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शुक्रवार, 19 मई 2017

युवा प्रशिक्षण और स्वामी विवेकानन्द

(विवेक-जीवन के पुराने पन्नों से: स्वामी बुद्धानन्द द्वारा लिखित): 

१. स्वामी विवेकानन्द के प्रति नवयुवकों के आकर्षण का रहस्य: 
स्वामी विवेकानन्द प्रत्येक नवयुवक (young man,किशोर या प्रेमी टीनेजर) को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं ! मैंने अब तक ऐसे एक किशोर को नहीं देखा, जो उनके जीवन और शिक्षाओं के ऊपर लिखित कुछ पन्नों को ही पढ़ कर, उन्हें प्रेम करने से स्वयं को रोक सकता हो ! स्वामी जी हर एक नव युवक के मन पर मानो जादू सा कर देते हैं; ऐसा क्या है उनमें ? 
सबसे पहले तो उनका शारीरिक शौष्ठव और चेहरे की सौम्यता हमारे मन को प्रचण्ड रूप से मोहित कर लेती है ! वे मानो 'शाश्वत यौवन ' की जीवन्त मूर्ति हैं, प्रचण्ड शक्ति और निर्भयता के प्रतीक हैं ! जरा उनकी नजरों से अपनी नजरें मिलाने की चेष्टा करो ! उनकी ऑंखें मानो ऐसी भाषा में कुछ कहना चाह रही हैं, -जो अकथनीय (unspeakable ) या अनिर्वचनीय है ! हर व्यक्ति यही सोचता रह जाता है कि आखिर इस व्यक्ति की आँखों में ऐसा कौन सा जादू है, जिसकी ओर मेरा मन खिंचा चला जा रहा है ? हमलोग यह सोचने पर विवश हो जाते हैं कि, वह जीवित व्यक्ति कितना आकर्षणीय होगा -जिसकी तस्वीर ऐसी है? हमलोग जल्दी ही यह समझ जाते हो, कि उनकी सम्मोहन शक्ति, उनके शारीरिक आकर्षण में तो बिल्कुल नहीं है ! 
क्योंकि फिल्म-जगत में शारीरिक रूप से उनसे भी अधिक सुन्दर हीरो हो सकते हैं। किन्तु किसी भी फ़िल्मी हीरो या क्रिकेट प्लेयर के चित्र की तरफ हमलोग बहुत अधिक देर तक देखना पसन्द नहीं करते हैं। किन्तु स्वामी जी की छवि को निहारने से हमलोग कभी नहीं थकते। इसका क्या रहस्य है ? इसका रहस्य है- तुम्हारे प्रति उनका असीम प्रेम ! His love which through his eyes reaches your heart and soul and inspires something very noble within you, उनका प्रेम जो उनकी आँखों के माध्यम से सीधा तुम्हारे हृदय में उतर जाता है, और तुम्हारी उस अन्तर्निहित आत्मा को झँकृत कर देता है, जो अत्यन्त महान है और जिसे अब तक तुमने जाना ही नहीं था। 
क्योंकि उनके इस प्रेम के पीछे किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं है, बल्कि इस प्रेम के पीछे उनकी परिपूर्ण पवित्रता (Perfect Holiness) ही छुपी हुई है ! स्वामीजी के उस परिपूर्ण पवित्रता के पीछे, पुनः एक उत्कृष्ट आध्यात्मिक उद्बोधन (Complete Spiritual Illumination.या 'विवेकज-ज्ञान' से परिपूर्ण उद्बोधन) अवस्थित है। 
और इसके अतिरिक्त भी एक वस्तु और है, जो अत्यन्त महत्वपूर्ण है ! तुममें से जिस किसी ने स्वामी सारदानन्द लिखित "श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग" को पढ़ लिया है, वे अवश्य जानते होंगे कि, "अपना शरीर त्यागने के पूर्व श्रीरामकृष्ण ने अपनी सम्पूर्ण आध्यात्मिक शक्तियों को 'नरेन्' (स्वामी विवेकानन्द) के भीतर ट्रांसमिट कर दिया था !"  
इसके उपरान्त, प्रत्येक व्यक्ति स्वामी विवेकानन्द की छवि के भीतर, अपने स्वयं की (The Dream of his own self-fulfillment.) 'ब्रह्मवेत्ता मनुष्य' बन जाने स्वप्न को; साकार होता सा हुआ देख पाता है ! "There is in him also the picture of the perfection a man can attain." प्रत्येक व्यक्ति को उनकी छवि (विशेष रूप से शिकागो पोज वाली-पूर्णता की छवि) को देखने से यह विश्वास हो जाता है कि उसके भीतर भी एक पूर्णता की छवि अन्तर्निहित है, आवश्यकता केवल उसके प्राकट्य की है; 'प्रत्येक व्यक्ति में 'ब्रह्म' को जानकर, 'ब्रह्मविद' मनुष्य बन जाने की सम्भावना है ! 
[क्योंकि, उस "Picture of the Perfection" को देखने से ही -प्रत्येक मनुष्य को यह आश्वासन 
मिल जाता है, कि जो बात श्रुति (मुण्डक उप० ३.२.९) में कही गयी है -'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' -ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है! यह बात बिल्कुल सत्य है ! स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - 'प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है !', तुम्हारे अंदर अनन्त शक्ति अन्तर्निहित है, केवल (बाह्य और अन्तःप्रकृति को वशीभूत करके) जीवन मे उसके प्राकट्य की आवश्यकता है ! और वह समझ जाता है कि सभी प्राणियों में केवल मनुष्य ही इतना श्रेष्ठ क्यों है कि इब्लीस को छोड़ कर बाकी सभी फ़रिश्ते मनुष्य के सामने सर को झुकाते हैं?]  
२. युवाओं के प्रति भगवान श्री रामकृष्ण के अतिरिक्त-प्रेम का कारण क्या था ? :  
जब श्री रामकृष्ण स्वयं पहली बार नरेन से  मिले थे, तब वे भी उनके आकर्षण को देखकर अत्यन्त मुग्ध
हो गए थे। उन्होंने अपनी प्रथम दृष्टि में ही नरेन में अन्तर्निहित ब्रह्मत्व को अभिव्यक्त करने की महान सम्भावना (great potential) को पहचान लिया था, तथा यह भी जान गए थे कि उनके मानव-शरीर धारण करने का उद्देश्य क्या था !
जब श्री रामकृष्ण देव से मिलने नरेन पहली बार पहुँचे, तब उनकी आयु केवल अठारह वर्ष थी; और जिस समय श्री रामकृष्ण ने अपना शरीर छोड़ा उस समय नरेन मात्र तेईस वर्ष के एक युवा थे ! श्रीरामकृष्ण देव की भक्त-मण्डली में कई बुजुर्ग और विद्वान् लोग भी शामिल थे, किन्तु उन्होंने अपने समस्त अनुयायियों के मध्य अपनी आध्यात्मिक शक्ति का संचार एक युवा में ही किया, और अपनी सारी आध्यात्मिक विरासत के नेतृत्व का अधिकार, 'श्री रामकृष्ण पताका' को -  उन्होंने युवा पीढ़ी के एक प्रशिक्षित दल के इसी अगुआ (standard-bearer) के हाथों सौंप दिया था। 
इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी अन्य बुजुर्ग और विद्वान् भक्त पर उनकी कृपा नहीं थी, अथवा अन्य किसी में अपनी कोई शक्ति संचारित नहीं की थी। किन्तु श्रीरामकृष्ण के अवतरण के उद्देश्य में धर्म-संस्थापन का 
जो ऊर्जस्वी हिस्सा था [ Dynamic Part of the Mission 'रामकृष्ण अवतारवरिष्ठ-मिशन' में सनातन
गुरु-शिष्य परम्परा के अनुसार धर्म को पुनर्स्थापित करने जो गत्यात्मक हिस्सा थाउसका लीडरशिप प्रदान करने के लिये उन्होंने नरेन का ही चयन किया था। 
प्रश्न उठ सकता है कि, मानवजाति के भावी मार्गदर्शक नेता के रूप में उन्होंने मात्र तेईस वर्षीय के युवा नरेन का ही चयन क्यों किया था ? 
इसके कारणों को स्पष्ट करते हुए श्री रामकृष्ण ने स्वयं कहा था, "जानते हो मैं इन लड़कों को क्यों पसन्द करता हूँ ? वे ताजा दूहे गये शुद्ध दूध जैसे होते हैं, उसका उपयोग करने के पहले केवल थोड़ा उबाल लेने की जरूरत पड़ती है। इसके अतिरिक्त देवता के ऊपर भी केवल शुद्ध दूध ही चढ़ाया जाता है। किन्तु पानी मिले दूध को उबालने में समय बहुत अधिक लगता है; तथा इसमें ईंधन की खपत भी अधिक होती है। ये तरुण और युवा लोग नये मिट्टी के बर्तनों के समान होते हैं, और नए स्वच्छ मिट्टी की हाँडी में कोई व्यक्ति बिना कोई चिन्ता किये दूध को रख सकता है। 
[Spiritual instructions arouse their inner consciousness without delay.] किशोरों और नव युवकों की अंतश्चेतना को (श्रवण-मनन-निदिध्यासन वेदान्त परम्परा में लीडरशिप ट्रेनिंग के दौरान युवाओं के Inner Consciousness ,अन्तर्निहित डिविनिटी या ब्रह्मत्व कोआध्यात्मिक निर्देशों (तत्वमसि
आदि) के द्वारा अविलम्ब जागृत करया जा सकता है। किन्तु बड़ी उम्र में 'लस्ट और लूकर' में अत्यधिक आसक्त हो जाने के कारण वैसा नहीं हो पाता। जिस पात्र का उपयोग एक बार दही ज़माने के लिये कर लिया गया हो, उसमें ताजे दूध रखने से व्यक्ति डरता है कि कहीं वह खट्टा तो नहीं हो जायेगा ?" 
३. The Root: इस चरित्र-निर्माण आन्दोलन की जड़ कहाँ हैं ?  
यदि कोई यह पूछे कि अपने ५० वर्ष पूर्ण कर चुके -'अखिल भारत विवेकानन्द युवा महमामण्डल' की जड़ें कहाँ हैं ? तो मैं यह कहूँगा कि महामण्डल की जड़ें , युवाओं के प्रति श्रीरामकृष्ण के अटूट 'विश्वास और प्रेम' (love and trust) में समाहित हैं। मुझे यहाँ यह भी कहना चाहिये उनका वह प्रेम और भरोसा तुम लोगों पर भी वर्षित हुआ है। His Love and Trust have 'Devolved upon'  you. यदि तुम इस युवा संगठन की आध्यात्मिक जड़ों (spiritual root) को तलाशने की कोशिश करोगे, तो निश्चित रूप से यही पाओगे कि वे जड़ें सनातन-धर्म रूपी वृक्ष की जड़ों के समान -'ऊर्ध्वमूल अधोशाखा' हैं। इस बात को हमें सदैव याद रखना चाहिये।
 युवाओं के ऊपर ऐसा प्रेम और भरोसा कितना प्रचण्ड है ! और युवाओं के ऊपर इतना प्रेम और भरोसा कौन रख रहा है ? तुम जानते हो कि दुनिया के लाखों लोग विवेकानन्द के गुरु श्री रामकृष्ण देव की पूजा आधुनिक युग में भगवान विष्णु के एक अवतार के रूप में करते हैं। और उसी भगवान का असीम प्रेम तुम्हारे ऊपर वर्षित हुआ है, तुम सब में उनका पूरा भरोसा उतर आया है !
तुम युवाओं पर प्रभु ने जो ऐसा भरोसा रखा है, अपना प्रेम तुम लोगों पर वर्षाया है, यह अकथनीय आनन्द का विषय है, ईश्वर की देदीप्यमान महिमा है और अपने भक्तों पर उनकी असीम कृपा है। किन्तु तुम्हें भी अपने उस दैवी -उत्तरदायित्व के प्रति सचेत हो जाना चाहिये; कि स्वयं प्रभु श्रीरामकृष्ण ने हम लोगों पर 'मनुष्य बनने और बनाने' की (अर्थात अवैतनिक लोकशिक्षक बनने और बनाने की) कितनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है ! परन्तु ऐसा भी नहीं सोचना चाहिये कि तुम इस जिम्मेदारी के बोझ तले दबे जा रहे हो। बल्कि यह सोच कर तुम्हारा हृदय गदगद हो जाना चाहिये कि तुम्हारे बिना जाने ही भगवान ने अपने काम के लिए तुम्हारा चयन कर लिया है, और यह सोच कर हमारा हृदय उत्साह से भर उठना चाहिये ! [गोवर्धन पहाड़ तो प्रभु ने अपनी कानी ऊँगली पर उठाया हुआ है, पर हमें गोप-सखा मानकर उसके नीचे लाठी से टिकाये रहने का भरोसा करके हममें संघबद्ध प्रयास करने का लीडरशिप भरना चाहते हैं !]
४. स्वामी विवेकानन्द की वसीयत (Bequest) चरैवेति चरैवेति :
स्वामी विवेकानन्द के निकट जाने के बाद, उनका एक विश्वासी सैनिक बन जाने के बाद, भगवान श्री रामकृष्ण देव का युवाओं के प्रति वही 'प्रेम और भरोसा' स्वामी जी के माध्यम से हमलोगों में भी हस्तान्तरित हो जाता है। 
 स्वामी विवेकानन्द विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने के पहले ही,अलासिंगा पेरुमल को २० अगस्त १८९३ को लिखित अपने प्रसिद्द पत्र के माध्यम से समस्त युवाओं को (bequeathing his legacy mainly to the youth विशेष रूप से महामण्डल के भावी नेताओं को) अपनी विरासत सौंपते हुए लिखते हैं " ऊँचे पदवालों या धनिकों का भरोसा न करना। उनमें जीवनीशक्ति नहीं है -वे तो जीते हुए भी मुर्दों के समान हैं। भरोसा तुम लोगों पर है; गरीब, पद-मर्यादा रहित किन्तु विश्वासी the meek, the lowly, but the FAITHFUL,आस्तिक) तुम्हीं लोगों परईश्वर पर भरोसा रखो ! [अर्थात माँ जगदम्बा के दशावतारों तथा भविष्य में आनेवाले अनेकानेक अवतारों के प्रति आस्था (श्रद्धा) रखो।] किसी अन्य चालबाजी की आवश्यकता नहीं; उससे कुछ नहीं होता। 
दुःखियों का 'दर्द' समझो और ईश्वर के पास सहायता की प्रार्थना करो - सहायता अवश्य मिलेगी ! मैं बारह वर्ष तक हृदय पर बोझ लादे और सर में यह 'विचार' लिए बहुत से तथाकथित धनिकों और अमीरों के दर दर घूमा। हृदय का रक्त  बहाते हुए मैं आधी पृथ्वी का चक्कर लगाकर [load on HEART this IDEA in my head= उच्च-शिक्षित और धनीमानी होने के बावजूद अपने और दूसरों के आत्मस्वरुप के भूल जाने के कारण होने वाले, ह्रदय के दर्द को, और इस दर्द को दूर करने में सक्षम मनुष्य (नेता) बनने और बनाने में समर्थ, 'BE AND MAKE' - लीडरशिप ट्रेनिंग का विचार को सिर में लेकर.करुणा पूर्ण हृदय के साथ] इस अजनबी देश में सहायता माँगने आया ।  
परन्तु भगवान (अवतार-वरिष्ठ श्रीरामकृष्ण) अनन्त शक्तिमान हैं -मैं जानता हूँ, वे मेरी सहायता करेंगे। मैं इस देश में भूख या जाड़े से भले ही मर जाऊँ, परन्तु मेरे नवयुवको, मैं गरीब, भूखों और उत्पीड़ितों के लिए इस सहानुभूति और प्राणपण प्रयत्न को थाती के तौर पर तुम्हें (महामण्डल के भावी नेताओं को) अर्पण करता हूँ। अपना सारा जीवन इन तीस करोड़ लोगों के लिये अर्पण कर देने का व्रत लो, जो दिनोंदिन डूबते जा रहे हैं ! 
महामण्डल के भावी नेताओं के लिए महामण्डल के नेता स्वामी विवेकानन्द का कमाण्ड यही है - "जाओ तुम सब इसी क्षण उस पार्थसारथी (श्रीकृष्णावतार) के मन्दिर में, जो गोकुल के दीन -हीन ग्वालों के सखा थे, [ गाय चराते समय भी विशाल बरगद के वृक्ष जैसा दूसरों को छाया देने वाला -ब्रह्मविद मनुष्य बनने और बनाने में सक्षम लोक शिक्षकों का निर्माण करते थे! जाओ तुम सब उनमें और समस्त अवतारों के प्रति आस्तिक मनुष्य बनो और बनाओ' !] 
जो अपने रामावतार में गुहक चाण्डाल  ( जैसे श्री रामचन्द्र वर्ण-भेद के ऊपर थे, the Pariah Guhaka)  को भी गले लगाने में नहीं हिचके, जिन्होंने अपने बुद्धावतार में अमीरों का निमंत्रण अस्वीकार करके एक 
वरांगना के भोजन का निमंत्रण स्वीकार किया (वैश्या के भीतर भी उसी ब्रह्म को देखने में सक्षम थे) और उसे उबारा; जाओ उनके पास (समस्त दशावतारों के पास), जाकर साष्टांग प्रणाम करो और उनके सम्मुख एक महाबली दो, अपने समस्त जीवन की बली दो - उन दीनहीनों और उत्पीड़ितों के लिये, जिनके लिये भगवान युग युग में अवतार लिया करते हैं, और जिन्हें वे सबसे अधिक प्यार करते हैं। और तब प्रतिज्ञा करो कि अपना सारा जीवन इन तीस करोड़ लोगों के उद्धार-कार्य में न्योछावर कर दोगे, जो दिनोदिन अवनति के गर्त में गिरते जा रहे हैं। ]
५. The Training:  [श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में सेल्फ मैन मेकिंग 'लीडरशिप ट्रेनिंग मेथड.']         
प्राचीन गुरु-शिष्य वेदान्त परम्परा में लोक-शिक्षकों के निर्माण की यह एक ऐसी लीडरशिप ट्रेनिंग-विधि है, जो महामण्डल से सम्बद्ध तुम सभी युवाओं पर उतरी  है, या (स्वामी विवेकानन्द के माध्यम से) उन सभी को हस्तान्तरित की गयी है जो महामण्डल को बिलॉन्ग करते हैं ! [This is the TRADITION ('BE AND MAKE')  which has DEVOLVED  upon you all who BELONG to this Yuva
MAHAMANDAL.]  
अतः तुम लोगों को यहाँ किस प्रकार का प्रशिक्षण मिलना चाहिए? " The training must be for man-making." - निश्चित रूप से यह प्रशिक्षण मनुष्य निर्माण के लिए होना चाहिये। किन्तु इस प्रशिक्षण का तात्पर्य यह नहीं है कि यहाँ कोई दूसरा व्यक्ति तुम्हें मनुष्य बना देगा। ( या इस शिविर में कोई दूसरा व्यक्ति तुम्हें पशु-मानव से देव-मानव में रूपान्तरित कर देगा।) यह प्रशिक्षण पद्धति 'Self-Man-Making'  या स्वनिर्मित-मनुष्य बनने और बनाने की प्रशिक्षण विधि' है, या ' सेल्फ मैन मेकिंग लीडरशिप ट्रेनिंग है। अर्थात 'स्वयं की मेहनत से 'स्वयं' को 'मनुष्य' के साँचे में ढाल लेने की प्रशिक्षण-पद्धति है ! 
महामण्डल के वरिष्ठ भैया लोग यहाँ ' तुम्हें ५ अभ्यास के द्वारा 3'H' को विकसित करके यथार्थ मनुष्य बनने' के विषय में जानकारी देंगे, शरीर-मन और हृदय को विकसित करने के लिए  उत्साह, सहायता और मार्गदर्शन प्रदान करेंगे। जहाँ कहीं उन्हें, तुम्हारे द्वारा किये जाने वाले अभ्यासों में त्रुटि दिखाई देगी, तो उसे दूर करने में भी वे तुम्हारी सहायता करेंगे। किन्तु 'स्वयं को मनुष्य के साँचे ढाल लेने के कार्य'  'Self-Man-Making' प्रशिक्षण के खेल में मुख्य भूमिका- 'नायक' (हीरो) की भूमिका तो तुम्हें ही निभानी होगी। ( But the main part in this self-man-making is to be played by you.) और इसके लिये पहले यह जान लेना जरुरी है, कि वास्तव में तुम कौन हो, तुम्हारा सच्चा स्वरुप क्या है ? तथा उस स्वरुप में अवस्थित होने के लिये क्या और कैसे करना होगा, उसके लिए तुम में उत्साह भी रहना चाहिये।
मैन-मेकिंग स्कीम: अतः सबसे पहले तुम्हें अच्छी तरह से यह सीखना होगा किइस मनुष्य निर्माण योजना
(man-making scheme.) के माध्यम से- तुमसे किस प्रकार का मनुष्य बन जाने की अपेक्षा की जाती है ? स्वामी जी वास्तव में तुम्हें किस प्रकार के मनुष्य के रूप देखना चाहते थे ?  
तुम्हारे पास, तुम्हारी अपनी स्वतंत्र इच्छाशक्ति है (You have your free will या विवेक-प्रयोग करने की शक्ति है); तुमने अपने सर्व-श्रेष्ठ विचारों का प्रयोग करने के बाद ही - 'राष्ट्रीय युवा आदर्श स्वामी विवेकानन्द' को अपने जीवन के एकमात्र आदर्श के रूप में चुन लिया है ! किसी अन्य व्यक्ति ने तुम्हें जबरन इस युवा-प्रशिक्षण शिविर में नहीं भेजा है, तुम्हें यहाँ खींचकर नहीं लाया गया है। (तुम दूर दूर से अपने खर्चे पर आये हो, शिविर में प्रशिक्षण प्राप्त करने का शुल्क भी जमा किया है !)
"It is out of your own free will that you are here, to allow yourself to be fashioned, out of your own choice," तुम अपनी स्वतंत्र इच्छा-शक्ति से प्रेरित होकर ही यहाँ आये हो, और तुमने स्वयं को अपने उस पसन्दीदा आदर्श या रोल-मॉडल के साँचे में ढल जाने की अनुमति दी है, जो तुम्हारी समस्त अभिलाषाओं (aspirations) को पूर्ण करते हैं, या उन्हें कार्यरूप में (fulfils ) परिणत
करने में समर्थ हैं ! 
अभी तुमने जो ऐन्थम (संघमन्त्र) गया है, उसमें तुमने घोषणा की है - " एक साथ चलेंगे, एक बात बोलेंगे -हम सबके मन को एक भाव से भरेंगे !" अर्थात हम सभी युवा एकजूट होकर, एक ही मार्ग का अनुसरण करेंगे और एक ही बात बोलेंगे ! किन्तु क्या हम सभी एकजुट हो सकते हैं ? प्रश्न है -How can we all speak one thing?  हम सभी एक ही स्वर में कैसे बोल सकते हैं ? इस विविधता पूर्ण जगत में इतनी सारी चीजें हैं (रंगरूप-भाषा-धर्म आदि चीजें हैं), इतने सारे आदर्श हैं। 
अतः एक ही स्वर में बोलना एक ही आदर्श का अनुसरण करना, केवल तभी सम्भव हो सकता है; जब हमारे पास एक ऐसा महान साझा-आदर्श हो जो हम सबों के जीवन की छोटी छोटी चीजों को पूर्ण करने के साथ साथ, उन सबसे परे भी हो ! इसीलिये हम सभी लोग केवल तभी एक साथ मिलकर कार्य कर सकते हैं और एक ही स्वर में बोल सकते हैं, जब हमारा आदर्श भी सर्वश्रेष्ठ (highest ideal) हो !'
सर्वश्रेष्ठ आदर्श से कम कोई अन्य वस्तु (Anything lesser than the highest ) हमारे समस्त देश-वासियों की जरूरतों को पूर्ण नहीं कर सकती ! 
तथा दुनिया में एक वस्तु ऐसी है जो प्रत्येक मनुष्य की जरूरतों को पूर्ण कर सकती है। तथा वह सर्व-श्रेष्ठ आदर्श, जो संसार के प्रत्येक मनुष्य की जरूरतों को [अभ्युदय (अर्थ और काम) और निःश्रेयस (अर्थात मोक्ष या भ्रम-मुक्ति दोनों) को]  पूर्ण कर सकता हो - उसी को धर्म कहते हैं ! 
६. धर्म क्या है ?      
आजकल बहुत से ऐसे लोगों  के द्वारा धर्म का प्रचार किया जा रहा है (जाकिर नाईक जैसे), जो वास्तव में धर्म का प्रचार न करके, विभिन्न प्रकार से धर्म को ही हतोत्साहित (डिस्करेज) करना चाहते हैं। किन्तु हमारे प्राचीन शिक्षक ( गुरु-शिष्य परम्परा में प्रशिक्षित आचार्य-देव, अवतार,ऋषि, गुरु या मानवजाति के मार्गदर्शक नेता गण) ऐसा मानते थे कि धर्म वह वस्तु है जो प्रत्येक व्यक्ति की उन्नति में सहायक सिद्ध होता है !    
जो नियम (दैनन्दिन अभ्यास) प्रत्येक व्यक्ति के आत्म-विकास (3'H'-विकास) को सुरक्षित रखने में सहायता करता है (safeguarding his self-development), जो अभ्यास किसी व्यक्ति को दूसरों को चोट पहुँचाने से परहेज करने या दूर रहने में मदद करता है (abstain from hurting others), - दूसरे शब्दों में जो दैनंदिन अभ्यास (५-अभ्यास) प्रत्येक व्यक्ति को उसकी अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करने में (attaining self-fulfillment, 3'H'-विकास करने या ब्रह्मवेत्ता मनुष्य, या भ्रममुक्त मनुष्य बनने में) सहायता करता है, उसी को धर्म कहते हैं !       
तबतो, वे दैनंदिन अभ्यास ऐसे होने चाहिये जो इस जगत के हरेक व्यक्ति के सर्वोच्च आत्महित (highest self-interest) को पूर्ण करने में अनिवार्यतः सक्षम हों ! क्या वह धर्म  (५ -दैनंदिन अभ्यास) ऐसा होना 
चाहिये जिनका पालन करने से, केवल तुम्हारे अपने सपने ही साकार हों ? क्या वे नियम ऐसे होने चाहिये जिनका पालन करने से, केवल तुम्हारा स्वार्थ, या तुम्हारे रिश्तेदारों का स्वार्थ, तुम्हारे परिवार का स्वार्थ, तुम्हारे कुटुम्ब-कबीले (गोत्र, clan) का स्वार्थ, तुम्हारे अपने पोलिटिकल पार्टी का स्वार्थ पूरा हो, या यहाँ तक कि केवल तुम्हारे अपने देश का स्वार्थ ही पूरा होना चाहिये ? नहीं !        
भारत की प्राचीन गुरु-शिष्य वेदान्त परम्परा से (श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त लीडरशिप ट्रेनिंग परम्परा से) प्राप्त होने वाला धर्म (अर्थात ५ दैनंदिन अभ्यासों का प्रशिक्षण, या शिक्षा) तो ऐसा होना चाहिये,जिसका पालन करने से इस पृथ्वी का प्रत्येक मनुष्य अपनी अन्तर्निहित पूर्णता को (अभ्युदय और निःश्रेयस को, क्षात्रवीर्य और ब्रह्मतेज को, 'whole self-fulfillment' को) पूर्ण रूप से अभिव्यक्त करने में समर्थ हो जाये! " And this is the HIGHEST in which all can unite !" - अर्थात यही वह सर्वोच्च आदर्श है जिसको प्राप्त करने के लिये हम सभी लोग संगठित होकर एक साथ चल सकते हैं, सभी लोग एक बात बोल सकते हैं, 'संगछ्ध्वं सङ्गवदध्वं' का सपना साकार हो सकता है, क्योंकि वहाँ पहुँच कर, विश्व के प्रत्येक मनुष्य का सर्वोच्च पुरुषार्थ (everybody’s highest aspiration-'मोक्ष'= भ्रम-मुक्त अवस्था) परिपूर्ण हो जायेगा।           
इसीलिये स्वामी विवेकानन्द भारत के युवाओं के समक्ष, (विशेष रूप से बंगाल के युवाओं के समक्ष)  'BE AND MAKE', अर्थात तुम स्वयं भ्रममुक्त मनुष्य (डीहिप्नोटाइज्ड) बनो और दूसरों को भी भ्रम-मुक्त मनुष्य बनने में सहायता करो !- का सर्वोच्च आदर्श ( The Highest Ideal) रखते हैं; इस सर्वोच्च आदर्श से छोटा कोई भी आदर्श हमारे लिये कारगर साबित नहीं होगा। 
आये दिन हमलोग इस संसार में जितने भी प्रकार के झगड़े देखते हैं (पारिवारिक- संयुक्त परिवार में, सास-बहु, भाई-भाई, पिता-पुत्र के झगड़े, सामाजिक-राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय झगड़े, टेरेरिस्ट अटैक आदि), जिसके फलस्वरूप कितनी ही प्रकार की समस्याओं का सामना या तो हमें आज करना पड़ रहा है, या भविष्य में करना पड़ेगा; वे सभी समस्यायें उत्पन्न ही इसलिये होती हैं कि, हमलोग  (the highest ideal of life) मनुष्य जीवन के सर्वोच्च आदर्श, धर्म ( गुरु-शिष्य परम्परा से प्राप्त होने वाले धर्म -'अभ्युदय और निःश्रेयस' प्रदान करने वाले ५ दैनंदिन अभ्यास) का पालन हमलोग नहीं कर रहे हैं।     
७. सर्वश्रेष्ठ आदर्श (The Highest Ideal): [जीवन को सार्थक बनाने के लिये मन की विवेक-प्रयोग क्षमता को विकसित करना। ]    
इसलिये अब हमें इस बात को ठीक से समझ लेना होगा कि (जीवन क्या है?) " the highest ideal of life"- जीवन का चरम लक्ष्य या सर्वोच्च आदर्श क्या है, और हमलोग उस आदर्श प्राप्त करने के लिए अग्रसर कैसे हो सकते हैं?  मनुष्य जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये स्वामी विवेकानन्द सबसे अधिक जोर फिजिकल फ़िट्नेस (शारीरिक स्वस्थता) पर देते हैं वे कहते हैं, "कमज़ोर बनना पाप है, शक्ति की उपासना करो, शकितमान बनो- 'नायं आत्मा बलहीनेन लभ्य:'।" उन्होंने तो यहाँ तक कहा है कि यदि तुम गीता पर दिए प्रवचन को सुनकर समझ नहीं पाते, तो प्रवचन सुनने से अच्छा है जाकर फुटबॉल खेलो, तुम फुटबॉल खेलकर गीता सुनने की अपेक्षा जल्दी अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकोगे। अतः ' for developing the potential of your physical strength' - तुम्हारी शारीरिक शक्ति की क्षमता को विकसित करने के लिये जो कुछ भी आवश्यक प्रशिक्षण मिलना चाहिये, उसकी व्यवस्था इस शिविर में की गयी है, जो तुम्हारे दैनिक कार्यक्रम का एक हिस्सा है। 
किन्तु अगर मानलो कि तुम किसी जंगली भैंसे या सांढ़ जितने बलवान बन जाते हो, तो इससे क्या फर्क पडेगा ? यदि तुम बैल का मस्तिष्क और एक बैल की ताकत के साथ समाज सेवा के कार्य में उतरोगे, तो इससे क्या तुन्हें या समाज को कोई लाभ पहुँचेगा ? इसीलिये, स्वस्थ और चुस्त शरीर के साथ तुम्हारे पास एक प्रशिक्षित मन का होना भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। 
मन को इस प्रकार से प्रशिक्षित करना होगा कि तुम स्वयं अपने आत्मा की शक्ति के द्वारा अपने मन की समस्त अन्तर्निहित शक्तियों ( all the potentials of your mind) को विकसित कर सको ! मन के भीतर जबरदस्त सम्भावना (tremendous potential) अन्तर्निहित है - एक ओर जहाँ इसमें "capacity to smash an atom" परमाणु को भी तोड़ डालने की क्षमता है ; तो दूसरी ओर इसमें " Realizing the Atman," आत्म-साक्षात्कार कर लेने की क्षमता भी है! आज तक मनुष्य ने जो कुछ भी प्राप्त किया है वह अपने मन की शक्तियों को एकाग्र करके ही प्राप्त किया है। जब तक तुममें अपनी इच्छानुसार मन को लगाने और हटाने की शक्ति नहीं होगी, तुम अपनी शारीरिक शक्ति का भी सही उपयोग नहीं कर सकोगे। तुम्हारे मन में अनन्त शक्ति है जिसका विकास करके तुम अपनी शारीरिक शक्तियों को भी अपने नियंत्रण में रखने की क्षमता प्राप्त कर सकते हो। 
किन्तु केवल मन की शक्ति भी तुम्हें लक्ष्य की दिशा में बहुत आगे तक नहीं ले जा सकेगी। मानसिक शक्तियों का प्रयोग करके लोगों ने ऐसे ऐसे अस्त्र-शस्त्र तैयार कर लिये हैं, जो सम्पूर्ण मानव-जाति के लिये आत्मघाती या 'self-destructive' हैं। इसीलिये तुम्हें अपने मन के एक उच्चतर संकाय (higher faculty of your mind), विवेक-प्रयोग शक्ति की आवश्यकता है, जिसके द्वारा तुम श्रेय-प्रेय (गुड ऐंड प्लिजेन्ट) को अलग अलग पृथक रूप में पहचान सकते हो। विवेक-प्रयोग शक्ति , मन में अन्तर्निहित 
संज्ञानात्मक या अवधारणात्मक (cognitive or perceptual) शक्तियों में से एक शक्ति है; जिसके द्वारा तुम यह अन्तर कर सकते कि दो वस्तुओं (जैसे आँवला और इमली में से) कौन सी वस्तु तुम्हारे लिये अच्छी है, कौन सी वस्तु तुम्हारे पडोसी के लिए अच्छी है, और कौन सी वस्तु सभी के लिए अच्छी है -और कौन सी वस्तु किसी के लिये भी अच्छी नहीं है ? 
८. आध्यात्मिक जागृति: Spiritual Awakening: 
 इसलिए, तुम्हें अपनी शारीरिक शक्ति के साथ साथ, तुम्हें अपनी मानसिक शक्ति को या विवेक-प्रयोग शक्ति को भी विकसित करना होगा, और इससे भी बढ़ कर जो इससे भी उच्चतर शक्ति है-जिसे 
आध्यात्मिक जागृति कहा जाता है, उस शक्ति को भी विकसित करना होगा। [कुछ मूलभूत प्रश्नों के उत्तर को स्वयं अपनी अनुभूति से जानना होगा, " इस पंचेन्द्रिय-ग्राह्य जड़ जगत के पीछे ऐसा कोई शक्तिमान पुरुष है या नहीं, जिसके इशारे पर जड़-समष्टि (गोचर भौतिक जगत) परिचालित हो रही है ? इस मानव जीवन का उद्देश्य क्या है ? क्या धर्म, ईश्वर आदि बातें मानव मन की कल्पना से उत्पन्न आकाशकुसुम की तरह असत्य हैं ?] 
यदि तुम केवल अपने बॉडी-माइंड कम्प्लेक्स (2H Complex, only 2 Dimension?)  या शरीर-मन की समष्टि को ही अन्तिम सत्य मानकर, इसी के छोटे से दायरे में घूमते रहोगे या इसी में रच-पच जाओगे, तो यह कभी नहीं जान पाओगे कि इस प्रकट-सत्ता या इन्द्रियगोचर अवास्तविक सत्ता (apparent entity) के पीछे कितनी अपार विस्तीर्णता (vastness) अवस्थित है!          
तुम यह कह सकते हो कि यदि मैं उस इन्द्रियातीत सत्य या विराट विस्तीर्णता को नहीं जानूँगा, तो इससे क्या फर्क पड़ेगा ? तुम बहुत सी बातों को अभी नहीं जानते हो। इसीलिये जो लोग इन्द्रियातीत सत्य के विषय में तुमसे बेहतर जानते हैं, उनके मुख से तुम्हें श्रवण करना होगा और और उसे जानने की पद्धति को सीखना होगा। मानव-जाति के मार्गदर्शक नेताओं ने उसका उपदेश दिया है और स्वामी विवेकानन्द ने उनके महावाक्यों को हमलोगों तक पहुँचा दिया है। 
जैसा कि तुम सब जानते हो, अपने जीवन की एक अवस्था में स्वामी विवेकानन्द स्वयं भी आस्तिक नहीं थे - ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करते थे ! (१८ वर्ष की अवस्था में, जब उनका नाम नरेन्द्र था) उनका मन वैज्ञानिक ढंग से स्वयं जाँच-परखकर देख लेने के बाद ही विश्वास करने को प्रशिक्षित था, इसलिये चुनौतीपूर्ण ढंग से अपने गुरु श्री रामकृष्ण से पूछा था - " क्या सचमुच कोई ईश्वर है ? महाशय, क्या आपने ईश्वर के दर्शन किये हैं ? 
श्री रामकृष्ण ने कहा, 'बेटा, मैंने ईश्वर के दर्शन किये हैं, तुम्हें जिस प्रकार प्रत्यक्ष देख रहा हूँ, इससे भी कहीं स्पष्ट रूप से उन्हें देखा है !"
 नरेन्द्र के विस्मय को सौगुना बढ़ाते हुए पुनः बोले - "क्या तुम भी देखना चाहते हो ? यदि तुम मेरे कहे अनुसार अभ्यास करो, तो तुम भी उन्हें देख सकते हो !"
'And Under His Training'- और 'उनके' प्रशिक्षण के दौरान (रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में लीडरशिप ट्रेनिंग) नरेन्द्र ने जब स्वयं ईश्वर का दर्शन कर लिया, केवल तभी उन्होंने 'Fact Of God' 
अर्थात 'ईश्वर के सत्य' को स्वीकार किया'ईश्वर का सत्य' ही परम-सत्य (Ultimate Reality, अविनाशी,
अपरिवर्तनशील सत्य) या जीवन का सर्वोच्च सत्य है। उसको जाने बिना तुम इस जगत में, (नश्वर) जीवन में जो कुछ भी करोगे, उसके द्वारा तुम मानव-सभ्यता की समस्याओं को कभी हल नहीं कर सकोगे। 
इसीलिये इस युवा-प्रशिक्षण कार्यक्रम का एक हिस्सा ऐसा भी अवश्य होना चाहिये, जिसे हम 'Spiritual Awakening' या आध्यात्मिक जागृति का प्रशिक्षण कहते हैं ! यदि तुम भारत की प्राचीन 'गुरु-शिष्य वेदान्त परम्परा' में विश्वास करते हो, तो हमारे उपनिषदों के ऋषि (शिक्षक या मानवजाति के मार्गदर्शक नेता) कहते हैं, " प्रत्येक मनुष्य में सर्वोच्च आत्म-विकास (highest self-development) करने की सम्भावना है!" [ चाहे वह इसे जानता हो या नहीं - प्रत्येक मनुष्य में ब्रह्म को जानकर ब्रह्मविद मनुष्य बन जाने की सम्भावना है !] जब तुम इस सर्वोच्च सम्भावना में विकसित हो जाते हो, तब अपने अनुभव से इस तथ्य को जान लेते हो कि " तुम्हारा यथार्थ स्वरूप और इस ब्रह्माण्ड का अन्तिम सत्य एक और अद्वितीय है!" (अतीन्द्रिय सत्य सच्चिदानन्द स्वरूप है !)         
हो सकता है कि इस अवस्था को समझ पाना तुमलोगों के लिये  'far cry' या दूर की कौड़ी हो ! तुम कह सकते हो तुम इस बात को नहीं समझ पा रहे हो, (हो सकता है, बॉल तुम्हारे सर के ऊपर से बाउंसर की तरह निकल रहा है।) किन्तु यदि तुम इस बात को पूरी तरह से नहीं भी समझ पा रहे हो, तो उससे भी कोई अन्तर नहीं पड़ेगा। इस 'सुसमाचार' (The gospel) को जान लेना भी कम नहीं है, कि सम्पूर्ण मानव व्यक्तित्व का एक 'महिमापूर्ण आयाम' ऐसा भी है !  
इसलिये इस प्रशिक्षण के दौरान तुम्हें अपने मस्तिष्क के क्षितिज को या मनो-आकाश के घेरे को विस्तृत करना होगा, तुम्हें अपनी बुद्धि की कुशाग्रता में वृद्धि करनी होगी, और इसके अतिरिक्त तुम्हें यह भी सीखना होगा कि 'मनःसंयोग' (Mental Concentration) कैसे किया जाता है।  
९. सुसंगत विकास: [3'H' Complex Harmonious Development: के लिये ऑडोटोरियम, किचेन, टॉयलेट, फिल्ड ड्यूटी का प्रशिक्षण।] 
 यह मन ही है, जिसकी सहायता से हमें दुनिया के सारे काम करने पड़ते हैं। पर यह मन है क्या ? [ मन को परिभाषित करते हुए शुक्लयजुर्वेद, ३४/ १ में कहा गया है - 
 "यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति । 
दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।। 

- अर्थात जो मन किसी मनुष्य की जाग्रत अवस्था में, दूर तक चला जाता है और वही मन सुप्तावस्था में वैसे ही लौट आता है, जो दूर तक जाने की सामर्थ्य रखता है और सभी ज्योतिर्मयों की भी ज्योति है, वैसा मेरा मन शान्त, शुभ तथा कल्याणप्रद विचारों का होवे ।" 
भावार्थः----जो मन जागृत अवस्था में दूर चला जाता है। वही स्वप्न में भी उसी प्रकार चलता रहता है। वह मन दूर जाने वाला और प्रकाशक (इन्द्रियों) का भी प्रकाशक है, ऐसा मन अच्छे विचार वाला हो।" 
जैसे कार आदि जड़ वस्तु और आँख, हाथ आदि अपने जड़ अंगों को एक बार नियंत्रित करने पर, वो पर्याप्त समय तक नियंत्रित रहते हैं। परंतु मन, जो कि जड़ है, उसको एक बार नियंत्रित करने पर भी वो बार-बार अनियंत्रित होकर हमारे ध्यान में बाधा डालता ही रहता है, ऐसा क्यों? 
 रसगुल्ला खाने में रूचि हैईश्वर में रूचि नहीं है, गड़बड़ी यह है। मूर्ख मित्रों से रोज मिलते हैं, न्यूज पेपर भी रोज पढ़ते हैं। इन सब से हम परिचित हैं और इन चीजों में, कार्यों में खूब रूचि है। इसलिये वहाँ पर मन खूब लगता है। और ईश्वर में रूचि नहीं, ईश्वर का महत्व नहीं जानते, ईश्वर के प्रति श्रद्धा  कम है, इसलिये ईश्वर का विचार मन में नहीं टिकता है। 
तो इस प्रयोग से पता चला, कि हमारी इच्छा से, हमारे प्रयत्न से ही मन में विचार उठते हैं। बस, तो ईश्वर के प्रति इच्छा पैदा करो, ईश्वर के प्रति रूचि बनाओ और उसको स्मरण करने का प्रयत्न करो। तो यह मन ठीक-ठाक चलेगा। कार की तरह चलेगा। फिर दूसरी बात नहीं उठायेंगे, ईश्वर की बात उठायेंगे। इसीलिये ऋषियों ने कहा है -‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः’ अर्थात् मन ही मनुष्यों के बंधन और मोक्ष का कारण है। 
परन्तु शरीर की तरह ही मन भी तो एक जड़ वस्तु है। इस बात का अभिप्राय यह नहीं समझना चाहिये कि कोई जड़-वस्तु हमको (अर्थात चेतन आत्मा) को अपनी स्वतंत्रता से बांध लेती है। तो फिर यह जड़ ‘मन’ हमारे बंधन और ‘मोक्ष’ का कारण कैसे है? 
मन जड़-वस्तु होकर के भी हमें बाँध तो लेता है, पर मन हमें बाँध लेने में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है। यदि हम बंधना चाहें, तभी यह जड़ मन हमें (मनुष्य को)  बाँध सकता है। पर यदि हम नहीं बंधना चाहें, तो यह हमें नहीं बाँध सकता है। बंधन और मोक्ष का कारण सीधा-सीधा तो जीवात्मा है। जीवात्मा अगर मोक्ष में जाना चाहे, तो मन उसको मोक्ष में जाने के लिए पूरा सहयोग देगा। और जीवात्मा बंधन में ही रहना चाहता है, वो मोक्ष में जाना ही नहीं चाहता, तो फिर मन उसको बंधन में डाल देगा। इसमें मन का कोई दोष नहीं है। मन एक जड़ वस्तु है, फिर भी वो इस नाम से कह दिया जाता है। जैसे यह कह दिया जाता है, कि मेरी तो इच्छा है उठ जाने की, पर यह रजाई मुझे नहीं छोड़ रही। जैसे वो मोटी सी बात कह दी, ऐसे ही ये मोटी सी बात है। मन का संचालन आत्मा के अधीन है। आत्मा चाहेगा, तो मन से बंधन अथवा मोक्ष दोनों कर सकता है। साभार http://aryamantavya.in  
इसीलिये हमें अपने मन में केवल सर्वोच्च विचार को (रसगुल्ला संबन्धी विचार नहीं ईश्वर=होली ट्रायो 
सम्बन्धी विचारों को) ही प्रविष्ट होने की अनुमति देनी चाहिये। मनःसंयोग का अभ्यास करते समय -'Do not shut your mind' अपने मन को विचारशून्य करने का प्रयत्न नहीं करना है। इस बात पर ध्यान मत दो कि वे विचार कहाँ से आ रहे हैं ? सभी दिशाओं से विचारों को आने की अनुमति देनी चाहिये। किन्तु अपने मन में अन्तर्निहित विवेक-प्रयोग करने की शक्ति को कुशाग्र बना लेना चाहिये ( अर्थात पृथक कर देने वाली कुल्हाड़ी को धारदार बना लेना, बाबू टेंगारी सिंह होकर बैठना चाहिये !) जिसके द्वारा उन श्रेय विचारों को,जो हमें आत्म-विकास के पथ पर अग्रसर करने के प्रति वफादार हों, पहचान कर प्रेय विचारों से तुरन्त पृथक कर लेना चाहिये। तुमने दो प्रकार के विकल्पों में से सर्वोत्कृष्ट विकल्प का चयन तो पहले ही कर लिया है कि तुम केवल स्वामी विवेकानन्द द्वारा निर्धारित शिक्षाओं और आदर्शों का ही अनुसरण करोगे। और जैसे जैसे तुम्हारी उम्र बढ़ेगी तुम्हारे मन का दायरा या क्षितिज भी बढ़ता जायेगा, तुम यह समझ जाओगे कि तुम्हारा यह चयन गलत नहीं है।   
एक दिन ऐसा आएगा, जब तुम उस दिन को धन्य मानोगे जिस दिन तुमने विरोधाभासी आदर्शों वाले किसी अन्य संगठन (Contending Ideals, जिसके नेता और संगठन का मन-मुख एक नहीं है।) से नहीं जुड़ कर 'महामण्डल' से जुड़ने का निर्णय लिया था ! यह संगठन मन-वचन-कर्म से स्वामी विवेकानन्द के उन आदर्शों का अनुसरण करता है, जो प्रत्येक व्यक्ति की सर्वोच्च अवश्यकताओं को परिपूर्ण करने में सक्षम है। वह पूर्णता जो तुम्हारे भीतर पहले से अन्तर्निहित है, उसे अभिव्यक्त करने का उपाय बहुत सरल भाषा में तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत कर देता है। और अन्तर्निहित ब्रह्मत्व या पूर्णता की अभिव्यक्ति इस बात की माँग करती है कि तुम मनुष्य के तीनों प्रमुख अवयव -शरीर, मन और हृदय की शक्तियों का सुसमन्वित विकास करो! अपनी शारीरिक-मानसिक और आध्यात्मिक तीनों शक्तियों को सुसमन्वित ढंग से विकसित करो ! इसका तात्पर्य यह है कि तुम्हें बाहुबल-बुद्धिबल और आत्मबल तीनों बलों के सुसमन्वित विकास द्वारा बलवान बन जाना होगा। 
'Our young boys do not know How to Dirt their Hands' --हमारे युवाओं ने, गन्दगी -साफ करने के लिये अपने हाथो को गन्दा करना कभी सीखा ही नहीं है। यदि कोई लड़का ऐसे पिता का पुत्र है, जिसकी मासिक आमदनी लाख-पचास हजार रूपये भी है, तो उसे यह नहीं पता होता कि अपने हाथों से पानी भरी बाल्टी को कैसे उठाया जाता है? या कमरे के फर्श पर झाड़ू कैसे लगाया जाता है, अपने कपड़े स्वयं कैसे धोये जाते हैं? तुम्हें अपने हाथों से कुछ काम करना अवश्य सीखना चाहिये, बल्कि वैसे कार्यों को करना भी सीखना चाहिये जिसे तुम 'Menial Work'  (नौकरों-मजदूरों या मेहतरों द्वारा किया जाने वाला छोटा काम) कहते हो। (परन्तु मुँह से कहते हो कि कोई काम छोटा नहीं होता, डिगनिटी ऑफ़ लेबर की बात क्या सिर्फ बोलने के लिए है, करने के लिए नहीं ?) स्वयं की सेवा स्वयं करना, स्वयं-सेवक बनना मनुष्य जीवन की अत्यन्त 'गौरवशाली परीक्षा' अवधि है।  (dignified probation पीरियड या नव-अभ्यास काल है!) 'For how could those, who do not serve themselves, serve others? ' क्योंकि जो मनुष्य अपनी सेवा आप नहीं कर सकता, वह भला दूसरों की सेवा कैसे कर सकता है?        
१०. Twin Ideals: [ ब्लूम व्हेयर यू आर प्लांटेड " -महामण्डल नेता के जुड़वाँ आदर्श -'BE AND MAKE']
 स्वामीजी ने कहा था : तुम्हारे सामने ये दो आदर्श हैं- बनो और बनाओ ! सबसे पहले, अंतर्निहित सर्वोच्च पूर्णता ब्रह्मत्व को अभिव्यक्त करने प्रयत्न करो, और उसके मार्ग में जो भी बाधाएँ आयें उन्हें धीरे से किनारे करके आत्म-विकास के मार्ग पर आगे बढ़ते रहो। और मानलो कि तुम तो अपने आत्मविकास की चोटी (summit) पर पहुँच गये, किन्तु तुम्हारे बाकी भाई, तुम्हारे सभी अपने देशवासी यहीं गरीबी-भुखमरी के कारण दुःख से गिड़गिड़ा रहे हैं; तब तुम्हारे इस उपलब्धि से क्या लाभ हुआ ? इसीलिए स्वामीजी ने कहा था, जब तुम आगे बढ़ जाते हो, तो अपने सभी भाइयों को भी साथ लेकर आगे बढ़ो ! 
"अपने में ब्रह्मभाव को अभिव्यक्त करने का यही एकमात्र उपाय है कि इस विषय में दूसरों की सहायता करना।"
जिसमें जितनी निःस्वार्थता है वह उतना ही आध्यात्मिक है, तथा उतना ही श्रीशिवजी के समीप है।  "
" मोहग्रस्त लोगों (हिप्नोटाइज्ड लोगों) की ओर दृष्टिपात करो। हाय ! हृदय-भेदकारी उनके करुणापूर्ण आर्तनाद को सुनो।  हे वीरों ! बद्धों को पाशमुक्त करने (हिप्नोटाइज्ड लोगों को डीहिप्नोटाइज्ड करने), दरिद्रों के कष्ट को कम करने, तथा अज्ञजनों (श्रीरामकृष्ण के जीवन और सन्देश में नहीं रखते) का हृदयान्धकार दूर करने के लिए आगे बढ़ो, 'डरो नहीं', 'डरो नहीं '- यही वेदान्त-दुन्दुभि का स्पष्ट उद्घोष है। " 
" मैंने इतनी तपस्या करके यही सार समझा है कि जीव-जीव में वे ही अधिष्ठित हैं, इसके अतिरिक्त ईश्वर और कुछ भी नहीं है। जो जीवों के प्रति दया करता है, वही व्यक्ति ईश्वर की सेवा कर रहा है। " इसीलिये, 'सेवा' हमारे जीवन के आदर्श का एक अपरित्याज्य हिस्सा बन जाना चाहिए !  
ये दो बातें - " self development for self-fulfillment and taking others along" अर्थात अन्तर्निहित ब्रह्मत्व को अभिव्यक्त करने के लिये आत्म-विकास का प्रयत्न और अपने साथ-साथ दूसरों को भी लेकर आगे बढ़ना" - किसी ( grown-up man) बालिग या व्यस्क मनुष्य की पहचान है, तथा प्रत्येक 'विवेकशील और आदर्शवादी भारतीय युवक का नियत कार्य' है। तुम सभी ऐसे ही युवा हो, तुम लोग इस आदर्श से अत्यधिक प्रेम करते हो, इसीलिये तुमने इस जुड़वाँ आदर्श - 'BE AND MAKE' को अपना आदर्श वाक्य चुन लिया है। 
इसीलिये इस प्रशिक्षण शिविर में तुम्हारे ऊपर जो भी जिम्मेदारी सौंपी जाय, या कोई कार्य करने को कहा
जाय, तो उसे सहर्ष स्वीकार करना चाहिये। तथा इस प्रशिक्षण केन्द्र में तुम जितने दिनों तक हो, उस दौरान पूरे दिल से, ध्यान-पूर्वक और प्रेम के साथ इसके सभी कार्यक्रमों में भाग भी लेना चाहिये। और इस शिविर से वापस लौट कर घर जाओ, तो तुमने जो कुछ सीखा है, (५ अभ्यास से 3'H' विकास) उन सभी को याद रखना चाहिये। तथा अगले प्रशिक्षण शिविर में जब तक आओ तब तक उन्हें विकसित करते रहने की चेष्टा भी करनी चाहिये। 
इस प्रशिक्षण शिविर के आयोजक लोग जब तुम्हें पुनः अधिक खिले हुए चेहरे, और अधिक विकसित व्यक्तित्व, स्वामीजी की शिक्षाओं और आदर्शों के विषय और अधिक स्पष्ट अवधारणा को देखेंगे तब उनके आनन्द का कोई ठिकाना नहीं होगा। इसके लिये क्या करना अनिवार्य होगा ? जब तुम वापस अपने घर लौटकर जाओ, तो अपने शैक्षिक विषयों का अध्यन (academic studies) के साथ साथ तुम्हें नियमित रूप से थोड़ा अध्यन स्वामी विवेकानन्द के विचारों का भी करना होगा।            
अपने शैक्षिक विषयों के अध्यन की अथवा अपनी आजीविका चलाने के लिये तुम जो कुछ नौकरी या व्यापार  करते हो- उसकी, कभी उपेक्षा मत करना। शिविरार्थी भाइयों में कुछ थोड़े से युवा भाई ऐसे भी होते हैं, कि जब वे जीवन में किसी आदर्श को ग्रहण करते हैं, तब पहला काम वे यही करते हैं कि वे अपने शैक्षिक अध्यन या अकादमिक अध्ययनों की उपेक्षा करने लगते हैं।  किन्तु तुम्हें यह अवश्य याद रखना चाहिये कि यह दुनिया बहुत कठिन प्रतिस्पर्धा (hard competition) की बेरहम दुनिया है। इसीलिये जब तक तुम अपनी सम्पूर्ण मानसिक और शारीरिक शक्ति को लगाकर काम नहीं करोगे, तो चाहे तुम्हारा कार्य-क्षेत्र कुछ भी हो तुम वहाँ अपनी अच्छी छाप नहीं छोड़ पाओगे, यहाँ तक कि अपनी रोजी-रोटी भी नहीं चला पाओगे। इसलिये वैसे प्रशिक्षण संस्थाओं से कभी प्रशिक्षण मत लेना, जो तुम्हें तुम्हारे गृहस्थ-जीवन के कर्तव्य या विद्यार्थी-जीवन के कर्तव्य की उपेक्षा करने की सीख देते हों ! वैसा करने से तुम्हारा भविष्य बिगड़ जायेगा। 
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता (३/३५ और १८/ ४५-४८) में स्वधर्म के विषय में जो कुछ कहा है, वह अत्यन्त महत्वपूर्ण है! [What is called svadharma by Sri Krishna in the Gita is very important. अपने-अपने नियत कर्मों का पालन करने से मनुष्य कर्मबन्धन से मुक्त हो जाता है अर्थात् उसका कल्याण हो जाता है। अतः दोषयुक्त दीखने पर भी नियत कर्म अर्थात् स्वधर्म का त्याग नहीं करना चाहिये। हे कौन्तेय दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए क्योंकि सभी कर्म दोष से आवृत होते है? जैसे धुयें से अग्नि। साभार https://www.gitasupersite.iitk.ac.in
सरकारी महकमे में एक कर्मचारी या ऑफिसर हो, कोई व्यापारी या विद्यार्थी हो, चाहे जिस किसी कार्यक्षेत्र में तुम क्यों न रहो, सदैव अपने कर्तव्य को सर्वोत्कृष्ट निष्ठा और सेवाभाव के साथ सम्पन्न करो। अन्यथा, तुम्हें अपने को स्वामी विवेकानन्द का एक अनुयायी कहने का कोई हक नहीं है। जो स्वामी विवेकानन्द का सच्चा अनुयायी होगा, वह चाहे जीवन के किसी भी क्षेत्र में कार्यरत होगा -वहीं अपनी सर्वोत्कृष्ट सेवायें प्रदान करेगा। चाहे कोई व्यक्ति एक सफाई कर्मचारी हो, या सेनाध्यक्ष के पद पर हो, या एक प्रोफेसर हो, उसे अपने अपने क्षेत्र में सर्वोत्कृष्ट सेवायें प्रदान करनी चाहिये।
 "Until you give your very best where you stand, you cannot give your best where you will stand." इस समय तुम जहाँ खड़े हो, (अर्थात अभी जीवन के जिस क्षेत्र में भी तुम्हें क्यों न रखा गया हो) वहीं पर यदि तुम अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दे सके, तो भविष्य में तुम्हें जहाँ खड़ा होना होगा, वहाँ भी अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दे पाओगे। इस प्रकार से विचार करना अत्यन्त महत्वपूर्ण है! 
[बाइबिल : *कुरिन्थियों 7/विवाह:20-24: - [ अब मुझे अविवाहितों और विधवाओं के बारे में यह कहना है:यदि वे मेरे समान अकेले ही रहें तो उनके लिए यह उत्तम रहेगा। 9 किन्तु यदि वे अपने आप पर काबू न रख सकें तो उन्हें विवाह कर लेना चाहिये; क्योंकि वासना की आग में जलते रहने से विवाह कर लेना अच्छा है। दि तुम विवाहित हो तो उससे छुटकारा पाने का यत्न मत करो। यदि तुम स्त्री से मुक्त हो तो उसे खोजो मत। 28 किन्तु यदि तुम्हारा जीवन विवाहित है तो तुमने कोई पाप नहीं किया है। तुम्हारे शरीर उस पवित्र आत्मा के मन्दिर हैं जिसे तुमने परमेश्वर से पाया है और जो तुम्हारे भीतर निवास करता है। और वह आत्मा तुम्हारा अपना नहीं है, 20 क्योंकि परमेश्वर ने तुम्हें कीमत चुका कर खरीदा है। इसलिए अपने शरीरों के द्वारा परमेश्वर को महिमा प्रदान करो। यह मेरा विचार है। और मैं सोचता हूँ कि मुझमें भी परमेश्वर के आत्मा का ही निवास है। 20 हर किसी को उसी स्थिति में रहना चाहिये, जिसमें उसे बुलाया गया है। 21 क्या तुझे दास के रूम में बुलाया गया है? तू इसकी चिंता मत कर। किन्तु यदि तू स्वतन्त्र हो सकता है तो आगे बढ़ और अवसर का लाभ उठा। 22 क्योंकि जिसे प्रभु के दास के रूप में बुलाया गया, वह तो प्रभु का स्वतन्त्र व्यक्ति है। इसी प्रकार जिसे स्वतन्त्र व्यक्ति के रूप में बुलाया गया, वह मसीह का दास है। 23 परमेश्वर ने कीमत चुका कर तुम्हें खरीदा है। इसलिए मनुष्यों के दास मत बनो। 24 हे भाईयों, तुम्हें जिस भी स्थिति में बुलाया गया है, परमेश्वर के सामने उसी स्थिति में रहो। ]
११.  विचारों का ख्याल रखना: (Take Care of Thoughts):
अच्छे बीजों की तरह ही अच्छे विचारों का चयन करना भी जरूरी है ! क्योंकि विचार ही तुम्हारे कर्मों का बीज है। राल्फ वाल्डो इमर्सन की एक प्रसिद्द अंग्रेजी कहावत है - “Sow a thought and you reap an action; sow an act and you reap a habit; sow a habit and you reap a character; sow a character and you reap a destiny.” -अर्थात " जैसे विचार बोओगे वैसे कर्म काटोगे, जैसे कर्म बोओगे वैसी आदत काटोगे, जैसी आदतें बोओगे वैसा चरित्र काटोगे, जैसा चरित्र बोओगे वैसा भाग्य काटोगे ! " 
इसलिये इस लीडरशिप ट्रेनिंग में विचारों का महत्व सबसे अधिक है। यहाँ से मिलने वाले उच्चतम विचारों को पूर्णतः स्वीकार करना चाहिये। और तुम्हें यह अवश्य ध्यान रखना चाहिये कि तुम्हारा मन तुम्हारे साथ, कहीं कोई चाल तो नहीं खेल रहा है ? मन-वचन-कर्म में ही नहीं सम्पूर्ण जीवन में ईमानदारी प्रकट होनी चाहिये। जहाँ सभी लोग परीक्षा भवन में नकल कर रहे हों, वहाँ भी तुम्हें ईमानदार रहने की चेष्टा करनी चाहिये। तुम्हारे पास वैसा चरित्र रहना चाहिये, नकल के विरुद्ध खड़े रहने का साहस होना चाहिये।  
तुम्हें बिल्कुल एक नए किस्म का मनुष्य बन जाना चाहिये। 
हो सकता है, तुम्हारे मित्र तुम्हें मूर्ख कहकर पुकारें ! या और कोई परिणाम भी क्यों न हो, उसका सामना करते हुए कहना चाहिये -" हाँ, मैं स्वामी विवेकानन्द को अपना आदर्श मानता हूँ, मैं चोरी नहीं कर सकता। मैं स्वयं के प्रति, अपने मार्गदर्शक नेता या गुरु विवेकानन्द और अपने भाग्य के प्रति ईमानदार रहूँगा। जो लड़के अच्छी तरह से पढ़ाई नहीं करेंगे, वे परीक्षा में भी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकेंगे। फिर अपने भविष्य के जीवन में आने वाले उच्तर परीक्षा या इम्तहान का सामना कैसे करेंगे ? वे अपने भावी जीवन में सफल कैसे होंगे ? 
इस प्रकार हम देख सकते हैं, कि अच्छे विचारों का केवल एक बीज (२४ में से केवल एक चारित्रिक गुण - ईमानदारी) हमारे भावी जीवन में कितना अधिक बदलाओ ला सकता है ! और हमलोग स्वामीजी के ट्रेनिंग में (शिक्षाओं में) इसी प्रकार के कितने ही वैसे महत्वपूर्ण बीज (मंत्र) प्राप्त करते हैं, जो अच्छे विचारों को उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं और हमारे सुन्दर -जीवन का निर्माण करते हैं।
" So study them": अतः पहले महामण्डल द्वारा प्रकाशित पुस्तिका 'चरित्र के गुण' को खरीद लें, और इसका स्वाध्याय करें। स्वामीजी ने कहा है - 'Take a Few Ideas and Make them your Life and Character.' - अर्थात " (अच्छे विचारों को उत्पन्न करने में सक्षम, केवल एक ही बीज, या एक ही भाव को लेकर सदा उसी में विभोर होकर रहो। सोते-जागते सब समय उसी को लेकर रहो। तुम्हारा मस्तिष्क, स्नायु, शरीर के सर्वांग उसी के विचार से पूर्ण रहें।  दूसरे सारे विचार छोड़ दो। यही सिद्ध होने का (चरित्रवान मनुष्य बन जाने का) उपाय है।" और श्री रामकृष्ण कहते हैं- " मुख से तबले के बोल निकाल लेना बहुत ही आसान है, किन्तु अपने हाथों के माध्यम से उन्हें निकाल पाना कठिन है। 
[सामान्य मानव चेतना सिर्फ इंन्द्रिय-ग्राह्य चीजों को ही देख सकती है। उससे परे नहीं देख सकती है। आध्यात्मिक चेतनाबोध होने पर सबसे पहले चेतनाबोध का परिवर्तन होता है। तब व्यक्ति को अनुभव होता है वह देह नहीं अथवा मन नहीं है, अपितु आत्मा है। यह लिख देना या कह देना आसान है, लेकिन इसका प्रत्यक्ष अनुभव अभी मुझे भी नहीं है। खैर, इसके बाद चेतना का विस्तार होता है। तब हमें अनुभव होता है कि हम सर्वव्यापी परमात्मा के अंश हैं। इसके और आगे बढ़ने पर अनुभव होता है कि ब्रह्म ही एकमात्र सत्ता है । हाथो से तबले का बोल निकालने के लिये ही महामण्डल के निर्देशन में प्रशिक्षण लेना ही पड़ता है!]  
इसीलिये, यहाँ तुमलोग जो कुछ सीखोगे उसमें से कुछ महत्वपूर्ण भावों का चयन कर लो, और उन्हें शरीर के स्नायुों से प्रवाहित करके उन्हें अपने जीवन के द्वारा अभिव्यक्त करो। जिस दिन तुम यह समझ जाओगे, कि तुम्हारे अनजाने ही तुम्हें यहाँ क्या प्राप्त हो गया है, ('त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि' सुनाकर आध्यात्मिक जागृति -अन्तर्निहित ब्रह्मत्व को अभिव्यक्त करने, ब्रह्मविद मनुष्य बनने और बनाने में समर्थ लोकशिक्षक का जीवन गठित हो रहा है !) उस दिन तुम आज के दिन को धन्य मानोगे, और इस दिन को आशीर्वाद दोगे; और दूसरे युवाओं को बुलाकर,उनके साथ उस आनन्द-सन्देश 'the glad tidings' को, जिसके भीतर तुम विभोर होकर रहे हो; उस आनन्द को जब दूसरों के साथ भी साझा करने लगोगे, तब  तुम लोगों का जीवन बदल जायेगा ! 
[अर्थात इस को, रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में अर्थात लोक-शिक्षक बनो और बनाओ परम्परा में लीडर-शिप ट्रेनिंग' के सन्देश को चरैवेति चरैवेति करते हुए, दूसरों को बुला-बुला कर साझा करने लगोगे तब तुम लोगों के जीवन में सत्ययुग आ जायेगा !] 
हमलोगों पर श्रीरामकृष्ण-माँ सारदा देवी -स्वामी विवेकानन्द की असीम कृपा है, कि विगत ५० वर्षों से महामण्डल का यह मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माणकारी आन्दोलन निरन्तर आगे बढ़ता जा रहा है। और तुमलोग सचमुच धन्य हो कि तुमने मानव-जाति के महान मार्गदर्शक नेता स्वामी विवेकानन्द के आह्वान का प्रति-उत्तर दिया है।       
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 [ पहले ही दिन २६-१२-१९८७ को मनःसंयोग की कक्षा में -जब महामण्डल के 'नेता' पूज्य नवनी दा ने प्रशिक्षण-शिविर में आये सभी युवाओं में अन्तर्निहित अपने ही जैसा भावी नेता को देखते हुए," तैत्तिरीयोपनिषद/शिक्षा वल्ली" से यह शान्तिपाठ किया था - ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा (भवतु अर्यमा) । शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं बह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम । अवतु वक्तारम् । ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः । " -अर्थात ‘मित्र’ देवता हमारे लिए कल्याणकारी हों, 'वरुण' देवता कल्याणकारी हों । ‘अर्यमा’ देवता हमारा कल्याण करें । हमारे लिए 'इन्द्र' एवं 'बृहस्पति' देवता कल्याणप्रद हों । ‘उरुक्रम’ (जिनके डग विशाल हैं ) विष्णु देवता हमारे प्रति कल्याणप्रद हों । ब्रह्म को नमन है । वायुदेव तुम्हें नमस्कार है । तुम ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हो । अतः तुम्हें ही प्रत्यक्ष तौर पर ब्रह्म कहूंगा । ऋत बोलूंगा । सत्य बोलूंगा । वह ब्रह्म मेरी रक्षा करें । वह वक्ता आचार्य की रक्षा करें । रक्षा करें मेरी । रक्षा करें वक्ता आचार्य की । त्रिविध (आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक) तापों की शांति हो । उस दिन का वह क्षण धन्य था, मैं उस क्षण का ऋणी हूँ ! 
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