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शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

स्वयं के प्रति कर्तव्य है -'BE' और देश के प्रति कर्तव्य है 'MAKE'! [एक नया युवा आन्दोलन -17.Our Duties ]

'विश्व-रंगमंच पर मनुष्य बनने का नाटक चल रहा है !'  
वास्तव में हमलोग क्या चाहते हैं ? हमलोग सदा आनन्दित रहना चाहते हैं। किन्तु आमतौर से हमलोग यह नहीं जानते कि सच्चा आनन्द (क्षणिक नहीं, भूमा) क्या है ? किन्तु, उस आनन्द की खोज में हमलोग अत्यन्त व्याकुल हो जाते हैं, और हड़बड़ी में किसी सनकी आदमी जैसा बिना 'विवेक-प्रयोग' किये, बाह्य जगत की प्रत्येक वस्तु से आनन्द मिलने की उम्मीद में,उसके पीछे अस्तव्यस्त होकर दौड़ते चले जाते हैं। और इस स्वच्छन्द-दौड़ (opinionated race) में अक्सर हमलोग इस बात को भूल जाते हैं कि कुछ चीजें हमसे भी अपेक्षित हैं। वह कौन सी वस्तु है जो हमलोगों से अपेक्षित है ? हमलोगों से यह अपेक्षा की जाती है, कि हमें कर्तव्य-परायण होना चाहिए । किसके प्रति कर्तव्यपरायण होना चाहिये ? हमें स्वयं के प्रति, अपने परिवार के प्रति, समाज के प्रति, देश के प्रति, विश्व-मानवता के प्रति कर्तव्यपरायण होना चाहिये। 

अधिकांश लोग कहेंगे- 'हम जानते हैं कि परिवार प्रति कर्तव्य'- क्या होता है? यही है न कि हमें अपने परिवार के लिये खून-पसीना एक करके अधिक से अधिक, जितना सम्भव हो सके उतना कमाना चाहिये, 
और अपने ऊपर न्यूनतम आराम और न्यूनतम खर्च करके, सारी सुख-सुविधायें अपने परिवार के लिये उपलब्ध करनी चाहिये।' किन्तु, भला अपने 'स्वयं' के प्रति हमारा क्या कर्तव्य हो सकता है ? और समाज के प्रति कर्तव्य तो सामाजिक कार्यकर्ताओं से सम्बन्धित है, और देश के प्रति कर्तव्य उन राजनीतिज्ञों तथा चुने गए जन-प्रतिनिधियों से सम्बंधित है-जो इसी कार्य के लिये निर्वाचित हुए हैं। फिर समाज और देश के प्रति हमारा क्या कर्तव्य हो सकता है ? 

अधिकांश साधारण जनता ऐसा ही सोचती है। किन्तु ऐसी धारणा बिल्कुल गलत है। जब तक हम स्वयं के प्रति 'कर्तव्य' का अर्थ सम्पूर्णतया नहीं समझ लेते,तब तक हम किसी भी कर्तव्य का निर्वहन सही ढंग से नहीं कर पायेंगे। जो व्यक्ति स्वयं के प्रति, समाज के प्रति और मातृभूमि के प्रति अपने कर्तव्य को भली-भाँति समझता है, केवल वही व्यक्ति परिवार के प्रति अपने कर्तव्य को भी बेहतर तरीके से निभा सकता है। क्योंकि कोई परिवार समाज से अलग नहीं है, प्रत्येक परिवार समाज की ही एक इकाई है। और प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवार का एक सदस्य होता है। और अलग अलग व्यक्तियों, परिवारों, समाजों और देशों से मिलकर ही 'विश्व-मानवता' अपना आकार धारण कर लेती है। इस दृष्टि देखने पर स्वयं के प्रति, या परिवार के प्रति कर्तव्य भी सम्पूर्ण मानवता के प्रति कर्तव्य का ही एक हिस्सा है। हमें इसी आलोक में पने समस्त कर्तव्यों को समझना होगा। 
क्योंकि, स्वामी विवेकानन्द के मतानुसार -" इस विश्व-रंगमंच पर 'मनुष्य' बनने का नाटक चल रहा है।**** और हमलोग इस विश्व-रंगमंच पर खेले जा रहे नाटक के केवल दर्शक मात्र नहीं हैं, बल्कि हमलोग इस रंगमंच के कलाकार भी हैं - (हमारे युग प्रसिद्द वैज्ञानिक नील्स बोर के मतानुसार) जो अपनी छोटी सी भूमिका द्वारा विश्वमानवता के कल्याण में अपना योगदान दे रहे हैं! " 
[*** विश्व-रंगमंच पर सामान्य 'पशु -मानव' से  'मनुष्य' बनने और मनुष्य से 'देवत्व' में उन्नत होते जाने का नाटक चल रहा  है- और इस प्रकार मनुष्य पूर्णत्व प्राप्ति की दिशा में अग्रसर हो रहा है। महामण्डल पुस्तिका : विवेकानन्द दर्शनम् -१ में कहा गया है -
नान्यदेका चित्रमाला जगदेतच्चराचरम् | 
एष वर्णमयो वर्गो भावमेकं प्रकाशते || 
 'आफ्टर ऑल, दिस वर्ल्ड इज अ सीरीज़ ऑफ़ पिक्चर्स.' दिस कलरफुल कंग्लोमरेशन एक्सप्रेसेज  वन आईडिया ओनली.'
 " सत्य-सा प्रतीत होते हुए भी, आखिरकार- यह चराचर जगत् सतत परिवर्तनशील छाया-चित्रों की एक श्रृंखला, या विश्व-रंगमंच पर होने वाला एक विचित्र-नाटक का मंचन मात्र ही तो है। और चलचित्रों या नाटक के दृश्यों के इस सतरंगी छटा-समुच्चय के द्वारा केवल एक ही उद्देश्य अभिव्यक्त होता है।" और वह है - 

मानुषाः पूर्णतां यन्ति नान्या वार्त्ता तु वर्तते |  
पश्यामः केवलं तद्धि नृनिर्माणं कथं भवेत् ||
'मैन इज़ मार्चिंग टुवर्ड्स परफेक्शन.' दैट इज -- ' दी ग्रेट इंटरेस्ट रनिंग थ्रू. वी वेयर ऑल वाचिंग दी मेकिंग ऑफ़ मेन, ऐंड दैट अलोन.'
चलचित्रों के इस सतरंगी समुच्चय-छटा रूपी जगत द्वारा केवल एक ही उद्देश्य अभिव्यक्त होता है कि - अपने मोह (भ्रमों-भूलों) को त्यागता हुआ -मनुष्य क्रमशः पूर्णत्व प्राप्ति (आदर्श ) की ओर अग्रसर हो रहा है ! हम सभी लोग अभी तक (जगत- रूपी टेलीविजन धारावाहिक के माध्यम से) केवल पशु को मनुष्य में और मनुष्य को देवता (यथार्थ मनुष्य या पूर्णतः निःस्वार्थी मनुष्य) में रूपान्तरित होता हुआ देख रहे थे ! "] 
इस परिप्रेक्ष्य में स्वयं के प्रति हमारे कर्तव्य को ठीक से समझ लेना अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाता है, और तभी हम यह समझ सकेंगे कि समाज और देश के प्रति भी हमारे कुछ कर्तव्य हैं। स्वयं के प्रति हमारा कर्तव्य बस इतना है, कि हमारे भीतर जो सर्वोत्कृष्ट प्रतिभा, सर्वोत्तम चारित्रिक गुण पहले ही से विद्यमान हैं, उन्हें केवल अभिव्यक्त करना है। 
हमलोगों के भीतर प्रतिभा और उत्कृष्टता या गुणवत्ता पहले से ही प्रयोग में हैं, किन्तु सुषुप्त है। उनका उपयोग करने के लिये, हमें स्वप्रयास द्वारा पहले उन्हें जाग्रत करना होगा, उन्हें बाहर लाना होगा और अपने अपने आचरण से अभिव्यक्त करना होगा। यही वह सबसे पवित्र कर्तव्य है जिसके पालन का दायित्व किसी दूसरे पर नहीं सिर्फ हमारे ही ऊपर निर्भर है। स्वयं के प्रति ऐसा कर्तव्य-बोध केवल तभी जाग्रत होता है, जब हम अपने देवदुर्लभ मानव-शरीर (पुरुष) की गरिमा (dignity,प्रताप या बड़प्पन) के प्रति जागरूक हो जाते हैं ! ('त्रय दुर्लभं' के मर्म को समझ लेते हैं) यदि हम इस प्राथमिक कर्तव्य की ही उपेक्षा कर देते हैं, तो न केवल हम अपना नुकसान करते हैं, अपितु मानवता के कल्याण की प्रगति को भी धीमा कर देते हैं।
 जो व्यक्ति अपनी अन्तर्निहित सर्वोत्कृष्ट चारित्रिक गुणों को प्रकट करने के कर्तव्य का पालन करने लगता है, वह अपने परिवार, समाज और देश के प्रति अपने कर्तव्य पालन करने में भी अधिक कर्मकुशल (efficient) बन जाता है। प्रश्न उठता है कि अपने भीतर जो सर्वोत्कृष्ट गुण हैं, उसे प्रकट करने के कर्तव्य का पालन किस प्रकार से किया जाता है ? 
समाज और देश के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन कई प्रकार से किया जा सकता है। कोई (जीवन-मुक्त) व्यक्ति केवल - 'राष्ट्रभक्ति'  (देश के प्रति अपने कर्तव्य का पालन ) को ही अपने जीवन का एकमात्र मकसद बना सकता है। किन्तु, कोई दूसरा व्यक्ति इस कार्य में  केवल अपनी अतिरिक्त ऊर्जा (सरप्लस एनर्जी), समय और धन का ही निवेश कर सकता है। और इस प्रकार से  कार्य करने के लिये भी नानाविध क्षेत्र हैं, जिसमे कोई व्यक्ति कार्य कर सकता है।  देश की सेवा करने के लिये कोई समाजोपकारी कार्य , समाजसेवा , सामाजिक सुधार, राजनीती और धर्म आदि किसी भी क्षेत्र को कार्य करने लिये चुना जा सकता है। 
सभी देशों में सामाजिक-सेवा के इन क्षेत्रों में भिन्न भिन्न प्रकार से योगदान करने वाले व्यक्तियों तथा उनके कार्यों का एक लंबा इतिहास रहा है। प्राचीन युग में इस तरह के अधिकांश कार्यों को व्यक्तिगत तौर से ही किया जाता था। बाद में इन्हें सुनियोजित ढंग से सम्पन्न करने के लिये विभिन्न निजी अभिकरण (एजेंसियों) के माध्यम से भी किया जाने लगा। धीरे धीरे राजनीतिक संरक्षण में इन सभी क्षेत्रों में सरकारी एजेंसियों का प्रवेश निरंतर विस्तारित होने लगा, जिसके कारण निजी क्षेत्र के एजेंसियों के पास समाज-सेवा के कार्यों के लिये बहुत थोड़े से क्षेत्र ही बच सके। जबकि व्यक्तिगत तौर पर देश-सेवा करने योग्य कार्य तो अत्यंत नाममात्र के ही शेष बचे । 
सामान्यतः बदलते हुए आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों में (स्वाधीनता प्राप्ति के बाद ) ऐसा होना,सभी समाजों में बिल्कुल स्वाभाविक ही था। यहाँ पूछा जा सकता है, कि तब फिर क्या ये बदली हुई परिस्थितियाँ  (स्वराज्य-प्राप्ति) व्यक्ति को समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करने के दायित्व से बिल्कुल ही मुक्त कर देती हैं ? उत्तर है-नहीं ! इसके विपरीत, बदली हुई परिस्थितियों ने जहाँ व्यक्ति को राज्य और सामाज द्वारा थोपे गए दायित्व के कुछ पुराने बोझ से तो मुक्त कर दिया है, किन्तु वहीँ उनके ऊपर और अधिक भारी और कष्टसाध्य जिम्मेदारी, दूसरों की निःस्वार्थ सेवा करने की इस  जिम्मेदारी को सौंप दिया है। ताकि वे स्वयं के प्रति कर्तव्यों को क्रियान्वित करने के विषय में जागरूक हो जायें, जो अंततः उन्हें समाज और देश के प्रति अपने कर्तव्यों के बारे में जागरूक बना देता है । अपने इस कर्तव्य का पालन भी कोई मनुष्य व्यक्तिगत तौर पर या संघबद्ध होकर, दोनों प्रकार से कर सकता है!  
स्वयं के प्रति हमारा जो कर्तव्य है, वह है कि हमारे भीतर जो सर्वोत्कृष्ट प्रतिभा, सर्वोत्तम चारित्रिक गुण  पहले से विद्यमान हैं, उन्हें प्रकट करने का प्रयास करना । इस स्वयं के प्रति कर्तव्य-पालन की प्रक्रिया को हमलोग 'being' or 'becoming.' अर्थात जो हमारा यथार्थ स्वरूप है, या जैसा हमारा सच्चा अस्तित्व है, वैसा बन जाना भी कह सकते हैं।  स्वामी विवेकानन्द के आदर्श वाक्य (motto) -'BE AND MAKE.' में जो 'BE' अर्थात 'होना' है, (क्या होना ? आत्मा या ब्रह्म जो हम पहले से हैं ) -के मर्म हमलोग इसी प्रकार समझ सकते हैं। 
 एवं उपरोक्त आदर्श वाक्य में जो 'MAKE' कहा गया है, उसका तात्पर्य होगा-समाज और देश के प्रति जो हमारा कर्तव्य है उसका पालन करना। समाज और देश के प्रति अपने कर्तव्य का पालन कैसे करेंगे ? इसे करेंगे- दूसरों को भी उनकी अपनी 'मानव-गरिमा' के प्रति जागृत करके। उनकी अव्यक्त दिव्यता  या अनन्त सम्भावना (potentiality) के प्रति और उनके कर्तव्य के विषय में जाग्रत करके , तथा  'to Become' अर्थात वास्तव में जो वे पहले से हैं, वही बन जाने में उनकी सहायता करके, उन्हें उसकी पद्धति बता करके। उनके आदर्श-वाक्य में 'MAKING' का तात्पर्य यही समझा जा सकता है।  
वैसे तो स्वामी विवेकानन्द ने - रिलिजन, सोशियोलॉजी, हिस्ट्री, पॉलिटिक्स, 'एस्थेटिक्स' (aesthetics) वस्तुओं के आंतरिक सौन्दर्य का अनुभव कराने वाला शास्त्र), आदि विषयों के ऊपर बहुत कुछ कहा है। किन्तु युवाओं को संबोधित करते हुए, उन्होंने एक ही महत्वपूर्ण कर्तव्य करने के निर्देश को बार बार दुहराया है। और वह है  "फर्स्ट बी मैन" - मेरे मित्रो, पहले मनुष्य बनो !, फिर कहते हैं - 'बी ऐंड मेक - लेट दिस बी योर मोटो.'  -अर्थात 'बनो और बनाओ ' यही तुम्हारा आदर्श वाक्य हो। उन्होंने बार बार युवाओं को आश्वस्त करते हुए कहा है - " इफ़ दैट कुड बी डन एव्रीथिंग एल्स विल टेक केयर ऑफ़ इटसेल्फ" --यदि यह कार्य हो गया, तो शेष सब कुछ अपने आप हो जायेगा ! "  
और महामण्डल ने इसी कार्य को अपने लिये चुन लिया है। समाज के प्रति अन्य समस्त कर्तव्यों, बाढ़-अकाल पीड़ितों आदि पर अनुग्रह करने की चिंता करने के लिये तो कितनी सारी बड़ी बड़ी एजेंसियाँ कार्यरत हैं। और ऐसे सभी कार्य 'मनी इन्टेन्सिव' हैं,अर्थात इनमें काफी सारा धन निवेश करना पड़ता है। किन्तु महामण्डल तो छात्रों और युवाओं का संगठन है, और  हमारे पास निवेश करने के लिये सिर्फ -'3H' हैं। कार्य करने की ऊर्जा (शरीर) है,  और कार्य को पूरा करने का दृढ़ संकल्प  (मन) है ! और एक सहानुभूति से परिपूर्ण  (हृदय) हैं। 
 इसीलिये महामण्डल ने सम्पूर्ण भारतवर्ष में- पूरब से पश्चिम तक और उत्तर से दक्षिण तक , स्वामी विवेकानन्द के इसी सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा-'3H' को विकसित करने की शिक्षा-पद्धति को,व्यक्तिगत तरीके से और संघबद्ध होकर दोनों उपायों से व्यवहारिक रूप देने के लिये चुन लिया है ! 

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[হোবা  আর হয় ওঠা -जो हम इस शरीर में आने से पहले थे, अभी भी हैं, और बाद में भी रहेंगे, वही - 'चिदानन्द रूपः शिवोहं शिवोहं' हो उठना हमारा कर्तव्य है !]
 प्रकट करने में बाधा उत्पन्न करने आदतों (अन्तःप्रकृति -शरीर का अहं) को हटाने का प्रयास करते रहना।
 [प्रेम मनुष्य का स्वरूप है, और यह प्रेम ही उसे कर्तव्यपरायण बना देता है, और प्रेम का अर्थ है प्रेमास्पद के सुख लिये अपने सुख-समृद्धि का त्याग और बलिदान] 
[ इसीलिये ऐसा सोचना बिलकुल गलत है , कि हमलोग राजनैतिक स्वाधीनता प्राप्त कर चुके हैं, इसीलिये अब हमें त्याग करने की आवश्यकता नहीं रह गयी है। इस त्याग से ही सब कुछ प्रारंभ हुआ है। इस त्याग के भीतर ही जीवन का विस्तार करना होगा, तथा इस त्याग के द्वारा ही जीवन को सफल करना होगा।
 श्रीरामकृष्ण के आश्चर्यजनक त्याग की तो धारणा भी नहीं की जा सकती। उनके त्याग का तो कहना ही क्या? सारदा देवी के त्याग की तुलना नहीं हो सकती। श्रीरामकृष्ण की माँ चन्द्रादेवी के असाधारण त्याग की बात हमलोग जानते हैं। 
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं -“ मानव का सर्वश्रेष्ठ पूर्ण विकास (पाशविक संस्कारों से मुक्ति) एकमात्र त्याग के द्वारा ही सम्पन्न होता है। जो मनुष्य दूसरों के लिये अपने स्वार्थों जितना अधिक त्याग कर सकता, मनुष्यों में वह उतना ही श्रेष्ठ माना  जाता है। जबकि पशुओं में जो जितना अधिक ध्वंश कर सकता है, उसे उतना ही अधिक बलवान समझा जाता है। 
मनुष्य का संघर्ष है मन में। जो  मनुष्य मन को  जितना अधिक अपने वश में करता जाता है, वह उसी अनुपात में महान बनता जाता है । जब मन की समस्त वृत्तियाँ सम्पूर्ण रूप से शान्त (निश्चल) हो जाती हैं, आत्मा स्वयं को अभिव्यक्त करने लगती है।”
" कुछ लोगों का मत है कि यदि मानव मानव के साथ लड़ाई न ठाने, तो उसकी प्रगति ही न होगी। मैं भी पहले ऐसा सोचा करता था; पर अब मुझे दिख पड़ रहा है कि प्रत्येक युद्ध ने मानव-उन्नति को आगे ठेलने के बदले पचास वर्ष पीछे फेंक दिया है।
.…… अमेरिका में ऐसे कई भौतिक वैज्ञानिक हैं जो कहते हैं कि ' अपराधियों (ईसिस जैसे टैरिरिस्टों) को नेस्त-नाबूद कर देना चाहिये, और केवल यही एक मात्र उपाय है, जिससे समाज से अपराध (भ्रष्टाचार आदि ) मिटाया जा सकता है। किन्तु युद्ध में जहाँ किसी देश या व्यक्ति की जीत होती है, वहाँ सहस्रों का नाश भी हो जाता है। अतएव यह भी एक बुराई ही है। जिससे केवल एक को सहायता मिले और अधिकांश बाधा पहुँचे वह कभी अच्छा नहीं हो सकता।
 पतंजलि कहते हैं ये युद्ध और संघर्ष केवल हमारे अज्ञान के कारण, हमारी अधीरता और असहिष्णुता के कारण घटित होती हैं, हममें इतना धैर्य नहीं है कि अपना मार्ग धीरता से तैयार करें। उदाहरणार्थ सिनेमाहॉल में जब आग लग जाती है, तो थोड़े से ही लोग बाहर निकल पाते हैं, बाकी सब जल्दी निकलने की धक्का-मुक्की में एक दूसरे को कुचल डालते हैं। यदि सब लोग धीरे धीरे निकले होते, तो एक को भी चोट न लगती। 
यही हाल जीवन में भी है। द्वार हमारे लिये खुले पड़े हैं, और हम सब बिना किसी प्रतियोगिता या संघर्ष के, बाहर निकल सकते हैं, किन्तु हम बड़े जल्दबाज हैं- हममें धीरज बिल्कुल ही नहीं है। शक्ति की उच्चतम अभिव्यक्ति है अपने को प्रशान्त रखना और स्वयं अपने पैरों पर खड़े होना। (४/ २२०-२१ ) 
हमारी शिक्षा का उद्देश्य और '3H ' विकास के प्रशिक्षण का उद्देश्य:  केवल मार्ग की बाधाओं को हटाना है। इनके हट जाने पर मूल ब्रह्मभाव स्वयं ही प्रकाशित हो जायेगा। .... ये प्रतियोगितायें, संघर्ष और बुराइयाँ (आतंकवाद और उग्रवाद ) यदि न भी रहें, तो भी मनुष्य विकसित होते होते एक दिन ब्रह्मरूप हो जायेगा; क्योंकि बाहर आकर अपने आपको अभिव्यक्त करना ब्रह्म का स्वभाव ही है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में एक ऐसा समय अवश्य आयेगा, जब समस्त विश्व जाग्रत अवस्था में देखा जा रहा स्वप्न मात्र प्रतीत होगा।  और तब हमें पता लगेगा कि अपने परिवेश की अपेक्षा हम (आत्मा) अनन्त गुना श्रेष्ठ हैं!
समस्त ज्ञान और सभी शक्तियाँ हमारे भीतर ही हैं, बाहर नहीं। जिन्हें हम सिद्धियाँ, प्रकृति के रहस्य और शक्ति कहते हैं, वे सब भीतर विद्यमान हैं। प्रकृति में कोई ज्ञान नहीं है, मानव की आत्मा से समस्त ज्ञान उद्भूत होता है।  मनुष्य ज्ञान व्यक्त करता है, अपने भीतर वह उसका आविष्कार करता है, जो पहले से, शाश्वत काल से ही विद्यमान है। प्रत्येक व्यक्ति में एक समान ही सामर्थ्य है--एक में उसकी अभिव्यक्ति अधिक है, दूसरे में कम। फिर विशेषाधिकार का दावा कहाँ ? मनुष्य किस मुख से अपने लिये विशेषाधिकार पाने का दावा कर सकता है?  ईश्वर का कोई विशेष संदेशवाहक नहीं, न कभी था, और न आगे वैसा दावा कोई कर सकता है। छोटे-बड़े सभी जीव ईश्वर की समान रूप से अभिव्यक्तियाँ हैं, अन्तर केवल अभिव्यक्तियों के परिमाण में है।
श्रीमद्भा० ६।१०।८में कहा गया है -
योऽध्रुवेणात्मना नाथा न धर्म न यशः पुमान् ।
ईहेत भूतदयया स शोच्यः स्थावरैरपि ॥
' जो पुरुष नाशवान् शरीरके द्वारा समर्थ होकर भी प्राणियोंपर दया करके धर्म या यश प्राप्त करनेकी इच्छा , चेष्टा, प्रयत्न नहीं करता, वह तो स्थावर वृक्ष - पर्वतादिके द्वारा भी शोचनीय है; क्योंकि वृक्ष - पर्वतादि भी अपने शरीरके द्वारा प्राणियोंकी सेवा करते हैं ।'
जब त्वष्टाके अग्नि - कुण्डसे उत्पन्न होकर वृत्रासुरने इन्द्रके स्वर्गपर अधिकार कर लिया और देवताओंने अपने जिन अस्त्रोंसे उसपर आघात किया, उन अस्त्र - शस्त्रोंको भी वह असुर निगल गया, तब निरस्त्र देवता बहुत डरे । कोई और उपाय न देखकर देवता ब्रह्माजीकी शरणमें गये । ब्रह्माजीने भगवानकी स्तुति की । 
भगवानने प्रकट होकर दर्शन दिया और बताया - कि महर्षि दधीचिकी हड्डियाँ उग्र तपस्याके प्रभावसे दृढ़ तथा तेजस्विनी हो गयी हैं । उन हड्डियोंसे वज्र बने, तभी इन्द्र उस वज्रसे वृत्रको मार सकते हैं । महर्षि दधीचि मेरे आश्रित हैं, अतः उन्हें बलपूर्वक कोई मार नहीं सकता। यह युद्ध तो अच्छाई और बुराई के बीच चलने वाला युद्ध है। जब कोई व्यक्ति लोक-कल्याण की इच्छा से जीवित अवस्था में अपनी हड्डियों का दान कर देगा, और उससे जो वज्र बनेगा, उसी से असुर मरेगा। '  तुमलोग उनसे जाकर याचना करो । माँगनेपर वे तुम्हें अपना शरीर दे देगे ।'
देवता साभ्रमती तथा चन्द्रभागाके सङ्गमपर दधीचिऋषिके आश्रममें गये । उन्होंने नाना प्रकारसे स्तुति करके ऋषिको सन्तुष्ट किया और उनसे उनकी हड्डियाँ माँगीं । जिस इन्द्रने उनका सिर काटना चाहा था, उन्ही के लिये ऋषिने अपनी हड्डियाँ देनेमें भी सक्कोच नहीं किया ! महर्षिने कहा कि उनकी इच्छा तीर्थयात्राचा करनेकी थी । इन्द्रने नैमिषारण्य में सब तीर्थोका आवाहन किया । वहाँ स्त्रान करके दधीचिजी आसन लगाकर बैठ गये । जिस  शरीर से उन्हें तानिक भी आसक्ति नहीं थी । 
एक - न - एक दिन तो शरीर छूटेगा ही । यह नश्चर देह किसीके भी उपयोगमें आ जाय, इससे बड़ा और कोई लाभ नहीं उठाया जा सकता । महर्षि ने अपना चित्त भगवानमें लगा दिया । मन तथा प्राणोंको हदयमें लीन करके वे शरीरसे ऊपर उठ गये । जङ्गली गायोंने अपनी खुरदरी जीमोंसे महर्षिके शरीरको चाट - चाटकर चमड़ा, मांसादि अलग कर दिया । इन्द्रने ऋषिकी हड्डी ले ली ।
 उसी हड्डीसे विश्वकर्माने वज्र बनाया और उस वज्रसे इन्द्रने वृत्रको मारा । इस प्रकार एक तपस्वी दधिची के अनुपम त्यागसे इन्द्रकी, देवलोककी वृत्रासुर से रक्षा हुई ।
महामण्डल का वज्रांकित ध्वज : वज्र अच्छाई की संगठित-शक्ति का प्रतिक है, जिसके द्वारा बुराइयों को जीता जा सकता है. भगिनी निवेदिता ने -गेरुआ पर वज्र के निशान वाले ध्वज  को  स्वाधीन-भारत का राष्ट्रीय-ध्वज बनाने का प्रस्ताव दिया था, (किन्तु हमारे छद्म-धर्मनिर्पेक्ष राजनितिक नेताओं ने उनके द्वारा निर्मित पताका को 'भगवा-पताका ' की संज्ञा देकर अस्वीकार कर दिया. ) उसी ध्वज को महामण्डल ने अपने ध्वज के रूप में चुन लिया गया है।
 हमलोगों का सम्पूर्ण जीवन किस प्रकार सार्थक  हो सकता है, स्वामीजी ने उसका एक सरल सूत्र दिया है। और वह सूत्र है- ' जिसने दूसरों के लिये जीना सिख लिया हो, केवल उसी ने जीवन को जाना है। ' दूसरों के लिये त्याग स्वीकार करने की आवश्यकता सदा रहने वाली वस्तु है।] 
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