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मंगलवार, 2 अगस्त 2016

'नियत कार्य और कार्य -पद्धति है - व्यावहारिक वेदान्त ' [*** एक नया युवा आंदोलन-8'The Task and the Way ']

'पौरुष ' (मैनलीनेस या विवेक-प्रयोग) पर ही सब कुछ निर्भर करता हैं ।
(श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में चरित्र-निर्माण)
'महामण्डल का उद्देश्य और कार्य -पद्धति'  
महामण्डल का उद्देश्य है- भारत का कल्याण। और यदि हमलोग उसके लिये कार्य करना चाहते हों, तो जगत की ओर देखने का हमारा नजरिया भी बिल्कुल स्पष्ट रहना चाहिये ! स्वामी विवेकानन्द यह जानते थे कि सम्पूर्ण विश्व में केवल भारत ही एक ऐसा देश है जो सम्पूर्ण मानवजाति की उन्नति में अर्थपूर्ण ढंग से अपना योगदान कर सकता है। इसीलिये तो धरती पर अवतरित होने के लिये उन्होंने भारत का ही चयन किया, और जगत के कल्याण के लिये, विशेष रूप से भारत के कल्याण के लिये अपने जीवन को न्योछावर कर दिया।   
"स्वामीजी हैड दिस विज़न आउट ऑफ़ हिज स्पिरिचुअल रियलाइजेशन !" स्वामी जी को ऐसी दृष्टि -'जगत को ब्रह्ममय देखने की विवेक-दृष्टि'- आत्म-साक्षात्कार करने या अपने यथार्थ स्वरूप की अनुभूति करने से प्राप्त हुई थी। स्वामी विवेकानन्द को ऐसी आत्माभिव्यक्ति (सेल्फ-एक्स्प्रेसन) और आध्यात्मिक-अनुभूति हमारे प्राचीन शास्त्रों में प्रतिस्थापित सत्यों, विशेष रूप से उपनिषदों, जिन्हें हम वेदान्त भी कहते हैं-से प्राप्त हुई थी। 
प्राचीन काल में यह वेदान्त - हमारे देश में वनों में, विशेष तौर से ऋषि-मुनियों के द्वारा ही पढ़ा जाता था। स्वामीविवेकानन्द ही वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने हमारे प्राचीन शास्त्रों में संचित इन महान सत्यों को वनों-आश्रमों, मठों के चहारदीवारियों से बाहर निकाल कर आम आदमी के द्वार तक, साधारण मनुष्यों के घर तक,  हाटों-बाजारों में, पूरे समाज में और मनुष्यों के दैनन्दिन जीवन तक पहुँचाने का कार्य किया था। इसको ही व्यवहारिक वेदान्त या 'प्रैक्टिकल वेदान्त ' कहा जाता है। सम्पूर्ण समाज के कल्याण के लिये, 'जगत को ब्रह्ममय देखने'- की इस तकनीक (विवेक-दृष्टि) को प्रत्येक व्यक्ति के जीवन-गठन के लिये प्रयोग में लाना होगा।    
स्वामीजी ने कहा था- " कोई भी राष्ट्र इसलिये महान और अच्छा नहीं होता कि वहाँ की पार्लियामेन्ट ने यह या वह बिल पास कर दिया है, वरन इसलिये होता है कि उसके नागरिक महान और अच्छे हैं ।" अतएव, जैसा कि हम पहले ही देख चुके हैं, किसी भी बड़ी बड़ी सरकारी योजनाओं को लागु करने से पहले, व्यक्ति के चरित्र निर्माण पर ध्यान देना ही हमारा प्रथम कार्य होना चाहिये। किसी व्यक्ति को हम अच्छा मनुष्य तभी कहते हैं, जब उसका चरित्र अच्छा होता है। इसीलिये स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, पहले 'मनुष्य' तैयार करो ! 
स्वामीजी ने यह भी अनुभव किया था कि यदि इस कार्य को हम बहुत बड़े पैमाने पर, सम्पूर्ण  भारत के कल्याण के लिये करना चाहते हैं, तो हमें निश्चित रूप से यह कार्य संगठित तरीके से ही करना होगा। इसीलिये यदि हम अपने देश के लिए, अपने देशवासियों के कल्याण के लिये कार्य करना चाहते हों, तो हमें अपना पूरा ध्यान प्रत्येक व्यक्ति के चरित्र-निर्माण पर ही केंद्रित करना होगा। और " इंडिविजुअल करैक्टर-बिल्डिंग एंड सेल्फ-डेवलपमेन्ट "' व्यक्ति-चरित्र निर्माण और आत्म विकास' का यह प्रयास हमें संघबद्ध होकर और  संगठन के माध्यम से ही करना होगा। 
अब हम यह देखने की कोशिश करेंगे कि 'मनुष्य ' तैयार करने और चरित्र के विकास के लिये क्या कोई वैज्ञानिक पद्धति और वैज्ञानिक रास्ता भी हो सकता है ? क्योंकि हममें से कइयों को ऐसा लगता है कि किसी व्यक्ति का चरित्र तो उसके साथ जन्मजात रूप से जुड़ा होता है। हमलोग अक्सर उदाहरण देते हुए कहते हैं, 'वाटर हैज डेफनिट केरक्टरिस्टिक्स' या पानी का एक निश्चित लक्षण होता है, उसी प्रकार आग में भी कुछ अलग प्रकार का गुण होता है। बाघ जन्मजात रूप से एक क्रूर और हिंसक जानवर होता है। किन्तु क्या हम निश्चित तौर से मनुष्य के विषय में भी  वैसा कुछ कुछ कह सकते हैं ? स्वामीजी ने क्यों कहा था , कि देवता लोग भी मानव-शरीर में जन्म लेने के लिये तरसते हैं ?  देवताओं का जीवन चाहे जितना भी गौरवशाली, महान और शानदार क्यों न हो, वे जैसे हैं, आजीवन वैसे ही रहते हैं। उसी प्रकार पशुयोनि भी भोग-योनि है, उन्हें कुछ बनना नहीं होता; हमलोगों ने यह कभी नहीं सुना है, कि कहीं कोई बाघ था जो आगे चलकर एक संत बन गया है। किन्तु मानव इतिहास में ऐसे अनगिनत उदाहरण दर्ज हैं, जहाँ कई पापी मनुष्य भी बाद में महान संत बन गये हैं। 
आइये हमलोग यह जाँच करके देखें कि हम किसी व्यक्ति के चरित्र को जानते कैसे हैं ? समाज के दूसरे व्यक्तियों के साथ  जब किसी मनुष्य का आकस्मिक मिलन होता है, उस समय उसके व्यवहार के माध्यम से किसी व्यक्ति के चरित्र को जाना जाता है। ट्रेन यात्रा के दौरान किसी व्यक्ति से मेरी मुलाकात हो जाती है, और थोड़ी देर बाद जब वह व्यक्ति चला जाता है, तो देखता हूँ कि उस व्यक्ति ने मेरे मन में बहुत ही आकर्षक छाप छोड़ी है। इसके विपरीत, जब मैं किसी दूसरे मनुष्य के सम्पर्क में आता हूँ, यदि उससे मिलकर मैंने खराब अनुभव किया, तो मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि काश मैं उस व्यक्ति कभी मिला ही न होता, तो अच्छा था; ? ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि पहले व्यक्ति के व्यक्तित्व और दूसरे व्यक्ति के व्यक्तित्व में अंतर है, हैं तो दोनों मनुष्य किन्तु एक का व्यक्तित्व चित्ताकर्षक (विन्सम) है, पर दूसरे व्यक्तित्व का वैसा क्यों नहीं है?
आइये अब हमलोग 'व्यक्तिव' ('पर्सनैलिटी) और 'चरित्र ' (कैरेक्टर)  के अंतर को समझने की चेष्टा करें। कोई व्यक्ति दूसरों के हृदय में अपना जैसा समग्र प्रभाव या छाप छोड़ता है, वही उसका व्यक्तित्व होता है। किसी व्यक्ति की आवाज, शारीरक लक्षण, आदि वैशिष्ट भी इस छाप को काफी हद तक निर्णायक बना देते हैं। यहाँ तक कि उसका परिधान, बालों की कटिंग, और उसके साथ जुड़ी हर चीज, उसके व्यक्तित्व में कुछ न कुछ छाप जोड़ देती है। जबकि किसी व्यक्ति का चरित्र उसके व्यक्तित्व का सिर्फ एक हिस्सा है। किन्तु हमें इस बात को बिल्कुल स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिये कि व्यक्तित्व का यही हिस्सा (चरित्र) सर्वाधिक महत्वपूर्ण वस्तु है! 
मेरे कपड़े मलीन हो सकते हैं, मेरा चेहरा बहुत मनोहारी नहीं  हो सकता है, बाह्य रूप से मेरी शिक्षा भी अधिक नहीं हो सकती है, किन्तु यदि मेरे चरित्र में कुछ उत्कृष्ट गुण हों, तो अन्ततोगत्वा लोग मेरे व्यवहार की वजह से, मेरे द्वारा सुंदर भावनाओं की अभिव्यक्ति होते देखकर लोग मुझे अधिक पसंद करेंगे, और मुझसे प्रेम करेंगे।  यदि हम ऐसा कहें कि जैसे हम दीखते हैं, वह हमारा व्यक्तित्व है; और जो हम वास्तव में हैं वह हमारा चरित्र है - तो यह कथन सत्य के बिल्कुल समीप होगा। 
" मनुष्य का व्यवहार या चरित्र ही वह दर्पण है
 जिसमें उसका व्यक्तित्व भली भाँति देखा जा सकता है ! "

हम अपने विशेष ढंग से बोल कर, और अन्य दूसरी चीजों के द्वारा दूसरों को थोड़ी देर के लिये प्रभावित या आकर्षित कर सकते हैं, किन्तु यदि परिस्थतियां बदल जाती हैं तो हम दूसरे ढंग  से व्यवहार भी कर बैठते हैं। इसलिए, सर्वप्रथम हमें हमारे व्यक्तित्व का 'रीयल कन्टेन्ट '(असली तत्व)- अपने चरित्र को ठोस धरातल पर और सही ढंग से निर्मित करने पर ध्यान देना चाहिये। 

श्रीरामकृष्ण के जीवन को देखें। बहुत से शिक्षित, और कोलकाता के प्रबुद्ध वर्ग के लोग भी  उनके पास आया करते थे। उन लोगों को श्रीरामकृष्ण बाह्यदृष्टि से देखने पर किस प्रकार के मनुष्य प्रतीत होते होंगे ? बिल्कुल सरल. एक देहाती अनपढ़ व्यक्ति, जिसको कोई शऊर नहीं हो, जो अक्सर अभद्र ग्रामीण भाषा का उपयोग भी करता हो । ऊपरी तौर से,श्रीरामकृष्ण के व्यक्तित्व में ऐसा कुछ नहीं था, जो  उन्हें  उनकी ओर आकर्षित कर सकता हो। किन्तु जैसे ही वे  उनके निकट आते थे , और वे चेहरा उठाकर उनकी ओर देखते थे, और इससे पहले कि वे एक शब्द बोलें, सभी लोग मोहित हो जाते थे, वे उनके प्रेम के जाल में फँस चुके होते थे । 

 ऐसा कैसे घटित होता था ? क्योंकि श्री रामकृष्ण परमहंस पास केवल एक  दिखावटी व्यक्तित्व ही नहीं था, बल्कि एक आश्चर्यजनक चरित्र था! उन्होंने वैसा चरित्र कैसे गठित किया था ?  उन्होंने 'सत्य' का अन्वेषण किया था, और उन्होंने अपने ही भीतर उस 'सत्य' को आविष्कृत किया था; जो पवित्रता है, जो प्रेम है, जो दया है, जो सहानुभूति है, जो निःस्वार्थपरता है, जो त्याग है, जो सबों के प्रति सेवापरायणता है। वास्तव में ये सभी वे सर्वोत्तम गुण हैं, जिन्हें कोई मनुष्य अपने चरित्र में धारण कर सकता है। यदि हम किसी तरह इन गुणों को अपने भीतर विकसित कर सकें, तभी यह  कहा जा सकता है कि हमने एक अच्छे चरित्र का गठन कर लिया है। 
हमारा चरित्र एक,' बंडल ऑफ़ हैबिट्स है या एग्लोमरेशन ऑफ़ प्रोपेन्सिटीज ' है । अर्थात चरित्र और कुछ नहीं बस 'आदतों का एक गठरी है, या प्रवृत्तियों का एक गुच्छा है'। 'सत्य' के प्रति अटूट प्रेम या करुणा, सहानुभूति, निःस्वार्थपरता, निर्भीकता, त्याग एवं सेवा करने की तीव्र इच्छा--ये सभी चरित्र के अच्छे गुण हैं। इसीलिये क्या हम यह मान सकते हैं, कि ये अच्छे गुण भी उन्हीं आदतों से उत्पन्न होते हैं, जिससे हमारा चरित्र बनता है ? हम पायेंगे कि जिन अच्छे गुणों का हमने अभी अभी उल्लेख किया है, वे सभी गुण तो हमारे अस्तित्व में पहले से ही विद्यमान हैं !
जब हमारी सत्ता में दिव्यता अथवा चरित्र के समस्त गुण प्राकृतिक रूप से अन्तर्निहित (इन्हेरन्ट) हैं, तो फिर चरित्र-गठन में विवेक-प्रयोग करके केवल सद्कर्म करने और अच्छी आदतों द्वारा -सद्प्रवृत्तियों का निर्माण करने की  भूमिका क्या है ? इसकी जाँच करने पर हमलोग देखेंगे कि, अतीत में किसी प्रकार (अज्ञानवश) हमने विवेक-प्रयोग किये बिना कार्य करने की आदत डाल रखी थी, और स्वयं के कुछ 'रॉंग डिशिजन्स एंड रॉंग ऐक्शंस'-- गलत फैसलों और गलत कार्यों  की वजह से, अपने मन (अवचेतन मन) चित्त पर कुछ गहरे लीक या खाँचा बना लिये थे, जो इस समय हमारी सत्ता में अंतर्निहित इन सुन्दर गुणों को प्राकृतिक रूप से अभिव्यक्त होने में रुकावट पहुँचा रहे हैं। 

इसीलिये स्वामीजी ने कहा था, कि इस बात को हमें को विशेष-ध्यान पूर्वक चिन्हित कर लेना चाहिये कि, हमें भीतर से बाहर की ओर विकसित होना है ! चरित्र-निर्माण करने या मनुष्य बनने की शिक्षा, एक प्रतिकारात्मक प्रक्रिया (निगेटिव प्रोसेस) है! क्योंकि पहले से अन्तर्निहित चारित्रिक गुणों की अभिव्यक्ति के मार्ग में बाधक, चित्त पर पड़ी गहरी लकीरों को हटाने के लिए विवेक-प्रयोग करने हेतु मन को नियंत्रित रखने के लिए हमें कड़ा संघर्ष और कठिन परिश्रम करना पड़ता है। 
इसी बात को महर्षि पतंजलि ने योग-सूत्र (कैवल्य पाद :३) में किसान की उपमा से समझाया है -"वरंभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत ।" - जैसे किसान जब पानी के बहने में रुकावट डालने वाली मेड़ को तोड़ देता है, तो मेड़ में अटका हुआ पानी अपने स्वभाव से ही बहने लगता है." उसी प्रकार, विवेक-प्रयोग द्वारा बाधा (चित्त पर बने अहं-लीक के मिटते ही) के हटते ही मानवमात्र में अन्तर्हित चरित्र के समस्त गुण स्वतः अभिव्यक्त होने लगते हैं ! 
इसीलिये चरित्र-गठन का प्रथम सोपान - बुरे विचारों, बुरे शब्दों, बुरे कर्मों की प्रवृत्ति या प्रोपेन्सिटीज से निवृत्त होना है। अर्थात मन-वचन-कर्म से पवित्र रहने की चेष्टा करते रहना है, इस  आत्म-संयम को ही ब्रह्मचर्य कहा जाता है। इसके बाद हमें अच्छे कार्यों की पुनरावृत्ती द्वारा अच्छी आदतों का निर्माण करना होगा। हमारा अब स्वाभाविक प्रश्न होगा - अच्छे कार्य क्या हैं ? शायद हमलोग एक स्वर से प्रस्ताव देंगे कि नैतिक कर्मों को ही क्रियान्वित करते रहना ही आमतौर से अच्छा होता है, परन्तु नैतिकता क्या है ? स्वामी विवेकानन्द बहुत सरल शब्दों में नैतिकता की एक ऐसी परिभाषा देते हैं,जो नैतिकता को एक परम-सिद्धान्त के रूप में परिभाषित करता है, क्योंकि उसे समय के उतार- चढाव के अनुसार कभी बदला नहीं जा सकता । स्वाजी कहते हैं- " दैट व्हिच इज अनसेलफ़िश इज मोरल,  एंड दैट व्हिच इज सेल्फिश इज इम्मोरल." अर्थात जो निःस्वार्थपर है वह नैतिक है, और जो स्वार्थपर है वह अनैतिक है। नैतिकता की इस परिभाषा को उन्होंने कहाँ से निकाला होगा ? 
हम आसानी से देख सकते हैं, यह परिभाषा वेदान्त द्वारा प्रतिपादित सत्यों या महावाक्यों पर ही आधारित एक उपसिद्धान्त है। जब तक हम लोग 'मैं' और 'मेरा' को लेकर ही व्यस्त रहते हैं, तब तक हम स्वयं को एक मरणधर्मा क्षुद्र शरीर तक ही सीमित किये रहते हैं। (मेरा देहाध्यास या 'अहं' की गहरी लकीर मेरी 
अंतर्निहित दिव्यता को अभिव्यक्त होने में बाधक बनी रहती है।) किन्तु जब समष्टि के विस्तार में मैं अपने 'मैं' को या अलग अस्तित्व (व्यष्टि-अहं) को खो देता हूँ, तब मैं निःस्वार्थपर हूँ और मैं नैतिक हूँ। इसका अर्थ यह हुआ कि मैं सत्य की समग्रता (जगत को ब्रह्ममय देखने की विवेक-दृष्टि) को स्वीकार करता हूँ। इसीलिये, नैतिकता की इस समझ के साथ अब हमलोग अच्छे और बुरे कार्यों आसानी से अलग-अलग कर सकते हैं। और, इस प्रकार विवेक-प्रयोग करते हुए हम यदि केवल नैतिक कार्यों को क्रियान्वित करें तथा उसकी पुनरावृति करते रहें, तो सिर्फ अच्छे कार्यों को करने की आदत बन जाएगी। और जब इन अच्छी 
आदतों की गहरी लकीर हमारे चित्त पर बन जाएगी,तो उन अच्छी प्रवृत्तियों या प्रोपेनसिटीज का जमाव (agglomeration) हमें अच्छे चरित्र का अधिकारी मनुष्य बना देंगी। अतएव, हम यह कह सकते हैं कि -
'रिपिटेशन ऑफ़ मोरल एक्शन्स ओवर एंड ओवर अगेन' इज दी मेथड ऑफ़ करैक्टर बिल्डिंग.
अतएव हम कह सकते हैं कि नैतिक कार्यों की बारम्बार पुनरावृति करते रहना ही चरित्र-निर्माण की पद्धति है।
स्वामी विवेकानन्द ने हमें मनुष्य को भगवान का रूप मानकर उसकी सेवा करने का उपदेश दिया है। 
श्रीरामकृष्ण ने कहा था -'ध्यान क्या केवल बन्द आँखों से ही सम्भव है ? उन्होंने हमें संकेत दिया था कि  यदि हम चाहें तो - "हम अपनी ऑंखें खुली रख कर भी भगवान का ध्यान करने में सक्षम हो सकते हैं !" वे 'दक्षिणेश्वर के काली-मंदिर' में स्थापित माँ भवतारिणी की मूर्ति की पूजा-अर्चना किया करते थे। किन्तु उन्होंने स्वयं से ही यह प्रश्न पूछा -- क्या तुम भगवान की पूजा सिर्फ मंदिर में स्थापित मूर्तियों में ही कर सकते हो ? क्या तुम हाड़-मांस के जीवन्त मानव-शरीर में स्थित भगवान की पूजा नहीं कर सकते ? स्वामीजी कहते थे, " तुम सदैव कह सकते हो कि प्रतिमा ईश्वर है, केवल यही सोचने की भूल से बचना कि ईश्वर प्रतिमा है। " 
अतएव, श्रीरामकृष्ण और स्वामी विवेकानन्द दोनों ने हमें इस महान सत्य की  (या स्वामी विवेकानन्द ने अपने गुरु श्रीरामकृष्ण से ही सीखकर ) शिक्षा दी है कि- 'सेवा ही असली पूजा है!', निजी आमोद-प्रमोद या स्वार्थपरता नहीं। 'रिनन्सीऐशन  एंड सर्विस टू अदर्स ' -दूसरों की सेवा करने  उद्देश्य से, अपने बड़े से बड़े सुख का त्याग कर देना, (अपने निर्विकल्प- समाधि के सुख का भी त्याग कर देना), ही किसी व्यक्ति के चरित्र-गठन का उपाय है। स्वामीजी के शब्दों में -"अपने चरित्र-कमल के फूल को पूर्ण रूप से विकसित कर लेना" ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। यही करने का प्रयास - क्यों न हम भी करें ? 
व्यावहारिक पहलु का विचार करने से हमलोग देखते हैं कि हमारा चरित्र हमारे कार्यों के द्वारा ही गठित होता है। यदि हमारे कार्यों पर हमारे विवेक का नियंत्रण रहे, केवल तभी हमारे विचार, शब्द और कार्य ऐसे होंगे जो अच्छा चरित्र गठित होने के अनुकूल होंगे। श्रेय और प्रेय विचार, अच्छे और बुरे कर्म के बीच विवेक-प्रयोग करने की क्षमता को विकसित करना हमारे मन का ही एक कार्य (function) है। इसीलिये चरित्र गठन करने के लिये अपने मन पर नियंत्रण रखना, उसे अपने वशीभूत कर लेना हमारा 'प्राइमरी टास्क' - सबसे पहला कर्तव्य है।

 क्योंकि मन की सहायता से ही हमलोग अच्छे एवं बुरे कार्यों के बीच विवेक-प्रयोग करने में सक्षम होते हैं, और चरित्रवान मनुष्य बनने का संकल्प लेना भी हमारे ही मन की सहायता से होता है, इसीलिये मन को नियंत्रण में रखकर निरन्तर विवेक-प्रयोग करते हुए लगातार केवल सद्विचार और सद्कर्म करते रहें अच्छी आदतों और अच्छी प्रवृत्तियों का गठन हो जायेगा, उसी को अच्छा चरित्र कहा जाता है। और अन्ततोगत्वा हमारा चरित्र हम सबों का उत्कृष्ट भाग्य निर्मित करता है ! इसीलिये स्वामी विवेकानन्द कहते थे, 'तुम स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हो !'   
ऐसा नहीं है कि हमारी नियति किसी सुदूरवर्ती स्थान से संचालित होने वाले असाधारण भाग्य पर निर्भर करती है। बल्कि हमारा भाग्य हमारे अपने पौरुष और अपनी निर्भीक आत्मश्रद्धा पर निर्भर करता है। इसीलिये स्वामी जी ने कहा था -" हमें इसकी क्या चिन्ता कि मुहम्मद अच्छे थे या बुद्ध ? क्या इस पर बहस करने से मेरी अच्छाई या बुराई में परिवर्तन हो सकता है ? आओ, हमलोग अपने लिए और अपनी जिम्मेदारी पर अच्छे मनुष्य बनें ! 
"ऐज आइ ग्रो ओल्डर , आइ फाइन्ड दैट एवरीथिंग डिपेंड्स ऑन मैनलीनेस"- ऐंड दिस इज माइ न्यू  गॉस्पेल. जितनी अधिक मेरी आयु होती जाती है, उतना ही अधिक मुझे लगता है कि 'पौरुष ' (मैनलीनेस) पर ही सब कुछ निर्भर करता हैं । यह मेरा नया सन्देश है। " 
 उन्होंने प्रत्येक युवा से  स्वयं पर विश्वास, अपने स्वयं के पौरुष में विश्वास, अपने प्रयत्न में ही विश्वास करने का आह्वान किया था। स्वामीजी प्रत्येक मनुष्य से उसकी अपनी सम्भावनाओं को अभिव्यक्त करने, अपने भाग्य का निर्माण करने, और उसके साथ ही साथ सम्पूर्ण राष्ट्र को उन्नततर, महत्तर और गौरवशाली भविष्य का निर्माण करने का आह्वान किया था। 
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" कोई व्यक्ति भारत को अपने पुराणों में वर्णित भारतवर्ष के रूप में, अपने अध्यन का भारतवर्ष, या अपने स्वप्नों का भारत के रूप में पुनः देखने की अभिलाषा रख सकता है। किन्तु मेरी आकांक्षा, 
उस प्राचीन भारत के सबल पक्षों को आधुनिक युग के सबल पक्षों द्वारा पुनः केवल स्वाभाविक रूप से परिपुष्ट होता हुआ देखने की है। ..... किन्तु तुम पूछ सकते हो इस योजना -'BE AND MAKE' में श्रीरामकृष्ण परमहंस का क्या स्थान है ?
" वे तो स्वयं में ही एक प्रणाली हैं, आश्चर्यजनक बेसुध-प्रणाली (अन्कान्शस-मेथड) ! उन्होंने स्वयं को नहीं समझा था। (दूसरों से पूछते थे -तुम क्या सोचते हो, मुझमें 'अहं' है या नहीं ?)। उन्होंने इंग्लैण्ड या अंग्रेजों के विषय में कुछ नहीं जाना, सिवा इसके कि अंग्रेज समुद्र पार के विचित्र लोग हैं। ' बट ही लीव्ड दैट ग्रेट लाइफ: ऐंड आइ रेड दी मीनिंग."-  किन्तु उन्होंने वह महान जीवन जिया और मैंने उस जीवन के अर्थ को पढ़ा (समझा)!  किसीके लिए कभी निन्दा का एक शब्द भी नहीं ! एक बार मैं अपने यहाँ के जादू-टोना करने वाले पैशाचिक-सम्प्रदाय की निन्दा कर रहा था। मैं तीन घण्टों तक उन्हें कोसता रहा, और वे चुपचाप सुनते रहे। जब मेरा कोसना रुका, तब उन्होंने कहा, " अच्छा ठीक है; पर शायद प्रत्येक घर में एक पिछला दरवाजा होता है। कौन जाने ? " ८/ १३२ 
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