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रविवार, 4 सितंबर 2016

[JSR ] 'BE AND MAKE- का निहितार्थ '

'मनुष्य बनो और बनाओ'-का तात्पर्य क्या है ? 
अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल द्वारा क्षेत्रीय और राज्य-स्तरीय,अन्तर्राज्य -स्तरीय एवं अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित होने वाले समस्त 'युवा प्रशिक्षण शिविर' में चर्चाओं का मूल विषय (theme) है- 'BE AND MAKE' ! इस अति संक्षिप्त उक्ति का अर्थ क्या है ?
स्वामी विवेकानन्द द्वारा आविष्कृत इस 'व्यावहारिक वेदान्त सूत्र' - " BE AND MAKE " का अर्थ, वेदों के चार महावाक्यों के ही समान, बहुत व्यापक है। यह महावाक्य महान विचारों को जन्म देती है। इस छोटे से सूत्र में ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य और उसे प्राप्त करने का उपाय छिपा हुआ है। यदि कोई व्यक्ति केवल इसी एक विचार को संकल्प के रूप में ग्रहण कर ले, और उसे इसी जीवन में उसे पूर्ण कर सके -तो कहा जा सकता है कि उस व्यक्ति का मनुष्य-जीवन सार्थक हो गया है।
'वेद' शब्द संस्कृत भाषाके 'विद्' धातु से निकला है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है -ज्ञान। और ज्ञान का अंत, चरमोत्कर्ष अथवा  'हाइट ऑफ़ नॉलेज'-- को 'वेदान्त' या उपनिषद कहा जाता है। 'वेदान्त' का शाब्दिक अर्थ है - 'वेदों का अंत' (अथवा सार है- एकं सद् वि‍प्रा बहुधा वदन्‍ति‍ (ऋग्‍वेद)- सत्य एक ही है ज्ञानी नाना प्रकार से कहते हैं।)।
 हमलोगों ने वेदों के चार महावाक्यों के विषय में सुना है।  वेदों के चार महावाक्य हैं जो ब्रह्म और आत्मा के एक होने का प्रतिपादन करते हैं। १. प्रज्ञानं ब्रह्म - [ प्रज्ञा रूप (उपाधिवाला) आत्मा ब्रह्म है. Consciousness is Brahman...ब्रह्म अनुभूत-ज्ञान है। ] २. अहं ब्रह्मास्मि- [ मै ब्रह्म हूँ। ....(I am Brahman)] ३. तत्वमसि - [तत त्वम असि - वह पूर्ण ब्रह्म तू है... (You are That )] ४. सर्वं खलु इदं ब्रह्म - जो कुछ भी दिख रहा है ब्रह्म ही हैं. ] चारों महावाक्य इस महासत्य का प्रतिपादन करते हैं। 
उपनिषद के ये चार महावाक्य संम्पूर्ण मानव जाति को पुनरुज्जीवित (रिविवफाइ revivify) करने के लिये रामबाण दवा  या संजीवनी बूटी के समान हैं, जिन्हें हृदयंगम कर लेने पर प्रत्येक मनुष्य आत्मस्थ हो सकता है, और डिस-एन्चैंटेड (disenchanted - देहाध्यास के भ्रम से मुक्त) होकर मृत्यु के भय को सदा के लिए समाप्त कर सकता है!

वेदों को ‘'श्रुति'’ भी कहते हैं, जिसका अर्थ है 'सुना हुआ ज्ञान'। जैसे नरेन्द्रनाथ दत्त ( स्वामी विवेकानन्द) के गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस ने अपने भौतिक शरीर को छोड़ने से दो दिन पहले स्वयं को मानवजाति का सच्चा नेता - 'विष्णु का अवतार' होने के रहस्य को प्रकट करते हुए कहा था -" ओ नरेन्, अभी तक तुझे विश्वास नहीं हुआ ? ' जो राम, जो कृष्ण, वही अब की बार एक ही आधार में रामकृष्ण; हुए हैं।' किन्तु तेरे वेदांत की दृष्टि से नहीं- साक्षात् !" 
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- " तुमने उस सिंह-शावक की कहानी पढ़ी होगी ?  भेंड़ों की तरह में-में करते और मृत्यु के भय से थर-थर करते देखा तो उसे उस सिंह-शिशु पर तरस आ गया। सिंह-गुरु ने सोचा कि भ्रम में पड़े सिंह-शावक के देहाध्यास (सम्मोहन या अविवेक) को दूर करने के लिये, सबसे पहले उसमें 'सत्य-मिथ्या विवेक' जाग्रत करके उसे डीहिप्नोटाइज करना होगा। परमहंस सिंह-गुरु उस सिंह-शावक को डीहिप्नोटाइज ( 'De-hypnotize') करने के लिये एक तालाब के किनारे ले गया।  उसका भेंड़पना (देह्ध्यास) मिट गया; और फिर वह भेंड़ों  झुण्ड में न लौटकर अपने परमहंस सिंह-गुरु के संग वन की ओर चल पड़ा। कथा में वर्णित परमहंस सिंह-गुरु वह समर्थ मार्गदर्शक 'नेता' है, जो अपने 'ब्रह्मचारी' अर्थात आत्मजिज्ञासु शिष्य को 'सत्य-मिथ्या विवेक' द्वारा देहाध्यास का सम्मोहन दूर करके उसे ब्रह्मविद् मनुष्य बनने और बनाने का मार्ग दिखला सकता है। 

ईसाई और मुसलमानों के मतानुसार, ईश्वर ने पैगम्बरों-फरिश्तों और अन्य सभी प्रकार के बड़े-छोटे उड़ने वाले, डंक मारने वाले जीव-जन्तुओं की सृष्टि करने के बाद मनुष्य की सृष्टि की। और मनुष्य का सृजन करके ईश्वर बड़े प्रसन्न हुए, क्योंकि सब प्रकार के शरीरों में मानव-शरीर ही श्रेष्ठ है, मनुष्य से श्रेष्ठतर और कोई नहीं है। यह देखकर ईश्वर ने सभी देवदूतों को बुलवा भेजा, और मनुष्य के सामने सिर झुकाकर अभिनन्दन और प्रणाम करने के लिये कहा। इबलीस को छोड़कर बाकी सभी फरिश्तों ने वैसा किया। इसलिये ईश्वर ने इबलीस कहा- दूर हटो शैतान ! इससे वह शैतान बन गया। अर्थात जो 'मनुष्य मात्र' के सामने आदर से सिर नहीं झुकाता वह शैतान है। हमारे श्रीमद्भागवत महापुराण में भी कहा गया है -

 ' सृष्ट्वा पुराणि विविधानि अजया आत्मशक्त्या 
वृक्षान् सरीसृप-पशून्-खग-दंशमत्स्यान्।
 तैः तैः अतुष्टहृदयः पुरुषं विधाय ब्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देवः॥'
सभी प्राणियों में मनुष्य ही एकमात्र ऐसा जीव है जो ब्रह्मवेत्ता बनने का अधिकारी है, जो अपने बनाने वाले  ईश्वर या ब्रह्म को भी जान लेने में समर्थ है,  ऐसे  मनुष्य की रचना करके सृष्टा प्रसन्न हो गए !"
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं -" मैं उस महापुरुष का शिष्य हूँ, जिन्होंने सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण (चट्टोपाध्याय? इस युग में मुखोपाध्याय !) होते हुए भी एक पैरिया (चाण्डाल) के घर को साफ करने की अपनी इच्छा प्रकट की थी। अवश्य वह इस पर सहमत हुआ नहीं -और भला होता भी कैसे ? एक तो सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण, उस पर भी संन्यासी, वे आकर घर सफाई करेंगे ? इस पर क्या वह कभी राजी हो सकता था ? निदान,  एक दिन आधी रात को उठकर गुप्त रूप से उन्होंने उस पैरिया के घर में प्रवेश किया और उसका शौचालय साफ कर दिया, उन्होंने अपने लम्बे बालों से उस स्थान को पोंछ डाला।और यह काम वे लगातार कई दिनों तक करते रहे, ताकि वे अपने को सबका दास बना सकें !
[सच्चे नेता या - आचार्य शब्दों से उपदेश देने से अधिक अपने आचरण द्वारा शिक्षित करते हैं ! ताकि मानवजाति के भावी मार्गदर्शक नेताओं के मन में यह बात बैठ जाये कि - जब दृष्टि ज्ञानमयी हो जाने के बाद जगत ब्रह्ममय है (पवित्र ट्रिनिटी है) तो मैं आस-पास रहने वाले सभी स्वजनों, बन्धुबान्धव, जिज्ञासुओं का दास हूँ, नेता को दास बनकर- उपदेश नहीं व्यव्हार से विद्यादान करने का अभ्यास करना चाहिये !]  मैं उन्हीं महापुरुष के चरण कमलों को अपने मस्तक पर धारण किये हूँ ! वे ही मेरे आदर्श हैं -मैं उन्हीं आदर्शपरुष श्रीरामकृष्ण परमहंस के जीवन का अनुकरण करने की चेष्टा करूँगा ! क्योंकि सबका सेवक बनकर ही एक हिन्दू (= नेता) अपने को उन्नत करने की चेष्टा करता है।  [क्योंकि नेता अपने ईश्वरत्व को कभी नहीं भूलता, और अपने स्वरूप में अटल रहने के लिये -कहीं 'नेतागिरी' या 'गुरुगिरि' का अहंकार न हो जाय, केवल विद्या का अहंकार, दास मैं, या भक्त मैं की सहायता से ईश्वर (परमसत्य) से जुड़ने में भावी नेताओं का सेवक बनकर नेतृत्व प्रदान करने की चेष्टा करता है।]
हमें इसी प्रकार (त्याग और सेवा के माध्यम से ) भारत की सर्वसाधारण जनता को उन्नत करना चाहिये न-कि पाश्चात्य समाज-सेवी क्लबों जैसी पद्धति का अनुकरण करके ! हमारे इन सुधारकों या तथाकथित समाज- सेवियों (क्लब और समिति के सदस्यों) में से एक भी, ऐसा जीवन गठन करके दिखाये दिखाये तो सही जो एक पैरिया की भी सेवा के लिए तत्पर हो ! फिर तो मैं भी उसके चरणों में बैठकर शिक्षा ग्रहण करूँ, पर हाँ -उसके पहले नहीं ! लम्बी-चौड़ी बातों की अपेक्षा थोड़ा कुछ कर दिखाना लाख गुना अच्छा है।"५/१०६ 
मनुष्य बनने (Being) को लेकर कुछ लोगों के मन में यह शंका उठती है, क्या हमें पहले 'मनुष्य' शब्द का जो सही अर्थ है, वैसा-  यथार्थ मनुष्य (ब्रह्म वेत्ता मनुष्य) बन जाना चाहिये, और केवल तभी दूसरों को मनुष्य बनने में सहायता करने की बात सोंचनी चाहिये ?
यह बात कई बार दोहराई जा चुकी है कि यद्यपि दूसरों को मनुष्य बनने में सहायता करने से पहले स्वयं एक 'यथार्थ मनुष्य' बन जाना एक आदर्श बात होगी।  किन्तु यदि हम लोग 'मनुष्य बनने' के लिये पहले स्वयं महामण्डल द्वारा निर्देशित पाँच अभ्यासों को ठीक से समझकर उनका पालन करना शुरू कर दें। और उसके साथ ही साथ अपने आस-पास रहने वाले कुछ दूसरे भाइयों को भी मनुष्य बनने में सहायता करने के उद्देश्य से इन अभ्यासों का पालन करने के लिये निष्काम भाव से अनुप्रेरित करते रहें, तो पहले हमारी चित्त-शुद्धि हो जायेगी और हमें ही मनुष्य बनने में सहायता प्राप्त होगी ! 
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं -" सामाजिक दोषों के निराकरण का कार्य (Making) उतना (ऑब्जेक्टिव )
वस्तुनिष्ठ नहीं है जितना आत्मनिष्ठ (सब्जेक्टिव)। हम कितनी भी लम्बी चौड़ी डिंग क्यों न हाँकें समाज के दोषों को दूर करने का कार्य जितना स्वयं के लिए शिक्षात्मक है, उतना समाज के लिये वास्तविक नहीं। " ५/१०९  
हमें यह स्मरण रखना चाहिये कि महामण्डल द्वारा प्रस्तावित 'मनुष्य-निर्माण आंदोलन' एक मन्दगति का आंदोलन है। एक ही दिन में रेल-सड़क जाम करके अपनी मांगे मनवा लेने जैसा राजनितिक आंदोलन नहीं है। क्योंकि आध्यात्मिक 'मनुष्य बनने की प्रक्रिया' - एक अत्यन्त धीमी गति की प्रक्रिया है, इसमें अग्रगमन धीरे धीरे होता है।  यह किसी  निश्चित समयावधि में निश्चित सिलेबस (तीन साल का डिग्री-कोर्स) को पढ़कर एक दिन ग्रेजुएट बन जाने जैसी प्रक्रिया नहीं है। या जैसे कोई कली सुबह में अचानक खिल कर फूल बन जाती है, और जिसे देखने से बड़ा आनन्द होता है, चरित्र-कमल का खिल जाना भी उतनी सहज प्रक्रिया नहीं है। 
इसके लिये पहले मन को आधुनिक में यथार्थ मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ साँचा भगवान के अवतार श्रीरामकृष्ण की मूर्ति या छवि पर मन को एकाग्र रखने की पद्धति मनःसंयोग का अभ्यास करना बहुत उपयोगी सिद्ध होता है। [ किन्तु हमलोग पाश्चात्य शिक्षा के कूप्रभाव से मूर्ति-पूजा की निंदा करने को मॉडर्न होना समझने लगे हैं, इसीलिये अपने आदर्श का चयन नहीं कर पाते]  
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, " आजकल मूर्ति-पूजा को गलत बताने की प्रथा सी चल पड़ी है, और सब लोग बिना किसी आपत्ति के उसमें विश्वास भी करने लग गये हैं। मैंने भी एक समय ऐसा ही सोचा था और उसके दण्डस्वरूप मुझे ऐसे व्यक्ति के चरणों में बैठकर शिक्षा ग्रहण करनी पड़ी, जिन्होंने सब कुछ मूर्ति-पूजा के द्वारा ही प्राप्त किया था, मेरा अभिप्राय श्रीरामकृष्ण परमहंस से है। यदि मूर्ति-पूजा के द्वारा श्रीरामकृष्ण परमहंस जैसे महापुरुष (नेता) का निर्माण हो सकता है, तब तुम क्या पसन्द करोगे सुधारकों का धर्म (कम्युनिस्ट), या मूर्ति-पूजा ? मैं इस प्रश्न का उत्तर चाहता हूँ। यदि मूर्ति पूजा के द्वारा इस प्रकार के श्रीरामकृष्ण परमहंस उत्पन्न हो सकते हों, तो और हजारों मूर्तियों की पूजा करो। प्रभु तुम्हें सिद्धि दें। 
जिस किसी भी उपाय से हो सके इस प्रकार के महापुरुषों (श्री रामकृष्ण जैसे नेताओं) का निर्माण करो ! 
और इतने पर भी मूर्ति-पूजा की निंदा की जाती है ! क्यों? यह कोई नहीं जानता। शायद इसलिये कि हजारों वर्ष पहले किसी यूहीदी ने अपनी मूर्ति को छोड़कर और सब मूर्तियों की निंदा की थी ? "५/११३
 इसीलिये 'BE AND MAKE' को ' साइमल्टैनीअस्ली' या साथ साथ कियान्वित करना, 'मनुष्य' बनने का सबसे अच्छा उपाय है। क्योंकि स्वयं 'मनुष्य बनने'  का प्रयास करने वाला कोई व्यक्ति (अर्थात अपने जीवन और चरित्र को गठित करने के लिए उद्यम करने वाला युवा), अपने आप में ही  दूसरों के लिए एक उदाहरण और प्रेरणा का एक स्रोत बन जाता है। और यदि हम अपने स्वरूप के प्रति जागृत होकर, इसी विषय में दूसरों की भी थोड़ी सी सहायता करते हैं, तो यह निःस्वार्थ-सेवा हमारे अपने आत्म-विकास के प्रयास को प्रोत्साहित (बूस्ट) करती है। इसलिए  'बनने' के साथ ही साथ यदि हम 'बनाने'  (Make =लोक-कल्याण) का थोड़ा प्रयास भी  करते हैं, तो अपने 'बनने' (Being =आत्मकल्याण) के मामले हमें कुछ खोना नहीं पड़ता है।
किन्तु यहाँ केवल एक सावधानी बरतनी आवश्यक हो जाती है। यदि हम मनुष्य बनने की दिशा में स्वयं कोई प्रयास नहीं करते, और इस विषय में केवल दूसरों को ही परामर्श देते रहते हैं, तो इससे किसी को  कोई लाभ न होगा। यह दूसरों के लिए अधिक सहायक तो नहीं ही होगा, मैं भी निश्चित रूप से उसका कोई लाभ नहीं उठा पाउँगा। मैं जहाँ था वहीँ रुका रहूंगा, या हो सकता है कि एक या दो सोपान नीचे भी उतर जाऊँ। क्योंकि, उस अवस्था में मुझे अपने विषय में यह 'खुशफहमी' हो सकती है कि मैं ऊँचे स्तर में पहुँच गया हूँ, जिससे मेरा अहंकार बढ़ जायेगा , (और गुरुगिरि करने के चक्कर में) और मैं अपने यथार्थ स्वरूप से नीचे गिर जाऊँगा।
इस 'मनुष्य बनने की प्रक्रिया' (५-अभ्यास) को आत्मसात करने में दृढ़ संकल्प , अविचलता, धैर्य, अध्यवसाय, और अत्यधिक सावधानी के साथ आजीवन - 'टिल दी गोल इज रीच्ड' - 'जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न जाये, तब तक' प्रयास-रत रहने की आवश्यकता होती है। स्वामी जी डॉ० नजुन्दाराव को ३० नवम्बर १८९४ के पत्र में लिखते हैं- " परन्तु वत्स इस (मनुष्य बनने के) मार्ग में बाधाएँ भी हैं। जल्दीबाजी से कोई काम नहीं होता। पवित्रता, धैर्य और अध्यवसाय (3P) इन्हीं तीन गुणों से सफलता मिलती है, और सर्वोपरि है प्रेम। तुम्हारे सामने अनन्त समय है, अतएव अनुचित शीघ्रता आवश्यक नहीं। यदि तुम पवित्र और निष्कपट हो तो सब काम ठीक हो जायेंगे। हमें तुम्हारे जैसे हजारों की आवश्यकता है, जो समाज पर टूट पड़ें और जहाँ कहीं वे जायें, वहीँ नये जीवन और नयी शक्ति का संचार कर दें! " 'मनुष्य बनने की प्रक्रिया' में 'कॉशन ऐंड केयर मस्ट बी कॉन्सटेंट-अनरिलेन्टींग' कठोरता पूर्वक विवेक-प्रयोग करने के लिये निरन्तर सतर्क और सावधान रहना ही पड़ता है! 
 'यथार्थ मनुष्य' बन जाना इतना आसान नहीं है कि किसी दिन मैं सुबह सुबह उठकर यह घोषणा कर दूँ -कि " मैं तो अब 'मनुष्य' कहा जाने योग्य मनुष्य (महात्मा बुद्ध) बन गया हूँ!" क्योंकि, जिस प्रकार जल को जहाँ से, और जब कभी नीचे गिरने का मार्ग मिल जाता है, जल वहीँ से नीचे की ओर बहने लगता है; यदि मनःसंयोग का अभ्यास नियमित तौर से नहीं करते रहा जाय तो, मानव-मन का स्वभाव भी ठीक उसी प्रकार नीचे की ओर गिरने का होता है। 
यहाँ इसी विषय के ऊपर एक उपाख्यान को सुनना हमारे लिये लाभप्रद हो सकता है। वाराणसी के एक मठ में एक सन्यासी (महंत जी ) रहा करते थे। वे प्रतिदिन गंगा-स्नान करने के लिए जाया करते थे। वहाँ से वापस लौटते समय एक स्त्री (?) प्रतिदिन उनके मार्ग में खड़ी होकर पूछती थी -'बाबा, मैं आपसे कुछ प्रश्न पूछना चाहती हूँ !' संन्यासी  जी कभी उसका कोई उत्तर नहीं देते थे, और बिना रुके अपने मार्ग पर आगे बढ़ जाते थे।
इसी प्रकार अनेक वर्ष बीत गये और महंत जी के मृत्यु का समय आ गया। उन्होंने अपने शिष्यों से कहा कि उस स्त्री को बुला कर मेरे पास ले आओ। उन्होंने वैसा ही किया और सन्यासी ने उसके आध्यात्मिक जिज्ञासा का उचित देकर उसे संतुष्ट कर दिया। आश्चर्यचकित होकर शिष्यों ने पूछा - 'महाराज, आपने इतने दिनों तक उस स्त्री की आध्यात्मिक प्रश्नों का समाधान क्यों नहीं किया ? तब संन्यासी जी ने उत्तर दिया, ' अभी तक मेरे मन के नीचे उतरने का खतरा सदैव बना हुआ था।' इसीलिये मैं आजीवन सतर्क रहता था, 'मैं अब यह जानता हूँ कि मैं जीवित नहीं रहूँगा'। हममें से बहुत से लोगों को ऐसी सावधानी अत्यधिक (टू मच या बेहद ज्यादा) प्रतीत हो सकती है। 'बट वी कैन लर्न अ लॉट फ्रॉम दिस' : 
जो महामण्डल कर्मी  गृहस्थ जीवन में रहते हुए, भी ' श्रीरामकृष्ण की पताका (महामण्डल -ध्वज) हाथ में लेकर संसार की मुक्ति के लिए विचरण करने की इच्छा रखते हैं, उन्हें इस उपाख्यान से स्वामी जी 'कभी फूलों से भी कोमल और कभी तीर के समान चुभने वाले' शब्दों का मर्म समझ में आ जाता है। स्वामी जी चाहते थे कि युवाओं को शारीरिक,मानसिक तथा आर्थिक दृष्टि उन्नत मनुष्य बनने का प्रशिक्षण देने के साथ ही साथ उनके हृदय को इतना उदार बना दिया जाय कि उसमें निजी भोगाकांक्षा या स्वार्थपरता के लिये थोड़ी सी भी जगह न रहे! क्षणिक-सुख भोगने की हल्की सी गन्ध में उसके हृदय शेष नहीं बचे ! उन्हें स्वस्थ शरीर और सबल मन के साथ साथ ' बज्र से भी कठोर और पुष्प से भी हृदय'  विकसित बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त कर लेना चाहिए। उत्तर राम-चरित में महाकवि भवभूति कहते हैं -  
वज्रादपि कठोराणि मृदुनि कुसुमादपि ।
लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विक्षातुमर्हति ॥ 
 मानवजाति के मार्गदर्शक नेताओं  का हृदय अति विशिष्ठ प्रकार से गढ़ा हुआ होता है, (बाहर से) वज्र जैसे कठोर और भीतर से पुष्प जैसा कोमल होता है। (इसी विशिष्टता के लिये ही वे समाज में प्रतिष्ठित और प्रसिद्ध 'नेता' होते हैं।)  ऐसे लोकोत्तर अंतःकरण को कौन समझ सकता है ?
वे स्वयं के १२ दोषों को निकालने और २४ सद्गुणों को अर्जित करने के संकल्प पर अटल रहने में विवेक-प्रयोग करते समय आवश्यकतानुसार वज्र के समान कठोर होते हैं।  किन्तु दूसरों को निरन्तर विवेक-प्रयोग करने में उनकी असमर्थता को देखकर उनके प्रति प्रेम और सहानुभूति का अनुभव करते हुए पुष्प के समान कोमलता के साथ उनकी सहायता करते हैं। (वे किसी तेज छात्र को दूसरे कमजोर छात्र की कान पकड़ कर चाटा मारने का हुक्म नहीं सुनाते हैं।)
प्रश्न है कि ऐसे हृदय का विकास कैसे किया जाता है ? स्वामी विवेकानन्द ने धर्म को परिभाषित करते हुए कहा था, "धर्म एक ऐसी वस्तु है जो, ' पशु-मानव (अ-विवेकी मनुष्य को) मनुष्य में और मनुष्य (विवेकी मनुष्य) को परमात्मा (पूर्ण निःस्वार्थपरता) में उन्नत कर देता है! और मनुष्य के सर्वांगीन विकास के लिये ऐसा होना अपरिहार्य है। 
हमलोग जानते हैं कि प्रत्येक मनुष्य के तीन प्रमुख अवयव या कम्पोनेंट्स होते हैं - शरीर (बाहुबल Hand), मन (बुद्धिबल या Head) और हृदय (सहानुभूति शक्ति -Heart) इन तीनों अवयवों को विकसित कर लेने से यथार्थ मनुष्य बना जा सकता है। इसी आधार पर मनुष्य-निर्माण का सूत्र देते हुए उन्होंने कहा था,  '3H -निर्माण' ! 
हम जानते हैं कि पंच भूतों से निर्मित हमारा यह शरीर एक स्थूल जड़ पदार्थ है, और मन एक सूक्ष्म जड़ पदार्थ है। इसीलिये पौष्टिक आहार और व्यायाम के द्वारा शरीर को विकसित करना आसान है। किन्तु मन अत्यंत सूक्ष्म वस्तु है, इसलिए बुद्धि को विकसित करने के लिये मन को वशीभूत करना थोड़ा कठिन तो अवश्य है, किन्तु असम्भव नहीं है। (डबल प्रेजेंस ऑफ़ माइंड के कारण मन को मन के माध्यम से ही पकड़ना सम्भव है) मनःसंयोग का अभ्यास और पौष्टिक मानसिक आहार द्वारा बुद्धिबल को भी विकसित किया जा सकता है।  
 किन्तु, हृदय कोई अन्य चीज है, जो उन सबसे सूक्ष्मतर है; और किसी भी तरह से उसे भौतिक पदार्थ (ऐन्द्रिक वस्तु) तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता है। हम हृदय को, किसी भी बाह्य उपकरण के जैसा आसानी से नहीं समझ सकते हैं। हम जानते हैं कि हमारा मन एक ऐसा साधन (इंस्ट्रुमेंट) है, जिसका उपयोग हम स्वयं मन को भी देखने (या पकड़ने) के लिये कर सकते हैं। 
लेकिन, हृदय का उपयोग या व्यवहार करने के लिये, ठीक उसी के सामान कोई दूसरा साधन या उपकरण हमारे पास नहीं है। "हार्ट कैन ओनली रेस्पॉन्ड टु हार्ट फ्रॉम अ डिस्टेंस." एक हृदय, दूसरे हृदय को केवल दूर से ही प्रत्युत्तर दे सकता है। इट इज  समथिंग लाइक रेजोनेंस.--यह कुछ-कुछ अनुगूँज या अनुकम्पन के जैसी चीज है।
जैसे, किसी रेडियो स्टेशन से एक निश्चित मेगाहर्ट्ज़ फ्रीक्वेंसीज के रेडियो तरंगों को संचारित (ट्रांसमिट) किया जाता है। और किसी दूरस्थ स्थान पर एक ट्रांजिस्टर (इलेक्ट्रॉनिक रिसीवर) होता है जो प्रेषित ध्वनि तरंगों को डिटेक्ट कर लेता है, या पकड़ लेता है, और उसे ऐम्प्लीफाइ करता है, अर्थात उसकी आवाज को बढ़ा देता है। और हमलोग घर बैठे रेडिओ प्रसारण केन्द्र से प्रसारित होने वाले भाषण या विविध संगीत को सुन सकते हैं। 
हमारा हृदय भी ठीक उसी प्रणाली से कार्य करता है। तुमने फिजिक्स में 'फिनामनान ऑफ़ रेजोनेन्स ' या 'अनुकम्पन की अद्भुत घटना'  के विषय में पढ़ा होगा। किसी स्ट्रिंग वाले (तार वाले) वाद्य यंत्र जैसे गिटार- के एक तार को एक विशेष फ्रिक्वेंसी या आवृत्ति, मानलें २४०- आवृत्ति के कम्पन के लिये ट्यून कर दो । और गिटार के एक अन्य तार को भी उसी समान आवृत्ति २४० आवृत्ति पर स्थिर या सेट कर दो । 
और बस एक तार को छेड़ दो । यदि तुम इस परीक्षण को करते हो, तो तुम देखेंगे कि दूसरा तार भी स्वतः कंपन करना शुरू देता है, और वही स्वर (ध्वनि) उत्पन्न कर रहा है, जो स्वर पहले वाले तार से बहार निकल रहा है।
 ठीक इसी प्रकार- तुम अपने हृदय  को दूसरों के हृदय की धड़कन या फीलींग्स (सुख-दुःख के कम्पन)  के साथ अट्यून करके, उस हृदय के सुर के साथ अपने हृदय के सुर को मिला सकते हो! (मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा !) किसी भी (सचेतन) प्राणी के हृदय पर कार्य करने की एकमात्र प्रणाली यही है। ' वी कैन अट्यून ऑवर हार्ट टू दी  हार्ट बीट्स आर दी  फीलिंग्स ऑफ अदर्स !'  उदाहरण के लिये, जब अपने किसी प्रिय व्यक्ति- के पैर में काँटा गड़ जाता है, या बटन लगाते समय कभी माँ की ऊँगली में सुई चुभ जाता है, तो उसकी पीड़ा का अनुभव, हम लोग अपने हृदय में करते हैं। 
इसीलिये समाज सेवा करते समय समाज-सेवी को अपने 'राईट मोटिवेशन' या उचित अभिप्रेरणा पर सतर्क दृष्टि रखनी चाहिये। और उचित प्रकार से समाज -सेवा करके अपने हृदय को ' वज्र से भी कठोर और पुष्प से भी कोमल ' विकसित करने के उद्देश्य ही से ही दूसरों की सहायता और सेवा करने के लिये आगे आना चाहिये। 
स्वामी जी ने कहा था - "तुम्हारी पाश्चात्य शिक्षा-पद्धति का एक बड़ा दोष यह है कि तुम केवल बौद्धिक-शिक्षा (Head) के ही पीछे पड़े हो, हृदय (Heart) की ओर ध्यान ही नहीं देते। इसका फल यह होता है कि मनुष्य दस गुना अधिक स्वार्थी बन जाता है। यही तुम्हारे नाश का कारण होगा। यदि हृदय (Heart) और बुद्धि (Head)  में विरोध उत्पन्न हो, तो हृदय का अनुसरण करो, क्योंकि बुद्धि केवल एक तर्क के क्षेत्र में ही काम कर सकती है। वह उसके परे नहीं जा सकती।
केवल हृदय ही हमें उच्चतम भूमि में ले जाता है, जहाँ बुद्धि कभी नहीं पहुँच सकती।  हमारा हृदय ही बुद्धि का अतिक्रमण कर जिसे हम 'अन्तःस्फुरण' कहते हैं, उसे पा लेता है। बुद्धि कभी अन्तःस्फुरित (इंस्पायर्ड) नहीं हो सकती। केवल उद्बोधित हृदय ही अन्तःस्फुरित हो सकता है !जिस तरह बुद्धि (Head)  ज्ञान का साधन है, उसी तरह हृदय (Heart) भी अन्तःस्फुरण का साधन (instrument) है। 
केवल बुद्धिप्रधान, किन्तु शुष्क-हृदय मनुष्य कभी अन्तःस्फूर्त [इन्स्पाइअर्ड या सेल्फ-पल्सेशन ? / self-pulsation,] नहीं बन सकता। प्रेममय पुरुष (लोक-शिक्षक या नेता ) की समस्त क्रियायें उसके हृदय 
से ही अनुप्राणित होती हैं, वह एक ऐसा उच्चतर साधन प्राप्त कर लेता है, जिसे बुद्धि कभी नहीं दे सकती, और वह साधन है हृदय का अन्तःस्फुरण।" किन्तु इसीलिये उसे सदैव सतर्क रहने की आवश्यकता भी होती है। इसीलिये स्वामीजी भगिनी निवेदिता को ३ नवम्बर १८९७ को लिखे पत्र में कहते हैं, "अत्यधिक भावुकता कार्य में बाधा उत्पन्न करती है, 'वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि' हमारा मूलमंत्र होगा।" 
पार्थसारथी श्रीकृष्ण गीता ६/३२ में परम् योगी (सच्चे नेता) को परिभाषित करते हुए कहते हैं -
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं सः योगी परमो मतः।।
 " हे अर्जुन,  सच्चा योगी वही है, जो ' आत्मा-उपम्येन'- अपने साथ तुलना करके दूसरों के दुःख-संताप को अपने हृदय में महसूस करता है। और समान रूप से शोकाकुल हो जाता है, और दूसरों के आनंदित होने से, उसके आनन्द को भी ठीक उसी के समान महसूस करके, उसके आनन्द में सहभागी बन सकता  है।" 
सम्पूर्ण विश्व के साथ एकात्मता का बोध होना - दुर्लभ अवस्था है। उनका प्रेम दिखावे वाला बाहरी विश्व-भ्रातृत्व नहीं बल्कि यह प्रेम योगी को आत्मज्ञान से विश्व-सेवा, जीव-सेवा या समाज-सेवा करने के लिये अभिप्रेरित करता है। यही विश्व-प्रेम अर्थात आत्मस्वरूप ब्रह्म का सभी प्राणियों में दर्शन को ही- अहं ब्रह्मास्मि कहा जाता है, खुली आँखों से ध्यान करते समय दैनन्दिन जीवन में ऐसी अनुभूति ही योगी को विश्वप्रेमिक बना देती है। ब्रह्म-स्वरुप अहं या 'पक्का मैं' की सीमा उस समय विश्वमय हो जाती है; उस अवस्था में योगी भुवनमंगल रूप होकर विराजमान रहते हैं।
इस दृष्टि से देखने पर स्वामी विवेकानन्द जी  एक महान योगी थे, किन्तु हमलोगों को भी कम से कम छोटा योगी तो अवश्य बनना चाहिये। हमें भी दूसरे के दुःख-कष्ट को अपने हृदय में थोड़ा बहुत अवश्य महसूस करने की चेष्टा करनी चाहिये, और उस दृश्य का उपयोग अपने हृदय को विकसित करने में करना चाहिये।
श्रीरामकृष्ण के जीवन के कुछ उदाहरण अपने हृदय को विकसित करने में बहुत सहायक सिद्ध हो सकते हैं। काशी के मार्ग में जाते हुए, बैद्यनाथ धाम में आकाल-पीड़ित सैकड़ों नर-नारियों के कंकाल समान चेहरे और प्रायः नग्न शरीर को देखकर श्रीरामकृष्ण रो पड़े थे। रानी रासमणि के बड़े दामाद मथुरानाथ विश्वास से उन्होंने रोते हुए कहा -" इन्हें भरपेट खिलाओ, नये वस्त्र दो, सिर पर तेल दो ।" मथुर बाबु कुछ आपत्ति जताकर बोले -" बाबा, तीर्थ में अनेक खर्चे हैं, ये तो बहुत से आदमी हैं, इन्हें खिलाने-पहनाने में रूपये घट जायेंगे।" श्रीरामकृष्ण देव ने रोते हुए कहा - " तुमलोग जाओ, मैं काशी नहीं जाऊँगा, मैं इन्हीं के पास रहूँगा" -इतना कहकर वे दरिद्रों के साथ जाकर बैठ गये। लाचार होकर मथुर बाबु ने उन सबको भरपेट खिलाया, सिर में तेल दिया और हरेक एक-एक नया वस्त्र दिया। इससे उन दरिद्रों के मुख पर हँसी देखकर ठाकुर वहाँ से उठ आये।  यही है विश्व को आत्मवत देखना, तथा दूसरों के दुःख से द्रवित होकर  दुःख का अनुभव करना। 
एक व्यक्ति दक्षिणेश्वर कालीबाड़ी के बाग के नयी दूब के ऊपर से पैदल चला जा रहा था, देखकर श्रीठाकुर असहनीय यन्त्रणा का अनुभव कर एकदम विकल हो पड़े।  बाद में उन्होंने कहा था -" छाती पर से कोई मनुष्य चला जाये तो जैसी वेदना का अनुभव होता है, उस समय मैंने वैसी ही वेदना का अनुभव किया था। " वह अनुभूति दो घन्टे तक थी। 
कालीबाड़ी के गंगा किनारे एक नाव पर दो माँझी झगड़ा कर रहे थे, उनमें से जो बलवान था, उसने दुर्बल मांझी की पीठ पर जोर से थप्पड़ मारा। उसे देखते ही ठाकुर चिल्लाकर रो पड़े। हृदयराम मामाजी की रुलाई सुनकर वहां दौड़ कर आ गये, उनकी पीठ पर बाम उखड़ आया था, उनकी पीठ लाल होकर फूल उठी है देखकर घबड़ाने लगे।  मांझी के पीठ के आघात का चिन्ह श्रीठाकुर के पीठ पर देखकर हृदयराम आश्चर्यचकित हुए।
 श्रीठाकुर एकदिन पूजा के लिये दूब और बेलपत्र चुनने गए थे। दूब चुनते हुए उन्हें अनुभव होने लगा सर्वत्र चैतन्य है, दूर्वादल भी छिन्न होकर कष्ट का अनुभव कर रहे हैं!  बेलपत्र चुनते समय पत्ती के साथ उस वृक्ष की थोड़ी छाल निकल आयी, उसमें वृक्ष को जो वेदना का अनुभव हो रहा था उसे समझकर वे फिर बेलपत्र नहीं चुन सके। 
किन्तु श्रीठाकुर देव की तरह सर्वत्र चैतन्य ही हैं - ऐसा महसूस करने के बाद भी , हमें केवल हाथ पर हाथ रखे बैठे नहीं रहना चाहिये। बल्कि व्यावहारिक वेदान्त सूत्र - ' बनो और बनाओ'  के अनुसार अपने आस-पास रहने वाले भाइयों की सहायता और सेवा के लिये अपने हाथों को आगे बढ़ा देना चाहिये। तुम तत्काल उसके दुःख को कम करने का प्रयत्न करो, और वैसा करने के बाद तुम्हें जो ज्ञान प्राप्त होगा वह स्थाई बन जायेगा, तुम्हारे हृदय में बस जायेगा, और तुम्हारे साथ सदैव बना रहेगा (तुम अपने ईश्वरत्व को कभी भूल नहीं पाओगे।)। 
उसी प्रकार 'मनुष्य बनाने' (मेकिंग) की अवधारणा भी बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिये। महामण्डल का सम्पूर्ण  कार्य मनुष्य-निर्माण करना ही है। किन्तु यह 'मनुष्य-बनाने' का कार्य 'Makeing' किसी भी अवस्था में 'मनुष्य बनने' के कार्य 'Being' से बिल्कुल भी पृथक नहीं है। इसी प्रधान सन्देश को हमें महामण्डल के आदर्श वाक्य -"Be and Make" में का 'सॉस्टेनूटो इन दी मौटो' समझना चाहिये! (sostenuto= संगीत का वह स्वर, 'वादी-स्वर' जिसे लम्बे समय तक बजाया जाता है।)
स्वामी विवेकानन्द ऐसा विश्वास करते थे कि श्रीरामकृष्ण परमहंस देव मात्र अपने कृपा-कटाक्ष द्वारा मिट्टी के ढेले से हजारों विवेकानन्द का निर्माण कर सकते हैं! बाद में जगतजननी माँ काली के विषय में बोलते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा था-'शी कैन मेक हीरोज आउट ऑफ़ स्टोन !' अर्थात "माँ काली पत्थर को भी नायक (मानवजाति का मार्गदर्शक नेता) के रूप गढ़ सकती है !" 
(वी शुड नॉट रीड दिस मीनिंग ऑफ 'मेकिंग', व्हेन वी आर कन्सर्न्ड।) हमलोगों को जब अपने विषय में 'मेकिंग' या 'मनुष्य बनने में सहायता करने' का तात्पर्य समझना हो, तो हमें 'बनाने' के कार्य को इस प्रकार नहीं देखना चाहिये। हमारे लिये तो अपने आस-पास रहने वाले लोगों को 'मनुष्य बनने में सहायता करने ' ('Making) का अवसर प्राप्त होने का अर्थ, स्वयं यथार्थ मनुष्य बनने के प्रयास में श्रीठाकुर देव के कार्य ( या स्वामी विवेकानन्द की क्रान्तिकारी योजना) को धरातल पर उतारने में एक अत्यन्त छोटा सा सहायक बनने (रामसेतु बन्धन में गिलहरी जैसा सहायक बनने ) का सौभाग्य प्राप्त करके अपने जीवन को धन्य करने जैसा है। 
क्योंकि स्वामी विवेकानन्द के अनुसार -' दी डाइनामिज़म ऑफ़ दी होल वर्ल्ड इज फॉर दी मेकिंग ऑफ़ मैन !' अर्थात सम्पूर्ण विश्व की निरन्तर गतिशीलता के पीछे 'मनुष्य निर्माण' (पशुमानव से मनुष्य और मनुष्य से देवमानव में रूपान्तरित होने) की एक ईश्वरीय -योजना है। ' एंड वी वेयर आल वाचिंग दी मेकिंग ऑफ़ मैन एंड दैट अलोन'। उन्होंने ने कहा था -' और हमलोग केवल मनुष्यों को निर्मित होता हुआ देख रहे थे।' महामण्डल की पुस्तिका 'विवेकानन्द दर्शनम्' में कहा गया है - 
 नान्यदेका चित्रमाला जगदेतच्चराचरम् |  
 मानुषाः पूर्णतां यन्ति नान्या वार्त्ता तु वर्तते |   
 सत्य-सा प्रतीत होते हुए भी, आखिरकार- यह चराचर जगत् सतत परिवर्तनशील छाया-चित्रों की एक श्रृंखला मात्र ही तो है। और जगत रूपी चलचित्रों के इस सतरंगी छटा-समुच्चय के माध्यम से केवल एक ही उद्देश्य अभिव्यक्त होता है। यही कि  " अपने भ्रमों-भूलों को त्यागता हुआ - मनुष्य क्रमशः पूर्णत्व प्राप्ति (आदर्श) की ओर अग्रसर हो रहा है ! ' इस  संसार-चलचित्र रूपी धारावाहिक के माध्यम से हम सभी लोग अभी तक केवल मनुष्य को ' मानहूश ' अर्थात आप्त-पुरुष, ऋषि या ब्रह्मविद् ' मनुष्य ' बनते हुए देख रहे थे ! 
किन्तु हमारे लिये 'मनुष्य निर्माण' करने का तात्पर्य केवल दर्शक बनकर मनुष्य बनते हुए देखते रहना ही नहीं है, किन्तु हमें मनुष्यों का निर्माण करने वाले  इस विश्व-रंगमंच पर सतत चलते रहने वाले जीवन्त नाटक में एक छोटे से कलाकार की भूमिका भी निभानी है।
जब हम अपने अंतःप्रकृति को या अपने 'स्व' को (यथार्थ स्वरूप को)  गहराई से जानने की चेष्टा करते हैं, अथवा बाह्य प्रकृति को, तो दोनों अवस्थाओं में हमें उसी अनन्त-असीम (लिमिटलैस) का आह्वान सुनाई देता है। बाह्यजगत और अंतःजगत दोनों अथाह (fathomless) हैं, इनकी गहराई को मापा नहीं जा सकता। इसीलिये हम उस प्रत्येक बाधा को तोड़ देना चाहते हैं, जो हमें नाम-रूप की सीमा में आबद्ध करना चाहती है। 
हमें ऐसा महसूस होता है कि स्वयं को विश्व के अन्य मनुष्य के सुख-दुःख से काट कर एकाकी (isolated) बना लेना एक पाप है, इसीलिये हम स्वयं को दूसरों में खो देना चाहते हैं। हम अपने साथ दूसरे लोगों को जोड़ते चले जाते हैं, पहले अपने माता-पिता, बन्धु-बान्धव , जो हमारे अपने स्वजन सगे-संबंधियों में स्वयं को प्रसारित करने की चेष्टा करते हैं। विवाह होने के बाद जो नये नाते-रिश्ते बनते हैं, उनमें भी अपने को खो देना चाहते हैं। और इस प्रकार क्रमशः हमें बोध होता है कि हमारी सबसे बड़ी विजय तो स्वयं को जीत लेने में है, ( नाम-रूप के देहाध्यास या अहंकार से परे चले जाने में है) जिसके फलस्वरूप हम अपने कामोन्माद या अपने परिवेश के गुलाम न होकर स्वयं के स्वामी बन जाते हैं। 
समाज के वर्तमान संकटपूर्ण अवस्था का मूल कारण यही है कि हमने स्वयं के ऊपर, अपनी अंतर्निहित दिव्यता के ऊपर विश्वास को ही खो दिया है, इसके साथ ही साथ हमने अपनी अन्तर्निहित अनन्त शक्ति और पवित्रता पर श्रद्धा को भी खो दिया है। इस खोये हुए आत्मविश्वास और श्रद्धा को सशक्त करने से ही हम इस विकट समस्या पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। 
और यहीं 'Be' अर्थात अपने यथार्थ स्वरुप में अवस्थित होने या यथार्थ मनुष्य बनने के लिए व्यक्तिगत प्रयास करने की आवश्यकता होती है। 'फ्रीडम इज ऑवर नेचर'- मुक्ति (स्वतंत्रता) ही हमारा स्वभाव है, एवं सम्पूर्ण मानव-जाति के साथ रक्त-सम्बन्धियों जैसी अपनापन की भावना रहने के कारण, अपने आस-पास रहने वालों के प्रति हमारा प्रेम - उन सबों को मुक्त देखने के लिये अनुप्रेरित करता है। और यहीं पर अपने यथार्थ स्वरूप (मुक्ति) में अवस्थित होने की हमारी व्यक्तिगत चेष्टा (इण्डिभिजुअल एफर्ट- 'BE') एक सामाजिक प्रयास (सोशल एफर्ट-'MAKE') में रूपान्तरित हो जाती है। इसी व्यावहारिक वेदान्त को स्वामी विवेकानन्द ने अपने संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित वाणी (महावाक्य)- 'BE AND MAKE' के माध्यम से अभिव्यक्त किया है।
प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है, या मुक्त-स्वभाव है, इसी विचार के साथ थोड़ा और आगे बढ़ने पर हम पाते हैं कि वे इसी बात को इंगित करते हुए कह रहे हैं -" भारत में हमारे पास  'सोशल कम्युनिज्म' अर्थात सामाजिक साम्यवाद है, जो अद्वैत वेदान्त (नॉन-डुअलिज्म, कोई पराया नहीं) की भावना से प्रकाशित है, इसीको आध्यात्मिक व्यक्तिवाद " स्पिरिचुअल इंडिविजुलिज्म" कहते हैं ।  (सूक्तियाँ एवं सुभाषित -८/१३४)
इसी आध्यात्मिक व्यक्तिवाद 'स्पिरिचुअल इंडिविजुअलिज्म' को सामाजिक प्रयत्न (सोशल एफर्ट) में परिवर्तित करने के लिये, उन्होंने भारत के जनसाधारण को सर्वप्रथम 'शिक्षा एवं संस्कृति' प्रदान करने का परामर्श दिया था। क्योंकि वे अच्छी तरह से जानते थे कि भारत के जनसाधारण तक गीता और उपनिषदों की शिक्षा को पहुँचाये बिना, एक महान राष्ट्र 'विश्वगुरु भारत' के रूप में हमारा 'कलेक्टिव-एग्जिस्टेंस' (सामूहिक-अस्तित्व) बिल्कुल मिथ्या हो जाता है। 
स्वामी विवेकानन्द कहते थे - " विगत शताब्दी तक जितने भी सुधारवादी आन्दोलन हुए हैं उनमें से अधिकांश का सम्बन्ध केवल भारत के प्रथम दो वर्णों से रहा है, शेष दो से नहीं। जो जनसाधारण का तिरस्कार करके स्वयं शिक्षित बने हैं । पर यह तो सुधार नहीं कहा जा सकता। सुधार करने में चीज भीतर, उसकी जड़ तक पहुँचना होता है। इसीको मैं आमूल सुधार कहता हूँ । आग जड़ में लगाओ और उसे क्रमशः ऊपर उठने दो, एवं एक 'अखंड भारतीय राष्ट्र' संगठित करो ! " 
" किन्तु उच्च वर्णों को नीचे उतार कर इस 'जातिप्रथा की समस्या' की मीमांसा न होगी, किन्तु नीची जातियों को ऊँची जातियों के बराबर उठाना होगा। अच्छा, तो वह योजना -वह प्रणाली क्या है ? उस आदर्श का एक छोर ब्राह्मण है और दूसरा छोर दलित, और सम्पूर्ण कार्य दलित को उठाकर ब्राह्मण बनाना है । ५/१८८[यही 'BE AND MAKE' का निहितार्थ है!] 
" इसी वर्ण-व्यवस्था प्रणाली से सभी जातियाँ धीरे धीरे उठेंगी। आज जो हजारों जातियाँ हैं, उनमें से कुछ तो ब्राह्मणों में शामिल भी हो रही हैं। कोई जाति अगर (अपना चरित्र निर्माण करके) अपने को ब्राह्मण कहने लगे तो इस पर कोई क्या कर सकता है ? जाति-भेद कितना भी कठोर क्यों न हो, वह इसी रूप में क्रमशः सृष्ट होता गया है ! और शंकराचार्य आदि शक्तिशाली युग-प्रवर्तक नेता ही बड़े बड़े वर्ण-निर्माता थे। कभी कभी उन्होंने दल के दल 'बलूच' लोगों (बलूचिस्तान में रहकर भी भारत माता की जय कहने वाले आधुनिक 'ब्रह्मदग बुगती' 10 साल पहले पाकिस्तानी आर्मी द्वारा एनकाउंटर में मारे गए बलूच राष्ट्रवादी नेता, नवाब अकबर खान बुगती के पोते और बलूच रिपब्लिकन पार्टी के नेता) को क्षणभर में क्षत्रिय बना डाला! दल के दल धीवरों (मछुओं) को लेकर क्षणभर में ब्राह्मण बना दिया। वे सब ऋषि मुनि थे,(ब्रह्म को जानकर ब्रह्मविद मनुष्य बन चुके थे) और हमें उनकी स्मृति के सामने अपने सिर को झुकाना ही होगा। (नहीं तो इब्लीस के सामान शैतान बन जाओगे !)
तुम्हें भी ऋषि बनना होगा -अपने मनुष्य जीवन को सार्थक करने का यही गूढ़ रहस्य है। न्यूनाधिक सबको ही ऋषि होना होगा। ऋषि के क्या अर्थ हैं ? ऋषि का अर्थ है पवित्र आत्मा। पहले पवित्र बनो (देह, इन्द्रिय,मन पर विजय प्राप्त करके आत्मसाक्षात्कार कर लो), तभी तुम शक्ति पाओगे। 'मैं ऋषि हूँ '(अहं
ब्रह्मsस्मि, या मैं ब्राह्मण हूँ !) कहने मात्र से न होगा, किन्तु जब तुम यथार्थ ऋषित्व (नेतृत्व) लाभ करोगे (अपना ईश्वरत्व कभी नहीं भूलोगे और सदा पवित्र जीवन जीने लगोगे) - तो देखोगे, दूसरे आप ही आप तुम्हारी आज्ञा मानते हैं। तुम्हारे भीतर से कुछ रहस्यमय वस्तु निःसृत होती है, जो दूसरों को तुम्हारा अनुसरण करने को बाध्य करती है। जिससे वे तुम्हारी आज्ञा का पालन करते हैं। यहाँ तक कि अपनी इच्छा के विरुद्ध अज्ञात भाव से वे तुम्हारी योजना (मनुष्य बनो और बनाओ योजना) की कार्यसिद्धि में सहायक होते हैं। और यही ऋषित्व है !" ५/ १८९ 
इसीलिये उन्होंने कहा था - " अपने निम्न श्रेणी वाले भाइयों के प्रति हमारा एकमात्र कर्तव्य  है -उनको शिक्षा देना, उनके खोये हुए श्रद्धा को लौटाकर, उनके व्यक्तित्व के विकास के लिए सहायता करना। मनुष्य को सदैव दुर्बलता की याद कराते रहना उसकी दुर्बलता का प्रतिकार नहीं है-बल्कि उसे अपने बल का (अपनी अंतर्निहत अनंत शक्ति का) स्मरण करा देना ही उसके प्रतिकार का उपाय है। उनमें जो बल पहले से ही विद्यमान है - उसका उन्हें स्मरण करा दो ! "
" ब्राह्मण जाति का कर्तव्य है कि वह भारत की दूसरी जातियों के उद्धार की चेष्टा करे। यदि वह ऐसा करती है और जब तक ऐसा करती रहती है, तभी तक वह ब्राह्मण है। और अगर वह (रिटायरमेंट के बाद भी ) धन कमाने के चक्कर में पड़ी रहती है तो वह ब्राह्मण नहीं है। युगों से संचित 'शिक्षा और संस्कृति'  जिनके ब्राह्मण संरक्षक होते आये हैं, अब साधारण जनता को देना पड़ेगा। ....इधर ब्राह्मणेत्तर जातियों से कहता हूँ, ठहरो, जल्दी मत करो, ब्राह्मणों से लड़ने का मौका मिलते ही उसका उपयोग मत करो। ... तुम्हें आज
संस्कृत सीखने और आध्यात्मिकता का उपार्जन करने से कौन रोक सकता है ? अपने ही घर में इस तरह लड़ते-झगड़ते न रहकर -जो कि पाप है, ब्राह्मणों के समान संस्कार प्राप्त करने के लिये अपनी सारी शक्ति लगा दो। तुम क्यों संस्कृत के पण्डित नहीं होते ? जिस समय तुम यह कार्य करोगे, उसी क्षण तुम
 ब्राह्मणों के बराबर हो जाओगे। भारत में शक्ति-लाभ का यही रहस्य है ! " ५/१९१ 
स्वामी जी ने इसी ढंग की समाज-सेवा करने की प्रेरणा दी है। वे कहते हैं -" भारत में किसी प्रकार का सुधार या उन्नति की चेष्टा करने के पहले धर्म-प्रचार आवश्यक है। सर्वप्रथम, हमारे उपनिषदों, पुराणों और अन्य सब शास्त्रों में जो अपूर्व सत्य छिपे हुए हैं, उन्हें सब ग्रन्थों के पन्नों से बाहर निकालकर, मठों की चहारदीवारियाँ भेदकर, वनों-आश्रमों से बाहर निकालकर, कुछ सम्प्रदाय-विशेषों के हाथों से छीनकर
 देश में सर्वत्र बिखेर देना होगा।
 ताकि ये सत्य दावानल के समान सारे देश को चारों ओर से लपेट लें -उत्तर से दक्षिण और पूर्व  पश्चिम तक सब जगह फ़ैल जायें -हिमालय से कन्याकुमारी और सिन्धु से ब्रह्मपुत्र तक सर्वत्र वे धधक उठें । सबसे पहले हमें यही करना होगा-  " पहले इसे सुनना होगा, फिर मनन करना होगा और उसके बाद निदिध्यासन " 
और जो भी व्यक्ति अपने शास्त्रों के महान सत्यों को -(चार महावाक्यों को) दूसरों को सुनाने में सहायता पहुँचायेगा -वह आज एक ऐसा कर्म करेगा, जिसके समान कोई दूसरा कर्म ही नहीं है। महर्षि व्यास ने कहा है, " इस कलियुग में मनुष्यों के एक ही कर्म शेष रह गया है। आजकल यज्ञ और कठोर तपस्याओं का कोई फल नहीं होता। इस समय दान ही एकमात्र कर्म है। और दानों में धर्मदान, अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान का दान ही सर्वश्रेष्ठ है। 
[ अतः जो युवा श्रीरामकृष्ण पताका (महामण्डल ध्वज) को हाथ में लेकर सारे भारत को यह सुनायेगा
 कि 'स्वामी विवेकानन्द के गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस ही आधुनिक युग में ब्रह्म के अवतार हैं ! केवल वेदान्त की दृष्टि से नहीं, साक्षात् !' वही सर्वश्रेष्ठ समाज-सेवा, विद्या और अविद्या में समन्वय रखने की आध्यात्मिक युक्ति को समझकर अपना जीवन सार्थक कर सकेगा।] "५/११६ पराशरस्मृतिः १/२३ में भी कहा गया है -  
तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानं उच्यते ।
द्वापरे यज्ञं एवाहुः दानं एव कलौ युगे ।। 
 " इसीलिये, मेरे मित्रो, मेरा विचार है कि मैं भारत में कुछ ऐसे शिक्षालय (पाठचक्र और युवा प्रशिक्षण शिविर) स्थापित करूँ, जहाँ हमारे नवयुवक अपने शास्त्रों के ज्ञान में दीक्षित होकर भारत तथा भारत के बाहर अपने धर्म का प्रचार कर सकें। 
' मनुष्य' , केवल मनुष्य भर चाहिये। बाकि सब कुछ अपने आप ही हो जायेगा। आवश्यकता है वीर्यवान, तेजस्वी, श्रद्धा-सम्पन्न और दृढ़विश्वासी निष्कपट नवयुवकों की। ऐसे सौ मिल जायें, तो संसार का कायाकल्प हो जाय। इच्छाशक्ति संसार में सबसे बलवती है। उसके सामने दुनिया की कोई चीज नहीं ठहर सकती; क्योंकि वह भगवान -साक्षात श्रीठाकुर जी के पास से आती है। विशुद्ध और दृढ़ इच्छाशक्ति सर्वशक्तिमान है! क्या तुम इसमें विश्वास नहीं करते ? सबके समक्ष अपने धर्म के सनातन सत्यों का प्रचार करो, संसार इसकी प्रतीक्षा कर रहा है!" ५/११८
 श्रीरामकृष्ण कहते थे- " कुछ तख्ते इस प्रकार की लकड़ियों से बने होते हैं कि उस पर यदि एक कौवा भी बैठ जाये तो वह डूब जाता है; पर कुछ तख्ते ऐसी लकड़ियों से बने होते हैं जो स्वयं डूबे बिना अपने साथ- साथ अपने ऊपर लदे बोझ को भी नदी के उस पार तक पहुँचा सकते हैं। "
जो लोग मनुष्य जाति के सच्चे नेता होते हैं -वे इसी प्रकार के न डूबने वाले तख्ते जैसे होते हैं। वे दूसरों के भार (५ अभ्यासों के लिए अनुप्रेरित करते रहने के दायित्व) को भी अपने कन्धों पर उठा लेते हैं। तथा इसके बदले में वे कोई पारिश्रमिक, लाभ या पुरष्कार पाने की आशा नहीं रखते बल्कि केवल लोक-कल्याण की इच्छा से दूसरों का भार उठाते हैं ।
उनके सामने जीवन का केवल एक ही लक्ष्य रहता है - दूसरों की उन्नति, सुधार, विकास, समानता और पूर्णत्व को अभिव्यक्त करने में सहायता करना, तथा इस उद्देश्य के पीछे इच्छा और आग्रह का जो प्रेरणा श्रोत होता है, वह होता है -'LOVE'! प्रेम ही ईश्वर है ! भगवान प्रेमस्वरूप हैं, तभी तो वे मनुष्य को भगवान बनाने के लिये बार बार इस धरती पर मनुष्य के रूप में अवतरित होते रहते हैं ! (उसके हृदय में विद्यमान यह अनंत प्रेम उसे अपना ईश्वरत्व -या विष्णुत्व या नेतापन भूलने ही नहीं देता। हमारे हृदय में विद्यमान आधुनिक युग के भगवान श्रीठाकुर)
भागवत में जब तरुण श्रीकृष्ण अपने गोप मण्डली के बीच लीडरशिप या नेता की भूमिका निभा रहे थे, उस समय उनके मुख से एक बहुत सुन्दर श्लोक निकला है, (श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध के २२ वें अध्याय में श्लोक ३२-३५ ) - एक दिन भगवान श्रीकृष्ण बलराम जी और ग्वालबालों के साथ गौएँ चराते हुए वृन्दावन से बहुत दूर निकल गये । ग्रीष्म ऋतु थी। सूर्य की किरणें बहुत ही प्रखर हो रही थीं। परन्तु घने-घने वृक्ष के नीचे गौएँ विश्राम कर रही थीं। उन सबके  ऊपर वृक्ष के पत्ते छाता का काम कर रहे थे। वृक्षों को छाया करते देख किशोर श्रीकृष्ण ने ग्वाल बालकों का नेतृत्व करते हुए कहा - 
पश्यतैतान्महाभागान्परार्थैकान्तजीवितान् ।
वातवर्षातपहिमान्सहन्तो वारयन्ति नः ॥
अहो एषां वरं जन्म सर्व प्राण्युपजीवनम् ।
सुजनस्येव येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिनः ॥    
‘मेरे प्यारे मित्रों! देखो, ये वृक्ष कितने भाग्यवान हैं! इनका सारा जीवन केवल दूसरों की भलाई करने के लिये ही है। ये स्वयं तो हवा के झोंके, वर्षा, धूप और पाला - सब कुछ सकते हैं, परन्तु हम लोगों की उनसे रक्षा करते हैं । मैं कहता हूँ कि इन्हीं का जीवन सबसे श्रेष्ठ है। क्योंकि ये सब प्राणियों को उपजीवन (सहारा) देते हैं,अर्थात इनके द्वारा सब प्राणियों का जीवन-निर्वाह होता है। जैसे कोई सज्जन पुरुष किसी याचक को खाली नहीं लौटाता, वैसे ही ये वृक्ष भी लोगों को खाली हाथ न लौटाकर उन्हें कुछ न कुछ अवश्य देते हैं। वृक्ष किस प्रकार दूसरों के कल्याण में अपना सबकुछ न्योछावर कर देते हैं? यह सहब विस्तारपूर्वर समझाते हुए श्री कृष्ण आगे कहते हैं-
पत्रपुष्पफलच्छाया मूलवल्कलदारुभिः ।
गन्धनिर्यासभस्मास्थि तोक्मैः कामान्वितन्वते ॥
अर्थात् ये वृक्ष पत्र (पत्ती), पुष्प, फल, छाया, मूल (जड़), वल्कल (छाल), दारू या लकड़ी, गंध, निर्यास या गोंद, भस्म (राख), अस्थि (कोयला), तोक्म (बीज) आदि पदार्थों के द्वारा हमारा उपकार करते हैं। 
एतावत् जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु ।
प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेयआचरणं सदा ॥
इन वृक्षों की भाँति ही मनुष्य को 'प्राणैः अर्थैः धिया वाचा' अपने शब्दों के माध्यम से, अपनी धी या बुद्धि से, या अपने मन के द्वारा, और यदि आवश्यक हो तो प्राणैः - अपने जीवन का बलिदान या अर्थ का त्याग करके भी केवल सद्कर्म ही करना चाहिये। 
इतने सरल शब्दों में वे अपने गाय चराने वाले मित्रों के नेता के रूप में अपने भाइयों को मनुष्य जीवन की सार्थकता क्या है, उसे समझा रहे हैं। कहते हैं, मेरे प्यारे मित्रों! संसार में प्राणी तो बहुत हैं; परन्तु उनके जीवन की सफलता इतने में ही है-  कि जहाँ तक हो सके-इन वृक्षों की भाँति ही मनुष्य को 'प्राणैः अर्थैः धिया वाचा' अपने शब्दों या विचारों के माध्यम से, अपनी धी या बुद्धि से, या अपने मन के विवेक-विचार से, अर्थ का त्याग करके, और आवश्यकता पड़ने पर- प्राणैः, अर्थात अपने प्राणों की आहुति देकर भी केवल ऐसे  कर्म किये जायँ, जिनसे दूसरों की भलाई हो। यही तो है संसार के समस्त धर्मों में निहित गूढ़ तत्व, या धर्म का वास्तविक रहस्य ! जैसा कि महाभारत में कहा है - 
वेदाहं जाजले धर्मं सरहस्यं सनातनम्।
सर्वभूतहितं मैत्रं पुराणं यं जना विदुः।।
 - हे जाजले ! मुझे सनातन धर्म सार-तत्व का पता चल गया है । वह क्या है ? जो व्यक्ति सर्वभूतों के सुहृत हैं और निरन्तर समस्त जीवों का हित करने में लगे रहते हैं, वास्तव में उन्हीं को धर्मज्ञ कहा जा सकता है। जो लोग सच्चे धर्मज्ञ हैं, जो सनातन या प्राचीनतम धर्म को सर्वभूत के लिये हितकर रूप में जान लेते हैं, (जैसे जाजले ऋषि जानते थे) वे अपने निकट आने वाले मनुष्यों को भी यही सनातन धर्म समझाते हैं -अर्थात सभी मनुष्यों के लिए मंगल कामना करने और सभी मनुष्यों से प्रेम करने की ही शिक्षा देते हैं। (वे कभी आतंकी जाकिर नाईक के जैसा किसी को सुसाईड बॉम्बर बनने की सीख नहीं दे सकते हैं।)
जीवन को सार्थक बनाने के विषय में स्वामी विवेकानन्द भी हमें ठीक ऐसी ही सलाह देते हैं । वे कहते हैं- "यह जीवन क्षणस्थायी है, संसार के भोग-विलास की सामग्रियाँ भी क्षणभंगुर हैं। वे ही यथार्थ में जीवित हैं, जो दूसरों के लिये जीवन धारण करते हैं। बाकि लोगों का जीना तो मुर्दों की तरह जीने जैसा है। "  
जब सनातन धर्म के इस गूढ़ रहस्य को हमलोग अच्छी तरह से समझ लिये हैं, तब हमारे आस-पास जितने युवा भाई रहते हैं, उनके हृदय में भी धर्म-ज्ञान की इस ज्योति को प्रज्ज्वलित करने का प्रयत्न करना चाहिये।किन्तु दूसरों के मन को परिवर्तित करने का कार्य वही व्यक्ति कर सकता है, जिसने स्वयं अपने मन को को वशीभूत कर लिया हो! क्योंकि सच्चे नेता का कार्य दुर्बल मन को बलशाली मन में परिवर्तित करने का ही होता है। 
साधारण ढंग की समाज सेवा -चन्दा माँगकर या अपने धन से भोजन-वस्त्र आदि से बाढ़ पीड़ितों तक या जरूरत-मन्दों तक पहुँचा देने का कार्य बहुत सी समाजसेवी संस्थायें और सरकारी एजेंसियाँ करती ही रहती हैं। और ऐसा करना बहुत अच्छा भी है, किन्तु सबसे उत्कृष्ट समाज सेवा है, दूसरों के मन को उन्नत बना देना। ताकि हमारे युवा भाई उच्च और महान विचारों को आत्मसात करके स्वयं यथार्थ मनुष्य बन जायें और दूसरों को भी 'मनुष्य' बनने में सहायता कर सकें।
उन्होंने सुस्पष्ट रूप से भविष्यवाणी करते हुए  कहा था - [" आध्यात्मिकता की बाढ़ आ गयी है। निर्बाध, निःसीम, सर्वग्रासी उस प्लावन को मैं भूपृष्ठ पर अवतरित होता देख रहा हूँ। इस ज्वार ने लगभग सम्पूर्ण विश्व को ही ढक लिया है। अब इसे कोई रोक नहीं सकता, कोई भी शक्ति इन प्रेम-तरंगों को फिर से वापस समुद्रतल में ढकेल नहीं सकती। यह ज्वार आगे बढ़ते हुए सम्पूर्ण धरातल को आच्छादित कर लेगा, ये विचार सभी के मस्तिष्क में प्रविष्ट हो जायेंगे, सम्पूर्ण मनुष्य जाति (जाति-धर्म का भेदभाव किये बिना) इन विचारों से प्रभावित हो जायेगी। "]  
" हमारी साधारण जनता अपने अन्तर्निहित ब्रह्मत्व  के प्रति ज्यों-ज्यों जागृत-दर-जागृत होती जाएगी, और इसी जन-जागरण के दौरान वह यदि अपेक्षित 'शिक्षा और संस्कृति'  भी अर्जित कर लेती है, तो उस बाढ़ का हिलोरा उतर जाने के बाद, 'ह्यूमैन अल्लुवियम' अर्थात यथार्थ मनुष्य (ब्रह्मविद मनुष्य) रूपी जलोढ़क जमाव (एलुवियल डिपाजिट) द्वारा यह भारत भूमि अत्यन्त उपजाऊ बन जायेगी। और यह उर्वरता ऐसे हजारों सुंदर फूलों को खिला देगी, जो स्वयं मुरझा जाने से पहले, एक एक सर्वाधिक पुष्टिकर फलों (ब्रह्मविद्तर मनुष्यों-नोबल सिक्स हंड्रेड ) को जन्म देते जायेंगे
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 विवेकानन्द के शक्तिदायी विचार ! 
  1. एक शब्द में वेदान्त का आदर्श है, 'मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप में जानना,' और उसका सन्देश यह है कि - यदि तुम अपने भाई मनुष्य की, व्यक्त ईश्वर की उपासना नहीं कर सकते तो उस ईश्वर की कल्पना कैसे कर सकोगे, जो अव्यक्त है ? 
  2. अपने निम्न श्रेणी वाले भाइयों के प्रति हमारा एकमात्र कर्तव्य  है -उनको शिक्षा देना, उनके खोये हुए श्रद्धा को लौटाकर, उनके व्यक्तित्व के विकास के लिए सहायता करना। 
  3. मनुष्य को सदैव दुर्बलता की याद कराते रहना उसकी दुर्बलता का प्रतिकार नहीं है- बल्कि उसे अपने बल का (अंतर्निहित ब्रह्मत्व का) स्मरण करा देना ही उसके प्रतिकार का उपाय है। उनमें जो बल पहले से ही विद्यमान है - उसका उन्हें स्मरण करा दो! 
  4.  भारत में किसी प्रकार का सुधार या उन्नति की चेष्टा करने के पहले धर्म-प्रचार आवश्यक है। सर्वप्रथम, हमारे उपनिषदों, पुराणों और अन्य सब शास्त्रों में जो महान सत्य छिपे हुए हैं, उन्हें सब  ग्रन्थों के पन्नों से बाहर निकालकर, मठों की चहारदीवारियाँ भेदकर, वनों-आश्रमों से बाहर  निकालकर, कुछ सम्प्रदाय-विशेषों के हाथों से छीनकर देश में सर्वत्र बिखेर देना होगा।
  5. ताकि ये सत्य दावानल के समान सारे देश को चारों ओर से लपेट लें -उत्तर से दक्षिण और पूर्व  पश्चिम तक सब जगह फ़ैल जायें -हिमालय से कन्याकुमारी और सिन्धु से ब्रह्मपुत्र तक सर्वत्र वे धधक उठें । 
  6. सबसे पहले हमें यही करना होगा।
  7.  अत्यधिक भावुकता कार्य में बाधा उत्पन्न करती है, 'वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि' हमारा मूलमंत्र होगा।"
  8.  धर्म एक ऐसी वस्तु है जो, ' पशु-मानव को मनुष्य में और मनुष्य को परमात्मा  में उन्नत कर देता है! धर्म का मुख्य सिद्धांत ही है -क्रमविकासवाद ! नाना प्रकार की अवस्थाओं (द्वैत-विशिष्टाद्वैत-अद्वैत) में से होकर आत्मा उच्चतम लक्ष्य तक पहुँचती है। 
  9. आजकल मूर्ति-पूजा को गलत बताने की प्रथा सी चल पड़ी है, और सब लोग बिना किसी आपत्ति के उसमें विश्वास भी करने लग गये हैं। यदि मूर्ति-पूजा के द्वारा श्रीरामकृष्ण परमहंस जैसे महापुरुष का निर्माण हो सकता है,तो और हजारों मूर्तियों की पूजा करो। जिस किसी भी उपाय से हो सके, लाखों की संख्या में इसी प्रकार के मनुष्यों का निर्माण करो !  
  10. 'मनुष्य', केवल (श्रीरामकृष्ण जैसा) मनुष्य भर चाहिये। बाकि सब कुछ अपने आप ही हो जायेगा। आवश्यकता है वीर्यवान, तेजस्वी, श्रद्धा-सम्पन्न और दृढ़विश्वासी निष्कपट नवयुवकों की। ऐसे सौ मिल जायें, तो संसार का कायाकल्प हो जाय।
  11. परन्तु वत्स इस (मनुष्य बनने के) मार्ग में बाधाएँ भी हैं। जल्दीबाजी से कोई काम नहीं होता। पवित्रता, धैर्य और अध्यवसाय (3P) इन्हीं तीन गुणों से सफलता मिलती है, और सर्वोपरि है प्रेम। यदि तुम पवित्र और निष्कपट हो तो सब काम ठीक हो जायेंगे। 
  12. हमें तुम्हारे जैसे हजारों की आवश्यकता है, जो श्रीरामकृष्ण पताका (महामण्डल ध्वज) हाथ में लेकर समाज पर टूट पड़ें और जहाँ कहीं वे जायें, वहीँ नये जीवन और नयी शक्ति का संचार कर दें!
  13. श्रीरामकृष्ण कहते थे- " कुछ तख्ते इस प्रकार की लकड़ियों से बने होते हैं कि उस पर यदि एक कौवा भी बैठ जाये तो वह डूब जाता है; पर कुछ तख्ते ऐसी लकड़ियों से बने होते हैं जो स्वयं डूबे बिना अपने साथ- साथ अपने ऊपर लदे बोझ को भी नदी के उस पार तक पहुँचा सकते हैं।"
  14. उपनिषद के चार महावाक्य- 'अहं ब्रह्मास्मि', 'तत त्वम् असि', 'सर्वं खलु इदं ब्रह्म' -संम्पूर्ण मानव जाति को पुनरुज्जीवित करने के लिए रामबाण दवा  या संजीवनी बूटी के समान हैं, जिन्हें हृदयंगम कर लेने पर प्रत्येक मनुष्य आत्मस्थ हो सकता है, और मृत्यु के भय को सदा के लिए समाप्त कर सकता है! 
  15. पहले इसे सुनना होगा, फिर मनन करना होगा और उसके बाद निदिध्यासन " 
  16.  प्रत्येक स्त्री-पुरुष वही आत्मा हैं; कोई विकसित है कोई अविकसित है। अन्तर प्रकार में नहीं, केवल परिमाण में है। आत्मा की इस अनन्त शक्ति का प्रयोग जड़ वस्तु (शरीर-Hand)  पर होने से - भौतिक उन्नति होती है, विचार (Head) पर होने से बुद्धि का विकास होता है, और अपने (हृदय-Heart) पर ही होने से मनुष्य स्वयं परमात्मा में रूपान्तरित हो जाता है।
  17.  'पहले हम स्वयं ईश्वर बनने का प्रयत्न करें, ततपश्चात दूसरों को भी ईश्वर बनने में सहायता देंगे। 
  18. ' बनो और बनाओ'-- यही हमारा मूल-मन्त्र रहे ! " फर्स्ट, लेट अस बी गॉड्स, ऐंड देन हेल्प अदर्स टु बी गॉड्स ! "बी ऐंड मेक "- लेट दिस बी आवर मोटो !
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[ क्योकि पहले मुद्रण की व्यवस्था न होने से इन को एक दुसरे से सुन- सुनकर याद रखा गया इस प्रकार वेद प्राचीन भारत के वैदिक काल की वाचिक/श्रुति = श्रवण परम्परा (oral tradition) की अनुपम कृति है जो पीढी दर पीढी पिछले चार-पाँच हजार वर्षों से चली आ रही है । वेद के पठन-पाठन के क्रम में गुरुमुख से श्रवण एवं याद करने का वेद के संरक्षण एवं सफलता की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्व है।  वेदों को अपौरुषेय (जिसे कोई व्यक्ति न कर सकता हो, यानि ईश्वर कृत) माना जाता है। इसीलिये यूनेस्को ने ७ नवम्बर २००३ को वेदपाठ को " मानवता की मौखिक एवं अमूर्त विरासत" की श्रेष्ठ कृति घोषित किया । 
पहला महावाक्य ऋग्वेद के ऐतरेय उपनिषद में उद्धृत किया गया है , जिसे ' लक्षणा वाक्य ' भी कहा गया है। इसका संबंध ब्रह्म की शाश्वत चैतन्यता (स्पंदन) से है , क्योंकि इसमें ब्रह्म को चैतन्य (शाश्वत स्पंदन) रूप में अनुभव किया गया है। दूसरा महावाक्य यजुर्वेद के वृहदारण्यक उपनिषद से लिया गया है। इसकी खासियत यह है कि इसमें यह जताने की कोशिश की गई है कि हम सभी ब्रह्म (अहं ब्रह्मास्मि) हैं। इसे 
' अनुभव वाक्य ' भी कहते हैं और इसके मूल स्वरूप को सिर्फ अनुभव के जरिए हासिल किया जा सकता है।
तीसरा महावाक्य सामवेद के छांदोग्य उपनिषद से लिया गया है। इस महावाक्य ' तत त्वम असि ' का मतलब यह है कि सिर्फ मैं ही ब्रह्म नहीं हूं , तुम भी ब्रह्म हो , बल्कि विश्व की हर वस्तु ही ब्रह्म है। इसे उपदेश वाक्य भी कहा जाता है। यह उपदेश वाक्य इसलिए भी कहा जाता है , क्योंकि इसके जरिए गुरु अपने शिष्यों में अहंकार को रोकते हैं। साथ ही , वह दूसरों के प्रति आदर की भावना को भी पैदा करते हैं।चौथा महावाक्य अथर्ववेद मुंडक उपनिषद से लिया गया है। इस महावाक्य के जरिए यह जताने की कोशिश हुई है कि जो कुछ भी अनुभव में आ रहा है, सब कुछ ब्रह्म ही है। दरअसल , यह अद्वैतवाद के सिद्धांत को प्रतिपादित करता है और परम सत्य के बड़े स्वरूप की जानकारी देता है , इसलिए इसे 
'अनुसंधान वाक्य ' भी कहा जाता है। 'वेद' शब्द संस्कृत भाषाके'विद् ज्ञाने' धातु से करणार्थ मे घञ् प्रत्यय लगने से ज्ञानार्थक वेद शब्द बना है, इस तरह वेदका शाब्दिक अर्थ है - 'ज्ञान के ग्रंथ'।  इसी धातु से 'विदित' (जाना हुआ), 'विद्या'(ज्ञान), 'विद्वान' (ज्ञानी) जैसे शब्द आए हैं। ऐसा माना जाता है कि प्राचीन काल में अग्नि, वायु, आदित्य और अङ्गिरा ऋषियों को वेदों का ज्ञान मिला जिसके बाद सात ऋषियों (सप्तर्षि) को ये ज्ञान मिला - इसका उल्लेख गीता में हुआ है। ऐतिहासिक रूप से ब्रह्माउनके पुत्र बादरायण और पौत्र व्यास और अन्य यथा जैमिनी,पतञ्जलि, मनु, वात्स्यायन, कपिल, कणाद आदि मुनियों को वेदों का अच्छा ज्ञान था। ऐतिहासिक रुप से किसी व्यक्ति को  गुरु या आचार्य बनने के लिये वेदान्त की पुस्तकों पर टीकाएँ या भाष्य लिखने पड़ते हैं। इन पुस्तकों में तीन महत्वपूर्ण पुस्तक शामिल हैं उपनिषद, भगवद गीता और ब्रह्मसूत्र, जिन्हें प्रस्थानत्रयी कहते हैं। 
पहले यह वेद ग्रन्थ एक ही था जिसका नाम यजुर्वेद था- एकैवासीद् यजुर्वेद चतुर्धाः व्यभजत् पुनः वही यजुर्वेद पुनः ऋक् यजुस् सामःके रूपमे प्रसिद्ध हुआ फिर उसमें अथर्व भी शामिल हो गया। 
वानप्रस्थ या संन्यास आश्रम में प्रवेश करने पर आरण्यकों की आवश्यकता होती थी, वन में रहते हुए लोग जीवन तथा जगत् की पहेली को सुलझाने का प्रयत्न करते थे। यही उपनिषद् के अध्ययन तथा मनन की अवस्था थी।  उपनिषदों में वेदों का ‘अन्त’ अर्थात् वेदों के विचारों का परिपक्व रूप है, जो व्यक्ति को ज्ञान प्राप्ति की दिशा में उत्प्रेरित करता है। 
वेदादि में विधिपूर्वक अध्ययन, मनन तथा उपासना आदि के अन्त में जो तत्त्व जाना जाये उस तत्त्व का विशेष रूप से यहाँ निरूपण किया गया हो, उस शास्त्र को ‘वेदान्त’ कहा जाता है। यह माना जाता था कि वेद-वेदांग आदि सभी शास्त्रों का अध्ययन कर लेने पर भी बिना उपनिषदों की शिक्षा प्राप्त किये हुए मनुष्य का ज्ञान पूर्ण नहीं होता है। बादरायण व्यास ने ब्रह्मसूत्र की रचना की जिसे वेदान्त सूत्र, शारीरकसूत्र, शारीरक- मीमांसा या उत्तरमीमांसा भी कहा जाता है। इसमें उपनिषदों के सिद्धान्तों को अत्यन्त संक्षेप में, सूत्र रूप में संकलित किया गया है।यह ज्ञान सृष्टि कर्ता ब्रह्मा जी द्वारा विराट-पुरुष  या कारण-ब्रह्म (अवतार?) से श्रुति-परम्परा के माध्यम से प्राप्त किया हुआ माना जाता है।
विराट पुरुष : स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रतिपादित विशिष्टाद्वैत वेदान्त के अनुसार ' तुम्हीं ब्रह्म रामकृष्ण'। रामकृष्ण तुम विराट पुरुष धारण प्रेम की  काया (यू ट्यूब में)। अपरब्रह्म ब्रह्म का वो रूप है, जिसमें अनन्त शुभ गुण हैं । वो पूजा का विषय है, इसलिये उसे ही ईश्वर माना जाता है । अद्वैत वेदान्त के मुताबिक ब्रह्म को जब इंसान मन और बुद्धि से जानने की कोशिश करता है, तो ब्रह्म माया की वजह से ईश्वर हो जाता है  
ब्रह्म या विराट पुरुष स्वतंत्र तत्व है। 
सच्चिदानंद श्री रामकृष्ण ही ब्रह्म हैं और जीव तथा जगत्‌ उनके अंश हैं। वही " अणोरणीयान्‌ तथा महतो महीयान्‌"  है। वह एक भी है, नाना भी है। वही अपनी इच्छा से अपने आप को जीव और जगत्‌ के नाना रूपों में प्रकट करता है। माया उसकी शक्ति है जिसी सहायता से वह एक से अनेक होता है। परंतु अनेक मिथ्या नहीं है। श्रीठाकुर जी  से जीव-जगत्‌ की स्वभावत: उत्पत्ति होती है। इस उत्पत्ति से श्री रामकृष्ण में कोई विकार नहीं उत्पन्न होता। जीव-जगत्‌ तथा ईश्वर का संबंध चिनगारी आग का सबंध है। ईश्वर के प्रति स्नेह भक्ति है। सांसारिक वस्तुओं से वैराग्य लेकर ईश्वर में राग लगाना जीव का कर्तव्य है। ईश्वर के अनुग्रह से ही यह भक्ति प्राप्य है, भक्त होना जीव के अपने वश में नहीं है। ईश्वर जब प्रसन्न हो जाते हैं तो जीव को (अंश) अपने भीतर ले लेते हैं या अपने पास नित्यसुख का उपभोग करने के लिए रख लेते हैं। इस भक्तिमार्ग को पुष्टिमार्ग भी कहते हैं। 
संसार उसी का प्रकाश है अत: मिथ्या नहीं है। मोक्ष में जीव का अज्ञान नष्ट होता है पर संसार बना रहता है। सारी अभिलाषाओं को छोड़कर श्री रामकृष्ण का अनुसेवन ही भक्ति है। वेदशास्त्रानुमोदित मार्ग से ईश्वरभक्ति के अनंतर जब जीव ईश्वर के रग में रँग जाता है तब वास्तविक भक्ति होती है जिसे रुचि या रागानुगा भक्ति कहते हैं। राधा (विवेकानन्द) की भक्ति सर्वोत्कृष्ट है। वृंदावन धाम (कामारपुकुर) में सर्वदा श्री रामकृष्ण का आनंदपूर्ण प्रेम प्राप्त करना ही मोक्ष है।
कारण ब्रह्म :  या परम् आत्मा (संस्कृत : ब्रह्मन्) हिन्दू (वेद परम्परा, वेदान्त और उपनिषद) दर्शन में इस सारे विश्व का परम सत्य है और जगत का सार है । वो दुनिया की आत्मा है । वो विश्व का कारण है, जिससे विश्व की उत्पत्ति होती है , जिसमें विश्व आधारित होता है और अन्त मे जिसमें विलीन हो जाता है । वो एक और अद्वितीय है । वो स्वयं ही परमज्ञान है, और प्रकाश-स्त्रोत की तरह रोशन है। वो निराकार, अनन्त, नित्य और शाश्वत है । ब्रह्म सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है । ब्रम्ह हिन्दी में ब्रह्म का ग़लत उच्चारण और लिखावट है । परब्रह्म या परम-ब्रह्म ब्रह्म का वो रूप है, जो निर्गुण और असीम है । "नेति-नेति" करके इसके गुणों का खण्डन किया गया है, पर ये असल मे अनन्त सत्य, अनन्त चित और अनन्त आनन्द है । अद्वैत वेदान्त में उसे ही परमात्मा कहा गया है, ब्रह् ही सत्य है,बाकि सब मिथ्या है। 'ब्रह्म सत्यम जगन मिथ्या,जिवो ब्रम्हैव ना परः। ' वह ब्रह्म ही जगत का नियन्ता है।]
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