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बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

⚜️️🔱2.सांख्य योग : विश्लेषणात्मक ज्ञान का योग ⚜️️🔱

द्वितीय अध्याय का सारामृत 

 72 श्लोक वाले इस अध्याय का नाम 'सांख्ययोग ' है। सांख्य शब्द का अर्थ है - 'विश्लेषणात्मक ज्ञान ' (Analytical knowledge) और योग शब्द युज धातु से बना है जिसका अर्थ है जोड़ना । स्वयं को (अर्थात देहाध्यास और जिवाध्यास में फँसी 'मूढ़बुद्धि' 'सम्मोहित मति' को, सिद्धांत 'जैसी मति वैसी गति ! इसलिए) वर्तमान की स्थिति से ऊँचा उठाकर  'आत्मा' से या किसी श्रेष्ठ एवं पूर्ण आदर्श से (ह्रदय में विद्यमान भगवान गदाधर श्री विष्णुपद श्रीहरि से) जुड़ जाने के लिये साधक जो कर्म या प्रयत्न करता है उसे योग कहते हैं। इस अध्याय में 'ज्ञान' और 'कर्म' पर सम्मिलित रूप से और पृथक रूप से चर्चा होने के कारण इस अध्याय का नाम 'सांख्ययोग' रखा गया है।    

 अर्जुन का विषाद दूर करने के लिए इस अध्याय का आरम्भ हुआ है। इसमें प्रधानतया -शरीर, इन्द्रिय , मन, बुद्धि से श्रेष्ठ आत्मा के तत्त्वज्ञान की ही चर्चा हुई है। देहाध्यास और जिवाध्यास को दूर करने के लिए भगवान ने अर्जुन को पहले मनुष्य की विशेष योग्यता 'नित्य-अनित्य विवेक' को जाग्रत करने का उपदेश दिया है। शरीर अनित्य है और आत्मा जन्म-मृत्यु -रहित तथा नित्य है। इस विवेक-प्रयोग के सिद्धान्त को समझाने के लिए भगवान गदाधर श्रीविष्णुपद श्रीहरि ने भगवान भाष्यकार श्रीशंकराचार्य जी द्वारा दिए गए विवेक की परिभाषा - "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः" को समझाने के लिए श्री भगवान गदाधर ने आत्मतत्व का उपदेश दिया है। इसके बाद उन्होंने अर्जुन को समझाया कि स्वधर्म-पालन करना मनुष्य का अवश्यमेव कर्तव्य है। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्मयोग पर भी कुछ उपदेश दिए हैं। 

 वे अर्जुन को फल की आसक्ति के बिना निष्काम कर्म करने की प्रेरणा देते हैं। फल की कामना से रहित कर्म करने के विज्ञान को वे 'बुद्धियोग' या 'बुद्धि का योग' नाम देते हैं। बुद्धि का प्रयोग मन को देह, इन्द्रिय विषय-भोगों में सुख खोजने में बुद्धि की लालसा को रोक कर आत्मा या भगवान के साथ सम्बन्ध बनाने के लिए करना चाहिए। इस भावना के साथ सम्पन्न किए गए कर्म 'बांधने वाले' से 'मुक्त करने वाले' में परिवर्तित हो जाते हैं। 

इसके पश्चात् अर्जुन उन मनुष्यों के लक्षणों को जानना चाहता है, जिनकी बुद्धि आत्मा में प्रतिष्ठित हो गयी हो , या आत्मनिष्ठ बुद्धि वाले स्थितप्रज्ञ मनुष्य के लक्षणों को जानना चाहता है। श्रीकृष्ण उसे बताते हैं कि किस प्रकार से स्थितप्रज्ञ होकर मनुष्य आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त हो जाता है। निष्काम कर्म, निष्काम भक्ति और ज्ञान के सम्मिलन के फलस्वरूप ब्रह्मप्राप्ति और स्थितप्रज्ञ-अवस्था होती है। इसीको ब्रह्मप्राप्ति (ब्राह्मी स्थिति, ब्रह्माध्यास ??) स्थितप्रज्ञ -अवस्था कहते है।   और सभी परिस्थितियों में उसकी इन्द्रियाँ उसके वश में हो जाती हैं और उसका मन सदा के लिए भगवान की भक्ति में तल्लीन हो जाता है। इस अवस्था में स्थित होकर मनुष्य निष्काम भाव अपने वर्ण और आश्रम कर्म करके अन्त में ब्रह्मनिर्वाण या मोक्ष प्राप्त करते हैं। यमराज नचिकेता को बताते हैं कि 'ॐ' ही वह सर्वोच्च ब्रह्म या परम लक्ष्य है, जिसे जानकर ही सब कुछ जान लिया जाता है और अमरता मिलती है। 

"सर्वे वेदा यत् पदम् आमनन्ति,

तपांसि सर्वाणि च यद् वदन्ति।

यद् ईच्छन्तो  ब्रह्मचर्यं चरन्ति,  

तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि - ॐ इति येतत्‌ ॥ 

(कठोपनिषद 1.2.15)  जो बताता है कि सभी वेदों का परम लक्ष्य, सभी तपस्याओं का अंतिम फल और ब्रह्मचर्य का उद्देश्य 'ॐ' (ओम्) ही है। 'उस पद' की प्राप्ति' [भगवान गदाधर श्री विष्णुपद श्रीहरि की प्राप्ति ] ही ब्राह्मी स्थिति या मोक्ष-प्राप्ति है। समस्त गीता में विशेष रूप से चर्चित इस ब्रह्मस्वरूपता की प्राप्ति ही इस अध्याय का मूल संगीत है।  

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February 5, 2026 : 

।।2.1।। संजय ने कहा -- इस प्रकार करुणा और विषाद से अभिभूत,  अश्रुपूरित नेत्रों वाले आकुल अर्जुन से मधुसूदन ने यह वाक्य कहा।।

अर्जुन की विषादावस्था का वर्णन करने के साथ ही संजय हमें यह भी संकेत करता है कि उसका आन्तरिक व्यक्तित्व भग्न हो गया था। और अर्जुन के व्यक्तित्व  में गहरी दरार पड़ गयी थी। अपने समय का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी होकर भी वह किसी सामान्य स्त्री के समान रुदन कर रहा था। 

श्री भगवानुवाच

 कुत: त्वा कश्मलम् इदम् विषमे समुपस्थितम्। 

 अनार्य जुष्टम् सद् अस्वय॑म् अकीर्तिकरम् अर्जुन।। (2.2)   

।।2.2।। श्री भगवान् ने कहा -- हे अर्जुन ! तुमको इस विषम स्थल में यह मोह कहाँ से उत्पन्न हुआ?  यह आर्य आचरण के विपरीत न तो स्वर्ग प्राप्ति का साधन ही है और न कीर्ति कराने वाला ही है।।

यहाँ भगवान् अर्जुन के आचरण को अनार्य कहते हैं।  आर्य पुरुष जीवन के उच्च आदर्शों पवित्रता और गरिमा के आह्वान के प्रति सदैव जागरूक और प्रयत्नशील रहते हैं । एक सच्चे आर्य अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष का स्वभाव तो यह होता है कि जीवन में आने वाली किसी भी परिस्थिति में अपने मनसंयम से विचलित न होकर उन परिस्थितियों का कुशलता से सामना करता है,  और उनको अपने अनुकूल बना लेता है। 

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।

क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।2.3।।

।।2.3।। हे पार्थ क्लीव (कायर) मत बनो। यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है, हे ! परंतप हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ।

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।

क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।2.3।।

।।2.3।। हे पार्थ क्लीव (कायर) मत बनो। यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है, हे ! परंतप हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ।।

ज्ञान के मार्ग पर सफलतापूर्वक कदम रखने के लिए उच्च आत्मबल और नैतिकता का होना आवश्यक है। जिसके लिए किसी मनुष्य को आशावान, उमंगी और ऊर्जावान बनकर आलस्य, स्वछन्दता की प्रवृत्ति, अज्ञान और आसक्ति जैसे दोषों पर विजय प्राप्त करना आवश्यक होता है। श्रीकृष्ण एक योग्य गुरु हैं और इसलिए अर्जुन को फटकारते हुए वे अब उसे परिस्थितियों का सामना करने के लिए प्रोत्साहित कर उसके आत्मबल को बढ़ाते हैं।

 [2.3 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.] 

अर्जुन उवाच

कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन।

इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन।।2.4।।

।।2.4।। अर्जुन ने कहा -- हे मधुसूदन ! मैं रणभूमि में किस प्रकार भीष्म और द्रोण के साथ बाणों से युद्ध करूँगा। हे अरिसूदन, वे दोनों ही पूजनीय हैं।।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि अर्जुन का मिथ्या अहंकार (देहाध्यास और जिवाध्यास )  ही उसकी मिथ्या धारणाओं और मूढ़बुद्धि होने का कारण था।

गुरूनहत्वा हि महानुभावान्

श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।

हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव

भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्।।2.5।।

।।2.5।। इन महानुभाव गुरुजनों को मारने से इस लोक में भिक्षा का अन्न भी ग्रहण करना अधिक कल्याण कारक है, क्योंकि गुरुजनों को मारकर मैं इस लोक में रक्तरंजित अर्थ और काम रूप भोगों को ही भोगूँगा।।

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो

यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।

यानेव हत्वा न जिजीविषाम 

स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः।।2.6।।

।।2.6।। हम नहीं जानते कि हमें क्या करना उचित है। हम यह भी नहीं जानते कि हम जीतेंगे, या वे हमको जीतेंगे, जिनको मारकर हम जीवित नहीं रहना चाहते वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने युद्ध के लिए खड़े हैं।।

हमारी पाँच इन्द्रियाँ है - एक स्पर्श इन्द्रिय त्वचा का स्थान पूरे शरीर में है, बाकी 4 इन्द्रिय रूप, रस , गंध , शब्द की इन्द्रियाँ शरीर के ऊपरी भाग में है।  हमारा मन ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा भिन्नभिन्न विषयों को ग्रहण कर उनको एक व्यवस्थित रूप में बुद्धि के समक्ष निर्णय के लिये प्रस्तुत करता है। बुद्धि अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर निर्णय देती है जिसे मन कमेन्द्रियों के द्वारा बाह्य जगत में व्यक्त करता है। हमारी जाग्रत अवस्था के प्रत्येक क्षण यह समस्त कार्यकलाप होता रहता है। अत्यधिक चिन्तातुर होने के कारण अर्जुन का देह, इन्द्रियाँ , मन (मिथ्या अहंकार M/F जीव भाव) मूढ़बुद्धि (देहाध्यास) द्वारा निर्देशित हो रहा था, वह शुद्ध या सारथि बुद्धि आत्मा (इष्टदेव) जुड़ा हुआ नहीं था। इस मोह का प्रभाव न केवल अर्जुन के मन (अहंकार) पर बल्कि उसकी बुद्धि पर भी पड़ा था।   

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः

पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः।

यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे

शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।।2.7।।

।।2.7।। करुणा के कलुष से अभिभूत और कर्तव्यपथ पर संभ्रमित हुआ मैं आपसे पूछता हूँ, कि मेरे लिये जो श्रेयष्कर हो, उसे आप निश्चय करके कहिये, क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ; शरण में आये मुझको आप उपदेश दीजिये।।

यहाँ अर्जुन शिष्यभाव से भगवान् की शरण में जाता है जो यह संकेत करता है कि अब वह उपदेश ग्रहण करने योग्य हो गया है। और अब वह भगवान् के उपदेश का पालन करेगा। 

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या

द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।

अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धम्

राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्।।2.8।।

।।2.8।। पृथ्वी पर निष्कण्टक समृद्ध राज्य को और देवताओं के स्वामित्व को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर कर सके।।

अब अर्जुन की स्थिति एक तीव्र मुमुक्ष के समान है जो मरणधर्मा शरीर (र्मत्य जीवन) की समस्त सीमाओं और बन्धनों से मुक्त हो जाने के लिये अधीर हो उठा है। अब आवश्यकता है केवल एक प्रामाणिक विचार की जो स्वयं भगवान हृषीकेश उसे गीता के दिव्य काव्य में देते हैं।

सञ्जय उवाच

एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।

न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह।।2.9।।

।।2.9।। संजय ने कहा -- इस प्रकार गुडाकेश परंतप अर्जुन भगवान् हृषीकेश से यह कहकर कि हे गोविन्द "मैं युद्ध नहीं करूँगा" चुप हो गया।।

संजय ने यहाँ अर्जुन को गुड़ाकेश  कह कर संबोधित किया गया है जिसका अर्थ है-'निद्रा पर विजय पाने वाला।' और  श्रीकृष्ण के लिए हृषीकेश अर्थात् 'मन और इन्द्रियों के स्वामी' शब्द का प्रयोग किया है। इसका शाब्दिक संकेत यह है कि जो मन और इन्द्रियों के स्वामी हैं, वे निश्चित रूप से अर्जुन को इस किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति से बाहर ले आएंगे।

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।

सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः।।2.10।

।।2.10।। इस प्रकार धर्म और अधर्म शुभ और अशुभ इन दो सेनाओं के संव्यूहन के मध्य अर्जुन (जीव देहाध्यास-रथी) पूर्ण रूप से अपने सारथी बुद्धि को भगवान् श्रीकृष्ण (सूक्ष्म विवेकवती बुद्धि, आत्मा , ईश्वर,परमात्मा) की शरण में आत्मसमर्पण करता है जो पाँच अश्वों (पंच ज्ञानेन्द्रियों) और मन रूपी लगाम के द्वारा चालित शरीर रूपी रथ (देह) अपने पूर्ण नियन्त्रण में रखते हैं

ऐसे दुखी और भ्रमित स्वयं को नश्वर देह समझने वाले , M/F देहाध्यासी  व्यक्ति जीव अर्जुन को श्रीकृष्ण सहास्य उसकी अन्तिम विजय का आश्वासन देने के साथ ही गीता के आत्ममुक्ति का आध्यात्मिक उपदेश भी करते हैं। जिसके ज्ञान से सदैव के लिये मनुष्य के शोक- मोह की निवृत्ति हो जाती है।

अपने अधूरे ज्ञान के कारण हम जिन परिस्थितियों का सामना करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं, उन्हें हम दोषी मानते हैं, दुःखी होते हुए उन पर खीझते हैं, उनसे दूर भागना चाहते हैं और उन्हें अपने दुर्भाग्य के लिए उत्तरदायी ठहराते हैं। किन्तु प्रबुद्ध आत्माएँ हमें अवगत कराती हैं कि भगवान की यह सृष्टि सभी प्रकार से पूर्ण है।  तथा शुभ और अशुभ परिस्थितियाँ हमारे सम्मुख दिव्य प्रयोजन हेतु उत्पन्न होती हैं। ये सब हमारे आध्यात्मिक उत्थान की व्यवस्था करती हैं ताकि हम पूर्णता को प्राप्त करने की (निःस्वार्थपरता को अभिव्यक्त करने की ?)अपनी यात्रा में आगे बढ़ सके। जो लोग इस रहस्य को समझते हैं, वे कभी कठिन परिस्थितियों से विचलित नहीं होते बल्कि दृढ़ता और शांति से इनका सामना करते हैं। 

शंकराचार्यजी अपने भाष्य में कहते हैं - " तस्माद्गीताशास्त्रे केवलादेव तत्त्वज्ञानान्मोक्षप्राप्तिः न कर्मसमुच्चितात् इति निश्चितोऽर्थः।भगवान् यही बात कहेंगे कि (योगी) अन्तःकरण की शुद्धि (चित्तशुद्धि) के लिये कर्म करते हैं। सुतरां गीताशास्त्र में निश्चय किया हुआ अर्थ यही है कि केवल तत्त्वज्ञान से  ही मुक्ति  होती है कर्म-सहित ज्ञान से नहीं




 




 


      


⚜️️🔱3.प्रारब्ध के चक्र को कैसे समझें ? ।। Yug-Purush।। How to understand the cycle of destiny? ⚜️️🔱

 3.प्रारब्ध के चक्र को कैसे समझें ? ।। Yug-Purush।। How to understand the cycle of destiny?


 कई बार बीज को देखकर भी यह पता नहीं चलता कि इस बीज में क्या छिपा हुआ है ? बीज को भी पता नहीं होता है , बीज को देखके दूसरे लोग भी नहीं जान सकते कि बिज में क्या छिपा हुआ है ? बचपन में मैं यमुना नदी में खड़े-खड़े जाप करता था। तब मुझे कुछ ज्ञान नहीं था , कुछ भी पता नहीं था। जैसे तुम्हारे बच्चे तुम्हें पूजा करते देखते हैं , तो वे भी आरती घुमाते हैं। वे भी पैर छूले ते हैं , मंदिर चले जाते हैं। ऐसे ही मैं भी कम बुद्धि वाला लड़का था। मुझे आता वाता कुछ नहीं था , पर सुना था कि भजन करना चाहिए, तप करना चाहिए (भगवान कृष्ण को भोग देना चाहिए , उनको प्रणाम करके सोना चाहिए) को तो करने लगे थे। कुछ अवतारी पुरुषों को छोड़कर बाकी सभी सामान्य साधक मेरी ही तरह के होते हैं। फिर गुरु महाराज (स्वामी विवेकानन्द) के विषय में सुना कि उनका दर्शन करने से आदमी तर जाता है।( दादा कहते थे - विवेक-दर्शन का अभ्यास करने से विवेक-स्रोत (source of wisdom) उद्घाटित हो जाता है!) तो तरने के चक्कर में फिर गुरुदेव के पास चले गए। तरने की जरूरत क्यों पड़ी ? ये भी भोन्दुपन के कारण। बचपन में सब चीजें बच्चा स्वीकार करता है। बचपन में आप को जब 'क' को मानना सिखाया गया था , तो क्या आप जानते थे कि 'क' को क ही मानना चाहिए ? क्या आप जानते थे - कि क , ख , ग ही क , ख , ग होता है ? नहीं जानते थे। जो कहा वो मान गए। बचपन में सबसे बड़ी अच्छाई है कि जो बड़े कहते हैं , घरवाले कहते हैं , सर्वोपरि माँ जो कहती हैं - जिनको अपना मानकर विश्वास करता है , वो जो कहती है , उसको मान लेता है। जाति -धर्म हमने कहने से माना। भगवान को प्रणाम करना हमने कहने से मानी। मैं और तुम कोई विशेष फर्क वाले नहीं हैं। मुझ्रे भी तुम अपनी तरह ही बुद्धू मानलो। या मैं अपनी तरह तुम्हें भी बुद्धू मानता हूँ। मैं अपने कोई ज्ञानी नहीं समझता , न तुम्हें ज्ञानी समझता हूँ। तरने की बात माननी पड़ी - कि हमने जानवरों को मारते देखा। सूअर को मारते देखा। मछली को मारते। दूध दूहने या , हल चलाते समय डंडे से पीटते। इक्के के घोड़े को देख कर इतना लगने लगा था कि इनको तकलीफ हो रही है। और घरवालों से, गाँव वालों से सुना था कि कर्मों का फल भोगना पड़ता है। बस इतनी सी बात थी , बच्चे थे मान गए। आप लोग तर्क करते होंगे , मेरे मन ने मान लिया कि अगर बुरा करेंगे तो हमको भी यही भोगना पड़ेगा (4:10) और जन्म आदि होते रहते हैं , जैसा करेंगे -वैसा भरेंगे। बचपन में ही यह बात मन में बैठ गयी। कि कुत्ता न बनें , मछली न बनें , गधा न बनें , घोड़ा न बनें। मारे न जाएं। बैल न बनें। बैल पर लाद दिया , चढ़ाई है। जीभ बाहर निकालता है , फिर भी उसे मारते हुए ले जाते हैं। ये हमने अपने आँखों से देखा था , वो बता दें। और जो सुनने से ठीक लगा वो बता दिया। बुरा काम न करें , तो भजन करने लगे। लेकिन जन्म पर जन्म लेंगे तो सुधार होता जायेगा। लेकिन मन तब शेखचिल्ली जैसा था , सोचने लगे जब जन्म पर जन्म लेते रहेंगे तो किसी जन्म में गड़बड़ी क्या नहीं होगी ? जब जन्म होगा तो हमसे पाप भी होगा। ऐसा तो मनमें बन गया था कि इस जन्म में पाप न करेंगे। लेकिन हर जन्म में क्या होगा ? ये तो नहीं जानते? ज्यादातर बड़े आदमी ही बुरा करते थे। बचपन में मैंने अनुमान लगाया जो (मुख्यमंत्री पुत्र, या धनी थे ) वे ज्यादा अत्याचार करते थे। जो ताकतवर थे ये ज्यादा अत्याचारी थे। तब लगा अच्छा काम करेंगे तो बड़े बनकर हमभी गड़बड़ करेंगे। तो दुदर्शा होगी , जिसका जन्म-मरण ही नहीं होता , वहाँ पहुँचने से ही बात बनेगी। वो कैसे होगा ? तो सुना की , जिसको भगवान मिल जाते हैं , उसको फिर जन्म-मरण के चक्कर में नहीं फँसना पड़ता। 

न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।15.6।।

जिनको परम धाम की प्राप्ति नहीं होती उनको आना-जाना पड़ता है। फिर सोचा भगवान कैसे मिलें ? तो सोंचा गुरु के मिलने से मिलते हैं। एक पुस्तक में पढ़ा गुरुदेव का नाम कि उनके दर्शन करें तो चित्त निर्मल हो जाता है , परमात्मा मिल जाता है। तो उनकी बातें सुनने चले गए। 
(विवेकानन्द जी से सुना कि गुरु ठोक-बजा कर करो, तो गुरु खोजने हरिद्वार चला गया। देवराहा बाबा से मिला। और वापस आकर गुरुदेव से दीक्षा लेने का फॉर्म भर दिया।)
 जब तुम्हें शादी की जरूरत थी तब तुमने यह कभी नहीं कहा कि विवाह पाखण्ड है , या बन्धन में बँधने जैसी बात है ? (6:33) फेरे लेने से , चक्कर लगाने से भी क्या कहीं शादी हो जाती है ? आपने भी चक्कर लगा के शादी की या नहीं ? आपने क्या किया था , क्या आपने चक्कर नहीं लगाए थे ? विवाह-बंधन को मान लिया था या नहीं ? जो जरूरत होती है आदमी मान जाता है। शादी की जरूरत होती है , तो पंडित चक्कर लगवा देते हैं , आप मान लेते हैं। विवाह हो गया , अब ये जिंदगी भर की परमानेंट पत्नी हो गयी। 
हमको भी ऐसा ही लगा कि अगर जन्म-मरण से मोक्ष चाहिए , तो गुरु से मिलने से होता है। इसलिए वहाँ गए। उनकी बातें बहुत अच्छी लगीं। यहाँ तक तो हमारी हालत बता दी। एक सम्माननीय साधक ने कहा अब आप आनंद लें। तब मैंने कहा भैया अभी मैं आनंद का ठेका नहीं लेता
 अस्पताल जब जाते हो , तो वहाँ ऑपरेशन के पहले और बाद में इंजेक्शन लगता है , बेड पे लेटना पड़ता है। ऑपरेशन के बाद रिकॉवरी रूम में जब तक हो - भारी कष्ट झेलना पड़ता है, उस समय भी क्या आनंद ही होता है ? आनंद के लिए ही ऑपरेशन तो होता है , पर उस समय भी आनंद होता है। यह कोई डॉक्टर नहीं कहता। अब तुम चाहो उसी दिन आनंद मिल जाये , तो ऐसा नहीं होता। पर यदि चाहते हो हॉस्पिटल से ठीक होकर घर लौट जाएँ , परमात्मा तक की यात्रा हमारी सुखद हो। तो अभी बैठे रहो। बाकी आज ही अच्छा लगे यह मैं नहीं कहता। कुछ बुरा-बुरा भी कहूँगा। सब अच्छा -अच्छा नहीं कहूंगा। शुरू -शुरू में लोगों को अच्छा कहकरके पटना पड़ता है। यदि डॉक्टर शुरू में ही बुरा बोल दे तो कई रोगी कहेंगे , भले ही मर जाएँ पर उस डॉक्टर के यहाँ नहीं जायेंगे। कई बार नाक के लिए घर में तलाक हो जाती है। मान-अपमान में तलाक की नौबत भी आ जाती है। हम तुम्हारा अपमान नहीं करेंगे , पर हर बात तुम्हें अच्छी ही लगे ये जरुरी नहीं है। डॉक्टर परहेज भी बताते हैं , पर रोगी परहेज करना नहीं चाहते। लेकिन अगर अपना इलाज चाहते हो तो सब स्वीकार करते हो। यदि आप मुक्त होना चाहते हैं , तब कुछ कहूंगा , तो मानना पड़ेगा। और यदि मुक्त होना नहीं चाहते , तो और जन्म होते रहेंगे। कभी न कभी जब तुम दुखी हो जाना और दूसरों की दुर्दशा देख लेना , फिर जब मन करे , तब इस रस्ते पर आना। दूसरे जन्मों में वर्तमान गुरु नहीं मिलेंगे ? लेकिन कोई न कोई गुरु हर जन्म में मिलता है। जब वर्तमान गुरु नहीं थे , तब पहले भी लोगों को गुरु मिलते रहे हैं। युगों -युगों से दुनिया चली आयी है , संत मिलते ही रहते हैं। गुरु तारते आये हैं , लोग तरते आये हैं। और सब कभी नहीं तरे। नहीं तो वर्तमान गुरु होते ही नहीं। कोई भी गुरु सबको तार नहीं पाया। (10:19) बहुत से लोग गुरुओं के उपदेश पर नहीं चलते , शास्त्र को नहीं मानते। तो इस जन्म में अगर न भोगना पड़े तो ,अगले जन्म में भोगना पड़ेगा। [बड़े घरन की स्त्रियाँ संतन से  शर्माये ,पिक्चर से न शर्माए ?? सेही कारण कुतियाँ भईं घर-घर डंटा खायें। ] सब यदि गुरु के पास आ जावें तो कुत्ता कौन बनेगा ? गधा कौन बनेगा ? वही बनेंगे जिनको गुरु के पास नहीं आने का मौका मिलता है। जिसको पाठचक्र में मन नहीं लगता ? आपने भी जरूर सुना होगा कि पाप जब ज्यादा होता है -तो कथा अच्छी नहीं लगती। लगता है ठाकुर के पास से उठकर भाग जाओ। पर मन लगने लग जाये तो समझो भक्ति आ गयी -
प्रथम भगति संतन कर संगा। 
दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।। 

पहले तो संत अच्छे लगें। फिर संत जो कथा सुनावें वो अच्छी लगे। 

गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान। 
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तज गान।। 

अभिमान छोड़के संतों की सेवा करें, तीसरी भक्ति अमान। बिना बड़पन्न दिखाए , विनम्र होके सन्तों की सेवा करें। 
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा |
पंचम भजन सो बेद प्रकासा ||

छठ दम सील बिरति बहु करमा |
निरत निरंतर सज्जन धर्मा ||

सातव सम मोहि मय जग देखा |
मोते संत अधिक करि लेखा ||

आठव जथा लाभ संतोषा |
सपनेहु नहिं देखहि परदोषा ||

नवम सरल सब सन छनहीना |
मम भरोस हिय हरष न दीना ||

नव महुं एकउ जिन्ह कें होई ।
नारि पुरूष सचराचर कोई ॥

मम दरसन फल परम अनूपा |
जीव पाइ निज सहज सरूपा ||

सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम |
ते नर प्राण समान मम जिन के द्विज पद प्रेम || 

यह पंक्तियाँ प्रभु श्रीराम ने माता शबरी को नवधा भक्ति (नौ प्रकार की भक्ति) का ज्ञान देते हुए कही थीं। "प्रथम भगति संतन्ह कर संगा" रामचरितमानस में वर्णित 'नवधा भक्ति' का पहला चरण है, जिसका अर्थ है ईश्वर (श्री राम) के भक्तों या संतों का सत्संग करना। इसका अर्थ है कि भगवान तक पहुँचने का सबसे पहला और मुख्य मार्ग सज्जनों की संगति है, जहाँ से भक्ति के भाव और ज्ञान प्राप्त होते हैं।  संतों के साथ रहने से मन शुद्ध होता है, आत्मा (ईश्वर, पवित्र त्रयी) के प्रति प्रेम जागृत होता है और सांसारिक मोह-माया कम होती है। बाकी लम्बी कथा आज नहीं करेंगे। तीन बातें सार रूप में बता देंगे। (12:07) बीजरूप में आज सब कहेंगे। फलफूल कल कहेंगे। 
आत्मविकास में सबसे बड़ी बाधा है -देहाध्यास M/F अपने को केवल स्त्री-पुरुष शरीर समझ लेना। मैं देह हूँ , इस मान्यता का नाम है , देहाध्यास। मैं स्त्री-पुरुष हूँ ऐसा लगना अध्यास है।
 
जीव जबतें हरितें बिलगान्यो।  तबतें देह गेह  निज जान्यो।  
मायाबस स्वरूप बिसरायो।  तेहि भ्रमतें दारुन दुख पायो।।
 
पायो  जो दारुन  दुख, सुख  लेस  सपनेहुँ नहिं  मिल्यो। 
भव  सूल, अनेक  जेहि,  तेहि  पंथ तू  हठि हठि  चल्यो।।  

बहु जोनि जनम,जरा, बपति, मतिमंद  !  हरि जान्यो नहीं। 
श्रीराम  बिनु  बिश्राम मूढ़  !  बिचार, लखि  पायो  कहीं।। 

------ श्रीश्रीविनयपत्रिका।  

"हे आत्मा! जब से तुम भगवान से अलग हुई हो, तुमने इस शरीर को अपना घर मान लिया है। माया के प्रभाव में आकर, तुम अपने सच्चे 'सत्-चित्-आनंद' स्वरूप को भूल गई हो, और इस भ्रम के कारण तुम्हें भयानक कष्ट सहने पड़े हैं। तुमने बार-बार जन्म और मृत्यु का असहनीय दर्द सहा है। सुख का तो नामोनिशान भी नहीं है, सपने में भी नहीं। तुम हठपूर्वक अनगिनत सांसारिक कष्टों और दुखों से भरे रास्ते पर चलती रही। तुमने कई जन्मों तक भटकती रही, बूढ़ी हुई, कई विपत्तियाँ सहीं, और मर गई, लेकिन हे मूर्ख! इन सबके बाद भी तुमने श्री हरि को (पवित्र त्रयी को ) नहीं पहचाना! हे भ्रमित बुद्धि /मूढ़बुद्धि / सम्मोहित बुद्धि! सोचो और देखो, क्या भगवान को छोड़कर किसी को कहीं भी सच्चा सुख और शांति मिली है?" || 

यह अंश श्री गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्री विनय पत्रिका से लिया गया है। यहाँ, श्री गोस्वामी जी, हम जैसे जीवों के दुख से द्रवित होकर, मार्गदर्शन देते हुए कहते हैं:
जब से जीव ने (अविवेकी मनुष्य ने) देह को अपना घर मान लिया , तभी से जीव (आत्मा) चैतन्य होकर भी जड़ प्रकृति (मूढ़बुद्धि) के पंजे में फंस गयी। देह को मैं मानने से जीवभाव - जीवभाव क्या है ? 
जीव धर्म अहमिति  अभिमाना ॥७॥ 

(बालकाण्ड) 

मैं M/F शरीर हूँ इस अभिमान का नाम जीव है। यदि जीव में यह अभिमान न रहे कि मैं जीव हूँ; तो वह मुक्त हो जाये। देह को ही 'मेरा' और 'मैं' मान लेता है। भगवान सारी सृष्टि में रहते हैं वे अहंता ममता से मुक्त हैं।  
मैं अरु मोर तोर तैं माया।

जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।

(रामचरितमानस : अरण्य कांड।)

श्री राम ने लक्ष्मण को समझाते हुए कहा : मैं और मेरा, तू और तेरा- यही माया है, जिसने समस्त जीवों को वश में कर रखा है। 
डरना मत ! पहले यह समझो देहाध्यास का हमारे लक्षण क्या हैं ? और इससे बचना कैसे है ? इसका उपाय है। लेकिन हम पहले यह स्वीकारें कि हमें M/F होने का भ्रम होता है। और जैसा हमको लगता है , यह हमारे ऋषियों को हमारे गुरुओं को पता था। इसलिए उन्होंने बताया -ऐसा जिसको लगता है , वे विवेकी-मनुष्य नहीं जीव कहलाते हैं। देहाध्यास होना परमत्मा की दैवी मायाशक्ति है। कोई जन्म-जन्मांतर से योगी हैं वे यहाँ मुक्त होकर आते हैं। (14:20) हमको तारने आते हैं। हमलोग तो वासनाओं में बंधे पशु हैं। कर्मों का फल भोगने आये हैं। शरीर का नाम ही भोगायतन है। यह शब्द याद रखने लायक है, भोग-आयतन। यह शरीर सुख-दुःख भोगने के लिए मिलता है। शादी के पहले यदि पत्नी यदि मर जाती , तो उसके दुःख से तुम दुखी नहीं होते। या पति मर जाता तो उसे पत्नी को दुःख न होता। जब प्रारब्ध खोटा होता है , तब वैसा ही संयोग मिल जाता है। जैसे -जैसे कर्म का फल भोगना होता है , वैसी -वैसी परिस्थिति आती है। अच्छी जगह शादी न होगी , जहाँ न होना चाहिए वहीँ हो जाएगी। देखोगे 100 जगह , पर पुत्र का और तुम्हारा जैसा ग्रहयोग होगा , शादी वहीं होगी। 30 -35 की लड़की को लड़का नहीं मिलेगा। बुढ़िया को लड़का कहाँ से मिलेगा ? बच्चियों की भी गलती नहीं है , उनका प्रारब्ध ऐसा ही था। नहीं मिलना था। 
तुलसी जस भवितव्यता, तैसी मिलै सहाय। 
आपु न आवै ताहि पै, ताहि तहाँ लै जाय।। 

गोस्वामी जी कहते हैं कि जैसी होनहार होती है मनुष्य को वैसी ही सहायता प्राप्त हो जाती है।  होनहार स्वयं मनुष्य के पास नहीं आती प्रत्युत उसे ही स्वयं खींच कर वहाँ ले जाती है। भाव यह है कि होनहार या भाग्य के आगे किसी का कुछ वश नहीं  चलता।   
जब राम का बनवास होना था , तब सरस्वरती ने मंथरा की बुद्धि फेर दी। मंथरा ने नौकरानी होकर भी मालिकन की बुद्धि फेर दी। जो सेवा में रहते हैं , वे बड़े खतरनाक होते हैं। नवनीदा के  PA, चेले या नौकर बड़े खतरनाक होते हैं। चौटाला ने एक बार हरियाणा में मंदिर गिरवा दी। जैसा प्रारब्ध होता है , वैसा सब योग मिल जाते हैं। हम जब जन्म लेते हैं , तो अपने कर्मों के अनुसार -स्थान , शरीर , परिवार सब मिलता है। गुरुदेव (स्वामी विवेकानन्द) ने पहले पहचाना, वे तो त्रिकालाज्ञ होते ही हैं। अंदर कुछ बीज अच्छा पड़ा होगा। मुझे इंगिलश नहीं आती है , विदेश चला गया। भारतीय मुझे नहीं मानते नहीं , और जिनको हिन्दी नहीं आती वे मेरे पीछे पड़े हैं। अभी हाल में 19 अमेरिका से आये थे , और 17 रूस से आये थे। 5 दिनों के ध्यान शिविर में भाग लिया। (19:08) जिनका जिनका प्रारब्ध है , उनका उनका जुगाड़ बैठ गया। घबड़ाओ मत , ज्योतिष को और प्रारब्ध को ठीक से समझ ले व्यक्ति तो दुखी नहीं होगा। मानलो बहु खोटी है बुरा बोलती है तो तुम दुखी हो जाते हो। बहु बनके तुम्हारे खोटे कर्म ही तुम्हारे सामने आये हैं। तुम्हारे कर्म दुःख दे रहे हैं , बहु थोड़े दे रही है। आरोप बहु पर लगाते हो , तुम्हारे कर्म कुछ नहीं थे ? ऐसे ही बहु आ गयी ? 
सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥171॥

मुनिनाथ ने बिलखकर (दुःखी होकर) कहा- हे भरत! विलाप न करो !  सुनो, भावी (होनहार) बड़ी बलवान है। हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-पयश, ये सब विधाता के हाथ हैं॥171॥  अभिनय में सब पहले से निश्चित रहता है।  कब उठना है , कब लड़ना है ? अभिनेता को पहले से पता होता है। तुम्हें अभी परसों क्या होगा ? पता नहीं है। जैसे प्रत्येक मनुष्य का मरना निश्चित है , मरना कच्चा है कि पक्का ? पर किस दिन मरना है ? और कहाँ मरना ? रोड में कि अस्पताल में, या कि घर में, नाव में , कि ट्रेन में , की जहाज में ?  ये किसीको नहीं पता। मुझे भी नहीं पता है। हमें पता नहीं है कि किस दिन क्या होगा ? लेकिन हम इतने ज्ञानी नहीं हैं। हमको ये पता नहीं है कि किस दिन क्या होगा ? लेकिन जो जो होगा , या होता जा रहा है , उसे स्वीकार कर रहे हैं। (22:00) जो होगा वो निश्चित है। वो होगा ! 

राजी हैं हम उसी में जिस में तेरी रजा है। 

जैसे प्रोड्यूसर ने रंगमंच बनाया , जो नाटक कम्पनी चलाता है वो जाने। अभिनेता को सिर्फ अपना अभिनय करना है। जो हमें पाठ दिया गया है करेंगे। हमलोग केवल अभिनेता हैं , हमारे पीछे निर्देशक है। हम सब ऐक्टर हैं , पर हमें ये पता नहीं है कि कल कौन सी एक्टिंग है ? रामकृष्ण मिशन के स्वामी आत्मानन्द जी हमारे सम्पर्क में थे। कानपूर के हमारे सम्मलेन में आये। पर इस साल के पहले हमने सोचा भी नहीं था कि रायपुर आएंगे। निश्चय किया था जिसने वही खिंच कर ले लाये हम नहीं आये। वही डॉयरेक्टर घुमाता रहता है। जिस दिन तुम ये जान जाओगे कि कोई डायरेक्टर है हम सिर्फ एक्टर हैं। और केवल ऐक्टर ही हैं , यहाँ कुछ लाभहानि नहीं है। एक्टिंग करने वाला मरने की एक्टिंग कर ? कि गरीबी की करे ? शादी की ऐक्टिंग करे। अमीर बन जाये , राजा बन जाये। वो एक्टिंग ही करेगा। होता -वोता कुछ नहीं है। क्यों ? क्योंकि वो एक्टर है , देहधारी M/F का अभिनय कर रहा है। हम भी कोई दुःख-सुख भोगने नहीं आये हैं , आप अपने को एक ऐक्टर मानकर एक्टिंग करोगे तो सुखी रहोगे। भगवान या ज्योतिष के अनुसार हमको काम सौंपा है , काम कर रहे हैं। 

ये ना पूछो के मरकर किधर जाएंगे वो जिधर भेज देंगे उधर जाएंगे ! 

कोई प्रवचन ऐसा नहीं जो तुम्हें थोड़ा आता न हो। (24:06 ) इधर (रायपुर) में भेज दिया तो इधर आना पड़ा। गोंदिया तो गुरुदेव आते थे। अब राजनन्द गाँव आये , रायपुर आये। भण्डारा आये और अभी बालाघाट जाना है। यहाँ जिनका समय आ गया होगा , वही मुझे प्रेम से सुनेंगे।          क्योंकि अगर यहाँ सबकुछ हमारे चाहने से हो , तुम्हारे चाहने से , तो तुम कभी बूढ़े न होते। कोई बूढ़ा होने की इच्छा नहीं करता , लेकिन होना पड़ता है। मेरे चाहने से मेरा शरीर जैसा चाहूँ वैसा नहीं रहता। हम केवल यही कर सकते हैं कि हम चाहना ही छोड़ दें। अभी भगवान जैसा अभिनय करवाएं करते रहें। जिस दिन शरीर छोड़वायें , छोड़ देंगे। बोरिया-विस्तरा बांध कर जाने के लिए हम तैयार रहें बस। 
     हम अपने कहें कि हम अभी नहीं जायेंगे। पर उनका निर्णय हो जाये तो लोग ऑक्सीजन (Oxygen) चढ़ाते रहें। यदि वो कह देंगे आ जाओ , तो गए। तो हम नहीं रोक सकते डॉक्टर नहीं रोक सकते। डॉक्टर अगर रोक सकते तो अपने घर वालों को तो रोक ही लेते। एक वैद्य का लड़का नहीं रहा। विवाह हो चुका था। मातायें उसको चूड़ी फोड़ने ले गयीं। एक जुलाहे की घरवाली ने पूछा ये क्या रिवाज है ? विधवा की चूड़ी फोड़ने जाना है , तो वो भी चली गयी। जब उसकी चूड़ी फोड़ी जा रही थी , तब जुलाहे की घरवाली ने अपनी चूड़ी फोडनी शुरू कर दी। तेरा कौन मर गया ? तू क्यों चूड़ी फोड़ रही है ? उसने कहा जब -वैद्य जी का लड़का मर गया तो मेरा तो मेरा मरा हुआ ही है। तो जब वैद्य नहीं बचा सका , तो हम भी तैयार हैं -चूड़ी फोड़ ही लेते हैं। समझदार लोग पहले से तैयार रहते हैं। (27:51) जब जुलाहा गर्मी में अंगीठी ताप रहे हैं , तो ठंढी में तो मर ही जायेंगे। तो आप क्या समझते हो ? यहाँ है कोई जो रह जायेगा ? क्या गुरुदेव बुढ़ापे को रोक लेंगे ? गुरुदेव की कथा सुनने से क्या होगा ? जो हमने समझा है , वो तुम भी समझ लो बस। अगर गुरुदेव अपने को बचाकर नमूना दिखाते , तो तुम मेरे शिष्य बनते तो ठीक है। गुरूजी ने बुढ़ापा नहीं आने दिया , तो इनका चेला बनना ठीक था। हम किसी को बचायेंगे नहीं - हाँ हम देहाध्यास ( जिवाध्यास जीवभाव M/F देहाभिमान) छुड़ा देंगे। तुमको ब्रह्माध्यास बतायेंगे। जिससे हम मुक्त हुए हैं , वही तुम्हें बतायेंगे। हम तुम्हारे सिर पर हाथ रखकर भाग्य बदल देंगे। मातायें बच्चे के सिर पर हाथ रखवाती हैं। हमारी माँ ने भी हाथ रखाया होगा। हम तो पैदा ही वरदान से हुए हैं। हमारी माँ के 11 -12 मर चुके थे। फिर देवी-देवता मनाया तो कोई देवी खुश हो गयी। फिर हम बचे हुए हैं। चलो बच गए। पर बकरे की मम्मी कब तक खैर मनाएगी ? हाँ हमभी अगर जल्दी मरते तो ठीक नहीं लगता। हम तो बूढ़े होकर जायेंगे। लकिन 

आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर। 
एक सिंहासन चढ़ी चले, एक बँधे जात जंजीर।। 

मैं वही कथा कहता हूँ , जो तुम्हें मालूम हैं। नई कथा कहने को साधु के पास कुछ है ही नहीं। कपड़ा फिसल गया नदी में तो एक पत्थर पर साबुन रगड़ रहा था। तुम यहाँ बैठे हो तो मन कहीं चला गया , तो नहीं समझोगे।  एकबार यदि समझ जाओ , तो मुक्त हो जाओ। 
रायपुर के कुछ लोग कहते हैं , हमें मुक्त कर दो। मैं इसी इरादे से आया भी हूँ कि मैं तुमको मुक्त ही कर दूँ। वही ग्रन्थ ,हैं वही उपनिषद हैं , वही गीता है। बस जहाँ तुम्हारा ध्यान नहीं जाता - वहाँ तुम्हारा ध्यान ले जाना चाहता हूँ। तुमको तुम्हारी बुद्धि फिर कभी धोखा नहीं दे सके तुम्हारा ध्यान वहाँ ले जाना चाहता हूँ। वैसे ही जवानी-बुढ़ापा नींद सबका होता रहता है। 
     फिरभी यदि मैं मुक्त हूँ , तो मैं तुम्हें मुक्त कर दूँगा। बस इतनी ही। पर यदि तुम्हारी समझ में मैं ही मुक्त नहीं हूँ , तो ये तुम्हारी समझ का मामला है , श्रद्धा इसी को कहते हैं। तुम्हारी समझ में यदि मैं मुक्त हूँ , तो तुम्हें बताऊँगा कि मुक्ति का अर्थ क्या है ? शादी के लिए पढ़ते हैं , मुक्त होने के लिए पढ़ते हैं ? सभी लोग मोक्ष भी नहीं पाना चाहते हैं। दर्शन करने आये हो , थोड़ा पुण्य हो जायेगा। 
 संत दरस जिमि पातक टरई॥3॥ 

संत के दर्शन से कुछ पाप कट जाते हैं। इसलिए जिसने संत नहीं देखा उसकी आँखे मोर के पंख जैसे हैं। भागवत कथा परीक्षित ने केवल एक बार सुना , वो तर गया। तुमने तो कई भागवत कथायें सुनी होगी ? जो भागवत तुमने सुनी , वही भागवत परीक्षित ने भी सुनी। वही गीता सुनके अर्जुन तर गए। 

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।

स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।।18.73।। 
 
गीता के वही श्लोक हैं , जिसको सुनकर अर्जुन कहता है मैं धन्य हो गया , मुझे स्मृति आ गयी । मैं अपने-आप में स्थित हो गया। (मेरी बुद्धि देहाध्यास छोड़कर आत्मा में स्थित हो गयी ?)

कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ॥.
कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा॥5॥

मैं न तो कवि हूँ, न चतुर कहलाता हूँ, अपनी बुद्धि के अनुसार श्री रामजी के गुण गाता हूँकहाँ तो श्री रघुनाथजी के अपार चरित्र, कहाँ संसार में आसक्त मेरी बुद्धि !॥5॥। (देह, इन्द्रिय, मन से सूक्ष्म बुद्धि उससे भी परे आत्मा है) अपनी समझ के अनुसार मैं चालाकी नहीं करता। बेईमानी नहीं करता , जितनी मेरी समझ है , ईमानदारी से मैं परमात्मा (अवतारवरिष्ठ) के गुण गाता हूँ। अपनी समझ में मैं बेईमानी नहीं करूँगा। जो जानता हूँ , दो टूक कहूँगा। जरा भी पर्दा नहीं। 
गूढ़उ तत्त्व न साधु दुरावहिं। आरत अधिकारी जहँ पावहिं॥  

संत लोग जहाँ आर्त अधिकारी पाते हैं, वहाँ गूढ़ तत्त्व भी उससे नहीं छिपाते। गूढ़ से गूढ़ रहस्य साधु नहीं छुपाते। कब ? जब आर्त अधिकारी , दुखी व्यक्ति मिल जाये , उसके लिए चाहने वाला मिले। तड़प रहा हो, बीमार हो तो वैद्य दवा देते हैं। साँप काटा हो तो झाड़ने वाला मंत्र से झाड़ते हैं नहीं तो उसकी विद्या नष्ट हो जाती है। इसीतरह कोई ब्रह्मज्ञानी अगर किसी जिज्ञासु को , जरूरत-मंद को यदि ब्रह्मविद्या नहीं सुनाता हो , तो उसकी ब्रह्मविद्या की शक्ति नष्ट हो जाएगी। इसलिए  (जिसका देहाध्यास चला गया हो और जो स्थित प्रज्ञ हो उसे )जिज्ञासु के साथ कपट नहीं करना चाहिए। लेकिन जो पात्र ही नहीं है , उसके लिए ज्ञानी भी क्या करेगा ? सुबह योग की क्लास है , उसमें बूढ़ा, बच्चा , स्त्रियाँ सभी आ सकता है। बूढ़ों के जैसा आसन -हम भी कर लेते हैं। ध्यान के लिए योगदर्शन के तीन सूत्र हैं - योगः चित्तवृत्ति निरोधः ! 'तदा द्रष्टुः स्वरूपे-ऽवस्थानम्' (योग सूत्र 1.3)-जब वृत्ति का निरोध होता है , तब द्रष्टा (=शुद्धबुद्धि) अपने स्वरुप में (आत्मा में या ईश्वर में) स्थित हो जाता है , अभी हमारी मूढ़बुद्धि, इन्द्रियों में स्थित है, विषयों में स्थित है। अभी  हमारी मूढ़बुद्धि (सम्मोहित बुद्धि) जीव-देह में (M/F शरीर में स्थित है) लेकिन  'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' ! जब वृत्तियों का निरोध होता है , तब जीव (अहं बुद्धि) अर्थात द्रष्टा अपने स्वरुप में अर्थात , अपने अधिष्ठान आत्मा में (परमात्मा, ईश्वर, ब्रह्म में) स्थित हो जाता है। तीसरा सूत्र है - यदि जीव चित्त वृत्तियों का निरोध नहीं करे , तो क्या होगा ? तो कहते हैं - 'वृत्ति सारूप्यम् इतरत्र' अन्य सभी अवस्थाओं में वृत्ति के अनुसार हो जाता है। तुम दुखी होते हो तो क्यों होते हो ? 'वृत्ति सारूप्यम् ! जैसी मति वैसी गति। वृत्ति दुःखाकार हो गयी है। तो दुःखी हो गए , निद्रा वृत्ति हो गयी तो सो गए। सुखानुभूति हो गयी तो सुखी हो गए। पैसा बढ़ गया , तो धनी हो गए।  ऐसा लगता है कि नहीं ? झूठ नहीं बोलना। धनी होने पर क्या होता है ? भूख ज्यादा लगती है ? हाजमा जायदा हो जाता है ? बुढ़ापा नहीं आता ? धनी होने का लाभ क्या है ? मुझे ये बताओ।  दिमाग में सिर्फ ये अहंकार का भूत चढ़ जाता है कि मैं बड़ा आदमी हो गया ! बड़े होने का एक मानसिक वृति बनती है। बाकी तो बड़े होने का कोई लाभ नहीं है। मैंने तो सन्तों से सुना था , जो ये दहीबड़े होते हैं न, जो उड़द की दाल से बनते हैं। हमारे सन्त कहते थे बड़े ऐसे नहीं बनते , पहले पीसा जाता है। फिर तले जाते हैं , फिर मट्ठे में डाले जाते हैं। ऐसे बड़े बनते हैं।  और बड़े बनने का लाभ क्या है ? (38:22) लोगों के बीच सिर्फ एक अभिमान के सिवा - कि मैं बड़ा हूँ ! जिमखाना का मेंबर, रोटरी का मेंबर को मरने में कुछ तो फर्क पड़ता होगा क्या ? अमीर आदमी कैसे मरता है ? और बड़े आराम से मरता है ? बल्कि गरीब शायद आराम से मरता हो , जितने बड़े हैं , वही ज्यादा चिन्ता से मरते हैं। गुरु ग्रंथ साहिब में कबीर जी का एक शब्द है"बड़े-बड़े जो दीसै लोग, तिन कउ व्यापे चिंता रोग"।  एक हँसी की बात बताऊँ ? मुझे लोग बिगड़ा नल कहते हैं - जो बहता ही रहता है। कोई प्यासा हो न हो , बह रहा है। आज भूमिका बना दी है।  अभ्यास कल कराउंगा। ध्यान में आइये -जिसका नहीं लगा उसका भी लगेगा उसका भी लगेगा ये हमारी जिम्मेदारी है। (39:32) तुम पढ़े हो या नहीं पढ़े हो , बल्कि बड़े बड़े सन्त अवतारी पुरुष ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं होते हैं। गुरुनानक देव जी कोई बहुत पढ़ेलिखे नहीं थे। ठाकुर देव भी पढ़े नहीं थे? हस्ताक्षर भी ठीक से नहीं कर पाते थे। उनके चेला (विवेकानन्द) के हम चेला हैं। तुम पढ़े हो या नहीं पढ़े हो हमारा काम है उधर ले चलना। कबीर साहेब के ऊपर phd होता है। ये कोई पढ़े की विद्या नहीं है। कबीर साहेब ने तो कह दिया -
 
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। 

 ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान (ब्रह्मविद)  न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप (देहदृष्टि नहीं -अद्वैत दृष्टी-एकत्व की दृष्टि , कोई पराया नहीं , सभी अपने हैं।) पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा। आप साधना में लग जाओगे तो आपका जीवन धन्य हो जायेगा। 
      आपका विश्वास यदि बच्चे की तरह होगा , तो पढ़ जाओगे। अधिक उम्र में पढ़ना बहुत मुश्किल है। इसीलिए कहते हैं - बूढ़े तोते या मिट्ठू को गुजराती में पोपट कहते हैं। तो बूढ़े तोते नहीं पढ़ते। नए नए को पढ़ाओ। पढ़ो मिट्ठू - दूधरोटी -चित्र-कोटि पढ़ो तो वो पढ़ने लगता है। जानवर के बच्चे भी जो पढ़ाओ पढ़ जायेगा। जब वो परिपक्व हो जाते है -एक भाषा में तो नहीं पढ़ते। मुश्किल ये है कि तुम देहाभिमान में (जीवभाव या M/F) अहं बुद्धि में परिपक्व हो गए हो। हम ये हैं , हम वो हैं , अब इसको सबको पोछना है। नए सीरे से तुम कौन हो ? ये तुमको बताना है। उसके लिए गीता और ग्रंथों के उदाहरण देंगे। देखो भगवान ने ये कहा। ये तुलसीदास ने कहा , अमुक संत ने ये कहा। और भारत के जितने भी संत हैं - किसी भी सम्प्रदाय के संत क्यों न हों ? रायपुर में सभी ने मिलजुलकर एक शोभायात्रा निकाली ये अच्छी बात है। आप अपनी बात को व्यावहारिक रूप से रखते हुए , व्यवहार में वही एकत्व का भाव -समाज और देश चलाने के लिए, ठीक है।  पर जब थोड़ा गहरी नींद में जाते हो , तब क्या होते हो ? ऐसे ही जब ध्यान -समाधि में जाओ तब तुम पुरुष नहीं स्त्री नहीं हो, उसको अमन दशा कहते हैं। संक्षेप में, यह एक ऐसा समय है जब जीवन में उथल-पुथल की जगह शांति, सकारात्मकता और संतुलन का अनुभव होता है। शंकराचार्य जी ने हस्तामलक स्तोत्र में कहा है- 
 
नाहं मनुष्यो न च देवयक्षौ,
न ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राः।

न ब्रम्हचारी न गृही वनस्थो,
भिक्षुर्न चाहं निजबोधरूपः ॥२॥

 - न मैं मनुष्य हूँ , न देवता अथवा यक्ष हूँ , न मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र हूँ, न ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ या सन्यासी हूँ , मैं केवल आत्मज्ञान स्वरुप हूँ॥२॥
शंकराचार्य ने यह किसके लिए कहा - नाहं मनुष्यो ! इसको क्या कोई पशु पढ़ेगा कि मनुष्य ही पढ़ेगा? माने विवेकी मनुष्यों को ये समझाना चाहते हैं कि तुम मनुष्य नहीं हो , 'वह' हो तत्त्वमसि ! देखो हमारा एक ग्रन्थ कहेगा तुम मनुष्य हो , तुम्हें पशुओं जैसा स्वार्थी नहीं रहना चाहिए। पहले तुम यह समझो कि तुम पशु नहीं हो , इसलिए मनुष्य की तरह ही चलो।
     पर जब तुमको देहाध्यास से मुक्त करना है , तब ये बताएंगे की तुम मनुष्य भी नहीं , हो पुरुष भी नहीं हो , स्त्री भी नहीं हो। और अंत में कहेंगे कि तुम जीव भी नहीं हो। जीवो ब्रह्मैव न अपरः ! ये तुम्हें अध्यास है , देहाध्यास , जिवाध्यास है , इन दो अध्यासों को छोड़कर तुम आत्मा हो ये जानने की कोशिश करो। कल इस पर विस्तार से बताएंगे आज यही पर समाप्त करते हैं। 
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⚜️️🔱2.क्या है आत्मानुभूति ? ।। 10 वां तू ! तो 'तत्त्वमसि 'महावाक्य (बड़ा वाक्य) का मतलब है -जो तुम्हारे गुरु ऐसे ढंग से गिनवायेंगे कि, देह, इन्द्रिय , मन बुद्धि -चित्त अहंकार आदि सब दृश्य है , लेकिन उन सबका साक्षी आत्मा तूँ है।Yug-Purush ।। What is self realization ?⚜️️🔱

10 वां तू ! 'तत्त्वमसि '


 2.क्या है आत्मानुभूति ? ।। Yug-Purush ।। What is self realization ?


जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं॥
जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अबिनासी॥2॥

मुनिगण जन्म-जन्म में (प्रत्येक जन्म में) (अनेकों प्रकार का) साधन करते रहते हैं। फिर भी अंतकाल में उन्हें 'राम' नहीं कह आता (उनके मुख से राम नाम नहीं निकलता)। जिनके नाम के बल से शंकर जी काशी में सबको समान रूप से अविनाशिनी गति (मुक्ति) देते हैं॥2॥
बहुत जन्म लेते लेते जब बुद्धि में सुधार होता है - और बुद्धि जब देहनिष्ठ से आत्मनिष्ठ बन जाती है, जिस जन्म में लोग ईश्वरलाभ या आत्मज्ञान (इष्टदेव) प्राप्त कर लेते हैं , वही उनका अंतिम जन्म होता है। 
जैसे नदी की स्वाभाविक गति सागर की तरफ है , वैसे ही मनुष्य की स्वाभाविक गति आत्मा (अवतार वरिष्ठ) की तरफ है। पर जानता नहीं है, माया से बने पंचभौतिक M/F शरीर के आकर्षण में बंधा हुआ लगता है - कि सांसारिक वस्तुओं में (3Kमें) आसक्त है।  पर वास्तव में वह आनन्द ही चाहता है। लेकिन सम्मोहित बुद्धि आत्मनिष्ठ नहीं हो पाती। हम ईश्वर (आत्मा, इष्टदेव) के अंश है , हम अपनी आत्मा (पवित्र त्रयी) की ओर खींचते हैं। (3 :49 ) लगता है कि हमें जगत (3K) प्रिय है। हमें तो केवल आनंद ही प्रिय है। चाहे कामिनी-कांचन या पद-प्रतिष्ठा की तरफ खींचो तो आनंद की ही चाहत होती है। मनुष्य परमात्मा का अंश है , इसलिए विस्तार की इच्छा होती है। राष्ट्र विस्तार चाहता है। व्यक्ति वृहित होना चाहता है , बड़ा होना चाहता है, ब्रह्म (आत्मा -भगवान) होना चाहता है। हम ब्रह्म होना चाहते हैं। साधु को यदि ब्रह्म न मिले , तो वो भी बड़ा ही होना चाहता है। साधुओं में भी बहुत कम्पीटिशन होता है। तुम्हारी दुकान से ज्यादा हमारी दुकान चलती है। (4:50) अगर वास्तव में देखें तो( महामण्डल के जो भाई पोस्ट के साथ शक्ति चाहते है या बिना पोस्ट के शक्ति पाना चाहते हैं) हम सब बड़े होने के लिए वास्तव परमात्मा को ही चाह रहे हैं । अभी और जीना चाहते हैं। ये जीना क्या है ? आत्मा (परमात्मा, ईश्वर या भगवान) अविनाशी है , वो अनंत काल तक जीता है। व्यक्ति क्षणभर ही जीता है। तो मनुष्य के अंदर ब्रह्म ही होने की इच्छा है , सदा रहने की इच्छा है। कभी न मरुँ। पर हॉस्पिटल जाता है , प्रार्थना करता कि उस समय बच जाएँ, लड़का भाग गया है , वो जरा मिल जाये फिर चाहे शरीर चला जाये। पर लौट आने के बाद फिर कोई जाना चाहता है ? सबलोग वास्तव में आत्मा (ईश्वर या परमात्मा) के लिए तरस रहे हैं। पर दूसरी दृष्टि से देखें/देहमति / मूढ़बुद्धि से देखें, तो लगता है - कोई आत्मा (ईश्वर) को नहीं चाहता -सभी 3K ही चाहते हैं। असल में बुद्धि ही भ्रमित हो गयी है। (6:25
कोई व्यक्ति नदी में स्नान करते जटधारी साधु को देखकर सोचा कोई स्त्री है , उधर गया तो देखा साधु है। आकर्षण स्त्री के प्रति था, साधु के प्रति नहीं था। पर वो स्त्री दिखी तो वो गया। असल हमको सब जगह आनंद की झलक ही दिखती है। यहाँ सम्मान मिल जायेगा , बड़प्पन मिल जायेगा।  हम सब लोग आत्मा (परमात्मा या ब्रह्म) को ही चाहते हैं , कोई दुनिया को नहीं चाहता। जिससे जीवन पर खतरा लगता है , उसकी हत्या पहले हम कर देते हैं। मच्छर से क्या दुश्मनी है ? क्यों मार देते हो ? हम चाहते सुख हैं - मच्छर दुःख देता है। मैं छोटी उम्र में शुकदेव/सुखदेव  की तरह साधु होने गुरुदेव के पास पहुँच गया था। असल में जो सुख देता है वो प्रिय लगता है। पत्नी भी प्रिय लगती है क्योंकि वो सुख देती है। बेटे से जब बाप को दुःख पहुँचता है तो प्यार खत्म हो जाता है। निशाना सबका एक है। निशाना लगाते समय हमलोग एक आँख बंद कर लेते हैं। देखने में दो हैं , पति-पत्नी, बाप-बेटा, गुरु-शिष्य , आत्मा (ईश्वर और जीव-जगत) देखने में दो हैं पर लक्ष्य में एक हैं। आत्मा (ईश्वर, ब्रह्म, जीव और जगत सब) एक है, उस एक के सिवा कोई दूसरा ईश्वर नहीं है, 'एकं ब्रह्म द्वितीय नास्ति नेह ना नास्ति किंचन' नहीं है, ज़रा सा भी नहीं है। (10:42) दिखाई तो अनेक देते हैं - बहुत दिखाई देते हैं - पर सत्य एक ही है ! "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः" अद्वैत वेदांत का मूलमंत्र है, जिसे आदि शंकराचार्य ने प्रतिपादित किया है। इसका अर्थ है कि केवल आत्मा (ब्रह्म, परमात्मा ईश्वर )  ही एकमात्र सत्य (नित्य) है, यह जगत (संसार) मिथ्या (अस्थायी/माया) है, और जीव (आत्मा) वास्तव में ब्रह्म ही है, उससे भिन्न नहीं। यह सूक्ति आत्मा और परमात्मा की एकता को दर्शाती है। 
नचिकेता ने यमराज से कहा था , मैंने बहुत से लोगों से सुना है कि मरने के बाद आत्मा रहती है। और बहुतों ये भी सुना है कि आत्मा नहीं रहती है - सिर्फ गप्प है। कोई आत्मा वात्मा नहीं होती। लेकिन मैं आपसे जानना चाहता हूँ। क्योंकि आप तो मृत्यु के देवता हैं , आपका का तो काम ही मारने का है। तो आपको तो पता होगा , कौन मरता है , कौन नहीं मरता है ? आप प्रैक्टिकल करते हो , सब जगह केवल Theory है , सिद्धांत की बात होती है। तुम यमराज हो हमें यह बताओ आत्मा रहती है या नहीं रहती ? 
यदि यमराज भी प्रवचन देने लगते तो नचिकेता समझ नहीं पाता।     
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्‌ ॥
[अयम् आत्मा प्रवचनेन न लभ्यः। न मेधया न बहुधा श्रुतेन। एषः यं एव वॄणुते तेन लभ्यः। तस्य एषः आत्मा त्वां तनूं विवृणुते ॥ कठोपनिषद्] "यह 'आत्मा' प्रवचन द्वारा लभ्य नहीं है, न मेधाशक्ति से, न बहुत शास्त्रों के श्रवण से 'यह' लभ्य है। यह आत्मा जिसका वरण करता है उसी के द्वारा 'यह' लभ्य है, उसी के प्रति यह 'आत्मा' अपने कलेवर को अनावृत करता है।
महावाक्य है - तत्त्वमसि ! अयमात्मा ब्रह्म ! ये महावाक्य है। अर्थात जीवब्रह्म के एकत्व को महावाक्य (बड़ा वाक्य) कहते हैं। तुम्हें परमात्मा मिल जायेगा यह एक वाक्य है।  तुम अविनाशी हो ये महावाक्य है जिस सर्वव्यापी आत्मा , परमात्मा , सत्य या ईश्वर की तलाश तुम्हें है , वो तुम हो ! 10 अंधे लोग नदी के पार जा रहे थे , उस पर पहुँचकर एक ने गिनना शुरू किया कोई खो तो नहीं गया ? जो गिनता था वो 9 ही गिनता था। एक तो गायब हो गया ? दूसरा और तीसरा भी गिना तो 9 मिला। सभी अंधों ने गिना तो 9 ही मिला। ढूँढ़ते थे 10 आदमी मिलते थे 9, गिनने वाला अपने को गिनता ही नहीं था। एक ज्ञानी जा रहा था , हम 10 वें को मिलवा देंगे , बोलो क्या दोगे ? एक नेता ने प्रस्ताव दिया कि आपको 1 अरब रुपया हम सरकार से दिलवा देंगे। लेकिन उसमें से 20 करोड़ आपको वापस कर देना पड़ेगा। (16:55) तो 20 करोड़ का खर्च हम दिखाएंगे कहाँ ? पहले हम पूरा निकाल लेंगे , बनाते समय हम उसमें से निकाल निकाल कर खर्च दिखाते जायेंगे।  नेता ने कहा नहीं 20 तो पूरा उसी समय लौटा देना होगा। तो स्किम ही कैंसिल कर दिया। आजकल मिलता उनको ही है , जो उसमें से थोड़ा देवे। पाने के लिए भी देना पड़ता है। हैण्ड पाइप में भी एक लोटा पानी दोगे , तो वो पानी देगा। खेत में भी पहले बीज डालते हो तो अनाज वापस आता है। तो गवर्नमेंट में भी ऐसे ही चलता है। नेता लोग सफ़ेद धन देते हैं , काला धन लेते हैं। भजन भी अगर आनंद से करोगे तो आनंद मिलेगा। भगवान भी दयासागर तभी हैं , जब तुम स्मरण -सागर हो। उनकी याद न करो तो दया भी नहीं। याद और दया में सिर्फ द का ही फर्क है। याद इधर से गयी तो उधर से दया बनकर लौटी। एक राधास्वामी मत है। सुरति को धारा कहते हैं। जो परमात्मा से निकली धारा है। जैसे नदी निकलती है , झरना निकलता है। वैसे ही आत्मा से निकली सुरति को धारा कहते हैं। सामान्य रूप से सुरति का अर्थ स्मृति, याद, सुध या ध्यान आना हैं। जब धारा देह-इन्द्रियों में आसक्ति को छोड़ कर उधर से लौटती है , तो धारा -राधा हो जाती है। तो आप राधास्वामी हो जाते हो। आपकी सुरति की धारा जो देह-इन्द्रियों की तरफ जा रही है , उसको यदि आत्मा की तरफ लौटा लो तो वो राधा बन जाती है। नहीं तो धारा कृष्ण , धारा कृष्ण, धारा कृष्ण - धारा जो लौटती हैं , तब वो राधा-कृष्ण हैं ! सामान्य मनुष्य धारा -कृष्ण ही होता है। तुम्हारी अपनी ही धारा- शक्ति या ऊर्जा  संसार में जा रही है - 3K में जा रही है। पाँचो इन्द्रियों और मन से हमारी ऊर्जा जगत की तरफ बह रही है। वो लौट आये तो तुम राधाकृष्ण बन जाओ। (21:07) जगत से बुद्धि जब लौट आती है , तब समाधि बन जाती है। 
विषय चल रहा था महावाक्य और महासमाधि। ब्रह्म-आत्मैक्य बोध या परमात्मा का अपरोक्ष बोध कराने वाले वाक्यों को महावाक्य कहते हैं। तो 10 अन्धों में नदी पार करते समय एक गायब था - उधर से कोई ज्ञानी महात्मा आये , उन्होंने कहा आओ तुम्हारे बिछुड़े साथी से मैं मिला देता हूँ। तो उस ज्ञानी ने प्रत्येक अंधे को सिर को ठोक -ठोक करके गिनना शुरू किया - 123456789 और 10 वां तूँ है ! तब कहा अरे मैं था ? मैं तो गायब नहीं था ? 9 था पर 10 वां तो खुद ही था पर ढूँढ रहा था , 10 वां कौन है ? जैसे तुम जिस सत्य को ढूँढ रहे हो तो , महावाक्य कहेगा देखो - यह देह है , यह दृश्य है। ये इन्द्रियाँ हैं ये दृश्य हैं , इन्द्रियों से सूक्ष्म मन है (जो M/F अहं है वह भी आभास है) मन से सूक्ष्म बुद्धि है, और जिस आत्मा (ईश्वर, ब्रह्म या भगवान) को तूँ ढूँढता है, वह ब्रह्म (पवित्र त्रयी) तूँ है ! अब कैसे कहेगा मुझे आत्मा नहीं मिला ? यदि यह भी कह देते 10 वां है ! 10 वां मोक्ष होता है , मिल जायेगा। तो अच्छा तो लग सकता था पर ढूँढना पसन्द नहीं था। 9 मिल गए हैं , 10 वां भी मिल जायेगा , 10 वां है। ये परोक्ष वाक्य हैं, महावाक्य नहीं हैं । तो सीधा तत्त्व बोधक परिचय नहीं है। आत्मा है -कहने से ये परोक्ष वचन हुआ। तब इतने से संतोष नहीं हुआ। जब गिनाने वाले ने 9 को ठोक -ठोक के कह दिया कि ये दसवाँ तो तूँ है। तो कौन मिला ? मिला -मिलाया ही मिला। जो पहले से वर्तमान था - वही मिल गया। आत्मा कोई अलग वस्तु नहीं है। अब कोई 9 को ही कहता 10 वां यही है , तो लाता कहाँ से ? तब उसी को भ्रम हो जाता कि उसको तो मिला पर मुझे नहीं मिला। किसी को भी गिनो तो यहाँ नारद की गिनती शुरू करो। (24:55) आठवाँ कौन है ? देवकी की आठवें गर्भ से आठवीं संतान से कंस का वध होगा। कंस की मृत्यु आठवीं संतान से होनी है , तो आठवाँ कौन है ? देवर्षि नारद बहुत विचित्र गिनती जानते थे। वही बात यहाँ शुरू करें तो 10 वां तू है ! और जगह से तो 10 वां तू ! तो तत्त्वमसि का मतलब है -जो तुम्हारे गुरु ऐसे ढंग से गिनवायेंगे कि, देह, इन्द्रिय , मन बुद्धि -चित्त अहंकार आदि सब दृश्य है , लेकिन उन सबका साक्षी परमात्मा तूँ है। दूसरा कोई गुरु अगर गिनवायेगा , तो वो भी बतलायेगा परमात्मा तूँ है। अर्थात जिसे तूँ ढूँढ़ता है , वह आत्मा (अविनाशी सत्य या परमात्मा) कोई 'third person' तीसरा व्यक्ति नहीं है ! कोई 'second person ' नहीं है। सारे 9 'second person ' (दृश्य) थे , लेकिन 10 वां द्रष्टा तूँ है।  विदेशों में तो मंत्र भी पैसे से बिकते हैं। और विदेशी लोग हर चीज को पैसे से खरीदते भी हैं। मुफ्त में लेते भी नहीं हैं। हमारे यहाँ प्रवचन निःशुल्क सुने जाते है , फिर श्रद्धा से लोग वहाँ पैसे चढ़ाते हैं। वहाँ पहले टिकट लगता है , तब सभा पण्डाल में प्रवेश होगा। वहाँ मेरे से (स्वामीजी से) मिलने के भी पैसे ले लेते हैं। 15 मिनट मिलने के 100 डॉलर , फिर भी हम बहुत सस्ते वाले हैं। वहाँ तो 5000 डॉलर , 10000 डॉलर से महात्मा के दर्शन होते हैं। हम तो फ्रीफंड वाले हैं।  अभी एक माता निकली , हमसे कहने लगी हमारे घर चलो दर्शन देने। पर वो ठीक नहीं आप ही आकर दर्शन कर लो। दीवाल को दर्शन क्या देना ? वहाँ तो चरण डाले जायेंगे।               

 तुम ही वह हो , तत्त्वमसि ! फिर एक महावाक्य है - "अयम् आत्मा ब्रह्म !'प्रज्ञानं ब्रह्म' (प्रज्ञान ही ब्रह्म है) ऋग्वेद का एक प्रमुख महावाक्य है।  "अयम् आत्मा ब्रह्म !" मतलब ये चैतन्य कौन है? आत्मा अविनाशी है ! कितने दिन सुनते आ रहे हो कि आत्मा अविनाशी है , लेकिन अभीतक आत्म-साक्षात्कार तो नहीं हुआ। सुनते हैं ब्रह्म है , ईश्वर है सर्वव्यापक है। परन्तु उसकी अनुभूति करनी होगी। ब्रह्म या आत्मा सबके ह्रदय में विद्यमान हैं , कितने दिन से सुना है ? फिर भी ढूँढना तो चालू है ? (26:28) ये जब ढूँढना बंद हो जाये , तो इसका मतलब हुआ कि मिल गया ! जब तक महावाक्य की अनुभूति नहीं होगी , तबतक बात नहीं बनेगी। एक साधक ने पूछा महावाक्य में और दूसरे मंत्रों में फर्क है क्या ? महावाक्य भी मंत्र हो सकता है , पर हर मंत्र महावाक्य नहीं है। क्या महावाक्य और गुरुमंत्र दोनों का सार एक होता है ?  वो अलग से भगवान का नाम बोल देगा। राम है , कृष्ण है , रामकृष्ण परमात्मा है , भगवान है सुना है , पर अभी तक हमको ये मिला हुआ नहीं लगता। हमको राम मिल गए , हमको कृष्ण मिल गए , हमको श्रीरामकृष्ण मिल गए , ऐसा लगना चाहिए।  तो महावाक्य परमात्मा को मिलाने वाले वचनों को बोलते हैं। सभी मंत्र महावाक्य नहीं कहे जा सकते। आत्मानुभूति किसे कहते हैं ? 'मैं' की अनुभूति बहुत आसान है। और जिनको आत्मानुभूति करनी है -गुरुशिष्य परम्परा को स्वीकार करें। ध्यान कैसे बनेगा वो गुरु का काम है। प्रश्न है कि आत्मानुभूति किसे कहते हैं ? आत्मानुभूति उसे कहते हैं , जिससे समस्त अनुभूतियाँ होती हैं। जिसके बिना कोई अनुभूति नहीं हो सकती। ऐसा आत्मा मैं हूँ ! यह अनुभव होना ही आत्मानुभूति होती है। इसीलिए ध्यान में जब बैठो , जब तुम्हारे भीतर उजाला दिखे , नात सुनाई दे , जब तुम्हारे मन को कोई विलक्षण अवस्था होगी। आनंद डूब जाओगे तब मैं कहूंगा , ये प्रकाश किसको अनुभव हो रहा है ? क्योंकि बिना तुम्हारे प्रकाश हो नहीं सकता। स्वप्ना तुम्हारे बिना नहीं हो सकता। पहले कुछ अनुभव हो तो सपना भी उसीका होगा। तुम कहोगे मुझे हुआ , तब मैं कहूँगा तत्त्वमसि ! एक संत रबिया की कथा में आती है - बाहर से पुकारा , तो भीतर से संत ने पूछा कि तूँ कौन है ? भीतर से सन्त ने (इष्टदेव ने) पूछा कि तूँ कौन है ? तो जिज्ञासु कहता है - यही तो मुझे पता नहीं है ! यही तो पता लगाने मैं आपके पास आया हूँ। भीतर से पूछा तूँ कौन है ? बाहर से बोला यही तो पता लगाने आया हूँ। जिस दिन ये जान जाऊँगा - मैं कौन हूँ ? तो फिर मुझे आने की जरूरत नहीं है। फिर संत भीतर से पूछा ये प्रश्न पूछता कौन है ? यह प्रश्न कहाँ उठा ? M/F देह में उठा ? मन में उठा ? जड़ में उठा ? ये प्रश्न किसने किया है ? किसके अन्दर जिज्ञासा है ? कौन जानना चाहता है , कि मैं कौन हूँ?  देह जानना चाहता है क्या ? मकान जानना चाहता है क्या ? ये प्रश्न किसके अंदर उठा है ? जैसे एक बुलबुला में यह यह प्रश्न उठा कि अविनाशी कौन है ? (30 :59) एक बुलबुला ने पूछा कि अविनाशी कौन है ? तो किसी ने कहा - ये बुलबुला किसमें बना है ? बुलबुला कहाँ से आया है? ये बुलबुला किस में लीन हो जायेगा ? यदि यह तूँ देख लेगा , तो जान जायेगा, यह देख लेगा कि तूँ ही पानी है। जिससे बुलबुला हुआ है वो पानी है। उसी तरह यह देह, इन्द्रिय,  मन बुद्धि जिससे पैदा होता है , मन (M/F अहंकार बुद्धि) जिसमें रहता है , मन जिसमें समा जाता है, वही आत्मा है (ईश्वर, काली या ब्रह्म है !) पर अभी कहेंगे कि वही आत्मा है तो काम नहीं बनेगा। जब तुमको ध्यान में ब्रह्मात्मैक्य का अनुभव हुआ , तब गुरु पूछेंगे -ये अद्वैत अनुभव किसको हुआ? तो तुम कहोगे कि मुझको हुआ , मुझे दिखा। तुम कहोगे आज ध्यान में मैं आनंद में डूब गया। तो गुरु पूछेंगे ये सब अनुभव किसे हुए ? तो सच्चा साधक कहेगा -मुझे हुआ। तो हम कहेंगे यही आत्मा है। जिससे सब अनुभव होता है , जिसमें सब रहता है , जिसमें सब लीन हो जाता है। 
"जन्माद्यस्य यतः" (janmādyasya yataḥ) ब्रह्मसूत्र (1.1.2) का प्रथम सूत्र है। इसका अर्थ है - (ब्रह्म वह है) जिससे (यतः) इस जगत का जन्म, स्थिति और लय (जन्मादि - जन्म, आदि, अस्य) होता है। यह वाक्य दर्शाता है कि आत्मा (ईश्वर या ब्रह्म) ही सृष्टि का सृजन, पालन और विनाश करने वाला मूल कारण है। 

"मन तू ज्योत स्वरूप है, अपना मूल पहचान" 

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी (आसा महला 3) की एक पवित्र पंक्ति है, जो मनुष्य को याद दिलाती है कि उसका मन-बुद्धि केवल शरीर नहीं, बल्कि परमात्मा का एक दिव्य प्रकाश (आत्मा) है। यह वाणी अज्ञान और अविद्या माया के परदे को हटाकर स्वयं के वास्तविक आध्यात्मिक स्वरूप को समझने और अहंकार मुक्त होने का संदेश देती है। अन्तःकरण की समस्त वृत्तियों का जो साक्षी है - वृत्तियों का आश्रय है , सतस्वरुप-चित्स्वरूप - आनंदस्वरूप चैतन्य आत्मा तूँ ही है।
    एक और प्रश्न है - पारिवारिक कार्य करने में मन की कोई रूचि ही न रह जाये , लेकिन पारिवारिक जिम्मेवारियाँ बाकी हों , तो मनुष्य को क्या करना चाहिए ? कई बार जिसका धंधा अच्छा नहीं चलता उसको भी दुकान में मन नहीं लगता। पर यदि परमात्मा (इष्टदेव) की स्मृति में मन लगता है , तब तमोगुणी नहीं है। आलसी मन नहीं है। जिसका  मन भजन में लग जाता है , उसको चाहिए कुछ देर ड्यूटी अदा करें , बाकि भजन करें। यह आवश्यक नहीं कि 24 घंटा भजन करें।   
यदि मन तुम्हारा आनंद में डूब कर शान्त हो जाता हो , और अरुचि का मतलब है , तुम दुःखी हो जाते हो। कई लड़कों का मन पढ़ाई में नहीं लगता , पर ये जरुरी नहीं है कि ऐसा होना  बहुत अच्छा है। जो भी प्रश्न हो एक घंटा में बंद कर देगें। Be and Make का प्रचार करना भी बहुत अच्छी साधना है। भजन और ड्यूटी साथ -साथ चलने दो। जिम्म्मेवरियाँ पूरी कर सकते हो तो अवश्य करो। लापरवाही मत करो।
     भगवान कृष्ण ने पूरी गीता में कर्म का खंडन किया , और पूरी गीता में कर्म छोड़ने का विरोध भी किया। (35 :51) अर्जुन कर्म छोड़ना चाहता है , युद्ध नहीं चाहता है , भगवान कृष्ण नहीं छोड़ने देते। और उदाहरण देते हैं - मैं भी तो काम करता हूँ ! और मैं भी ज्ञानी हूँ , पर तूँ तो अभी ज्ञानी नहीं हुआ है। मुक्त भी नहीं है , पर मैं मुक्त हूँ फिरभी काम करता हूँ। भगवान कहते हैं कोई व्यक्ति कर्म किये बिना रह ही नहीं सकता। तो कर्तव्यकर्म नहीं करेगा , तो वासना मूलक कर्म करेगा। व्यर्थ के काम करेगा। कई बार आदमी कुर्सी में बैठकर अपने पैर ही हिलाता रहता है। खाली कभी मत बैठो। काम में मन  न लगना योग्य मनुष्य (विवेकी मनुष्य) की पहचान नहीं है। 
       विवेक-वैराग्य -षट्सम्पत्ति और मुमुक्षता यही चार साधन हैं , तो आत्मज्ञान होने पर सहज समाधि मिलेगी। जैसे आपको सहज भाव से लगता है , कि आप भारतीय हैं , M/F हैं। घड़ा बने , ईंट बने।  मिट्टी को बस इतना पता रहे कि मैं मिट्टी हूँ। तुम कौन हो ? ये पहले समझ में आ जाये।  और ये सहज बना रहे। आँख खोलना , मुँदना नहीं है। साधना अवस्था में जप करना। अकेले रहना। महर्षि रमन का कोई कर्तव्य नहीं रहता। मिट्टी की सत्ता के आलावा और कोई सत्ता नहीं रहता। जब सब में मैं हूँ ? तो पराया कौन है ? जब तक आप साधक हैं - श्रवण-मनन -निदिध्यासन करते रहें। अभी लगाने से मन नहीं लगता , पर समाधि से उठने का मन नहीं करेगा। 
मनःसंयोग का अभ्यास : जिस आसन में बैठने से आपको कोई तकलीफ न हो। 5 मिनट बैठ जाइये। अब ये देखिये कि ये तो शरीर है , आपका ध्यान कहाँ है ? (45:03) हृदय के भीतर श्वांस को ले जाओ। कान में ध्यान ले जाओ। कान में आवाज आती है क्या ? आँख पर ध्यान ले जाओ। आंख को जोर से मीच लो फिर ढीली छोड़ दो। आँख खोलना नहीं है। कड़ी करना है , ढीली करना है। शरीर को कड़ा ढीला करो। फिर अपनी आँखों में आकर बैठ जाओ। बंद आँखों से देखो अंदर क्या है ? अँधेरा है कि उजेला है ? कुछ भी नहीं है तो भी ठीक है , देख तो रहे हो कि कुछ भी नहीं है। देख के ही तो बताओगे कि कुछ भी नहीं है। ऑंखें न होंगी तो कैसे बताओगे? भीतर की आंख खुली रहे कि कुछ भी नहीं है। या कुछ है तो क्या है ? अँधेरा है ? रंग है ? प्रकाश है ? प्रकाश है तो कैसा है ? चन्द्रमा का है सूर्य का है ? या टोर्च काहै ? तुम्हारा ध्यान शरीर के भीतर है कि बाहर है। अंत  ११ बार मंत्र का जप कर लो। बड़े प्यार से 11 बार मंत्र जप लो। तुम्हारा मन बोले जिह्वा नहीं। ढूँढो मन कहाँ है ? मन के अंदर ये शब्द आया कि नहीं ? और तुम कौन हो ? खोजो आत्मा के खोजने का यही रास्ता है। पहले सबकुछ खो दोगे , धीरे -धीरे मन मिल जायेगा। आत्मा कौन है ? जो मन का साक्षी है ! जो मन को देख ले वो आत्मा , जो मन को ढूँढ ले वो आत्मा। जो मन में है वो आत्मा है , साक्षी है। ॐ शांति शांति शांति ! 
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⚜️️🔱जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति क्या है ? ।। Yug-Purush ।। What is Jeevan Mukti and Videha Mukti ?⚜️️🔱

 "चींटी के पग नूपुर बाजे सो भी साहब सुनता है।" 


जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति क्या है ? 

[।। Yug-Purush ।। What is Jeevan Mukti and Videha Mukti ?] 

जीतेजी मुक्ति या भगवत-पाप्ति कोई ऐसी चीज नहीं है , जो किसी परलोक में पहुँचने से मिलती है। मुक्ति तो जब होगी इसी जीवन में होगी। जब कभी हो , मरने के बाद नहीं जीवित रहते ही मुक्ति होती है। मुक्ति के लिए दो शब्द है, एक शब्द है जीवनमुक्ति - ('निश्चल तत्त्वे जीवनमुक्ति)।' और दूसरा शब्द है विदेहमुक्ति। अर्थात देह का न रहना। विदेहमुक्ति का अर्थ है जीतेजी जो मुक्त है , उसका देह न रहना। जीवनमुक्त है उसका देह छूटना अभी बाकी है। मानसिक तौर से तो वो मुक्त हो गया, पर शरीर का अभी जेल से बाहर आना बाकी है। जैसे जेल में बन्द कैदी कोर्ट से छूट गया , पर अभी जेल के भीतर ही है। मानसिक तौर से तो वो मुक्त हो गया पर शरीर और व्यक्ति का जेल से बाहर आना बाकी है। शरीर के रहते हुए जो ज्ञान को उपलब्ध हो गए वो मुक्त हो गए। अब रह गया उसके शरीर का छूटना। इसी तरह शरीर , इन्द्रिय , मन, बुद्धि के रहते हुए जो आत्मज्ञानी हो गया , गुणातीत हो गया वो मुक्त हो गया पर   
जीवनमुक्त होकर भी अभी शरीर में रहना पड़ेगा। ज्ञान होने के बाद एक ही दिन में नहीं जाने वाला है , ये शरीर। इसमें अभी 10 वर्ष , 50 वर्ष रहना है। जीवन्मुक्त को शरीर में अभी रहना पड़ेगा। जो कोई भी ज्ञानी जन (महापुरुष) मुक्त हुए , महर्षि रमण , अरविन्द , रामतीर्थ, आदिगुरु शंकराचार्यजी जैसे जितने भी ज्ञानी हो गए हैं , वे सभी जीवनमुक्त हैं , पर अभी शरीर में रहना पड़ेगा। शरीर में रहने से कुछ कष्ट तो होंगे। यदि आपका जो वास्तविक मैं है (Real I -आत्मा) है वो ब्रह्म के साथ चला गया , हो आया। पर अब वह फिर देह में आएगा - दुकान जायेगा। लेकिन अब आपको गुरुमंत्र लेने की जरूरत नहीं रहेगी। उसी तरह कोई ज्ञानी एक बार ब्रह्मता को प्राप्त हो गया , तो बस होगया। अब रास्ता (इष्टदेव का नाम) दिखाने वाला नहीं चाहिए। देह में आएगा , देह में रहेगा , फिर वापस जायेगा। पर एक दिन देह ही नहीं रहेगा। अभी तो देह में आएगा , लौट जायेगा अपने घर ? परमात्मा से जुड़ता रहेगा , पर एक दिन देह ही नहीं रहेगा। पर जब तक देह है , नींद से या ध्यान (समाधि?) से वापस आना पड़ता है, इन आँखों में इन हाथों में। यदि देह न रहे तो स्वप्न भी नहीं देख सकते। लेकिन जब शरीर ही न रहेगा मृत्यु के बाद तब उसको इस शरीर में आने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन जो आमलोग हैं - जो जीवनमुक्त नहीं हुए हैं , वे फिर नया शरीर प्राप्त करेंगे। अभी उनके कर्म भोग हैं , उसे भोगने पड़ेंगे। मृत्यु के बाद एक लौटता है , एक नहीं लौटता। जो  देह नहीं रहने के बाद, देह में नहीं लौटते वे विदेह मुक्त हो गए। (10:41) जो आते हैं , वो मुक्त नहीं हैं वासना वाले हैं। एक का आना  और एक का दुबारा देह में न आना वो निर्भर है , अभी की हमारी सोच पर। जिसमें वासना है , भोगने के लिए आना चाहता है , तो आ जायेगा। सभी लोग मुक्ति भी नहीं चाहते हैं, क्योंकि वे बंधन में हैं -इसका उन्हें बोध ही नहीं है। असल में हमारे अन्तःकरण में तीन गुण-सतोगुण , रजोगुण , तमोगुण हैं , जो शरीर रहने तक काम करते हैं। शरीर में रहने तक सोना और जागना होता रहेगा। शरीर रहने तक आपको इन गुणों के अधीन रहना पड़ेगा। बूढ़ा होना नहीं चाहते हो , पर बूढ़ा होना प्रकृति का नियम है , तुम्हारी इच्छा से क्या होगा ? शरीर ही न रहेगा तो बूढ़े भी नहीं होंगे। मानलो अगला जन्म ही न होगा तो बूढ़े कैसे होंगे ? तो ये अध्यात्म और सत्संग (गुरु- शिष्य) भी एक Science है - एक विज्ञान है। पर इस विज्ञान को यदि उपलब्ध नहीं कर सकते हो ,  तो दूसरा सिद्धांत है -  कर्म का सिद्धान्त है -जो करोगे सो भरोगे। बुद्धि/ मति या दृष्टि में जैसी इच्छा, वासना वाले और कर्म वाले होंगे, वैसी गति होगी - वैसी अगली यात्रा होगी। 
    इसलिए आम आदमी अगर विज्ञान (अतीन्द्रिय ज्ञान) न प्राप्त कर सकें , तो अच्छे कर्म करें। धर्म पूर्वक चलें। नहीं तो ज्ञान के बाद भी प्रारब्ध भोग कर ही नष्ट होता हैं। हमारी वासना अच्छी होगी तो अगला जन्म अच्छा होगा। अगला जन्म इस जन्म के सद्कर्मों पर निर्भर है। बुरे काम छोड़ना चाहिए, नहीं तो उसका फल भोगना पड़ेगा। इस जन्म में जिन संकटों का सामना करना पड़ा , वो क्यों करना पड़ा ? ये तुम्हारे ही किसी कर्म के फल हैं। सुख और दुःख देने वाला कोई दूसरा नहीं है। मेरे ही कर्मों के फल हैं। इसलिए आज से कर्मों के प्रति सावधान हैं , तो आगे ठीक होगा। भविष्य को अगर ठीक करना है , तो आज को ठीक करना होगा।  हमारा जो आज का जीवन है वो हमारा निर्माण किया हुआ है। जिसके बीज हमने पहले बोये थे , वो आज काट रहे हैं।इसलिए आगे हमेशा पवित्र कर्म ही करो , इसके लिए सावधान रहना होगा। (18:24) जप-ध्यान या सद्कर्म (Be and Make) मुक्ति के लिए नहीं करें , तो अगले जन्म के लिए करें। और मुक्ति के लिए तो कर्म की बात है ही नहीं।
 
न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।

बहुत कर्मों से , बहुत सन्तानों से मोक्ष नहीं होता। बल्कि मुक्ति केवल आत्मज्ञान से होती है। (मिथ्या मैं के त्याग से होती है।) भोग ही अगर चाहिए तो अच्छे कर्म करो। कई लोगों को इस जन्म में मिला हुआ है , पहले जन्म में अच्छा किया होगा। इस जन्म में सुख-सुविधा मिली है तो पहले जन्म में अच्छा किया होगा। (22:39)    
 हर व्यक्ति को पहले कर्म करने में धर्मात्मा होना चाहिए। अच्छा है दुःख -अपमान मिला तो जो प्रारब्ध था वो कट गया। एक गलत काम से यदि दुःख हुआ तो हमको प्रेरणा मिली कि आगे से कोई गलत काम नहीं करूँगा। जिसका बछड़ा उसी गाय की तरफ जाता है। पुराना किया हुआ कर्मफल आत्मज्ञानी को भी भोगना पड़ेगा। (26:08) ज्ञान इसलिए प्राप्त नहीं करते कि हमें माफ़ किया जाए , बल्कि इसीलिए कि हमें अगला जन्म -हो तो पिवत्र-त्रयी के साथ ही हो। जीव का जन्म प्रारब्ध भोगने के लिए होता है , अवतार वरिष्ठ या पवित्र -त्रयी का जन्म लोकहित के लिए होता है। या नेता को कथा सुनाने का काम मिलता है। शरीर का जो होना है , होगा। हमें जो करना चाहिए वो पवित्र कर्म करते चलो। परिवार जैसा मिला है , वो मिला है। कर्म से मिला है। अच्छे कर्म करो या ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके आवागमन से मुक्त हो जाओ। इसलिए हम फिर लेना पसंद ही न करें। हम ही परमात्मा में समा जाएँ -ब्रह्मलीन हो जाएँ। पवित्र -त्रयी से अलग मेरा फिर कभी कोई अस्तित्व ही न हो। (32:21) श्रद्धा के साथ जप करें। तो इसका परिणाम भी अच्छा आएगा। पवित्र त्रयी के सिवा कुछ न चाहो। जो होना है होगा -सब छोड़ दिया भगवान पर। प्रकृति पर छोड़ दिया , परमात्मा पर छोड़ दिया , ग्रहों पर छोड़ दिया, प्रारब्ध पर छोड़ दिया। जो होना है हो जायेगा , फिर तुम्हें क्या करना है ? जप यज्ञ करते रहो। जपात सिद्धिः - जप से सिद्धि प्राप्त होगी। प्रभु का स्मरण , जब तक शरीर है हमें श्रद्धा पूर्वक स्वामीजी का काम करना है Be and Make में लगे रहना है।
   दो तरह के भगवान - एक जो भक्त को दीखते हैं , दूसरे जो भक्त को देखते हैं। भगवान तुम्हें इस समय देख रहे हैं। (37:28) भगवान तुम्हारे जप के साक्षी हैं। गवाही हैं। वो तुम्हें देख रहे हैं , तुम्हें नहीं दिख रहे हैं।  "चींटी के पग नूपुर बाजे सो भी साहब सुनता है।" साहेब से कुछ छिपा नहीं है। जो जाप को देख रहा है , उस परमात्मा में तुम लीन हो जाओ। जो सदा निराकार , निर्विकार हमारे मन का सदा साक्षी है ,सदा अन्तर्यामी है वो हमारे मन में ही है।  
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सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

⚜️️🔱श्रीमद् भगवद्गीता : अध्याय-1. अर्जुन विषाद योग : युद्ध के परिणाम पर शोक प्रकट करना⚜️️🔱

अध्याय - 1.

अर्जुन विषाद योग 

 [युद्ध के परिणाम पर शोक प्रकट करना] 

भगवद्गीता का उपदेश एक ही वंश के दो चचेरे भाइयों कौरव और पाण्डवों के मध्य हुए महाभारत युद्ध की रणभूमि पर दिया गया है। 

भगवद्गीता का प्रारंभ राजा धृतराष्ट्र और उसके मंत्री संजय के वार्तालाप से होता है। चूंकि धृतराष्ट्र नेत्रहीन था इसलिए वह व्यक्तिगत रूप से युद्ध में उपस्थित नहीं हो सका। अत: संजय उसे युद्धभूमि पर घट रही घटनाओं का पूर्ण सजीव विवरण सुना रहा था। संजय महाभारत के प्रख्यात रचयिता वेदव्यास के शिष्य थे। ऋषि वेदव्यास अपनी अलौकिक शक्ति के द्वारा सुदूर प्रदेशों में घट रही घटनाओं को प्रत्यक्ष रूप से देखने में समर्थ थे। अपने गुरु की अनुकंपा से संजय ने भी दूरदृष्टि की दिव्य चमत्कारिक शक्ति प्राप्त की थी। इस प्रकार से वह युद्ध भूमि में घटित सभी घटनाओं को दूर से देख सका।

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 February 1, 2026 :

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।।1.1।।

धृतराष्ट्र ने कहाः हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर युद्ध करने की इच्छा से एकत्रित होने के पश्चात्, मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?

।।1.2।। संजय ने कहा -- पाण्डव-सैन्य की व्यूह रचना देखकर राजा दुर्योधन ने आचार्य द्रोण के पास जाकर ये वचन कहे।

।।1.3।। दुर्योधन ने कहाः पूज्य आचार्य! पाण्डु पुत्रों की विशाल सेना का अवलोकन करें, जिसे आपके द्वारा प्रशिक्षित बुद्धिमान शिष्य द्रुपद के पुत्र (धृष्टद्द्युम्न) ने कुशलतापूर्वक युद्ध करने के लिए सुव्यवस्थित किया है
अध्याय 1.(4.5.6यहाँ इस सेना में भीम और अर्जुन के समान बलशाली युद्ध करने वाले महारथी युयुधान, विराट और द्रुपद जैसे अनेक शूरवीर धनुर्धर हैं। यहाँ पर इनके साथ धृष्टकेतु, चेकितान काशी के पराक्रमी राजा काशिराज, पुरूजित, कुन्तीभोज और शैव्य सभी महान सेना नायक हैं। इनकी सेना में पराक्रमी युधामन्यु, शूरवीर, उत्तमौजा, सुभद्रा और द्रौपदी के पुत्र भी हैं जो सभी निश्चय ही महाशक्तिशाली योद्धा हैं।
।।1.7।। हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! हमारे पक्ष की और के उन सेना नायकों के संबंध में भी सुनिए, जो सेना को संचालित करने में विशेष रूप से निपुण हैं। अब मैं आपके समक्ष उनका वर्णन करता हूँ।
।।1.8।। इस सेना में सदा विजयी रहने वाले आप तथा भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण तथा सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा आदि महा पराक्रमी योद्धा हैं जो युद्ध में सदा विजेता रहे हैं।
।।1.9।। यहाँ हमारे पक्ष में अन्य अनेक महायोद्धा ऐसे भी हैं जो मेरे लिए अपने जीवन का बलिदान करने के लिए तत्पर हैं। वे युद्ध कौशल में पूर्णतया निपुण और विविध प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित हैं।
।।1.10।। हमारी शक्ति असीमित है और हम सब महान सेना नायक भीष्म पितामह के नेतृत्व में पूरी तरह से संरक्षित हैं जबकि पाण्डवों की सेना की शक्ति भीम द्वारा भलीभाँति रक्षित होने के पश्चात भी सीमित है।

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 February 2, 2026 :

।।1.11।।अतः मैं कौरव सेना के सभी योद्धागणों से आग्रह करता हूँ कि सब अपने मोर्चे पर अडिग रहते हुए भीष्म पितामह की पूरी सुरक्षा करें
।।1.12।।तत्पश्चात् कुरूवंश के वयोवृद्ध परम यशस्वी महायोद्धा भीष्म पितामह ने सिंह-गर्जना जैसी ध्वनि करने वाले अपने शंख को उच्च स्वर से बजाया जिसे सुनकर दुर्योधन हर्षित हुआ।
।।1.13।। इसके पश्चात् शंख, नगाड़े, बिगुल, तुरही तथा मृदंग अचानक एक साथ बजने लगे। उनका समवेत स्वर अत्यन्त भयंकर था।
।।1.14।। तत्पश्चात् पाण्डवों की सेना के बीच श्वेत अश्वों द्वारा खींचे जाने वाले भव्य में बैठे माधव (श्रीकृष्ण) और पाण्डुपुत्र अर्जुन ने भी अपने दिव्य शंख बजाये।
।।1.15।।हृषीकेश भगवान् कृष्ण ने अपना पाञ्चजन्य शंख बजाया, धनंजय (अर्जुन) ने देवदत्त शंख तथा अतिभोजी एवं अति दुष्कर कार्य करने वाले भीम ने पौण्डू नामक भीषण शंख बजाया
।।1.(16, 17, 18)  हे राजन्! राजा युधिष्ठिर ने अपना अनन्त विजय नाम का शंख बजाया तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष एवं मणिपुष्पक नामक शंख बजाये। श्रेष्ठ धनुर्धर काशीराज, महा योद्धा शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट, अजेय सात्यकि, द्रुपद, द्रौपदी के पांच पुत्रों तथा सुभद्रा के महाबलशाली पुत्र वीर अभिमन्यु आदि सबने अपने-अपने अलग-अलग शंख बजाये
।।1.19।। वह भयंकर घोष आकाश और पृथ्वी पर गूँजने लगा और उसने धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय विदीर्ण कर दिये।
।।1.20।।हे महीपते ! उस समय हनुमान के चित्र से अंकित ध्वजा (कपिध्वज ) लगे रथ पर आसीन पाण्डु पुत्र अर्जुन अपना धनुष उठा कर बाण चलाने के लिए उद्यत दिखाई दिये। हे राजन! आपके पुत्रों को अपने विरुद्ध व्यूह रचना में खड़े देख कर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से यह वचन कहे।
।।1.21।। अर्जुन ने कहा -- हे! अच्युत मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य खड़ा कीजिये। 

।।1.22।।जिससे मैं युद्ध की इच्छा से खड़े इन लोगों का निरीक्षण कर सकूँ कि इस युद्ध में मुझे किनके साथ युद्ध करना है।
कथा के इस बिन्दु तक महाभारत का अजेय योद्धा अर्जुन अपने मूल स्वभाव के अनुसार व्यवहार कर रहा था। उसमें किसी प्रकार की मानसिक उद्विग्नता के कोई लक्षण नहीं दिखाई दे रहे थे।
।।1.23।।दुर्बुद्धि धार्तराष्ट्र (दुर्योधन) का युद्ध में प्रिय चाहने वाले जो ये राजा लोग यहाँ एकत्र हुए हैं, उन युद्ध करने वालों को मैं देखूँगा। एक कर्मशील व्यक्ति होने के कारण वह कोई अनावश्यक संकट मोल नहीं लेना चाहता। इसलिये वह देखना चाहता है कि वे कौन से दुर्मति सत्तामदोन्मत्त और प्रलोभन से प्रताड़ित लोग हैं जो कौरव सेनाओं में सम्मिलित होकर सर्वथा अन्यायी तानाशाह दुर्योधन का समर्थन कर रहे हैं।

।।1.25।। 
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्य एतान् समवेतान् कुरून् इति।।1.25।।

 संजय बोले - हे भरतवंशी राजन्! निद्राविजयी अर्जुन के द्वारा इस तरह कहने पर दोनों सेनाओं के मध्यभाग में पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण के सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने श्रेष्ठ रथ को खड़ा करके, अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण ने इस तरह कहा कि 'हे पार्थ! इन इकट्ठे हुए कुरुवंशियों को देख'। सम्पूर्ण प्रथम अध्याय में केवल ये ही शब्द हैं जिन्हें भगवान ने कहा है। उन शब्दों ने उस चिनगारी का काम किया जिसने अर्जुन के (मिथ्या) अहंकार पर आधारित झूठे मूल्यों एवं धारणाओं के महल को जलाकर राख कर दिया। इसके पश्चात् हम देखेंगे कि इन शब्दों की अर्जुन पर क्या प्रतिक्रिया हुई और किस प्रकार अर्जुन का मन [मिथ्या अहं- प्रत्येक जीव (पितामह और गुरु द्रोण) भी देह नहीं ब्रह्म है ?]  टूटकर बिखर गया।
 "कुरु" शब्द का प्रयोग कौरवों और पाण्डवों दोनों के लिए किया गया है क्योंकि दोनों कुरु वंशज थे। भगवान श्रीकृष्ण ने जान बूझकर इस शब्द का प्रयोग किया ताकि अर्जुन में बंधुत्व की भावना जागृत हो और उसे यह प्रतीत हो कि वे सब एक ही हैं। वे चाहते थे कि बंधुत्व की भावना से (पितामह और गुरु में अपना और पराया कौन है ? इसे देखने से ) अर्जुन में मोह उत्पन्न होगा और जिससे वह विचलित हो जाएगा। जिसके परिणामस्वरूप उन्हें आगे आने वाले कलियुग में मानव मात्र के कल्याण के लिए गीता के सत्य सिद्धान्तों का (महावाक्यों का) दिव्य उपदेश देने का अवसर प्राप्त होगा। 

पार्थ का अर्थ है पृथापुत्र अर्जुन। पृथा कुन्ती का दूसरा नाम है। इस संस्कृत शब्द पार्थ में पार्थिव की गन्ध मिलती है जिसका अर्थ है पंचभूतों से निर्मित नश्वर देह। यह सम्बोधन अत्यन्त अर्थपूर्ण है। इसका तात्पर्य यह है कि गीता 'परम सत्य' का संदेश है जिसे अमृत स्वरूप भगवान् (अवतार-नेता) ने मनुष्य के सार्वकालिक प्रतिनिधि र्मत्य पुरुष अर्जुन को सुनाया है।
।।1.26।।वहाँ अर्जुन ने उन दोनों सेनाओं में खड़े पिता के भाइयों,  पितामहों,  आचार्यों,  मामों, भाइयों, पुत्रों,  पौत्रों,  मित्रों,  श्वसुरों और सुहृदों को भी देखा।

।।1.27।।इस प्रकार उन सब बन्धु-बान्धवों को खड़े देखकर कुन्ती पुत्र अर्जुन का मन करुणा से भर गया और विषादयुक्त होकर उसने यह कहा। 
संभवत इस दृश्य को देखकर पहली बार एक पारिवारिक कलह के भयंकर दुखदायी परिणाम का अनुमान वह कर सका जिससे उसका अन्तरतम तक हिल गया। कारण जो कुछ भी रहा हो लेकिन यह स्पष्ट है कि इस दृश्य को देखकर उसका हृदय करुणा और विषाद से भर गया। परन्तु इस समय की उसकी करुणा स्वाभाविक नहीं थी।  इस समय अर्जुन के मन तथा बुद्धि परस्पर वियुक्त हो चुके थे क्योंकि स्वयं को सर्वश्रेष्ठ वीर समझने के कारण उसके मन में युद्ध में विजयी होने की प्रबल आतुरता थी। पूर्व की दमित भावनायें और वर्तमान की विजय की व्याकुलता के कारण उसकी विवेक बुद्धि (आत्मनिष्ठ बुद्धि) विचलित हो गयी। और अब खुद को केवल शरीर समझ रहा था। 
।।1.28।।अर्जुन ने कहा -- हे कृष्ण ! युद्ध की इच्छा रखकर उपस्थित हुए इन स्वजनों को देखकर मेरे अंग शिथिल हुये जाते हैं, मुख भी सूख रहा है और मेरे शरीर में कम्प तथा रोमांच हो रहा है।।
 बुद्धि की आसक्ति सांसारिक आसक्ति देह-इन्द्रियों से या आत्मा (इष्टदेव से) आध्यात्मिक आसक्ति  हो सकती है। किसी संबंधी के लिए मोह-होना सांसारिक आसक्ति है जो स्वयं को शरीर (M/F)  समझने के कारण उत्पन्न होती है। स्वयं को शरीर समझने पर दैहिक संबंधियों (पत्नी/पुत्र-पुत्री/ भाई) में आसक्ति हो जाती है। अज्ञानता (अविद्या , अस्मिता , राग -द्वेष, अभिनिवेश पंचक्लेश )  से उत्पन्न यह आसक्ति हमें घोर सांसारिक बना देती है। अन्ततोगत्वा इस आसक्ति का अंत भी दुखदायी होता है क्योंकि शरीर का अंत होने पर पारिवारिक संबंध भी समाप्त हो जाता है।
 दूसरी ओ आत्मा (ईश्वर भगवान इष्टदेव) हमारी शुद्ध बुद्धि/मति के सच्चे पिता, माता, सखा, स्वामी और प्रियतम हैं। इसलिए शुद्ध बुद्धि का आत्मा के स्तर पर भगवान में अनुरक्त होना आध्यात्मिक आसक्ति है जो हमारी चेतना का विकास है और हमारी बुद्धि को आत्मनिष्ठ बनाता है। भगवान के प्रति प्रेम एक महासागर की तरह है जिसकी व्यापकता में सब कुछ समा जाता है जबकि दैहिक संबंध अपूर्ण और स्वार्थपरता से पूर्ण होते हैं। 
BG 1.29-31: मेरा सारा शरीर काँप रहा है, मेरे शरीर के रोएं खड़े हो रहे हैं, मेरा धनुष ‘गाण्डीव' मेरे हाथ से सरक रहा है और मेरी पूरी त्वचा में जलन हो रही है। मेरा मन उलझ रहा है और मुझे घबराहट हो रही है। अब मैं यहाँ और अधिक खड़ा रहने में समर्थ नहीं हूँ। केशी राक्षस का वध करने वाले हे केशव! मुझे केवल अमंगल के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। युद्ध में अपने वंश के बंधु बान्धवों का वध करने में मुझे कोई अच्छाई नही दिखाई देती है और उन्हें मारकर मैं कैसे सुख पा सकता हूँ?

।।1.33।।हमें जिनके लिये राज्य,  भोग और सुखादि की इच्छा है,  वे ही लोग धन और जीवन की आशा को त्यागकर युद्ध में खड़े हैं।
   यहाँ अर्जुन अनुचित भावों को प्रदर्शित कर रहा है और उसे श्रेष्ठ मान रहा है। सांसारिक भोगों और भौतिक सुख-समृद्धि के प्रति विरक्ति प्रशंसनीय है किन्तु अर्जुन आध्यात्मिक भावों से युक्त नहीं है। अपितु उसकी मूढ़बुद्धि या सम्मोहित बुद्धि - मोह और करुणा का  रूप धारण कर उससे छल कर रही  है। उसकी अपनी बुद्धि ही अर्जुन को धोखा दे रही है , ओरे नित्यमुक्त अविनाशी आत्मा से जुड़ने न देकर , पुनः नश्वर देह-इन्द्रियों में बांध रही है।  शुद्ध मनोभाव, आंतरिक सामंजस्य और संतोष आत्मा को सुख प्रदान करते हैं। यदि अर्जुन की भावनाएँ अलौकिक की होती, स्वयं को M/F नश्वर शरीर समझने से उत्पन्न न हुई होती , तब तो वह मोहजनित संवेदनाओं से ऊपर उठ चुका होता। लेकिन उसके मनोभाव सर्वथा प्रतिकूल हैं क्योंकि वह अपने मन और बुद्धि में असामंजस्य और अपने कर्तव्य पालन के प्रति असंतोष और अपने भीतर गहन दुःख का अनुभव कर रहा है। उस पर हावी संवेदनाओं का प्रभाव यह दर्शाता है कि उसकी मूढ़बुद्धि/ मति / दृष्टि में करुणा उसके मोह से उत्पन्न हुई हैं। और जैसी मति होगी , वैसी गति होगी। 
।।1.34 -- 1.35।। आचार्य, पिता, पुत्र और उसी प्रकार पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं, मुझ पर प्रहार करने पर भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, और हे मधुसूदन! मुझे त्रिलोकी का राज्य मिलता हो, तो भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिये तो, मैं इनको क्या मारूँ? 
एक ही क्षत्रिय परिवार के लोगों के बीच होने जा रहे इस गृहयुद्ध के विरुद्ध अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण को अन्य तर्क भी देता है। भावाविष्ट अर्जुन अपने कायरतापूर्ण पलायन के लिये अनेक तर्क देकर, अपने युद्ध न करने के विचार को उचित सिद्ध करना चाहता है।  जबकि वास्तव में वह भाग्य से प्राप्त कर्तव्य करने से वास्तव में वह दूर भाग रहा है। उसने जो कुछ पहले कहा था उसी को वह दोहराता रहता है क्योंकि श्रीकृष्ण अपने गूढ़ मौन द्वारा उसके तर्क स्वीकार नहीं कर रहे थेभगवान् के अधरों की तीक्ष्ण मुस्कान अर्जुन को लज्जित कर रही थी। वह अपने अपने विचारों के प्रति अपने मित्र एवं सारथि बुद्धि श्रीकृष्ण (शुद्धबुद्धि ,अन्तरात्मा , अवतारवरिष्ठ) की स्वीकृति और सहमति चाहता था परन्तु न तो उनकी दृष्टि के भाव से और न ही उनके शब्दों से उसे इच्छित सहमति मिल रही थी। जिससे कि भगवान् उसके मत की पुष्टि करें अर्जुन व्यर्थ में त्याग की बातें करता है। वह यह दर्शाना चाहता है कि वह इतना उदार हृदय है कि उसके चचेरे भाई उसको मार भी डालें तो भी वह उन्हें मारने को तैयार नहीं होगा। अतिशयोक्ति की चरम सीमा पर वह तब पहुँचता है जब वह घोषणा करता है कि त्रैलोक्य का राज्य मिलता हो तब भी वह युद्ध नहीं करेगा; फिर केवल हस्तिनापुर के राज्य की बात ही क्या है।
।।1.36।। हे जनार्दन ! धृतराष्ट्र के पुत्रों की हत्या करके हमें क्या प्रसन्नता होगी?  इन आततायियों को मारकर तो हमें केवल पाप ही लगेगा।
अपने शुद्ध दिव्य स्वरूप अविनाशी (आत्मा -इष्टदेव) के विपरीत हम जो गलत काम करते हैं वे पाप कहलाते हैं। शरीर मन और बुद्धि को (Apparent I) को ही अपना स्वरूप (Real I) समझकर कोई कर्म करना श्रेष्ठ मनुष्य (विवेकी मनुष्य, आत्मज्ञानी)  का लक्षण नहीं है। मिथ्या अहंकार (M/F भाव से ) अपने स्वार्थ के लिये किये गये कर्म हमारे 'कच्चा मैं'  और शुद्ध चैतन्य स्वरूप 'पक्का मैं' आत्मा के बीच वासना की सुदृढ़ दीवार खड़ी कर देते हैं। इन्हें ही पाप कहा जाता है। शत्रुओं की हत्या करने में अर्जुन का अविवेकपूर्ण विरोध शास्त्र को न समझने का परिणाम है और फिर अपनी समझ के अनुसार कर्म करना अपनी संस्कृति को ही नष्ट करना है।
इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के तर्कों की न स्तुति करते हैं और न ही आलोचना। वे जानते हैं कि अर्जुन को अपने मन की बात कह लेने देनी चाहिए। किसी मानसिक रोगी के लिए यह उत्तम निदान हैइस प्रकार उसका चित्त शांत हो जाता है
।।1.37।।हे माधव  !  इसलिये अपने बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारना हमारे लिए योग्य नहीं है,  क्योंकि स्वजनों को मारकर हम कैसे सुखी होंगे।
श्रीकृष्ण के मौन से वह और भी अधिक विचलित होकर उनसे दयनीय भाव से प्रार्थना करते हुए अपने मूर्खतापूर्ण निर्णय की पुष्टि चाहता है। दीर्घकाल तक साथ में रहने से दोनों में स्नेहभाव बढ़ गया था और इसी कारण अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण को माधव नाम से सम्बोधित करके पूछता है कि स्वबान्धवों की ही हत्या करके कोई व्यक्ति कैसे सुखी रह सकता है। भगवान् फिर भी मौन रहते हैं।
।।1.38 -- 1.39।। यद्यपि लोभ के कारण जिनका विवेक-विचार लुप्त हो गया है, ऐसे ये (दुर्योधन आदि) कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होनेवाले पाप को नहीं देखते, (तो भी) हे जनार्दन! कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को ठीक-ठीक जाननेवाले हमलोग इस पाप से निवृत्त होनेका विचार क्यों न करें?
इसी प्रकार अर्जुन का तर्क है कि यदि दुर्योधन और उसके मित्र अन्धे होकर अन्यायपूर्ण आक्रमण करते हैं तो क्या पाण्डवों को शान्ति की वेदी पर स्वयं का बलिदान करते हुये युद्ध से विरत हो जाना उचित नहीं है यह धारणा स्वयं में कितनी खतरनाक है इसको हम तब समझेंगे जब गीता के आगामी परिच्छेदों में तत्त्वज्ञान के महत्त्वपूर्ण अंश को देखेंगे जो भारतीय जीवन का सारतत्त्व है। अधर्म का सक्रिय प्रतिकार ही एक मुख्य सिद्धांत है जिसका भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में प्रतिपादन किया है।
।।1.40।।कुल के नष्ट होने से सनातन धर्म नष्ट हो जाते हैं। धर्म नष्ट होने पर सम्पूर्ण कुल को अधर्म (पाप) दबा लेता है।
सभ्यता और संस्कृति के क्षेत्र में नएनए प्रयोग करने में हमारे पूर्वजों की सदैव विशेष रुचि रही है। वे जानते थे कि राष्ट्र की संस्कृति की इकाई कुल की संस्कृति होती है। इसलिये यहाँ अर्जुन विशेष रूप से कुल धर्म के नाश का उल्लेख करता है क्योंकि उसके नाश के गम्भीर परिणाम हो सकते हैं।
।।1.41।। हे कृष्ण ! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियां दूषित हो जाती हैं,  और हे वार्ष्णेय ! स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है
प्राचीन काल में वर्ण विभाग का आधार समाज के व्यक्तियों की मानसिक व बौद्धिक क्षमता और पक्वता होती थी। बुद्धिमान तथा अध्ययन अध्यापन एवं अनुसंधान में रुचि रखने वाले लोग ब्राह्मण कहलाते थे। क्षत्रिय वे थे जिनमें राजनीति द्वारा राष्ट्र का नेतृत्व करने की सार्मथ्य थी और जो अपने ऊपर इस कार्य का उत्तरदायित्व लेते थे कि राष्ट्र को आन्तरिक और बाह्य आक्रमणों से बचाकर राष्ट्र में शांति और समृद्धि लायें। कृषि और वाणिज्य के द्वारा समाज सेवा करने वालों को वैश्य कहते थे। वे लोग जो उपयुक्त कर्मों में से कोई भी कर्म नहीं कर सकते थे शूद्र कहे जाते थे। उनका कर्तव्य सेवा और श्रम करना था। हमारे आज के समाज-सेवक और अधिकारी वर्ग कृषक और औद्योगिक कार्यकर्त्ता आदि सभी उपर्युक्त वर्ण व्यवस्था में आ जाते हैं।
समाज में नैतिक पतन होने पर अनियन्त्रित वासनाओं में डूबे युवक और युवतियाँ स्वच्छन्दता से परस्पर मिलते हैं। कामना के वश में वे सामाजिक और सांस्कृतिक विकास का किंचित भी विचार नहीं करते। इसलिये अर्जुन को भय है कि वर्णसंकर के कारण समाज और संस्कृति का पतन होगा।
।।1.42।।वह वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने का कारण बनता है। पिण्ड और जलदान की क्रिया से वंचित इनके पितर भी नरक में गिर जाते हैं।
पुरातन परम्पराओं और प्रथाओं के अनुसार कुल के वयोवृद्ध लोग उच्च मूल्यों और आदर्शों को अगली पीढ़ी के कल्याण हेतु उन्हें हस्तांतरित करते हैं। ये महान परम्पराएं कुल के सदस्यों को मानवीय मूल्यों और धार्मिक मर्यादाओं का पालन करवाने में सहायता करती हैं। यदि कुल के वयोवृद्धों की समय से पूर्व मृत्यु हो जाती है तब भावी पीढ़ियां कुल के उनके मार्गदर्शन और शिक्षण से वंचित हो जाती हैं। अर्जुन के कहने का तात्पर्य यह है कि जब कुलों का विनाश हो जाता है तब उसकी महान परम्पराएं भी उसके साथ समाप्त हो जाती हैं और कुल के शेष सदस्यों में अधर्म और व्यभिचार की प्रवृत्ति बढ़ती है जिससे वे अपनी आध्यात्मिक उन्नति का अवसर खो देते हैं। 
प्रत्येक पीढ़ी अपनी संस्कृति की आलोकित ज्योति भावी पीढ़ी के हाथों में सौंप देती है। नई पीढ़ी का यह कर्तव्य है कि वह इसे सावधानीपूर्वक आलोकित अवस्था में ही अपने आगे आने वाली पीढ़ी को भी सौंपे। संस्कृति की रक्षा एवं विकास करना हमारा पुनीत कर्तव्य है।
ऋषि मुनियों द्वारा निर्मित भारतीय संस्कृति आध्यात्मिक है जिसकी सुरक्षा धार्मिक विधियों पर आश्रित होती है। इसलिये हिन्दुओं के लिए संस्कृति और धर्म एक ही वस्तु है। हमारे प्राचीन साहित्य में संस्कृति शब्द का स्वतन्त्र उल्लेख कम ही मिलता है। उसमें अधिकतर धार्मिक विधियों के अनुष्ठान पर ही बल दिया गया है।
वास्तव में हिन्दू धर्म सामाजिक जीवन में आध्यात्मिक संस्कृति संरक्षण की एक विशेष विधि है। धर्म का अर्थ है उन दिव्य गुणों को अपने जीवन में अपनाना जिनके द्वारा हमारा शुद्ध आत्मस्वरूप स्पष्ट प्रकट हो। अतः कुलधर्म का अर्थ परिवार के सदस्यों द्वारा मिल-जुल कर अनुशासन और ज्ञान के साथ रहने के नियमों से है। परिवार में नियमपूर्वक रहने से देश के एक योग्य नागरिक के रूप में भी हम आर्य संस्कृति को जी सकते हैं।
।।1.43।। इन वर्णसंकर पैदा करनेवाले दोषोंसे कुलघातियों के सदा से चलते आये कुलधर्म और जातिधर्म नष्ट हो जाते हैं।
यह सुविदित है कि प्रत्येक युद्ध के बाद समाज में नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों का सहसा कितना पतन होने लगता है। अनैतिकता और छलकपट की प्रवृत्तियों के नीचे दबा हाँफ रहा आज का युग उपरोक्त तथ्य का ज्वलंत उदाहरण है। युद्ध के बाद न केवल लंगड़े लूलों की संख्या बढ़ती है वरन् उससे भी भयंकर परिणाम मन की गंभीर विकृतियों के रूप में सामने आते हैं।  इसलिए मनु स्मृति में वर्णन किया गया है:'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।' 
।।1.44।।हे जनार्दन !  हमने सुना है कि जिनके यहां कुल धर्म नष्ट हो जाता है,  उन मनुष्यों का अनियत काल तक नरक में वास होता है।
इसके उपरान्त भी भगवान् कुछ नहीं बोले। अब अर्जुन की स्थिति ऐसी हो गयी थी कि वह न तो चुप रह सकता था और न उसको नये तर्क ही सूझ रहे थे। परन्तु भगवान् के मौन का प्रभाव भी अनूठा ही था। इस श्लोक में अर्जुन पारम्परिक कथन ही उद्धृत करता है।
।।1.45।।अहो  !  शोक है कि हम लोग बड़ा भारी पाप करने का निश्चय कर बैठे हैं,  जो कि इस राज्यसुख के लोभ से अपने कुटुम्ब का नाश करने के लिये तैयार हो गये हैं।
।।1.45।।अहो  !  शोक है कि हम लोग बड़ा भारी पाप करने का निश्चय कर बैठे हैं,  जो कि इस राज्यसुख के लोभ से अपने कुटुम्ब का नाश करने के लिये तैयार हो गये हैं। ।
 आत्मविश्वास को खोकर वह कहता है अहो हम पाप करने को प्रवृत्त हो रहे हैं . इत्यादि। इस वाक्य से स्पष्ट ज्ञात होता है कि परिस्थिति पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के स्थान पर अर्जुन स्वयं उसका शिकार बन गया है। आत्मविश्वास के अभाव में एक कायर के समान वह स्वयं को असहाय अनुभव कर रहा है
।।1.46।।यदि मुझ शस्त्ररहित और प्रतिकार न करने वाले को ये शस्त्रधारी कौरव रण में मारें,  तो भी वह मेरे लिये कल्याणकारक होगा।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि युद्ध में विजयरूपी फल में अत्यन्त आसक्ति और उसकी चिन्ता के कारण अर्जुन आत्मशक्ति खोकर एक उन्माद के मानसिक रोगी के समान विचित्र व्यवहार करने लगता है।
।।1.47।।संजय ने कहा  --  रणभूमि (संख्ये) में शोक से उद्विग्न मनवाला अर्जुन इस प्रकार कहकर बाणसहित धनुष को त्याग कर रथ के पिछले भाग में बैठ गया।
अठारह अध्यायी गीतोपनिषद् के प्रथम अध्याय का नाम अर्जुनविषादयोग है। इन अध्यायों को उपनिषद् कहने का कारण यह है कि इनमें उपनिषद् के विषय का ही प्रतिपादन किया गया है। इनके लक्ष्यार्थ को ऐसे पाठक गण नहीं समझ सकेंगे जो बिना किसी पूर्व तैयारी के इनका अध्ययन करेंगे। सरल प्रतीत होने वाले श्लोकों में छिपे गूढ़ार्थ को समझने के लिये मनन की अत्यन्त आवश्यकता होती है। उपनिषद् विद्या के समान यहाँ भी गीता के श्लोकों में निहित परमार्थ निधि को पाने के लिये एक कृपालु एवं योग्य गुरु की आवश्यकता है
उपनिषद् शब्द का अर्थ है वह विद्या जिसका अध्ययन गुरु के समीप (उप) पहुँचकर उसके चरणों के पास अत्यन्त नम्र भाव से और निश्चयपूर्वक (नि) बैठकर (षद्) किया जाता है। विश्व के सभी धार्मिक शास्त्र ग्रन्थों का विषय एक ही है। वे सभी हमको यह शिक्षा देते हैं कि इस नित्य परिवर्तनशील जगत् के पीछे एक अविनाशी पारमार्थिक सत्य है जो इस जगत् का मूल स्वरूप है। इस अद्वैत सत्य को हिन्दू धर्म ग्रन्थों में ब्रह्म कहा गया है। इसलिये ब्रह्म का ज्ञान तथा उसके अनुभव के लिये साधनों का उपदेश देने वाली विद्या ब्रह्मविद्या कहलाती है। हिन्दू दर्शनशास्त्र के दो भाग हैं तत्त्वज्ञान और योगशास्त्र। इस दूसरे भाग में अभ्यसनीय साधनों का वर्णन किया गया है।
योग शब्द युज धातु से बना है जिसका अर्थ है जोड़ना । स्वयं को (देहाध्यास और जिवाध्यास में फँसी मूढ़ बुद्धि मति को, जैसी मति वैसी गति ) वर्तमान की स्थिति से ऊँचा उठाकर किसी श्रेष्ठ एवं पूर्ण आदर्श 'आत्मा' (ह्रदय में विद्यमान इष्टदेव)  को प्राप्त करने के लिये साधक जो प्रयत्न करता है उसे योग कहते हैं और इस विज्ञान को योगशास्त्र। संकल्प वाक्य में गीता को योगशास्त्र कहा जाता गया है। इसलिये इससे हम उन साधनों के ज्ञान की अपेक्षा रखते हैं जिनके अभ्यास द्वारा परमार्थ सत्य का साक्षात् अनुभव प्राप्त किया जा सकता है।
यहाँ इस ज्ञान का उपदेश स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण अपने परम मित्र अर्जुन को ऐसी संघर्षपूर्ण स्थिति के संदर्भ में दे रहे हैं जहाँ वह पूर्णतया मानसिक सन्तुलन को खोकर विषाद की अवस्था को प्राप्त होता है। इसलिये गीता से हम ऐसे उपदेश और मार्गदर्शन की अपेक्षा रख सकते हैं जो अत्यन्त सहानुभूतिपूर्वक किया गया हो। गीता की यह विशेषता संकल्पवाक्य में यह कहकर बतायी गयी है कि यह स्वयं भगवान् द्वारा एक र्मत्य पुरुष को दिया गया उपदेश है श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
किसी एक व्यक्ति समाज या राष्ट्र में धर्म और तत्त्वज्ञान की माँग तभी होगी जब उनके हृदय में अर्जुन के विषाद का अनुभव होगा। आज का जगत् जितनी अधिक मात्रा में यह अनुभव करेगा कि वह जीवन संग्राम का सामना करने में असहाय है और उसमें यह साहस नहीं कि स्वयं के द्वारा निर्मित अपने प्रिय आर्थिक मूल्यों एवं औद्योगिक लोभ का वह संहार कर सके उतनी ही अधिक मात्रा में वह गीतोपदेश का पात्र है। 
ऐसे समय में ही मनुष्य को पूर्णत्व प्राप्त करने की तीव्र अभिलाषा होती है। विषाद की स्थिति प्राप्त किये बिना अकेले शास्त्र हमारी सहायता नहीं कर सकतेआत्मयोग के पूर्व विषाद की स्थिति अनिवार्य होने के कारण उसे यहाँ योग कहा गया है। गीता में वर्णित योग को सीखने एवं जीने के लिए अर्जुन-विषाद की स्थिति को प्राप्त होना प्राथमिक साधना है
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