नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥
[अयम् आत्मा प्रवचनेन न लभ्यः। न मेधया न बहुधा श्रुतेन। एषः यं एव वॄणुते तेन लभ्यः। तस्य एषः आत्मा त्वां तनूं विवृणुते ॥ कठोपनिषद्] "यह 'आत्मा' प्रवचन द्वारा लभ्य नहीं है, न मेधाशक्ति से, न बहुत शास्त्रों के श्रवण से 'यह' लभ्य है। यह आत्मा जिसका वरण करता है उसी के द्वारा 'यह' लभ्य है, उसी के प्रति यह 'आत्मा' अपने कलेवर को अनावृत करता है।
महावाक्य है - तत्त्वमसि ! अयमात्मा ब्रह्म ! ये महावाक्य है। अर्थात जीवब्रह्म के एकत्व को महावाक्य (बड़ा वाक्य) कहते हैं। तुम्हें परमात्मा मिल जायेगा यह एक वाक्य है। तुम अविनाशी हो ये महावाक्य है ! जिस सर्वव्यापी आत्मा , परमात्मा , सत्य या ईश्वर की तलाश तुम्हें है , वो तुम हो ! 10 अंधे लोग नदी के पार जा रहे थे , उस पर पहुँचकर एक ने गिनना शुरू किया कोई खो तो नहीं गया ? जो गिनता था वो 9 ही गिनता था। एक तो गायब हो गया ? दूसरा और तीसरा भी गिना तो 9 मिला। सभी अंधों ने गिना तो 9 ही मिला। ढूँढ़ते थे 10 आदमी मिलते थे 9, गिनने वाला अपने को गिनता ही नहीं था। एक ज्ञानी जा रहा था , हम 10 वें को मिलवा देंगे , बोलो क्या दोगे ? एक नेता ने प्रस्ताव दिया कि आपको 1 अरब रुपया हम सरकार से दिलवा देंगे। लेकिन उसमें से 20 करोड़ आपको वापस कर देना पड़ेगा। (16:55) तो 20 करोड़ का खर्च हम दिखाएंगे कहाँ ? पहले हम पूरा निकाल लेंगे , बनाते समय हम उसमें से निकाल निकाल कर खर्च दिखाते जायेंगे। नेता ने कहा नहीं 20 तो पूरा उसी समय लौटा देना होगा। तो स्किम ही कैंसिल कर दिया। आजकल मिलता उनको ही है , जो उसमें से थोड़ा देवे। पाने के लिए भी देना पड़ता है। हैण्ड पाइप में भी एक लोटा पानी दोगे , तो वो पानी देगा। खेत में भी पहले बीज डालते हो तो अनाज वापस आता है। तो गवर्नमेंट में भी ऐसे ही चलता है। नेता लोग सफ़ेद धन देते हैं , काला धन लेते हैं। भजन भी अगर आनंद से करोगे तो आनंद मिलेगा। भगवान भी दयासागर तभी हैं , जब तुम स्मरण -सागर हो। उनकी याद न करो तो दया भी नहीं। याद और दया में सिर्फ द का ही फर्क है। याद इधर से गयी तो उधर से दया बनकर लौटी। एक राधास्वामी मत है। सुरति को धारा कहते हैं। जो परमात्मा से निकली धारा है। जैसे नदी निकलती है , झरना निकलता है। वैसे ही आत्मा से निकली सुरति को धारा कहते हैं। सामान्य रूप से सुरति का अर्थ स्मृति, याद, सुध या ध्यान आना हैं। जब धारा देह-इन्द्रियों में आसक्ति को छोड़ कर उधर से लौटती है , तो धारा -राधा हो जाती है। तो आप राधास्वामी हो जाते हो। आपकी सुरति की धारा जो देह-इन्द्रियों की तरफ जा रही है , उसको यदि आत्मा की तरफ लौटा लो तो वो राधा बन जाती है। नहीं तो धारा कृष्ण , धारा कृष्ण, धारा कृष्ण - धारा जो लौटती हैं , तब वो राधा-कृष्ण हैं ! सामान्य मनुष्य धारा -कृष्ण ही होता है। तुम्हारी अपनी ही धारा- शक्ति या ऊर्जा संसार में जा रही है - 3K में जा रही है। पाँचो इन्द्रियों और मन से हमारी ऊर्जा जगत की तरफ बह रही है। वो लौट आये तो तुम राधाकृष्ण बन जाओ। (21:07) जगत से बुद्धि जब लौट आती है , तब समाधि बन जाती है।
विषय चल रहा था महावाक्य और महासमाधि। ब्रह्म-आत्मैक्य बोध या परमात्मा का अपरोक्ष बोध कराने वाले वाक्यों को महावाक्य कहते हैं। तो 10 अन्धों में नदी पार करते समय एक गायब था - उधर से कोई ज्ञानी महात्मा आये , उन्होंने कहा आओ तुम्हारे बिछुड़े साथी से मैं मिला देता हूँ। तो उस ज्ञानी ने प्रत्येक अंधे को सिर को ठोक -ठोक करके गिनना शुरू किया - 123456789 और 10 वां तूँ है ! तब कहा अरे मैं था ? मैं तो गायब नहीं था ? 9 था पर 10 वां तो खुद ही था पर ढूँढ रहा था , 10 वां कौन है ? जैसे तुम जिस सत्य को ढूँढ रहे हो तो , महावाक्य कहेगा देखो - यह देह है , यह दृश्य है। ये इन्द्रियाँ हैं ये दृश्य हैं , इन्द्रियों से सूक्ष्म मन है (जो M/F अहं है वह भी आभास है) मन से सूक्ष्म बुद्धि है, और जिस आत्मा (ईश्वर, ब्रह्म या भगवान) को तूँ ढूँढता है, वह ब्रह्म (पवित्र त्रयी) तूँ है ! अब कैसे कहेगा मुझे आत्मा नहीं मिला ? यदि यह भी कह देते 10 वां है ! 10 वां मोक्ष होता है , मिल जायेगा। तो अच्छा तो लग सकता था पर ढूँढना पसन्द नहीं था। 9 मिल गए हैं , 10 वां भी मिल जायेगा , 10 वां है। ये परोक्ष वाक्य हैं, महावाक्य नहीं हैं । तो सीधा तत्त्व बोधक परिचय नहीं है। आत्मा है -कहने से ये परोक्ष वचन हुआ। तब इतने से संतोष नहीं हुआ। जब गिनाने वाले ने 9 को ठोक -ठोक के कह दिया कि ये दसवाँ तो तूँ है। तो कौन मिला ? मिला -मिलाया ही मिला। जो पहले से वर्तमान था - वही मिल गया। आत्मा कोई अलग वस्तु नहीं है। अब कोई 9 को ही कहता 10 वां यही है , तो लाता कहाँ से ? तब उसी को भ्रम हो जाता कि उसको तो मिला पर मुझे नहीं मिला। किसी को भी गिनो तो यहाँ नारद की गिनती शुरू करो। (24:55) आठवाँ कौन है ? देवकी की आठवें गर्भ से आठवीं संतान से कंस का वध होगा। कंस की मृत्यु आठवीं संतान से होनी है , तो आठवाँ कौन है ? देवर्षि नारद बहुत विचित्र गिनती जानते थे। वही बात यहाँ शुरू करें तो 10 वां तू है ! और जगह से तो 10 वां तू ,और जगह से तो 10 वां तू ! तो तत्त्वमसि का मतलब है -जो तुम्हारे गुरु ऐसे ढंग से गिनवायेंगे कि, देह, इन्द्रिय , मन बुद्धि -चित्त अहंकार आदि सब दृश्य है , लेकिन उन सबका साक्षी परमात्मा तूँ है। दूसरा कोई गुरु अगर गिनवायेगा , तो वो भी बतलायेगा परमात्मा तूँ है। अर्थात जिसे तूँ ढूँढ़ता है , वह आत्मा (अविनाशी सत्य या परमात्मा) कोई 'third person' तीसरा व्यक्ति नहीं है ! कोई 'second person ' नहीं है। सारे 9 'second person ' (दृश्य) थे , लेकिन 10 वां द्रष्टा तूँ है। विदेशों में तो मंत्र भी पैसे से बिकते हैं। और विदेशी लोग हर चीज को पैसे से खरीदते भी हैं। मुफ्त में लेते भी नहीं हैं। हमारे यहाँ प्रवचन निःशुल्क सुने जाते है , फिर श्रद्धा से लोग वहाँ पैसे चढ़ाते हैं। वहाँ पहले टिकट लगता है , तब सभा पण्डाल में प्रवेश होगा। वहाँ मेरे से (स्वामीजी से) मिलने के भी पैसे ले लेते हैं। 15 मिनट मिलने के 100 डॉलर , फिर भी हम बहुत सस्ते वाले हैं। वहाँ तो 5000 डॉलर , 10000 डॉलर से महात्मा के दर्शन होते हैं। हम तो फ्रीफंड वाले हैं। अभी एक माता निकली , हमसे कहने लगी हमारे घर चलो दर्शन देने। पर वो ठीक नहीं आप ही आकर दर्शन कर लो। दीवाल को दर्शन क्या देना ? वहाँ तो चरण डाले जायेंगे।
तुम ही वह हो , तत्त्वमसि ! फिर एक महावाक्य है - "अयम् आत्मा ब्रह्म !" 'प्रज्ञानं ब्रह्म' (प्रज्ञान ही ब्रह्म है) ऋग्वेद का एक प्रमुख महावाक्य है। "अयम् आत्मा ब्रह्म !" मतलब ये चैतन्य कौन है? आत्मा अविनाशी है ! कितने दिन सुनते आ रहे हो कि आत्मा अविनाशी है , लेकिन अभीतक आत्म-साक्षात्कार तो नहीं हुआ। सुनते हैं ब्रह्म है , ईश्वर है सर्वव्यापक है। परन्तु उसकी अनुभूति करनी होगी। ब्रह्म या आत्मा सबके ह्रदय में विद्यमान हैं , कितने दिन से सुना है ? फिर भी ढूँढना तो चालू है ? (26:28) ये जब ढूँढना बंद हो जाये , तो इसका मतलब हुआ कि मिल गया ! जब तक महावाक्य की अनुभूति नहीं होगी , तबतक बात नहीं बनेगी। एक साधक ने पूछा महावाक्य में और दूसरे मंत्रों में फर्क है क्या ? महावाक्य भी मंत्र हो सकता है , पर हर मंत्र महावाक्य नहीं है। क्या महावाक्य और गुरुमंत्र दोनों का सार एक होता है ? वो अलग से भगवान का नाम बोल देगा। राम है , कृष्ण है , रामकृष्ण परमात्मा है , भगवान है सुना है , पर अभी तक हमको ये मिला हुआ नहीं लगता। हमको राम मिल गए , हमको कृष्ण मिल गए , हमको श्रीरामकृष्ण मिल गए , ऐसा लगना चाहिए। तो महावाक्य परमात्मा को मिलाने वाले वचनों को बोलते हैं। सभी मंत्र महावाक्य नहीं कहे जा सकते। आत्मानुभूति किसे कहते हैं ? 'मैं' की अनुभूति बहुत आसान है। और जिनको आत्मानुभूति करनी है -गुरुशिष्य परम्परा को स्वीकार करें। ध्यान कैसे बनेगा वो गुरु का काम है। प्रश्न है कि आत्मानुभूति किसे कहते हैं ? आत्मानुभूति उसे कहते हैं , जिससे समस्त अनुभूतियाँ होती हैं। जिसके बिना कोई अनुभूति नहीं हो सकती। ऐसा आत्मा मैं हूँ ! यह अनुभव होना ही आत्मानुभूति होती है। इसीलिए ध्यान में जब बैठो , जब तुम्हारे भीतर उजाला दिखे , नात सुनाई दे , जब तुम्हारे मन को कोई विलक्षण अवस्था होगी। आनंद डूब जाओगे तब मैं कहूंगा , ये प्रकाश किसको अनुभव हो रहा है ? क्योंकि बिना तुम्हारे प्रकाश हो नहीं सकता। स्वप्ना तुम्हारे बिना नहीं हो सकता। पहले कुछ अनुभव हो तो सपना भी उसीका होगा। तुम कहोगे मुझे हुआ , तब मैं कहूँगा तत्त्वमसि ! एक संत रबिया की कथा में आती है - बाहर से पुकारा , तो भीतर से संत ने पूछा कि तूँ कौन है ? भीतर से सन्त ने (इष्टदेव ने) पूछा कि तूँ कौन है ? तो जिज्ञासु कहता है - यही तो मुझे पता नहीं है ! यही तो पता लगाने मैं आपके पास आया हूँ। भीतर से पूछा तूँ कौन है ? बाहर से बोला यही तो पता लगाने आया हूँ। जिस दिन ये जान जाऊँगा - मैं कौन हूँ ? तो फिर मुझे आने की जरूरत नहीं है। फिर संत भीतर से पूछा ये प्रश्न पूछता कौन है ? यह प्रश्न कहाँ उठा ? M/F देह में उठा ? मन में उठा ? जड़ में उठा ? ये प्रश्न किसने किया है ? किसके अन्दर जिज्ञासा है ? कौन जानना चाहता है , कि मैं कौन हूँ? देह जानना चाहता है क्या ? मकान जानना चाहता है क्या ? ये प्रश्न किसके अंदर उठा है ? जैसे एक बुलबुला में यह यह प्रश्न उठा कि अविनाशी कौन है ? (30 :59) एक बुलबुला ने पूछा कि अविनाशी कौन है ? तो किसी ने कहा - ये बुलबुला किसमें बना है ? बुलबुला कहाँ से आया है? ये बुलबुला किस में लीन हो जायेगा ? यदि यह तूँ देख लेगा , तो जान जायेगा, यह देख लेगा कि तूँ ही पानी है। जिससे बुलबुला हुआ है वो पानी है। उसी तरह यह देह, इन्द्रिय, मन बुद्धि जिससे पैदा होता है , मन (M/F अहंकार बुद्धि) जिसमें रहता है , मन जिसमें समा जाता है, वही आत्मा है (ईश्वर, काली या ब्रह्म है !) पर अभी कहेंगे कि वही आत्मा है तो काम नहीं बनेगा। जब तुमको ध्यान में ब्रह्मात्मैक्य का अनुभव हुआ , तब गुरु पूछेंगे -ये अद्वैत अनुभव किसको हुआ? तो तुम कहोगे कि मुझको हुआ , मुझे दिखा। तुम कहोगे आज ध्यान में मैं आनंद में डूब गया। तो गुरु पूछेंगे ये सब अनुभव किसे हुए ? तो सच्चा साधक कहेगा -मुझे हुआ। तो हम कहेंगे यही आत्मा है। जिससे सब अनुभव होता है , जिसमें सब रहता है , जिसमें सब लीन हो जाता है।
"जन्माद्यस्य यतः" (janmādyasya yataḥ) ब्रह्मसूत्र (1.1.2) का प्रथम सूत्र है। इसका अर्थ है - (ब्रह्म वह है) जिससे (यतः) इस जगत का जन्म, स्थिति और लय (जन्मादि - जन्म, आदि, अस्य) होता है। यह वाक्य दर्शाता है कि आत्मा (ईश्वर या ब्रह्म) ही सृष्टि का सृजन, पालन और विनाश करने वाला मूल कारण है।
"मन तू ज्योत स्वरूप है, अपना मूल पहचान"
श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी (आसा महला 3) की एक पवित्र पंक्ति है, जो मनुष्य को याद दिलाती है कि उसका मन-बुद्धि केवल शरीर नहीं, बल्कि परमात्मा का एक दिव्य प्रकाश (आत्मा) है। यह वाणी अज्ञान और अविद्या माया के परदे को हटाकर स्वयं के वास्तविक आध्यात्मिक स्वरूप को समझने और अहंकार मुक्त होने का संदेश देती है। अन्तःकरण की समस्त वृत्तियों का जो साक्षी है - वृत्तियों का आश्रय है , सतस्वरुप-चित्स्वरूप - आनंदस्वरूप चैतन्य आत्मा तूँ ही है।
एक और प्रश्न है - पारिवारिक कार्य करने में मन की कोई रूचि ही न रह जाये , लेकिन पारिवारिक जिम्मेवारियाँ बाकी हों , तो मनुष्य को क्या करना चाहिए ? कई बार जिसका धंधा अच्छा नहीं चलता उसको भी दुकान में मन नहीं लगता। पर यदि परमात्मा (इष्टदेव) की स्मृति में मन लगता है , तब तमोगुणी नहीं है। आलसी मन नहीं है। जिसका मन भजन में लग जाता है , उसको चाहिए कुछ देर ड्यूटी अदा करें , बाकि भजन करें। यह आवश्यक नहीं कि 24 घंटा भजन करें।
यदि मन तुम्हारा आनंद में डूब कर शान्त हो जाता हो , और अरुचि का मतलब है , तुम दुःखी हो जाते हो। कई लड़कों का मन पढ़ाई में नहीं लगता , पर ये जरुरी नहीं है कि ऐसा होना बहुत अच्छा है। जो भी प्रश्न हो एक घंटा में बंद कर देगें। Be and Make का प्रचार करना भी बहुत अच्छी साधना है। भजन और ड्यूटी साथ -साथ चलने दो। जिम्म्मेवरियाँ पूरी कर सकते हो तो अवश्य करो। लापरवाही मत करो।
भगवान कृष्ण ने पूरी गीता में कर्म का खंडन किया , और पूरी गीता में कर्म छोड़ने का विरोध भी किया। (35 :51) अर्जुन कर्म छोड़ना चाहता है , युद्ध नहीं चाहता है , भगवान कृष्ण नहीं छोड़ने देते। और उदाहरण देते हैं - मैं भी तो काम करता हूँ ! और मैं भी ज्ञानी हूँ , पर तूँ तो अभी ज्ञानी नहीं हुआ है। मुक्त भी नहीं है , पर मैं मुक्त हूँ फिरभी काम करता हूँ। भगवान कहते हैं कोई व्यक्ति कर्म किये बिना रह ही नहीं सकता। तो कर्तव्यकर्म नहीं करेगा , तो वासना मूलक कर्म करेगा। व्यर्थ के काम करेगा। कई बार आदमी कुर्सी में बैठकर अपने पैर ही हिलाता रहता है। खाली कभी मत बैठो। काम में मन न लगना योग्य मनुष्य (विवेकी मनुष्य) की पहचान नहीं है।
विवेक-वैराग्य -षट्सम्पत्ति और मुमुक्षता यही चार साधन हैं , तो आत्मज्ञान होने पर सहज समाधि मिलेगी। जैसे आपको सहज भाव से लगता है , कि आप भारतीय हैं , M/F हैं। घड़ा बने , ईंट बने। मिट्टी को बस इतना पता रहे कि मैं मिट्टी हूँ। तुम कौन हो ? ये पहले समझ में आ जाये। और ये सहज बना रहे। आँख खोलना , मुँदना नहीं है। साधना अवस्था में जप करना। अकेले रहना। महर्षि रमन का कोई कर्तव्य नहीं रहता। मिट्टी की सत्ता के आलावा और कोई सत्ता नहीं रहता। जब सब में मैं हूँ ? तो पराया कौन है ? जब तक आप साधक हैं - श्रवण-मनन -निदिध्यासन करते रहें। अभी लगाने से मन नहीं लगता , पर समाधि से उठने का मन नहीं करेगा।
मनःसंयोग का अभ्यास : जिस आसन में बैठने से आपको कोई तकलीफ न हो। 5 मिनट बैठ जाइये। अब ये देखिये कि ये तो शरीर है , आपका ध्यान कहाँ है ? (45:03) हृदय के भीतर श्वांस को ले जाओ। कान में ध्यान ले जाओ। कान में आवाज आती है क्या ? आँख पर ध्यान ले जाओ। आंख को जोर से मीच लो फिर ढीली छोड़ दो। आँख खोलना नहीं है। कड़ी करना है , ढीली करना है। शरीर को कड़ा ढीला करो। फिर अपनी आँखों में आकर बैठ जाओ। बंद आँखों से देखो अंदर क्या है ? अँधेरा है कि उजेला है ? कुछ भी नहीं है तो भी ठीक है , देख तो रहे हो कि कुछ भी नहीं है। देख के ही तो बताओगे कि कुछ भी नहीं है। ऑंखें न होंगी तो कैसे बताओगे ? भीतर की आंख खुली रहे कि कुछ भी नहीं है। या कुछ है तो क्या है ? अँधेरा है ? रंग है ? प्रकाश है ? प्रकाश है तो कैसा है ? चन्द्रमा का है सूर्य का है ? या टोर्च काहै ? तुम्हारा ध्यान शरीर के भीतर है कि बाहर है। अंत ११ बार मंत्र का जप कर लो। बड़े प्यार से 11 बार मंत्र जप लो। तुम्हारा मन बोले जिह्वा नहीं। ढूँढो मन कहाँ है ? मन के अंदर ये शब्द आया कि नहीं ? और तुम कौन हो ? खोजो आत्मा के खोजने का यही रास्ता है। पहले सबकुछ खो दोगे , धीरे -धीरे मन मिल जायेगा। आत्मा कौन है ? जो मन का साक्षी है ! जो मन को देख ले वो आत्मा , जो मन को ढूँढ ले वो आत्मा। जो मन में है वो आत्मा है , साक्षी है। ॐ शांति शांति शांति !
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