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रविवार, 26 फ़रवरी 2017

$$$ माया (अज्ञान-अविद्या -nescience) क्या है ?

[पृष्ठभूमि : वार्ता एवं संलाप: २२ (विवेकानन्द साहित्य खण्ड ६/ The Complete Works of Swami Vivekananda‎ | Volume 7/Conversations And Dialogues-ix) स्थान: बेलूर,किराए का मठ परिसर: वर्ष १८९८:स्वामी विवेकानन्द जी १८९८ में अपने शिष्य के साथ मठ की भूमि पर भ्रमण करते हुए तथा अपनी ऋषि-दृष्टि से ११८ वर्ष बाद २०१६ में आयोजित होने वाले महामण्डल के गोल्डन जुबली युवा प्रशिक्षण शिविर को 'बेलुड़ विद्या मन्दिर' में आयोजित होते देख रहे हैं! तथा " गुरु-शिष्य वेदान्त परम्परा " में भावी नेतृत्व प्रशिक्षक-प्रशिक्षण शिविर (लीडरशिप ट्रेनर्स-ट्रेनिंग कैम्प- Teachers Training School in the " Ramakrishna-Vivekananda Vedanta tradition") को आयोजित करने की पद्धति तथा नियम (रुप-रेखा) आदि पर चर्चा कर रहे हैं।]
स्वामी विवेकानन्द - " यह मठ आध्यात्मिक साधना तथा ज्ञान की संस्कृति का प्रधान केन्द्र होगा, यही मेरी इच्छा है। यहाँ से जिस आध्यात्मिक शक्ति की उत्पत्ति होगी, वह पृथ्वी भर में फैल जायेगी, और वह मनुष्य के जीवन की गति को उच्चतर लक्ष्य की दिशा में मोड़ देगी। ज्ञान, भक्ति, योग, कर्म के समन्वय स्वरुप सम्पूर्ण मानवता के लिये कल्याणकारी उच्च आदर्श यहाँ से प्रसृत होंगे। इस मठ के 'टेम्पल ऑफ़ लर्निंग'
(बेलुड़ शिक्षक प्रशिक्षण विद्या मन्दिर) में प्रशिक्षण के द्वारा जो यथार्थ मनुष्य (मानवजाति के मार्गदर्शक नेता) निर्मित होंगे, उनकी आज्ञा से एक समय में पृथ्वी के सुदूरवर्ती देशों में भी प्राण संचारित होने लगेगा। समय (२०१६) आने पर यथार्थ धर्म (आध्यात्मिकता) के सच्चे आत्म-जिज्ञासु यहाँ आकर एकत्र हो जायेंगे। …इसि प्रकार के हजारों विचार मेरे मन में उठ रहे हैं। प्राचीन काल की पाठशालाओं के अनुकरण पर यह " बेलुड़ विद्या मन्दिर " स्थापित होगा। बालब्रह्मचारी (उपनिषद के सत्यार्थी) उस स्थान पर रहकर शास्त्रों का अध्यन करेंगे। उनके भोजन-वस्त्र का प्रबन्ध मठ की ओर से किया जायेगा। ये सब ब्रह्मचारी ५ वर्ष तक शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात यदि चाहेंगे तो घर लौटकर गृहस्थी कर सकेंगे। यदि इच्छा हो तो मठ के वरिष्ठ संन्यासियों की अनुमति लेकर संन्यास ले सकेंगे। ....धीरे धीरे जब इस प्रकार मठ का काम प्रारम्भ होगा, उस समय कैसा होगा, बोल तो। " 
शिष्य - तो क्या आप प्राचीन काल की तरह 'गुरुगृह-वास वाली ब्रह्मचर्याश्रम' की प्रथा को देश में फिर से प्रचलित करना चाहते हैं ?
स्वामी जी - और नहीं तो क्या ? (आधुनिक शिक्षा का सबसे बड़ा दोष) 'दी मॉडर्न सिस्टम ऑफ़ एजुकेशन गिव्स नो फैसिलिटी फॉर द डेवलपमेन्ट ऑफ़ दी नॉलेज ऑफ़ ब्रह्मन। प्रचलित शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष यह है कि उसमें ब्रह्मविद्या के विकास का जरा भी स्थान नहीं है। पहले के सामान गुरु-गृहवास के लिए ब्रह्मचर्याश्रम तो स्थापित करने होंगे, किन्तु इस समय के अनुरूप उसमें अनेक उपयुक्त परिवर्तन भी करने होंगे। ...... वह सब पीछे बताऊँगा ! [स्वामीजी जिस ५ अभ्यास की प्रशिक्षण पद्धति
को बताना चाहते थे, पूज्य नवनी दा ने गुरुगृह वास को युगानुसार सरल बनाकर छह दिवसीय युवा प्रशिक्षण शिविर के सिलेबस में ऑर्डिनरी ट्रेनी और लीडर ट्रेनी दो भाग में ढाल दिया है।]  
स्वामी जी फिर कहने लगे - ... अमुक जगह पर एक लंगरखाना रहेगा। उसमें सचमुच जो 'इन्डिजेन्ट' या मुहताज लोग हैं (केवल धन से ही गरीब नहीं भाव से भी गरीब) उनको नारायण मानकर उनकी सेवा करने की व्यवस्था होगी। (महामण्डल के वरिष्ठ सदस्यों को-प्रमोददा कोउत्साही ब्रह्मचारियों को, इस लंगरखाने का संचालन सिखाना होगा। उन्हें कहीं से प्रबन्ध करके, आवश्यक हो तो भीख मांगकर (चंदा लेकर) भी इस लंगरखाने को चलाना होगा। इस विषय में मठ (महामण्डल केन्द्रीय कमिटी) किसी प्रकार की आर्थिक सहायता सहायता नहीं कर सकेगा। ब्रह्मचारियों को ही उसके लिये धन-संग्रह करके लाना पड़ेगा। (हृदय का विस्तार ?) इस प्रकार धर्मार्थ लंगर में ५ वर्ष का प्रशिक्षण समाप्त होने पर वे विद्या-मन्दिर शाखा में प्रवेश करने का अधिकार पा सकेंगे। लंगरखाने में ५ वर्ष तक और विद्या-मन्दिर में ५ वर्ष तक, कुल १० वर्ष प्रशिक्षण ग्रहण करने के बाद मठ के स्वामियों से दीक्षित होकर वे 'संन्यास आश्रम' (लीडर ट्रेनीमें प्रविष्ट हो सकेंगे-केवल शर्त होगी कि वे संन्यासी बनना चाहें और मठ के अध्यक्ष उन्हें योग्य अधिकारी समझकर संन्यास देना चाहें। परन्तु मठाध्यक्ष किसी किसी विशेष सद्गुणी ब्रह्मचारी के सम्बन्ध में इस नियम का उल्लंघन करके भी उन्हें जब इच्छा हो, संन्यास में दीक्षा दे सकेंगे । [लीडरशिप प्रशिक्षक-प्रशिक्षण का क्लास लेने की शर्त होगी कि महामण्डल के वरिष्ठ भाइयों से महामण्डल के शिविर में मनःसंयोग का क्लास लेने की अनुमति (चपरास?) प्राप्त कर सकें]  परन्तु साधारण ब्रह्मचारियों (ऑर्डिनरी कैम्पर्स) को, उसी क्रम से संन्यासाश्रम (लीडर ट्रेनी) में प्रवेश करना होगा। मेरे मस्तिष्क में ये सब विचार मौजूद हैं। [जिसे मैं १९६७ में भावी महामण्डल नेता (नवनी दा?) को बताऊँगा।]   
शिष्य --महाराज, मठ में (महामण्डल युवा प्रशिक्षण शिविर में) इस प्रकार तीन शाखाओं की स्थापना का क्या उद्देश्य है ? 
स्वामी जी - समझा नहीं ? पहले अन्नदान; उसके बाद विद्यादान और सर्वोपरि ज्ञानदान ! (फर्स्ट ऑफ़ ऑल, कम्स दि गिफ्ट ऑफ़ फ़ूड; नेक्स्ट इज दि गिफ्ट ऑफ़ लर्निंग, ऐंड दि हाईएस्ट ऑफ़ आल इज दि गिफ्ट ऑफ़ नॉलेज।) इन तीन भावों का समन्वय इस मठ से (युवा प्रशिक्षण शिविर में?) करना होगा।सर्वप्रथम अन्नदान की सेवा करते करते ब्रह्मचारियों के मन में '' दि आईडिया ऑफ़ प्रैक्टिकल वर्क फॉर दि सेक ऑफ़ अदर्स " 'परार्थ कर्म को भी व्यवहारिक तत्परता के साथ करने के कारण उनमें कर्मपरायणता एवं 'शिव मानकर जीव-सेवा का भाव' दृढ़ होगा। तभी ब्रह्मचारी यथासमय ब्रह्म-ज्ञान पाने की योग्यता एवं संन्यासाश्रम ( लीडरशिप क्लास) में प्रवेश करने का अधिकार प्राप्त कर सकेंगे। उससे उनके चित्त धीरे धीरे निर्मल होकर उनमें सात्विक भाव का स्फुरण होगा। (बाइ कन्टिन्यूअस्ली प्रैक्टिसिंग दी गिफ़्ट ऑफ़ फ़ूड, दी ब्रह्मचारीन्स विल हैव दी आइडिया ऑफ़ प्रैक्टिकल वर्क फॉर दी सेक ऑफ़ अदर्स ऐंड दैट ऑफ़ सर्विंग ऑल बीइंग्स इन दी स्प्रीट ऑफ़ लॉर्ड फर्मली इम्प्रेस्ड ऑन देयर माइंड।)
शिष्य- महाराज, ज्ञानदान (आध्यात्मिक ज्ञान का दान करना ) ही यदि श्रेष्ठ है, फिर अन्नदान और विद्यादान की शाखायें स्थापित करने की क्या आवश्यकता ? 
स्वामी जी- तू अभी तक मेरी बात नहीं समझा ! सुन-इस अन्नाभाव के युग में यदि तू दूसरों की सेवा के उद्देश्य से गरीब-दुःखियों को भिक्षा माँगकर या जैसे भी हो, दो ग्रास अन्न दे सका तो जीव-जगत का तथा तेरा तो कल्याण होगा ही-साथ ही साथ तू (माने महामण्डल) इस सत्कार्य के लिये सभी की सहानुभूति भी प्राप्त कर सकेगा। " दी वर्ल्डली माइंडेड पीपल, टाइड डाउन टु 'लस्ट ऐंड वेल्थ' विल हैव फेथ इन यू फॉर दिस लेबर ऑफ़ लव ऐंड कम फॉरवर्ड टू हेल्प यू ![ऐसा कठिन कार्य जिसके करने पर (नामयश या धन नहीं) बल्कि ऐसा आनंद मिले,जिससे मनुष्य को न भूख-प्यास लगती है, न थकान होता है -महामण्डल कैम्प जैसा कार्य !!]  इस सत्कार्य के लिये तुझपर (युवा संगठन पर) विश्वास करके 'लस्ट ऐंड लूकर' (कामुकता और कमाई) में बँधे हुए गृहस्थ लोग भी तेरी सहायता करने के लिये अग्रसर होंगे। तू विद्यादान या ज्ञानदान करके जितने लोगों को आकर्षित कर सकेगा, उसके हजार गुना लोग तेरे इस अयाचित अन्नदान द्वारा (लेबर ऑफ़ लव द्वारा) आकृष्ट होंगे। इस कार्य में (झरना-कुण्ड से धजाधारी जल चढ़ाने वाले को भोजन करवाने में?) तुझे जनसाधारण की जितनी सहानुभूति प्राप्त होगी -उतनी अन्य किसी कार्य में नहीं हो सकती। फिर यथार्थ सत्कार्य में भगवान स्वयं मनुष्य की सहायता करते हैं ! (इन अ ट्रुली नोबल वर्क, नॉट टु सपीक ऑफ़ मेन,इवेन गॉड हिमसेल्फ  बीफ्रेंन्ड्स दी डूअर! साहसी जो नाश की गति नाचता है, माँ उसीके पास आयी !) इसी तरह लोगों के आकृष्ट होने पर (कैम्प में चटनी और सिद्ध भोजन के द्वारा आकृष्ट होने पर) ही तू उनमें विद्या तथा ज्ञान प्राप्त करने की आकांक्षा को उद्दीप्त कर सकेगा। इसलिये पहले अन्नदान (किसी भी कैम्प में पहले प्रमोद दा !) ही आवश्यक है।
शिष्य -महाराज, खैराती लंगरखाना (फीडिंग होम्स) खोलने के लिये पहले स्थान चाहिये, उसके बाद उसके लिये मकान आदि बनवाना पड़ेगा, फिर काम चलाने के लिये धन चाहिये। इतना रुपया कहाँ से आयेगा?      
स्वामी जी -..... (जानिबिगहा विवेकानन्द ज्ञान मन्दिर स्कूल, गया में (विद्या मन्दिर विथ फीडिंग होम)
'लीडरशिप ट्रेनर्स (टीचर्स) ट्रेनिंग स्कूल  खोल ले !) स्वयं उनके लिये भिक्षा मांगकर ला। स्वयं पका कर उन्हें खिला। इस प्रकार कुछ दिन करने से ही देखेगा - तेरे इस कार्य में सहायता करने के लिये कितने ही लोग अग्रसर होंगे; कितने ही लोग धन देंगे। 'न हि कल्याणकृत कश्चित् दुर्गतिं तात गच्छति।' हे तात, कोई भी शुभ कर्म करने वाला दुर्गति को नहीं प्राप्त होता है।।' गीता ६/४० 
शिष्य -हाँ ठीक है। परन्तु उस प्रकार लगातार कर्म करते करते समय पर कर्म-बन्धन भी तो आ सकता है। 
स्वामी जी -कर्म के परिणाम के प्रति यदि तेरी दृष्टि न रहे और सभी प्रकार की कामना तथा वासनाओं के परे जाने के लिये यदि तुममें एकान्त आग्रह रहे तो वे सब सत्कार्य तेरे कर्म-बन्धन काट डालने में ही सहायता करेंगे! ऐसे कर्म (निःस्वार्थ महामण्डल कैम्प) से कहीं बन्धन आयेगा ? यह तू कैसी बात कह रहा है ? बल्कि पूर्णतया दूसरों के कल्याण के लिए किये हुए इस प्रकार के कर्म ही कर्म-बन्धनों की जड़ काटने के लिये एक मात्र उपाय हैं। -इसके अतिरिक्त (महामण्डल युवा प्रशिक्षक-प्रशिक्षण शिविर चलाने के अतिरिक्त) कोई दूसरा मार्ग नहीं है -नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय! हे तात, कोई भी शुभ कर्म करने वाला दुर्गति को नहीं प्राप्त होता है।। (दादा कहते थे-महामण्डल का कार्य निष्ठापूर्वक करते रहो; अन्य कोई साधना नहीं करनी पड़ेगी मुक्त हो जाओगे ! 
[ वैदिक ऋषियों ने मानव को 'अमृत-पुत्र' के नाम से सम्बोधित किया है -  " श्रृंण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा ये धामानि दिव्यानि तस्थुः। वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥श्वेताश्वतरोपनिषत्/3/८॥- अर्थात मैं उस महिमावान पुरुष को जानता हूँ जो सूर्य के वर्ण का है और अंधकार से परे है। उसको जानने के बाद जन्म-मृत्यु का बंधन नहीं रह जाता। मोक्ष की प्राप्ति का अन्य रास्ता नहीं है! कितना स्पष्ट और संशय से रहित भाव है इन शब्दों में! ] 
शिष्य - महाराज, अब तो धर्मार्थ लंगर (फीडिंग होम) एवम सेवाश्रम (होम ऑफ़ सर्विस) के सम्बन्ध में आपके आइडियाज (मनोभाव) को विशेष रूप से सुनने के लिये और भी उत्कण्ठित हो रहा हूँ।  
स्वामी जी - गरीब दुःखियों के लिये (भावी नेताओं के लिये) छोटे छोटे ऐसे कमरे बनवाने होंगे, जिनमें हवा आने-जाने की अच्छी व्यवस्था रहे। (जैसा सभी स्कूलों में होता है ।) एक कमरे में दो या तीन व्यक्ति रहेंगे। उन्हें अच्छे बिछौने और साफ कपड़े देने होंगे। उनके लिए एक डॉक्टर रहेगा, जो सप्ताह में एक या दो बार सुविधानुसार उन्हें देख जायेगा। (किन्तु ६ दिवसीय कैम्प में एलोपैथी और होमियोपैथी दोनों डॉक्टर और दवा, तथा एक बेड पानी चढ़ाने के अरेन्जमेन्ट भी रहेंगे।) धर्मार्थ लंगरखाने (फीडिंग होम) के तत्वाधान में सेवाश्रम (अस्पताल) एक विभाग की तरह रहेगा। इसमें रोगियों की सेवा-शुश्रूषा की जायगी। एक बड़ा रसोईघर (पाकशाला और उससे सटे बड़ा सा डायनिंग हॉल रहेगा, जिसमें एक साथ ५००-१००० व्यक्तियों को बैठाकर खिलाने की व्यवस्था होगी।) लंगरखाने में केवल 'दीयतां भुज्यतां '-(फ़ूड डिमान्डेड ऐंड सप्लाइड) यही ध्वनि उठेगी । (और नैपथ्य में हेला कोरो ना बाछा देर आमार बजता रहेगा।) भात का पानी (माड़) गंगा जी में पड़ने से गंगा जी का जल सफ़ेद (स्वच्छ) हो जायेगा। इस प्रकार धर्मार्थ लंगरखाना (के माड़ से गङ्गे सफाई योजना) बना देखकर मेरे प्राणों को शान्ति (सोलेस टु माई हर्ट) मिलेगी। 
शिष्य ने कहा - " आपकी जब इस प्रकार इच्छा है तो सम्भव है समय पर (११८ वर्ष बाद-२०१६ में
वास्तव में ऐसा ही हो। "
शिष्य की बात सुनकर स्वामीजी गंगा की ओर थोड़ी देर तक ताकते हुए मौन रहे। [मानो २०१६ में आयोजित महामण्डल के गोल्डन जुबली कैम्प को " बेलुड़ विद्या मन्दिर" में आयोजित होता हुआ देख रहे हों] ......... फिर प्रसन्न मुख शिष्य से सस्नेह कहने लगे-' तुममें से कब किसके भीतर से सिंह जाग उठेगा, यह कौन जानता है ? यदि तुममें से किसी एक में भी माँ उस ज्ञानाग्नि को प्रज्ज्वलित के दें तो पृथ्वी भर में वैसे कितने ही लंगरखाने बन जायेंगे। 
बात क्या है, जानते हो ?[नॉलेज एंड पावर एंड डिवोशन --एव्रीथिंग एग्जिस्ट्स इन फुल्लेस्ट इन ऑल बीइंग्स] ज्ञान-शक्ति-भक्ति या 'बुद्धिबल, बाहुबल और आत्मबल' (3H) सभी मनुष्यों में पूर्ण भाव से अन्तर्निहित है, किन्तु हम विभिन्न व्यक्तियों में उनके विकास की न्यूनाधिकता को देखकर किसी को बड़ा तो किसी को छोटा मानने लगते हैं। मात्र जीव के मन पर पड़ा हुआ एक प्रकार का आवरण उसके सम्पूर्ण विकास को रोक कर खड़ा है। वह हटा कि बस सब कुछ हो गया। एक बार यदि तुम मन की चहारदीवारी (अहं) को एक बार तोड़कर निकल गये, तो " वटेवर यू वांट, वटेवर यू विल डिजायर, विल कम टु पास !'  तो तुम्हारी जो भी इच्छा होगी, जो भी तुम चाहते हो, वह सब तुम्हारे पास आ जाएगा !"
स्वामी जी की बात सुनकर शिष्य सोचने लगा कि उसके स्वयं के मन का पर्दा कब हटेगा और कब उसे ईश्वर-दर्शन प्राप्त होगा! 
स्वामी जी फिर कहने लगे -"यदि ईश्वर ने चाहा तो इस मठ को समन्वय का महान क्षेत्र बनाना होगा। हमारे श्री रामकृष्ण सर्व भावों की साक्षात् समन्वय-मूर्ति हैं। उस समन्वय के भाव (मत-अविरोध) को यहाँ पर जगाकर रखने से ही श्रीरामकृष्ण संसार में प्रतिष्ठित रहेंगे। सारे मत, सारे पन्थ, ब्राह्मण-चाण्डाल सभी जिससे यहाँ पर आकर अपने अपने आदर्श को देख सकें, वह करना होगा। उस दिन जब मठ-भूमि पर श्री रामकृष्ण की प्राण-प्रतिष्ठा की, तब ऐसा लगा मानो यहाँ से उनके भावों का विकास होकर चराचर विश्व भर में छा गया है। मैं तो जहाँ तक हो सके, कर रहा हूँ और करूँगा; तुम लोग भी रामकृष्ण के उदार भाव लोगों को समझा दो। 
केवल वेदान्त पढ़ने से कोई लाभ नहीं होगा। असल में प्रतिदिन के व्यावहारिक जीवन में शुद्धाद्वैत-वाद (प्योर अद्वैत-इज्म) की सत्यता को प्रमाणित करना होगा। श्री शंकर इस अद्वैतवाद को जंगलों और पहाड़ों में रख गये हैं; मैं अब उसे वहाँ से लाकर संसार और समाज में प्रसारित करने के लिये आया हूँ। घर घर में, घाट-मैदान में, जंगल-पहाड़ों में इस अद्वैतवाद का गम्भीर नाद उठाना होगा। तुम लोग सहायक बन कर मेरे काम में लग जाओ।   
शिष्य -महाराज, ध्यान की सहायता से उस भाव का अनुभव करने में ही मानो मुझे अच्छा लगता है। उछल-कूद करने  की इच्छा नहीं होती।(अर्थात अधिकांश आलसी लोगों की तरह मुझे भी केवल ज्ञान की चर्चा करने का मन तो करता है, किन्तु व्यावहारिक जीवन में चन्दा माँगकर शिविर करने-शिवज्ञान से जीव सेवा (परिश्रम) करने की इच्छा नहीं होती।
स्वामी जी - वह तो नशा करके बेहोश पड़े रहने की तरह हुआ। केवल ऐसे रहकर क्या होगा? अद्वैतवाद की प्रेरणा से कभी ताण्डव नृत्य कर ( dance wildly) तो कभी स्थिर होकर रह। अच्छी चीज पाने पर क्या उसे अकेले खाकर ही सुख होता है ? दस आदमियों को देकर खाना चाहिये। आत्मानुभूति प्राप्त करके यदि तू मुक्त हो गया तो इससे दुनिया को क्या लाभ हुआ ? त्रि-जगत को मुक्त करना होगा ! महामाया के राज्य में आग लगा देनी होगी; तभी नित्य-सत्य में प्रतिष्ठित रह सकोगे।
उस आनन्द की क्या कोई तुलना है ? (हैज दैट ब्लिस एनी मैच -माइ ब्याय ?)निरवधि गगनाभं निष्कलं निर्विकल्पं हृदि कलयति विद्वान्ब्रह्म पूर्णं समाधौ ॥" (विवेकचूडामणि/ ४०९ ॥) -अर्थात जब तू उस कालातीत, आकाश के समान निःसीम (limitless like the skies.), निश्चेष्ट, निर्विकल्प भूमानन्द में प्रतिष्ठित होगा, जीव-जगत में सर्वत्र अपनी ही सत्ता देखकर तू दंग रह जायेगा ! स्थावर और जंगम सभी तुझे अपनी सत्ता ज्ञात होंगे। उस समय अपनी ही तरह सबकी चिन्ता किये बिना तू रह नहीं सकेगा। ऐसी स्थिति ही कर्म के बीच में वेदान्त की अनुभूति (प्रैक्टिकल वेदान्ता) है, (समझते हो भाई) समझा ?  " ब्रह्मन इज वन,बट इज ऐट दी सेम टाइम अपियरिंग मेनी, ऑन दी रिलेटिव प्लेन। नेम ऐंड फॉर्म आर ऐट दी रूट ऑफ़ दिस रिलेटिविटी।"  वह ब्रह्म (आत्मा) एक होकर भी सापेक्षिक धरातल पर (व्यावहारिक रूप में) हमारे सामने अनेक रूपों में विद्यमान है। तथा "नाम और रूप" ही इस सापेक्षिक भिन्नता के मूल (अस्ति -भाति -प्रिय) में मौजूद हैं ! जिस प्रकार घड़े का नाम और रूप छोड़ देने से क्या देखता है -केवल मिट्टी, जो उसकी वास्तविक सत्ता है। इसी प्रकार भ्रम में पड़कर (हिप्नोटाइज्ड होकर- through delusion) एक घट,एक पट, एक संगठन (महामण्डल या मठ) इत्यादि का भी तू विचार करता है तथा उन्हें देखता है। दी फिनोमिनल वर्ल्ड डिपेन्ड्स ऑन दिस नीसाइंस (नेशंस-nescience) व्हिच ऑब्स्ट्रक्ट्स नॉलेज ऐंड व्हिच हैज नो रीयल एग्जिस्टैंस।" आत्म-स्वरूप के ज्ञान का प्रतिबन्धक यह जो नीसाइंस (अज्ञान -अविद्या माया) है, उसकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है, किन्तु (दैवी शक्ति है -श्री ठाकुर की शक्ति है इसीलिये) उसी के कारण यह दृष्टिगोचर जगत इतना वास्तविक रूप में भास रहा है, कि उसीको लेकर लोक-व्यवहार चलता रहता है!! स्त्री-पुत्र, देह-मन, (चेतना -wife, children, body, mind) जो कुछ है, सभी नाम-रूप की सहायता से अविद्या माया (अज्ञान) की सृष्टि में देखने में आते हैं । ज्योंही अज्ञान हट जायेगा, त्योंही ब्रह्म-सत्ता की अनुभूति हो जायेगी। (ज्यों ही होली ट्रायो की कृपा हो जायेगी - माँ जगदम्बा की सृष्टि -में महामण्डल, बेलुड़ मठ भी हैं - दृष्टिगोचर होने लगेगा !) 
शिष्य -यह अज्ञान (अविद्या माया) आया कहाँ से ?  
स्वामी जी - कहाँ से आया यह बाद में बताऊँगा। तू जब रस्सी को साँप मानकर भय से भागने लगा, तब क्या रस्सी साँप बन गयी थी ? -या तेरी अज्ञता ने ही तुझे इस प्रकार भगाया था ? 
शिष्य -अज्ञता ने ही वैसा किया था। 
स्वामी जी - तो फिर सोचकर देख, तू जब फिर रस्सी को रस्सी जान सकेगा, (रोप ऐज रोपउस समय अपनी पहलेवाली अज्ञता का चिंतन कर तुझे हँसी आयेगी या नहीं, नाम-रूप मिथ्या जान पड़ेंगे या नहीं ? 
शिष्य - जी हाँ।  
स्वामी जी -तब, नाम-रूप मिथ्या हुए या नहीं ? इस प्रकार ब्रह्म-सत्ता ही एकमात्र सत्य रह गयी। इस अनन्त सृष्टि की विचित्रताओं से भी उनके स्वरूप में जरा सा परिवर्तन नहीं हुआ, केवल तू इस अविद्या के ट्वाइलाइट (झुटपुटे) प्रकाश में सोचता है कि ये तुम्हारी स्त्री है, वह तुम्हारा पुत्र है, यह तुम्हारा अपना है, वह पराया है.... इसी भ्रमित बुद्धि (मोह जनित मल से हिप्नोटाइज्ड बुद्धि) के कारण इस 'सर्व-प्रकाशक आत्मा' के अस्तित्व को समझ नहीं सकता ! 'व्हेन थ्रू दी गुरुज (लीडर्स) इंस्ट्रक्शन ऐंड योर ओन  कन्विक्शन' - जिस समय तू अपने मार्गदर्शक नेता (गुरु, युवा -आदर्श ? युवा संगठन महामण्डल पुस्तिकाओं ) के उपदेश और अपने विश्वास के द्वारा इस नाम-रूपात्मक जगत को न देखकर, इसकी मूल सत्ता का ही अनुभव करेगा, उस समय आब्रह्मस्तम्ब (फ्रॉम दी क्रियेटर डाउन टु अ क्लम्प ऑफ़ ग्रास) सभी पदार्थों में तुझे आत्मानुभूति होगी। उसी समय- "भिद्यते हृदयग्रन्थि: छिद्यन्ते सर्वसंशया: । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे" ।। (ईश्वर का साक्षात्कार होने पर, जब मनुष्य की हृदय-ग्रन्थि कट जाती (खुल जाती) है, तथा सभी शंकाओं का निवारण हो जाता है।  हिप्नोटाइज्ड जीव (के भ्रमित बुद्धि) की अविद्या नष्ट हो जाती है , और सारे कुसंस्कारों का नाश हो जाता है, तब वह जीवित रहते हुए भी किसी मोह में आबद्ध नहीं होता। -मुण्डकोपनिषद् २/१/१८)--की स्थिति तुम्हारी भी हो जाएगी ! 
शिष्य - महाराज, मुझे (origin and cessation of this nescience) इस अज्ञान के  आदि-अन्त की बातें जानने की इच्छा है।  
स्वामी जी - जो चीज बाद में नहीं रहती उसे मिथ्या (झूठ) कहते हैं, तो समझ गया ? (सत्य-असत्य-मिथ्या क्लियर हो गया ?) जिसने वास्तव में निरपेक्ष सत्य या ब्रह्म की अनुभूति कर ली है, वह कहेगा, " where is nescience, in faith? - जब आत्मविश्वास हो गया तो -अज्ञान फिर कहाँ ? वह रस्सी को रस्सी ही देखता है, साँप नहीं देखता। जो लोग रस्सी में साँप देखते हैं, उन्हें भयभीत देख उसे हँसी आती है। इसलियेज्ञान का (अविद्या माया का) वास्तव में कोई स्वरूप नहीं है। सन्नाप्यसन्नाप्युभयात्मिका नो॥ विवेक-चूड़ामणि १०९॥  अज्ञान को (अविद्या माया को) 'सत' भी नहीं कहा जा सकता, 'असत' भी नहीं कहा जा सकता- जो चीज इस प्रकार असत्य ज्ञात हो रही है, उसके सम्बन्ध में क्या प्रश्न है, और क्या उत्तर है ? 
[अविद्या ही कारण शरीर (कॉजल बॉडी) है । 'सन्नाप्यसन्नाप्युभयात्मिका नो॥ महाद्भुताऽनिर्वचनीयरूपा॥ माँ काली मुण्डमाला पहने हँसती हुई नहीं दिखतीं ? वह न सत है न असत है । न भाव है,न अभाव है । न उभयात्मक है, न स्थूल है, न सूक्ष्म है । वह केवल भ्रम माने अज्ञान (विसम्मोहित अवस्था) है! आचार्य केवल शिष्य की सहायता करने के उद्देश्य से, स्थूल में से सूक्ष्म में और सूक्ष्म में से कारण मे पहुँचने की जो बात करते हैं, वह केवल करुणा करके उसे वैज्ञानिक युक्ति-तर्क का आश्रय लेकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देने के लिये है। "ये बातें हैं उपनिषद् सिद्धांत से बिलकुल अलग है।" वास्तविकता यह है कि पहले 'शरीर के प्रति  मेरापन ' से -- 'मेरापन' छूटा, और फिर परिच्छिन्न में से 'मैं -पना' (काचा आमी) छूटा। परिच्छिन्न का आत्मरूप में अनुभव हुआ, तब फिर (डीहिप्नोटाइज्ड अवस्था में) अपनी अद्वितीयता, परिपूर्णता या अपरिच्छिन्नता में दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं। वास्तव में हम कारण शरीर में बैठे हैं, यानि वह कोई वस्तु नहीं है। द्रष्टा और दृश्य के बीच में, द्रष्टा के स्वरुप का जो अज्ञान है वही दोनों की विभाजक रेखा है।-श्री ओड़िया बाबा] (About a thing that is thus proved to be false, neither question nor answer is of any significance.) उस विषय में प्रश्न करना उचित भी नहीं हो सकता। क्यों, यह सुन - यह प्रश्नोत्तर भी उसी नाम-रूप या देश-काल की भावना से किया जा रहा है। जो ब्रह्म वस्तु, नाम-रूप, देश-काल से परे है, उसे प्रश्नोत्तर द्वारा कैसे समझाया जा सकता है ? इसीलिये शास्त्र, मन्त्र आदि व्यावहारिक रूप से तो सत्य हैं, किन्तु पारमार्थिक रूप से नहीं। अज्ञान का स्वरूप ही नहीं है, उसे फिर समझेगा क्या ? जब ब्रह्म का प्रकाश होगा, उस समय फिर इस प्रकार का प्रश्न करने का अवसर ही न रहेगा। श्री रामकृष्ण की 'मोची-मुटिया' (शूमेकर कुलीमज़दूर) 'वाली कहानी *सुनी है न? -बस, ठीक वही! अज्ञान को ज्योंही पहचान लिया जाता है, त्योंही वह भाग जाता है।   
[* श्रीरामकृष्ण की ' मोची-मुटिया '- वाली कहानी - एक पण्डित जी (पोंगा पण्डित) किसी गाँव में अपने धनाड्य जजमान के यहाँ जा रहे थे। उन्हें कोई नौकर (नाइ) नहीं मिला, इसलिये उन्होंने रास्ते के एक चमार को ही अपने साथ ले लिया और उसे सिखा दिया कि वह अपने चमार जाति से होने की बात को गुप्त रखे, और किसी से कुछ भी न बोले। (क्योंकि तब भारत १००० सालों से गुलाम था इसलिये जाति-पांति में छुआ-छूत था) 
गाँव पहुँचकर एक दिन पण्डित जी अपने नित्यक्रम के अनुसार सन्ध्या-वन्दन कर रहे थे। वह नौकर भी उनके पास ही बैठा था। इतने में ही वहाँ एक दूसरे पण्डित जी आये। जो अपने जूते बाहरी कमरे में छोड़ आये थे। अपने को उच्च जाति का समझने वाले पोंगा-पण्डित ने  इस नौकर को (नाइ समझकर) हुक्म दिया, " अरे जा, वहाँ से मेरे जूते तो ले आ। " पर नौकर नहीं उठा और न कुछ बोला ही। पण्डित जी ने फिर कहा, पर वह फिर भी न उठा। इस पर उन्हें बड़ा क्रोध आया और उन्होंने उसे डाँटते हुए चिल्लाकर कहा - " तूँ चमार है (शूमेकर है) क्या रे, कहने से भी नहीं उठता ? " वह चमार-नौकर हक्का-बक्का होकर चीखा - " ऐ बाबा, मेरी असली जाति का इनको पता चल गया है, अब यहाँ मैं और नहीं ठहर सकता। " बस वह भागा, और ऐसा भागा कि उसका पता ही न चला। ठीक उसी प्रकार जब अविद्या-माया पहचान ली जाती है तो वह भी भाग जाती है, एक क्षण भी नहीं टिकती।] 
शिष्य -परन्तु महाराज, यह अज्ञान आया कहाँ से ?
स्वामी जी - जो चीज है ही नहीं, वह फिर आएगी कैसे ? हो, तबतो आयेगी ?
शिष्य- तो फिर इस जिव-जगत की उत्पत्ति क्योंकर हुई ?
स्वामी जी - एक ब्रह्म-सत्ता ही तो मौजूद है! तू मिथ्या नाम-रूप देकर उसी को नाना रूपों और नामों में देख रहा है। 
शिष्य - यह मिथ्या नाम-रूप भी क्यों और कहाँ से आया ? 
स्वामी जी - शास्त्रों में इस नाम-रूपात्मक संस्कार या अज्ञान को प्रवाह के रूप में नित्यपराय कहा गया है। परन्तु उसका अन्त है। ( ingrained notion or ignorance as almost endless in a series. But it has a termination)और ब्रह्म-सत्ता तो सदा रस्सी की तरह अपने स्वरूप में ही वर्तमान है। इसीलिये वेदान्त शास्त्र का सिद्धान्त है कि यह निखिल ब्रह्माण्ड ब्रह्म में अध्यस्त, इन्द्रजालवत प्रतीत हो रहा है। इससे ब्रह्म के स्वरूप में किंचित भी परिवर्तन नहीं हुआ। समझते हो भाई ? 
शिष्य -एक बात अभी भी नहीं समझ सका । 
स्वामी जी - क्या नहीं समझा ?
शिष्य- यह जो आपने कहा कि यह सृष्टि-स्थिति-लय आदि ब्रह्म में अध्यस्त हैं, उनकी कोई स्वरूप सत्ता नहीं है --यह कैसे हो सकता है ? जिसने जिस चीज को पहले कभी नहीं देखा, उस चीज का भ्रम हो ही नहीं सकता। जिसने कभी साँप नहीं देखा, उसे रस्सी में सर्प का भ्रम नहीं होता। इसी प्रकार जिसने इस सृष्टि को नहीं देखा, उसका ब्रह्म में सृष्टि का भ्रम क्यों होगा ? अतः सृष्टि पहले से थी या है, इसीलिये तो सृष्टि का भ्रम हो रहा है; इसीसे द्वैत की आपत्ति उठ रही है। 
स्वामी जी - ब्रह्मज्ञ व्यक्ति तेरे प्रश्न का इस रूप में पहले ही खण्डन कर देंगे कि उनकी दृष्टि में सृष्टि आदि बिल्कुल दिखाई नहीं दे रही है। वे एक मात्र ब्रह्म-सत्ता को ही देख रहे हैं। रस्सी ही देख रहे हैं, साँप नहीं देख रहे हैं। यदि तू कहेगा, ' मैं तो यह सृष्टि या साँप देख रहा हूँ '--तो तेरे दृष्टि के दोष को दूर करने के लिये वे तुझे रस्सी का स्वरूप समझा देने की चेष्टा करेंगे। जब उनके उपदेश और अपनी स्वयं की विचार-शक्ति इन दोनों के बल पर तू रज्जु-सत्ता या ब्रह्म-सत्ता को समझ सकेगा, उस समय यह भ्रमात्मक सर्प-ज्ञान या सृष्टि-ज्ञान नष्ट हो जायेगा। उस समय इस सृष्टि -स्थिति-लय रूपी भ्रमात्मक ज्ञान को ब्रह्म में आरोपित कहने के अतिरिक्त और तू क्या कह सकता है ? 
अनादि प्रवाह के रूप में सृष्टि की यह प्रतीति यदि चली आयी है तो आती रहे, उसके निर्णय में लाभ-हानी कुछ भी नहीं। 'करामलक' की तरह ब्रह्म-तत्व का प्रत्यक्ष न होने पर इस प्रश्न की पूरी मीमांसा नहीं हो सकती; और उस समय फिर प्रश्न भी नहीं उठता, उत्तर की आवश्यकता भी नहीं होती। ब्रह्म-तत्व का आस्वाद उस समय 'मुकास्वादन' की तरह होता है ! 
शिष्य - तो फिर इतना विचार करके क्या होगा ?
स्वामी जी - उस विषय को समझने के लिये ही विचार-विश्लेषण करने का परामर्श दिया जाता है। परन्तु सत्य वस्तु विचार-विश्लेषण से परे है- नैषा तर्केण मतिरापनेया- (कठ. उ. १ । २ । ९ /को कण्ठस्थ कर लो। वास्तव में, नचिकेता, तुम सत्यनिष्ठ हो (अथवा सच्चे निश्चयवाले-एथेंस का सत्यार्थी हो)। तुम्हारे सदृश जिज्ञासु हमें मिला करें। आत्मज्ञान बुद्धि की तर्कपूर्ण युक्तियों से प्राप्त नहीं होता। -श्री रामकृष्ण परमहंस देव ही आधुनिक युग में ब्रह्म के अवतार हैं, इस 'विवेकानन्द-मत' को स्वीकार कर, श्री ठाकुर के ऊपर कुछ श्रद्धा-विश्वास किये बिना, केवल शुष्कतर्कों से अज्ञान को या कारण शरीर को समझ लेना असम्भव है। ]      
इस प्रकार वार्तालाप होते होते शिष्य स्वामी जी के साथ मठ में आकर उपस्थित हुआ। मठ में आकर स्वामी जी मठ के संन्यासियों तथा ब्रह्मचारियों को आज के ब्रह्म-विचार का संक्षिप्त सार समझा दिया, और उठते उठते शिष्य से कहने लगे, 'नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः !' (मुण्डकोपनिषद् : ३.२.४). इस आत्मा को बलहीन व्यक्ति प्राप्त नहीं कर सकता । अर्थात जो व्यक्ति शरीर से और चरित्र से दुर्बल (लूज कैरेक्टर) है, वह परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता । इसलिए उपनिषद् का आदेश है कि स्वयं को शक्तिशाली बनाओ ।---"शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ।।" शरीर ही धर्म करने का पहला साधन है । (इस साधन को पौष्टिक आहार और व्यायाम द्वारा स्वस्थ रखो, तथा महामण्डल द्वारा निर्देशित ५ अभ्यास को खूब परिश्रम पूर्वक करते रहो ! ) 
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