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शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना : प्रकाशकीय से ५ वें निबन्ध तक का सारांश

प्रकाशक का निवेदन 
प्रत्येक देश के मानव-समुदाय के समक्ष कुछ न कुछ समस्यायें, प्रत्येक युग में बनी ही रहती हैं। कभी कभी तो कोई समस्या राष्ट्रिय-संकट का रूप भी धारण कर लेती है। इन दिनों अधिकांश भारतीय ऐसा मानने लगे हैं कि हमारा देश एक भारी संकट के दौर से गुजर रहा है। गरीबी, अशिक्षा,चरित्र, नैतिकता और आम-जनता के प्रति सच्ची सहानुभूति का अभाव, दूसरों को हानी पहुँचाकर अपना स्वार्थ पूरा करने का निर्लज्ज प्रयास, मानवीय मूल्यों तथा आत्मविश्वास का घोर आभाव देखकर बहुत से लोगो के मन को दुःख पहुंचता है। किन्तु हममें से अधिकांश लोग अक्सर  इसके उपर दुःख प्रकट करने या प्रमुख राजनितिक दलों के नेताओं के दोषों को देखने-दिखाने की चेष्टा में वाट्सऐप पर तरह तरह के चुटकुलों का आदान-प्रदान करके अपनी देशभक्ति का परिचय देते हैं, किन्तु भारत के पुनर्निर्माण में अपनी जिम्मेदारी के ऊपर चुप्पी साधकर बैठ जाते हैं। 
हम लोग इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करते कि - केवल देश-वासियों की आन्तरिक शक्ति और संभावनाओं को विकसित करने से ही, देश की अवस्था में परिवर्तन होना संभव है। मनुष्य के आन्तरिक सम्भावनाओं के विकास की कोई सीमा नहीं है। उन संभावनाओं को रचनात्मक विचार तथा कठोर परिश्रम की सहायता से विकसित कर प्रयोग में लाने से, हमलोग समाज में बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।
स्वामी विवेकानन्द असाधारण हृदयवत्तामानव-प्रेम और मनीषा के अधिकारी महापरुष थे। उन्होंने मानव-समाज विशेष रूप से भारत के जन-जीवन के असीम दुःख-दैन्य के मूल कारण को समझा था, एवं उसमें आमूल परिवर्तन लाने का उपाय भी बतलाया था। मानव-समाज की अनेकों समस्याओं में से विशेष रूप से 'युवा समस्या' को देखकर समस्त विचार-शील व्यक्तियों का हृदय अधिक व्यथित होता है। किन्तु स्वामी विवेकानन्द ने  युवा-जीवन में ही,  सम्पूर्ण समाज की सम्यक उन्नति के बीज को निहित देखा था। तथा अपने देशवासियों के सर्वांगीन उन्नति के सपने को साकार करने के उद्देश्य से,उन्होंने समस्त युवाओं को  अपने व्यक्ति-जीवन की संभावनाओं को प्रस्फुटित करने का आह्वान किया था। इस पुस्तक में संकलित रचनाओं का उद्देश्य, स्वामी विवेकानन्द के उसी आह्वान को आम जनों तक, विशेष तौर पर युवाओं के समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करना है।
महामण्डल विगत ५० वर्षों से विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से यही कार्य करता चला आ रहा है। इसकी मासिक द्विभाषी पत्रिका ' विवेक-जीवन ' भी विगत ४८ वर्षों से प्रकाशित होती आ रही है। इस संकलन के अधिकांश लेख (कुछ को छोड़ कर) - ' विवेक-जीवन ' के विभिन्न अंकों में प्रकाशित सम्पादकीय के रूप में प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें से सभी सम्पादकीय लिखित भी नहीं हैं, कक्षा में बोले गये व्याख्यान को लिख कर बाद में सम्पादकीय रूप में प्रकाशित किया गया है। इसीलिये यह संभव है कि सम्पूर्ण पुस्तक में भाषा और भाव की अभिव्यक्ति एवं एकरूपता में कहीं कहीं अंतर दिखाई दे, और यह भी स्वाभाविक है कि कहीं कहीं किसी विषय का उल्लेख दुबारा भी हो गया हो। यदि इस संकलन में प्रकशित निबन्धों के अध्यन से थोड़े भी युवा विवेकानन्द के भाव को ग्रहण करने की प्रेरणा प्राप्त कर सकें तो हम सभी की मिहनत सार्थक हो जाएगी।
हिन्दी प्रकाशन की भूमिका 
यद्दपि १४ जनवरी १९८५ को ही 'विवेकानन्द ज्ञान मन्दिर' (युवा चरित्र-निर्माणकारी संस्था) के माध्यम से स्वामीजी का भाव झुमरीतिलैया (तब के बिहार अभी झारखण्ड ) में आविर्भूत हो चूका था। किन्तु चरित्र क्या है तथा चरित्र-निर्माण की पद्धति क्या है ? इस विषय में इस पुस्तक के अनुवादक को स्वयं कुछ भी ज्ञात नहीं था। किन्तु स्वामी जी की सत्येन्द्रनाथ मजूमदार द्वारा लिखित जीवनी 'विवेकानन्द चरित' को पढ़ने के बाद वह तीव्र ४४० वोल्ट के इलेक्ट्रिक शॉक का अनुभव कर रहा था। राँची रामकृष्ण आश्रम में कार्यरत पूज्य प्रमोद दा के परामर्श पर १९८७ के बेलघड़ीया में आयोजित वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर में इस अनुवादक ने महामण्डल का प्रथम कैम्प किया था। वहाँ उसने जीवन्त वेद स्वरूप पूज्य नवनी दा के मुख से विवेकानन्द के जीवन-गठनकारी विचारों तथा ' Be and Make ' की अद्भुत व्याख्या के अनुसार 'भारत निर्माण की योजना' को आश्चर्यचकित होकर सुना था। 
और उस शिविर से लौटने के बाद पूज्य नवनी दा के साथ पत्राचार होने के बाद 'झुमरीतिलैया विवेकानन्द ज्ञान मन्दिर' का विलय 'झुमरीतिलैया विवेकानन्द युवा महामण्डल ' में हो गया। तथा १९८८ के अप्रैल माह में, अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल का पहला बिहार राज्य-स्तरीय युवा प्रशिक्षण शिविर, झुमरीतिलैया में आयोजित हुआ। जिसमे महामण्डल के अध्यक्ष को छोड़कर महामण्डल एग्जीक्यूटिव कमिटी के सभी सदस्य उपस्थित थे।  
किन्तु इस भाव को समझकर, अपना जीवन गठित करने में पूर्व संस्कार भी बाधक होते हैं, जिनके साथ संघर्ष करके मन को वशीभूत करने में काफी समय लग जाता है। इसीलिये किसी हिन्दी-भाषी महामण्डल कर्मी को पूज्य ' नवनी दा' के द्वारा बंगला भाषा में लिखे इस ग्रन्थ का हिन्दी में अनुवाद करने का सौभाग्य, प्रथम बंगला संस्करण प्रकशित होने के पूरे २८ वर्ष बाद  मिल रहा है।
स्वामी विवेकानन्द के सार्धशतक जन्म जयंती के अवसर पर जो चतुर्थ संस्करण बंगला भाषा में प्रकाशित हुआ है, उसमें संकलित आठ नये निबन्धों का हिन्दी अनुवाद भी यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है। महामण्डल के इस मनुष्य निर्माणकारी और चरित्र-निर्माणकारी आन्दोलन से जुड़े हिन्दीभाषी युवा कार्य-कर्ताओं को अपना जीवन गठित करने की 'अद्भुत शिक्षा के अद्भुत शिक्षक श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय' की बंगला वाणी को हिन्दी में पढ़ने से स्वामी विवेकानन्द के आदर्श और उद्देश्य का अनुसरण करके अपना जीवन गठित करने में बहुत बड़ा संबल प्राप्त होगा।
इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर इस ग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद - ' झुमरीतिलैया विवेकानन्द युवा महामण्डल ' के ' विवेक-अंजन ' प्रकाशन कार्यालय से पुस्तकाकार में, किन्तु लागत मूल्य को देखते हुए अलग -अलग खण्डों में प्रकाशित किया जाने वाला है। (किन्तु जब तक यह पुस्तक प्रकाशित नहीं हो जाती है, इसके चुने हुए अंशों को महामण्डल के 'इन्टर स्टेट बी ऐंड मेक' वाट्सऐप पर ही प्रकाशित करने की चेष्टा करूँगा।  
(बिजय कुमार सिंह , महामण्डल का हिन्दी प्रकाशन विभाग,झुमरितेलैया (झारखण्ड): सितम्बर 2012 ) 
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[पूज्य नवनी दा लिखित इस पुस्तक में १० अध्याय हैं, पहले अध्याय का शीर्षक है, १.स्वामी विवेकानन्द -व्यक्ति और मन', इसके अन्तर्गत ९ निबन्धों को रखा गया है। दूसरे अध्याय का शीर्षक है -२.समस्या और समाधान' -इसके अन्तर्गत ६ निबन्ध हैं। तीसरे अध्याय का शीर्षक है -३.'स्वामी विवेकानन्द और युवा समाज', इसमें ४ निबन्ध हैं। चौथे अध्याय का शीर्षक है -'४. शिक्षा -समस्त रोगों की रामबाण औषधि है!' -इसके अन्तर्गत ४ निबन्ध हैं। पंचम अध्याय का शीर्षक है -'५.धर्म और समाज', इसके अंतर्गत १० निबन्ध है। छठा अध्याय है ६.'जीवन-गठन के साधन', इसके अंतर्गत भी १० निबन्ध हैं। सप्तम अध्याय है ७.'व्यावहारिक जीवन में आध्यात्मिकता'-इसके अंतर्गत ७ निबन्ध हैं। अष्टम अध्याय का शीर्षक है -८.'मनुष्य का मन', इसके अंतर्गत ३ निबन्ध हैं। नवम अध्याय का शीर्षक है -९.'समाज और सेवा', इसके अंतर्गत ७ निबन्ध हैं। दसवाँ अध्याय है -१०.'विश्वमानव के कल्याण में', इसके अंतर्गत ६ निबन्ध हैं । ] 
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प्रथम अध्याय :(व्यक्ति और मन):
निबन्ध १.' नवनी दा अतीत के नेता थे या भावी युग के ? का सिलेबस (syllabus) या पाठ्यक्रम : 
१.नवनी दा प्रतिपादित महामण्डल का कर्म-योग आन्दोलन -' BE AND MAKE ' का रहस्य है- मनुष्य मात्र में अन्तर्निहित ब्रह्मत्व (शाश्वत महानता) को उद्घाटित करा देना। क्योंकि " कई हजार ब्रह्मा एवं इन्द्रादि देवता भी ' बुद्धत्व-प्राप्त ' नर-देवता के चरणों में शीस झुकाते हैं तथा इस बुद्धत्व-प्राप्ति पर मानव-मात्र का अधिकार है। " 
२. बुद्धत्व प्राप्ति के इच्छुक गृहस्थों के लिए कामनाओं का त्याग करने का अर्थ है -कामनाओं का दास नहीं बनना, 'लस्ट ऐंड लूकर'-में आसक्ति नहीं रखना 'तेनत्यक्तेन भुंजीथा'।  
३. केवल भारत में ही धर्म, अर्थ और कामना के सानुपातिक (well-proportioned) व्यवहार करने की व्यवस्था थी। बल्कि मोक्ष को तो सभी मनुष्यों के लिये अनिवार्य भी नहीं माना गया था। हमारे ऋषियों ने 'चार वर्णों' (शूद्र,वैश्य, क्षत्रीय,ब्राह्मण) के विभिन्न धर्म अर्थात कर्तव्य के माध्यम से क्रमविकसित होने के उद्देश्य से, जातिप्रथा का निर्माण किया था, जो वंशानुगत नहीं, बल्कि गुणगत (सत-रज-तम) थी। 'चार पुरुषार्थ ' (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) और 'चार आश्रम' (ब्रह्मचर्य,गृहस्थ,वानप्रस्थ,संन्यास) के अनुसार सबों को, (शुद्र को भी) अपने अपने धर्म अर्थात कर्तव्य का पालन करते हुए एक 'चरित्रवान मनुष्य' बन जाने, अर्थात 'ब्राह्मण' तक उन्नत होने का समान अवसर प्राप्त था। 
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निबन्ध २. ' अनुसरण ही सच्चा स्मरण है ' का सिलेबस (syllabus) या पाठ्यक्रम : 
१. यदि हमलोग स्वामी विवेकानन्द के भाष्यकार पूज्य नवनी दा का स्मरण करना चाहते हो, तो विवेकानन्द का न सही, कम से कम नवनी दा का अनुसरण करने की चेष्टा तो हमें करनी ही चाहिये। क्योंकि यदि हमलोग नवनी दा का अनुसरण भी हमलोग नहीं कर सकें, तो उनके नाम पर आयोजित होने वाली समस्त स्मारक- सभायें निरर्थक सिद्ध होंगी। 
२. जो कोई महामण्डल कर्मी  नवनी दा का स्मरण करते हुए उनका अनुसरण भी करना चाहेगा, तो उसके मन में पहला प्रश्न यही उठेगा कि उनका अनुसरण किस प्रकार किया जाय ?  कहाँ और किस क्षेत्र में हम लोग नवनी दा का  अनुसरण कर सकते हैं ? यदि हम सचमुच उनका स्मरण करना चाहते हों, तो पहले यह विचार करना पड़ेगा कि उनका  (नवनी दा का ) मूल भाव (The main idea) क्या है ? 
३.हमलोगों को ऐसा प्रतीत होता है कि महामण्डल के वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर एवम  साप्ताहिक 'यूथ -स्टडीसर्कल' में नियमित रूप से भाग लेकर, मनुष्य का सही रूप में 'मनुष्य बन जाना' (মানুষ হয়ে ওঠা); या मनुष्य को सही 'मनुष्य बना देना' (--अर्थात व्यायाम,प्रार्थना,मनःसंयोग,विवेक-प्रयोग, स्वाध्याय आदि ५ दैनदिन अभ्यासों के द्वारा মানুষ করে তোলা) यही उनका मौलिक विचार (brainchild या अपना विचार) था। 
४. यदि केवल इन ५ सरल अभ्यासों को सीखकर,जीवन के किसी भी क्षेत्र में रहते हुए मनुष्य मात्र के लिए अपनी अंतर्निहित पूर्णता (डिविनिटी) को अभिव्यक्त कर के एक चरित्रवान मनुष्य या ब्राह्मण बन जाना सम्भव है, तब तो इस मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा को गांवों और शहरों में,पूरे भारतवर्ष में फैला देना चाहिए। इस विचार का उपयोग तो देश-काल (टाइम ऐंड स्पेस,स्थानिक दूरी एवं सामयिक दूरी ) की सीमारेखा  के परे जाकर भी किया जा सकता है।  क्योंकि मनुष्य की सत्ता (पूर्णता या आत्मा ) सभी देशों और सभी युग में एक ही रहती है। अतः उस सत्ता (पूर्णता) की अभिव्यक्ति विभिन्न देशों या विभिन्न युगों में अलग अलग हो सकती है।

५. यह पूर्णता ही देश-काल -पात्र के अनुसार अपने को ईसा, बुद्ध, मोहम्मद, नानक, कबीर, राम-कृष्ण, श्रीरामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, नवनी दा के रूप में अपने को अभिव्यक्त करती है ! इसीलिये कोई भी अवरोध, चाहे समस्त प्रकार की संकीर्णता हो, या विशिष्ट आदर्श की सीमा हो,इसे सीमित नहीं कर सकते। और नवनी दा महामण्डल चरित्र-निर्माणकारी आन्दोलन के माध्यम से सभी देशों के सभी मनुष्यों को उसकी पूर्णता को अभिव्यक्त करने की दिशा में अग्रसर होने में सहायता करना चाहते थे

६.उन्होंने लीडरशिप ट्रेनिंग के दौरान, अपने क्रमानुयायियों (Successor, उत्तराधिकारी भावी नेताओं) के सामने एक अभूतपूर्व अनुरोध (appeal) रखा था। उन्होंने कहा था- गरीबों को प्रकाश दो। किन्तु  जो लोग धन या विद्या के अहंकार (arrogance) में चूर हैं, वे भी कम करुणा के पात्र नहीं हैं। क्योंकि वे लोग समाज के उपेक्षित मनुष्यों (देवताओं) की सेवा करने का अवसर पा कर भी उसका सदुपयोग नहीं करते। और जो लोग गरीबों के शोषण से प्राप्त धन को खर्च करके शिक्षित हुए हैं, किन्तु पढ़-लिख लेने के बाद उनके सम्बन्ध में कुछ नहीं सोचते, उनको ही स्वामीजी ने देशद्रोही के रूप में चिन्हित किया था। उन्होंने कहा था कि जब तक उनके देश का एक कुत्ता भी भूखा है, उसको रोटी देना ही मेरा धर्म है। 

७. इसीलिये यदि हम उनका अनुसरण करना चाहते हों, तो हमलोगों के लिये इस बात को ठीक तरीके से समझ लेना आवश्यक है कि नवनी दा अपने सक्सेसर्स (उत्तराधिकारियों) से क्या चाहते थे ?  हमें यह उपलब्धी करनी होगी कि नवनी दा के चश्मा के भीतर से पेनीट्रेटिंग या भेदनकारी दृष्टि उनके अनन्त-जीवन के संग्राम का प्रतिक है। उनको स्मरण करना तभी सार्थक होगा जब हमलोग उनके मौलिक भाव "प्रत्येक मनुष्य में ब्रह्मवेत्ता मनुष्य बन जाने की सम्भावना है"  को समझने की चेष्टा करें तथा ५ अभ्यासों का पालन करके, यथार्थ मनुष्य बने और बनाएं। 

८. हमलोगों ने -व्यापक रूप में यह समाज क्या है, या प्रत्येक मनुष्य वास्तव में क्या है ; उसमें ब्रह्म को जानकर ब्रह्मविद मनुष्य बन जाने की अपार सम्भावना है -  इस दृष्टि से हमने उनके मौलिक भाव को (नवनी दा के ब्रेन्चाइल्ड -अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल को) समझने की चेष्टा ही नहीं की है। उनका अनुसरण करना तो अभी भी बड़े दूर की बात है। इसलिये नवनी दा के आगामी ८५ वीं जयन्ती १५ अगस्त २०१७  में उनको स्मरण करते समय, इन बातों को हमें भूलना नहीं चाहिये।

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निबन्ध ३.'स्वामीजी का मन' (স্বামীজির ভাব) ' का सिलेबस (syllabus) या पाठ्यक्रम : 
१. नवनी दा को स्मरण करना तभी सार्थक होगा जब हमलोग उनके मौलिक भाव (उनके मन में चिरस्थायी रूप से बने रहने वाले मनोभाव -प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है)- को समझने की चेष्टा करें तथा स्वयं उस मौलिक भाव का अनुसरण भी करें, भले ही वह कितने ही छोटे पैमाने पर क्यों न हो। मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य (ब्रह्म अवलोक धिषणं मनुष्य -ब्रह्मवेत्ता)  बना देना ही नवनी दा के मन का स्वाभाविक मनोभाव (প্রকৃত ভাব brainchild) या आदर्श था
२.नवनी दा की संगीत रागिनी- 'मोहे जाने को दे रे सइयाँ' में बार-बार दुहराया जाने वाला आलाप था- 'BE AND MAKE' योजना अर्थात " स्वयं मनुष्य बनो और दूसरों को मनुष्यत्व अर्जित करने में सहायता करो।"हममें से प्रत्येक व्यक्ति स्वयं यथार्थ मनुष्य बनने की चेष्टा करें, तथा यदि हमारी वह चेष्टा दूसरों को भी मनुष्य बनने में सहायता कर सके, तो इस विराट कार्य को बहुत छोटे पैमाने पर भी अपने हाथों में लिया जा सकता है। अपने आस-पास रहने वाले बच्चों-किशोरों-युवाओं- को नवनी दा द्वारा निर्देशित ५ दैनंदिन अभ्यासों में प्रशिक्षित करने के लिए छोटे से शिशु-संगठन, युवा-संगठन या नारी-संगठन के माध्यम से पहले स्वयं अग्रसर होकर ही उनका अनुसरण किया जा सकता है! नवनी दा जैसे 'गुरु-नेता' के अनुसरण करने के लिए एक मात्र पथ यही है। 
३. समाज का मूल मनुष्य है, इसीलिये यदि एक एक करके प्रत्येक मनुष्य को ही दोषरहित (faultless) या सच्चा मनुष्य (चरित्रवान) बना लिया जाय, तभी  एक परिवर्तित समाज सामने आ सकेगा। नवनी दा इस आदर्श या मौलिक मनोभाव का अनुसरण (एक उच्च स्तर की समाज-सेवा समझकर) किया जाय- तो जितने परिमाण में इस कार्य किया जायेगा, उसी परिमाण में समाज की मुखाकृति भी (पशुमानव से देवमानव में) परिवर्तित होती चली जाएगी। और यही है-सम्पूर्ण क्रांति अर्थात समाज में आमूल-चूल परिवर्तित लाने में समर्थ अध्यात्मिक क्रांति (Spiritual Revolution)! जीवन को पूर्ण रूप से विकसित कर लेने की सम्भावना एक अध्यात्मिक विषय है,तथा उस क्षमता (potential) को विकसित करने की चेष्टा ही,आध्यात्मिकता है।  तथा इस मौलिक विचार (भाव) को समाज के सभी क्षेत्रों में संचारित कर देना ही अध्यात्मिक क्रांति (विप्लव) है।(पशु मानव से देवमानव में उन्नत हो जाने की) क्षमता को भौतिकता के सैलाब में नहीं बहने देकर, उसको विकसित कर लेना ही इस आध्यात्मिक क्रांति का उद्देश्य होता है।
४. हमलोग नोटबन्दी आदि को लेकर या अन्य कई विषयों को लेकर कितनी ही बातों के लिये विप्लव करते रहते हैं। किन्तु मनुष्यों की जो सबसे अंदरूनी सत्ता है (innermost entity-आत्मा या पूर्णता है), जो सभी चीजों की नियन्ता है(controller) है- जिसके पूर्ण विकसित होने से मनुष्य सर्वशक्तिमान् बन जाता है,अपनी समस्त समस्यायों का समाधान करने में स्वयं समर्थ बन जाता है, उसी प्राणप्रद (जीवनदायी) भाव (वेदान्त के चार महावाक्यों) को सभी मनुष्यों के लिये उपलब्ध बना देने वाले आध्यात्मिक विप्लव से बचना चाहते हैं। हमलोग इस बात के उपर थोड़ा भी विचार नहीं करते कि वास्तव में यही तो है मनुष्य के विकास की क्रांति को दबाये रखना और उसके मार्ग में बाधाएँ खड़ी करना।
५. 'अपने प्राण की रक्षा करना '- समस्त प्राणियों का पहला धर्म होने पर भी,उत्तम प्राणी का पहला धर्म या कर्तव्य  'प्राण को विकसित करना' होता है। क्योंकि साधारण जीवों (Beasts) के क्षेत्र में जिसे अंतर्निहित प्रवृत्ति (সহজাত বৃত্তি' या Inherent Tendency) या  कहते है, मनुष्य के क्षेत्र में उसी को महत प्रवृत्ति (মহৎ প্রবৃত্তি 'Greater Tendency' महत बुद्धि-माँ) कहते हैं।
६.  यदि हमलोग मनुष्य के समाज को एक पशु-समाज में परिवर्तित होते नहीं देखना चाहते हों, तो हमें इसी वक्त इस बात को समझ लेना होगा कि केवल आध्यात्मिक विप्लव ही  इस कार्य (मनुष्य को निर्दोष बनाने के कार्य) को धरातल पर उतारने में - समर्थ हो सकता है।
७. स्वामीजी ने कहा था, 'मैं सुधार में नहीं स्वाभाविक उन्नति (growth) में विश्वास करता हूँ।' जिसमें वस्तु में जीवन होता है, जो सतेज (Spirited या जोशपूर्ण) होते हैं- वे स्वयं विकसित होकर परिवर्तित हो जाते हैं। उस मनुष्य-वृक्ष की जड़ (मूल सत्ता) में बाहर से कोई वस्तु डाल कर उसको ग्रहण नहीं करवाया जा सकता। आज का जीव-विज्ञान (Biology) भी जीव-कोशिकाओं के मूल को जीन उत्परिवर्तन (Genetic Mutation) की प्रक्रिया के द्वारा जानने की चेष्टा कर रहा है। नवनी दा ने १९६७ में ही समाज के ' जीन ' (५ जीवनदायी अभ्यास)  का अविष्कार करके समाज को उन्नत तथा समृद्ध करने का उपाय भी बतला दिया था। क्योंकि स्वामी जी ने कहा था -" सुधार करने में हमें चीज के भीतर, उसकी जड़ तक पहुँचना होता है। इसीको मैं आमूल सुधार कहता हूँ। आग जड़ में लगाओ और उसे क्रमशः ऊपर उठने दो, एवं एक अखण्ड भारतीय राष्ट्र संगठित करो।" 
८.श्री नवनी दा अवतार में ज्ञान, भक्ति, कर्म, मनःसंयोग -चारो योग ही विद्यमान हैं ! उनमें अनन्त ज्ञान, अनन्त प्रेम, अनन्त कर्म तथा सभी प्राणियों के लिए अनन्त दया है ! अभी तक (१६ जनवरी) तुम्हें इसका अनुभव नहीं हुआ? -- श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ! --कोई इस शरीरी (नवनी दा)  को आश्चर्य की तरह देखता है। वैसे ही अन्य कोई इसका आश्चर्य की तरह वर्णन करता है तथा अन्य कोई इसको आश्चर्य की तरह सुनता है, 'श्रुत्वा अपि एनम्  वेद न च एव कश्चित'-और इसको सुन करके भी कोई नहीं जानता।४/३१०
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्य: ।
आश्चर्यवच्चैनमन्य: श्रृणोति
 श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ।।गीता २. २९।।
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 निबन्ध ४' नवनी दा का धर्म' [यह निबन्ध नए प्रकाशन में नहीं है]: का सिलेबस (syllabus) पाठ्यक्रम : 

१. भावावेश ( Emotionality) रूपी अफीम की मिलावट से परिशोधित धर्म! धर्म के साथ अफीम (অহিফেন) की गन्ध तरह संयुक्त भावुकता कई बार हमारी बुद्धि मोहग्रस्त कर देती है,और हम अपने कर्तव्य पथ से भटक जाते हैं।किन्तु धर्म ही सत्य है, अफीम (धर्म का नशा) सत्य नहीं है!

२. सच्चे से सच्चा धर्म भी,समय के प्रवाह में दूषित हो ही जाता है। जिस समय धर्म के क्षेत्र में ऐसी अवस्था होती है, उस समय धर्म को फिर से नये रूप में सज्जित करके समस्त मनुष्यों के लिये ग्राह्य बनाकर, मानव-जाति के समक्ष प्रस्तुत करना पड़ता है, और उसका प्रचार करना पड़ता है।

३. नवनी दा के इस नव-वेदान्त प्रचार 'बनो और बनाओ ' रूपी चरित्र-निर्माण आन्दोलन का वैशिष्ट क्या है? अन्यान्य क्षेत्रों में जहाँ विचारकों ने  एक एक विषय के भाव को लेकर ही चिन्तन किया है,वहीँ नवनी दा ने मनुष्य के समग्र पहलू (overall-aspect) के ऊपर चिंतन किया है। उनके चिन्तन में मनुष्य की समग्र सत्ता (3H), एवम उसका सम्पूर्ण समाज एक विषय के रूप दिखाई देता है। जबकि अन्यान्य विचारकों ने मनुष्य से जुड़े अलग अलग कई विषयों को लेकर चिन्तन किया है।  

४. तथा मनुष्य वास्तव में क्या है - इस पर चिंतन करते करते उन्होंने ऐसे एक धागे (निःस्वार्थपरता) का अविष्कार कर लिया। उस धागे को मनुष्य के गले में पहना दिया, और उसका नाम दिया धर्म!और कहा कि यही वह धागा है, जो मनुष्य को सभी ओर से धारण किये रखेगा-अर्थात मनुष्य को मनुष्य बनाये रखेगा। क्योंकि ब्रांडेड धर्म समय के प्रवाह में केवल भावावेश (emotionality) या अफीम की तरह नशा उत्पन्न करते हैं। ऐसा कहना, कि जो लोग किसी खास निर्दिष्ट नुस्खा (Prescription) के अनुसार जीवन -यापन करते हों, वे ही धार्मिक हैं, और बाकी सभी लोग अधार्मिक हैं, इस बात में कोई दम नहीं है। मनुष्य अपने केन्द्र से उसी समय जुड़ पाता है, जब वह दूसरे मनुष्यों के साथ युक्त होता है।स्वामी जी द्वारा ' मनुष्य ' की जो परिभाषा दी गयी है, उसमें सूत्र के रूप में यही बात सन्निहित है। स्वामीजी के मतानुसार 'मनुष्य' एक ऐसा वृत्त है, जिसकी परिधि असीम है, जबकि उसका केंद्र एक स्थान में है।जो मनुष्य स्वामीजी के धर्म में विश्वासी होता है, उसके जीवन की परिधि विश्वव्यापी हो जाती है। 
५. यहीं पर विकास का मूल है। और स्वामी जी के धर्म की मूल बात- मनुष्य का ऐसा समग्र विकास ही है। इसी विकास के पथ पर अग्रसर रहते हुए,  मनुष्य अपनी क्षूद्र सत्ता, ' मैं'-बोध (अहं भाव) को खोना सीख लेता है।इस प्रकार महिमा की तरफ अग्रसर होना ही स्वामीजी के विचारों में ईश्वर के मार्ग पर आगे बढ़ना है।' निःस्वार्थपरता ही ईश्वर है ! ' यदि इसी उक्ति को धर्म कहा जाय, तो इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है ?
६.धर्म क्या है ? फिलोसफी, जप, तप, देवता-घर, दीपक-दानी, केले का थम, कुशी-घंटी-शंख इन सब को स्वामीजी ने व्यक्तिगत धर्म कहा है। किन्तु जिस धर्म को सभी लोग समझते हैं, वह है परोपकार। अपने हृदय के विश्वव्यापी परिधि के अन्तर्गत समस्त जीवों के एकत्व की उपलब्धी करना ही धर्म है। यह उपलब्धी हो जाने के बाद मनुष्य द्वारा किया गया कोई भी कर्म परोपकार होता है, और वही है धर्म। यह धर्म कायरों के लिये नहीं है, यह वीरों का धर्म है। क्योंकि कायर (डरपोक) दूसरों को मारता है, और वीर ( अर्थात सच्चा जिहादी ) अपने कच्चे ' मैं '-को (अपने तुच्छ अहं को ) मारता है। जो वीर होता है, वह इस वृहत जगत (भव-सागर ) के पार जाने के लक्ष्य को ध्यान में रखकर,सांप, बिच्छु या मच्छड़ तक को नहीं मरता है,बल्कि अपने तुच्छ स्वार्थ के छोटे से दायरे में बंधे - ' मैं और मेरा ' को मारता है। 
७. सच्चे धर्म की अभिव्यक्ति व्यक्ति के जीवन से किस प्रकार होती है ?  नवनी दा ने कहा है,यथार्थ धर्म-बोध मनुष्य को, उसकी असीम परिधि तक सक्रीय जन-कल्याण करने की भूमिका-(गुरु-नेता के कार्य) में नियोजित कर देता है।यही बोध उसको अपना और दूसरों का दुःख दूर करने की शक्ति और साहस से भर देता है। यहीं से अंतःकरण में हित-अहित का ज्ञान, अन्तरात्मा की आवाज, या विवेक-प्रयोग करने की शक्ति का जागरण हो जाता है। यही बोध उसको अपना और दूसरों का दुःख दूर करने की शक्ति और साहस से भर देता है। यहीं से अंतःकरण में हित-अहित का ज्ञान, अन्तरात्मा की आवाज, या विवेक-प्रयोग करने की शक्ति का जागरण हो जाता है। धर्म मनुष्य को सम्पूर्ण जगत के साथ जोड़ देता है, और नीतिबोध (आत्मा की आवाज या Conscience) उस ईश्वर के साथ जुड़े हुए मनुष्य के कर्म की निति- परोपकार को निर्धारित करता है। ' मनुष्य में अन्तर्निहित अनन्त शक्ति का स्फुरण (या प्रस्फुटित) होना ही धर्म है।' उस धर्म की अभिव्यक्ति - भूखों को अन्न-वस्त्र-त्राण करने से श्रेष्ठ समाज-सेवा - (अज्ञानियों के विवेक को जाग्रत करने तथा आध्यात्मिक दृष्टि शुद्धबुद्धि को उद्घाटित करने) के प्रयास से होती है। धर्म का मुख्य कार्य ही मनुष्य को शक्ति प्रदान करना है। स्वामीजी के मतानुसार - 'जो धर्म मनुष्य को इस संसार में सुखी नहीं बना सकता, उस धर्म के द्वारा परलोक या मरने के बाद सुख देगा, धर्म का यह आश्वासन बुद्धिमानों के समझ से परे है। 
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(व्यक्ति और मन): निबन्ध ५ : क्या नवनी दा के उपदेश केवल दूसरों को सुनाने के लिये हैं -स्वयं करने के लिये नहीं ?: में निहित मनुष्य-निर्माणकारी सिलेबस (syllabus) या पाठ्यक्रम : 
१.अगले वर्ष (२०१७) से महामण्डल के सभी केन्द्रों में प्रत्येक १५ अगस्त को, 'स्वाधीनता दिवश समारोह' के साथ साथ 'नवनी दा का जन्म-जयन्ती समारोह' भी बड़े धूम-धाम के साथ मनाया जाने लगेगा ! हमलोग उनको एक 'सर्वत्यागी परिव्राजक संन्यासी तुल्य गृहस्थ' के रूप में स्मरण करेंगे जो अपने जीवन के अंतिम वर्षों में खड़दह स्थित पैतृक निवास-स्थान 'भुवन-भवन' का त्याग करके कोन्नगर स्थित 'महामण्डल भवन' में रहने के लिये आ गए थे! (यहाँ उन्होंने .....से........ तक कुल ....... दिन निवास किया)। नवनी दा जन्म तो श्रीरामकृष्ण के पार्षद महिमाचरण चक्रवर्ती के घर -१०० न ० काशीपुर में हुआ था, शरीर छूटा था अपने द्वारा निर्मित 'महामण्डल भवन' में। कोन्नगर में शुभाशीष दा और बनमाली तथा अभिजीत आदि महामण्डल कर्मी प्रमोद दा का निर्देशन में उनकी देखभाल करते थे, तथा प्रशिक्षण शिविर के दौरान प्रणव दा के निर्देशन में केदार दा और बासुदेव बाघ मातृवत उनकी देखभाल करते थे, तथा हमलोगों को भी कुछ न कुछ खाने के लिए देते थे। उनका स्मरण करके हम सभी लोग एक बार फिर से स्वीकार करेंगे कि वे सचमुच एक महान देशभक्त थे, और जो लोग शताब्दियों से दबे-कुचले, पददलित होते आ रहे हैं -उन ब्राह्मणेत्तर जातियों से गहरी सहानुभूति रखते थे। वैसे तो नवनी दा मनुष्य मात्र से प्रेम करते थे जिसके कारण बिहार के रिमोट ग्राम जहाँ, रोड बिजली कुछ नहीं था नक्सल प्रभावित ग्राम जानिबिगहा तक बैलगाड़ी और पालकी में बैठकर, उनके भीतर भी सिंहत्व (ब्रह्मत्व) को जाग्रत कराने के उद्देश्य से छड़ी पकड़ कर और कमर में बेल्ट बांध कर भी जाते रहते थे। और यदि हमलोग अपने को वंशगत रूप से उत्तरभारतीय 'ब्राह्मण' समझते हों, तो इस बात पर थोड़ा गर्व भी महसूस कर सकते हैं, कि वे एक 'कन्नौजिया (कान्यकुब्ज) ब्राह्मण' भी थे। या भाषायी रूप से अपने को बंगाली समझते हों तो वे भी एक कुलीन बंगाली ब्राह्मण थे! बंगाली रामायण के रचयिता कृतिवास ओझा के कुल में जन्मे थे। तथा वे एक विश्वप्रेमी मानव भी थे क्योंकि पिछले जन्म में वे कैप्टन सेवियर थे ! 
यदि व्यक्तिगत रूप से जानकारी ली जाय तो कोई भी महामण्डल कर्मी ऐसा नहीं मिलेगा जो नवनी दा के प्रति श्रद्धा के दो शब्द नहीं कहता हो। किन्तु समय बीतने के साथ ही साथ एक दिवसीय स्मरण-सभा से उत्पन्न जोश का ज्वार  शीघ्र ही विस्मृति के समुद्र में विलीन हो जायेगा। यदि हमलोग अपने व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक जीवन, सामाजिक जीवन या राष्ट्रीय जीवन को  देखें, या उनलोगों की ओर देखें जो हमारे जीवन को (इस शिविर) को परिचालित कर रहे हैं, जो युवा प्रशिक्षण शिविर के नेताओं के लिये भी नीतियाँ और परियोजनायें बनाते हैं, तो पाते हैं किमलोग नवनी दा की स्मरण सभाओं में जो कुछ कहते हैं, या उनकी जीवनी पर निबन्ध लिखकर हमलोग जिन विचारों का उल्लेखकरते हैं, यदि अपने यथार्थ -जीवन के आचरण के साथ उन विचारों की तुलना करके देखें तो कहीं कोई सामंजस्य नहीं दीखता है !  
ऐसा प्रतीत होता है मानो नवनी दा  के उपदेश  ' केवल बोलने के लिये हैं, करने के लिये नहीं। ' और मनःसंयोग, व्यायाम , प्रार्थना, चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया, चरित्र के गुण, चमत्कार जो आप कर सकते हैं, आत्ममूल्यांकन तालिका, लीडरशिप आदि विषयों पर  बोलने (या क्लास लेने)  के लिये तो केवल नवनी दा द्वारा लिखित महामण्डल पुस्तिकाओं  के कुछ पन्नों को एक बार फेंट लेना ही यथेष्ट होता है। किन्तु स्वयं उनका दैनंदिन जीवन में अनुपालन करने में बहुत तकलीफ होती है। स्वामीजी ने हमलोगों के इस बड़े राष्ट्रिय दोष को बहुत पहले ही देखकर हमलोगों को सतर्क कर दिया था। फिर भी इस दोष को हटाने के लिये हमलोग अपने कदम आगे क्यों नहीं बढ़ा पाते हैं?
इसके पीछे दो कारण हो सकते हैं। पहला कारणनवनी दा ने आजीवन क्या किया था-  इस बारे में सम्पूर्ण जानकारी रखने पर भी, हमलोग इस बात पर विशेष ध्यान नहीं देते, कि वे हमसे --- अपने successors या क्रमानुयायीयों से क्या अपेक्षा रखते थे ? इसका मुख्य  कारण यह है कि हमारे युवा प्रशिक्षण शिविर
में के एक-दो परहितव्रती बुजुर्ग शिक्षकों (प्रमोद दा , दीपक दा, बीरेन दा, रनेन दा, बासु दा) से नवनी दा के जीवन से जुडी  कुछ कहानियाँ सुन लेने से अधिक और कुछ सिखलाने -लीडरशिप ट्रेनिंग देने में सक्षम युवा शिक्षकों की घोर कमी है। इसीलिये हमलोग केवल इतना जानते हैं कि नवनी दा  के विषय में बोलते समय उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना हमारा कर्तव्य है; किन्तु अपने जीवन को समर्पित करके नवनी दा  के प्रति अपनी श्रद्धा को अभिव्यक्त करना हम अपना उत्तरदायित्व नहीं समझते, किन्तु अपने को उनका सक्सेसर या उत्तराधिकारी समझते  हैं। 
और दूसरा कारण यह है, कि यदि हममें से कुछ व्यक्ति (रणजीत घोष, अनुऱाभ सेनगुप्ता, समीर 
दासगुप्ता, सोमनाथ बागची,अमित दत्ता,अनिन्दो ,अपूर्वा दास,जगदीश,जुगल प्रधानआदि) चाहे व्यक्तिगत जीवन में अपनाने के लिए हो या राष्ट्रीय जीवन में अपनाने के लिए हो,  इस बात को थोड़ा-बहुत समझ भी लेते हैं कि नवनी दा हमसे किस बात की अपेक्षा रखते थे, तो भी वे 'समझ नहीं सके हैं' का बहाना बनाकर उनके उपदेशों को अपने जीवन में धारण करने से बचना चाहते हैं, और बंगाल के बाहर आयोजित होने वाले कैम्प में नहीं जाना चाहते हैं! 
क्योंकि हम कहीं यह कह दें कि हमने तो यह समझ लिया की वे हमसे यथार्थ 'मनुष्य' (बंगाली-बिहारी नहीं) बनने और बनाने की अपेक्षा रखते थे। तो फिर क्या उस उत्तरदायित्व का निर्वहन करने के लिये मुझे भी अपने समस्त व्यक्तिगत स्वार्थ और लाभ के स्वप्नों या इच्छाओं को त्याग देना होगा ? बस इसी बात को याद करके, हमलोग नवनी दा सच्चा अनुयायी बनने के भय से शिहर उठते हैं, और अपने जीवन को सार्थक करने के कर्तव्य से पलायन कर जाते हैं।
भला ऐसा क्यों होता है, महामण्डल के साथ  इतने वर्षों तक जुड़े रहने के बावजूद हमलोग अपने जीवन को स्वयं सार्थक क्यों नहीं करना चाहते हैं ? नवनी दा ने कई बार इसका कारण भी बता दिया था।  दादा कहते थे -
आलस्यं  हि  मनुष्याणां  शरीरस्थो  महान  रिपुः |
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा Sयम् नाSवसीदति  ||
[आलस्य= आलस्य। ही = निश्चित रूप से। मनुष्यानां = लोगों के बीच। शरीरस्थो = शरीर में मौजूद। महान= महान। रिपु = दुश्मन।नास्त्युदद्यमो = नास्ति  + उद्द्य्म  + समो। नास्ति = नहीं है। उद्द्य्म = परिश्रम। समो = के बराबर। बंधु = दोस्त, कृतवायं  = कृत्वा  + अयं । कृत्वा = करने से ।
अयं = यह। नावसीदति  = ना + अवसीदति । ना अवसीदति  = निराश, उदास नहीं ।संस्कृत में अवसाद का मतलब = मानसिक अवसाद की स्थिति डिप्रेशन है।]
मनुष्य की ढेरों स्वाभाविक प्रवृत्तियों में से एक है- जड़ता, सदैव स्थिर-अवस्था में अचल होकर ' जड़-पिण्डों ' के समान पड़े रहने की प्रवृत्ति। जो मनुष्य अभी जैसा है,वह वैसा ही बने रहना चाहता है। किन्तु नवनी दा का क्रमानुयायी (सक्सेसर) बनने के लिये इस भाव का बिल्कुल ही परित्याग कर देना होता है। उनके भाव से अनुप्रेरित होने के लिये - ' मैं पिछले वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर में जैसा था, इस वर्ष भी वैसा ही रहूँगा ' के भाव को बिलकुल छोड़ देना होता है। क्योंकि नवनी दा जैसे रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में गुरु-नेता (दादा या भैया) का उत्तराधिकारी बनने के लिये- कल तक वह जितना मनुष्य बन सका था, आज भी उतना ही (लघु) मनुष्य बना रह पाना संभव ही नहीं होता है। इतना ही नहीं, इसके पहले क्षण मैं जो था, इस क्षण भी ठीक वैसा ही बने रहना संभव नहीं रह जाता है। मुझको प्रतिमुहूर्त उन्नततर मनुष्य बनते रहना पड़ता है। दादा यह भी कहते थे -
सुखार्थी  वा  त्यजेत विद्याम्   विद्यार्थी वा त्यजेत सुखम्  |
सुखार्थिनः  कुतो  विद्या  कुतो  विद्यार्थिनः  सुखम्  ||
[सुखार्थी = सुख के साधक। वा = यदि । त्यजेत = छोड़, दे। विद्या = शिक्षा,आत्मज्ञान । विद्यार्थी = शिक्षा और ज्ञान के साधक। सुखं = प्लेजर। कुतो = कहाँ ? विद्यार्थिनः =  छात्रों, ज्ञान के चाहने वालों।] 
-- अर्थात कोई व्यक्ति अगर एक लापरवाही-पूर्ण जीवन जीना चाहता है, या इन्द्रिय-सुख भोगों के साथ आराम-दायक जीवन जीना चाहता है, तो उसके लिए यही बेहतर होगा कि वह विद्या (निरपेक्ष सत्य का ज्ञान / जो मुक्त कर दे -'विवेकज़ ज्ञान) को सीखने का उद्देश्य त्याग दे ! और अगर कोई सच्चा जिज्ञासु ( एथेंस का सत्यार्थी)  या उनका सच्चा अनुयायी (शिष्य) बनना चाहता है, तो उसके लिए यही बेहतर होगा कि वह, गृहस्थ होते हुए भी जितनी जल्दी हो सके इंद्रियभोगों और आरामदायी जीवन में आसक्ति का त्याग
कर दे। [क्योंकि (१९८६ हरिद्वार कुम्भ और १६ जनवरी का ज्ञान)  कोई सबसुख-दास मनुष्य कभी रामसुख-दास संत नहीं बन सकता ! अर्थात कोई सुखार्थी व्यक्ति कभी ब्रह्मविद मनुष्य या ब्रह्मवेत्ता मनुष्य नहीं बन सकता, क्योंकि ब्रह्म को जान विवेकज़-आनन्द (भूमा आनंद) में प्रतिष्ठित रहने की साधना, कभी ईज़ीगोइंग-प्रोसेस नहीं हो सकती -मनुष्य बनने और बनाने  के लिए ५ अभ्यास तो सभी को करना ही पड़ेगा।]
शरीर का बड़ा होना, या बूढ़ा होकर पेंशन पाने लगना - यह कार्य तो प्रकृति द्वारा ही होता रहता है। इसके लिये मुझे स्वयं कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता है। किन्तु जब मैं अपने, शरीर को स्वस्थ और सबल तथा  मन को तेजस्वी बनाना चाहता हूँ या अपने हृदय को विशाल बनाना चाहता हूँ, उसको प्रसारित करना चाहता हूँ, तो इस 3H विकास के लिये मुझे स्वयं ही चेष्टा (५ अभ्यास)  करनी पड़ेगी है; और यही मेरा कार्य है मुझे प्रति मुहूर्त अपने 'छोटा मैं' (या मिथ्या नाम-रूप केअहंकार) को निष्ठुरता के साथ त्याग करके 'बड़ा-मैं' (पाका आमी-ब्रह्मविद मनुष्य) बनने की चेष्टा करते रहना होगा, इसीको -स्वामीजी के भाव (आदर्श) को आचरण में उतारना कहते हैं !
 विवेकानन्द -"व्यक्ति और मन" के अन्तर्गत 'आमादेर सम्भावना का निबन्ध ३  में हमने  विवेकानन्द ऐज अ "पर्सन एंड हिज माइंड",में देखा था कि 'नवनी दा' ऐज अ पर्सन क्या थे, और उनका मन कैसा-उन्मुक्त निर्झर की तरह गठित हो गया था !  वे कहते थे जब हृदय के बन्द कपाट (अहं) को खोल कर, प्रेम-मन्दाकिनी प्रवाहित होने लगती है, तब उस निर्झर का मोह-भंग हो जाता है, तब वह निर्झर भ्रांतिमुक्त 
('disillusioned' या भेंड़ पना से मुक्त) हो जाता है। उस उन्मुक्त झरने के  उसी अवस्था का चित्रण रवीन्द्रनाथ ठाकुर अपनी कविता -'निर्झरेर स्वप्नभंग' (নির্ঝরের স্বপ্নভঙ্গ)  अर्थात 'निर्झर का डी-हिप्नोटाइज्ड हो जाना' में इस प्रकार करते हैं -
आजि ऐ प्रभाते रविर कर
केमने पासिलो प्राणेर ‘पर 
केमने पासिलो गुहार आंधारे
प्रभात पाखीर गान!
ना जानि केनोरे एतो दिन परे जागिया उठिलो प्राण!
“न जाने, आज क्या हुआ कि जाग उठे हैं प्राण
 मानो, कानों में पड़ा हो दूरस्थ महासागर का गान“।
भांग रे हृदय , भांग  रे बाँधोन 
शाध  रे ‍आजिके प्राणेर शाधोन 
लहरीर पोरे लहोरी तुलिया
अघातेर पोरे अघात कोर!
मातीया जोखोन उठेचे पोरान!
शिखोर होईते शिखोरे छुटिबो
भूधोर होईते भूधोरे लुटिबो
" हेशे खलखल गेये कलकल, 
ताले ताले दिबो ताली !" 

'हेशे खलखल गेये  कलकल' ताले ताले दिबो ताली'! कोई झरना जब पहाड़ के कलेजे को फोड़ कर फूट पड़ता है, तब वह भ्रांतिमुक्त हो जाता है, और 'हँसते खिलखिलाते, कलकल गीत गाते हुए' - ' जीवन नदी के हर मोड़ पर ' समस्त बाधाओं को लाँघता हुआ दूरस्थ महासागर के साथ युक्त होकर सदा के लिये मुक्त बन जाता है! नेतृत्व-प्रशिक्षण में  ५ अभ्यास का प्रशिक्षण प्राप्त कर लेने के बाद 'गुरु-नेता' भेंड़त्व भ्रमजाल (से मुक्त होकर या डी-हिप्नोटाइज्ड होकर सिंहत्व में स्थित हो जाता है। 'स्वामीजी का मन' निबन्ध ३ के अनुसार:- 'अपने प्राण की रक्षा करना '- समस्त प्राणियों का पहला धर्म होने पर भी,उत्तम प्राणी का पहला धर्म या कर्तव्य  'प्राण को विकसित करना' होता है। क्योंकि साधारण जीवों (Beasts) के क्षेत्र में जिसे जन्मजात वृत्ति (Innate instinct) कहते हैं, मनुष्य के क्षेत्र में उसी को जन्मसिद्ध या 
अन्तर्निहित महत प्रवृत्ति (Greater Tendency महत बुद्धि-माँ-Divinity या ईश्वरत्व) कहते हैं। (যা সাধারণ জীবের ক্ষেত্র একটি সহজাত বৃত্তি' 'Inherent Tendency' তা মানুষের ক্ষেত্রে এক মহৎ প্রবৃত্তি 'Greater Tendency'  
और तब उस गुरु-नेता का अनुयायी भी उसी 'खिलखिला कर हँसते और कलकल ध्वनि' में बहती झरने की धारा में अर्थात 'रामकृष्ण-वेदान्त परम्परा में लीडरशिप ट्रेनिंग में'  स्नान  कर लेने के बाद अपने छोटे छोटे सर्वस्व का त्याग करके (मैं और मेरा, या मन की चहार दिवारी को भी ट्रैन्सेन्ड 'transcend' करके) यथार्थ (शाश्वत) जीवन-समुद्र के सम्मुख खड़ा हो जाता है! इसीलिए स्वामी जी ने कहा था 'गति ही जीवन है, स्थित ही मृत्यु।',  फिर कहते हैं- ' उठो, जागो ! अब और स्वप्न मत देखो ! ' (अपने को शरीर समझने की-देहाध्यास) घोर निद्रा को त्याग कर उठ खड़े होओ !

इस मिथ्या अहं (भेंड़त्व, देहाध्यास, M/F भाव ) को खो कर अपने यथार्थ स्वरूप या ब्रह्मत्व की प्राप्ति (ससीम से असीम बनने या बून्द से सागर बनने) को हमें भयप्रद क्यों मानना चाहिए ? यह भय केवल अपनी जड़ावस्था को (आलस्य को) अचल रखने के दुराग्रहवश उत्पन्न होता है। इसीलिये महामण्डल के प्रतीक चिन्ह (एम्ब्लेम) में लिखा है - ' चरैवेति चरैवेति '-जो आलस्य में सोया हुआ है, उसका कलिकाल चल रहा है, उठकर खड़े हो जाओ। खड़े हो गए हो, तो चलना शुरू कर दो, जो चलना शुरू कर देता है, उसके लिए सत्ययुग आ जाता है। यही महामण्डल का संजीवनी- मन्त्र है, जो मृत जड़-पिण्डों में भी जान डाल सकता है। नवनी दा के आविर्भूत होने की तिथि का स्मरण करके हमलोग इस नव-जीवन प्रदायी मन्त्र 'चरैवेति चरैवेति '-में यदि दीक्षित न हो सकें, तो नवनी दा के प्रति मौखिक श्रद्धा-सुमन चढ़ाने का कोई मोल नहीं है।
किन्तु केवल इतना ही काफी नहीं है। अपने जीवन-दीपक को प्रज्वलित करके दूसरों के जीवन को भी प्रज्वलित करा देने का प्रयत्न करना होगा। हम लोगों को ' सबों के जीवन से अपने जीवन को जोड़ कर देखना ' सीखना होगा। सभी युवाओं को व्यक्ति से पारिवारिक-जीवन में, पारिवारिक से सामाजिक-जीवन में, तथा इसी प्रकार राष्ट्रिय जीवन तक 'एक और अभिन्न ' बनते हुए आगे बढ़ने के मन्त्र में अनुप्राणित करना होगा। इस महा-जागरण की वाणी को भारत के खेतों-खलिहानों, कल-कारखानों, स्कुल-कालेजों, ऑफ़िस-अदालतों, व्यापारियों की गद्दीयों, राष्ट्र-चालकों के मसनदों (सत्ता की कुर्सी पर बैठे नेताओं ) तक, सर्वत्र फैला देना होगा। नवनी दा सम्पूर्ण भारतवर्ष को पूर्ण रूप से जाग्रत कर देने के लिये ही आये थे। हमलोगों ने अभी तक नवनी दा को इस रूप में देखना नहीं सीखा है। किन्तु हमलोगों को स्वयं उन्हें इसी रूप में देखना सीखना होगा और सबों को इसी दृष्टि देखने की पद्धति समझानी होगी।
स्वामीजी ने कहा था- 'भारत झोपड़ियों में वास करता है।' उसके जनसाधारण की उन्नति से ही भारत की उन्नति होगी। भारत को उठने के लिये (महान बनने के लिये) यहाँ की साधारण जनता, जो पीछे रह गए हैं, उन्हें ऊपर उठाना होगा (उन्हें वेदान्त के महावाक्यों सेअनुप्राणित करना होगा।) नवनी दा कहते थे - " माना कि तूँ  उन सबों को उपर नहीं उठा सकता, किन्तु तुम उनके कानों तक इस महा-जीवन की वाणी को पहुंचा तो अवश्य सकता है।" मानव-मात्र के भीतर अनन्त शक्ति अन्तर्निहित है। उस शक्ति के जाग्रत होते ही, वह किसी के भी दबाने से दबेगा नहीं, अप्रतिरोध्य बन जायेगा। तब वह अपने अधिकार को जानने के साथ साथ अपने उत्तरदायित्व को भी जान लेगा। प्रत्येक मनुष्य जब इस बोध को प्राप्त करके अपने पैरों पर खड़ा हो जायेगा, सिर उठाकर चलने लगेगा, अपने निजी सुख-भोग को तुच्छ समझ कर दूसरों के लिये अपने जीवन को भी न्योछावर कर देने में नहीं हिचकेगा, तभी भारत जाग जायेगा।

जो (प्रक्रिया-५ अभ्यास संजीवनी बुट्टी) इस नवजीवन को जाग्रत करके उसे धारण किये रहती हो, वही है स्वामीजी का धर्म। इस धर्म को हम अफीम का नशा नहीं कह सकते। जिस आलस्य रूपी अफीम को खाकर हमलोग घोर सुषुप्ति की अचेत अवस्था में सोये पड़े हैं, उस निद्रा को त्याग कर उठ जाने के लिए ही स्वामीजी हमें पुकार रहे हैं।

 प्रत्येक छात्र, प्रत्येक युवक को उनका यह आह्वान पहले स्वयं समझना होगा, फिर दूसरों को भी समझाना होगा। देश की सम्पूर्ण  राष्ट्रीय-व्यवस्था (प्रत्येक यूनिवर्सिटी के सोशल वर्क्स डिपार्टमेन्ट)  को इस समझाने के दायित्व का निर्वहन करना होगा। "स्वामीजी बड़े महान थे", यह कहकर भाषण देने से, या समाचार-पत्र में छोटा सा लेख लिखकर श्रद्धांजली देने से ही देश आगे नहीं बढ़ेगा। भारतवर्ष अभी तक जितना भी सिर उठाकर खड़ा होने में समर्थ हुआ है, वह स्वामीजी के उसी मन्त्र -  ' चरैवेति चरैवेति ' से हुआ है, जिसे हमने भुला दिया है। उनका यह महामन्त्र हमलोगों के व्यक्तिगत  और सामाजिक जीवन को महाजीवन प्रदान करने में समर्थ है, उसको अस्वीकार करके, उसकी उपेक्षा करके हमलोग उनके अमर सन्देश ' Be and Make ' रूपी रतन को खो देंगे ? यदि हम इसे खोयें नहीं, यदि उनके इस सन्देश के उचित मूल्य को समझकर उन्हें प्रत्येक युवा अपना आदर्श माने तभी नवनी दा काआविर्भूत होने की तिथि पर उनको श्रद्धांजली देना सार्थक होगा। 

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