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बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

⚜️️🔱" ईसा का पुनरागमन कब होगा?" ⚜️️🔱 When Will Christ Come Again? ⚜️️🔱 मनुष्य और ईसा में अन्तर (The Difference Between Man and Christ) ⚜️️🔱क्या ईसा और बुद्ध एक हैं ? (Are Christ and Buddha Identical?) ⚜️️🔱

 " ईसा का पुनरागमन कब होगा?"

[When Will Christ Come Again?]  

 एक बार अमेरिका में स्वामी विवेकानन्द से पूछा गया कि - " ईसा का पुनरागमन कब होगा?"

     उत्तर में उन्होंने कहा " मैं ऐसी बातों पर विशेष ध्यान नहीं देता। मुझे तो (सनातन) सिद्धान्तों -का विवेचन करना है।  मुझे तो केवल इसी बात की शिक्षा देनी है कि - ईश्वर बार बार आता है वह भारत में राम , कृष्ण और बुद्ध के रूप में आया था और पुनः आयेगा ! यह देखा जा सकता है कि प्रत्येक 500 वर्षों के पश्चात दुनिया नीचे जाती है, (धर्म का पतन होता है), और एक महान आध्यात्मिक लहर आती है और उस लहर के शिखर पर एक 'ईसा' होता है। 

समस्त संसार में एक बड़ा परिवर्तन होनेवाला है और यह एक चक्र जैसा है। लोग अनुभव करते हैं कि जीवन पकड़ से बाहर होता जा रहा है। वे किधर जायेंगे ? वे किधर जायेंगे ? नीचे या ऊपर ? निस्सन्देह, ऊपर। नीचे कैसे ? खाई में कूद पड़ो।   उसे अपने शरीर से , जीवन से पाट दो। जब तक तुम जीवित हो , दुनिया को नीचे क्यों जाने दो ? (१०/४०) 

[खाई में कूद पड़ो। = देश-काल -निमित्त से परे हो जाओ , देह भाव का अतिक्रमण करो। श्रीकृष्ण गीता में ऐसा कहते हैं कि जो मुझे समझ गया या जो भक्त मेरे परायण हो गया, वो दोबारा लौटकर नहीं आता है ? इसका क्या मतलब है? अगर लौटकर के आना, माने जन्म लेना बड़ी खूबसूरत बात होती, बड़े पुण्य की बात होती, बड़े आनन्द की बात होती, तो सब सन्त यही इच्छा क्यों करते कि हमें नहीं पैदा होना? ]   

[When Will Christ Come Again? I never take much notice of these things. I have come to deal with principles. I have only to preach that God comes again and again, and that He came in India as Krishna, Rama, and Buddha, and that He will come again. It can almost be demonstrated that after each 500 years the world sinks, and a tremendous spiritual wave comes, and on the top of the wave is a Christ.

There is a great change now coming all over the world, and this is a cycle. Men are finding that they are losing hold of life; which way will they turn, down or up? Up, certainly. How can it be down? Plunge into the breach; fill up the breach with your body, your life. How should you allow the world to go down when you are living? 

[Notes Of Class Talks And Lectures/ Volume 8,pg 179]

" अभिव्यक्त प्राणियों में बहुत अन्तर होता है। अभिव्यक्त प्राणी के रूप में तुम ईसा कभी नहीं हो सकते। मिट्टी से एक मिट्टी का हाथी बना लो , उसी मिट्टी से एक मिट्टी का चूहा बना लो। उन्हें पानी में डाल दो - वे एक बन जाते हैं। मिट्टी के रूप में वे निरन्तर एक हैं, गढ़ी हुई वस्तुओं के रूप में वे निरन्तर भिन्न हैं। ब्रह्म (चेतन) ईश्वर तथा मनुष्य दोनों का उपादान है। पूर्ण सर्वव्यापी सत्ता के रूप में हम सब एक हैं , परन्तु वैयक्तिक प्राणियों के रूप में ईश्वर अनन्त स्वामी (मायाधीश) हैं और हम शाश्वत सेवक (मायाधीन) हैं।  

"तुम्हारे पास तीन चीजें '3H'  हैं- 1. शरीर, 2. मन 3. आत्मा! आत्मा इन्द्रियातीत है। मन जन्म और मृत्यु का पात्र है और वही दशा शरीर की है। तुम वही आत्मा (अविनाशी-चेतन ) हो, पर बहुधा तुम सोचते हो की तुम शरीर (आकर ) हो। 

जब मनुष्य कहता है- 'मैं यहाँ हूँ',  तो उस समय वह शरीर की बात सोचता है। फिर एक दूसरा क्षण आता है , जब तुम उच्चतम भूमिका में होते हो, तब तुम यह नहीं कहते - " मैं यहाँ हूँ ! " किन्तु जब कोई तुम्हें गाली देता है, या तुम्हारा अपमान करता है, और तुम भीतर से क्रोधित नहीं हो जाते, तब तुम आत्मा हो जब मैं सोचता हूँ कि मैं मन (निराकार) हूँ , मैं उस अनन्त अग्नि का एक स्फुलिंग हूँ , जो तुम हो। जब मैं यह अनुभव करता हूँ कि मैं आत्मा (चेतन) हूँ , तब तुम और मैं एक हूँ -यह एक प्रभु के भक्त का कथन है। क्या 'मन' (बुद्धि) आत्मा से भी श्रेष्ठ है ? " (खंड 10. पृष्ठ 40) श्री हनुमानजी का कथन हैं -

देहबुद्धया तु दासोऽहं  जीवबुद्धया त्वदंशक। 

आत्मबुद्धया  त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः ॥ 

देह-बुद्धि से तो मैं आपका दास हूँ। जीव-बुद्धि से (निराकार से साकार बने M/F दृष्टि से देखता हूँ) तो आप पूर्ण हैं और मैं आपका अंश ही हूँ ! और आत्म-बुद्धि से मैं वही हूँ जो आप हैं, यही मेरी निश्चित मति है॥ यह प्रभु श्रीराम के महान भक्त हनुमानजी का कथन है।  ॐ !]

[You have three things in you: (1) the body, (2) the mind, (3) the spirit. The spirit is intangible, the mind comes to birth and death, and so does the body. You are that spirit, but often you think you are the body.

When a man says, "I am here", he thinks of the body. Then comes another moment when you are on the highest plane; you do not say, "I am here". But if a man abuses you or curses you and you do not resent it, you are the spirit. "When I think I am the mind, I am one spark of that eternal fire which Thou art; and when I feel that I am the spirit, Thou and I are one"-- so says a devotee to the Lord. Is the mind in advance of the spirit? 

There is much difference in manifested beings. As a manifested being you will never be Christ. Out of clay, manufacture a clay elephant, out of the same clay, manufacture a clay mouse. Soak them in water, they become one. As clay, they are eternally one; as fashioned things, they are eternally different. The Absolute is the material of both God and man. As Absolute, Omnipresent Being, we are all one; and as personal beings, God is the eternal master, and we are the eternal servants.   

 "When I think I am the mind, I am one spark of that eternal fire which Thou art; and when I feel that I am the spirit, Thou and I are one"-- so says a devotee to the Lord. Is the mind in advance of the spirit? (Volume 8- page 181)]

बुद्धि और विवेक में क्या अन्तर है ? (What is the difference between intelligence and wisdom?)  

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।

मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः।।  

(गीता 3:42)  

सिद्धान्त है कि स्थूल से अधिक शक्ति सूक्ष्म में होती है। मनुष्य की इन्द्रियाँ शरीर से अधिक सूक्ष्म होने के कारण, शरीर से अधिक बलशाली हैं। इन्द्रियों से भी सूक्ष्म है मन। इसलिए मन इन्द्रियों से अधिक बलशाली है। मन से भी सूक्ष्म है -बुद्धि।  इसलिए बुद्धि मन से अधिक शक्तिशाली। लेकिन जड़ है , इसलिए बुद्धि भी कभी देह और इन्द्रियों से जुड़ जाती है, और यह मूढ़बुद्धि सम्मोहित होकर चिज्जड़-ग्रंथि में फंस जाती है। इसलिए अपने से श्रेष्ठ और अविनाशी चेतन -आत्मा के साथ अपना सम्बन्ध नहीं जोड़ पाती - इसलिए जीव जन्म-मृत्यु के चक्र में फंस जाता है। 

 इसी अवस्था को समझाने के लिए , गीता और कठोपनिषद में शरीर के तुलना रथ (कार) से गयी है। शरीर रथ है , इन्द्रियाँ घोड़े हैं , मन लगाम है , बुद्धि सारथि है और मन लगाम है। आत्मा रथी है। यदि सारथि मूढ़बुद्धि (मूढ़मति)  हो और चेतन आत्मा (सच्चिदानन्द) को धोखा देकर मन के लगाम को ढीला छोड़कर, इन्द्रियों और शरीर से जुड़ी जाएगी ,तो रथी आत्मा (कार का मालिक) अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पायेगा। और उसकी जैसी मती वैसी गति होती है। 

इसलिए सनातन हिन्दू वैदिक धर्म के समस्त  शास्त्र और शंकराचार्यजी जैसे सद्गुरु "जीव, जगत और ईश्वर " के एकत्व (Oneness) बारे में हमारी दृष्टि (मति, बुद्धि या सोंच) को बदलने के लिए हमें यह शिक्षा देते हुए कहते हैं  - 

श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रंथ कोटिभिः।

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।। 

जो अनेक ग्रंथों में लिखा है । उसे मैं आधे श्लोक में यहां कह रहा हूं - ब्रह्म सत्य है । जगत मिथ्या है । तथा जीव ब्रह्म ही है । कोई अन्य नहीं । इसीको नित्य-अनित्य विवेक कहते हैं , जो मनुष्य-शरीर की विशेष योग्यता है। क्योंकि गुरु-शिष्य परम्परा में विवेक-जागृत करने का अवसर केवल मनुष्य-शरीर में ही प्राप्त होता है। इस लिए जीवन का एक भी क्षण या श्वास व्यर्थ में नहीं गँवाना चाहिए। 

आदि गुरु शंकराचार्यजी के इसी अद्वैत वेदान्त को वर्तमान युग के सर्वश्रेष्ठ अद्वैताचार्य स्वामी विवेकानन्द, 'व्यावहारिक वेदान्त' के रूप में ढालकर यह शिक्षा देते हैं कि - " योगशास्त्र के मतानुसार, आत्मा (चेतन) अविद्या के कारण प्रकृति के साथ संयुक्त हो गयी है;  'प्रकृति' के पंजे से, (चिज्जड़ ग्रंथि से)  छुटकारा पाना ही हमारा उद्देश्य है। यही सारे धर्मों का एकमात्र लक्ष्य है। प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है! बाह्य एवं अंतःप्रकृति को वशीभूत करके आत्मा के इस अंतर्निहित ब्रह्मत्व 'Inherent Divinity'  को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है। कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान, इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर अपने ब्रह्मभाव को व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ। बस, यही धर्म का सर्वस्व है। मत, अनुष्ठान – पद्धति, शास्त्र, मन्दिर अथवा अन्य बाह्य क्रिया कलाप तो उसके गौण ब्यौरे मात्र है।"  

["According to Yoga philosophy, it is through ignorance that the soul has been joined with nature. The aim is to get rid of nature's control over us. That is the goal of all religions. Each soul is potentially divine. The goal is to manifest this Divinity within, by controlling nature, external and internal. Do this either by work, or worship, or psychic control, or philosophy — by one or more or all of these — and be free. This is the whole of religion. Doctrines, or dogmas, or rituals, or books, or temples, or forms, are but secondary details."

[मनुष्य के तीन प्रमुख अवयव हैं- 3'H' शरीर, मन और ह्रदय। इसमें  मन जन्म और मृत्यु का पात्र है और वही दशा शरीर की है।  आत्मा इन्द्रियातीत है। व्याख्या : अर्थात आकार में दिखने वाला देह , निराकार मन (परिवर्तनशील M/F जीव भाव (Apparent I) दोनों झूठ (मिथ्या) है और 'मृत्यु का पात्र' है। अतएव आकार वाला इन्द्रिय गोचर देह और निराकार मन दोनों परिवर्तनशील या परस्पर विनिमय करने योग्य  (interchangeable) होने के कारण जड़ या नश्वर है। E=Mc2 :यह दर्शाता है कि पदार्थ  (matter-आकार) और ऊर्जा (Energy शक्ति निराकार) परस्पर विनिमयीय हैं। "आत्मा (चेतन) इन्द्रियातीत है।" अर्थात चेतन आत्मा इन्द्रियातीत होने के कारण अपरिवर्तनशील अजर-अमर -अविनाशी है। इसको शस्त्र नहीं काट सकते ...... यही हमारा यथार्थ स्वरुप  (Real I) सत् , चित्, आनंद और एकमेवा-द्वितीय (अद्वैत) है।

....यह  शरीर  मन का एक बाहरी परत (crust छिलका) मात्र है। शरीर (आकार) और मन (निराकार) दो अलग अलग वस्तुएं नहीं हैं,  वे तो सीप (oyster-घोंघा) और उसके खोल (shell) के समान हैं। वे एक ही नश्वर वस्तु की दो विभिन्न अवस्थायें हैं। सीप के भीतर का जन्तु बाहर से नाना प्रकार के उपादान लेकर उस खोल को तैयार करता है। उसी प्रकार मन नामक यह आंतरिक सूक्ष्म -शक्ति समूह (निराकार अन्तःकरण) भी बाहर से स्थूल पंचभूत (आकाश,वायु , अग्नि, जल और पृथ्वी) को लेकर उससे इस शरीर रूपी ऊपरी खोल को तैयार कर रहा है। अतः हम यदि अन्तर्जगत पर विजय प्राप्त कर सकें, तो बाह्य जगत को जितना फिर बड़ा आसान हो जायेगा। फिर ये दो शक्तियाँ अलग अलग नहीं हैं ! ऐसी बात नहीं है कि कुछ शक्तियाँ भौतिक हैं , और कुछ मानसिक। जैसे यह दृश्यमान भौतिक जगत सूक्ष्म जगत की स्थूल अभिव्यक्ति मात्र है, उसी प्रकार भौतिक शक्तियाँ भी सूक्ष्म शक्तियों की स्थूल अभिव्यक्ति मात्र है। 

[This body (आकार) is just the external crust of the mind (निराकार) . They are not two different things; they are just as the oyster and its shell. They are but two aspects of one thing; the internal substance of the oyster takes up matter from outside, and manufactures the shell. In the same way the internal fine forces which are called mind (निराकार) take up gross matter from outside, and from that manufacture this external shell, the body (आकार) . If, then, we have control of the internal, it is very easy to have control of the external. Then again, these forces are not different. It is not that some forces are physical, and some mental; the physical forces are but the gross manifestations of the fine forces, just as the physical world is but the gross manifestation of the fine world

क्या ईसा और बुद्ध एक हैं ? (Are Christ and Buddha Identical?) 

यह मेरी अपनी कल्पना है कि वही बुद्ध ईसा हुए। बुद्ध ने भविष्यवाणी की थी , " मैं 500 वर्षों में पुनः आउंगा और 500 वर्षों बाद ईसा आये। ये दो महान व्यक्तित्व - दो ईश्वर। संसार में जहाँ कहीं थोड़ा भी ज्ञान है , लोग या तो बुद्ध अथवा ईसा के सामने सिर झुकाते हैं। बुद्ध के 500 वर्षों बाद मुहम्मद आये , लूथर आये। ईसा और बुद्ध ईश्वर थे , दूसरे सब पैगम्बर थे। ईसा और बुद्ध के जीवन में प्रकट शान्ति की अभिव्यक्ति को देखो - शान्त और अवरोधी। जेब में एक पाई भी न रखने वाले, आजीवन तिरस्कृत , नास्तिक और मूर्ख कहे जाने -फिर भी सोचो , मानवजाति पर उन्होंने कितना महान आध्यात्मिक प्रभाव डाला है।  

पाप से मोक्ष (Salvation From Sin) : 

अज्ञान से मुक्त होकर ही हम पाप से मुक्त हो सकते हैं। अज्ञान (Ignorance , अविद्या, अस्मिता राग-द्वेष , अभिनिवेश आदि पंचक्लेश) उसका कारण है, जिसका फल पाप है।   

We are to be saved from sin by being saved from ignorance. Ignorance is the cause of which sin is the result.

दिव्य मातृत्व (जगत जननी की गोद) में वापस लौटना (Coming Back to the Divine Mother) 

जब आया बच्चे को बगीचे में ले जाती है और उसके साथ खेलती है , माँ उसे भीतर आने के लिए बुलावा भेज सकती है। बच्चा खेल में मग्न है और कहता है , " मैं नहीं आऊंगा, खाने की मेरी इच्छा नहीं है। थोड़ी ही देर में बच्चा अपने खेल से थक जाता है और कहता है , " मैं माँ के पास जाऊंगा। " आया कहती है , " यह लो नयी गुड़िया। " पर बच्चा कहता है , " अब मुझे गुड़ियों की तनिक भी इच्छा नहीं है। मैं माँ के पास जाऊँगा। " जब तक वह चला नहीं जाता , रोता रहता है। हम सभी बच्चे हैं। ईश्वर माँ है। हमलोग धन , सम्प्पति आदि चीजों की खोज में डूबे हुए हैं ; किन्तु एक ऐसा समय आएगा , जब हम जाग उठेंगे ; और जब यह प्रकृति हमें और खिलौने देने का प्रयत्न करेगी तब हम कहेंगे , " नहीं , मैंने बहुत पाया , अब मैं ईश्वर के पास जाऊँगा। " (10:42) 

ईश्वर (चेतन या आत्मा) से भिन्न  व्यक्तित्व नहीं (No Individuality Apart From God) 

यदि हम ईश्वर से अभिन्न है और सदैव एक हैं (अद्वैत हैं) , तो क्या हमारा कोई व्यक्तित्व नहीं है?हाँ है ; वह है ईश्वर। हमारा व्यक्तित्व परमात्मा है। तुम्हारा यह इस समय का व्यक्तित्व वास्तविक व्यक्तित्व नहीं है। तुम सच्चे व्यक्तित्व की ओर अग्रसर हो रहे हैं। व्यक्तित्व का अर्थ है -अविभाज्यता। वर्तमान अवस्था में हमारी जो स्थिति है , उस अवस्था को तुम व्यक्तित्व -'अविभाज्यता ' कैसे कह सकते हो ? एक घंटे भर तुम एक ढंग से सोचते हो , दूसरे घंटे में दूसरे दूसरे ढंग से और दो घंटे पश्चात् अन्य ढंग से। व्यक्तित्व तो वह जो बदलता नहीं है। यदि वर्तमान दशा शाश्वत काल तक बनी रहे , तो यह बड़ी भयावह स्थिति होगी। तब तो चोर सदा चोर ही बना ही रजेगा और  नीच नीच। यदि शिशु मरेगा , तो वह शिशु ही बना रहेगा ? वास्तविक व्यक्तित्व वो है, जो कभी परिवर्तित नहीं होता है और न कभी परिवर्तित ही होगा , और वह हमारे अन्तर में निवास करने वाला ईश्वर (चेतन) है। (10 : 42 ) 

[If we are inseparable from God, and always one, have we no individuality? Oh yes; that is God. Our individuality is God. This is not real individuality which you have now. You are coming towards that true one. Individuality means what cannot be divided. How can you call this state -- we are now -- individuality? One hour you are thinking one way, and the next hour another way, and two hours after another way. Individuality is that which changes not. It would be tremendously dangerous for the present state to remain in eternity, then the thief would always remain a thief, and the blackguard, a blackguard. If a baby died, it would have to remain a baby. The real individuality is that which never changes, and will never change; and that is God within us.]

श्री रामकृष्ण परमहंस देव और स्वामी विवेकानन्द दोनों अक्सर सिंह-शावक  के खुद को भेंड़ समझने (Apparent I या जड़ देह,इन्द्रिय, मन और मूढ़बुद्धि से तादात्म्य) का समझने उदाहरण देते थे। कि कैसे हमलोग सिंह-शावक (चेतन -आत्मा) होकर भी भेंड़ों की तरह घाँस चरते हैं , (अर्थात विवेकी मनुष्य होकर भी मूढ़बुद्धि की गुलामी करते हैं) और बाघ से तो क्या गड़रिया से भी डरते हैं। 

विचार करके देखो प्यारे, जगत बना है मन से।  

जैसे शेर भेंड़ बन बैठो, भय मानत सिंघन से।।

यह मन (बुद्धि) ही देह बन गया है। और यम से (मृत्यु के भय से) डरता रहता है। ये 'शुद्ध बुद्धि'  बहुत दिनों से मन -इन्द्रियों के साथ रही। उनकी आदत इस बुद्धि में आ गयी। उसी तरह से सोंचती है। इन्द्रियों के द्वारा मिले दुःखों -सुखों से बुद्धि सम्मोहित है। प्रभावित है। कभी आत्मा के आनन्द को नहीं जानती। 

स्वामी विवेकानन्द अपने गुरुभाई स्वामी अखण्डानन्द को , 13 नवंबर, 1895 को लिखित एक पत्र में कहते हैं - " जबरदस्त उत्साह, अदम्य साहस , अद्भुत ऊर्जा , और सर्वोपरि गुरु -शिष्य परम्परा ( श्री रामकृष्ण -स्वामी विवेकानन्द वेदांत शिक्षक-प्रशिक्षण परम्परा Be and Make) में गुरु की आज्ञा का पालन यही वे गुण हैं, जो किसी व्यक्ति या राष्ट्र को महान बना सकते हैं !" (४/३६०) 

मेरा जीवन तथा ध्येय 

[My Life And Mission] 

(27 जनवरी, 1900 को कैलिफोर्निया के पासाडेना के शेक्सपियर क्लब में दिया गया भाषण)

" हिन्दू जाति ने कभी धन को श्रेय नहीं माना। धन उन्हें खूब प्राप्त हुआ , -दूसरे राष्ट्रों से कहीं अधिक धन उन्हें मिला , पर हिन्दू जाति ने धन को कभी श्रेय नहीं माना। युगों तक भारत शक्तिशाली बना रहा , तो भी शक्ति उसका श्रेय नहीं बनी। कभी उसने अपनी शक्ति का उपयोग अपने देश के बाहर किसी दूसरे देश पर विजय प्राप्त करने में नहीं किया।  .....  भारत वर्ष ही एक ऐसा राष्ट्र है , जिसने श्रद्धापूर्वक सदैव यही विश्वास किया कि यह जीवन वास्तविक नहीं। सत्य तो ईश्वर है , इसलिए दुःख और सुख में उसीको पकड़े रहें अपने अधःपतन के बीच भी उसने धर्म को प्रथम स्थान दिया। ....इसका एक ही कारण है और वह यह है कि इस जाति की सजीवता, इस देश का ध्येय धर्म है , और क्योंकि धर्म पर अभी तक आघात नहीं हुआ , अतः ये जाति जीवित है।  " (१०/४) [ has believed, and believed intensely, that this life is not real. The real is God; and they must cling unto that God through thick and thin.] 

" अब तुम अमेरिका की आम राय (vox pop) पर विचार करो , किसी आलोचना की दृष्टि से नहीं। ... यहाँ की हरएक चीज का निर्माण इसी दृष्टि से हुआ है कि मानव की लौकिक यात्रा सरलतापूर्वक सम्पन्न हो जाय। और जब तक जीवन है , तबतक खूब सुखपूर्वक जीवन-यापन करे। पर तुम्हारे देश में कोई व्यक्ति इस वृक्ष के नीचे बैठ जाय और कहने लगे कि मैं तो यही पर आसन मारकर ध्यान लगाऊँगा , काम नहीं करूँगा , तो उसे जेल जाना होगा। -यही फर्क है। ...मनुष्य तभी इस समाज में (भोग-प्रधान समाज में) रह सकता है , जब तक वह सामान्य समाज की पंक्ति के सुर में सुर मिलाकर काम किया करे। प्रस्तुत जीवन में अधिकाधिक भौतिक सुखभोग की इस घुड़दौड़ में हर एक आदमी को शामिल होना पड़ता है , अन्यथा वह मर जाता है (१०/६) 

अब जरा भारत की आम राय पर विचार करें। वहाँ कोई व्यक्ति कहे कि मैं पर्वत के शिखर पर बैठकर जीवन भर नासाग्र को देखते रहना चाहता हूँ , तो हर आदमी यही कहता है -जाओ शुभमस्तु ! पर यदि कोई व्यक्ति आकर कहे कि देखो " मैं इस भौतिक जीवन का कुछ ऐशो-आराम लूटना चाहता हूँ ', तो शायद उसके लिए सब द्वार बंद ही मिलेंगे। .... दोनों देशों की धारणायें भ्रमात्मक हैं। यहाँ भी आसन लगाकर कोई ध्यान करना चाहे , तो उसको भी अनुमति होनी चाहिए। वैसे ही भारत में क्यों मानव इस जीवन में भौतिक सुख-सुविधाएँ न पाए ? धनोपार्जन क्यों न करे ? लेकिन भारत में अध्यात्मवादियों की निरंकुशता है ज्ञानियों की निरंकुशता है। याद रखो ज्ञानियों की निरंकुशता, अज्ञानियों की निरंकुशता से कहीं अधिक प्रबल होती है। जब पंडित और ज्ञानी अपने मतों को औरों पर लादना प्रारम्भ करते हैं , तो वे बाधाओं और बन्धनों को रचने के ऐसे लाखों उपाय सोच लेते हैं , जिनको तोड़ने की शक्ति अज्ञानियों में नहीं होती। मैं चाहता हूँ कि इसे (निरंकुशता) को एकदम रोक दिया जाये। 

  लाखों-करोड़ों लोगों की कुर्बानी देकर 'बुद्ध' के जैसा एक बड़ा 'स्पिरिचुअल दिग्गज ' पैदा किया जाने का कोई अर्थ नहीं हैयदि हम ऐसे मनुष्यों का समाज निर्माण करें , जिसमें एक ऐसा आध्यात्मिक दिग्गज भी हो , और सारे अन्य लोग भी सुखी हों , तो वह ठीक है। पर अगर करोड़ो को पीसकर एक ऐसा दिग्गज बनाया गया , तो यह अन्याय है। अधिक उचित तो यह होगा कि सम्पूर्ण जगत का परित्राण करने के लिए एक व्यक्ति (महान आध्यात्मिक नेता) खुद कष्ट झेले।" (१०/६)   

"Now, I say that this thing has got to stop. There is no use in sacrificing millions and millions of people to produce one spiritual giant. If it is possible to make a society where the spiritual giant will be produced and all the rest of the people will be happy as well, that is good; but if the millions have to be ground down, that is unjust. Better that the one great man should suffer for the salvation of the world." 

किसी राष्ट्र में यदि तुमको कुछ कार्य करना है , तो उसी राष्ट्र की विधियों को अपनाना होगा। हर आदमी को उसीकी भाषा में बतलाना होगा। अगर तुमको अमेरिका या इंग्लैण्ड में धर्म का उपदेश देना है , (या पाश्चात्य शिक्षा में पले बढ़े आधुनिक भारतीय लोगों में मनुष्य बनो और बनाओ का उपदेश देना है ) तो तुमको - संगठन बनाना होंगी , Executive committee का मेंबर बनाकर प्रेसिडेन्ट , सेक्रेटरी , कोषाध्यक्ष आदि का चुनाव 'A.G.M' में  वार्षिक आम बैठक में तय करना होगा; क्योंकि पाश्चात्य जातियों या उनकी शिक्षा में पले -बढ़े लोगों में काम करने की यही विधि और यही भाषा है। 

[if you want to preach religion to them, you will have to work through political methods -- make organisations, societies, with voting, balloting, a president, and so on, because that is the language, the method of the Western race. ]

प्राचीन भारत का नियम यह था कि प्रत्येक पुरुष और स्त्री अपने जीवन की संध्या के निकट सामाजिक जीवन को त्याग कर , केवल अपने मोक्ष और परमात्मा के चिन्तन में संलग्न रहे। यह सब उस महान घटना का स्वागत करने की तैयारी है , जिसे मृत्यु कहते हैं। बाद में युवकों ने भी संसार त्यागना आरम्भ किया। युवकों में शक्ति का बाहुल्य होता है , इसलिए वे निरंतर अपनी मृत्यु (देह-मन की ?) के चिंतन में ही ध्यान लगाए न रह सके और घूम-घूम कर उपदेश देने और नए सम्प्रदायों का निर्माण करने लगे। इसी प्रकार युवा बुद्ध ने वह महान सुधार (अष्टांग योग बौद्धमठ ) आरम्भ किया। यदि वे जरा -जर्जरित होते तो अपने नासाग्र पर दृष्टि रखते और शांतिपूर्वक मर जाते। बुद्ध मठ का सम्प्रदाय कोई धर्म संघ -चर्च नहीं है, और न इसके अनुयाई पुरोहित होते हैं।  पुरोहितों और संन्यासियों में मौलिक भेद है। [The Order (रामकृष्ण मठ या बौद्ध मठ)  is not a church, and the people who join the Order are not priests. There is an absolute difference between the priests and the Sannyasins.]  

पुरोहित होना भी सामाजिक जीवन का एक पैतृक व्यवसाय है। पुरोहित का पुत्र उसी प्रकार पुरोहित बन जाता है , जिस प्रकार बढ़ई का पुत्र बढ़ई अथवा लोहार का बेटा लोहार। पुरोहित को विवाह-सूत्र में भी बंधना पड़ता है। हिन्दू का मत है कि पत्नी के बिना पुरुष अधूरा है। अविवाहित पुरुष को धार्मिक अनुष्ठान करने का अधिकार नहीं। "(१०/७) [The priest must always be married. The Hindu does not think a man is complete unless he has a wife. An unmarried man has no right to perform religious ceremonies.]

संन्यासियों (त्यागी -गुरुओं) के पास सम्पत्ति नहीं होती , वे विवाह नहीं करते। उनके ऊपर कोई समाज- व्यवस्था नहीं लागु नहीं होती। एकमात्र बंधन जो उनपर व्याप्ता है , वह है गुरु और शिष्य का आपसी सम्बन्ध- और कुछ नहीं। और यह भारत की अपनी निजी विशेषता है। गुरु कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जो बस कहीं से आकर मुझे शिक्षा दे देता है और उसके बदले में मैं उसे कुछ धन देता हूँ , और बात खत्म हो जाती है। भारत में यह गुरु-शिष्य सम्बन्ध वैसी ही प्रथा है, जैसे पुत्र का गोद लेना।   गुरु पिता से भी बढ़कर है और मैं सचमुच गुरु का पुत्र हूँ - हर तरह से उनका पुत्र। पिता से भी बढ़कर मैं उनका आज्ञाकारी सेवक हूँ - क्योंकि पिता ने मुझे केवल यह शरीर मात्र दिया , मेरे गुरु ने मुझे मेरी मुक्ति का का मार्ग प्रदर्शित किया। (अर्थात नाम-जप सिखाकर मेरा आवा-गमन छुड़ा दिया!) और इसलिए वे पिता से बढ़कर हैं। अपने गुरु के प्रति मेरा यह सम्मान जीवन-व्यापी होता है , मेरा प्रेम चिरजीवी होता है। गुरु (नेता) ही एकमात्र संगठन है  (only organisation) जिसका अस्तित्व अक्षुण्ण रहता है। मैं इसी प्रकार अपने शिष्यों को ग्रहण करता हूँ । कभी कभी तो गुरु एकदम नवयुवक होता है और शिष्य कहीं अधिक बूढ़ा।) " (१० /८) 

[The teacher is not a man who comes just to teach me, and I pay him so much, and there it ends. In India it is really like an adoption. The teacher is more than my own father, and I am truly his child, his son in every respect. I owe him obedience and reverence first, before my own father even; because, they say, the father gave me this body, but he showed me the way to salvation, he is greater than father. And we carry this love, this respect for our teacher all our lives. And that is the only organisation that exists .

मेरे गुरुदेव जब " कम उम्र के ही थे , तभी उनके मन में सत्य का सीधा साक्षात्कार कर लेने की बड़ी उग्र आकांक्षा समा गयी। (.....When he was a boy he was seized with the tremendous idea of getting truth direct.) उन्होंने पाया कि हर सम्प्रदाय एक ऐसा मार्ग है, जिससे लोग एक निश्चित केंद्र पर ही पहुँचते हैं। (they are all so many paths leading to the same goal. )और इस तरह उन्होंने प्रत्येक धर्म को आशीष दिया। मैं जिन विचारों का सन्देश देना चाहता हूँ , वे सब उनके विचारों को प्रतिध्वनित करने की मेरी अपनी चेष्टा है। इसमें मेरा अपना निजी कोई भी मौलिक विचार नहीं ; हाँ , जो कुछ असत्य अथवा बुरा है , वह अवश्य ही मेरा है। पर  हर ऐसा शब्द , जिसे मैं तुम्हारे सामने कहता हूँ और जो सत्य एवं शुभ है , केवल उन्हीं की वाणी को झंकार देने का प्रयत्न मात्र है। " 

" बस उन्हीं के चरणों में मुझे ये विचार प्राप्त हुए। मेरे साथ और भी अनेक नवयुवक थे। मेरी उम्र रही होगी 16 वर्ष की कुछ तो मुझसे भी छोटे और कुछ बड़े भी थे। लगभग एक दर्जन गुरुभाई थे हम सब। और हम सबने बैठकर यह निश्चय किया कि हमें इस आदर्श का प्रसार करना है। और हम लोग चलपड़े  - न केवल उस आदर्श  का प्रसार करने , बल्कि उसे और भी व्यावहारिक रूप देने के लिए। हिन्दुओं की आध्यात्मिकता (spirituality-'प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है'  -महावाक्य) , बौद्धों की जीव-दया (mercifulness) , ईसाईयों की क्रियाशीलता (activity), एवं मुस्लिमों का बंधुत्व (brotherhood) हमलोगों को अपने व्यावहारिक जीवन के माध्यम से प्रदर्शित करना था। हमने निश्चय किया कि ' हम एक सार्वभौमिक धर्म (यूनिवर्सल धर्म -Be and Make ) का निर्माण करेंगे - अभी और यहाँ ही। हम रुकेंगे नहीं। " (१०/९)

" इसके बाद एक भयंकर समय आया ,...एक ओर था मेरी माता और भाइयों के भूखों मरने का दृश्य, और दूसरी ओर थे इन महान महापुरुष के विचार -जिनसे मेरा ख्याल था -भारत का ही नहीं, सारे विश्व का कल्याण हो सकता है। इसलिए उन विचारों का प्रचार-प्रसार करते हुए उन्हें कार्यान्वित करना अनिवार्य था। " [On the one hand, I would have to see my mother and brothers starve unto death; on the other, I had believed that this man's ideas were for the good of India and the world, and had to be preached and worked out. और यहीं से शुरू होती है - 'एक युवा आन्दोलन' - अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल के गठन की ऐतिहासिक अनिवार्यता ! A few have jumped into the breach , they are only a few. A few thousands are necessary, and they will come . . "Onward, my brave boys - money or no money - men or no men! Have you love? Have you God? Onward and forward to the breach, you are irresistible. "TO MY BRAVE BOYS(Written to Alasinga Perumal from New York on 19th November, 1894.)vol-4/pg-367/

सकलि तोमारि इच्छा इच्छामयी तारा तुमि ।

तोमार कर्म तुमि करो माँ, लोके बोले करि आमि।।

पंके बद्ध करो करि, पंगुरे लंघाओ गिरि,

कारे दाओ माँ ब्रह्मपद, कारे करो अधोगामी ।।

आमि यंत्र तुमि यंत्री, आमि घर तुमि घरनी,

आमि रथ तुमि रथी, जेमन चालाओ तेमनि चलि ।।

भावानुवाद

सभी तेरी इच्छा है माँ इच्छामयी तारा तुम्हीं ।

अपना कर्म तुम्हीं करती माँ लोग कहते करते हमहीं ।।

फँसाती कीच में हाथी, लंघाती पंगु को गिरि ।

देती हो किसी को ब्रह्मपद माँ, करती किसी को अधोगामी ।।

मैं हूँ यंत्र तुम हो यंत्री, मैं हूँ घर तुम हो घरनी ।

मैं हूँ रथ तुम हो रथी माँ, चलता जैसा चलाती माँ ।।

by Swami Atmajnananda 

=देश-काल -निमित्त से परे हो जाओ , देह भाव का अतिक्रमण करो। आकार देह , निराकार मन से परे 'चेतन ' ब्रह्म ही सत्य है , जगत मिथ्या है , जीव भी ब्रह्म ही है।

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बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

⚜️️🔱2.सांख्य योग : विश्लेषणात्मक ज्ञान का योग ⚜️️🔱 तमेव विदित्वा अतिमृत्युम् एति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥ (3-8) 'न स पुनरावर्तते , न स पुनरावर्तते। मनुष्य जीवन का लक्ष्य - 'आत्मवान् बनो। ⚜️️🔱 (45-50 ) ⚜️️🔱72. ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व)

द्वितीय अध्याय का सारामृत 

 72 श्लोक वाले इस अध्याय का नाम 'सांख्ययोग ' है। सांख्य शब्द का अर्थ है - 'विश्लेषणात्मक ज्ञान ' (Analytical knowledge) और योग शब्द युज धातु से बना है जिसका अर्थ है जोड़ना । स्वयं को (अर्थात देहाध्यास और जिवाध्यास में फँसी 'मूढ़बुद्धि' 'सम्मोहित मति' को, सिद्धांत 'जैसी मति वैसी गति ! इसलिए वर्तमान की स्थिति (देहाभिमान-मायाधीन देह अहंकार) से ऊँचा उठकर किसी श्रेष्ठ एवं पूर्ण आदर्श से 'आत्मा' या ह्रदय में विद्यमान मायाधीश भगवान गदाधर श्री विष्णुपद श्रीहरि के ज्ञान से जुड़ जाने के लिये साधक जो कर्म या प्रयत्न करता है उसे योग कहते हैं। इस अध्याय में 'ज्ञान' और 'कर्म' पर सम्मिलित रूप से और पृथक रूप से चर्चा होने के कारण इस अध्याय का नाम 'सांख्ययोग' रखा गया है।    

 अर्जुन का विषाद दूर करने के लिए इस अध्याय का आरम्भ हुआ है। इसमें प्रधानतया -शरीर, इन्द्रिय , मन, बुद्धि से श्रेष्ठ आत्मा के तत्त्वज्ञान की चर्चा हुई है। देहाध्यास और जिवाध्यास को दूर करने के लिए भगवान ने अर्जुन को पहले मनुष्य की विशेष योग्यता 'नित्य-अनित्य विवेक' को जाग्रत करने का उपदेश दिया है। शरीर अनित्य है और आत्मा जन्म-मृत्यु -रहित तथा नित्य है। इस विवेक-प्रयोग के सिद्धान्त को समझाने के लिए भगवान गदाधर श्रीविष्णुपद श्रीहरि ने भगवान भाष्यकार श्रीशंकराचार्य जी द्वारा दिए गए विवेक की परिभाषा - "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः" को समझाने के लिए श्री भगवान ने आत्मतत्व का उपदेश दिया है। इसके बाद उन्होंने अर्जुन को समझाया कि स्वधर्म-पालन करना मनुष्य का अवश्यमेव कर्तव्य है। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्मयोग पर भी कुछ उपदेश दिए हैं। 

 वे अर्जुन को फल की आसक्ति के बिना निष्काम कर्म करने की प्रेरणा देते हैं। फल की कामना से रहित कर्म करने के विज्ञान को वे 'बुद्धियोग' या 'बुद्धि का योग' नाम देते हैं। बुद्धि का प्रयोग मन को देह, इन्द्रिय विषय-भोगों में सुख खोजने में बुद्धि की लालसा को रोक कर आत्मा या भगवान के साथ सम्बन्ध बनाने के लिए करना चाहिए।  इस भावना के साथ सम्पन्न किए गए कर्म (पवित्र विवाह बंधन ?)'बांधने वाले' से 'मुक्त करने वाले' में परिवर्तित हो जाते हैं। 

इसके पश्चात् अर्जुन उन मनुष्यों के लक्षणों को जानना चाहता है, जिनकी बुद्धि आत्मा में प्रतिष्ठित हो गयी हो , या आत्मनिष्ठ बुद्धि वाले या स्थितप्रज्ञ मनुष्य के लक्षणों को जानना चाहता है। श्रीकृष्ण उसे बताते हैं कि किस प्रकार से स्थितप्रज्ञ होकर मनुष्य आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त हो जाता है। निष्काम कर्म, निष्काम भक्ति और ज्ञान के सम्मिलन के फलस्वरूप ब्रह्मप्राप्ति और स्थितप्रज्ञ-अवस्था होती है। इसीको ब्रह्मप्राप्ति (ब्राह्मी स्थिति, ब्रह्माध्यास ??) स्थितप्रज्ञ -अवस्था कहते है।   और सभी परिस्थितियों में उसकी इन्द्रियाँ उसके वश में हो जाती हैं और उसका मन सदा के लिए भगवान की भक्ति में तल्लीन हो जाता है। इस अवस्था में स्थित होकर मनुष्य निष्काम भाव अपने वर्ण और आश्रम कर्म करके अन्त में ब्रह्मनिर्वाण या मोक्ष प्राप्त करते हैं। यमराज नचिकेता को बताते हैं कि 'ॐ' ही वह सर्वोच्च ब्रह्म या परम लक्ष्य है ('आदित्यवर्णं पुरुषं महान्तं' मायाधीश , जादूगर सत्य है,जादू नहीं) ! , जिसे जानकर ही सब कुछ जान लिया जाता है और अमरता मिलती है। 

"सर्वे वेदा यत् पदम् आमनन्ति,

तपांसि सर्वाणि च यद् वदन्ति।

यद् ईच्छन्तो  ब्रह्मचर्यं चरन्ति,  

तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि - ॐ इति येतत्‌ ॥ 

(आमनन्ति - āmananti - glorify | कठोपनिषद 1.2.15)  जो बताता है कि सभी वेदों का परम लक्ष्य, सभी तपस्याओं का अंतिम फल और ब्रह्मचर्य का उद्देश्य 'ॐ' लाभ ईश्वर लाभ (ओम्-मायाधीश का नाम ,जादूगर सत्य)  परम पद की प्राप्ति' [भगवान गदाधर श्री विष्णुपद श्रीहरि की प्राप्ति ] ही ब्राह्मी स्थिति या मोक्ष-प्राप्ति है। समस्त गीता में विशेष रूप से चर्चित इस ब्रह्मस्वरूपता की प्राप्ति ही इस अध्याय का मूल संगीत है।  

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तं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।

विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः।।2.1।।

।।2.1।। संजय ने कहा -- इस प्रकार करुणा और विषाद से अभिभूत,  अश्रुपूरित नेत्रों वाले आकुल अर्जुन से मधुसूदन ने यह वाक्य कहा।।

अर्जुन की विषादावस्था का वर्णन करने के साथ ही संजय हमें यह भी संकेत करता है कि उसका आन्तरिक व्यक्तित्व भग्न हो गया था। और अर्जुन के व्यक्तित्व  में गहरी दरार पड़ गयी थी। अपने समय का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी होकर भी वह किसी सामान्य स्त्री के समान रुदन कर रहा था। 

श्री भगवानुवाच

 कुत: त्वा कश्मलम् इदम् विषमे समुपस्थितम्। 

 अनार्य जुष्टम् सद् अस्वय॑म् अकीर्तिकरम् अर्जुन।। (2.2)   

।।2.2।। श्री भगवान् ने कहा -- हे अर्जुन ! तुमको इस विषम स्थल में यह मोह कहाँ से उत्पन्न हुआ?  यह आर्य आचरण के विपरीत न तो स्वर्ग प्राप्ति का साधन ही है और न कीर्ति कराने वाला ही है।।

यहाँ भगवान् अर्जुन के आचरण को अनार्य कहते हैं।  आर्य पुरुष जीवन के उच्च आदर्शों पवित्रता और गरिमा के आह्वान के प्रति सदैव जागरूक और प्रयत्नशील रहते हैं । एक सच्चे आर्य अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष का स्वभाव तो यह होता है कि जीवन में आने वाली किसी भी परिस्थिति में अपने मनसंयम से विचलित न होकर उन परिस्थितियों का कुशलता से सामना करता है,  और उनको अपने अनुकूल बना लेता है। 

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।

क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।2.3।।

।।2.3।। हे पार्थ क्लीव (कायर) मत बनो। यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है, हे ! परंतप हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ।

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।

क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।2.3।।

।।2.3।। हे पार्थ क्लीव (कायर) मत बनो। यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है, हे ! परंतप हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ।।

ज्ञान के मार्ग पर सफलतापूर्वक कदम रखने के लिए उच्च आत्मबल और नैतिकता का होना आवश्यक है। जिसके लिए किसी मनुष्य को आशावान, उमंगी और ऊर्जावान बनकर आलस्य, स्वछन्दता की प्रवृत्ति, अज्ञान और आसक्ति जैसे दोषों पर विजय प्राप्त करना आवश्यक होता है। श्रीकृष्ण एक योग्य गुरु हैं और इसलिए अर्जुन को फटकारते हुए वे अब उसे परिस्थितियों का सामना करने के लिए प्रोत्साहित कर उसके आत्मबल को बढ़ाते हैं।

 [2.3 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.] 

अर्जुन उवाच

कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन।

इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन।।2.4।।

।।2.4।। अर्जुन ने कहा -- हे मधुसूदन ! मैं रणभूमि में किस प्रकार भीष्म और द्रोण के साथ बाणों से युद्ध करूँगा। हे अरिसूदन, वे दोनों ही पूजनीय हैं।।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि अर्जुन का मिथ्या अहंकार (देहाध्यास और जिवाध्यास )  ही उसकी मिथ्या धारणाओं और मूढ़बुद्धि होने का कारण था।

गुरूनहत्वा हि महानुभावान्

श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।

हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव

भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्।।2.5।।

।।2.5।। इन महानुभाव गुरुजनों को मारने से इस लोक में भिक्षा का अन्न भी ग्रहण करना अधिक कल्याण कारक है, क्योंकि गुरुजनों को मारकर मैं इस लोक में रक्तरंजित अर्थ और काम रूप भोगों को ही भोगूँगा।।

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो

यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।

यानेव हत्वा न जिजीविषाम 

स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः।।2.6।।

।।2.6।। हम नहीं जानते कि हमें क्या करना उचित है। हम यह भी नहीं जानते कि हम जीतेंगे, या वे हमको जीतेंगे, जिनको मारकर हम जीवित नहीं रहना चाहते वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने युद्ध के लिए खड़े हैं।।

हमारी पाँच इन्द्रियाँ है - एक स्पर्श इन्द्रिय त्वचा का स्थान पूरे शरीर में है, बाकी 4 इन्द्रिय रूप, रस , गंध , शब्द की इन्द्रियाँ शरीर के ऊपरी भाग में है।  हमारा मन ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा भिन्नभिन्न विषयों को ग्रहण कर उनको एक व्यवस्थित रूप में बुद्धि के समक्ष निर्णय के लिये प्रस्तुत करता है। बुद्धि अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर निर्णय देती है जिसे मन कमेन्द्रियों के द्वारा बाह्य जगत में व्यक्त करता है। हमारी जाग्रत अवस्था के प्रत्येक क्षण यह समस्त कार्यकलाप होता रहता है। अत्यधिक चिन्तातुर होने के कारण अर्जुन का देह, इन्द्रियाँ , मन (मिथ्या अहंकार M/F जीव भाव) मूढ़बुद्धि (देहाध्यास) द्वारा निर्देशित हो रहा था, वह शुद्ध या सारथि बुद्धि आत्मा (इष्टदेव) जुड़ा हुआ नहीं था। इस मोह का प्रभाव न केवल अर्जुन के मन (अहंकार) पर बल्कि उसकी बुद्धि पर भी पड़ा था।   

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः

पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः।

यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे

शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।।2.7।।

।।2.7।। करुणा के कलुष से अभिभूत और कर्तव्यपथ पर संभ्रमित हुआ मैं आपसे पूछता हूँ, कि मेरे लिये जो श्रेयष्कर हो, उसे आप निश्चय करके कहिये, क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ; शरण में आये मुझको आप उपदेश दीजिये।।

यहाँ अर्जुन शिष्यभाव से भगवान् की शरण में जाता है जो यह संकेत करता है कि अब वह उपदेश ग्रहण करने योग्य हो गया है। और अब वह भगवान् के उपदेश का पालन करेगा। 

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या

द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।

अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धम्

राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्।।2.8।।

।।2.8।। पृथ्वी पर निष्कण्टक समृद्ध राज्य को और देवताओं के स्वामित्व को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर कर सके।।

अब अर्जुन की स्थिति एक तीव्र मुमुक्ष के समान है जो मरणधर्मा शरीर (र्मत्य जीवन) की समस्त सीमाओं और बन्धनों से मुक्त हो जाने के लिये अधीर हो उठा है। अब आवश्यकता है केवल एक प्रामाणिक विचार की जो स्वयं भगवान हृषीकेश उसे गीता के दिव्य काव्य में देते हैं।

सञ्जय उवाच

एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।

न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह।।2.9।।

।।2.9।। संजय ने कहा -- इस प्रकार गुडाकेश परंतप अर्जुन भगवान् हृषीकेश से यह कहकर कि हे गोविन्द "मैं युद्ध नहीं करूँगा" चुप हो गया।।

संजय ने यहाँ अर्जुन को गुड़ाकेश  कह कर संबोधित किया गया है जिसका अर्थ है-'निद्रा पर विजय पाने वाला।' और  श्रीकृष्ण के लिए हृषीकेश अर्थात् 'मन और इन्द्रियों के स्वामी' शब्द का प्रयोग किया है। इसका शाब्दिक संकेत यह है कि जो मन और इन्द्रियों के स्वामी हैं, वे निश्चित रूप से अर्जुन को इस किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति से बाहर ले आएंगे।

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।

सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः।।2.10।

।।2.10।। इस प्रकार धर्म और अधर्म शुभ और अशुभ इन दो सेनाओं के संव्यूहन के मध्य अर्जुन (जीव देहाध्यास-रथी) पूर्ण रूप से अपने सारथी बुद्धि को भगवान् श्रीकृष्ण (सूक्ष्म विवेकवती बुद्धि, आत्मा , ईश्वर,परमात्मा) की शरण में आत्मसमर्पण करता है जो पाँच अश्वों (पंच ज्ञानेन्द्रियों) और मन रूपी लगाम के द्वारा चालित शरीर रूपी रथ (देह) अपने पूर्ण नियन्त्रण में रखते हैं

ऐसे दुखी और भ्रमित स्वयं को नश्वर देह समझने वाले , M/F देहाध्यासी  व्यक्ति जीव अर्जुन को श्रीकृष्ण सहास्य उसकी अन्तिम विजय का आश्वासन देने के साथ ही गीता के आत्ममुक्ति का आध्यात्मिक उपदेश भी करते हैं। जिसके ज्ञान से सदैव के लिये मनुष्य के शोक- मोह की निवृत्ति हो जाती है।

अपने अधूरे ज्ञान के कारण हम जिन परिस्थितियों का सामना करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं, उन्हें हम दोषी मानते हैं, दुःखी होते हुए उन पर खीझते हैं, उनसे दूर भागना चाहते हैं और उन्हें अपने दुर्भाग्य के लिए उत्तरदायी ठहराते हैं। किन्तु प्रबुद्ध आत्माएँ हमें अवगत कराती हैं कि भगवान की यह सृष्टि सभी प्रकार से पूर्ण है।  तथा शुभ और अशुभ परिस्थितियाँ हमारे सम्मुख दिव्य प्रयोजन हेतु उत्पन्न होती हैं। ये सब हमारे आध्यात्मिक उत्थान की व्यवस्था करती हैं ताकि हम पूर्णता को प्राप्त करने की (निःस्वार्थपरता को अभिव्यक्त करने की ?)अपनी यात्रा में आगे बढ़ सके। जो लोग इस रहस्य को समझते हैं, वे कभी कठिन परिस्थितियों से विचलित नहीं होते बल्कि दृढ़ता और शांति से इनका सामना करते हैं। 

शंकराचार्यजी अपने भाष्य में कहते हैं - " तस्माद्गीताशास्त्रे केवलादेव तत्त्वज्ञानान्मोक्षप्राप्तिः न कर्मसमुच्चितात् इति निश्चितोऽर्थः।भगवान् यही बात कहेंगे कि (योगी) अन्तःकरण की शुद्धि (चित्तशुद्धि) के लिये कर्म करते हैं। सुतरां गीताशास्त्र में निश्चय किया हुआ अर्थ यही है कि केवल तत्त्वज्ञान से  ही मुक्ति  होती है कर्म-सहित ज्ञान से नहीं

श्री भगवानुवाच

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।

गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।।2.11।।

[अशोच्यान् अन्वशोचः  त्वम्  प्रज्ञावादान्  च  भाषसे। गतासून् ' अगतासून् च न अनुशोचन्ति पण्डिताः।। ] 

विष्णुपुराण में श्री भगवान की परिभाषा इस प्रकार है—

उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम्।

वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति॥

(विष्णुपुराण ६। ५। ७८)

‘जो सम्पूर्ण प्राणियों के उत्पत्ति, प्रलय (के बाद ???), इस लोक में आगमन, परलोक में गति, विद्या और अविद्या सब कुछ जानते हैं , वही भगवान हैं। अर्थात संसार की सृष्टि , स्थिति और प्रलय के कर्ता को भगवान कहते हैं। 

श्री कृष्ण स्वयं भगवान हैं, वे त्रिकालदर्शी भी हैं। कुरुक्षेत्र के युद्ध का परिणाम भी वे जानते थे। अपने-अपने कर्मों के अनुसार जिनलोगों का मृत्युकाल उपस्थित था वे ही लोग उस युद्ध क्षेत्र में एकत्र हुए थे। श्रीभगवान ने सबका मृत्युकाल उपस्थित जानकर भी उनकी ऊर्ध्वगति की व्यवस्था की थी। वे द्रष्टा मात्र थे -उन्होंने शस्त्र धारण नहीं किया था। वे ही कर्मफल दाता हैं - सबको कर्मफल दिया था।      

।।2.11।। श्री भगवान् ने कहा -(अशोच्यान्) जिनके लिये शोक करना उचित नहीं है, उनके लिये तुम शोक करते हो और ज्ञानियों के से वचनों को कहते हो, परन्तु ज्ञानी पुरुष मृत (गतासून्) और जीवित (अगतासून्) दोनों के लिये शोक नहीं करते हैं।।

इस श्लोक के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन का ध्यान जीव के उच्च स्वरूप# की ओर आकर्षित करते हैं। [#अविनाशी (Real I या) आत्मस्वरूप] 
जैसा कि एक श्रेष्ठ चिकित्सक रोग के लक्षणों का ही उपचार न करके उस रोग के मूल कारण को दूर करने का प्रयत्न करता है,  उसी प्रकार यहाँ भी भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के शोक मोह के मूल कारण (आत्मअज्ञान) को ही दूर करने का प्रयत्न करते हैं।
शुद्ध आत्मस्वरूप के अज्ञान के कारण अहंकार उत्पन्न होता है। यह अज्ञान न केवल दिव्य स्वरूप को आच्छादित करता है वरन् उसके उस सत्य पर भ्रान्ति भी उत्पन्न कर देता है। 
अपने नश्वर व्यावहारिक मैं (Apparent I) और अविनाशी (Real I या) आत्मस्वरूप के अज्ञान (शरीर का जन्म होते ही अविद्या -अस्मिता-रागद्वेष -पंचक्लेश पंचभूतों के पंजों में फँस जाने के कारण ही ब्रह्म या आत्मा को रोना पड़ता है क्योंकि) अज्ञान के कारण देहाभिमान (M/F जीवभाव) अहंकार उत्पन्न होता है। यह अज्ञान न केवल अविनाशी दिव्य स्वरूप को आच्छादित करता है वरन् उसके उस सत्य पर भ्रान्ति (देहाभिमान जनित कामना-वासना) भी उत्पन्न कर देता है।
 मोहग्रस्त व्यक्ति को किसी विशेष व्यक्ति (परिवार या आत्मीय जन से आसक्ति का मूल्य दुःख और शोक के रूप में चुकाना पड़ता है। इन शरीर -इन्द्रिय-मन -बुद्धि या अन्तःकरण की  उपाधियों के साथ मिथ्या तादात्म्य (देहाध्यास)  के कारण ही हमें दुःख प्राप्त होते रहते हैं। हमें अपने अविनाशी आत्मस्वरूप का (Real I' का) ज्ञान होने से उनका अन्त हो जाता है।
 (और वाणी पर संयम नहीं रहने होने पर उसकी विवेक-शक्ति चली जाती है।नित्य-अनित्य विवेक नहीं रहने से) अविनाशी, 'शाश्वत चैतन्य स्वरुप आत्मा' (ब्रह्म, सच्चिदानन्द) स्थूल शरीर (M/F शरीर) के साथ मिथ्या तादात्म्य (देहाभिमान, देहाध्यास) के कारण शरीर को ही 'मैं' और 'मेरा' मान लेने के कारण अनेक वस्तुओं और व्यक्तियों के सम्बन्ध में अपने को बन्धन (आसक्ति) में अनुभव करती है। वही आत्मतत्त्व ('Real I' सच्चिदानन्द का) शरीर ,इन्द्रिय, मन, अहंबुद्धि के साथ जुड़कर अनेक प्रकार की भावनाओं का अनुभव करता है (अपना -पराया) मानो वह भावना जगत् (मनोराज्य) उसी का है। 
फिर यही शाश्वत चैतन्य (आत्मा) जड़ 'बुद्धि' उपाधि से युक्त होकर 'आशा और इच्छा' (कामना-वासना)  करता है, महत्वाकांक्षा और आदर्श रखता है जिनके कारण उसे दुखी भी होना पड़ता है। देहाभिमान, कामना-वासना, इच्छा -महत्वाकांक्षा आदि बुद्धि के ही धर्म हैं। इस प्रकार देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि से युक्त शुद्ध आत्मा जीवभाव (M/F शरीर देहाभिमान) को प्राप्त करके बाह्य विषयों भावनाओं और विचारों का दास और शिकार बन जाती है। जीवन के असंख्य दुःख और क्षणिक सुख इस जीवभाव (M/F देहाभिमानी बुद्धि) के कारण ही हैं। अर्जुन इसी जीवभाव के कारण पीड़ा का अनुभव कर रहा था। 
श्रीकृष्ण जानते थे कि शोकरूप भ्रांति या विक्षेप का मूल कारण आत्मस्वरूप का अज्ञान आवरण (अविद्या-अस्मिता-पंचक्लेश) है और इसलिये अर्जुन के विषाद को जड़ से हटाने के लिये वे उसको उपनिषदों में प्रतिपादित आत्मज्ञान का उपदेश करते हैं।
मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विधि (Psychological and spiritual method : अष्टांगयोग का प्रशिक्षण) के द्वारा मन-बुद्धि को पुन शिक्षित करने का ज्ञान भारत ने हजारों वर्ष पूर्व विश्व को दिया था। यहाँ श्रीकृष्ण का गीतोपदेश के द्वारा यही प्रयत्न है। आत्मज्ञान की पारम्परिक उपदेश विधि (गुरु-शिष्य परम्परा) के अनुसार जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण सीधे ही आत्मतत्त्व का उपदेश करते हैं।
भीष्म और द्रोण का अन्तःकरण (चित्त) शुद्ध होने के कारण उनमें चैतन्य प्रकाश (आत्म-ज्योति)  स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था। उनकी बुद्धि रूपी सारथि -इन्द्रिय मन द्वारा शासित न होकर चैतन्य आत्मा के द्वारा शासित थी। इसलिए वे दोनों ही महापुरुष अतुलनीय थे। इस युद्ध में मृत्यु हो जाने पर उनको अधोगति प्राप्त होगी यह विचार केवल एक अपरिपक्व बुद्धि वाला ही कर सकता है। 
आत्मविषयक बुद्धिका नाम पण्डा है और वह बुद्धि जिनमें हो वे पण्डित हैं। (पण्डा आत्मविषया बुद्धिः येषां ते हि पण्डिताः पाण्डित्यं निर्विद्य इति श्रुतेः।)
>>3H : मनुष्य के तीन प्रमुख अवयव हैं -शरीर (Hand) के द्वारा हम बाह्य अथवा भौतिक जगत् को देखते हैं जो मन (Head) के द्वारा अनुभव किये भावनात्मक जगत् से भिन्न होता है और उसी प्रकार बुद्धि (Heart के साथ या आत्मा के साथ जुड़ी) विवेक-सम्पन्न बुद्धि के द्वारा ( जीव -जगत और ईश्वर में एकत्व (Oneness) के विचारात्मक जगत् का अनुभव हमें होता है।
भौतिक दृष्टि से (M/F शरीर) की दृष्टि से जिसे मैं केवल एक स्त्री समझता हूँ उसी को मन के द्वारा अपनी माँ के रूप में देखता हूँ। स्थूल देहाभिमान को हटाकर यदि विशेलषणात्मक बुद्धि से केवल वैज्ञानिक परीक्षण करें तो स्त्री/पुरुष शरीर धारी जीव हड्डी -रक्त -मज्जा-मांस और नस-नाड़ी कोशिकाओं आदि से बना हुआ एक पिण्ड विशेष ही है।  यदि मेरी भावना उस M/F स्थूल शरीर के  प्रति परिवर्तित हो जाये , तो भौतिक वस्तु कामना-वासना के प्रति आसक्ति दोष अथवा अपूर्णता के कारण होने वाले दुखों को दूर किया जा सकता है । 
इसी प्रकार भौतिक और भावनात्मक दृष्टि से जो वस्तु (इन्द्रिय विषयों के भोग)  कुरूप और लज्जाजनक है उसी को यदि बुद्धि द्वारा तात्त्विक दृष्टि से देखें तो हमारे दृष्टिकोण में अन्तर आने से हमारा दुःख (भ्रम) दूर हो सकता है। इसी तथ्य को और आगे बढ़ाने पर ज्ञात होगा कि यदि मैं जीवन को आध्यात्मिक दृष्टि (विवेकज ज्ञान की दृष्टि) से देख सकूँ तो शारीरिक मानसिक और बौद्धिक दृष्टिकोणों के कारण उत्पन्न विषाद को आनन्द और प्रेरणादायक स्फूर्ति में परिवर्तित किया जा सकता है। 
यहाँ भगवान् अर्जुन को यही शिक्षा देते हैं कि वह अपनी अज्ञान की दृष्टि का त्याग करके गुरुजन, स्वजन एवं युद्धभूमि इत्यादि को (जगत-रूपी रंगमंच या व्यायामशाला को) आध्यात्मिक दृष्टि से देखने और समझने (लीला और अभिनय को समझने)  का प्रयत्न करे। इस महान् पारमार्थिक सत्य का उपदेश यहाँ इतने अनपेक्षित ढंग से अचानक किया गया है कि अर्जुन की बुद्धि को एक आघातसा लगा
 आगे के श्लोक पढ़ने पर हम समझेंगे कि भगवान् ने जो यह आघात अर्जुन की बुद्धि में पहुँचाया उसका कितना लाभकारी प्रभाव अर्जुन के मन पर पड़ाइनके लिये शोक करना उचित क्यों नहीं है क्योंकि वे नित्य हैं। (दृश्य रूप में अनित्य है , साक्षी रूप में नित्य है ?) कैसे भगवान् कहते हैं- 
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्।।2.12।।

।।2.12।। वास्तव में न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था अथवा तुम नहीं थे अथवा ये राजालोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे।।
 यही हिन्दू दर्शन का प्रसिद्ध पुनर्जन्म का सिद्धान्त है। जिस अस्तित्व को हम 'स्वयं' कहते हैं, वह आत्मा है न कि भौतिक शरीर और यह भगवान के समान नित्य है।
यहाँ भगवान् स्पष्ट घोषणा करते हैं कि M/F देह को धारण करने वाली आत्मा एक महान तीर्थयात्रा (दहोहं से शिवोहं की यात्रा)  के लिये निकल पड़ी है।  जो इस यात्रा के मध्य कुछ काल के लिये विभिन्न शरीरों को ग्रहण करते हुये उनके साथ तादात्म्य कर विशेष-विशेष अनुभवों को प्राप्त करती है। 
श्रीकृष्ण, अर्जुन और अन्य राजाओं का उन विशेष शरीरों में होना कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। न वे शून्य से आये और न ही मृत्यु के बाद शून्य रूप हो जायेंगे। प्रामाणिक तात्त्विक विचार के द्वारा मनुष्य भूत, वर्तमान और भविष्य की घटनाओं की सतत शृंखला समझ सकता है।  आत्मा वहीं रहती हुई अनेक शरीरों को ग्रहण करके प्राप्त परिस्थितियों का अनुभव करती प्रतीत होती है।यही हिन्दू दर्शन का प्रसिद्ध पुनर्जन्म का सिद्धान्त है।  गौतम बुद्ध सदैव अपने पूर्व जन्मों का सन्दर्भ दिया करते थे। और इस्लाम के सूफी संत  इस कथन को कौन नहीं जानता जिसमें उन्होंने कहा कि ' मैं पत्थर से मरकर पौधा बना,  पौधे से मरकर पशु बना,  पशु से मरकर मैं मनुष्य बना। फिर मरने से मैं क्यों डरूँ?  मरने से मुझमें कमी कब आयी ? मनुष्य से मरकर मैं देवदूत बनूँगा। पश्चिम के प्रसिद्ध कवियों को भी कल्पना के स्वच्छाकाश में विचरण करते हुये अन्त प्रेरणा से इसी सिद्धान्त का अनुभव हुआ जिनमें ब्राउनिंग रोसेटी टेनिसन वर्डस्वर्थ आदि प्रमुख नाम हैं।
 वह दिन दूर नहीं जब मनोविज्ञान के क्षेत्र में तेजी से हो रहे विकास के कारण पश्चिमी राष्ट्रों को भी अपने धर्म ग्रन्थों का पुनर्लेखन करना पड़ेगा। यदि हम तर्क को स्वीकार करते हैं तो देह से भिन्न जीव के अस्तित्व को मानना ही पड़ता है।
भारत के शंकराचार्य आदि का जीवन देखें तो ज्ञात होता है कि बाल्यावस्था में ही उनको कितना उच्च ज्ञान था। 
जब भगवान् ने कहा कि उन सबका (पितामह और आचार्य का) नाश होने वाला नहीं है। तब उनके इस कथन को जगत् का एक सामान्य व्यक्ति होने के नाते (देहाभिमानी) अर्जुन ठीक से ग्रहण नहीं कर पाया। उसने प्रश्नावाचक  मुद्रा में श्रीकृष्ण की ओर देखकर अधिक स्पष्टीकरण की मांग की।
"इनका (पितामह और आचार्य) के देहत्याग का शोक क्यों नहीं करना चाहिये ? क्योंकि स्वरूप से ये सब नित्य हैं। कैसे ?"...भगवान् कहते हैं।

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।।2.13।।

।।2.13।। जैसे इसी देह में देही जीवात्मा की कुमार, युवा और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही उसको अन्य शरीर की प्राप्ति होती है;  धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता है।।
 स्मृति के नियम (principle of memory) से यह सिद्ध हो जाता है कि व्यक्ति में कुछ है जो तीनों अवस्थाओं में अपरिवर्तनशील है जो बालक और युवा शरीर द्वारा अनुभवों को प्राप्त करता है तथा उनका स्मरण भी करता है। इस प्रकार देखने पर यह ज्ञात होता है कि कौमार्य अवस्था की मृत्यु युवावस्था का जन्म है और युवावस्था की मृत्यु ही वृद्धावस्था का जन्म है। 
बाल्यावस्था आदि की मृत्यु होने पर हम शोक नहीं करते क्योंकि हम जानते हैं कि हमारा अस्तित्व बना रहता है।  और हम पूर्व अवस्था से उच्च अवस्था को प्राप्त कर रहे हैं। उसी प्रकार एक देह विशेष को त्याग कर जीवात्मा अपनी पूर्व वासनाओं के अनुसार अन्य देह को धारण करता है। इस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता है।

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।2.14।।
।।2.14।। हे कुन्तीपुत्र ! शीत और उष्ण और सुख दुख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग का प्रारम्भ और अन्त होता है;  वे अनित्य हैं,  इसलिए,  हे भारत ! उनको तुम सहन करो।।
आँख , कान , नाक , जिह्वा -और त्वचा पूरे शरीर तक फैली इन्द्रियाँ तो केवल उपकरण हैं जिनके द्वारा जीव विषय ग्रहण करता है उनको जानता है। जीव (आत्मा) के बिना केवल इन्द्रियाँ विषयों का ज्ञान नहीं करा सकतीं। जो पुरुष यह समझ लेता है कि जगत् की वस्तुयें नित्य परिवर्तनशील हैं उत्पन्न और नष्ट होती रहती हैं।  वह पुरुष इन वस्तुओं के कारण स्वयं को कभी विचलित नहीं होने देगा।
 काल के प्रवाह में भविष्य की घटनायें वर्तमान का रूप लेती हैं और हमें विभिन्न अनुभवों को प्रदान करके निरन्तर भूतकाल में समाविष्ट हो जाती हैं। जगत् की कोई भी वस्तु एक क्षण के लिये भी विकृत हुये बिना नहीं रह सकती । यहाँ परिवर्तन ही एक अपरिवर्तनशील नियम है।

शीत और उष्ण सफलता और असफलता सुख और दुख कोई भी नित्य नहीं हैं। जब वस्तुस्थिति ऐसी है तो प्रत्येक परिवर्तित परिस्थिति के कारण क्षुब्ध या चिन्तित होना अज्ञान का ही लक्षण है। जीवन में आने वाले कष्टों को चिन्तित हुये बिना शान्तिपूर्वक सहन करना चाहिये। सभी प्रकार की अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में विवेकी पुरुष इस तथ्य को सदा ध्यान में रखता है कि यह भी बीत जायेगाअनित्य शब्द से तात्पर्य यह है कि एक ही वस्तु किसी एक व्यक्ति के लिये ही कभी सुखदायक तो कभी दुखदायक हो सकती है।
शीतउष्ण आदि को समान भाव से सहने वाले व्यक्ति को क्या लाभ मिलेगा ? सुनिये
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते।।2.15।।
।।2.15।। हे पुरुषश्रेष्ठ ! दुःख और सुख में समान भाव से रहने वाले जिस धीर पुरुष को ये व्यथित नहीं कर सकते हैं वह अमृतत्व (मोक्ष) का अधिकारी होता है।।
उपनिषदों के अनुसार आत्मसाक्षात्कार के लिये-दुःख-सुख को समान भाव से सहन करना - सहनशीलता या तितिक्षा मनुष्य -चरित्र का एक आवश्यक गुण है । तितिक्षा का अर्थ निराश उदास भाव से जो हो रहा है उसको सहन करना ऐसा नहीं है। यहाँ प्रयोजन निराश व्यक्ति की सहनशक्ति से नहीं बल्कि जगत् के परिर्वतनशील स्वभाव को अच्छी प्रकार समझ लेने से है। विवेकी पुरुष में यह सार्मथ्य आ जाती है कि सुख में उसे हर्षातिरेक नहीं होता और न दुख में अत्यन्त विषाद। जब तक देह में रहना पड़ता है - प्रकृति के राज्य में हैं। ज्ञानदायिनी माँ सारदा को याद करना है - जो बिल्कुल अपनी माँ है !  
अमृतत्व का अर्थ है जो पुरुष अपने नित्य आत्मस्वरूप को पहचान लेता है वह इन सब अनुभवों को प्राप्त कर उनके मध्य रहता हुआ भी शोकमोह को प्राप्त नहीं होताक्योंकि उसे अपने अमृतस्वरूप का विस्मरण नहीं होता। जीवन में आने वाले सुख-दुःखादि कष्टों को चिन्तित हुये बिना प्रसन्नतापूर्वक सहन करने की सर्वोच्च साधना-  करने का अवसर मिलता है। विश्व के अनेक देशभक्त क्रान्तिकारियों ने अपने देश की स्वतंत्रता के आदर्शों को प्राप्त करने के लिए अनेक कष्ट सहन करके अपने प्राणों की आहुति दी है। निम्नलिखित कारणों से भी तुम्हारे लिए उचित है कि शोक और मोह को छोड़ कर तुम शान्तिपूर्वक शीतादि को सहन करो। क्योंकि
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः।।2.16।।
।।2.16।। असत् वस्तु का तो अस्तित्व नहीं है और सत् का कभी अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्त्व,  तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुषों के द्वारा देखा गया है।।
 स्वाभाविक ही सत्य वस्तु वह है जो त्रिकाल अबाधित है - भूतवर्तमान भविष्य इन तीनों कालों में भी नित्य अविकारी रूप में रहती है। 
असत् वस्तु वह है जिसकी भूतकाल में सत्ता नहीं थी और भविष्य में भी वह नहीं होगी परन्तु वर्तमान में उसका अस्तित्व प्रतीतसा होता है। वर्तमान में भी असत् ही है हमें दिखाई देने वाली वस्तुयें मिथ्या होने पर भी उन्हें सत् माना जाता है। प्रतीत होने पर भी स्वप्न मिथ्या है। अत तीनों काल में अबाधित वस्तु ही सत्य कहलाती है। शरीर मन और बुद्धि इन जड़ उपाधियों के साथ हमारा जीवन परिच्छिन्न है  इन तीनों में ही नित्य परिवर्तन हो रहा है। शरीर मन और बुद्धि के स्तर पर होने वाले असंख्य अनुभवों को एक सूत्र में धारण कर एक पूर्ण जीवन का अनुभव कराने के लिये निश्चय ही एक नित्य अपरिर्तनशील सत् वस्तु का अधिष्ठान आवश्यक है। मणियों को धारण करने वाले एक सूत्र के समान हममें कुछ है जो परिवर्तनों के मध्य रहते हुये विविध अनुभवों को एक साथ बांधकर रखता है।  सूक्ष्म विचार करने पर यह ज्ञान होगा कि वह कुछ अपनी स्वयं की चैतन्य स्वरूप आत्मा ( आत्मनिष्ठबुद्धि ? चैतन्य निष्ठ बुद्धि)है। असंख्य अनुभव जो प्रकाशित हुये उनमें से कोई अनुभव आत्मा नहीं है। जीवन जो कि अनुभवों की एक धारा है योग है इस चैतन्य के कारण ही सम्भव है। बाल्यावस्था युवावस्था और वृद्धावस्था में होने वाले अनुभवों को यह चैतन्य ही प्रकाशित करता है। अनुभव आते हैं और जाते हैं। जिस चैतन्य के कारण 'मैं'ने (चैतन्य ने)सबको जाना जिसके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है वह चैतन्य आत्मा जन्म और नाश से रहित नित्य सत्य वस्तु है। तत्त्वदर्शी पुरुष इन दोनों सत् और असत् आत्मा और अनात्मा (बुद्धि) के तत्त्व को पहचानते हैं। इन दोनों के रहस्यमय संयोग से यह विचित्र जगत् उत्पन्न होता है। फिर वह नित्य सद्वस्तु क्या है सुनो
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति।।2.17।।
।।2.17।। उस वस्तु को तुम अविनाशी जानों,  जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। इस अव्यय (भगवान) का नाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।
समस्त जगत् को जो व्याप्त किये हुये है और इस दृश्यमान अनुभव में आने वाले जगत् का जो अधिष्ठान है वह सत् (आत्मा) है। मिट्टी के बने अनेक प्रकार के पात्र होते हैं जिनके विभिन्न उपयोगों के कारण अथवा उनमें रखी वस्तुओं के कारण उनके विभिन्न नाम होते हैं परंतु विविध आकारों के होने पर भी वे सब एक मिट्टी के ही बने होते हैं जो सब आकारों में व्याप्त होती है और जिसके बिना किसी भी पात्र का अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता। उन सब की उत्पत्ति स्थिति और लय मिट्टी में ही है। अत उनमें मिट्टी ही वास्तव में सत्य है
इसी प्रकार यह नित्य परिवर्तनशील जगत् नित्य अविनाशी तत्त्व से व्याप्त है और भगवान् (आत्मा ) कहते हैं कि इस तत्त्व का विनाश कदापि सम्भव नहीं है।
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत।।2.18।।
।।2.18।। 
 आत्मा द्वारा धारण किये हुये भौतिक शरीर नाशवान् हैं जबकि आत्मा नित्य अविनाशी और अप्रमेय अर्थात् बुद्धि के द्वारा जानी नहीं जा सकती। इसलिये हे भारत ! तुम युद्ध करो।। इसका कारण यह है कि इन्द्रियाँ मन और बुद्धि आदि हमारे ज्ञान प्राप्ति के साधन हैं वे स्वत जड़ हैं और चैतन्य आत्मा की उपस्थिति में ही वे अन्य वस्तुओं को प्रकाशित कर सकते हैं। हे भारत तुम युद्ध करो , अर्थात प्रत्येक परिस्थिति का निष्ठापूर्वक और साहस के साथ सामना करो। 
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।।2.19।।
।।2.19।। जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसको मरा समझता है वे दोनों ही नहीं जानते हैं,  क्योंकि यह आत्मा न मरता है और न मारा जाता है।। 

न जायते म्रियते वा कदाचि
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।2.20।
।।2.20।। यह आत्मा किसी काल में भी न जन्मता है और न मरता है और न यह एक बार होकर फिर अभावरूप होने वाला है। यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है,  शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता।।
शरीर के समान आत्मा का जन्म नहीं होता क्योंकि वह तो सर्वदा ही विद्यमान है। तरंगों की उत्पत्ति होती है और उनका नाश होता है परन्तु उनके साथ न तो समुद्र की उत्पत्ति होती है और न ही नाश। जिसका आदि है उसी का अन्त भी होता है। उत्ताल तरंगे ही मृत्यु की अन्तिम श्वांस लेती हैं। सर्वदा विद्यमान आत्मा के जन्म और नाश का प्रश्न ही नहीं उठता। अत यहाँ कहा है कि आत्मा अज और नित्य है।
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्।।2.21।।

।।2.21।। हे पार्थ ! जो पुरुष इस आत्मा को अविनाशी (indestructible),नित्य (eternal) और अव्ययस्वरूप (inexhaustible) सदापूर्ण रहने जानता है, वह कैसे किसको मरवायेगा और कैसे किसको मारेगा?
जो पुरुष अविनाशी आत्मा को जानता है वह कभी जीवन की वास्तविकताओं का सामना करने में शोकाकुल नहीं होता। जिसको कोई सांसारिक चाहत ही नहीं है , ऐसा पुरुष न किसी को मारता है और न किसी के मरने का कारण बनता है।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।2.22।।
।।2.22।। जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही देही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।।
विकास की दृष्टि से जीव का ही देह का त्याग होता है और वह नये अनुभवों की प्राप्ति के लिये उपयुक्त नवीन देह को धारण करता है। उसमें कोई कष्ट नहीं है। यह विकास और परिवर्तन जीव के लिये है न कि चैतन्य स्वरूप आत्मा के लिये। आत्मा सदा परिपूर्ण है उसे विकास की आवश्यकता नहीं।
पुनर्जन्म क्यों होता है? न्यायशास्त्र में पुनर्जन्म को सिद्ध करने में तर्क दिया है -जातस्य हर्षभयशोक सम्प्रतिपत्तेः।। (न्यायशास्त्र-3.1.18)  यदि हम छोटे शिशु की गतिविधियों पर ध्यानपूर्वक विचार करते हैं, तब हमें यह ज्ञात होता है कि वह बिना किसी स्पष्ट कारण के कभी प्रसन्न, कभी उदास और कभी भयभीत दिखाई देता है।  छोटा शिशु अपने पूर्वजन्म का स्मरण करता रहता है और इसी कारण समय-समय पर उसकी मनोदशा में परिवर्तन देखने को मिलता है। हालांकि जैसे-जैसे उसकी आयु बढ़ती है उसके पूर्वजन्म की स्मृतियाँ विलुप्त हो जाती हैं। पुनर्जन्म के पक्ष में न्यायशास्त्र का दूसरा तर्क जिसमें यह कहा गया है- “स्तन्याभिलाषात्" (3.1.21)।  नवजात शिशु ने अपने पूर्व जन्मों में यहाँ तक कि पशु की योनि में भी स्तन से अपनी असंख्य माताओं का दूध पिया होता है। इसलिए जब माँ अपने बच्चे के मुँह में स्तन का अग्रभाग डालती है, तब बच्चा स्वतः अपने पूर्व जन्म के अभ्यास के कारण अपनी माँ का स्तनपान करना आरंभ कर देता है। [ शरीर में रहने तक माया का राज्य है। बिना 'ज्ञानदायिनी श्री श्री माँ सारदा देवी की प्रार्थना' किये ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके | शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते || कोई विवेकी और साधनचतुष्टय सम्पन्न मनुष्य भी  प्रवृत्ति से निवृत्ति में नहीं आ सकता है। ठाकुर ने भी श्रीश्री माँ के चरणों में माला रख दी थी।] 
 
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।।2.23।।

।।2.23।। इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते और न अग्नि इसे जला सकती है ; जल इसे गीला नहीं कर सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती।।
अविनाशी आत्मा चैतन्य है और जड़ (नश्वर) देह, इन्द्रिय , मन बुद्धि से परे होने के कारण अवयव -रहित (M/F शरीर रहित) है, अर्थात  सदा निर्लिप्त है। अवयव रहित (2H से अनासक्त) होने के कारण तलवार आदि शस्त्र इसके अङ्गों के टुकड़े नहीं कर सकते। वैसे ही अग्नि इसको जला नहीं सकता अर्थात् अग्नि भी इसको भस्मीभूत नहीं कर सकता, और जल भी  इसको भिगो नहीं सकता।  क्योंकि  निरवयव आत्मा में ऐसा होना सम्भव नहीं। सिद्धांत यह है कि स्थूल साधन अपने से सूक्ष्म वस्तु का नाश नहीं कर सकता । अभिप्राय यह कि मनुष्य के तीन प्रमुख अवयव हैं- 3'H' उनमें से यह (Heart-2.5 आखर 'प्रेम' है ढाई आखर प्रेम का पढ़ा सो पण्डित है। दादा ने कहा था तुम गीता पर अपना भाष्य लिखो !)
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः।।2.24।।
।।2.24।। क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य (काटी नहीं जा सकती), अदाह्य (जलाई नहीं जा सकती),  अक्लेद्य (गीली नहीं हो सकती) और अशोष्य (सुखाई नहीं जा सकती) है;  यह नित्य,  सर्वगत, स्थाणु , अचल और सनातन है।।

(गीता 3:42 में भी कहा गया है - 

 इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्य: परं मन: |
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे: परतस्तु स: || 42|| 

"इन्द्रियों से परे इन्द्रियों के विषय हैं, इन्द्रियों के विषय से सूक्ष्म मन, मन से परे बुद्धि और बुद्धि से सूक्ष्म आत्मा है।
कठोपनिषद् में भी वर्णन किया गया है- 

इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।

मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः।। 

(कठोपनिषद्-1.3.10)

कठोपनिषद् में भी वर्णन किया गया है कि आत्मा भौतिक ऊर्जा (E=Mc2) से भी सूक्ष्म होने के कारण हमारी बुद्धि की पहुंच से बाहर है।

हमारी आँखें भौतिक तत्वों (माया) से बनी हैं और केवल इन्द्रियगोचर सांसारिक विषयों का ही अवलोकन कर सकती हैं। चूँकि आत्मा दिव्य है, अर्थात इन्द्रियातीत या कालातीत और अकाल पुरुख है। इसलिए (माया से बने) भौतिक यंत्रों के क्षेत्र से परे है इसलिए यह हमारी आँखों के लिए अदृश्य है। हमारी लौकिक बुद्धि केवल सांसारिक विषयों को समझ-बूझ सकती है लेकिन अपनी चिन्तन शक्ति से दिव्य आत्मा तक नहीं पहुंच सकती। अतः अलख -निरंजन आत्मा को जानने के लिए आंतरिक ज्ञान आवश्यक है जो केवल शास्त्रों और गुरु द्वारा सुलभ है।
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि।।2.25।।
।।2.25।। यह आत्मा अव्यक्त,  अचिन्त्य और अविकारी कहा जाता है;  इसलिए इसको इस प्रकार जानकर तुमको शोक करना उचित नहीं है।।
छः दर्शन जो वैदिक प्रमाणों को स्वीकार करते हैं उन्हें आस्तिक दर्शन कहा जाता है। ये मीमांसा, वेदान्त, न्याय, वैशेषिक, सांख्य और योग हैं। 
इन्द्रियगोचर वस्तु व्यक्त कही जाती है। अत जो इन्द्रियों से परे है वह अव्यक्त है। अव्यक्त पंचमहाभूतों में जो सबसे अधिक स्थूल है पृथ्वी उसका ज्ञान पांचों ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा होता है। परन्तु जैसे जैसे सूक्ष्मतर तत्त्व तक हम पहुँचते हैं वैसे यह ज्ञात होता है कि जल में गंध नहीं है , अग्नि में रस नहीं है, वायु में रूप भी नहीं है। इस प्रकार आकाश सूक्ष्मतम होने से दृष्टिगोचर नहीं होता। 
यद्यपि मैं किसी वृक्ष के बीज में छुपे वृक्ष को देखसुन नहीं सकता हूँ और न उसका स्वाद स्पर्श या गंध ज्ञात कर सकता हूँ तथापि मैं जानता हूँ कि यही बीज वृक्ष का कारण है। इस स्थिति में कहा जायेगा कि बीज में वृक्ष अव्यक्त अवस्था में है। इस प्रकार आत्मा को अव्यक्त कहने का तात्पर्य यह है कि वह इन्द्रियों के द्वारा जानने योग्य विषय नहीं है। अचिन्त्य आत्मा इन्द्रियों का विषय नहीं है उसी प्रकार यहाँ वह अचिन्त्य है कहकर यह दर्शाते हैं कि जड़ मन और बुद्धि के द्वारा हम चैतन्य आत्मा का मनन और चिन्तन नहीं कर सकते जैसे अन्य विषयों का विचार सम्भव है। इस प्रकार श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश करते हैं कि आत्मा को उसके शुद्ध रूप से पहचान कर शोक करना त्याग देना चाहिए। ज्ञानी पुरुष अपने को न मारने वाला समझता है और न ही मरने वाला मानता है।
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि।।2.26।।
।।2.26।। और यदि तुम आत्मा को नित्य जन्मने और नित्य मरने वाला मानो तो भी,  हे महाबाहो!  इस प्रकार शोक करना तुम्हारे लिए उचित नहीं है।।
जन्मने वाले का मरण और मरनेवाला जन्म यह दोनों अवश्य ही होने वाले हैं।
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।2.27।।
।।2.27।। जन्मने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है;  इसलिए जो अटल है अपरिहार्य - है उसके विषय में तुमको शोक नहीं करना चाहिये।।
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।।2.28।।
।।2.28।। हे भारत ! समस्त प्राणी जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद अव्यक्त अवस्था में रहते हैं और बीच में व्यक्त होते हैं। फिर उसमें चिन्ता या शोक की क्या बात है ?
जो लोग जन्म के पूर्व अव्यक्त या अज्ञात थे , बीच में कुछ समय के लिए दिखाई पड़ रहे हैं, और जो विनाश के बाद पुनः अज्ञात हो जायेंगे। स्वजन लोग जन्म के पूर्व तुम्हारे कौन थे ? -सभी यात्री एक धर्मशाला में रात भर रुक कर, सुबह अपने-अपने गंतव्य स्थान पर चले जायेंगे।   
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्।।2.29।।
।।2.29।। कोई इसे आश्चर्य के समान देखता है;  कोई इसके विषय में आश्चर्य के समान कहता है;  और कोई अन्य पुरुष इसे आश्चर्य के समान सुनता है;  और फिर कोई सुनकर भी नहीं जानता।।
 स्वयं को M/F समझने वाला एक र्मत्य जीव अमरत्व से उतना ही दूर है जितना कि स्वप्नद्रष्टा जाग्रत पुरुष से। जो मनुष्य अपने आत्मस्वरूप के वैभव  (सच्चिदानन्द)के प्रति जागरूक है वही ईश्वर है। और स्वस्वरूप के वैभव से विस्मृत ईश्वर ही मोहित जीव (M/F) है।  जब वह आत्मविकास की साधना (3H विकास के 5 )अभ्यास करके/ माँ की कृपा से अपने आनन्दस्वरूप को पहचानता है तब वह उस इन्द्रियातीत अनन्त आनन्दस्वरूप का अनुभव कर आश्चर्यचकित रह जाता है। आश्चर्य की भावना जब मन में उठती है तब आश्चर्यचकित व्यक्ति (आत्मा?) को और कुछ सूझता ही नहीं और वह उस क्षण उस भावना के साथ तदाकार हो जाता है। आत्मानुभव का  आनन्द वह आनंद है जब अहंकार जीव (M/Fबिना देह, इन्द्रिय, मन बुद्धि ) समाप्त होकर शुद्ध अनन्तस्वरूप मात्र रह जाता है।
 ज्ञानी पुरुष जानता है कि मैं आत्मा हूँ जिसने शरीर धारण किया है ।इस श्लोक से अज्ञानी पुरुष को भी श्रवण मनन और निदिध्यासन के द्वारा इस विरले प्रकार के श्रेष्ठ ज्ञान को प्राप्त करने की प्रेरणा मिल सकती है। आत्मतत्त्व (अवतार वरिष्ठ) को विषय के रूप में नहीं जाना जा सकता। इसीलिए यहाँ कहा गया है कि इसको सुनकर कोई भी व्यक्ति इसे नहीं जानता।
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि।।2.30।।
।।2.30।। हे भारत ! यह देही आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य है, इसलिए समस्त प्राणियों के लिए तुम्हें शोक करना उचित नहीं।।
 सम्पूर्ण प्राणियों के शरीरों का नाश किये जानेपर भी इस आत्मा का नाश नहीं किया जा सकता इसलिये भीष्मादि सब प्राणियों के उद्देश्य से तुझे शोक करना उचित नहीं है।
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाछ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते।।2.31।।
।।2.31।। और स्वधर्म को भी देखकर तुमको विचलित होना उचित नहीं है,  क्योंकि धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारक कर्त्तव्य क्षत्रिय के लिये नहीं है। [तत्वमसि - आत्मा का कोई कार्य नहीं ? अज्ञान से अपने को क्षत्रिय मानने का कार्य] 
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्।।2.32।।
।।2.32।। और हे पार्थ ! अपने आप प्राप्त हुए और स्वर्ग के लिए खुले हुए द्वाररूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं।।
अथ चैत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि।।2.33।।
।।2.33।। और यदि तुम इस धर्मयुद्ध को स्वीकार नहीं करोगे,  तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त करोगे।।
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।।2.34।।
।।2.34।। और सब लोग तुम्हारी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति को भी कहते रहेंगे;  और सम्मानित पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी अधिक होती है।।
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्।।2.35।।
।।2.35।। और जिनके लिए तुम बहुत माननीय हो उनके लिए अब तुम तुच्छता को प्राप्त होओगे,  वे महारथी लोग तुम्हें भय के कारण युद्ध से निवृत्त हुआ मानेंगे।।
अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्।।2.36।।
।।2.36।। तुम्हारे शत्रु तुम्हारे सार्मथ्य की निन्दा करते हुए बहुत से अकथनीय वचनों को कहेंगे,  फिर उससे अधिक दु:ख क्या होगा ?
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः।।2.37।।
।।2.37।। युद्ध में मरकर तुम स्वर्ग प्राप्त करोगे या जीतकर पृथ्वी को भोगोगे;  इसलिय, हे कौन्तेय ! युद्ध का निश्चय कर तुम खड़े हो जाओ।।

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।

ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।।2.38।।

।।2.38।। सुख-दु:ख,  लाभ-हानि और जय-पराजय को समान करके युद्ध के लिये तैयार हो जाओ;  इस प्रकार तुमको पाप #नहीं होगा।।
अनासक्त होकर , फलाकांक्षा छोड़कर तथा समबुद्धि होकर अपना युद्धरूप कर्तव्य कर्म करने पर तुम्हें पाप स्पर्श भी नहीं कर सकेगा। इस प्रकार की समबुद्धि को ही योग कहते हैं। यही गीता -शास्त्रोक्त निष्काम कर्मयोग है। 
एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु।
बुद्ध्यायुक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि।।2.39।।
।।2.39।। हे पार्थ ! तुम्हें सांख्य विषयक ज्ञान कहा गया और अब इस (कर्म) योग से सम्बन्धित ज्ञान को सुनो जिस ज्ञान से युक्त होकर तुम कर्मबन्ध का नाश कर सकोगे।।
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।।2.40।
।।2.40।। मनुष्यलोकमें इस समबुद्धिरूप धर्मके आरम्भका नाश नहीं होता, इसके अनुष्ठानका उलटा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ासा भी अनुष्ठान (जन्म-मरणरूप) महान् भयसे रक्षा कर लेता है।
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्।।2.41।।
।।2.41।। हे कुरुनन्दन! इस समबुद्धि की प्राप्ति के विषयमें व्यवसायात्मिका बुद्धि एक ही होती है। अव्यवसायी मनुष्योंकी बुद्धियाँ अनन्त और बहुशाखाओंवाली ही होती हैं।
आत्मसाक्षात्कार की सर्वोच्च उपलब्धि केवल इसलिये सम्भव होती है कि साधक दृढ़ निश्चय और एकाग्र चित्त से सामान्य बुद्धि को देह-इन्द्रिय -मन, अहंकार से खींचकर विवेकी बुद्धि बनाकर,  निरंतर आत्मा में जोड़े रखने का (बुद्धियोग का) अभ्यास करता है। 
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चित: |
वेदवादरता: पार्थ नान्यदस्तीति वादिन: || 42||
कामात्मान: स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् |
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति || 43||
।।2.42।। ।।2.42 -- 2.43।। हे पृथानन्दन ! 
हे पार्थ अविवेकी पुरुष वेदवाद में रमते हुये जो यह पुष्पिता (दिखावटी शोभा की) वाणी बोलते हैं? इससे (स्वर्ग से) बढ़कर और कुछ नहीं है।।वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकारकी जिस पुष्पित (दिखाऊ शोभायुक्त) वाणीको कहा करते हैं, जो कि जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है तथा भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये बहुतसी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है।
"जो स्वर्ग जैसे उच्च लोकों का सुख पाने के प्रयोजन से वेदों में वर्णित आडम्बरपूर्ण कर्मकाण्डों में व्यस्त रहते है और स्वयं को धार्मिक ग्रंथों का विद्वान समझते हैं वास्तव में वे मूर्ख हैं। वे एक अंधे व्यक्ति द्वारा दूसरे अंधे को रास्ता दिखाने वाले के समान हैं।"

भोग ऐश्वर्य प्रसक्तानाम्' तया अपहृत-चेतसाम्। 

व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते।।

(2.44) 

।।2.44।। उससे जिनका चित्त हर लिया गया है ऐसे भोग और एश्र्वर्य‌ मॆ आसक्ति रखने वाले पुरुषों के अन्तकरण मे निश्चयात्मक् बुद्धि नही हॊती अर्थात वे ध्यान का अभ्यास करने योग्य‌ नही होते। जिनका मन इन्द्रिय के सुखों के प्रति निरंतर आसक्त रहता है। कर्मफल पाने की इच्छा और चिन्ता के कारण जिनकी सदसद् विवेक की क्षमता खो गयी है। वे अविवेकी मनुष्य जो 'ब्रह्मसत्य -जगत मिथ्या , जीवो ब्रह्मैव न अपरः ' महावाक्य को नहीं समझते, इसलिए अपनी बुद्धि का प्रयोग वे निरंतर अपनी आय बढ़ाने, (जमीन -जायदाद खरीदने/F-D बढ़ाने) अपनी लौकिक प्रतिष्ठा बढ़ाने और भौतिक सुखों का संवर्धन करने (फुटानी चौक) में करते हैं। इस प्रकार से भ्रमित होकर वे भगवतप्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए अपेक्षित दृढ़-संकल्प धारण करने में असमर्थ रहते हैं।
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्।।2.45।।

।।2.45।। हे अर्जुन वेदों का विषय तीन गुणों से सम्बन्धित (संसार से) है तुम त्रिगुणातीत, निर्द्वन्द्व, नित्य सत्त्व (शुद्धता-आत्मनिष्ठ बुद्धि) में स्थित, योगक्षेम से रहित और आत्मवान् बनो।।
"Be and Make !" आत्मवान् बनो ! और दूसरों को आत्मवान बनने में सहायता करो। 
विभिन्न अनुपातों में सत्त्व रज और तम इन तीन गुणों के संयोग से जीवों के अन्तःकरण (चित्त,मन, बुद्धि और अहंकार) का निर्माण हुआ है। अन्तःकरण इन तीन गुणों का ही कार्य हैतीन गुणों के परे जाने का अर्थ है 'ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या ' को पहचान कर मिथ्या अहंकार या देहाभिमान का त्याग,  M/F जीव भाव का त्याग, क्योंकि जीव भी ब्रह्म ही है पर इसकी अनुभूति नहीं हुई इसीलिए ब्रह्म अर्थात बृहद बनने के चक्कर में जमीन-जायदाद बढ़ा रहा है । 
इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में त्रिगुणों के ऊपर उठकर असीम आनन्द में स्थित होने की साधना बतायी गयी है। पूर्व उपदिष्ट समत्व भाव का ही उपदेश यहाँ दूसरे शब्दों में किया गया है। परस्पर भिन्न एवं विपरीत लक्षणों वाले सुख-दुख, शीत-उष्ण, लाभ-हानि इत्यादि जीवन के द्वन्द्वात्मक अनुभव हैं। इन सब में सम-भाव में रहने का अर्थ ही निर्द्वन्द्व होना ही इनसे मुक्त होना है। माया- मोह (मृगमरीचिका)  का अर्थ है वस्तु को यथार्थ रूप में न पहचानना -आवरण। तपते रेगिस्तान के रेत पर पानी देखना ही , बुद्धि पर आवरण है जगत की मिथ्या वस्तुएं सत्य जैसी लगती हैं। जिसके कारण वस्तु का अनुभव किसी अन्य रूप मे ही होता है जिसे विक्षेप कहते हैं और जिसका परिणाम है शोक। अतः  सत्वगुण में स्थित होने का अर्थ विवेक-जनित शान्ति में स्थित होना । सत्त्वस्थ बनने के लिए सतत् सजग प्रयत्न की अपेक्षा है। 
निर्योगक्षेम यहाँ योग का अर्थ है अप्राप्त वस्तु को प्राप्त करना और प्राप्त वस्तु के रक्षण का नाम है क्षेम। निर्योगक्षेम बनने का अर्थ है इन दोनों को त्याग देना जिससे चिन्ताओं से मुक्ति तत्काल ही मिलती हैं। जब इस ज्ञान को जीवन में उतारने की व्यावहारिक विधि का भी उपदेश दिया गया हो। इस श्लोक में ऐसी विधि का निर्देश आत्मवान भव इन शब्दों में किया गया है। द्वन्द्वों तथा योगक्षेम के कारण उत्पन्न दुख और पीड़ा केवल तभी सताते हैं जब हमारी बुद्धि /दृष्टि /मति देहाभिमानी हो जाती है - आत्मवान नहीं रहती ? अपने देह को 'मैं 'मान कर -सांसारिक नाते-रिश्तों को (भाई-बहन, पत्नी -पुत्र-पुत्री, नाती -पोता को)  और 'मेरा' समझने का भ्रम से बुद्धि भ्रमित हो जाती है। तब हमारी भ्रमित बुद्धि का तादात्म्य आत्मा (ईश्वर, ब्रह्म) के साथ न होकर मिथ्या अहंकार और स्वार्थ की अधिकता से होती है। 
इन नश्वर जड़ देह-मन की उपाधियों के साथ विद्यमान तादात्म्य को छोड़कर इनसे भिन्न अपने शुद्ध अविनाशी चैतन्य स्वरूप आत्मा के प्रति सतत जागरूक रहने का अभ्यास ही आत्मवान होने का उपाय अर्थात् आत्मस्वरूप में स्थित होने का उपाय है। इसकी सिद्धि होने पर मिथ्या अहंकार (मैं नश्वर देह हूँ - ऐसा जीवभाव) नष्ट हो जाता है और वह साधक त्रिगुणों के परे आत्मा में स्थित हो जाता है। ऐसे सिद्ध पुरुष के लिए वेदों का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। वास्तव में आत्मज्ञानी पुरुष (नवनीदा जैसे गृहस्थ नेता होने) के होने के कारण ही वेद-वाक्यों 'तत्वमसि' -जैसे महावाक्यों का प्रामाण्य सिद्ध होता है

यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः।।

(2.46)

।।2.46।। सब ओर से परिपूर्ण जलराशि के होने पर मनुष्य का छोटे जलाशय में जितना प्रयोजन रहता है,  आत्मज्ञानी ब्राह्मण का सभी वेदों में उतना ही प्रयोजन रहता है।।
वेद हमें अपने ही शुद्ध चैतन्यस्वरूप का बोध कराते हैं। जब तक अविद्यायुक्त अहंकार का अस्तित्व है तब तक वेदाध्ययन की आवश्यकता अपरिहार्य है। 
  आत्मबोध के होने पर उस ज्ञानी पुरुष के कारण वेदों का (महावाक्यों का) भी प्रामाण्य सिद्ध होता है। गणित की सर्वोच्च शिक्षा प्राप्त कर लेने पर उस व्यक्ति को पहाड़े रटने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती; क्योंकि उसके पूर्ण ज्ञान (सर्वमंगल मांगल्ये की प्रार्थना) में इस प्रारम्भिक ज्ञान का समावेश रहता है। [ इस पर स्वामी जी का भाष्य है। दादा का ) 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47।।

।।2.47।। कर्म करने मात्र में तुम्हारा अधिकार है, फल में कभी नहीं। तुम कर्मफल के हेतु वाले मत होना और अकर्म में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।।
अनुचित संकल्प-विकल्प जीवन के विष हैं। आगामी कल की फसल आज के जोतने और बीज बोने पर निर्भर है। उन्नत भविष्य के लिए वर्तमान समय का उपयोग बुद्धिमत्तापूर्वक करना चाहिये। भगवान् का आह्वान है कि मनुष्य को व्यर्थ की चिन्ताओं में प्राप्त समय को नहीं खोना चाहिये वरन् बुद्धिमत्तापूर्वक उसका सदुपयोग करना चाहिये। भविष्य का निर्माण अपने आप होगा और कर्मयोगी को श्रेष्ठ आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होगी ।
संक्षेप में इस उपदेश का प्रयोजन मनुष्य को चिन्ता मुक्त बनाकर कर्म करते हुये दैवी आनन्द में निमग्न रहकर जीना सिखाना है। कर्म करना ही उसके लिये सबसे बड़ा पुरस्कार और उपहार है श्रेष्ठ कर्म करने के सन्तोष और आनन्द में वह अपने आपको भूल जाता है। कर्म है साधन और आत्मानुभूति है साध्य।
ईश्वर का स्मरण करते हुये सभी बाह्य चुनौतियों का तत्परता से सामना करते हुये मनुष्य सरलतापूर्वक शान्ति और वासना क्षय द्वारा चित्त की शुद्धि प्राप्त कर सकता है। जितनी अधिक मात्रा में चित्त में शुद्धि होगी उतनी ही अधिक आत्मानुभूति उसे सुलभ होगी।

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।

(2.48)

।।2.48।। हे धनंजय आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाव होकर योग में स्थित हुये तुम कर्म करो। यह समभाव ही योग कहलाता है।।
 इस श्लोक में प्रथम बार योग शब्द का प्रयोग किया गया है और यहीं पर उसकी परिभाषा भी दी है कि समत्व योग कहलाता है। इस योग में दृढ़ स्थित होने पर ही निष्काम कर्म किये जा सकते हैं। इसके लिये उपाय है कर्मों के तात्कालिक फलों के प्रति संग (आसक्ति) का त्याग।
 यह 'अहंकार' क्या है ? भूतकाल की स्मृतियों और भविष्य की आशाओं की गठरी। इस अहंकार का विस्मरण करके (मैं प्रभु का दास होकर) कर्म करने में ही पूर्ण आनन्द है। ऐसे कर्म का फल सदैव महान् होता है। जीवन में किसी कार्य को पूरी लगन और उत्साह से जब हम कर रहे होते हैं उस समय यदि वहाँ कोई व्यक्ति आकर खड़ा हो जाये तब भी हमें उसका भान नहीं रहता। आनन्द की उस अनुभूति से नीचे अहंकार के स्तर पर उतर कर आगन्तुक को उत्तर देने में भी हमें कुछ समय लग जाता है।
अहंकार को भूलकर (दास बनकर) जो कार्य किये जाते हैं उनमें कर्ता को यश अथवा अपयश की कोई चिन्ता नहीं रहती।  क्योंकि फल की चिन्ता का अर्थ है भविष्य की चिन्ता और भविष्य में रहने का अर्थ है वर्तमान को खोना।  स्फूर्त जीवन का आनन्द वर्तमान के प्रत्येक क्षण में निहित होता है। कहा जाता है कि प्रत्येक क्षण का आनन्द स्वयं में परिपूर्ण है। 
अतः भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन की सभी परिस्थितियों में समान रहते हुये कर्म करने का उपदेश देते हैं
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः।।2.49।।

।।2.49।। इस बुद्धियोग की तुलना में (सकाम) कर्म अत्यन्त निकृष्ट हैं? इसलिये हे धनंजय तुम बद्धि की शरण लो फल की इच्छा करनेवाले कृपण (दीन) हैं।।
देह से सूक्ष्म इन्द्रिय हैं, इन्द्रियों से सूक्ष्म है मन और मन से सूक्ष्म है बुद्धि -बुद्धि से भी सूक्ष्म है आत्मा (विवेकी-बुद्धि)। बुद्धि का आत्मा (शुद्ध बुद्धि या विवेक-सम्पन्न बुद्धि) के अनुशासन में रहना तथा अन्तर्बाह्य परिस्थितियों का स्वामी होना बुद्धियोग के लक्षण हैं। 
जीवन के परम लक्ष्य - आत्मवान बनने के लक्ष्य को आँखों से ओझल किये बिना प्राप्त कर्तव्यों का पालन ही बुद्धियोग है।
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।।2.50।।
।।2.50।। समत्वबुद्धि युक्त पुरुष यहां (इस जीवन में) पुण्य और पाप इन दोनों कर्मों को त्याग देता है, इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ। कर्मों में कुशलता योग है।।
 पाप और पुण्य मन की धारणायें हैं और उनकी प्रतिक्रियाएँ मन पर वासनाओं के रूप में अंकित होती हैं। 
 गीता का मानव मात्र को आह्वान है कि वह केवल इन्द्रियों के विषय नश्वर स्थूल देह और मन के स्तर पर ही न रहे जो उसके व्यक्तित्व का बाह्यतम पक्ष है। इनसे सूक्ष्मतर बुद्धि का उपयोग कर उसको अपने वास्तविक ब्रह्मत्व (आत्मा) को व्यक्त करना चाहिये। प्राणियों की सृष्टि में केवल विवेक-सम्पन्न बुद्धि का होना केवल मनुष्य की विशेषता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को (उसके माध्यम से प्रत्येक मनुष्य को) मानसिक चिंता त्यागकर परिस्थितियों का स्वामी बनकर वीर पुरुष के समान आत्मवान बनकर  रहने का उपदेश देते हैं। 
उस समय अर्जुन इतना भावुक और दुर्बल हो गया था कि वह अपनी व अन्यों के शारीरिक सुरक्षा की चिन्ता करने लगा था। विकास की सीढ़ी पर मनुष्यत्व को प्राप्त कर जो अपनी विशेष क्षमताओं (विवेक-सम्पन्न बुद्धि) का पूर्ण उपयोग करता है वही व्यक्ति जन्म जन्मान्तरों में अर्जित वासनाओं के बन्धन से (देहाभिमान से) मुक्त हो जाता है।  इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ यह भगवान् श्रीकृष्ण का उपदेश है। 
इसके पूर्व समत्व को योग कहा गया था। अब इस सन्दर्भ में व्यासजी योग की और विशद परिभाषा देते हैं कि कर्म में कुशलता योग है। इस श्लोक में  कहा गया है कि समस्त प्रकार के द्वन्द्वों में मन के सन्तुलन को न खोकर कुशलतापूर्वक कर्म करना ही कर्मयोग है। कर्मयोग की भावना से कर्म करने पर वासनाओं का क्षय होता है। वासनाओं के दबाव से ही मन में विक्षेप उठते हैं। किन्तु वासना क्षय के कारण मन स्थिर और शुद्ध होकर मनन निदिध्यासन और आत्मानुभूति के योग्य बन जाता है।
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्।।2.51।।
।।2.51।। बुद्धियोग युक्त मनीषी लोग कर्मजन्य फलों को त्यागकर जन्मरूप बन्धन से मुक्त हुये अनामय अर्थात् निर्दोष पद को प्राप्त होते हैं।।
देहाभिमान (अहंकार) और स्वार्थ से रहित व्यक्ति ही मनीषी कहलाता है। देह-के साथ तादात्म्य से अहंकार उत्पन्न होता है और वह फलासक्ति के कारण बन्धनों में फँस जाता है। जीवन में उच्च लक्ष्य- (ईश्वर प्राप्ति)  को रखने पर ही अहंकार (देहाभिमान) और स्वार्थ का त्याग संभव है।
         भौतिक सुखों में लिप्त सांसारिक मनोवृत्ति वाले लोग जानते हैं कि वे वास्तव मे दुःखी हैं किन्तु वे सोचते हैं कि जो अन्य लोग उनसे अधिक समृद्ध हैं, वे सुखी होंगे और इसलिए वे भी सांसारिक सुख सुविधाओं को बढ़ाने की दिशा की ओर निरन्तर भागने में लगे रहते हैं। यह अंधी दौड़ अनेक जन्मों तक चलती रहती है और फिर भी सुख की कोई किरण दिखाई नहीं देती। जब लोगों को यह अनुभव होता है कि सकाम कर्मों में संलग्न होने से कभी भी कोई मनुष्य सुख प्राप्त नहीं कर सकता, तब उन्हें समझ में आता है कि वे जिस दिशा की ओर भाग रहे हैं, वह निस्सार है और फिर वे आध्यात्मिक जगत की ओर मुड़ने के लिए सोचते हैं। 
वे बुद्धिमान पुरुष जो आध्यात्मिक ज्ञान से दृढ़-निश्चयी हो जाते हैं वे यह जान जाते हैं कि भगवान सभी पदार्थों के भोक्ता हैं। परिणामस्वरूप वे अपने कर्मों के प्रति आसक्ति के भाव को त्याग कर सब कुछ भगवान को अर्पित करते हैं और सुख-दुःख आदि सभी को समान रूप से स्वीकार करते हैं। ऐसा करने से उनके कर्म अपने फलों से मुक्त हो जाते हैं जो मनुष्य को जन्म और मृत्यु के बंधन मे बांधते हैं। 
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।।2.52।।
।।2.52।। जब तुम्हारी बुद्धि मोहरूप दलदल (कलिल) को तर जायेगी तब तुम उन सब वस्तुओं से निर्वेद (वैराग्य) को प्राप्त हो जाओगे जो सुनने योग्य और सुनी हुई हैं।।
स्वरूप से दिव्य होते हुये भी चैतन्य आत्मा मोहावरण में फँसी हुई प्रतीत होती है। इस मोह का कारण है एक अनिर्वचनीय शक्ति माया।
बुद्धि पर आत्मस्वरूप के अज्ञान के रूप में पड़े इस आवरण को वेदान्त में माया की आवरण शक्ति कहा गया है। इस श्लोक में कहा गया है कि कर्मयोग की भावना से कर्म करते रहने पर बुद्धि की शुद्धि होती है और तब उसके लिये सम्भव होता है कि आवरण को हटाकर आत्मस्वरूप का साक्षात्कार कर सके। 
आनन्दस्वरूप के अज्ञान के कारण विषयों को पाने के लिये चल रही मनुष्य की भागदौड़ स्वत समाप्त हो जाती है जब वह स्वस्वरूप को पहचान लेता है। कर्मयोगी की बुद्धि न तो पूर्वानुभूत विषय सुखों का स्मरण करती है और न ही भविष्य में प्राप्त होनेवाले अनुभवों की आशा
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।।2.53।।
।।2.53।। जब अनेक प्रकार के विषयों को सुनने से विचलित हुई तुम्हारी बुद्धि आत्मस्वरूप में अचल और स्थिर हो जायेगी तब तुम योग को प्राप्त करोगे।।
जब पाँचो ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण करने पर भी जिसकी बुद्धि अविचलित रहती है तब उसे योग में स्थित समझा जाता है। सामान्यत इन्द्रियों के विषय ग्रहण के कारण मन में अनेक विक्षेप उठते हैं। योगस्थ पुरुष का मन इन सबमें निश्चल रहता है। उसके विषय में आगे स्थितप्रज्ञ के लक्षण और अधिक विस्तार से बताते हैं।

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्।।2.54।।

।।2.54।। अर्जुन ने कहा -- हे केशव समाधि में स्थित स्थिर बुद्धि वाले पुरुष का क्या लक्षण है स्थिर बुद्धि पुरुष कैसे बोलता है कैसे बैठता है कैसे चलता है ? 
 इस प्रकरण में स्थितप्रज्ञ का अर्थ है वह पुरुष जिसे आत्मा का अपरोक्ष अनुभव हुआ हो
प्रचलित वर्णनों के अनुसार नये जिज्ञासु साधक की कल्पना होती है कि ज्ञानी पुरुष इस व्यावहारिक जगत् के योग्य नहीं रह जाता।
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।।2.55।।
।।2.55।। श्री भगवान् ने कहा -- हे पार्थ,  जिस समय पुरुष मन में स्थित सब कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है; उस समय वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।
अज्ञान दशा में मनुष्य स्वयं को परिच्छिन्न अहंकार (देहाM/F) के रूप में जानता है। इसलिये विषयोपभोग की स्पृहा अपनी भावनाओं एवं विचारों के साथ आसक्ति स्वाभाविक होती है। अज्ञान के नष्ट होने पर यह अहंकार (देहाभिमान) अपने शुद्ध अनन्त स्वरूप में विलीन हो जाता है और स्थितप्रज्ञ पुरुष आत्मा द्वारा आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है। सब कामनायें समाप्त हो जाती हैं क्योंकि वह स्वयं आनन्दस्वरूप बनकर स्थित हो जाता है।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।2.56।।
।।2.56।। दुख में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता सुख में जिसकी स्पृहा निवृत्त हो गयी है, जिसके मन से राग (स्वयं को देह समझने के कारण M/F आकर्षण) भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं ! वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।
स्थितप्रज्ञ का मुख्य लक्षण है आत्मानन्द की अनुभूति द्वारा सब कामनाओं का त्याग। श्रीकृष्ण ज्ञानी की पहचान का दूसरा लक्षण बताते हैं सुख और दुख में मन का समत्व रहना। स्थितप्रज्ञ मुनि वह है जो राग भय और क्रोध से मुक्त है।   राग ही निमित्त-वशात् क्रोध के रूप में व्यक्त होता है। श्री शंकराचार्य जी भाष्य में लिखते हैं कि ज्ञानी पुरुष त्रिविध तापों में स्थिरचित्त रहता है। वे त्रिविध दुख हैं (क) आध्यात्मिक शरीर में रोग आदि (ख) आधिभौतिक बाह्य वस्तुओं आदि से प्राप्त जैसे व्याघ्र चोर आदि (ग) आधिदैविक प्रकृति के प्रकोप जैसे भूकम्प तूफान आदि। 
ईंधन के डालने पर अग्नि प्रज्वलित होती है। परन्तु ज्ञानी पुरुष में अनेक विषय रूप ईंधन डालने पर भी इच्छा की अग्नि उग्ररूप धारण नहीं करती। ऐसे पुरुष को कहते हैं स्थितप्रज्ञ मुनि।

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।

नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2.57।।

।।2.57।। जो सर्वत्र अति स्नेह से रहित हुआ उन शुभ तथा अशुभ परिस्थितियों को प्राप्त कर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है,  उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित (स्थिर) है।।
यहाँ स्थितप्रज्ञ पुरुष की अनासक्ति का वर्णन है। बाह्य विषयों से वैराग्य होने के साथसाथ सभी परिस्थितियों का सामना करने के लिए मन के आन्तरिक सन्तुलन की भी आवश्यकता होती है। शुभ प्राप्ति में हर्षातिरेक का और अशुभ प्राप्ति में द्वेष और विषाद का अभाव ये आत्मज्ञानी के लक्षण हैं।
हमारा जीवन भी शुभ-अशुभ का सुख -दुःख का मिश्रण है। यह तो उसका स्वभाव ही है।  ज्ञानी पुरुष अपने नित्य स्वरूप में स्थित होने के कारण जीवन की उत्कृष्ट एवं निकृष्ट परिस्थितियों में पूर्ण वैराग्य के साथ रहता है।
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2.58।।
।।2.58।। कछुवा अपने अंगों को जैसे समेट लेता है वैसे ही यह पुरुष जब सब ओर से अपनी इन्द्रियों को इन्द्रियों के विषयों से परावृत्त कर लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है।।

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।

रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।।2.59।।

।।2.59।। निराहारी देही पुरुष से विषय तो निवृत्त (दूर) हो जाते हैं? परन्तु (उनके प्रति) राग नहीं परम तत्व को देख लेने पर इस (पुरुष) का राग (देहाभिमान M/F) भी निवृत्त हो जाता है।।
मेरे गुरुदेव कहते थे -" भक्त मुझसे प्यार करते हैं और मैं भी उनसे प्यार करता हूँ; लेकिन उन्हें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि अगर वे सिर्फ़ मेरे शरीर से, यानी दैहिक भूतेशानन्द से प्यार करते हैं, तो जब यह प्राकृतिक शरीर नहीं रहेगा, तब वे दुखी होंगे। 
लेकिन अगर वे इसके हृदय में विद्यमान श्री रामकृष्ण से प्यार करते हैं, तो इस शरीर के अन्त होने पर भी श्री रामकृष्ण के साथ हमारा सम्बन्ध अक्षुण्ण बना रहेगा क्योंकि वे सनातन (सत्य) हैं। इसे सतत याद रखें, और उसी के अनुसार से अपना आध्यात्मिक जीवन गठित करें।” - स्वामी भूतेशानन्द (सत्वार्षिक श्रद्धांजली, पेज 71)
 " Devotees love me and I also love them; but they should always remember that if they love my body only, i.e, the physical Bhuteshananda, when the physical body will be no more, they will be unhappy. 
However if they love Sri Ramakrishna inside this body, even when the body dies our relationship with Sri Ramakrishna will continue since He is eternal . Always remember this, and accordingly build up your spiritual life."- Swami Bhuteshananda (1901-1998) (satvarshik shraddhanjli, pg 71) 

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।।2.60।।

।।2.60।। हे कौन्तेय (संयम का) प्रयत्न करते हुए बुद्धिमान (विपश्चित) पुरुष के भी मन को ये इन्द्रियां बलपूर्वक हर लेती हैं।।
सत्त्व (विवेकशीलता) रज (क्रियाशीलता ) और तम (निष्क्रियता) इन तीन गुणों का प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति के अन्तकरण पर पड़ता है। तमोगुण के आवरण तथा रजोगुण के विक्षेप के कारण जब सत्त्व गुण (विवेक-ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या ?) भी दूषित हो जाता है तब अनेक दुखों को हमें भोगना पड़ता है। 
इस श्लोक में स्वीकार किया गया है कि ऐसी स्थिति किसी बुद्धिमान साधक की भी कभीकभी होती है।  अर्जुन को केवल इस बात की सावधानी रखने को कहा गया है कि वह कभी अपने मन का बुद्धि पर आधिपत्य स्थापित न होने दे। सावधानी की यह सूचना अत्यन्त समयोचित है।
अध्यात्म साधना का अभ्यास करने वाले अनेक साधकों के पतन का कारण एक ही है। कुछ वर्षों तक तो वे संयम के प्रति सजग रहते हैं जिसके फलस्वरूप उन्हें आनन्द भी मिलता है। तत्पश्चात् स्वयं पर अत्यधिक विश्वास के कारण तप के प्रति उनकी जागरूकता कम हो जाती है और तब स्वाभाविक ही इन्द्रियाँ बलपूर्वक मन को विषयों में खींच ले जाती हैं और साधक की शान्ति को नष्ट कर देती हैं।
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2.61।।

।।2.61।। उन सब इन्द्रियों को संयमित कर युक्त और मत्पर होवे। जिस पुरुष की इन्द्रियां वश में होती हैं, उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित होती है।।

आध्यात्मिक जीवन के अधिष्ठान आत्मा के पतन का मूल कारण ये इन्द्रियां ही हैं। (चिज्जड़ ग्रंथि ) 
इसलिए अर्जुन को यहां सावधान किया गया है कि वह पूर्णत्व प्राप्ति के लिये देह, मन ,इन्द्रियों और विषयों के अनियन्त्रित एवं उन्मुक्त विचरण के प्रति सतत सजग रहे। क्योंकि 

'जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥ 

पाश्चात्य देशों में मनः संयम का अर्थ दमन समझा जाता है।  परन्तु वैदिक दर्शन में कहीं भी दमन का उपदेश नहीं दिया गया। वहाँ तो मूढ़ बुद्धि की उस परिपक्वता पर बल दिया गया है जिससे विवेकी-बुद्धि वाले मनुष्य का व्यक्तित्व खिल उठे और श्रेष्ठ (आत्मा) के प्रति निष्ठवान बुद्धि  की निकृष्ट इच्छायें अपने आप ही छूट जाये। वहाँ इच्छाओं का दमन नहीं वरन् उनसे ऊपर उठने- स्थूल से सूक्ष्म की ओर उठने का उपदेश दिया गया है। क्योंकि जैसी मति होगी वैसी गति होगी। 
भगवान् श्रीकृष्ण इस वैदिक सिद्धांत को यहां अत्यन्त सुन्दर ढंग से स्पष्ट करते हैं। वे आत्म विकास की साधना के विधेयात्मक (जो करना चाहिये) और निषेधात्मक (जो त्यागना चाहिये) दोनों पक्षों पर प्रकाश डालते हैं।
चिज्जड़ग्रंथि खोलने की विधेयात्मक साधना में भगवान् शिष्य को मत्पर होने का उपदेश देते हैं। मत्पर का अर्थ (ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या जीवो ब्रह्मैव न अपरः मायाधीन जीव भी ब्रह्म ही है) लेकिन जो मुझ परमात्मा को (मायाधीश अवतार वरिष्ठ, सत्य या सनातन) को ही जीवन का परम लक्ष्य 'ध्रुवतारा' समझता है। 'युक्त आसीत मत्पर' इस अर्ध पंक्ति में ही गीता द्वारा आत्मविकास की पूर्ण साधना बतायी गयी है। 
 मनुष्य को पशु के स्तर पर ले जाने वाली अनैतिक एवं कामुक प्रवृत्तियां उसके असंख्य जन्मजन्मान्तरों में किये विषयोपभोग और उनसे अर्जित वासनाओं का ही परिणाम है।  एक जीवन में ही उन सबको नष्ट करना अथवा उनके परे जाना मनुष्य के लिये कदापि संभव नहीं। नैतिकता के उन्नायकों आदर्श शिक्षकों (नेताओं , पैगम्बरों) और अध्यात्म के साधकों की निराशा का भी यही एक कारण है। 
इन वैषयिक प्रवृत्तियों को समाप्त करने का साधन -मनःसंयोग का अभ्यास प्राचीन ऋषियों ने (पतंजलि ऋषि ने) स्वानुभव से खोज निकाला था। अष्टांग योग से ध्यान के शान्त वातवरण में मन को अपने शुद्ध पूर्ण स्वरूप में स्थिर करने का प्रयत्न ही वह साधना है। इसके अभ्यास से जिसकी इन्द्रियां स्वत ही वश में आ गयी हैं वही स्थितप्रज्ञ पुरुष माना जाता है। इस श्लोक का गूढ़ार्थ अब स्पष्ट हो जाता है निराहारी का बलपूर्वक किया हुआ इन्द्रिय निग्रह क्षणिक है जिससे आध्यात्मिक सौन्दर्य के खिल उठने की कोई आशा नहीं करनी चाहिये। 
आत्मानुभाव में स्थित जिस पुरुष की इन्द्रियाँ स्वत वश में रहती हैं वह स्थितप्रज्ञ है। न तो वह इन्द्रियों को नष्ट करता है और न उनका उपयोग ही बन्द करता हैएवं पूर्णत्व प्राप्त ज्ञानी पुरुष वह है जिसकी इन्द्रियाँ और मन वश में होकर उसकी सेवा में सदैव तत्पर रहते हैं। अब भगवान् असफल व्यक्ति के पतन के कारण बताते हैं।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।2.62।।
क्रोधात् भवति संमोहः, संमोहात् स्मृतिविभ्रमः।
 स्मृति भ्रंशात्  बुद्धिनाशः बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।।2.63।।
।।2.62 -- 2.63।। विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध होने पर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोह से स्मृति भ्रष्ट (में जड़ देह नहीं, चेतन आत्मा हूँ की स्मृति भ्रष्ट) हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धि का नाश होने पर मनुष्य का पतन हो जाता है।" [विचार करके देखो प्यारे, जगत बना है मन से।' जैसे शेर भेंड़ बन बैठो, भय मानत सिंघन से।।
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।2.64।।
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।।2.65।।
।।2.64 -- 2.65।। वशीभूत अन्तःकरण वाला कर्मयोगी साधक रागद्वेष से रहित अपने वश में की हुई इन्द्रियों के द्वारा विषयों का सेवन करता हुआ अन्तःकरण की निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होने पर साधक के सम्पूर्ण दुःखों का नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्त वाले साधक (मायाधीन) की बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मा (मायाधीश-) में स्थिर हो जाती है।
शान्ति प्राप्त होने पर सब दुखों का अन्त हो जाता है।
इस वाक्य में सुख की परिभाषा मिलती है। विक्षेपों का होना दुख कहलाता है। अत विक्षेपों के अभाव रूप मन की शान्ति का अर्थ सुख ही होना चाहिये। शान्ति ही सुख है और सुख ही शान्ति है।
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्।।2.66।।
।।2.66।। जिस शरीर रूपी रथ के मन-इन्द्रियाँ बुद्धि रूपी सारथि के द्वारा संयमित नहीं हैं, ऐसे मनुष्य की बुद्धि , व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती।  और व्यवसायात्मिका बुद्धि न होने से अर्थात आत्मा द्वारा शासित बुद्धि न होने से उसमें कर्तव्यपरायणता की भावना नहीं होती। ऐसी भावना न होने से उसको शान्ति नहीं मिलती। फिर शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है? 
ध्रुव तारे के समान जीवन में महान  लक्ष्य के न होने  दिशाहीन पुरुष को कभी शान्ति नहीं मिलती और ऐसे अशान्त पुरुष को सुख कहाँ ?
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि।।2.67।।
।।2.67।। जल में वायु जैसे नाव को हर लेता है वैसे ही विषयों में विरचती हुई इन्द्रियों के बीच में जिस इन्द्रिय का अनुकरण मन करता है,  वह एक ही इन्द्रिय इसकी प्रज्ञा को हर लेती है।।
यदि मनुष्य अर्थपूर्ण जीवन (सार्थक जीवन:भारत माता की सेवा के लिए) जीना चाहता है तो उसे अपनी इन्द्रियों को अपने वश में रखने का सतत प्रयत्न करते रहना चाहिए
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2.68।।
।।2.68।। इसलिये, हे महाबाहो जिस पुरुष की इन्द्रियाँ सब प्रकार इन्द्रियों के विषयों के वश में की हुई होती हैं, उसकी बुद्धि स्थिर होती है।।
 अर्जुन को आवश्यक तर्क देने के बाद इस श्लोक में श्रीकृष्ण इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यदि हम अपने जीवन में केवल अश्रुविलाप और शोक के अतिरिक्त किसी उच्चतर वस्तु की अपेक्षा करते हैं, तो संयम-पूर्ण जीवन ही जीने योग्य है। इन्द्रियों के विषयों से जिसकी इन्द्रियाँ पूर्णत वश में होती हैं वही पुरुष वास्तव में स्थितप्रज्ञ है
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।।2.69।।
।।2.69।। सम्पूर्ण प्राणियों (मायाधीन या अविवेकी मनुष्यों ) की जो रात है (मायाधीश से विमुखता है) उसमें संयमी मनुष्य (विवेक-सम्पन्न बुद्धि युक्त मनुष्य) जागता है, और जिसमें सब प्राणी जागते हैं (भोग और संग्रहमें लगे रहते हैं), वह तत्त्व को जानने वाले मुनि की दृष्टि में रात है।
ज्ञानी और अज्ञानी की दृष्टियों (बुद्धि या मति) के बीच के भेद को स्पष्ट करना इस श्लोक का प्रयोजन है। इस श्लोक में यह बताया गया है कि अज्ञानी देहाभिमानी (M/F आकर्षण) में बंधा  र्मत्य जीव आत्मस्वरूप के प्रति सोया हुआ है जिसके प्रति ज्ञानी पुरुष पूर्णरूप से जागरूक है। जिन सांसारिक विषयों के प्रति अज्ञानी लोग सजग होकर व्यवहार करते हैं और दुख भोगते हैं स्थितप्रज्ञ पुरुष उसे रात्रि अर्थात् अज्ञान की अवस्था ही समझते हैं। जिसने समस्त कामनाओं का त्याग किया वही ज्ञानी भक्त (मायाधीश का भक्त) मोक्ष प्राप्त करता है और कामी पुरुष कभी नहीं। इसे एक दृष्टान्त द्वारा भगवान् समझाते हैं- 
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।2.70।।
।।2.70।। जैसे सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में (अनेक नदियों के) जल ( उसे विचलित किये बिना) समा जाते हैं, वैसे ही जिस पुरुष के प्रति कामनाओं के विषय उसमें (विकार उत्पन्न किये बिना) समा जाते हैं।  वह पुरुष शान्ति प्राप्त करता है, न कि भोगों की कामना करने वाला पुरुष।। विषयों के बीच रहता हुआ इन्द्रियों के द्वारा समस्त व्यवहार करता हुआ भी जो पुरुष स्व-स्वरूप की स्थिति (आनन्दस्वरूप की स्थिति) से विचलित नहीं होता वही ज्ञानी है सन्त है। 

भोगों की कामना करने वाले पुरुषों को कभी शान्ति नहीं मिलती। किन्तु यह विचार आधुनिक भौतिकवादी विचारधारा के सर्वथा विपरीत हैं। उनकी यह धारणा है कि अधिक इच्छाओं के होने से भौतिक उन्नति होगी और अधिक से अधिक इच्छाओं की पूर्ति से मनुष्य को सुखी बनाया जा सकता है। 
 बड़ेबड़े व्यापारी और उद्योगपति विज्ञान की आधुनिक उपलब्धियों की सहायता से नईनई इच्छायें उत्पन्न करने और उन्हें पूर्ण करने का प्रयत्न करते रहते हैं। जिस मात्रा में मनुष्य की इच्छायें पूर्ण होती हैं उसे कहा जाता है कि अब वह पहले से कहीं अधिक सुखी है। इसके विपरीत भारत के प्राचीन महान् ऋषियों ने स्वानुभव सूक्ष्म निरीक्षण एवं अध्ययन से यह पाया कि इच्छाओं की पूर्ति से प्राप्त सुख/ फिर दुःख उत्पन्न करेगा-  कभी पूर्ण नहीं हो सकता।अनेक भोगों की कामना करने वाला पुरुष कभी शान्ति प्राप्त नहीं करता। 
प्राचीन ऋषिगण भी मानव समाज में ही रहते थे और तत्त्वज्ञान के द्वारा उनका लक्ष्य समाज को अधिक सुखी बनाना ही था। उन्होंने पहचाना कि इच्छाओं की संख्या कम किये बिना केवल अधिक से अधिक इच्छाओं की पूर्ति से न कोई वास्तविक आनन्द ही प्राप्त होता है और न ही उसमें कोई विशेष वृद्धि ही। परन्तु आज हम ऋषियों के विचार से सर्वथा भिन्न मार्ग अपना रहे हैं और इसीलिए समाज में आनन्द नहीं दिखाई देता। आनन्दस्वरूप में स्थित ज्ञानी पुरुष इन सब विषयों से अविचलित रहता है।
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः

निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति।।2.71।।

।।2.71।। [विहाय कामान् यः सर्वान्' पुमान्' चरति निःस्पृहः]  जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर स्पृहारहित, ममभाव रहित और अहंकार रहित  (देहाभिमान रहित) हुआ विचरण करता है, वह शान्ति प्राप्त करता है।।
जड़ देह तथा सब प्रकार के प्राप्त -अप्राप्त विषयों के प्रति जो आसक्ति -रहित है उसको निस्पृह कहते हैं। निर्मम - पत्नी, पुत्र , घर, मकान, दुकान , होटल, गृह-क्षेत्र , धन-मान आदि समस्त सांसारिक विषयों में ममत्व-बुद्धि-रहित व्यक्ति को निर्मम कहते है। मैं धनी , मानी , विद्वान् , बुद्धिमान, उच्च वंश में उत्पन्न , दाता हूँ , मैं कर्ता हूँ -इस प्रकार का देहाभिमान ही अहंकार है। यह अहंकार ही बंधन और दुःख का कारण है। जिसे इस प्रकार अहंकार नहीं वही निरहंकार तथा धन्य है।  
इस श्लोक का निष्कर्ष यह है कि जीवन में हमारे समस्त दुखों का कारण अहंकार और उससे उत्पन्न ममभाव, स्वार्थ और असंख्य कामनायें हैं। संन्यास का अर्थ है त्याग अतः अहंकार और स्वार्थ को पूर्णरूप से परित्याग करके वैराग्य का जीवन जीना वास्तविक संन्यास है जिससे वह साधक अपने पूर्ण दिव्य स्वरूप (जड़ अलग चेतन आनंद स्वरुप) की अनुभूति में सतत रह सकता है। 
जीवन से पलायन करने अथवा गेरुये वस्त्र धारण करने को संन्यास समझने की जो गलत धारणा समाज में फैल गई है उसनेे उपनिषदों के महान् तत्त्वज्ञान पर एक अमिटसा धब्बा लगा दिया है। 
वास्तव में हिन्दू धर्म केवल उसी को संन्यासी स्वीकार करता है जिसने विवेक द्वारा (ब्रह्मसत्यं जगत मिथ्या जीवो ब्रह्मैव न अपरः बोध द्वारा) अहंकार (M/F देहाभिमान) और स्वार्थ को त्याग कर स्फूर्तिमय जीवन (सेवा का जीवन) जीना सीखा है।
एक सच्चे संन्यासी का अत्यन्त सुन्दर वर्णन श्री शंकराचार्य अपने भाष्य में इस प्रकार करते हैं,  वह राजर्षि/ या संन्यासी जो सब कामनाओं को त्यागकर जीवन में सन्तोषपूर्वक रहता हुआ- प्रारब्ध से प्राप्त घर-मकान -दुकान (पूरे राज्य) में भी ममत्व भाव नहीं रखता न ज्ञान का अभिमान करता है। ऐसा ब्रह्मवित् स्थितप्रज्ञ पुरुष निर्वाण (शान्ति) को प्राप्त करता है जहाँ संसार के सब दुखों की आत्यन्तिक निवृत्ति होती है। संक्षेप में ब्रह्मवित् ज्ञानी पुरुष ब्रह्म ही बन जाता है। इस ज्ञाननिष्ठा की स्तुति इस प्रकार करते है--(सैषा ज्ञाननिष्ठा स्तूयते।)

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।

स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति।।2.72।।

।।2.72।। हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है।।

इस अहंकार के सम्बन्ध में श्रीरामकृष्णदेव ने कहा है - " अहं तो एकदम नहीं जायेगा तो उसे ' मैं दास हूँ ' इस प्रकार से रहने दो। मैं भगवान का दास और उनका पुत्र तथा सेवक हूँ , इस प्रकार के अहंकार में दोष नहीं है। इस प्रकार की भावना बन्धन का कारण न होकर मुक्ति का कारण होती है। " उन्होंने और भी कहा - " मैं और मेरा ये दोनों अज्ञान है , तुम और तुम्हारा यह ज्ञान है। सभी कुछ भगवान श्रीरामकृष्ण का है।" यह ज्ञानी की बात है।    
 
इस अवस्था के विभिन्न स्तर हैं और प्रधानतया असम्प्रज्ञात समाधि में स्थिति-काल पर निर्भर है।  (समाधि अंतिम अवस्था है, जिसे 'निर्बीज समाधि' या 'निर्विकल्प समाधि' भी कहते हैं।) 
श्रीरामकृष्ण परमहंस देव ने उन ज्ञानियों को दो स्तरों में विभक्त कर कहा है - 'ज्ञानी और विज्ञानी।' शास्त्र में भी लिखा है - " ब्रह्मविद , ब्रह्मविद्वर, ब्रह्मविदवरीयान, ब्रह्मविदवरिष्ठ।
अवतारी पुरुष या अधिकारी पुरुष के सिवाय साधारण मनुष्य उस निर्विकल्प समाधि से लौट नहीं सकता। पूर्णतया वासना रहित हो जाने के कारण उसका मन फिर जीवभूमि में नहीं उतरता। 21 दिनों के भीतर ही वे शरीर छोड़कर ब्रह्मस्वरूपता को प्राप्त हो जाते हैं। 
आधिकारिक पुरुष सर्वशक्तिमान परमेश्वर की विशेष इच्छा से केवल जीव-कल्याण रूप वासना का अवलंबन कर अपने मन को जीवभूमि में उतार सकता हैं। श्रीरामकृष्ण देव ने कहा है - श्रीशंकराचार्य ने लोकशिक्षा के लिए विद्या के 'मैं ' को रखा था। ब्रह्मसाक्षात्कार होने पर मनुष्य मौन हो जाता है। ...
ज्ञानी 'नेति नेति ' कहते हुए देहात्मबुद्धि से ऊपर उठकर आत्मा के साथ अभिन्नता को प्राप्त करता है। विज्ञानी अपरोक्ष रूप से उपलब्धि करता है कि ब्रह्म अटल, अचल तथा सुमेरु के समान स्थिर है। यह संसार माया के सत्त्व, रज और तम गुणों से कल्पित हुआ है। ब्रह्म इन गुणों से निर्लिप्त है।विज्ञानी जानता है- जो ब्रह्म है वही भगवान है। जो गुणातीत है वही षडैश्वर्यपूर्ण भगवान (मायाधीश) है। यह जीव, जगत , मन , बुद्धि , भक्ति, वैराग्य, ज्ञान सभी उसी के ऐश्वर्य हैं। विज्ञानी ज्ञान और अज्ञान के परे चला जाता है।  
श्वेताश्वतर उपनिषद के ऋषि कहते हैं - [सबकुछ नचिकेता के ॐ का , तुलसी के राम का , शिवपुराण वालों के शिव का है। विवेकानन्द के अवतार वरिष्ठ का हैमायाधीश , जादूगर, अनन्त का है !]

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्‌

तमेव विदित्वा अतिमृत्युम् एति  नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥ (3-8) 

 'न स पुनरावर्तते , न स पुनरावर्तते।  

उस ब्रह्मभिन्नात्मा (मायाधीश को जानकर) मनुष्य मृत्यु का अतिक्रमण कर अमरत्व को प्राप्त करता है , मुक्ति के लिए अन्य कोई पथ नहीं है। वह फिर यहाँ लौटकर नहीं आता , वह फिर यहाँ लौटकर नहीं आता। 

मेरे गुरुदेव कहते थे -" भक्त मुझसे प्यार करते हैं और मैं भी उनसे प्यार करता हूँ; लेकिन उन्हें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि अगर वे सिर्फ़ मेरे शरीर से, यानी दैहिक भूतेशानन्द से प्यार करते हैं, तो जब यह प्राकृतिक शरीर नहीं रहेगा, तब वे दुखी होंगे। 
लेकिन अगर वे इस हृदय में विद्यमान श्री रामकृष्ण से प्यार करते हैं, तो शरीर के अन्त होने पर भी श्री रामकृष्ण के साथ हमारा सम्बन्ध अक्षुण्ण बना रहेगा क्योंकि वे अनंत हैं इसे हमेशा याद रखें, और उसी के अनुसार से अपना आध्यात्मिक जीवन गठित करें।” - स्वामी भूतेशानन्द (सत्वार्षिक श्रद्धांजली, पेज 71)
 " Devotees love me and I also love them; but they should always remember that if they love my body only, i.e, the physical Bhuteshananda, when the physical body will be no more, they will be unhappy. 
However if they love Sri Ramakrishna inside this body, even when the body dies our relationship with Sri Ramakrishna will continue since He is eternalAlways remember this, and accordingly build up your spiritual life."Swami Bhuteshananda (1901-1998) (satvarshik shraddhanjli, pg 71) 

अपने हृदय में स्थित आत्मा को पहचानने का ही अर्थ है उसी समय सर्वत्र व्याप्त (सर्वगत) नित्य ब्रह्म (मायाधीश -जादूगर -) को पहचानना। अहंकार के नष्ट होने पर नित्य चैतन्य आत्मा का अनुभव उससे भिन्न रहकर नहीं होता वरन् उसके साथ एकत्व का अनुभव ही होता है। अतः इस साक्षात्कार को ब्राह्मी स्थिति कहा गया है।

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ।।

जड़-चेतन प्राणियों वाली यह समस्त सृष्टि परमात्मा से व्याप्त है। मनुष्य इसके पदार्थों का आवश्यकतानुसार भोग करे, परंतु ‘यह सब मेरा नहीं है के भाव के साथ’ उनका संग्रह न करे

This universe, made of living and non-living things, is permeated by God. Humans may use the resources as needed but may not hoard as if 'this all belongs to me'

यहाँ एक शंका उठ सकती है कि क्या आत्मानुभव के पश्चात् भी हमें पुन मोहित होकर अहंकार से उत्पन्न दुखों का भोग हो सकता है ऐसे किसी पुनर्मोह का यहाँ निषेध करके भगवान् हमारे भय को दूर कर देते हैं और भी एक बात है कि आत्मसाक्षात्कार का युवावस्था में ही होना आवश्यक नहीं हैं। वृद्धावस्था अथवा जीवन के अन्तिम क्षणों में भी यदि मनुष्य अपने स्वयंसिद्ध नित्य स्वरूप को पहचान लेता है तब भी वह अनुभव ब्राह्मी स्थिति के लिए पर्याप्त है
मिथ्या का निषेध और सत्य का प्रतिपादन यही वह मार्ग है जिसका उपनिषदों में आत्मप्राप्ति के लिए उपदेश है। 
अनासक्त भाव से सिद्धि और असिद्धि में समान रहते हुए कर्म करने का अर्थ है अहंकार  के अधिकार (देहाभिमान) को ही समाप्त करना और इस प्रकार अनजाने ही वहाँ उच्चतर सत्य (3rd 'H' मायाधीश आत्मा) की स्थापना करना।

परन्तु अर्जुन भगवान् के केवल वाच्यार्थ को ही ग्रहण करता है और उसके मन में एक सन्देह उत्पन्न होता है जिसे वह तृतीय अध्याय के प्रारम्भ में व्यक्त करता है। अतः अगले अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण कर्मयोग का विस्तारपूर्वक विवेचन करते हैं।

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