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बुधवार, 18 मार्च 2026

⚜️️🔱श्रीमद् भगवद्गीता : अध्याय -7⚜️️🔱अध्याय सात: ज्ञान विज्ञान योग ⚜️️🔱सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप।। माया का सिद्धांत: माया प्रिज्म (आयत) के समान है! ⚜️️🔱सर्वज्ञता का अर्थ ⚜️️🔱 आत्मज्ञान के लिए गुरु के उपदेश तथा स्वयं की साधना की आवश्यकता होती है।⚜️️🔱 "Ours not to question why, Ours but to do and die."ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है ऐसा मेरा मत है ! ⚜️️🔱वासुदेवः सर्वमिति ⚜️️🔱 "

 अध्याय -7 

 ज्ञान विज्ञान योग

30 श्लोकों वाले इस अध्याय का नाम ज्ञान विज्ञान योग है। इस अध्याय के शीर्षक से ही प्रतीत होता है कि जिस विशेष योग के अवलंबन से 'ज्ञान और विज्ञान ' का विकास होता है इस अध्याय में मुख्य रूप से उस योग के विषय में ही चर्चा हुई है। 

ज्ञान शब्द यहाँ परोक्ष अनुभूति और विज्ञान शब्द अपरोक्षानुभूति का सूचक है। श्री रामकृष्ण के वचन ज्ञान और विज्ञान पर नया प्रकाश डालती है। उन्होंने कहा है - " पढ़ने की अपेक्षा सुनना अच्छा है, सुनने की अपेक्षा देखना अच्छा है। देखने से सब सन्देह चला जाता है। गुरुमुख या साधूमुख से सुनने पर धारणा अधिक स्पष्टता से होती है , और शास्त्रों का असार भाग सोचना नहीं पड़ता। ज्ञानी 'नेति नेति ' विचार करते हैं। यह विचार करते करते जहाँ आनन्द मिलता है , वही ब्रह्म है। ज्ञानी का स्वभाव कैसा है ? ज्ञानी कानून के अनुसार चलते हैं। गीता में 'ज्ञानी' शब्द का प्रयोग ज्ञानमार्ग के साधक के उद्देश्य से हुआ है। 

बाद में उन्होंने कहा था - " ईश्वर हैं , इतना जान गया इसका नाम है ज्ञानी। किन्तु लकड़ी जलाकर रसोई पकाना और खाना तथा पूर्ण परितृप्त हो जाना , जिसको होता है , उसका नाम विज्ञानी है।" अर्थात ब्रह्म को शब्द और अर्थ से जानने का नाम है ज्ञान और ब्रह्म को विशेष रूप से जानकर उसमें निरन्तर विलास करना , ब्रह्मानन्द में डूबा रहना विज्ञान है। 

" विज्ञानी के 8 पाश (बंधन) खुल जाते हैं , काम और क्रोध आदि का आकार मात्र रहता है। विज्ञानी सदा ईश्वर (चैतन्य) का दर्शन करता है, इसीसे ऐसा रेलपेल भाव है। ऑंखें खोलकर भी देखते हैं। कभी नित्य में कभी लीला में रहते हैं , फिर कभी लीला से नित्य में जाते हैं। 'नेति नेति ' विचार करके नित्य अखण्ड सच्चिदानन्द में पहुँचते है। विचार करते हैं वह (चैतन्य) जीव नहीं , जगत नहीं और 24 तत्व भी नहीं है। नित्य में पहुँचकर देखते हैं कि वह सब कुछ हुए हैं - जीव, जगत और २४ तत्व। विज्ञानी ईश्वर के आनन्द कस विशेष रूप से उपभोग करते हैं।  

" किसी ने दूध का नाम सुना है , किसी ने देखा है और किसी ने पिया है। विज्ञानी ने दूध पिया है और पीकर आनंद-लाभ किया है और हृष्टपुष्ट भी हुए हैं। ब्रह्मज्ञान के बाद - अर्थात आत्मा से अभिन्न ब्रह्म की अपरोक्षानुभूति के अनन्तर .. ईश्वर कुछ 'मैं' -लोकशिक्षा के लिए छोड़ रखते हैं। नारद आदि आचार्य विज्ञानी थे। जो लोग केवल ज्ञानी हैं वे भयभीत रहते हैं, किन्तु विज्ञानी को किसी से भय नहीं रहता। उन्होंने (माँ के ?) साकार और निराकार दोनों रूप का साक्षात्कार किया है , ईश्वर के साथ वार्तालाप भी किया है। ईश्वर के आनन्द का पूर्ण उपभोग किया है। साधारण मनुष्य या साधक ज्ञानी तक हो सकता है , विज्ञान की अवस्था में नहीं पहुँच सकता। ईश्वर-कोटि तथा आधिकारिक पुरुष जैसे नारद , शुकदेव , बुद्ध , आचार्य शंकर आदि , वे विज्ञानी की अवस्था में पहुँच सकते हैं और बाद में श्रीभगवान (माँ) की विशेष इच्छा से जीवन-भूमि में उतर आते हैं , केवल लोक-कल्याण के लिए। 

जो योगी निरंतर ईश्वर चिंतन करते हुए श्रीभगवान वासुदेव को विशेष रूप से जान सके हैं , वही युक्ततम हैं। 

स्वरुप तत्व कहते हुए भगवान ने बताया - " मेरी दो प्रकृतियाँ हैं -अपरा और परा। अपरा जड़ प्रकृति 8 भागों में विभक्त है - बुद्धि , अहंकार , मन , पृथ्वी, जल , अग्नि , वायु और आकाश। और परा प्रकृति इस समस्त जगत-प्रपंच को धारण कर रही है। इन दोनों प्रकृतियों के संयोग से इस संसार की सृष्टि होती है। भगवान ही संसार के मूल कारण हैं। प्रलय काल में स्थावर -जंगम रूप समस्त संसार भगवान में ही लय प्राप्त होता है। उपनिषद में कहा है - "तज्जलानिति शान्त उपासीत" -(छान्दोग्य 3.14.1) यहाँ  "तज्जलान" शब्द ब्रह्म की तीन अवस्थाओं—उत्पत्ति, लय और स्थिति को दर्शाता है। 

भगवान प्रकृति का कारण होने पर भी स्वाधीन हैं। प्रकृति ही ईश्वर की गुणमयी माया है। जो लोग नितान्त शरणागत होकर श्रीभगवान की उपासना करते हैं , वे ही इस दुस्तर माया का अतिक्रमण कर सकते हैं।

इसके अनन्तर श्रीभगवान ने आशा की वाणी सुनाकर कहा है -आर्त , जिज्ञासु , अर्थार्थी और ज्ञानी - ये 4 प्रकार के भक्त ही उदार और पुण्यवान हैं। क्योंकि भगवान का भक्त संसार में मिलना दुर्लभ है। श्रीभगवान अपने भक्त की पूजा अर्चना से प्रसन्न होकर ही अपना स्वरुप प्रकट करते हैं। और मनुष्य के जन्म-जन्मांतर का मोह-अज्ञान [काम-क्रोध ?] दूर कर उसे स्वरुप के ज्ञान में प्रतिष्ठित करते हैं। 

देव-देवियों की पूजा से नहीं , केवल वासुदेव पुरुषोत्तम का भजन करके ही मनुष्य जन्म-मृत्यु की पहेली से चिरमुक्ति -लाभ कर सकता है। 

[सांख्य दर्शन के मत में मूल प्रकृति ही अपरा प्रकृति है और पुरुष है परा प्रकृति। सत्व, रजः और तम इन तीन गुणों की साम्यावस्था ही प्रकृति है। अपरा प्रकृति जड़ है , परा प्रकृति -है जीव जो चैतन्य स्वरुप है।]  

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मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः।

असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु।।7.1।।

।।7.1।। हे पार्थ ! मुझमें असक्त हुए मन वाले तथा मदाश्रित होकर योग का अभ्यास करते हुए जिस प्रकार तुम मुझे समग्ररूप से, बिना किसी संशय के, जानोगे वह सुनो।।

ध्यानाभ्यास का आरम्भ करने के पूर्व साधक जब तक केवल बौद्धिक स्तर पर ही वेदान्त का विचार करता है जैसा कि प्रारम्भ में होना स्वाभाविक है तब तक उसके मन में प्रश्न उठता रहता है कि परिच्छिन्न मन के द्वारा अनन्तस्वरूप सत्य का साक्षात्कार किस प्रकार किया जा सकता है ?

पिछले छः अध्याय  के विवेच्य विषय की प्रस्तावना करते हुए श्रीकृष्ण अर्जुन को वचन देते हैं कि वे आत्मसाक्षात्कार के सिद्धान्त एवं उपायों का समग्रत वर्णन करेंगे जिससे यह स्पष्ट हो जायेगा कि किस प्रकार सुसंगठित मन के द्वारा आत्मस्वरूप का ध्यान करने से आत्मा की अपरोक्षानुभूति होती है। 

ध्यान के सन्दर्भ में मन शब्द का प्रयोग होने पर उससे शुद्ध, पवित्र एवं एकाग्र मन का ही अभिप्राय है न कि अशक्त तथा विखण्डित मन।  अनुशासित और असंगठित मन जब अपने स्वरूप में समाहित होता है तब साधक का विकास तीव्र गति से होता है। 

इस प्रकरण कै विषय है आन्तरिक विकास का युक्तियुक्त विवेचन। श्रीभगवान् कहते हैं

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः।

यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते।।7.2।।

।।7.2।। मैं तुम्हारे लिए विज्ञान सहित इस ज्ञान को अशेष रूप से कहूँगा जिसको जानकर यहाँ (जगत् में) फिर और कुछ जानने योग्य (ज्ञातव्य) शेष नहीं रह जाता है।।

 श्री शंकराचार्य के अनुसार शास्त्र में कहे पदार्थों का परिज्ञान ज्ञान है तथा शास्त्र से ज्ञात तत्त्व का यथार्थ रूप में स्वानुभव होना विज्ञान है। जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को वचन देते हैं कि वे न केवल शास्त्रीय सिद्धांतों का वर्णन करेंगे वरन् प्रवचनकाल में ही वे उसे आत्मानुभव के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचा भी देंगे। 

उनका यह कथन कुछ अविश्वसनीय प्रतीत हो सकता है क्योंकि योग साधना तथा भारतीय दर्शन की अन्य शाखाओं में साधक को लक्ष्य का ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् उसकी प्राप्ति के लिये विशेष साधना करनी होती है। परन्तु वेदान्त शास्त्र इनसे भिन्न है क्योंकि इसमें साधक को उसके नित्यसिद्ध स्वरूप का ही बोध कराया गया है न कि स्वयं से भिन्न किसी वस्तु का। 

अत एक सुयोग्य विद्यार्थी को उपदेश ग्रहण के पश्चात् आत्मानुभव के लिये कहीं किसी वन प्रान्त में जाने की आवश्यकता नहीं होती है। यदि शिष्य ज्ञान के लिये आवश्यक गुणों से (साधन चतुष्टय) सम्पन्न है और गुरु के बताये हुए तर्कों को समझने में समर्थ है तो उसे अध्ययन काल में ही आत्मानुभव हो सकता है। 

यही कारण है कि वेदान्त केवल सुयोग्य विद्यार्थियों को ही पढ़ाया जाता है। उत्तम शिष्य के लिये आत्मानुभूति तत्काल प्राप्य है। उसे कालान्तर अथवा देशान्तर की अपेक्षा नहीं होती। 

यदि वेदान्त एक पूर्ण शास्त्र है और उपदेश काल में ही आत्मानुभव सिद्ध हो सकता है तो फिर क्या कारण है कि विश्वभर में ऐसे ज्ञानी पुरुष विरले ही होते हैं भगवान् कहते हैं

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।

यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः।।7.3।।

।।7.3।। सहस्रों मनुष्यों में कोई एक ही मनुष्य पूर्णत्व की सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है और उन प्रयत्नशील साधकों में भी कोई ही पुरुष मुझे तत्त्व से जानता है।।

यह एक सर्वविदित तथ्य है कि किसी विरले पुरुष में ही आत्मोन्नति (सत्यानुसन्धान-आत्मानुसंधान) की तीव्र अभिलाषा होती है जिसके लिए वह अपना सर्वस्व अर्पण करने को तत्पर रहता है। 

जब शिष्य उत्साहपूर्वक एकाग्रचित्त होकर सद्गुरु के उपदेश का श्रवण करता है तब वह स्वयं किसी सीमा तक ऊँचा उठ भी सकता है। परन्तु हो सकता है कि सत्य के द्वार तक पहुँचकर भी वह किसी सूक्ष्म एवं अज्ञात अभिलाषा अथवा अनजाने गर्व के कारण अपनी प्रगति के मार्ग को अवरुद्ध कर ले और इस प्रकार सत्य के दर्शन से वंचित ही रह जाय। 

इस दृष्टि से ईसामसीह की यह घोषणा अर्थपूर्ण है कि एक धनवान् व्यक्ति के स्वर्ग द्वार में प्रवेख करने की अपेक्षा एक ऊँट सुई के छिद्र से सरलता से प्रवेश करके बाहर निकल सकता है। यहाँ धन शब्द से अभिप्राय मन में संचित वासनाओं से है न कि लौकिक सम्पत्ति से। 

जब तक मन पूर्णतया प्रारबध भोगकर  वासनारहित होकर शुद्ध नहीं हो जाता तब तक वह सत्य के आनन्द का अनुभव नहीं कर सकता है। भगवान् श्रीकृष्ण की दृष्टि को ध्यान में रखकर इस श्लोक पर विचार करने से उसका अर्थ यह प्रतीत होता है कि विरले लोग ही वेदान्त का श्रवण करके उसके सिद्धांत को यथार्थ रूप में समझ पाते हैं। 

उनमें भी ऐसे साधकों की संख्या बहुत कम ही होती है जिनमें सत्य एवं नैतिक जीवन , शुद्धि का जीवन जीने के लिए लक्ष्य का आवश्यक ज्ञान मन की दृढ़ता शारीरिक सहनशक्ति तथा प्रयत्न की सम्पन्नता हो।

अर्जुन तथा गीता के जिज्ञासु लोग ऐसे ही विरले पुरुष हैं जो आत्मज्ञान के अधिकारी हैं। उन्हें भगवान् श्रीकृष्ण विज्ञान के सहित ज्ञान के उपदेश का वचन देते हैं जिससे आत्मा का साक्षात् अनुभव हो सकता है। 

इस प्रकार श्रोता में इस ज्ञान के प्रति रुचि उत्पन्न कराकर भगवान् आगे कहते हैं 

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।

अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।7.4।।

।।7.4।। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और अहंकार - यह आठ प्रकार से विभक्त हुई मेरी प्रकृति है।।

वैदिक काल के महान् मनीषियों ने जगत् की उत्पत्ति पर सूक्ष्म विचार करके यह बताया है कि जगत् जड़ पदार्थ (प्रकृति) और चेतनतत्त्व (पुरुष) के संयोग से उत्पन्न होता है। उनके अनुसार पुरुष की अध्यक्षता में जड़ प्रकृति से बनी शरीरादि उपाधियाँ चैतन्ययुक्त होकर समस्त व्यवहार करने में सक्षम होती हैं। 

यदि एक बार मनुष्य प्रकृति और पुरुष जड़ और चेतन का भेद स्पष्ट रूप से समझ ले तो वह यह भी सरलता से समझ सकेगा कि जड़ उपाधियों के साथ आत्मा का तादात्म्य ही उसके सब दुखों का कारण है। स्वाभाविक ही इस मिथ्या तादात्म्य की निवृत्ति होने पर वह स्वयं अपने स्वरूप को पहचान सकता है जो पूर्ण आनन्दस्वरूप है।

अर्जुन को जड़ और चेतन का भेद स्पष्ट करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण प्रथम प्रकृति के आठ भागों को बताते हैं जिसे यहाँ अष्टधा प्रकृति कहा गया है। इस विवेक से प्रत्येक व्यक्ति अपने शुद्ध और दिव्य स्वरूप को पहचान सकता है।

आकाश वायु अग्नि जल और पृथ्वी वे पंचमहाभूत तथा मन बुद्धि और अहंकार यह है अष्टधा प्रकृति जो परम सत्य के अज्ञान के कारण उस पर अध्यस्त (कल्पित) हैव्यष्टि (एक जीव) में स्थूल पंचमहाभूत का रूप है स्थूल शरीर तथा उनके सूक्ष्म भाव का रूप पंच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं जिनके द्वारा मनुष्य बाह्य जगत् का अनुभव करता है। ज्ञानेन्द्रियाँ ही वे कारण हैं जिनके द्वारा विषयों की संवेदनाएं मन तक पहुँचती हैं। इन प्राप्त संवेदनाओं का वर्गीकरण तथा उनका ज्ञान और निश्चय करना बुद्धि का कार्य है। \

इन्द्रियों द्वारा विषय ग्रहण मन के द्वारा उनका एकत्रीकरण तथा बुद्धि के द्वारा उनका निश्चय इन तीनों स्तरों पर एक अहं वृत्ति सदा बनी रहती है जिसे अहंकार कहते हैं। ये जड़ उपाधियाँ हैं जो चैतन्य का स्पर्श पाकर चेतनवत् व्यवहार करने में समर्थ होती हैं।इसके पश्चात् अपनी पराप्रकृति बताने के लिए भगवान् कहते हैं

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।

जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्।।7.5।।

।।7.5।। हे महाबाहो ! यह अपरा प्रकृति है। इससे भिन्न मेरी जीव (ब्रह्म) रूपी पराप्रकृति को जानो, जिससे यह जगत् धारण किया जाता है।।

आत्मा मानो अपने स्वरूप को भूलकर अपरा प्रकृति के साथ तादात्म्य करके जीवभाव (स्वयं को M/F नश्वर शरीर समझकर) के दुखों को प्राप्त होता है। परन्तु उसका यह दुख मिथ्या है वास्तविक नहीं। 

स्वस्वरूप की पहचान ही अनात्मबन्धन से मुक्ति का एकमात्र उपाय है। (शरीर के जीवित रहने तक बहुत धैर्य पूर्वक दासोऽहं भाव में रहना ही दुःख से बचने का एकमात्र उपाय है।) परा से अपरा की उत्पत्ति  उसी प्रकार होती है जैसे मिट्टी के बने घड़ा की मिट्टी से। सभी घड़ों  में एक मिट्टी ही सत्य है उसी प्रकार विषय इन्द्रियां मन तथा बुद्धि इन अपरा प्रकृति के कार्यों का वास्तविक स्वरूप चेतन तत्त्व ही है। इसलिये

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।

मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।।7.7।।

।।7.7।। हे धनंजय ! मुझसे श्रेष्ठ (परे) अन्य किचिन्मात्र वस्तु नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मुझमें पिरोया हुआ है।।

इसके पूर्व के श्लोकों में कथित सिद्धान्त को स्वीकार करने पर हमें जगत् की ओर देखने के दो दृष्टिकोण (बुद्धि /मति) मिलते हैं। एक है अपर अर्थात् कार्यरूप जगत् की दृष्टि से तथा दूसरा इससे भिन्न है पर अर्थात् कारण की दृष्टि से।]

जैसे मिट्टी की दृष्टि से उसमें विभिन्न रूप रंग वाले घड़ों का सर्वथा अभाव होता है वैसे ही चैतन्य-स्वरूप पुरुष में न विषयों का स्थूल जगत् है और न विचारों का सूक्ष्म जगत्। मुझसे (आत्मा, चैतन्य या इष्टदेव से) अन्य किञ्चिन्मात्र वस्तु नहीं है।

स्वप्न से जागने पर जाग्रत् पुरुष के लिये स्वप्न जगत् की कोई वस्तु दृष्टिगोचर नहीं होती। समुद्र में असंख्य लहरें उठती हुई दिखाई देती हैं परन्तु वास्तव में वहाँ समुद्र के अतिरिक्त किसी का कोई अस्तित्व नहीं होता। उनकी उत्पत्ति स्थिति और लय स्थान समुद्र ही होता है। 

 समस्त नामरूपों में आत्मा के एकत्व को दर्शाने के लिये यहाँ भगवान् कहते हैं कि वे ही इस जगत् के अधिष्ठान हैं। वे सभी रूपों को इस प्रकार धारण करते हैं जैसे माला में एक ही सूत्र सभी मणियों को पिरोये रहता है। 

माला में समस्त मणियाँ एक समान होते हुये दर्शनीय भी होती हैं परन्तु वे समस्त छोटीबड़ी मणियाँ जिस एक सूत्र में पिरोयी होती हैं वह सूत्र हमें दृष्टिगोचर नहीं होता तथापि उसके कारण ही वह माला शोभायमान होती है। 

किस प्रकार मुझ में यह जगत् पिरोया हुआ है वह सुनो

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।

प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु।।7.8।।

।।7.8।। हे कौन्तेय ! जल में मैं रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सब वेदों में प्रणव (ॐ) हूँ तथा आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ।।

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।

जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु।।7.9।।

।।7.9।। पृथ्वी में पवित्र गन्ध हूँ और अग्नि में तेज हूँ; सम्पूर्ण भूतों में जीवन हूँ और तपस्वियों में मैं तप हूँ।।

।।7.9।। किस प्रकार परमात्मरूपी सूत्र में नामरूपमय मणि पिरोकर सुन्दर सृष्टिरूप माला  की निर्मिति हुई है इसका वर्णन इन दो श्लोकों में किया गया है। इसके पूर्व भगवान् ने यह कहा था कि परा और अपरा प्रकृतियों के द्वारा मैं ही जगत् का कारण हूँ और मुझसे भिन्न किञ्चिन्मात्र कोई वस्तु नहीं है। 

वह सनातन तत्त्व क्या है जो सर्वत्र व्याप्त होते हुये भी दृष्टिगोचर नहीं होता ? इस प्रश्न का उत्तर यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण ने दिया है। किसी वस्तु का धर्म या स्वरूप वह है जो सदा एक समान बना रहता है और जिसके बिना उस वस्तु का अस्तित्व ही सिद्ध नहीं हो सकता। 

यहाँ दिये दृष्टान्त जल में रस सूर्य चन्द्र में प्रकाश समस्त वेदों में प्रणव आकाश में शब्द पृथ्वी में पवित्र गन्ध पुरुषों में पुरुषत्व एवं तपस्वियों में तप आदि ये सब दर्शाते हैं कि आत्मा (चैतन्य)  ही वह तत्त्व है जिसके कारण इन वस्तुओं का अपना विशेष अस्तित्व होता है। संक्षेपत आत्मा समस्त भूतों का जीवन है। भगवान् श्रीकृष्ण कुछ और उदाहरण देते हुये कहते हैं

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।

बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।।7.10।।

।।7.10।। हे पार्थ ! सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज (कारण) मुझे ही जानो; मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ।।

परिपक्व बुद्धि (विवेकी बुद्धि) के जिज्ञासुओं के लिये पूर्व के दो श्लोकों में दिये गये उदाहरण तत्त्व को समझने के लिए पर्याप्त हैं किन्तु मन्द बुद्धि (मूढ़बुद्धि -विषयाशक्त बुद्धि) के पुरुषों के लिए नहीं। 

बुद्धिमानों की शुद्ध बुद्धि (विवेकी बुद्धि) मैं हूँ एक बुद्धिमान व्यक्ति अपने आदर्शों तथा विचारों के माध्यम से अपने दिव्य स्वरूप को व्यक्त कर पाता है। उस बुद्धिमान् पुरुष के विवेकी बुद्धि की वास्तविक सार्मथ्य आत्मा के कारण ही संभव है। उसी प्रकार तेजस्वियों का तेज भी आत्मा ही है।

दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि आत्मा (चैतन्य) ही बुद्धि उपाधि के द्वारा बुद्धिमान व्यक्ति/(शरीर) के रूप में प्रकट होता है। जैसे विद्युत ही बल्ब में प्रकाश हीटर में उष्णता और रेडियो में संगीत के रूप में व्यक्त होती है।

आगे कहते हैं

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।

धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।।7.11।।

।।7.11।। हे भरत श्रेष्ठ ! मैं बलवानों का कामना तथा आसक्ति से रहित बल हूँ और सब भूतों में धर्म के अविरुद्ध अर्थात् अनुकूल काम हूँ।।

 सामान्यत मनुष्य में जब कामना व आसक्ति होती है तब वह अथक परिश्रम करते हुये दिखाई देता है और अपनी इच्छित वस्तु को पाने के लिये सम्पूर्ण शक्ति लगा देता है। कामना और आसक्ति इन दो प्रेरक वृत्तियों के बिना किसी बल की हम कल्पना भी नहीं कर पाते हैं। 

यद्यपि सतही दृष्टि से काम और राग में हमें भेद नहीं दिखाई देता है तथापि शंकराचार्य अपने भाष्य में उसे स्पष्ट करते हुये कहते हैं. अप्राप्त वस्तु की इच्छा काम है और प्राप्त वस्तु में (देह में)  आसक्ति राग कहलाती है। 

प्राणियों में धर्म के अनुकूल काम मैं हूँ। जिसके कारण वस्तु का अस्तित्व होता है वह उसका धर्म कहलाता है। मनुष्य का अस्तित्व चैतन्य आत्मा के बिना नहीं हो सकता अत वह उसका वास्तविक धर्म या स्वरूप है। व्यवहार में जो विचार भावना और कर्म उसके दिव्य स्वरूप के विरुद्ध नहीं है वे धर्म के अन्तर्गत आते हैं। 

जिन विचारों एवं कर्मों से अपने आत्मस्वरूप को पहचानने में सहायता मिलती है उन्हें धर्म कहा जाता है और इसके विपरीत कर्म अधर्म कहलाते हैं क्योंकि वे उसकी आत्मविस्मृति को दृढ़ करते हैं। उनके वशीभूत होकर मनुष्य पतित होकर पशुवत् व्यवहार करने लगता है। धर्म के अविरुद्ध कामना से तात्पर्य साधक की उस इच्छा तथा क्षमता से है जिसके द्वारा वह अपनी दुर्बलताओं को समझकर उन्हें दूर करने का प्रयत्न करता है और आत्मोन्नति की सीढ़ी पर ऊपर चढ़ता जाता है। भगवान् के कथन को दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि मैं साधक नहीं वरन् उसमें स्थित आत्मज्ञान की प्रखर जिज्ञासा हूँ। 

अब तक के उपदेश तथा दृष्टान्तों का क्या यह अर्थ हुआ कि आत्मा वास्तव में अनात्म जड़ उपाधियों  के बन्धन में आ गया है (चैतन्य नहीं स्वयं को M/F शरीर समझकर देहाध्यास के बन्धन में आ गया है) परिच्छिन्न उपाधि अपरिच्छिन्न आत्मा को कैसे सीमित कर सकती है ? इसके उत्तर में भगवान् कहते हैं

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।

मत्त एवेति तान्विद्धि नत्वहं तेषु ते मयि।।7.12।।

।।7.12।। जो भी सात्त्विक (शुद्ध), राजसिक (क्रियाशील) और तामसिक (जड़) भाव हैं, उन सबको तुम मेरे से उत्पन्न हुए जानो; तथापि मैं उनमें नहीं हूँ, वे मुझमें हैं।।

मुझमें सम्पूर्ण जगत् पिरोया हुआ है जैसे सूत्र में मणियाँ अपने इस कथन के साथ प्रारम्भ किये गये प्रकरण का उपसंहार भगवान् श्रीकृष्ण इस श्लोक में करते हैं।

हमें जगत् में ज्ञान क्रिया और जड़त्व इन तीनों का अनुभव होता है। इन्हें ही क्रमश सत्त्व रज और तमोगुण का कार्य कहा जाता है। वेदान्त में जिसे माया कहा गया है वह इन तीनों गुणों का संयुक्त रूप है जिसके अधीन प्राणियों की प्रवृत्तियाँ भिन्नभिन्न प्रकार की दिखाई देती हैं। मनुष्य की भावनाएं और विचार इन गुणों से प्रभावित होते हैं जिनके अनुसार ही मनुष्य अपने शरीर मन और बुद्धि से कार्य करता है।

उपर्युक्त विवेचन को ध्यान में रखकर इस श्लोक के अध्ययन से यह अर्थ स्पष्ट होता है कि इन तीन गुणों से उत्पन्न जो कोई भी वस्तु प्राणी या स्थिति है वह सब आत्मा से (मुझ से ) उत्पन्न होती है। 

त्रिगुणजनित भावों की सत्य से उत्पत्ति उसी प्रकार की है जैसे मिट्टी से घट समुद्र से तरंग और स्वर्ण से आभूषण की।इस श्लोक का सुन्दर अन्तिम वाक्य एक पहेली के समान है। 

श्री शंकराचार्य इस वाक्य 'मैं उनमें नहीं हूँ, वे मुझमें हैं' का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखते हैं मैं उनमें नहीं हूँ का अर्थ है मैं उन पर आश्रित नहीं हूँ जब कि उनका अस्तित्व मुझ पर आश्रित है। जैसे जल का अस्तित्व तरंग पर आश्रित नहीं है किन्तु तरंग जल पर आश्रित होती है। तरंग के होने से जल को किसी प्रकार का दोष या बन्धन नहीं प्राप्त होता

अगले श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण खेद व्यक्त करते हुए कहते हैं कि जगत् के लोग उनके वास्तविक नित्यमुक्त स्वरूप को नहीं जानते हैं। लोगों के इस अज्ञान का क्या कारण है? सुनो

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्।

मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्।।7.13।।

।।7.13।। त्रिगुणों से उत्पन्न इन भावों (विकारों) से सम्पूर्ण जगत् (लोग) मोहित हुआ इन (गुणों) से परे अव्यय स्वरूप मुझे नहीं जानता है।।

त्रिगुणों से उत्पन्न राग द्वेषादि विकारों के कारण मनुष्य अपने दिव्य स्वरूप को भूलकर उपाधियों के साथ तादात्म्य स्थापित करके केवल विषयोपभोग का ही जीवन जीते हैं। स्वाभाविक है कि इस आसक्ति के कारण स्वस्वरूप की ओर इनका ध्यान तक नहीं जाता। 

एक बार स्तम्भ में प्रेत का आभास होने पर वह स्तम्भ उससे आच्छादित हो जाता है। यह एक तथ्य है कि जब तक यह आभास बना रहता है तब तक स्तम्भ का एक इञ्च भाग भी मोहित व्यक्ति को नहीं दिखाई देता इसी प्रकार माया से उत्पन्न उपाधियों के साथ तादात्म्य के कारण आत्मा को मानो जीवभाव प्राप्त हो जाता है। यह जीव बाह्य जगत् में व्यस्त और आसक्त होकर अपने शुद्ध स्वरूप को पहचानने में स्वयं को असमर्थ पाता है।

 स्वयं में स्वयं के साथ स्वयं का चल रहा लुकाछिपी का यह खेल विचित्र एवं रहस्यमय है जिसके कारण यह अपने लिए और जगत् के लिए अनन्त दुख और विक्षेप उत्पन्न करता रहता है।अगले श्लोक में इस आवरण शक्ति की परिभाषा का वर्णन किया गया है

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।7.14।।

।।7.14।। यह दैवी त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है। परन्तु जो मेरी शरण में आते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।।

भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि अहंकार (M/F देहाभिमान) से युक्त आत्मकेन्द्रित पुरुष के लिए मेरी माया से उत्पन्न मोह को पार कर पाना दुस्तर है।

जो साधक मेरी शरण में आते हैं वे माया को तर जाते हैं। शरण से तात्पर्य भगवान् के स्वरूप को पहचान कर तत्स्वरूप बन जाना है। 

 एकाग्र चित्त होकर आत्मस्वरूप (इष्टदेव) का ध्यान करना यह साक्षात् साधन है और ध्यान के लिए आवश्यक योग्यता प्राप्त करने के उपाय भी पहले बताये गये हैं।

यदि आपकी शरण में आने से माया को पार किया जा सकता है तो फिर सब लोग आपकी शरण में क्यों नहीं आते ? हैं इस पर कहते हैं

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।

माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः।।7.15।।

।।7.15।। दुष्कृत्य करने वाले, मूढ, नराधम पुरुष मुझे नहीं भजते हैं; माया के द्वारा जिनका ज्ञान हर लिया गया है, वे आसुरी भाव को धारण किये रहते हैं।।

दुष्कृत्य करने वाले मूढ नराधम लोग ईश्वर की भक्ति नहीं करते हैं जिसका कारण यह है कि उनके विवेक का माया द्वारा हरण कर लिया जाता है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि मनुष्य के उच्च विकास का लक्षण उसकी विवेकवती बुद्धि है।

 इस बुद्धि के द्वारा वह अच्छा-बुरा, उच्च-नीच , नैतिक-अनैतिक का विवेक कर पाता है। विवेकी बुद्धि ही वह माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य अज्ञानजनित जीवभाव के स्वप्न से जागकर अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप का साक्षात् अनुभव कर सकता है।

विषयों के द्वारा जो व्यक्ति क्षुब्ध नहीं होता उसमें ही यह विवेकशक्ति प्रभावशाली ढंग से कार्य कर पाती है। मनुष्य में देहात्मभाव जितना अधिक दृढ़ होगा उतनी ही अधिक विषयाभिमुखी उसकी प्रवृत्ति होगी। अत विषयभोग की कामना को पूर्ण करने हेतु वह निंद्य कर्म में भी प्रवृत्त होगा।

 इस दृष्टि से पाप कर्म का अर्थ है मनुष्यत्व की उच्च स्थिति को पाकर भी स्वस्वरूप के प्रतिकूल किये गये कर्म। स्थूल देह को अपना स्वरूप समझकर मोहित हुए पुरुष ही पापकर्म करते हैं।

 ऐसे लोगों को यहाँ मूढ़ और आसुरी भाव का मनुष्य कहा गया है। गीता के सोलहवें अध्याय में दैवी और आसुरीभाव का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।परन्तु जो पुण्यकर्मी लोग हैं वे चार प्रकार से मेरी भक्ति करते हैं। भगवान् कहते हैं

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।

आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।7.16।।

।।7.16।। हे भरत श्रेष्ठ अर्जुन ! उत्तम कर्म करने वाले (सुकृतिन:) आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी ऐसे चार प्रकार के लोग मुझे भजते हैं।।

समस्त पदार्थ (Matter) एवं ऊर्जा (Energy) का स्रोत आत्मा ही होने के कारण जड़ (inanimate-निर्जीव) पदार्थों में यदि क्रिया होते दिखाई दे, तो उसका प्रेरक स्रोत भी आत्मा (ईश्वर , इष्टदेव) ही होना चाहिए।

[Since the Soul is the sole source of all matter and energy, if any activity is observed within inanimate objects, its motivating source must invariably be the Soul itself.] 

 जैसे बिजली के कारण बल्ब , हीटर , पंखा आदि चलता है पर बिजली दिखाई नहीं देती , ठीक उसी प्रकार समस्त मनुष्य शरीर मन और बुद्धि (Hand और Head) के माध्यम से जो सार्मथ्य प्रकट करते हैं वह आत्मचैतन्य के कारण ही संभव होता है। योगी हो या भोगी दोनों को कार्य करने के लिए आत्मचैतन्य (Heart -ह्रदय गुहा में विराजमान-इष्टदेव) का ही आह्वान करना पड़ता है। चाहे कोई योगी हो या भोगी, किसी भी कार्य को करने के लिए दोनों को ही अंतरात्मा—यानी हृदय-गुहा में विराजमान *इष्ट-देव* (अपने चुने हुए आराध्य-आत्मचैतन्य)—का आह्वान करना अनिवार्य है। 

[जैसे किसी रूप को आँख ने देखा , किन्तु वह रूप किसका है ? घड़ा है या घड़ी है -इसका निर्णय बुद्धि करती है। लेकिन बुद्धि में निर्णय करने का सामर्थ्य अन्तरात्मा या आत्मचैतन्य से *इष्टदेव * से अपने चुने हुए आराध्य से प्राप्त होता है ! ]

[Just as a light bulb, heater, fan, and similar devices function because of electricity—even though electricity itself remains invisible—in precisely the same way, the capabilities that human beings manifest through their body, mind, and intellect (the 'Hand' and the 'Head') are made possible solely by virtue of the conscious Self (आत्मचैतन्य the 'Heart').Whether one is a Yogi or a Bhogi, both must invoke the Self-Consciousness—the *Ishta-Deva* (Chosen Deity) residing within the Heart-Cave—in order to perform any action.

जिस तरह एक बल्ब, हीटर, पंखा और इसी तरह के उपकरण बिजली के कारण काम करते हैं—लेकिन बिजली खुद दिखाई नहीं देती—ठीक उसी तरह, मनुष्य अपने शरीर, मन और बुद्धि ('हाथ' और 'सिर') से जो सामर्थ्य दिखाते हैं, वे सिर्फ़ आत्मचैतन्य (चेतन आत्मा या हृदय Heart) की वजह से ही सम्भव होती हैं। चाहे कोई योगी हो या भोगी, किसी भी कार्य को करने के लिए दोनों को ही अंतरात्मा—यानी हृदय-गुहा में विराजमान *इष्ट-देव* (अपने चुने हुए आराध्य)—का आह्वान करना अनिवार्य है।]

चाहे वे पीड़ा और कष्ट के समय सान्त्वना की कामना करें या विषय उपभोगों की इच्छा करें इन सबके लिए आत्मा की चेतनता आवश्यक होती है। (Whether one seeks solace during times of pain and suffering, or desires material enjoyments, the consciousness of the soul is essential for all such endeavors.)

एक विशेष दशा मे कार्य करने के लिए आत्मा का आह्वान करना ही भजन या प्रार्थना है। प्रार्थना विधि में भक्त स्वयं को ईश्वर के चरणों में समर्पित करके ईश्वर के अनुग्रह की कामना करता है। इसको समझने के लिए हम विद्युत् का दृष्टान्त ले सकते हैं। विद्युत् पंखा हीटर रेडियो आदि स्वयं कुछ कार्य नहीं कर सकते। विद्युत् शक्ति के इनमें प्रवाहित होने पर ये अपनेअपने कार्य के द्वारा समाज की सेवा कर पाते हैं। यही विद्युत् शक्ति का आह्वान है

स्पष्ट है कि सभी यन्त्रों के लिए विद्युत् आवश्यक है लेकिन उसका उपयोग किस यन्त्र के लिए करना है वह हमारी इच्छा पर निर्भर करता है। शीत ऋतु के दिनों में पंखा चलाकर हमें और अधिक कष्ट उठाना पड़े तो उसका दोष विद्युत् को नहीं दिया जा सकता और न ही उसे क्रूर कहा जा सकता है।

 विखण्डित मन (मूढ़बुद्धि-सम्मोहित बुद्धि) में जब चैतन्य व्यक्त होता है तो मन के अवगुणों के लिए (मूढ़ बुद्धि को इन्द्रियों के पीछे भागने के लिए) आत्मा को दोष नहीं दिया जा सकता इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि -एक मात्र आत्मा ही चैतन्य स्वरूप है। [इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि -स्थूल शरीर, इन्द्रिय ,मन , बुद्धि (विवेकी बुद्धि या पवित्र बुद्धि) में एक मात्र आत्मा ही चैतन्य स्वरूप है।]

भगवान् यहाँ कहते हैं कि पापी हो या पुण्यात्मा, मूढ़बुद्धि हो या शुद्धबुद्धि (विवेकी बुद्धि का बुद्धिमान हो)आलसी हो या क्रियाशील, भीरु हो या साहसी, सब मुझे ही भजते हैं और मैं उन सबके हृदय में व्यक्त होता हूँ। सभी मनुष्यों को शरीर मन या बुद्धि से कार्य करने के लिए  जाने या अनजाने मेरा ही आह्वान करना पड़ता है। इस श्लोक में पुण्यकर्मी भक्तों का चार प्रकार से वर्गीकरण किया गया है। वे हैं

 (1.) आर्त - अर्थात दुख से पीड़ित व्यक्ति। दुखार्त भक्त अपने कष्ट के निवारण के लिए भक्ति करता है। यह सामान्य दुख के विषय में हुआ किन्तु ऐसे भी व्यक्ति होते हैं जिन्हें जीवन में सब प्रकार की सुख-सुविधाएं उपलब्ध होने पर भी वे एक प्रकार की आन्तरिक अशान्ति का अनुभव करते हैं। इस अशान्ति की निवृत्ति भगवत्स्वरूप की प्राप्ति से ही होती है। ऐसे आर्त भक्त भी मेरा भजन करते हैं।

2. जिज्ञासु जो साधक शास्त्राध्ययन के द्वारा मुझे जानना चाहते हैं वे जिज्ञासु भक्त हैं।

3. अर्थार्थी किसी न किसी कार्यक्षेत्र में इष्ट फल को प्राप्त करने के लिए जो लोग कर्म करते हुए मेरे अनुग्रह की कामना करते हैं उन्हें अर्थार्थी कहते हैं। कामना की पूर्ति इनका लक्ष्य होता है।

4. ज्ञानी - उपर्युक्त तीनों से भिन्न ज्ञानी भक्त विरला ही होता है।  जो न किसी फल की इच्छा रखता है और न मुझसे कोई अपेक्षा। वह स्वयं को ही मुझे अर्पित कर देता है। वह मेरे स्वरूप को पहचान कर मेरे साथ एकत्व को प्राप्त हो जाता है। 

इन चर्तुविध भक्तों में सर्वश्रेष्ठ कौन है? 

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते। 

प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः।।7.17।।

।।7.17।। उनमें भी मुझ से नित्ययुक्त, अनन्य भक्ति वाला ज्ञानी श्रेष्ठ है, क्योंकि ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।।

 चतुर्विध भक्तों की परस्पर तुलना करके भगवान् कहते हैं कि जो ज्ञानी भक्त मुझसे नित्ययुक्त है और आत्मस्वरूप के साथ जिसकी अनन्य भक्ति है वह सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि आत्मतत्त्व  (इष्टदेव)  से भिन्न किसी अन्य विषय में उसका मन विचरण नहीं करता है।

 जब तक साधक को अपने ध्येय (आराध्य*इष्टदेव) का स्वरूप निश्चित रूप से ज्ञात नहीं होता है तब तक मन की एकाग्रता भी प्राप्त नहीं की जा सकती है। एक भक्ति का अर्थ है साधक के मन में आत्मसाक्षात्कार की ही एक वृत्ति बनी रहना। एक भक्ति को पाने के लिए साधक को अपने मन की विषयाभिमुखी प्रवृत्तियों को (मूढ़बुद्धि को) विषय से निवृत्त करना आवश्यक होता है। 

ज्ञानी व्यक्ति किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए नहीं वरन् अपने मन की उन प्रवृत्तियों को नष्ट करने के लिए ईश्वर का आह्वान करता है जिसके कारण उसके मन की शक्ति का जगत् के मिथ्या आकर्षणों में व्यर्थ अपव्यय होता है। 

अत स्वाभाविक है कि आत्मस्वरूप में स्थित भगवान् श्रीकृष्ण ऐसे ज्ञानी पुरुष को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं जिसके मन में आत्मानुभूति (सत्यानुभूति) के अतिरिक्त अन्य कोई कामना ही नहीं रहती। 

ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ। प्रेम का मापदण्ड है प्रियतम के साथ हुआ तादात्म्य। वास्तव में आत्मसमर्पण की धुन पर ही प्रेम का गीत गाया जाता है। Unselfishness is God ! निस्वार्थता प्रेम का आधार है। प्रेम की मांग है समस्त कालों एवं परिस्थितियों में बिना किसी प्रतिदान की आशा के सर्वस्व दान प्रेम के इस स्वरूप को समझने पर ही ज्ञात होगा कि ज्ञानी भक्त का प्रेम ही वास्तविक शुद्ध और पूर्ण प्रेम होता है। 

एकपक्षीय प्रेम की परिसमाप्ति कभी पूर्णत्व में नहीं हो सकती। यहाँ भगवान् स्पष्ट कहते हैं ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और मुझे वह अत्यन्त प्रिय है। इस कथन में एक मनोवैज्ञानिक सत्य छिपा हुआ है। प्रेम का यह सनातन नियम है कि वह निष्काम होने पर न केवल पूर्णता को प्राप्त होता है वरन् उसमें एक दुष्ट को भी आदर्श बनाने की विचित्र सार्मथ्य होती है। 

यह एक सुविचारित एवं सुविदित तथ्य है कि जब किसी व्यक्ति का मन (हृदय) किसी एक विशेष भावना जैसे दुःख, द्वेष, ईर्ष्या या करुणा (compassion) से भरा होता है तो उसके समीपस्थ लोगों के मन पर भी उस तीव्र भावना का प्रभाव पड़ता है। 

[It is a well-considered and widely acknowledged fact that if a person's mind becomes saturated with a specific emotion—such as sorrow, malice, envy, or compassion—that intense emotion inevitably exerts an influence upon the minds of those in their immediate vicinity.]

अत यदि हम किसी को निस्वार्थ शुद्ध प्रेम दे सकें तो हमारे दुष्ट शत्रु का भी हृदय परिवर्तित हो सकता है। यह नियम है। यह मनोवैज्ञानिक सत्य भगवान् के इस कथन में स्पष्ट होता है कि ज्ञानी को मैं और मुझे ज्ञानी अत्यन्त प्रिय है।

तब क्या आर्तादि भक्त भगवान् वासुदेव को प्रिय नहीं है ऐसी बात नहीं फिर क्या कहते हैं

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।

आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्।।7.18।

।।7.18।। (यद्यपि) ये सब उत्कृष्ट हैं, परन्तु ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है ऐसा मेरा मत है, क्योंकि वह स्थिर बुद्धि ज्ञानी अति उत्तम गतिस्वरूप मुझमें अच्छी प्रकार स्थित है।।

 विशाल हृदय के भक्तानुग्रहकारक भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट कहते हैं कि जो कोई भी भक्त मेरी भक्ति करता है वह अन्य जनों की अपेक्षा उत्कृष्ट ही है; फिर चाहे वह अपने कष्ट निवारणार्थ मेरा भक्त हो अथवा वह अर्थार्थी हो। किसी न किसी प्रकार से वह मुझ अनन्तस्वरूप की ओर ही अग्रसर हो रहा होता है। अत वह उत्कृष्ट है। तथापि इन चतुर्विध भक्तों में ज्ञानी तो मेरी आत्मा ही है।

हम सब जानते हैं कि किसी मन्त्री का मित्र होना और स्वयं ही मन्त्री बनना इन दोनों में बहुत अन्तर है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि मन्त्री की मित्रता प्राप्त होने मात्र से भी मनुष्य को समाज में एक विशेष प्रभावपूर्ण स्थान प्राप्त होता है परन्तु मन्त्री पद की समस्त गरिमा एवं अधिकार तो स्वयं मन्त्री बनने पर ही प्राप्त होते हैं। 

इसी प्रकार किसी फल विशेष के लिए ईश्वर की आराधना करना उसका आह्वान करना निश्चय ही एक दैवी गुण है। किन्तु ज्ञानी पुरुष निष्काम होकर मन और बुद्धि के अतीत अपने परमात्मस्वरूप को पहचान कर परिच्छिन्न अहंकार को ही समाप्त कर देता है - और तब वह परमात्मा के साथ एकत्वभाव (Oneness) को प्राप्त हो जाता है। तत्पश्चात् ऐसा ज्ञानी पुरुष सदा आत्मस्वरूप में ही स्थित होता है। 

[ एक दिन समय आनेपर देखता है - पहले वाले 'अहंकर्ता' वाला अहंकार (तोतापुरी जी वाला अहं) ही लुप्त-प्राय तो हो गया ? पर फिर भी है -और 'दासोऽहं ' कहने के सिवा अपने पास कोई उपाय नहीं है।  हृदय से आवाज निकलती है -- "Ours not to question why, Ours but to do and die." हमारा काम यह पूछना नहीं कि क्यों? हमारा काम है—करो या मरो!

" हे प्रभु, तेरा नाम धन्य हो! और तेरी ही इच्छा पूरी हो। हे प्रभु, हम जानते हैं कि हमें समर्पण करना है; हे प्रभु, हम जानते हैं कि यह माँ का ही हाथ है जो प्रहार कर रहा है, और "आत्मा तो तत्पर है, पर शरीर दुर्बल है।" 

हे प्रेम के पिता, मेरे हृदय में एक ऐसी वेदना है जो उस शांत समर्पण के विरुद्ध संघर्ष कर रही है, जिसकी शिक्षा तूने हमें दी है। हे प्रभु, हमें शक्ति दे—तूने ही तो अपनी आँखों के सामने, अपने हाथों को अपनी छाती पर बाँधे हुए, अपने पूरे परिवार को नष्ट होते देखा था। हे प्रभु, हे महान गुरु, पधार! तूने ही हमें यह सिखाया है कि सैनिक का कर्तव्य केवल आज्ञा का पालन करना है, बोलना नहीं। 

हे प्रभु, हे अर्जुन के सारथी, पधार! और मुझे भी वैसे ही शिक्षा दे, जैसे तूने कभी अर्जुन को दी थी—कि तुझमें ही पूर्ण समर्पण करना, इस जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य और उद्देश्य है; ताकि प्राचीन काल के उन महान पुरुषों की भाँति, मैं भी दृढ़ता और पूर्ण समर्पण के भाव से यह उद्घोष कर सकूँ: "ॐ श्री कृष्णार्पणमस्तु।"

Blessed be Thy name, O Lord! And Thy will be done. Lord, we know that we are to submit; Lord, we know that it is the Mother's hand that is striking, and "The spirit is willing but the flesh is weak." There is, Father of Love, an agony at the heart which is fighting against that calm resignation which Thou teachest". Give us strength, O Thou who sawest Thy whole family destroyed before Thine eyes, with Thine hands crossed on Thy breast. Come, Lord, Thou Great Teacher, who has taught us that the soldier is only to obey and speak not. Come, Lord, come Arjuna's Charioteer, and teach me as Thou once taughtest him, that resignation in Thyself is the highest end and aim of this life, so that with those great ones of old, I may also firmly and resignedly cry, Om Shri Krishnârpanamastu.  (बंबई से 23 मई, 1893 को डी. आर. बालाजी राव को लिखा गया पत्र — जो उस समय एक गंभीर पारिवारिक विपत्ति से गुज़र रहे थे।

  और तब वह परमात्मा के साथ  एकत्वभाव को प्राप्त हो जाता है। तत्पश्चात् ऐसा ज्ञानी पुरुष सदा आत्मस्वरूप में ही स्थित होता है।

 इसलिए अन्य भक्तों की तुलना में ज्ञानी पुरुष श्रेष्ठ है यह श्रीकृष्ण का मत है।

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।

         वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।।7.19।।

।।7.19।। बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि 'यह सब वासुदेव है' ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है; ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है।।

सर्वोच्च ज्ञान को प्राप्त हुए श्रेष्ठ महात्मा पुरुष जगत् में विरले ही होते हैं यह भगवान् श्रीकृष्ण का कथन है। सृष्टि में समस्त चेतन जीवों की तुलना में मानव की संख्या अत्यन्त कम अनुपात में है। मनुष्यजाति में भी सभी परिपक्व बुद्धि एवं उच्च भावनाओं से सम्पन्न नहीं होते हैं। अन्तकरण के श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न होने पर भी बहुत कम लोग हैं जो गम्भीरतापूर्वक शास्त्राध्ययन करते हैं और शास्त्रों से प्राप्त ज्ञान को अपने जीवन में जीने वालों की संख्या तो नगण्य ही होती है। 

अनेक लोगों को केवल बौद्धिक ज्ञान से ही सन्तोष हो जाता है। इस विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि विकास के चरम लक्ष्य आत्मानुभूति तक पहुँचने वाले ज्ञानी पुरुष विरले ही होंगे। डार्विन के समान प्राचीन काल में ऋषियों ने सभी प्राणियों का निरीक्षण करके यह पाया कि प्राणी का अपने निम्न स्तर से उच्च स्तर तक का विकास होने के लिए दीर्घकालावधि की अपेक्षा होती है।   जिसमें विभिन्न परिस्थितियों एवं जन्मों से गुजरते हुए वह विकास के श्रेष्ठतर रूप को प्राप्त करता है। यह कालावधि करोड़ों वर्ष की हो सकती है।

इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि हम इसी वर्तमान जन्म में ही जीवन के इस सर्वोच्च लक्ष्य ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकते। गीता का कथन निराशाजनक नहीं वरन् उत्साहवर्धक है। यहाँ बताये गये असंख्य जन्म ज्ञान प्राप्ति के पूर्व के हैं, आत्मानुभूति (आत्मसाक्षात्कार) हो जाने के पश्चात् के नहीं। 

यदि मनुष्य अपने जीवन की अनेक उपलब्धियों से भी असन्तुष्ट होकर जीवन का वास्तविक लक्ष्य जानने का प्रयत्न करता है तो यह स्वयं ही विकास की एक अवस्था है। तत्पश्चात् शास्त्रों के अध्ययन में उसकी प्रवृत्ति हो और तत्प्रतिपादित सिद्धांतों को ग्रहण करने की सार्मथ्य हो तो स्पष्ट है कि वह आत्मदेव के मन्दिर के द्वार तक पहुँच गया है। साधक को साधना में अग्रसर होने के लिए उत्साहित करना ही भगवान् के उक्त कथन का एक मात्र प्रयोजन है। 

[ "ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् (ईशोपनिषद 1.1) का अर्थ है- जड़-चेतन से युक्त इस संसार में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है। " इस अवस्था (दृष्टि , बुद्धि या मति) को  प्राप्त न करने का कारण वे अगले श्लोक में बताते हैं]

  यह सब आत्मा या वासुदेव ही है इस ज्ञान को- प्राप्त न करने का कारण वे अगले श्लोक में बताते हैं

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः।

तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया।।7.20।।

।।7.20।। भोगविशेष की कामना से जिनका ज्ञान हर लिया गया है, ऐसे पुरुष अपने स्वभाव से प्रेरित हुए अन्य देवताओं को विशिष्ट नियम का पालन करते हुए भजते हैं।।

 एक मात्र मनुष्य शरीर की ही यह विशिष्ट योग्यता है कि वह 'नित्य-अनित्य विवेक' की परिभाषा -के अनुरूप अपने सुप्त विवेक को जाग्रत कर सकता है। विवेक-प्रयोग का  सार्मथ्य मानव जन्म की विशेषता है और यह सर्वथा असंभव है कि नित्य-अनित्य विवेक के प्रखर और सजग होने पर मनुष्य को आत्मज्ञान न हो सके। परन्तु मन की (मूढ़बुद्धि की)  बहिर्मुखी प्रवृत्तियां और विषयभोग की कामनायें उसके विवेक को आच्छादित कर देती हैं

भोगी पुरुष विभिन्न देवताओं की आराधना केवल वैषयिक सुख को प्राप्त करने के लिए ही करता है, अतएव कामना से प्रेरित होकर वह तत्पूर्ति के लिए अनेक प्रकार के प्रयत्न करता रहता है। शान्त मन में आत्मा (इष्टदेव) का प्रतिबिम्ब स्पष्ट और स्थिर दिखाई देता है। परन्तु कामनाओं के स्रोतों से प्रवाहित होने वाली विचारों की धारायें उसमें विक्षेप उत्पन्न करके प्रतिबिम्ब को भी विचलित कर देती हैं।

     मन के क्षुब्ध-चंचल मन विषय भोगो में आसक्त होने पर मूढ़बुद्धि की विवेक सार्मथ्य लुप्त हो जाती है और स्वभावत फिर मनुष्य सत्य-असत्य-मिथ्या का विवेक नहीं कर पाता है। मन में भोगों की इच्छा के उदय मात्र से मनुष्य का पतन नहीं होता बल्कि पतन का कारण है उत्पन्न इच्छा के साथ उसका तादात्म्य। इस तादात्म्य के द्वारा मनुष्य अनजाने में अपनी इच्छाओं को बढ़ावा देकर असंख्य विक्षेपों को जन्म देता हुआ स्वयं उनका शिकार बन जाता है।

     अन्न के सूक्ष्म तत्त्व का ही रूप वृत्ति (विचार) है और इसलिए वह स्वयं जड़ है। वृत्तिरूप मन आत्मा से चेतनता प्राप्त करता है और कामी व्यक्ति से सार्मथ्य। फिर विचारों के अनुसार कर्म होता है। 

एक बार मनुष्य के मन में भोगों की कोई कामना दृढ़ हो जाये तो वह यह विवेक खो देता है कि उस कामनापूर्ति से उसे नित्य शाश्वत सुख मिलेगा या नहीं। क्षणिक सुख की आसक्ति के कारण वह अन्यान्य इन्द्रियों के देवताओं को सन्तुष्ट करने में व्यस्त रहता है

प्रत्येक मनुष्य अपनी पूर्व संचित वासनाओं के अनुसार भिन्नभिन्न विषयों की ओर आकर्षित होकर तदनुसार कर्म करता है। यह धारणा कि स्वर्ग में बैठा कोई ईश्वर हमारे मन में इच्छाओं को उत्पन्न कराकर हमें पाप और पुण्य के कर्मों में प्रवृत्त करता है केवल निराशावादी निर्बल और आलसी लोगों की ही हो सकती है। बुद्धिमान साहसी और उत्साही पुरुष जानते हैं कि मनुष्य स्वयं ही अपने विचारों के अनुसार अपने भाग्य का निर्माण करता है , वातावरण और कार्य-क्षेत्र आदि का निर्माण करता है। 

संक्षेप में एक मूढ़ बुद्धि  शाश्वत सुख की आशा में वैषयिक क्षणिक सुखों की मृगमरीचिका के पीछे दौड़ती रहती है।  जबकि विवेकी बुद्धि (शुद्धबुद्धि) उसकी व्यर्थता पहचान कर आत्मोन्मुखी होकर परम सत्य के मार्ग पर अग्रसर होती है। भगवान् आगे कहते हैं

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।

तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्।।7.21।।

।।7.21।। जो-जो (सकामी) भक्त जिस-जिस (देवता के) रूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस (भक्त) की मैं उस ही देवता के प्रति श्रद्धा को स्थिर करता हूँ।।

इस अध्याय के प्रारम्भिक भाग में ही आत्मानात्म विवेक (नित्य-अनित्य विवेक , जड़-चेतन का विभाजन) करके भगवान् श्रीकृष्ण ने वर्णन किया है कि किस प्रकार - मणियों की माला का सूत्र जैसे उनमें समस्त नाम-रूप पिरोये हुए हैं। उसके पश्चात् उन्होंने यह भी बताया कि किस प्रकार त्रिगुणात्मिका मायाजनित विकारों से मोहित होकर मनुष्य अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को नहीं पहचान पाता। आत्मचैतन्य के बिना शरीर मन और बुद्धि की जड़ उपाधियाँ स्वयं कार्य नहीं कर सकती हैं।

जगत् में देखा जाता है कि सभी भक्तजन एक ही रूप में ईश्वर की आराधना नहीं करते। प्रत्येक भक्त अपने इष्ट देवता की पूजा के द्वारा सत्य तक पहुँचने का प्रयत्न करता है। भगवान् श्रीकृष्ण स्पष्ट घोषणा करते हैं कि कोई भी भक्त किसी भी स्थान पर मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारा या गिरजाघर में एकान्त में या सार्वजनिक स्थान में किसी भी रूप में ईश्वर की पूजा श्रद्धा के साथ करता है उसकी उस श्रद्धा को उसके इष्ट देवता में मैं स्थिर करता हूँ। 

मनुष्य जिस विषय का निरन्तर चिन्तन करता रहता है उसमें वह दृढ़ता से आसक्त और स्थित हो जाता है। अखण्ड चिन्तन से मन में उस विषय के संस्कार दृढ़ हो जाते हैं और फिर उसके अनुसार ही उस मनुष्य की इच्छायें और कर्म होते हैं। इसी नियम के अनुसार सतत आत्मचिन्तन (इष्टदेव-ठाकुर,माँ और स्वामीजी का चिंतन) करने से भी मनुष्य अपने शुद्ध स्वरूप का साक्षात् अनुभव कर सकता है। 

सारांशत भगवान् का कथन हैं कि जैसा हम विचार करते हैं वैसा ही हम बनते हैं। अत यदि कोई व्यक्ति दुर्गुणों का शिकार हो गया हो अथवा अन्य व्यक्ति दैवी गुणों से संपन्न हो तो यह दोनों के भिन्न-भिन्न विचारों का ही परिणाम समझना चाहिए।

 मन में उठने वाले विचार (या चित्तवृत्तियों में या बुद्धि-वृत्तियों में उठने वाले विचार) प्रकृति का अंग है; तथा विचारों के अनुरूप जगत् होता है। जिसका एक अधिष्ठान है सर्वव्यापी आत्मतत्त्व।

सतत समृद्ध हो रही श्रद्धा के द्वारा मनुष्य किस प्रकार इष्ट फल को प्राप्त करता है-

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।

लभते च ततः कामान्मयैव विहितान् हि तान्।।7.22।।

।।7.22।। वह (भक्त) उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उससे मेरे द्वारा विधान किये हुये इच्छित भोगों को नि:सन्देह प्राप्त करता है।।

 वह भक्त उस श्रद्धा से युक्त होकर अपने इष्ट देवता की आराधना करता है जिसके फलस्वरूप वह देवता उसकी इच्छा को पूर्ण करता है। परन्तु भगवान् कहते हैं कि वास्तव में कर्मफलदाता भगवान ही हैं। सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान परमात्मा ही समस्त जगत् का आदि कारण होने से मनुष्य को कर्म करने की और देवताओं को फल प्रदान करने की सार्मथ्य उन्हीं से प्राप्त होती है। 

इष्ट- अनिष्ट फलों की प्राप्ति से (चाहे-अनचाहे फलों की प्राप्ति से) सुख-दुःख आदि का अनुभव मनुष्य के मूढ़-बुद्धि या विवेकी-बुद्धि योग्य अन्तःकरण में होता है जिसे आत्मचैतन्य (अन्तरात्मा) प्रकाशित करता है। आत्मा की शक्ति के बिना बुद्धि को इस प्रकार का कोई अनुभव प्राप्त नहीं हो सकता। श्रद्धा के साथ किये हुये पूजन से ईश्वर द्वारा विधान किये हुए नियम के अनुसार फल प्राप्त होता है। यहाँ श्रीकृष्ण अपने परमात्म स्वरूप के साथ तादात्म्य करके कहते हैं वे इष्ट फल मेरे द्वारा ही दिये जाते हैं

अविवेकी लोग निरंतर अनित्य भोगों की ही कामना करते हैं इसलिए उन्हें कभी शाश्वत शान्ति प्राप्त नहीं होती। [लेकिन विवेकी-लोग ? जिनका सोया विवेक जाग्रत है ?] अतः कहते हैं

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।

देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि।।7.23।।

।।7.23।। परन्तु उन अल्प बुद्धि पुरुषों का वह फल नाशवान् होता है। देवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं

नाशवान् भोगों की इच्छा को पूर्ण करने के लिए मनुष्य जो कर्म करता है वह अनित्य होने से उसका फल भी क्षणभंगुर ही होता है। स्वर्ण से बने आभूषण स्वर्ण ही होंगे। कार्य का गुणधर्म पूर्णतया कारण पर निर्भर करता है। 

देशकाल से परिच्छिन्न कर्मों से प्राप्त फल अनित्य ही होगा चाहे वह सुख हो या दुख। सुख का अन्त दुख का प्रारम्भ है। अत जब कोई इच्छा पूर्ण हो जाती है तब यद्यपि क्षणमात्र के लिए सुख का आभास भी होता है परन्तु शीघ्र ही उसके समाप्त होने पर दुख का कटु अनुभव मनुष्य को होता है। 

भगवान् श्रीकृष्ण सामान्य नियम बताते हैं कि देवपूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं। जिस नियम का जो अधिष्ठाता देवता है या जिस क्षेत्र में जो उत्पादन क्षमता है उसका आह्वान करने पर मनुष्य केवल उसी फल को प्राप्त कर सकता है। इसी प्रकार मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं। 

इद्रियभोगों भोगों के लिए मनुष्य इतना अधिक प्रयत्न करके अन्त में क्षणिक फल को ही प्राप्त करता है। यदि वही प्रयत्न वह दैवी जीवन जीने में करे तो उसे नित्य आनन्दस्वरूप की उपलब्धि हो सकती है।  किन्तु मन की बहिर्मुखी प्रवृत्तियों के कारण वह अनात्म उपाधियों से तादात्म्य करके बाह्य वैषयिक जगत् में ही रमता है। (विवेक-जगने तक पूरे जीवन भर?)

विवेकी पुरुष (विवेकी बुद्धि) विषयोपभोग की तुच्छता और व्यर्थता को पहचान कर उनसे विरक्त हो जाते हैं। विवेक और वैराग्य से (साधनचतुष्टय से) सम्पन्न होकर जब वे आत्मस्वरूप का ध्यान करते हैं तब उन्हें उस परम आनन्दस्वरूप की वह अनुभूति होती है जो इन्द्रियातीत है - शरीर मन और बुद्धि तीनों के परे है नित्य है

गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने जो मैं शब्द का प्रयोग किया है वह उस अनन्त तत्त्व को सूचित करता है जो व्यष्टि और समष्टि का अधिष्ठान है। अत वे कहते हैं कि मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं तब उनका तात्पर्य ऐतिहासिक पुरुष देवकी पुत्र कृष्ण/राम/रामकृष्ण (शरीर) से नहीं वरन् चैतन्यस्वरूप पुरुष से होता है। 

इस दृष्टि से आत्मवित् आत्मस्वरूप ही बन जाता है। ( ब्रह्मविद ब्रह्मैवभवति) यही भगवान् श्रीकृष्ण के कथन का वास्तविक अभिप्राय है। 

तब क्या कारण है कि सामान्य जन आपको प्राप्त करने का-ईश्वरलाभ का ? प्रयत्न नहीं करता ? उत्तर है

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः।

परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।।7.24।।

।।7.24।। बुद्धिहीन मूढ़बुद्धि वाला मनुष्य मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमभाव को न जानते हुए अव्यक्त (मन-इन्द्रियों से पर) मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा को भी साधारण मनुष्य की तरह ही शरीर धारण करने वाला मानते हैं

समस्त नाम-रूपों की वैचित्र्यपूर्ण सृष्टि में प्रकाशित हो रहे-  परम सत्य को ग्रहण करने की विवेक-सार्मथ्य जिनमें नहीं है वे लोग अव्यय अविनाशी आत्मतत्त्व का सााक्षात् नहीं कर पाते। 

 इस दृष्टिगोचर अनित्य जगत् में अत्यन्त आसक्ति के कारण वे यह नहीं जान पाते कि यह सम्पूर्ण नाम-रूपमय जगत् सूत्र में मणियों के समान परमात्मा में पिरोया हुआ है जिस चैतन्य के प्रकाश में सम्पूर्ण विश्व प्रकाशित हो रहा है उस परम सत्य को ही यहाँ अव्यक्त शब्द से इंगित किया गया है।

इस अव्यक्त शब्द का लक्ष्यार्थ समझना आवश्यक है। जो वस्तु स्थूल है इन्द्रियगोचर है और जो निराकार सूक्ष्म बिचार है -उसे मन और बुद्धि के माध्यम से जाना जा सकता हैजैसे भावना या विचार भी  व्यक्त कहलाती है। परन्तु इन तीनों उपाधियों - इन्द्रिय, मन और बुद्धि के द्वारा जिसे जाना नहीं जा सकता वह वस्तु अव्यक्त है। 

आत्मतत्त्व ही अव्यक्त हो सकता है क्योंकि वही एकमात्र चेतन तत्त्व है जिसके कारण इन्द्रियां मन और बुद्धि स्वविषयों को ग्रहण करने में समर्थ होती हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि आत्मा ही इन सबका (देह, इन्द्रिय ,मन, मूढ़बुद्धि का) द्रष्टा है और इसलिए कभी दृश्यरूप में नहीं जाना जा सकता। वह अव्यक्त है।

बहिर्मुखी प्रवृत्ति के लोग (जिसकी बुद्धि आत्मानोन्मुखी नहीं है), केवल स्थूल भौतिक रूप को ही देख पाते हैं। अविवेक के कारण वे गुरु अथवा अवतार के शरीर को और सार्मथ्य को देखकर उतने मात्र को ही सनातन सत्य समझ लेते हैं। 

इसमें कोई सन्देह नहीं कि चित्त की एकाग्रता का अभ्यास करने के लिए अथवा उपासना के लिए किसी उपास्य की प्रतीक या प्रतिमा के रूप में आवश्यकता होती है किन्तु वह प्रतिमा ही स्वयं परम सत्य नहीं हो सकती। यदि वही सत्य वस्तु होती तो पाषाण/मिट्टी से से मूर्ति बनाने (और 10 दिनों तक पूजा करके विसर्जन कर देने के पश्चात्) या गुरु के पास पहुँचने मात्र से साधक को सत्य की प्राप्ति हो जाने से उसे और कुछ करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। 

मूर्ति पूजा का प्रयोजन चित्त की शुद्धि एवं एकाग्रता, मूढ़बुद्धि को आत्मानोन्मुखी बनाने और आत्मानुभूति करना है जिसके द्वारा (प्रत्याहार-धारणा) ध्यान का अभ्यास करके आत्मा का साक्षात् अनुभव किया जा सकता है।

यह श्लोक स्पष्ट रूप से हमें बताता है कि बोतल को औषधि सममझना,  शरीर को ही गुरु और मूर्ति को ही भगवान् समझ लेना व्यर्थ है , और प्रत्येक चमकीली वस्तु सोना -स्वर्ण नहीं होती। 

अवतार का सिद्धांत हिन्दू धर्म में स्वीकार किया जाता है। किसी न- किसी मात्रा में प्रत्येक व्यक्ति ही अवतार कहा जा सकता है। एक ही सत्य सर्वत्र सबमें व्याप्त है। मन और बुद्धि की उपाधियों में वह व्यक्त होता है जितना ही अधिक शुद्ध और स्थिर अन्तकरण (बुद्धि) होगा उतना ही अधिक चैतन्य का प्रकाश उसमें व्यक्त होगा। 

जिस पुरुष का अन्तकरण अत्यन्त शुद्ध एवं स्थिर होता है और जिसने अपरा प्रकृति पर पूर्ण विजय पा ली होती है वह ऋषि, मुनि या पैगम्बर, 'मानवजाति का मार्गदर्शक नेता' नवनीदा  कहलाता है। ये पुरुष  (सद्गुरु-ठाकुर,माँ और स्वामीजी) आत्मस्वरूप को पहचानकर कि वे ही भूतमात्र की आत्मा है , उसमें स्थित होकर दिव्य जीवन जीते हैं। उनके शरीर मन और बुद्धि को ही परम सत्य समझना ऐसी ही त्रुटि है जैसे कि तरंगों को ही समुद्र समझ लेना है।

 यही कारण है कि भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ ऐसे अविवेकी लोगों के लिए अबुद्धय जैसे कठोर शब्द का प्रयोग करते हैं। यह अज्ञान किस निमित्त से है ? इस पर कहते हैं 

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।

मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्।।7.25।।

।।7.25।। अपनी योगमाया से आवृत्त मैं सबको प्रत्यक्ष नहीं होता हूँ। यह मोहित लोक (मनुष्य) मुझ जन्मरहित, अविनाशी को नहीं जानता है।।

 यदि समस्त जगत् के अधिष्ठान के रूप में कोई दिव्य तत्त्व विद्यमान है तो फिर क्या कारण है कि सब लोगों के द्वारा सर्वत्र सदा वह अनुभव नहीं किया जाता?  क्यों हम परिच्छिन्न जीव के समान व्यवहार करते हैं और अपने अनन्त स्वरूप को पहचान नहीं पाते?

 संक्षेप में मुझमें और मेरे स्वरूप के मध्य कौन सा आवरण पड़ा हुआ है? जब जिज्ञासु साधकगण वेदान्त प्रतिपादित सिद्धांतों का अध्ययन करते हैं तो स्वाभाविक ही उनके मन में इस प्रकार के प्रश्न उठते हैं।

भगवान् कहते हैं यह मोहित जगत् मुझ अजन्मा अविनाशी को नहीं जानता है क्योंकि उनके लिए मैं त्रिगुणात्मिका योगमाया से आच्छादित रहता हूँ। 

वेदान्त के प्रारम्भिक विद्यार्थी जब माया को एक बाह्य वस्तु के रूप में समझने का प्रयत्न करते हैं तब उसे समझने में अत्यन्त कठिनाई होती है। परन्तु जब वे अध्यात्म दृष्टि से विचार करते हैं अर्थात् अपने ही अन्तकरण में माया किस प्रकार कार्य करती है ? ऐसा विचार जब करते हैं तो माया का सिद्धांत स्पष्ट हो जाता है। 

माया प्रिज्म (आयत) के समान ऐसी उपाधि है जिसके माध्यम से अवर्ण अद्वैत स्वरूप तत्त्व जब व्यक्त होता है तब सप्तरंगी प्रकाश (VIBGYOR-Red, Orange, Yellow, Green, Blue, Indigo, and Violetके समान  वह नानाविधि सृष्टि के रूप में प्रतीत होता है

व्यष्टि (एक व्यक्ति) में कार्य कर रही माया को ही अविद्या कहते हैं

हमारे पूर्वज वैदिक ऋषिओं ने जब इस अविद्या (अज्ञान या माया)का अध्यन बहुत सूक्ष्मता से किया, ध्यान की गहराई में लीन होकर किया , तो पाया कि  यह अविद्या (माया- अस्मिता , राग-द्वेष, अभि-निवेश, पंचक्लेश) ही जीवों के समस्त दुःखों का कारण है। और इस रहस्य को उद्घाटित किया कि यह अविद्या तीन गुणों से युक्त है जो 'मनुष्य' को प्रभावित करते हैं

ये तीन गुण हैं सत्त्व, रज और तम जो एक आयत का (प्रिज्म) का सा काम करते हैं और जिनके माध्यम से हमें इस बहुविधि सृष्टि का अनुभव होता है। रजोगुण का कार्य है विक्षेप और तमोगुण का कार्य बुद्धि पर पड़ा आवरण है। त्रिगुणों के विकारों से मोहित और भ्रान्त पुरुष (सम्मोहित बुद्धि या मूढ़बुद्धि) को आत्मा का साक्षात् ज्ञान नहीं होता। 

किसी ग्रामीण अनपढ़ व्यक्ति के लिए बल्ब में विद्युत का अभाव प्रतीत होता है क्योंकि वह अव्यक्त होती है। उसके प्रवाह को प्रत्यक्ष अनुभव करने के लिए सैद्धांतिक ज्ञान तथा प्रत्यक्ष प्रयोग की अपेक्षा होती है। एक बार विद्युत शक्ति के गुणधर्म का ज्ञान हो जाने पर यदि वह अनपढ़ मनुष्य जब उसी बल्ब में प्रकाश देखे तो उसे अव्यक्त विद्युत का ज्ञान तत्काल हो जाता है।

 इसी प्रकार जब किसी साधक का चंचल मन श्रवण मनन और निदिध्यासन तथा आत्मसंयम  या मनःसंयोग की पद्धति (अष्टांग योग) के प्रशिक्षण के द्वारा में प्रशान्त हो जाता है तब आवरण के अभाव में वह मुझ (आत्मा या इष्टदेव के) अजन्मा अविनाशी स्वरूप को पहचान लेता है।

अज्ञानी जीव (मायाग्रस्त अविवेकी जीव बुद्धि -स्वयं को M/F शरीर समझने वाली बुद्धि ?) इन्द्रिय- विषय-उपभोगों में नित्य सुख की खोज तभी तक करता है जब तक उसके आवरण और विक्षेप की निवृत्ति नहीं हो जाती

कामाग्नि में सुलगते निराशा में जकड़े असन्तोष से कुचले और आत्मनाश के भय से व्याकुल उन्मत्त और संत्तप्त मनों में समता और एकाग्रता कदापि नहीं हो सकती कि वे क्षणभर के लिए भी आत्मा का शुद्ध स्वरूप अनुभव कर सकें। 

योगमाया से मोहित यह जगत् मुझ अव्यय स्वरूप को नहीं जानता। मानो नाम और रूप की इस सृष्टि ने आत्मा को आवृत्त कर दिया है। 

[क्या अविद्या या माया सिंह-शावक (विवेकी मनुष्य) को भी भी डरपोक भेंड़ बना देती हैं ? तब फिर। ....]  उस आत्मज्ञान के लिए गुरु के उपदेश तथा स्वयं की साधना की आवश्यकता क्यों होती है?

    यह आवरण उसी प्रकार का है जैसे भूत झुरमुट को , मृगमरीचिका रेत को और तरंगे समुद्र को आच्छादित कर देती हैं।  सामान्य जीवों की अज्ञान दशा के विपरीत भगवान श्रीकृष्ण अपने स्वरूप को बताते हुए कहते हैं- 

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।

भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन।।7.26।।

।।7.26।। हे अर्जुन ! पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमान में स्थित तथा भविष्य में होने वाले भूतमात्र को मैं जानता हूँ, परन्तु मुझे कोई भी पुरुष नहीं जानता हैं।।

विश्व के सभी धर्मों में ईश्वर को सर्वज्ञ माना गया है। लेकिन गीता में सर्वज्ञता का अर्थ बताया गया है। 

आत्मा ही वह चेतन तत्त्व है जो मनबुद्धि की समस्त वृत्तियों का प्रकाशित करता है। बाह्य भौतिक जगत् का ज्ञान हमें तभी होता है जब इन्द्रियां विषय ग्रहण करती हैं जिसके फलस्वरूप मन में विषयाकार वृत्तियां उत्पन्न होती हैं। इन वृत्तियों का वर्गीकरण करके विषय का निश्चय करने का कार्य बुद्धि का है। मन और बुद्धि की वृत्तियां नित्य चैतन्य स्वरूप आत्मा से ही प्रकाशित होती हैं।

सूर्य का प्रकाश जगत् की समस्त वस्तुओं को प्रकाशित करता है। जब मेरे नेत्र या श्रोत रूप या शब्द को प्रकाशित करते हैं तब मैं कहता हूँ कि मैं देखता हूँ या मैं सुनता हूँ। संक्षेप में वस्तु का भान होने का अर्थ है उसे जानना और जानने का अर्थ है प्रकाशित करना। 

जैसे सूर्य को जगच्चक्षु कहा जा सकता है क्योंकि उसके अभाव में हमारी नेत्रेन्द्रिय निष्प्रयोजन होकर गोलक मात्र रह जायोगी वैसे ही आत्मा को सर्वत्र सदा सबका ज्ञाता कहा जा सकता है

आत्मा की सर्वज्ञता भगवान् के इस कथन में कि मैं भूत वर्तमान और भविष्य के भूतमात्र को जानता हूँ स्पष्ट हो जाती है।यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि आत्मा न केवल वर्तमान का ज्ञाता है बल्कि अनादिकाल से जितने विषय भावनाएं एवं विचार व्यतीत हो चुके है उन सबका भी प्रकाशक वही था और अनन्तकाल तक आने वाले भूतमात्र का ज्ञाता भी वह 'आत्मा' ही रहेगा। 

 विद्युत से पंखा घूमता है परन्तु पंखा विद्युत को गति नहीं दे सकता।  एक व्यक्ति दूरदर्शी यन्त्र से नक्षत्रों का निरीक्षण करता है,  किन्तु वह यन्त्र उस द्रष्टा व्यक्ति का निरीक्षण नहीं कर सकता।द्रष्टा आत्मा ही  इन्द्रिय मन और बुद्धि को चेतना प्रदान करता है, तो जड़ इन्द्रिय-मन-बुद्धि अपने प्रकाशित करने वाले आत्मा (चैतन्य) को किस प्रकार जान सकता हैभगवान् श्रीकृष्ण इस आत्मदृष्टि से कहते हैं यद्यपि मैं सबको सर्वत्र सदा जानता हूँ लेकिन मुझे कोई भी नहीं जानता है। 

वेदान्त में वर्णित पारमार्थिक दृष्टि से तो आत्मा तो चैतन्य स्वरूप है ही, इसलिए आत्मा को ज्ञाता या द्रष्टा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जानना तो बुद्धि का धर्म है। जैसे शुद्ध तार्किक दृष्टि से यह कहना गलत होगा कि सूर्य जगत् को प्रकाशित करता है। हमें रात्रि के अन्धकार में वस्तुएं दिखाई नहीं देतीं इस कारण दिन में उनके दृष्टिगोचर होने पर सूर्य को प्रकाशित करने के धर्म से युक्त मानते हैं। 

तथापि नित्य प्रकाश स्वरूप सूर्य की दृष्टि से ऐसा कोई क्षण नहीं है जब वह वस्तुओं को प्रकाशित करके उन्हें अनुग्रहीत न करता हो। अत यह कहना कि सूर्य जगत् को प्रकाशित करता है उतना ही अर्थहीन है जितना यह कथन कि आजकल मैं श्वासोच्छ्वास में- अर्थात श्वास लेने और श्वास छोड़ने में अत्यन्त व्यस्त हूँ

आत्मा का ज्ञातृत्व औपाधिक है अर्थात् माया की उपाधि (बुद्धि) से उसे प्राप्त हुआ है। शुद्ध सत्त्वगुण प्रधान माया में व्यक्त आत्मा या ब्रह्म को ही वेदान्त में ईश्वर कहा जाता है। भगवान् श्रीकृष्ण सत्य का साकार रूप या ईश्वर का अवतार हैं और इसलिए उनका स्वयं को सर्वज्ञ घोषित करना बिल्कुल उचित है।

परन्तु दुर्भाग्य से आत्मकेन्द्रित र्मत्य जीव परिच्छिन्न संकीर्ण और सीमित मन तथा बुद्धि के छिद्र से जगत् को देखते हुए समष्टि की ताल-बद्ध लय को पहचान नहीं पाता। 

जो व्यक्ति स्वनिर्मित अज्ञान के बन्धनों को तोड़कर विश्व के साथ तादात्म्य कर सकता है वही व्यक्ति श्रीकृष्ण के दृष्टिकोण को निश्चय ही समझ सकता है ; उसका अनुभव कर सकता है। जो व्यक्ति सफलतापूर्वक समष्टि मन के साथ तादात्म्य प्राप्त कर जीता है वह व्यक्ति अपने तथा तत्पश्चात् आने वाले युग का कृष्ण (या भावी नेता, पैगम्बर)  ही है

यदि सभी औपाधिक ज्ञानों का प्रकाशक आत्मा ही है तो किन प्रतिबन्धों के कारण आत्मा का साक्षात्कार नहीं हो पाता ? है भगवान् कहते हैं

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।

सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप।।7.27।।

।।7.27।। हे परन्तप भारत ! इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्वमोह से भूतमात्र उत्पत्ति काल में ही संमोह (अविवेक) को प्राप्त होते हैं।।

क्यों और कैसे यह जीव (विवेकी मनुष्य) भी आत्मा के शुद्ध स्वरूप को नहीं जान पाता ?

    इस तथ्य का वर्णन करते हुए -एक अत्यन्त वैज्ञानिक एवं सूक्ष्म दार्शनिक सत्य को इस श्लोक में सूचित किया गया है। भगवान् श्रीकृष्ण मूलभूत उन सिद्धांतों को बताते हैं जो आधुनिक जीवशास्त्रियों ने जीव के विकास के सम्बन्ध में शोध करके प्रस्तुत किये हैं। 

आत्मसुरक्षा की सर्वाधिक प्रबल स्वाभाविक प्रवृत्ति के वशीभूत मनुष्य जगत् में जीने का प्रयत्न करता है। सुरक्षा की यह प्रवृत्ति बुद्धि में उन वस्तुओं की इच्छाओं के रूप में व्यक्त होती है। जिनके द्वारा मनुष्य अपने सांसारिक जीवन को सुखी और समृद्ध बनाने की अपेक्षा रखता है। 

प्रिय वस्तु को प्राप्त करने की अभिलाषा को इच्छा कहते हैं। यदि कोई वस्तु या व्यक्ति इस इच्छापूर्ति में बाधक बनता है तो उसकी ओर मन की प्रतिक्रिया द्वेष या क्रोध के रूप में व्यक्त होती है।  इच्छा और द्वेष की दो शक्तियों के बीच होने वाले शक्ति परीक्षण में दुर्भाग्यशाली जीव छिन्नभिन्न होकर मरणासन्न व्यक्ति की असह्य पीड़ा को भोगता है

 स्वाभाविक ही ऐसा व्यक्ति सदा प्रिय की ओर प्रवृत्ति और द्वेष की ओर से निवृत्ति में व्यस्त रहता है। शीघ्र ही वह व्यक्ति अत्याधिक व्यस्त और पूर्णतया भ्रमित होकर थक जाता है। मन में उत्पन्न होने वाले विक्षेप दिन-प्रतिदिन बढ़ते हुए अशान्ति की वृद्धि करते हैं। इन्हीं विक्षेपों के आवरण के फलस्वरूप मनुष्य को अपने सत्यस्वरूप का दर्शन नहीं हो पाता

अतएव आत्मा की अपरोक्षानुभूति का एकमात्र उपाय है मन को संयमित करके उसके विक्षेपों पर पूर्ण विजय प्राप्त करना। विश्व के सभी धर्मों में जो क्रिया प्रधान भावना प्रधान या विचार प्रधान आध्यात्मिक साधनाएं बतायी जाती हैं उन सबका प्रयोजन केवल मन को पूर्णतया शान्त करने का ही है।

 The very moment of supreme peace is the moment of self-realization, self-illumination, and union with the Selfपरम शान्ति का वह क्षण ही, आत्मानुभूति आत्मप्रकाश और आत्ममिलन का क्षण होता है। दैवी करुणा से भरे स्वर में भगवान् श्रीकृष्ण का यह कथन है - "परन्तु दुर्भाग्य है कि प्राणीमात्र उत्पत्ति काल में ही सम्मोह को प्राप्त होते हैं-या  Hypnotized-मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। 

मनुष्य का यह कोई नैराश्यपूर्ण समर्पण नहीं है कि- दुखपूर्ण प्रारब्ध को भोग कर क्षय करने के लिए उसे यह वर्तमान देह-बंधन (M/F शरीर से तादात्म्य) हो जाये , और जिससे मुक्ति पाने में उसे जन्म से ही अशक्त बना दिया गया हो। 

ईसाई धर्म के समान सनातन धर्म - या भगवान कृष्ण का धर्म किसी भी मनुष्य को 'पाप का पुत्र' नहीं मानता। 

यमुना कुञ्ज विहारी दुर्दम्य आशावादी आशा के संदेशवाहक जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ मात्र दार्शनिक सत्य को ही व्यक्त कर रहे हैं कि कोई भी व्यक्ति किसी देह विशेष और उपलब्ध वातावरण में जन्म लेने की त्रासदी अपनी अतृप्त वासनाओं और प्रच्छन्न कामनाओं की परितृप्ति के लिए स्वयं ही निर्माण करता है। 

सम्यक् ज्ञान को प्राप्त करना (आत्मसाक्षात्कार करना) और इस संसारी मोह जाल से (देहाध्यास से) मुक्ति पाना ही मनुष्य जीवन का मुख्य उद्देश्य और पावन लक्ष्य है। 

गीता भगवान् द्वारा विरचित काव्य है जो विपरीत ज्ञान में फंसे लोगों को भ्रमजाल से निकालकर पूर्णानन्द में विहार कराता है

आत्मान्वेषी या सत्य के साधकों के गुण दर्शाने के लिए भगवान् आगे कहते हैं

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।

ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः।।7.28।।

।।7.28।। परन्तु जिन पुण्यकर्मी पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है, वे द्वन्द्वमोह से निर्मुक्त और दृढ़वती पुरुष मुझे भजते हैं।।

जिन पुण्यकर्मी पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है इस कथन को सम्यक् प्रकार से समझना आवश्यक है। वेदान्त के अनुसार पाप मनुष्य का स्वभाव नहीं हैं वह मनुष्य द्वारा किये गये गलत निर्णय अविवेकी मूढ़बुद्धि की मूर्खता है ,अर्थात् उस विपरीत ज्ञान का परिणाम है , जिसने आत्मचैतन्य को आच्छादित सा कर दिया है।

 पाप का मुख्य कारण है बाह्य स्थूल जगत् के निम्न स्तरीय विषयोपभोग के लिए हमारे मन की तृष्णा और स्पृहा। मूर्ख या पापी ? पुरुष मूढ़बुद्धि वह है जिसका अत्यधिक समय और ध्यान केवल अपने देहसुख इन्द्रिय-भोग के लिए ही व्यक्त होता है। ऐसे पुरुष में देह स्वामी और आत्मा उसकी दासी बन जाती है। बहिर्मुखी प्रवृत्ति वैषयिक सुखों की कामना मन में उठने वाली प्रत्येक निम्न कोटि की भावना का सन्तुष्टीकरण यह है, मूढ़बुद्धि वाले पापी पुरुष की जीवन पद्धति।

   इस प्रकार का कामुक पाशविक जीवन अन्तकरण में वैसी ही वासनाएं उत्पन्न करता है। वासना के अनुसार ही विचार होते हैं। विचारानुसार कर्म और ये कर्म फिर वासना को ही दृढ़ करते हैं।

मनुष्य की शान्ति और सन्तुष्टि को विनष्ट करने वाली वासनात्मक विचार जनित कर्म की श्रृंखला को तोड़ने के लिए मनुष्य को पुण्यकर्म  के द्वारा का नया जीवन प्रारम्भ करने का उपदेश दिया जाता है। पुण्यकर्म (निष्काम कर्म Be and Make) पाप का विरोधी होने से उसके अन्तर्गत वे सब विचार भावनाएं तथा कर्म आते हैं जो ईश्वर को समर्पित होते हैं अर्थात् जिनका लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति होता है। 

आप कौन हो ? 'मैं देह हूँ ' के स्थान पर 'मैं आत्मा हूँ' इस ज्ञान को दृढ़ करके कर्म करने पर वे अपना संस्कार उत्पन्न नहीं करेंगे। कुछ कालावधि (कितनी लंबी ?) में इन पुण्य-संस्कारों के दृढ़ होने पर पाप वासनाएं नष्ट हो जायेंगी। ऐसा पापयुक्त पुरुष सुख दुखादि रूप सभी प्रकार के द्वन्द्व-मोह से निर्मुक्त हो जाता है

 तब उसमें यह योग्यता आती है कि वह एकाग्रचित तथा दृढ़वती अर्थात् दृढ़ निश्चयी होकर आत्मा का ध्यान कर सके। साधन सम्पन्न साधक किस प्रयोजन से आत्मा का ध्यान करते हैं उत्तर है

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।

ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्।।7.29।।

।।7.29।। जो मेरे शरणागत होकर जरा और मरण से मुक्ति पाने के लिए यत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को और सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं।।

चित्तशुद्धि तथा ध्यानसाधना का प्रयोजन है जरा और मरण से मुक्ति पाना। आधुनिक काल में भी मनुष्य ऐसे उपायों को खोजने का प्रयत्न कर रहा है जिसके द्वारा जरा और मरण से मुक्ति मिल सके। पाश्चात्य शिक्षा में अमृत्व की कल्पना यह है कि इस भौतिक देह का अस्तित्व सदा बना रहे परन्तु अध्यात्म शास्त्र में इसे अमृतत्त्व नहीं कहा है। और न देह के नित्य अस्तित्व को जीवन का लक्ष्य बताया है।

प्राणिमात्र के लिए जन्म, वृद्धि, व्याधि ,क्षय और मरण ये विकार अवश्यंभावी हैं। ये सभी विकार या परिवर्तन मनुष्य को असह्य पीड़ा दायक होते हैं। इनके अभाव में मनुष्य का जीवन अखण्ड आनन्दमय होता है। 

ध्यानाभ्यास में साधक का प्रयत्न इन परिवर्तनशील उपाधियों के साथ हुए तादात्म्य से ऊपर उठकर कालत्रयातीत - मुक्त आत्मस्वरूप (चैतन्य) में स्थिति प्राप्त करने का होता है। 

विवेक-बुद्धि की योग्यता से सम्पन्न साधक आत्मा (इष्टदेव) का ध्यान करके अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप का साक्षात्कार करता है, कि यह आत्मा मैं हूँ। यह आत्मा ही वह परम सत्य है जो समस्त ब्रह्माण्ड का अधिष्ठान है जिसे वेदान्त में ब्रह्म की संज्ञा दी गई है। 

आत्मसाक्षात्कार का अर्थ ही ब्रह्मस्वरूप बनना है, क्योंकि व्यक्ति की आत्मा ही भूतमात्र की आत्मा है। सत्य के इस अद्वैत को यहाँ इस प्रकार सूचित किया गया है कि जो साधक मुझ आत्मस्वरूप पर ध्यान करते हैं वे ब्रह्म को जानते हैं। 

ज्ञानी पुरुष के विषय में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह न केवल सर्वव्यापी आत्मा का ज्ञाता है बल्कि स्वयं की सम्पूर्ण अध्यात्म अर्थात् मनोवैज्ञानिक शक्तियों का भी ज्ञाता है तथा वह सभी कर्मों में कुशल होता है। इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि आत्मानुभवी पुरुष जगत् व्यवहार में भी अकुशल और मूढ़ नहीं होता। आत्मज्ञानी अनुभवी पुरुषों का मत है कि केवल वही पुरुष वास्तविक अर्थ में जगत् की सेवा कर सकता है, जिसे लोगों के मनोविज्ञान का पूर्ण ज्ञान है तथा अपने मन पर पूर्ण संयम है। 

सत्य का गीत गाने के लिए ऐसा पूर्णत्व प्राप्त व्यक्ति - सुन्दर जीवन और उत्तम चरित्र   ही योग्यतम माध्यम है।  और ऐसे व्यक्ति का सुसंगठित और समस्त कार्यों में कुशल होना आवश्यक है।ज्ञानी पुरुषों के विषय में ही आगे कहते हैं

साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः।

प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः।।7.30।।

।।7.30।। जो पुरुष अधिभूत और अधिदैव तथा अधियज्ञ के सहित मुझे जानते हैं, वे युक्तचित्त वाले पुरुष अन्तकाल में भी मुझे जानते हैं।।

 आत्मानुभवी पुरुष न केवल मन के स्वभाव (अध्यात्म) और कर्म के स्वरूप को ही जानते हैं वरन् वे अधिभूत (पंच विषय रूप जगत्) अधिदैव (इन्द्रिय मन और बुद्धि की कार्य प्रणाली) और अधियज्ञ अर्थात् उन परिस्थितियों को भी जानते हैं जिनमें विषय ग्रहण रूप यज्ञ सम्पन्न होता है।

ईश्वर के किसी रूप विशेष के भक्त के विषय में सम्भवत कुछ लोगों में यह धारणा उचित हो सकती है कि भक्तजन अव्यावहारिक होते हैं और उनमें सांसारिक जीवन को सफलतापूर्वक जीने की कुशलता नहीं होती। एक सगुण उपासक अपने इष्ट देवता का ध्यान करने में ही इतना भावुक और व्यस्त हो जाता है कि उसमें संसार को समझने की न रुचि होती है और न क्षमता। 

परन्तु वेदान्त शास्त्र में आत्मज्ञानी पुरुष का जो चित्रण मिलता है उसके अनुसार वह पुरुष न केवल आत्मानुभव में दृढ़निष्ठ होता है वरन् वह सर्वत्र सदा एवं समस्त परिस्थितियों में अपने मन का स्वामी बना रहता है और ऐसी सार्मथ्य से सम्पन्न होता है जिसे एक दिन सम्पूर्ण जगत् को स्वीकार करना पड़ता है। ऐसा स्वामित्व प्राप्त नेता  पुरुष ही जगत् को नेतृत्व प्रदान कर सकता है। 

सब प्रकार के असंयम एवं विपर्ययों से मुक्त वह ज्ञानी पुरुष अध्यात्म और अधिभूत को जानते हुए इसी जगत् में ईश्वर के समान रहता है। सारांशत इस अध्याय की समाप्ति भगवान् की इस घोषणा के साथ होती है कि जो पुरुष मुझे जानता है वह सब कुछ जानता है। भगवान् श्रीकृष्ण के समान वह भी अपनी वर्तमान तथा भावी पीढ़ियों के भाग्य निर्माण में मार्गदर्शक बनता है। 

इस अध्याय के अन्तिम दो श्लोक उनमें प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दों का पूर्णरूप से वर्णन नहीं करते हैं। ये सूत्ररूप श्लोक हैं जिनका विस्तृत विवेचन अगले अध्याय में किया गया है। 

दो अध्यायों को संबद्ध करने की पारम्परिक शास्त्रीय पद्धतियों में से यह एक पद्धति है।

[श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का ज्ञानविज्ञानयोग नामक सप्तम अध्याय समाप्त होता है।उपनिषदों में उपदिष्ट सिद्धांत महर्षि व्यास के समय केवल काव्यत्मक पूर्णत्व के काल्पनिक वर्णन के रूप में रह गये थे जिनका जीवन की वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं था। 

इस प्रकार अपनी संस्कृति के मूल वैभव एवं सार्मथ्य से विलग हुए हिन्दुओं की सांस्कृतिक चेतना में पुनर्जीवित करना आवश्यक था। यह कार्य उन्हें उनके दार्शनिक सिद्धांतों में सौन्दर्य एवं तेजस्विता को दर्शा कर सम्पन्न किया जा सकता था।

 इस अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण ने निश्चयात्मक रूप से यह सिद्ध किया है तथा इस पर बल दिया है कि वेदान्त प्रतिपादित पूर्णत्व कोई कल्पना नहीं वरन् वह साधक की वास्तविक उपलब्धि बन सकती है जिसे जीवन में सफलतापूर्वक जी कर वह अपनी पीढ़ी का कल्याण कर सकता है।

 अत इस अध्याय का ज्ञानविज्ञानयोग शीर्षक अत्यन्त उपयुक्त है। केवल ज्ञान विशेष उपयोगी नहीं होता। ज्ञान का पूर्णत्व उसके यथार्थ अनुभव में है। ज्ञान का उपदेश तो दिया जा सकता है परन्तु अनुभव (विज्ञान) नहीं।

   धर्म तत्त्व ज्ञान का उपदेश देता है और उसके साथ ही उन उपायों का भी निर्देशन करता है जिनके द्वारा वह ज्ञान साधक का अपना विज्ञान बन सके और जीवन के साथ एकरूप हो जाय। इस प्रकार धर्म का प्रयोजन 'Be and Make' पद्धति से ऐसे अनुभवी पुरुषों का निर्माण करना है जो जीवन के परम पुरुषार्थ को प्राप्त करके धर्म को सत्योचित प्रमाणित कर सकें और अपनी पीढ़ियों को आनन्दाभिभूत करके कृतार्थ करने में सक्षम हों

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