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गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना- [7] "हमलोग क्या मांगे?"

 मानव-मात्र के लिए लक्ष्यवस्तु है 'मनुष्यत्व' -प्राप्ति!
स्वामी विवेकानन्द क्या चाहते होंगे, उनकी हार्दिक इच्छा क्या रही होगी ? इसी प्रश्न को हमलोग यदि अपने देह-मन-सत्ता को एक करके समझने का प्रयास करें, और उनकी चाहत (Burning-Desire) के साथ यदि हम अपनी चाहत को एक कर लें, तो इस बात में कोई सन्देह नहीं है कि भारतवर्ष विश्वसभा में एक दिन अवश्य गौरवशाली आसन प्राप्त करेगा। स्वामीजी की जो चाहत थी, उससे बड़ी चाहत और कुछ हो ही नहीं सकती; क्योंकि उसको प्राप्त कर लेने के बाद और कुछ मांगने योग्य बचता ही नहीं है। 
 स्वामी जी कहते थे, " मनुष्यत्व की प्राप्ति, हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है; और मैं इसी महानतम जन्म-
सिद्ध अधिकार को प्राप्त करना चाहता हूँ। " क्या मनुष्य जीवन इतना क्षुद्र है- कि वह थोड़ा सा शारीरिक भोग, थोड़ी धन-दौलत, बंगला-मोटरकार, थोड़ा नाम-यश, थोड़ी सी सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करके अपने को धन्य मानने लगे ? नहीं, बिलकुल नहीं। ' भूमैव सुखम ' - अल्प नहीं भूमा में जो महा आनन्द है ! मैं उसी भूमा-आनन्द का अधिकारी हूँ, हम सभी उसी आत्मा के अधिकारी हैं। यदि हमलोग  'मनुष्य' बनने की चेष्टा करें, अर्थात सबसे बृहद वस्तु (ब्रह्म) को पाने की चेष्टा करें,और उस बृहद (ब्रह्म) का साक्षात्कार कर लें; तो फिर इस जीवन में- व्यावहारिक जीवन में और कुछ प्राप्त करने योग्य वस्तु अवशिष्ट ही नहीं रह जाती। 
हमारी एक मात्र लक्ष्य-वस्तु (target object) है- इसी जीवन में 'पूर्णता' की प्राप्ति अर्थात 'मनुष्यत्व' अर्जित कर लेना। हम सभी लोग उस पूर्ण साम्य-भाव अवस्थित जीवन के अधिकारी 'मनुष्य' बन सकते हैं। स्वामीजी के मन में सबसे बड़ी कामना यही थी। और वे इसी आकांक्षा को वे सभी मनुष्यों के मन में, विशेष रूप से युवाओं के मन में जाग्रत करा देना चाहते थे।  
 एक दिन नरेन् श्रीरामकृष्ण के पास जाकर कहते है, ' मैं इन दिनों बड़ी मुफलिसी के दौर से गुजर रहा हूँ, माँ-भाई बहनों के लायक भोजन भी नहीं जुट पाता है। आप कोई उपाय कर दीजिये। माँ काली तो आपकी सब बातों को मान लेती हैं, और वे सब कुछ कर सकती हैं, तो उनसे कहकर मेरे लिये आप इतना तो करवा दीजिये। मेरे परिवार के लिये धन चाहिये और अन्न चाहिये - देखूँ, आप इसकी व्यवस्था कर सकते हैं या नहीं?" 
श्रीरामकृष्ण ने कहा, " मैं तो माँ से यह सब चीजें नहीं माँग सकता हूँ रे; तुम स्वयं माँ से ये सभी चीजें माँग लो, तुम स्वयं उनसे जाकर क्यों नहीं कहते ? तुम माँ के पास जाकर उनसे स्वयं कहो न।" किन्तु जब नरेन माँ से माँगने गए, तो महाकाली के सामने अपने मन की सर्वोच्च आकांक्षा ही व्यक्त कर दिये। उन्होंने जगत जननी से माँगा - " माँ, मुझे भक्ति दो, विवेक दो, वैराग्य दो, ज्ञान दो ! " नरेन् ने केवल वही माँगा, जो मनुष्यत्व-प्राप्त करने के अधिकारी होने के रूप में, एक मनुष्य के रूप में, वे माँग सकते थे। 
नरेन्द्रनाथ, तो हमलोग जैसा - म्याऊं म्याऊं करके छोटी छोटी वस्तुओं को माँगने वालों में से नहीं थे, वे माँ से बलपूर्वक केवल वही माँगते है, जिसे प्राप्त करने के वे एक योग्य अधिकारी थे। क्योंकि बुद्धिमान नरेन् यह जानते थे, कि अधिक माँगने से यद्यपि अधिक नहीं प्राप्त है, किन्तु कम मांगने से तो अधिक कभी मिल ही नहीं सकता है। किन्तु हमलोग जीवन में छोटी चीजों को ही अधिक माँगते हैं।
स्वामीजी कहते हैं, " तुम लोग केवल नौकरी दो, नौकरी दो ! कह कर चिल्लाते रहते हो। क्या अंग्रेजों के बेंत और जूतों का प्रहार खाय बिना तुम्हें चैन नहीं मिलता है? क्या तुम स्वयं कुछ नहीं कर सकते? क्या तुम मिट्टी भी नहीं खोद सकते हो ? आधुनिक विज्ञान और प्रद्द्योतिकी की सहयता से तुमलोग भी आधुनिक उपभोग की वस्तुओं का निर्माण क्यों नहीं कर सकते ? जापान में जाकर देखो, उन लोगों का देश-प्रेम कितना अद्भुत है !" 
 स्वामीजी कहते थे- ' जब मनुष्य बन कर जन्म लिया है, तो मनुष्य-जीवन की महिमा को प्रकट तो करो। जीवन क्या है ? एक अन्तर्निहित शक्ति अपने को अभिव्यक्त करना चाह रही है, और बाहरी परिस्थितियाँ और बाधाएँ उसको दबाये रखना चाहती हैं, उन समस्त बाधा-विघ्नों का अतिक्रमण करके जो अपनी अन्तर्निहित शक्ति (दिव्यता) को प्रकट कर लेता है, उसी को मनुष्य-जीवन कहते हैं। " 
स्वामी जी जीवन को विकसित करने का निर्देश दे रहे हैं। विकसित करने का अर्थ है, प्रस्फुटित करना। अपने जीवन की कलियों को प्रस्फुटित करके मनुष्यों को दिखा दो कि जीवन में क्या पाना चाहते हो, क्या करना चाहते हो ! थोड़ा धीरज रखो, और जीवन को थोड़ा प्रस्फुटित कर लो। अपने जीवन को विकसित करके अभिव्यक्त करो। विकास और अभिव्यक्ति । आश्चर्यजनक रूप से एक महान अस्तित्व हम सबों के भीतर छुपा हुआ है ! उसको आविष्कृत करना होगा,अर्थात  जानना होगा और अभिव्यक्त करना होगा। 
 हम लोगों को अपने जीवन में प्रति मुहूर्त-चलते, बोलते एवं करते समय,  यह स्मरण रखना होगा, कि हमलोगों के भीतर अनन्त अविरोध हैं, अनन्त ज्ञान है, अनन्त शक्ति है, अनन्त प्रेम है। मेरे भीतर है, और प्रत्येक मनुष्य के भीतर है।  किन्तु हम उसे जानते नहीं हैं, उसका सम्मान नहीं करते हैं, उसे  अभिव्यक्त नहीं करते हैं। सर्वदा शारीरिक सुख प्राप्त करने, या क्षणिक-इन्द्रिय सुख को प्राप्त करने की कामना करते रहने से क्या हो रहा है ? यही हो रहा है कि हमलोग अपने अन्तर्निहित सर्वोच्च सुन्दर और बृहद वस्तु को उपेक्षित करके, उसे गँवा देने पर उतारू हैं। 
 स्वामीजी की तीव्र मनो-कामना क्या थी ? वे जगदम्बा से क्या वर पाना चाहते थे, इस बात को पत्र-
पत्रिकाओं या समाचार पत्र के पन्नों को पढ़कर नहीं जाना जा सकता है। इसको समझने के लिये अपने हृदय को विशाल बना लेना होगा। 

स्वामीजी ने स्वयं ही कहा है, कि (श्रीरामकृष्ण ही आधुनिक युग में ब्रह्म के अवतार हैं, वेदान्त की दृष्टि से नहीं साक्षात् !..... यह जान लेने से ) मुझे क्या लाभ हुआ है, सो तो मैं नहीं जानता किन्तु इतना अवश्य कह सकता हूँ कि मेरा हृदय जरुर बड़ा हो गया है। यह जो मेरा हृदय बड़ा हो गया है, -यही है असली चाहने वाली वस्तु, जिसे मैंने चाहा और प्राप्त किया है। स्वामीजी कहते हैं, कोई भी छोटी वस्तु पाने या इन्द्रिय-भोगों की कामना को मन से निकाल दो, हर समय यही चेष्टा करो जिससे हम अपने हृदय को बड़ा सकें।
अगर कोई यह प्रश्न करे कि स्वामीजी क्या प्राप्त करना चाहते थे, इसे मैं जानने की चेष्टा क्यों करूँ ?
इसका उत्तर संक्षेप में यह है कि हमलोग एक बहुत बड़े संकट में घिर गये है, एक गंभीर परिस्थिति से घिरे हुए हैं, जिसमें पतन की सम्भावना ही अधिक है। यदि इसी उम्र (किशोरावस्था) से हमलोग यह नहीं जानें, कि हमें सचमुच वरदान में किस वस्तु को माँगने की इच्छा करनी चाहिये, तो हमलोग इतना अधिक नीचे भी गिर सकते हैं कि वहाँ से फिर हम कभी उठ ही नहीं सकेंगे। इसीलिये हमें (राजाधिराज से कोंहड़ा माँगने की अपेक्षा ) अपनी चाहत को बहुत अधिक बढ़ा लेना होगा, और सर्वोच्च वस्तु को पाने की कामना ही करनी होगी।

हमलोगों का सम्पूर्ण जीवन किस प्रकार सफल हो सकता है, स्वामीजी ने उसी का सूत्र दिया है। और वह सूत्र है- ' जिसने दूसरों के लिये जीना सिख लिया हो, केवल उसी ने जीवन को जाना है। ' दूसरों के लिये त्याग स्वीकार करने की आवश्यकता सदा रहने वाली वस्तु है। इसीलिये ऐसा सोचना बिलकुल सुसंगत नहीं होगा, कि हमलोग राजनैतिक स्वाधीनता प्राप्त कर चुके हैं, इसीलिये अब हमें त्याग करने की आवश्यकता नहीं रह गयी है। इस त्याग से ही सब कुछ प्रारंभ हुआ है। इस त्याग के भीतर ही जीवन का विस्तार करना होगा, तथा इस त्याग के द्वारा ही जीवन को सफल करना होगा।
 श्रीरामकृष्ण के आश्चर्यजनक त्याग की तो धारणा भी नहीं की जा सकती। उनके त्याग का तो कहना ही क्या? सारदा देवी के त्याग की तुलना नहीं हो सकती। श्रीरामकृष्ण की माँ चन्द्रादेवी के असाधारण त्याग की बात हमलोग जानते हैं। एक बार मथुर बाबु ने उनसे पूछा था, " माताजी, आप क्या चाहती हैं, मुझे बताइये - आप जो कुछ भी माँगेंगी मैं आपको वही लाकर दूंगा। " उत्तर में उन्होंने कहा-" मैं कुछ भी मांग नहीं है।" किन्तु मथुर बाबु बिना कुछ मांगे छोड़ने वाले नहीं थे, फिर भी वे क्या माँगू यह सोच नहीं पा रही थीं, अन्त में बोली, " देखो इस समय क्या माँगू, बहुत सोचने से भी कोई जरूरत महसूस नहीं हो रही है।" उधर मथुर बाबु की प्रतिबद्धता दृढ़ हो रही है, कहते हैं-" माताजी संकोच मत कीजियेगा, आप जो भी मांगेंगी मैं अवश्य दूंगा। यदि जमीन, मकान, रुपया चाहिये, जो भी कहेंगी वही दे दूंगा। " चन्द्रादेवी कहती हैं, ' अभी तो सोचने से मुझे कुछ भी माँगने लायक वस्तु दिखाई नहीं दे रही है, कल मैं सोच तुमको  बता दूंगी। 'दूसरे दिन बहुत सोचने के बाद बोली, " एक पैसे का दोख्ता (जर्दा पत्ता ) ला दोगे ? ' इस मांगने की घटना के पीछे जो सत्य अंतर्निहित है, उसको समझने की चेष्टा करनी होगी। 
 स्वामीजी हमलोगों को जिस वस्तु को माँगने के लिये कहा है, उसी वस्तु को यदि कोई माँगे, और उसको प्राप्त कर ले, या प्राप्त करने की चेष्टा में लगा रहे, तभी उसको मनुष्य कहा जा सकता है। यह चेष्टा, संग्राम या प्रयत्न ही 'मनुष्यत्व' प्राप्ति की साधना है। "मनुष्य तभी तक मनुष्य कहा जा सकता है,जब तक वह प्रकृति के उपर उठने ले लिये संघर्ष करता है।" जिस क्षण वह इस चेष्टा को बन्द करके प्रकृति के सामने अपनी पराजय स्वीकार कर लेता है, उसी क्षण वह मनुष्य की महिमा से स्वयं को गिरा लेता है। इसीलिये स्वामीजी ने चाहा था, उनकी ज्वलंत कामना  यही थी कि- हमलोग मनुष्य (ब्रह्मविद-मनुष्य) बन जाएँ। 
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  " सैकड़ों युग के लगातार सामाजिक अत्याचार से तुम्हारा सारा मनुष्यत्व नष्ट हो गया है! ...आओ, मनुष्य बनो। अपने संकीर्ण अन्धकूप से निकलकर बाहर जाकर देखो, सभी देश कैसे उन्नति के पथ पर चल रहें है। क्या तुम मनुष्य से प्रेम करते हो? तुम लोग क्या देश से प्रेम करते हो? तो फिर आओ हम भले बनने के लिए प्राणपण से चेष्टा करे। "
" मनुष्य के सच्चे स्वरूप में कोई विधि नहीं,कोई दैव नहीं,कोई अदृष्ट नहीं। अनन्त में विधान या नियम कैसे रह सकता है ?" श्रृंखला तोड़ डालो और मुक्त हो जाओ।"८/३२ 

नरेन् जानते थे, जिनको जान लेने से यह जगत अदृश्य हो जाता है, वे भगवान श्रीरामकृष्ण परमहंस ही परमब्रह्म हैं। वे त्रिगुणातीत हैं, शुद्ध-स्वरुप हैं, बाकी जो कुछ दीखता है वह सब गुणमय है, इसलिये अशुद्ध है, अतः यदि हम अपने मन को श्रीरामकृष्ण से जोड़ लें तो हमारा अंतःकरण भी शुद्ध हो जायेगा। अतः हम लोगों को भी उसी शाश्वत जीवन को प्राप्त करने के लिये , अपनी समस्त प्रकार की संभावनाओं को प्रकट करने की साधना (मन को श्रीरामकृष्ण से जोड़ लेने की साधना) करनी होगी। 
एक अद्भुत महान सत्ता (परमहंसदेव या सत्य-वस्तु) हमलोगों के भीतर छुपे हुए हैं। उसका नाम है हरी, और जो शक्ति उस 'है' को  छुपा देती है, और जो नहीं है (नाम-रूपात्मक प्रपंच या जगत) को दिखाती है उसे ही माया कहते हैं।  
उस माया को दूर हटाने के लिये ही प्रार्थना की जाती है- ' सत्यम परम धीमहि '! सविता का अर्थ यह सूर्य नहीं है, वह ब्रह्म है जिससे सब निकला-स्थित और लय होता है।  
 " माया के भीतर अग्रसर होने को एक वृत्त कहा जा सकता है-जो तुम्हें प्रस्थान बिंदु पर पुनः वापस ले आता है। अन्तर केवल इतना ही है कि यात्रा प्रारंभ करते समय तुम अज्ञानी थे और उस स्थान पर जब लौट कर आते हो, तब तुम पूर्ण ज्ञान उपलब्ध किये होते हो। यह है वह ज्ञान ,जो हमारा स्वभाव या स्वरूप है। इस ज्ञान को हमारा 'जन्मगत स्वत्व' भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वास्तव में हमारा जन्म तो है ही नहीं।"७/१०८
"मनुष्य जाति के बड़े बड़े नेताओं की बात यदि ली जाये, तो हमें सदा यही दिखलाई देगा कि ..सच्चा मनुष्यत्व या व्यक्तित्व ही वह वस्तु है,जो हम पर प्रभाव डालती है।४/१७१
 " आज के पाश्चात्य ईश्वरतत्व-अन्वेषियों का मूलमंत्र तो 'मनुष्य का सच्चास्वरूप' और आत्मा हो गया है।" ९/३७५   

  इसीलिये स्वामी जी कहते थे - " मेरे मित्रो ! पहले मनुष्य बनो,तब तुम देखोगे कि वे सब बाक़ी चीजें स्वयं तुम्हारा अनुसरण करेंगी। परस्पर के प्रति घृणित द्वेषभाव को छोड़ो और सदुद्देश्य, सदुपाय,सत्य को जानने का साहस एवं सदवीर्य का अवलंबन करो। तुमने मनुष्य योनि में जन्म लिया है, तो अपनी कीर्ति यहीं छोड़ जाओ।
तुलसी आयो जगत में, जगत हँसे तुम रोये।
ऐसी करनी कर चलो, तुम हँसो जग रोये।।
अगर ऐसा कर सको, तब तो तुम मनुष्य हो,अन्यथा तुम मनुष्य किस बात के ?१०/६२" 
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1 टिप्पणी:

  1. वहब ब्रह्म या सत्य रामकृष्ण हैं। अति उत्तम !!

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