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बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

⚜️️🔱2.सांख्य योग : विश्लेषणात्मक ज्ञान का योग ⚜️️🔱

द्वितीय अध्याय का सारामृत 

 72 श्लोक वाले इस अध्याय का नाम 'सांख्ययोग ' है। सांख्य शब्द का अर्थ है - 'विश्लेषणात्मक ज्ञान ' (Analytical knowledge) और योग शब्द युज धातु से बना है जिसका अर्थ है जोड़ना । स्वयं को (अर्थात देहाध्यास और जिवाध्यास में फँसी 'मूढ़बुद्धि' 'सम्मोहित मति' को, सिद्धांत 'जैसी मति वैसी गति ! इसलिए) वर्तमान की स्थिति से ऊँचा उठाकर  'आत्मा' से या किसी श्रेष्ठ एवं पूर्ण आदर्श से (ह्रदय में विद्यमान भगवान गदाधर श्री विष्णुपद श्रीहरि से) जुड़ जाने के लिये साधक जो कर्म या प्रयत्न करता है उसे योग कहते हैं। इस अध्याय में 'ज्ञान' और 'कर्म' पर सम्मिलित रूप से और पृथक रूप से चर्चा होने के कारण इस अध्याय का नाम 'सांख्ययोग' रखा गया है।    

 अर्जुन का विषाद दूर करने के लिए इस अध्याय का आरम्भ हुआ है। इसमें प्रधानतया -शरीर, इन्द्रिय , मन, बुद्धि से श्रेष्ठ आत्मा के तत्त्वज्ञान की ही चर्चा हुई है। देहाध्यास और जिवाध्यास को दूर करने के लिए भगवान ने अर्जुन को पहले मनुष्य की विशेष योग्यता 'नित्य-अनित्य विवेक' को जाग्रत करने का उपदेश दिया है। शरीर अनित्य है और आत्मा जन्म-मृत्यु -रहित तथा नित्य है। इस विवेक-प्रयोग के सिद्धान्त को समझाने के लिए भगवान गदाधर श्रीविष्णुपद श्रीहरि ने भगवान भाष्यकार श्रीशंकराचार्य जी द्वारा दिए गए विवेक की परिभाषा - "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः" को समझाने के लिए श्री भगवान गदाधर ने आत्मतत्व का उपदेश दिया है। इसके बाद उन्होंने अर्जुन को समझाया कि स्वधर्म-पालन करना मनुष्य का अवश्यमेव कर्तव्य है। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्मयोग पर भी कुछ उपदेश दिए हैं। 

 वे अर्जुन को फल की आसक्ति के बिना निष्काम कर्म करने की प्रेरणा देते हैं। फल की कामना से रहित कर्म करने के विज्ञान को वे 'बुद्धियोग' या 'बुद्धि का योग' नाम देते हैं। बुद्धि का प्रयोग मन को देह, इन्द्रिय विषय-भोगों में सुख खोजने में बुद्धि की लालसा को रोक कर आत्मा या भगवान के साथ सम्बन्ध बनाने के लिए करना चाहिए। इस भावना के साथ सम्पन्न किए गए कर्म 'बांधने वाले' से 'मुक्त करने वाले' में परिवर्तित हो जाते हैं। 

इसके पश्चात् अर्जुन उन मनुष्यों के लक्षणों को जानना चाहता है, जिनकी बुद्धि आत्मा में प्रतिष्ठित हो गयी हो , या आत्मनिष्ठ बुद्धि वाले स्थितप्रज्ञ मनुष्य के लक्षणों को जानना चाहता है। श्रीकृष्ण उसे बताते हैं कि किस प्रकार से स्थितप्रज्ञ होकर मनुष्य आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त हो जाता है। निष्काम कर्म, निष्काम भक्ति और ज्ञान के सम्मिलन के फलस्वरूप ब्रह्मप्राप्ति और स्थितप्रज्ञ-अवस्था होती है। इसीको ब्रह्मप्राप्ति (ब्राह्मी स्थिति, ब्रह्माध्यास ??) स्थितप्रज्ञ -अवस्था कहते है।   और सभी परिस्थितियों में उसकी इन्द्रियाँ उसके वश में हो जाती हैं और उसका मन सदा के लिए भगवान की भक्ति में तल्लीन हो जाता है। इस अवस्था में स्थित होकर मनुष्य निष्काम भाव अपने वर्ण और आश्रम कर्म करके अन्त में ब्रह्मनिर्वाण या मोक्ष प्राप्त करते हैं। यमराज नचिकेता को बताते हैं कि 'ॐ' ही वह सर्वोच्च ब्रह्म या परम लक्ष्य है, जिसे जानकर ही सब कुछ जान लिया जाता है और अमरता मिलती है। 

"सर्वे वेदा यत् पदम् आमनन्ति,

तपांसि सर्वाणि च यद् वदन्ति।

यद् ईच्छन्तो  ब्रह्मचर्यं चरन्ति,  

तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि - ॐ इति येतत्‌ ॥ 

(कठोपनिषद 1.2.15)  जो बताता है कि सभी वेदों का परम लक्ष्य, सभी तपस्याओं का अंतिम फल और ब्रह्मचर्य का उद्देश्य 'ॐ' (ओम्) ही है। 'उस पद' की प्राप्ति' [भगवान गदाधर श्री विष्णुपद श्रीहरि की प्राप्ति ] ही ब्राह्मी स्थिति या मोक्ष-प्राप्ति है। समस्त गीता में विशेष रूप से चर्चित इस ब्रह्मस्वरूपता की प्राप्ति ही इस अध्याय का मूल संगीत है।  

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February 5, 2026 : 

।।2.1।। संजय ने कहा -- इस प्रकार करुणा और विषाद से अभिभूत,  अश्रुपूरित नेत्रों वाले आकुल अर्जुन से मधुसूदन ने यह वाक्य कहा।।

अर्जुन की विषादावस्था का वर्णन करने के साथ ही संजय हमें यह भी संकेत करता है कि उसका आन्तरिक व्यक्तित्व भग्न हो गया था। और अर्जुन के व्यक्तित्व  में गहरी दरार पड़ गयी थी। अपने समय का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी होकर भी वह किसी सामान्य स्त्री के समान रुदन कर रहा था। 

श्री भगवानुवाच

 कुत: त्वा कश्मलम् इदम् विषमे समुपस्थितम्। 

 अनार्य जुष्टम् सद् अस्वय॑म् अकीर्तिकरम् अर्जुन।। (2.2)   

।।2.2।। श्री भगवान् ने कहा -- हे अर्जुन ! तुमको इस विषम स्थल में यह मोह कहाँ से उत्पन्न हुआ?  यह आर्य आचरण के विपरीत न तो स्वर्ग प्राप्ति का साधन ही है और न कीर्ति कराने वाला ही है।।

यहाँ भगवान् अर्जुन के आचरण को अनार्य कहते हैं।  आर्य पुरुष जीवन के उच्च आदर्शों पवित्रता और गरिमा के आह्वान के प्रति सदैव जागरूक और प्रयत्नशील रहते हैं । एक सच्चे आर्य अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष का स्वभाव तो यह होता है कि जीवन में आने वाली किसी भी परिस्थिति में अपने मनसंयम से विचलित न होकर उन परिस्थितियों का कुशलता से सामना करता है,  और उनको अपने अनुकूल बना लेता है। 

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।

क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।2.3।।

।।2.3।। हे पार्थ क्लीव (कायर) मत बनो। यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है, हे ! परंतप हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ।

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।

क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।2.3।।

।।2.3।। हे पार्थ क्लीव (कायर) मत बनो। यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है, हे ! परंतप हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ।।

ज्ञान के मार्ग पर सफलतापूर्वक कदम रखने के लिए उच्च आत्मबल और नैतिकता का होना आवश्यक है। जिसके लिए किसी मनुष्य को आशावान, उमंगी और ऊर्जावान बनकर आलस्य, स्वछन्दता की प्रवृत्ति, अज्ञान और आसक्ति जैसे दोषों पर विजय प्राप्त करना आवश्यक होता है। श्रीकृष्ण एक योग्य गुरु हैं और इसलिए अर्जुन को फटकारते हुए वे अब उसे परिस्थितियों का सामना करने के लिए प्रोत्साहित कर उसके आत्मबल को बढ़ाते हैं।

 [2.3 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.] 

अर्जुन उवाच

कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन।

इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन।।2.4।।

।।2.4।। अर्जुन ने कहा -- हे मधुसूदन ! मैं रणभूमि में किस प्रकार भीष्म और द्रोण के साथ बाणों से युद्ध करूँगा। हे अरिसूदन, वे दोनों ही पूजनीय हैं।।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि अर्जुन का मिथ्या अहंकार (देहाध्यास और जिवाध्यास )  ही उसकी मिथ्या धारणाओं और मूढ़बुद्धि होने का कारण था।

गुरूनहत्वा हि महानुभावान्

श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।

हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव

भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्।।2.5।।

।।2.5।। इन महानुभाव गुरुजनों को मारने से इस लोक में भिक्षा का अन्न भी ग्रहण करना अधिक कल्याण कारक है, क्योंकि गुरुजनों को मारकर मैं इस लोक में रक्तरंजित अर्थ और काम रूप भोगों को ही भोगूँगा।।

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो

यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।

यानेव हत्वा न जिजीविषाम 

स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः।।2.6।।

।।2.6।। हम नहीं जानते कि हमें क्या करना उचित है। हम यह भी नहीं जानते कि हम जीतेंगे, या वे हमको जीतेंगे, जिनको मारकर हम जीवित नहीं रहना चाहते वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने युद्ध के लिए खड़े हैं।।

हमारी पाँच इन्द्रियाँ है - एक स्पर्श इन्द्रिय त्वचा का स्थान पूरे शरीर में है, बाकी 4 इन्द्रिय रूप, रस , गंध , शब्द की इन्द्रियाँ शरीर के ऊपरी भाग में है।  हमारा मन ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा भिन्नभिन्न विषयों को ग्रहण कर उनको एक व्यवस्थित रूप में बुद्धि के समक्ष निर्णय के लिये प्रस्तुत करता है। बुद्धि अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर निर्णय देती है जिसे मन कमेन्द्रियों के द्वारा बाह्य जगत में व्यक्त करता है। हमारी जाग्रत अवस्था के प्रत्येक क्षण यह समस्त कार्यकलाप होता रहता है। अत्यधिक चिन्तातुर होने के कारण अर्जुन का देह, इन्द्रियाँ , मन (मिथ्या अहंकार M/F जीव भाव) मूढ़बुद्धि (देहाध्यास) द्वारा निर्देशित हो रहा था, वह शुद्ध या सारथि बुद्धि आत्मा (इष्टदेव) जुड़ा हुआ नहीं था। इस मोह का प्रभाव न केवल अर्जुन के मन (अहंकार) पर बल्कि उसकी बुद्धि पर भी पड़ा था।   

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः

पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः।

यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे

शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।।2.7।।

।।2.7।। करुणा के कलुष से अभिभूत और कर्तव्यपथ पर संभ्रमित हुआ मैं आपसे पूछता हूँ, कि मेरे लिये जो श्रेयष्कर हो, उसे आप निश्चय करके कहिये, क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ; शरण में आये मुझको आप उपदेश दीजिये।।

यहाँ अर्जुन शिष्यभाव से भगवान् की शरण में जाता है जो यह संकेत करता है कि अब वह उपदेश ग्रहण करने योग्य हो गया है। और अब वह भगवान् के उपदेश का पालन करेगा। 

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या

द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।

अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धम्

राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्।।2.8।।

।।2.8।। पृथ्वी पर निष्कण्टक समृद्ध राज्य को और देवताओं के स्वामित्व को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर कर सके।।

अब अर्जुन की स्थिति एक तीव्र मुमुक्ष के समान है जो मरणधर्मा शरीर (र्मत्य जीवन) की समस्त सीमाओं और बन्धनों से मुक्त हो जाने के लिये अधीर हो उठा है। अब आवश्यकता है केवल एक प्रामाणिक विचार की जो स्वयं भगवान हृषीकेश उसे गीता के दिव्य काव्य में देते हैं।

सञ्जय उवाच

एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।

न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह।।2.9।।

।।2.9।। संजय ने कहा -- इस प्रकार गुडाकेश परंतप अर्जुन भगवान् हृषीकेश से यह कहकर कि हे गोविन्द "मैं युद्ध नहीं करूँगा" चुप हो गया।।

संजय ने यहाँ अर्जुन को गुड़ाकेश  कह कर संबोधित किया गया है जिसका अर्थ है-'निद्रा पर विजय पाने वाला।' और  श्रीकृष्ण के लिए हृषीकेश अर्थात् 'मन और इन्द्रियों के स्वामी' शब्द का प्रयोग किया है। इसका शाब्दिक संकेत यह है कि जो मन और इन्द्रियों के स्वामी हैं, वे निश्चित रूप से अर्जुन को इस किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति से बाहर ले आएंगे।

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।

सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः।।2.10।

।।2.10।। इस प्रकार धर्म और अधर्म शुभ और अशुभ इन दो सेनाओं के संव्यूहन के मध्य अर्जुन (जीव देहाध्यास-रथी) पूर्ण रूप से अपने सारथी बुद्धि को भगवान् श्रीकृष्ण (सूक्ष्म विवेकवती बुद्धि, आत्मा , ईश्वर,परमात्मा) की शरण में आत्मसमर्पण करता है जो पाँच अश्वों (पंच ज्ञानेन्द्रियों) और मन रूपी लगाम के द्वारा चालित शरीर रूपी रथ (देह) अपने पूर्ण नियन्त्रण में रखते हैं

ऐसे दुखी और भ्रमित स्वयं को नश्वर देह समझने वाले , M/F देहाध्यासी  व्यक्ति जीव अर्जुन को श्रीकृष्ण सहास्य उसकी अन्तिम विजय का आश्वासन देने के साथ ही गीता के आत्ममुक्ति का आध्यात्मिक उपदेश भी करते हैं। जिसके ज्ञान से सदैव के लिये मनुष्य के शोक- मोह की निवृत्ति हो जाती है।

अपने अधूरे ज्ञान के कारण हम जिन परिस्थितियों का सामना करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं, उन्हें हम दोषी मानते हैं, दुःखी होते हुए उन पर खीझते हैं, उनसे दूर भागना चाहते हैं और उन्हें अपने दुर्भाग्य के लिए उत्तरदायी ठहराते हैं। किन्तु प्रबुद्ध आत्माएँ हमें अवगत कराती हैं कि भगवान की यह सृष्टि सभी प्रकार से पूर्ण है।  तथा शुभ और अशुभ परिस्थितियाँ हमारे सम्मुख दिव्य प्रयोजन हेतु उत्पन्न होती हैं। ये सब हमारे आध्यात्मिक उत्थान की व्यवस्था करती हैं ताकि हम पूर्णता को प्राप्त करने की (निःस्वार्थपरता को अभिव्यक्त करने की ?)अपनी यात्रा में आगे बढ़ सके। जो लोग इस रहस्य को समझते हैं, वे कभी कठिन परिस्थितियों से विचलित नहीं होते बल्कि दृढ़ता और शांति से इनका सामना करते हैं। 

शंकराचार्यजी अपने भाष्य में कहते हैं - " तस्माद्गीताशास्त्रे केवलादेव तत्त्वज्ञानान्मोक्षप्राप्तिः न कर्मसमुच्चितात् इति निश्चितोऽर्थः।भगवान् यही बात कहेंगे कि (योगी) अन्तःकरण की शुद्धि (चित्तशुद्धि) के लिये कर्म करते हैं। सुतरां गीताशास्त्र में निश्चय किया हुआ अर्थ यही है कि केवल तत्त्वज्ञान से  ही मुक्ति  होती है कर्म-सहित ज्ञान से नहीं




 




 


      


⚜️️🔱2. 10 वां तू ! तो 'तत्त्वमसि ' गुरु ऐसे ढंग से गिनवायेंगे कि, देह, इन्द्रिय , मन बुद्धि -चित्त अहंकार आदि सब दृश्य है , लेकिन उन सबका साक्षी आत्मा तूँ है।⚜️️🔱3. "हम वासी वा देश के, जहां पारब्रह्म का खेल।⚜️️🔱

10 वां तू ! 'तत्त्वमसि '


 2.क्या है आत्मानुभूति ? ।। Yug-Purush ।। What is self realization ?


जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं॥
जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अबिनासी॥2॥

मुनिगण जन्म-जन्म में (प्रत्येक जन्म में) (अनेकों प्रकार का) साधन करते रहते हैं। फिर भी अंतकाल में उन्हें 'राम' नहीं कह आता (उनके मुख से राम नाम नहीं निकलता)। जिनके नाम के बल से शंकर जी काशी में सबको समान रूप से अविनाशिनी गति (मुक्ति) देते हैं॥2॥
बहुत जन्म लेते लेते जब बुद्धि में सुधार होता है - और बुद्धि जब देहनिष्ठ से आत्मनिष्ठ बन जाती है, जिस जन्म में लोग ईश्वरलाभ या आत्मज्ञान (इष्टदेव) प्राप्त कर लेते हैं , वही उनका अंतिम जन्म होता है। 
जैसे नदी की स्वाभाविक गति सागर की तरफ है , वैसे ही मनुष्य की स्वाभाविक गति आत्मा (अवतार वरिष्ठ) की तरफ है। पर जानता नहीं है, माया से बने पंचभौतिक M/F शरीर के आकर्षण में बंधा हुआ लगता है - कि सांसारिक वस्तुओं में (3Kमें) आसक्त है।  पर वास्तव में वह आनन्द ही चाहता है। लेकिन सम्मोहित बुद्धि आत्मनिष्ठ नहीं हो पाती। हम ईश्वर (आत्मा, इष्टदेव) के अंश है , हम अपनी आत्मा (पवित्र त्रयी) की ओर खींचते हैं। (3 :49 ) लगता है कि हमें जगत (3K) प्रिय है। हमें तो केवल आनंद ही प्रिय है। चाहे कामिनी-कांचन या पद-प्रतिष्ठा की तरफ खींचो तो आनंद की ही चाहत होती है। मनुष्य परमात्मा का अंश है , इसलिए विस्तार की इच्छा होती है। राष्ट्र विस्तार चाहता है। व्यक्ति वृहित होना चाहता है , बड़ा होना चाहता है, ब्रह्म (आत्मा -भगवान) होना चाहता है। हम ब्रह्म होना चाहते हैं। साधु को यदि ब्रह्म न मिले , तो वो भी बड़ा ही होना चाहता है। साधुओं में भी बहुत कम्पीटिशन होता है। तुम्हारी दुकान से ज्यादा हमारी दुकान चलती है। (4:50) अगर वास्तव में देखें तो( महामण्डल के जो भाई पोस्ट के साथ शक्ति चाहते है या बिना पोस्ट के शक्ति पाना चाहते हैं) हम सब बड़े होने के लिए वास्तव परमात्मा को ही चाह रहे हैं । अभी और जीना चाहते हैं। ये जीना क्या है ? आत्मा (परमात्मा, ईश्वर या भगवान) अविनाशी है , वो अनंत काल तक जीता है। व्यक्ति क्षणभर ही जीता है। तो मनुष्य के अंदर ब्रह्म ही होने की इच्छा है , सदा रहने की इच्छा है। कभी न मरुँ। पर हॉस्पिटल जाता है , प्रार्थना करता कि उस समय बच जाएँ, लड़का भाग गया है , वो जरा मिल जाये फिर चाहे शरीर चला जाये। पर लौट आने के बाद फिर कोई जाना चाहता है ? सबलोग वास्तव में आत्मा (ईश्वर या परमात्मा) के लिए तरस रहे हैं। पर दूसरी दृष्टि से देखें/देहमति / मूढ़बुद्धि से देखें, तो लगता है - कोई आत्मा (ईश्वर) को नहीं चाहता -सभी 3K ही चाहते हैं। असल में बुद्धि ही भ्रमित हो गयी है। (6:25
कोई व्यक्ति नदी में स्नान करते जटधारी साधु को देखकर सोचा कोई स्त्री है , उधर गया तो देखा साधु है। आकर्षण स्त्री के प्रति था, साधु के प्रति नहीं था। पर वो स्त्री दिखी तो वो गया। असल हमको सब जगह आनंद की झलक ही दिखती है। यहाँ सम्मान मिल जायेगा , बड़प्पन मिल जायेगा।  हम सब लोग आत्मा (परमात्मा या ब्रह्म) को ही चाहते हैं , कोई दुनिया को नहीं चाहता। जिससे जीवन पर खतरा लगता है , उसकी हत्या पहले हम कर देते हैं। मच्छर से क्या दुश्मनी है ? क्यों मार देते हो ? हम चाहते सुख हैं - मच्छर दुःख देता है। मैं छोटी उम्र में शुकदेव/सुखदेव  की तरह साधु होने गुरुदेव के पास पहुँच गया था। असल में जो सुख देता है वो प्रिय लगता है। पत्नी भी प्रिय लगती है क्योंकि वो सुख देती है। बेटे से जब बाप को दुःख पहुँचता है तो प्यार खत्म हो जाता है। निशाना सबका एक है। निशाना लगाते समय हमलोग एक आँख बंद कर लेते हैं। देखने में दो हैं , पति-पत्नी, बाप-बेटा, गुरु-शिष्य , आत्मा (ईश्वर और जीव-जगत) देखने में दो हैं पर लक्ष्य में एक हैं। आत्मा (ईश्वर, ब्रह्म, जीव और जगत सब) एक है, उस एक के सिवा कोई दूसरा ईश्वर नहीं है, 'एकं ब्रह्म द्वितीय नास्ति नेह ना नास्ति किंचन' नहीं है, ज़रा सा भी नहीं है। (10:42) दिखाई तो अनेक देते हैं - बहुत दिखाई देते हैं - पर सत्य एक ही है ! "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः" अद्वैत वेदांत का मूलमंत्र है, जिसे आदि शंकराचार्य ने प्रतिपादित किया है। इसका अर्थ है कि केवल आत्मा (ब्रह्म, परमात्मा ईश्वर )  ही एकमात्र सत्य (नित्य) है, यह जगत (संसार) मिथ्या (अस्थायी/माया) है, और जीव (आत्मा) वास्तव में ब्रह्म ही है, उससे भिन्न नहीं। यह सूक्ति आत्मा और परमात्मा की एकता को दर्शाती है। 
नचिकेता ने यमराज से कहा था , मैंने बहुत से लोगों से सुना है कि मरने के बाद आत्मा रहती है। और बहुतों ये भी सुना है कि आत्मा नहीं रहती है - सिर्फ गप्प है। कोई आत्मा वात्मा नहीं होती। लेकिन मैं आपसे जानना चाहता हूँ। क्योंकि आप तो मृत्यु के देवता हैं , आपका का तो काम ही मारने का है। तो आपको तो पता होगा , कौन मरता है , कौन नहीं मरता है ? आप प्रैक्टिकल करते हो , सब जगह केवल Theory है , सिद्धांत की बात होती है। तुम यमराज हो हमें यह बताओ आत्मा रहती है या नहीं रहती ? 
यदि यमराज भी प्रवचन देने लगते तो नचिकेता समझ नहीं पाता।     
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्‌ ॥
[अयम् आत्मा प्रवचनेन न लभ्यः। न मेधया न बहुधा श्रुतेन। एषः यं एव वॄणुते तेन लभ्यः। तस्य एषः आत्मा त्वां तनूं विवृणुते ॥ कठोपनिषद्] "यह 'आत्मा' प्रवचन द्वारा लभ्य नहीं है, न मेधाशक्ति से, न बहुत शास्त्रों के श्रवण से 'यह' लभ्य है। यह आत्मा जिसका वरण करता है उसी के द्वारा 'यह' लभ्य है, उसी के प्रति यह 'आत्मा' अपने कलेवर को अनावृत करता है।
महावाक्य है - तत्त्वमसि ! अयमात्मा ब्रह्म ! ये महावाक्य है। अर्थात जीवब्रह्म के एकत्व को महावाक्य (बड़ा वाक्य) कहते हैं। तुम्हें परमात्मा मिल जायेगा यह एक वाक्य है।  तुम अविनाशी हो ये महावाक्य है जिस सर्वव्यापी आत्मा , परमात्मा , सत्य या ईश्वर की तलाश तुम्हें है , वो तुम हो ! 10 अंधे लोग नदी के पार जा रहे थे , उस पर पहुँचकर एक ने गिनना शुरू किया कोई खो तो नहीं गया ? जो गिनता था वो 9 ही गिनता था। एक तो गायब हो गया ? दूसरा और तीसरा भी गिना तो 9 मिला। सभी अंधों ने गिना तो 9 ही मिला। ढूँढ़ते थे 10 आदमी मिलते थे 9, गिनने वाला अपने को गिनता ही नहीं था। एक ज्ञानी जा रहा था , हम 10 वें को मिलवा देंगे , बोलो क्या दोगे ? एक नेता ने प्रस्ताव दिया कि आपको 1 अरब रुपया हम सरकार से दिलवा देंगे। लेकिन उसमें से 20 करोड़ आपको वापस कर देना पड़ेगा। (16:55) तो 20 करोड़ का खर्च हम दिखाएंगे कहाँ ? पहले हम पूरा निकाल लेंगे , बनाते समय हम उसमें से निकाल निकाल कर खर्च दिखाते जायेंगे।  नेता ने कहा नहीं 20 तो पूरा उसी समय लौटा देना होगा। तो स्किम ही कैंसिल कर दिया। आजकल मिलता उनको ही है , जो उसमें से थोड़ा देवे। पाने के लिए भी देना पड़ता है। हैण्ड पाइप में भी एक लोटा पानी दोगे , तो वो पानी देगा। खेत में भी पहले बीज डालते हो तो अनाज वापस आता है। तो गवर्नमेंट में भी ऐसे ही चलता है। नेता लोग सफ़ेद धन देते हैं , काला धन लेते हैं। भजन भी अगर आनंद से करोगे तो आनंद मिलेगा। भगवान भी दयासागर तभी हैं , जब तुम स्मरण -सागर हो। उनकी याद न करो तो दया भी नहीं। याद और दया में सिर्फ द का ही फर्क है। याद इधर से गयी तो उधर से दया बनकर लौटी। एक राधास्वामी मत है। सुरति को धारा कहते हैं। जो परमात्मा से निकली धारा है। जैसे नदी निकलती है , झरना निकलता है। वैसे ही आत्मा से निकली सुरति को धारा कहते हैं। सामान्य रूप से सुरति का अर्थ स्मृति, याद, सुध या ध्यान आना हैं। जब धारा देह-इन्द्रियों में आसक्ति को छोड़ कर उधर से लौटती है , तो धारा -राधा हो जाती है। तो आप राधास्वामी हो जाते हो। आपकी सुरति की धारा जो देह-इन्द्रियों की तरफ जा रही है , उसको यदि आत्मा की तरफ लौटा लो तो वो राधा बन जाती है। नहीं तो धारा कृष्ण , धारा कृष्ण, धारा कृष्ण - धारा जो लौटती हैं , तब वो राधा-कृष्ण हैं ! सामान्य मनुष्य धारा -कृष्ण ही होता है। तुम्हारी अपनी ही धारा- शक्ति या ऊर्जा  संसार में जा रही है - 3K में जा रही है। पाँचो इन्द्रियों और मन से हमारी ऊर्जा जगत की तरफ बह रही है। वो लौट आये तो तुम राधाकृष्ण बन जाओ। (21:07) जगत से बुद्धि जब लौट आती है , तब समाधि बन जाती है। 
विषय चल रहा था महावाक्य और महासमाधि। ब्रह्म-आत्मैक्य बोध या परमात्मा का अपरोक्ष बोध कराने वाले वाक्यों को महावाक्य कहते हैं। तो 10 अन्धों में नदी पार करते समय एक गायब था - उधर से कोई ज्ञानी महात्मा आये , उन्होंने कहा आओ तुम्हारे बिछुड़े साथी से मैं मिला देता हूँ। तो उस ज्ञानी ने प्रत्येक अंधे को सिर को ठोक -ठोक करके गिनना शुरू किया - 123456789 और 10 वां तूँ है ! तब कहा अरे मैं था ? मैं तो गायब नहीं था ? 9 था पर 10 वां तो खुद ही था पर ढूँढ रहा था , 10 वां कौन है ? जैसे तुम जिस सत्य को ढूँढ रहे हो तो , महावाक्य कहेगा देखो - यह देह है , यह दृश्य है। ये इन्द्रियाँ हैं ये दृश्य हैं , इन्द्रियों से सूक्ष्म मन है (जो M/F अहं है वह भी आभास है) मन से सूक्ष्म बुद्धि है, और जिस आत्मा (ईश्वर, ब्रह्म या भगवान) को तूँ ढूँढता है, वह ब्रह्म (पवित्र त्रयी) तूँ है ! अब कैसे कहेगा मुझे आत्मा नहीं मिला ? यदि यह भी कह देते 10 वां है ! 10 वां मोक्ष होता है , मिल जायेगा। तो अच्छा तो लग सकता था पर ढूँढना पसन्द नहीं था। 9 मिल गए हैं , 10 वां भी मिल जायेगा , 10 वां है। ये परोक्ष वाक्य हैं, महावाक्य नहीं हैं । तो सीधा तत्त्व बोधक परिचय नहीं है। आत्मा है -कहने से ये परोक्ष वचन हुआ। तब इतने से संतोष नहीं हुआ। जब गिनाने वाले ने 9 को ठोक -ठोक के कह दिया कि ये दसवाँ तो तूँ है। तो कौन मिला ? मिला -मिलाया ही मिला। जो पहले से वर्तमान था - वही मिल गया। आत्मा कोई अलग वस्तु नहीं है। अब कोई 9 को ही कहता 10 वां यही है , तो लाता कहाँ से ? तब उसी को भ्रम हो जाता कि उसको तो मिला पर मुझे नहीं मिला। किसी को भी गिनो तो यहाँ नारद की गिनती शुरू करो। (24:55) आठवाँ कौन है ? देवकी की आठवें गर्भ से आठवीं संतान से कंस का वध होगा। कंस की मृत्यु आठवीं संतान से होनी है , तो आठवाँ कौन है ? देवर्षि नारद बहुत विचित्र गिनती जानते थे। वही बात यहाँ शुरू करें तो 10 वां तू है ! और जगह से तो 10 वां तू ! तो तत्त्वमसि का मतलब है -जो तुम्हारे गुरु ऐसे ढंग से गिनवायेंगे कि, देह, इन्द्रिय , मन बुद्धि -चित्त अहंकार आदि सब दृश्य है , लेकिन उन सबका साक्षी परमात्मा तूँ है। दूसरा कोई गुरु अगर गिनवायेगा , तो वो भी बतलायेगा परमात्मा तूँ है। अर्थात जिसे तूँ ढूँढ़ता है , वह आत्मा (अविनाशी सत्य या परमात्मा) कोई 'third person' तीसरा व्यक्ति नहीं है ! कोई 'second person ' नहीं है। सारे 9 'second person ' (दृश्य) थे , लेकिन 10 वां द्रष्टा तूँ है।  विदेशों में तो मंत्र भी पैसे से बिकते हैं। और विदेशी लोग हर चीज को पैसे से खरीदते भी हैं। मुफ्त में लेते भी नहीं हैं। हमारे यहाँ प्रवचन निःशुल्क सुने जाते है , फिर श्रद्धा से लोग वहाँ पैसे चढ़ाते हैं। वहाँ पहले टिकट लगता है , तब सभा पण्डाल में प्रवेश होगा। वहाँ मेरे से (स्वामीजी से) मिलने के भी पैसे ले लेते हैं। 15 मिनट मिलने के 100 डॉलर , फिर भी हम बहुत सस्ते वाले हैं। वहाँ तो 5000 डॉलर , 10000 डॉलर से महात्मा के दर्शन होते हैं। हम तो फ्रीफंड वाले हैं।  अभी एक माता निकली , हमसे कहने लगी हमारे घर चलो दर्शन देने। पर वो ठीक नहीं आप ही आकर दर्शन कर लो। दीवाल को दर्शन क्या देना ? वहाँ तो चरण डाले जायेंगे।               

 तुम ही वह हो , तत्त्वमसि ! फिर एक महावाक्य है - "अयम् आत्मा ब्रह्म !'प्रज्ञानं ब्रह्म' (प्रज्ञान ही ब्रह्म है) ऋग्वेद का एक प्रमुख महावाक्य है।  "अयम् आत्मा ब्रह्म !" मतलब ये चैतन्य कौन है? आत्मा अविनाशी है ! कितने दिन सुनते आ रहे हो कि आत्मा अविनाशी है , लेकिन अभीतक आत्म-साक्षात्कार तो नहीं हुआ। सुनते हैं ब्रह्म है , ईश्वर है सर्वव्यापक है। परन्तु उसकी अनुभूति करनी होगी। ब्रह्म या आत्मा सबके ह्रदय में विद्यमान हैं , कितने दिन से सुना है ? फिर भी ढूँढना तो चालू है ? (26:28) ये जब ढूँढना बंद हो जाये , तो इसका मतलब हुआ कि मिल गया ! जब तक महावाक्य की अनुभूति नहीं होगी , तबतक बात नहीं बनेगी। एक साधक ने पूछा महावाक्य में और दूसरे मंत्रों में फर्क है क्या ? महावाक्य भी मंत्र हो सकता है , पर हर मंत्र महावाक्य नहीं है। क्या महावाक्य और गुरुमंत्र दोनों का सार एक होता है ?  वो अलग से भगवान का नाम बोल देगा। राम है , कृष्ण है , रामकृष्ण परमात्मा है , भगवान है सुना है , पर अभी तक हमको ये मिला हुआ नहीं लगता। हमको राम मिल गए , हमको कृष्ण मिल गए , हमको श्रीरामकृष्ण मिल गए , ऐसा लगना चाहिए।  तो महावाक्य परमात्मा को मिलाने वाले वचनों को बोलते हैं। सभी मंत्र महावाक्य नहीं कहे जा सकते। आत्मानुभूति किसे कहते हैं ? 'मैं' की अनुभूति बहुत आसान है। और जिनको आत्मानुभूति करनी है -गुरुशिष्य परम्परा को स्वीकार करें। ध्यान कैसे बनेगा वो गुरु का काम है। प्रश्न है कि आत्मानुभूति किसे कहते हैं ? आत्मानुभूति उसे कहते हैं , जिससे समस्त अनुभूतियाँ होती हैं। जिसके बिना कोई अनुभूति नहीं हो सकती। ऐसा आत्मा मैं हूँ ! यह अनुभव होना ही आत्मानुभूति होती है। इसीलिए ध्यान में जब बैठो , जब तुम्हारे भीतर उजाला दिखे , नात सुनाई दे , जब तुम्हारे मन को कोई विलक्षण अवस्था होगी। आनंद डूब जाओगे तब मैं कहूंगा , ये प्रकाश किसको अनुभव हो रहा है ? क्योंकि बिना तुम्हारे प्रकाश हो नहीं सकता। स्वप्ना तुम्हारे बिना नहीं हो सकता। पहले कुछ अनुभव हो तो सपना भी उसीका होगा। तुम कहोगे मुझे हुआ , तब मैं कहूँगा तत्त्वमसि ! एक संत रबिया की कथा में आती है - बाहर से पुकारा , तो भीतर से संत ने पूछा कि तूँ कौन है ? भीतर से सन्त ने (इष्टदेव ने) पूछा कि तूँ कौन है ? तो जिज्ञासु कहता है - यही तो मुझे पता नहीं है ! यही तो पता लगाने मैं आपके पास आया हूँ। भीतर से पूछा तूँ कौन है ? बाहर से बोला यही तो पता लगाने आया हूँ। जिस दिन ये जान जाऊँगा - मैं कौन हूँ ? तो फिर मुझे आने की जरूरत नहीं है। फिर संत भीतर से पूछा ये प्रश्न पूछता कौन है ? यह प्रश्न कहाँ उठा ? M/F देह में उठा ? मन में उठा ? जड़ में उठा ? ये प्रश्न किसने किया है ? किसके अन्दर जिज्ञासा है ? कौन जानना चाहता है , कि मैं कौन हूँ?  देह जानना चाहता है क्या ? मकान जानना चाहता है क्या ? ये प्रश्न किसके अंदर उठा है ? जैसे एक बुलबुला में यह यह प्रश्न उठा कि अविनाशी कौन है ? (30 :59) एक बुलबुला ने पूछा कि अविनाशी कौन है ? तो किसी ने कहा - ये बुलबुला किसमें बना है ? बुलबुला कहाँ से आया है? ये बुलबुला किस में लीन हो जायेगा ? यदि यह तूँ देख लेगा , तो जान जायेगा, यह देख लेगा कि तूँ ही पानी है। जिससे बुलबुला हुआ है वो पानी है। उसी तरह यह देह, इन्द्रिय,  मन बुद्धि जिससे पैदा होता है , मन (M/F अहंकार बुद्धि) जिसमें रहता है , मन जिसमें समा जाता है, वही आत्मा है (ईश्वर, काली या ब्रह्म है !) पर अभी कहेंगे कि वही आत्मा है तो काम नहीं बनेगा। जब तुमको ध्यान में ब्रह्मात्मैक्य का अनुभव हुआ , तब गुरु पूछेंगे -ये अद्वैत अनुभव किसको हुआ? तो तुम कहोगे कि मुझको हुआ , मुझे दिखा। तुम कहोगे आज ध्यान में मैं आनंद में डूब गया। तो गुरु पूछेंगे ये सब अनुभव किसे हुए ? तो सच्चा साधक कहेगा -मुझे हुआ। तो हम कहेंगे यही आत्मा है। जिससे सब अनुभव होता है , जिसमें सब रहता है , जिसमें सब लीन हो जाता है। 
"जन्माद्यस्य यतः" (janmādyasya yataḥ) ब्रह्मसूत्र (1.1.2) का प्रथम सूत्र है। इसका अर्थ है - (ब्रह्म वह है) जिससे (यतः) इस जगत का जन्म, स्थिति और लय (जन्मादि - जन्म, आदि, अस्य) होता है। यह वाक्य दर्शाता है कि आत्मा (ईश्वर या ब्रह्म) ही सृष्टि का सृजन, पालन और विनाश करने वाला मूल कारण है। 

"मन तू ज्योत स्वरूप है, अपना मूल पहचान" 

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी (आसा महला 3) की एक पवित्र पंक्ति है, जो मनुष्य को याद दिलाती है कि उसका मन-बुद्धि केवल शरीर नहीं, बल्कि परमात्मा का एक दिव्य प्रकाश (आत्मा) है। यह वाणी अज्ञान और अविद्या माया के परदे को हटाकर स्वयं के वास्तविक आध्यात्मिक स्वरूप को समझने और अहंकार मुक्त होने का संदेश देती है। अन्तःकरण की समस्त वृत्तियों का जो साक्षी है - वृत्तियों का आश्रय है , सतस्वरुप-चित्स्वरूप - आनंदस्वरूप चैतन्य आत्मा तूँ ही है।
    एक और प्रश्न है - पारिवारिक कार्य करने में मन की कोई रूचि ही न रह जाये , लेकिन पारिवारिक जिम्मेवारियाँ बाकी हों , तो मनुष्य को क्या करना चाहिए ? कई बार जिसका धंधा अच्छा नहीं चलता उसको भी दुकान में मन नहीं लगता। पर यदि परमात्मा (इष्टदेव) की स्मृति में मन लगता है , तब तमोगुणी नहीं है। आलसी मन नहीं है। जिसका  मन भजन में लग जाता है , उसको चाहिए कुछ देर ड्यूटी अदा करें , बाकि भजन करें। यह आवश्यक नहीं कि 24 घंटा भजन करें।   
यदि मन तुम्हारा आनंद में डूब कर शान्त हो जाता हो , और अरुचि का मतलब है , तुम दुःखी हो जाते हो। कई लड़कों का मन पढ़ाई में नहीं लगता , पर ये जरुरी नहीं है कि ऐसा होना  बहुत अच्छा है। जो भी प्रश्न हो एक घंटा में बंद कर देगें। Be and Make का प्रचार करना भी बहुत अच्छी साधना है। भजन और ड्यूटी साथ -साथ चलने दो। जिम्म्मेवरियाँ पूरी कर सकते हो तो अवश्य करो। लापरवाही मत करो।
     भगवान कृष्ण ने पूरी गीता में कर्म का खंडन किया , और पूरी गीता में कर्म छोड़ने का विरोध भी किया। (35 :51) अर्जुन कर्म छोड़ना चाहता है , युद्ध नहीं चाहता है , भगवान कृष्ण नहीं छोड़ने देते। और उदाहरण देते हैं - मैं भी तो काम करता हूँ ! और मैं भी ज्ञानी हूँ , पर तूँ तो अभी ज्ञानी नहीं हुआ है। मुक्त भी नहीं है , पर मैं मुक्त हूँ फिरभी काम करता हूँ। भगवान कहते हैं कोई व्यक्ति कर्म किये बिना रह ही नहीं सकता। तो कर्तव्यकर्म नहीं करेगा , तो वासना मूलक कर्म करेगा। व्यर्थ के काम करेगा। कई बार आदमी कुर्सी में बैठकर अपने पैर ही हिलाता रहता है। खाली कभी मत बैठो। काम में मन  न लगना योग्य मनुष्य (विवेकी मनुष्य) की पहचान नहीं है। 
       विवेक-वैराग्य -षट्सम्पत्ति और मुमुक्षता यही चार साधन हैं , तो आत्मज्ञान होने पर सहज समाधि मिलेगी। जैसे आपको सहज भाव से लगता है , कि आप भारतीय हैं , M/F हैं। घड़ा बने , ईंट बने।  मिट्टी को बस इतना पता रहे कि मैं मिट्टी हूँ। तुम कौन हो ? ये पहले समझ में आ जाये।  और ये सहज बना रहे। आँख खोलना , मुँदना नहीं है। साधना अवस्था में जप करना। अकेले रहना। महर्षि रमन का कोई कर्तव्य नहीं रहता। मिट्टी की सत्ता के आलावा और कोई सत्ता नहीं रहता। जब सब में मैं हूँ ? तो पराया कौन है ? जब तक आप साधक हैं - श्रवण-मनन -निदिध्यासन करते रहें। अभी लगाने से मन नहीं लगता , पर समाधि से उठने का मन नहीं करेगा। 
मनःसंयोग का अभ्यास : जिस आसन में बैठने से आपको कोई तकलीफ न हो। 5 मिनट बैठ जाइये। अब ये देखिये कि ये तो शरीर है , आपका ध्यान कहाँ है ? (45:03) हृदय के भीतर श्वांस को ले जाओ। कान में ध्यान ले जाओ। कान में आवाज आती है क्या ? आँख पर ध्यान ले जाओ। आंख को जोर से मीच लो फिर ढीली छोड़ दो। आँख खोलना नहीं है। कड़ी करना है , ढीली करना है। शरीर को कड़ा ढीला करो। फिर अपनी आँखों में आकर बैठ जाओ। बंद आँखों से देखो अंदर क्या है ? अँधेरा है कि उजेला है ? कुछ भी नहीं है तो भी ठीक है , देख तो रहे हो कि कुछ भी नहीं है। देख के ही तो बताओगे कि कुछ भी नहीं है। ऑंखें न होंगी तो कैसे बताओगे? भीतर की आंख खुली रहे कि कुछ भी नहीं है। या कुछ है तो क्या है ? अँधेरा है ? रंग है ? प्रकाश है ? प्रकाश है तो कैसा है ? चन्द्रमा का है सूर्य का है ? या टोर्च काहै ? तुम्हारा ध्यान शरीर के भीतर है कि बाहर है। अंत  ११ बार मंत्र का जप कर लो। बड़े प्यार से 11 बार मंत्र जप लो। तुम्हारा मन बोले जिह्वा नहीं। ढूँढो मन कहाँ है ? मन के अंदर ये शब्द आया कि नहीं ? और तुम कौन हो ? खोजो आत्मा के खोजने का यही रास्ता है। पहले सबकुछ खो दोगे , धीरे -धीरे मन मिल जायेगा। आत्मा कौन है ? जो मन का साक्षी है ! जो मन को देख ले वो आत्मा , जो मन को ढूँढ ले वो आत्मा। जो मन में है वो आत्मा है , साक्षी है। ॐ शांति शांति शांति ! 
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⚜️️🔱3. "हम वासी वा देश के, जहां पारब्रह्म का खेल।



  जगत से संबन्ध टूट जाये और आत्मभाव प्रकट हो जाये ! यही ज्ञान है!

सच्चिदानन्द भगवान की जय ! अभी मंच पर बैठते हुए सन्तों , ज्ञानियों निष्ठावानों का यह वचन याद आया - 'तुझको अंत समय सब छोड़ देंगे।' किसी भी समय में तुम्हारे प्राण देह का त्याग कर सकते हैं। पर हमलोग प्रकृति के इस व्यवहारिक नियम को बहुत महत्व दे रहे हैं- कि अभी हम बच्चे हैं , युवा हैं , अभी हम बूढ़े तो हैं - पर इतने बूढ़े भी नहीं हैं कि चले जायें ? इसमें ही अपनी बुद्धि लगा रहे हैं। क्योंकि दिखाई ऐसे देता है कि एक पेड़ में फूल आया है , अब फल आएगा। फल आयेगा तो पहले छोटा होगा। फिर थोड़ा बड़ा होगा , फिर और बड़ा होके - पकेगा। नियम तो यही है। पर हम ये भूल जाते हैं कि कितने ही फल पकते ही नहीं हैं। छोटा सा लगा और झड़ गया। कितने बचपन में चले गए , कितने जवानी में चले गए। कितने लोग समय के पहले चले गए।पर अपने लिए ये नियम पक्का बनाये बैठा हूँ कि मैं अभी नहीं जाऊँगा। एक सन्त ने अपने छोटे गुरुभाई के नाम वसीयत लिख दी। ये स्वाभाविक है - अगर मैं बूढ़ा हूँ तो भावी पीढ़ी को देदूँ। लेकिन जिनके नाम वसीयत थे उनका ही देहांत पहले हो गया। क्योंकि मृत्यु का नियम -बुढ़ापे में या जवानी में बहुत पक्का और सच्चा नहीं है। इसके विपरीत भी हो सकता है। अब आपका प्रश्न होगा तो क्या - हम अपना सब काम छोड़ दें ?लेकिन अभी हम बहुत दिन रहेंगे , ये सोचकर जरुरी काम को लटकायें - यह भी तो अच्छा नहीं है।  (5:06 क्यों न हम अपनी मृत्यु को बिल्कुल नजदीक समझकर , जो करना जरुरी है , उसे पहले निपटा लें ? जिसको जो देना चाहिये दे दें , जिससे जो कहना चाहिए कह लें। स्वयं को जो समझना चाहिए , समझ लें। जिस समय मृत्यु निश्चित रूप से आती है , उस समय बुद्धि बहुत तेज हो जाती है। जब व्यक्ति के प्राण निकलने वाले होते हैं , उस समय की बात कोई सुन नहीं पाता। समझ नहीं पाता समझा नहीं पाता। पर क्या क्या सोच के प्राण निकलते होंगे ? इधर बोल रुक गया है , बोल नहीं सकते हैं। ये मान लेने पर अभी हम कुछ कह सकते हैं , अभी हम कुछ सुन सकते हैं। अभी कुछ स्मरण कर सकते हैं। 
      और प्रत्येक दिन को अपना जन्मदिन समझना चाहिए , और प्रत्येक रात को अपनी मृत्यु समझना चाहिए। प्रातः उठे अभी जन्म हुआ है। अभी बच्चे की तरह पवित्र हो , ये समय सुमिरन करने के लिए बहुत अच्छा है। [सुमिरन का अर्थ है प्रेम और श्रद्धा के साथ निराकार आत्मा (इष्टदेव या सच्चिदानन्द) का नाम-जपना या निरंतर स्मरण करना।] बच्चे जितना शुद्ध मन किसी का नहीं होता है। ज्ञानी का मन छोटे बच्चे जैसा सरल और पवित्र होता है। बच्चे लड़ते और थोड़ी देर में भूल जाते हैं। बच्चों की स्मृति बहुत तेज होती है , बचपन की याद अभी तक है। बच्चे की ये विशेषता है। भाषा सीख जाते हैं , नई चीजें सीख जाते हैं। लेकिन लड़ने की बात तुरंत भूल जाते हैं। क्या सयाने लोग किसी के दुर्व्यवहार को इतनी जल्दी भूल सकते हैं ? कुछ घटनाओं को वे दिमाग से हटा नहीं पाते। उसीमें कुढ़ते हुए , जाने मन में कितना कचरा लिए कूच कर जाते हैं। इसलिए आप प्रत्येक सुबह छोटे बच्चे की तरह कोमल सरल होकर आप उठें। और उस पवित्र मन में भगवान का स्मरण करें। रात को सोने के पहले समझें -  हो सकता है मैं कल सुबह उठ जाऊँ। लेकिन ये पक्का है क्या ? थोड़ी देर जब तक नींद में रहूँगा , तो उतने समय कोई इन्द्रियाँ काम नहीं करेंगी। सब भूल जाऊँगा , तो सोना भी लगभग लगभग एक मृत्यु ही है। 
      तो नींद में जाने के पहले मुझे सत्य (आत्मा) को खोजना चाहिए , कि नींद में क्या रहता है (10 वां तू) साक्षी आत्मा रहता है , और नींद में क्या खो जाता है ? -, देह, इन्द्रिय , मन ,बुद्धि आदि दृश्य खो जाते हैं। यदि नींद में रहने वाले और न रहने वाले को मैं खोज लूँ; तो मैं मृत्यु से मुक्त हो जाऊँगा। क्योंकि मृत्यु और नींद में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है। जो नींद में सत्य को खोज लेगा , जो नींद का सदुपयोग करेगा , क्योंकि नींद में भी परिवार छूट गया था। नींद में भी देह, मन , इन्द्रियों की खबर नहीं थी। मन भी खो गया था। नींद में सिर्फ मुझे अपना होश नहीं था। जब जगत का होश चला जाये और अपना होश न खोये ! इसीका नाम समाधि है। (10:30) जगत से सम्बन्ध टूट जाये , और आत्मा का सम्बन्ध - आत्मभाव प्रकट हो जाये , यही ज्ञान है। यही मुक्ति है। जिसका सम्बन्ध नींद में टूट जाता है (मिथ्या देहाध्यास M/F जीव का ?) , उसीका सम्बन्ध मृत्यु में भी टूटता है।  जो नींद में छूटता है, वह मेरी मृत्यु में भी छूटता है। जो मृत्यु में छूटेगा , वही नींद में छूटता है। फर्क इतना है कि नींद से उठने वाला फिर उसी देह में आता है , मृत्युवाला नए देह में आता है। सत्य (आत्मा या परमात्मा) का अनुभव न नींद में जाने वाला करता है , न मृत्यु में जाने वाला करता है। जगत तो दोनों में समान छूटता है , लेकिन आत्मा की उपलब्धि में भी दोनों अवस्थाएं समान हैं। न नींद वाला अहं आत्मा को उपलब्ध होता है , न मृत्यु वाला आत्मा को उपलब्ध होता है। नींद मुझे दृश्यमान जगत से उस पार ले जाती है। नींद मुझे दुनिया से तो बचा लेती है , लेकिन वही नींद मुझे अपने मोह में फँसा लेती है। नींद में हम जगत के दुःखों से पार चले जाते हैं। लेकिन उस समय हम कौन है ? उस समय आत्मा का अनुसन्धान -स्मरण नहीं रहता। इसलिए कहा गया - 'जो सोवे सो खोवे, जो जागे सो पावे ! ' सोने वाला जगत को ही नहीं आत्मा को भी खोया हुआ है। आत्मा को कोई नींद वाला नहीं पा सकता। आत्मा की स्मृति को नींद में प्राप्त नहीं करता। नींद का साथ लेकर मैं चलूँ तो , नींद को भी छोड़ दूँ - मैं रह जाऊँ। मैं अकेला रह जाऊँ , न 'शरीर' का पर्दा न 'खुदी' का पर्दा (जीव भाव का पर्दा।)  
अपनी खुदी ही परदा है, दीदार के लिए। 
वरना कोई नकाब नहीं, यार के लिए।। 

'आत्मज्ञान' होने (बुद्धत्व-प्राप्ति में  ये देह पर्दा है - देहाभिमान - देहाध्यास -या जीवभाव (जाति-धर्म का M/F होना) पर्दा है। आत्मज्ञान में 'मैं हूँ !' यह जान सकता था , पर देह को पकड़ बैठा। 'देहोहं', 'देहोहं', 'देहोहं' (I am the body) यही मंत्र है हमारा। जैसे 'शवोहं'-'शवोहं'  आत्मा के बिना ये शरीर शव है। मैं M/F शरीर हूँ - यही जीवभाव आत्मा में बहुत बड़ा पर्दा है(14:05)  लेकिन जब 3H को उलट कर (Heart, Head, Hand) देखते हैं तब 'देहोहं' का भाव तो नहीं रहता 'देहोहं' (I am the body) यह मंत्र तो छूट जाता है , लेकिन शिवोऽहम् मंत्र की प्राप्ति सोहम मंत्र की अनुभूति नहीं होती। मैं चैतन्य हूँ , आत्मा हूँ , साक्षी हूँ , ब्रह्म हूँ -ऐसा कोई अनुभव नहीं होता। नींद से चलें तो यह सोचें कि थोड़ी देर बाद नींद हमें देह से ले जाएगी, इन्द्रियों से 'आँखों' से ले जायेगी। जहाँ आँख की जरूरत नहीं, कान की , जुबान की जरूरत नहीं वहाँ हम चलें। इनको छोड़ें (इन देह , इन्द्रिय , मन बुद्धि आदि दृश्य के मोह को छोड़ें) मर करके तो सब छोड़ते हैं। ऐसा नहीं कि मैं , या तुम। या यह या वह। हिन्दू, मुसलमान -ब्राह्मण-क्षत्रिय, पण्डित , ठाकुर , बनिया। साधु या गृहस्थ मर करके तो सब छोड़ते हैं। कोई ऐसा नहीं है , जो न छोड़े। मर कर के तो स्पर्श इन्द्रियसुख लेना सब छोड़ते हैं , जीते जी तू छोड़ ! 
 
मर करी के तो सब छोड़ते जीते जी तू छोड़,
       जग से नाता तोड़कर,  हरिसे नाता जोड़।
सो करके सब भूलते ,मर करके सब भूलते , जीतेजी तू भूल।
आत्मा में जाग जाय तू तो मिट जाएँ सब शूल 

इस जगत को भूल जा। ये मेरा है , ये तेरा है। इसे भूल थोड़ी देर के लिए हटा ख्याल। आत्मा में जाये तू तो सारे संसार के दुःख कष्ट मिट जायें। और इन्हीं की छूटने की तो पीड़ा है ? मौत क्या है ? मृत्यु का दुःख क्या है ? मृत्यु और करती क्या है ? जो तुमने अपना बनाया है , घर, मकान , दुकान ये सब छीन लेगी। यही तो पीड़ा है। पीठ स्पर्श का मालिश सुख छूटने के सिवा और कौन सी पीड़ा है , मरने के समय ? और जिसके छूटने की पीड़ा है , उसे जीतेजी , जागते-जागते छोड़ कर देख (16:46) देहाभिमान छोड़ दे , आँख छोड़ दे , कान छोड़ दे , ज्ञानेन्द्रिय विषयों को छोड़दे , कर्मेन्द्रियाँ छोड़ दे। मन छोड़ दे। इतना ही नहीं जगत का ख्याल छोड़ दे। जगत है , जगत तेरा है , जगत तू है ? ये सब ख्याल छोड़। और तू जाग कि - इनको छोड़कर तू मर गया ?? या तू है। एक बार भी यदि तू सब कुछ छोड़कर जिन्दा रह गया - तो एक सत्य तेरे हाथ आया कि मृत्यु में भी सब छोड़ कर मैं नहीं मरूंगा। (मैं मरणधर्मा शरीर नहीं हूँ।  अविनाशी आत्मा हूँ !) देह छोड़ना (देह का त्याग करना) मृत्यु है ही नहीं !! पर देह छोड़ना मृत्यु लगती है। इसी भ्रम को तोड़ने के लिए -ध्यान है , समाधि है , सत्संग, निर्वाण षटकम् अथवा आत्मषट्कम् स्तोत्र है ! देह छोड़ना जो मुझे मौत मालूम पड़ती है। इन्द्रियाँ छोड़ना तो मुझे ऐसा लगता है , जैसे हम अँधे हो जायेंगे , बहरे हो जायेंगे, लूले हो जायेंगे , लंगड़े हो जायेंगे। इन्द्रियाँ न होंगी तो जैसे मैं अपाहिज हो जाऊँगा ? बल्कि सच्चाई यह है कि यदि तुम्हारे पास , शरीर न हों, इन्द्रियाँ न हों।  तो तेरे पास कोई संकट ही नहीं है नेत्र हैं तो मैं अँधा होता हूँ , cataract का ऑपरेशन कराना पड़ता है। कान है तो मैं बहरा होता हूँ। देह है तो मैं बूढ़ा होता हूँ। देह है तो मैं मरता हूँ। देह नहीं होता तो , क्या मैं जवान -बूढ़ा होता ? देह नहीं होता , तो भूख-प्यास लगती ? देह नहीं होता तो कभी ठंढी-गर्मी लगती ? देह ने हमें दिया कुछ भी नहीं। देह ने हमें नुकसान पहुँचाया है। हाँ इस मनुष्य देह से कोई लाभ है तो वह सत्संग और विवेक। गुरुनानक देवजी कहते हैं -

भई परापति मानुख देहुरीआ ॥ 

गोबिंद मिलण की इह तेरी बरीआ ॥ 

मनुष्य का शरीर केवल यही एक चीज दे सकता है। नहीं तो मनुष्य शरीर में जन्म-दिया , बुढ़ापा दी , जवानी दी , यहाँ तक काम-क्रोध लोभ दिए। लोभ ने चोर बनाया। ठंढा-गर्म -मुलायम -रुखड़ा स्पर्श दिया। और क्या दिया शरीर ने ?  काम ने चरित्रहीन बनाया तुम्हारे स्मरण में अगर देह न हो , तो मौत का ख्याल होगा ? तुम मरने का ख्याल करके दिखाओ। जन्म तो क्या मौत दी है देह ने। इसलिए जन्म ही मृत्यु है। न होता जन्म , न आते देह में , न देहाभिमान होता , न मृत्यु होती। लेकिन देहाभिमान होने के पीछे भी एक कारण है , और वह है आत्मा का अज्ञान। आत्मा का ज्ञान होने के बाद तुम्हें देह में बिठा दिया जाये ? तो तुम देहाभिमानी नहीं बनोगे। (20:04)  
मिट्टी को अगर पहले अकल हो ? घड़े की शकल यदि बाद में दी जाये , तो मिट्टी घड़े की शकल में भी अपने को मिट्टी जान सकेगी। पहले मिट्टी हो फिर शकल बनाई जाये। आप अभी पुरुष हो , और आपको अभी स्त्रियों के कपड़े पहना दूँ - आप मेरे बनाने से स्त्री हो जायेंगे ? झूठ नहीं बोलना। तुम औरत होने का अभिनय कर सकते हो , औरत नहीं हो सकते हो। तुम अभी धनी हो , और मैं तुमको निर्धन के कपड़े पहनाकर मंच में लाऊँ ? तो आप निर्धन हो जाओगे ? आप को सर्दी नहीं हुई हो , और आपको सर्दी लगने की एक्टिंग करनी हो , तो आप अपनी समझ में कैसे बीमार हो जाओगे ? घड़ा पहले यह जानता हो कि मैं मिट्टी हूँ। फिर घड़ा बन जाये। तो घड़ा बनना नाटक होगा। मिट्टी होना उसकी असलियत होगी। लेकिन मिट्टी अंजान है , भोली है मिट्टी। जिसको अपना पता ही नहीं है कि मैं क्या हूँ ? पहले उसको घड़ा बना दिया जाये , फिर अकल/बुद्धि हो। तो वो अपने को घड़ा ही मान जाएगी। हमें अकल कब आयी ? जब मैं देह बन चुका था। देह पाने के पहले भी बुद्धि (अकल) थी ? (21:44) ऐसी कोई याद आपको ? किसी से पूछो ? सोने से पूछो ? गहना बनने के पहले तू क्या था ? तो गहना कहेगा -मुझे पता ही नहीं है। मिट्टी से पूछो - घड़ा बनने के पहले भी कुछ थी ? वो कहेगी मुझे पता ही नहीं। तुमसे पूछूँ , इस देह से पहले तुम कुछ थे क्या ? क्या थे , ये तो छोडो। तुम थे भी कि नहीं , ये भी तुम्हें पता नहीं है। देह मिलने के पहले आप थे ? यह आपको पता है ? आप कल थे यह आपको पता है। पिछले साल थे ये आपको पता है। कहाँ रहते हो ये आपको पता है। परन्तु इस देह में आने के पहले आप कहाँ थे ? क्या थे? कैसे थे ? कुछ भी पता नहीं है। और देह छोड़ने पर पता रहता नहीं है। यदि देह छोड़ने के बाद पता लगाने का यदि उपाय होता , तो मर कर के भी हम परमात्मा को जान लेते। ध्यान से सुने - शरीर छोड़ने के बाद यदि जानने का उपाय होता , तो मनुष्य शरीर की जरूरत ही नहीं थी। किसी शरीर को छोड़ते तो भगवान को जान लेते ? तब क्या था , शरीर छोड़ेंगे फिर आत्मा (ईश्वर या भगवान) को जान लूंगा। लेकिन जब घड़ा न होगा तो बुद्धि न होगी। घड़ा होगा तो घड़े की बुद्धि तो होगी, पर मिट्टी की नहीं होगी। मानवशरीर के अलावा जानने का कोई मौका है ही नहीं। शरीर धारण किये बिना तुमको आत्मा या ब्रह्म को जानने का कोई अवसर ही नहीं है। सो गए तो जानोगे ही नहीं। मानवदेह नहीं होगा तो अकल यानि विवेकी-बुद्धि भी नहीं होगी। तब भी तुम आत्मज्ञ या ब्रह्मज्ञ नहीं होंगे। और जब देह होगा तब बुद्धि होगी , और वो बुद्धि कैसी होगी ? देह हूँ तो M/F देह हूँ यही बुद्धि होगी। मोटे -पतले , बड़े-छोटे हैं यही बुद्धि होगी। गरीब-अमीर ये बुद्धि। मेरा जमीन इतना है , उसका मेरे जितना कुछ भी नहीं है। इसकी ही गिनती करते रहोगे और इसीको बुद्धि मानी समझोगे ? लेकिन देह हो पर देहाभिमानी बुद्धि न हो। देह रहते देह-बुद्धि का त्याग हो जाये। आत्मबुद्धि प्राप्त हो जाय , ब्रह्मबुद्धि प्राप्त हो जाये। साक्षीबुद्धि प्राप्त हो जाये। निर्गुण-निराकार बुद्धि प्राप्त हो जाये। साकार बुद्धि तो है (मैं M/F हूँ यह बुद्धि तो है) निरकार बुद्धि नहीं हैतुम निराकार हो ! तुम निराकार हो ! तुम निर्विकार हो ! तुम निरंजन हो , "शुद्ध," "निर्मल," "बेदाग," या "बुरे गुणों से रहित" हो , लेकिन तुम्हें ये पता ही नहीं है। हम आकार हैं , और हम बूढ़े हैं ? (Are we just shapes (रूप या ढाँचा), and are we old?) हम कमजोर हो गए हैं , और हम मर जायेंगे ? आत्मा (ईश्वर , भगवान, ब्रह्म, इष्टदेव, गुरु) निर्गुण -निराकार है। ब्रह्म ही नहीं तुम्हारी आत्मा भी निर्गुण-निराकार है। पर तुमतो आत्मा हो ही नहीं ? तुम तो देह (M/F-ब्राह्मण-क्षत्रिय) बने बैठे हो। जब से होश सम्भाला बुद्धि आयी , तबसे देह भाव ही रहा है। इसलिए मुझे जो अनुभव प्राप्त हुए वह देह सहित , इन्द्रियों सहित , मन सहित दुःख-सुख , मान -अपमान , हानि -लाभ , बस यही अनुभव मैंने संजोया है ? पर मैं यदि आत्मा हूँ , तो लाभ-हानि से रहित हूँ। plus minus कुछ नहीं हूँ। न मुझमें कुछ जुड़ता है , न निकलता है।  न कुछ मेरा बिगड़ता है। मेरा ऐसा कोई अनुभव है ही नहीं। क्या यह अनुभव तब होगा जब देह न होगा ? (25:44) देह जब छूट जायेगा , तब बुद्धि सही सलामत बची रहेगी ? और देह छोड़कर आप देखेंगे - हाँ !अब मैं आत्मा हो गया !! जब देह नहीं था , तब समझ गए थे ? देह के रहते ही मैं कौन हूँ ? यह समझने का अवसर है ! केवल इसीलिए -भई परापति मानुख देहुरीआ ॥  गोबिंद मिलण की इह तेरी बरीआ ॥  इसीमें में एक बात  पर और ध्यान दो - यदि यह देह मनुष्य का न होकर , गधे का होता , कुत्ते का होता ? बकरी -भेंड़ का होता ? कोई अन्य देह होता तो देह ही होते बस ! समझने की भी जरूरत न पड़ती। जीते -जवान-बूढ़े होते फिर मर जाते। केवल मनुष्य शरीर। चाहे तुम पापी ही क्यों न हो ? मनुष्य यदि सैंकड़ों गलतियाँ करता हो , परन्तु इस दुनिया में सच्चा भाग्यशाली कोई यदि है - तो वो मनुष्य है। कोई भी पशु भाग्यशाली नहीं है।  यदि तुम इतना ही सोचते हो कि मौज में रहना ही भाग्य है। तो कई कुत्ते बहुत ही मौज में रहते हैं। अमेरिका में तो कुत्तों की कीमत बहुत ज्यादा है। वहाँ परिवार में लड़के-लड़कियाँ नहीं रहते। लड़कों को बहुएँ ले गयीं , लड़कियों को दामाद ले गए। ये मत समझो की लड़के माँ-बाप के रहेंगे। 

ससुरारि पिआरि लगी जब तें। 

रिपुरूप कुटुंब भए तब तें॥

नृप पाप परायन धर्म नहीं।

 करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं॥3॥ 

(उत्तरकाण्ड)

जब से ससुराल प्यारी लगने लगी, तब से कुटुम्बी शत्रु रूप हो गए। राजा लोग पाप परायण हो गए, उनमें धर्म नहीं रहा। वे प्रजा को नित्य ही (बिना अपराध) दंड देकर उसकी विडंबना (दुर्दशा) किया करते हैं॥3॥
शादी हो गई तो उसकी सिटी में लड़का चलने लगा। बेटे की भी मजबूरी है , यदि बहु की न सुने तो कहेगी शादी क्यों की थी ? ओह इतनी बुरी बुरी बातें कहती हैं , कि वे बेटे ही जानते होंगे जिनकी बहु अच्छी मिलगई। अब रह गए दो। ब्याह के दिन दो हुए थे , अब मौत के दिन रह गए एक। जैसे अपने बनाया सब छूट जाये , तो उसके बाद भी तुम कुछ तो बचो। 
[ चित्त-अन्तःकरण-देह मिलने के पहले भी था क्या ? मैं नश्वर देह नहीं अविनाशी आत्मा हूँ यह ज्ञान कब आया ? आत्मसाक्षात्कार कब हुआ ?]
अच्छा देह छूटा की तुम ही खो गए ? होश गँवाकर भी तुम बचे की नहीं बचे ? देह मिलना ही जैसे तुम्हारा प्रारम्भ है। जैसे घड़े का जन्म मिट्टी का प्रारम्भ है? लहर जैसे पानी का प्रारम्भ है। और लहर की समाप्ति जैसे जल की समाप्ति है ? देह का प्रारम्भ ही क्या मेरा प्रारम्भ है ? देह का अंत जैसे मेरा अंत हो ? इसलिए भारत ने मरने के लिए बहुत अच्छे शब्द का प्रयोग किया है। अमुक व्यक्ति का देहान्त हो गया ! (31:01) पहले ये कहते थे , अब कहते हैं -मर गया। क्योंकि बुद्धि है नहीं। पहले आदमी समझता था देह प्राप्त होता है , देह का अन्त होता है। जब जल समझदार था , तब लहर का प्रारम्भ होता था। लहर का अंत होता है। घड़ा का प्रारम्भ हुआ , तो घड़े का अन्त होगा। मिट्टी का प्रारम्भ नहीं हुआ। गहना का प्रारंभ हुआ , सोना का प्रारम्भ नहीं हुआ। शरीर का जन्म होना जैसे आत्मा का प्रारम्भ हो गया ? और हमारा (आत्मा का) अन्त आ गया ? देह का अंत होगा, देह की मृत्यु होगी -देहान्त होता है। मनुष्य नहीं मरता , क्योंकि आत्मा का अन्त नहीं होतापशु मरता है , क्योंकि पशु के देह का अंत ही पशु का अंत है। वहाँ कोई आत्मा की समझ नहीं है। आत्मा बचती है या नहीं ? जिन मनुष्यों को इतनी सूझबूझ नहीं है , वे मनुष्य भी जानवर हैं। मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है , जो पैदा भी नहीं होता और मरता भी नहीं है। (32:28) मनुष्य का प्रारम्भ नहीं हुआ। मनुष्य देखता है , मेरा प्रारम्भ नहीं हुआ - मेरा अंत नहीं होता। इसीलिए मनुष्य के मरने को देहान्त कहा जाता है। अच्छा देह का अन्त हो गया , तो फिर उसकी आत्मा का क्या हुआ ? तो दूसरे लोग कहते थे -केवल देह का अन्त नहीं हुआ -हमारे पिता स्वर्गवासी हो गए। देहवासी नहीं रहे। देह के लोक में इस लोक में नहीं रहे , परलोक सिधार गए। एक शब्द ये भी था। मर गए नहीं - परलोक सिधार गए। भारत ने मृत्यु शब्द को छुआ ही नहीं। देहान्त हुआ उसका ? नहीं ! तो क्या हुआ ? स्वर्गवासी हो गए , परलोक सिधार गए। इस लोक से परलोक गए हैं। जैसे आप अपने घर से यहाँ सत्संग में आये हो। तो घर वाले क्या कहंगे ? मर गए ? कहेंगे मंदिर गए हैं। तो आप देह छोड़कर परलोक गए कि मर गए ? सोया हुआ आदमी को कहोगे -वो तो मर गए ? सोये को सोया कहो /जागे को जागा कहो। जैसे व्यवहार में सत्य बोलते हो , तैसे देह छूट गया है -उन्होंने देह छड़ दीत्ता ! देह छोड़ दिया -तो कहाँ गए ? ये आप सुनके बोलते हैं। चोला उतार दिया। जो सन्तों के सम्पर्क में आये हैं , वे ऐसा बोलते हैं। उनके अपने अनुभव नहीं हैं। मैं पैदा नहीं होता , मैं मरता नहीं हूँ , और मैं परिवर्तित नहीं होता। अविकारी हूँ। निरंजन हूँ। आत्मा हूँ। ये तो अनुभव करते ही नहीं हो। अच्छी बातें सुनकर बिना उसका अनुभव किये तोते की तरह हम उसका प्रयोग करते हैं। मैं आत्मा हूँ -इसका अनुभव भी करो। देह के आलावा क्या आत्मा नाम की कोई चीज है ? वह अभी देखें। घड़े में घड़े के आलावा मिट्टी है। मिट्टी है कोई चीज ? लहर में लहर के आलावा, पानी भी है कोई चीज ? अब आपकी दृष्टि ही बदल जाएगी। लहर में लहर लहर के आलावा, पानी भी कोई चीज है? अब आप ये पूछोगे पानी के आलावा लहर नामकी कोई और चीज है क्या ? आपका अनुभव ही अब उल्ट जायेगा। ब्रह्मसत्यं जगत मिथ्या ' अनुभव के बाद आत्मा के सिवा मन-बुद्धि नाम की और कोई चीज है क्या ? आत्मा के आलावा इन्द्रियां , देखना -सुनना कोई अलग वस्तु है ? आत्मा की सत्ता छोड़कर आँख खुद कुछ देख सकती है ? सोना हटा के गहना कोई बना लेगा ? यदि गहना अपनी सत्ता रखता है , तो सोने की सत्ता से अलग होकर गहना दिख जाये बन जाये ? मेरे बिना मेरी आँख कुछ देख सकती है ?  उपनिषद की कथा है - देवताओं को अहंकार हो गया कि राक्षसों पर हमने विजय पायी। तो ब्रह्म ने उनकी परीक्षा ली। परमात्मा ने परीक्षा ली। देवताओं के आगे तिनका रख दिया। अग्नि को कहा इसे जलाकर दिखाओ। सारी ताकत लगादी। तिनका नहीं जला। वैसे ही ये आँख , ये नाक , मेरे से अलग कर दी जाये। और देखने को कहा जाये। मेरा चस्मा क्या सबको देख लेगा ? या मेरी आँख में लगेगा , तब देखेगा ? चश्मा देखता है कि आँख? आँख से अलग होकर चश्मा देख लेता , तो सभी अंधे चश्मा लगा लेते। आँख , कान , नाक केवल यंत्र हैं , चश्मा या नाक आत्मा नहीं है। नेत्र स्वयं आत्मा नहीं है , नाक स्वयं आत्मा नहीं है , मन स्वयं आत्मा नहीं है।  (Intelligence itself is not consciousness.) बुद्धि स्वयं चैतन्य नहीं है अहंकार स्वयं आत्मा नहीं है। आत्मा के कारण अहंकार (M/F देह का अहं) जीवित होकर के मैं, मैं।मैं।मैं। करती है। और हम इन्हीं इन्द्रियों को ही आत्मा मानें देह को ही आत्मा मानें ? मैं को मैं न मानकर देह को 'मैं' कहे जा रहे हैं। (38:41) मैं को मैं न मानकर इन्द्रियों को मैं कहे जा रहे हैं। मन को मैं  कहे जा रहे हैं। और उसीके अनुसार स्त्री-पुरुष , बूढ़े-जवान मान रहे हैं। हम में अब ज्ञान कम हो गया ? वैसे चश्मा मैंने इतनी उम्र में कई बार बदल लिए। एक जेब डाल लेता हूँ। एक लगा लेता हूँ। सीसा घिस जाता है , तो फिर बदल देता हूँ। ऐसे ही बुढ़ापे में आँखे खराब हो जाती हैं , देह भी खराब होता है , फिर देह बदलना पड़ता है। नेत्र बदलने पड़ते हैं , कान बदलने पड़ते हैं। सब कुछ बदलता है। जो नहीं बदलता वो सिर्फ 'मैं ' नहीं बदलता है। सब -जीव-जगत दृश्य है परिवर्तन शील है -लेकिन आत्मा कभी नहीं बदलता। अपरिवर्तनीय आत्मा को कुछ नहीं चाहिएयदि तुम्हें नींद में जाना हो, तो अन्धे सो सकेंगे कि नहीं ? बहरे , गूंगे बिना इन्द्रियों के लोग भी सो जायेंगे। क्योंकि सोने के लिए इन्द्रियाँ नहीं चाहिए। इन्द्रियाँ चाहिए बाहर देखने के लिए। मुझे अपने जीने के लिए देह नहीं चाहिएलेकिन इस देह से यदि काम लेना है , तो शरीर को जीवित करके काम करने के लिए देह चाहिए। मुझे अपने लिए देह और इन्द्रियाँ कुछ नहीं चाहिए। सायकिल मोटर चाहिए बाहर जाने के लिए। लौटने के लिए भी वाहन चाहिए। लेकिन बेडरूम में जाने के लिए तो कार नहीं चाहिए। तुम जब आराम करते हो , उस समय आँख या कान में तो आराम नहीं करते। जैसे कोई व्यक्ति बाथरूम में नहीं सोता। आप बेडरूम में सोते हो। वैसे ही आप आँख में नहीं सोते हो। सोने के लिए कान और आँख छोड़ देना पड़ता है। अपने विश्राम को आंख नहीं चाहिए। इसीलिए देहाराम , इन्द्रिय-राम नहीं , विषयों में आराम नहीं , इन्द्रियों में आराम नहीं। देह में आराम नहीं होता , आराम तो देह छोड़ने में है। (41:44 ) छोड़कर देख लो आराम ही आराम है। लेकिन अज्ञानी देह छोड़ने को मौत समझते हैं।अज्ञानी का देहत्याग मौत है , और ज्ञानी के लिए देहत्याग परमानन्द प्राप्ति है। 
"जा मरने से जग डरे, मेरे मन आनंद। कब मरिहूँ, कब पाऊँ, पूरन परमानंद॥इसका अर्थ है कि संसार जिस मृत्यु (शरीर के नष्ट होने) से डरता है, संत के लिए वह परमात्मा से मिलने का एक आनंदमयी मार्ग है, जिससे पूर्ण परमानंद की प्राप्ति होती है। अभी भी किसी को देह छोड़ने की हिम्मत नहीं है। जब तक देह छोड़ने की हिम्मत नहीं , तबतक आप समझो की अज्ञानी हो। जिस दिन देह छोड़ना आनंद लगे , अभी सुनना है ,सुना है लेकिन ज्ञान नहीं है। सोने में आपको क्यों दुःख नहीं होता ? क्यों डर नहीं लगता ? आप नींद को खतरा मानते हो , कि मौत को ? और जितना आराम से सोओगे , उसके लिए ज्योत्षी नहीं पूछोगे , न किसी से। क्योंकि सोने में कोई खतरा मालूम नहीं पड़ता। ऐसे ही आराम से मरो ! बुरा नहीं मानो -समझाने के लिए कहता हूँ , भगवान न करें तुम कभी मरो। डॉक्टर जब कह दे कि अब तुम्हारा देह छोड़ने का time हो गया। तब कहो बहुत अच्छा हुआ -दुःख मिटा। जब तक जीवन है , तो दुःख है। यदि देह छूट गया तो कोई दुःख बचा ही नहीं। चिंता ही कोई नहीं। लेकिन अभी मन जाने को तैयार नहीं है। यही दुःख है। "जा मरने से जग डरे, मेरे मन आनंद। " ऐसे ही नहीं लिखा। कथा सुनने वाले भी डरते हैं , मंदिर जानेवाले भी डरते हैं। पूजा करने वाले भी डरते हैं , भाषण देने वाले भी डरते हैं।
 जिसने बोला था - "जा मरने से जग डरे, मेरे मन आनंद। " वो कोई गपोड़ा था क्या ? क्या केवल कबिता लिखता था ? ऐसे ही लिख दिया ? बताओ क्या जा  मरने से जग डरे, तेरे मन में आनंद है ? क्या आपके मन में भी मरने का तो कोई भय नहीं है ? डॉक्टर जब जवाब देदे फिर भी उसे बधाई दो ! आज आशीर्वाद देता हूँ कि तुम्हें अच्छी नींद आएगी। स्वप्न रहित अच्छी नींद आएगी। तो ये श्राप है कि वरदान ? ये वरदान है , आशीर्वाद है। ऐसे ही मैं कहूं -कि जब तुम्हारा शरीर छूटेगा तब जैसे हाथी की पीठ पर रखा हौदा उसकी पीठ से गिर जाती है , तो हाथी को कोई तकलीफ है ? और रखी भी है , तो भी इतना बड़ा बोझ नहीं है। शरीर है तो है , गया तो गया। अपना कोई चुनाव नहीं है(46:13) जैसे साँप की केचुली छूट जाती है। तो साँप खुश हो जाता है। ऐसे ही ज्ञानी शरीर छोड़कर खुश हो जाता है। अच्छा धनी लोगों के पास यह शरीर छोड़ने की विद्या होती है कि नहीं ? अच्छा बहुत ऊँची डिग्री वालों के पास ये विद्या होती है क्या ? अच्छा जो श्लोक रट लेते हैं, उनके पास ये विद्या होती होगी या नहीं ? ये विद्या , ये योग , ये विज्ञान, कि शरीर छोड़ने पर भी यह अनुभव करूँ - कि थोड़ी देर के लिए मैं ने आँख छोड़ दी। कान छोड़ दिया , सुनना,  देखना सूंघना , जानना होश में छोड़ दिया। होश पूर्वक छोड़ा , बेहोश होकर नहीं छोड़ा। निर्वाणषटक के ध्यान में -समाधि में सब छोड़ा और देखा वहां असीम -आनंद थाएथेंस के सत्यार्थी ने जिस सत्य को देखा - वहाँ देह, इन्द्रिय , मन, बुद्धि की पहुँच नहीं है। मैं जहाँ गया था , वहाँ यह आँख नहीं थी - मैं वहाँ भी हूँ जहाँ आँख है। 

"न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः" केनोपनिषद (1.3) 

 वहां (ब्रह्म/आत्मा तक) न आँख पहुँच सकती है, न वाणी, और न ही मन। इसका तात्पर्य है कि परम सत्य इंद्रियों, मन और वाणी की पहुँच से परे है। जहा यह आँख है , मैं वहाँ पर भी अभी हूँ , लेकिन मैं वहाँ भी गया था , जहाँ आँख नहीं थी। सोना वहाँ भी है , जहाँ गहना है। पर सोना वहाँ भी है , तब भी है जब गहना नहीं था। मैं देह में भी हूँ , मैं इन्द्रियों में भी हूँ , मैं मन में भी हूँ और 'वहाँ भी था' -' था ' ऐसा 'अभी' कहता हूँ। अभी सिर्फ देख कर आओ , मैं तब भी था जहाँ आँख नहीं थी। ये तुम भी अनुभव करो। 
 "न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः" वहां (ब्रह्म/आत्मा तक) न आँख पहुँच सकती है, न वाणी, और न ही मन। यह श्लोक बताता है कि जिस ब्रह्म (विष्णुपद श्री रामकृष्ण) की उपासना की जाती है, वह आंख, कान या मन का विषय नहीं है, अपितु उन सबको प्रकाशित करने वाला प्रकाशक है। आँख नहीं जाती , वहाँ कान नहीं जाते , वहाँ मन नहीं जाता - नो मनो ! न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः। न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात्। वहाँ बुद्धि नहीं जाती है , लेकिन आप होते हैं ! न विद्मो न विजानीमो: हम नहीं जानते और न ही यह जान पाते हैं कि 'यथैतदनुशिष्यात्:'  उसे कैसे शिष्यों को उपदेश दिया जाए (अर्थात उसे वाणी या तर्क से समझाना अत्यंत कठिन है)। एक बार वहाँ जाओ , जहाँ ये नहीं होते हैं; लेकिन आप होते हैं। बस समझो कि मौत से छुट्टी , दुःख से छुट्टी , चिंता से छुट्टी। क्योंकि मैं वहाँ था , जहाँ ये कोई नहीं थे। और मौत कहाँ तक आती है ? बुढ़ापा कहाँ तक आता है ? (49:24) आँखों में आता है , शरीर में आता है। कानों में आता है। दिमाग में आता है। सब में बुढ़ापा आता है। इन्हीं में बुढ़ापा आता है , इसीमें काल आता है। काल की गति यहीं तक है। वो आत्मा (ब्रह्म) तो अकाल पुरुष है। आत्मा निरंकार है। निर्मोह निर्वैर अकाल मूरत अजूनी है। वो जन्मा नहीं है। जो कहते हैं राम जूनि आया। नासमझ हैं।  परमात्मा जूनि नहीं आया , परमात्मा अवतार साधारण मनुष्यों जैसा पैदा नहीं हुआ। आत्मा (परमात्मा) पैदा नहीं होता। आप तो जानते हो कि वो ऊपर में कहाँ रहता है ? जो आत्मा पैदा नहीं हुआ वो कहाँ रहता है ? (50:29) जो अजन्मा , अविनाशी है , जो सदा निर्लेप है , वो कहाँ रहता है ?  नौवें गुरु, श्री गुरु तेग बहादुर जी कहते हैं -
काहे रे बन खोजन जाई।
सर्व निवासी,  सदा अलेपा;  तोही संगि समाई॥
पुहप मधि जिउ बासु बसतु है, मुकर माहि जैसे छाई।
तैसे ही हरि बसे निरंतरि, घट ही खोजहु भाई॥  

नौवें गजी गुरुजी कहते हैं कि ईश्वर 'सर्व-निवासी' हैं—वे सब जगह मौजूद हैं और हमेशा 'अलेपा' (अप्रभावित/निराकार) रहकर भी आपके साथ ही समाए हुए हैं। जैसे सुगंध फूल के अंदर और परछाईं आईने में होती है, वैसे ही 'तोही संगि समाई' ईश्वर आपके भीतर ही हैं, उसे बाहर खोजना व्यर्थ है। कोई कुमार , कोई कुमारी-  जाने कहाँ -कहाँ खोजने जाते हैं। यह अभिव्यक्ति अक्सर अकेलेपन (कोई कुमार) या फिर किसी पवित्र/अविवाहित (कुमारी) के संदर्भ में उपयोग की जाती है। "कुमारी" शब्द का अर्थ  कन्या भी है, जिसे नेपाल में कुमारी जात्रा त्योहार के दौरान देवी के रूप में पूजा जाता है। गुरु महाराज जी सीधी -साफ बात कहते हैं। उनका ज्ञान यही है कि आत्मा को (ईश्वर या भगवान) को बाहर या अंदर एक ही जानो। जब तक जीव खुद को (आपा-ज्ञान) नहीं पहचानता, तब तक उसके मन का भ्रम नहीं मिटता। काहे रे बन खोजन जाई।
सर्व निवासी,  सदा अलेपा;  तोही संगि समाई॥ कई लोगों ने तो यही सिद्ध करने में अपनी पूरी ताकत लगादी है कि आत्मा (परमात्मा) सर्वव्यापक हो ही नहीं सकता है। परमात्मा सर्वत्र नहीं है। और तर्क क्या ? सर्वत्र होता तो नापदान में भी होता। [कुछ विचारों (जैसे ब्रह्माकुमारी मान्यता) के अनुसार, परमात्मा सर्वव्यापी नहीं, बल्कि एक दिव्य सत्ता है जो ऊपर परमधाम में रहती है। इस मत के अनुसार, यदि वे कण-कण (नापदान, चोर-डाकू) में होते तो उन्हें 'पतित-पावन' कहना अनुचित होता और उनके लिए अवतार की आवश्यकता नहीं होती। नाबदान में होता तो बदबू में कैसे रहेगा ? जहाँ नाक नहीं होती , जो बिना नाक का है , वहाँ बदबू रहेगी ? जो बिना आंख का है न, उसे क्या कुछ देखना है ? वो आत्मा तो चैतन्य है ! (51:44 ) वह 'सर्व निवासी,  सदा अलेपा;  तोही संगि समाई॥ वो तेरे संग है - तूँ प्रारब्ध वश जहाँ कहीं और जिस अवस्था में भी है , वो वहीँ है ! तू जरा जाग। पहले देख तूँ -आँख छोड़ , कान छोड़। देह छोड़ , मन छोड़। संकल्प-विकल्प छोड़। आराम कर। तू जाग।  और तूँ जब इनसे रहित होगा। तो इनसे रहित वो आत्मा है। तो इनसे रहित तूँ हो गया। परमात्मा विकारी नहीं है , अलेप है।  और तूँ ने इनको छोड़ा तो तूँ कैसा मिला ? अलेप , निर्विकारी , निरंकार। तूँ भला इन्द्रियों का विषय है ? इन्द्रियाँ तेरी विषय हैं। ये सब तेरे विषय हैं , तूँ  इन विषयों को जान।  ये आंख-कान -नाक इस आत्मा को क्या जानेगे ? और आत्मा तो स्वयं चैतन्य देव है। इसलिए इस आत्मा का अनुभव कर। और  पहले जीतेजी मस्त हो जा ! शरीर रहते , इन्द्रियाँ रहते , थोड़ी देर उस पार की यात्रा कर आ। देख आ क्या है , वहाँ का नजारा ? 
"हम वासी वा देश के, जहां पारब्रह्म का खेल।
'दिया जले अगम का', बिन बाती बिन तेल।।" 
कबीर कहते हैं कि मैं उस (अमर/अलौकिक) देश का निवासी हूँ, जहाँ केवल परब्रह्म (निराकार परमात्मा) का ही खेल या दिव्य लीला रची जाती है। वहाँ ज्ञान और प्रकाश का एक ऐसा दीपक (अगम) जल रहा है, जो बिना रुई की बत्ती और बिना तेल के ही निरंतर प्रकाशमान है। यह साखी आत्मा की अमरता और ईश्वर के अनुभव के लिए सांसारिक साधनों की आवश्यकता न होने को दर्शाती है। यह ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक है।    

इस सत्य को तूँ एकबार देख ले। सुमिरन में देख। छोड़ इन आँखों को। आँख को बंद कर। 

आँख नाक मुख मूँद के नाम निरंजन ले, 

भीतर के पट तब  खुलें,  जब बाहर के पट दे। 

ये बाहर की आँख बंदकर  , कान में रुई लगा। मुख बंदकर। घुड़दौड़ मत कर। जुबान से भी उनका नाम मत ले। यद्यपि प्रारम्भ में मुँह से बोल ले। बाद में उनका भजन करते समय , जिह्वा भी नहीं हिलेगी। जबान से जब बोलेगा तो जबान छोड़ेगा कैसे ? तुझे तो जुबान छोड़नी हैं। आंख छोड़नी है। मुख भी मांस की ही बनी है। नाम निरंजन लेना है , तो इससे नहीं लेना है। आँख नाक मुख मूँद के नाम निरंजन ले ! कैसे लेवें निरंजन नाम ? बिना जीभ हिलाये। भीतर के पट तब  खुलें,  जब बाहर के पट दे। अंदर के पट तब खुले जब बाहर के पट दे। हाथ से भी न जाप कर। जुबान से भी नहीं जाप। और आगे चलके मन से भी नहीं। निरंजन ही निरंजन का नाम ले !(54 :47)  मन नहीं अमन हो जा। मन रहित हो जा। जैसे लहर पानी का जाप न करे। लहर ही न रहे तो फिर पानी का जाप क्या? लहर तो हो ही गयी पानी ! लहर खोई -जल हुआ। 
सूरज किरणि मिली , जल का जलु हूआ राम।।
जोती जोति रली, संपूरनु का जल हुआ राम।।
राम रूपी ब्रह्म में सूरज की किरण मिली , तो अब क्या होगया ?  जल था पहले , बर्फ बनने के पहले क्या था ? जल ? तो सूरज की किरण मिली , जल का जल हुआ राम। ऐसे ही ज्ञान से -ध्यान से चेतन का चेतन हो गया। 
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⚜️️🔱जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति क्या है ? ।। Yug-Purush ।। What is Jeevan Mukti and Videha Mukti ?⚜️️🔱

 "चींटी के पग नूपुर बाजे सो भी साहब सुनता है।" 


जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति क्या है ? 

[।। Yug-Purush ।। What is Jeevan Mukti and Videha Mukti ?] 

जीतेजी मुक्ति या भगवत-पाप्ति कोई ऐसी चीज नहीं है , जो किसी परलोक में पहुँचने से मिलती है। मुक्ति तो जब होगी इसी जीवन में होगी। जब कभी हो , मरने के बाद नहीं जीवित रहते ही मुक्ति होती है। मुक्ति के लिए दो शब्द है, एक शब्द है जीवनमुक्ति - ('निश्चल तत्त्वे जीवनमुक्ति)।' और दूसरा शब्द है विदेहमुक्ति। अर्थात देह का न रहना। विदेहमुक्ति का अर्थ है जीतेजी जो मुक्त है , उसका देह न रहना। जीवनमुक्त है उसका देह छूटना अभी बाकी है। मानसिक तौर से तो वो मुक्त हो गया, पर शरीर का अभी जेल से बाहर आना बाकी है। जैसे जेल में बन्द कैदी कोर्ट से छूट गया , पर अभी जेल के भीतर ही है। मानसिक तौर से तो वो मुक्त हो गया पर शरीर और व्यक्ति का जेल से बाहर आना बाकी है। शरीर के रहते हुए जो ज्ञान को उपलब्ध हो गए वो मुक्त हो गए। अब रह गया उसके शरीर का छूटना। इसी तरह शरीर , इन्द्रिय , मन, बुद्धि के रहते हुए जो आत्मज्ञानी हो गया , गुणातीत हो गया वो मुक्त हो गया पर   
जीवनमुक्त होकर भी अभी शरीर में रहना पड़ेगा। ज्ञान होने के बाद एक ही दिन में नहीं जाने वाला है , ये शरीर। इसमें अभी 10 वर्ष , 50 वर्ष रहना है। जीवन्मुक्त को शरीर में अभी रहना पड़ेगा। जो कोई भी ज्ञानी जन (महापुरुष) मुक्त हुए , महर्षि रमण , अरविन्द , रामतीर्थ, आदिगुरु शंकराचार्यजी जैसे जितने भी ज्ञानी हो गए हैं , वे सभी जीवनमुक्त हैं , पर अभी शरीर में रहना पड़ेगा। शरीर में रहने से कुछ कष्ट तो होंगे। यदि आपका जो वास्तविक मैं है (Real I -आत्मा) है वो ब्रह्म के साथ चला गया , हो आया। पर अब वह फिर देह में आएगा - दुकान जायेगा। लेकिन अब आपको गुरुमंत्र लेने की जरूरत नहीं रहेगी। उसी तरह कोई ज्ञानी एक बार ब्रह्मता को प्राप्त हो गया , तो बस होगया। अब रास्ता (इष्टदेव का नाम) दिखाने वाला नहीं चाहिए। देह में आएगा , देह में रहेगा , फिर वापस जायेगा। पर एक दिन देह ही नहीं रहेगा। अभी तो देह में आएगा , लौट जायेगा अपने घर ? परमात्मा से जुड़ता रहेगा , पर एक दिन देह ही नहीं रहेगा। पर जब तक देह है , नींद से या ध्यान (समाधि?) से वापस आना पड़ता है, इन आँखों में इन हाथों में। यदि देह न रहे तो स्वप्न भी नहीं देख सकते। लेकिन जब शरीर ही न रहेगा मृत्यु के बाद तब उसको इस शरीर में आने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन जो आमलोग हैं - जो जीवनमुक्त नहीं हुए हैं , वे फिर नया शरीर प्राप्त करेंगे। अभी उनके कर्म भोग हैं , उसे भोगने पड़ेंगे। मृत्यु के बाद एक लौटता है , एक नहीं लौटता। जो  देह नहीं रहने के बाद, देह में नहीं लौटते वे विदेह मुक्त हो गए। (10:41) जो आते हैं , वो मुक्त नहीं हैं वासना वाले हैं। एक का आना  और एक का दुबारा देह में न आना वो निर्भर है , अभी की हमारी सोच पर। जिसमें वासना है , भोगने के लिए आना चाहता है , तो आ जायेगा। सभी लोग मुक्ति भी नहीं चाहते हैं, क्योंकि वे बंधन में हैं -इसका उन्हें बोध ही नहीं है। असल में हमारे अन्तःकरण में तीन गुण-सतोगुण , रजोगुण , तमोगुण हैं , जो शरीर रहने तक काम करते हैं। शरीर में रहने तक सोना और जागना होता रहेगा। शरीर रहने तक आपको इन गुणों के अधीन रहना पड़ेगा। बूढ़ा होना नहीं चाहते हो , पर बूढ़ा होना प्रकृति का नियम है , तुम्हारी इच्छा से क्या होगा ? शरीर ही न रहेगा तो बूढ़े भी नहीं होंगे। मानलो अगला जन्म ही न होगा तो बूढ़े कैसे होंगे ? तो ये अध्यात्म और सत्संग (गुरु- शिष्य) भी एक Science है - एक विज्ञान है। पर इस विज्ञान को यदि उपलब्ध नहीं कर सकते हो ,  तो दूसरा सिद्धांत है -  कर्म का सिद्धान्त है -जो करोगे सो भरोगे। बुद्धि/ मति या दृष्टि में जैसी इच्छा, वासना वाले और कर्म वाले होंगे, वैसी गति होगी - वैसी अगली यात्रा होगी। 
    इसलिए आम आदमी अगर विज्ञान (अतीन्द्रिय ज्ञान) न प्राप्त कर सकें , तो अच्छे कर्म करें। धर्म पूर्वक चलें। नहीं तो ज्ञान के बाद भी प्रारब्ध भोग कर ही नष्ट होता हैं। हमारी वासना अच्छी होगी तो अगला जन्म अच्छा होगा। अगला जन्म इस जन्म के सद्कर्मों पर निर्भर है। बुरे काम छोड़ना चाहिए, नहीं तो उसका फल भोगना पड़ेगा। इस जन्म में जिन संकटों का सामना करना पड़ा , वो क्यों करना पड़ा ? ये तुम्हारे ही किसी कर्म के फल हैं। सुख और दुःख देने वाला कोई दूसरा नहीं है। मेरे ही कर्मों के फल हैं। इसलिए आज से कर्मों के प्रति सावधान हैं , तो आगे ठीक होगा। भविष्य को अगर ठीक करना है , तो आज को ठीक करना होगा।  हमारा जो आज का जीवन है वो हमारा निर्माण किया हुआ है। जिसके बीज हमने पहले बोये थे , वो आज काट रहे हैं।इसलिए आगे हमेशा पवित्र कर्म ही करो , इसके लिए सावधान रहना होगा। (18:24) जप-ध्यान या सद्कर्म (Be and Make) मुक्ति के लिए नहीं करें , तो अगले जन्म के लिए करें। और मुक्ति के लिए तो कर्म की बात है ही नहीं।
 
न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।

बहुत कर्मों से , बहुत सन्तानों से मोक्ष नहीं होता। बल्कि मुक्ति केवल आत्मज्ञान से होती है। (मिथ्या मैं के त्याग से होती है।) भोग ही अगर चाहिए तो अच्छे कर्म करो। कई लोगों को इस जन्म में मिला हुआ है , पहले जन्म में अच्छा किया होगा। इस जन्म में सुख-सुविधा मिली है तो पहले जन्म में अच्छा किया होगा। (22:39)    
 हर व्यक्ति को पहले कर्म करने में धर्मात्मा होना चाहिए। अच्छा है दुःख -अपमान मिला तो जो प्रारब्ध था वो कट गया। एक गलत काम से यदि दुःख हुआ तो हमको प्रेरणा मिली कि आगे से कोई गलत काम नहीं करूँगा। जिसका बछड़ा उसी गाय की तरफ जाता है। पुराना किया हुआ कर्मफल आत्मज्ञानी को भी भोगना पड़ेगा। (26:08) ज्ञान इसलिए प्राप्त नहीं करते कि हमें माफ़ किया जाए , बल्कि इसीलिए कि हमें अगला जन्म -हो तो पिवत्र-त्रयी के साथ ही हो। जीव का जन्म प्रारब्ध भोगने के लिए होता है , अवतार वरिष्ठ या पवित्र -त्रयी का जन्म लोकहित के लिए होता है। या नेता को कथा सुनाने का काम मिलता है। शरीर का जो होना है , होगा। हमें जो करना चाहिए वो पवित्र कर्म करते चलो। परिवार जैसा मिला है , वो मिला है। कर्म से मिला है। अच्छे कर्म करो या ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके आवागमन से मुक्त हो जाओ। इसलिए हम फिर लेना पसंद ही न करें। हम ही परमात्मा में समा जाएँ -ब्रह्मलीन हो जाएँ। पवित्र -त्रयी से अलग मेरा फिर कभी कोई अस्तित्व ही न हो। (32:21) श्रद्धा के साथ जप करें। तो इसका परिणाम भी अच्छा आएगा। पवित्र त्रयी के सिवा कुछ न चाहो। जो होना है होगा -सब छोड़ दिया भगवान पर। प्रकृति पर छोड़ दिया , परमात्मा पर छोड़ दिया , ग्रहों पर छोड़ दिया, प्रारब्ध पर छोड़ दिया। जो होना है हो जायेगा , फिर तुम्हें क्या करना है ? जप यज्ञ करते रहो। जपात सिद्धिः - जप से सिद्धि प्राप्त होगी। प्रभु का स्मरण , जब तक शरीर है हमें श्रद्धा पूर्वक स्वामीजी का काम करना है Be and Make में लगे रहना है।
   दो तरह के भगवान - एक जो भक्त को दीखते हैं , दूसरे जो भक्त को देखते हैं। भगवान तुम्हें इस समय देख रहे हैं। (37:28) भगवान तुम्हारे जप के साक्षी हैं। गवाही हैं। वो तुम्हें देख रहे हैं , तुम्हें नहीं दिख रहे हैं।  "चींटी के पग नूपुर बाजे सो भी साहब सुनता है।" साहेब से कुछ छिपा नहीं है। जो जाप को देख रहा है , उस परमात्मा में तुम लीन हो जाओ। जो सदा निराकार , निर्विकार हमारे मन का सदा साक्षी है ,सदा अन्तर्यामी है वो हमारे मन में ही है।  
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