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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

'स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना ' [8] " स्वामीजी का आदर्श --अन्तर्निहित शक्ति का उद्घाटन "

 'बनना और बनाना' -परस्पर अभिन्न और अवियोज्य रूप से सम्बद्ध हैं।
['बनना और बनाना'-द्वा सुपर्णा-' सिद्धार्थ और बुद्ध ' की भाँति इन्सेपरेबल है !
स्वामी विवेकानन्द के महान व्यक्तित्व-सम्पन्न जीवन एवं संदेशों के विशाल भण्डार के समक्ष खड़े होते ही, मन में स्वतः यह प्रश्न उठने लगता है, कि स्वामीजी ने हमलोगों के सामने कौन सा आदर्श प्रस्तुत किया था? महापुरुषों के मन, वचन एवं कर्म में समरूपता रहती है। अतएव विवेकानन्द के आइडियल (आदर्श-बी ऐंड मेक) को समझने के लिये हमलोगों को उनके विचारों, संदेशों तथा उनके कर्ममय जीवन को समान रूप से देखने-समझने की चेष्टा करनी होगी।
स्वामीजी के विचार बहु आयामी दिशा में धावित हुए थे,और उन्होंने मनुष्य-जीवन के प्रत्येक पहलु (3H) का बहुत सूक्ष्म अवलोकन किया था। तथा सच्चे 'विवेकज-ज्ञान' के द्वारा मनन करने के फलस्वरूप उनकी दृष्टि के समक्ष मनुष्य-जीवन की पूर्णता अनावृत (Exposed उद्घाटित) हो उठी थी। इसिलिए,उन्होंने अपनी वाणी के द्वारा, अपने सन्देशों का वितरण मानव-मात्र के कल्याण के लिये किया था। तथा अपने जीवन के माध्यम से, उन्होंने उसी पद्धति को दिखाने का प्रयास किया है, कि कोई मनुष्य उस पूर्णत्व की अभिव्यक्ति को कैसे संभव बना सकता है। इसीलिये उनके संदेशों के ही समान उनका जीवन भी हमलोगों के लिये एक आदर्श है। 
मानव-जीवन के लिये जिस प्रकार का एकमात्र सर्वश्रष्ठ आदर्श होना उचित है, स्वामी जी ने उसी का प्रचार -बिल्कुल किसी नए नाम वाले धर्म का आविष्कार और उसे प्रस्थापित करने के मोह में पड़े बिना,उसे न समझ पाने के प्रति शंका, अश्रद्धा, उपेक्षा किये बिना, बिल्कुल निर्भय और निःसंकोच होकर किया है। स्वामी विवेकानन्द कहते है कि,- 'कोई भी मौलिक आदर्श, समाज के सामने अपना सिर नहीं झुकाएगा, बल्कि समाज को ही आदर्श (Ideal) के सम्मुख अपना सिर झुकाना होगा। और समाज जितनी जल्दी वैसा करने लगेगा,समाज का उतना ही अधिक कल्याण होगा।' तथा स्वामीजी के मतानुसार - वही समाज श्रेष्ठ समाज है, जिस समाज में किसी श्रेष्ठ-आदर्श को कार्यरूप देना संभव हो जाता है। 
उन्हीं के शब्दों में तथा बहुत संक्षेप में उनके इस महान आदर्श को -'BE AND MAKE'! के द्वारा, अर्थात "मनुष्य बनो और मनुष्य बनाओ" के माध्यम से अभिव्यक्त किया जा सकता है।   यह 'बनना और बनाना' - आपस में अभिन्न और अविभाज्य (जो अलग न हो सके ) रूप से सम्बद्ध हैं। इसीलिये स्वामी
विवेकानन्द ने कहा था,"मेरा आदर्श अवश्य ही थोड़े से शब्दों में कहा जा सकता है और वह है- मनुष्यजाति को उसके दिव्य स्वरुप का उपदेश देना तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे प्रकट करने का उपाय बताना। " (माई आइडियल, इन्डिड, कैन बी पुट इन्टु अ फ्यू वर्ड्स, ऐंड  दैट इज टु प्रीच अन्टू मैनकाइंड देयर डिविनिटी, एंड हाउ टु मेक इट मेनिफेस्ट इन एव्री मूवमेन्ट ऑफ़ लाइफ।
  उनके इस आदर्श ' Be and Make ' को समझने की चेष्टा करने पर, जिस बात पर हमारी दृष्टि सबसे पहले जाती है, वह यह कि -स्वामीजी ने मात्र किसी तात्विक सिद्धान्त को ही आदर्श नहीं कह दिया था, 
बल्कि उसके साथ- साथ व्यावहारिक जीवन में उसके उपयोग के ऊपर भी यथेष्ट चिन्तन किया था। क्योंकि, कोई वैसा आदर्श जिसे यदि मनुष्य अपने व्यावहारिक जीवन में अपना ही न सके, तो वैसे थोथे आदर्श को, आदर्श कहकर पुकारना भी उचित नहीं है।
 स्वामीजी ने जिस आदर्श को हमारे सामने प्रस्तुत किया था, वह आदर्श जीवन के किसी एक क्षेत्र-विशेष में ही उपयोग किया जा सकने वाला आदर्श नहीं है, बल्कि वह तो समग्र जीवन के लिए आदर्श है। यह आदर्श हमारे व्यक्ति-जीवन, पारिवारिक-जीवन, सामाजिक-जीवन, राष्ट्रिय जीवन, एवं अन्तर्राष्ट्रीय जीवन --अर्थात व्यक्ति और सामाज जीवन के सभी क्षेत्रों में व्यवहारोपयोगी है। कई बार हमलोग समाज में पारस्परिक सम्बन्ध (correlation), धर्म, राजनीति, अर्थनीति, न्याय-नीति, आदि विभिन्न क्षेत्रों के लिये भिन्न-भिन्न आदर्शों को प्रतिष्ठित होते देखते हैं। किन्तु जब किसी व्यक्ति के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के ये सभी आदर्श किसी एक महत्तर और मूल आदर्श (मानदण्ड) के अनुरूप नहीं होते, उस समय उस व्यक्ति के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में एक प्रकार का अन्तर्विरोध दिखाई देने लगता है। तथा व्यावहारिक जीवन और विविध भूमिकाओं के आदर्शों  में समन्वय का अभाव होने के कारण, उस व्यक्ति के जीवन में अनेक प्रकार के संकट उपस्थित हो जाते हैं। 
इसीलिये चाहे कोई व्यक्ति हो या समाज, उसके निर्विघ्न प्रगति के लिये किसी न किसी एक मौलिक आदर्श (Archetype-आद्यरूप) का रहना आवश्यक हो जाता है।  वह आद्यरूप आदर्श, यदि ऐसे किसी सत्य पर प्रतिष्ठित हो, जो सत्य मनुष्य-जीवन का केन्द्रबिन्दु है, तभी वह आदर्श जीवन का सर्वांगीन कल्याण करने में सक्षम होता है। स्वामीजी ने उसी प्रकार के एक केन्द्रीय सत्य के प्रति  हमारी दृष्टि को आकर्षित कराया है, तथा मनुष्य-जीवन की समस्त भूमिकाओं को निभाते समय उसी को अपने आदर्श के रूप में ग्रहण करने का परामर्श दिया है। 
मनुष्य -मात्र के लिए वह केन्द्रीय सत्य या तत्व है - अनन्त ज्ञान, और अनन्त शक्ति,अनंत प्रेम -जो जाति-धर्म, वर्ण-लिंग-आदि भेद होने पर भी; प्रत्येक मनुष्य में अंतर्निहित है ! किन्तु जब तक हमलोगों के हृदय में - मानवमात्र में अंतर्निहित इस 'डिविनिटी' (पूर्णता) के प्रति, अटूट-श्रद्धा और विश्वास उत्पन्न नहीं हो जाता; तब तक-अपने मन से वैसे किसी अन्य आदर्श (आईं-चाईं बाबा) का आविष्कार करके, जो स्वयं इस मौलिक तत्व में स्वयं प्रतिष्ठित नहीं है, उसी को अपने जीवन के किसी क्षेत्र-विशेष का आदर्श मानकर; उसका अनुसरण हमलोग कितना भी  क्यों न करते रहें,उस क्षेत्र-विशेष में अस्थाई रूप से  थोड़ी-बहुत प्रगति होने से भी, वैसे आदर्श के द्वारा मनुष्य को कभी उसकी पूर्णता में या उसकी स्व-महिमा में प्रतिष्ठित नहीं कराया जा सकता। इसीलिये तब तक हमलोग यह नहीं कह सकते कि हमने अनुसरण करने योग्य
किसी सच्चे आदर्श (मापदण्ड) का अनुसन्धान कर लिया है।
 अतः हमारे जीवन का मुख्य कार्य क्या होना चाहिये ? यही कि, जो पूर्णत्व (मनुष्यत्व) मनुष्य-जीवन का मौलिक सत्य  है उस मनुष्यत्व को अपने जीवन के प्रत्येक कर्म में, प्रत्येक अभिव्यक्ति में, किसी भी परीक्षा की घड़ी में प्रकट करना। हम इस बात को आसानी से समझ सकते हैं कि, मनुष्य की वह शक्ति, (मनुष्यत्व) है - निःस्वार्थपरता, जो  उसके केंद्रीय-सत्य उसकी अविनाशी सत्ता 'आत्मा' के उपर प्रतिष्ठित है, तथा वह कभी देश-काल (या नाम-रूपात्मक प्रपंच) में परिवर्तित हो जाने वाली वस्तु नहीं है।कोई मनुष्य चाहे पश्चमी गोलार्ध का हो, या पूर्वी गोलार्ध का - मनुष्य की सत्ता जो पहले थी, वही आज भी है। अतः इस प्रकार के प्रश्न उठाना कि स्वामीजी द्वारा प्रस्तुत यह आदर्श -'बी ऐंड मेक' - आज के युग में उपयोगी है या नहीं, बिलकुल अप्रासंगिक है।  
इस प्रकार के केन्द्रीय-सत्य में प्रतिष्ठित एक आदर्श (निःस्वार्थपरता) के साथ, जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के छोटे छोटे आदर्श भी संयुक्त हो जाने के बाद, भले ही शाश्वत न हों, किन्तु दीर्घ काल तक अवश्य प्रभावी बने रहेंगे। क्योंकि देश और युग (काल) की आवश्यकता के अनुसार वह परिवर्तन-सापेक्ष सामान्य आदर्श 'निःस्वार्थपरता' ही अपने को विभिन्न नाम-रूपों (कभी राम,कभी बुद्ध,ईसा मुहम्मद, रामकृष्ण, स्वामीजी, या कभी नवनी दा आदि-आदि) में अभिव्यक्त करती रहती है, किन्तु हर युग उस सच्चे नेता का मुख्य लक्ष्य रहेगा- मनुष्य में अन्तर्निहित 'पूर्णत्व '- अनन्त ज्ञान और शक्ति को प्रस्फुटित करने में सहायता करना। ऐसा होने से ही, विभिन्न क्षेत्रों के आदर्शों में सच्ची सहमति बनी रहेगी, तथा परस्पर पूरक के रूप में कार्य करते हुए, प्रत्येक क्षेत्र से जीवन को पूर्णत्व की दिशा में ले जायेंगे, तथा आपस में अन्तर्विरोध का भाव नहीं रहने के कारण जीवन के किसी भी क्षेत्र-विशेष का आदर्श कभी असफल नहीं होगा। 
 इस मूलरूप आदर्श -'बी ऐंड मेक' का सरल परिचय है- ' स्वयं निःस्वार्थपर मनुष्य बनने की चेष्टा करना और दूसरों को भी मनुष्य बनने में सहायता करना।'  क्योंकि सृष्टि और मानव-समाज के बीच एक प्रकार का अंतर्निहित एकत्व (Underlying unity) रहता है, इसीलिये अन्य मनुष्यों को भी अपने साथ लिए बिना,(समाज से कट कर) कोई मनुष्य अकेले अपना सुधार नहीं कर सकता।  मनुष्य बनने का अर्थ ही है-
अपनी अन्तर्निहित सत्ता या सत्य का, शक्ति (निःस्वार्थपरता) और ज्ञान का प्रकटीकरण' अथवा उस दिव्यता की अभिव्यक्ति, जिससे जीवन में पूर्णता आती हो। 
इसी लक्ष्य पर अटल रहते हुए यदि मनुष्य के व्यक्तित्व को गठित किया जाय, उसके चरित्र का गठन किया जाय, शिक्षा अर्जित की जाय, और साथ ही साथ परिवार चलाने के लिये आवश्यक भोग-सामग्रियों का संग्रह भी किया जाय, तभी धीरे धीरे मनुष्य अपने यथार्थ आदर्श (साम्य-भाव ) में स्थित होने की ओर अग्रसर हो सकता है। इसीलिये स्वामीजी इस आदर्श को ही मूल (Archetype-आद्यरूपआदर्श कहते हैं। क्योंकि इस आदर्श का अनुसरण करने से मनुष्य का सामान्य जीवन (normal life) भी उपेक्षित नहीं होता है। किन्तु यदि मनुष्य का जीवन असंयमित हो, लक्ष्यहीन हो, तो उसके जीवन को बहुत बड़ा नुकसान पहुँचता है। अतः इस जीवन के लक्ष्य को, संयम को, नियम (निःस्वार्थपरता) को अपने दैनंदिन जीवन में धारण करने की आवश्यकता है। और जो वस्तु (निःस्वार्थपरता) हमारे जीवन को लक्ष्या-भिमुखी बनाती है, उसे समग्र रूप से धारण करती है, उसे नियंत्रित करती है- उसी का नाम तो धर्म है।

इसीलिये स्वामीजी ने (मानवजाति के सच्चे मार्गदर्शक नेता पूज्य नवनी दा ने) धर्म क्या है, इस बारे में बहुत प्रकार से समझाने की चेष्टा जीवन के अंतिम क्षणों तक करते रहते हैं। किन्तु उन्होंने कभी धार्मिक आचार-अनुष्ठान (व्यक्तिगत-धर्म या पूजा पद्धति) को ही धर्म का मूल बात नहीं कहा है। हमलोग कहीं यह भूल न कर बैठें, इसीलिये स्वामीजी अक्सर रिलिजन (धर्म) की बात न कहकर स्पिरिचुअलिटी या आध्यात्मिकता की बात कहते थे। 'आध्यात्मिकता' का अर्थ है - मनुष्य की आत्मा उसके मूल तत्व को, उसमें अन्तर्निहित ज्ञान और शक्ति अर्थात निःस्वार्थपरता को सतत अभिव्यक्त करने की चेष्टा करते रहने को ही आध्यात्मिकता कहते हैं। 
इसीलिये स्वामीजी जब सम्पूर्ण राष्ट्र को पुनरुज्जीवित करने की बात कहते हैं, सम्पूर्ण राष्ट्र को जब जाग्रत करने की बात कहते हैं, या राष्ट्र को उन्नत बनाने की बात कहते हैं, तो सब कुछ से पहले देश को इसी आध्यात्मिकता की बाढ़ में प्लावित कर देने पर जोर देते हैं। स्वामीजी के मन में मनुष्य-मात्र के लिये ऐसा महान आदर्श - कि 'निःस्वार्थपर मनुष्य बनने और बनाने' का आदर्श, सर्वदा जाग्रत रहता था । इसीलिये जब वे अनन्त शक्ति, अनन्त ज्ञान से सम्पन्न मनुष्य को दुर्बल,असहाय, निराश, दुःख-कष्ट में गिरा देखते थे, तो उनको बहुत कष्ट पहुँचता था। मनुष्य-मात्र के प्रति अथाह ममता और सहानुभूति से भरा हृदय रहने के कारण, उसकी दुर्बल अवस्था को देखने से उनकी आँखों से अश्रु झरते थे। किन्तु स्वामीजी का वह मानव-प्रेम, इन्द्रिय-प्रकृति के दासरूपी मनुष्य के काल्पनिकआदर्श मूर्ति की आराधना नहीं थी, बल्कि सर्वशक्ति ज्ञानाधार मनुष्य के स्वराज्य-च्यूत, धूलि धूसरित किन्तु संभावनाओं से परिपूर्ण जीवन्त शरीर-मन आश्रित 'सत्ता' की पूजा करना ही स्वामी विवेकानन्द की मानवता है।
जो मनुष्य अपनी सत्ता के सम्बन्ध में सोया हुआ है, जो अपनी गरिमा के प्रति सचेत (मान-हूँश) नहीं है, अनन्त सम्भावना की खोज नहीं करता, वह स्वाभाविक रूप से स्वयं को दुर्बल सोचता है, तुच्छ समझता है।  तथा इस असहाय भाव का अतिक्रमण करने को कठिन समझकर स्वार्थ को ही परमार्थ समझने लगता है, और स्वयं को दिनोंदिन गहरे अंधकार में निमग्न करता चला जाता है।  इस स्वार्थपरता की हीन बुद्धि 
को त्याग करके ही हमलोग परमार्थ की ओर, आदर्श की ओर, पूर्णता की ओर, अनन्त शक्ति को उद्घाटित करने के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं। इसीलिये स्वामीजी के मतानुसार- 'निःस्वार्थपरता ही ईश्वर है।' हम लोग जिस स्वार्थपरता (नाम-रूप में आसक्ति), संकीर्णता, हीनभावना (Inferiority complex) का त्याग करते हुए, अपनी वृहत सत्ता की ओर,पूर्णता की ओर, सत्य के मार्ग पर अग्रसर होते जाते हैं, वही हमलोगों का यथार्थ त्याग है।
और इसी मार्ग पर आगे बढ़ने में दूसरों की सहायता करना ही उच्च स्तर की 'समाज-सेवा' है। हमलोग जैसे जैसे वृहत की ओर, पूर्णता की ओर, निःस्वार्थपरता की ओर, अन्तर्निहित सत्ता की ओर, परायों को भी अपना बना लेने की दिशा में हम जितना अधिक अग्रसर होते जाते हैं, उतना ही हम निर्भय होते जाते हैं,उतना ही अधिक ज्ञानालोक पाते रहते हैं, उतने ही अधिक शक्तिशाली होते जाते हैं। और हमलोगों के समस्त कार्यों में, हमलोगों की अन्तर्निहित निष्कलंक सुन्दरता, पवित्रता, ज्ञान और शक्ति, उतना ही अधिक प्रस्फुटित होने लगती है। ऐसे मनुष्य के लिये कुछ भी असंभव नहीं है, कोई भी वस्तु अलभ्य नहीं रह जाती है, नैराश्य और विषाद आदि तो कभी उसके पास भी नहीं फटकते।
स्वामीजी ने दिलोजान से चाहा था, कि यह सरल किन्तु प्रबल व्यावहारिक-वेदान्त सूत्र -'बी ऐंड मेक' को  प्रत्येक मनुष्य तक, ग्रामों की साधारण जनता तक, उदारता के साथ, बिना ऊँच-नीच का भेद किये वितरित किया जाय। और " एक नवीन भारत निकल पड़े- निकले हल पकड़कर, किसानों की कुटी भेदकर, मछुआ, मोची, मेहतरों की झोपड़ियों से। निकल पड़े बनियों की दुकानों से, भुजवा के भाड़ के पास से, कारखाने से, हाट से, बाजार से। निकले झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से। "स्वामीजी ने चाहा था, कि हमारी शिक्षानीति ऐसी बने जिससे प्रत्येक मनुष्य अपनी अनन्त सम्भावनाओं को अभिव्यक्त करने में समर्थ हो जाये।
हमारी राजनीति इतनी स्वच्छ हो, जिसमें सभी मनुष्यों को अपनी अन्तर्निहित शक्ति को जाग्रत करने का अवसर प्राप्त हो सके। सामाज-सेवा की नीति ऐसी प्रचलित हो, जिसमें ऊँच-नीच, धनी-दरिद्र, विद्वान-मूर्ख के भेद एवं समस्त प्रकार के विशेषाधिकार के दावों का अवसान हो जाये। अर्थिक-नीति में ऐसा परिवर्तन हो, जिसमें शोषण-ठगी, लूट-घोटाला समाप्त हो जाय, और हमारे प्रत्येक देशवासियों के लिये कम से कम दोनों शाम का भोजन का प्रबंध अवश्य हो जाये।
 कुमारी मेरी हेल को १ नवम्बर १८९६ को लिखित एक पत्र में स्वामीजी कहते हैं, " एक ही वर्ग का व्यक्ति सदा सुख या दुःख भोगता रहे, उससे तो अच्छा है कि सुख-दुःख बारी बारी से सबों में विभक्त किया जाये। इस दुःखी संसार में सबको सुख-भोग का अवसर दो, ताकि  इस तथाकथित सुख का अनुभव कर लेने के बाद,वे संसार, शासन-विधि और अन्य सब झंझटों को छोड़ कर परमात्मा के पास आ सकें। " ५/३८७  ऐसी धर्मनीति आचरित हो, जिससे कूसंस्कार दूर हो सके, धार्मिक कट्टरता समाप्त हो जाय, मनुष्य का दूसरे मनुष्य के साथ प्रेम बढ़े, भोग में संयम रहे, परार्थता में स्वार्थ-बुद्धि हो, त्याग के महत्व का प्रचार हो, मनुष्य की सच्ची सेवा के प्रति हृदय में प्रेम का उन्मेष हो, हृदय का प्रसार हो।
स्वामीजी के इस उच्च स्तर की समाज-सेवा में, या 'बी ऐंड मेक' को ही अपना आदर्श मानने वाले युवाओं के जीवन में निद्रा का स्थान नहीं है, आलस्य का स्थान नहीं है। " कायर और मूर्ख लोग ही भाग्य की दुहाई देते हैं। वीर तो सिर ऊँचा करके बोलता है- मैं स्वयं अपने भाग्य का निर्माण करूँगा। "
स्वामीजी का आदर्श इसी शक्ति को उद्घाटित कर देने का आदर्श है। " शक्ति ही सुख और आनन्द है, शक्ति ही अनन्त और अविनाशी जीवन है।"  ईश्वर करें, कि हमलोगों का आदर्श दीप्तिमान हो, हमारा जीवन विकसित हो, हम लोगों की शक्ति उद्घाटित हो, और हमारी शक्ति-आराधना सार्थक हो !

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