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गुरुवार, 2 नवंबर 2017

महर्षि कपिल का परिणामवाद

हमारा यह स्थूल शरीर और दृष्टिगोचर विश्व-ब्रह्माण्ड अस्तित्व में कैसे आ गया ? आइये इस रहस्य को हम आधुनिक युग में में ईश्वर (ब्रह्म) के अवतार भगवान श्रीरामकृष्ण द्वारा भारत की प्राचीन ' गुरु-शिष्य वेदाध्यापक प्रशिक्षण परम्परा' में  प्रशिक्षित एवं आधुनिक युग में मानवजाति के मार्गदर्शक नेता, लोक-शिक्षक,या 'वेदाध्यापक' (टीचर ऑफ़ वेदान्ता) स्वामी विवेकानन्द जी के शब्दों में समझने का प्रयास करते हैं। स्वामी विवेकानन्द जी कहते हैं -
 " भगवान कपिल ही दर्शन शास्त्र के पितामह हैं, वे व्यासदेव से भी प्राचीन हैं, इसीलिये हम उनकी बात सुनने के लिये बाध्य हैं। कपिल का 'सांख्य-दर्शन' ही विश्व का ऐसा सर्वप्रथम दर्शन है, जिसमें 'युक्ति-विचार पद्धति' से जगत् की उत्पत्ति और लय के सम्बन्ध में विचार किया गया है। विश्व के प्रत्येक तत्त्व जिज्ञाषु- वैज्ञानिक को उनके प्रति श्रद्धांजली अर्पित करनी चाहिये।" (४:२०४) " 
 " ... वयोवृद्ध और अत्यन्त पवित्र महर्षि भी इन प्रश्नों (सृष्टी-रचना के सिद्धान्त) का समाधान करने में असमर्थ हो रहे हैं; पर तभी एक ' युवक ' - उनके बीच खड़ा हो कर घोषणा करता है- ' हे अमृत के पुत्र सुनो, हे दिव्यधाम के निवासी सुनो - मुझे मार्ग मिल गया है ! जो अंधकार या अज्ञान के परे है, उसे जान लेने पर ही हम मृत्यु के परे जा सकते हैं, अन्य कोई मार्ग नहीं है। " (श्वेताशतर२/५/३-८) (वि० सा० ख० २:५८)
" कपिल का प्रधान मत है, 'परिणाम-वाद'। इस कार्य-कारण वाद या ' परिणाम- वाद ' से तात्पर्य है- 'कार्य' भी अन्य रूप में परिणत ' कारण ' मात्र ही है। जैसे ' घड़ा ' कार्य है, और ' मिट्टी ' है उसका कारण। कपिल के अनुसार अव्यक्त प्रकृति से ले कर चित्त,मन, बुद्धि, अहंकार तक कोई भी वस्तु पुरूष अर्थात भोक्ता या प्रशासक नहीं है। स्वरूपतः मन में चैतन्य नहीं है; किन्तु हम देखते हैं कि वह तर्कना करता है।अतएव उसके परे, निश्चित रूप से ऐसी कोई ' सत्ता ' होनी चाहिए, जिसका आलोक- महत्, बुद्धि, अहं-ज्ञान और अन्य परवर्ती परिणामों में व्याप्त है। इस सत्ता को कपिल ' पुरूष ' कहते हैं, वेदान्ती उसी को 'आत्मा' कहते हैं।...बुद्धि स्वतः क्रियाशील नहीं है- उसकी पृष्ठ भूमि में जो पुरूष विद्यमान हैं, उसीसे मानो उसमे कार्यशीलता आती है। " (४:२१२) 

" हमारे दो जगत हैं, बाह्य-जगत और अन्तर्जगत। यह सम्पूर्ण बाह्य-जगत्, अन्तर्जगत् या सूक्ष्मजगत् का स्थूल विकास मात्र है। विकसित होने या अभिव्यक्त होने की प्रक्रिया की सभी अवस्थाओं में सूक्ष्म को 'कारण' और स्थूल को 'कार्य' समझना होगा। इस नियम से, बाह्य-जगत् कार्य है और अन्तर्जगत् कारण। " (१:४२)
' बाह्य-जगत्'  तो तुम्हे अपने मन के अध्यन में प्रेरित करने के लिए एक उद्दीपक तथा अवसर मात्र है। सेब के गिरने ने न्यूटन को एक उद्दीपक प्रदान किया, उसने अपने मन का अध्यन किया और गुरुत्वाकर्षण का नियम मिल गया। ' (३:४)
 " एक पत्थर गिरा और हमने प्रश्न किया- इसके गिरने का कारण क्या है? हम यह निश्चित रूप से जानते हैं कि - बिना कारण कुछ कुछ भी घटित नहीं होता। मेरा अनुरोध है कि इस ' क्यों ' कि धारणा को खूब स्पष्ट रूप से समझ लो। जब हम यह प्रश्न करते हैं कि यह घटना क्यों हुई? तब यह मान लेते हैं, कि सभी घटनाओं का एक ' क्यों ' रहता ही है। अर्थात उसके घटित होने के पूर्व और कुछ अवश्य हुआ होगा, जिसने कारण का कार्य किया। इसी पूर्ववर्तिता और परवर्तिता के अनुक्रम को ही ' निमित्त ' अथवा कार्य-कारणवाद कहते हैं। " (२:८६) 
" शापेनहावर ने यह निष्कर्ष निकला कि ' इच्छा ' (Will) ही सभी चीजों का कारण है। ' होने ' की इच्छा से ही हमारी अभिव्यक्ति होती है"- किन्तु हम इससे इन्कार करते हैं। वास्तव में इच्छा और प्रेरक-नाड़ी (Motor-nerve) एक रूप है। जब हम किसी वस्तु को देखते हैं, तो इसमे इच्छा की कोई बात नहीं होती, जब इसकी संवेदनायें मस्तिष्क में स्थित दर्शन इन्द्रिय तक पहुँचती हैं- तब प्रतिक्रिया स्वरूप बुद्धि निर्णय करती है - 'यह करो ' अथवा ' यह न करो '। अहं तत्व की इस अवस्था को ही इच्छा कहते हैं। इच्छा का एक भी कण ऐसा नहीं है, जो प्रतिक्रिया का फल न हो। अतएव ' इच्छा ' के पूर्व बहुत सी वस्तुयें रहनी आवश्यक हैं। यह ' इच्छा ' अहं तत्व से निर्मित कोई प्रतिक्रिया मात्र है। और अहं तत्व का सृजन - उससे भी ऊँची वस्तु बुद्धि से होती है। और वह बुद्धि भी अविभक्त प्रकृति का परिणाम है। मनुष्य में महत्, महान् तत्व ( the  Great Principle) या बुद्धि (the Intelligence) सम्बन्धी बात को समझना बहुत आवश्यक है। " (वि० सा० ख ० ४: २०४ )
" देश-काल-निमित्त या नाम-रूप के साँचे से जब ' वह ' जो इच्छा रूप में परिणत हो जाता है, जो पहले इच्छा के रूपमें नहीं था, परन्तु बाद में देश-काल-निमित्त के साँचे में पड़ने से जो मानवीय इच्छा हो गया, वह अवश्य स्वाधीन है। और जब यह इच्छा इस वर्तमान नाम-रूप या देश-काल-निमित्त के साँचे से मुक्त हो जायगी तो ' वह ' पुनःस्वतंत्र हो जाएगा। " (३:६९) 
" अतएव ' इच्छा ' के पूर्व बहुत सी वस्तुयें जरुरी है। यह इच्छा- अहं तत्त्व से निर्मित कोई प्रतिक्रिया मात्र है। औरअहं तत्व का सृजन उससे भी ऊँची वस्तु बुद्धि से होती है। और यह बुद्धि भी अविभक्त प्रकृति का परिणाम है।"(४:२०४)
" इसे (परिणामवाद E=M को) समझना तुम्हारे लिए अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि समस्त विश्व में कोई ऐसा दर्शन नहीं है जो कपिल का ऋणी न हो। पाइथागोरस भारत आये और उन्होंने इस दर्शन का अध्यन किया। और वही ग्रीक लोगों के दार्शनिक विचारों का समारंभ था। " (४:२०४) 
" आधुनिक विकास-वाद का सिद्धांत कहता है, हर कार्य पूर्ववर्ती कारण की आवृत्ति मात्र है। परिस्थिति या परिवेश के कारण रूप-परिवर्तन होता है। योनी-परिवर्तनों के कारण को खोजने सृष्टि से बाहर जाने की जरुरत नहीं है। कार्य में ही कारण श्रृंखला विद्यमान है। विश्व का मूल कारण, ऐसी कोई शक्ति नहीं है, या कोई सत्ता नहीं है, जो इससे अलग रह कर रिमोट से इसको चला रही है। " (२:२८२)
" क्रमविकास-वाद क्या है? उसके दो अवयव क्या हैं ? एक है प्रबल अन्तर्निहित शक्ति, जो अपने को व्यक्त करने की चेष्टा कर रही है, और दूसरा है बाहर की परिस्थितियाँ, जो उसे अवरुद्ध किए हुये है, या वह परिवेश है जो उसे व्यक्त होने नहीं देता। अतः इन परिस्थितियों से युद्ध करने केलिये यह ' शक्ति ' नये नये शरीर धारण कर रही है। एक अमीबा इस संघर्ष में एक और शरीर धारण करता है, और कुछ बाधाओं पर जय-लाभ करता है, और इस प्रकार भिन्न भिन्न शरीर धारण करते हुये अन्त में मनुष्य में परिणत हो जाता है। " (२:९१)
" प्रकृति या Nature का अधिक वैज्ञानिक नाम है- ' अव्यक्त '। जो अभिव्यक्त या प्रकट नहीं या भेदात्मक नहीं है, उससे ही सब पदार्थ उत्पन्न हुये हैं। उसीसे अणु-परमाणु, जड़-पदार्थ, शक्ति, मन, बुद्धि सब प्रसूत हुये हैं। सांख्यों ने अव्यक्त का लक्षण बताया है, त्रि-शक्तियों की (तीन शक्ति -सत्, रज, तम) साम्यावस्था। जब आकर्षण-शक्ति (Centripetal-force) अर्थात ' तमस ' और विकर्षण-शक्ति (Centrifugal-force) अर्थात ' रजस ' - जब पूरी तरह से ' सत्व ' के द्वारा संयत रहतीं हैं, अथवा पूर्ण साम्य की अवस्था में रहतीं हैं, तब सृष्टि का अस्तित्व नहीं रहता। किन्तु यह साम्यावस्था ज्योंही नष्ट होती है, उनका संतुलन भंग हो जाता है, और उनमे से एक शक्ति दूसरे से प्रबलतर हो उठती है, त्योंही गति (प्राण) का आरम्भ होता है और सृष्टि होने लगती है ।" (४:१९३)
" प्रकृति या अव्यक्त ...एक सर्वव्यापी जड़-राशिस्वरूप है। इसी अव्यक्त या प्रकृति में बाह्य-जगत् के समस्त वस्तुओं के ' कारण ' विद्यमान हैं। व्यक्त अवस्था की सूक्ष्म दशा को- ' कारण ' कहते हैं, यह उस वस्तु की अन्-अभिव्यक्त अवस्था है, जो अभिव्यक्ति को प्राप्त होती है।...कारण में प्रत्यावर्तन का नाम ही विनाश है। " (४:२०१)
 ' नाशः कारणलयः ' - नाश (मृत्यु) का अर्थ है कारण में लय हो जाना। (वि० सा० ख० २:१०१) 
" अव्यक्त (Nature) अर्थात एक अखण्ड, अविभक्त (द्रव्य या ) जड़-राशि के उस सर्वव्यापी विस्तार की कल्पना करो - जो प्रत्येक वस्तु की प्रथम अवस्था है, और यह उसी प्रकार परिवर्तित होने लगता है, जिस प्रकार दूध परिवर्तित हो कर दही बन जाता है। ब्रह्माण्ड (Cosmos) में इस Nature या अव्यक्त की प्रथम अभिव्यक्ति को सांख्य के शब्दों में-' महत्' कहा जाता है।' महत् ' तत्त्व का शाब्दिक अर्थ है, 'द अल्टीमेट सोर्स' (The Ultimate Source) ' महान आधारभूत कारण - हम इसे बुद्धि (Intelligence) कह सकते हैं। अर्थात प्रकृति में जो प्रथम परिवर्तन हुआ उससे ' बुद्धि ' की उत्पत्ति हुई। 
मैं उस ' महान आधारभूत कारण ' या महत् को अंग्रेजी में चेतना, होश,या आत्म-चेतना (Self-Consciousness) नहीं कह सकता, क्योंकि वह ग़लत होगा। चेतना तो इस ' सार्वभौम बुद्धि ' का अंशमात्र है। महत् तत्व सर्वव्यापी है, चेतन (जाग्रतअवस्था -Consciousness), अवचेतन (स्वप्नावस्था Sub-Consciousness), अचेतन (सुषुप्ति -Unconsciousness)और अतिचेतन(तुरीयावस्था Super-Consciousness) सब (मन-बुद्धि के सारे स्तर) इसके अर्न्तगत आ जाते हैं। इसीलिये इस महत् या बुद्धि के 'अल्टीमेट सोर्स' या महान आधारभूत कारण के लिए चेतना की किसी अकेली अवस्था मात्र के लिए प्रयुक्त करना पर्याप्त नहीं माना जाएगा। फ़िर यह महत् पदार्थ या ' बुद्धि ' जब (दूध से दही के समान) स्थूलतर पदार्थ (Grosser Matter) में परिवर्तित होता है, तब प्रकृति या अव्यक्त के दुसरे परिवर्तन को 'अहं-तत्व' (Egoism) कहते हैं।
फिर यह अव्यक्त (नेचर या प्रकृति) अपने तीसरे और अन्तिम परिवर्तन में स्वयं को -' सार्वभौम संवेदक इन्द्रियों' (Universal Sense-Organs) तथा 'सार्वभौम तन्मात्राओं' (Universal Fine-Particles)  के रूप में अभिव्यक्त करती है। और ये अन्तिम वस्तुएं पुनः संयुक्त हो कर इस स्थूल-' बाह्य जगत् ' में परिणत हो जातीं हैं। इस प्रकार वह सूक्ष्म ' महत् ' तत्त्व ही बाह्य ' जगत् ' के रूप में परिणत हो गया है। जड़-पदार्थों और मन में परिणामगत भेद के अतिरिक्त कोई भेद नहीं है। सूक्ष्म एवं स्थूल स्वरूप में एक ही पदार्थ है, एक ही दुसरे में बदल जाता है। ... मन (mind) और मस्तिष्क(Brain) में अन्तर नहीं है, दोनों जड़ पदार्थ हैं, मन सूक्ष्म जड़ है, मस्तिष्क स्थूल जड़ है। " (वि० सा० ख० ४: २०२)
" सत्व,रज और तम- जगत के उपादान हैं, जिनसे समग्र विश्व विकसित हुआ है। कल्प के प्रारम्भ में ये साम्यावस्था में रहते हैं। सृष्टि का आरम्भ होने पर ही ये उपादान परस्पर अनन्त प्रकार से संयुक्त हो कर इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि करते हैं। इसका प्रथम विकास महत् अथवा सर्वव्यापी बुद्धि है, और उससे अंहकार की उत्पत्ति होती है। अंहकार से मन अथवा सर्वव्यापी मनस-तत्व  का उद्भव होता है। इस अहंकार से ही, मस्तिष्क में अवस्थित ज्ञान और कर्म के इन्द्रियों या स्नायू-केन्द्रों तथा तन्मात्राओं की उत्पत्ति होती है। तन्मात्राओं को प्रत्यक्ष नहीं किया जा सकता, किन्तु वे जब स्थूल परमाणु बन जाते हैं, तब हम उन्हें अनुभव और इन्द्रियगोचर कर सकते हैं। बुद्धि, अंहकार और मन - इन तीन माध्यमों से कार्य करने वाला, ' चित्त ' - ही प्राण नामक शक्तियों की सृष्टि कर के उन्हें परिचालित कर रहा है। तुम्हे इस कुसंस्कार को अवश्य त्याग देना चाहिए कि प्राण केवल श्वास-प्रश्वास (Breath) है, श्वास-प्रश्वास तो प्राण का कार्य मात्र है। प्राण ही वायु पर कार्य कर रहा है, वायु प्राण के ऊपर नहीं। " (४:२११)
" प्राण का अभिप्राय है ऊर्जा (Energy)- जो सभी तरह की गति या सम्भाव्य गति, शक्ति या आकर्षण के रूपों में अपने को अभिव्यक्त करता है। "(४:१५२)
"आजकल हम जिसे जड़-पदार्थ (matter) कहते हैं, उसे प्राचीन हिंदू भूत अर्थात बाह्य तत्व कहते थे। उनके मतानुसार एक तत्व नित्य है, शेष सब इसी एक से उत्पन्न हुए हैं। इस मूल तत्व को ' आकाश ' की संज्ञा प्राप्त है। आजकल ईथर शब्द से जो भाव व्यक्त होता है, यह बहुत कुछ उसके सदृश है, यद्दपि पुर्णतः नहीं। इस मूलभूत आकाश-तत्व के साथ प्राण नाम की आद्य उर्जा भी रहती है। प्राण (Energy) और आकाश (Matter) संघटित और पुनः संघटित हो कर शेष तत्वों (वायु,अग्नि,जल,पृथ्वी) का निर्माण करते हैं। कल्पान्त में सबकुछ प्रलयगत हो कर आकाश और प्राण में लौट जाता है। " (४:१९४) 
" ब्रह्माण्ड में जो उर्जा व्याप्त है, उसका नाम है प्राण और वह इन भूतों में शक्ति के रूप में निवास करती है। प्राण के प्रयोग का महान उपकरण है मन। मन भी भौतिक पदार्थ है। मन से परे है आत्मा, जो प्राण को धारण करता है। आत्मा वह ' विशुद्ध बुद्धि ' है जिससे प्राण नियंत्रित और निर्दिष्ट होता है। मन अत्यन्त सूक्ष्म भौतिक पदार्थ है, जो प्राण को अभिव्यक्त करने का एक उपकरण है। अभिव्यक्ति के लिए  ऊर्जा या शक्ति (Energy) को भौतिक पदार्थ (Matter) की आवश्यकता होती है। " (४:९७) 
" कॉस्मिक-प्लान या ब्रह्माण्ड का विधान है-' यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे ' - जो ब्रह्माण्ड में है, वह अवश्य पिण्ड में भी होगी। (What is in The Cosmos must also be microcosmic.) उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति (Individual) को लो; उसमे निहित वह भौतिक प्रकृति (अव्यक्त) इस ' सार्वभौम-बुद्धि ' या महत् के एक लघु कण में परिवर्तित हो जाती है। फ़िर उस सार्वभौम बुद्धि का एक लघु कण ' अहं-तत्त्व ' में परिणत हो जाता है, यह ' अहं ' ही उस व्यक्ति के स्थूल एवं सूक्ष्म भौतिक शरीर का संयोजन और निर्माण करते हैं। " (४:२०३)
" मैं तुम लोगों को देख रहा हूँ। इस दर्शन-क्रिया के लिए किन किन बातों की आवश्यकता है ? पहले तो आँख --आँखें रहनी ही चाहिए। मेरी अन्य सब इन्द्रियाँ भले ही अच्छी रहें, पर यदि मेरी आँखें न हों, तो मैं तुम लोगों को न देख सकूँगा। अतएव पहले मेरी आँखें अवश्य रहनी चाहिए। दुसरे, आंखों के पीछे और कुछ रहने की आवश्यकता है, और वास्तव में वही तो दर्शन-इन्द्रिय है। यह यदि हममे न हो, तो दर्शन -क्रिया असंभव है। 
वस्तुतः आँखें इन्द्रिय नहीं हैं, वे तो दृष्टि की यंत्र मात्र हैं। यथार्थ इन्द्रिय आंखों के पीछे, हमारे मस्तिष्क में अवस्थित इसका नाड़ी-केन्द्र (Optic- nerve) है। यदि यह केन्द्र किसी प्रकार नष्ट हो जाये, तो दोनों आँखें रहते हुए भी मनुष्य कुछ देख न सकेगा।अतएव दर्शन क्रिया के लिए इस असली इन्द्रिय का अस्तित्व नितान्त आवश्यक है। हमारी अन्यान्य इन्द्रियों के बारे में भी ठीक ऐसा ही है। बाहर के कान धवनी-तरंगों को भीतर ले जाने के यन्त्र मात्र हैं, पर उस ध्वनी-तरंग को मस्तिष्क में अवस्थित उसके नाड़ी-केन्द्र या श्रवण - इन्द्रियों तक अवश्य पहुंचना चाहिए।
 पर इतने से ही श्रवण-क्रिया पूर्ण नहीं हो जाती। कभी-कभी ऐसा होता है कि पुस्तकालय में बैठ कर तुम ध्यान से कोई पुस्तक पढ़ रहे हो,घड़ी में बारह बजने का टंकार पड़ता है, पर तुम्हे वह ध्वनी सुनायी नहीं देती। क्यों ? वहाँ ध्वनी तो है, वायु-स्पन्दन, कान और केन्द्र भी वहाँ हैं और कान के मध्यम से मस्तिष्क में अवस्थित उसके नाड़ी-केन्द्र तक स्पन्दन पहुँच भी गए हैं, पर तो भी तुम उसे सुन नहीं सके। किस चीज कि- कमी थी ? इस इन्द्रिय के साथ मन का योग नहीं था। 
अतएव हम देखते हैं कि मन का रहना भी नितान्त आवश्यक है। पहले चाहिए यह बहिर्यंत्र, जो मानो विषय को वहन करके नाड़ी-केन्द्र या इन्द्रिय के निकट ले जाता है। फ़िर(स्थूल शरीर में अवस्थित) उस इन्द्रिय (Optic-nerve) के साथ (सूक्ष्म-शरीर में अवथित) मन को भी  युक्त रहना चाहिए। जब मस्तिष्क में अवस्थित इन्द्रिय से मन का योग नहीं रहता, तब कर्ण-यन्त्र और मस्तिष्क के केन्द्र पर भले ही कोई विषय आकर टकराये, पर हमें उसका अनुभव न होगा। 
मन भी केवल एक वाहक है, वह इस विषय की संवेदना को और भी आगे ले जा कर बुद्धि को ग्रहण कराता है। बुद्धि उसके सम्बन्ध में निश्चय करती है, पर इतने से ही नहीं हुआ। बुद्धि को उसे फ़िर और भी भीतर ले जाकर (स्थूल और सूक्ष्म दोनों) शरीर के राजा आत्मा के पास पहुँचाना पड़ता है। उसके पास पहुँचने पर वह आदेश देती है, ' हाँ, यह करो' या 'मत करो'। तब जिस क्रम में वह विषय संवेदना आत्मा तक गयी थी, ठीक उसी क्रम से वह बहिर्यंत्र में आती है- पहले बुद्धि में, उसके बाद मन में, फ़िर मस्तिष्क-केन्द्र में और अन्त में बहिर्यंत्र में; तभी विषय-ज्ञान की क्रिया पूरी होती है। " (२: १०९-१०)
" ये सब यंत्र आँख, कान, नाक आदि और उनका मस्तिष्क में स्थित स्नायु केन्द्र अथवा ' इन्द्रिय ' मनुष्य के स्थूल देह में अवस्थित है, पर मन और बुद्धि नहीं। मन और बुद्धि तो उसमें है, जिसे हिंदूशास्त्र - 'सूक्ष्म-शरीर' कहते हैं और इसाई शास्त्र 'आध्यात्मिक-शरीर' कहते हैं। वह इस स्थूल शरीर से अवश्य बहुत ही सूक्ष्म है, परन्तु फ़िर भी आत्मा नहीं है। क्योंकि जिस प्रकार शरीर कभी सबल कभी दुर्बल होता है, उसी प्रकार मन भी कभी सबल कभी निर्बल हो जाता है। अतः मन आत्मा नहीं है, क्योंकि आत्मा कभी जीर्ण या क्षयग्रस्त नहीं होती। आत्मा इन सबके अतीत है। "(२:११०)
"जब मन किसी बाह्य-वस्तु का अध्यन करता है, तब वह उससे अपना तादात्म्य स्थापित कर लेता है, और स्वयं लूप्त हो जाता है। यह 'मन' आत्मा का ' दिव्य चक्षू ' है ! हमारा  मन उस  स्फटिक खंड के समान है, जो अपने निकट की वस्तुका रंग ग्रहण कर लेता है। हम लोगों ने शरीर का रंग ग्रहण कर लिया है,अर्थात शरीर के साथ अपना तादात्म्य स्थापित कर लिया है, और भूल गये हैं कि हम क्या हैं। ....हम लोग उसी प्रकार शरीर नहीं हैं, जिस प्रकार स्फटिक ' लाल फूल ' नहीं है।... आत्मा की स्वस्थतम अवस्था - तब है जब वह 'स्व' का चिन्तन कर रही हो और अपनी गरिमा में स्थित हो।" (४:१३१)
" मनुष्य दिव्य है, यह दिव्यता ही हमारा स्वरूप है। अन्य जो कुछ है वह अध्यास मात्र है। उसके दिव्य स्वरूप का कभी भी नाश नहीं होता। यह जिस प्रकार ' परम-संत ' में है, वैसे ही ' महा-अधम ' व्यक्ति में भी है। हमे अपने इसदेव-स्वभाव का केवल आह्वान करना होगा, और वह स्वयं ही अपने को प्रकट कर देगा। चकमक पत्थर और सूखी- लकड़ी में आग रहती है, पर उस आग को बाहर निकालने के लिये घर्षण आवश्यक था। नीचे धरती पर रेंगने वाला क्षुद्र कीड़ा और स्वर्ग का श्रेष्ठतम देवता इन दोनों में ज्ञान का भेद प्रकार्गत नहीं, परिणाम गत है। " (२:१८२)
" अगर कोई व्यक्ति हत्यारा है, तो उसमे प्रतिफलक (मन-दर्पण) बुरा है, न कि आत्मा। दूसरी ओर अगर कोई साधू है तो उसमे प्रतिफलक शुद्ध है। सत्ता केवल एक ही है जो कीट से लेकर पूर्णतया विकसित मनुष्य (बुद्ध या ईशा) तक में प्रतिबिम्बित है। इस तरह सम्पूर्ण विश्व एक एकत्व, एक सत्ता है- भौतिक, मानसिक, आध्यात्मिक, हर दृष्टि से। इस एक सत्ता को ही हम विभिन्न रूपों में देखते हैं। " (२:११२)
" जगत को विचार कि दृष्टि से देखने पर.… प्रतीत होगा कि, इसका एक-एक आदमी एक-एक विशेष मन है। तुम एक मन हो, मैं एक मन हूँ, प्रत्येक व्यक्ति केवल एक मन है। फ़िर इसी जगत को ज्ञान कि दृष्टि से देखने पर,.... अर्थात जब आंखों पर से मोह का आवरण हट जाता है, जब मन शुद्ध और पवित्र हो जाता है, तब यही पहले के एक-एक मन उसी अखंड पूर्णस्वरूप 'पुरूष' के विभिन्न रूप प्रतीत होते हैं।" (२:३२) 
 " अहं को निकाल डालो , उसका नाश कर डालो, उसे भूल जाओ, अपने द्वारा ईश्वर को कार्य करने दो- यह उन्ही का कार्य है,उन्हें ही करने दो।...." पहले अपने (मन) को जीत लो , फ़िर सम्पूर्ण जगत तुम्हारे पैरों के नीचे आ जायगा ।" (७:२२)
." तुच्छ अहं को नष्ट कर डालो , केवल महत अहं को रहने दो। हम अभी जो कुछ हैं, वह सब अपने चिन्तन का फल है। इसलिए तुम क्या चिन्तन करते हो, इस विषय में ध्यान दो, विशेष ध्यान रखो। शब्द-वाणी तो गौण वस्तु हैं। चिन्तन ही बहुकाल स्थाई है और उसकी गति भी दूर व्यापी है। हम जो कुछ चिन्तन करते हैं, उसमे हमारे चरित्र की छाप लग जाती है."(७:२२).... 
" जितनी बार तुम कहते हो, ' तू नहीं मैं' ; उतनी बार तुम अनन्त को यहाँ ( अपने देह-मन के माध्यम से) अभिव्यक्त करने का व्यर्थ में प्रयास करते हो। इसी से संसार में प्रतिद्वंदिता, संघर्ष और अनिष्ट की उत्पत्ति होती है। पर अन्त में 'मिथ्या-मैं' का त्याग होगा, यह 'मैं' मर जायगा। इस तुच्छ पृथक अहंता को नष्ट होना ही चाहिए।" (२:१७७)
" यह जो (अमुक नाम वाले व्यक्ति) के रूप में मेरा नाम- रूपात्मक चेहरा दिख रहा है, इसके पीछे जो असीम विद्यमान है, उसी ने अपने को बहिर्जगत में व्यक्त करने के लिए जैसा रूप धारण करने कि इच्छा की थी- उसी का परिणाम है। इस (नाम-रूपात्मक)- 'मैं' को फ़िर पीछे लौट कर अपने अनन्तस्वरूप में मिल जाना होगा."(२:१७६) 
..." अहं - ही वह वज्रदृढ़ प्राचीर है, जिसने हमे बद्ध कर रखा है, और भोग वासना है लाख फन वाला सर्प , हमे उसे कुचलना ही होगा."(७:२३)..
" प्रत्येक वस्तु क्रम-परिवर्तन शील है। यह सारा विश्व ही परिवर्तन शीलता का एक पिंड है।आज के पर्वत कल समुद्र थे , और कल वहां पुनः समुद्र दिखाई देगा।  एकमात्र ईश्वर ही ऐसा है, जिसमे कभी परिवर्तन नहीं होता, हम उसके जितने समीप लौटेंगे, प्रकृति का अधिकार हम पर उतना ही कम होता जायगा,उतना ही कम परिवर्तन या विकार हम में होगा। और जब हम उस तक पहुंच जायेंगे- तो हम प्रकृति पर विजय प्राप्त कर लेंगे, प्रकृति के सारे व्यापार हमारे अधीन हो जायेंगे,और हम पर उनका कोई प्रभाव न पडेगा।"(३:१०६)
" हमारा यह शरीर वृद्धि और क्षय के नियमों से बद्ध है, - जिसकी जन्म और वृद्धि है, उसका क्षय भी अवश्यमेव होगा। परन्तु देहमध्यस्त आत्मा तो असीम एवं सनातन है, वह अनादी और और अनन्त है। ...काल कि गति काशाश्वत सत्ता पर कोई असर नहीं होता।....मानव-बुद्धि के लिये सर्वथा अगम्य जो 'अतीन्द्रिय-भूमि ' है, वहाँ न तो 'भूत' है न 'भविष्य'। वेदों का कथन है कि मानव कि आत्मा अमर है। "(१:२५४)
'सूक्ष्म-शरीर' क्या है ? " मन, अहं-बोध, मस्तिष्क स्नायु-केन्द्र या इन्द्रिय, और प्राण - इन सबके संयोग से ' सूक्ष्म-शरीर ' बनता है, जिसे इसाई दर्शन में मानव का आध्यात्मिक देह कहते हैं।  इस देह (सूक्ष्म शरीर या मन ) को ही उद्धार और दण्ड प्राप्त होता है, इसका ही बार- बार जन्म और पुनर्जन्म होता है। " (४:२१३)
"परन्तु मुझमे कुछ अहं था, इसीलिए उस समाधि कि अवस्था से लौट आया था." (६:९९)...
" जब मैं लड़ता हूँ , कमर कस कर लड़ता हूँ- इसके मर्म को समझता हूँ। श्री रामकृष्ण के दासानुदासों में से कोई न कोई मुझ जैसा अवश्य बनेगा, जो मुझे समझेगा। "(६:३८३)
" इस जन्म-मृत्यु की समस्या की यथार्थ मीमांसा के लिए यदि यम के द्वार पर जा कर भी सत्य का लाभ कर सको तो निर्भय ह्रदय से वहाँ जाना उचित है। भय ही मृत्यु है। भय से पर हो जाना चाहिए। अपने मोक्ष तथा परहित के निमित्त आत्मोसर्ग करने के लिए अग्रसर हो जाओ। ...दधिची के समान औरों के लिए अपना हाड-मांस दान कर दो। जो ब्रह्मज्ञ हैं, जो अन्य को भय से पार ले जाने में समर्थ हैं,वे ही यथार्थ गुरु हैं। "(६:३३)
" यह मानव आत्मा देह से देहान्तर में संक्रमित हो रही है, इस प्रवास में वह कितने ही भिन्न भिन्न रूपों में व्यक्त हुई है एवं होगी। आध्यात्मिक विकास के उस महान नियमानुसार वह अधिकाधिक अभिव्यक्त हो रही है। परन्तु जब वह सम्पूर्ण अभिव्यक्त हो जायेगी, तब उसमे और अधिक परिणाम न होगा। (१:२५४)
" (यदि कार्य-कारण वाद या परिणाम वाद सच है) तो हमे अपने पूर्व जन्मों का कुछ भी स्मरण क्यों नहीं है?मनः समुद्र की उपरी सतह का नाम ही चेतन अवस्था है। किन्तु उसकी गहराई में (अवचेतन मन में) संचित है, मानव के समस्त सुखात्मक और दुखात्मक अनुभव। मानव आत्मा कुछ ऐसी वस्तु पाने की इच्छा करती है, जोअचल हो, अविनाशी हो। जबकि हमारा यह शरीर और मन ही क्या, नाना रूपात्मक यह समस्त प्रकृति ही अनवरत परिवर्तनशील है। पर हमारी अन्तरात्मा की सर्वोच्च अभिलाषा (या तड़प) यही है, कि उसे कुछ ऐसा प्राप्त हो जाये, जिसका परिवर्तन नहीं होता, जो चिर(शान्ति) पूर्णता को पा चुकी हो। और यही है उस असीम के लिये मानवात्मा कि अभीप्सा ! हमारा नैतिक और मानसिक विकास (अर्थात चरित्र-निर्माण) जितना ही सूक्ष्मतर होता जायेगा, उस अपरिवर्तनशील सत्ता के प्रति हमारी अभीप्सा (व्याकुलता) भी उतनी ही दृढ़ होती जायेगी। "(१:२५५)
" हमारे ऋषि तो यह कहते हैं, कि इन्द्रियजन्य सुखों में तृप्त रहना उन कारणों में से एक है, जिसने सत्य और हमारे बीच परदा सा डाल दिया है। केवल कर्म-कांडों में रूचि, इन्द्रियों में तृप्ति तथा नाना प्रकार मतवादों ने हमारे और सत्य के बीच एक आवरण डाल रखा है।' एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति ' - सत्ता केवल एक है, ऋषिगण उसे विभिन्न नामों से पुकारते हैं।...सत्य तो चिरकाल से ही विद्यमान था, केवल इस (नाम-रूप) के आवरण ने ही उसे ढँक रखा था। " (१:२५५) 
"हम विश्व के रहस्य को हल करने की चेष्टा करते हैं। ऐसा लगता है कि यह सब हमे अवश्य जान लेना चाहिए, हमे ऐसा कभी महसूस नहीं होता कि 'ज्ञान' कोई प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं है। ....किन्तु अति बलवान इन्द्रियाँ मनुष्य की आत्मा को, 'अवशीभूत मन' - रूपी शत्रु की सहायता से बाहर की विषयों में खींच लातीं हैं। और मनुष्य ऐसे स्थान में सुख की खोज करने लगता है, जहाँ वे हैं ही नहीं, जहाँ वह उन्हें कभी पा नहीं सकता। ...हम कुछ कदम आगे जाते हैं, कि अनादी-अनन्त कालरुपी प्राचीर व्यवधान बन जाता है; जिसे हम लाँघ नहीं सकते। कुछ दूर बढ़ते ही असीम देश का व्यवधान खड़ा हो जाता है, फ़िर यह सब कार्य-कारण रूपी दीवार द्वारा सुदृढ़ रूप से सीमा-बद्ध है !...तो भी हम संघर्ष करते हैं !" (२:७४)
" इन्द्रियपरायण जीवन से अतीत होने की हमारी असमर्थता, और शारीरक विषय-भोगों के लिये उद्यम ही संसार में सभी प्रकार के आतंकों (भ्रष्टाचार) तथा दुखों का कारण है। "(४:११४)
." हमारे चारो ओर अनेक मोह रूपी जाल हैं, कुछ क्षण के लिए हमे प्रतीत होता है कि हम स्वर्गीय दिव्य ज्योति में तन्मय हो जाएंगे , परन्तु कुछ ही देर बाद कोई दृश्य या स्मृति हमारे पाशविक भाव को भड़का देती है।" (७:२४९)
" वास्तव में पाशविक भाव के उपर विजय प्राप्त कर लेने, तथा जन्म-मरण के प्रश्न को सुलझा लेने और श्रेय -प्रेय के बीच के भेद को जान लेने कि अपेक्षा और श्रेष्ठ है ही क्या ?"(७:२५०)
" स्वाधीनता ही उच्च जीवन की कसौटी है।आध्यात्मिक जीवन उस समय प्रारम्भ होता है, जिस समय तुम अपने को इन्द्रिय बन्धनों से मुक्त करलेते हो। जो इन्द्रियों के अधीन है, वही संसारी है, वही दास है। " (४:४३)
" एक अन्तर्निहित शक्ति मानो लगातार अपने स्वरूप में व्यक्त होने के लिये - अविराम चेष्टा कर रही है, और बाह्य परिवेश उसको दबाये रखने के लिये प्रयासरत है, बाहरी दबाव को हटा कर प्रस्फुटित हो जानेकी इस चेष्टा का नाम ही जीवन है।" (विवेकानन्द चरित-पृष्ठ १०८)
"सच पूछा जाय तो 'पूर्ण-जीवन' शब्द ही स्वविरोधात्म्क है। जीवन तो हमारे एवं प्रत्येक वाह्य वस्तु के बीच एक प्रकार का निरन्तर संघर्ष है।" (३:५९)
 " मैं जीवन से उच्चतर कोई वस्तु हूँ; जीवन सदैव दासता है। हम (और जीवन ) सदा घुल-मिल जाते हैं। "(४:१३६) 
" हम सबों में मुक्ति की भावना-स्वाधीनता की भावना हुआ करती है, उसी से यह संकेत मिलता है कि हमारे अन्तराल में, शरीर(Hand) और मन (Head) से परे भी कुछ और है। हमारी अन्तर्यामी आत्मा(Heart) स्वरूपतः स्वाधीन है और वही हममे मुक्ति की इच्छा जाग्रत करती है। " (१:२५६)
" प्रकृति हमे चारो ओर से दमित करने का प्रयास कर रही है, और आत्मा अपने को अभिव्यक्त करना चाहती है। प्रकृति कहती है - ' मैं विजयी होउंगी ' ; आत्मा कहती है- ' विजयी मुझे होना है '। प्रकृति कहती है- ठहरो, मैं तुम्हे चुप रखने के लिये थोड़ा सुख भोग दूंगी। आत्मा को थोड़ा मज़ा आता है, क्षण भरके लिये वह धोखे में पड़ जाती है, पर दुसरे ही क्षण वह फ़िर मुक्ति के लिये चीत्कार कर उठती है।" (३:१७३) 
" हम वस्तुतः वही अनन्तस्वरूप हैं- अपने उसी अनन्त स्वरूप को अभिव्यक्त कर रहे हैं। यहाँ तक तो ठीक है। पर इसका क्या मतलब कि, जब तक हम सब पूर्ण नहीं हो जाते, अनन्त क्रमशः अधिकाधिक व्यक्त होता रहेगा ? पूर्णता का अर्थ है-अनन्त , और अभिव्यक्ति का अर्थ है- ससीम। तो क्या हम असीम रूप से ससीम बन जायेंगे ? पर यह स्वविरोधी वाक्य है।  (तात्पर्य यह है कि )....हम अपने ईश्वर भाव को भूल कर, पशु जैसे हो गये थे। अब हम फ़िर उन्नत्ति के मार्ग पर चल रहे हैं, और इस बंधन से बाहर होने का प्रयत्न कर रहे हैं, हम प्राणपन से उसकी चेष्टा कर रहे हैं,....पर अन्त में एक समय आएगा, जब हम देखेंगे कि - जब तक हम इन्द्रियों के गुलाम बने हुए हैं, तब तक पूर्णता कि प्राप्ति असंभव है। तब हम अपने मूल अनन्तस्वरूप कि ओर लौटना शुरू करेंगे। यही त्याग है, यही नैतिकता है। "(२:१७५)
" यह चित्त अपनी स्वाभाविक पवित्र अवस्था को फ़िर से प्राप्त कर लेने के लिये सतत् चेष्टा कर रहा है, किन्तु इन्द्रियाँ उसे बाहर खींचे रहती हैं। चित्त में बाहर जाने और विषय भोगों में चिपके रहने की जो प्रवृत्ति है- उसका दमन करना होगा और उसके बहिर्मुखी प्रवाह (पर वैराग्य का फाटक लगा कर, या लालच को कम करके ) को आत्मा की ओर मोड़ देना होगा। यही योग का पहला सोपान है। "(१:११८)
" असीम शक्ति का एक स्प्रिंग इस छोटी सी काया में कुण्डली मारे विद्यमान है, और वह स्प्रिंग अपने को फैला रहा है। और ज्यों ज्यों यह फैलता है, त्यों त्यों एक के बाद दूसरा शरीर अपर्याप्त होता जाता है, वह उनका परित्याग कर उच्चतर शरीर धारण करता है। यही है मनुष्य का धर्म, सभ्यता या प्रगति का इतिहास। वह भीमकाय ' प्रोमिथियस ' (एक यूनानी देवता जिसने olampious से चुराई हुई अग्नि मनुष्य को दिया और जिसे दंड स्वरूप जंजीरों में जकड़ दिया गया) मानो अपने को बंधन मुक्त कर रहा है। " (९:१५६)
" मेरी ही यह 'विश्वजनीन बुद्धि' - क्रमसंकुचित हुई थी, और वही क्रमशः अपने को अभिव्यक्त कर रही है, जब तक कि वह पूर्ण मानव में परिणत नहीं हो जाती। फ़िर वह अपने उत्पत्ति-स्थान में लौट जायगी , ब्रह्मलीन हो जायेगी । धर्म तत्वज्ञ इस विश्वव्यापी बुद्धि को ही ईश्वर कहते हैं।" (२:१०६)
" हमारे इस अविराम,कठोर जीवन-संग्राम का लक्ष्य है, अंत में उनके निकट पहुँच कर उनके साथ एकीभूत हो जाना। " (४:५०)
" पूर्णता ही मनुष्य का स्वभाव है, केवल उसके किवाड़ बंद हैं, वह अपना यथार्थ रास्ता नहीं पा रही है, यदि कोई इस बाधा को दूर कर सके तो, उसकी स्वभाविक पूर्णता अपनी शक्ति के बल से अभिव्यक्त होगी ही। मनःसंयोग का अभ्यास और चरित्र निर्माण की साधना ही उस पूर्णता के किवाड़ को खोल देता है, जो हमारा स्वभाव है,वह दिव्यता प्रकट हो जाती है।" (१:२०६)
 " स्वयं 'व्यास देव' भी पूर्णत्व प्राप्त करने में , पूर्ण रूप से सफल न हो सके थे, परन्तु उनके पुत्र - ' शुकदेव' जन्म से ही सिद्ध थे।......जो मनुष्य ' विदेह' बन चुका है; जिस मनुष्य ने स्वयं पर अधिकार प्राप्त कर लिया है, ( मन को पूरी तरह से जीत लिया है ) उसके उपर बाहर की कोई भी चीज अपना प्रभाव नहीं डाल सकती, उसके लिए किसी भी प्रकार की दासता शेष नहीं रह जाती। उसका मन स्वतन्त्र हो जाता है- और केवल ऐसा पुरूष ही संसार में रहने के योग्य है। "(३:६६)
 " जो पूर्ण है , वह किसी के द्वारा कभी अपूर्ण कैसे हो सकता है? जो मुक्त है, वह कभी बंधन में कैसे पड़ सकता है? तुम कभी बंधन में नहीं थे। तुम पूर्ण हो, ईश्वर पूर्ण है, तुम सब पूर्ण हो, सत्ता एक ही हो सकती है, दो नहीं। पूर्ण को कभी अपूर्ण नहीं बनाया जा सकता।......तुम लक्ष्य तक पहुंच चुके हो-जो भी गन्तव्य है। मन को कदापि न सोंचने दो कि - तुम लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाये हो। हम जो कुछ सोंचते हैं, वही बन जाते हैं। यदि तुम अपने को हीन पापी सोंचते हो तो, तुम अपने को सम्मोहित कर रहे हो।...यह सब कौतुक है। " (९:१४३)
" पूर्णता का मार्ग यह है कि, स्वयं पूर्णता को प्राप्त होना ,तथा कुछ थोड़े से स्त्री-पुरुषों को पूर्णता को प्राप्त होने में सहायता करना। फिर मैं भैंस के आगे बीन बजा कर - समय, स्वास्थ्य और शक्ति का अपव्यय क्यों करूँ? "(२:३३२)
" पूर्ण ( या असंख्य) में पूर्ण का भाग दो, पूर्ण जोडो , पूर्ण से पूर्ण में गुना करो, पूर्ण ही रहेगा।" 
 ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुद्च्च्यते ।   
  पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवा वशिष्यते । । 
(संस्कृत भाषा - पूर्णांग भाषा है !) (१०:११७)
" जीवन का अर्थ ही वृद्धि अर्थात विस्तार यानि प्रेम है। इसलिए प्रेम ही जीवन है, यही जीवन का एकमात्र नियम है, और स्वार्थपरता ही मृत्यु है। परोपकार ही जीवन है, परोपकार न करना ही मृत्यु है। ...जीसमे प्रेम नहीं वह जी भी नहीं सकता। ( ३:३३३)
" एकमात्र परोपकार को ही मैं कार्य मानता हूँ, बाकि सब कुकर्म है। " (४:२९८)
" जीवन का सर्वश्रेष्ठ उपयोग यही है कि उसे सर्वभूतों कि सेवा में न्योछावर कर दिया जाये।"(४:५८)
 " तुमलोग चारो ओर फ़ैल जाओ , अर्थात जगह जगह शाखाएं स्थापित करने का प्रयत्न करो। मौका खाली न जाने पाये, मद्रासियों (हर प्रांत वालों), से मिल कर जगह जगह समिति आदि की स्थापना करनी होगी। ( हिन्दी में महामंडल पुस्तिकाओं- पत्रिकाओं ) के ग्राहक क्यों नहीं बढ़ रहे ? अपनी बहादुरी तो दिखाओ। प्रिय भाई, मुक्ति न मिली, तो न सही, दो-चार बार नर्क ही जाना पडे,तो हानि क्या है ? क्या यह बात असत्य है ?--
-'मनसी वचसी काये पुण्यपियूष पूर्णाः,त्रिभुवनम उपकारश्रेणीभिः प्रीण यन्तः । 
परगुण परमाणुंग पर्वतीकृत्य नित्यं,निजहृदि विकसंतः सन्ति सन्तः कियन्तह।।
अर्थात ऐसे साधू कितने हैं, जिनके कार्य , मन तथा वाणी पुण्यरूप अमृत से परिपूर्ण हैं, और जो विभिन्न उपकारों के द्वारा त्रिभुवन की प्रीति सम्पादन कर दूसरों के परमाणु तुल्य - अर्थात अत्यंत स्वल्प गुण को भी- पर्वत प्रमाण बढ़ा कर अपने हृदयों का विकास साधन करते हैं ? श्री परमहंस देव के प्रति श्रद्धासम्पन्न १० व्यक्ति भी जहाँ हैं, वहीं एक सभा स्थापित करो। हरी-सभा इत्यादि को धीरे धीरे स्वाहा करना होगा।
'परोपकाराय हि सतां जीवितं , परार्थ प्राग्य उत्सृजेत -' साधुओं का जीवन परोपकार के लिए ही है, प्राज्ञ व्यक्तियों को दूसरों के लिए सब कुछ न्योच्छावर कर देना चाहिए।" (४:३०७)
" बुद्धदेव की जीवनी, ' ललित-विस्तार ' के प्रसिद्द गीत में कहा गया है - बुद्ध ने मनुष्य जाती के परित्राता  या मार्गदर्शक ' नेता ' के रूप में जन्म लिया; किन्तु जब राज-प्रासाद की विलासिता में वे अपने को भूल गये, तब उनको जगाने के लिये देवदूतों ने एक गीत गाया, जिसका मर्मार्थ इस प्रकार है - ' हम एक प्रवाह में बहते चले जा रहे हैं; हम अविरत रूप से परिवर्तित हो रहे हैं- कहीं निवृत्ति नहीं है, कहीं विराम नहीं है; सारा संसार मृत्यु की ओर चला जा रहा है-सभी मरते हैं ! हमारी सभी प्रगति, व्यर्थ का आडम्बरी जीवन, हमारे समाज-सुधार ! हमारी विलासिता, हमारे ऐश्वर्य, हमारा ज्ञान - इन सबकी मृत्यु ही एक मात्र गति है ! हम क्यों इस जीवन में आसक्त हैं ? क्यों हम इसका परित्याग नहीं कर पाते ?... यह हम नहीं जानते ! और यही माया है !! " (२:४७)
" भारतीय कुशल-प्रश्न है, ' आप स्वस्थ तो हैं ? '- जिसका अर्थ है आप अपने में स्थित हैं या देह में?...ध्यान करने का तात्पर्य है- आत्मा का अपने में (या स्व में) स्थित होने के लिए यत्न करना। "
" आगे बढ़ो ! सैकड़ो युगों तक संघर्ष करने से एक चरित्र का गठन होता है। निराश न होओ! सत्य के एक शब्द का भी लोप नहीं हो सकता। सत्य अविनाशी है, पुण्य अनश्वर है,पवित्रता अनश्वर है। मुझे सच्चे मनुष्य की आवश्यकता है, मुझे शंख-ढपोर चेले नहीं चाहोये। ... सदाचार सम्बन्धी जिनकी उच्च अभिलाषा मर चुकी है, भविष्य की उन्नति के लिए जो बिल्कुल चेष्टा नहीं करते, और भलाई करने वालों को धर दबाने में जो हमेशा तत्पर हैं- ऐसे ' मृत-जड़पिण्डों ' के भीतर क्या तुम प्राण का संचार कर सकते हो ? क्या ' तुम ' उस वैद्य की जगह ले सकते हो, जो लातें मारते हुए उदण्ड बच्चे के गले में दवाई डालने की कोशिश करता हो ? भारत को नव-विद्युत की आवशयकता है, जो राष्ट्र की धमनियों में नविन चेतना कासंचार कर सके। यह काम हमेशा धीरे धीरे हुआ है, और होगा। " ( ३:३४४)
'गुरु-शिष्य वेदाध्यापक प्रशिक्षण परम्परा' के अनुसार चपरास प्राप्त वेदाध्यापकों  या मानव-जाति के मार्गदर्शक नेताओं का निर्माण करने की अनिवार्यता पर स्वामी विवेकानन्द जी के विचार :
 " मनुष्य स्वयं ही अपने भाग्य का निर्माता है !"- इस कथन का अर्थ यह नहीं कि, हमे किसी बाहरी सहायता कि आवश्यकता ही नहीं है।..जब ऐसी सहायता प्राप्त होती है तो, उसकी उन्नति वेगवती हो जाती है, और अंत में साधक पवित्र एवं सिद्ध बन जाता है। यह संजीवनी-शक्ति पुस्कों से नहीं मिल सकती। इस शक्ति कि प्राप्ति तो एक आत्मा, एक दूसरी आत्मा से ही कर सकती है, अन्य किसी से नहीं। "(वि०सा० ख० ४:२५)
" जिन्हों ने धर्म-लाभ कर लिया है, वे ही दूसरों में धर्मभाव संचारित कर सकते हैं। वे ही मनुष्य जाती के श्रेष्ठ आचार्य हो सकते हैं।" (७:२६७)
" मनुष्य को पहले चरित्रवान होना चाहिए तथा आत्मज्ञान प्राप्त करना चाहिए और उसके बाद फल स्वयं मिल जाता है। ...अतः अपने विचारों का दूसरो में प्रचार करने के लिए जल्दी नहीं करनी चाहिए, पहले हमारे पास देने के लिए कुछ होना चाहिए। "(७:२५८)
 " प्रथम तुम स्वयं आत्मज्ञानी हो जाओ तथा संसार को कुछ देने के योग्य बन जाओ और फ़िर संसार के सम्मुख देने के लिए खडे होओ ।"(७:२६०)
" स्वयं आध्यात्मिक सत्य कि उपलब्धी करने और दूसरों में उसका संचार करने का एक मात्र उपाय है- हृदय और मन कि पवित्रता।"(४:२२)
" शिक्षा (=शीक्षा) देना केवल लेक्चर देना नहीं है, और न सिद्धांत बघारना ही शिक्षा है, इसका अर्थ है -सम्प्रेष्ण !" (७:२५८)
विद्या-गुरुमुखी: " जिस व्यक्ति की आत्मा से दूसरी आत्मा में शक्ति का संचार होता है, वह गुरु (नेता ) कहलाता है। और जिसकी आत्मा में यह शक्ति संचारित होती है, उसे शिष्य (या भावी वेदाध्यापक या वुड बी लीडर) कहते हैं।"(४:१७).
 " सच्चे गुरु वह हैं , जिनके द्वारा हमको अपना आध्यात्मिक जन्म प्राप्त हुआ है। वे ही वह साधन हैं , जिसमे से हो कर आध्यात्मिक प्रवाह हम लोगों में प्रवाहित होता है।" (७:१००)॥ 
" एक लोकप्रिय गीत , जो मेरे गुरु देव सदा गाया करते थे, मुझे इस समय याद आ रहा है- ' दिल जिस से मिल जाता है, वह जन अपनी आंखों से व्यक्त कर देता है !   हैं ऐसे दो-एक जन , जो करते विचरण - जगत की अनजानी राहों पर.' (७:३६९)...
" गुरु वह आभामय चेहरा है, जिसे ईश्वर हम तक पहुँचने के लिए धारण करता है। जब हम एकटक उसे निहारते हैं तो, धीरे-धीरे वह चेहरा गिर जाता है और ईश्वर प्रकट हो जाते हैं।" (३:१९९)
गुरु (या नेता) का चुनाव करते समय पहले उनको जाँच कर देखो, जो वे कहते हैं स्वयं उनका जीवन उस प्रकार का है या नहीं ? कथनी और करनी में कहीं अन्तर तो नहीं है ? हर एक आदमी गुरु होना चाहता है। एक भिखारी भी चाहता है कि लाखों का चेक दान में काट कर देदे। जैसे हास्यास्पद ये भिखारी हैं, वैसे ही ये गुरु भी हैं।"(४:१९) 
 " बहुत से लोग ऐसे हैं, जो स्वयं तो बडे अज्ञानी हैं, परन्तु फ़िर भी अंहकार वश अपने को सर्वज्ञ समझते हैं; इतना ही नहीं , बल्कि दूसरो को भी अपने कन्धों पर ले जाने को तैयार रहते हैं। इस प्रकार जो स्वयं अँधा है वही अन्य अंधों का अगुवा- 'पथ प्रदर्शक' (नेता)  बन जाता है, फलतः दोनों ही गड्ढे में गिर पड़ते हैं।"

" कुछ अपवाद -स्वरूप आत्माएँ , पहले से ही मुक्त हैं, और जो संसार की भलाई के लिए, संसार को सहायता देने के लिए यहाँ जन्म लेतीं हैं। वे पहले से ही मुक्त होतीं हैं, उन्हें अपनी मुक्ति की चिंता नहीं होती, वे केवल दूसरो की सहायता करना चाहती हैं। वे तो उन अभिनेताओं के समान हैं, जिनका अपना अभिनय समाप्त हो चुका है। "(७:८)॥
"साधारण गुरुओं से श्रेष्ठ एक और श्रेणी के गुरु होते हैं, वे हैं- इस संसार में ईश्वर के अवतार। वे केवल स्पर्श से, यहाँ तक कि इच्छा मात्र से ही आध्य्मिकता प्रदान कर सकते हैं। वे गुरुओं के भी गुरु हैं। हम उनकी उपासना किए बिना रह नहीं सकते, हम उनकी उपासना करने को विवश हैं। "(४:२५) 
..."ईश्वर है पारस मणि, उसके स्पर्श से मनुष्य एक क्षण में सोना बन जाता है."(७:१३) ..." एक सच्चा गुरु शिष्य से कहेगा- जा अब और पाप न कर। और शिष्य अब पाप नहीं कर सकता।"(३:१९८) 
...वे उन प्रथम दीपों के समान हैं, जिनसे अन्य दीप जलाये जाते हैं,..उनके सम्पर्क में आने वाले मनो उनसे अपना दीप जला लेते हैं, परन्तु वह 'प्रथम दीप' अमंद ज्योति से जगमगाता रहता है।" (३:१९६)
" बौद्धों कि एक उदार प्रार्थना है- ' पृथ्वी के सभी पवित्र मनुष्यों के समक्ष (मानवजाति के भावी मार्गदर्शक नेताओं के समक्ष ) मैं नतमस्तक हूँ।'... जब तुम जैसे पवित्र और आनंदित लोगों के दर्शन मिलते हैं -जिसके मस्तक पर प्रभु अपनी ऊँगली से 'यह मेरा है' स्पष्ट रूप से अंकित कर दिए होते हैं तब मुझे इस प्रार्थना के सही अर्थ का बोध होने लगता है। "(२:३३३) 
.." पैगम्बर धर्म का प्रचार करते हैं, किंतु ईसा, बुद्ध, श्री रामकृष्ण आदि के समान अवतार पुरूष धर्म प्रदान करते हैं। उनका मात्र एक स्पर्श, या एक दृष्टि-पात ही पर्याप्त होता है। इसाई धर्म में इसी को - पवित्र आत्मा की शक्ति (Power of holy ghost) को दूसरो में संचारित करना (by the lying of hands) कहते हैं। प्रभु ईसा ने अपने शिष्यों के भीतर सचमुच शक्ति का संचार किया था। इसी को गुरु-परम्परा गत शक्ति कहते हैं। यही यथार्थ 'Baptism' दीक्षा है और अनादी काल से चली आ रही है। "(७:१४)....
" श्री रामकृष्ण देव जैसे पुरुषोत्तम ने इससे पहले जगत में और कभी जन्म नहीं लिया। संसार के घोर अंधकार में अब यही महापुरुष ज्योतिस्वरूप हैं। इनकी ही ज्योति से मनुष्य संसार-समुद्र के पार चले जायेंगे।"(६:४७,४९)
" श्रीरामकृष्ण के जीवन का पूर्वार्ध धर्मोपार्जन में लगा रहा तथा उत्तरार्ध उसके वितरण में।....दूसरों के प्रति उनमे अगाध प्रेम था।" (७:२६५)......" श्री रामकृष्ण का संदेश है-' प्रथम स्वयं धार्मिक बनो और सत्य की उपलब्धी करो। उनका सिद्धांत था कि, मनुष्य को प्रथम चरित्रवान होना चाहिए तथा आत्मज्ञान प्राप्त करना चाहिए, जब तुम्हारा चरित्र रूपी कमल पूरी तरह खिल जायगा ,तब देखोगे कि सारे फल तुम्हे अपने-आप प्राप्त हो रहे हैं."(७:२५८) 
" आधुनिक संसार के लिए श्री रामकृष्ण का संदेश यही है---' मतवादों,आचारों, पंथों, तथा गिरजाघरों एवं मन्दिरों की चिंता न करो। प्रत्येक मनुष्य के भीतर जो सार वस्तु ; अर्थात आत्म-तत्व विद्यमान है, इसकी तुलना में ये सब तुच्छ हैं, और मनुष्य के अंदर यह भाव जितना ही अधिक अभिव्यक्त होता है, वह उतना ही जगत् कल्याण के लिए सामर्थ्यवान हो जाता है। प्रथम इसी धर्म-धन का उपार्जन करो, किसी में दोष मत खोजो, क्योंकि; ' सभी मत , सभी पथ ' अच्छे हैं। अपने जीवन द्वारा यह दिखा दो कि धर्म का अर्थ न तो शब्द होता है, न नाम और न सम्प्रदाय , वरन इसका अर्थ होता है-'आध्यात्मिक-अनुभूति।' जिन्हें अनुभव हुआ है, वे ही इसे समझ सकते हैं। जिन्होंने धर्मलाभ कर लिया है, वे ही दूसरों में धर्मभाव संचारित कर सकते हैं, वे ही मनुष्य जाती के श्रेष्ठ आचार्य हो सकते हैं-- केवल वे ही ज्योति की शक्ति हैं।" (७:२६७)
"श्री रामकृष्ण ने अपने पूजा-पाठ का प्रचार करने का उपदेश मुझे कभी नहीं दिया। वे साधना पद्धति, ध्यान-धारणा तथा अन्य ऊँचे धर्म भावों के सम्बन्ध में जो सब उपदेश दिए हैं, उन्हें पहले अपने में अनुभव कर के, फ़िर सर्व-साधारण को उन्हें सिखाना होगा। 'मत अनंत हैं; पथ भी अनंत हैं '। सम्प्रदायों से भरे जगत में और एक नवीन सम्प्रदाय पैदा कर देने के लिए मेरा जन्म नहीं हुआ। "
" यह ख्याल रखना कि इन सारे कार्यों की देख-भाल तुमको ही करनी होगी, पर 'नेता' बन कर नहीं 'सेवक' बन कर।"(२:३९४)...
" मेरा सिद्धांत है कि प्रत्येक अपनी सहायता आप करता है। नारी या पुरूष एक दूसरे पर शासन क्यों करें ? प्रत्येक स्वतंत्र है। यदि कोई बंधन है, तो वह प्रेम का। नारियाँ स्वयं अपने भाग्य का विधान कर लेंगी, पुरुषों का स्त्रियों के भाग्य का विधान अपने हाँथ में रखना- नारियों कि अवमानना है। ....मैं ऐसी गलती के साथ प्रारम्भ नहीं करना चाहता, क्योंकि यही गलती फ़िर समय के साथ बडी होती जायगी , इतनी बडी कि अन्ततोगत्वा उसके अनुपात को सम्भालना असम्भव हो जाएगा ।अतः यदि स्त्रियों के कार्य में पुरुषों को लगाने की भूल मैंने की , तो स्त्रियाँ कभी भी मुक्त न हो सकेंगी - वह एक खानापूर्ति जैसा कार्य होगा। माँ (श्रीसारदा देवी) हमारी 'संघ-नेत्री' हैं, पर वे कभी हम पर शासन नहीं करतीं। "(१० :२०)
" स्त्रीयों में जो ईश्वरत्व वास करता है, उसे हम कभी ठग नहीं सकते।...वह सदैव ही अचूक रूप से बेईमानी तथा ढोंग को पहचान लेता है।...पश्चिम में स्त्रियों की पूजा प्रायः उनके तारुण्य तथा लावण्य के कारण होता है। किंतु पथ-प्रदर्शकों (यथार्थ नेताओं) के लिए प्रत्येक स्त्री का मुखार्विन्द , उस आनन्दमयी माँ का ही मुखार्विन्द है."(७:२५७)
" श्री रामकृष्ण माँ सारदा से कहते हैं - ' जगन्माता ने मुझे यह समझा दिया है कि, वह प्रत्येक स्त्री में निवास करती है, और इसीलिए मैं हर स्त्री को माँ रूप में देखता हूँ। यही एक दृष्टि है, जिससे मैं तुम्हे भी देख सकूंगा, परन्तु यदि तुम्हारी इच्छा मुझे संसाररूपी मायाजाल में खींचने की हो, क्योंकि मेरा तुमसे विवाह हो चुका है, तो मैं तुम्हारी सेवा में उपस्थित हूँ।' माँ बोली -' आपको सांसारिक जीवन में घसीटने कि मेरी इच्छा कदापि नहीं है, बस, इतना ही चाहती हूँ कि मैं आपके समीप रहूँ,आपकी सेवा करूं तथा आपसे शिक्षा ग्रहण करूं।' (७:२५४) 
" ह्रदय सरोवर में एक अष्टदल रक्त-वर्ण कमल है, धर्म उसका मूल देश है, ज्ञान उसकी नाल है, योगी कि अष्ट-सिद्धियाँ उस कमल के आठ दलों के समान हैं, और वैराग्य उसके अंदर की कर्णिका है। जो योगी अष्ट सिद्धियाँ आने पर भी उनको छोड़ सकते हैं, वे ही मुक्त हो सकते हैं। इसीलिए अष्ट-सिद्धियों को बाहर के आठ दलों के रूप में, तथा अंदर कि कर्णिका को 'परम वैराग्य' - अर्थात अष्ट सिद्धियाँ आने पर भी, उनके प्रति वैराग्य के रूप में वर्णन किया है। विषय की लालसा, भय और क्रोध छोड़ कर जो प्रभु के शरणागत हुए है,उन्हीं में तन्मय हो गए हैं, जिनका ह्रदय पवित्र हो गया है, वे भगवान के पास जो कुछ चाहते हैं, भगवान उसी समय उसकी पूर्ति करते हैं। अतः तुम उनसे कहो, हे प्रभु -तुम मुझे ,भक्ति दो, विवेक दो , वैराग्य दो ,ज्ञान दो। "(१:१०४)
" तमेवैकं जानथ आत्मानम् अन्या वाचो विमुंचथ "- (मुण्डक उ ० २। २। ५ ) अर्थात- उसका, केवल उसका ध्यान करो अन्य सब बातों को त्याग दो।" जो लोग केवल उन्ही की चर्चा करते हैं, वे भक्त को मित्र के समान प्रतीत होते हैं। और जो लोग अन्य विषयों की चर्चा करते हैं , वे उसको शत्रु के समान लगते हैं। उस प्रियतम का चिन्तन हृदय में सदैव बने रहने के कारण ही उसे जीवन इतना मधुर प्रतीत होता है। ...इसको 'तद अर्थप्राणसंस्थान ' कहा है। तदियता तब आती है जब, साधक श्री भगवान् के चरण-कमलों को स्पर्श कर लेता है, तब उसकी प्रकृति विशुद्ध हो जाती है, सम्पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाती है। "(४:५५)
[ 'BE AND MAKE ' का अर्थ है , गुरु-शिष्य वेदाध्यापक प्रशिक्षण परम्परा में स्वयं एक वेदाध्यापक (पैगम्बर, नेता, लोक-शिक्षक)  बनो और दूसरों को भी वेदाध्यापक बनने में सहायता करो ! ]  ..." अंगूर कि लता पर जिस प्रकार गुच्छों में अंगूर फलते हैं, उसी प्रकार भविष्य में सैंकडो ईसाओं का आविर्भाव होगा."(७:१२)
" जिस देश में ऐसे मनुष्य जितनी अधिक संख्या में पैदा होंगे, वह देश उतनी ही उन्नत अवस्था को पहुँच जायगा।....वे चाहते थे कि तुम अपने भाई-स्वरूप समग्र मानवजाति के कल्याण के लिए सर्वस्व त्याग दो। 'universal brotherhood' पर सेमीनार नहीं करो,अपने शब्दों को सिद्ध करके दिखा दो। त्याग तथा प्रत्यक्ष अनुभूति का समय आ गया है, और इनसे ही तुम जगत के सभी धर्मों में सामंजस्य देख पाओगे।"(७:२६८) 
इस प्रकार हमलोग यह समझ सकते हैं कि सांख्य शास्त्र का उद्देश्य तत्वज्ञान के द्वारा मोक्ष प्राप्त करना या डीहिप्नोटाइज्ड होना है ! (अर्थात अपने -पराये के भ्रम से मुक्त होना है।) कपिलवस्तु, जहाँ बुद्ध पैदा हुए थे, कपिल के नाम पर बसा नगर था। इससे कम-से-कम इतना तो अवश्य कह सकते हैं कि बुद्ध के पहले कपिल का नाम फैल चुका था।
निस्संदेह भगवान कपिल ही दर्शन शास्त्र के पितामह हैं ! जो हमें सृष्टि के 'देश-काल -निमित्त' टाइम-स्पेस एण्ड कॉज़ैशन में कॉज़ैशन (the act of causing something to happen) या 'अल्टीमेट सोर्स ऑफ़ क्रिएशन' सृष्टि के महान आधार भूत कारण 'महत तत्व' को सांख्य की दृष्टि से समझने में सहायता करते हैं !
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गुरुवार, 10 अगस्त 2017

‘सा विद्या या विमुक्तये’

बॉन्डेज ऐंड लिबरेशन: स्वामी विवेकानन्द ने प्रचलित शिक्षा को 'निषेधात्मक शिक्षा' की संज्ञा देते हुए कहा है कि " आप उस व्यक्ति को शिक्षित मानते हैं जिसने कुछ परीक्षाएं उत्तीर्ण कर ली हों तथा जो अच्छे भाषण दे सकता हो, पर वास्तविकता यह है कि जो शिक्षा जनसाधारण को जीवन संघर्ष के लिए तैयार नहीं करती, जो चरित्र निर्माण नहीं करती, जो समाज सेवा की भावना विकसित नहीं करती तथा जो सिंह जैसा साहस पैदा नहीं कर सकती, वह शिक्षा भी कोई शिक्षा है, ऐसी शिक्षा से क्या लाभ? उन्होंने कहा है कि 'हमें ऐसी शिक्षा चाहिए, जिससे चरित्र का गठन हो, मन का बल बढ़े, बुद्धि का विकास हो और व्यक्ति स्वावलम्बी बने।' 
स्वामी विवेकानन्द धर्म को शिक्षा का मेरुदण्ड कहते थे। उनका मानना था कि प्रत्येक व्यक्ति में 'ज्ञान' का वास होता है; और शिक्षा उसको प्रकाश में लाने का कार्य करती है। धर्म का मानव जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। धर्म अर्थात चरित्र से हीन मनुष्य पशु होता है। धर्म का अर्थ है- ' विवेक ' या मननशीलता। यह विवेक ही मनुष्य को 'सत-असत' का निर्णय करने में सक्षम-'निर्णायक बुद्धि ' प्रदान करता है। तभी तो विवेकी मनुष्य, क्या अच्छा है, और क्या बुराहै, समझ-बूझ कर इसका निर्णय कर सकता है। किन्तु साधारण अर्थों में जिसे अच्छा और बुरा (आंवला-इमली का अंतर) समझा जाता है, सदसत-विवेक का अर्थ भी ठीक उतना ही नहीं है। 'सत ' का अर्थ है-जो अविनाशी हो या चिरस्थायी हो (सत्य-वस्तु)। 'असत' का अर्थ है क्षणभंगुर या नश्वर (मिथ्या-वस्तु)। कौन सी वस्तु सत (अविनाशी) है, और कौन सी वस्तु असत (नश्वर) है- जो प्राणी चिन्तन करके इस बात को जान सकता है, उसी को मननशील जीव कहा जाता है। वैदिक निरुक्तकार यास्क-मुनि मनुष्य को परिभाषित करते हुए कहते हैं- " जो व्यक्ति कुछ भी सोचने-बोलने-करने के पहले थोड़ा रुककर, 'विवेक-प्रयोग' करने के बाद ही कोई कार्य करता है, उसको ही मनुष्य कहा जाता है।"
[स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [17] ' स्वामी विवेकानन्द तथा आज के हमलोग '
(स्वामी विवेकानन्द और युवा समाज)] 
संस्कृत में नीतिकार कहते हैं-‘धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः।’ अर्थात् मनुष्यों और पशुओं में आहार, निद्रा, मैथुन तथा भयभीत होना, ये सब समान होते हैं परन्तु धर्माचरण अर्थात सुन्दर चरित्र ही मनुष्य में विशेष गुण है जिसके कारण वह पशुओं से भिन्न होता है। 

येषां न विद्या न तपो न दानं , ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ।
 ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः , मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥
जिसके पास न विद्या है, न तप है, न दान है , न ज्ञान है , न शील है , न गुण है और न धर्म है ; वे मृत्युलोक पृथ्वी पर भार होते है और मनुष्य रूप तो हैं पर पशु की तरह चरते हैं (जीवन व्यतीत करते हैं )।चरित्र ही मनुष्‍य के जीवन को शोभा (रौनक) प्रदान करता है। मनुष्य के लिये चरित्र एक ऐसी दौलत है जिसे अपने पास रखने वाला व्यक्ति कैसी ही हालत में क्यों न हो, वह समाज के बीच गौरव और प्रतिष्‍ठा पाता ही है। चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना किसी महान सभ्‍यता का प्रधान अंग है। किसी भी राष्ट्र की सच्‍ची उन्नति तभी होगी जब उस देश का हर एक आदमी अपने को चरित्र संपन्‍न और भलमनसाहत की कसौटी में कसे हुए मनुष्य के रूप में प्रगट कर सकते हों।
निरूक्तकार आचार्य यास्क मुनि अपने निरुक्त में पशु की परिभाषा देते हुए कहते है-" पश्यति इति पशुः"  अर्थात जो देखता है वो पशु है। और सभी देखते हैं, इसलिये क्या सभी पशु हैं ? तो फिर मनुष्य और पशु में अन्तर कहाँ है ? यास्क मुनि - 'मनुष्यः कस्मात्' अर्थात मनुष्य कौन है ? के उत्तर में कहते है-  'मत्वा (कर्माणि) सिव्यति इति मनुष्यः’ (३/८/२) अर्थात् मनुष्य तभी मनुष्य है जब वह किसी भी कर्म को चिन्तन तथा मनन पूर्वक करता है। मनुष्य विचारपूर्वक देखता है तथा करता है-मत्वा कर्माणि सीव्यति’ क्योंकि मनुष्य एक चिन्तनशील प्राणी है। पशु केवल नेत्रों से देखता है- वह विचार नहीं कर सकता। 'मनसा सीव्यति इति मनुष्यः' - अर्थात मन से जो सी ले, सम्बन्ध जोड़ ले वह मनुष्य होता है।' अतः मनुष्य वही है जो अपने समस्त कर्त्वय कर्मों को 'विवेक-प्रयोग ' करने के बाद ही करे। इतना सारा समय इन्द्रियजगत में, मन की कल्पनाओं को देखने (पश्यति पशुः) में चला जाये तो मनुष्य जीवन का अनर्थ हुआ। मनुष्य को एकाग्रता के अभ्यास के साथ-साथ निरंतर विवेक-प्रयोग भी करते रहना चाहिये।

मनुष्य व पशु शब्दों की व्याख्या करते हुए कहा जाता है कि ‘मनुते इति मनुष्यः’ अर्थात मनन करके कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले व्यक्ति को मनुष्य कहा जाता है। "मोक्तुम इच्छा मुमुक्षा " मुमुक्षा अर्थात मोक्ष की इच्छा छूटने की इच्छा यह "मोक्षेच्छा जिस मनुष्य मे रहती हैं उसका नाम है "मुमुक्षा।" मनुष्य दो हाथ, दो पैर व वाणी वाला व्यक्तित्त्व है। उसमें चिंतनशीलता है।  बार-बार मनन यानी सोच-विचार करते हैं वे ही वास्तव में मनुष्य होते हैं। यह, 'अहं ब्रह्मासि'  आदि वेदान्त के महावाक्यों पर 'श्रवण-मनन -निदिध्यासन ' की प्रवृत्ति ही मनुष्यता की परिचायक है। यही मनुष्य होने का लक्षण है। अन्यथा मनुष्य भी उस पशु के समान ही है जो केवल देखता है और बिना चिन्तन मनन के विषय में प्रवृत्त हो जाता है।
पशु परम् सत्य या ईश्वर की खोज नहीं कर सकता, परन्तु मनुष्य किसी भी वस्तु की सत्यता को खोजने या आविष्कृत करने की चेष्टा करता है। और जब कोई मनुष्य देश-काल -निमित्त से परे इन्द्रियातीत परमसत्य या ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है तब वह 'ऋषि' (अध्यात्म -वैज्ञानिक) बन जाता है।  यास्क मुनि के निरुक्त मे ऋषि का निर्वचन इस प्रकार है-‘ऋषिः दर्शनात् !' (निरुक्त 2/11) इस निरुक्त से ॠषि का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है- दर्शन करने वाला, तत्वों की साक्षात अपरोक्ष अनुभूति रखने वाला विशिष्ट पुरुष। ऋषिगण त्रिकालज्ञ माने गये हैं। 'ऋषि दर्शनात्', जो साधक भूत और भविष्य को भी वर्तमान के समान ही देख सके । ‘साक्षात्कृतधर्माणः ऋषयो बभूवुः’ किसी मन्त्र विशेष की सहायता से किये जाने पर किसी कर्म से किस प्रकार का फल परिणत होता है, ॠषि को इस तथ्य का पूर्ण ज्ञान होता है। इस विवेचन से यह स्पष्ट है कि वैदिक मन्त्रों के द्रष्टा (कर्ता नहीं) ऋषि कहे गये हैं। सप्तर्षि- सात ऋषियों में मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ की गणना होती है। आकाश में सात तारों के एक समूह विशेष को भी सप्तर्षि कहा जाता है।
यहां दर्शन का अर्थ दिव्य दृष्टि ही है, सामान्य देखना नहीं, सामान्य रूप में तो सभी देखते हैं। दिव्य दृष्टि केवल ऋषि में होती है। ऋषि बिना नेत्रों के ही अन्तः प्रज्ञा से देखता है। ब्रह्म वा अजः ।-(शतपथ० ६/४/४/१५) ब्रह्म ही अजन्मा है। 
अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ।।-(श्वेता० २/१५)
 अजन्मा,ध्रुव,सारे तत्त्वों से अलग परमात्मदेव को ब्रह्मतत्त्वदर्शी जानकर पाशों से छूट जाते हैं।
 ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है! श्रुति कहती है! तुलसीदास जी भी कहते हैं कि " सोइ जानै जेहि देहु जनाई! जानत तुमहि तुमही होइ जाई!! " तुमको जाननेवाला तुम्ही हो जाता है ! स्वामी विवेकानन्द भी कहते हैं कि मानवमात्र के अंदर अनन्त ज्ञान, अनन्त शक्ति अन्तर्निहित है, केवल जीवन मे उसके प्राकट्य की आवश्यकता है ! पारलौकिक दृष्टि से उन्होंने कहा है कि 'शिक्षा मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है।'
भारतीय संस्कृति बौद्धिक है।  बुद्धि के ऊपर निर्भर है। जहां बुद्धि नहीं, वहा मुक्ति नहीं, वहां भारतीय संस्कृति नहीं, वहां धर्म नहीं।  बृहस्पति स्मृति में कहा गया है -
केवलं शास्त्रमाश्रित्य न कर्तव्यो विनिर्णयः।
युक्तिहीन विचारे तु धर्महानिः प्रजायते।
केवल किताबों का, जिनको शास्त्र कहते हैं, सहारा लेकर धर्म तत्त्व का निर्णय नहीं हुआ करता। जहां बुद्धि नहीं है, युक्ति नहीं हैं, ऐसे विचार से धर्म की हानी होती है। चाहे वे हिंदू हों, चाहे मुसलमान हों, चाहे ईसाई हो, धर्म युक्ति पर आधारित नहीं है, वह धर्म कहलाने योग्य नहीं है। भारतीय धर्म बौद्धिक है और युक्ति पर निर्भर है। 
हमारा देश ऋषि-मुनियों का देश है , इसीलिये यह देश अपने आतंरिक तल में बौद्धिक रहा है, बुद्ध का पुजारी रहा है।  बुद्धि के ऊपर उसने किसी किताब को नहीं रखा है- ‘यो बुद्धेः परतस्तु सः.’ बुद्धि के ऊपर केवल ईश्वर को माना है।  ईश्वर के बाद संसार में बुद्धि ही तत्त्व है। कोई भी बुद्धिवादी व्यक्ति, बुद्धि के ऊपर सब पुस्तकों को, ट्रेडिशंस को, नापने-तोलने के लिए तैयार रहता है, यही हमारे यहां प्राचीनों का क्रम था। ऋषि लोग ही भारतीय समाज के पथ प्रदर्शक रहे हैं। जब तक मानव का चरित्र सही नहीं होता तब तक उसे आर्दशवान् नही कहा जा सकता है, एवं सभ्य समाज की कल्पना नहीं का जा सकती है। ऋषि और वैज्ञानिक में अन्तर क्या है? ऋषि सत्य के द्रष्टा हैं। उन्हे अनुमान नही करना है ।  जबकि वैज्ञानिको का ज्ञान निरीक्षण, परीक्षण और निष्कर्ष पर आधारित होता है। यही कारण है कि वैज्ञानिकों का ज्ञान अधूरा रहता है और समय समय पर ये अपनी ही उपस्थापनाओं को बदलते रहते हैं। 

वेदों के ऋषि किसी एक जाति या वर्ण के नही है वरन् समाज के प्रत्येक जाति और वर्ण से हैं। वेद के बहुत से मन्त्रों की ऋषि स्त्रियाँ भी हैं। ऋषि शब्द का अर्थ है-  मन्त्रद्रष्टा, एक अन्तः सफूर्त कवि या मुनि। अर्थात् मन्त्रों का द्रष्टा उनके रहस्यों को समझकर प्रचार करने वाला ऋषि होता है। 
कथा है, जब यास्क मुनि के शरीर छोड़ने का समय आया, तब उनके चेलों ने उनसे पूछा- ‘महाराज, आप जाते हैं, अब वेदों का अर्थ कौन करेगा?’ ध्यान रखिए वेदों का. यास्क मुनि निरुक्त के कर्ता हैं. निरुक्त वह शास्त्र है, जो वेदों के शब्दों को सामने रखता है और उनका अर्थ निकालता है। चेलों ने पूछा- ‘अब आप जा रहे हैं, तब वेदों का अर्थ कौन करेगा? अब हम लोग किस ऋषि के पास जायें?’ 
यास्क ने जवाब दिया- ‘तर्को वै ऋषिरुक्तः।’ इसका क्या अर्थ है? वेदों का अर्थ करने के लिए अब तर्क, लाजिक, सिलोजिज्म- यही ऋषि है। यह वाक्य था कि तर्क ही ऋषि है। तर्क का मतलब बुद्धि, क्योंकि तर्क का सहारा तो बुद्धि के बिना बढ़ता नहीं।  बुद्धि को ही ऋषि बनाना- यह वाक्य हमारे देश की पुरानी परिपाटी को बताता है।  " मैंने तुझे नौका दी थी नदी पार करने के लिए न कि पार होने के बाद सिर पर ढोने के लिए।" बुद्ध की इस उक्ति से उनके तर्क-संगत दर्शन की साफ झलक मिल जाती है। उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण शिक्षा यह थी कि 'सत्य' को पहले तर्क की कसौटी पर परखो, फिर उसमें विश्वास करो। इसे उन्होंने अपनी शिक्षाओं पर भी लागू किया। उन्होंने साफ कहा कि मेरी बात इसलिए नहीं मानो कि मैं स्वयं (बुद्ध) कह रहा हूं, बल्कि 'सत्य हो` तभी मानो। 
श्रीविष्णुपुराण (१-१९-४१) में कहा गया है- ‘सा विद्या या विमुक्तये’ अर्थात ज्ञान वह है जो मुक्त कर दे! 
तत्कर्म यन्न बन्धाय, सा विद्या या विमुक्तये।
 आयासायापरं कर्म, विद्यऽन्या शिल्पनैपुणम्॥ 
कर्म वही है, जो बन्धन में  न डाले (कर्मफल में आसक्त न करे), ज्ञान वह है, जो हमें बन्धनों से मुक्त कर दे (जन्म-मृत्यु के बन्धन या देहाध्यास से भ्रममुक्त कर दे)।  अन्य कर्म 'आयास' (अर्थात व्यर्थ का प्रयास)
श्रम मात्र है, और अन्य विद्याऐं शिल्पकौशल (रोजगारोन्मुख-निपुणता, skill-craftsmanship) मात्र ही हैं।
[सच्चा कर्म वह है जो हमें बन्धन में न डाले, सच्ची विद्या वही है जो  विमुक्त कर दे - कर दे । इस से परे जो कर्म है वह व्यर्थ का श्रम कहलाता है; और इसके परे जो विद्या है वह तो बस 'अथकड़ि विद्या', (रोटी-कपड़ा-मकान कमाने की शिक्षा-craftsmanship)  कारीगरी (आई.टी.आई.) की शिक्षा है।]
 but What is that KNOWLEDGE which Liberates one from bondage ? and where it is taught ? Is it the ‘Brahm-Vidhya’ as per my own belief or something else ?
 स्वामी विवेकानन्द ने अपने गुरुदेव श्रीरामकृष्ण परमहंस से वेदान्त परम्परा में उसे प्राप्त करने की विधि ‘निर्विकल्प समाधि’ की शिक्षा ग्रहण की थी। शिष्य को गुरु का घनिष्ठ सान्निध्य लगभग पाँच वर्ष मिल पाया था। गुरु ने अपने इस प्रिय शिष्य से कहा था, ‘‘तुम्हें तो विशाल वट वृक्ष की तरह होना पड़ेगा जिसकी छाया में समस्त पृथ्वी के मनुष्य शांति लाभ करेंगे।’’  इसीलिये श्रीरामकृष्ण ने योग्य शिष्य को पाकर अपना सारा ज्ञान और तेज उनके हृदय में संचारित कर दिया था। किन्तु वह विद्या या वह 'ज्ञान' है क्या -जो स्वयं को मात्र साढ़े-तीन हाँथ का शरीर मानने के देहाध्यास या भ्रम से विमुक्त कर देता है ?  
वह 'ब्रह्म-ज्ञान' [विवेकज-ज्ञान या विवेक-प्रयोग से उत्पन्न ज्ञान] है क्या - जो मानवमात्र को मन की गुलामी से, जन्म-मृत्यु के बन्धनों से आजाद करने में सक्षम है? इसे समझने के लिये पहले हमें यह समझना होगा कि 'बन्धन' क्या है ? ऐंड व्हाट इज दैट पॉवर ऑफ़ बॉन्डेज व्हिच बाइंडस ईवन ऑल माइटी ब्रह्म ? किन्तु वह बन्धन-कारी शक्ति (अविद्या-माया) क्या है जो सर्व-शक्तिमान ब्रह्म को भी बन्धन में डाल देती है ?  तथा वह 'ब्रह्म-विद्या' (विवेक-प्रयोग के लिये मनःसंयोग का प्रशिक्षण) सिखाई कहाँ जाती है, -- जो किसी 'सिंह-शावक' को भेंड़त्व के मिथ्या 'मैं-पन' से डीहिप्नोटाइज्डकरके सदा के लिये "भ्रममुक्त" कर देता है ? बट व्हाट इज दैट दैट नॉलेज व्हिच लिब्रेट्स वन फ्रॉम बॉन्डेज ! 
चरित्रवान मनुष्य बनने के लिये,जीवन की सफलता के लिए, प्रत्येक कर्म अत्यन्त सावधान होकर  करना पड़ता है, यथा – मैं क्या देखूॅं, क्या न देखूॅं, क्या सुनॅूं, क्या न सुनूॅं, क्या जानूँ, क्या न जानूॅं, क्या करुॅं अथवा क्या न करूॅं। 'लस्ट और लूकर ' या वासना और धन में आसक्त (कामातुर) मनुष्य का मन उसके वश में नहीं रहता। उसकी विवेक-प्रयोग शक्ति नष्ट-भ्रष्ट हो जाती है। पशु-मानव भी श्रेय-प्रेय, सत-असत, उचित -अनुचित का भेदभाव नहीं कर सकते। राष्ट्र की सम्पत्ति और अपनी ईमानदारी से कमाई हुई सम्पत्ति में भेदभाव नहीं करते, इसी कारण उन्हें पशु (समान पश्यति इति पशु) कहते हैं। और दोनों को समान समझ कर, सरकारी पद का दुरूपयोग करते हुए भ्रष्टाचारी बन जाते हैं। और अन्त में जेल जाना पड़ता ही है। 
राजा पश्यति चाराभ्यां बुद्धया पश्यन्ति पण्डिता:।
पशु: पश्यति गन्धेन हृदा पश्यन्ति साधव:॥
राजा गुप्तचरों की नज़रों से देखता है। पंडित लोग बुद्धि से देखते हैं। पशु गंध से देख लेता है और साधु-महात्मा हृदय की दृष्टि से देखते हैं।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। 
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥ गीता ६/३० 
‘‘जो योगी पुरुष (यः) मुझ परमेश्वर को (मां) सभी ओर (सर्वत्र) देखते हैं (पश्यति), समस्त भूतों को (सर्वं) मुझ में ही (च मयि) देखते हैं (पश्यति), मैं- परमेश्वर (अहं) उनके लिए (तस्य) अदृश्य नहीं होता (न प्रणश्यति) और वह भी (स च) मेरे लिये (मे) अदृश्य नहीं होते (न प्रणश्यति)।’’ 
भावार्थ फिर से एक बार- ‘‘जो योगी संपूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ श्री कृष्ण (जो राम जो कृष्ण वही श्रीरामकृष्ण परमहंस देव, वेदान्त की दृष्टि से नहीं -साक्षात् !) - परमात्मा को ही संव्याप्त देखता है और संपूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अन्तर्गत ही देखता है (अध्याय ९ श्लोक ६) उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता और न ही वह मेरे लिए अदृश्य होता है।’’ 
ऐसी ब्राह्मी स्थिति में पहुँचने के बाद योगी का जीवन के प्रति दृष्टिकोण आमूलचूल बदल जाता है। अब उसे दिव्य ब्रह्म के सिवाय और कुछ दिखाई नहीं देता। पशु- पक्षी जगत- प्रकृति के अंग- अवयव सभी सिवाय मेरे अर्थात परमात्मा के ही अंश दिखाई देते हैं (डीप इकॉलाजी की मूल अवधारणा)। यह अनुभूति क्षणमात्र के लिए नहीं होती- यह तो एकात्मता वाली स्थिति है। फिर ऐसा साधक भगवान से कभी विलग नहीं होता (तस्याहं न प्रणश्यामि) और न परमात्मा ही उससे कभी पृथक होता है (स च मे न प्रणश्यति)। यह एक प्रकार से ज्ञानी का- कर्मयोगी का- भक्तियोगी साधक का नया जन्म है- अपने आपके बारे में नूतन जागृति है और विकास का एक नया आयाम खुल चुका है जा उसे पूर्णत्व की ओर ले जा रहा है।   
वेदाहमेतमजरं पुराणं सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात् । 
जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनो प्रवदन्ति नित्यम् ।।-(श्वेता० ३/२१) 
मैं उस ब्रह्म को जानता हूं जो पुराना है और अजर है। सबका आत्मा और विभु होने से सर्वगत है। ब्रह्मवादी जिसके जन्म का अभाव बतलाते हैं क्योंकि वह नित्य है।
(मनुष्य )शब्द का अर्थ है "मनु की संतान "मनु की पत्नी थी" श्रध्दा "जो श्रध्दा और मनन दोनो को लेकर सृष्टि में अवतीर्ण हुआ है वह मनुष्य है । दूसरी ओर चौपाया पशु है उसका नाम ही पशु इसलिये है कि ‘पश्यते प्रतिक्रियते इति पशुः’ देखने पर प्रतिक्रिया करने वाला चौपाया पशु है इसलिये मनुष्य की मनन करने की क्षमता का आदर कीजिये उसे मनुवाद (वर्णाश्रम व्यवस्था) की काल्पनिक शत्रुता का आधार मत बनाइये। 

हम लोग जब कहते हैं - यह चद्दर हमारी... यह लोटा -थाली हमारी... यह पैन्ट हमारी.... यह टाई हमारी....। उस समय विवेक पूर्वक हमें यह देखना चाहिये यदि मेरा यथार्थ स्वरूप चेतन आत्मा है, जड़ शरीर नहीं है, तो आत्मा के लिए अपना कहने योग्य परमात्मा (श्रीरामकृष्ण देव) के अतिरिक्त और कौन हो सकता है ? जब शरीर से जुडी वस्तुओं को हम अपना कह सकते हैं तो उस परमात्मा (ठाकुर-माँ-स्वामीजी) को अपना बनाने में हमारा क्या जाता है? वास्तव में परमात्मा के सिवाय और कुछ हमारा है ही नहीं। लेकिन शाश्वत चैतन्य से उत्पन्न होने के कारण मन में ऐसा कुछ चमत्कार है कि वह जैसा सोचता है वैसा सत्य ही भासता है। सत्यस्वरूप आत्मा की शक्ति से ही मन फुरता है। हमलोग जैसा सोचते हैं वैसा सत्य भासने लगता है। भोग की नज़र से देखेंगे तो जगत भोगने के लिए है ऐसा लगेगा। लेकिन संसार के स्वामी को पहचानने के लिए विचित्र परिस्थितियों से पसार होकर अंतिम लक्ष्य तक पहुँचाने की पाठशाला की नजर से संसार को देखेंगे तो उसमें हमलोग उत्तीर्ण होते जायेंगे। हमलोग जब सोचें कि जगत में दुःख है, पीड़ा है, मुसीबत है तो जगत बिल्कुल ऐसा ही लगेगा। हमसे यदि कोई ऊँचा दिखता है तो हमें अपने को सिकोड़ कर नीचा नहीं बना लेना चाहिये। वैसे ही यदि कोई हमसे ज्ञान में, समझ में छोटा दिखता है तो अकड़ नहीं जाना चाहिये। वह छोटा दर्जे का विद्यार्थी है। ऐसा समझना चाहिये, पढ़ते-पढ़ते, ठोकर खाते-खाते वह भी एक दिन पास हो जायेगा। जो मनुष्य जैसे ऊँचे तक, ब्रह्म तक पहुँचा हुआ है वहाँ एक दिन मैं भी पहुँच जाऊँगा। बड़े को देखकर ईर्ष्या और छोटे को देखकर घृणा नहीं होना चाहिए। जो बड़े में है वही का छोटे में छुपा है और मुझमें भी वही का वही है।
अणोरणीयान् महतोमहीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् ।
                    तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमात्मनः ।।-(कठ० 2/20)
अर्थ:-ब्रह्म सूक्ष्म से भी अत्यन्त सूक्ष्म है,बड़े से भी बड़ा है। वह प्राणी के ह्रदयाकाश में स्थित है।उसकी महिमा को बुद्धि के निर्मल होने से निष्काम शोक रहित प्राणी देखता है। 
                                   अशरीरं शरीरेषु अनवस्थेष्ववस्थितम् ।
                                 महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ।।-(कठोप० १/२/२२)
वह परमात्मा लोगों के शरीर में रहते हुए भी स्वयं शरीर-रहित है। बदलने वाली वस्तुओं में एकरस (न बदलने वाला) है। उस महान् विभु आत्मा को जानकर धीर पुरुष शोकमुक्त (भ्रममुक्त) हो जाता है। 
श्रुति कहती है - सभी प्राणियों में मनुष्य ही सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि वह अपने बनाने वाले ब्रह्म को भी जान सकता है। 'ब्रह्मविद ब्रह्मैव भवति!' ब्रह्म जिसे जानकर या; जिसे प्राप्त कर के 'सिंह-शावक' भेंड़त्व के भ्रम से मुक्त हो जाता है ? यह अध्यास क्या है ? यह अध्यास अविद्या का कार्य है। अविद्या से स्वत: कोई नुकसान नही है। नुकसान तो वस्तुत: अध्यास से है। विद्या से अविद्या हट जाती है और फलस्वरूप अध्यास भी। अविद्या के नष्ट होने के बाद भी, नाम रूपात्मक जगत् रहता ही है क्योंकि यह सत् है। अंतर बस इतना है कि मुक्त जीव इसमें नानात्व नहीं देखता। वह इसमें अब्रह्मत्व या असर्वात्मत्व नहीं देखता। वह जगत् और अपने में कोई भेद नहीं देखता। वह जीव, जगत और ब्रह्म को एक ही वस्तु देखता है। 
कार्य दृष्टि से देखा गया जगत् अविद्या कल्पित और भ्रम है जैसे कि रज्जु में सर्प या शुक्तिका में रजत। रज्जु-सर्प, शुक्तिका-रजत, द्वि-चंद्र आदि दृष्टांतों का उद्देश्य कार्य कारणत्व बताना नहीं है बल्कि नामरूपात्मक जगत के अब्रह्मप्रत्ययत्व को हटाना है।  वही जगत् कारण दृष्टि से देखने पर ब्रह्म है। इस प्रकार दोष दृष्टि में है, जगत् में नहीं। जगत् काल्पनिक नहीं है। जगत् का अब्रह्मत्व और असर्वात्मत्व काल्पनिक और अविद्याकल्पित है। इस प्रकार, अविद्याकल्पित का वास्तविक अर्थ यह है कि वस्तु ब्रह्म से भिन्न जान पड़ती है। 
यह अब्रह्मप्रत्यय रज्जु में सर्प के समान है। ‘जिसमें जो नहीं है, उसमें वह है’ ऐसी बुद्धि अध्यास है।  रस्सी ही सर्प के समान, शुक्ति ही रजत के समान अवभासित होती है तथा एक चंद्रमा ही दूसरे के साथ मालूम पड़ता है । अध्यास को ही पंडित अविद्या मानते हैं, और विवेक करके वस्तुस्वरूप के निर्धारण को विद्या कहते हैं । आत्मा मे देह के धर्मों का अध्यास करके कहता है- ‘मैं मोटा हूँ’ ‘मैं पतला हूँ’ ‘मैं गोरा हूँ’ ‘मैं खड़ा हूँ’ ‘मैं जाता हूँ’ ‘मैं लांघता हूँ’। इसी प्रकार इंद्रियों के धर्मों का अध्यास करके कहता है कि ‘मैं गूंगा हूँ’ ‘मैं काना हूँ’ ‘मैं नपुंसक हूँ’ ‘मैं बहरा हूँ’ ‘मैं अंधा हूँ’। इसी प्रकार काम, संकल्प, संशय, निश्चय आदि अंत:करण के धर्मों का आत्मा में अध्यास करते हैं। इस अध्यास का समूल नाश करने के लिए अर्थात् आत्मैकत्व विद्या कि प्राप्ति के लिए सभी वेदान्त प्रारम्भ किए जाते हैं।
[जहाँ-जहाँ जीवन है वहाँ-वहाँ विवेकयुक्त जीवन (जाग्रत Soul) भी हो यह ज़रूरी नहीं। जन्म-वृद्धि-जरा-मृत्यु,  ह्रास -विकास अहंयुक्त जीवन (Life) के लक्षण हैं, शाश्वत आत्मजीवन के नहीं। आत्मा एक ब्रह्माण्डीय अस्तित्व (Cosmic Existence) है जबकि जीवन एक व्यक्तिगत अस्तित्व (Individual Existence) है। आत्मा वहीं है जहाँ कर्म भोग है और कर्म भोग वही हैं जहाँ विवेक (Wisdom) है। पशु आदि में विवेक नहीं है, अतः वहां जाग्रत आत्मा नहीं है। आत्मा नहीं है तो कर्म फल भोग भी नहीं है। पशु और वनस्पतियों में कोई व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं होता। अतः उसकी हत्या को जीव हत्या नहीं कहा जा सकता। जब पशु आदि में जीव (Soul) ही नहीं है, तो जीव-हत्या कैसी ? पशु आदि में सिर्फ और सिर्फ जीवन है, जीव नहीं। अतः पशु-पक्षी आदि के प्रयोजन हेतु उपयोग को हिंसा नहीं कहा जा सकता।]
यास्क मुनि पदार्थों के छ: विकारों (षड् भाव-विकारों) का उल्लेख करते हुए कहते हैं - ( रेतो रक्त प्रसूतम्) माता पिता के शुक्र शोणित रूप धातुओं से उत्पन्न (जड़म्) स्वभाव से ही जड़ तथा (अशनेन चितम्) अन्नादिकों के भक्षण से वृद्ध अर्थात् बढ़ने वाला- छः विकारों वाला (षड् विकारम्) उत्पत्ति आदि छः विकारों (त्वक् अस्थि स्नायु क्रव्य अन्त्र मज्जा) के सहित ‘जायतेऽस्ति वर्द्धते विपरिणमते पचीयते विनश्यतिच' ....जायते अस्ति वर्द्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, विनश्यति। जो उत्पन्न होता है, स्थित है, बढ़ता है, बदलता है, क्षीण होता है और नाश हो जाता है, वह तू नहीं है।’ ये छः बातें अनुभव में नहीं होती हैं। अनुभव अपने आत्मा का ही स्वरूप है और एकरस है। चाहे कितना भी परिवर्तन हो, शरीर बदल जायगा, मन बदल जायगा, पाप-पुण्य बदल जायगा, राग-द्वेष बदल जायगा, हृास-विकास होता रहेगा। और ये जो आत्मदेव हैं- सर्वदा एकरस, सन्मात्र, चिन्मात्र, आनन्दमात्र रहते हैं।
जन्म है, बीमारी है, बुढ़ापा है, मृत्यु है—सभी देह के हैं। देह के साथ तादात्म है तो देह की सारी पीड़ाओं के साथ भी तादात्‍म्‍य है। जब देह जराजीर्ण होती है तो हम सोचते हैं, मैं जराजीर्ण हो गया। जब देह बीमार होती है तो हम सोचते हैं, मैं बीमार हो गया। जब देह मरण के निकट पहुंचती है तो हम घबड़ाते हैं कि मैं मरा। मान्यता—सिर्फ मान्यता! ऋषि अष्टावक्र जी कहते हैं - 
देहाभिमानपाशेन चिरं बद्धोऽसि पुत्रक । 
          बोधोऽहं ज्ञानखंगेन तन्निष्कृत्य सुखी भव । 1-14.
अष्टावक्र ने कहा, ‘हे पुत्र! तू बहुत काल से देहाभिमान के पाश में बंधा हुआ है। उस पाश को मैं बोध हूं, इस ज्ञान की तलवार से काट कर तू सुखी हो!’
 मैं देह हूं ! मैं देह हूं !! मैं देह हूं !!! ...... ऐसा जन्मों—जन्मों तक पुनः पुनः दोहराया है; दोहराने के कारण हम देह हो गये हैं। देह हम हैं नहीं; यह हमारा अभ्यास है, हमारी आदत परिपक्व होकर प्रवृत्ति बन गयी है। हमने इतनी प्रगाढ़ता से माना है कि हम हो गये हैं। मैं शरीर हूं, यह जन्मों—जन्मों से मानी हुई बात है; मान ली तो हम शरीर हो गये। मान ली तो हम क्षुद्र हो गये। मान ली तो हम सीमित हो गये। यह हमारा अभ्यास है, और यही अविद्या माया या 'आत्मसम्मोहन' है, सिंहशावक का हिप्नोटाइज्ड हो जाना है, 'आटोहिप्नोसिस' है। 
तुम शरीर हो नहीं गये हो, तुम शरीर हो नहीं सकते हो। इसका कोई उपाय ही नहीं है। जो तुम नहीं हो, वह कैसे हो सकते हो? जो तुम हो, तुम अभी भी वही हो। सिर्फ झूठी मान्यता को काट डालना है। 'ज्ञानखंगेन तत् निष्कृत्य त्वं सुखी भव!' उस पाश को, मैं बोध हूं, इस ज्ञान की तलवार से काटकर तू अभी सुखी हो जा।’   
आमतौर पर जब कोई व्यक्ति किसी एक योगमार्ग से लक्ष्य तक पहुंच जाता है- 'ब्रह्म' को जान लेता है या आत्मसाक्षात्कार कर लेता है; तब फिर वह दूसरे योग-मार्गों की साधना करना आवश्यक नहीं समझता! जैसे कोई व्यक्ति सीमेन्ट की सीढ़ियों से चढ़ कर पहाड़ की चोटी पर पहुंच जाये; तो फिर दूसरी पगडंडियों से भी चोटी पर चढ़ा जा सकता है, या नहीं ? इस बात की फ़िक्र कौन फिक्र करता है— पहुंच ही गये। जो पक्की सीढ़ी चोटी तक ले आई, ले आई; बाकी लाती हों न लाती हों, प्रयोजन किसे है! लेकिन भगवान श्री रामकृष्ण देव ऐसे साधक थे जो विभिन्न योग-मार्गों के सहारे बार—बार पहाड़ की चोटी पर पहुंचे, फिर—फिर नीचे उतर आये। फिर दूसरे मार्ग से चढ़े। फिर तीसरे मार्ग से चढ़े। 
वे पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने सभी धर्मों की साधना की और सभी धर्मों से उसी शिखर को पा लिया। सर्वधर्म समन्वय की बात बहुत से लोग कहते थे, किन्तु श्री रामकृष्ण ने ही सर्व-प्रथम धर्म-समन्वय का विज्ञान निर्मित किया। बहुत से लोगों ने कहा था, सभी धर्म सच हैं; लेकिन वह केवल मुख से कहने की बात थी—उनका अपना अनुभव नहीं था। रामकृष्ण ने उस मार्ग को तथ्य बनाया; उस मार्ग की साधना के अनुभव पर बल दिया; अपने जीवन से प्रमाणित किया। जब वे इस्लाम की साधना करते थे तो वे ठीक मुसलमान फकीर हो गये। वे काली -काली कहना भूल गये; नमाज पढ़ने लगे, अल्लाह के ९९ नामों का जप  करन लगे; कुरान की आयतें सुनने लगे। एक मस्जिद के द्वार पर ही पड़े रहते थे। मंदिर के पास से निकल जाते, उधर आंख भी न उठाते। 
छह महीने तक उन्होंने सखी—संप्रदाय के राधा भाव की साधना की थी। तीन महीने के बाद उनके स्तन उभर आये; उनकी आवाज बदल गई; वे स्त्रियों जैसे चलने लगे, स्त्रियों जैसी उनकी मधुर वाणी हो गई। स्तन उभर आये, स्त्रियों जैसे स्तन हो गये ! शरीर का पुरुष—ढांचा बदलने लगा। एक मान्यता कि मैं स्त्री हूं—यह मान्यता इतनी प्रगाढ़ता से की गई, यह भाव इतने गहरे तक गुंजाया गया, यह रोएं—रोएं में, कण—कण में शरीर के गुंजने लगा कि मैं स्त्री हूं! इसका विपरीत भाव न रहा। पुरुष की बात ही भूल गई। तो घटना घट गई। छह महीने पूरे होते—होते उनको मासिक—धर्म शुरू हो गया। तब चमत्कार की बात थी!  ऐसा तो कभी किसी पुरुष को न हुआ था।भगवान श्री रामकृष्ण को अवतारवरिष्ठ इसीलिए कहा जाता है कि उन्होंने सभी धर्मों की साधनाएं की हैं। मनुष्य—जाति के इतिहास में वे अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने सभी धर्मों के मार्ग से सत्य तक जाने की चेष्टा की। 
अष्टावक्र कह रहे हैं : हम देह नहीं हैं; हमने जब मन से यह मान लिया कि हमतो मरणधर्मा शरीर मात्र हैं, तो हम देह हो गये हैं। हमने जो मान लिया, हम वही हो गये हैं। अनु पश्चाद् भवनं-अनुभवः। ‘अनु’ माने पीछे ‘भव’ माने होना-‘भवनं भवः।’ जो सबसे पीछे रहकर सबको प्रकाशित करे उसका नाम अनुभव। ज्ञान की पराकाष्ठा। संसार हमारी मान्यता है। और मान्यता छोड़ दी तो हम तत्क्षण रूपांतरित हो सकते हैं। छोड़ने के लिए किसी यथार्थ को बदलना नहीं है; सिर्फ एक धारणा को छोड़ देना है। हम वस्तुत: अगर शरीर होते बदलाहट बड़ी मुश्किल थी। हम वस्तुत: शरीर नहीं हैं। हम वस्तुत: तो शरीर के भीतर छिपा जो चैतन्य है, वही हैं—वह साक्षी, द्रष्टा है। व्यक्ति की मनःस्थिति का प्रभाव उसके जीवन पर प्रत्यक्ष देखने में आता है।
 यत्र यत्र मनो देही धारयेत्सकलं धिया ।
        स्नेहात् द्वेषात् भयाद्वापि याति तत्तत्सरूपताम् ॥ श्रीमद्भागवत्
अर्थ- देहधारी जीव स्नेह से , अथवा भय से जिस किसी में भी सम्पूर्ण रूप से अपने चित्त को लगा देता है , अन्त मे वह तद्रूप हो जाता है । 
'लस्ट और लूकर ' अर्थात वासना और धन ' में  अत्यधिक आसक्ति  हमारे मन को किसी मदिरोन्मत्त  बन्दर के समान चंचल बना देता है। और  धर्म महावत के सामान हमारे हाथी के समान उन्मत्त मन की पाशविक वृत्तियों पर अंकुश रखता है, अतः धर्म हमारे चंचल मन का नियन्ता है। हमारा शत्रु बाहर नहीं है, मन में बैठे काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और ईर्ष्या रूपी षडरिपु ही हमारे वास्तविक शत्रु हैं। ये षडरिपु मानव को पतन की ओर अग्रसर करते हैं। इन पतनोन्मुख प्रवृत्तियों को रोकने के लिए परमावश्यक होता है विवेकशील होना और विवेक को जागृत करने के लिए अच्छे पुरुषों की संगति तथा अच्छे ग्रन्थों का स्वाध्याय परमावश्यक है।
देहाभिमानगलिते ज्ञानेन परमात्मनः।
 यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः॥
अर्थात देहाभिमान ( जड़ शरीर और मन के साथ मैं-पन का तादात्म्य)  सर्वथा मिट जाने पर जब परमात्मतत्त्व का बोध हो जाता है, तब जहाँ-जहाँ मन जाता है, वहाँ-वहाँ परमात्मतत्त्व का अनुभव होता है अर्थात उसकी अखंड समाधि (सहज समाधि रहती है)। जीव को ब्रह्म होने मे उतनी ही देर लगती है जितनी देर ब्राह्मण को मनुष्य होने मे लगती है । ब्राह्मण मनुष्य ही है केवल ब्राह्मणत्व का अभिमान हटाना है इसी प्रकार देहाभिमान हटा देने पर जीव वस्तुतः ब्रह्म ही है
" किन्तु बिना चरित्र के अगर कोई मनुष्य होगा तो वह पशु के सामान होगा।" इसीलिये सबसे पहले चरित्रवान मनुष्यों का निर्माण करना ये महामण्डल का उपाय है। और हमारे आदर्श हैं स्वामी विवेकानन्द। वे भारत के राष्ट्रीय युवा आदर्श हैं। १९८४ में ही भारत सरकार ने स्वामी विवेकानन्द को युवा आदर्श घोषित किया है। चरित्र-गठन के लिये एक साँचा की आवश्यकता होती है। युवाओं के रोल-मॉडल हैं, हमारे आदर्श हैं विवेकानन्द, उनके साँचे में अपने जीवन को हमलोगों को गढ़ना है। 
महमामण्डल का प्रतीक-चिन्ह: (एम्ब्लेम) में जो वृत्त (गोलाई) है, वह पृथ्वी का प्रतीक है, पृथ्वी के भीतर कन्याकुमारी से प्रारम्भ होता हुआ भारतवर्ष का मानचित्र है। भारतवर्ष के भीतर युवा महामण्डल के आदर्श परिब्राजक स्वामी विवेकानन्द खड़े हैं ! उस गोलाई के नीचे हमारा आदर्श वाक्य (मोटो) लिखा है ' Be and Make ';यह महावक्य भी स्वामी जी का दिया हुआ निर्देश है। इसका साधारण अर्थ है - स्वयं मनुष्य बनो और दूसरों को मनुष्य बनने में सहायता करो! किन्तु स्वामी विवेकानन्द द्वारा कथित यह महावाक्य भी वेदों में कथित चार महावाक्यों के समान ही अत्यन्त सारगर्भित है! जैसे वेदान्त के चार महावाक्य -"अहंब्रह्मास्मि", "तत्त्वमसि" इत्यादि के बड़े गहरे अर्थ होते हैं, ठीक वैसे ही स्वामी विवेकानन्द द्वारा कथित इस महावाक्य "बनो और बनाओ" का भी बहुत गहरा अर्थ है। 
"BE AND MAKE " का गहरा महत्व यह है कि हमलोग केवल साढ़े-तीन हाथ के शरीर मात्र ही नहीं हैं।जैसे हमलोग केवल सॉलिड को देख पाते हैं,स्थूल देख पाते हैं; लेकिन सूक्ष्म को नहीं देख पाते हैं। हमलोगों ने फिजिक्स में पढ़ा है कि पदार्थ की तीन अवस्थायें होती हैं -ठोस,तरल और गैस। बर्फ को हमलोग देख सकते हैं, मुट्ठी में पकड़ सकते हैं। पानी को भी देख सकते हैं, किन्तु मुट्ठी में नहीं पकड़ सकते। किन्तु गैस या वायु  को न तो हमलोग देख सकते हैं और न मुट्ठी में पकड़ ही सकते हैं।  फिर भी कोई यह नहीं कह सकता कि हवा नहीं होती है ? 
विवेकानन्द के गुरु भगवान श्रीरामकृष्णदेव कहते थे, " जिस प्रकार पानी जमकर बर्फ बन जाता है, उसी प्रकार निराकार, अखण्ड, सच्चिदानन्द 'ब्रह्म' ही साकार रूप धारण कर लेता है। जैसे बर्फ पानी से ही पैदा होती है, पानी में ही रहती है, और पानी में ही मिल जाती है; वैसे ही ईश्वर का साकार रूप भी निराकार ब्रह्म से ही उत्पन्न होता है, उसी में अवस्थित रहता है तथा उसी में विलीन हो जाता है।" (अमृतवाणी/साकार और निराकार/२३०) 
उसी प्रकार हमारे तीन कम्पोनेंट्स हैं - शरीर, मन और हृदय। शरीर स्थूल होता है, इसलिये हमलोग उसको देख पाते हैं, मन अत्यन्त सूक्ष्म वस्तु है इसलिये उसको देख नहीं पाते, किन्तु अनुभव करते हैं कि मेरा मन है। और हृदय, हार्ट (Heart) हम लोग बोलते हैं; यह उससे भी सूक्ष्म वस्तु है- वास्तव में वो आत्मा है। लेकिन अभी हमलोग उसको समझ नहीं पायेंगे; इसीलिये स्वामी जी उसको हार्ट बोले। क्योंकि आत्मस्वरूप को अनुभव करने या फील करने की शक्ति हृदय में होती है। अतः हृदय को विकसित करने की शिक्षा प्राप्त करने से आत्मविश्वास आता है। और आत्मविश्वास से अंतर्निहित ब्रह्मभाव जागृत हो जाता है! शिक्षा से श्रद्धा और विश्वबंधुत्व बढ़ता है। 
अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल युवाओं के अन्दर आत्मविश्वास पैदा करने का कार्य करता है। उसको अपने अन्दर की शक्ति को पहचानने की एक दिशा देता है, कैसे वह अपने अन्दर की शक्ति को पहचान सकता है। उसके अन्दर जो अनन्त शक्ति छिपी हुई है,स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाओं के आधार पर उन्हें यह बताया जाता है कि तुम्हारे अन्दर एक दिव्यत्व भरा हुआ है, एक आध्यात्मिक शक्ति भरी हुई है। जिसके माध्यम से तुम अपना जीवन बना सकते हो, अपने जीवन की सारी  समस्याओं का समाधान कर सकते हो। अपने रोजगार के साधन के साथ-साथ परिवार, समाज और देश के कल्याण के लिये भी अपने जीवन को आगे बढ़ा सकते हो (देश की सेवा में अपने जीवन को समर्पित कर सकते हो)!"और यह तभी सम्भव है, जब शिक्षा हमें मन को (हृदय में विद्यमान सूक्ष्म वस्तु को) देखने की प्रक्रिया की सम्यक जानकारी प्रदान करे।
सभी लोग नवयुवकों को उपदेश देते हैं कि मन लगा कर पढ़ो ! किन्तु कोई यह नहीं सिखलाता कि मन क्या है, अर्थात उसकी बनावट कैसी है ? तथा किसी इच्छित विषय में मन को लगाया कैसे जाता है ?  अतः शिक्षा (युवा-प्रशिक्षण) का प्रथम कार्य यह है कि वह प्रत्येक नवयुवक को उसके मन की बनावट और मन को एकाग्र करने की पद्धति से उसका परिचय करा सके।  स्वामीजी मन की एकाग्रता की प्रक्रिया को (मनःसंयोग को) शिक्षा के केन्द्र में लाना चाहते थे। उनका कहना था, ‘‘मैं तो मन की एकाग्रता को ही शिक्षा का यथार्थ सार समझता हूँ, ज्ञातव्य विषयों के संग्रह को नहीं। यदि एक बार मुझे फिर शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिले, तो मैं विषयों का अध्ययन नहीं करूँगा। मैं तो एकाग्रता को तथा मन को विषय से अलग कर लेने की शक्ति को बढ़ाऊँगा और तब साधन अथवा मंत्र की पूर्णता प्राप्त हो जाने पर इच्छानुसार विषयों का संग्रह करूँगा।’’
शिक्षा की वास्तविक उपलब्धि के लिए मन की एकाग्रता आवश्यक है। विद्यार्थी जितने अधिक एकाग्रचित्त होते जाते हैं, उनकी विद्या ग्रहण करने की शक्ति उतनी ही अधिक बढ़ती जाती है।"एकाग्रता की विशिष्टता" के अनुसार ही कोई व्यक्ति किसी "विषय-विशेष" का अथवा अनेक विषयों का ज्ञाता हो जाता है। भारत वासियों के द्वारा "गुरु-शिष्य वेदान्त शिक्षक प्रशिक्षण परम्परा" में अन्तर्जगत पर,आत्मा के अदृष्ट प्रदेश पर (हृदय में विद्यमान भगवान श्रीरामकृष्ण देव पर) अपने मन को एकाग्र किए जाने से भारतवर्ष में योग-शास्त्र का विशेष उत्थान हुआ। जबकि यूरोप के लोगों ने बाह्य जगत पर मन को एकाग्र कर भौतिक उपलब्धियों में शिखरों का स्पर्श कर लिया है। विश्व का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जिस के बारे में मन को एकाग्र किया जाए और उपलब्धि न प्राप्त हो। 
अतः मनुष्य-निर्माण की प्रक्रिया को सरल करते हुए स्वामी जी ने कहा - 3'H';  हैण्ड -हेड एण्ड हार्ट् का डेवलपमेन्ट करो - मनुष्य विकसित हो जायेगा, मनुष्य निकलेगा, मनुष्य प्रगट हो जायेगा। वह 'मनुष्य' जो 'ब्रह्म' को-अर्थात अपने बनाने वाले को भी जान सकता है ! 
आधुनिक युग में 'ब्रह्म' के अवतार, जगतगुरु भगवान श्रीरामकृष्णदेव कहते थे - " वह मनुष्य धन्य है जिसका शरीर, मन और हृदय (3'H') तीनों ही समान रूप से विकसित हुए हैं। सभी परिस्थितियों में वह सरलता के साथ उत्तीर्ण हो जाता है। उसके हृदय में भगवान के प्रति सरल विश्वास और दृढ़ श्रद्धा-भक्ति होती है; साथ ही उसके आचार-व्यवहार में भी कहीं कोई कमी नहीं होती। माता-पिता और गुरुजनों के सम्मुख वह वह विनयी और आज्ञाकारी होता है। पड़ोसियों के प्रति वह दया और सहानुभूति रखता है। आत्मीय-स्वजन और मित्रों को वह अतिशय प्रिय प्रतीत होता है, क्योंकि उसके हाथ (Hand) सदैव मदद करने को तैयार रहते हैं। सांसारिक व्यवहार के समय वह पूरा-पूरा व्यवसायी होता है, विद्वान् पण्डितों की सभा में वह सर्वश्रेष्ठ विद्वान् सिद्ध होता है। वाद-विवाद में अकाट्य युक्तियों द्वारा वह अपनी तीक्ष्ण बुद्धि (Head) का परिचय देता है।  पत्नी के सामने वह मानो साक्षात् मदन-देवता होता है। इस तरह का मनुष्य वास्तव में सर्वगुण-सम्पन्न (ऑल अराउन्डर) होता है ! " अमृतवाणी /८०]
और महामण्डल इसी प्रकार के सर्वगुण-सम्पन्न (ऑल अराउन्डर) मनुष्यों का निर्माण करने हेतु चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने वाला संगठन है। " इसलिये महामण्डल का उद्देश्य है - भारत का कल्याण (ऑब्जेक्ट ऑफ़ महामण्डल इज -वेलफ़ेयर ऑफ़ इंडिया), उपाय है - चरित्रनिर्माण (महामण्डल्स स्किम फॉर द वेलफ़ेयर ऑफ़ इंडिया इज -मैन्यूफैक्तचरिंग मैन ऑफ़  आदर्श हैं -स्वामी विवेकानन्द, आदर्श वाक्य है -"BE AND MAKE" और हमारा अभियान मन्त्र है - " चरैवेति चरैवेति !" अर्थात 'आगे बढ़ो आगे बढ़ो !' ये ऐक्चुअली ऐतरेय ब्राह्मण का एक मंत्र है। जिसमें कहा गया है, कि जो युग परिवर्तन
होता है वह व्यक्ति के विचारों में (विचार जगत में) होता है।   
कलिः शयानो भवति, संजिहानस्तु द्वापरः ।
 उत्तिष्ठँस्त्रेताभवति, कृतं संपद्यते चरन् ।
चरैवेति चरैवेति॥
जो मनुष्य सोया रहता है, (या आलसी मनुष्य है) और पुरुषार्थ (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) नहीं करता- उस मनुष्य का भाग्य भी सोया रहता है, जो पुरुषार्थ करने के लिये उठकर खड़ा हो जाता है, उसका भाग्य भी खड़ा हो जाता है, जो अपने लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ता जाता है, उसका भाग्य भी आगे बढ़ता जाता है। इसलिये हे मनुष्यों - 'चरैवेति चरैवेति ', आगे बढ़ो, आगे बढ़ो ! 
जो मनुष्य सोया हुआ है (पंचभूतों के फंदे में फंसा हुआ है), वह अभी कलिकाल में वास कर रहा है, (स्वामी जी के आह्वान को सुनने से-सिंहशावक) जिसकी मोहनिद्रा भंग हो गयी है, वह द्वापर युग में वास कर रहा है। जो मनुष्य पुरुषार्थ करने के लिये कमर कसकर उठ खड़ा होता है, वह त्रेता युग में वास कर रहा है। कृतं संपद्यते चरन्- जो व्यक्ति अपने आस-पास रहने वाले कुछ भाइयों को एकत्र करके महामण्डल  निर्देशित ५ अभ्यासों का स्वयं अनुसरण करते हुए दूसरों को भी उसकी शिक्षा देने के कार्य में लग जाता है, उसके जीवन में सत्ययुग का प्रारम्भ हो जाता है। मनु महाराज जी कहते हैं कि :
कृतं त्रेतायुगं चैव द्वापरं कलिरेव च।
    राज्ञो वृत्तानि सर्वाणि राजाहि युगमुच्यते॥301॥
कलि: प्रसुप्तो भवति स जाग्रद्द्वापरं युगम्।
    कर्मस्वभ्युद्यतस्त्रेता विचरंस्तु कृतं युगम्॥302॥
'सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग ये चारों राजा ही के आचरण हैं, क्योंकि राजा ही को युग कहते हैं। राजा जिस समय अकर्मण्य होकर विषय सुख में लीन तथा अपने कर्तव्य ज्ञान से रहित होता है उस समय कलियुग समझना चाहिए; जिस समय अपने कर्तव्य को सिर्फ समझने लगता है उस समय द्वापर; जब उस समझ के अनुसार काम करने का विचार करता या उसके लिए तत्पर होता है तब त्रेता और जब पूर्ण रीति से अपना कर्तव्य पालन करता रहता है तब सत्ययुग समझना चाहिए' (मनु. 301, 302)। 
 इसका आशय यही है कि मनुष्य अपने से ही कलियुग और सत्ययुग बना सकता है। जब सभी लोग आलसी और 'दैव-दैव आलसी पुकारा' वाले हो जाएँ तभी घोर कलियुग एवं जब कर्मपरायण, कर्तव्य पालन में तत्पर, पूर्ण कर्मयोगी हो जाएँ, तो सत्ययुग ही समझा जाता है। बस यही युगव्यवस्था कर्म करने के लिए माननीय है। इसके अतिरिक्‍त और कोई नहीं।
इसलिये गोलाई के ऊपर  लिखा हुआ है- 'चरैवेति चरैवेति'  हमारे चरित्र-निर्माण और मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा के प्रचार-प्रसार रूपी कर्म-योग आन्दोलन का अभियान-मंत्र का जयघोष है -  'चरैवेति चरैवेति हुँकारों स्माकम!' स्वामी जी सभी युवाओं से आह्वान कर रहे हैं - 'चरैवेति चरैवेति' -सत्ययुग को धरती पर उतारने के लिये आगे बढ़ो आगे बढ़ो ! साथ ही साथ ' Be and Make ' पूर्णतः निःस्वार्थी मनुष्य, भ्रममुक्त मनुष्य, थंडरबोल्ट जैसा अप्रतिरोध्य (irresistible-जो रुक न सके, अत्यन्त सम्मोहक) बनने और बनाने के लिये परमपुरुषार्थ करने का  निर्देश भी दे रहे हैं। 
इसलिये गोलाई के किनारे बने छोटे-छोटे वज्र के निशान वैसे अनेकों भावी लोकशिक्षकों (वुड बी लीडर्स) के प्रतीक हैं, जो " पूर्णतः निःस्वार्थी मनुष्य (भ्रममुक्त मनुष्य) थंडरबोल्ट के जैसा मनुष्य बन चुके हैं! 
इस ' श्रीरामकृष्ण -विवेकानन्द वेदान्त लीडरशिप ट्रेनिंग परम्परा' की विशेषता ही यह है कि यह एक पूर्णतया निःस्वार्थपर " थंडरबोल्ट" की तरह इरिज़िस्टबल-अप्रतिरोध्य महामण्डल नेता (पैगम्बर) बनने और बनाने"  की 'सेल्फ-मैन-मेकिंग-स्कीम' - या योजना है। इस 'सेल्फ मैन मेकिंग ट्रेनिंग' की पद्धति का तात्पर्य यह है कि वास्तव में मैं कौन हूँ, मेरा सच्चा स्वरुप क्या है; तथा उस स्वरुप में अवस्थित होने के लिये क्या और कैसे करना होगा ? इन प्रश्नों का उत्तर हमें स्वयं ढूँढ़ना होगा। कोई दूसरा व्यक्ति हमलोगों को पशु-मानव (१००% घोर स्वार्थी या सम्मोहित मनुष्य) से मनुष्य (५० % स्वार्थी या विवेकशील मनुष्य) में और फिर क्रमशः मनुष्य से देव-मानव (क्रमशः १०० % निःस्वार्थी या भ्रममुक्त मनुष्य) में रूपान्तरित नहीं कर सकता है ! 
" काम से राम तक पहुँचने की यात्रा हमें स्वयं तय करनी होगी! " पंचभूतों के फन्दों से मुक्त हो जाने, या ब्रह्म को जानकर ब्रह्मविद मनुष्य, भ्रममुक्त-मनुष्य, पूर्णतः निःस्वार्थी थंडरबोल्ट जैसा अप्रतिरोध्य मनुष्य या माँ श्री सरदादेवी की कृपा से वैष्णव-जन के लिये हमलोगों में एथेंस का सत्यार्थी जैसा प्रचण्ड साहस और उत्साह', नचिकेता के जैसी आत्मश्रद्धा, प्रह्लाद जैसी प्रबल आस्तिकता स्वयं उत्पन्न करनी होगी। वास्तव में यह "Be and Make" वेदान्त परम्परा स्वयं मनुष्य बनने और दूसरों को मनुष्य बनने में सहायता करते करते स्वयं 'भ्रममुक्त मनुष्य' (पूर्णतः निःस्वार्थी मनुष्य, वैष्णव -जन जो पीर पराई को जानता है) बन जाने वाली सनातन प्रशिक्षण -परम्परा है।] “मेरा विश्वास नवयुवकों पर है। इन्ही में से मेरे कार्यकर्ता निकलेंगे, जो अपने पराक्रम से विश्व को बदल देंगे।"   
 यह स्वामी विवेकानन्द के उपरोक्त सजीव संदेशों का प्रभाव है, कि जो भी नवयुवक स्वामी जी की शिक्षाओं को समझकर, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उनका अनुसरण करेगा, जीवन ही बदल जायेगा। उसके जीवन में सत्ययुग आ जायेगा ! इसीलिए स्वामी जी कहते हैं- " आओ, हम सब आज से - इसी क्षण से धर्म को सहज बनाने की चेष्टा करें और उस सत्ययुग को धरती पर उतारने में सहायता करें, अर्थात जब प्रत्येक मनुष्य एक उपासक (वर्शिपर) होगा और प्रत्येक मनुष्य में अन्तर्निहित सत्यता (दी रियलिटी इन एव्री मैन) ही उसकी उपासना का विषय (ऑबजेक्ट ऑफ़ वर्शिप) होगा।" (८/६३)
'श्रीरामकृष्ण पताका': - नवयुवकों के प्रति भगवान श्रीरामकृष्ण के उस 'प्रेम और विश्वास' (नरेन् शिक्षा देगा के भरोसे) का प्रतिक है, कि मनुष्यों में आध्यात्मिक जागृति लाने (भ्रममुक्त मनुष्य बनने) की शिक्षा केवल रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा के लीडरशिप ट्रेनिंग में प्रशिक्षित-नवयुवक वृन्द ही दे सकते हैं। श्री रामकृष्ण ने अपने उसी प्रेम और भरोसे को 'वज्रांकित महामण्डल ध्वज के रूप में सभी नवयुवकों को हस्तान्तरित कर दिया गया है! ताकि भविष्य में महामण्डल द्वारा आयोजित युवा-प्रशिक्षण शिविर के माध्यम से 'मनुष्य बनने और बनाने' में समर्थ हजारों पूर्णतः निःस्वार्थी 'थंडरबोल्ट' जैसे अप्रतिरोध्य (irresistible) वुड बी लीडर्स का निर्माण हो सम्भव हो जाये! 
[जीवन नदी के हर मोड़ पर (पृष्ठ १५३)] 
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