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शुक्रवार, 27 मार्च 2026

श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय -12⚜️️🔱अध्याय बारह: भक्तियोग⚜️️🔱 मौन का वास्तविक अर्थ है मननशीलता ⚜️️🔱 जो पुरुष बुद्धि के स्तर पर रहता है उसे ही मान और अपमान प्रभावित कर सकते हैं आत्मस्वरूप में स्थित भक्त को नहीं ⚜️️🔱उस चैतन्य तत्त्व का साक्षात्कार करे जिसकी प्रतीक वह मूर्ति है⚜️️🔱हमारे समस्त कर्म ईश्वर के लिए अर्पण की भावना से होने चाहिये।⚜️️🔱आसक्तियों के त्याग से तत्काल शान्ति मिलती है।⚜️️🔱ज्ञानमयी दृष्टि में कोई वस्तु परमात्मा से भिन्न है ही नहीं⚜️️🔱उसके मन में किसी वस्तु से कोई आसक्ति नहीं होती⚜️️🔱वह 'ज्ञानिभक्त' कठिन परिस्थितियों के बीच भी, अस्तित्व के शाश्वत और अपरिवर्तनीय (immutable) अधिष्ठान को अनुभव करता है⚜️️🔱वह केवल एक अडिग और शुद्ध स्वर -"सोऽहं" ही सुनता है⚜️️🔱 भक्त अपने स्वयं के साथ तथा जगत् के साथ भी सदा शान्ति का अनुभव करता है⚜️️🔱भक्त के मन में राग और द्वेष नहीं होने के कारण वह शुभ और अशुभ दोनों ही से मुक्त हो जाता⚜️️🔱

 ⚜️️🔱अध्याय बारह: भक्तियोग⚜️️🔱

बारहवें अध्याय का सारामृत 

यह अध्याय 20 श्लोकों में समाप्त होता है। भक्ति योग , कर्मयोग, राजयोग और ज्ञान योग इनमें से एक या एकाधिक अथवा सभी उपायों से भगवान लाभ या ब्रह्मस्वरूपता में प्रतिष्ठित होना सम्भव है। यह अध्याय भक्ति-मार्ग के निर्देश के लिए विशेष महत्वपूर्ण है। भगवान ने बताया है कि यद्यपि-निर्गुण और सगुण दोनों से ईश्वरलाभ सम्भव है किन्तु , सगुण भक्ति का मार्ग श्रेष्ठ और सुगम है। फिर भक्तिमार्ग के भी अनेक उपाय हैं , उनमें भक्तियुक्त निष्काम कर्म ही श्रेष्ठ है।

भक्ति दो प्रकार की हैं - वैधी भक्ति और रागात्मिका भक्ति या प्रेमाभक्ति। {वैधी भक्ति नियमों पर चलती है, जबकि रागात्मिका या रागानुगा भक्ति प्रेम से बहती है। दोनों ही मार्ग भगवान तक ले जाने वाले हैं। }वैधी भक्ति के बारे में श्रीरामकृष्ण देव का उपदेश है - शास्त्र अनेक कर्म करने के लिए कह गए हैं , उस लिए वही करता हूँ - ऐसी भक्ति को वैधी भक्ति कहते हैं। निष्ठा के बिना कोई भी भजनांग फलदायी नहीं होता। इस प्रसंग में श्रीरामकृष्णदेव ने कहा है - ईश्वर के प्रति स्वजन की तरह प्रेम उत्पन्न होने पर कोई विधि-नियम नहीं रहता। 

   हवा के लिए पंखे की आवश्यकता है। ईश्वर के प्रति प्रेम होगा , इस कर्म जप, तप , उपवास आदि हैं , किन्तु यदि दक्षिणी हवा बहने लगे, तो लोग पंखा फेंक देते हैं। ईश्वर के ऊपर प्रेम या अनुराग होने से जप आदि कर्म छूट जाते हैं। हरि के प्रेम में मत्त होने पर वैध कर्म कौन करेगा ? व्याकुलता होने से ही अरुण का उदय हुआ। उसके बाद सूर्य दिखाई देगा।  व्याकुलता के बाद ही ईश्वर-दर्शन होता है। 

जिन लोगों में रागभक्ति है, उन्हीं का आन्तरिक है , ईश्वर उनका भार लेते हैं। { जब भक्त अपना 'अहंकार' त्याग कर पूरी तरह ईश्वर पर आश्रित हो जाता है, तब ईश्वर स्वयं उसके योग (जो उसके पास नहीं है उसे देना) और क्षेम (जो उसके पास है उसकी रक्षा करना) का भार अपने ऊपर ले लेते हैं। } रागानुगा भक्ति होने से भक्त केवल भगवान को ही चाहते हैं। उस समय वह सब प्रकार के आश्रमों का त्याग करके और सारी उपाधियों से मुक्त होकर एकमात्र भगवत सेवा में ही आत्मनियोग करते हैं।  

रागात्मिका भक्ति सम्बन्धात्मिका और कामात्मिका इन दो श्रेणियों में विभक्त है। तथा सम्बन्धात्मिका भक्ति शांत , दास्य , सख्य और वात्सल्य इन 4 भागों में विभक्त है। कामात्मिका भक्ति भी 4 प्रकार की होती है।

भक्तिमार्ग का अवलंबन कर जो लोग इन्द्रियसंयम करते हुए सर्वत्र समत्वबुद्धि सम्पन्न होकर समस्त प्राणियों में ब्रह्म का प्रकाश देखते हैं , और सभी प्राणियों के कल्याण कार्यों में निरत रहकर अव्यक्त ब्रह्म की चिन्ता करते हैं , वे भी श्रीभगवान को प्राप्त करते हैं। किन्तु जो लोग समस्त कर्मों का फल श्री भगवान में अर्पण करके अहं-बुद्धि से रहित होकर तदगत चित्त से अनन्य भक्ति के साथ श्री भगवान की उपासना करते हैं , उन्हें भी श्री भगवान इस संसार सागर से उद्धार करते हैं। 

उसके अनन्तर श्री भगवान ने अर्जुन को अभ्यासयोग का उपदेश देते हुए अर्जुन से कहा -यदि तुम मुझमें चित्त स्थिर न रख सको , तो आत्मविषयक अभ्यास योग द्वारा विक्षिप्त चित्त को अनात्म-विषयों से बार बार हटाकर मुझमें संलग्न रखने की चेष्टा करो। यदि अभ्यासयोग में भी असमर्थ हो तो मेरी प्रीति के लिए सेवा समझकर पूजा , अर्चना, जप , ध्यान, नामकीर्तन अदि करते रहो। उससे मैं भी प्रसन्न होऊंगा। और यदि वैसा भी नहीं कर सके तो दयालु, अहंभाव रहित , समत्वबुद्धि सम्पन्न सभी प्राणियों के प्रति मित्रभाव युक्त। और ममत्व बुद्धि से रहित होकर मुझमें एकनिष्ठ और मेरे शरणागत होकर फल आकांक्षा का परित्याग करके अमृत तुल्य धर्म का आचरण करो। उसी से तुम मेरे विशेष प्रीतिभाजन होंगे। 

इस अध्याय में विशेष रूप से भक्तिमार्ग का आश्रय लेकर ईश्वर की उपासना का उपदेश दिया गया है। इस कारण इस अध्याय का नाम भक्तियोग है। 

भक्तिमार्ग के अवलंबन से सगुण ब्रह्मोपासना के फलस्वरूप ईश्वरदर्शन लाभ होता है। साधन करते रहने से भक्त स्वयं समझ सकेंगे कि वह साधन मार्ग में कहाँ तक अग्रसर हुए हैं। भक्ति परिपक्व होने पर ईश्वरदर्शन रूप परमानन्द की प्राप्ति होती है। सच्चिदानन्द स्वरुप ईश्वर के दर्शन के लक्षण के सम्बन्ध में श्री रामकृष्ण देव ने कहा है - ईश्वरदर्शन के कुछ लक्षण हैं। ज्योति दिखाई पड़ती है , आनंद होता है , छाती के भीतर तुबड़ी की तरह गुड़गुड़ करते हुए महावायु उठती है। जिसके भीतर अनुराग के ऐश्वर्य का प्रकाश हो रहा है , उसके ईश्वरलाभ में विलम्ब नहीं है। अनुराग के ऐश्वर्य क्या क्या हैं? विवेक, वैराग्य , जीवों पर दया , साधु सेवा , साधुसंग , ईश्वरका नामगुण कीर्तन, सत्यबात यही सब। 

भक्त के ह्रदय में इस प्रकार के लक्षण प्रगट होने पर समझा जायेगा कि ईश्वरदर्शन या परमानंद प्राप्ति में और अधिक विलम्ब नहीं है। ईश्वर के प्रति भक्ति होने से थोड़े में ही उद्दीपन होता है। ईश्वरीय प्रसंग के सिवाय दूसरी बात भक्त को अच्छी नहीं लगती। निष्ठा के अनन्तर भक्ति होती है। 

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अर्जुन उवाच

एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।

येचाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः।।12.1।।

।।12.1।। अर्जुन ने कहा -- जो भक्त, सतत युक्त होकर इस (पूर्वोक्त) प्रकार से आपकी उपासना करते हैं और जो भक्त अक्षर, और अव्यक्त की उपासना करते हैं, उन दोनों में कौन उत्तम योगवित् है।।

पूर्व अध्याय की समाप्ति भगवान् के इस आश्वासन के साथ हुई थी कि कोई भी साधक भक्त अनन्यभक्ति के द्वारा ईश्वर के विराट् वैभव का स्वयं में साक्षात् अनुभव कर सकता है। इस चुनौती भरे वाक्य ने क्षत्रिय राजपुत्र अर्जुन की महत्त्वाकांक्षा को जगा दिया। जगत् के एक व्यावहारिक पुरुष के रूप में वह जानना चाहता है कि वह परमात्मा के कौन से रूप की उपासना करे। 

यहाँ प्रश्न बड़ी बुद्धिमत्तापूर्वक रखा गया है। यह सुविदित तथ्य है कि जगत् में दो प्रकार के साधक होते हैं? जो वस्तुत एक ही साध्य को प्राप्त करने के लिए साधनारत होते हैं। कोई साधक परमात्मा के सगुण साकार व्यक्त रूप की आराधना उपासना करते हैं।  जबकि अन्य साधक निर्गुण निराकार अव्यक्त का ध्यान करते हैं। दोनों ही निष्ठावान् हैं और अपनेअपने मार्ग पर प्रगति की ओर अग्रसर होते हैं।

 परन्तु प्रश्न यह है कि इन दोनों में कौन उत्तम योगवित् या योगनिष्ठ है ? सगुण और निर्गुण के इन दो उपासकों में कौन साधक श्रेष्ठ है?  क्या मूर्तिपूजा के द्वारा ईश्वर का ध्यान और साक्षात्कार किया जा सकता है क्या कोई भी प्रतीक परमात्मा का सूचक हो सकता है क्या एक तरंग समुद्र का प्रतीक या प्रतिनिधि बन सकती है  ? प्रथम भगवान् श्रीकृष्ण सगुणोपासना का वर्णन करते हुए कहते हैं

श्री भगवानुवाच

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।

श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः।।12.2।।

।।12.2।। श्रीभगवान् ने कहा -- मुझमें मन को एकाग्र करके नित्ययुक्त हुए जो भक्तजन परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे, मेरे मत से, युक्ततम हैं अर्थात् श्रेष्ठ हैं।।

नित्ययुक्त होने का अर्थ है नित्य नियमित उपासना के समय आत्मसंयम का होना। मन अपनी बहिर्मुखी प्रवृत्ति के कारण ध्येय को त्यागकर अन्य विषयों में ही विचरण करने लगता हैं। ऐसे मन का ध्यान ध्येय में ही स्थिर करने की कला का ही नाम है आत्मसंयम।  वास्तविक उपासना तो परमात्मा के साथ तादात्म्य करने की आन्तरिक क्रिया है जिसके द्वारा हम परमात्मस्वरूप बन जाते हैं। 

परा श्रद्धा से युक्त हुए।  श्रद्धा का अर्थ है किसी अज्ञात वस्तु में मेरा वह विश्वास जिसके द्वारा, एक दिन वह वस्तु (अन्तर्निहित सत्य-दिव्यता) मुझे यथार्थ रूप से ज्ञात होती है,  जिसमें मेरा पहले केवल विश्वास ही था। इस प्रकार  एक सच्चा भक्त बनने के लिए इस श्लोक में जिस तीन आवश्यक एवं अपरिहार्य गुणों को बताया गया है? वे हैं (1) परम श्रद्धा (2) उपासना में नित्ययुक्तता और (3) ध्येयस्वरूप (आत्मा या इष्टदेव) में मन की एकाग्रता। इन तीन गुणों से सम्पन्न व्यक्ति को भगवान् युक्ततम मानते हैं। तो क्या अन्य भक्त युक्ततम नहीं हैं ऐसी बात नहीं है किन्तु उनके विषय में जो कहना है उसे सुनो-

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।

सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्।।12.3।।

।।12.3।। परन्तु जो भक्त अक्षर ,अनिर्देश्य, अव्यक्त, सर्वगत, अचिन्त्य, कूटस्थ, अचल और ध्रुव की उपासना करते हैं।।

पूर्व श्लोकों में सगुणोपासक भक्तों के लिए आवश्यक गुणों का वर्णन करने के पश्चात् अब भगवान् श्रीकृष्ण निर्गुण के उपासकों का वर्णन उपर्युक्त दो श्लोकों में करते हैं। 

अक्षर शब्द से यह सूचित किया गया है कि इन्द्रियों के द्वारा परमतत्त्व का ज्ञान कदापि संभव नहीं है। अनिर्देश्य जो परिभाषित नहीं किया जा सकता है उसे अनिर्देश्य कहते हैं। सभी परिभाषाएं दृश्य वस्तु के सन्दर्भ में ही दी जा सकती हैं। अत जो इन्द्रियों का दृश्य नहीं होता  उसकी न परिभाषा दी जा सकती है और न ही उसे अन्य वस्तुओं से भिन्न करके जाना जा सकता हैसर्वत्रगम् जो अनन्त तत्त्व गुण रहित होने से व्यक्त नहीं हैं और इसी कारण अनिर्देश्य है और उसको सर्वव्यापी-सर्वगत होना आवश्यक है। 

    यदि परमात्मा से कोई स्थान रिक्त हो  तो परमात्मा को आकार विशेष प्राप्त हो जायेगा। और साकार वस्तु विनाशी भी होगी। अचिन्त्यम् मन के द्वारा जिस वस्तु का चिन्तन किया जा सकता है, वह दृश्य पदार्थ होने के कारण नाशवान् होगी। इसलिए अविनाशी तत्त्व निश्चित ही अकल्पनीय अग्राह्य और अचिन्त्य होगा। 

कूटस्थम् (अविकारी) यद्यपि चैतन्यस्वरूप आत्मा वह अधिष्ठान है जिसके ऊपर सब विकार और परिवर्तन होते रहते हैं , परन्तु वह स्वयं अपरिवर्तनशील और अविकारी ही रहता है। कूट शब्द का अर्थ है निहाई। एक लुहार की दुकान में निहाई पर अन्य लौह खण्डों को रखकर उन पर आघात करके उन्हें विभिन्न आकार दिये जाते हैं, परन्तु निहाई स्वयं अपरिवर्तित ही रहती है। उसी प्रकार चैतन्य के सम्बन्ध से उपाधियों तथा व्यक्तित्व में विकार होता है किन्तु चैतन्य तत्त्व कूट के समान अविकारी रहता है

अचलम् चलन का अर्थ है वस्तु का देश और काल की मर्यादा में परिवर्तन होना। कोई वस्तु अपने में ही चल नहीं सकती उसका चलन वही पर संभव है जहाँ पर वह पहले से विद्यमान नहीं है। परमात्मा सर्वव्यापी है और इसलिए देश या काल में ऐसा कोई स्थान या क्षण नहीं है जहाँ वह विद्यमान न हो अत वह अचल कहलाता है। 

वह यत्र, तत्र, सर्वत्र है उसमें ही भूत, वर्तमान और भविष्य का अस्तित्व है। ध्रुवम् (शाश्वत् सनातन) विकारी वस्तु देश और काल से सीमांकित (delimited) होती है। परन्तु जो देश और काल का भी अधिष्ठान है  वह परमात्मा इन दोनों से सीमित नहीं हो सकता है। अनन्त स्वरूप चैतन्य आत्मा सर्वत्र सब काल में एक ही है। 

शैशव, यौवन और वृद्धावस्था में सर्वत्र, सब काल और सुख-दुख,  लाभ- हानि की समस्त परिस्थितियों में आत्मा एक समान ही रहता है। 

जब हम अपने शरीर मन और बुद्धि के स्तर पर आते हैं केवल तभी हम आइन्स्टीन के द्वारा वर्णित देश और काल की सापेक्षता के जगत् में प्रवेश करते हैं। 

आत्मा (परमात्मा, ईश्वर, भगवान) समय के द्वारा सीमित या 'bound by time 'कालविच्छिन्न नहीं है वह काल का भी शासक हैवह ध्रुव है। 

   यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन दो श्लोकों में प्रयुक्त शब्द उपनिषदों से लिये गये हैं। इन शब्दों के द्वारा उस आत्मा (इष्टदेव) का निर्देश किया जाता है जो इस नित्य परिवर्तनशील नाम और रूपों, कर्म और घटनाओं, विषय ग्रहण और भावनाओं विचारों तथा अनुभवों के जगत् का एकमेव सनातन अधिष्ठान है। [पर्दा जैसा एकमेव कूटस्थ सनातन अधिष्ठान है,नाम-जप साधना !]

संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।

ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः।।12.4।।

।।12.4।। इन्द्रिय समुदाय को सम्यक् प्रकार से नियमित करके, सर्वत्र समभाव वाले, प्राणी मात्र के हित में रत वे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।।

सभी उपासकों में निम्नलिखित तीन गुणों का होना आवश्यक है। इन्द्रियसंयम ! इन्द्रियों के द्वारा अपनी शक्तियों का अपव्यय करना अविवेकी एवं निम्न स्तर की रुचि वाले मनुष्यों का कार्य़ होता है। 

जिस साधक की महत्त्वाकांक्षा पूर्णत्व के शिखर पर पहुँचकर परमानन्द का अनुभव में प्रतिष्ठित रहने  की है, उसको चाहिए कि वह इस अपव्यय में कटौती करे।  और उसे बिल्कुल विष के जैसा समझकर सदा के लिए त्याग दे।  और इस प्रकार ब्रह्मचर्य द्वारा उपार्जित शक्तियों-  का सदुपयोग ध्यान में आत्मानुभव को प्राप्त करने/ अथवा आत्मानुभव में प्रतिष्ठित रहने  के लिए करे। 

पांच ज्ञानेन्द्रियां ही वे द्वार हैं,  जिनके माध्यम से मन को विचलित करने वाले बाह्य जगत् के विषय चोरी छिपे मन में प्रवेश करके हमारी आन्तरिक शान्ति को नष्ट कर देते हैं। और फिर हमारा मन (अहंकार)  कर्मेन्द्रियों के द्वारा बाह्य जगत् में अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त करने को दौड़ पड़ता है। इस प्रकार विषयग्रहण और प्रतिक्रिया रूप यह व्यवहार मन के सामंजस्य और सन्तुलन को तोड़ देता है।  इसलिए यहाँ श्रीकृष्ण का इन्द्रियसंयम पर बल देना उचित ही है क्योंकि ध्यानमार्ग की सफलता इसी पर निर्भर करती है

सर्वत्र समबुद्धि सफलता के लिए आवश्यक यह दूसरा गुण हैसमस्त प्रकार की सुख-दुःख , मान-अपमान की परिस्थितियों और अनुभवों में बुद्धि की समता होनी चाहिएबाह्य विक्षेपरहित दशा की आशा और प्रतीक्षा करना मूर्खता का लक्षण ही है। बाह्य जगत में सब ठीक हो जायेगा -? ऐसी आदर्श परिस्थिति का होना असम्भव है। जगत् की वस्तुएं अपने में ही तथा विशिष्ट संरचनाओं के रूप में भी निरन्तर परिवर्तित होती रहती हैं। इसलिए ऐसे नित्य परिवर्तनशील रचना वाले जगत् में किसी ऐसी इष्ट स्थिति की अपेक्षा रखना अविवेकपूर्ण ही कहा जा सकता है जो भी परिस्थिति आये वो साधक के ध्यानाभ्यास के लाभ के लिए निरन्तर एक समान बनी रहे वास्तव में अविवेकपूर्ण ही कहा जा सकता है। यह सर्वथा असंभव है।

इसलिए ऐसे परिवर्तनशील जगत् में साधक को ही चाहिए कि वह  अपने बौद्धिक मूल्यांकनों मन की आसक्तियों तथा बाह्य जगत् के साथ होने वाले सम्पर्कों को विवेकपूर्ण संयमित करके बुद्धि की समता और मन का सन्तुलन बनाये रखे। 

दृष्टि के समक्ष मन में विकार या विक्षेप उत्पन्न करने वाले विषयों या परिस्थितियों के होने पर भी जो पुरुष अपना सन्तुलन नहीं खोता है (आत्मा इष्टदेव के नाम-जप में प्रतिष्ठित रहता है) वही समबुद्धि कहलाता है। 

जिस पुरुष ने अपनी विवेकशक्ति का विकास किया है वह बड़ी सरलता से सौन्दर्य के उस स्वर्णिम पर्दे को देख और पहचान सकता है जो इस जगत् की उन समस्त वस्तुओं को धारण किये हुए है। इस क्षमता से सम्पन्न साधक को ही यहाँ समबुद्धि कहा गया है।

किसी व्यक्ति का शिशु पुत्र किसी समय मैला है तो दुसरे समय अत्यन्त चंचल प्रात रुदन कर रहा होता है।  तो दोपहर में हंसता है संध्याकाल में तंग करता है और रात में उन्मत्त और फिर भी उसकी इन सब दशाओं में उसका पिता एक पुत्र को ही देखता है।  और इसलिए उसके भिन्नभिन्न रूपों में भी उसे समान रूप से ही प्रेम करता है। यह उस प्रेमपूर्ण पिता की समबुद्धि है

 इसी प्रकार एक सच्चा साधक अपने जीवन के भयानक दुखान्तों और आनन्ददायक सुखान्तों में तथा अभूतपूर्व सफलताओं और निराशाजनक विफलताओं में भी अपने हृदय के इष्ट देव को  पहचानना सीखता है।  इसलिए वह बौद्धिक समता को प्राप्त हो जाता है। 

सफलता के लिए आवश्यक तीसरे गुण को बताते हुए भगवान् कहते हैं कि साधक को अर्पण की भावना से सदैव यथाशक्ति प्राणिमात्र की सेवा में रत रहना चाहिए। 

जब तक मनुष्य इस शरीर को धारण किये जीवित रहता है तब तक उसके लिये यह सर्वथा असंभव है कि नित्य निरन्तर प्रत्येक समय अपने मन और बुद्धि को आत्मचिन्तन में ही स्थिर कर सके। जगत् के साथ उसे सामान्य व्यवहार करना ही होगा। इस प्रकार के व्यवहारों में उसे निरन्तर अथक प्रय़त्न करके प्राणीमात्र की सेवा करनी चाहिए।  यह तो इस ज्ञान का स्वरूप ही है। प्राणिमात्र को प्रेम करना तो उसका धर्म ही है। इस प्रकार उक्त तीन गुणों से सम्पन्न होकर जो साधकगण अक्षर और अव्यक्त (इष्टदेव) की उपासना करते हैं वे भी मुझे ही प्राप्त होते हैं यह भगवान् श्रीकृष्ण की घोषणा है।

भगवान् श्रीकृष्ण यह बताते हैं कि किस प्रकार दोनों ही उपासक एक ही लक्ष्य को प्राप्त करते हैंदोनों में ही सफलता के लिए कौन से समान गुणों का होना आवश्यक है। परन्तु सामान्यत बहुसंख्यक साधकों के विषय में वे कहते हैं

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।

अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते।।12.5।।

।।12.5।। परन्तु उन अव्यक्त में आसक्त हुए चित्त वाले पुरुषों को क्लेश अधिक होता है, क्योंकि देहधारियों स्वयं को स्थूल शरीर समझने वाले व्यक्ति द्वारा अव्यक्त की गति कठिनाईपूर्वक प्राप्त की जाती है।।

 श्रीशंकराचार्य इसे स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि देहवद्भि का अर्थ है देहाभिमानवद्भि अर्थात् देहधारी से तात्पर्य उन लोगों से है? जिन्हें देहाभिमान बहुत दृढ़ है। जो देह को ही अपना स्वरूप समझते हैं, (अपने को पैदा होने वाला शरीर मात्र समझते हैं)  वे लोग उनमें आसक्त होकर सदा विषयोपभोग का ही जीवन जीते हैं।

    ऐसे विषयासक्त पुरषों के लिए अनन्त निराकार और सर्वव्यापी तत्त्व का ध्यान करना प्राय असंभव होता है। जिसकी दृष्टि मन्द हो और हाथ काँपते हों ऐसे वृद्ध व्यक्ति को सुई में धागा डालने में बड़ी कठिनाई हो सकती है। तात्पर्य यह है कि स्वयं अव्यक्तोपासना में कष्ट नहीं है वरन् देहाभिमानियों के लिए वह कष्टप्रद प्रतीत होती है। संक्षेप में बहुसंख्यक साधकों के लिए विश्व में व्यक्त भगवान् के सगुण साकार रूप का ध्यान करना अधिक सरल और लाभदायक है

 यदि मनुष्य जगत् की सेवा को ही ईश्वर की पूजा समझकर करे तो शनैशनै उसकी देहासक्ति तथा विषयोपभोग की तृष्णा समाप्त हो जाती है। और मन इतना शुद्ध और सूक्ष्म हो जाता है कि फिर वह निराकार अव्यक्त और अविनाशी तत्त्व का ध्यान करने/ (प्रतिष्ठित रहने में) समर्थ हो जाता है। 

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।

अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।।12.6।।

।।12.6।। परन्तु जो भक्तजन मुझे ही परम लक्ष्य समझते हुए सब कर्मों को मुझे अर्पण करके अनन्ययोग के द्वारा मेरा (सगुण का) ही ध्यान करते हैं।।

यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण सगुणोपासकों के लिए श्रद्धापूर्वक अनुष्ठेय गुणों अथवा नियमों का वर्णन करते हुए यह आश्वासन देते हैं कि निष्ठावान् साधकों का इस संसार-सागर से उद्धार स्वयं भगवान् ही करेंगे। 

जब कोई भक्त अपने आप को पूर्णत ईश्वर के चरणों में अर्पण कर देता है और फिर ईश्वर के दूत अथवा ईश्वरी संकल्प के प्रतिनिधित्व के रूप में कार्य करता है तब वह दैवी शक्ति से सम्पन्न हो जाता है। उसे अपने प्रत्येक कार्य में ही परमात्मा की उपस्थिति और अनुग्रह का भान बना रहता है। 

 एक भक्त को उपदेश दिया जाता है कि वह ईश्वर को ही अपने जीवन का परम लक्ष्य माने और जीवन में सदैव उसे ही प्राप्त करने का प्रयत्न करे। सारांश में हमें यह उपदेश दिया जाता है कि  आवश्यक है कि हम अपने जीवन के सम्पर्कों व्यवहारों एवं अनुभवों का उपयोग उस परमात्मा की उपलब्धि  के लिए करें जिसकी उपासना हम उसके सगुण साकार रूप में करते हैं। 

अनन्ययोग के द्वारा वे सभी प्रयत्न योग कहलाते हैं जिनके द्वारा हम अपने मन का तादात्म्य अपने पूर्णत्व के लक्ष्य के साथ स्थापित कर सकते हैं। 

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।

निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।।12.8।।

।।12.8।। तुम अपने मन और बुद्धि को मुझमें ही स्थिर करो, तदुपरान्त तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें कोई संशय नहीं है।।

 शास्त्रीय दृष्टि से गीता का यह उपदेश उचित है कि भक्त को चाहिए कि वह अपनी विवेकवती बुद्धि के द्वारा अपने इष्टदेव की पाषाण की मूर्ति का भेदन करके उस चैतन्य तत्त्व का साक्षात्कार करे जिसकी प्रतीक वह मूर्ति है

हममें से प्रत्येक व्यक्ति किसी एक क्षण विशेष में अपनी समस्त भावनाओं एवं विचारों का कुल योग रूप होता है। यदि हमारा मन भगवान् में स्थिर हुआ है तथा बुद्धि अनन्त की गहराइयों में प्रवेश कर जाती है तो हमारा व्यक्तिगत अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है और हम सर्वव्यापी अनन्त परमात्मा में विलीन होकर तत्स्वरूप बन जाते हैं। 

(पुनः देह में आने के बाद ?)  इसलिए भगवान् ने कहा है कि तदुपरान्त तुम मुझमें ही निवास करोगे। सत्य के मन्दिर के द्वार पर मन में विक्षेप और संकोच के साथ खड़े हुए एक र्मत्य जीव को भगवान् का यह कथन अतिशयोक्ति पूर्ण प्रतीत हो सकता है।

 उसका तो अपना नित्य का अनुभव यह है कि वह एक  ससीम र्मत्य व्यक्ति है जो सहस्रों मर्यादाओं से घिरा असंख्य दोषों से दुखी और निराशाओं की सेना के द्वारा (देह के जीवित रहने तक) उत्पीड़ित किया जा रहा जीव है। इसलिए उसे विश्वास नहीं होता कि वास्तव में वह कभी अपने ईश्वरत्व के स्वरूप का साक्षात्कार भी कर सकता है। 

अत एक दयालु गुरु के रूप में भगवान् श्रीकृष्ण स्पष्ट आश्वासन देते हैं कि इसमें संशय की कोई बात नही है। यदि यह साधना कठिन प्रतीत हो तो उपायान्तर बताते हुए भगवान् कहते हैं

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।

अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय।।12.9।।

।।12.9।। हे धनंजय ! यदि तुम अपने मन को मुझमें स्थिर करने में समर्थ नहीं हो, तो अभ्यासयोग के द्वारा तुम मुझे प्राप्त करने की इच्छा (अर्थात् प्रयत्न) करो।।

साधक को अपना मन भगवान् के चरणों में स्थिर करके बुद्धि के द्वारा उस सगुण रूप के पारमार्थिक स्वरूप को पहचानना चाहिए। इन दोनों प्रक्रियाओं का सम्पादन करने के लिए अत्यन्त सूक्ष्म बुद्धि और मन की एकाग्रता की आवश्यकता होती है। सम्भवत एक सामान्य पुरुष के समान अर्जुन को यह अनुभव हुआ कि इस मार्ग का सफलतापूर्वक अनुकरण करना उसके लिए असंभव ही है। 

करुणासागर भगवान् श्रीकृष्ण अपने शिष्य के मुख के भावों को समझकर यहाँ एक अन्य उपाय का वर्णन करते हैं। यदि तुम स्थिरतापूर्वक अपने चित्त को मुझमें समाहित नहीं कर सकते हो  तब एक उपाय यह है कि तुम अभ्यासयोग का पालन करो। इस अभ्यासयोग को पूर्व में इस प्रकार बताया गया था कि जहाँ कहीं यह चंचल और अस्थिर मन विचरण करता है उसे वहीं संयमित करके आत्मा के ही वश में लाना चाहिए। 

 जब कभी कोई साधक अपने मन को चुने हुए ध्येय विषय में (इष्टदेव) समाहित करना चाहता है तो उसका चंचल मन ध्येय से हटकर विजातीय प्रवृत्तियों के प्रवाह में विचरण करने लगता है। प्रत्येक साधक को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि ध्यानाभ्यास के समय किसी एक अवधि तक (5 मिनट) भी मन सर्वथा ध्येय वस्तु का ही चिन्तन करने में सफल नहीं होता है। कुछ ही क्षणों में मन का अपने कल्पना जगत् में विहार करना प्रारम्भ हो जाता है।

उसका यह विहार करना अपने आप में इतनी बड़ी समस्या नहीं हैं जितनी बड़ी वह बन जाती है जब यह साधक (मूढ़बुद्धि) भी मन के द्वारा अपहृत हुआ उसी कल्पना लोक में ले जाया जाता है।

 योगेश्वर श्रीकृष्ण केवल यही उपदेश देते हैं कि हमको अपने दिव्य पथ को त्यागकर मन के लुभाने में नहीं आना चाहिए। यत्रतत्र विचरण करने वाले उपद्रवी मन का ध्यान ध्येय बिन्दु में ही समाहित करने के लिए साधक में (शुद्धबुद्धि में) मन से अलग हो कर, अपने में ही निहित उस क्षमता के साथ तादात्म्य करना चाहिए जो मन से भी श्रेष्ठ है और उस पर शासन करके उसे अनुशासित कर सकती है। मन से श्रेष्ठ उसका शासक है विवेक-सम्पन्न बुद्धि अर्थात् शुद्ध बुद्धि। बुद्धि की विवेकसार्मथ्य के द्वारा ही हम उससे निम्नतर मन को अनुशासित कर सकते हैं। यह उपाय उन लोगों को लिए बताया गया है जो पूर्व श्लोक में वर्णित विहंगम मार्ग का अनुसरण नहीं कर सकते हैं। दीर्घकाल तक अभ्यासयोग की साधना करने पर हमारा मन इस प्रकार अनुशासित हो जायेगा कि हम आत्मविकास के साक्षात् साधन का अभ्यास करने में समर्थ हो जायेंगे  जिसका वर्णन पूर्व के श्लोक में किया गया है। 

यदि यह भी सम्भव न हो तो

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।

मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि।।12.10।।

।।12.10।। यदि तुम अभ्यास में भी असमर्थ हो तो मत्कर्म परायण बनो; इस प्रकार मेरे लिए कर्मों को करते हुए भी तुम सिद्धि को प्राप्त करोगे।।

यदि कोई साधक मानसिक दृष्टि से विक्षुब्ध और असंयमित है तो वह अभ्यासयोग का पालन करने में समर्थ नहीं हो सकता। यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण का यह उपदेश है कि ऐसे साधकों को ध्यानाभ्यास में व्यर्थ संघर्ष नहीं करते रहना चाहिए। 

परन्तु यदि किसी पुरुष का मन इन विषयवासनाओं से पूर्ण है तथा अत्यन्त बहिर्मुखी है  तो उसका ध्यानाभ्यास केवल ध्यानाभास ही होगा। भगवान् कहते हैं कि ऐसे पुरुष को ध्यान छोड़कर कर्म करना चाहिये। परन्तु वे कर्म ईश्वर के लिए अर्पण की भावना से होने चाहिये। यही मत्कर्मपरमो भव वाक्य का अर्थ है। इस प्रकार के कर्मानुष्ठान से अत्यन्त बहिर्मुखी प्रवृत्ति के पुरुष को भी अपने समस्त दैनिक कर्मों में ईश्वर का अखण्ड स्मरण बना रह सकता है। 

कोई व्यक्ति निश्चयात्मक  रूप से स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर ईश्वर के ही संकल्प -Be and Make' को अपने कर्मों के द्वारा पूर्ण करने का प्रयत्न करे तो उसे सदैव ईश्वर का स्मरण बना रहेगा।  और वह स्वयं में कर्म-कुशलता की अलौकिक शक्ति  संगठन-सार्मथ्य और आत्मविश्वास-पूर्ण साहस को पायेगा। 

ईश्वर को समस्त कर्म अर्पण करने की कला के द्वारा हम अपने दैनिक व्यावहारिक कर्म करते हुए भी मन में दैवी संस्कारों का विकास करते रहेंगे। इसा प्रक्रिया में हमारी पूर्वार्जित वासनाओं का क्षय़ भी होता रहेगा। इस प्रकार चित्त की शुद्धि प्राप्त हो जाने पर हम अभ्यासयोग के अधिकारी हो जायेंगे और शीघ्र ही पर्याप्त समता और सन्तुलन को प्राप्त कर सत्य आत्मा का ध्यान कर तत्स्वरूप बन जायेंगे।

 यदि कोई व्यक्ति इसे भी करने में असमर्थ हो तो उसके लिए भी उपाय अगले श्लोक में बताते हैं

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।

सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्।।12.11।।

।।12.11।। और यदि इसको भी करने के लिए तुम असमर्थ हो, तो आत्मसंयम से युक्त होकर मेरी प्राप्ति रूप योग का आश्रय लेकर, तुम समस्त कर्मों के फल का त्याग करो।।

पूर्व श्लोक में हमें अहंकार (कर्तापन) का सर्वथा त्याग करके जगत् में कर्म करने का उपदेश दिया गया था। अत्यन्त अहंकारी और मानी पुरुष के लिए यह कार्य़ इतना सरल नहीं है। ऐसा पुरुष रजोगुण के कारण अत्यन्त क्षुब्ध रहता है तथा तमोगुण की निम्नस्तरीय प्रवृत्तियों के कारण उसका व्यक्तित्व विषाक्त रहता है। ऐसे निम्न स्तर के व्यक्ति के लिए भी गीता में साधन मार्ग बताया गया है।

यदि समस्त कर्मों को ईश्वरार्पण बुद्धि से कर पाना असंभव है तो उस साधक के लिए उतना ही प्रभावी अन्य उपाय यहाँ बताया गया है कि आत्मसंयम से युक्त होकर मेरी प्राप्ति रूप योग का आश्रय लेकर तुम समस्त कर्मों के फलों का त्याग करो। 

वर्तमान क्षण में किया गया कर्म ही परिपक्व होकर भविष्य के क्षण में फल बनकर प्रकट होता है। आज यदि कोई कृषक भूमि को जोतकर बीज बोता है तो उसे वह फसल दो-तीन महीनों के पश्चात् ही प्राप्त होगी। और यदि वह कृषक वर्तमान में करने योग्य कार्य को त्यागकर भविष्य में आने वाले फल की ही चिन्ता करने में समय का अपव्यय करे तो निश्चय ही उसे कभी लाभ प्राप्त नहीं हो सकता। 

यहाँ कर्मफल त्याग का अर्थ यह है कि भविष्य में आने वाले फलों की व्यर्थ की चिन्ताओं और कल्पनाओं का सर्वथा त्याग कर देना और वर्तमान में कर्म करते रहना। 

 अगले श्लोक में भगवान् सर्वकर्म-फल त्याग की प्रशंसा करते हैं

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते।

ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्।।12.12।।

।।12.12।। अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है; ज्ञान से श्रेष्ठ ध्यान है और ध्यान से भी श्रेष्ठ कर्मफल त्याग है त्याग; से तत्काल ही शान्ति मिलती है।।

श्रवण से प्राप्त ज्ञान को आत्मसात् करने के लिए उस पर विचारपूर्वक मनन और ध्यान की आवश्यकता होती है। शास्त्रवाक्यों के केवल शाब्दिक अर्थ को जानने से यह कार्य सम्पादित नहीं हो सकता। इसलिए मनन और निदिध्यासन अनिवार्य़ होते हैं। केवल श्रवण से किये गये ज्ञान से आत्मसात् किया हुआ ज्ञान निश्चित ही अधिक श्रेष्ठ होता है उसे आत्मसात् करने का साधन ध्यान है।

इसलिए यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण कर्मफल त्याग को श्रेष्ठ स्थान प्रदान करते हैं।अपने कथन पर टिप्पणी को जोड़ते हुए भगवान् कहते हैं कि आसक्तियों के त्याग से तत्काल शान्ति मिलती है।  हिन्दू धर्म में संन्यास का वास्तविक अर्थ यह है कि इन्द्रियों का विषयों के साथ सम्पर्क होने से उत्पन्न होने वाले सुख भोग की बन्धनकारक आसक्तियों को त्याग देना।

इस त्याग के परिणामस्वरूप साधक को अन्तकरण की प्रभावशाली शान्ति और स्थिरता प्राप्त होती है। ऐसे शान्त वातावरण में विवेकी बुद्धि शास्त्र के ज्ञान पर मनन करके उसमें वर्णित आत्मविकास के साधनों को सम्यक् प्रकार से समझ पाती है। और इस प्रकार ज्ञानपूर्वक ध्यान का अभ्यास करने पर साधक को निश्चित ही सफलता मिलती है।

अब अक्षर और अव्यक्त की उपासना करने वाले ज्ञानी भक्तजनों के आंतरिक लक्षण अगले श्लोक में बताये जा रहे हैं। 

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।

निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।।12.13।।

।।12.13।। प्राणिमात्र के प्रति जो द्वेषरहित है तथा सबका मित्र तथा करुणावान् है; जो ममता और अहंकार से रहित, सुख और दु:ख में सम और क्षमावान् है।।

जिस भक्त ने यह पहचान लिया है कि प्राणी मात्र में एक ही आत्मा व्याप्त है, जो उसका स्वयं का ही स्वरूप है ! तो ऐसा आत्मैकत्वदर्शी पुरुष किसी से भी द्वेष नहीं कर सकता।  क्योंकि उसकी ज्ञानमयी दृष्टि में कोई वस्तु परमात्मा से भिन्न है ही नहीं। कोई भी जीवित पुरुष अपने ही दाहिने हाथ से द्वेष नहीं कर सकता।  क्योंकि वह उसमें भी व्याप्त है। कोई भी व्यक्ति अपने से ही द्वेष या घृणा नहीं करता। प्राणीमात्र के प्रति उसका भाव मैत्रीपूर्ण होता है।  और सबके लिए उसके मन में करुणा होती है। सबको वह अभय प्रदान करता है

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।12.14।।

।।12.14।। जो संयतात्मा, दृढ़निश्चयी योगी सदा सन्तुष्ट है, जो अपने मन और बुद्धि को मुझमें अर्पण किये हुए है, जो ऐसा मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है।।

वह अहंकार और वस्तुओं में ममत्व भाव से रहित होता है। सुख और दुख से सम तथा किसी के द्वारा अपशब्द कहे अथवा पीड़ित किये जाने पर भी अविकारी भाव से रहता है। शरीर धारणमात्र के लिए भी वस्तुओं के न होने पर वह सदा सन्तुष्ट एवं निजानन्द में मग्न रहता है। वह आत्मसंयमी तथा तत्त्व के स्वरूप के विषय में दृढ़ निश्चय वाला होता है। भगवान् कहते हैं कि अपने मन और बुद्धि को मुझमें अर्पित करने वाला मेरा भक्त मुझे प्रिय है। 

भगवान् ने पहले भी सातवें अध्याय में कहा था कि मुझमें (आत्मा या इष्टदेव में ) अपनी शुद्धबुद्धि अर्पित करने वाला ज्ञानी को मैं और मुझे ज्ञानी भक्त अत्यन्त प्रिय है उसी कथन को यहाँ और अधिक विस्तार से स्पष्ट किया गया है।

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।

हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः।।12.15।।

।।12.15।। जिससे कोई लोक (अर्थात् जीव, व्यक्ति) उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी व्यक्ति से उद्वेग अनुभव नहीं करता तथा जो हर्ष, अमर्ष (असहिष्णुता) भय और उद्वेगों से मुक्त है,वह भक्त मुझे प्रिय है।।

इस में ज्ञानी भक्त के तीन और लक्षण बताये गये हैं। जिस पुरुष से इस लोक को उद्वेग नहीं होता ज्ञानी पुरुष वह है जो लोक में किसी प्रकार का विक्षेप या उद्वेग उत्पन्न नहीं करता है। जहाँ सूर्य है वहाँ अन्धकार नहीं रह सकता वैसे ही जहाँ शान्त और आनन्दस्वरूप में स्थित ज्ञानी भक्त होगा वहाँ अशान्ति और उदासी का प्रश्न ही नहीं उठता है। 

उसके आसपास शान्ति प्रेम और आनन्द का ही ऐसा वातावरण निर्मित होता है कि वहाँ पहुँचने पर एक क्षुब्ध और दुखी पुरुष भी उस महात्मा पुरुष से प्रभावित होकर अपने दुख को भूलकर शान्ति का अनुभव करता है। वास्तविकता तो यह है कि सारा जगत् उस सन्त के समीप विवश हुआ सा दौड़ पड़ता है केवल उसके ज्ञान और आनन्द को स्वयं में अनुभव करने के लिए जो स्वयं भी किसी से उद्विग्न नहीं होता है न केवल वह सबको शान्ति प्रदान करता है बल्कि स्वयं अपनी शान्ति और आनन्द को किसी प्रकार से भी नहीं खोता है। जगत् की कोई भी स्थिति उसे उद्विग्न नहीं कर सकती। 

(इष्टदेव को समर्पित बुद्धि वाले भक्त को ??) बाह्य दुर्व्यवस्था विरोध और प्रतिशोध की भावना से पूर्ण उपद्रवी लोगों के होने पर भी उसके मन में विक्षेप नहीं होता। भौतिक वस्तुओं का यह जगत् सदैव परिवर्तित होता रहता है और सामान्यत सबको विमूढ़ और दुखी कर देने वाला मृत्यु का यह ताण्डव सन्त पुरुष की मनशान्ति को रंचमात्र भी विचलित नहीं कर सकता। 

मानो वह अधिक शक्तिशाली धातु का बना होता है और उसका जीवन सुदृढ़ नीव पर निर्मित होता है। समुद्र की सतह पर अनेक लकड़ियाँ इतस्तत बहती और भटकती रहती हैं।  किन्तु समुद्री चट्टानों की दृढ़ नींव पर निर्मित दीपस्तम्भ समुद्र में उठने वाले ज्वारभाटे का अवलोकन करते हुये निश्चल और सीधा खड़ा रहता है ज्ञानी पुरुष का व्यक्तित्व जीवन के अधिष्ठानस्वरूप सत्य वस्तु की अनुभूति में स्थित/प्रतिष्ठित होने के कारण जीवन की सतही परिस्थितियों से कभी विचलित नहीं होता क्योंकि उसके मन में किसी वस्तु से कोई आसक्ति नहीं होती। 

वह 'ज्ञानिभक्त' कठिन परिस्थितियों की आंतरिक और बाहरी उथल-पुथल के बीच भी, अस्तित्व के शाश्वत और अपरिवर्तनीय (immutable) अधिष्ठान को अनुभव करता है; {he experiences an eternal and immutable ground of being.) और प्रकृति के शुद्ध संगीत के बीच, मनुष्य द्वारा उत्पन्न वर्जित ध्वनियों (निर्मम वचनों) के होते हुए भी,  वह केवल एक अडिग और शुद्ध स्वर ["सोऽहं" ?] ही सुनता है।

वह हर्ष (elation-रोमांच), अमर्ष (indignation : घृणा के साथ क्रोध)  भय और उद्वेग (agitation-व्यग्रता) से मुक्त होता है। इस प्रकार जो भक्त अपने स्वयं के साथ तथा जगत् के साथ भी सदा शान्ति का अनुभव करता है और जो परिस्थितियों पर शासन करता है, और उनका शिकार नहीं बनता है।  जिसने सामान्य मनुष्य के अवगुणों और प्रतिक्रियाओं को पार कर लिया है,  ऐसा भक्त मुझे प्रिय है।

इसी विषय में भगवान् आगे कहते हैं

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।

सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।12.16।।

।।12.16।। जो अपेक्षारहित, शुद्ध, दक्ष, उदासीन, व्यथारहित और सर्वकर्मों का संन्यास करने वाला मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है।।

सामान्य मनुष्य अपने सुख और शान्ति के लिए बाह्य देश, काल, वस्तु,  व्यक्ति और परिस्थितियों पर आश्रित होता है। इनमें से प्रिय की प्राप्ति होने पर वह क्षण भर रोमांचित कर देने वाले हर्षोल्लास का अनुभव करता है। परन्तु एक सच्चा भक्त- जो अनपेक्ष (अपेक्षारहित) है ,  अपने सुख के लिए बाह्य जगत् की अपेक्षा नहीं रखता। 

 शारीरिक शुचिता तथा व्यवहार में भी पवित्रता रखने पर भारत में अत्यधिक बल दिया गया है। बाह्य शुद्धि के बिना आन्तरिक शुद्धि मात्र दिवास्वप्न या व्यर्थ की आशा ही सिद्ध होगी। दक्ष (कुशल) सदा विवेकी बुद्धि सजगता तो सुगठित पुरुष का स्वभाव ही बन जाता है। किसी भी कार्य़ की सफलता की कुंजी उत्साह है। कुशल और समर्थ व्यक्ति वह नहीं है जो अपने व्यवहार और कार्य में त्रुटियां करता रहता है। दक्ष भक्त मन से सजग और बुद्धि से समर्थ होता है। उसमें मन की शक्ति का अपव्यय नहीं होता अत एक बार किसी कार्य का उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर लेने के पश्चात् वह उस कार्य का सिद्धि के लिए सदा तत्पर रहता है। 

 यहाँ साधक को यह उपदेश दिया गया है कि जीवन की इन साधारण परिस्थितियों में वह अपनी मानसिक शक्ति को व्यर्थ ही नहीं खोने दे? बल्कि इन घटनाओं में उदासीन भाव से रहकर शक्ति का संचय करे। छोटे-मोटे दुख और कष्ट अनित्य होने के कारण स्वतः ही निवृत्त हो जाते हैं।  अत उनके लिए चिन्ता और संघर्ष करने की कोई आवश्यकता नहीं है। 

 ज्ञानी भक्त सब कामनाओं से मुक्त होने के कारण निर्भय होता है। जो पुरुष भगवान् का भक्त है उसको इस प्रकार के मान और कर्तृत्व के अभिमान को सर्वथा त्याग कर निरहंकार भाव से जगत् में कर्म करने चाहिए।

यदि गहराई से चिंतन किया जाये तो ज्ञात होगा कि हमारे सभी कर्म जगत् में उपलब्ध वस्तुओं , और स्थितियों से, नियन्त्रित, नियमित, शासित और प्रेरित होते हैं। और इसलिए ज्ञानिभक्त  जगत् में सदा ईश्वर के हाथों में एक करण या निमित्त के रूप में कर्म करता है न कि किसी कर्म के स्वतन्त्र कर्ता के रूप में। उपर्युक्त सद्गुणों से सम्पन्न भक्त मुझे प्रिय है। 

भक्त के कुछ और लक्षण बताते हुए भगवान् कहते हैं

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।

शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्य: स मे प्रिय: ।।12.17।।

।।12.17।। जो न हर्षित होता है और न द्वेष करता है; न शोक करता है और न आकांक्षा; तथा जो शुभ और अशुभ को त्याग देता है, वह भक्तिमान् पुरुष मुझे प्रिय है।।

वह पुरुष परम भक्त कहलाता है जिसने मन और बुद्धि की अनात्म उपाधियों तथा जगत् से अपने तादात्म्य को त्याग कर आनन्दस्वरूप आत्मा में दृढ़ स्थिति प्राप्त कर ली है। (देह में रहते हुए ?)

अत यह स्वाभाविक ही है कि अनात्म जगत् से होने वाले सुखदुखादिक अनुभव उसे किसी भी प्रकार से न आकर्षित कर सकते हैं और न विचलित। इसे ही इस श्लोक में बताया गया है।

ज्ञानी भक्त में इन समस्त विकारों और प्रतिक्रियाओं का यहाँ अभाव बताया गया है। इसका कारण यह है कि वह अपने परम आनन्दस्वरूप में स्थित होने के कारण बाह्य मिथ्या वस्तुओं में सुख और दुख की कल्पना करके उनसे राग या द्वेष नहीं करता। राग और द्वेष के द्वन्द्व के अभाव में हर्ष और शोक का स्वत अभाव हो जाता है। वह ज्ञानी भक्त जगत् को अपनी कल्पना की दृष्टि से न देखकर यथार्थ रूप में देखता है

साधारण मूढ़बुद्धि अपने राग और द्वेष के कारण वस्तुओं की प्राप्ति के लिए शुभ और अशुभ (पुण्य और पाप) दोनों ही प्रकार के कर्म करता है।  परन्तु भक्त के मन में राग और द्वेष नहीं होने के कारण वह शुभ और अशुभ दोनों ही से मुक्त हो जाता है। 

धर्मशास्त्रों के शब्दों का वाच्यार्थ उसके मर्म या प्रयोजन को स्पष्ट नहीं करता है। अत उनके लक्ष्यार्थ पर विचार करना आवश्यक हो जाता है। इस श्लोक में वर्णित गुणें से युक्त भक्त भगवान् को प्रिय होता है।  इस प्रकार अब तक छब्बीस गुणों को बताया गया है।  जो भक्त के स्वाभाविक लक्षण होते हैं।

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।

शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः।।12.18।।

।।12.18।। जो पुरुष शत्रु और मित्र में तथा मान और अपमान में सम है; जो शीत-उष्ण व सुखदु:खादिक द्वन्द्वों में सम है और आसक्ति रहित है।।

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित्।

अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः।।12.19।

।।12.19।। जिसको निन्दा और स्तुति दोनों ही तुल्य है, जो मौनी है, जो किसी अल्प वस्तु से भी सन्तुष्ट है, जो अनिकेत है, वह स्थिर बुद्धि का भक्तिमान् पुरुष मुझे प्रिय है।।

जो शत्रु और मित्र में सम है किसी व्यक्ति को शत्रु या मित्र के रूप में देखना मन का काम या खेल है। य़द्यपि ज्ञानी पुरुष किसी से शत्रुता नहीं रखता परन्तु अन्य लोग उसके प्रति शत्रु या मित्र भाव रख सकते हैं। उन दोनों के साथ एक भक्त समान रूप से व्यवहार करता है। 

जो मान और अपमान में सम है स्वयं को सम्मानित या अपमानित अनुभव करना बुद्धि का धर्म है। बुद्धि अपने ही मापदण्ड निर्धारित करके लोगों के व्यवहार का मूल्यांकन करती रहती है। जिस किसी प्रकार के व्यवहार से मनुष्य सम्मानित अनुभव करता है  वही उसे अपमान प्रतीत होता है जब उसके जीवन मूल्य परिवर्तित हो जाते हैं। जो पुरुष बुद्धि के स्तर पर रहता है? उसे ही मान और अपमान प्रभावित कर सकते हैं आत्मस्वरूप में स्थित भक्त को नहीं

जो शीत और उष्ण में सम रहता है शीत और उष्ण का अनुभव शरीर द्वारा होता है और उसका प्रभाव भी शरीर पर ही पड़ता है। वस्तुत जीवन में शरीर, मन और बुद्धि के स्तर पर होने वाले समस्त अनुभवों का समावेश हो जाता है। इन सबमें परम भक्त पुरुष अक्षुब्ध रहता है  क्योंकि वह आसक्तिरहित होता है। 

अनात्म उपाधियों से आसक्ति होने के कारण ही हम अपने जीवन में होने वाली प्रत्येक अल्प सी घटना से भी अत्यधिक विचलित हो जाते हैं जबकि संगरहित पुरुष उन सबका शासक बन कर रहता है।

एक महान् भक्त जो अपने सर्वोपाधिविनिर्मुक्त सच्चिदानन्द स्वरूप की रसानुभूति में मग्न रहता है उसे संसारी पुरुषों द्वारा की गई निन्दा और स्तुति अत्यन्त तुच्छ और अर्थहीन प्रतीत होती है। वह भलीभाँति जानता है कि जिस पुरुष की समाज में आज स्तुति और प्रशंसा की जा रही है उसी पुरुष को यही समाज कल अपमानित भी करेगा और आज का निन्दित पुरुष कल का स्तुत्य नेता भी बनेगा।  निन्दा और स्तुति दोनों ही संसारी लोगों के मन में क्षणिक तरंग मात्र होती है। 

मौनी ज्ञानी भक्त मौनी होता है। इसका अर्थ है कि वह अतिवादी नहीं होता। मौन का वास्तविक अर्थ है मननशीलता। अत केवल वाचिक मौन वास्तविक मौन नहीं कहा जा सकता। 

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।

श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः।।12.20।।

।।12.20।। जो भक्त श्रद्धावान् तथा मुझे ही परम लक्ष्य समझने वाले हैं और इस यथोक्त धर्ममय अमृत का अर्थात् धर्ममय जीवन का पालन करते हैं, वे मुझे अतिशय प्रिय हैं।।

यथोक्त अमृत धर्म उपर्युक्त पंक्तियों में सनातन धर्म का सार दिया गया है। वस्तुत हिन्दू धर्म के अनुयायियों के जीवन का लक्ष्य आत्मसाक्षात्कार करके उसे जीवन को अपने व्यक्तित्व के सभी स्तरों शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक पर जीने का है। उसके लिये केवल इतना पर्याप्त नहीं है कि वह इस ज्ञान को बौद्धिक स्तर पर समझता है अथवा नियमित रूप से शास्त्रग्रन्थ का पाठ करता है,  या उन्हें अच्छी प्रकार दूसरों को समझा भी सकता है।

 उसे चाहिए कि वह शास्त्रीय ज्ञान को आत्मसात् करके स्वयं पूर्ण पुरुष बन जाये। इसलिए भगवान् कहते हैं कि उसे श्रद्धावान् होना चाहिए यहाँ श्रद्धा शब्द का अर्थ है स्वयं के अनुभव के द्वारा शास्त्र प्रतिपादित आत्मज्ञान को आत्मसात् करने- की क्षमता

ऐसे भक्त मुझे अतिशय प्रिय हैं इस श्लोक के साथ भक्त के लक्षणों का वर्णन करने वाले इस प्रकरण का षष्ठ भाग तथा यह अध्याय भी समाप्त होता है। यद्यपि इसमें और कोई नया लक्षण नहीं बताया गया है तथपि इसमें भगवान् का समस्त साधकों को दिया हुआ पुनराश्वासन है कि उक्त गुणों से सम्पन्न साधकों को भगवान् की परा भक्ति प्राप्त होगी

श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का भक्तियोग नामक बारहवां अध्याय समाप्त होता है।

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बुधवार, 25 मार्च 2026

श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय -11⚜️️🔱विश्वरूप दर्शन योग ⚜️️🔱The true test of the perfection of Self-realization is love for all and malice towards none.⚜️️🔱आत्मसाक्षात्कार की पूर्णता की कसौटी है सबसे प्रेम और किसी से द्वेष नहीं होना ⚜️️🔱हे सव्यसाचिन् मेरे द्वारा ये मारे ही हुए हैं तुम केवल निमित्त बनो। ⚜️️🔱कर्म करने की शक्ति ईश्वर से ही मिली है, और मैं केवल एक साधन हूँ। ⚜️️🔱सत् असत् और इन दोनों से परे अक्षरतत्त्व वह आप (आत्मा ठाकुरदेव) ही हैं।।⚜️️🔱 नियमित जप-ध्यान और योगासन के द्वारा मन को सदा अथक उत्साह और आनंदपूर्ण प्रेरणा से भरे रहो !⚜️️🔱 आत्मसंयम की सम्पूर्ण साधना का 5 अभ्यास ⚜️️🔱 यह संसार ब्रह का विराट शरीर है⚜️️🔱 "द्रष्टुम् इच्छामि ते रुपम्-ऐश्वरम्'(दर्शन पाने के लिए) माँगना अत्यन्त आवश्यक है !⚜️️🔱भगवान ही एकमात्र कर्ता हैं , मैं यंत्र मात्र हूँ ⚜️️🔱 ⚜️️🔱

श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय -11⚜️️🔱विश्वरूप दर्शन योग ⚜️️🔱

एकादश अध्याय का सारामृत 

55 श्लोकों में यह अध्याय समाप्त है। श्रीभगवान के निकट अर्जुन ने विश्वरूप दर्शन के लिए कातर भाव से पार्थना की थी। उन्होंने प्रसन्न होकर अपना ईश्वरीय रूप दिखलाया। किन्तु इन स्थूल चक्षुओं से (चर्म चक्षुओं से -माया की बनी आंख से-माया की बनी चीजेँ  ही देख सकते हैं) भगवान के यथार्थ रूप का दर्शन नहीं किया जा सकता। क्योंकि इन चक्षुओं से केवल सांसारिक पदार्थ ही देखे जा सकते हैं। चिन्मय रूप देखने के लिए ,'चिन्मय-दृष्टि' की आवश्यकता है। इस कारण श्री भगवान ने अर्जुन को दिव्य-चक्षु या भावनेत्र दिए थे , उन दिव्य चक्षुओं के द्वारा अर्जुन ने देखा था , श्री भगवान के दिव्यरूप क दर्शन होने से मनुष्य को परमगति मिलती है। 

वेदों में कहा गए है - 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म'- ब्रह्म एक और अद्वितीय है ! 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'- ये सभी ब्रह्म हैं। [ब्रह्मैव इदं सर्वं ; आत्मैव इदं सर्वं ;] फिर कहा है -तत् सर्वं अभवत्- वही सबकुछ हुए हैं। वही संसार के निमित्त और उपादान कारण दोनों हैं। वह एक हैं। वह अनेक हुए हैं। "एकोऽहं बहु स्यां प्रजायेय" - मैं एक हूँ , अनेक हूँगा -प्रजा सृष्टि करूँगा। वह एक होकर भी अपने को संसार के रूप में रूपायित करते हैं। "स इदं सर्वं असृजत , तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्"  -तैत्तिरीयोपनिषद् (२.६.१) संसार की सृष्टिकरके वे उसमें अनुप्रविष्ट हो गए। उन्होंने अपने को ही दृष्टिगोचर संसार रूप में रूपायित कर लिया। 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म' 'नेह ना नास्ति किंचन'-ब्रह्म एक और अद्वितीय हैं। इस संसार में नाना पदार्थ नहीं हैं। 

वह भूमा अर्थात सर्वव्यापक हैं। एक मात्र ब्रह्म ही हैं , वही एकमात्र सत्यवस्तु हैं। इन वेदान्त वाक्यों में विरोध प्रतीत होने पर भी उनका सामंजस्य दिखाने के लिए ही श्रीभगवान ने उस प्रकार विश्वरूप प्रकट किया। यह संसार ब्रह का विराट शरीर है

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।

स भूमिँ सर्वतः स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ ऋग्वेद  (10.90.1) 

"उस विराट पुरुष के हज़ारों (अनंत ) मस्तक, हज़ारों ऑंखें (अगणित) और हज़ारों (अनंत ) चरण हैं।  वे पूरी ब्रह्माण्ड  को चारों ओर से व्याप्त करके भी दस अंगुल शेष रहते हैं"।

इस प्रकार श्रीभगवान का विराट-रूप दर्शन करने से -जीवनमुक्त आत्मान्वेषी भक्त की ऐसी अवस्था होती है। 

"भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। 

क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥" 

(मुण्डकोपनिषद् 2.2.8) 

पर (श्रेष्ठ) ब्रह्मा भी जिनसे अवर (निकृष्ट) हैं , उन परमात्मा का दर्शन करने से द्रष्टा की हृदय-ग्रन्थि (अज्ञान की गाँठ - अविद्या M/F अहंकार की गाँठ ) खुल जाती है द्वैतजन्य समस्त संदेह दूर हो जाते हैं अर्थात पूर्णज्ञान लाभ होता है और '' प्रारब्ध के सिवाय " सारे कर्मसंस्कार क्षयप्राप्त हो जाते हैं। 

श्री भगवान ने अर्जुन को जिस विश्वरूप का दर्शन कराया था वह वास्तव में अद्भुत , अनिर्वचनीय , और अदृष्टपूर्व है। उस विश्वमूर्ति को महाकाल का प्रकट रूप समझकर अर्जुन ने भय से श्रीकृष्ण की प्रसन्नता माँगी थी। तब श्री भगवान ने शान्त मूर्ति धारण कर अर्जुन को आश्वासन देते हुए कहा था - " जिस विश्वरूप का तुमने दर्शन किया वह देवताओं के लिए  दुर्लभ है। केवल एकनिष्ठ भक्ति के बिना मेरा यह विश्वरूप कोई नहीं देख सकता। तुम मेरे भक्त हो , इसी कारण प्रसन्न होकर तुम्हें वैसा दुर्लभ विश्वरूप दिखाया है। मैं ही तुम्हारी परमगति हूँ। अतः मेरे ऊपर पूर्णतया निर्भर रहकर मेरा अभीष्ट कर्म  करते चलो। 

    समस्त कर्मों का कर्ता मैं ही हूँ और सारे कर्म मेरे ही हैं , ऐसा समझकर तुम अनासक्त चित्त से युद्ध -'Be and Make'आदि समस्त कर्म करते रहो" - यही श्रीकृष्ण का निर्देश है। 

श्रीरामकृष्ण देव ने कहा है - " उन्हें स्थूल चक्षुओं से देखा नहीं जा सकता। साधन करते करते (ईश्वर कृपा से ) एक प्रेम का शरीर बनता है , उसके प्रेम की आंख और प्रेम के ही कान होते हैं। उन आँखों से मनुष्य उन्हें देखता है और उन कानों से उनकी वाणी सुनता है। बहुत अधिक प्रेम होने पर चारों ओर ईश्वरमय देखा जाता है। दिनरात उनका चिंतन करने से चारों ओर वही दिख पड़ते हैं। .....अर्जुन को विश्वरूप दर्शन करने के लिए श्रीठाकुर ने दिव्यचक्षु दिए थे।   

और एक विषय विशेष ध्यान देने योग्य है। भगवान से व्याकुल प्रार्थना करनी होगी , तभी वह दर्शन देंगे। (दर्शन पाने के लिए) माँगना अत्यन्त आवश्यक है ! (भगवान के अविनाशी सत्य स्वरुप को देखने के लिए साहस के साथ माँगना होता है - द्रष्टा को मरना होता है ?)  "द्रष्टुम् इच्छामि ते रुपम्-ऐश्वरम्' पाने के लिए माँगना आवश्यक है। यहाँ तक कि अर्जुन श्रीकृष्ण के प्रिय सखा होने पर भी उनके लिए भी इस नियम का व्यतिक्रम नहीं हुआ था। जब तक अर्जुन ने पुरुषोत्तम के पास -द्रष्टुम् इच्छामि ते रुपम्-ऐश्वरम्' ऐसी प्रार्थना नहीं की थी , तब तक उन्होंने अपना अव्यय सत्यस्वरूप प्रकट नहीं किया था। 

भगवान से माँगना होता है , " दर्शन दो , दर्शन दो " इस प्रकार पुकार पुकार कर रोना होता है -तभी उनका दर्शन सम्भव है।  

इस अध्याय का विश्वरूप-दर्शनयोग यह नाम सार्थक है। यहाँ प्रयुक्त विश्वरूप शब्द का वास्तविक अर्थ विराट् रूप  है। आत्मा एक व्यष्टि स्थूल देह के साथ तादात्म्य को प्राप्त होकर जाग्रत् अवस्था की घटनाओं का अनुभव करता है। वही आत्मा समष्टि स्थूल देह अर्थात् ब्रह्माण्ड के साथ तादात्म्य प्राप्त कर विराट् कहलाता है।  इस अवस्था में स्थित आत्मा को वेदान्त में विश्व कहा जाता है। यद्यपि यहाँ भगवान् ने अपना विराट् रूप दिखाया है, फिरभी इस अध्याय का नाम विश्वरूप-दर्शनयोग है। इससे विश्व और विराट् (cosmic whole-ब्रह्माण्ड ) के पारमार्थिक एकत्व का बोध होता है। The Realization of the Ultimate Unity of the World and the Cosmic Whole ! 

(- अर्थात माँ के शब्दों में-वेदान्त  जगत में कोई पराया नहीं है , सभी अपने हैं ! इसलिए जीवन में शांति चाहते हो तो किसी का दोष मत देखो। दोष देखो अपना , सबको अपना बनाना सीखो ! परन्तु हाथी नारायण और महावत नारायण की घटना भी याद रखो।  (The Realization of the Ultimate Unity of the World and the Cosmic Whole)

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अर्जुन उवाच

मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्।

यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम।।11.1।।

।।11.1।। 10 वें अध्याय के 42 वें और अंतिम श्लोक में श्री भगवान ने कहा था - विष्टभ्य–अहम्-इदम्- कृत्स्नम्' अंशेन स्थित: जगत्-अनन्त ब्रह्माण्डों की समस्त सृष्टि उनके एक अंश में स्थित है। शेष तीन चौथाई आध्यात्मिक अभिव्यक्तियाँ हैं। इस वाक्य से विश्वात्मक परमेश्वर के रूप की बात कही गयी है। उसे सुनकर भगवान का ईश्वरीय विश्वरूप रूप दर्शन करने की इच्छा से - अर्जुन ने कहा -- मुझ पर अनुग्रह करने के लिए जो परम गोपनीय, अध्यात्मविषयक वचन (उपदेश) आपके द्वारा कहा गया, उससे मेरा मोह दूर हो गया है।...... अब मैं समझ गया हूँ कि भगवान ही एकमात्र कर्ता हैं , मैं यंत्र मात्र हूँ ! 

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया।

त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्।।11.2।।

।।11.2।। हे कमलनयन ! मैंने भूतों की उत्पत्ति और प्रलय आपसे विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपका अव्यय माहात्म्य (प्रभाव) भी सुना है।। 

एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर।

द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम।।11.3।।

।।11.3।। हे परमेश्वर ! आप अपने को जैसा कहते हो, यह ठीक ऐसा ही है। (परन्तु) हे पुरुषोत्तम ! मैं आपके ईश्वरीय रूप को प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।।

मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो।

योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम्।।11.4।।

।।11.4।। हे प्रभो ! यदि आप मानते हैं कि मेरे द्वारा वह आपका रूप देखा जाना संभव है, तो हे योगेश्वर ! आप अपने अव्यय रूप का दर्शन कराइये।।

श्री भगवानुवाच

पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः।

नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च।।11.5।।

।।11.5।। श्रीभगवान् ने कहा -- हे पार्थ ! मेरे सैकड़ों तथा सहस्रों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तथा आकृति वाले दिव्य रूपों को देखो।।

पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा |

बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत || 6||

।।11.6।। हे भारत ! (मुझमें) आदित्यों, वसुओं, रुद्रों तथा अश्विनीकुमारों और मरुद्गणों को देखो, तथा और भी अनेक इसके पूर्व कभी न देखे हुए आश्चर्यों को देखो।।

यहाँ नवीन नाम केवल अश्विनी कुमारों का है। ये सूर्य के दो पुत्र माने गये हैं।  जिनके मुख अश्व के हैं तथा ये अश्विनीकुमार के नाम से प्रसिद्ध दो बन्धु देवताओं के वैद्य कहे जाते हैं। किसी स्थान पर वे उषकाल और सन्ध्याकाल के प्रतीक माने गये हैं तो किसी अन्य स्थल पर इन्हें इन दो समयों के तारों का प्रतीक कहा गया है। 

विराट् रूप में द्रष्टव्य रूपों का सारांश में निर्देश करके भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने शिष्य अर्जुन की जिज्ञासा को और अधिक बढ़ा दिया। इसलिए वह जानना चाहता है कि इन रूपों को वह कहां देखे इस पर कहते हैं

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्।

मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि।।11.7।।

।।11.7।। हे गुडाकेश ! आज (अब) इस मेरे शरीर में एक स्थान पर स्थित हुए चराचर सहित सम्पूर्ण जगत् को देखो तथा और भी जो कुछ तुम देखना चाहते हो, उसे भी देखो।।

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा।

दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्।।11.8।

।।11.8।। परन्तु तुम अपने इन्हीं (प्राकृत) नेत्रों के द्वारा मुझे देखने में समर्थ नहीं हो; (इसलिए) मैं तुम्हें दिव्यचक्षु देता हूँ, जिससे तुम मेरे ईश्वरीय 'योग' को देखो।।

"ईश्वरयोग " रूपी अघटन -घटन महान योग शक्ति सम्पन्न होने के कारण वे 'विश्वरूपधर' कथित हुए। 

सञ्जय उवाच

एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः।

दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्।।11.9।।

।।11.9।। संजय ने कहा -- हे राजन् ! महायोगेश्वर हरि ने इस प्रकार कहकर फिर अर्जुन के लिए परम ऐश्वर्ययुक्त रूप को दर्शाया।।  

अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्।

अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्।।11.10।।

।।11.10।। उस अनेक मुख और नेत्रों से युक्त तथा अनेक अद्भुत दर्शनों वाले एवं बहुत से दिव्य भूषणों से युक्त और बहुत से दिव्य शस्त्रों को हाथों में उठाये हुये।।

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्।

सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्।।11.11।।

।।11.11।। दिव्य माला और वस्त्रों को धारण किये हुये और दिव्य गन्ध का लेपन किये हुये एवं समस्त प्रकार के आश्चर्यों से युक्त अनन्त, विश्वतोमुख (विराट् स्वरूप) परम देव (को अर्जुन ने देखा)।।

आचार्य शंकर कहते हैं सभी प्राणियों की आत्मा होने के कारण श्रीभगवान के सब ओर मुख अर्थात दृष्टि है।  

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।

यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः।।11.12।।

।।11.12।। आकाश में सहस्र सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्न जो प्रकाश होगा, वह उस (विश्वरूप) परमात्मा के प्रकाश के सदृश होगा।।

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा।

अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा।।11.13।।

।।11.13।। पाण्डुपुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त हुए सम्पूर्ण जगत् को देवों के देव श्रीकृष्ण के शरीर में एक स्थान पर स्थित देखा।।

आचार्य शंकर ने लिखा - " उस समय पाण्डुपुत्र अर्जुनने देव, पितृ और मनुष्यादि भेद से अनेक प्रकार विभक्त हुए समस्त जगत को  उस विश्वरूप देवाधिदेव हरि के शरीर में ही एकत्र स्थित देखा

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः।

प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत।।11.14।।

।।11.14।। उसके उपरान्त वह आश्चर्यचकित हुआ हर्षित रोमों वाला (जिसे रोमांच का अनुभव हो रहा हो) धनंजय अर्जुन विश्वरूप देव को (श्रद्धा भक्ति सहित) शिर से प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोला।।

अर्जुन उवाच

पश्यामि देवांस्तव देव देहे

सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान्।

ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ

मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्।।11.15।।

।।11.15।। अर्जुन ने कहा -- हे देव! मैं आपके शरीर में समस्त देवों को तथा अनेक भूतविशेषों के समुदायों को और कमलासन पर स्थित सृष्टि के स्वामी ब्रह्माजी को, ऋषियों को और दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ।।

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं

पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्।

नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं

पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप।।11.16।।

।।11.16।। हे विश्वेश्वर! मैं आपकी अनेक बाहु, उदर, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनन्त रूपों वाला देखता हूँ। हे विश्वरूप! मैं आपके न अन्त को देखता हूँ और न मध्य को और न आदि को।।

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च

तेजोराशिं सर्वतोदीप्तिमन्तम्।

पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता

द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्।।11.17।।

।।11.17।। मैं आपका मुकुटयुक्त, गदायुक्त और चक्रधारण किये हुये तथा सब ओर से प्रकाशमान् तेज का पुंज, दीप्त अग्नि और सूर्य के समान ज्योतिर्मय, देखने में अति कठिन और अप्रमेयस्वरूप सब ओर से देखता हूँ।।

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं

त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।

त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता

सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे।।11.18।।

।।11.18।। आप ही जानने योग्य (वेदितव्यम्) परम अक्षर हैं; आप ही इस विश्व के परम आश्रय (निधान) हैं ! आप ही शाश्वत धर्म के रक्षक हैं और आप ही सनातन पुरुष हैं,ऐसा मेरा मत है।।

आचार्य शंकर कहते हैं - 

 आपकी योगशक्तिको देखकर ही मैं अनुमान करता हूँ - आप मुमुक्षु पुरुषों द्वारा जानने योग्य परमअक्षर अर्थात् जिसका कभी नाश न हो ऐसे परमब्रह्म परमात्मा हैं। आप ही इस समस्त जगत्के परम उत्तम निधान हैं -- जिसमें कोई वस्तु रक्खी जाय उसे निधान कहते हैं।  सो आप इस संसारके परम आश्रय हैं। इसके सिवा आप अविनाशी हैं अर्थात् आपका कभी नाश नहीं होता।  इसलिये आप नाशरहित हैं और सनातन धर्म के रक्षक हैं अर्थात् जो सदासे है ऐसे नित्यधर्म के आप रक्षक हैं।  और आप ही सनातन परमपुरुष हैं -- यह मेरा मत है

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य

मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्।

पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम्

स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।।11.19।।

।।11.19।। मैं आपको आदि, अन्त और मध्य से रहित तथा अनंत सार्मथ्य से युक्त और अनंत बाहुओं वाला तथा चन्द्रसूर्यरूपी नेत्रों वाला और दीप्त अग्निरूपी मुख वाला तथा अपने तेज से इस विश्व को तपाते हुए देखता हूँ।।

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि

व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः।

दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं

लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्।।11.20।।

।।11.20।। हे महात्मन् ! स्वर्ग और पृथ्वी के मध्य का यह आकाश तथा समस्त दिशाएं अकेले आप से ही व्याप्त हैं; आपके इस अद्भुत और उग्र रूप को देखकर तीनों लोक अतिव्यथा (भय) को प्राप्त हो रहे हैं।।

अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति

केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति।

स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः

स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः।।11.21।।

।।11.21।। ये समस्त देवताओं के समूह आप में ही प्रवेश कर रहे हैं और कई एक भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आप की स्तुति करते हैं; महर्षि और सिद्धों के समुदाय 'कल्याण होवे' (स्वस्तिवाचन करते हुए) ऐसा कहकर, उत्तम (या सम्पूर्ण) स्रोतों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं।।

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या

विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च |

गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा

वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे || 22||

।।11.22।। रुद्रगण, आदित्य, वसु और साध्यगण, विश्वेदेव तथा दो अश्विनीकुमार, मरुद्गण और उष्मपा, गन्धर्व, यक्ष, असुर और सिद्धगणों के समुदाय- ये सब ही विस्मित होते हुए आपको देखते हैं।।

रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं

महाबाहो बहुबाहूरुपादम्।

बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं

दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाऽहम्।।11.23।।

।।11.23।। हे महाबाहो! आपके बहुत मुख तथा नेत्र वाले, बहुत बाहु, उरु (जंघा) तथा पैरों वाले, बहुत-ंंसी उदरों वाले तथा बहुतसी विकराल दाढ़ों वाले महान् रूप को देखकर सब लोग व्यथित हो रहे हैं और उसी प्रकार मैं भी (व्याकुल हो रहा हूँ)।।

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं

व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्।

दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा

धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो।।11.24।।

।।11.24।। हे विष्णो! आकाश के साथ स्पर्श किये हुए देदीप्यमान अनेक रूपों से युक्त तथा विस्तरित मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत हुआ मैं धैर्य और शान्ति को नहीं प्राप्त हो रहा हूँ।।

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि

दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि।

दिशो न जाने न लभे च शर्म

प्रसीद देवेश जगन्निवास।।11.25।।

।।11.25।। आपके विकराल दाढ़ों वाले और प्रलयाग्नि के समान प्रज्वलित मुखों को देखकर, मैं न दिशाओं को जान पा रहा हूँ और न शान्ति को प्राप्त हो रहा हूँ; इसलिए हे देवेश!  हे जगन्निवास! आप प्रसन्न हो जाइए।।

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः

सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः।

भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथाऽसौ

सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः।।11.26।।

।।11.26।। और ये समस्त धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदाय सहित आप में प्रवेश करते हैं। भीष्म, द्रोण तथा कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धाओं के सहित.।।

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति

दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।

केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु

संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः।।11.27।।

।।11.27।। तीव्र वेग से आपके विकराल दाढ़ों वाले भयानक मुखों में प्रवेश करते हैं और कई एक चूर्णित शिरों सहित आपके दांतों के बीच में फँसे हुए दिख रहे हैं।।

श्रीकृष्ण महाकाल स्वरुप हैं और समस्त विश्वब्रह्माण्ड को वह अपने में धारण किये हुए हैं। उन्हीं विराट पुरुष के भीतर से यह जगत-प्रपंच प्रकाशित हो रही है , वही सबकुछ धारण किये हुए हैं और अंत में सबको वही अपने में संहार कर लेते हैं। अर्थात उनके सिवाय संसार में और कुछ नहीं है। - अर्थात काली और कृष्ण (ठाकुरदेव-आत्मा-परमात्मा -ईश्वर -भगवान) एक ही हैं ! 

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः

समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति।

तथा तवामी नरलोकवीरा

विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति।।11.28।।

।।11.28।। जैसे नदियों के बहुत से जलप्रवाह समुद्र की ओर वेग से बहते हैं, वैसे ही मनुष्यलोक के ये वीर योद्धागण आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश करते हैं।।

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा

विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।

तथैव नाशाय विशन्ति लोका

स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः।।11.29।।

।।11.29।। जैसे पतंगे अपने नाश के लिए प्रज्वलित अग्नि में अतिवेग से प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये लोग भी अपने नाश के लिए आपके मुखों में अतिवेग से प्रवेश करते हैं।।  

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता

ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः।

तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं

भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो।।11.30।।

।।11.30।। हे विष्णो! आप प्रज्वलित मुखों के द्वारा इन समस्त लोकों का ग्रसन करते हुए आस्वाद ले रहे हैं, आपका उग्र प्रकाश सम्पूर्ण जगत् को तेज के द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है।।

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो

नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद।

विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं

न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्।।11.31।।

।।11.31।। (कृपया) मेरे प्रति कहिये, कि उग्ररूप वाले आप कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ! आपको नमस्कार है, आप प्रसन्न होइये। आदि स्वरूप आपको मैं (तत्त्व से) जानना चाहता हूँ, क्योंकि आपकी प्रवृत्ति (अर्थात् प्रयोजन को) को मैं नहीं समझ पा रहा हूँ।।

श्री भगवानुवाच

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो

लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।

ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे

येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः।।11.32।।

।।11.32।। श्रीभगवान् ने कहा -- मैं लोकों का नाश करने वाला प्रवृद्ध काल हूँ। इस समय, मैं इन लोकों का संहार करने में प्रवृत्त हूँजो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा हैं, वे सब तुम्हारे बिना भी नहीं रहेंगे।।

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व

जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।

मयैवैते निहताः पूर्वमेव

निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।।11.33।।

।।11.33।। इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो।।

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च

कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान्।

मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा

युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्।।11.34।।

।।11.34।। द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण तथा और भी बहुत से मेरे द्वारा मारे गये वीर योद्धाओं को तुम मारो; भय मत करो; युद्ध करो; तुम युद्ध में शत्रुओं को जीतोगे।।

यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को सीधे और स्पष्ट शब्दों में आश्वस्त करते हैं कि उसको उठ खड़े होकर काल के आश्रय से सफलता और वैभव को प्राप्त करना चाहिए। अधर्मियों की शक्ति और सार्मथ्य कितनी ही अधिक क्यों न हो, लोक क्षयकारी महाकाल की शक्ति ने पहले ही उन्हें मार दिया है। अर्जुन को केवल आगे बढ़कर एक वीर पुरुष की भूमिका निभाते हुए विजय के मुकुट को प्राप्त कर लेना है। हे सव्यसाचिन् मेरे द्वारा ये मारे ही हुए हैं तुम केवल निमित्त बनो।

वस्तुत प्रत्येक विचारशील पुरुष को इस तथ्य का स्पष्ट ज्ञान होता है कि जीवन में वह ईश्वर के हाथों में केवल एक निमित्त ही है। परन्तु सामान्यत हम इस तथ्य को स्वीकार करने को तैयार नहीं होते  क्योंकि हमारा गर्वभरा अभिमान इतनी सरलता से निवृत्त नहीं होता कि हमारा शुद्ध दिव्य स्वरूप अपनी सर्वशक्ति से हमारे द्वारा कार्य कर सके। 

अबतक जीवन के सभी कार्य क्षेत्रों में प्राप्त की गयी उपलब्धियों पर यदि हम विचार करें तो हमें ज्ञात होगा कि प्रत्येक उपलब्धि में प्रकृति के योगदान की तुलना में हमारा योगदान अत्यन्त क्षुद्र और नगण्य है। फिर भी हमारा अभिमान यह होता है कि हमने उस फल को उत्पन्न किया है। रेडियो, वायुयान ,इंजिन, जीवन संरक्षक औषधयां, संक्षेप में यह सम्पूर्ण नवीन जगत् और प्रगति में इसकी उपलब्धियां ये सब ईश्वर की गोद में बैठे बच्चों के खेल के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं।

 ईश्वर ने ही हमारे लिए विद्युत्, लोहा, आकाश वायु इत्यादि उपलब्ध कराये और हमें उसका उपयोग करने के लिए स्वीकृति और स्वतन्त्रता प्रदान की। इन मूलभूत वस्तुओं के बिना कोई भी उपलब्धि संभव नहीं हो सकती और उपलब्धि का अर्थ है, ईश्वर प्रदत्त वस्तुओं का बुद्धिमत्तापूर्वक समायोजन करना। 

शरणागति तथा ईश्वर का अखण्ड स्मरण करते हुए जगत् की सेवा -Be and Make  करने के सिद्धांतों को ऐसी व्यर्थ की कल्पनाएं नहीं समझना चाहिए,  जो जगत् की भौतिक सत्यता से पलायन करने के लिए विधान की गयी हों। जगत् में कुशलतापूर्वक कार्य करके सफलता पाने के लिए मनुष्य़ को अपनी योग्यता (विवेक-आनन्द) और स्वभाव को ऊँचा उठाना आवश्यक है। 

ईश्वर का अखण्ड  स्मरण (नियमित जपध्यान और योगासन) वह साधन है जिसके द्वारा हम अपने मन को सदा अथक उत्साह और आनन्दपूर्ण प्रेरणा के भाव में रख सकते हैं। अहंकारी के लिए यह जगत् एक बोझ या समस्या बना होता है। जिस सीमा तक अहंकार स्वयं को किसी महान् और श्रेष्ठ आदर्श के प्रति समर्पित कर देता है  उसी सीमा में यह जगत् और उसकी उपलब्धियां प्राप्त करना सरल और निश्चित सफलता का खेल बन जाता है। इसके पूर्व भी गीता में अनेक स्थलों पर स्पष्टत सूचित किया गया है कि अहंकार के समर्पण से हममें स्थित महानतर क्षमताओं को व्यक्त किया जा सकता है। उसी विचार को यहाँ दोहराया गया है। 

अर्जुन को कौरव पक्ष के कुछ प्रधान और श्रेष्ठ पुरुषों से विशेष भय था। यहाँ भगवान् उनका नामोल्लेख करके बताते हैं कि ये वीर पुरुष भी सर्वभक्षक काल के द्वारा मारे जा चुके हैं। द्रोणाचार्य अर्जुन के गुरु थे जिन्होंने उसे धनुर्विद्या सिखायी थी। उसके पास कुछ विशेष शस्त्रास्त्र थे और अर्जुन उनका विशेष रूप से आदर और सम्मान करता था।

भीष्मपितामह को स्वेच्छा से मरण प्राप्ति का वरदान मिला हुआ था तथा उनके पास भी अत्यन्त शक्तिशाली दिव्यास्त्र थे। एक बार उन्होंने वीर परशुराम तक को धूल चटा दी थी। जयद्रथ की अजेयता का कारण उसके पिता द्वारा किया जा रहा तप था। उन्होंने यह दृढ़ निश्चय किया था कि जो कोई भी व्यक्ति मेरे पुत्र जयद्रथ का शिर पृथ्वी पर गिरायेगा उस व्यक्ति का शिर भी नीचे गिर पड़ेगा। 

कर्ण से भय का कारण यह था कि उसे भी इन्द्र से दिव्यास्त्र प्राप्त हुआ था। उपर्युक्त कारणों से स्पष्ट होता है कि भगवान् ने इन चारों पुरुषों का ही विशेषत उल्लेख क्यों किया है। ये महारथी लोग भी काल का ग्रास बन चुके थे अत अर्जुन को चाहिए कि वह राजसिंहासन की ओर अग्रसर हो और सम्पूर्ण वैभव का स्वामी बन जाये। 

यह स्वाभाविक है कि जब मनुष्य की किसी तीव्र इच्छा को पूर्ण कर दिया जाता है तो वह अकस्मात् अपने दयालु संरक्षक की स्तुति और प्रशंसा करने लगता है

सञ्जय उवाच

एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य

कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी।

नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं

सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य।।11.35।।

।।11.35।। संजय ने कहा -- केशव भगवान् के इस वचन को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़े हुए, कांपता हुआ नमस्कार करके पुन: भयभीत हुआ श्रीकृष्ण के प्रति गद्गद् वाणी से बोला।।

अर्जुन उवाच

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या

जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च।

रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति

सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः।।11.36।।

।।11.36।। अर्जुन ने कहा -- यह योग्य ही है कि आपके कीर्तन से जगत् अति हर्षित होता है और अनुराग को भी प्राप्त होता है। भयभीत राक्षस लोग समस्त दिशाओं में भागते हैं और समस्त सिद्धगणों के समुदाय आपको नमस्कार करते हैं।।

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्

गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे।

अनन्त देवेश जगन्निवास

त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्।।11.37।।

।।11.37।। हे महात्मन् ! ब्रह्मा के भी आदि कर्ता और सबसे श्रेष्ठ आपके लिए वे कैसे नमस्कार नहीं करें? (क्योंकि) हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! जो सत् असत् और इन दोनों से परे अक्षरतत्त्व है, वह आप ही हैं।।

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण

स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।

वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम

त्वया ततं विश्वमनन्तरूप।।11.38।।

।।11.38।। आप आदिदेव और पुराण (सनातन) पुरुष हैं। आप इस जगत् के परम आश्रय, ज्ञाता, ज्ञेय, (जानने योग्य) और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप आपसे ही यह विश्व व्याप्त है।।

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः

प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।

नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः

पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते।।11.39।।

।।11.39।। आप वायु, यम, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजापति (ब्रह्मा) और प्रपितामह (ब्रह्मा के भी कारण) हैं; आपके लिए सहस्र बार नमस्कार, नमस्कार है, पुन: आपको बारम्बार नमस्कार, नमस्कार है।।

उस अनन्त (आत्मा)  को अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण (इष्टदेव) के रूप में देखता है।वेदान्त का यह सिद्धांत है कि एक ही परमात्मा विविध उपाधियों के द्वारा व्यक्त होकर इन देवताओं के रूप में प्राप्त होता है। वर्तमान काल में भी भक्तगण अपने इष्ट देवता के रूप में परमेश्वर का आह्वान कर अपने इष्ट को ही देवाधिदेव कहते हैं। इस देवेश को ही अर्जुन प्रणाम करता है।

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते

नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।

अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं

सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः।।11.40।।

।।11.40।। हे अनन्तसार्मथ्य वाले भगवन्! आपके लिए अग्रत: और पृष्ठत: नमस्कार है, हे सर्वात्मन्! आपको सब ओर से नमस्कार है। आप अमित विक्रमशाली हैं और आप सबको व्याप्त किये हुए हैं, इससे आप सर्वरूप हैं।।

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं

हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।

अजानता महिमानं तवेदं

मया प्रमादात्प्रणयेन वापि।।11.41।।

।।11.41।। हे भगवन्! आपको सखा मानकर आपकी इस महिमा को न जानते हुए मेरे द्वारा प्रमाद से अथवा प्रेम से भी "हे कृष्ण हे! यादव हे सखे!" इस प्रकार जो कुछ बलात् कहा गया है।।

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं

हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।

अजानता महिमानं तवेदं

मया प्रमादात्प्रणयेन वापि।।11.41।।

।।11.41।। हे भगवन्! आपको सखा मानकर आपकी इस महिमा को न जानते हुए मेरे द्वारा प्रमाद से अथवा प्रेम से भी "हे कृष्ण हे! यादव हे सखे!" इस प्रकार जो कुछ बलात् कहा गया है।।

यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि

विहारशय्यासनभोजनेषु।

एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं

तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्।।11.42।।

।।11.42।। और, हे अच्युत! जो आप मेरे द्वारा हँसी के लिये बिहार, शय्या, आसन और भोजन के समय अकेले में अथवा अन्यों के समक्ष भी अपमानित किये गये हैं, उन सब के लिए अप्रमेय स्वरूप आप से मैं क्षमायाचना करता हूँ।।

पितासि लोकस्य चराचरस्य

त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्।

न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो

लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव।।11.43।।

।।11.43।। आप इस चराचर जगत् के पिता, पूजनीय और सर्वश्रेष्ठ गुरु हैं। हे अप्रितम प्रभाव वाले भगवन्! तीनों लोकों में आपके समान भी कोई नहीं हैं, तो फिर आपसे अधिक श्रेष्ठ कैसे होगा?।।

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं

प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्।

पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः

प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्।।11.44।।

।।11.44।। इसलिये हे भगवन्! मैं शरीर के द्वारा साष्टांग प्रणिपात करके स्तुति के योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिये प्रार्थना करता हूँ। हे देव! जैसे पिता पुत्र के, मित्र अपने मित्र के और प्रिय अपनी प्रिया के(अपराध को क्षमा करता है), वैसे ही आप भी मेरे अपराधों को क्षमा कीजिये।।

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा

भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।

तदेव मे दर्शय देव रूपं

प्रसीद देवेश जगन्निवास।।11.45।।

।।11.45।। मैं आपके इस अदृष्टपूर्व रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भय से अतिव्याकुल भी हो रहा हैं। इसलिए हे देव! आप उस पूर्वकाल को ही मुझे दिखाइये। हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न होइये।।

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त

मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव।

तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन

सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते।।11.46।।

।।11.46।। मैं आपको उसी प्रकार मुकुटधारी, गदा और चक्र हाथ में लिए हुए देखना चाहता हूँ। हे विश्वमूर्ते! हे सहस्रबाहो! आप उस चतुर्भुजरूप के ही बन जाइए।।

श्री भगवानुवाच

मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं

रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्।

तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं

यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्।।11.47।।

।।11.47।। हे अर्जुन! तुम पर प्रसन्न होकर मैंने अपनी योगशक्ति (आत्मयोगात्) के प्रभाव से यह अपना परम तेजोमय, सबका आदि और अनन्त विश्वरूप तुझे दर्शाया है, जिसे तुम्हारे पूर्व किसी ने नहीं देखा है।।

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै

र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः।

एवंरूपः शक्य अहं नृलोके

द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर।।11.48।।

।।11.48।। हे कुरुप्रवीर! तुम्हारे अतिरिक्त इस मनुष्य लोक में किसी अन्य के द्वारा मैं इस रूप में, न वेदाध्ययन और न यज्ञ, न दान और न (धार्मिक) क्रियायों के द्वारा और न उग्र तपों के द्वारा ही देखा जा सकता हूँ।।

मा ते व्यथा मा च विमूढभावो

दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्।

व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं

तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य।।11.49।।

।।11.49।। इस प्रकार मेरे इस घोर रूप को देखकर तुम व्यथा और मूढ़भाव को मत प्राप्त हो। निर्भय और प्रसन्नचित्त होकर तुम पुन: मेरे उसी (पूर्व के) रूप को देखो।।

सञ्जय उवाच

इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा

स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः।

आश्वासयामास च भीतमेनं

भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा।।11.50।।

।।11.50।। संजय ने कहा -- भगवान् वासुदेव ने अर्जुन से इस प्रकार कहकर, पुन: अपने (पूर्व) रूप को दर्शाया, और फिर, सौम्यरूप महात्मा श्रीकृष्ण ने इस भयभीत अर्जुन को आश्वस्त किया।।

अर्जुन उवाच

दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तवसौम्यं जनार्दन।

इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः।।11.51।।

।।11.51।। अर्जुन ने कहा -- हे जनार्दन! आपके इस सौम्य मनुष्य रूप को देखकर अब मैं शांतचित्त हुआ अपने स्वभाव को प्राप्त हो गया हूँ।।

श्री भगवानुवाच

सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम।

देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः।।11.52।।

।।11.52।। श्रीभगवान् ने कहा -- मेरा यह रूप देखने को मिलना अति दुर्लभ है, जिसको कि तुमने देखा है। देवतागण भी सदा इस रूप के दर्शन के इच्छुक रहते हैं।।

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।

शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा।।11.53।।

।।11.53।। न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से ही मैं इस प्रकार देखा जा सकता हूँ, जैसा कि तुमने मुझे देखा है।।

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।

ज्ञातुं दृष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप।।11.54।।

।।11.54।। परन्तु हे परन्तप अर्जुन! अनन्य भक्ति के द्वारा मैं तत्त्वत: 'जानने', 'देखने' और 'प्रवेश' करने के लिए (एकी भाव से प्राप्त होने के लिए) भी, शक्य हूँ!।।

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः।

निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव।।11.55।।

।।11.55।। हे पाण्डव! जो पुरुष मेरे लिए ही कर्म करने वाला है, और मुझे ही परम लक्ष्य मानता है, जो मेरा भक्त है तथा संगरहित है, जो प्राणीमात्र के प्रति निर्वैर है, वह मुझे प्राप्त होता है।।

 अर्जुन ने यह सुना कि अनन्यभक्ति के द्वारा कोई भी भक्त भगवान् के समष्टि वैभव को न केवल पहचान ही सकता है वरन् स्वयं में ही उसका साक्षात् अनुभव भी कर सकता है। 

किसी जीव को ईश्वरत्व प्राप्त करने का श्रीकृष्ण द्वारा उपदिष्ट योजना के पांच अंग हैं। उन पांच अंगों या आवश्यक गुणों को इस श्लोक में बताया गया है। वे गुण हैं (1) जो ईश्वरार्पण बुद्धि से कर्म करता है? (2) जिसका परम लक्ष्य ईश्वर ही है? (3) जो ईश्वर का भक्त है? (4) जो आसक्तियों से रहित है? तथा (5) जो प्राणी मात्र के प्रति वैरभाव से रहित है।इन पांच आवश्यक गुणों में आत्मसंयम की सम्पूर्ण साधना का 5 अभ्यास दिया गया है। 

ईश्वर के अखण्ड स्मरण से ही समस्त उपाधियों के कर्मों में अनासक्ति का भाव दृढ़ होता है। किसी व्यक्ति के प्रति वैरभाव तभी होता है, जब हम उसे पराया समझते हैं। मेरे ही दोनों हाथों के मध्य कोई वैरभाव नहीं हो सकता। आत्मैकत्व के बोध से जब सर्वत्र एकता का दर्शन और अनुभव होता है? केवल तभी समस्त भूतों के प्रति पूर्ण निर्वैरभाव प्राप्त हो सकता है

मन और बुद्धि के स्तर पर सर्वथा अनासक्ति होना असंभव है। मन और बुद्धि किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति आसक्ति के बिना नहीं रह सकते हैं। इसलिए एक साधक सर्वप्रथम ईश्वरार्पण की भावना के द्वारा विषयासक्ति को त्यागना सीखता है।  और तत्पश्चात् अपने मन को भक्ति के साथ ईश्वर में स्थित कर देता है। इस अंग की पूर्णता के लिए पूर्व कथित गुण निश्चय ही सहायक होते हैं।

    इस श्लोक से यह भी स्पष्ट ज्ञात होता है कि अध्यात्म के साधक की महान् पवित्र तीर्थयात्रा ईश्वरार्पण बुद्धि से कर्म करने से प्रारम्भ होती है। ईश्वरार्पण बुद्धि से कर्म करने का अर्थ है अपने सभी कर्तव्यों को ईश्वर को समर्पित मानकर, फल की इच्छा के बिना करना। यह भावना रखना कि कर्म करने की शक्ति ईश्वर से ही मिली है, और मैं केवल एक साधन हूँ। यह साधना मन को शुद्ध करती है और अहंकार को नष्ट करती है।  सांसारिक जिम्मेदारियों से भागने के बजाय, उनमें रहते हुए भी कमल के पत्ते की तरह निर्लिप्त रहने की शिक्षा देती है ! 

The true test of Leader : Love for all and malice towards none.

तत्पश्चात् स्वयं ईश्वर (आत्मा , सत्य , इष्टदेव) ही उसके जीवन का परम लक्ष्य बन जाता है। इसका परिणाम होगा ईश्वर के प्रति परम प्रेम। स्वाभाविक है कि जगत् की अनित्य, सीमित  वस्तुओं के साथ उसकी आसक्ति समाप्त हो जायेगी और वह आत्मा का दर्शन कर सकेगा। जब स्वयं आत्मस्वरूप (इष्टदेव) ही बनकर वह स्वयं को सर्वत्र सब प्राणियों में स्वयं को ही पहचानेगातब उसका किसी भी प्राणी से किसी प्रकार का वैर नहीं होगा। गीता के अनुसार साधना के द्वारा प्राप्त आत्मसाक्षात्कार की पूर्णता की कसौटी है सबसे प्रेम और किसी से द्वेष नहीं होना

इस प्रकार श्रीकृष्णार्जुनसंवाद के रूप में ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रस्वरूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का विश्वरूप दर्शनयोग नामक ग्यारहवां अध्याय समाप्त होता है।

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 25 /3 /2026/ 1 month starts :  

अमृतवाणी | श्री रामकृष्णदेव के उपदेश | PART 1| ‪@SanatanGyan9‬



https://www.youtube.com/watch?v=NTfQJlCQXZA

अमृतवाणी | श्री रामकृष्णदेव के उपदेशों का विशाल संग्रह। प्रस्तुत पुस्तक रामकृष्ण मठ चेन्नई से प्रकाशित पुस्तक Syings of Sri Ramkrishna " का हिन्दी अनुवाद है। अध्याय - 1 , जीवन का उद्देश्य। अनुवादक श्री वागीश्वरानन्द