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रविवार, 29 मार्च 2026

श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय -13⚜️️🔱अध्याय तेरह: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग ⚜️️🔱क्या 'मन' आत्मा से बढ़कर है ?⚜️️🔱13.22।।साधक को पहले विवेकज ज्ञान के द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त करना चाहिए और फिर वैराग्य के द्वारा मिथ्या आसक्ति का त्याग कर देना चाहिए। ⚜️️🔱 ।।13.17।।शक्ति (काली ) को मानने से ही जगत मिथ्या हो जाता है। समाधिस्थ हुए बिना शक्ति की सीमा लाँघने का उपाय नहीं है।⚜️️🔱गीता अध्याय 13 :(8.9,10, 11, 12 ) में चरित्र के इन बीस गुणों को ही ज्ञान कहा गया है⚜️️🔱6-7: अविद्या दशा : शिक्षा व्यवस्था में -शुद्ध आत्मस्वरूप का बोध कराने के लिए सर्वप्रथम जड़ और चेतन का विवेक कराना आवश्यक है।⚜️️🔱"तत्कर्म यन्न बंधाय सा विद्या या विमुक्तये"विद्या (विवेकज-ज्ञान) वह ज्ञान है जो मुक्ति का कारण है।⚜️️🔱 पूर्णत्व का अनुभव आत्मरूप से होता है न कि दृश्य रूप से।⚜️️🔱क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विवेक-जनित ज्ञान (विवेकज-ज्ञान) ही वास्तविक ज्ञान है⚜️️🔱आत्मा या ब्रह्म ही उपाधि भेद से क्षेत्र (Hand and Head) और क्षेत्रज्ञ (Heart-3H)रूप में प्रगट हुए हैं⚜️️🔱

⚜️️🔱अध्याय तेरह: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग ⚜️️🔱

[अध्याय 13 का सारांश]

     भगवद्गीता में कुल अठारह अध्याय हैं। इनका तीन खण्डों में विभाजन किया जा सकता है। प्रथम खण्ड के छः अध्यायों में कर्मयोग का वर्णन किया गया है। दूसरे खण्ड में भक्ति की महिमा और भक्ति को पोषित करने का की विधि वर्णन हुआ है। इसमें भगवान के ऐश्वर्यों का भी वर्णन किया गया है। तीसरे खण्ड के छः अध्यायों में तत्त्वज्ञान पर चर्चा की गयी है।

आचार्य शंकर ने कहा है कि इस अध्याय के अंतिम श्लोक में पूरे अध्याय का सारमर्म बतलाया गया है। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ अर्थात शरीर और आत्मा का भेद-दर्शन ही मुक्ति है। देहात्मबोध अर्थात इस नश्वर देह में आत्मज्ञान ही अज्ञान (अविद्या) तथा सारे बन्धनों का (पंचक्लेश का) कारण है। देहात्म-विवेक अर्थात आत्मा देह से पृथक है - इस ज्ञान से ही निर्वाण मुक्ति है।

कथामृत ग्रंथ में मिलता है - " देह और आत्मा। देह पैदा हुई है, फिर चली जाएगी। आत्मा की मृत्यु भी नहीं है , जन्म भी नहीं है। ..उनका दर्शन करने से (विवेक-दर्शन का अभ्यास करने से) उन्हें प्राप्त करने से देह-बुद्धि चली जाती है। उस समय देह पृथक और आत्मा पृथक -ऐसा बोध होता है। 

" जब तक देहबुद्धि है , तभी तक सुख-दुःख , जन्म-मृत्यु , रोग-शोक हैं। ये सब देह के ही हैं , आत्मा के नहीं। आत्मज्ञान होने से सुख-दुःख , जन्म-मृत्यु आदि स्वप्न की तरह मिथ्या प्रतीत होते हैं। जड़ देह , इन्द्रिय , मन , बुद्धि सभी सगुण, सभी नश्वर हैं। अतः वे अविनाशी आत्मा नहीं हो सकते। आत्मा (इष्टदेव) निर्गुण है। 

     इसके संबन्ध ने श्रीरामकृष्णदेव ने कहा था - " जो शुद्ध आत्मा है , वह निर्लिप्त है। उसमें माया या अविद्या है। इस माया (अविद्या) के भीतर ही तीन गुण हैं -सत्त्व, रजः , तमः। जो शुद्ध आत्मा है (शुद्धबुद्धि ) है उसमें ये तीन गुण मिले हुए हैं , किन्तु आत्मा निर्लिप्त है। यदि कहो कि दुःख , पाप, अशान्ति ये सब क्या हैं ? तो उत्तर है कि यह सब जीवों के लिए है। ब्रह्म निर्लिप्त है , आत्मा सभी अवस्थाओं में निर्लिप्त है। शरीर में रहकर भी देह-मन से निर्लिप्त है। शुद्ध आत्मा निर्लिप्त है। उसके भीतर विद्या और अविद्या दोनों हैं , तो भी वह निर्लिप्त है। जैसे वायु में कभी सुंगध कभी दुर्गंध मिलती है, किन्तु वायु निर्लिप्त है। श्रीरामकृष्ण ने एक दिन हाजरा महाशय से कहा था - " तुम शुद्ध आत्मा (ब्रह्म) को ईश्वर क्यों कहते हो ? शुद्ध आत्मा निष्क्रिय है , तीन अवस्थाओं में वह साक्षी -स्वरुप है। 

श्रीठाकुर ने अन्यत्र कहा है -" जो शुद्ध आत्मा है वह महाकारण, कारण का भी कारण हैं। पंचभूत स्थूल है , मन, बुद्धि, अहंकार सूक्ष्म है। प्रकृति या आद्यशक्ति इन सबकी कारण हैं , ब्रह्म या शुद्ध आत्मा कारण के भी कारण हैं। 

वेदान्ती कहते हैं कि आत्मा निर्लिप्त है। सुख -दुःख , पाप-पुण्य आदि आत्मा को कोई हानि नहीं पहुँचा सकते, किन्तु देहाभिमानी मनुष्यों को कष्ट दे सकते हैं। धुआँ दीवाल (स्थूल) को मलीन कर सकता है , किन्तु आकाश का कुछ भी नहीं कर सकता। " 

देह में आत्मबोध अज्ञान है , देहात्म-विवेक देह और आत्मा का पृथक ज्ञान ही बोध है। -जिसे ऐसा ब्रह्मज्ञान हुआ है, वह जीवन मुक्त है। वह ठीक समझ सकता है कि आत्मा पृथक और देह पृथक है। भगवान का दर्शन कर लेने पर देहात्मबुद्धि नहीं रहती। 

गीता का यह अतिशय उज्ज्वल अध्याय है  जो हमें अपने नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्त आत्म स्वरूप के ध्यान करने के साक्षात् साधन का उपदेश देता है।  जिसके अभ्यास से हम अपरोक्षनुभूति प्राप्त कर सकते हैं।

 स्वप्न से जाग जाने का अर्थ स्वप्नावस्था के सब दुःखों का अन्त हो जाना है। जाग्रत् ,  स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं के मध्य यातायात की कोई निश्चित सीमा नहीं निर्धारित की गयी है अर्थात् अवस्थान्तर के लिए हमें कोई परिश्रम नहीं करना पड़ता है। 

इसी प्रकार हमारा संसार -दुःख  प्रकृति के साथ हमारे अविद्याजनित मिथ्या तादात्म्य के कारण ही है। (लेकिन समाधि के बाद शरीर में रहने तक प्रारब्ध को भोग कर ही क्षय करना पड़ता है।) अतः  क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विवेक के द्वारा प्राप्त आत्मबोध से संसार की निवृत्ति हो जाती है। यही एकमात्र ज्ञेय वस्तु है। सम्पूर्ण गीता में  परमात्मा का इससे अधिक स्पष्ट और साक्षात् निर्देशन हमें किसी अन्य अध्याय में नहीं मिलता है।

इस अध्याय में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का भेद विशेष रूप से दिखाया है। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का यह भेद ज्ञान ही यथार्थ ज्ञान है। वही परमेश्वर का ज्ञान या ब्रह्मज्ञान है। 

इस ज्ञान में प्रतिष्ठित होने के लिए कुछ साधनों की आवश्यकता है। और विभिन्न साधन मार्गों से उस तत्त्वज्ञान या ब्रह्मज्ञान में प्रतिष्ठा मिल सकती है। अष्टांग योग के धारणा, ध्यान और समाधि के द्वारा जिस प्रकार आत्मदर्शन सम्भव है , उसी प्रकार नेति नेति ज्ञान मार्ग से भी आत्मज्ञानरूपी मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। फिर कर्म और भक्तिमार्ग से भी आत्मा लभ्य है। 

 उस अन्तिम अवस्था को ही आत्मदर्शन , ब्रह्मस्वरूपता की प्राप्ति , देहात्मविवेक -मोक्ष आदि विविध नामों से का गया है। 

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अर्जुन उवाच

प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च।

एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव।।13.1।।

।।13.1।। अर्जुन ने कहा -- हे केशव ! मैं, प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान और ज्ञेय ये सब जानना चाहता हूँ।।  

[अनेक ग्रंथों में  यह श्लोक नहीं है? आचार्य शंकरने भी अपने टीका और भाष्य में इस श्लोक को नहीं लिया है, हमने गीता के श्लोक की संख्या पूर्ण करने के लिए (700 ) इस श्लोक को ग्रहण किया है। ]  

इस अध्याय में ज्ञान शब्द से तात्पर्य उस शुद्धान्तकरण (शुद्धबुद्धि -विवेकी बुद्धि) से हैं जिसके द्वारा ही आत्मतत्त्व का अनुभव किया जा सकता है। यह आत्मा ही ज्ञेय अर्थात् जानने योग्य वस्तु है।  अर्जुन की इस जिज्ञासा के उत्तर को जानना सभी साधकों को लाभदायक होगा।

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।

एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः।।13.2।।

।।13.2।। श्रीभगवान् ने कहा -- हे कौन्तेय ! यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसे तत्त्वज्ञ जन, क्षेत्रज्ञ कहते हैं।।

 पूर्णत्व का अनुभव आत्मरूप से होता है न कि दृश्य रूप से। ऋषियों का इस विषय में एकमत है कि अन्तर्मुखी होकर आत्मविचार करना ही आत्मबोध तथा उसके साक्षात् अनुभव का साधन मार्ग है। 

जाग्रत पुरुष ही अपनी किसी एक विशेष मनस्थिति से स्वप्नद्रष्टा बन जाता है और जब तक स्वप्न बना रहता है तब तक उस स्वप्नद्रष्टा के लिये वह अत्यन्त सत्य प्रतीत होता है। परन्तु जाग जाने पर उस स्वप्न का अभाव हो जाता है और जाग्रत् पुरुष यह जानता है कि वह स्वप्न उसके ही मन का मरीचिका मात्र था।  इसी प्रकार आत्मानुभूति की वास्तविक जागृति में इस दृश्य प्रपंच का अभाव होता है। 

इस प्रकार वेदान्त दर्शन के अनुसार विचार करने पर ज्ञात होता है कि समस्त प्राणी दो तत्त्वों से बने हैं। एक तत्त्व है परिवर्तनशील देह और मन जड़-अचेतन और दूसरा है अपरिवर्तनीय अविनाशी चेतन तत्त्व।

 संपूर्ण जड़ जगत् क्षेत्र है, और चैतन्य स्वरूप आत्मा क्षेत्रज्ञ कहा जाता है। 

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम।।13.3।।

।।13.3।। हे भारत ! तुम समस्त क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे ही जानो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही (वास्तव में) ज्ञान है , ऐसा मेरा मत है।।

 क्षेत्रज्ञ मैं हूँ ! क्योंकि सभी साधकों को यह इसी रूप में अनुभव करना है कि वह मैं हूँ (सोऽहम्)। भगवान् श्रीकृष्ण गीता का उपदेश योगारूढ़ की स्थिति के विरले क्षणों में कर रहे हैं। वे सर्वव्यापी आत्मस्वरूप से तादात्म्य किये हुये हैं।

इस सम्पूर्ण विविध नाम-रूपमय सृष्टि के पीछे विद्यमान एकमेव सत्य (चैतन्य आत्मा) का निर्देश करने के पश्चात् भगवान् अपना मत बताते हुये कहते हैं कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विवेक-जनित ज्ञान (विवेकज-ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान कहलाने योग्य है। क्योंकि यही ज्ञान हमें अपने सांसारिक बन्धनों से मुक्त कराने में समर्थ है। 

"तत्कर्म यन्न बंधाय सा विद्या या विमुक्तये" (विष्णुपुराण १.१९.४१) का अर्थ है- कर्म वही है जो बंधन का कारण नहीं होता, और विद्या (विवेकज-ज्ञान) वह ज्ञान है जो मुक्ति का कारण हैआत्मानुभूति के अतिरिक्त अन्य ज्ञान व्यर्थ का पाण्डित्य मात्र है। आत्मा या ब्रह्म ही उपाधि भेद से क्षेत्र (Hand and Head) और क्षेत्रज्ञ (Heart-3H) रूप में प्रगट हुए हैं।

ज्ञानमार्ग के निष्ठावान् साधकों के लिए यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का ज्ञान उपयोगी और आवश्यक होने के कारण उन्हें उसका विस्तृत अध्ययन करना होगा।

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत्।

स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु।।13.4।।

।।13.4।। वह क्षेत्र जो है, जैसा है, जिन विकारों वाला है और जिससे जो पैदा हुआ है; तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो है और जिस प्रभाव वाला है, वह सब संक्षेप में मेरेसे सुन।

हमारे आसपास का यह जगत् जिसे हमने ही प्रेक्षित किया है तथा वे ही प्रक्रियायें जिनके द्वारा हम कार्य करते हुये असंख्य विषयों भावनाओं और विचारों की विविधता को देखते हैं ,इन सबका हमें सूक्ष्म निरीक्षण तथा अध्ययन करना चाहिये। 

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्।

ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितै:।।13.5।।

।।13.5।। (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के विषय में) ऋषियों द्वारा विभिन्न और विविध छन्दों में बहुत प्रकार से गाया गया है, तथा सम्यक् प्रकार से निश्चित किये हुये युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा (अर्थात् ब्रह्म के सूचक शब्दों द्वारा) भी (वैसे ही कहा गया है)।।

यहाँ भगवान् स्वयं ही स्पष्ट कहते हैं कि ऋषियों द्वारा अनुभूत और प्रतिपादित सत्य की ही वे पुनर्घोषणा कर रहे हैं। संक्षेप में उपनिषदों के प्रतिपाद्य ब्रह्मतत्त्व का ही निरूपण इस अध्याय का विषय है। 

महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।

इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः।।13.6।।

।।13.6।। पंच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त (प्रकृति), दस इन्द्रियाँ, एक मन, इन्द्रियों के पाँच विषय।।

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः।

एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्।।13.7।।

।।13.7।। इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघात (स्थूलदेह), चेतना (अन्त:करण की चेतन वृत्ति) तथा धृति -  इस प्रकार यह क्षेत्र विकारों के सहित संक्षेप में कहा गया है।।

अहंकार-  चैतन्य (आत्मा)  का उपाधियों के साथ तादात्म्य होने पर अहंभाव या अहंकार की उत्पत्ति होती है। यही उपाधियों द्वारा कर्मों का कर्ता और फलों का भोक्ता बनता है। संसार के सुखदुखादिक इसी के लिए होते हैं।

बुद्धि - सांख्यदर्शन में महत्तत्त्व कहते हैं , समष्टि की दृष्टि से यहाँ बुद्धि शब्द प्रयुक्त है जिसे । अन्तकरण की निश्चयात्मिका वृत्ति बुद्धि कहलाती है। जीवन में वस्तु की यथार्थता अनुभवों का शुभ और अशुभ रूप में निर्धारण करना ही बुद्धि का कार्य है।अव्यक्त मनुष्य के मन और बुद्धि जिससे प्रेरित होते हैं  वह अव्यक्त वासनाएं हैं। जगत् में हम जो कर्म करते हैं तथा फल भोगते हैं उनसे हमारे मन में संस्कार उत्पन्न होते हैं।  जो हमारे भावी कर्म, विचार एवं भावनाओं को दिशा प्रदान करते हैं। 

एक व्यष्टि जीव के समस्त कर्मों का स्रोत उसकी वासनाएं होती हैं।  इसी समष्टि वासना को सांख्यदर्शन में मूलप्रकृति कहा गया है, तो वेदान्त ने इसे माया कहा हैमाया या मूलप्रकृति की उपाधि से विशिष्ट परमात्मा ही सृष्टिकर्ता मायाधीश ईश्वर है और वही परमात्मा व्यष्टि वासना की उपाधि (अविद्या) से विशिष्ट मायाधीन जीव बनता है

इस विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि अव्यक्त ही वह अदृष्ट कारण है जिससे यह दृश्य जगत् कार्यरूप में व्यक्त हुआ है। दस इन्द्रियाँ पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ ही वे कारण हैं जिनके द्वारा प्रत्येक मनुष्य क्रमश विषय ग्रहण करके अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त करता है। 

क्षेत्र के तत्त्वों को बताने के पश्चात् भगवान् उसके विकारों को बताते हैं। वे विकार हैं इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, स्थूल देह, अन्तकरण वृत्ति तथा धृति अर्थात् धैर्य। संक्षेपत केवल शरीर इन्द्रियाँ मन और बुद्धि ही क्षेत्र नहीं है वरन् उसमें इन उपाधियों द्वारा अनुभूत विषय भावनाएं और विचार भी समाविष्ट हैं। 

द्रष्टा से भिन्न जो कुछ भी है वह सब दृश्य है क्षेत्र है। इस द्रष्टा आत्मचैतन्य की दृष्टि से जो कुछ भी दृश्य, ज्ञात तथा अनुभूत वस्तु है वह सब क्षेत्र है। इसे गीता में अत्यन्त संक्षिप्त वाक्य यह शरीर के द्वारा दर्शाया गया है। इस सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करने वाला चैतन्यस्वरूप आत्मा क्षेत्रज्ञ कहलाता है। 

अविद्या दशा : होश सँभालते ही भ्रमित होकर स्वयं को M/F शरीर को (अविद्या , अस्मिता, राग-द्वेष-अभिनिवेश)   में यह जीव, शरीर आदि क्षेत्र को ही अपना स्वरूप अर्थात् क्षेत्रज्ञ समझता है।  इस कारण उसे अपने शुद्ध आत्मस्वरूप का बोध कराने के लिए सर्वप्रथम जड़ और चेतन का विवेक कराना आवश्यक है।  इसीलिए यहाँ 'क्षेत्र' को इतने विस्तार पूर्वक-दो श्लोकों में (13/6-7 में) बताया गया है

(प्राथमिक शिक्षा से ही या उच्चतर शिक्षा व्यवस्था में आचार्य शंकर द्वारा कही गयी विवेक की परिभाषा बताना आवश्यक/अनिवार्य है। अतएव पहले विवेक-बुद्धि सम्पन्न शिक्षकों , नेताओं का निर्माण का आवश्यक है।)  

अब अगले पाँच श्लोकीय प्रकरण में ज्ञान को बताया गया है , यहाँ ज्ञान शब्द से तात्पर्य उस अन्तकरण से है जो आत्मज्ञान के लिए आवश्यक गुणों से सम्पन्न हो।  क्योंकि शुद्ध अन्तकरण (शुद्ध बुद्धि )  के द्वारा ही आत्मा का अनुभव सम्भव होता है। अत अब प्रस्तुत प्रकरण में भगवान् श्रीकृष्ण चरित्र के बीस गुणों को बताते हैं जो सदाचार और नैतिक नियम हैं।

 वे गुण हैं- 

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।

आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः।।13.8।।

।।13.8।। मानित्व-(अपनेमें श्रेष्ठताके भाव-) का न होना, दम्भित्व-(दिखावटीपन-) का न होना, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरुकी सेवा, बाहर-भीतरकी शुद्धि, स्थिरता और मनका वशमें होना।

।।13.8।। नम्रताः अमानित्व -  जब हमें अपने क्षेत्र अर्थात् शरीर के गुणों जैसे सौंदर्य, बुद्धि, प्रतिभा, सामर्थ्य आदि पर अहंकार हो जाता है, तब हम यह भूल जाते हैं कि ये सब गुण हमें भगवान ने ही कृपापूर्वक प्रदान किए हैं। अहंकार के परिणामस्वरूप हमारी चेतना हमें भगवान से विमुख कर देती है। यह आत्मज्ञान के मार्ग में एक बड़ी बाधा है क्योंकि अहंकार मन और बुद्धि को प्रभावित करके पूरे क्षेत्र को दूषित कर देता है। 

अमानित्व स्वयं को पूजनीय व्यक्ति समझना मान कहलाता है। उसका अभाव अमानित्व है। अदम्भित्व अपनी श्रेष्ठता का प्रदर्शन न करने का स्वभाव। अहिंसा शरीर मन और वाणी से किसी को पीड़ा न पहुँचाना

 क्षान्ति -अर्थात सहनशक्ति  किसी के अपराध किये जाने पर भी मन में विकार का न होना क्षान्ति अर्थात् सहनशक्ति हैआर्जव हृदय का सरल भाव अकुटिलता।  

आचार्योपासना गुरु की केवल शारीरिक सेवा ही नहीं,  वरन् उनके हृदय की पवित्रता और बुद्धि के तत्त्वनिश्चय के साथ तादात्म्य करने का प्रयत्न ही वास्तविक आचार्योपासना है। 

शौचम् शरीर, वस्त्र, बाह्य वातावरण तथा मन की भावनाओं, विचारों, उद्देश्यों तथा अन्य वृत्तियों की शुद्धि भी इस शब्द से अभिप्रेत है। 

स्थिरता जीवन के सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दृढ़ निश्चय और एकनिष्ठ प्रयत्न। आत्मसंयम जगत् के साथ व्यवहार करते समय इन्द्रियों तथा मन पर संयम होना

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।

जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्।।13.9।।

।।13.9।। इन्द्रियों के विषय के प्रति वैराग्य, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धवस्था, व्याधि और दुःख में दोष दर्शन...৷৷

 इन्द्रियों के विषयों के प्रति वैराग्य : इसका अर्थ जगत् से पलायन करना नहीं है। विषयों के साथ रहते हुए भी मन से उनका चिन्तन न करना तथा उनमें आसक्त न होना  यह वैराग्य का अर्थ है। जो व्यक्ति विषयों से दूर भागकर कहीं जंगलों में बैठकर उनका चिन्तन करता रहता है वह तो अपनी वासनाओं का केवल दमन कर रहा होता है।  ऐसे पुरुष को भगवान् ने मिथ्याचारी कहा है। (दादा कहते थे चरित्र जंगल में बैठकर पकाने की वस्तु नहीं है -समाज में रहकर ही यम-नियम का पालन 24X 7 करना है।)  

अहंकार का अभाव : व्यष्टिगत जीवभाव का उदय (M/F शरीर होने का भाव )  केवल तभी होता है जब हम शरीरादि उपाधियों के साथ तथा उनके अनुभवों के साथ तादात्म्य करते हैं। अपने शुद्ध आत्मस्वरूप में स्थित होने के लिए आवश्यक पूर्व गुण यह है कि हम इस मिथ्या तादात्म्य को विवेक- विचार के द्वारा नष्ट कर दें। यह प्रक्रिया भूमि जोतने के पूर्व घासपात को दूर करने के तुल्य ही है।  

जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि दुख-दोषानुदर्शनम् : वर्तमान अविद्या दशा से असन्तुष्टि ही हमें नवीन श्रेष्ठतर और सुखद स्थिति को प्राप्त करने के लिए प्रेरित कर सकती है। जब तक किसी राष्ट्र या समाज के लोगों में इस बात की जागरूकता नहीं आती है कि उनकी वर्तमान दशा (अविद्या दशा में स्वयं को मात्र देह M/F समझना) अत्यन्त घृणित और दुखपूर्ण है तब तक वे अपने दुखों को भूलकर अपने आप को ही उस अविद्या दशा में जीने के अनुकूल बना लेते हैं। यही कारण है कि प्रत्येक नेता या समाज सेवक सर्वप्रथम लोगों को उनकी पतित और दरिद्रता की दशा (पशु दशा) का बोध कराता है। जब लोगों में इस बात की जागरूकता आ जाती है, तब वे उत्साह के साथ श्रेष्ठतर आनन्द और समृद्ध जीवन जीने का प्रयत्न करने को तत्पर हो जाते हैं।

यही पद्धति शैक्षणिक Be and Make ' और आध्यात्मिक क्षेत्रों में भी प्रयोज्य है। जब तक साधक को अपने आन्तरिक व्यक्तित्व के बन्धनों का पूर्णतया भान  नहीं होता है (जब तक अविनाशी आत्मा होते हुए भी नश्वर देह समझने की मूढ़ बुद्धि रहती है)तब तक वह स्वनिर्मित दुख के गर्त में पड़ा रहता है, और उससे बाहर आने के लिए कदापि प्रयत्न नहीं करता है। 

मानव शरीर और मन में अपने आप को परिस्थिति के अनुकूल बना लेने की अद्भुत् क्षमता है। वे अत्यन्त घृणित अवस्था (पाशविक अवस्था) को भी स्वीकार कर लेते हैं यहाँ तक कि उसी में सुख भी अनुभव करने लगते हैं। इसलिए यहाँ साधक को अपनी वर्तमान दशा (अविद्या दशा) के दोषों को विवेक-विचार पूर्वक देखने का उपदेश दिया गया है।

एक बार जब वह विवेकी मनुष्य  अपनी बद्धावस्था को (देहाभिनि अवस्था की मूर्खता को) पूर्णतया समझ लेगा तब उसमें आवश्यक आध्यात्मिक जिज्ञासा, बौद्धिक सार्मथ्य,  मानसिक उत्साह और शारीरिक साहस आदि समस्त गुण आ जायेंगे जिनके द्वारा वह आध्यात्मिक पूर्णता की उपलब्धि सरलता से कर सकेगा। 

जन्ममृत्युजराव्याधि में दोष का दर्शन प्रत्येक शरीर को ये विकार प्राप्त होते हैं। इनमें से प्रत्येक विकार नयेनये दुखों का स्रोत है। इन समस्त विकारों से प्राप्त होने वाले दुखों के प्रति जागरूकता आ जाने पर वह पुरुष उनसे मुक्ति पाने के लिए अधीर हो जाता है। दुख के विरुद्ध विद्रोह का यह भाव ही वह प्रेरक तत्त्व है जो साधकों को पूर्णत्व के शिखर तक शीघ्रता से पहुँचने के लिए प्रेरित करता है। 

असक्तिरनभिष्वङ्ग: पुत्रदारगृहादिषु।  

नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु।।13.10।

।।13.10।। आसक्ति तथा पुत्र, पत्नी, गृह आदि में अनभिष्वङ्ग (तादात्म्य का अभाव); और इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में समचित्तता।।

 हमें जो दुख होता है वह विषयों के कारण नहीं हमारे उसके साथ के मानसिक संग के कारण होता है। जैसै अग्नि स्वयं किसी को नहीं जला सकती जब तक कि कोई उसे स्पर्श न करे। 

पुत्र, भार्या और गृहादिक में अनभिष्वंग अति स्नेह को अभिष्वंग कहते हैं। अत उसका अभाव ही अनभिष्वंग कहलाता है। जब किसी व्यक्ति के प्रति सामान्य प्रीति बढ़कर आसक्ति का रूप ले लेती है, तब उसे अभिष्वंग कहते हैं। इस आसक्ति का लक्षण है यह है कि मनुष्य को अपनी प्रिय वस्तु या व्यक्ति के साथ इतना तादात्म्य हो जाता है कि उनके सुखदुख उसे अपने ही अनुभव होते हैं। इसका स्पष्ट उदाहरण है पुत्र के प्रति माता -पिता की आसक्ति काइस प्रकार की आसक्ति के कारण व्यक्ति के मन में सदा विक्षेप बना रहता है और वह कार्य करने में भी अकुशल हो जाता है। 

हमें अपने आन्तरिक व्यक्तित्व के चारों ओर नित्य -अनित्य विवेक की ऐसी दीवार खड़ी करनी चाहिये कि ये सभी विक्षेप हमसे दूर रहें और मन का सन्तुलन सदा बना रहे।  जिसके बिना किसी प्रकार की प्रगति या समृद्धि कदापि संभव नहीं होती। 

प्रिय और अप्रिय परिस्थितियों में चित्त की समता को सतत अभ्यास करते रहने से प्राप्त किया जा सकता है। यदि मनुष्य अपनी मूढ़ बुद्धि की प्रीति और आसक्ति के बन्धनों से मुक्त हो जाये तो उसे अपने में ही अतिरिक्त शक्ति का भण्डार प्राप्त होता है। 

 जिसका उसे सही दिशा में सदुपयोग करना चाहिये अन्यथा वही शक्ति आत्मघातक सिद्ध हो सकती है।वह सही दिशा क्या है इसे अगले श्लोक में बताते हैं

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। 

विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि।।13.11।।

।।13.11।। अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि।।

यह श्लोक बताता है कि किस प्रकार इस अतिरिक्त शक्ति का वह सही दिशा में सदुपयोग करे जिससे कि आत्मविकास में उसका लाभ मिल सके। अनन्ययोग से मुझ में अव्यभिचारिणी भक्ति अनन्यता का अर्थ है मन का ध्येय विषय में एकाग्र हो जाना। इसके लिये विजातीय वृत्तियों का सर्वथा त्याग करके ध्येयविषयक वृत्ति को ही बनाये रखने का अभ्यास आवश्यक होता है। ध्यान या भक्ति में इस स्थिरता के नष्ट होने के लिए दो कारण हो सकते हैं या तो साधक के मन की अस्थिरता या फिर ध्येय का ही निश्चित नहीं होना। 

यदि हमारी भक्ति एक मूर्ति से अन्य मूर्ति में परिवर्तित होती रहती है तो एकाग्रता कैसे सम्भव हो सकती है इसलिये यहाँ कहा गया है कि योग में प्रगति और विकास के लिए अनन्य योग से परमात्मा की भक्ति आवश्यक है। 

अविभाजित ध्यान तथा मन में उत्साह के होने पर पर भक्ति में एकाग्रता आना सरल कार्य हो जाता है। यहाँ अव्यभिचारी शब्द से साधक को यह चेतावनी दी जाती है कि उसका ध्यान अनेक देवीदेवताओं अथवा विचारों में न भटके वरन् चुने हुये ध्येय के साथ एकनिष्ठ रहे। फिर एक ही लक्ष्य दिखाई देता है और इन्हें लौकिक बातों में कोई रुचि नहीं रह जाती।यहाँ जिस समुदाय में अरुचि रखने को कहा गया है वह असंस्कृत असभ्य भोगों में आसक्त जनों के समुदाय के सम्बन्ध में कहा गया है न कि 'सन्त पुरुषों के संग' से।

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।

एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा।।13.12।।

।।13.12।। अध्यात्मज्ञान में नित्यत्व अर्थात् स्थिरता तथा तत्त्वज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा का दर्शन, यह सब तो ज्ञान कहा गया है, और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है।।

ज्ञान को दर्शाने वाले इस प्रकरण के इस अन्तिम श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण दो और गुणों को बताते हैं आत्मज्ञान में प्रतिष्ठित रहना तथा तत्त्वज्ञानार्थ का दर्शन। - मोक्ष, विवेकज-ज्ञान से प्राप्त होने वाले तत्वज्ञान का अनुसन्धान - या आत्मानुसंधान। 

श्री रामकृष्ण देव ने कहा है - " आत्मा के द्वारा ही आत्मा को जाना जा सकता है। शुद्धमन , शुद्ध बुद्धि, शुद्ध आत्मा एक ही है। "  (स्वयं को देह समझने वाली जड़ अहंबुद्धि के द्वारा, अविनाशी चैतन्य आत्मा को नहीं जाना जा सकता।) 

आत्मज्ञान में प्रतिष्ठित होना : आत्मज्ञान जीवन में अनुभव करके जीने का विषय है केवल बुद्धि से सीखने का नहीं।  यदि आत्मा ही एक सर्वव्यापी पारमार्थिक सत्य है तब साधक को अपने व्यक्तित्व के सभी स्तरों पर आत्मदृष्टि से रहने का - बहुत सतर्कता के साथ प्रयत्न करना चाहिये। 

स्वयं को आत्मा जानकर उसी बोध में स्थित होकर साधक को अपने जीवन के समस्त व्यवहार करने चाहिये। इसके लिये सतत अभ्यास की आवश्यकता होती है

तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् अमानित्वादि गुणों का विकास जिसके निमित्त करने को कहा गया है, वह है तत्त्वज्ञान और उस तत्त्वज्ञान के अर्थ का जो लक्ष्य है  उसका दर्शन करना। संसार बन्धनों की उपरामता अर्थात् मोक्ष ही वह लक्ष्य है। लक्ष्य का सतत स्मरण करते रहने से साधनाभ्यास में प्रवृत्ति और उत्साह बना रहता है  जो लक्ष्यप्राप्ति में साहाय्यकारी सिद्ध होता है। 

इस प्रकरण में उपर्युक्त पाँच श्लोकों (गीता अध्याय 13 :8.9,10, 11, 12 ) में  चरित्र के इन बीस गुणों को ही ज्ञान कहा गया है क्योंकि ये समस्त गुण आत्मसाक्षात्कार के लिए अनुकूल हैं। ये गुण, प्रवृत्तियों, व्यवहार और मनोवृत्तियों का वर्णन करते हैं जो हमारे जीवन को शुद्ध करते हैं और उसे ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करते हैं। 

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते।

अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते।।13.13।।

।।13.13।। मैं उस ज्ञेय वस्तु को स्पष्ट कहूंगा जिसे जानकर मनुष्य अमृतत्व को प्राप्त करता है। वह ज्ञेय है - अनादि, परम ब्रह्म, जो न सत् और न असत् ही कहा जा सकता है।।

जिसे जानकर साधक अमृत्व को प्राप्त होता है जड़ पदार्थ का धर्म है मरण। इन जड़ उपाधियों के साथ तादात्म्य के कारण अमरणधर्मा (अविनाशी) आत्मा इनसे अवच्छिन्न हुआ व्यर्थ ही मिथ्या परिच्छिन्नता और मरण का अनुभव करता है। आत्मानात्मविवेक के द्वारा अपने आत्मस्वरूप को पहचान कर उसमें दृढ़ स्थिति प्राप्त करने से मरण का यह मिथ्या भय समाप्त हो जाता है और अमृतस्वरूप आत्मा के परमानन्द का अनुभव होता है।

जो परमात्मा काल का भी अधिष्ठान है उसकी उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती। ब्रह्म को न सत् कहा जा सकता है और न असत्। सामान्य दृष्टि से जो वस्तु इन्द्रियगोचर होती है, उसे ही हम सत् (सत्य) कहते हैं। परन्तु जो चैतन्य द्रष्टा है वह कभी भी इन्द्रिय मन और बुद्धि का ज्ञेय नहीं हो सकता।  इसलिए कहा गया है कि वह सत् (सत्य) नहीं है। चैतन्य तत्त्व समस्त वस्तुओं का प्रकाशक होते हुए स्वयं समस्त अनुभवों के अतीत है

यदि वह सत् (सत्य) नहीं है तो हम उसे असत् (असत्य)  समझ लेगें।  इसलिए यहाँ उसका भी निषेध किया गया है। अत्यन्त अभावरूप वस्तु को असत् कहते हैं जैसे - खरहे का सिंघ,  आकाश पुष्प, बन्ध्यापुत्र इत्यादि। ब्रह्म को असत् नहीं कह सकते. क्योंकि वह सम्पूर्ण जगत् का कारण है। उसका ही अभाव होने पर जगत् की सिद्धि कैसे हो सकती है इसलिए उपनिषदों में उसे "नेति, नेति " (यह नहीं) की भाषा में निर्देशित किया गया है।

शंकराचार्य जी कहते हैं- इन्द्रियातीत होने अर्थात जाति और गुण से रहित होने के कारण ब्रह्म को सत् नहीं कहा जा सकता और समस्त शरीरों में चैतन्य रूप में व्यक्त होने के कारण असत् भी नहीं कहा जा सकता है। 

उपर्युक्त कथन से कोई व्यक्ति उसे शून्य न समझ ले इसलिए समस्त प्राणियों की उपाधियों के द्वारा ब्रह्म के अस्तित्व का बोध कराते हुए भगवान् कहते हैं

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।

सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति।।13.14।।

।।13.14।। वह सब ओर हाथ-पैर वाला है और सब ओर से नेत्र, शिर और मुखवाला तथा सब ओर से श्रोत्रवाला है; वह जगत् में सबको व्याप्त करके स्थित है।।

यद्यपि प्रणियों के हाथ और पैर जड़ तत्त्व के बने हैं तथापि वे चेतन और कार्यक्षम प्रतीत हो रहे हैं। इन सबके पीछे इन्हें चेतनता प्रदान करने वाला आत्मतत्त्व सर्वत्र एक ही है। इसीलिए यहाँ कहा गया है कि ब्रह्म समस्त हाथ और पैरों को धारण करने वाला है।

वह परम सत्य सबको व्याप्त करके स्थित है। यह श्लोक वैदिक साहित्य से परिचित विद्यार्थियों को ऋग्वेद के प्रसिद्ध पुरुषसूक्तम् का स्मरण कराता है।भगवान् आगे कहते हैं

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।

असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च।।13.15।।

।।13.15।। वह समस्त इन्द्रियों के गुणो (कार्यों) के द्वारा प्रकाशित होने वाला, परन्तु (वस्तुत:) समस्त इन्द्रियों से रहित है; आसक्ति रहित तथा गुण रहित होते हुए भी सबको धारणपोषण करने वाला और गुणों का भोक्ता है।।

यह श्लोक उपनिषद् से लिया गया है। आत्मचैतन्य के सम्बन्ध से ही समस्त इन्द्रियाँ अपनाअपना व्यापार करती हैं। परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि उनसे अवच्छिन्न आत्मा ही कार्य करता है तथा वह इन इन्द्रियों से युक्त है। किन्तु विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि इन्द्रियाँ भौतिक पदार्थ हैं और नाशवान भी हैं।  जबकि उनमें व्यक्त होकर उन्हें चेतनता प्रदान करने वाला आत्मा सनातन और अविकारी है।  संक्षेप में उपाधियों की दृष्टि से आत्मा उनका धारक प्रतीत होता है किन्तु स्वस्वरूप से वह सर्वेन्द्रिय विवर्जित है। 

 कोई भी तरंग सम्पूर्ण समुद्र नहीं है समस्त तरंगे सम्मिलित रूप में भी समुद्र नहीं है। हम यह नहीं कह सकते हैं कि समुद्र उन तरंगों में आसक्त है , क्योंकि वह तो उन सबका स्वरूप ही है। असक्त होते हुए भी उन सबको धारण करने वाला समुद्र के अतिरिक्त और कोई नहीं होता। 

वह आत्मा निर्गुण किन्तु गुणों का भोक्ता है , मनुष्य का मन सदैव सत्त्व,  रज और तम इन तीन गुणों के प्रभाव में कार्य करता है। इन तीनों गुणों के प्रभावों को आत्मा सदा प्रकाशित करता रहता है। प्रकाशक- प्रकाश्य के धर्मों से मुक्त होने के कारण आत्मा गुणरहित है। किन्तु एक चेतन मन ही इन गुणों का अनुभव कर सकता है इसलिए यहाँ कहा गया है कि आत्मा स्वयं निर्गुण होते हुए भी मन की उपाधियों के द्वारा गुणों का भोक्ता भी है।इस प्रकार इस श्लोक में आत्मा का सोपाधिक (उपाधि सहित) और निरुपाधिक (उपाधि रहित) इन दोनों दृष्टिकोणों से निर्देश किया गया है ।

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।

सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्।।13.16।।

।।13.16।। (वह ब्रह्म) भूत मात्र के अन्तर्बाह्य स्थित है; वह चर है और अचर भी। सूक्ष्म होने से वह अविज्ञेय है; वह सुदूर और अत्यन्त समीपस्थ भी है।।

वह भूतमात्र के अन्तर्बाह्य है सभी व्यष्टि उपाधियों में व्यक्त चेतन तत्त्व सर्वव्यापी है। अन्तर्बाह्य से तात्पर्य है कि जहाँ शरीरादि उपाधियाँ हैं वहाँ तो वह विशेष रूप से व्यक्त हुआ विद्यमान रहता ही है परन्तु जहाँ कोई उपाधि नहीं है वहाँ भी वह केवल सत्य रूप से स्थित रहता है। 

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।

भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च।।13.17।।

।।13.17।। और वह अविभक्त है, तथापि वह भूतों में विभक्त के समान स्थित है। वह ज्ञेय ब्रह्म भूतमात्र का भर्ता, संहारकर्ता और उत्पत्ति कर्ता है।।

ग्रसिष्णु-संहारक, प्रभविष्णु-स्रष्टा : आचार्य शंकर ने कहा है -वह आत्मा स्थिति काल में सब प्राणियों को धारण करता है , प्रलय काल में संहार करता है, और सृष्टिकाल में सबको पुनः उत्पन्न करता है। 

जिस प्रकार रस्सी में सर्प का भ्रम के समय रस्सी उस सर्प की उत्पत्ति , स्थिति और प्रलय का कारण है , उसी प्रकार आत्मा ही इस जगत्प्रपंच की उत्पत्ति , स्थिति , प्रलय का कारण है। श्रीरामकृष्ण देव ने कहा है -"  वेद ने उन्हें सगुण भी कहा है , और निर्गुण भी कहा है। पुराणों में सगुण ब्रह्म को काली या आद्यशक्ति कहा गया है। जो सगुण ब्रह्म है , वही निर्गुण ब्रह्म भी है। जो शक्ति (काली ) है , वही ब्रह्म (अवतार-वरिष्ठ) है। पूर्ण ज्ञान के बाद अभेद है। अग्नि को छोड़कर जलाने शक्ति भी नहीं सोची जा सकती। इसी तरह ब्रह्म को छोड़कर शक्ति को अलग नहीं सोचा जा सकता। नित्य (काली) को छोड़कर लीला (अवतार) , और लीला (अवतार वरिष्ठ) को छोड़कर नित्य (काली) नहीं सोचा जा सकता। 

" ब्रह्म ही आद्या शक्ति है। पुरुष और प्रकृति। जो पुरुष है वही प्रकृति है। आनन्दमय और आनन्दमयी। जिसे पुरुष का ज्ञान है , उसे प्रकृति का भी ज्ञान है। जिसे बाप का ज्ञान है , उसे माँ का ज्ञान भी है। जिसे सुख का ज्ञान है , उसे दुःख का भी ज्ञान है। ब्रह्म शक्ति है , और शक्ति ब्रह्म है। दोनों अभिन्न हैं। सच्चिदानन्दमय और सच्चिदानन्दमयी  " 

श्रीरामकृष्ण कथामृत ग्रंथ में है - " श्रीकृष्ण पुरुष और राधा प्रकृति , चितशक्ति, आद्याशक्ति है। राधा प्रकृति, त्रिगुणमयी है। इनके भीतर सत्व, रज, तमः ये तीन गुण हैं। यह चितशक्ति और वेदांत के ब्रह्म (पुरुष) अभिन्न हैं। जैसे जल और उसकी हिमशक्ति। जल की हिम शक्ति के विषय में सोचने से ही जल का ज्ञान अपनेआप हो जाता है। फिर जल के विषय में सोचने से ही जल की हिमशक्ति का विचार अपनेआप आ जाता है। " 

" ब्रह्म और शक्ति अभिन्न है। शक्ति को मानने से ही जगत मिथ्या हो जाता है। मैं , तुम , मकान , परिवार सभी मिथ्या हैं। आद्याशक्ति के रहने से ही यह संसार खड़ा है। 

" हजारों विचार क्यों न करो समाधिस्थ हुए बिना शक्ति की सीमा लाँघने का उपाय नहीं है। मैं ध्यान करता हूँ , मैं मनन करता हूँ - ये सब शक्ति की सीमा के भीतर है , शक्ति के ऐश्वर्य के भीतर है।  

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।

ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।।13.18।।

।।13.18।। (वह ब्रह्म) ज्योतियों की भी ज्योति और (अज्ञान) अन्धकार से परे कहा जाता है। वह ज्ञान (चैतन्यस्वरूप) ज्ञेय और ज्ञान के द्वारा जानने योग्य (ज्ञानगम्य) है। वह सभी के हृदय में स्थित है।।  

केवल हमारे नेत्र के समक्ष होने से ही बाह्य वस्तुओं का हमें दर्शन नहीं हो सकता वरन् किसी बाह्य प्रकाश से उनका प्रकाशित होना भी आवश्यक होता है। इस लौकिक अनुभव को दृष्टान्त स्वरूप मानें तो यह भी स्वीकार करना होगा कि हमारी आन्तरिक भावनाओं और विचारों को भी प्रकाशित करने वाला कोई अन्तर्प्रकाश होना चाहिए  अन्यथा इन वृत्तियों का हमें बोध ही नहीं हो सकता था। अन्तकरण की वृत्तियों  के इस प्रकाशक को ही स्वयं प्रकाश आत्मा या आत्मज्योति (इष्टदेव की ज्योति) कहा जाता है। 

वेदान्त अध्ययन के प्रारम्भिक काल में शास्त्रीय भाषा से अनभिज्ञ होने के कारण जिज्ञासु साधकगण प्रकाश शब्द से लौकिक प्रकाश ही समझते हैं। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि गुरु इस आत्मप्रकाश या आत्मज्योति जैसे शब्दों का वास्तविक तात्पर्य स्पष्ट करें। 

वह अनन्त परमात्मा सबके हृदय में ही स्थित है।दार्शनिक दृष्टि से  हृदय शब्द का अर्थ शुद्ध मन से होता है जो समस्त आदर्श और पवित्र भावनाओं का उदय स्थान माना जाता है। आन्तरिक शुद्धि के इस वातावरण में जब पवित्र मन या शुद्ध बुद्धि उस पारमार्थिक आत्मतत्त्व का ध्यान करती है जो सर्वातीत होते हुए सर्वव्यापक भी है तब वह शुद्बुद्धि स्वयं ही आत्मस्वरूप बन जाती है यही आत्मानुभूति है। 

इसीलिए हृदय को आत्मा का निवास स्थान माना गया है। स्वहृदय में स्थित आत्मा (इष्टदेव) का अनुभव ही अनन्त ब्रह्म का अनुभव है क्योंकि आत्मा ही ब्रह्म है। 

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।

मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते।।13.19।।

।।13.19।। इस प्रकार, (मेरे द्वारा) क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय को संक्षेपत: कहा गया। इसे तत्त्व से जानकर (विज्ञाय) मेरा भक्त मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।।

अब प्रश्न यह है कि इस ज्ञान का उत्तम अधिकारी कौन है भगवान् कहते हैं- जो मेरा भक्त है वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है। परन्तु यह भक्ति केवल भावुकतापूर्ण प्रेम ही नहीं है।

 जिसने क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विवेक द्वारा [विवेकज ज्ञान के द्वारा] यह स्वानुभव प्राप्त किया है कि एक वासुदेव (अवतार वरिष्ठ) ही प्राणी मात्र में क्षेत्रज्ञ के रूप में विराजमान हैं  वही साधक उत्तम भक्त है जो मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है। 

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का ही वर्णन अगले श्लोक में प्रकृति और पुरुष के रूप में किया जा रहा है

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।

विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्।।13.20।।

।।13.20।। प्रकृति और पुरुष इन दोनों को ही तुम अनादि जानो। और तुम यह भी जानो कि सभी विकार और गुण प्रकृति से ही उत्पन्न हुए हैं।।

इसके पूर्व सातवें अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी दो प्रकृतियों अपरा और परा का वर्णन करते हुए कहा था कि ये दोनों प्रकृतियाँ ही सृष्टि की कारण हैं। इन दोनों का ही निर्देश यहाँ क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के रूप में किया गया है।

उक्त विचार को ही दूसरी शब्दावली में बताते हुए भगवान् कहते हैं कि प्रकृति (क्षेत्र) और पुरुष (क्षेत्रज्ञ) दोनों ही अनादि हैं। ये दोनों ही परमात्मा के ही दो रूप हैं। परमेश्वर नित्य है इसलिए उसके इन दो रूपों का भी अनादि होना उचित ही है।

कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।

पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते।।13.21।।

।।13.21।। कार्य और कारण के उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और पुरुष सुख-दु:ख के भोक्तृत्व में हेतु कहा जाता है।।

यह जो दृष्टिगोचर संसार है , इसका स्वरुप क्या है ? सुख-दुःख का भोग ही तो संसार है तथा इन दोनों का भोग करना हो पुरुष का (आत्मा का) संसार -बंधन में फँसना है। 

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।

कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु।।13.22।।

।।13.22।। प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है। इन गुणों का संग ही इस पुरुष (जीव) के शुभ और अशुभ योनियों में जन्म लेने का कारण है।।  

 यद्यपि पूर्ण पुरुष आत्मा (परमात्मा) का कोई संसार नहीं है तथापि यही प्रकृतिस्थ पुरुष -आत्मा प्रकृति से बंध गयी है। शीत-उष्ण, राग-द्वेष, सुख-दुख आदि गुण जड़ प्रकृति (क्षेत्र) के धर्म हैं किन्तु उपाधियों के साथ अहंभाव से (M/F देहाभिमान) तादात्म्य होने के कारण यह पुरुष (आत्मा) उसे अपने ही धर्म मानकर व्यर्थ ही दुखों को भोगता है। 

इससे यह स्पष्ट होता है कि पुरुष का दुख प्रकृति (देह-मन) के कारण नहीं वरन् उसके साथ हुए तादात्म्य के कारण है। प्रकृति के गुणों के साथ अत्याधिक आसक्ति हो जाने के कारण यह पुरुष असंख्य शुभ और अशुभ उत्तम और अधम योनियों में जन्म लेता रहता है।

इस प्रकार पारमार्थिक दृष्टि से सच्चिदानन्द स्वरूप होते हुए भी अविद्यावशात् यह पुरुष कर्ता, भोक्ता, सुखी, दुखी,  इहलोक परलोक गामी संसारी जीव बन जाता है। 

 आत्म अज्ञान और प्रकृतिजनित गुणों से आसक्ति ही पुरुष के सांसारिक दुख का कारण है। अत संसार की आत्यन्तिक निवृत्ति के लिए जो ज्ञानमार्ग है उसके दो अंग हैं विवेक और वैराग्य। साधक को चाहिए कि वह विवेक के द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त करे और वैराग्य के द्वारा मिथ्या आसक्ति का त्याग करे। [साधक को पहले विवेक जनित ज्ञान (विवेकज -ज्ञान) के द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त करना चाहिए और फिर वैराग्य के द्वारा, कामिनी-कांचन और कीर्ति  (3K) में मिथ्या आसक्ति का त्याग कर देना चाहि

उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।

परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः।।13.23।।

।।13.23।। इस शरीर में देह से भिन्न परम पुरुष विद्यमान है। वही स्वतंत्र पुरुष इस देह में उपद्रष्टा (साक्षी) , अनुमन्ता (अनुमति देने वाला) ,भर्ता, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा कहा जाता है।।

आत्मस्वरूप के विषय में पूर्ण अज्ञानी तथा राग-द्वेषादि वृत्तियों से पूर्ण मन वाले व्यक्ति में आत्मा मानो केवल उपद्रष्टा बनकर रहता है। परन्तु जब उस व्यक्ति का चित्त कुछ मात्रा में शुद्ध होता है और वह सत्कर्म में प्रवृत्त हौता है तब परमात्मा मानो अनुमन्ता बनता है अर्थात् उसके सत्कर्मों को अपनी अनुमति प्रदान करता है। 

अन्तकरण के और अधिक शुद्ध होने पर वह व्यक्ति जब अपने दिव्य स्वरूप के प्रति जागरूक हो जाता है तब ईश्वर उसके कर्मों को पूर्ण करने वाला भर्ता बन जाता है। अर्पण की भावना से किये गये कर्मों में ईश्वर की कृपा से सफलता ही प्राप्त होती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो ईश्वर उस साधक के अल्प प्रयत्नों को भी पूर्णता प्रदान करता है। 

जब वह साधक अपने अहंकार को भुलाकर पूर्णतया योगयुक्त हो जाता है तब ऐसे व्यक्ति के हृदय में आत्मा ही भोक्ता बनी प्रतीत होती है।  इस श्लोक की समाप्ति इस कथन के साथ होती है कि आत्मा ही महेश्वर है। वही इस देह में परम पुरुष है।

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह।

सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते।।13.24।।

।।13.24।। इस प्रकार पुरुष और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य जानता है, वह सब प्रकार से रहता हुआ (व्यवहार करता हुआ) भी पुन: नहीं जन्मता है।।

इस अनन्तस्वरूप ब्रह्म को अपने आत्मस्वरूप से जानने का अर्थ ही अविद्या को नष्ट करना है। ऐसे पूर्ण ज्ञानी पुरुष का पुनः प्रकृति के साथ मिथ्या तादात्म्य होने के लिए कोई कारण ही नहीं रह जाता है। इसलिए यहाँ भगवान् कहते हैं कि सब प्रकार से रहते हुए भी उसका पुनः जन्म नहीं होता है। 

इसका अभिप्राय यह है कि ज्ञानी पुरुष जगत् में कर्म करता हुआ भी सामान्य मनुष्यों के समान नईनई वासनाओं को उत्पन्न करके उनके बन्धन में नहीं आता है क्योंकि उसका अहंकार सर्वथा नष्ट हो चुका होता हैब्रह्मवित् ब्रह्म ही बन जाता है और उसके समस्त कर्म नष्ट हो जाते हैं यह सभी उपनिषदों के द्वारा प्रतिपादित सत्य है।

वेदों में लिखा है - " ब्रह्मज्ञानी के कर्म क्षय को प्राप्त हो जाते हैं। जो ब्रह्म को जानता है , वह ब्रह्म ही बन जाता है। जैसे अग्नि के स्पर्श से रुई का ढेर जल जाता है। उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान के प्रभाव से सब प्रकार के कर्म भष्म हो जाते हैं। जैसे बीज आग पर भुन जाने पर अंकुर उतप्न्न नहीं कर सकता उसी प्रकार - 'अविद्या आदि पंचक्लेश' एक बार ज्ञान के द्वारा दग्ध हो जाये तो फिर वे जीव के जन्म के कारण नहीं हो सकते। 

अतः पुरुष और प्रकृति के सम्बन्ध में इस प्रकार के ज्ञान प्राप्त होने पर , वे विद्वान् पुनः संसार में जन्म ग्रहण नहीं करते। ज्ञानलाभ -ईश्वरलाभ होने पर अविद्या आदि पंचक्लेश एक दम नष्ट हो जाते हैं। श्रीरामकृष्ण देव ने सच में कहा हैं - " हजारों वर्षों का अंधकार एक दियासलाई जलाने पर क्षणभर में लुप्त हो जाता है।"   

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।

अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे।।13.25।।

।।13.25।। कोई पुरुष ध्यान के अभ्यास से आत्मा को आत्मा (हृदय) में आत्मा (शुद्ध बुद्धि) के द्वारा देखते हैं; अन्य लोग सांख्य योग के द्वारा तथा कोई साधक कर्मयोग से (आत्मा को देखते हैं)।।

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते।

तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः।।13.26।।

।।13.26।। परन्तु, अन्य लोग जो स्वयं इस प्रकार न जानते हुए, दूसरों से (आचार्यों से) सुनकर ही उपासना करते हैं, वे श्रुतिपरायण (अर्थात् श्रवण ही जिनके लिए परम साधन है) लोग भी मृत्यु को नि:सन्देह तर जाते हैं।

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्।

क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ।।13.27।।

।।13.27।। हे भरत श्रेष्ठ ! यावन्मात्र जो कुछ भी स्थावर जंगम (चराचर) वस्तु उत्पन्न होती है, उस सबको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न हुई जानो।।

सभी प्राणियों में एक ब्रह्म ही विराजमान हैं , इस प्रकार की अनुभूति में जो प्रतिष्ठित हो गए हैं -वे दूसरे प्राणी की हिंसा नहीं करते। क्योंकि उनमें अपना -पराया भाव नहीं है। वह जानता है कि वह स्वयं आत्मस्वरूप में सर्वत्र विद्यमान

स्वामी विवेकानन्द अपने 'वेदान्त का उद्देश्य' विषय पर दिए भाषण में कहते हैं - 

" तुम अपने को और प्रत्येक व्यक्ति को अपने सच्चे स्वरुप की शिक्षा दो ! और घोरतम मोहनिद्रा में पड़ी हुई जीवात्मा को इस नींद से जगा दो। जब तुम्हारी आत्मा प्रबुद्ध होकर सक्रीय हो उठेगी, तब तुम आप ही शक्ति का अनुभव करोगे , महिमा और महत्ता पाओगे , साधुता आएगी , पवित्रता भी आप ही चली आएगी -मतलब यह कि जो कुछ अच्छे गुण हैं , वे सभी तुम्हारे पास आ पहुँचेंगेगीता में यदि कोई ऐसी बात है , जिसे मैं पसंद करता हूँ,तो दो श्लोक हैं। कृष्ण के उपदेश के सारस्वरूप इन श्लोकों से बड़ा भारी बल प्राप्त होता है -     

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।

विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति।।13.28।।

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।

न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्।।13.29।।

 जो लोग समस्त नश्वर शरीरों में अविनाशी परमात्मा को स्थित देखते हैं, यथार्थ में उन्हीं का देखना सार्थक है। क्योंकि ईश्वर को सर्वत्र सामान भाव से देखकर वे आत्मा (इष्टदेव) के द्वारा आत्मा की हिंसा नहीं करते, इसलिए वे परम गति (highest goal) को प्राप्त होते हैं।

इस प्रकार इस देश में  और अन्यान्य देशों में कल्याण कार्य की दृष्टि से वेदान्त के प्रचार और प्रसार के लिए विस्तृत क्षेत्र है। (वि०सा० 5/90)   

[ Let us proclaim to every soul: उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत — Arise, awake, and stop not till the goal is reached. Arise, awake! Awake from this hypnotism of weakness. None is really weak; the soul is infinite, omnipotent, and omniscient. Stand up, assert yourself, proclaim the God within you, do not deny Him! Too much of inactivity, too much of weakness, too much of hypnotism has been and is upon our race. 

O ye modern Hindus, de-hypnotise yourselves. The way to do that is found in your own sacred books. Teach yourselves, teach every one his real nature, call upon the sleeping soul and see how it awakes. Power will come, glory will come, goodness will come, purity will come, and everything that is excellent will come when this sleeping soul is roused to self-conscious activity.

     Ay, if there is anything in the Gita that I like, it is these two verses, coming out strong as the very gist, the very essence, of Krishna's teaching — 

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।

विनश्यत्सु-अविनश्यन्तम् यः पश्यति सः पश्यति।।13.28।।

समम्- पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितम् ईश्वरम्। 

न हिनस्ति आत्मना आत्मानम् ततो याति पराम् गतिम्।। 13.29।।

"He who sees the Supreme Lord dwelling alike in all beings, the Imperishable in things that perish, he sees indeed. For seeing the Lord as the same, everywhere present, he does not destroy the Self by the Self, and thus he goes to the highest goal."

Thus there is a great opening for the Vedanta to do beneficent work both here and elsewhere.

{THE MISSION OF THE VEDANTA :On the occasion of his visit to Kumbakonam}

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।

यः पश्यति तथाऽऽत्मानमकर्तारं स पश्यति।।13.30।।

।।13.30।। जो पुरुष समस्त कर्मों को सर्वश: प्रकृति (शरीर-मन-वाणी) द्वारा ही किये गये देखता है तथा आत्मा को अकर्ता देखता है, वही (वास्तव में) देखता है।। सब कर्म आत्मा की केवल उपस्थिति में प्रकृति से उत्पन्न उपाधियों के - देह, इन्द्रिय , मन , बुद्धि द्वारा ही किये जाते हैं। 

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।

तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा।।13.31।।

।।13.31।। यह पुरुष जब प्राणियों के पृथक् भावों को एक (परमात्मा) में स्थित देखता है तथा उस (परमात्मा) से ही यह विस्तार हुआ जानता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।।

 समस्त नाम और रूपों के पीछे एक आत्मतत्त्व ही सत्य है यह जानना मात्र आंशिक ज्ञान है। ज्ञान की पूर्णता तो इसमें होगी कि जब हम यह भी जानेंगे कि इस एक आत्मा से अनेक नाम-रूपों की यह सृष्टि किस प्रकार प्रकट हुई है। 

जिस प्रकार समुद्र को जानने वाला पुरुष असंख्य और विविध तरंगों का अस्तित्व एक समुद्र में ही देखता है।  इसी प्रकार आत्मज्ञानी पुरुष भी प्राणियों के पृथक्पृथक् भाव को एक परमात्मा में ही स्थित देखता है। समस्त तरंगें समुद्र का ही विस्तार होती हैंज्ञानी पुरुष का भी यही अनुभव होता है कि एक आत्मा से ही इस सृष्टि का विस्तार हुआ है

 स्वस्वरूपानुभूति के इन पवित्र क्षणों में ज्ञानी पुरुष स्वयं ब्रह्म बनकर यह अनुभव करता है कि एक ही आत्मतत्त्व अन्तर्बाह्य सबको व्याप्त और आलिंगन किए है सबका पोषण करते हुए स्थित है न केवल गहनगम्भीर और असीमअनन्त में वह स्थित है वरन् सभी सतही नाम और रूपों में भी वह व्याप्त है। 

'आत्मैव इदं सर्वं ', ब्रह्मैव इदं सर्वं ,'नेह नानास्ति किंचन ' इस अनुभूति में प्रतिष्ठित होता है। तथा यह समझता है कि सारे जगत्प्रपंच की उत्पत्ति ब्रह्म से हुई है। अर्थात आत्मा , ईश्वर या ब्रह्म (इष्टदेव) के अतिरिक्त पृथक सत्ता इस संसार की नहीं है, तब वह साधक ब्रह्मस्वरूपता प्राप्त करता है अर्थात मोक्ष प्राप्त करने में समर्थ होता है।  

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।

शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।।13.32।।

।।13.32।। हे कौन्तेय ! अनादि और निर्गुण होने से यह परमात्मा अव्यय है। शरीर में स्थित हुआ आत्मा (इष्टदेव या परमात्मा) भी, वस्तुत:, वह न (कर्म) करता है और न (फलों से) लिप्त होता है।।  

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।

सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते।।13.33।।

।।13.33।। जिस प्रकार सर्वगत आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सर्वत्र देह में स्थित आत्मा लिप्त नहीं होता।।

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः।

क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत।।13.34।।

।।13.34।। हे भारत ! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही क्षेत्री (क्षेत्रज्ञ) सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।।

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।

भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्।।13.35।।

।।13.35।। इस प्रकार, जो लोग क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा अविद्या रूपी प्रकृति के मिथ्यात्व को ज्ञानचक्षु के द्वारा दर्शन करते हैं वे परम् पद अर्थात निर्वाण मुक्ति को प्राप्त करते हैं। 

अब तक श्रीकृष्ण ने जो कुछ कहा उसका उपसंहार करते हुए वे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विषय का समापन करते हैं। प्रकृति अर्थात् क्षेत्र (कर्म क्षेत्र) और आत्मा अर्थात् क्षेत्रज्ञ (क्षेत्र का ज्ञाता) के अंतर को जानना ही वास्तविक ज्ञान है। जो इस विवेकज ज्ञान से सम्पन्न हो जाते हैं, वे स्वयं को केवल  भौतिक शरीर ( M/F) के रूप में नहीं देखते। 

इसी विषय पर स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " तुम्हारे पास तीन चीजें हैं - शरीर (Hand), मन (Head) और आत्मा (Heart)| आत्मा इन्द्रियातीत है। मन जन्म और मृत्यु का पात्र है , और वही दशा शरीर की है तुम वास्तव में आत्मा ही हो , पर बहुधा तुम सोचते हो कि तुम शरीर हो। जब मनुष्य कहता है 'मैं यहाँ हूँ ' , वह शरीर की बात सोचता है। फिर एक दूसरा क्षण आता है , जब तुम उच्चतम भूमिका में होते हो, तब तुम यह नहीं कहते -'मैं यहाँ हूँ। ' किन्तु जब कोई तुम्हें गाली देता है, या शाप देता है और तुम रोष प्रकट नहीं करते , तब तुम आत्मा हो। 

देहबुद्ध्या तु दासोऽहं, जीवबुद्ध्या त्वदंशकः।

आत्मबुद्ध्या त्वमेवाहम्, इति मे निश्चिता मतिः॥

जब मैं अपने को देह (शरीर) भाव से देखता हूँ, तो मैं तुम्हारा दास (सेवक) हूँ। जब मैं सोचता हूँ कि मैं मन हूँ (जीव हूँ), तब मैं उस अनन्त अग्नि की एक स्फुलिंग हूँ, जो तुम हो। जब मैं यह अनुभव करता हूँ कि मैं आत्मा हूँ, तुम और मैं एक (अद्वैत) हूँ ! यही मेरी निश्चित धारणा (मति) है।-यह एक प्रभु के भक्त का कथन है। क्या 'मन' आत्मा से  बढ़कर है ? " (10/40) 

केवल अविद्या वशात् ही प्रकृति की प्रतीति होती है वास्तव में केवल ब्रह्म ही एक पारमार्थिक सत्य है। जीव जब तक देह में है -(M/F शरीर का देहाभिमान-रहता ही है) इसलिए जो जीव देह में रहते हुए भी अपने आप को प्रभु का यंत्र नहीं स्वतंत्र समझ लेता है - वह पंचक्लेशों में बंध जाता है! 

अविद्या -अस्मिता- राग- द्वेषा अभिनिवेशाः पंच क्लेशाः। 

 (साधनपाद , अध्याय 2, श्लोक 3) 

-- 'अविद्या (अज्ञान) , अस्मिता (अहंकार) , राग (देहासक्ति) , द्वैष  (Malice- कटुता या नफरत) अभिनिवेश (जीवन के प्रति ममता)- ये पांचों क्लेश हैं।

ये ही पंचक्लेश हैं, ये पाँच बन्धनों के समान हमें इस संसार चक्र में बाँध रखते हैं। अविद्या ही कारण और शेष चार क्लेश इसके कार्य हैं। यह अविद्या  ही हमारे दुःखों का एकमात्र कारण है।भला और किसकी शक्ति है , जो हमें इस प्रकार दुःख में रख सके ? आत्मा तो नित्य आनन्द स्वरुप है। उसे अज्ञान -भ्रम (मरीचिका) - माया के सिवा और कौन दुःखी कर सकता है ? आत्मा के समस्त दुःख केवल भ्रम मात्र हैं।" (१/१५३)

[आत्मा के समस्त दुःख अज्ञान वश - नश्वर देह (M/F- Apparent 'I') या 'व्यावहारिक मैं' को ही 'यथार्थ मैं' (अविनाशी आत्मा) समझने (या मगरमच्छ को ही नाव समझने के कारण)  भ्रम के कारण है। जीवात्मा जब अपने आप को प्रभु का यंत्र (आत्मा या इष्टदेव-माँ का पुत्र) नहीं स्वतंत्र समझ लेता है, 'अविद्या, अस्मिता, राग, द्वैष व अभिनिवेश' आदि पंच क्लेशों में बन्ध जाता है जब वही जीव सदगुरुदेव के कृपा से आत्मा (ठाकुर-माँ स्वामीजी) का दासत्व स्वीकार कर लेता है, वह भव प्रवाह से मुक्त हो जाता है !

श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभागयोग नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त होता है।

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शुक्रवार, 27 मार्च 2026

श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय -12⚜️️🔱अध्याय बारह: भक्तियोग⚜️️🔱 मौन का वास्तविक अर्थ है मननशीलता ⚜️️🔱 जो पुरुष बुद्धि के स्तर पर रहता है उसे ही मान और अपमान प्रभावित कर सकते हैं आत्मस्वरूप में स्थित भक्त को नहीं ⚜️️🔱उस चैतन्य तत्त्व का साक्षात्कार करे जिसकी प्रतीक वह मूर्ति है⚜️️🔱हमारे समस्त कर्म ईश्वर के लिए अर्पण की भावना से होने चाहिये।⚜️️🔱आसक्तियों के त्याग से तत्काल शान्ति मिलती है।⚜️️🔱ज्ञानमयी दृष्टि में कोई वस्तु परमात्मा से भिन्न है ही नहीं⚜️️🔱उसके मन में किसी वस्तु से कोई आसक्ति नहीं होती⚜️️🔱वह 'ज्ञानिभक्त' कठिन परिस्थितियों के बीच भी, अस्तित्व के शाश्वत और अपरिवर्तनीय (immutable) अधिष्ठान को अनुभव करता है⚜️️🔱वह केवल एक अडिग और शुद्ध स्वर -"सोऽहं" ही सुनता है⚜️️🔱 भक्त अपने स्वयं के साथ तथा जगत् के साथ भी सदा शान्ति का अनुभव करता है⚜️️🔱भक्त के मन में राग और द्वेष नहीं होने के कारण वह शुभ और अशुभ दोनों ही से मुक्त हो जाता⚜️️🔱

 ⚜️️🔱अध्याय बारह: भक्तियोग⚜️️🔱

बारहवें अध्याय का सारामृत 

यह अध्याय 20 श्लोकों में समाप्त होता है। भक्ति योग , कर्मयोग, राजयोग और ज्ञान योग इनमें से एक या एकाधिक अथवा सभी उपायों से भगवान लाभ या ब्रह्मस्वरूपता में प्रतिष्ठित होना सम्भव है। यह अध्याय भक्ति-मार्ग के निर्देश के लिए विशेष महत्वपूर्ण है। भगवान ने बताया है कि यद्यपि-निर्गुण और सगुण दोनों से ईश्वरलाभ सम्भव है किन्तु , सगुण भक्ति का मार्ग श्रेष्ठ और सुगम है। फिर भक्तिमार्ग के भी अनेक उपाय हैं , उनमें भक्तियुक्त निष्काम कर्म ही श्रेष्ठ है।

भक्ति दो प्रकार की हैं - वैधी भक्ति और रागात्मिका भक्ति या प्रेमाभक्ति। {वैधी भक्ति नियमों पर चलती है, जबकि रागात्मिका या रागानुगा भक्ति प्रेम से बहती है। दोनों ही मार्ग भगवान तक ले जाने वाले हैं। }वैधी भक्ति के बारे में श्रीरामकृष्ण देव का उपदेश है - शास्त्र अनेक कर्म करने के लिए कह गए हैं , उस लिए वही करता हूँ - ऐसी भक्ति को वैधी भक्ति कहते हैं। निष्ठा के बिना कोई भी भजनांग फलदायी नहीं होता। इस प्रसंग में श्रीरामकृष्णदेव ने कहा है - ईश्वर के प्रति स्वजन की तरह प्रेम उत्पन्न होने पर कोई विधि-नियम नहीं रहता। 

   हवा के लिए पंखे की आवश्यकता है। ईश्वर के प्रति प्रेम होगा , इस कर्म जप, तप , उपवास आदि हैं , किन्तु यदि दक्षिणी हवा बहने लगे, तो लोग पंखा फेंक देते हैं। ईश्वर के ऊपर प्रेम या अनुराग होने से जप आदि कर्म छूट जाते हैं। हरि के प्रेम में मत्त होने पर वैध कर्म कौन करेगा ? व्याकुलता होने से ही अरुण का उदय हुआ। उसके बाद सूर्य दिखाई देगा।  व्याकुलता के बाद ही ईश्वर-दर्शन होता है। 

जिन लोगों में रागभक्ति है, उन्हीं का आन्तरिक है , ईश्वर उनका भार लेते हैं। { जब भक्त अपना 'अहंकार' त्याग कर पूरी तरह ईश्वर पर आश्रित हो जाता है, तब ईश्वर स्वयं उसके योग (जो उसके पास नहीं है उसे देना) और क्षेम (जो उसके पास है उसकी रक्षा करना) का भार अपने ऊपर ले लेते हैं। } रागानुगा भक्ति होने से भक्त केवल भगवान को ही चाहते हैं। उस समय वह सब प्रकार के आश्रमों का त्याग करके और सारी उपाधियों से मुक्त होकर एकमात्र भगवत सेवा में ही आत्मनियोग करते हैं।  

रागात्मिका भक्ति सम्बन्धात्मिका और कामात्मिका इन दो श्रेणियों में विभक्त है। तथा सम्बन्धात्मिका भक्ति शांत , दास्य , सख्य और वात्सल्य इन 4 भागों में विभक्त है। कामात्मिका भक्ति भी 4 प्रकार की होती है।

भक्तिमार्ग का अवलंबन कर जो लोग इन्द्रियसंयम करते हुए सर्वत्र समत्वबुद्धि सम्पन्न होकर समस्त प्राणियों में ब्रह्म का प्रकाश देखते हैं , और सभी प्राणियों के कल्याण कार्यों में निरत रहकर अव्यक्त ब्रह्म की चिन्ता करते हैं , वे भी श्रीभगवान को प्राप्त करते हैं। किन्तु जो लोग समस्त कर्मों का फल श्री भगवान में अर्पण करके अहं-बुद्धि से रहित होकर तदगत चित्त से अनन्य भक्ति के साथ श्री भगवान की उपासना करते हैं , उन्हें भी श्री भगवान इस संसार सागर से उद्धार करते हैं। 

उसके अनन्तर श्री भगवान ने अर्जुन को अभ्यासयोग का उपदेश देते हुए अर्जुन से कहा -यदि तुम मुझमें चित्त स्थिर न रख सको , तो आत्मविषयक अभ्यास योग द्वारा विक्षिप्त चित्त को अनात्म-विषयों से बार बार हटाकर मुझमें संलग्न रखने की चेष्टा करो। यदि अभ्यासयोग में भी असमर्थ हो तो मेरी प्रीति के लिए सेवा समझकर पूजा , अर्चना, जप , ध्यान, नामकीर्तन अदि करते रहो। उससे मैं भी प्रसन्न होऊंगा। और यदि वैसा भी नहीं कर सके तो दयालु, अहंभाव रहित , समत्वबुद्धि सम्पन्न सभी प्राणियों के प्रति मित्रभाव युक्त। और ममत्व बुद्धि से रहित होकर मुझमें एकनिष्ठ और मेरे शरणागत होकर फल आकांक्षा का परित्याग करके अमृत तुल्य धर्म का आचरण करो। उसी से तुम मेरे विशेष प्रीतिभाजन होंगे। 

इस अध्याय में विशेष रूप से भक्तिमार्ग का आश्रय लेकर ईश्वर की उपासना का उपदेश दिया गया है। इस कारण इस अध्याय का नाम भक्तियोग है। 

भक्तिमार्ग के अवलंबन से सगुण ब्रह्मोपासना के फलस्वरूप ईश्वरदर्शन लाभ होता है। साधन करते रहने से भक्त स्वयं समझ सकेंगे कि वह साधन मार्ग में कहाँ तक अग्रसर हुए हैं। भक्ति परिपक्व होने पर ईश्वरदर्शन रूप परमानन्द की प्राप्ति होती है। सच्चिदानन्द स्वरुप ईश्वर के दर्शन के लक्षण के सम्बन्ध में श्री रामकृष्ण देव ने कहा है - ईश्वरदर्शन के कुछ लक्षण हैं। ज्योति दिखाई पड़ती है , आनंद होता है , छाती के भीतर तुबड़ी की तरह गुड़गुड़ करते हुए महावायु उठती है। जिसके भीतर अनुराग के ऐश्वर्य का प्रकाश हो रहा है , उसके ईश्वरलाभ में विलम्ब नहीं है। अनुराग के ऐश्वर्य क्या क्या हैं? विवेक, वैराग्य , जीवों पर दया , साधु सेवा , साधुसंग , ईश्वरका नामगुण कीर्तन, सत्यबात यही सब। 

भक्त के ह्रदय में इस प्रकार के लक्षण प्रगट होने पर समझा जायेगा कि ईश्वरदर्शन या परमानंद प्राप्ति में और अधिक विलम्ब नहीं है। ईश्वर के प्रति भक्ति होने से थोड़े में ही उद्दीपन होता है। ईश्वरीय प्रसंग के सिवाय दूसरी बात भक्त को अच्छी नहीं लगती। निष्ठा के अनन्तर भक्ति होती है। 

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अर्जुन उवाच

एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।

येचाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः।।12.1।।

।।12.1।। अर्जुन ने कहा -- जो भक्त, सतत युक्त होकर इस (पूर्वोक्त) प्रकार से आपकी उपासना करते हैं और जो भक्त अक्षर, और अव्यक्त की उपासना करते हैं, उन दोनों में कौन उत्तम योगवित् है।।

पूर्व अध्याय की समाप्ति भगवान् के इस आश्वासन के साथ हुई थी कि कोई भी साधक भक्त अनन्यभक्ति के द्वारा ईश्वर के विराट् वैभव का स्वयं में साक्षात् अनुभव कर सकता है। इस चुनौती भरे वाक्य ने क्षत्रिय राजपुत्र अर्जुन की महत्त्वाकांक्षा को जगा दिया। जगत् के एक व्यावहारिक पुरुष के रूप में वह जानना चाहता है कि वह परमात्मा के कौन से रूप की उपासना करे। 

यहाँ प्रश्न बड़ी बुद्धिमत्तापूर्वक रखा गया है। यह सुविदित तथ्य है कि जगत् में दो प्रकार के साधक होते हैं? जो वस्तुत एक ही साध्य को प्राप्त करने के लिए साधनारत होते हैं। कोई साधक परमात्मा के सगुण साकार व्यक्त रूप की आराधना उपासना करते हैं।  जबकि अन्य साधक निर्गुण निराकार अव्यक्त का ध्यान करते हैं। दोनों ही निष्ठावान् हैं और अपनेअपने मार्ग पर प्रगति की ओर अग्रसर होते हैं।

 परन्तु प्रश्न यह है कि इन दोनों में कौन उत्तम योगवित् या योगनिष्ठ है ? सगुण और निर्गुण के इन दो उपासकों में कौन साधक श्रेष्ठ है?  क्या मूर्तिपूजा के द्वारा ईश्वर का ध्यान और साक्षात्कार किया जा सकता है क्या कोई भी प्रतीक परमात्मा का सूचक हो सकता है क्या एक तरंग समुद्र का प्रतीक या प्रतिनिधि बन सकती है  ? प्रथम भगवान् श्रीकृष्ण सगुणोपासना का वर्णन करते हुए कहते हैं

श्री भगवानुवाच

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।

श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः।।12.2।।

।।12.2।। श्रीभगवान् ने कहा -- मुझमें मन को एकाग्र करके नित्ययुक्त हुए जो भक्तजन परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे, मेरे मत से, युक्ततम हैं अर्थात् श्रेष्ठ हैं।।

नित्ययुक्त होने का अर्थ है नित्य नियमित उपासना के समय आत्मसंयम का होना। मन अपनी बहिर्मुखी प्रवृत्ति के कारण ध्येय को त्यागकर अन्य विषयों में ही विचरण करने लगता हैं। ऐसे मन का ध्यान ध्येय में ही स्थिर करने की कला का ही नाम है आत्मसंयम।  वास्तविक उपासना तो परमात्मा के साथ तादात्म्य करने की आन्तरिक क्रिया है जिसके द्वारा हम परमात्मस्वरूप बन जाते हैं। 

परा श्रद्धा से युक्त हुए।  श्रद्धा का अर्थ है किसी अज्ञात वस्तु में मेरा वह विश्वास जिसके द्वारा, एक दिन वह वस्तु (अन्तर्निहित सत्य-दिव्यता) मुझे यथार्थ रूप से ज्ञात होती है,  जिसमें मेरा पहले केवल विश्वास ही था। इस प्रकार  एक सच्चा भक्त बनने के लिए इस श्लोक में जिस तीन आवश्यक एवं अपरिहार्य गुणों को बताया गया है? वे हैं (1) परम श्रद्धा (2) उपासना में नित्ययुक्तता और (3) ध्येयस्वरूप (आत्मा या इष्टदेव) में मन की एकाग्रता। इन तीन गुणों से सम्पन्न व्यक्ति को भगवान् युक्ततम मानते हैं। तो क्या अन्य भक्त युक्ततम नहीं हैं ऐसी बात नहीं है किन्तु उनके विषय में जो कहना है उसे सुनो-

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।

सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्।।12.3।।

।।12.3।। परन्तु जो भक्त अक्षर ,अनिर्देश्य, अव्यक्त, सर्वगत, अचिन्त्य, कूटस्थ, अचल और ध्रुव की उपासना करते हैं।।

पूर्व श्लोकों में सगुणोपासक भक्तों के लिए आवश्यक गुणों का वर्णन करने के पश्चात् अब भगवान् श्रीकृष्ण निर्गुण के उपासकों का वर्णन उपर्युक्त दो श्लोकों में करते हैं। 

अक्षर शब्द से यह सूचित किया गया है कि इन्द्रियों के द्वारा परमतत्त्व का ज्ञान कदापि संभव नहीं है। अनिर्देश्य जो परिभाषित नहीं किया जा सकता है उसे अनिर्देश्य कहते हैं। सभी परिभाषाएं दृश्य वस्तु के सन्दर्भ में ही दी जा सकती हैं। अत जो इन्द्रियों का दृश्य नहीं होता  उसकी न परिभाषा दी जा सकती है और न ही उसे अन्य वस्तुओं से भिन्न करके जाना जा सकता हैसर्वत्रगम् जो अनन्त तत्त्व गुण रहित होने से व्यक्त नहीं हैं और इसी कारण अनिर्देश्य है और उसको सर्वव्यापी-सर्वगत होना आवश्यक है। 

    यदि परमात्मा से कोई स्थान रिक्त हो  तो परमात्मा को आकार विशेष प्राप्त हो जायेगा। और साकार वस्तु विनाशी भी होगी। अचिन्त्यम् मन के द्वारा जिस वस्तु का चिन्तन किया जा सकता है, वह दृश्य पदार्थ होने के कारण नाशवान् होगी। इसलिए अविनाशी तत्त्व निश्चित ही अकल्पनीय अग्राह्य और अचिन्त्य होगा। 

कूटस्थम् (अविकारी) यद्यपि चैतन्यस्वरूप आत्मा वह अधिष्ठान है जिसके ऊपर सब विकार और परिवर्तन होते रहते हैं , परन्तु वह स्वयं अपरिवर्तनशील और अविकारी ही रहता है। कूट शब्द का अर्थ है निहाई। एक लुहार की दुकान में निहाई पर अन्य लौह खण्डों को रखकर उन पर आघात करके उन्हें विभिन्न आकार दिये जाते हैं, परन्तु निहाई स्वयं अपरिवर्तित ही रहती है। उसी प्रकार चैतन्य के सम्बन्ध से उपाधियों तथा व्यक्तित्व में विकार होता है किन्तु चैतन्य तत्त्व कूट के समान अविकारी रहता है

अचलम् चलन का अर्थ है वस्तु का देश और काल की मर्यादा में परिवर्तन होना। कोई वस्तु अपने में ही चल नहीं सकती उसका चलन वही पर संभव है जहाँ पर वह पहले से विद्यमान नहीं है। परमात्मा सर्वव्यापी है और इसलिए देश या काल में ऐसा कोई स्थान या क्षण नहीं है जहाँ वह विद्यमान न हो अत वह अचल कहलाता है। 

वह यत्र, तत्र, सर्वत्र है उसमें ही भूत, वर्तमान और भविष्य का अस्तित्व है। ध्रुवम् (शाश्वत् सनातन) विकारी वस्तु देश और काल से सीमांकित (delimited) होती है। परन्तु जो देश और काल का भी अधिष्ठान है  वह परमात्मा इन दोनों से सीमित नहीं हो सकता है। अनन्त स्वरूप चैतन्य आत्मा सर्वत्र सब काल में एक ही है। 

शैशव, यौवन और वृद्धावस्था में सर्वत्र, सब काल और सुख-दुख,  लाभ- हानि की समस्त परिस्थितियों में आत्मा एक समान ही रहता है। 

जब हम अपने शरीर मन और बुद्धि के स्तर पर आते हैं केवल तभी हम आइन्स्टीन के द्वारा वर्णित देश और काल की सापेक्षता के जगत् में प्रवेश करते हैं। 

आत्मा (परमात्मा, ईश्वर, भगवान) समय के द्वारा सीमित या 'bound by time 'कालविच्छिन्न नहीं है वह काल का भी शासक हैवह ध्रुव है। 

   यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन दो श्लोकों में प्रयुक्त शब्द उपनिषदों से लिये गये हैं। इन शब्दों के द्वारा उस आत्मा (इष्टदेव) का निर्देश किया जाता है जो इस नित्य परिवर्तनशील नाम और रूपों, कर्म और घटनाओं, विषय ग्रहण और भावनाओं विचारों तथा अनुभवों के जगत् का एकमेव सनातन अधिष्ठान है। [पर्दा जैसा एकमेव कूटस्थ सनातन अधिष्ठान है,नाम-जप साधना !]

संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।

ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः।।12.4।।

।।12.4।। इन्द्रिय समुदाय को सम्यक् प्रकार से नियमित करके, सर्वत्र समभाव वाले, प्राणी मात्र के हित में रत वे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।।

सभी उपासकों में निम्नलिखित तीन गुणों का होना आवश्यक है। इन्द्रियसंयम ! इन्द्रियों के द्वारा अपनी शक्तियों का अपव्यय करना अविवेकी एवं निम्न स्तर की रुचि वाले मनुष्यों का कार्य़ होता है। 

जिस साधक की महत्त्वाकांक्षा पूर्णत्व के शिखर पर पहुँचकर परमानन्द का अनुभव में प्रतिष्ठित रहने  की है, उसको चाहिए कि वह इस अपव्यय में कटौती करे।  और उसे बिल्कुल विष के जैसा समझकर सदा के लिए त्याग दे।  और इस प्रकार ब्रह्मचर्य द्वारा उपार्जित शक्तियों-  का सदुपयोग ध्यान में आत्मानुभव को प्राप्त करने/ अथवा आत्मानुभव में प्रतिष्ठित रहने  के लिए करे। 

पांच ज्ञानेन्द्रियां ही वे द्वार हैं,  जिनके माध्यम से मन को विचलित करने वाले बाह्य जगत् के विषय चोरी छिपे मन में प्रवेश करके हमारी आन्तरिक शान्ति को नष्ट कर देते हैं। और फिर हमारा मन (अहंकार)  कर्मेन्द्रियों के द्वारा बाह्य जगत् में अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त करने को दौड़ पड़ता है। इस प्रकार विषयग्रहण और प्रतिक्रिया रूप यह व्यवहार मन के सामंजस्य और सन्तुलन को तोड़ देता है।  इसलिए यहाँ श्रीकृष्ण का इन्द्रियसंयम पर बल देना उचित ही है क्योंकि ध्यानमार्ग की सफलता इसी पर निर्भर करती है

सर्वत्र समबुद्धि सफलता के लिए आवश्यक यह दूसरा गुण हैसमस्त प्रकार की सुख-दुःख , मान-अपमान की परिस्थितियों और अनुभवों में बुद्धि की समता होनी चाहिएबाह्य विक्षेपरहित दशा की आशा और प्रतीक्षा करना मूर्खता का लक्षण ही है। बाह्य जगत में सब ठीक हो जायेगा -? ऐसी आदर्श परिस्थिति का होना असम्भव है। जगत् की वस्तुएं अपने में ही तथा विशिष्ट संरचनाओं के रूप में भी निरन्तर परिवर्तित होती रहती हैं। इसलिए ऐसे नित्य परिवर्तनशील रचना वाले जगत् में किसी ऐसी इष्ट स्थिति की अपेक्षा रखना अविवेकपूर्ण ही कहा जा सकता है जो भी परिस्थिति आये वो साधक के ध्यानाभ्यास के लाभ के लिए निरन्तर एक समान बनी रहे वास्तव में अविवेकपूर्ण ही कहा जा सकता है। यह सर्वथा असंभव है।

इसलिए ऐसे परिवर्तनशील जगत् में साधक को ही चाहिए कि वह  अपने बौद्धिक मूल्यांकनों मन की आसक्तियों तथा बाह्य जगत् के साथ होने वाले सम्पर्कों को विवेकपूर्ण संयमित करके बुद्धि की समता और मन का सन्तुलन बनाये रखे। 

दृष्टि के समक्ष मन में विकार या विक्षेप उत्पन्न करने वाले विषयों या परिस्थितियों के होने पर भी जो पुरुष अपना सन्तुलन नहीं खोता है (आत्मा इष्टदेव के नाम-जप में प्रतिष्ठित रहता है) वही समबुद्धि कहलाता है। 

जिस पुरुष ने अपनी विवेकशक्ति का विकास किया है वह बड़ी सरलता से सौन्दर्य के उस स्वर्णिम पर्दे को देख और पहचान सकता है जो इस जगत् की उन समस्त वस्तुओं को धारण किये हुए है। इस क्षमता से सम्पन्न साधक को ही यहाँ समबुद्धि कहा गया है।

किसी व्यक्ति का शिशु पुत्र किसी समय मैला है तो दुसरे समय अत्यन्त चंचल प्रात रुदन कर रहा होता है।  तो दोपहर में हंसता है संध्याकाल में तंग करता है और रात में उन्मत्त और फिर भी उसकी इन सब दशाओं में उसका पिता एक पुत्र को ही देखता है।  और इसलिए उसके भिन्नभिन्न रूपों में भी उसे समान रूप से ही प्रेम करता है। यह उस प्रेमपूर्ण पिता की समबुद्धि है

 इसी प्रकार एक सच्चा साधक अपने जीवन के भयानक दुखान्तों और आनन्ददायक सुखान्तों में तथा अभूतपूर्व सफलताओं और निराशाजनक विफलताओं में भी अपने हृदय के इष्ट देव को  पहचानना सीखता है।  इसलिए वह बौद्धिक समता को प्राप्त हो जाता है। 

सफलता के लिए आवश्यक तीसरे गुण को बताते हुए भगवान् कहते हैं कि साधक को अर्पण की भावना से सदैव यथाशक्ति प्राणिमात्र की सेवा में रत रहना चाहिए। 

जब तक मनुष्य इस शरीर को धारण किये जीवित रहता है तब तक उसके लिये यह सर्वथा असंभव है कि नित्य निरन्तर प्रत्येक समय अपने मन और बुद्धि को आत्मचिन्तन में ही स्थिर कर सके। जगत् के साथ उसे सामान्य व्यवहार करना ही होगा। इस प्रकार के व्यवहारों में उसे निरन्तर अथक प्रय़त्न करके प्राणीमात्र की सेवा करनी चाहिए।  यह तो इस ज्ञान का स्वरूप ही है। प्राणिमात्र को प्रेम करना तो उसका धर्म ही है। इस प्रकार उक्त तीन गुणों से सम्पन्न होकर जो साधकगण अक्षर और अव्यक्त (इष्टदेव) की उपासना करते हैं वे भी मुझे ही प्राप्त होते हैं यह भगवान् श्रीकृष्ण की घोषणा है।

भगवान् श्रीकृष्ण यह बताते हैं कि किस प्रकार दोनों ही उपासक एक ही लक्ष्य को प्राप्त करते हैंदोनों में ही सफलता के लिए कौन से समान गुणों का होना आवश्यक है। परन्तु सामान्यत बहुसंख्यक साधकों के विषय में वे कहते हैं

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।

अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते।।12.5।।

।।12.5।। परन्तु उन अव्यक्त में आसक्त हुए चित्त वाले पुरुषों को क्लेश अधिक होता है, क्योंकि देहधारियों स्वयं को स्थूल शरीर समझने वाले व्यक्ति द्वारा अव्यक्त की गति कठिनाईपूर्वक प्राप्त की जाती है।।

 श्रीशंकराचार्य इसे स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि देहवद्भि का अर्थ है देहाभिमानवद्भि अर्थात् देहधारी से तात्पर्य उन लोगों से है? जिन्हें देहाभिमान बहुत दृढ़ है। जो देह को ही अपना स्वरूप समझते हैं, (अपने को पैदा होने वाला शरीर मात्र समझते हैं)  वे लोग उनमें आसक्त होकर सदा विषयोपभोग का ही जीवन जीते हैं।

    ऐसे विषयासक्त पुरषों के लिए अनन्त निराकार और सर्वव्यापी तत्त्व का ध्यान करना प्राय असंभव होता है। जिसकी दृष्टि मन्द हो और हाथ काँपते हों ऐसे वृद्ध व्यक्ति को सुई में धागा डालने में बड़ी कठिनाई हो सकती है। तात्पर्य यह है कि स्वयं अव्यक्तोपासना में कष्ट नहीं है वरन् देहाभिमानियों के लिए वह कष्टप्रद प्रतीत होती है। संक्षेप में बहुसंख्यक साधकों के लिए विश्व में व्यक्त भगवान् के सगुण साकार रूप का ध्यान करना अधिक सरल और लाभदायक है

 यदि मनुष्य जगत् की सेवा को ही ईश्वर की पूजा समझकर करे तो शनैशनै उसकी देहासक्ति तथा विषयोपभोग की तृष्णा समाप्त हो जाती है। और मन इतना शुद्ध और सूक्ष्म हो जाता है कि फिर वह निराकार अव्यक्त और अविनाशी तत्त्व का ध्यान करने/ (प्रतिष्ठित रहने में) समर्थ हो जाता है। 

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।

अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।।12.6।।

।।12.6।। परन्तु जो भक्तजन मुझे ही परम लक्ष्य समझते हुए सब कर्मों को मुझे अर्पण करके अनन्ययोग के द्वारा मेरा (सगुण का) ही ध्यान करते हैं।।

यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण सगुणोपासकों के लिए श्रद्धापूर्वक अनुष्ठेय गुणों अथवा नियमों का वर्णन करते हुए यह आश्वासन देते हैं कि निष्ठावान् साधकों का इस संसार-सागर से उद्धार स्वयं भगवान् ही करेंगे। 

जब कोई भक्त अपने आप को पूर्णत ईश्वर के चरणों में अर्पण कर देता है और फिर ईश्वर के दूत अथवा ईश्वरी संकल्प के प्रतिनिधित्व के रूप में कार्य करता है तब वह दैवी शक्ति से सम्पन्न हो जाता है। उसे अपने प्रत्येक कार्य में ही परमात्मा की उपस्थिति और अनुग्रह का भान बना रहता है। 

 एक भक्त को उपदेश दिया जाता है कि वह ईश्वर को ही अपने जीवन का परम लक्ष्य माने और जीवन में सदैव उसे ही प्राप्त करने का प्रयत्न करे। सारांश में हमें यह उपदेश दिया जाता है कि  आवश्यक है कि हम अपने जीवन के सम्पर्कों व्यवहारों एवं अनुभवों का उपयोग उस परमात्मा की उपलब्धि  के लिए करें जिसकी उपासना हम उसके सगुण साकार रूप में करते हैं। 

अनन्ययोग के द्वारा वे सभी प्रयत्न योग कहलाते हैं जिनके द्वारा हम अपने मन का तादात्म्य अपने पूर्णत्व के लक्ष्य के साथ स्थापित कर सकते हैं। 

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।

निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।।12.8।।

।।12.8।। तुम अपने मन और बुद्धि को मुझमें ही स्थिर करो, तदुपरान्त तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें कोई संशय नहीं है।।

 शास्त्रीय दृष्टि से गीता का यह उपदेश उचित है कि भक्त को चाहिए कि वह अपनी विवेकवती बुद्धि के द्वारा अपने इष्टदेव की पाषाण की मूर्ति का भेदन करके उस चैतन्य तत्त्व का साक्षात्कार करे जिसकी प्रतीक वह मूर्ति है

हममें से प्रत्येक व्यक्ति किसी एक क्षण विशेष में अपनी समस्त भावनाओं एवं विचारों का कुल योग रूप होता है। यदि हमारा मन भगवान् में स्थिर हुआ है तथा बुद्धि अनन्त की गहराइयों में प्रवेश कर जाती है तो हमारा व्यक्तिगत अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है और हम सर्वव्यापी अनन्त परमात्मा में विलीन होकर तत्स्वरूप बन जाते हैं। 

(पुनः देह में आने के बाद ?)  इसलिए भगवान् ने कहा है कि तदुपरान्त तुम मुझमें ही निवास करोगे। सत्य के मन्दिर के द्वार पर मन में विक्षेप और संकोच के साथ खड़े हुए एक र्मत्य जीव को भगवान् का यह कथन अतिशयोक्ति पूर्ण प्रतीत हो सकता है।

 उसका तो अपना नित्य का अनुभव यह है कि वह एक  ससीम र्मत्य व्यक्ति है जो सहस्रों मर्यादाओं से घिरा असंख्य दोषों से दुखी और निराशाओं की सेना के द्वारा (देह के जीवित रहने तक) उत्पीड़ित किया जा रहा जीव है। इसलिए उसे विश्वास नहीं होता कि वास्तव में वह कभी अपने ईश्वरत्व के स्वरूप का साक्षात्कार भी कर सकता है। 

अत एक दयालु गुरु के रूप में भगवान् श्रीकृष्ण स्पष्ट आश्वासन देते हैं कि इसमें संशय की कोई बात नही है। यदि यह साधना कठिन प्रतीत हो तो उपायान्तर बताते हुए भगवान् कहते हैं

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।

अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय।।12.9।।

।।12.9।। हे धनंजय ! यदि तुम अपने मन को मुझमें स्थिर करने में समर्थ नहीं हो, तो अभ्यासयोग के द्वारा तुम मुझे प्राप्त करने की इच्छा (अर्थात् प्रयत्न) करो।।

साधक को अपना मन भगवान् के चरणों में स्थिर करके बुद्धि के द्वारा उस सगुण रूप के पारमार्थिक स्वरूप को पहचानना चाहिए। इन दोनों प्रक्रियाओं का सम्पादन करने के लिए अत्यन्त सूक्ष्म बुद्धि और मन की एकाग्रता की आवश्यकता होती है। सम्भवत एक सामान्य पुरुष के समान अर्जुन को यह अनुभव हुआ कि इस मार्ग का सफलतापूर्वक अनुकरण करना उसके लिए असंभव ही है। 

करुणासागर भगवान् श्रीकृष्ण अपने शिष्य के मुख के भावों को समझकर यहाँ एक अन्य उपाय का वर्णन करते हैं। यदि तुम स्थिरतापूर्वक अपने चित्त को मुझमें समाहित नहीं कर सकते हो  तब एक उपाय यह है कि तुम अभ्यासयोग का पालन करो। इस अभ्यासयोग को पूर्व में इस प्रकार बताया गया था कि जहाँ कहीं यह चंचल और अस्थिर मन विचरण करता है उसे वहीं संयमित करके आत्मा के ही वश में लाना चाहिए। 

 जब कभी कोई साधक अपने मन को चुने हुए ध्येय विषय में (इष्टदेव) समाहित करना चाहता है तो उसका चंचल मन ध्येय से हटकर विजातीय प्रवृत्तियों के प्रवाह में विचरण करने लगता है। प्रत्येक साधक को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि ध्यानाभ्यास के समय किसी एक अवधि तक (5 मिनट) भी मन सर्वथा ध्येय वस्तु का ही चिन्तन करने में सफल नहीं होता है। कुछ ही क्षणों में मन का अपने कल्पना जगत् में विहार करना प्रारम्भ हो जाता है।

उसका यह विहार करना अपने आप में इतनी बड़ी समस्या नहीं हैं जितनी बड़ी वह बन जाती है जब यह साधक (मूढ़बुद्धि) भी मन के द्वारा अपहृत हुआ उसी कल्पना लोक में ले जाया जाता है।

 योगेश्वर श्रीकृष्ण केवल यही उपदेश देते हैं कि हमको अपने दिव्य पथ को त्यागकर मन के लुभाने में नहीं आना चाहिए। यत्रतत्र विचरण करने वाले उपद्रवी मन का ध्यान ध्येय बिन्दु में ही समाहित करने के लिए साधक में (शुद्धबुद्धि में) मन से अलग हो कर, अपने में ही निहित उस क्षमता के साथ तादात्म्य करना चाहिए जो मन से भी श्रेष्ठ है और उस पर शासन करके उसे अनुशासित कर सकती है। मन से श्रेष्ठ उसका शासक है विवेक-सम्पन्न बुद्धि अर्थात् शुद्ध बुद्धि। बुद्धि की विवेकसार्मथ्य के द्वारा ही हम उससे निम्नतर मन को अनुशासित कर सकते हैं। यह उपाय उन लोगों को लिए बताया गया है जो पूर्व श्लोक में वर्णित विहंगम मार्ग का अनुसरण नहीं कर सकते हैं। दीर्घकाल तक अभ्यासयोग की साधना करने पर हमारा मन इस प्रकार अनुशासित हो जायेगा कि हम आत्मविकास के साक्षात् साधन का अभ्यास करने में समर्थ हो जायेंगे  जिसका वर्णन पूर्व के श्लोक में किया गया है। 

यदि यह भी सम्भव न हो तो

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।

मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि।।12.10।।

।।12.10।। यदि तुम अभ्यास में भी असमर्थ हो तो मत्कर्म परायण बनो; इस प्रकार मेरे लिए कर्मों को करते हुए भी तुम सिद्धि को प्राप्त करोगे।।

यदि कोई साधक मानसिक दृष्टि से विक्षुब्ध और असंयमित है तो वह अभ्यासयोग का पालन करने में समर्थ नहीं हो सकता। यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण का यह उपदेश है कि ऐसे साधकों को ध्यानाभ्यास में व्यर्थ संघर्ष नहीं करते रहना चाहिए। 

परन्तु यदि किसी पुरुष का मन इन विषयवासनाओं से पूर्ण है तथा अत्यन्त बहिर्मुखी है  तो उसका ध्यानाभ्यास केवल ध्यानाभास ही होगा। भगवान् कहते हैं कि ऐसे पुरुष को ध्यान छोड़कर कर्म करना चाहिये। परन्तु वे कर्म ईश्वर के लिए अर्पण की भावना से होने चाहिये। यही मत्कर्मपरमो भव वाक्य का अर्थ है। इस प्रकार के कर्मानुष्ठान से अत्यन्त बहिर्मुखी प्रवृत्ति के पुरुष को भी अपने समस्त दैनिक कर्मों में ईश्वर का अखण्ड स्मरण बना रह सकता है। 

कोई व्यक्ति निश्चयात्मक  रूप से स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर ईश्वर के ही संकल्प -Be and Make' को अपने कर्मों के द्वारा पूर्ण करने का प्रयत्न करे तो उसे सदैव ईश्वर का स्मरण बना रहेगा।  और वह स्वयं में कर्म-कुशलता की अलौकिक शक्ति  संगठन-सार्मथ्य और आत्मविश्वास-पूर्ण साहस को पायेगा। 

ईश्वर को समस्त कर्म अर्पण करने की कला के द्वारा हम अपने दैनिक व्यावहारिक कर्म करते हुए भी मन में दैवी संस्कारों का विकास करते रहेंगे। इसा प्रक्रिया में हमारी पूर्वार्जित वासनाओं का क्षय़ भी होता रहेगा। इस प्रकार चित्त की शुद्धि प्राप्त हो जाने पर हम अभ्यासयोग के अधिकारी हो जायेंगे और शीघ्र ही पर्याप्त समता और सन्तुलन को प्राप्त कर सत्य आत्मा का ध्यान कर तत्स्वरूप बन जायेंगे।

 यदि कोई व्यक्ति इसे भी करने में असमर्थ हो तो उसके लिए भी उपाय अगले श्लोक में बताते हैं

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।

सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्।।12.11।।

।।12.11।। और यदि इसको भी करने के लिए तुम असमर्थ हो, तो आत्मसंयम से युक्त होकर मेरी प्राप्ति रूप योग का आश्रय लेकर, तुम समस्त कर्मों के फल का त्याग करो।।

पूर्व श्लोक में हमें अहंकार (कर्तापन) का सर्वथा त्याग करके जगत् में कर्म करने का उपदेश दिया गया था। अत्यन्त अहंकारी और मानी पुरुष के लिए यह कार्य़ इतना सरल नहीं है। ऐसा पुरुष रजोगुण के कारण अत्यन्त क्षुब्ध रहता है तथा तमोगुण की निम्नस्तरीय प्रवृत्तियों के कारण उसका व्यक्तित्व विषाक्त रहता है। ऐसे निम्न स्तर के व्यक्ति के लिए भी गीता में साधन मार्ग बताया गया है।

यदि समस्त कर्मों को ईश्वरार्पण बुद्धि से कर पाना असंभव है तो उस साधक के लिए उतना ही प्रभावी अन्य उपाय यहाँ बताया गया है कि आत्मसंयम से युक्त होकर मेरी प्राप्ति रूप योग का आश्रय लेकर तुम समस्त कर्मों के फलों का त्याग करो। 

वर्तमान क्षण में किया गया कर्म ही परिपक्व होकर भविष्य के क्षण में फल बनकर प्रकट होता है। आज यदि कोई कृषक भूमि को जोतकर बीज बोता है तो उसे वह फसल दो-तीन महीनों के पश्चात् ही प्राप्त होगी। और यदि वह कृषक वर्तमान में करने योग्य कार्य को त्यागकर भविष्य में आने वाले फल की ही चिन्ता करने में समय का अपव्यय करे तो निश्चय ही उसे कभी लाभ प्राप्त नहीं हो सकता। 

यहाँ कर्मफल त्याग का अर्थ यह है कि भविष्य में आने वाले फलों की व्यर्थ की चिन्ताओं और कल्पनाओं का सर्वथा त्याग कर देना और वर्तमान में कर्म करते रहना। 

 अगले श्लोक में भगवान् सर्वकर्म-फल त्याग की प्रशंसा करते हैं

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते।

ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्।।12.12।।

।।12.12।। अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है; ज्ञान से श्रेष्ठ ध्यान है और ध्यान से भी श्रेष्ठ कर्मफल त्याग है त्याग; से तत्काल ही शान्ति मिलती है।।

श्रवण से प्राप्त ज्ञान को आत्मसात् करने के लिए उस पर विचारपूर्वक मनन और ध्यान की आवश्यकता होती है। शास्त्रवाक्यों के केवल शाब्दिक अर्थ को जानने से यह कार्य सम्पादित नहीं हो सकता। इसलिए मनन और निदिध्यासन अनिवार्य़ होते हैं। केवल श्रवण से किये गये ज्ञान से आत्मसात् किया हुआ ज्ञान निश्चित ही अधिक श्रेष्ठ होता है उसे आत्मसात् करने का साधन ध्यान है।

इसलिए यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण कर्मफल त्याग को श्रेष्ठ स्थान प्रदान करते हैं।अपने कथन पर टिप्पणी को जोड़ते हुए भगवान् कहते हैं कि आसक्तियों के त्याग से तत्काल शान्ति मिलती है।  हिन्दू धर्म में संन्यास का वास्तविक अर्थ यह है कि इन्द्रियों का विषयों के साथ सम्पर्क होने से उत्पन्न होने वाले सुख भोग की बन्धनकारक आसक्तियों को त्याग देना।

इस त्याग के परिणामस्वरूप साधक को अन्तकरण की प्रभावशाली शान्ति और स्थिरता प्राप्त होती है। ऐसे शान्त वातावरण में विवेकी बुद्धि शास्त्र के ज्ञान पर मनन करके उसमें वर्णित आत्मविकास के साधनों को सम्यक् प्रकार से समझ पाती है। और इस प्रकार ज्ञानपूर्वक ध्यान का अभ्यास करने पर साधक को निश्चित ही सफलता मिलती है।

अब अक्षर और अव्यक्त की उपासना करने वाले ज्ञानी भक्तजनों के आंतरिक लक्षण अगले श्लोक में बताये जा रहे हैं। 

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।

निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।।12.13।।

।।12.13।। प्राणिमात्र के प्रति जो द्वेषरहित है तथा सबका मित्र तथा करुणावान् है; जो ममता और अहंकार से रहित, सुख और दु:ख में सम और क्षमावान् है।।

जिस भक्त ने यह पहचान लिया है कि प्राणी मात्र में एक ही आत्मा व्याप्त है, जो उसका स्वयं का ही स्वरूप है ! तो ऐसा आत्मैकत्वदर्शी पुरुष किसी से भी द्वेष नहीं कर सकता।  क्योंकि उसकी ज्ञानमयी दृष्टि में कोई वस्तु परमात्मा से भिन्न है ही नहीं। कोई भी जीवित पुरुष अपने ही दाहिने हाथ से द्वेष नहीं कर सकता।  क्योंकि वह उसमें भी व्याप्त है। कोई भी व्यक्ति अपने से ही द्वेष या घृणा नहीं करता। प्राणीमात्र के प्रति उसका भाव मैत्रीपूर्ण होता है।  और सबके लिए उसके मन में करुणा होती है। सबको वह अभय प्रदान करता है

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।12.14।।

।।12.14।। जो संयतात्मा, दृढ़निश्चयी योगी सदा सन्तुष्ट है, जो अपने मन और बुद्धि को मुझमें अर्पण किये हुए है, जो ऐसा मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है।।

वह अहंकार और वस्तुओं में ममत्व भाव से रहित होता है। सुख और दुख से सम तथा किसी के द्वारा अपशब्द कहे अथवा पीड़ित किये जाने पर भी अविकारी भाव से रहता है। शरीर धारणमात्र के लिए भी वस्तुओं के न होने पर वह सदा सन्तुष्ट एवं निजानन्द में मग्न रहता है। वह आत्मसंयमी तथा तत्त्व के स्वरूप के विषय में दृढ़ निश्चय वाला होता है। भगवान् कहते हैं कि अपने मन और बुद्धि को मुझमें अर्पित करने वाला मेरा भक्त मुझे प्रिय है। 

भगवान् ने पहले भी सातवें अध्याय में कहा था कि मुझमें (आत्मा या इष्टदेव में ) अपनी शुद्धबुद्धि अर्पित करने वाला ज्ञानी को मैं और मुझे ज्ञानी भक्त अत्यन्त प्रिय है उसी कथन को यहाँ और अधिक विस्तार से स्पष्ट किया गया है।

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।

हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः।।12.15।।

।।12.15।। जिससे कोई लोक (अर्थात् जीव, व्यक्ति) उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी व्यक्ति से उद्वेग अनुभव नहीं करता तथा जो हर्ष, अमर्ष (असहिष्णुता) भय और उद्वेगों से मुक्त है,वह भक्त मुझे प्रिय है।।

इस में ज्ञानी भक्त के तीन और लक्षण बताये गये हैं। जिस पुरुष से इस लोक को उद्वेग नहीं होता ज्ञानी पुरुष वह है जो लोक में किसी प्रकार का विक्षेप या उद्वेग उत्पन्न नहीं करता है। जहाँ सूर्य है वहाँ अन्धकार नहीं रह सकता वैसे ही जहाँ शान्त और आनन्दस्वरूप में स्थित ज्ञानी भक्त होगा वहाँ अशान्ति और उदासी का प्रश्न ही नहीं उठता है। 

उसके आसपास शान्ति प्रेम और आनन्द का ही ऐसा वातावरण निर्मित होता है कि वहाँ पहुँचने पर एक क्षुब्ध और दुखी पुरुष भी उस महात्मा पुरुष से प्रभावित होकर अपने दुख को भूलकर शान्ति का अनुभव करता है। वास्तविकता तो यह है कि सारा जगत् उस सन्त के समीप विवश हुआ सा दौड़ पड़ता है केवल उसके ज्ञान और आनन्द को स्वयं में अनुभव करने के लिए जो स्वयं भी किसी से उद्विग्न नहीं होता है न केवल वह सबको शान्ति प्रदान करता है बल्कि स्वयं अपनी शान्ति और आनन्द को किसी प्रकार से भी नहीं खोता है। जगत् की कोई भी स्थिति उसे उद्विग्न नहीं कर सकती। 

(इष्टदेव को समर्पित बुद्धि वाले भक्त को ??) बाह्य दुर्व्यवस्था विरोध और प्रतिशोध की भावना से पूर्ण उपद्रवी लोगों के होने पर भी उसके मन में विक्षेप नहीं होता। भौतिक वस्तुओं का यह जगत् सदैव परिवर्तित होता रहता है और सामान्यत सबको विमूढ़ और दुखी कर देने वाला मृत्यु का यह ताण्डव सन्त पुरुष की मनशान्ति को रंचमात्र भी विचलित नहीं कर सकता। 

मानो वह अधिक शक्तिशाली धातु का बना होता है और उसका जीवन सुदृढ़ नीव पर निर्मित होता है। समुद्र की सतह पर अनेक लकड़ियाँ इतस्तत बहती और भटकती रहती हैं।  किन्तु समुद्री चट्टानों की दृढ़ नींव पर निर्मित दीपस्तम्भ समुद्र में उठने वाले ज्वारभाटे का अवलोकन करते हुये निश्चल और सीधा खड़ा रहता है ज्ञानी पुरुष का व्यक्तित्व जीवन के अधिष्ठानस्वरूप सत्य वस्तु की अनुभूति में स्थित/प्रतिष्ठित होने के कारण जीवन की सतही परिस्थितियों से कभी विचलित नहीं होता क्योंकि उसके मन में किसी वस्तु से कोई आसक्ति नहीं होती। 

वह 'ज्ञानिभक्त' कठिन परिस्थितियों की आंतरिक और बाहरी उथल-पुथल के बीच भी, अस्तित्व के शाश्वत और अपरिवर्तनीय (immutable) अधिष्ठान को अनुभव करता है; {he experiences an eternal and immutable ground of being.) और प्रकृति के शुद्ध संगीत के बीच, मनुष्य द्वारा उत्पन्न वर्जित ध्वनियों (निर्मम वचनों) के होते हुए भी,  वह केवल एक अडिग और शुद्ध स्वर ["सोऽहं" ?] ही सुनता है।

वह हर्ष (elation-रोमांच), अमर्ष (indignation : घृणा के साथ क्रोध)  भय और उद्वेग (agitation-व्यग्रता) से मुक्त होता है। इस प्रकार जो भक्त अपने स्वयं के साथ तथा जगत् के साथ भी सदा शान्ति का अनुभव करता है और जो परिस्थितियों पर शासन करता है, और उनका शिकार नहीं बनता है।  जिसने सामान्य मनुष्य के अवगुणों और प्रतिक्रियाओं को पार कर लिया है,  ऐसा भक्त मुझे प्रिय है।

इसी विषय में भगवान् आगे कहते हैं

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।

सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।12.16।।

।।12.16।। जो अपेक्षारहित, शुद्ध, दक्ष, उदासीन, व्यथारहित और सर्वकर्मों का संन्यास करने वाला मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है।।

सामान्य मनुष्य अपने सुख और शान्ति के लिए बाह्य देश, काल, वस्तु,  व्यक्ति और परिस्थितियों पर आश्रित होता है। इनमें से प्रिय की प्राप्ति होने पर वह क्षण भर रोमांचित कर देने वाले हर्षोल्लास का अनुभव करता है। परन्तु एक सच्चा भक्त- जो अनपेक्ष (अपेक्षारहित) है ,  अपने सुख के लिए बाह्य जगत् की अपेक्षा नहीं रखता। 

 शारीरिक शुचिता तथा व्यवहार में भी पवित्रता रखने पर भारत में अत्यधिक बल दिया गया है। बाह्य शुद्धि के बिना आन्तरिक शुद्धि मात्र दिवास्वप्न या व्यर्थ की आशा ही सिद्ध होगी। दक्ष (कुशल) सदा विवेकी बुद्धि सजगता तो सुगठित पुरुष का स्वभाव ही बन जाता है। किसी भी कार्य़ की सफलता की कुंजी उत्साह है। कुशल और समर्थ व्यक्ति वह नहीं है जो अपने व्यवहार और कार्य में त्रुटियां करता रहता है। दक्ष भक्त मन से सजग और बुद्धि से समर्थ होता है। उसमें मन की शक्ति का अपव्यय नहीं होता अत एक बार किसी कार्य का उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर लेने के पश्चात् वह उस कार्य का सिद्धि के लिए सदा तत्पर रहता है। 

 यहाँ साधक को यह उपदेश दिया गया है कि जीवन की इन साधारण परिस्थितियों में वह अपनी मानसिक शक्ति को व्यर्थ ही नहीं खोने दे? बल्कि इन घटनाओं में उदासीन भाव से रहकर शक्ति का संचय करे। छोटे-मोटे दुख और कष्ट अनित्य होने के कारण स्वतः ही निवृत्त हो जाते हैं।  अत उनके लिए चिन्ता और संघर्ष करने की कोई आवश्यकता नहीं है। 

 ज्ञानी भक्त सब कामनाओं से मुक्त होने के कारण निर्भय होता है। जो पुरुष भगवान् का भक्त है उसको इस प्रकार के मान और कर्तृत्व के अभिमान को सर्वथा त्याग कर निरहंकार भाव से जगत् में कर्म करने चाहिए।

यदि गहराई से चिंतन किया जाये तो ज्ञात होगा कि हमारे सभी कर्म जगत् में उपलब्ध वस्तुओं , और स्थितियों से, नियन्त्रित, नियमित, शासित और प्रेरित होते हैं। और इसलिए ज्ञानिभक्त  जगत् में सदा ईश्वर के हाथों में एक करण या निमित्त के रूप में कर्म करता है न कि किसी कर्म के स्वतन्त्र कर्ता के रूप में। उपर्युक्त सद्गुणों से सम्पन्न भक्त मुझे प्रिय है। 

भक्त के कुछ और लक्षण बताते हुए भगवान् कहते हैं

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।

शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्य: स मे प्रिय: ।।12.17।।

।।12.17।। जो न हर्षित होता है और न द्वेष करता है; न शोक करता है और न आकांक्षा; तथा जो शुभ और अशुभ को त्याग देता है, वह भक्तिमान् पुरुष मुझे प्रिय है।।

वह पुरुष परम भक्त कहलाता है जिसने मन और बुद्धि की अनात्म उपाधियों तथा जगत् से अपने तादात्म्य को त्याग कर आनन्दस्वरूप आत्मा में दृढ़ स्थिति प्राप्त कर ली है। (देह में रहते हुए ?)

अत यह स्वाभाविक ही है कि अनात्म जगत् से होने वाले सुखदुखादिक अनुभव उसे किसी भी प्रकार से न आकर्षित कर सकते हैं और न विचलित। इसे ही इस श्लोक में बताया गया है।

ज्ञानी भक्त में इन समस्त विकारों और प्रतिक्रियाओं का यहाँ अभाव बताया गया है। इसका कारण यह है कि वह अपने परम आनन्दस्वरूप में स्थित होने के कारण बाह्य मिथ्या वस्तुओं में सुख और दुख की कल्पना करके उनसे राग या द्वेष नहीं करता। राग और द्वेष के द्वन्द्व के अभाव में हर्ष और शोक का स्वत अभाव हो जाता है। वह ज्ञानी भक्त जगत् को अपनी कल्पना की दृष्टि से न देखकर यथार्थ रूप में देखता है

साधारण मूढ़बुद्धि अपने राग और द्वेष के कारण वस्तुओं की प्राप्ति के लिए शुभ और अशुभ (पुण्य और पाप) दोनों ही प्रकार के कर्म करता है।  परन्तु भक्त के मन में राग और द्वेष नहीं होने के कारण वह शुभ और अशुभ दोनों ही से मुक्त हो जाता है। 

धर्मशास्त्रों के शब्दों का वाच्यार्थ उसके मर्म या प्रयोजन को स्पष्ट नहीं करता है। अत उनके लक्ष्यार्थ पर विचार करना आवश्यक हो जाता है। इस श्लोक में वर्णित गुणें से युक्त भक्त भगवान् को प्रिय होता है।  इस प्रकार अब तक छब्बीस गुणों को बताया गया है।  जो भक्त के स्वाभाविक लक्षण होते हैं।

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।

शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः।।12.18।।

।।12.18।। जो पुरुष शत्रु और मित्र में तथा मान और अपमान में सम है; जो शीत-उष्ण व सुखदु:खादिक द्वन्द्वों में सम है और आसक्ति रहित है।।

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित्।

अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः।।12.19।

।।12.19।। जिसको निन्दा और स्तुति दोनों ही तुल्य है, जो मौनी है, जो किसी अल्प वस्तु से भी सन्तुष्ट है, जो अनिकेत है, वह स्थिर बुद्धि का भक्तिमान् पुरुष मुझे प्रिय है।।

जो शत्रु और मित्र में सम है किसी व्यक्ति को शत्रु या मित्र के रूप में देखना मन का काम या खेल है। य़द्यपि ज्ञानी पुरुष किसी से शत्रुता नहीं रखता परन्तु अन्य लोग उसके प्रति शत्रु या मित्र भाव रख सकते हैं। उन दोनों के साथ एक भक्त समान रूप से व्यवहार करता है। 

जो मान और अपमान में सम है स्वयं को सम्मानित या अपमानित अनुभव करना बुद्धि का धर्म है। बुद्धि अपने ही मापदण्ड निर्धारित करके लोगों के व्यवहार का मूल्यांकन करती रहती है। जिस किसी प्रकार के व्यवहार से मनुष्य सम्मानित अनुभव करता है  वही उसे अपमान प्रतीत होता है जब उसके जीवन मूल्य परिवर्तित हो जाते हैं। जो पुरुष बुद्धि के स्तर पर रहता है? उसे ही मान और अपमान प्रभावित कर सकते हैं आत्मस्वरूप में स्थित भक्त को नहीं

जो शीत और उष्ण में सम रहता है शीत और उष्ण का अनुभव शरीर द्वारा होता है और उसका प्रभाव भी शरीर पर ही पड़ता है। वस्तुत जीवन में शरीर, मन और बुद्धि के स्तर पर होने वाले समस्त अनुभवों का समावेश हो जाता है। इन सबमें परम भक्त पुरुष अक्षुब्ध रहता है  क्योंकि वह आसक्तिरहित होता है। 

अनात्म उपाधियों से आसक्ति होने के कारण ही हम अपने जीवन में होने वाली प्रत्येक अल्प सी घटना से भी अत्यधिक विचलित हो जाते हैं जबकि संगरहित पुरुष उन सबका शासक बन कर रहता है।

एक महान् भक्त जो अपने सर्वोपाधिविनिर्मुक्त सच्चिदानन्द स्वरूप की रसानुभूति में मग्न रहता है उसे संसारी पुरुषों द्वारा की गई निन्दा और स्तुति अत्यन्त तुच्छ और अर्थहीन प्रतीत होती है। वह भलीभाँति जानता है कि जिस पुरुष की समाज में आज स्तुति और प्रशंसा की जा रही है उसी पुरुष को यही समाज कल अपमानित भी करेगा और आज का निन्दित पुरुष कल का स्तुत्य नेता भी बनेगा।  निन्दा और स्तुति दोनों ही संसारी लोगों के मन में क्षणिक तरंग मात्र होती है। 

मौनी ज्ञानी भक्त मौनी होता है। इसका अर्थ है कि वह अतिवादी नहीं होता। मौन का वास्तविक अर्थ है मननशीलता। अत केवल वाचिक मौन वास्तविक मौन नहीं कहा जा सकता। 

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।

श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः।।12.20।।

।।12.20।। जो भक्त श्रद्धावान् तथा मुझे ही परम लक्ष्य समझने वाले हैं और इस यथोक्त धर्ममय अमृत का अर्थात् धर्ममय जीवन का पालन करते हैं, वे मुझे अतिशय प्रिय हैं।।

यथोक्त अमृत धर्म उपर्युक्त पंक्तियों में सनातन धर्म का सार दिया गया है। वस्तुत हिन्दू धर्म के अनुयायियों के जीवन का लक्ष्य आत्मसाक्षात्कार करके उसे जीवन को अपने व्यक्तित्व के सभी स्तरों शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक पर जीने का है। उसके लिये केवल इतना पर्याप्त नहीं है कि वह इस ज्ञान को बौद्धिक स्तर पर समझता है अथवा नियमित रूप से शास्त्रग्रन्थ का पाठ करता है,  या उन्हें अच्छी प्रकार दूसरों को समझा भी सकता है।

 उसे चाहिए कि वह शास्त्रीय ज्ञान को आत्मसात् करके स्वयं पूर्ण पुरुष बन जाये। इसलिए भगवान् कहते हैं कि उसे श्रद्धावान् होना चाहिए यहाँ श्रद्धा शब्द का अर्थ है स्वयं के अनुभव के द्वारा शास्त्र प्रतिपादित आत्मज्ञान को आत्मसात् करने- की क्षमता

ऐसे भक्त मुझे अतिशय प्रिय हैं इस श्लोक के साथ भक्त के लक्षणों का वर्णन करने वाले इस प्रकरण का षष्ठ भाग तथा यह अध्याय भी समाप्त होता है। यद्यपि इसमें और कोई नया लक्षण नहीं बताया गया है तथपि इसमें भगवान् का समस्त साधकों को दिया हुआ पुनराश्वासन है कि उक्त गुणों से सम्पन्न साधकों को भगवान् की परा भक्ति प्राप्त होगी

श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का भक्तियोग नामक बारहवां अध्याय समाप्त होता है।

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