मूल है। इसी माने हुए सम्बन्धके कारण वह सम्पूर्ण जड प्रकृति अर्थात् बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ, विषय, शरीर और,पदार्थोंका द्रष्टा बनता है।
 सत्य अन्तर-जगत और बाह्य जगत को अलग अलग नहीं देखता, यह सर्वदा पूर्ण है। किन्तु सापेक्षिक सत्य भी हमें पूर्ण सत्य को समझने में सहायता प्रदान करता है।  सामान्यतः आधुनिक युवाओं का अपना कोई जीवन-दर्शन नहीं होता, उन्हें इसी भरी जवानी में अपना जीवन का उद्देश्य (नेता बनने और बनाने) निर्धारित करने के लिये उत्साहित करना चाहिये। बहुत से युवा यह नहीं जानते कि मनुष्य-जन्म को महामूल्यवान क्यों कहा जाता है ? अधिकांश यह जानने का भी प्रयास नहीं करते कि यह जीवन क्या है ? वे तो बस यही समझते हैं कि जीवन बस आकस्मिक संयोग से प्राप्त कोई वस्तु है, इसका भरपूर उपयोग करना चाहिये। ईट-ड्रिंक ऐंड बी मेरी - खूब धन कमाना और इंद्रियभोगों में खर्च करना है -बस यही मनुष्य जीवन की सार्थकता है ? यह नीरा पागलपन है, अज्ञान है मूर्खता है ! अलिमृग-मीन-पतंग गज जैसा जीवन को नष्ट करना है !
महामण्डल के लीडरशिप ट्रेनिग से जो नेतृत्व उभर कर सामने आएगा वह इस मूर्खता के मकड़-जाल में फंसे युवक-युवतियों को बाहर खींच लायेगा। उन्हें नारद का माया दर्शन की कहानी सुनायेगा:
नारद का माया दर्शन : नारद ने एक दिन श्रीकृष्ण से पूछा, " प्रभो, माया कैसी है, मैं देखना चाहता हूँ। " ..... बच्चे जल कहाँ है ? तुम जल लेने गए थे न, मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में खड़ा हूँ। तुम्हें गए आधा घण्टा बीत गया। "आधा घण्टा !!" नारद चिल्ला पड़े। उनके मन में तो बारह वर्ष बीत चुके थे, और आधे घण्टे में ही ये सब दृश्य उनके मन से होकर निकल गये ! और यही माया है !
अधिकांश मनुष्य अज्ञानता (अविद्या) के अंधकार में रहते हुए भी खुश रहते हैं। वे इन्द्रियों के बन्धन में हैं, कारागार में हैं किन्तु वही उनको अपना घर प्रतीत होता है। स्वामी जी कहते हैं -" ये सब बातें तो सैकड़ों युगों से लोगों को मालूम है कि हम सब अतीव दुर्दशा में पड़े हैं, यह जगत वास्तव में एक कारागार है, हमारी बुद्धि और मन की चहारदीवारी भी किसी कारागार के ऊँची चहारदीवारी के समान है।  
यह सत्य है कि हम सभी माया के दास हैं, हम सभी माया के अन्दर जन्म लेते हैं, और माया के राज्य में जीवित रहते हैं।
 आज २१ वीं शताब्दी में प्रतिद्वंद्विता जितनी तीव्र है, उतनी तीव्र पहले कभी नहीं थी। मनुष्य अपने भाइयों के प्रति आज जितना निष्ठुर है, उतना पहले कभी नहीं था। तब क्या कोई आशा नहीं है ? इस जगत में ही जहाँ जीवन और मृत्यु समानार्थी हैं, एक महावाणी समस्त युगों में समस्त व्यक्तियों के हृदय में गूँजती रहती है - 
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
             मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।7.14।।  
 यह दैवी त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है। परन्तु जो मेरी शरण (श्री रामकृष्ण परमहंस की शरण) में आते हैं वे इस माया को पार कर जाते हैं।। जब मनुष्य को लगता है कि उसका सब कुछ चला जा रहा है, जब उसकी आशा टूटने लगती है, जब अपने बल में उसका विश्वास हटने लगता है, जब सबकुछ उसकी मुट्ठी से फिसल कर भागने लगता है और जीवन एक भग्नावशेष में परिणत हो जाता है, तब वह इस वाणी को सुन पाता है - इसके मर्म को समझ पाता है -और यही धर्म है !
देवोपासना ( किसी मानवजाति के मार्गदर्शक नेता या ठाकुर-देव की पूजा -अर्चना का ?) में कौन सा रहस्य है ? यही कि वे प्रकृति से उन्नत हैं, इस माया के द्वारा वे बद्ध नहीं हैं। जैसे जैसे प्रकृति के सम्बन्ध में हमारी धारणा उन्नत होती जाती है, वैसे वैसे प्रकृति के प्रभु आत्मा के सम्बन्ध में भी हमारी धारणा उन्नत होती जाती है। अंत में हम एकेश्वरवाद -'मैं' अहं नहीं -आत्मा ही सच्चिदानन्द है -में पहुँच जाते हैं ! 
यह वेदान्त माया या प्रकृति को स्वीकार करता है, और जिसके मतानुसार मायाधीश एक ईश्वर (ठाकुर देव जो मेरे हृदय में मेरी आत्मा बनकर बैठे हैं !) ही है ! यह मुक्ति यह स्वाधीनता तुम्हारे अंदर ही है, वह तुम्हारी आत्मा की अन्तरात्मा है। यह मुक्ति बराबर तुम्हारा स्वरूप ही थी, और माया ने तुम्हें कभी बद्ध नहीं किया। तुम पर अधिकार चलाने का सामर्थ्य प्रकृति में कभी नहीं था। डरे हुए बालक के समान तुम स्वप्न देख रहे थे कि प्रकृति तुम्हारा गला दबा रही है। इस भय से मुक्त होना ही लक्ष्य है। " २/८३ 
 "Man must be educated in knowledge of his own divine nature." 'मैन मस्ट बी एजुकेटेड इन नॉलेज ऑफ़ हिज ओन डिवाइन नेचर.'  प्रत्येक युवा को छात्र-जीवन से ही उसकी अपनी दिव्य प्रकृति या यथार्थ स्वरूप के ज्ञान में अवश्य शिक्षित (प्रशिक्षित) किया जाना चाहिए। इसे ही आत्मज्ञान भी कहते हैं। यह हमारे अलग अलग स्त्री-पुरुष में विभक्त अहं-केन्द्रित ज्ञान  या अहंकार-स्वभाव का ज्ञान नहीं है, बल्कि उस विशिष्ट 'स्व' का ज्ञान है -जो सभी का 'स्व' है! उसी स्व में हमलोग अभी रह रहे हैं, उसी में चल रहे हैं, जो हमारा अस्तित्व है, जो हमारी वास्तविक सत्ता है। 
यही वह ज्ञान है, जो हमें उस मुक्ति (प्रकृति या मन की गुलामी से) में पुनः प्रतिष्ठित करा देगा-जो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। यह मुक्ति हमें प्रकृति के द्वारा उपहार में नहीं प्राप्त होती, या कोई हमें इस मुक्ति को उपहार के रूप में नहीं दे सकता। हमें स्वयं एक दिन यह अनुभूति हो जाती है कि 'OMG' - हम तो सदा से मुक्त ही थे - किन्तु 'ऑर्गेनिक डिफिशिएंसी' [इन्द्रिय-सम्बन्धी त्रुटि, ब्रह्मचर्य का अभाव]  के कारण हमारा शुद्ध-बुद्ध-नित्यमुक्त परमानन्दी स्वरूप हमसे ही विस्मृत हो गया था !!'माया एवं मुक्ति ' नामक भाषण २/८० में स्वामी जी कहते हैं - " ('Hand' या शरीर की शक्ति सेन्ट्री-फ्यूगल फ़ोर्स, अविद्या माया, प्रेय को पाने का लालच) इन्द्रियाँ मनुष्य की आत्मा को बाहर खींच लाती हैं ! मनुष्य ऐसे स्थानों में सुख की खोज करना शुरू कर देता है, जहाँ वह उन्हें कभी नहीं पा सकता। युगों से हम यही शिक्षा पाते आ रहे हैं कि -यह निर्थक और व्यर्थ है; यहाँ (इन्द्रिय विषयों से) हमें सुख नहीं मिल सकता। परन्तु हम सीख नहीं सकते। अपने अनुभव के अतिरिक्त और किसी उपाय से हम सीख नहीं सकते। हम प्रयत्न करते हैं -(विवाह-बाल-बच्चे- करते हैं ?) और हमें एक धक्का लगता है; फिर भी क्या हम सीखते हैं ? नहीं, फिर भी नहीं सीखते।
 (अलि-मृग-मीन-पतंग-गज की एक इन्द्रिय - हालत देखो।) पतिंगे जिस प्रकार दीपक की लौ पर टूट पड़ते हैं, उसी प्रकार हम (पाँच) इन्द्रियों में सुख पाने की आशा से अपने को बार बार झोंकते रहते हैं। पुनः पुनः लौटकर हम फिर से नये उत्साह के साथ लग जाते हैं। बस, इसी प्रकार चलता रहता है और अंत में लूले-लँगड़े होकर,धोखा खाकर हम मर जाते हैं। और यही माया है!"
यही बात हमारी बुद्धि ('Head' चित्त-मन-बद्धि-अहंकार) के सम्बन्ध में भी है। हम अपनी बुद्धि से (विश्व या अपने शरीर) के रहस्य को जान लेने की चेष्टा करते हैं, हम कुछ कदम आगे जाते हैं (तो मृत्यु और बचपन की ओर लौटते हैं तो जन्म ) कि अनादि-अनन्त काल (टाइम) बीच में दीवार की भाँति खड़ा हो जाता है, जिसे हम लाँघ नहीं सकते। कुछ दूर आगे बढ़ते ही असीम देश (स्पेस) का व्यावधान आकर खड़ा हो जाता है। और फिर हम अपने जीवन को ही कार्य-कारण रूपी दीवार (जन्म-मृत्यु चक्र ) द्वारा सुदृढ़ रूप से सीमाबद्ध पाते हैं। हम इस दीवार को लाँघ नहीं सकते। तो भी हम संघर्ष करते रहते हैं। हमें संघर्ष करना ही पड़ता है। और यही माया है।  
हृदय (Heart) की प्रत्येक धड़कन के साथ हम समझते हैं कि हम प्रेम करने को स्वतंत्र हैं, और उसी क्षण हम देखते हैं कि हम स्वतन्त्र नहीं हैं। हम प्रकृति (प्रोपेन्सिटी) के गुलाम हैं। और यही माया है। हम सबका यही हाल है। किसी न किसी रूप में हम सभी इस माया के भीतर हैं। यह बात समझना बड़ा कठिन है - विषय भी बड़ा जटिल है। लोगों के सामने दो मार्ग हैं। इनमें से एक को सभी जानते हैं। वह यह कि -' संसार में दुःख है, कष्ट है-सब सत्य हैं, पर इस सम्बन्ध में बिल्कुल मत सोचो। 'यावत जीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत।' इसीको सांसारिक ज्ञान कहते हैं। -' मनुष्य  रूपेण मृगाश्चरन्ति'-  मूविंग अबाउट इन दी फॉर्म ऑफ़ मैन, बट विथ एनिमल स्टिल विदिन .’
येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः  ।
                        ते  मृत्युलोके  भुवि  भार भूता  मनुष्य  रूपेण मृगाश्चरन्ति ॥ – भर्तृहरि नीतिशतक

जिन्होंने न विद्या प्राप्त की है, न तप किया है, न दान दिया है, न ज्ञान अर्जित किया है, न चरित्र-निर्माण करने की चेष्टा की, न गुण सीखे और न ही धर्मानुसार कर्तव्यों का पालन ही किया है- वे इस संसार में पृथ्वी का बोझ बढ़ाने वाले और मनुष्य की सूरत-शक्ल में पशु ही हैं। इसी बात को वेदान्त आध्यात्मिक अंधापन, अंधकार या अज्ञानता कहता है।
इस मोहनिद्रा से युवाओं को जाग्रत करने के लिये महामण्डल का नेता युवाओं से कहेगा - " तुम सभी अव्यक्त ब्रह्म हो, तुम्हारे भीतर अनंत संभावनायें छुपी हुई हैं! उठो ! जागो ! जब तुम आलस्य छोड़कर ५ अभ्यास करके उस दिव्यता को अभिव्यक्त करने के लिए प्रयासरत हो जाओगे तभी इस महामूल्यवान मनुष्य जीवन के उद्देश्य को समझ पाओगे। जब तुम यह जान जाओगे कि जीवन क्या है, तब तुम्हें भी अपने जीवन से प्रेम हो जायेगा। पूर्ण मनुष्य बन सके तो उससे जीवन का जो पूर्ण आनंद प्राप्त होगा उसकी तुलना में इन्द्रिय विषयों का सुख अत्यंत तुच्छ प्रतीत होगा। एक बार अमेरिका के विख्यात अज्ञेयवादी इंगरसोल ने स्वामी जी से कहा था - ' हमलोग पंचेन्द्रिय ग्राह्य जगत के सिवा अन्य किसी परम् सत्य को जानने की चिंता नहीं करते, अतः हमलोग इस जगत रूपी संतरे को निचोड़ कर उसका पूरा रस ले लेना चाहते हैं। स्वामीजी ने कहा था तुमलोग संतरे का रस निचोड़ते हो और हमलोग आम का रस निकाल कर उसकी गुठली को फेंक देते हैं। ' 
यहीं पर विवेक-प्रयोग करना आवश्यक हो जाता है। हम सभी लोग सुख पाना चाहते हैं, किन्तु सच्चा सुख कहाँ है -यह नहीं जानने के कारण अक्सर सुख के आवरण में छुपे दुःख को ही भोगते हैं विवेक-प्रयोग करना ही अन्तः जगत का विज्ञान है। सुख तीन प्रकार के हैं, सात्विक,राजसिक, और तामसिक |सामान्यतः हम सभी लोग पहले तामसिक सुख की तरफ ही दौड़ते हैं, या फिर राजसिक सुख (दाद-दिनाई खुजलाने से पहले सुख बाद में महा पीड़ा ) | "जो सुख आरम्भ में विष की तरह दुःख दायक है, किन्तु परिणाम में अमृत के समान है, और जो सुख आत्मनिष्ठ बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होता है, वह सात्विक सुख है |"(गीता : १८ :३७ )" रूप, रस आदि विषयों और इन्द्रियों के संयोग से जो सुख उत्पन्न होता है, और जो सुख आरम्भ में अमृत तुल्य लगता है, किन्तु परिणाम में विष की तरह दुःख दायक है, उसे राजसिक सुख कहते हैं " (गीता : १८ : ३८ )" जो सुख आरम्भ और परिणाम में बुद्धि का मोह्जनक है, और जो सुख अति निद्रा, आलस्य और असावधानता से उत्पन्न होता है, उसे तामसिक सुख कहते हैं | "(गीता:१८:३९)
तुमने आँवला और हर्रे का नाम सुना होगा, जब इन्हें पहले मुख में डालकर चबाया जाता है तो आरम्भ उनका स्वाद अच्छा नहीं लगता, किन्तु जब इन्हें चबाने के बाद थोडा पानी पी लेते हो तो इसका स्वाद भी अच्छा लगता है और इनसे हमारे शरीर को सच्ची पौष्टिकता भी प्राप्त होती है |अतः यही है सात्विक सुख |
अतः केवल अपने क्षुद्र सुखों का भोग करने के लिये ही जीवन धारण करना, घोर स्वार्थपरता ही नहीं अपितु देवदुर्लभ मनुष्य शरीर को प्राप्त कर उसे नष्ट कर देने जैसा है | तथा महामण्डल के नेता अपने आस-पास रहने वाले भाइयों के मन में ऐसे ही उच्च विचारों को भरने के लिये केवल मुख से न बोल कर जीवन से दिखा देते हैं |" मनुष्यों की सच्ची सेवा , उनके मन में उच्च भावों को प्रविष्ट कराकर भी की जा सकती है ! "
============

 नेतृत्व का गूढ़ रहस्य (The Secret of Leadership ): 'नेता' का विशिष्ट लक्षण (वास्तविक गुण आध्यात्मिकता) विशेष आध्यात्मिक शक्ति-जगत को ब्रह्ममय देखने कि शक्ति (या खुली आँखों से ध्यान करने की शक्ति में) सन्निहित है !       
अपरोक्षानुभूति:११६  में आचार्य शंकर कहते हैं, -'नेता' की विशेष आध्यात्मिक शक्ति- " जगत को ब्रह्ममय देखने कि शक्ति या 'खुली आँखों से ध्यान करने की शक्ति' में सन्निहित है! 
दृष्टिं ज्ञानमयीं कृत्वा पश्येत्-ब्रह्ममयं जगत् ।
               सा दृष्टिः परमोदारा न नासाग्रावलोकिनी ॥ ११६॥       

एक बार भी तुम यदि अपने अनुभव से यह जान  कि- यह जगत प्रत्यक्ष ब्रह्म है ! जिसको भी और जहाँ भी देखो - सभी ईश्वर हैं ! प्रत्येक मनुष्य में वही पवित्रता विद्यमान है।  बिना कुछ बोले, मन ही मन अपने ह्रदय में, प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान पवित्रता को अनुभव करते रहो। तुम केवल अपनी इस अनुभूति के द्वारा ही, दूसरों को भी महान बना सकते हो| हर समय उपदेश देते रहने से कोई लाभ नहीं होगा, बस- हर किसी में अन्तर्निहित पवित्रता का अनुभव करो। 
तुम स्वयं जिस परिमाण में अपने भीतर और प्रत्येक मनुष्य के हृदय में विद्यमान उस दिव्यता (निर्भीकता-पवित्रता-और आत्मश्रद्धा) की उपस्थिति का अनुभव करने में समर्थ बन जाओगे, उसी परिमाण में तुम दूसरों के भीतर भी इस पवित्रता को संचारित कर सकते हो। 
" देख-देख के ऐसा देख, मिट जाए सब, रह जाए एक ! " इस नयी, अनोखी दृष्टि से की गयी समाज-सेवा मुझ मे सहानुभूति, सेवापरायणता, त्याग की भावना को जाग्रत कर देती है।  सेवा के द्वारा निर्भयता अथवा अभिः की प्राप्ति भी अवश्य होनी चाहिये, अतः नेता को सदैव सतर्क हो कर यह देखना चाहिये कि मेरा आत्मविश्वास पहले कि अपेक्षा कई गुना बढ़ गया है, मैं अधिक निःस्वार्थपर हो गया हूँ, अब मेरे मन से सभी प्रकार कि भोगाकांक्षा का समूल नाश हो चुका है !   
क्या तुम यह सचमुच अनुभव कर सकते हैं कि प्रत्येक मनुष्य में -जानीबीघा का कुन्दन, धनेश्वर या श्रवण अथवा कैलाश माँझी में भी ---पहले से ही पूर्ण सत्य, पूर्ण पवित्रता, पूर्ण ज्ञान,सम्पूर्ण शक्ति विद्यमान है ! यह केवल शास्त्रों में लिखी बातें नहीं है, यह बिल्कुल सत्य है, प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है - जरा इस सत्य को अपने ह्रदय में ही महसूस करने कि चेष्टा तो करो ! तुम जितनी जल्दी इस सत्य का अनुभव करने लगेंगे, वह आधात्मिक शक्ति तुम्हारे भीतर और दूसरों में भी विकसित होने लगेगी। यदि तुम ऐसा प्रयोग करके देख चुके हो, तो अब सचमुच तुम एक सच्चे नेता बन सकते हो! 
श्री रामकृष्ण परमहंस एक ऐसे ही नेता थे, स्वामी विवेकानन्द एक ऐसे ही नेता थे, तथा निश्चित रूप से हममें से अनेक लोग सच्चे नेता बन सकेंगे।  केवल इतना ही नहीं, प्रत्येक मनुष्य में ऐसा नेता बनने की सम्भावना है! 
आज हमारे समाज का वातावरण जैसा है, विशेष रूप से उसमें रहते हुए कुछ युवाओं के द्वारा व्यक्तिगत रूप से अलग-अलग अपनी अन्तर्निहित देवत्व को अभिव्यक्त करने के लिये, 3H को विकसित करने के लिये उद्यम करना बहुत कठिन है। यदि कुछ बड़ी संख्या में युवा लोग एक साथ आ जायें,और चरित्र-निर्माण करने के लिये संघबद्ध होकर संगठित प्रयत्न करें, तो निश्चित रूप से वे एक दूसरे को उत्साहित और प्रेरित कर सकते हैं।  यह संगठन 'अखिल भारत विवेकानंद युवा महामंडल'  इसी कार्य के लिये निर्मित हुआ है, ताकि इस संगठन की बज्रांकित पताका के तले सभी युवा एकत्रित होकर अपने जीवन को गठित करने के लिये एक दूसरे को प्रेरित कर सकें।
 यदि वे युवा, इस तरह के संगठित प्रयास के माध्यम से, भारत के ६० करोड़ युवा जनसंख्या में से केवल ६०० (नोबल सिक्स हंड्रेड) युवाओं को 'यथार्थ मनुष्य' में रूपान्तरित कर दें, तो केवल कुछ ही वर्षों में हमारे समाज की अवस्था काफी हद तक बदल जायेगी। [आजादी के बाद से] यदि किसी कमरे में ६५ वर्षों से अँधेरा भरा हो, तो उसके जाने में भी ६५ वर्ष नहीं लगते, एक माचिस की तीली जलाते ही वह सारा अँधेरा भाग जाता है !) और यहीं पर एक ' 3H' को विकसित करने की पद्धति बताने वाले विशेषज्ञ लोकशिक्षकों का निर्माण करने वाला 'संगठन और लीडरशिप' अनिवार्य हो जाता है। 
=============     
 किन्तु यह प्रशिक्षण देगा कौन ?
वर्तमान  मानव  समुदाय दुखी बना हुआ है। उसका कारण छात्रों-युवाओं को उचित मार्गदर्शन (प्रॉपर लीडरशिप) देने या '3H' को विकसित करने की पद्धति सिखा देने में समर्थ मार्गदर्शक नेताओं या लोक-शिक्षकों का घोर अभाव हो गया है। शंकराचार्य विवेक चूडामणिं/३ में कहते हैं,
दुर्लभं त्रयमेवैतद्देवानुग्रहहेतुकम्।
    मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः॥ 
' त्रय-दुर्लभं ' --ये तीन चीजें ' मनुष्यत्वं, मुमुक्षुत्वं और महापुरुष संश्रय'- दुर्लभ हैं, और देवताओं के अनुग्रह से ही मिलती हैं। एक तो मनुष्य होना, दूसरा मन की गुलामी से मुक्त होने की इच्छा या मोक्ष की इच्छा रखना, और तीसरा किसी महापुरुष की शरण। अर्थात स्वामी विवेकानन्द जैसे महापुरुष की प्राप्ति; अर्थात मानव-जाति के मार्गदर्शक नेता को अपना आदर्श (फ्रैंड-फिलॉस्फर-गाइड) या सदगुरु चुन लेना बहुत दुर्लभ है। भगवन्त दुर्लभ नहीं है, सच्चे सन्त या 'वसन्त ऋतू की तरह निःस्वार्थ परोपकारी नेता' का मिलना दुर्लभ है। क्योंकि मानव-जाति के वैसे नेता ही अपने अनुयायियों को नश्वर शरीर (हृदय) में ['ब्लड पम्पिंग मशीन ' के निकट हॉउस न० १०१, सिम्पेथेटिक  गैंगग्लीआ ' में- अवस्थित आत्मा (ब्रह्म श्रीरामकृष्ण) के निवास का पता और उससे साक्षात्कार करने की पद्धति (विवेक-प्रयोग आदि पाँच अभ्यास) सिखला सकते हैं। 
श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में आधारित महामण्डल के युवा प्रशिक्षण शिविर में दिया जाने वाला लीडरशिप ट्रेनिग इस 'ऑर्गेनिक डिफिशिएंसी' (जैविक दुर्बलता) के आनुक्रमिक निराकरण (ग्रेजुअल रिमूवल) की पद्धति द्वारा, मनुष्य मात्र में अन्तर्निहित पवित्रता और पूर्णता  (निर्भीकता और श्रद्धा) की अभिव्यक्ति में क्रमागत उन्नति का ब्यौरा प्रस्तुत करता है। 
ऐसा नेता, (लोक-शिक्षक या गुरु) जो श्रीकृष्ण-अर्जुन, श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा की विशेषताओं में सम्पन्न हो, जिन्होंने अपने प्रचण्ड तप द्वारा ईश्वरीय सत्ता का साक्षात्कार किया हो, जो बुद्ध की भाँति आत्मबल का धनी हो, जो श्रीकृष्ण की भाँति योग  विभूतियों से सुसम्पन्न हो, श्रीरामकृष्ण की तरह जिसके अंतःकरण से भक्तिरस की धारा प्रस्फुटित होती हो। जब कोई ऐस्पिरेंट या सत्यार्थी  'सत्य' को जानने के लिये इतना व्याकुल हो जाता है, मानो उसके हाथ-पैर बांधकर, उसके पेट के ऊपर किसीने दहकता हुआ चारकोल रख दिया हो, तो वह 'शिष्य' (भावी नेता) बनने की योग्यता को पूरी तरह से अर्जित कर लेता है। और ऐसे भावी नेता (शिष्य) को मार्गदर्शन (दीक्षा) देने वाले नेता (गुरु) को ढूँढ़ने नहीं पड़ता।  विष्णु-सहस्रनाम में भगवान विष्णु का एक नाम 'नेता' है, वैसे ही ईश्वर-तुल्य सदगुरु पथ-प्रदर्शक युवा नेता (स्वामी विवेकानन्द) स्वयं उसके पास किसी बहाने उपस्थित हो जाते  हैं। 
प्राचीन भारतीय इतिहास कहता है कि जिस समय आश्रमों में गुरु और शिष्य परंपरा थी। उस युग में जब कोई सत्यार्थी, (aspirant या शिष्य) ब्रह्मपद-अभिलाषी, आकांक्षी केवल परमसत्य को जानने के लिये व्याकुल हो जाता था, तब 'सर्वत्यागी गुरु' (मानवजाति का मार्गदर्शक नेता ) स्वयं उस योग्य शिष्य को ढूंढ़कर लाते थे (ठाकुर दक्षिणेश्वर मन्दिर में अपने कमरे की छत पर खड़े होकर पुकारते थे !), और उन्हें नेतृत्व प्रशिक्षण के पाँच अभ्यास द्वारा प्रशिक्षित योग्य-नेता के रूप में समाज के सामने प्रस्तुत करते थे। 
इसके लिए वे हर उस सुख सुविधा का त्याग कर देते थे, जो उन्हें समाज से सहज में प्राप्त हो सकता था। उन महान नेताओं का ऐसा त्याग, ऐसा उत्सर्ग - समाज और राष्ट्र की उन्नति के लिये उस योग्य प्रार्थी या शिष्य के माध्यम से इस 'लीडर ऐंड वुडबी लीडर' गुरु-शिष्य परम्परा को पुनः आगे बढ़ाने के लिये होता था।  
सचमुच जिन्हें ऐसे (स्वामी विवेकानन्द जैसे ) समर्थ नेता (गुरु) का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन मिल गया समझना चाहिए कि जीवन लक्ष्य प्राप्ति के लिए की जाने वाली साधना की आधी मंजिल पूरी हो गयी, तथा उत्तरोत्तर गति से आगे बढ़ने का एक सशक्त आधार-अवलम्बन मिल गया।  स्वामी जी युवाओं का आह्वान करते हैं -प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है -जीवन की अभिव्यक्ति के उच्चतर सोपानों तक पहुँचने के लिये प्रयत्न और संघर्ष करो ! 'अराइज  अवेक एंड स्टॉप नॉट टिल दी  गोल इज रिच्ड' ! यही वजह है कि प्राचीन भारतीय चिंतकों ने मानवजाति के मार्गदर्शक नेताओं को 'गुरु' के उच्च आसन पर बैठाया है -

                                   ‘यह तन विष की बेलरी, गुरु  अमृत की खान।
      शीश दिये जो गुरु  मिले, तो भी सस्ता जान ॥ ’  

अर्थ: यह शरीर एक विष उत्पन्न करने वाले पौधे के सामान है, जिसे एक गुरु रूपी अमृत ही पवित्र बनाकर अमृतत्व प्रदान कर सकता है, गुरु रूपी अमृत प्राप्त करने के लिए यदि अपने जीवन को भी त्यागना पड़े तो भी यह सौदा सस्ता ही है। कबीर ने तो गुरु की वंदना को ज्यादा महत्व देकर उन्हें ईश्वर से भी उंचा स्थान दिया है।   


 ‘गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागूं पांव,
     बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो बताये’ 

किन्तु कुछ लोग इन दोहों को पढ़कर इतने भावुक हो जाते हैं कि अपना विवेक ही खो देते हैं और दीक्षा लेने के लिये भेड़ों तरह झुण्ड बनाकर-आधुनिक गुरुओं (ठग-वैद्यों) की शरण में चले जाते है। टी.वी चैनल आने के बाद आजकल अपने देश में एक फ़ैशन, या प्रचलन बहुत तेजी से फैल रहा है कि हर किसी मनुष्य को किसी न किसी आश्रम या कहना चाहिए आलीशान आश्रम; में रह रहे किसी गुरु को जाँचे बिना ही अपना मार्ग-दर्शक नेता मान लेना चाहिये। और अर्थ का अनर्थ तो तब हो जाता है, जब वे इन ढोंगी 
गुरुओं के चरित्र को जाँचे बिना दीक्षा भी ले लेते हैं, (किसी जाकिर नाइक के चक्कर में पड़कर धर्म-परिवर्तन भी कर लेते हैं।) 
एक ढोंगी बाबा कहते हैं,भगवान निरकार है इसीलिये किसी भी 'सगुण ब्रहम' ( राम,कृष्ण, ईसा या 
श्रीरामकृष्ण देव-स्वामी विवेकानन्द के गुरु) को अवतार न मानने के लिए उपदेश देते हैं। पर उसके भक्तो के गले में उसी बाबा की तश्वीर वाला लॉकेट होता है, और उनके घरो में उनकी फोटो की पूजा भी होती है। एक बाबा (ठाकुर अमुक-चन्द्र)  कामिनी-कांचन और 'मोह और वासना' से दूर रहने को कहता है। किन्तु उसकी अपनी दो -दो शादीयाँ हो रखी है! 
स्वामी विवेकानन्द ने ब्रह्म को  आत्मसाक्षात्कार (Direct perception) के द्वारा  जाना था। इतना ही नहीं उन्होंने नरदेह-धारी ईश्वर (श्रीरामकृष्ण) के श्री-चरणों का स्पर्श भी किया था। वे जानते थे कि ईश्वर सर्वत्र विराजमान हैं। वे यह भी जानते थे कि ' अहं ब्रह्मास्मि- मैं ही ब्रह्म हूँ !' इस सत्य को अपने अनुभव से जान लेना ही मनुष्य जीवन की चरम उपलब्धी है।
 फिर भी जब वे अपने गुरु से निर्विकल्प समाधि में लीन रहने की इच्छा व्यक्त किये थे, तो उनके गुरु ने प्रसन्न होने के बजाय उनको हलकी झिड़की लगाई थी।  किन्तु उस झिड़की के बाद ही नरेन्द्र का नव-जन्म हुआ था। वे उसी दिन द्विज (विवेकानन्द) हो गये थे। क्योंकि इस भर्त्सना के बाद ही स्वामीजी उस वेदवाक्य
के मर्म को धारण कर सके थे, जिसका अर्थ होता है- " कुछ मनुष्य ऐसे होते हैं, जो अमृतत्व प्राप्त करने के लिये मृत्यु तक का वरण कर लेते हैं; किन्तु कुछ मनुष्य ऐसे भी होते हैं- जो सभी मनुष्यों का कल्याण करने के उद्देश्य से, अमृतत्व  तक का त्याग कर देते हैं ।" 
'देवेभ्यः कमवृणीत मृत्युं प्रजायै कममृतं नावृणीत ।' 
(देवेभ्यः कं मृत्युम् - अवृणीत)  ब्रहस्पति परमात्मा मुमुक्षुजनों के लिए किस मृत्यु को स्वीकार करता है ? अर्थात् किसी भी मृत्यु को नहीं। किन्तु स्वाभाविक जरानन्तर होने वाली मृत्यु को स्वीकार करता है क्योंकि देव तो अमर होते हैं। (प्रजायै कम् – अमृतं न - अवृणीत) देवों से भिन्न  प्रजायमान केवल जन्म धारण करने योग्य प्रजा के लिए किसी भी अमृत को नहीं स्वीकार करता।   
हमलोग यह समझ सकते हैं कि बाद वाला आदर्श ही सर्वोच्च आदर्श है। इसीलिये स्वामी विवेकानन्द ने मानवमात्र के कल्याण के उद्देश्य से बाद वाले आदर्श, ' अमृतत्व ' (निर्विकल्प समाधि) का त्याग करके जन-कल्याण के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया था। इसीलिये उनके गुरुदेव ने अपने हाथों से एक
' चपरास ' लिखा था- " नरेन् शिक्षा देगा।" तथा सार्वजनिक रूप से घोषित किया था, "नरेन्द्रनाथ वास्तव में नर-रूपी नारायण है ! जीवों की दुर्गति को दूर करने के लिये ही इसने एक बार पुनः शरीर धारण किया है ! " श्रीरामकृष्ण ने कहा था, " इस युग में सम्पूर्ण विश्व के इतिहास में इतने उच्च कोटि का आधार और कभी नहीं आया  था! "
[ हिरण्यकशिपु के मारने में नृसिंह को बड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ा था। क्योंकि वह न दिन में मर सकता था, न रात में, न जमीन में, न आसमान में और न आदमी से न जानवर से ही। इसीलिए  नर-सिंह  रूप बना के संध्या समय में अपनी जांघ पर रखकर नाखूनों से पेट चीरकर  ही उसे मारने की बात भगवान को सोचनी पड़ी।ऐसा कहा जाता है। आगे भी ऐसी परेशानी न हो इसी खयाल से उन्होंने  प्रह्लाद से कहा कि इस जगत-प्रपंच को  छोड़ के मेरे साथ ही चलो। लोगों को मनःसंयोग, चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया, जीवन-गठन आदि  ज्ञान-ध्यान सिखाना छोड़ो।
 इस पर प्रह्लाद कहते हैं कि भगवन ऐसा तो अकसर होता है कि सभी ऋषि-मुनि दूसरों की परवाह छोड़ के चुपचाप एकांत में चले जाते और अपनी ही मुक्ति की फिक्र में लग जाते हैं। तो क्या मैं भी आपकी आज्ञा मान के ऐसा ही स्वार्थी बन जाऊँ? हरगिज नहीं। मैं ऐसा नहीं कर सकता। मुझे अकेले मुक्ति नहीं चाहिए। क्योंकि तब तो इन सांसारिक दुखियों-का मार्गदर्शन करने वाला कोई रही न जाएगा। जो आपको इनके हितार्थ बलात इसी तरह खींचे!  
प्रायेण देव मनुय: स्वविमुक्तिकामा मौनं चरन्ति विजने न परार्थनिष्ठा:।
 नैतान् विहाय कृपणान् विमुमुक्ष एकोनान्यं त्वदस्य शरणं भ्रमतोऽनुपश्ये॥ (श्रीमद्भागवत)
-Leaving the miserable fellow-beings behind in thraldom (इन्द्रियों की गुलामी) , little do I care to save myself alone. 
प्रह्लाद कहते हैं जनसाधारण की सेवा ही भगवान की पूजा है। उन्हें प्रवृत्तियों (प्रकृति) की गुलामी करते रहने के लिए यहाँ छोड़,ऋषि मुनि लोग तो स्वार्थी बनकर अपनी ही मुक्ति के लिए एकांतवास करते हैं, उन्हें औरों की फ़िक्र नहीं होती। लेकिन मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकता। सभी दुखियों को छोड़ मुझे सिर्फ अपनी मुक्ति नहीं चाहिए। मैं तो श्री रामकृष्ण विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में मनुष्य बनने और बनाने का युथ लीडरशिप ट्रेनिंग कैम्प  'BE AND MAKE' के साथ मरूँगा और जीऊंगा!] 
इस प्रकार के तरुण मार्गदर्शक ऋषि -नेता इस विश्व में बहुत कम ही होते हैं।  इसी बात को प्राचीन काल के राजा-कवि-दार्शनिक भर्तृहरी एक श्लोक में बड़े सुन्दर ढंग से कहा है - 
मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णाः-
त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभि: प्रीणयन्तः। 
परगुणपरमाणून् पर्वतीकृत्य नित्यं,
निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः ॥
अर्थात -ऐसे सन्त समाज में कितने हैं; जिनका मन, कर्म, वचन पुण्यरूप अमृत (पवित्रता ) से परिपूर्ण हैं, और जो सभी मनुष्यों का बहुत प्रकार से कल्याण करके त्रिभुवन को आनन्दित करते हैं? वे लोग त्रिभुवन को  किस उपाय से आनन्दित करते हैं ? किसी के भीतर यदि परमाणु के जितना छोटा भी गुण दिखता है, उसे वे पर्वत के जितना विशाल देखते और बखान करते हैं, और इस प्रकार अपने हृदय को सदैव विकसित करते रहते हैं। राजा कवि भर्तृहरी कहते हैं, ऐसे सन्त जो ' प्रेम-प्रयोग ' करके दूसरों के परमाणु तुल्य या  अत्यंत स्वल्प गुण को भी- पर्वत प्रमाण बढ़ा कर अपने हृदयों का विकास साधन करते हों, संसार में बहुत कम पाये जाते हैं।आचार्य शंकर ने ( विवेकचूडामणि/ ३९)  भी कहा हैं -
 शान्ता महान्तो निवसन्ति सन्तो
    वसन्तवत् लोकहितं चरन्तः  |
   तीर्णाः स्वयं भीम-भवार्णवं  
     जनान् अहेतुना अन्यान् अपि तारयन्तः ॥३७||
 इस भयंकर संसार-सागर से स्वयं तरे हुए शांत और महान् सज्जन पुरुष वसंत ऋतू के समान लोक-हित करते हुए बिना कारण दूसरे लोगों को तारते (making cross) हुए सदा निवास करते हैं। जब कोई मनुष्य इस नश्वर नाम-रूपात्मक जगत के पृष्ठभूमि में अवस्थित अविनाशी सत्य (अस्ति-भाति-प्रिय) का साक्षात्कार कर लेते हैं, वे इस जन्म-मृत्यु के सागर से तर जाते हैं। अर्थात जगत के पदार्थों को 'मैं' और 'मेरा' मानने की प्रवृत्ति या आसक्ति के बंधन से मुक्त हो कर परम शान्ति का अनुभव करते हैं। उनका दिल पिघलना शुरू कर देता है,अर्थात उनका ह्रदय अत्यन्त विशाल और उदार हो जाता है। और तब वे बिना किसी स्वार्थ के (अकारण) ही बसंत-ऋतू की तरह केवल परोपकार करने के उद्देश्य से भारत के गाँव-गाँव तक स्वामीजी के सन्देश "Be and Make " - ' मनुष्य बनो और बनाओ ' को पहुंचा देने के लिये  लोक-कल्याण के कार्य में निरन्तर लगे रहते हैं। 
 'चरित्रवान मनुष्य ' बन जाने के एक निरन्तर संग्राम का नाम है-जीवन । भगिनी निवेदिता के माध्यम से युवाओं का आह्वान करते हुए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, -"मेरी दृढ धारणा है कि तुममें अन्धविश्वास नहीं है। तुममें वह शक्ति विद्यमान है, जो संसार को हिला सकती है, धीरे - धीरे और भी अन्य लोग आयेंगे। 'निर्भीक वाणी'  और उससे अधिक 'निर्भीक' होकर कर्म करने वाले युवाओं की हमें आवश्यकता है। उठो! उठो! संसार दुःख से जल रहा है। क्या तुम सो सकते हो? हम बार - बार पुकारें, जब तक सोते हुए देवता न जाग उठें, जब तक अन्तर्यामी देव उस पुकार का उत्तर न दें। जीवन में और क्या है? इससे महान कर्म क्या है?" " Be and Make ! ' मनुष्य बनो और मनुष्य बनाओ'  - यही हमारा उद्देश्य बने। " 
 - वे कहते थे,"अतीत मे भी आत्मत्याग ही कर्म का रहस्य था, अफ़सोस युगों युगों तक ऐसा ही चलता रहेगा।" "उठो, सिंह स्वरूप होकर भी तुमलोग अपने को भेंडो के समान समझ रहे हो, आओ, इस भ्रम को दूर हटा दो! तुम तो अजर-अमर आत्मा हो, मुक्त सनातन और आनन्दमय हो ! तुम लोग जड़ नहीं हो, तुमलोग देह नहीं हो, जड़ तो तुम्हारा दास है। तुमलोग जड़ के दास नहीं हो। यदि तूँ केवल अपनी मुक्ति के लिये साधना करना चाहता है, तो तूँ जहन्नुम में जायेगा। ...यदि दूसरों का कल्याण करने के लिये, यदि तुझे नरक मे भी जाना पड़े तो, तो उसमें हानी ही क्या है ? स्वार्थपरता के साथ स्वयं स्वर्ग प्राप्त करने की अपेक्षा क्या यही ज्यादा अच्छा नहीं है? "  "मुझे मुक्ति और भक्ति की चाह नहीं। लाखों नरकों में जाना मुझे स्वीकार है, 'बसन्तवल्लोकहितं चरन्तः-' यही मेरा धर्म है।" 
==============

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें