कुल पेज दृश्य

गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

कर्मयोग के रहस्य पर चिंतन : (Reflection on the Secret of Karma Yoga) : [प्रबुद्ध भारत या जागृत भारत! -मार्च 2026 :इंटरनेट संस्करण: www.advaitaashram.org] {(Prabuddha Bharata " or Awakened India ! March- 2026 ! Internet Edition: www.advaitaashram.org }

Reflection on the Secret of Karma Yoga :

" Inactivity should be avoided by all means. Activity always means resistance. Resist all evils, mental and physical; and when you have succeeded in resisting, then will calmness come. It is very easy to say, "Hate nobody, resist not evil," but we know what that kind of thing generally means in practice. When the eyes of society are turned towards us, we may make a show of non-resistance, but in our hearts it is canker all the time. We feel the utter want of the calm of non-resistance; we feel that it would be better for us to resist. If you desire wealth, and know at the same time that the whole world regards him who aims at wealth as a very wicked man, you, perhaps, will not dare to plunge into the struggle for wealth, yet your mind will be running day and night after money. This is hypocrisy and will serve no purpose. Plunge into the world, and then, after a time, when you have suffered and enjoyed all that is in it, will renunciation come; then will calmness come. So fulfil your desire for power and everything else, and after you have fulfilled the desire, will come the time when you will know that they are all very little things; but until you have fulfilled this desire, until you have passed through that activity, it is impossible for you to come to the state of calmness, serenity, and self-surrender. These ideas of serenity and renunciation have been preached for thousands of years; everybody has heard of them from childhood, and yet we see very few in the world who have really reached that stage. I do not know if I have seen twenty persons in my life who are really calm and non-resisting, and I have travelled over half the world." (Each is great in his own place- March- 2026 !) 

Reflection Questions

1.Where in my life am I externally restrained but internally restless ? 

*Recognition ? 

*Influence ?

*Validation? 

*Intellectual supererity ? 

*control ? 

* Security? 

2. What desire do I secretly judge in myself ? 

3. If I did not fear judgement, what would I admit I still want ? Is it somthing that is legitimate and not causing harm to others ? What are the pros and cons of achieving it ? 

कर्मयोग के रहस्य पर चिंतन :(Reflection on the Secret of Karma Yoga) :

" निष्क्रियता का हर प्रकार से त्याग करना चाहिए। क्रियाशीलता का अर्थ है 'प्रतिरोध'। मानसिक तथा शारीरिक समस्त दोषों का प्रतिरोध करो, और जब तुम इस प्रतिरोध में सफल होगे, तभी शान्ति प्राप्त होगी। यह कहना बहुत बड़ा सरल है कि ' किसीसे घृणा मत करो, किसी अशुभ का प्रतिरोध मत करो', परन्तु हम जानते हैं कि इसे कार्यरूप में परिणत करना क्या होता है ? जब सारे समाज की आँख हमारी ओर लगी हों, तो हम अप्रतिरोध का प्रदर्शन भले ही करें , परन्तु हमारे ह्रदय में वह सदैव कुरेदती रहती है। अप्रतिरोध का शान्तिजन्य अभाव हमें निरन्तर खलता रहता है ; हमें ऐसा लगता है कि प्रतिरोध करना ही अच्छा है। 

       यदि तुम्हें धन की इच्छा है और साथ ही तुम्हें यह भी मालूम है कि जो मनुष्य धन का इच्छुक है, उसे संसार दुष्ट कहता है; तो सम्भव है तुम धन प्राप्त करने के लिए प्राणपण से चेष्टा करने का साहस न करो , फिर भी तुम्हारा मन दिन-रात धन के पीछे दौड़ता रहेगा। पर यह तो सरासर मिथ्याचार है और इससे कोई लाभ नहीं होता। 

         संसार में कूद पड़ो और जब तुम इसके समस्त सुख और दुःख भोग लोगे, तभी त्याग आयेगा -तभी शान्ति प्राप्त होगी। अतएव प्रभुत्व-लाभ की अथवा अन्य जो कुछ तुम्हारी वासना हो, वह सब पहले पूरी कर लो। और जब तुम्हारी सारी वासनायें पूर्ण हो जायेंगी, तब एक ऐसा समय आएगा, जब तुम्हें यह मालूम हो जायेगा कि ये सब चीजें बहुत छोटी हैं। परन्तु जब तक तुम्हारी वह वासना तृप्त नहीं होती, जबतक तुम उस कर्मशीलता से में से होकर गुजर नहीं जा चुकते, तब तक तुम्हारे लिए उस शान्तभाव एवं आत्मसमर्पण (शरणागति) तक पहुँचना नितान्त असम्भव है। 

         इस धीरता (serenity) और त्याग (renunciation या अनासक्ति) का प्रचार गत हजार वर्षों से होता आया है - प्रत्येक व्यक्ति इसके बारे में बचपन से सुनता आया है , परन्तु फिर भी आज संसार में हमें ऐसे बहुत कम लोग दिखाई देते हैं , जो वास्तव में उस स्थिति तक पहुँच सके हों। मैंने लगभग आधे संसार का भ्रमण कर डाला है , परन्तु मुझे शयद 20 व्यक्ति भी नहीं मिले , जो वास्तव में शान्त तथा अप्रतिरोधी प्रकृति वाले हों। --('हरेक अपने क्षेत्र में महान है 'कर्मयोग - खण्ड 3: पेज:14 -15 )  

गहन चिंतन के प्रश्न (Reflection Questions)

1. मेरे अपने जीवन का ऐसा कौन-सा पहलू है, जहाँ मैं बाहर से तो नियंत्रित हूँ, लेकिन भीतर से बेचैन? 

* पहचान? (*Recognition ?) 

* प्रभाव? (*Influence ?) 

* मान्यता? (*Validation?) 

* बौद्धिक श्रेष्ठता? (*Intellectual supererity ?)  

* नियंत्रण? (*control ?) 

* सुरक्षा?* (Security?) 

2. मैं अपने भीतर की किस इच्छा को छुपाकर आंकता हूँ? 

(What desire do I secretly judge in myself ? 

3. अगर मुझे किसी के द्वारा दण्डित किये जाने का भय न हो, तो क्या मैं यह स्वीकार करूँगा कि, मुझे वही कुछ करने की इच्छा है, जो बिल्कुल सही है और जिससे दूसरों को कोई नुकसान नहीं पहुँचता? यदि आप वह प्राप्त भी कर लेते हैं , तो उससे लाभ और हानि क्या है ? 

========= 

Reflection on the Secret of Karma Yoga :

Every man should take up his own ideal and endeavour to accomplish it. That is a surer way of progress than taking up other men's ideals, which he can never hope to accomplish. For instance, we take a child and at once give him the task of walking twenty miles. Either the little one dies, or one in a thousand crawls the twenty miles, to reach the end exhausted and half-dead. That is like what we generally try to do with the world. All the men and women, in any society, are not of the same mind, capacity, or of the same power to do things; they must have different ideals, and we have no right to sneer at any ideal. Let every one do the best he can for realising his own ideal. Nor is it right that I should be judged by your standard or you by mine. The apple tree should not be judged by the standard of the oak, nor the oak by that of the apple. To judge the apple tree you must take the apple standard, and for the oak, its own standard.

Unity in variety is the plan of creation. However men and women may vary individually, there is unity in the background. The different individual characters and classes of men and women are natural variations in creation. Hence, we ought not to judge them by the same standard or put the same ideal before them. Such a course creates only an unnatural struggle, and the result is that man begins to hate himself and is hindered from becoming religious and good. Our duty is to encourage every one in his struggle to live up to his own highest ideal, and strive at the same time to make the ideal as near as possible to the truth.

(Each is great in his own place : (Each is great in his own place : April, 2026 !)  

Reflection and Practice : Inspired by Swami Vivekananda 

Swami Vivekananda remminds us that each person must grow according to their own nature . The oak and the apple tree cannot be judged by the same standered .Yet he also urges us to encourage evryone to rise towards the higest and truest ideal possible . 

Reflection Questions :  

1. What ideal seems most natural and meaningful to my life rught now?  

Is it an ideal that awakens strength, compassion, truthfulness and service in me -or is it something borrrowed from others ? 

2. When do I judge others by my own standerds ? 

Can I recall moments when I dismissed another person's  path , goals, or struggles because they did not match my expectation ?  

Daily Practice 

1. Catch the Moment of judgement .

Today , If I notice myself criticizing someone's life choices, goals , or abilities, pause and ask : " Am I judging this person by my own standard  rather than understanig their path ? "

2. Clarify and elevate your ideal.

Spend a few minuts reflecting : " What small action today can move me closer to my highest ideal - through honesty, self-discipline, kindness, or service ? " 

कर्मयोग के रहस्य पर चिंतन :

" प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपना आदर्श लेकर उसे चरितार्थ करने का प्रयत्न करे। दूसरों के ऐसे आदर्शों को लेकर चलने की अपेक्षा , जिनको वह पूरा ही नहीं कर सकता, अपने ही आदर्शों का अनुसरण करना सफलता का अधिक निश्चित मार्ग है। उदाहरणार्थ, यदि हम एक छोटे बच्चे से एकदम बीस मील चलने को कह दें , तो या तो वह बेचारा मर जायेगा , या यदि हजार में से एकाध रेंगता -रंगते कहीं पहुँचा भी , तो वह अधमरा हो जायेगा। बस हम भी संसार के साथ ऐसा ही करने का प्रयत्न करते हैं।  

किसी समाज के सब स्त्री-पुरुष न एक मन के होते हैं , न एक ही योग्यता के और न एक ही शक्ति के। अतएव उनमें से प्रत्येक का आदर्श भी भिन्न भिन्न होना चाहिए ; और इन आदर्शों में एक का भी उपहास करने का हमें कोई अधिकार नहीं। अपने आदर्श को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक को जितना हो सके , प्रयत्न करने दो। फिर यह भी ठीक नहीं कि मैं तुम्हारे अथवा तुम मेरे आदर्श द्वारा जाँचे जाओ। सेब के पेड़ की तुलना ओक से नहीं होनी चाहिए और न ओक की सेब से। सेब के पेड़ का विचार करने के लिए सेब का मापक ही लेना होगा , और ओक के लिये उसका अपना मापक। 

"बहुत्व में एकत्व ही सृष्टि का विधान है। (विभिन्नता में एकता ही सृष्टि का विधान है।) प्रत्येक स्त्री-पुरुष में व्यक्तिगत रूप से कितना भी भेद क्यों न हो, उन सबकी पृष्ठभूमि में एकत्व विद्यमान है। स्त्री-पुरुषों के भिन्न भिन्न चरित्र एवं वर्गीकरण सृष्टि सृष्टि की स्वाभाविक विविधता मात्र है। अतएव एक ही आदर्श द्वारा सबकी जाँच करना अथवा सबके सामने एक ही आदर्श रखना किसी भी प्रकार उचित नहीं है। ऐसा करने से केवल एक अस्वाभाविक संघर्ष उत्पन्न हो जाता है और फल यह होता है कि मनुष्य स्वयं से ही घृणा करने लगता है तथा एक धार्मिक और उन्नत मनुष्य (50 % Unselfish, या 'यथार्थ मनुष्य') बनने से भी वंचित रह जाता है। हमारा कर्तव्य तो यह है कि हम प्रत्येक व्यक्ति को उसके अपने उच्चतम आदर्श को प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करें , तथा उस आदर्श को 'सत्य' के जितना निकटवर्ती हो सके, लाने की चेष्टा करें। "--('हरेक अपने क्षेत्र में महान है 'कर्मयोग - खण्ड 3: पृष्ठ 15 -16, प्रबुद्ध भारत या जागृत भारत! )  

 स्वामी विवेकानन्द से प्रेरित चिन्तन और अभ्यास: (Reflection and Practice- Inspired by Swami Vivekananda.         

स्वामी विवेकानंद हमें स्मरण कराते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने प्रवृत्ति (nature) के अनुसार ही विकसित होना चाहिए। ओक और सेब के पेड़ को एक ही पैमाने पर नहीं आँका जा सकता। फिर भी, वे हमें यह भी प्रेरित करते हैं कि हम प्रत्येक व्यक्ति को किसी सर्वोच्च और सबसे सच्चे आदर्श की ओर विकसित होने के लिए प्रोत्साहित करें।

चिंतन के प्रश्न (Reflection Questions) : 

1. इस समय मेरे जीवन के लिए कौन-सा आदर्श सबसे ज़्यादा स्वाभाविक और सार्थक लगता है?

क्या यह ऐसा आदर्श है जो मुझमें शक्ति, करुणा, सच्चाई और सेवा की भावना जगाता है—या फिर यह कुछ ऐसा है जो मैंने दूसरों से उधार लिया है?

2. मैं दूसरों को अपने ही पैमानों पर कब परखता हूँ?

क्या मुझे ऐसे पल याद आते हैं जब मैंने किसी दूसरे व्यक्ति के रास्ते, लक्ष्यों या संघर्षों को इसलिए नज़रअंदाज़ कर दिया था, क्योंकि वे मेरी उम्मीदों से मेल नहीं खाते थे? 

दैनन्दिन अभ्यास : (Daily Practice) 

1. आलोचना (judgement परदोषदर्शन) के पल को पहचानें।

आज, अगर मैं खुद को किसी और के जीवन के चुनावों, लक्ष्यों या क्षमताओं की आलोचना करते हुए देखूँ, तो एक पल रुकूँ और खुद से पूछूँ: "क्या मैं इस व्यक्ति को उसके अपने रास्ते को समझने के बजाय, अपने ही पैमानों पर परख रहा हूँ?"

2. अपने आदर्श को स्पष्ट करें और उसे ऊँचा उठाएँ।

कुछ मिनट इस बात पर विचार करने में बिताएँ: " ईमानदारी (honesty), आत्म-अनुशासन ( self-discipline), सहानुभूति, या सेवापरायणता के द्वाराआज मैं ऐसा कौन सा छोटा सा काम कर सकता हूँ जो मुझे मेरे सर्वोच्च आदर्श के और निकट ले जाए - ?"

Daily Practice 

1. Catch the Moment of judgement .

Today , If I notice myself criticizing someone's life choices, goals , or abilities, pause and ask : " Am I judging this person by my own standard  rather than understanig their path ? "

2. Clarify and elevate your ideal.

Spend a few minuts reflecting : " What small action today can move me closer to my highest ideal - through honesty, self-discipline, kindness, or service ? " 

दैनन्दिन अभ्यास : (Daily Practice) 

1. आलोचना के पल को पहचानें।

आज, अगर मैं खुद को किसी और के जीवन के चुनावों, लक्ष्यों या क्षमताओं की आलोचना करते हुए देखूँ, तो एक पल रुकूँ और खुद से पूछूँ: "क्या मैं इस व्यक्ति को उसके अपने रास्ते को समझने के बजाय, अपने ही पैमानों पर परख रहा हूँ?"

2. अपने आदर्श को स्पष्ट करें और उसे ऊँचा उठाएँ।

कुछ मिनट इस बात पर विचार करने में बिताएँ: "आज मैं ऐसा कौन सा छोटा सा काम कर सकता हूँ जो मुझे मेरे सबसे ऊँचे आदर्श के और करीब ले जाए - ईमानदारी, आत्म-अनुशासन, दयालुता या सेवा के ज़रिए?"

=============

'चरित्र निर्माण की प्रक्रिया '(চরিত্র গঠনের উপায়)] (अध्याय-6, जीवन-गठन की निर्माण-सामग्री ) स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [35]


रविवार, 5 अप्रैल 2026

⚜️️🔱श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय -18 ⚜️️🔱अध्याय अठारह: मोक्ष योग⚜️️🔱

 ⚜️️🔱अध्याय अठारह: मोक्ष योग⚜️️🔱

[संन्यास में पूर्णता और शरणागति का योग] 

 भगवद्गीता का यह अंतिम अध्याय 78 में रचित है। यह अध्याय श्लोक-संख्या की दृष्टि से तो बड़ा है लेकिन इसमें मानव-जीवन का मुख्य उद्देश्य अंतिम पुरुषार्थ मोक्ष-लाभ (ईश्वर-लाभ) कैसे होता है, जैसे सबसे महत्वपूर्ण को सम्मिलित किया गया है। अर्जुन संन्यास और त्याग के संबंध में प्रश्न पूछता है। दोनों शब्द एक ही मूल के हैं जिसका अर्थ 'परित्याग करना' है। संन्यासी वह है जो गृहस्थ जीवन में प्रवेश नहीं करता और समाज को त्याग कर निरंतर साधना का अभ्यास करता है। 

त्यागी वह है जो कर्म में तो संलग्न रहता है लेकिन कर्म-फल का भोग करने की इच्छा का त्याग करता है। (यही गीता का मुख्य अभिप्राय है) श्रीकृष्ण इस दूसरे प्रकार के त्याग की संतुति करते हैं। वे कहते हैं कि यज्ञ, दान, तपस्या और कर्त्तव्य पालन संबंधी कार्यों का कभी त्याग नहीं करना चाहिए क्योंकि ये ज्ञानी के चित्त को शुद्ध करते हैं। इनका संपादन केवल कर्त्तव्य पालन की दृष्टि से करना चाहिए। इन कार्यों को कर्म फल की आसक्ति के बिना संपन्न किया जाता है। 

श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो अल्पज्ञानी है वे स्वयं को अपने कार्यों का कारण मानते हैं, लेकिन विशुद्ध बुद्धि युक्त जीवात्मायें स्वयं को अपने कार्यों का कर्ता और भोक्ता नहीं मानती हैं। अपने कर्मों के फलों से सदैव विरक्त रहने के कारण वे उनके बंधन में नहीं पड़ते। आगे इस अध्याय में यह बताया गया है कि हमारे उद्देश्यों और कर्मों में भिन्नता क्यों पाई जाती है ? पुनः इसमें प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म और कर्ता की श्रेणियों का वर्णन किया गया है। फिर यह अध्याय बुद्धि, दृढ संकल्प और सुख के संबंध में भी समान विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसके बाद यह अध्याय उन लोगों का वर्णन करता है जिन्होंने आध्यात्मिक जीवन में पूर्णता की अवस्था प्राप्त कर ली है और ब्रह्म में लीन हो गए हैं।

 इस अध्याय में यह भी कहा गया है कि ऐसे ब्रह्मज्ञानी भी भक्ति द्वारा ही अपनी पूर्णता को प्राप्त करते हैं। इसलिए भगवान के दिव्य व्यक्तित्त्व को केवल भक्ति द्वारा जाना जा सकता है।

इसके बाद श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि भगवान सभी जीवों के हृदय में स्थित हैं और उनके कर्मों के अनुसार वे उन्हें गति प्रदान करते हैं। यदि हम उनका स्मरण करते हुए अपने सभी कर्म उन्हें समर्पित करते हैं, तथा उनका आश्रय लेकर उन्हें अपना लक्ष्य बनाते हैं तब उनकी कृपा से हम सभी प्रकार की कठिनाइयों को पार कर लेंगे। लेकिन यदि हम अभिमान (अहंकार) से प्रेरित होकर अपनी इच्छानुसार कर्म करते है तब हम सफलता प्राप्त नहीं कर पाएंगे। 

इसके बाद श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि भगवान सभी जीवों के हृदय में स्थित हैं और उनके कर्मों के अनुसार वे उन्हें गति प्रदान करते हैं। यदि हम उनका स्मरण करते हुए अपने सभी कर्म उन्हें समर्पित करते हैं, तथा उनका आश्रय लेकर उन्हें अपना लक्ष्य बनाते हैं तब उनकी कृपा से हम सभी प्रकार की कठिनाइयों को पार कर लेंगे। लेकिन यदि हम अभिमान से प्रेरित होकर अपनी इच्छानुसार कर्म करते है तब हम सफलता प्राप्त नहीं कर पाएंगे। 

अंत में श्रीकृष्ण यह प्रकट करते हैं कि सभी धर्मों का त्याग कर केवल भगवान की भक्ति द्वारा उनके समक्ष शरणागत होना ही गुह्यतम ज्ञान है। जो आडम्बर-हीन और भक्त नहीं हैं, यह ज्ञान उन्हें नहीं प्रदान करना चाहिए क्योंकि वे इसकी अनुचित व्याख्या करेंगे और इसका दुरूपयोग कर आवश्यक कर्मों का त्याग करेंगे। यदि हम यह गुह्य ज्ञान पात्र जीवात्मा को प्रदान करते है तब भगवान अति प्रसन्न होते हैं। 

इसके बाद अर्जुन भगवान से कहता है कि उसका मोह नष्ट हो गया है और वह उनकी आज्ञाओं का पालन करने के लिए तत्पर है। अंत में संजय जो धृतराष्ट्र को श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हो रहे संवादों को सुना रहा था, व्यक्त करता है कि वह इन संवादों को सुनकर अत्यंत विस्मित है। जैसे ही वह भगवान के शब्दों और उनके विश्व रूप का स्मरण करता है, वैसे ही उसके रोंगटे खड़े हो जाते हैं ।भगवद्गीता का समापन करते हुए वह कहता है कि विजय सदैव वहीं होती है जहाँ भगवान और उसके भक्त होते हैं और इस प्रकार से सत्य, प्रभुता और समृद्धि भी वहीं होती है क्योंकि परम सत्य का प्रकाश सदैव असत्य के अंधकार को परास्त कर देता है।

====================

को अर्जुन उवाच

संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।

त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन।।18.1।।

।।18.1।। अर्जुन बोले -- हे महाबाहो ! हे हृषीकेश (इन्द्रियों के स्वामी भगवान विष्णु)! हे केशिनिषूदन ! मैं  संन्यास और त्याग का तत्त्व अलग-अलग जानना चाहता हूँ।

यद्यपि अर्जुन की जिज्ञासा शैक्षणिक रुचि की है तथापि भगवान् श्रीकृष्ण पूर्ण गम्भीरता के साथ उसका उत्तर देते हैं। जब शिष्य अपना सन्देह या जिज्ञासा प्रकट करता है तब निश्चय ही वह स्वयं अपनी कठिनाई नहीं जान पाता है। अत गुरु का यह कर्तव्य हो जाता है कि शिष्य की कठिनाई को समझकर उसका समाधान करे। यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण का यही प्रयत्न है।

यह सम्पूर्ण अध्याय त्याग (renunciation) और संन्यास (the ascetic order) के अर्थ के चारों ओर घूमता रहता है। त्याग के बिना संन्यास अचिन्तनीय है, असम्भव है,  और यदि कोई ऐसा प्रयत्न करता है तो उसका संन्यास केवल पाखण्ड ही कहा जायेगा। यह अध्याय हमारी उन वासनाओं, प्रवृत्तियों, उद्देश्यों आदि का वर्णन करता है, जो 'मनुष्य' के लिए सर्वथा त्याज्य है; इनके ज्ञान से (अर्थात विद्या से) ही अवांछनीय गुणों का (पाशविक गुणों का) वास्तविक त्याग संभव हो सकता है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर ही इस अध्याय का अध्ययन करना चाहिए अन्यथा, निश्चय ही यह हमें प्रभावित नहीं कर पायेगा। 

केशनिषूदन/ अर्थात केशि नामक एक असुर अश्व का रूप धारण करके बालकृष्ण की हत्या करने आया था परन्तु भगवान् ने उसे ही दो भागों में विदीर्ण कर दिया था। अत वे केशिनिषूदन के नाम से प्रसिद्ध हुए। 

इन दो शब्दों के तत्त्व निर्णय हेतु

श्री भगवानुवाच

काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः।

सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः।।18.2।।

।।18.2।। श्रीभगवान् ने कहा -- (कुछ) कवि (पण्डित) जन काम्य कर्मों के त्याग को "संन्यास" समझते हैं और विचारशील जन 'समस्त कर्मों के फलों के त्याग' को "त्याग" कहते हैं।।

काम्य कर्मों का त्याग संन्यास कलाता है और समस्त कर्मों का फल-त्याग त्याग कहा जाता है। शास्त्रीय सिद्धांतों से अनभिज्ञ लोगों को इन दोनों में कोई अन्तर नहीं ज्ञात होता क्योंकि कामना सदैव फलप्राप्ति की ही होती है। अत कामना प्रेरित कर्मों का त्याग और कर्मफल की आसक्ति का त्याग ये दोनों ही समान प्रतीत होते हैं।  इसका कारण शास्त्रों से अनभिज्ञता अथवा उनका सतही अध्ययन ही हो सकता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि दोनों का अर्थ कामना का त्याग ही है।  परन्तु त्याग और संन्यास में कुछ अन्तर है।  फिर भी त्याग संन्यास का अविभाज्य अंग है। 

मनुष्य वर्तमान में कर्म करता है और आशा करता है कि उसे इष्टफल भविष्य में प्राप्त होगा। वर्तमान के कर्म का परिणाम ही भावी फल है। इसलिए निष्काम कर्म (Be and Make) वर्तमान में ही हो सकते हैं। जब कि फलभोग की चिन्ता से उत्पन्न होने वाली मन की व्याकुलता का संबंध भविष्य काल से होता है। वर्तमान के कर्म की परिसमाप्ति भावी फल में होती है। कामना और विक्षेप मन में अशान्ति उत्पन्न करते हैं। कामना जितनी अधिक तीव्र होगी उतनी ही अधिक मात्रा में हमारी आन्तरिक शक्तियों का ह्रास होगा और ऐसा शक्तिहीन पुरुष किसी भी कर्म को कुशलता एवं उत्साह के साथ सम्पादित नहीं कर सकता।

यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि अहंकार (मन) या जीव  ही इच्छा करता है। अत अहंकार की निवृत्ति का अर्थ है व्यष्टि जीव की विरति (विवेक-वैराग्य) और उस साधक की अपने सर्वोच्च स्वरूप (सत्य) में दृढ़ स्थिति। कर्म वर्तमान में होते हैं और उनके फल भविष्य में प्राप्त होने की सम्भावना रहती है। जो व्यक्ति फल की चिन्ता करता है वह वर्तमान में कार्य करने की अपनी क्षमता खो देता है। स्वाभाविक ही है कि उस व्यक्ति को इष्ट फल मिलने की सम्भावना कम हो जाती है क्योंकि कर्म का फल कर्ता के प्रयत्न तथा प्रकृति के नियमादि अन्य कई कारणों पर निर्भर करता है। 

'विचक्षणाः' बुद्धिमान लोग होते हैं। श्रीकृष्ण यहाँ यह बताते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति त्याग पर बल देते हैं जिसका अर्थ आंतरिक संन्यास है। इसका तात्पर्य वैदिक शास्त्रों में उल्लिखित कर्त्तव्यों का त्याग करना नहीं है। बल्कि इसके विपरीत इनसे प्राप्त होने वाले फलों की इच्छा का त्याग करने से है। अतः फल की आसक्ति का त्याग करने की मनोवृति को त्याग कहा जाता है जबकि कर्मों का त्याग करना संन्यास कहलाती है। संन्यास और त्याग दोनों आत्मज्ञान के उचित विकल्प प्रतीत होते हैं। इन दोनों प्रकार के कर्मों में से श्रीकृष्ण किस कार्य की संस्तुति करते हैं? 

आने वाले श्लोकों में वे और अधिक स्पष्टता से इसकी व्याख्या करेंगे।

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः।

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे।।18.3।।

।।18.3।। कुछ मनीषी जन कहते हैं कि समस्त कर्म दोषयुक्त होने के कारण त्याज्य हैं; और अन्य जन कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याज्य नहीं हैं।।

सांख्य सिद्धांत के समर्थकों का इस त्याग के विषय में यह मत है कि समस्त कर्म दोषयुक्त होने के कारण त्याज्य हैं। उनके मतानुसार सभी कर्म वासनाएं उत्पन्न करते हैं जो आत्मा को आच्छादित कर देती है। अत कर्मों का सर्वथा त्याग करना चाहिए। परन्तु सांख्य दर्शन के कुछ व्याख्याकार कहते हैं कि केवल उन कर्मों का ही त्याग करना चाहिए जो कामना और स्वार्थ से प्रेरित होते हैं न कि सभी कर्म त्याज्य हैं। 

तत्त्वचिन्तक मनीषी जनों का यह उपदेश है कि साधकों को काम्य और निषिद्ध कर्मों का त्याग और कर्तव्य कर्मों का पालन करना चाहिए। सत्कर्मों के आचरण (Be and Make) से ही मनुष्य का चरित्र निर्माण होता है। 

इन व्याख्याकारों के अनुसार यज्ञ दान और तपरूप कर्म त्याज्य नहीं हैं। गीता के अध्येताओं को यह ज्ञात होना चाहिए कि भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को केवल दोषयुक्त कर्मों को ही त्यागने का उपदेश देते हैं। उनका मनुष्य को आह्वान है कि उसको कर्म के द्वारा ही ईश्वर की भक्ति करनी चाहिए। यह आध्यात्मिक साधना है। 

भगवान का निर्णय है कि अज्ञानी जनो को कर्म करने चाहिये। उपर्युक्त विकल्पों के विषय में वे कहते हैं

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।

यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्।।18.5।।

।।18.5।। यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याज्य नहीं है, किन्तु वह नि:सन्देह कर्तव्य है; यज्ञ, दान और तप ये मनीषियों (साधकों) को पवित्र करने वाले हैं।।

 भगवान् कहते हैं यज्ञ, दान और तपरूप कर्म करणीय हैं , त्याज्य नहीं। पूर्व अध्याय में हमने देखा था कि इन कर्मों का सम्यक् आचरण करने पर वे अन्तकरण को शुद्धि प्रदान करते हैं।  जो आत्मोन्नति और आत्मसाक्षात्कार के लिए आवश्यक है। अविद्याजनित बन्धनों से मुक्ति पाने के इच्छुक साधकों को श्रद्धा -भक्ति पूर्वक यज्ञ, दान और तप का आचरण करना चाहिए। इसके द्वारा वे आन्तरिक शान्ति और संतुलन को प्राप्त कर सकते हैं।

आगे कहते हैं- 

एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।

कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ।।18.6।।

।।18.6।। हे पार्थ ! इन कर्मों को भी, फल और आसक्ति को त्यागकर करना चाहिए, यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है।।

 इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों का भी पालन करना चाहिए। सम्पूर्ण गीता में संग अर्थात् आसक्ति का त्याग शब्द का प्रयोग अनेक स्थलों पर हुआ है जिसका अपना एक विशेष अर्थ है। यह शब्द  कर्तृत्वाभिमानी जीव का अपने कर्मफल के साथ संबंध बताने वाला है। 

उदाहरणार्थ नव विवाहित दम्पत्ति को पुत्र की इच्छा होती है। यह सामान्य इच्छा है। परन्तु यदि वे कहें,  हमें पुत्र ही चाहिए,  पुत्री नहीं तो उनका यह आग्रह संग या आसक्ति है। ऐसा आग्रह रखना अविवेक का ही लक्षण है।

आसक्ति से अभिभूत पुरुष अपने इष्टफल को प्राप्त करने में अविवेकपूर्ण या आत्मघातक चिन्ताओं से ग्रस्त हो जाता है। फल प्राप्ति के पूर्व ही उसके विषय में चिन्ता और व्याकुलता होने से मनुष्य की कार्यकुशलता समाप्तप्राय हो जाती है।

 इसलिए भगवान् का उपदेश है कि यज्ञादिक कर्म भी फलासक्ति के बिना करने चाहिए।  वेदों में भी निष्काम कर्म के सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया है। कर्मयोग के जीवन को अपनाने से अन्तकरण की शुद्धि के द्वारा मनुष्य अपने नित्य शुद्धबुद्ध मुक्त स्वरूप का साक्षात्कार कर सकता है। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को स्नेहपूर्वक पार्थ कहकर सम्बोधित करते हैं जो निकट का संबंध बताने वाला नाम है। भगवान् चाहते हैं कि अर्जुन इसी जीवन पद्धति का,अवलम्बन करे।

 यज्ञादि कर्मों की कर्तव्यता को दर्शाने के पश्चात् भगवान् आगे कहते हैं

नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।

मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः।।18.7।।

।।18.7।। नियत कर्म का त्याग उचित नहीं है; मोहवश उसका त्याग करना "तामस त्याग" कहा गया है।।

नियत अर्थात् कर्तव्य कर्मों का त्याग अत्यन्त निम्नस्तर का तामस त्याग माना गया है। नित्य और नैमित्तक कर्मों के सम्मिलित रूप को ही नियत कर्म कहते हैं। जब तक मनुष्य अपने परिवार , समाज , राष्ट्र के एक सदस्य के रूप में जीवन यापन करता है तब तक उसे वह समाज सुरक्षा तथा उन्नति का लाभ भी प्रदान करता है।

 अत हिन्दू नीति के अनुसार मनुष्य को अपने कर्तव्यों को त्यागने का कोई अधिकार नहीं है। यदि कोई व्यक्ति अज्ञानवश अपने नैतिक कर्तव्यों का त्याग करता है तब भी वह क्षम्य नहीं है।जैसे संविधान के और भौतिक जगत् के प्राकृतिक नियमों के पालन के संबंध में नियम का अज्ञान क्षम्य नहीं माना जाता  वैसे ही आध्यात्मिक क्षेत्र में भी यही नियम लागू होता है। 

अज्ञान और अविवेक के कारण यदि कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य पालन के द्वारा समाज सेवा नहीं करता है तो उसका यह त्याग मूढ़ अर्थात् तामसिक त्याग है।

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।

स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्।।18.8।।

।।18.8।। जो मनुष्य, कर्म को दु:ख समझकर शारीरिक कष्ट के भय से त्याग देता है, वह पुरुष उस राजसिक त्याग को करके कदापि त्याग के फल को प्राप्त नहीं होता है।।

।।18.8।। यदि कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य कर्म को दुखदायक समझकर कायाक्लेश के भय से त्याग दे तो उसका त्याग राजस कहा जायेगा। इसका अभिप्राय यह है कि यदि कर्तव्य कर्म दुखदायक और थकाने वाले न हों , तो रजोगुणी पुरुष उन्हें करने में तत्पर रहेगा। परन्तु कर्मशील पुरुष होकर जो अपनी व्यक्तिगत सुखसुविधाओं का त्याग नहीं कर सकता उसे श्रेष्ठ और साहसी पुरुष कदापि नहीं कहा जा सकता। 

ऐसे कर्मों का कोई विशेष पुरस्कार नहीं मिलता। भगवान् तो कहते हैं वह अपने त्याग का कोई फल प्राप्त नहीं करता है। वस्तुत अपने कर्तव्यों का पालन ही महानतम त्याग है। और विशेषत तब वह और भी अधिक श्रेष्ठ बन जाता है जब मनुष्य को अपनी शारीरिक सुख सुविधाओं का भी त्याग करना पड़ता है।  

स्वयं अर्जुन भी युद्ध करने में संकोच करके अपने कर्तव्य से विमुख हो रहा था। इस प्रकार उसका त्याग राजस श्रेणी का ही कहा जा सकता था। वास्तविक त्याग हमें सदैव आत्माभिव्यक्ति के विशालतर क्षेत्र में पहुँचाता है।  जहाँ हम श्रेष्ठतर दिव्य आनन्द का अनुभव कर सकते हैं। 

त्याग के द्वारा ही एक कली खिलकर फूल बन जाती है और वह फूल अपनी कोमल पंखुड़ियों और मनमोहक सुगन्ध का त्याग कर ही फल के सम्पन्न पद (जीवन-पुष्प का प्रस्फुटन) को प्राप्त होता हैं।

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।

सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः।।18.9।।

।।18.9।। हे अर्जुन ! "कर्म करना कर्तव्य है" ऐसा समझकर जो नियत कर्म आसक्ति और फल को त्यागकर किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है।।

।।18.9।। सात्त्विक पुरुष इस भावना से कर्म करते हैं कि नियत कर्मों का पालन करना कर्तव्य है और उनका त्याग करना अत्यन्त अपमान जनक एवं लज्जास्पद कार्य है। कर्तव्य के त्याग को वे अपनी मृत्यु ही मानते हैं। ऐसे अनुप्राणित पुरुषों का त्याग सात्त्विक कहलाता है।

कर्मों में कुछ अपरिहार्य प्रतिबन्ध होते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण का उपदेश केवल इतना ही है कि हमको इन प्रतिबन्धों के बिना अपने कर्म करते रहना चाहिए। अभिप्राय यह है कि कर्म फल से आसक्ति होने पर ही वह कर्म हमें बन्धन में बद्ध कर सकता है अन्यथा नहीं। अत वास्तविक त्याग फलासक्ति का होना चाहिए कर्मों का नहीं

 इसीलिए आसक्ति रहित कर्तव्यों के पालन को यहाँ सात्विक त्याग कहा गया है। भगवान् के उपदेशानुसार अपने मन में स्थित स्वार्थ, कामना। आसक्ति आदि का त्याग ही यथार्थ त्याग है जिसके द्वारा हमें अपने परमानन्द स्वरूप की प्राप्ति होती है। 

यह त्याग कुछ ऐसा ही है जैसे हम अन्न को ग्रहण कर क्षुधा का त्याग करते हैं अहंकार और स्वार्थ का त्याग करके कर्तव्यों के पालन से मनुष्य अपनी वासनाओं का क्षय करता है और आन्तरिक शुद्धि को प्राप्त करता है। इस प्रकार त्याग तो मनुष्य को और अधिक शक्तिशाली और कार्यकुशल बना देता है। 

किस प्रकार यह सात्त्विक पुरुष आत्मानुभव को प्राप्त करता है सुनो

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।

त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः।।18.10।।

।।18.10।। जो पुरुष अकुशल (अशुभ) कर्म से द्वेष नहीं करता और कुशल (शुभ) कर्म में आसक्त नहीं होता, वह सत्त्वगुण से सम्पन्न पुरुष संशयरहित, मेधावी (ज्ञानी) और त्यागी है।।

।।18.10।। पूर्व श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण ने यह कहा था कि सात्त्विक पुरुष अपने नियत कर्मों को केवल कर्तव्य समझकर फलासक्ति को त्यागकर करता है। प्रथम दृष्टि में सामान्य पुरुष को त्याग का यह सिद्धांत असंभव ही प्रतीत होगा। संभवत अर्जुन के मुख पर कुछ इसी प्रकार के आश्चर्य भाव को देखकर भगवान् श्रीकृष्ण इस श्लोक में सात्त्विक पुरुष का और अधिक स्पष्ट चित्रण करते हैं। 

सामान्य अज्ञानी जन अतिरेकी स्वभाव के होते हैं। वे जगत् को यथार्थ रूप में कभी नहीं देखते। जगत् की वस्तुओं को वे अपने राग- द्वेष से रंजित दृष्टि से देखते हैं। तत्पश्चात् वे अपनी प्रिय वस्तु को पाने का प्रयत्न करते हैं और अप्रिय को त्यागने के लिए परिश्रम करते हैं। 

इसके लिए वे शुभा-शुभ कर्मों की चिन्ता नहीं करते। प्रिय वस्तु को प्राप्त कराने वाले कर्म में उनकी आसक्ति हो जाती है और अन्य कर्म से द्वेष। इसके परिणामस्वरूप इष्ट की प्राप्ति पर उन्हें हर्षातिरेक होता है और अनिष्ट की प्राप्ति में वे विषाद के गर्त में गिर जाते हैं। ऐसे लोगों के अन्तकरण में काम,  क्रोध ईर्ष्या आदि अवगुणों का स्थायी निवास होता है। यदाकदा इनमें से कोई व्यक्ति धर्माचरण में प्रवृत्त भी होता है तो अपने अतिरेकी स्वभाव के कारण धार्मिक कार्य में आसक्त हो जाता है और अन्य लोगों को पतित समझकर उन्हें हेय दृष्टि से देखता है।  

परन्तु सत्त्वगुणी पुरुष उपर्युक्त समस्त अवगुणों से मुक्त होता है। इसका कारण उसकी विकसित विवेक शक्ति है। आत्मानात्माविवेक के द्वारा वह यह भलीभांति जानता है कि शरीर, इन्द्रियाँ,  मन और बुद्धि ये सब अनात्मा हैं, तथा जन्ममरण, क्षुधातृषा और शोक-मोह ये सब इनके ही धर्म हैं।  न कि इन सब को प्रकाशित करने वाले साक्षी आत्मा के। इस ज्ञान के कारण वह अनात्म उपाधियों से तादात्म्य नहीं करता। इसी को यहाँ इस प्रकार कहा गया है कि वह अशुभ से द्वेष और शुभ से राग नहीं करता है। ऐसा पुरुष ही वास्तव में सुशिक्षित एवं सुसंस्कृत कहा जाता है। अन्य अविवेकी लोग तो शुष्क पर्ण के समान वायु की गति और दिशा के साथ इतस्तत भटकते रहते हैं। विवेकी पुरुष अपने मन का साक्षी बनकर रहता है जबकि अविवेकी लोग त्याग के अभाव में अपने मन की वृत्तियों के साथ तादात्म्य करके दुःख भोगते रहते हैं।

किसी भी वस्तु के यथार्थ स्वरूप को समझने तथा मिथ्या का त्याग करने के लिए अपने नित्य और पूर्ण स्वरूप का बोध आवश्यक है। वस्तुओं को समझने तथा युक्तियुक्त विचार करने की बुद्धि की इस क्षमता को मेधा शक्ति कहते हैं। केवल इतना ही नहीं वरन् प्राप्त ज्ञान को धारण एवं आवश्यकतानुसार स्मरण करने की क्षमता भी मेधा ही है। इस शक्ति से सम्पन्न पुरुष मेधावी कहा जाता है। 

ऐसे मेधावी पुरुष को निम्नलिखित तत्त्वों का स्पष्टत ज्ञान होता है (1) अपना कर्मक्षेत्र (2) वे उपाधियां जिनके द्वारा वह जगत् से सम्पर्क करता है (3) अपना शुद्ध आनन्द स्वरूप और (4) जगत् से अपना संबंध। 

यह मेधावी पुरुष संशय रहित (छिन्न संशय) होता है। क्योंकि वस्तु के अपूर्ण ज्ञान से ही संशय उत्पन्न हो सकता है अन्यथा नहीं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि ऐसे सात्त्विक त्यागी पुरुष जगत् में विरले ही होते हैं। बहुसंख्यक लोग तो अपनी देहादि उपाधियों के साथ तादात्म्य स्थापित करके स्वयं को कर्म का कर्ता मानते हैं।  

और तब उन्हें कर्मफल भोगने के लिए बाध्य होना ही पड़ता है। जो अज्ञानी पुरुष कर्तृत्व के अभिमान तथा देहासक्ति को त्याग नहीं पाता है, उसको कम से कम कर्म फल त्याग करना चाहिए। 

भगवान् कहते हैं

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्।

भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्।।18.12।।

।।18.12।। कर्मों के शुभ, अशुभ और मिश्र ये त्रिविध फल केवल अत्यागी जनों को मरण के पश्चात् भी प्राप्त होते हैं; परन्तु संन्यासी पुरुषों को कदापि नहीं।।

।।18.12।। इसके पूर्व त्रिविध त्याग का वर्णन किया गया था और अब यहाँ उनके त्रिविध फलों का वर्णन किया जा रहा है। मनुष्य की इच्छा का प्रक्षेपण बाह्य जगत् में भी होता है, उसे कर्म कहते हैं। 

और प्रत्येक कर्म कर्ता की मनस्थिति तथा उसके उद्देश्य के अनुसार अपना संस्कार उस कर्ता के अन्तकरण में अंकित करता है। मानव मन का स्वभाव कर्मों को दोहराने का है। भावी विचार , भूतकाल के विचार चिन्हों का ही अनुकरण करते हैं। इस प्रकार कर्म से वासनायें उत्पन्न होती हैं।  और फिर जगत् की घटनाओं के साथ इन वासनाओं के अनुसार हमारी प्रतिक्रियायें होती हैं। 

दर्शनशास्त्र में कर्मफल से तात्पर्य केवल लौकिक फल से ही न होकर हमारे अन्तकरण में अंकित होने वाले कर्मों के संस्कारों से भी है। ये कर्मफल यहाँ त्रिविध बताये गये हैं (1) इष्ट अर्थात् शुभ कल्याणकारी (2) अनिष्ट अर्थात् अशुभ अनर्थकारी और (3) मिश्र अर्थात् शुभाशुभ का मिश्ररूप। 

काल के सतत् प्रवाह में , वर्तमान काल निकट भविष्य को निर्धारित करता है। इसलिए स्पष्ट है कि विभिन्न संरचनाओं वाली हमारी वासनायें ही निकट भविष्य की घटनाओं के प्रति हमारी प्रतिक्रियाओं को निर्धारित करेंगी। यदि इसी सिद्धांत को हम अपने वर्तमान देह के मरण के क्षण तक आगे बढ़ायें ; तो यह तथ्य स्पष्ट हो जायेगा कि मरणोपरान्त का हमारा देह ,तथा जन्म , देश आदि का निर्धारण उस समय की हमारी वासनाओं के अनुरूप ही होगा। यही सनातन धर्म में प्रतिपादित पुनर्जन्म का सिद्धांत है।

शुभ कर्मों के फल उच्चलोक का सुख है और अशुभ कर्मों का फल अशुभ अर्थात् निम्नस्तर का दुखपूर्ण पशु जीवन है। शुभाशुभ के मिश्रण के फलस्वरूप मनुष्य देह की प्राप्ति होती है। इस देह में रहते हुए हम अपने बन्धनों को और अधिक दृढ़ भी कर सकते हैं और उन बन्धनों,  से पूर्ण मुक्ति भी प्राप्त कर सकते हैं। अत लक्ष्य का निर्धारण हमें ही करना है।

 निसन्देह सभी मनुष्यों के हृदय में सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्ति का आह्वान होता रहता है? परन्तु उसी हृदय में निवास कर रहे अवगुणरूपी पशु भी भौंकते, चीखते,  पुकारते और गर्जना करते रहते हैं। वे हमें भ्रमित कर अपने लक्ष्य से दूर ले जाते हैं। यदि मनुष्य अपने श्रेष्ठ आदर्श से तादात्म्य करता है तो उसके अवगुण शनै शनै समाप्त हो जाते हैं। और यदि वह उपाधियों के साथ तथा विषयों में आसक्त होता है तो उसके अवगुण निरन्तर प्रवृद्ध ही होते जाते हैं जो उसके दिव्य स्वरूप को आच्छादित करते हैं। 

संक्षेप में उच्च और नीच के इस शक्ति परीक्षण में निर्णायक तत्त्व मनुष्य का अपना व्यक्तित्व (चरित्र) ही होता है। इस श्लोक में कथित त्रिविध फलों से पूर्ण मुक्ति पाने के लिए साधक को अपने त्रिगुणातीत आत्मस्वरूप का बोध प्राप्त करना चाहिए। 

त्याग और संन्यास के सूक्ष्म भेद को यहाँ स्पष्ट किया गया है। त्याग का अर्थ है? त्रिगुणों से प्रभावित मन की वृत्तियों के साथ होने वाले तादात्म्य का प्रयत्नपूर्वक त्याग तथा संन्यास का अर्थ है उस अहंकार का ही त्याग जो शुभअशुभ कर्मों का कर्ता तथा इष्टानिष्टादि फलों का भोक्ता बनता है। 

सम्पूर्ण गीता में मनुष्य के व्यक्तित्व के पुनर्गठन के सिद्धांत एवं साधनाओं का अत्यन्त सुन्दर और विस्तृत विवेचन किया गया है। उसका सारांश यह है कि 

(1) सर्वप्रथम अहंकार और स्वार्थ का त्याग कर , अर्थात मन और इन्द्रियों से अनासक्त होकर,   ईश्वरार्पण की भावना से अपने कर्तव्य का पालन करना।  

(2) इस प्रकार चित्त शुद्धि, अर्थात इन्द्रियों और मन में आसक्त मूढ़बुद्धि को आत्मनोन्मुखी करके शुद्ध-बुद्धि द्वारा शास्त्र ( वेदान्त प्रमाण) और गुरु वाक्य के अनुरूप आत्मस्वरूप (इष्टदेव)  का श्रवण एवं मनन करना और 

(3) तत्पश्चात् आत्मा के निदिध्यासन द्वारा आत्मसाक्षात्कार करके उसी सत्स्वरूप (सत्य-निष्ठा इष्टदेव) में निष्ठा प्राप्त करना। आत्मा और कुछ नहीं जो चैतन्य नित्य शाक्षी है, वही आत्मा है । 

 शुद्धबुद्धि  द्वारा चैतन्य स्वरूप आत्मानुभव में भवसागर सूख जाता है। (खण्डन -भव -बन्धन हो जाता है। (शुद्धबुद्धि या) आत्मा में कुछ बनने की क्रिया नहीं है। चैतन्य स्वरूप आत्मा (इष्टदेव) इन्द्रिय और मन की वासनाओं से सदा अनासक्त रहता है। 

अब आगामी श्लोकों में कर्म के स्वरूप का विवेचन किया जा रहा है

पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।

सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्।।18.13।।

।।18.13।। हे महाबाहो ! समस्त कर्मों की सिद्धि के लिए ये पांच कारण सांख्य सिद्धांत में कहे गये हैं, जिनको तुम मुझसे भलीभांति जानो।।

 त्रिविध त्याग के सन्दर्भ में भगवान् श्रीकृष्ण ने निरहंकार और निसंग - अनासक्त भाव से कर्म करने वाले पुरुष को सात्विक त्यागी कहा था। अत स्वाभाविक ही है कि अर्जुन के मन में कर्म के स्वरूप को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है। इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण प्रस्तुत खण्ड में  कर्म के स्थूल रूप तथा प्रेरणा उद्देश्य आदि सूक्ष्म स्वरूप का भी वर्णन करते हैं। 

किसी भी लौकिक अथवा आध्यात्मिक कर्म को सम्पादित करने के लिए पाँच कारणों की अपेक्षा होती है। ये मानों कर्म के अंग हैं  जिनके बिना कर्म की सिद्धि नहीं हो सकती। यदि मनुष्य अपने कर्मों को अनुशासित और सुनियोजित कर आन्तरिक सांस्कृतिक विकास को सम्पादित करना चाहता हो , (चरित्र-निर्माण और जीवनगठन द्वारा Be and Make जैसा निष्काम कर्म में)  तो उसे अत्याधिक साहस, प्रयोजन का सातत्य आत्मविश्वास तथा बौद्धिक क्षमता की आवश्यकता होती है। इसलिए भगवान् यहाँ अर्जुन को महाबाहो के नाम से सम्बोधित कर उसकी शूरवीरता का आह्वान करते हैं।

 कृतान्त का अर्थ है कर्मों का अन्त। वेदान्त में उपदिष्ट आत्म ज्ञान के होने पर अहंकार का अन्त हो जाता है और उसी के साथ उसके कर्मों की समाप्ति हो जाती है। अहंकार का अन्त हो जाता है -इसलिए वेदान्त का विशेषण कृतान्त कहा गया हैं। अगले श्लोक में उन पाँच कारणों को बताते हैं

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।

विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।18.14।।

।।18.14।। अधिष्ठान (शरीर), कर्ता ,विविध करण (इन्द्रियादि) ,विविध और पृथक्-पृथक् चेष्टाएं तथा पाँचवा हेतु दैव है।।

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।

न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः।।18.15।।

।।18.15।। मनुष्य अपने शरीर, वाणी और मन से जो कोई न्याय्य (उचित) या विपरीत (अनुचित) कर्म करता है, उसके ये पाँच कारण ही हैं।।

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।

पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः।।18.16।।

।।18.16।। अब इस स्थिति में जो पुरुष असंस्कृत बुद्धि होने के कारण, केवल शुद्ध आत्मा को कर्ता समझता हैं, वह दुर्मति पुरुष (यथार्थ) नहीं देखता है।।

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।

हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते।।18.17।।

।।18.17।। जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है।।

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।

करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः।।18.18।।

।।18.18।। ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता ये त्रिविध कर्म प्रेरक हैं, और, करण, कर्म. कर्ता ये त्रिविध कर्म संग्रह हैं।।

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।

प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि।।18.19।।

।।18.19।। ज्ञान, कर्म और कर्ता भी गुणों के भेद से सांख्यशास्त्र (गुणसंख्याने) में त्रिविध ही कहे गये हैं; उनको भी तुम मुझ से यथावत् श्रवण करो।।

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।

अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्।।18.20।।

।।18.20।। जिस ज्ञान से मनुष्य, विभक्त रूप में स्थित समस्त भूतों में एक अविभक्त और अविनाशी (अव्यय) स्वरूप को देखता है, उस ज्ञान को तुम सात्त्विक जानो।।

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।

वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्।।18.21।।

।।18.21।। जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य समस्त भूतों में नाना भावों को पृथक्-पृथक् जानता है, उस ज्ञान को तुम राजस जानो।।

यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।

अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्।।18.22।।

।।18.22।। और जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य एक कार्य (शरीर) में ही आसक्त हो जाता है, मानो वह (कार्य ही) पूर्ण वस्तु हो तथा जो (ज्ञान) हेतुरहित (अयुक्तिक), तत्त्वार्थ से रहित तथा संकुचित (अल्प) है, वह (ज्ञान) तामस है।।

नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।

अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते।।18.23।।

नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।

अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते।।18.23।।

।।18.23।।जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमानसे रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा बिना राग-द्वेषके किया हुआ हो, वह सात्त्विक कहा जाता है।

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः।

क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्।।18.24।।

।।18.24।।परन्तु जो कर्म भोगोंको चाहनेवाले मनुष्यके द्वारा अहंकार अथवा परिश्रमपूर्वक किया जाता है, वह राजस कहा गया है।

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्।

मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते।।18.25।।

।।18.25।।जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्यको न देखकर मोहपूर्वक आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।

सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते।।18.26।।

।।18.26।।जो कर्ता रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकार है, वह सात्त्विक कहा जाता है

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।

हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः।।18.27।।

।।18.27।।जो कर्ता रागी, कर्मफलकी इच्छावाला, लोभी, हिंसाके स्वभाववाला, अशुद्ध और हर्षशोकसे युक्त है, वह राजस कहा गया है।

अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।

विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते।।18.28।।

।।18.28।।जो कर्ता असावधान, अशिक्षित, ऐंठ-अकड़वाला, जिद्दी, उपकारीका अपकार करनेवाला, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री है, वह तामस कहा जाता है।

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु।

प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय।।18.29।।

।।18.29।।हे धनञ्जय ! अब तू गुणोंके अनुसार बुद्धि और धृतिके भी तीन प्रकारके भेद अलग-अलगरूपसे सुन, जो कि मेरे द्वारा पूर्णरूपसे कहे जा रहे हैं।

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।

बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी।।18.30।।

।।18.30।। हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति, कार्य और अकार्य, भय और अभय तथा बन्ध और मोक्ष को तत्त्वत जानती है, वह बुद्धि सात्विकी है।।

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।

बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी।।18.30।।

।।18.30।। हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति, कार्य और अकार्य, भय और अभय तथा बन्ध और मोक्ष को तत्त्वत जानती है, वह बुद्धि सात्विकी है।।

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।

अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी।।18.31।।

।।18.31।।हे पार्थ ! मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्मको, कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है।

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता।

सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी।।18.32।।

।।18.32।।हे पृथानन्दन ! तमोगुणसे घिरी हुई जो बुद्धि अधर्मको धर्म और सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मान लेती है, वह तामसी है।

धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।

योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी।।18.33।।

।।18.33।।हे पार्थ ! समतासे युक्त जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है।

यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन।

प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी।।18.34।।

।।18.34।।हे पृथानन्दन अर्जुन ! फलकी इच्छावाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा धर्म, काम (भोग) और अर्थको अत्यन्त आसक्तिपूर्वक धारण करता है, वह धृति राजसी है।

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।

न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी।।18.35।।

।।18.35।।हे पार्थ ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख और घमण्डको भी नहीं छोड़ता, वह धृति तामसी है।

सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।

अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति।।18.36।।

।।18.36।।हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! अब तीन प्रकारके सुखको भी तुम मेरेसे सुनो। जिसमें अभ्याससे रमण होता है और जिससे दुःखोंका अन्त हो जाता है, ऐसा वह परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा होनेवाला जो सुख (सांसारिक आसक्तिके कारण) आरम्भमें विषकी तरह और परिणाममें अमृतकी तरह होता है, वह सुख सात्त्विक कहा गया है

यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।

तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्।।18.37।।

।।18.37।।हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! अब तीन प्रकारके सुखको भी तुम मेरेसे सुनो। जिसमें अभ्याससे रमण होता है और जिससे दुःखोंका अन्त हो जाता है, ऐसा वह परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा होनेवाला जो सुख (सांसारिक आसक्तिके कारण) आरम्भमें विषकी तरह और परिणाममें अमृतकी तरह होता है, वह सुख सात्त्विक कहा गया है

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।

परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्।।18.38।।

।।18.38।।जो सुख इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे आरम्भमें अमृतकी तरह और परिणाममें विषकी तरह होता है, वह सुख राजस कहा गया है।

यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।

निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्।।18.39।।

।।18.39।।निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न होनेवाला जो सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है, वह सुख तामस कहा गया है।

न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।

सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभि: स्यात्त्रिभिर्गुणै:।।18.40।।

।।18.40।।पृथ्वीमें या स्वर्गमें अथवा देवताओंमें तथा इनके सिवाय और कहीं भी वह ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो।

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप।

कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः।।18.41।।

।।18.41।।हे परंतप ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके कर्म स्वभावसे उत्पन्न हुए तीनों गुणोंके द्वारा विभक्त किये गये हैं।

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप।

कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः।।18.41।।

।।18.41।।हे परंतप ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके कर्म स्वभावसे उत्पन्न हुए तीनों गुणोंके द्वारा विभक्त किये गये हैं।

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।

ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।।18.42।।

।।18.42।।मनका निग्रह करना इन्द्रियोंको वशमें करना; धर्मपालनके लिये कष्ट सहना; बाहर-भीतरसे शुद्ध रहना; दूसरोंके अपराधको क्षमा करना; शरीर, मन आदिमें सरलता रखना; वेद, शास्त्र आदिका ज्ञान होना; यज्ञविधिको अनुभवमें लाना; और परमात्मा, वेद आदिमें आस्तिक भाव रखना -- ये सब-के-सब ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।

दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।।18.43।।

।।18.43।।शूरवीरता, तेज, धैर्य, प्रजाके संचालन आदिकी विशेष चतुरता, युद्धमें कभी पीठ न दिखाना, दान करना और शासन करनेका भाव -- ये सबकेसब क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म हैं

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।

परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्।।18.44।।

।।18.44।।खेती करना, गायोंकी रक्षा करना और शुद्ध व्यापार करना -- ये सब-के-सब वैश्यके स्वाभाविक कर्म हैं, तथा चारों वर्णोंकी सेवा करना शूद्रका भी स्वाभाविक कर्म है

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।

स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।18.45।।

।।18.45।।अपने-अपने कर्ममें तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि-(परमात्मा-)को प्राप्त कर लेता है। अपने कर्ममें लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धिको प्राप्त होता है? उस प्रकारको तू मेरेसे सुन।

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।।18.46।।

।।18.46।।जिस परमात्मा (आत्मा , ईश्वर , भगवान , इष्टदेव) से सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।

स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।18.47।।

।।18.47।। अच्छी तरह से अनुष्ठान किये हुए परधर्म से गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता।

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।

सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।।18.48।।

।।18.48।।हे कुन्तीनन्दन ! दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँसे अग्निकी तरह किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं।

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।

नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति।।18.49।।

।।18.49।।जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है, जिसने शरीर, मन और इन्द्रियों को वशमें कर रखा है, जो स्पृहारहित है, वह मनुष्य सांख्ययोगके द्वारा नैष्कर्म्य-सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।

समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा।।18.50।।

।।18.50।।हे कौन्तेय ! सिद्धि-(अन्तःकरणकी शुद्धि-) को प्राप्त हुआ साधक ब्रह्मको, जो कि ज्ञानकी परा निष्ठा है, जिस प्रकारसे प्राप्त होता है, उस प्रकारको तुम मुझसे संक्षेपमें ही समझो।

बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च।

शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च।।18.51।।

।।18.51।।जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः।

ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः।।18.52।।

।।18.52।।जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, 

शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।??????

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।

विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते।।18.53।।

।।18.53।।जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला,

 साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।????

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।

समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्।।18.54।।

।।18.54।।वह ब्रह्मभूत-अवस्थाको प्राप्त प्रसन्न मनवाला साधक न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी इच्छा करता है। ऐसा सम्पूर्ण प्राणियोंमें समभाववाला साधक मेरी पराभक्तिको प्राप्त हो जाता है।

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।

ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्।।18.55।।

।।18.55।।उस पराभक्तिसे मेरेको, मैं जितना हूँ और जो हूँ -- इसको तत्त्वसे जान लेता है तथा मेरेको तत्त्वसे जानकर फिर तत्काल मेरेमें प्रविष्ट हो जाता है

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।

मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्।।18.56।।

।।18.56।।मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदको प्राप्त हो जाता है।

चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।

बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव।।18.57।।

।।18.57।।चित्तसे सम्पूर्ण कर्म मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर तथा समताका आश्रय लेकर निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो जा

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।

अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि।।18.58।

।।18.58।।मेरेमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा और यदि तू अहंकारके कारण मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा

यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।

मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति।।18.59।।

।।18.59।।अहंकारका आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तेरा यह निश्चय मिथ्या (झूठा) है; क्योंकि तेरी क्षात्र-प्रकृति तेरेको युद्धमें लगा देगी

स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।

कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्।।18.60।।

।।18.60।।हे कुन्तीनन्दन ! अपने स्वभावजन्य कर्मसे बँधा हुआ तू मोहके कारण जो नहीं करना चाहता, उसको तू (क्षात्र-प्रकृतिके) परवश होकर करेगा

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।18.61।।

।।18.61।।हे अर्जुन ! ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें रहता है और अपनी मायासे शरीररूपी यन्त्रपर आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियोंको (उनके स्वभावके अनुसार) भ्रमण कराता रहता है।

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।18.62।।

।।18.62।।हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! तू सर्वभावसे उस ईश्वरकी ही शरणमें चला जा। उसकी कृपासे तू परमशान्ति-(संसारसे सर्वथा उपरति-) को और अविनाशी परमपदको प्राप्त हो जायगा।

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।

विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।।18.63।।

।।18.63।।यह गुह्यसे भी गुह्यतर (शरणागतिरूप) ज्ञान मैंने तुझे कह दिया। अब तू इसपर अच्छी तरहसे विचार करके जैसा चाहता है, वैसा कर।

सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः।

इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।।18.64।।

।।18.64।।सबसे अत्यन्त गोपनीय वचन तू फिर मेरेसे सुन। तू मेरा अत्यन्त प्रिय है, इसलिये मैं तेरे हितकी बात कहूँगा।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।

मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।।18.65।।

।।18.65।।तू मेरा भक्त हो जा, मेरेमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर। ऐसा करनेसे तू मेरेको ही प्राप्त हो जायगा -- यह मैं तेरे सामने सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।18.66।।

।।18.66।।सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर।

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।

न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति।।18.67।।

।।18.67।।यह सर्वगुह्यतम वचन अतपस्वीको मत कहना; अभक्तको कभी मत कहना; जो सुनना नहीं चाहता, उसको मत कहना; और जो मेरेमें दोषदृष्टि करता है, उससे भी मत कहना

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।

भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय:।।18.68।।

।।18.68।।मेरेमें पराभक्ति करके जो इस परम गोपनीय संवाद-(गीता-ग्रन्थ) को मेरे भक्तोंमें कहेगा, वह मुझे ही प्राप्त होगा -- इसमें कोई सन्देह नहीं है

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम:।

भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि।।18.69।।

।।18.69।।उसके समान मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भी नहीं है और इस भूमण्डलपर उसके समान मेरा दूसरा कोई प्रियतर होगा भी नहीं।

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।

ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः।।18.70।।

।।18.70।।जो मनुष्य हम दोनोंके इस धर्ममय संवादका अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित होऊँगा -- ऐसा मेरा मत है

श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः।

सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्।।18.71।।

।।18.71।।श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित जो मनुष्य इस गीता-ग्रन्थको सुन भी लेगा, वह भी सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त हो जायगा।

कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।

कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय।।18.72।।

।।18.72।।हे पृथानन्दन ! क्या तुमने एकाग्र-चित्तसे इसको सुना ?और हे धनञ्जय ! क्या तुम्हारा अज्ञानसे उत्पन्न मोह नष्ट हुआ ??????????

अर्जुन उवाच

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।

स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।।18.73।।

।।18.73।।अर्जुन बोले -- हे अच्युत ! आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया है और स्मृति प्राप्त हो गयी है। मैं सन्देहरहित होकर स्थित हूँ। अब मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा

सञ्जय उवाच

इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।

संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्।।18.74।।

।।18.74।।सञ्जय बोले -- इस प्रकार मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुनका यह रोमाञ्चित करनेवाला अद्भुत संवाद सुना

व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।

योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्।।18.75।।

।।18.75।।व्यासजीकी कृपासे मैंने स्वयं इस परम गोपनीय योग (गीता-ग्रन्थ) को कहते हुए साक्षात् योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णसे सुना है।

राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।

केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः।।18.76।।

।।18.76।।हे राजन् ! भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके इस पवित्र और अद्भुत संवादको याद कर-करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।

विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः।।18.77।।

।।18.77।।हे राजन् ! भगवान् श्रीकृष्णके उस अत्यन्त अद्भुत विराट्रूपको याद कर-करके मेरेको बड़ा भारी आश्चर्य हो रहा है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।18.78।

।।18.78।।जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीवधनुषधारी अर्जुन हैं, वहाँ ही श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है -- ऐसा मेरा मत है।

======================

 November 14, 2012 : 'चरित्र निर्माण की प्रक्रिया '(চরিত্র গঠনের উপায়)] (अध्याय-6, जीवन-गठन की निर्माण-सामग्री ) स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [35]

=============================