द्वितीय अध्याय का सारामृत
72 श्लोक वाले इस अध्याय का नाम 'सांख्ययोग ' है। सांख्य शब्द का अर्थ है - 'विश्लेषणात्मक ज्ञान ' (Analytical knowledge) और योग शब्द युज धातु से बना है जिसका अर्थ है जोड़ना । स्वयं को (अर्थात देहाध्यास और जिवाध्यास में फँसी 'मूढ़बुद्धि' 'सम्मोहित मति' को, सिद्धांत 'जैसी मति वैसी गति ! इसलिए) वर्तमान की स्थिति से ऊँचा उठाकर 'आत्मा' से या किसी श्रेष्ठ एवं पूर्ण आदर्श से (ह्रदय में विद्यमान भगवान गदाधर श्री विष्णुपद श्रीहरि से) जुड़ जाने के लिये साधक जो कर्म या प्रयत्न करता है उसे योग कहते हैं। इस अध्याय में 'ज्ञान' और 'कर्म' पर सम्मिलित रूप से और पृथक रूप से चर्चा होने के कारण इस अध्याय का नाम 'सांख्ययोग' रखा गया है।
अर्जुन का विषाद दूर करने के लिए इस अध्याय का आरम्भ हुआ है। इसमें प्रधानतया -शरीर, इन्द्रिय , मन, बुद्धि से श्रेष्ठ आत्मा के तत्त्वज्ञान की ही चर्चा हुई है। देहाध्यास और जिवाध्यास को दूर करने के लिए भगवान ने अर्जुन को पहले मनुष्य की विशेष योग्यता 'नित्य-अनित्य विवेक' को जाग्रत करने का उपदेश दिया है। शरीर अनित्य है और आत्मा जन्म-मृत्यु -रहित तथा नित्य है। इस विवेक-प्रयोग के सिद्धान्त को समझाने के लिए भगवान गदाधर श्रीविष्णुपद श्रीहरि ने भगवान भाष्यकार श्रीशंकराचार्य जी द्वारा दिए गए विवेक की परिभाषा - "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः" को समझाने के लिए श्री भगवान गदाधर ने आत्मतत्व का उपदेश दिया है। इसके बाद उन्होंने अर्जुन को समझाया कि स्वधर्म-पालन करना मनुष्य का अवश्यमेव कर्तव्य है। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्मयोग पर भी कुछ उपदेश दिए हैं।
वे अर्जुन को फल की आसक्ति के बिना निष्काम कर्म करने की प्रेरणा देते हैं। फल की कामना से रहित कर्म करने के विज्ञान को वे 'बुद्धियोग' या 'बुद्धि का योग' नाम देते हैं। बुद्धि का प्रयोग मन को देह, इन्द्रिय विषय-भोगों में सुख खोजने में बुद्धि की लालसा को रोक कर आत्मा या भगवान के साथ सम्बन्ध बनाने के लिए करना चाहिए। इस भावना के साथ सम्पन्न किए गए कर्म 'बांधने वाले' से 'मुक्त करने वाले' में परिवर्तित हो जाते हैं।
इसके पश्चात् अर्जुन उन मनुष्यों के लक्षणों को जानना चाहता है, जिनकी बुद्धि आत्मा में प्रतिष्ठित हो गयी हो , या आत्मनिष्ठ बुद्धि वाले स्थितप्रज्ञ मनुष्य के लक्षणों को जानना चाहता है। श्रीकृष्ण उसे बताते हैं कि किस प्रकार से स्थितप्रज्ञ होकर मनुष्य आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त हो जाता है। निष्काम कर्म, निष्काम भक्ति और ज्ञान के सम्मिलन के फलस्वरूप ब्रह्मप्राप्ति और स्थितप्रज्ञ-अवस्था होती है। इसीको ब्रह्मप्राप्ति (ब्राह्मी स्थिति, ब्रह्माध्यास ??) स्थितप्रज्ञ -अवस्था कहते है। और सभी परिस्थितियों में उसकी इन्द्रियाँ उसके वश में हो जाती हैं और उसका मन सदा के लिए भगवान की भक्ति में तल्लीन हो जाता है। इस अवस्था में स्थित होकर मनुष्य निष्काम भाव अपने वर्ण और आश्रम कर्म करके अन्त में ब्रह्मनिर्वाण या मोक्ष प्राप्त करते हैं। यमराज नचिकेता को बताते हैं कि 'ॐ' ही वह सर्वोच्च ब्रह्म या परम लक्ष्य है, जिसे जानकर ही सब कुछ जान लिया जाता है और अमरता मिलती है।
"सर्वे वेदा यत् पदम् आमनन्ति,
तपांसि सर्वाणि च यद् वदन्ति।
यद् ईच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति,
तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि - ॐ इति येतत् ॥
(कठोपनिषद 1.2.15) जो बताता है कि सभी वेदों का परम लक्ष्य, सभी तपस्याओं का अंतिम फल और ब्रह्मचर्य का उद्देश्य 'ॐ' (ओम्) ही है। 'उस पद' की प्राप्ति' [भगवान गदाधर श्री विष्णुपद श्रीहरि की प्राप्ति ] ही ब्राह्मी स्थिति या मोक्ष-प्राप्ति है। समस्त गीता में विशेष रूप से चर्चित इस ब्रह्मस्वरूपता की प्राप्ति ही इस अध्याय का मूल संगीत है।
==========
February 5, 2026 :
।।2.1।। संजय ने कहा -- इस प्रकार करुणा और विषाद से अभिभूत, अश्रुपूरित नेत्रों वाले आकुल अर्जुन से मधुसूदन ने यह वाक्य कहा।।
अर्जुन की विषादावस्था का वर्णन करने के साथ ही संजय हमें यह भी संकेत करता है कि उसका आन्तरिक व्यक्तित्व भग्न हो गया था। और अर्जुन के व्यक्तित्व में गहरी दरार पड़ गयी थी। अपने समय का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी होकर भी वह किसी सामान्य स्त्री के समान रुदन कर रहा था।
श्री भगवानुवाच
कुत: त्वा कश्मलम् इदम् विषमे समुपस्थितम्।
अनार्य जुष्टम् सद् अस्वय॑म् अकीर्तिकरम् अर्जुन।। (2.2)
।।2.2।। श्री भगवान् ने कहा -- हे अर्जुन ! तुमको इस विषम स्थल में यह मोह कहाँ से उत्पन्न हुआ? यह आर्य आचरण के विपरीत न तो स्वर्ग प्राप्ति का साधन ही है और न कीर्ति कराने वाला ही है।।
यहाँ भगवान् अर्जुन के आचरण को अनार्य कहते हैं। आर्य पुरुष जीवन के उच्च आदर्शों पवित्रता और गरिमा के आह्वान के प्रति सदैव जागरूक और प्रयत्नशील रहते हैं । एक सच्चे आर्य अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष का स्वभाव तो यह होता है कि जीवन में आने वाली किसी भी परिस्थिति में अपने मनसंयम से विचलित न होकर उन परिस्थितियों का कुशलता से सामना करता है, और उनको अपने अनुकूल बना लेता है।
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।2.3।।
।।2.3।। हे पार्थ क्लीव (कायर) मत बनो। यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है, हे ! परंतप हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ।
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।2.3।।
।।2.3।। हे पार्थ क्लीव (कायर) मत बनो। यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है, हे ! परंतप हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ।।
ज्ञान के मार्ग पर सफलतापूर्वक कदम रखने के लिए उच्च आत्मबल और नैतिकता का होना आवश्यक है। जिसके लिए किसी मनुष्य को आशावान, उमंगी और ऊर्जावान बनकर आलस्य, स्वछन्दता की प्रवृत्ति, अज्ञान और आसक्ति जैसे दोषों पर विजय प्राप्त करना आवश्यक होता है। श्रीकृष्ण एक योग्य गुरु हैं और इसलिए अर्जुन को फटकारते हुए वे अब उसे परिस्थितियों का सामना करने के लिए प्रोत्साहित कर उसके आत्मबल को बढ़ाते हैं।
[2.3 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.]
अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन।।2.4।।
।।2.4।। अर्जुन ने कहा -- हे मधुसूदन ! मैं रणभूमि में किस प्रकार भीष्म और द्रोण के साथ बाणों से युद्ध करूँगा। हे अरिसूदन, वे दोनों ही पूजनीय हैं।।
संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि अर्जुन का मिथ्या अहंकार (देहाध्यास और जिवाध्यास ) ही उसकी मिथ्या धारणाओं और मूढ़बुद्धि होने का कारण था।
गुरूनहत्वा हि महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्।।2.5।।
।।2.5।। इन महानुभाव गुरुजनों को मारने से इस लोक में भिक्षा का अन्न भी ग्रहण करना अधिक कल्याण कारक है, क्योंकि गुरुजनों को मारकर मैं इस लोक में रक्तरंजित अर्थ और काम रूप भोगों को ही भोगूँगा।।
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः।।2.6।।
।।2.6।। हम नहीं जानते कि हमें क्या करना उचित है। हम यह भी नहीं जानते कि हम जीतेंगे, या वे हमको जीतेंगे, जिनको मारकर हम जीवित नहीं रहना चाहते वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने युद्ध के लिए खड़े हैं।।
हमारी पाँच इन्द्रियाँ है - एक स्पर्श इन्द्रिय त्वचा का स्थान पूरे शरीर में है, बाकी 4 इन्द्रिय रूप, रस , गंध , शब्द की इन्द्रियाँ शरीर के ऊपरी भाग में है। हमारा मन ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा भिन्नभिन्न विषयों को ग्रहण कर उनको एक व्यवस्थित रूप में बुद्धि के समक्ष निर्णय के लिये प्रस्तुत करता है। बुद्धि अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर निर्णय देती है जिसे मन कमेन्द्रियों के द्वारा बाह्य जगत में व्यक्त करता है। हमारी जाग्रत अवस्था के प्रत्येक क्षण यह समस्त कार्यकलाप होता रहता है। अत्यधिक चिन्तातुर होने के कारण अर्जुन का देह, इन्द्रियाँ , मन (मिथ्या अहंकार M/F जीव भाव) मूढ़बुद्धि (देहाध्यास) द्वारा निर्देशित हो रहा था, वह शुद्ध या सारथि बुद्धि आत्मा (इष्टदेव) जुड़ा हुआ नहीं था। इस मोह का प्रभाव न केवल अर्जुन के मन (अहंकार) पर बल्कि उसकी बुद्धि पर भी पड़ा था।
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।।2.7।।
।।2.7।। करुणा के कलुष से अभिभूत और कर्तव्यपथ पर संभ्रमित हुआ मैं आपसे पूछता हूँ, कि मेरे लिये जो श्रेयष्कर हो, उसे आप निश्चय करके कहिये, क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ; शरण में आये मुझको आप उपदेश दीजिये।।
यहाँ अर्जुन शिष्यभाव से भगवान् की शरण में जाता है जो यह संकेत करता है कि अब वह उपदेश ग्रहण करने योग्य हो गया है। और अब वह भगवान् के उपदेश का पालन करेगा।
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या
द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धम्
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्।।2.8।।
।।2.8।। पृथ्वी पर निष्कण्टक समृद्ध राज्य को और देवताओं के स्वामित्व को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर कर सके।।
अब अर्जुन की स्थिति एक तीव्र मुमुक्ष के समान है जो मरणधर्मा शरीर (र्मत्य जीवन) की समस्त सीमाओं और बन्धनों से मुक्त हो जाने के लिये अधीर हो उठा है। अब आवश्यकता है केवल एक प्रामाणिक विचार की जो स्वयं भगवान हृषीकेश उसे गीता के दिव्य काव्य में देते हैं।
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह।।2.9।।
।।2.9।। संजय ने कहा -- इस प्रकार गुडाकेश परंतप अर्जुन भगवान् हृषीकेश से यह कहकर कि हे गोविन्द "मैं युद्ध नहीं करूँगा" चुप हो गया।।
संजय ने यहाँ अर्जुन को गुड़ाकेश कह कर संबोधित किया गया है जिसका अर्थ है-'निद्रा पर विजय पाने वाला।' और श्रीकृष्ण के लिए हृषीकेश अर्थात् 'मन और इन्द्रियों के स्वामी' शब्द का प्रयोग किया है। इसका शाब्दिक संकेत यह है कि जो मन और इन्द्रियों के स्वामी हैं, वे निश्चित रूप से अर्जुन को इस किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति से बाहर ले आएंगे।
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः।।2.10।
।।2.10।। इस प्रकार धर्म और अधर्म शुभ और अशुभ इन दो सेनाओं के संव्यूहन के मध्य अर्जुन (जीव देहाध्यास-रथी) पूर्ण रूप से अपने सारथी बुद्धि को भगवान् श्रीकृष्ण (सूक्ष्म विवेकवती बुद्धि, आत्मा , ईश्वर,परमात्मा) की शरण में आत्मसमर्पण करता है जो पाँच अश्वों (पंच ज्ञानेन्द्रियों) और मन रूपी लगाम के द्वारा चालित शरीर रूपी रथ (देह) अपने पूर्ण नियन्त्रण में रखते हैं।
ऐसे दुखी और भ्रमित स्वयं को नश्वर देह समझने वाले , M/F देहाध्यासी व्यक्ति जीव अर्जुन को श्रीकृष्ण सहास्य उसकी अन्तिम विजय का आश्वासन देने के साथ ही गीता के आत्ममुक्ति का आध्यात्मिक उपदेश भी करते हैं। जिसके ज्ञान से सदैव के लिये मनुष्य के शोक- मोह की निवृत्ति हो जाती है।
अपने अधूरे ज्ञान के कारण हम जिन परिस्थितियों का सामना करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं, उन्हें हम दोषी मानते हैं, दुःखी होते हुए उन पर खीझते हैं, उनसे दूर भागना चाहते हैं और उन्हें अपने दुर्भाग्य के लिए उत्तरदायी ठहराते हैं। किन्तु प्रबुद्ध आत्माएँ हमें अवगत कराती हैं कि भगवान की यह सृष्टि सभी प्रकार से पूर्ण है। तथा शुभ और अशुभ परिस्थितियाँ हमारे सम्मुख दिव्य प्रयोजन हेतु उत्पन्न होती हैं। ये सब हमारे आध्यात्मिक उत्थान की व्यवस्था करती हैं ताकि हम पूर्णता को प्राप्त करने की (निःस्वार्थपरता को अभिव्यक्त करने की ?)अपनी यात्रा में आगे बढ़ सके। जो लोग इस रहस्य को समझते हैं, वे कभी कठिन परिस्थितियों से विचलित नहीं होते बल्कि दृढ़ता और शांति से इनका सामना करते हैं।
शंकराचार्यजी अपने भाष्य में कहते हैं - " तस्माद्गीताशास्त्रे केवलादेव तत्त्वज्ञानान्मोक्षप्राप्तिः न कर्मसमुच्चितात् इति निश्चितोऽर्थः। " भगवान् यही बात कहेंगे कि (योगी) अन्तःकरण की शुद्धि (चित्तशुद्धि) के लिये कर्म करते हैं। सुतरां गीताशास्त्र में निश्चय किया हुआ अर्थ यही है कि केवल तत्त्वज्ञान से ही मुक्ति होती है कर्म-सहित ज्ञान से नहीं।