इस ब्लॉग में व्यक्त कोई भी विचार किसी व्यक्ति विशेष के दिमाग में उठने वाले विचारों का बहिर्प्रवाह नहीं है! इस ब्लॉग में अभिव्यक्त प्रत्येक विचार स्वामी विवेकानन्द जी से उधार लिया गया है ! ब्लॉग में वर्णित विचारों को '' एप्लाइड विवेकानन्दा इन दी नेशनल कान्टेक्स्ट" कहा जा सकता है। एवं उनके शक्तिदायी विचारों को यहाँ उद्धृत करने का उद्देश्य- स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाओं को अपने व्यावहारिक जीवन में प्रयोग करने के लिए युवाओं को 'अनुप्राणित' करना है।
72 श्लोक वाले इस अध्याय का नाम 'सांख्ययोग ' है। सांख्य शब्द का अर्थ है - 'विश्लेषणात्मक ज्ञान ' (Analytical knowledge) और योग शब्द युज धातु से बना है जिसका अर्थ है जोड़ना । स्वयं को (अर्थात देहाध्यास और जिवाध्यास में फँसी 'मूढ़बुद्धि' 'सम्मोहित मति' को, सिद्धांत 'जैसी मति वैसी गति ! इसलिए) वर्तमान की स्थिति से ऊँचा उठाकर 'आत्मा' से या किसी श्रेष्ठ एवं पूर्ण आदर्श से (ह्रदय में विद्यमान भगवान गदाधर श्री विष्णुपद श्रीहरिसे) जुड़ जाने के लिये साधक जो कर्म या प्रयत्न करता है उसे योग कहते हैं। इस अध्याय में 'ज्ञान' और 'कर्म' पर सम्मिलित रूप से और पृथक रूप से चर्चा होने के कारण इस अध्याय का नाम 'सांख्ययोग' रखा गया है।
अर्जुन का विषाद दूर करने के लिए इस अध्याय का आरम्भ हुआ है। इसमें प्रधानतया -शरीर, इन्द्रिय , मन, बुद्धि से श्रेष्ठ आत्मा के तत्त्वज्ञान की ही चर्चा हुई है। देहाध्यास और जिवाध्यास को दूर करने के लिए भगवान ने अर्जुन को पहले मनुष्य की विशेष योग्यता 'नित्य-अनित्य विवेक' को जाग्रत करने का उपदेश दिया है। शरीर अनित्य है और आत्मा जन्म-मृत्यु -रहित तथा नित्य है। इस विवेक-प्रयोग के सिद्धान्त को समझाने के लिए भगवान गदाधर श्रीविष्णुपद श्रीहरि ने भगवान भाष्यकार श्रीशंकराचार्य जी द्वारा दिए गए विवेक की परिभाषा - "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः" को समझाने के लिए श्री भगवान गदाधर ने आत्मतत्व का उपदेश दिया है। इसके बाद उन्होंने अर्जुन को समझाया कि स्वधर्म-पालन करना मनुष्य का अवश्यमेव कर्तव्य है। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्मयोग पर भी कुछ उपदेश दिए हैं।
वे अर्जुन को फल की आसक्ति के बिना निष्काम कर्म करने की प्रेरणा देते हैं। फल की कामना से रहित कर्म करने के विज्ञान को वे 'बुद्धियोग' या 'बुद्धि का योग' नाम देते हैं। बुद्धि का प्रयोग मन को देह, इन्द्रिय विषय-भोगों में सुख खोजने में बुद्धि की लालसा को रोक कर आत्मा या भगवान के साथ सम्बन्ध बनाने के लिए करना चाहिए। इस भावना के साथ सम्पन्न किए गए कर्म 'बांधने वाले' से 'मुक्त करने वाले' में परिवर्तित हो जाते हैं।
इसके पश्चात् अर्जुन उन मनुष्यों के लक्षणों को जानना चाहता है, जिनकी बुद्धि आत्मा में प्रतिष्ठित हो गयी हो , या आत्मनिष्ठ बुद्धि वाले स्थितप्रज्ञ मनुष्य के लक्षणों को जानना चाहता है। श्रीकृष्ण उसे बताते हैं कि किस प्रकार से स्थितप्रज्ञ होकर मनुष्य आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त हो जाता है। निष्काम कर्म, निष्काम भक्ति और ज्ञान के सम्मिलन के फलस्वरूप ब्रह्मप्राप्ति और स्थितप्रज्ञ-अवस्था होती है। इसीको ब्रह्मप्राप्ति (ब्राह्मी स्थिति, ब्रह्माध्यास ??) स्थितप्रज्ञ -अवस्था कहते है। और सभी परिस्थितियों में उसकी इन्द्रियाँ उसके वश में हो जाती हैं और उसका मन सदा के लिए भगवान की भक्ति में तल्लीन हो जाता है। इस अवस्था में स्थित होकर मनुष्य निष्काम भाव अपने वर्ण और आश्रम कर्म करके अन्त में ब्रह्मनिर्वाण या मोक्ष प्राप्त करते हैं। यमराज नचिकेता को बताते हैं कि 'ॐ' ही वह सर्वोच्च ब्रह्म या परम लक्ष्य है, जिसे जानकर ही सब कुछ जान लिया जाता है और अमरता मिलती है।
"सर्वे वेदा यत् पदम् आमनन्ति,
तपांसि सर्वाणि च यद् वदन्ति।
यद् ईच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति,
तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि - ॐ इति येतत् ॥
(कठोपनिषद 1.2.15) जो बताता है कि सभी वेदों का परम लक्ष्य, सभी तपस्याओं का अंतिम फल और ब्रह्मचर्य का उद्देश्य 'ॐ' (ओम्) ही है। 'उस पद' की प्राप्ति' [भगवान गदाधर श्री विष्णुपद श्रीहरि की प्राप्ति ] ही ब्राह्मी स्थिति या मोक्ष-प्राप्ति है। समस्त गीता में विशेष रूप से चर्चित इस ब्रह्मस्वरूपता की प्राप्ति ही इस अध्याय का मूल संगीत है।
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February 5, 2026 :
।।2.1।। संजय ने कहा -- इस प्रकार करुणा और विषाद से अभिभूत, अश्रुपूरित नेत्रों वाले आकुल अर्जुन से मधुसूदन ने यह वाक्य कहा।।
अर्जुन की विषादावस्था का वर्णन करने के साथ ही संजय हमें यह भी संकेत करता है कि उसका आन्तरिक व्यक्तित्व भग्न हो गया था। और अर्जुन के व्यक्तित्व में गहरी दरार पड़ गयी थी। अपने समय का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी होकर भी वह किसी सामान्य स्त्री के समान रुदन कर रहा था।
।।2.2।। श्री भगवान् ने कहा -- हे अर्जुन ! तुमको इस विषम स्थल में यह मोह कहाँ से उत्पन्न हुआ? यह आर्य आचरण के विपरीत न तो स्वर्ग प्राप्ति का साधन ही है और न कीर्ति कराने वाला ही है।।
यहाँ भगवान् अर्जुन के आचरण को अनार्य कहते हैं। आर्य पुरुष जीवन के उच्च आदर्शों पवित्रता और गरिमा के आह्वान के प्रति सदैव जागरूक और प्रयत्नशील रहते हैं । एक सच्चे आर्य अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष का स्वभाव तो यह होता है कि जीवन में आने वाली किसी भी परिस्थिति में अपने मनसंयम से विचलित न होकर उन परिस्थितियों का कुशलता से सामना करता है, और उनको अपने अनुकूल बना लेता है।
।।2.3।। हे पार्थ क्लीव (कायर) मत बनो। यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है, हे ! परंतप हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ।।
ज्ञान के मार्ग पर सफलतापूर्वक कदम रखने के लिए उच्च आत्मबल और नैतिकता का होना आवश्यक है। जिसके लिए किसी मनुष्य को आशावान, उमंगी और ऊर्जावान बनकर आलस्य, स्वछन्दता की प्रवृत्ति, अज्ञान और आसक्ति जैसे दोषों पर विजय प्राप्त करना आवश्यक होता है। श्रीकृष्ण एक योग्य गुरु हैं और इसलिए अर्जुन को फटकारते हुए वे अब उसे परिस्थितियों का सामना करने के लिए प्रोत्साहित कर उसके आत्मबल को बढ़ाते हैं।
[2.3 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.]
अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन।।2.4।।
।।2.4।। अर्जुन ने कहा -- हे मधुसूदन ! मैं रणभूमि में किस प्रकार भीष्म और द्रोण के साथ बाणों से युद्ध करूँगा। हे अरिसूदन, वे दोनों ही पूजनीय हैं।।
संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि अर्जुन का मिथ्या अहंकार (देहाध्यास और जिवाध्यास ) ही उसकी मिथ्या धारणाओं और मूढ़बुद्धि होने का कारण था।
गुरूनहत्वा हि महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्।।2.5।।
।।2.5।। इन महानुभाव गुरुजनों को मारने से इस लोक में भिक्षा का अन्न भी ग्रहण करना अधिक कल्याण कारक है, क्योंकि गुरुजनों को मारकर मैं इस लोक में रक्तरंजित अर्थ और काम रूप भोगों को ही भोगूँगा।।
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः।।2.6।।
।।2.6।। हम नहीं जानते कि हमें क्या करना उचित है। हम यह भी नहीं जानते कि हम जीतेंगे, या वे हमको जीतेंगे, जिनको मारकर हम जीवित नहीं रहना चाहते वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने युद्ध के लिए खड़े हैं।।
हमारी पाँच इन्द्रियाँ है - एक स्पर्श इन्द्रिय त्वचा का स्थान पूरे शरीर में है, बाकी 4 इन्द्रिय रूप, रस , गंध , शब्द की इन्द्रियाँ शरीर के ऊपरी भाग में है। हमारा मन ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा भिन्नभिन्न विषयों को ग्रहण कर उनको एक व्यवस्थित रूप में बुद्धि के समक्ष निर्णय के लिये प्रस्तुत करता है। बुद्धि अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर निर्णय देती है जिसे मन कमेन्द्रियों के द्वारा बाह्य जगत में व्यक्त करता है। हमारी जाग्रत अवस्था के प्रत्येक क्षण यह समस्त कार्यकलाप होता रहता है। अत्यधिक चिन्तातुर होने के कारण अर्जुन का देह, इन्द्रियाँ , मन (मिथ्या अहंकार M/F जीव भाव) मूढ़बुद्धि (देहाध्यास) द्वारा निर्देशित हो रहा था, वह शुद्ध या सारथि बुद्धि आत्मा (इष्टदेव) जुड़ा हुआ नहीं था। इस मोह का प्रभाव न केवल अर्जुन के मन (अहंकार) पर बल्कि उसकी बुद्धि पर भी पड़ा था।
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।।2.7।।
।।2.7।। करुणा के कलुष से अभिभूत और कर्तव्यपथ पर संभ्रमित हुआ मैं आपसे पूछता हूँ, कि मेरे लिये जो श्रेयष्कर हो, उसे आप निश्चय करके कहिये, क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ; शरण में आये मुझको आप उपदेश दीजिये।।
यहाँ अर्जुन शिष्यभाव से भगवान् की शरण में जाता है जो यह संकेत करता है कि अब वह उपदेश ग्रहण करने योग्य हो गया है। और अब वह भगवान् के उपदेश का पालन करेगा।
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या
द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धम्
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्।।2.8।।
।।2.8।। पृथ्वी पर निष्कण्टक समृद्ध राज्य को और देवताओं के स्वामित्व को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर कर सके।।
अब अर्जुन की स्थिति एक तीव्र मुमुक्ष के समान है जो मरणधर्मा शरीर (र्मत्य जीवन) की समस्त सीमाओं और बन्धनों से मुक्त हो जाने के लिये अधीर हो उठा है। अब आवश्यकता है केवल एक प्रामाणिक विचार की जो स्वयं भगवान हृषीकेश उसे गीता के दिव्य काव्य में देते हैं।
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह।।2.9।।
।।2.9।। संजय ने कहा -- इस प्रकार गुडाकेश परंतप अर्जुन भगवान् हृषीकेश से यह कहकर कि हे गोविन्द "मैं युद्ध नहीं करूँगा" चुप हो गया।।
संजय ने यहाँ अर्जुन को गुड़ाकेश कह कर संबोधित किया गया है जिसका अर्थ है-'निद्रा पर विजय पाने वाला।' और श्रीकृष्ण के लिए हृषीकेश अर्थात् 'मन और इन्द्रियों के स्वामी' शब्द का प्रयोग किया है। इसका शाब्दिक संकेत यह है कि जो मन और इन्द्रियों के स्वामी हैं, वे निश्चित रूप से अर्जुन को इस किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति से बाहर ले आएंगे।
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः।।2.10।
।।2.10।। इस प्रकार धर्म और अधर्म शुभ और अशुभ इन दो सेनाओं के संव्यूहन के मध्य अर्जुन (जीव देहाध्यास-रथी) पूर्ण रूप से अपने सारथी बुद्धि को भगवान् श्रीकृष्ण (सूक्ष्म विवेकवती बुद्धि, आत्मा , ईश्वर,परमात्मा) की शरण में आत्मसमर्पण करता है जो पाँच अश्वों (पंच ज्ञानेन्द्रियों) और मन रूपी लगाम के द्वारा चालित शरीर रूपी रथ (देह) अपने पूर्ण नियन्त्रण में रखते हैं।
ऐसे दुखी और भ्रमित स्वयं को नश्वर देह समझने वाले , M/F देहाध्यासी व्यक्ति जीव अर्जुन को श्रीकृष्ण सहास्य उसकी अन्तिमविजय का आश्वासन देने के साथ हीगीता के आत्ममुक्ति का आध्यात्मिक उपदेशभी करते हैं।जिसके ज्ञान से सदैव के लियेमनुष्य केशोक- मोह की निवृत्तिहो जाती है।
अपने अधूरे ज्ञान के कारण हम जिन परिस्थितियों का सामना करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं, उन्हें हम दोषी मानते हैं, दुःखी होते हुए उन पर खीझते हैं, उनसे दूर भागना चाहते हैं और उन्हें अपने दुर्भाग्य के लिए उत्तरदायी ठहराते हैं। किन्तु प्रबुद्ध आत्माएँ हमें अवगत कराती हैं कि भगवान की यह सृष्टि सभी प्रकार से पूर्ण है। तथा शुभ और अशुभ परिस्थितियाँ हमारे सम्मुख दिव्य प्रयोजन हेतु उत्पन्न होती हैं। ये सब हमारे आध्यात्मिक उत्थान की व्यवस्था करती हैं ताकि हम पूर्णता को प्राप्त करने की (निःस्वार्थपरता को अभिव्यक्त करने की ?)अपनी यात्रा में आगे बढ़ सके। जो लोग इस रहस्य को समझते हैं, वे कभी कठिन परिस्थितियों से विचलित नहीं होते बल्कि दृढ़ता और शांति से इनका सामना करते हैं।
शंकराचार्यजी अपने भाष्य में कहते हैं - " तस्माद्गीताशास्त्रे केवलादेव तत्त्वज्ञानान्मोक्षप्राप्तिः न कर्मसमुच्चितात् इति निश्चितोऽर्थः। " भगवान् यही बात कहेंगे कि (योगी) अन्तःकरण की शुद्धि (चित्तशुद्धि) के लिये कर्म करते हैं। सुतरां गीताशास्त्र में निश्चय किया हुआ अर्थ यही है कि केवल तत्त्वज्ञान से ही मुक्ति होती है कर्म-सहित ज्ञान से नहीं।
श्री भगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।।2.11।।
[अशोच्यान् अन्वशोचः त्वम् प्रज्ञावादान् च भाषसे। गतासून् ' अगतासून् च न अनुशोचन्ति पण्डिताः।। ]
विष्णुपुराण में श्री भगवान की परिभाषा इस प्रकार है—
उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम्।
वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति॥
(विष्णुपुराण ६। ५। ७८)
‘जो सम्पूर्ण प्राणियों के उत्पत्ति, प्रलय (के बाद ???), इस लोक में आगमन, परलोक में गति, विद्या और अविद्या सब कुछ जानते हैं , वही भगवान हैं। अर्थात संसार की सृष्टि , स्थिति और प्रलय के कर्ता को भगवान कहते हैं।
श्री कृष्ण स्वयं भगवान हैं, वे त्रिकालदर्शी भी हैं। कुरुक्षेत्र के युद्ध का परिणाम भी वे जानते थे। अपने-अपने कर्मों के अनुसार जिनलोगों का मृत्युकाल उपस्थित था वे ही लोग उस युद्ध क्षेत्र में एकत्र हुए थे। श्रीभगवान ने सबका मृत्युकाल उपस्थित जानकर भी उनकी ऊर्ध्वगति की व्यवस्था की थी। वे द्रष्टा मात्र थे -उन्होंने शस्त्र धारण नहीं किया था। वे ही कर्मफल दाता हैं - सबको कर्मफल दिया था।
।।2.11।। श्री भगवान् ने कहा -(अशोच्यान्) जिनके लिये शोक करना उचित नहीं है, उनके लिये तुम शोक करते हो और ज्ञानियों के से वचनों को कहते हो, परन्तु ज्ञानी पुरुष मृत (गतासून्) और जीवित (अगतासून्) दोनों के लिये शोक नहीं करते हैं।।
इस श्लोक के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन का ध्यान जीव के उच्च स्वरूप# की ओर आकर्षित करते हैं। [#अविनाशी (Real I या) आत्मस्वरूप]
जैसा कि एक श्रेष्ठ चिकित्सक रोग के लक्षणों का ही उपचार न करके उस रोग के मूल कारण को दूर करने का प्रयत्न करता है, उसी प्रकार यहाँ भी भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के शोक मोह के मूल कारण (आत्मअज्ञान) को ही दूर करने का प्रयत्न करते हैं।
शुद्ध आत्मस्वरूप के अज्ञान के कारण अहंकार उत्पन्न होता है। यह अज्ञान न केवल दिव्य स्वरूप को आच्छादित करता है वरन् उसके उस सत्य पर भ्रान्ति भी उत्पन्न कर देता है।
अपने नश्वर व्यावहारिक मैं (Apparent I) और अविनाशी (Real I या) आत्मस्वरूप के अज्ञान (शरीर का जन्म होते ही अविद्या -अस्मिता-रागद्वेष -पंचक्लेश पंचभूतों के पंजों में फँस जाने के कारण ही ब्रह्म या आत्मा को रोना पड़ता है क्योंकि) अज्ञान के कारण देहाभिमान (M/F जीवभाव) अहंकार उत्पन्न होता है। यह अज्ञान न केवल अविनाशी दिव्य स्वरूप को आच्छादित करता है वरन् उसके उस सत्य पर भ्रान्ति (देहाभिमान जनित कामना-वासना) भी उत्पन्न कर देता है।
मोहग्रस्त व्यक्ति को किसी विशेष व्यक्ति (परिवार या आत्मीय जन से आसक्ति का मूल्य दुःख और शोक के रूप में चुकाना पड़ता है। इन शरीर -इन्द्रिय-मन -बुद्धि या अन्तःकरण की उपाधियों के साथ मिथ्या तादात्म्य (देहाध्यास) के कारण ही हमें दुःख प्राप्त होते रहते हैं। हमें अपने अविनाशीआत्मस्वरूप का (Real I' का)ज्ञान होने से उनका अन्तहो जाता है।
(और वाणी पर संयम नहीं रहने होने पर उसकी विवेक-शक्ति चली जाती है।नित्य-अनित्य विवेक नहीं रहने से) अविनाशी, 'शाश्वत चैतन्य स्वरुप आत्मा' (ब्रह्म, सच्चिदानन्द) स्थूल शरीर (M/F शरीर) के साथ मिथ्या तादात्म्य (देहाभिमान, देहाध्यास) के कारण शरीर को ही 'मैं' और 'मेरा' मान लेने के कारण अनेक वस्तुओं और व्यक्तियों के सम्बन्ध में अपने को बन्धन (आसक्ति) में अनुभव करती है। वही आत्मतत्त्व ('Real I' सच्चिदानन्द का) शरीर ,इन्द्रिय, मन, अहंबुद्धि के साथ जुड़कर अनेक प्रकार की भावनाओं का अनुभव करता है (अपना -पराया) मानो वह भावना जगत् (मनोराज्य) उसी का है।
फिर यही शाश्वत चैतन्य (आत्मा) जड़ 'बुद्धि' उपाधि से युक्त होकर 'आशा और इच्छा' (कामना-वासना) करता है, महत्वाकांक्षा और आदर्श रखता है जिनके कारण उसे दुखी भी होना पड़ता है। देहाभिमान, कामना-वासना, इच्छा -महत्वाकांक्षा आदि बुद्धि के ही धर्म हैं। इस प्रकार देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि से युक्त शुद्ध आत्मा जीवभाव (M/F शरीर देहाभिमान) को प्राप्त करके बाह्य विषयों भावनाओं और विचारों का दास और शिकार बन जाती है। जीवन के असंख्य दुःख और क्षणिक सुख इस जीवभाव (M/F देहाभिमानी बुद्धि) के कारण ही हैं। अर्जुन इसी जीवभाव के कारण पीड़ा का अनुभव कर रहा था।
श्रीकृष्ण जानते थे कि शोकरूप भ्रांति या विक्षेप का मूल कारण आत्मस्वरूप का अज्ञान आवरण (अविद्या-अस्मिता-पंचक्लेश) है और इसलिये अर्जुन के विषाद को जड़ से हटाने के लिये वे उसको उपनिषदों में प्रतिपादित आत्मज्ञान का उपदेश करते हैं।
मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विधि (Psychological and spiritual method : अष्टांगयोग का प्रशिक्षण) के द्वारा मन-बुद्धि को पुन शिक्षित करने का ज्ञान भारत ने हजारों वर्ष पूर्व विश्व को दिया था। यहाँ श्रीकृष्ण का गीतोपदेश के द्वारा यही प्रयत्न है। आत्मज्ञान की पारम्परिक उपदेश विधि (गुरु-शिष्य परम्परा) के अनुसार जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण सीधे ही आत्मतत्त्व का उपदेश करते हैं।
भीष्म और द्रोण का अन्तःकरण (चित्त) शुद्ध होने के कारण उनमें चैतन्य प्रकाश (आत्म-ज्योति) स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था। उनकी बुद्धि रूपी सारथि -इन्द्रिय मन द्वारा शासित न होकर चैतन्य आत्मा के द्वारा शासित थी। इसलिए वे दोनों ही महापुरुष अतुलनीय थे। इस युद्ध में मृत्यु हो जाने पर उनको अधोगति प्राप्त होगी यह विचार केवल एक अपरिपक्व बुद्धि वाला ही कर सकता है।
आत्मविषयक बुद्धिका नाम पण्डा है और वह बुद्धि जिनमें हो वे पण्डित हैं। (पण्डा आत्मविषया बुद्धिः येषां ते हि पण्डिताः पाण्डित्यं निर्विद्य इति श्रुतेः।)
>>3H : मनुष्य के तीन प्रमुख अवयव हैं -शरीर (Hand) के द्वारा हम बाह्य अथवा भौतिक जगत् को देखते हैं जो मन (Head) के द्वारा अनुभव किये भावनात्मक जगत् से भिन्न होता है और उसी प्रकार बुद्धि (Heart के साथ या आत्मा के साथ जुड़ी)विवेक-सम्पन्न बुद्धि के द्वारा ( जीव -जगत और ईश्वर में एकत्व (Oneness) के विचारात्मक जगत् का अनुभव हमें होता है।
भौतिक दृष्टि से (M/F शरीर) की दृष्टि सेजिसे मैं केवल एक स्त्री समझता हूँ उसी को मन के द्वारा अपनी माँ के रूप में देखता हूँ। स्थूल देहाभिमान को हटाकर यदि विशेलषणात्मक बुद्धि से केवल वैज्ञानिक परीक्षण करें तो स्त्री/पुरुष शरीर धारी जीवहड्डी -रक्त -मज्जा-मांस और नस-नाड़ी कोशिकाओं आदि से बना हुआ एक पिण्ड विशेष ही है। यदि मेरी भावना उस M/F स्थूल शरीर के प्रति परिवर्तित हो जाये , तो भौतिक वस्तु कामना-वासना के प्रति आसक्ति दोष अथवा अपूर्णता के कारण होने वाले दुखों को दूर किया जा सकता है ।
इसी प्रकार भौतिक और भावनात्मक दृष्टि से जो वस्तु (इन्द्रिय विषयों के भोग) कुरूप और लज्जाजनक है उसी को यदि बुद्धि द्वारा तात्त्विक दृष्टि से देखें तो हमारे दृष्टिकोण में अन्तर आने से हमारा दुःख (भ्रम) दूर हो सकता है। इसी तथ्य को और आगे बढ़ाने पर ज्ञात होगा कि यदि मैं जीवन को आध्यात्मिक दृष्टि (विवेकज ज्ञान की दृष्टि) से देख सकूँ तो शारीरिक मानसिक और बौद्धिक दृष्टिकोणों के कारण उत्पन्न विषाद को आनन्द और प्रेरणादायक स्फूर्ति में परिवर्तित किया जा सकता है।
यहाँ भगवान् अर्जुन को यही शिक्षा देते हैं कि वह अपनी अज्ञान की दृष्टि का त्याग करके गुरुजन, स्वजन एवं युद्धभूमि इत्यादि को (जगत-रूपी रंगमंच या व्यायामशाला को) आध्यात्मिक दृष्टि से देखने और समझने (लीला और अभिनय को समझने) का प्रयत्न करे। इस महान् पारमार्थिक सत्य का उपदेश यहाँ इतने अनपेक्षित ढंग से अचानक किया गया है कि अर्जुन की बुद्धि को एक आघातसा लगा।
आगे के श्लोक पढ़ने पर हम समझेंगे कि भगवान् ने जो यह आघात अर्जुन की बुद्धि में पहुँचाया उसका कितना लाभकारी प्रभाव अर्जुन के मन पर पड़ा। इनके लिये शोक करना उचित क्यों नहीं है क्योंकि वे नित्य हैं। (दृश्य रूप में अनित्य है , साक्षी रूप में नित्य है ?) कैसे भगवान् कहते हैं-
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्।।2.12।।
।।2.12।। वास्तव में न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था अथवा तुम नहीं थे अथवा ये राजालोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे।।
यही हिन्दू दर्शन का प्रसिद्ध पुनर्जन्म का सिद्धान्त है। जिस अस्तित्व को हम 'स्वयं' कहते हैं, वह आत्मा है न कि भौतिक शरीर और यह भगवान के समान नित्य है।
यहाँ भगवान् स्पष्ट घोषणा करते हैं कि M/F देह को धारण करने वाली आत्मा एक महान तीर्थयात्रा (दहोहं से शिवोहं की यात्रा) के लिये निकल पड़ी है। जो इस यात्रा के मध्य कुछ काल के लिये विभिन्न शरीरों को ग्रहण करते हुये उनके साथ तादात्म्य कर विशेष-विशेष अनुभवों को प्राप्त करती है।
श्रीकृष्ण, अर्जुन और अन्य राजाओं का उन विशेष शरीरों में होना कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। न वे शून्य से आये और न ही मृत्यु के बाद शून्य रूप हो जायेंगे। प्रामाणिक तात्त्विक विचार के द्वारा मनुष्य भूत, वर्तमान और भविष्य की घटनाओं की सतत शृंखला समझ सकता है। आत्मा वहीं रहती हुई अनेक शरीरों को ग्रहण करके प्राप्त परिस्थितियों का अनुभव करती प्रतीत होती है।यही हिन्दू दर्शन का प्रसिद्ध पुनर्जन्म का सिद्धान्त है। गौतम बुद्ध सदैव अपने पूर्व जन्मों का सन्दर्भ दिया करते थे। और इस्लाम के सूफी संत इस कथन को कौन नहीं जानता जिसमें उन्होंने कहा कि ' मैं पत्थर से मरकर पौधा बना, पौधे से मरकर पशु बना, पशु से मरकर मैं मनुष्य बना। फिर मरने से मैं क्यों डरूँ? मरने से मुझमें कमी कब आयी ? मनुष्य से मरकर मैं देवदूत बनूँगा। पश्चिम के प्रसिद्ध कवियों को भी कल्पना के स्वच्छाकाश में विचरण करते हुये अन्त प्रेरणा से इसी सिद्धान्त का अनुभव हुआ जिनमें ब्राउनिंग रोसेटी टेनिसन वर्डस्वर्थ आदि प्रमुख नाम हैं।
वह दिन दूर नहीं जब मनोविज्ञान के क्षेत्र में तेजी से हो रहे विकास के कारण पश्चिमी राष्ट्रों को भी अपने धर्म ग्रन्थों का पुनर्लेखन करना पड़ेगा। यदि हम तर्क को स्वीकार करते हैं तो देह से भिन्न जीव के अस्तित्व को मानना ही पड़ता है।
भारत के शंकराचार्य आदि का जीवन देखें तो ज्ञात होता है कि बाल्यावस्था में ही उनको कितना उच्च ज्ञान था।
जब भगवान् ने कहा कि उन सबका (पितामह और आचार्य का) नाश होने वाला नहीं है। तब उनके इस कथन को जगत् का एक सामान्य व्यक्ति होने के नाते (देहाभिमानी) अर्जुन ठीक से ग्रहण नहीं कर पाया। उसने प्रश्नावाचक मुद्रा में श्रीकृष्ण की ओर देखकर अधिक स्पष्टीकरण की मांग की।
"इनका (पितामह और आचार्य) के देहत्याग का शोक क्यों नहीं करना चाहिये ?क्योंकि स्वरूप से ये सब नित्य हैं। कैसे ?"...भगवान् कहते हैं।
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।।2.13।।
।।2.13।। जैसे इसी देह में देही जीवात्मा की कुमार, युवा और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही उसको अन्य शरीर की प्राप्ति होती है; धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता है।।
स्मृति के नियम (principle of memory) से यह सिद्ध हो जाता है कि व्यक्ति में कुछ है जो तीनों अवस्थाओं में अपरिवर्तनशील है जो बालक और युवा शरीर द्वारा अनुभवों को प्राप्त करता है तथा उनका स्मरण भी करता है। इस प्रकार देखने पर यह ज्ञात होता है कि कौमार्य अवस्था की मृत्यु युवावस्था का जन्म है और युवावस्था की मृत्यु ही वृद्धावस्था का जन्म है।
बाल्यावस्था आदि की मृत्यु होने पर हम शोक नहीं करते क्योंकि हम जानते हैं कि हमारा अस्तित्व बना रहता है। और हम पूर्व अवस्था से उच्च अवस्था को प्राप्त कर रहे हैं। उसी प्रकार एक देह विशेष को त्याग कर जीवात्मा अपनी पूर्व वासनाओं के अनुसार अन्य देह को धारण करता है। इस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता है।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।2.14।।
।।2.14।। हे कुन्तीपुत्र ! शीत और उष्ण और सुख दुख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग का प्रारम्भ और अन्त होता है; वे अनित्य हैं, इसलिए, हे भारत ! उनको तुम सहन करो।।
आँख , कान , नाक , जिह्वा -और त्वचा पूरे शरीर तक फैली इन्द्रियाँ तो केवल उपकरण हैं जिनके द्वारा जीव विषय ग्रहण करता है उनको जानता है। जीव (आत्मा) के बिना केवल इन्द्रियाँ विषयों का ज्ञान नहीं करा सकतीं। जो पुरुष यह समझ लेता है कि जगत् की वस्तुयें नित्य परिवर्तनशील हैं उत्पन्न और नष्ट होती रहती हैं। वह पुरुष इन वस्तुओं के कारण स्वयं को कभी विचलित नहीं होने देगा।
काल के प्रवाह में भविष्य की घटनायें वर्तमान का रूप लेती हैं और हमें विभिन्न अनुभवों को प्रदान करके निरन्तर भूतकाल में समाविष्ट हो जाती हैं। जगत् की कोई भी वस्तु एक क्षण के लिये भी विकृत हुये बिना नहीं रह सकती । यहाँ परिवर्तन ही एक अपरिवर्तनशील नियम है।
शीत और उष्ण सफलता और असफलता सुख और दुख कोई भी नित्य नहीं हैं। जब वस्तुस्थिति ऐसी है तो प्रत्येक परिवर्तित परिस्थिति के कारण क्षुब्ध या चिन्तित होना अज्ञान का ही लक्षण है। जीवन में आने वाले कष्टों को चिन्तित हुये बिना शान्तिपूर्वक सहन करना चाहिये। सभी प्रकार की अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में विवेकी पुरुष इस तथ्य को सदा ध्यान में रखता है कि यह भी बीत जायेगा। अनित्य शब्द से तात्पर्य यह है कि एक ही वस्तु किसी एक व्यक्ति के लिये ही कभी सुखदायक तो कभी दुखदायक हो सकती है।
शीतउष्ण आदि को समान भाव से सहने वाले व्यक्ति को क्या लाभ मिलेगा ? सुनिये
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते।।2.15।।
।।2.15।। हे पुरुषश्रेष्ठ ! दुःख और सुख में समान भाव से रहने वाले जिस धीर पुरुष को ये व्यथित नहीं कर सकते हैं वह अमृतत्व (मोक्ष) का अधिकारी होता है।।
उपनिषदों के अनुसार आत्मसाक्षात्कार के लिये-दुःख-सुख को समान भाव से सहन करना - सहनशीलता या तितिक्षा मनुष्य -चरित्र का एक आवश्यक गुण है । तितिक्षा का अर्थ निराश उदास भाव से जो हो रहा है उसको सहन करना ऐसा नहीं है। यहाँ प्रयोजन निराश व्यक्ति की सहनशक्ति से नहीं बल्कि जगत् के परिर्वतनशील स्वभाव को अच्छी प्रकार समझ लेने से है। विवेकी पुरुष में यह सार्मथ्य आ जाती है कि सुख में उसे हर्षातिरेक नहीं होता और न दुख में अत्यन्त विषाद। जब तक देह में रहना पड़ता है - प्रकृति के राज्य में हैं। ज्ञानदायिनी माँ सारदा को याद करना है - जो बिल्कुल अपनी माँ है !
अमृतत्व का अर्थ है जो पुरुष अपने नित्य आत्मस्वरूप को पहचान लेता है वह इन सब अनुभवों को प्राप्त कर उनके मध्य रहता हुआ भी शोकमोह को प्राप्त नहीं होता। क्योंकि उसे अपने अमृतस्वरूप का विस्मरण नहीं होता।जीवन में आने वाले सुख-दुःखादि कष्टों को चिन्तित हुये बिना प्रसन्नतापूर्वक सहन करने की सर्वोच्च साधना- करने का अवसर मिलता है। विश्व के अनेक देशभक्त क्रान्तिकारियों ने अपने देश की स्वतंत्रता के आदर्शों को प्राप्त करने के लिए अनेक कष्ट सहन करके अपने प्राणों की आहुति दी है। निम्नलिखित कारणों से भी तुम्हारे लिए उचित है कि शोक और मोह को छोड़ कर तुम शान्तिपूर्वक शीतादि को सहन करो। क्योंकि
।।2.16।। असत् वस्तु का तो अस्तित्व नहीं है और सत् का कभी अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्त्व, तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुषों के द्वारा देखा गया है।।
स्वाभाविक ही सत्य वस्तु वह है जो त्रिकाल अबाधित है - भूतवर्तमान भविष्य इन तीनों कालों में भी नित्य अविकारी रूप में रहती है।
असत् वस्तु वह है जिसकी भूतकाल में सत्ता नहीं थी और भविष्य में भी वह नहीं होगी परन्तु वर्तमान में उसका अस्तित्व प्रतीतसा होता है। वर्तमान में भी असत् ही है हमें दिखाई देने वाली वस्तुयें मिथ्या होने पर भी उन्हें सत् माना जाता है। प्रतीत होने पर भी स्वप्न मिथ्या है। अत तीनों काल में अबाधित वस्तु ही सत्य कहलाती है। शरीर मन और बुद्धि इन जड़ उपाधियों के साथ हमारा जीवन परिच्छिन्न है इन तीनों में ही नित्य परिवर्तन हो रहा है। शरीर मन और बुद्धि के स्तर पर होने वाले असंख्य अनुभवों को एक सूत्र में धारण कर एक पूर्ण जीवन का अनुभव कराने के लिये निश्चय ही एक नित्य अपरिर्तनशील सत् वस्तु का अधिष्ठान आवश्यक है। मणियों को धारण करने वाले एक सूत्र के समान हममें कुछ है जो परिवर्तनों के मध्य रहते हुये विविध अनुभवों को एक साथ बांधकर रखता है। सूक्ष्म विचार करने पर यह ज्ञान होगा कि वह कुछ अपनी स्वयं की चैतन्य स्वरूप आत्मा ( आत्मनिष्ठबुद्धि ? चैतन्य निष्ठ बुद्धि)है। असंख्य अनुभव जो प्रकाशित हुये उनमें से कोई अनुभव आत्मा नहीं है। जीवन जो कि अनुभवों की एक धारा है योग है इस चैतन्य के कारण ही सम्भव है। बाल्यावस्था युवावस्था और वृद्धावस्था में होने वाले अनुभवों को यह चैतन्य ही प्रकाशित करता है। अनुभव आते हैं और जाते हैं। जिस चैतन्य के कारण 'मैं'ने (चैतन्य ने)सबको जाना जिसके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है वह चैतन्य आत्मा जन्म और नाश से रहित नित्य सत्य वस्तु है। तत्त्वदर्शी पुरुष इन दोनों सत् और असत्आत्मा और अनात्मा (बुद्धि) के तत्त्व को पहचानते हैं। इन दोनों के रहस्यमय संयोग से यह विचित्र जगत् उत्पन्न होता है। फिर वह नित्य सद्वस्तु क्या है सुनो
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति।।2.17।।
।।2.17।। उस वस्तु को तुम अविनाशी जानों, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। इस अव्यय (भगवान) का नाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।।
समस्त जगत् को जो व्याप्त किये हुये है और इस दृश्यमान अनुभव में आने वाले जगत् का जो अधिष्ठान है वह सत् (आत्मा) है। मिट्टी के बने अनेक प्रकार के पात्र होते हैं जिनके विभिन्न उपयोगों के कारण अथवा उनमें रखी वस्तुओं के कारण उनके विभिन्न नाम होते हैं परंतु विविध आकारों के होने पर भी वे सब एक मिट्टी के ही बने होते हैं जो सब आकारों में व्याप्त होती है और जिसके बिना किसी भी पात्र का अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता। उन सब की उत्पत्ति स्थिति और लय मिट्टी में ही है। अत उनमें मिट्टी ही वास्तव में सत्य है।
इसी प्रकार यह नित्य परिवर्तनशील जगत् नित्य अविनाशी तत्त्व से व्याप्त है और भगवान् (आत्मा ) कहते हैं कि इस तत्त्व का विनाश कदापि सम्भव नहीं है।
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत।।2.18।।
।।2.18।।
आत्मा द्वारा धारण किये हुये भौतिक शरीर नाशवान् हैं जबकि आत्मा नित्य अविनाशी और अप्रमेय अर्थात् बुद्धि के द्वारा जानी नहीं जा सकती। इसलिये हे भारत ! तुम युद्ध करो।। इसका कारण यह है कि इन्द्रियाँ मन और बुद्धि आदि हमारे ज्ञान प्राप्ति के साधन हैं वे स्वत जड़ हैं और चैतन्य आत्मा की उपस्थिति में ही वे अन्य वस्तुओं को प्रकाशित कर सकते हैं। हे भारत तुम युद्ध करो , अर्थात प्रत्येक परिस्थिति का निष्ठापूर्वक और साहस के साथ सामना करो।
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।।2.19।।
।।2.19।। जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसको मरा समझता है वे दोनों ही नहीं जानते हैं, क्योंकि यह आत्मा न मरता है और न मारा जाता है।।
न जायते म्रियते वा कदाचि
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।2.20।
।।2.20।। यह आत्मा किसी काल में भी न जन्मता है और न मरता है और न यह एक बार होकर फिर अभावरूप होने वाला है। यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता।।
शरीर के समान आत्मा का जन्म नहीं होता क्योंकि वह तो सर्वदा ही विद्यमान है। तरंगों की उत्पत्ति होती है और उनका नाश होता है परन्तु उनके साथ न तो समुद्र की उत्पत्ति होती है और न ही नाश। जिसका आदि है उसी का अन्त भी होता है। उत्ताल तरंगे ही मृत्यु की अन्तिम श्वांस लेती हैं। सर्वदा विद्यमान आत्मा के जन्म और नाश का प्रश्न ही नहीं उठता। अत यहाँ कहा है कि आत्मा अज और नित्य है।
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्।।2.21।।
।।2.21।। हे पार्थ ! जो पुरुष इस आत्मा को अविनाशी (indestructible),नित्य (eternal) और अव्ययस्वरूप (inexhaustible)सदापूर्ण रहने जानता है, वह कैसे किसको मरवायेगा और कैसे किसको मारेगा?
जो पुरुष अविनाशी आत्मा को जानता है वह कभी जीवन की वास्तविकताओं का सामना करने में शोकाकुल नहीं होता। जिसको कोई सांसारिक चाहत ही नहीं है , ऐसा पुरुष न किसी को मारता है और न किसी के मरने का कारण बनता है।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।2.22।।
।।2.22।। जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही देही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।।
विकास की दृष्टि से जीव का ही देह का त्याग होता है और वह नये अनुभवों की प्राप्ति के लिये उपयुक्त नवीन देह को धारण करता है। उसमें कोई कष्ट नहीं है। यह विकास और परिवर्तन जीव के लिये है न कि चैतन्य स्वरूप आत्मा के लिये। आत्मा सदा परिपूर्ण है उसे विकास की आवश्यकता नहीं।
पुनर्जन्म क्यों होता है? न्यायशास्त्र में पुनर्जन्म को सिद्ध करने में तर्क दिया है -जातस्य हर्षभयशोक सम्प्रतिपत्तेः।। (न्यायशास्त्र-3.1.18) यदि हम छोटे शिशु की गतिविधियों पर ध्यानपूर्वक विचार करते हैं, तब हमें यह ज्ञात होता है कि वह बिना किसी स्पष्ट कारण के कभी प्रसन्न, कभी उदास और कभी भयभीत दिखाई देता है। छोटा शिशु अपने पूर्वजन्म का स्मरण करता रहता है और इसी कारण समय-समय पर उसकी मनोदशा में परिवर्तन देखने को मिलता है। हालांकि जैसे-जैसे उसकी आयु बढ़ती है उसके पूर्वजन्म की स्मृतियाँ विलुप्त हो जाती हैं। पुनर्जन्म के पक्ष में न्यायशास्त्र का दूसरा तर्क जिसमें यह कहा गया है- “स्तन्याभिलाषात्" (3.1.21)। नवजात शिशु ने अपने पूर्व जन्मों में यहाँ तक कि पशु की योनि में भी स्तन से अपनी असंख्य माताओं का दूध पिया होता है। इसलिए जब माँ अपने बच्चे के मुँह में स्तन का अग्रभाग डालती है, तब बच्चा स्वतः अपने पूर्व जन्म के अभ्यास के कारण अपनी माँ का स्तनपान करना आरंभ कर देता है। [ शरीर में रहने तक माया का राज्य है। बिना 'ज्ञानदायिनी श्री श्री माँ सारदा देवी की प्रार्थना' किये ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके | शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते || कोई विवेकी और साधनचतुष्टय सम्पन्न मनुष्य भी प्रवृत्ति से निवृत्ति में नहीं आ सकता है। ठाकुर ने भी श्रीश्री माँ के चरणों में माला रख दी थी।]
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।।2.23।।
।।2.23।। इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते और न अग्नि इसे जला सकती है ; जल इसे गीला नहीं कर सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती।।
अविनाशी आत्मा चैतन्य है और जड़ (नश्वर) देह, इन्द्रिय , मन बुद्धि से परे होने के कारण अवयव -रहित (M/F शरीर रहित) है, अर्थात सदा निर्लिप्त है। अवयव रहित (2H से अनासक्त) होने के कारण तलवार आदि शस्त्र इसके अङ्गों के टुकड़े नहीं कर सकते। वैसे ही अग्नि इसको जला नहीं सकता अर्थात् अग्नि भी इसको भस्मीभूत नहीं कर सकता, और जल भी इसको भिगो नहीं सकता। क्योंकि निरवयव आत्मा में ऐसा होना सम्भव नहीं। सिद्धांत यह है कि स्थूल साधन अपने से सूक्ष्म वस्तु का नाश नहीं कर सकता । अभिप्राय यह कि मनुष्य के तीन प्रमुख अवयव हैं- 3'H'उनमें से यह (Heart-2.5 आखर 'प्रेम' है ढाई आखर प्रेम का पढ़ा सो पण्डित है। दादा ने कहा था तुम गीता पर अपना भाष्य लिखो !)
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः।।2.24।।
।।2.24।। क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य (काटी नहीं जा सकती), अदाह्य (जलाई नहीं जा सकती), अक्लेद्य (गीली नहीं हो सकती) और अशोष्य (सुखाई नहीं जा सकती) है; यह नित्य, सर्वगत, स्थाणु , अचल और सनातन है।।
(गीता 3:42 में भी कहा गया है -
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्य: परं मन: |
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे: परतस्तु स: || 42||
"इन्द्रियों से परे इन्द्रियों के विषय हैं, इन्द्रियों के विषय से सूक्ष्म मन, मन से परे बुद्धि और बुद्धि से सूक्ष्म आत्मा है।"
कठोपनिषद् में भी वर्णन किया गया है-
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः।।
(कठोपनिषद्-1.3.10)
कठोपनिषद् में भी वर्णन किया गया है कि आत्मा भौतिक ऊर्जा (E=Mc2) से भी सूक्ष्म होने के कारण हमारी बुद्धि की पहुंच से बाहर है।
हमारी आँखें भौतिक तत्वों (माया) से बनी हैं और केवल इन्द्रियगोचर सांसारिक विषयों का ही अवलोकन कर सकती हैं। चूँकि आत्मा दिव्य है, अर्थात इन्द्रियातीत या कालातीत और अकाल पुरुख है। इसलिए (माया से बने) भौतिक यंत्रों के क्षेत्र से परे है इसलिए यह हमारी आँखों के लिए अदृश्य है। हमारी लौकिक बुद्धि केवल सांसारिक विषयों को समझ-बूझ सकती है लेकिन अपनी चिन्तन शक्ति से दिव्य आत्मा तक नहीं पहुंच सकती। अतः अलख -निरंजन आत्माको जानने के लिए आंतरिक ज्ञान आवश्यक है जो केवल शास्त्रों और गुरु द्वारा सुलभ है।
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि।।2.25।।
।।2.25।। यह आत्मा अव्यक्त, अचिन्त्य और अविकारी कहा जाता है; इसलिए इसको इस प्रकार जानकर तुमको शोक करना उचित नहीं है।।
छः दर्शन जो वैदिक प्रमाणों को स्वीकार करते हैं उन्हें आस्तिक दर्शन कहा जाता है। ये मीमांसा, वेदान्त, न्याय, वैशेषिक, सांख्य और योग हैं।
इन्द्रियगोचर वस्तु व्यक्त कही जाती है। अत जो इन्द्रियों से परे है वह अव्यक्त है। अव्यक्त पंचमहाभूतों में जो सबसे अधिक स्थूल है पृथ्वी उसका ज्ञान पांचों ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा होता है। परन्तु जैसे जैसे सूक्ष्मतर तत्त्व तक हम पहुँचते हैं वैसे यह ज्ञात होता है कि जल में गंध नहीं है , अग्नि में रस नहीं है, वायु में रूप भी नहीं है। इस प्रकार आकाश सूक्ष्मतम होने से दृष्टिगोचर नहीं होता।
यद्यपि मैं किसी वृक्ष के बीज में छुपे वृक्ष को देखसुन नहीं सकता हूँ और न उसका स्वाद स्पर्श या गंध ज्ञात कर सकता हूँ तथापि मैं जानता हूँ कि यही बीज वृक्ष का कारण है। इस स्थिति में कहा जायेगा कि बीज में वृक्ष अव्यक्त अवस्था में है। इस प्रकार आत्मा को अव्यक्त कहने का तात्पर्य यह है कि वह इन्द्रियों के द्वारा जानने योग्य विषय नहीं है। अचिन्त्य आत्मा इन्द्रियों का विषय नहीं है उसी प्रकार यहाँ वह अचिन्त्य है कहकर यह दर्शाते हैं किजड़ मन और बुद्धि के द्वारा हम चैतन्य आत्मा का मनन और चिन्तन नहीं कर सकतेजैसे अन्य विषयों का विचार सम्भव है। इस प्रकार श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश करते हैं कि आत्मा को उसके शुद्ध रूप से पहचान कर शोक करना त्याग देना चाहिए। ज्ञानी पुरुष अपने को न मारने वाला समझता है और न ही मरने वाला मानता है।
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि।।2.26।।
।।2.26।। और यदि तुम आत्मा को नित्य जन्मने और नित्य मरने वाला मानो तो भी, हे महाबाहो! इस प्रकार शोक करना तुम्हारे लिए उचित नहीं है।।
जन्मने वाले का मरण और मरनेवाला जन्म यह दोनों अवश्य ही होने वाले हैं।
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।2.27।।
।।2.27।। जन्मने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है; इसलिए जो अटल है अपरिहार्य - है उसके विषय में तुमको शोक नहीं करना चाहिये।।
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।।2.28।।
।।2.28।। हे भारत ! समस्त प्राणी जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद अव्यक्त अवस्था में रहते हैं और बीच में व्यक्त होते हैं। फिर उसमें चिन्ता या शोक की क्या बात है ?
जो लोग जन्म के पूर्व अव्यक्त या अज्ञात थे , बीच में कुछ समय के लिए दिखाई पड़ रहे हैं, और जो विनाश के बाद पुनः अज्ञात हो जायेंगे। स्वजन लोग जन्म के पूर्व तुम्हारे कौन थे ? -सभी यात्री एक धर्मशाला में रात भर रुक कर, सुबह अपने-अपने गंतव्य स्थान पर चले जायेंगे।
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्।।2.29।।
।।2.29।। कोई इसे आश्चर्य के समान देखता है; कोई इसके विषय में आश्चर्य के समान कहता है; और कोई अन्य पुरुष इसे आश्चर्य के समान सुनता है; और फिर कोई सुनकर भी नहीं जानता।।
स्वयं को M/F समझने वाला एक र्मत्य जीव अमरत्व से उतना ही दूर है जितना कि स्वप्नद्रष्टा जाग्रत पुरुष से। जो मनुष्य अपने आत्मस्वरूप के वैभव (सच्चिदानन्द)के प्रति जागरूक है वही ईश्वर है। और स्वस्वरूप के वैभव से विस्मृत ईश्वर ही मोहित जीव (M/F)है। जब वह आत्मविकास की साधना (3H विकास के 5 )अभ्यास करके/ माँ की कृपा से अपने आनन्दस्वरूप को पहचानता है तब वह उस इन्द्रियातीत अनन्त आनन्दस्वरूप का अनुभव कर आश्चर्यचकित रह जाता है। आश्चर्य की भावना जब मन में उठती है तब आश्चर्यचकित व्यक्ति (आत्मा?) को और कुछ सूझता ही नहीं और वह उस क्षण उस भावना के साथ तदाकार हो जाता है। आत्मानुभव का आनन्द वह आनंद है जब अहंकार जीव (M/Fबिना देह, इन्द्रिय, मन बुद्धि ) समाप्त होकर शुद्ध अनन्तस्वरूप मात्र रह जाता है।
ज्ञानी पुरुष जानता है कि मैं आत्मा हूँ जिसने शरीर धारण किया है ।इस श्लोक से अज्ञानी पुरुष को भी श्रवण मनन और निदिध्यासन के द्वारा इस विरले प्रकार के श्रेष्ठ ज्ञान को प्राप्त करने की प्रेरणा मिल सकती है। आत्मतत्त्व (अवतार वरिष्ठ) को विषय के रूप में नहीं जाना जा सकता। इसीलिए यहाँ कहा गया है कि इसको सुनकर कोई भी व्यक्ति इसे नहीं जानता।
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि।।2.30।।
।।2.30।। हे भारत ! यह देही आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य है, इसलिए समस्त प्राणियों के लिए तुम्हें शोक करना उचित नहीं।।
सम्पूर्ण प्राणियों के शरीरों का नाश किये जानेपर भी इस आत्मा का नाश नहीं किया जा सकता इसलिये भीष्मादि सब प्राणियों के उद्देश्य से तुझे शोक करना उचित नहीं है।
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाछ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते।।2.31।।
।।2.31।। और स्वधर्म को भी देखकर तुमको विचलित होना उचित नहीं है, क्योंकि धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारक कर्त्तव्य क्षत्रिय के लिये नहीं है। [तत्वमसि - आत्मा का कोई कार्य नहीं ? अज्ञान से अपने को क्षत्रिय मानने का कार्य]
।।2.39।। हे पार्थ ! तुम्हें सांख्य विषयक ज्ञान कहा गया और अब इस (कर्म) योग से सम्बन्धित ज्ञान को सुनो जिस ज्ञान से युक्त होकर तुम कर्मबन्ध का नाश कर सकोगे।।
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।।2.40।
।।2.40।। मनुष्यलोकमें इस समबुद्धिरूप धर्मके आरम्भका नाश नहीं होता, इसके अनुष्ठानका उलटा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ासा भी अनुष्ठान (जन्म-मरणरूप) महान् भयसे रक्षा कर लेता है।
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्।।2.41।।
।।2.41।। हे कुरुनन्दन! इस समबुद्धि की प्राप्ति के विषयमें व्यवसायात्मिका बुद्धि एक ही होती है। अव्यवसायी मनुष्योंकी बुद्धियाँ अनन्त और बहुशाखाओंवाली ही होती हैं।
आत्मसाक्षात्कार की सर्वोच्च उपलब्धि केवल इसलिये सम्भव होती है कि साधक दृढ़ निश्चय और एकाग्र चित्त से सामान्य बुद्धि को देह-इन्द्रिय -मन, अहंकार से खींचकर विवेकी बुद्धि बनाकर, निरंतर आत्मा में जोड़े रखने का (बुद्धियोग का) अभ्यास करता है।
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चित: |
वेदवादरता: पार्थ नान्यदस्तीति वादिन: || 42||
कामात्मान: स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् |
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति || 43||
।।2.42।। ।।2.42 -- 2.43।। हे पृथानन्दन !
हे पार्थ अविवेकी पुरुष वेदवाद में रमते हुये जो यह पुष्पिता (दिखावटी शोभा की) वाणी बोलते हैं? इससे (स्वर्ग से) बढ़कर और कुछ नहीं है।।वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकारकी जिस पुष्पित (दिखाऊ शोभायुक्त) वाणीको कहा करते हैं, जो कि जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है तथा भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये बहुतसी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है।
"जो स्वर्ग जैसे उच्च लोकों का सुख पाने के प्रयोजन से वेदों में वर्णित आडम्बरपूर्ण कर्मकाण्डों में व्यस्त रहते है और स्वयं को धार्मिक ग्रंथों का विद्वान समझते हैं वास्तव में वे मूर्ख हैं। वे एक अंधे व्यक्ति द्वारा दूसरे अंधे को रास्ता दिखाने वाले के समान हैं।"
भोग ऐश्वर्य प्रसक्तानाम्' तया अपहृत-चेतसाम्। ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते।।
(2.44)
।।2.44।। उससे जिनका चित्त हर लिया गया है ऐसे भोग और एश्र्वर्य मॆ आसक्ति रखने वाले पुरुषों के अन्तकरण मे निश्चयात्मक् बुद्धि नही हॊती अर्थात वे ध्यान का अभ्यास करने योग्य नही होते। जिनका मन इन्द्रिय के सुखों के प्रति निरंतर आसक्त रहता है। कर्मफल पाने की इच्छा और चिन्ता के कारण जिनकी सदसद् विवेक की क्षमता खो गयी है। वे अविवेकी मनुष्य जो 'ब्रह्मसत्य -जगत मिथ्या , जीवो ब्रह्मैव न अपरः ' महावाक्य को नहीं समझते, इसलिए अपनी बुद्धि का प्रयोग वे निरंतर अपनी आय बढ़ाने, (जमीन -जायदाद खरीदने/F-D बढ़ाने) अपनी लौकिक प्रतिष्ठा बढ़ाने और भौतिक सुखों का संवर्धन करने (फुटानी चौक) में करते हैं। इस प्रकार से भ्रमित होकर वे भगवतप्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए अपेक्षित दृढ़-संकल्प धारण करने में असमर्थ रहते हैं।
।।2.45।। हे अर्जुन वेदों का विषय तीन गुणों से सम्बन्धित (संसार से) है तुम त्रिगुणातीत, निर्द्वन्द्व, नित्य सत्त्व (शुद्धता-आत्मनिष्ठ बुद्धि) में स्थित, योगक्षेम से रहित और आत्मवान् बनो।।
"Be and Make !" आत्मवान् बनो ! और दूसरों को आत्मवान बनने में सहायता करो।
विभिन्न अनुपातों में सत्त्व रज और तम इन तीन गुणों के संयोग से जीवों के अन्तःकरण (चित्त,मन, बुद्धि और अहंकार) का निर्माण हुआ है। अन्तःकरण इन तीन गुणों का ही कार्य है। तीन गुणों के परे जाने का अर्थ है 'ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या ' को पहचान कर मिथ्या अहंकार या देहाभिमान का त्याग, M/F जीव भाव का त्याग, क्योंकि जीव भी ब्रह्म ही है पर इसकी अनुभूति नहीं हुई इसीलिए ब्रह्म अर्थात बृहद बनने के चक्कर में फुटानी चौक पर जमीन-जायदाद बढ़ा रहा है ।
इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में त्रिगुणों के ऊपर उठकर असीम आनन्द में स्थित होने की साधना बतायी गयी है। पूर्व उपदिष्ट समत्व भाव का ही उपदेश यहाँ दूसरे शब्दों में किया गया है। परस्पर भिन्न एवं विपरीत लक्षणों वाले सुख-दुख, शीत-उष्ण, लाभ-हानि इत्यादि जीवन के द्वन्द्वात्मक अनुभव हैं। इन सब में सम-भाव में रहने का अर्थ ही निर्द्वन्द्व होना ही इनसे मुक्त होना है। माया- मोह (मृगमरीचिका) का अर्थ है वस्तु को यथार्थ रूप में न पहचानना -आवरण। तपते रेगिस्तान के रेत पर पानी देखना ही , बुद्धि पर आवरण है। जगत की मिथ्या वस्तुएं सत्य जैसी लगती हैं। जिसके कारण वस्तु का अनुभव किसी अन्य रूप मे ही होता है जिसे विक्षेप कहते हैं और जिसका परिणाम है शोक। अतः सत्वगुण में स्थित होने का अर्थ विवेक-जनित शान्ति में स्थित होना । सत्त्वस्थ बनने के लिए सतत् सजग प्रयत्न की अपेक्षा है।
निर्योगक्षेम यहाँ योग का अर्थ है अप्राप्त वस्तु को प्राप्त करना और प्राप्त वस्तु के रक्षण का नाम है क्षेम। निर्योगक्षेम बनने का अर्थ है इन दोनों को त्याग देना जिससे चिन्ताओं से मुक्ति तत्काल ही मिलती हैं। जब इस ज्ञान को जीवन में उतारने की व्यावहारिक विधि का भी उपदेश दिया गया हो। इस श्लोक में ऐसी विधि का निर्देश आत्मवान भव इन शब्दों में किया गया है। द्वन्द्वों तथा योगक्षेम के कारण उत्पन्न दुख और पीड़ा केवल तभी सताते हैं जब हमारी बुद्धि /दृष्टि /मति देहाभिमानी हो जाती है - आत्मवान नहीं रहती ? अपने देह को 'मैं 'मान कर -सांसारिक नाते-रिश्तों को (भाई-बहन, पत्नी -पुत्र-पुत्री, नाती -पोता को) और 'मेरा' समझने का भ्रम से बुद्धि भ्रमित हो जाती है। तब हमारी भ्रमित बुद्धि का तादात्म्य आत्मा (ईश्वर, ब्रह्म) के साथ न होकर मिथ्या अहंकार और स्वार्थ की अधिकता से होती है। इन नश्वर जड़ देह-मन की उपाधियों के साथ विद्यमान तादात्म्य को छोड़कर इनसे भिन्न अपने शुद्ध अविनाशी चैतन्य स्वरूप आत्मा के प्रति सतत जागरूक रहने का अभ्यास ही आत्मवान होने का उपाय अर्थात् आत्मस्वरूप में स्थित होने का उपाय है। इसकी सिद्धि होने पर मिथ्या अहंकार (मैं नश्वर देह हूँ - ऐसा जीवभाव) नष्ट हो जाता है और वह साधक त्रिगुणों के परे आत्मा में स्थित हो जाता है। ऐसे सिद्ध पुरुष के लिए वेदों का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। वास्तव में आत्मज्ञानी पुरुष (नवनीदा जैसे गृहस्थ नेता होने) के होने के कारण ही वेद-वाक्यों 'तत्वमसि' -जैसे महावाक्यों का प्रामाण्य सिद्ध होता है।
यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः।।
(2.46)
।।2.46।। सब ओर से परिपूर्ण जलराशि के होने पर मनुष्य का छोटे जलाशय में जितना प्रयोजन रहता है, आत्मज्ञानी ब्राह्मण का सभी वेदों में उतना ही प्रयोजन रहता है।।
वेद हमें अपने ही शुद्ध चैतन्यस्वरूप का बोध कराते हैं। जब तक अविद्यायुक्त अहंकार का अस्तित्व है तब तक वेदाध्ययन की आवश्यकता अपरिहार्य है।
आत्मबोध के होने पर उस ज्ञानी पुरुष के कारण वेदों का (महावाक्यों का) भी प्रामाण्य सिद्ध होता है। गणित की सर्वोच्च शिक्षा प्राप्त कर लेने पर उस व्यक्ति को पहाड़े रटने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती; क्योंकि उसके पूर्ण ज्ञान (सर्वमंगल मांगल्ये की प्रार्थना) में इस प्रारम्भिक ज्ञान का समावेश रहता है। [ इस पर स्वामी जी का भाष्य है। दादा का )
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47।।
।।2.47।। कर्म करने मात्र में तुम्हारा अधिकार है, फल में कभी नहीं। तुम कर्मफल के हेतु वाले मत होना और अकर्म में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।।
अनुचित संकल्प-विकल्प जीवन के विष हैं। आगामी कल की फसल आज के जोतने और बीज बोने पर निर्भर है। उन्नत भविष्य के लिए वर्तमान समय का उपयोग बुद्धिमत्तापूर्वक करना चाहिये। भगवान् का आह्वान है कि मनुष्य को व्यर्थ की चिन्ताओं में प्राप्त समय को नहीं खोना चाहिये वरन् बुद्धिमत्तापूर्वक उसका सदुपयोग करना चाहिये। भविष्य का निर्माण अपने आप होगा और कर्मयोगी को श्रेष्ठ आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होगी ।
संक्षेप में इस उपदेश का प्रयोजन मनुष्य को चिन्ता मुक्त बनाकर कर्म करते हुये दैवी आनन्द में निमग्न रहकर जीना सिखाना है। कर्म करना ही उसके लिये सबसे बड़ा पुरस्कार और उपहार है श्रेष्ठ कर्म करने के सन्तोष और आनन्द में वह अपने आपको भूल जाता है। कर्म है साधन और आत्मानुभूति है साध्य।
ईश्वर का स्मरण करते हुये सभी बाह्य चुनौतियों का तत्परता से सामना करते हुये मनुष्य सरलतापूर्वक शान्ति और वासना क्षय द्वारा चित्त की शुद्धि प्राप्त कर सकता है। जितनी अधिक मात्रा में चित्त में शुद्धि होगी उतनी ही अधिक आत्मानुभूति उसे सुलभ होगी।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।
(2.48)
।।2.48।। हे धनंजय आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाव होकर योग में स्थित हुये तुम कर्म करो। यह समभाव ही योग कहलाता है।।
इस श्लोक में प्रथम बार योग शब्द का प्रयोग किया गया है और यहीं पर उसकी परिभाषा भी दी है कि समत्व योग कहलाता है। इस योग में दृढ़ स्थित होने पर ही निष्काम कर्म किये जा सकते हैं। इसके लिये उपाय है कर्मों के तात्कालिक फलों के प्रति संग (आसक्ति) का त्याग।
यह 'अहंकार' क्या है ? भूतकाल की स्मृतियों और भविष्य की आशाओं की गठरी। इस अहंकार का विस्मरण करके (मैं प्रभु का दास होकर) कर्म करने में ही पूर्ण आनन्द है। ऐसे कर्म का फल सदैव महान् होता है। जीवन में किसी कार्य को पूरी लगन और उत्साह से जब हम कर रहे होते हैं उस समय यदि वहाँ कोई व्यक्ति आकर खड़ा हो जाये तब भी हमें उसका भान नहीं रहता। आनन्द की उस अनुभूति से नीचे अहंकार के स्तर पर उतर कर आगन्तुक को उत्तर देने में भी हमें कुछ समय लग जाता है।
अहंकार को भूलकर (दास बनकर) जो कार्य किये जाते हैंउनमें कर्ता को यश अथवा अपयश की कोई चिन्ता नहीं रहती। क्योंकि फल की चिन्ता का अर्थ है भविष्य की चिन्ता और भविष्य में रहने का अर्थ है वर्तमान को खोना। स्फूर्त जीवन का आनन्द वर्तमान के प्रत्येक क्षण में निहित होता है। कहा जाता है कि प्रत्येक क्षण का आनन्द स्वयं में परिपूर्ण है।
अतः भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन की सभी परिस्थितियों में समान रहते हुये कर्म करने का उपदेश देते हैं।
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः।।2.49।।
।।2.49।। इस बुद्धियोग की तुलना में (सकाम) कर्म अत्यन्त निकृष्ट हैं? इसलिये हे धनंजय तुम बद्धि की शरण लो फल की इच्छा करनेवाले कृपण (दीन) हैं।।
देह से सूक्ष्म इन्द्रिय हैं, इन्द्रियों से सूक्ष्म है मन और मन से सूक्ष्म है बुद्धि -बुद्धि से भी सूक्ष्म है आत्मा (विवेकी-बुद्धि)। बुद्धि का आत्मा (शुद्ध बुद्धि या विवेक-सम्पन्न बुद्धि) के अनुशासन में रहना तथा अन्तर्बाह्य परिस्थितियों का स्वामी होना बुद्धियोग के लक्षण हैं।
जीवन के परम लक्ष्य - आत्मवान बनने के लक्ष्य को आँखों से ओझल किये बिना प्राप्त कर्तव्यों का पालन ही बुद्धियोग है।
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।।2.50।।
।।2.50।। समत्वबुद्धि युक्त पुरुष यहां (इस जीवन में) पुण्य और पाप इन दोनों कर्मों को त्याग देता है, इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ। कर्मों में कुशलता योग है।।
पाप और पुण्य मन की धारणायें हैं और उनकी प्रतिक्रियाएँ मन पर वासनाओं के रूप में अंकित होती हैं।
गीता का मानव मात्र को आह्वान है कि वह केवल इन्द्रियों के विषय नश्वर स्थूल देह और मन के स्तर पर ही न रहे जो उसके व्यक्तित्व का बाह्यतम पक्ष है। इनसे सूक्ष्मतर बुद्धि का उपयोग कर उसको अपने वास्तविक ब्रह्मत्व (आत्मा) को व्यक्त करना चाहिये। प्राणियों की सृष्टि में केवल विवेक-सम्पन्न बुद्धि का होना केवल मनुष्य की विशेषता है। अर्जुन से मानसिक उन्माद त्यागकर वीर पुरुष के समान परिस्थितियों का स्वामी बनकर- आत्मवान बनकर रहने के लिये भगवान् कहते हैं।
उस समय अर्जुन इतना भावुक और दुर्बल हो गया था कि वह अपनी व अन्यों के शारीरिक सुरक्षा की चिन्ता करने लगा था। विकास की सीढ़ी पर मनुष्यत्व को प्राप्त कर जो अपनी विशेष क्षमताओं (विवेक-सम्पन्न बुद्धि) का पूर्ण उपयोग करता है वही व्यक्ति जन्म जन्मान्तरों में अर्जित वासनाओं के बन्धन से (देहाभिमान से) मुक्त हो जाता है। इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ यह भगवान् श्रीकृष्ण का उपदेश है।
इसके पूर्व समत्व को योग कहा गया था। अब इस सन्दर्भ में व्यासजी योग की और विशद परिभाषा देते हैं कि कर्म में कुशलता योग है। इस श्लोक में कहा गया है कि समस्त प्रकार के द्वन्द्वों में मन के सन्तुलन को न खोकर कुशलतापूर्वक कर्म करना ही कर्मयोग है। कर्मयोग की भावना से कर्म करने पर वासनाओं का क्षय होता है। वासनाओं के दबाव से ही मन में विक्षेप उठते हैं। किन्तु वासना क्षय के कारण मन स्थिर और शुद्ध होकरमनन निदिध्यासन और आत्मानुभूति के योग्य बन जाता है।
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्।।2.51।।
।।2.51।। बुद्धियोग युक्त मनीषी लोग कर्मजन्य फलों को त्यागकर जन्मरूप बन्धन से मुक्त हुये अनामय अर्थात् निर्दोष पद को प्राप्त होते हैं।।
देहाभिमान (अहंकार) और स्वार्थ से रहित व्यक्ति ही मनीषी कहलाता है। देह-के साथ तादात्म्य से अहंकार उत्पन्न होता है और वह फलासक्ति के कारण बन्धनों में फँस जाता है। जीवन में उच्च लक्ष्य- (ईश्वर प्राप्ति) को रखने पर ही अहंकार (देहाभिमान) और स्वार्थ का त्याग संभव है।
भौतिक सुखों में लिप्त सांसारिक मनोवृत्ति वाले लोग जानते हैं कि वे वास्तव मे दुःखी हैं किन्तु वे सोचते हैं कि जो अन्य लोग उनसे अधिक समृद्ध हैं, वे सुखी होंगे और इसलिए वे भी सांसारिक सुख सुविधाओं को बढ़ाने की दिशा की ओर निरन्तर भागने में लगे रहते हैं। यह अंधी दौड़ अनेक जन्मों तक चलती रहती है और फिर भी सुख की कोई किरण दिखाई नहीं देती। जब लोगों को यह अनुभव होता है कि सकाम कर्मों में संलग्न होने से कभी भी कोई मनुष्य सुख प्राप्त नहीं कर सकता, तब उन्हें समझ में आता है कि वे जिस दिशा की ओर भाग रहे हैं, वह निस्सार है और फिर वे आध्यात्मिक जगत की ओर मुड़ने के लिए सोचते हैं।
वे बुद्धिमान पुरुष जो आध्यात्मिक ज्ञान से दृढ़-निश्चयी हो जाते हैं वे यह जान जाते हैं कि भगवान सभी पदार्थों के भोक्ता हैं। परिणामस्वरूप वे अपने कर्मों के प्रति आसक्ति के भाव को त्याग कर सब कुछ भगवान को अर्पित करते हैं और सुख-दुःख आदि सभी को समान रूप से स्वीकार करते हैं। ऐसा करने से उनके कर्म अपने फलों से मुक्त हो जाते हैं जो मनुष्य को जन्म और मृत्यु के बंधन मे बांधते हैं।
।।2.52।। जब तुम्हारी बुद्धि मोहरूप दलदल (कलिल) को तर जायेगी तब तुम उन सब वस्तुओं से निर्वेद (वैराग्य) को प्राप्त हो जाओगे जो सुनने योग्य और सुनी हुई हैं।।
स्वरूप से दिव्य होते हुये भी चैतन्य आत्मा मोहावरण में फँसी हुई प्रतीत होती है। इस मोह का कारण है एक अनिर्वचनीय शक्ति माया।
बुद्धि पर आत्मस्वरूप के अज्ञान के रूप में पड़े इस आवरण को वेदान्त में माया की आवरण शक्ति कहा गया है। इस श्लोक में कहा गया है कि कर्मयोग की भावना से कर्म करते रहने पर बुद्धि की शुद्धि होती है और तब उसके लिये सम्भव होता है कि आवरण को हटाकर आत्मस्वरूप का साक्षात्कार कर सके।
आनन्दस्वरूप के अज्ञान के कारण विषयों को पाने के लिये चल रही मनुष्य की भागदौड़ स्वत समाप्त हो जाती है जब वह स्वस्वरूप को पहचान लेता है। कर्मयोगी की बुद्धि न तो पूर्वानुभूत विषय सुखों का स्मरण करती है और न ही भविष्य में प्राप्त होनेवाले अनुभवों की आशा।
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।।2.53।।
।।2.53।। जब अनेक प्रकार के विषयों को सुनने से विचलित हुई तुम्हारी बुद्धिआत्मस्वरूप में अचल और स्थिर हो जायेगी तब तुम योग को प्राप्त करोगे।।
जब पाँचो ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण करने पर भी जिसकी बुद्धि अविचलित रहती है तब उसे योग में स्थित समझा जाता है। सामान्यत इन्द्रियों के विषय ग्रहण के कारण मन में अनेक विक्षेप उठते हैं। योगस्थ पुरुष का मन इन सबमें निश्चल रहता है। उसके विषय में आगे स्थितप्रज्ञ के लक्षण और अधिक विस्तार से बताते हैं।
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्।।2.54।।
।।2.54।। अर्जुन ने कहा -- हे केशव समाधि में स्थित स्थिर बुद्धि वाले पुरुष का क्या लक्षण है स्थिर बुद्धि पुरुष कैसे बोलता है कैसे बैठता है कैसे चलता है ?
इस प्रकरण में स्थितप्रज्ञ का अर्थ है वह पुरुष जिसे आत्मा का अपरोक्ष अनुभव हुआ हो।
प्रचलित वर्णनों के अनुसार नये जिज्ञासु साधक की कल्पना होती है कि ज्ञानी पुरुष इस व्यावहारिक जगत् के योग्य नहीं रह जाता।
।।2.55।। श्री भगवान् ने कहा -- हे पार्थ, जिस समय पुरुष मन में स्थित सब कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है; उस समय वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।
अज्ञान दशा में मनुष्य स्वयं को परिच्छिन्न अहंकार (देहाभिमानी M/F) के रूप में जानता है। इसलिये विषयोपभोग की स्पृहा अपनी भावनाओं एवं विचारों के साथ आसक्ति स्वाभाविक होती है। अज्ञान के नष्ट होने पर यह अहंकार (देहाभिमान) अपने शुद्ध अनन्त स्वरूप में विलीन हो जाता है और स्थितप्रज्ञ पुरुष आत्मा द्वारा आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है।सब कामनायें समाप्तहो जाती हैं क्योंकि वह स्वयं आनन्दस्वरूप बनकर स्थित हो जाता है।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।2.56।।
।।2.56।। दुख में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता सुख में जिसकी स्पृहा निवृत्त हो गयी है, जिसके मन से राग (स्वयं को देह समझने के कारण M/F आकर्षण) भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं ! वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।
स्थितप्रज्ञ का मुख्य लक्षण है आत्मानन्द की अनुभूति द्वारा सब कामनाओं का त्याग। श्रीकृष्ण ज्ञानी की पहचान का दूसरा लक्षण बताते हैं सुख और दुख में मन का समत्व रहना। स्थितप्रज्ञ मुनि वह है जो राग भय और क्रोध से मुक्त है। राग ही निमित्त-वशात् क्रोध के रूप में व्यक्त होता है। श्री शंकराचार्य जी भाष्य में लिखते हैं कि ज्ञानी पुरुष त्रिविध तापों में स्थिरचित्त रहता है। वे त्रिविध दुख हैं (क) आध्यात्मिक शरीर में रोग आदि (ख) आधिभौतिक बाह्य वस्तुओं आदि से प्राप्त जैसे व्याघ्र चोर आदि (ग) आधिदैविक प्रकृति के प्रकोप जैसे भूकम्प तूफान आदि।
ईंधन के डालने पर अग्नि प्रज्वलित होती है। परन्तु ज्ञानी पुरुष में अनेक विषय रूप ईंधन डालने पर भी इच्छा की अग्नि उग्ररूप धारण नहीं करती। ऐसे पुरुष को कहते हैं स्थितप्रज्ञ मुनि।
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2.57।।
।।2.57।। जो सर्वत्र अति स्नेह से रहित हुआ उन शुभ तथा अशुभ वस्तुओं को प्राप्त कर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित (स्थिर) है।।
यहाँ स्थितप्रज्ञ पुरुष की अनासक्ति का वर्णन है। बाह्य विषयों से वैराग्य होने के साथसाथ सभी परिस्थितियों का सामना करने के लिए मन के आन्तरिक सन्तुलन की भी आवश्यकता होती है। शुभ प्राप्ति में हर्षातिरेक का और अशुभ प्राप्ति में द्वेष और विषाद का अभाव ये आत्मज्ञानी के लक्षण हैं।
हमारा जीवन भी शुभअशुभ का मिश्रण है। यह तो उसका स्वभाव ही है। ज्ञानी पुरुष अपने नित्य स्वरूप में स्थित होने के कारण जीवन की उत्कृष्ट एवं निकृष्ट परिस्थितियों में पूर्ण वैराग्य के साथ रहता है।
।।2.58।। कछुवा अपने अंगों को जैसे समेट लेता है वैसे ही यह पुरुष जब सब ओर से अपनी इन्द्रियों को इन्द्रियों के विषयों से परावृत्त कर लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है।।
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।।2.59।।
।।2.59।। निराहारी देही पुरुष से विषय तो निवृत्त (दूर) हो जाते हैं? परन्तु (उनके प्रति) राग नहीं परम तत्व को देख लेने पर इस (पुरुष) का राग (देहाभिमानM/F शरीर का आकर्षण) भी निवृत्त हो जाता है।।
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।।2.60।।
।।2.60।। हे कौन्तेय (संयम का) प्रयत्न करते हुए बुद्धिमान (विपश्चित) पुरुष के भी मन को ये इन्द्रियां बलपूर्वक हर लेती हैं।।
सत्त्व (विवेकशीलता)रज (क्रियाशीलता ) और तम (निष्क्रियता) इन तीन गुणों का प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति के अन्तकरण पर पड़ता है। तमोगुण के आवरण तथा रजोगुण के विक्षेप के कारण जब सत्त्व गुण (विवेक-ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या ?) भी दूषित हो जाता है तब अनेक दुखों को हमें भोगना पड़ता है।
इस श्लोक में स्वीकार किया गया है कि ऐसी स्थिति किसी बुद्धिमान साधक की भी कभीकभी होती है। अर्जुन को केवल इस बात की सावधानी रखने को कहा गया है कि वह कभी अपने मन का बुद्धि पर आधिपत्य स्थापित न होने दे। सावधानी की यह सूचना अत्यन्त समयोचित है।
अध्यात्म साधना का अभ्यास करने वाले अनेक साधकों के पतन का कारण एक ही है। कुछ वर्षों तक तो वे संयम के प्रति सजग रहते हैं जिसके फलस्वरूप उन्हें आनन्द भी मिलता है। तत्पश्चात् स्वयं पर अत्यधिक विश्वास के कारण तप के प्रति उनकी जागरूकता कम हो जाती है और तब स्वाभाविक ही इन्द्रियाँ बलपूर्वक मन को विषयों में खींच ले जाती हैं और साधक की शान्ति को नष्ट कर देती हैं।
3.प्रारब्ध के चक्र को कैसे समझें ?।। Yug-Purush।। How to understand the cycle of destiny?
कई बार बीज को देखकर भी यह पता नहीं चलता कि इस बीज में क्या छिपा हुआ है ? बीज को भी पता नहीं होता है , बीज को देखके दूसरे लोग भी नहीं जान सकते कि बिज में क्या छिपा हुआ है ? बचपन में मैं यमुना नदी में खड़े-खड़े जाप करता था। तब मुझे कुछ ज्ञान नहीं था , कुछ भी पता नहीं था। जैसे तुम्हारे बच्चे तुम्हें पूजा करते देखते हैं , तो वे भी आरती घुमाते हैं। वे भी पैर छूले ते हैं , मंदिर चले जाते हैं। ऐसे ही मैं भी कम बुद्धि वाला लड़का था। मुझे आता वाता कुछ नहीं था , पर सुना था कि भजन करना चाहिए, तप करना चाहिए (भगवान कृष्ण को भोग देना चाहिए , उनको प्रणाम करके सोना चाहिए) को तो करने लगे थे। कुछ अवतारी पुरुषों को छोड़कर बाकी सभी सामान्य साधक मेरी ही तरह के होते हैं। फिर गुरु महाराज (स्वामी विवेकानन्द) के विषय में सुना कि उनका दर्शन करने से आदमी तर जाता है।( दादा कहते थे - विवेक-दर्शन का अभ्यास करने से विवेक-स्रोत (source of wisdom) उद्घाटित हो जाता है!) तो तरने के चक्कर में फिर गुरुदेव के पास चले गए। तरने की जरूरत क्यों पड़ी ? ये भी भोन्दुपन के कारण। बचपन में सब चीजें बच्चा स्वीकार करता है। बचपन में आप को जब 'क' को मानना सिखाया गया था , तो क्या आप जानते थे कि 'क' को क ही मानना चाहिए ? क्या आप जानते थे - कि क , ख , ग ही क , ख , ग होता है ? नहीं जानते थे। जो कहा वो मान गए। बचपन में सबसे बड़ी अच्छाई है कि जो बड़े कहते हैं , घरवाले कहते हैं , सर्वोपरि माँ जो कहती हैं - जिनको अपना मानकर विश्वास करता है , वो जो कहती है , उसको मान लेता है। जाति -धर्म हमने कहने से माना। भगवान को प्रणाम करना हमने कहने से मानी। मैं और तुम कोई विशेष फर्क वाले नहीं हैं। मुझ्रे भी तुम अपनी तरह ही बुद्धू मानलो। या मैं अपनी तरह तुम्हें भी बुद्धू मानता हूँ। मैं अपने कोई ज्ञानी नहीं समझता , न तुम्हें ज्ञानी समझता हूँ। तरने की बात माननी पड़ी - कि हमने जानवरों को मारते देखा। सूअर को मारते देखा। मछली को मारते। दूध दूहने या , हल चलाते समय डंडे से पीटते। इक्के के घोड़े को देख कर इतना लगने लगा था कि इनको तकलीफ हो रही है। और घरवालों से, गाँव वालों से सुना था कि कर्मों का फल भोगना पड़ता है। बस इतनी सी बात थी , बच्चे थे मान गए। आप लोग तर्क करते होंगे , मेरे मन ने मान लिया कि अगर बुरा करेंगे तो हमको भी यही भोगना पड़ेगा। (4:10) और जन्म आदि होते रहते हैं , जैसा करेंगे -वैसा भरेंगे। बचपन में ही यह बात मन में बैठ गयी। कि कुत्ता न बनें , मछली न बनें , गधा न बनें , घोड़ा न बनें। मारे न जाएं। बैल न बनें। बैल पर लाद दिया , चढ़ाई है। जीभ बाहर निकालता है , फिर भी उसे मारते हुए ले जाते हैं। ये हमने अपने आँखों से देखा था , वो बता दें। और जो सुनने से ठीक लगा वो बता दिया। बुरा काम न करें , तो भजन करने लगे। लेकिन जन्म पर जन्म लेंगे तो सुधार होता जायेगा। लेकिन मन तब शेखचिल्ली जैसा था , सोचने लगे जब जन्म पर जन्म लेते रहेंगे तो किसी जन्म में गड़बड़ी क्या नहीं होगी ? जब जन्म होगा तो हमसे पाप भी होगा। ऐसा तो मनमें बन गया था कि इस जन्म में पाप न करेंगे। लेकिन हर जन्म में क्या होगा ? ये तो नहीं जानते? ज्यादातर बड़े आदमी ही बुरा करते थे। बचपन में मैंने अनुमान लगाया जो (मुख्यमंत्री पुत्र, या धनी थे ) वे ज्यादा अत्याचार करते थे। जो ताकतवर थे ये ज्यादा अत्याचारी थे। तब लगा अच्छा काम करेंगे तो बड़े बनकर हमभी गड़बड़ करेंगे। तो दुदर्शा होगी , जिसका जन्म-मरण ही नहीं होता , वहाँ पहुँचने से ही बात बनेगी। वो कैसे होगा ? तो सुना की , जिसको भगवान मिल जाते हैं , उसको फिर जन्म-मरण के चक्कर में नहीं फँसना पड़ता।
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।15.6।।
जिनको परम धाम की प्राप्ति नहीं होती उनको आना-जाना पड़ता है। फिर सोचा भगवान कैसे मिलें ? तो सोंचा गुरु के मिलने से मिलते हैं। एक पुस्तक में पढ़ा गुरुदेव का नाम कि उनके दर्शन करें तो चित्त निर्मल हो जाता है , परमात्मा मिल जाता है। तो उनकी बातें सुनने चले गए।
(विवेकानन्द जी से सुना कि गुरु ठोक-बजा कर करो, तो गुरु खोजने हरिद्वार चला गया। देवराहा बाबा से मिला। और वापस आकर गुरुदेव से दीक्षा लेने का फॉर्म भर दिया।)
जब तुम्हें शादी की जरूरत थी तब तुमने यह कभी नहीं कहा कि विवाह पाखण्ड है , या बन्धन में बँधने जैसी बात है ? (6:33) फेरे लेने से , चक्कर लगाने से भी क्या कहीं शादी हो जाती है ?आपने भी चक्कर लगा के शादी की या नहीं ? आपने क्या किया था , क्या आपने चक्कर नहीं लगाए थे ? विवाह-बंधन को मान लिया था या नहीं ? जो जरूरत होती है आदमी मान जाता है। शादी की जरूरत होती है , तो पंडित चक्कर लगवा देते हैं , आप मान लेते हैं। विवाह हो गया , अब ये जिंदगी भर की परमानेंट पत्नी हो गयी।
हमको भी ऐसा ही लगा कि अगर जन्म-मरण से मोक्ष चाहिए , तो गुरु से मिलने से होता है। इसलिए वहाँ गए। उनकी बातें बहुत अच्छी लगीं। यहाँ तक तो हमारी हालत बता दी। एक सम्माननीय साधक ने कहा अब आप आनंद लें। तब मैंने कहा भैया अभी मैं आनंद का ठेका नहीं लेता।
अस्पताल जब जाते हो , तो वहाँ ऑपरेशन के पहले और बाद में इंजेक्शन लगता है , बेड पे लेटना पड़ता है। ऑपरेशन के बाद रिकॉवरी रूम में जब तक हो - भारी कष्ट झेलना पड़ता है, उस समय भी क्या आनंद ही होता है ? आनंद के लिए ही ऑपरेशन तो होता है , पर उस समय भी आनंद होता है। यह कोई डॉक्टर नहीं कहता। अब तुम चाहो उसी दिन आनंद मिल जाये , तो ऐसा नहीं होता। पर यदि चाहते हो हॉस्पिटल से ठीक होकर घर लौट जाएँ , परमात्मा तक की यात्रा हमारी सुखद हो। तो अभी बैठे रहो। बाकी आज ही अच्छा लगे यह मैं नहीं कहता। कुछ बुरा-बुरा भी कहूँगा। सब अच्छा -अच्छा नहीं कहूंगा। शुरू -शुरू में लोगों को अच्छा कहकरके पटना पड़ता है। यदि डॉक्टर शुरू में ही बुरा बोल दे तो कई रोगी कहेंगे , भले ही मर जाएँ पर उस डॉक्टर के यहाँ नहीं जायेंगे। कई बार नाक के लिए घर में तलाक हो जाती है। मान-अपमान में तलाक की नौबत भी आ जाती है। हम तुम्हारा अपमान नहीं करेंगे , पर हर बात तुम्हें अच्छी ही लगे ये जरुरी नहीं है। डॉक्टर परहेज भी बताते हैं , पर रोगी परहेज करना नहीं चाहते। लेकिन अगर अपना इलाज चाहते हो तो सब स्वीकार करते हो। यदि आप मुक्त होना चाहते हैं , तब कुछ कहूंगा , तो मानना पड़ेगा। और यदि मुक्त होना नहीं चाहते , तो और जन्म होते रहेंगे। कभी न कभी जब तुम दुखी हो जाना और दूसरों की दुर्दशा देख लेना , फिर जब मन करे , तब इस रस्ते पर आना। दूसरे जन्मों में वर्तमान गुरु नहीं मिलेंगे ? लेकिन कोई न कोई गुरु हर जन्म में मिलता है। जब वर्तमान गुरु नहीं थे , तब पहले भी लोगों को गुरु मिलते रहे हैं। युगों -युगों से दुनिया चली आयी है , संत मिलते ही रहते हैं। गुरु तारते आये हैं , लोग तरते आये हैं। और सब कभी नहीं तरे। नहीं तो वर्तमान गुरु होते ही नहीं। कोई भी गुरु सबको तार नहीं पाया। (10:19) बहुत से लोग गुरुओं के उपदेश पर नहीं चलते , शास्त्र को नहीं मानते। तो इस जन्म में अगर न भोगना पड़े तो ,अगले जन्म में भोगना पड़ेगा। [बड़े घरन की स्त्रियाँ संतन से शर्माये ,पिक्चर से न शर्माए ?? सेही कारण कुतियाँ भईं घर-घर डंटा खायें। ] सब यदि गुरु के पास आ जावें तो कुत्ता कौन बनेगा ? गधा कौन बनेगा ? वही बनेंगे जिनको गुरु के पास नहीं आने का मौका मिलता है। जिसको पाठचक्र में मन नहीं लगता ? आपने भी जरूर सुना होगा कि पाप जब ज्यादा होता है -तो कथा अच्छी नहीं लगती। लगता है ठाकुर के पास से उठकर भाग जाओ। पर मन लगने लग जाये तो समझो भक्ति आ गयी -
प्रथम भगति संतन कर संगा।
दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।
पहले तो संत अच्छे लगें। फिर संत जो कथा सुनावें वो अच्छी लगे।
गुर पद पंकज सेवातीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तज गान।।
अभिमान छोड़के संतों की सेवा करें, तीसरी भक्ति अमान। बिना बड़पन्न दिखाए , विनम्र होके सन्तों की सेवा करें।
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा |
पंचम भजन सो बेद प्रकासा ||
छठ दम सील बिरति बहु करमा |
निरत निरंतर सज्जन धर्मा ||
सातव सम मोहि मय जग देखा |
मोते संत अधिक करि लेखा ||
आठव जथा लाभ संतोषा |
सपनेहु नहिं देखहि परदोषा ||
नवम सरल सब सन छनहीना |
मम भरोस हिय हरष न दीना ||
नव महुं एकउ जिन्ह कें होई ।
नारि पुरूष सचराचर कोई ॥
मम दरसन फल परम अनूपा |
जीव पाइ निज सहज सरूपा ||
सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम |
ते नर प्राण समान मम जिन के द्विज पद प्रेम ||
यह पंक्तियाँ प्रभु श्रीराम ने माता शबरी को नवधा भक्ति (नौ प्रकार की भक्ति) का ज्ञान देते हुए कही थीं। "प्रथम भगति संतन्ह कर संगा" रामचरितमानस में वर्णित 'नवधा भक्ति' का पहला चरण है, जिसका अर्थ है ईश्वर (श्री राम) के भक्तों या संतों का सत्संग करना। इसका अर्थ है कि भगवान तक पहुँचने का सबसे पहला और मुख्य मार्ग सज्जनों की संगति है, जहाँ से भक्ति के भाव और ज्ञान प्राप्त होते हैं। संतों के साथ रहने से मन शुद्ध होता है, आत्मा (ईश्वर, पवित्र त्रयी) के प्रति प्रेम जागृत होता है और सांसारिक मोह-माया कम होती है। बाकी लम्बी कथा आज नहीं करेंगे। तीन बातें सार रूप में बता देंगे। (12:07) बीजरूप में आज सब कहेंगे। फलफूल कल कहेंगे।
आत्मविकास में सबसे बड़ी बाधा है -देहाध्यास M/F अपने को केवल स्त्री-पुरुष शरीर समझ लेना। मैं देह हूँ , इस मान्यता का नाम है , देहाध्यास। मैं स्त्री-पुरुष हूँ ऐसा लगना अध्यास है।
जीव जबतें हरितें बिलगान्यो। तबतें देह गेह निज जान्यो।
मायाबस स्वरूप बिसरायो। तेहि भ्रमतें दारुन दुख पायो।।
पायो जो दारुन दुख, सुख लेस सपनेहुँ नहिं मिल्यो।
भव सूल, अनेक जेहि, तेहि पंथ तू हठि हठि चल्यो।।
बहु जोनि जनम,जरा, बपति, मतिमंद ! हरि जान्यो नहीं।
श्रीराम बिनु बिश्राम मूढ़ ! बिचार, लखि पायो कहीं।।
------ श्रीश्रीविनयपत्रिका।
"हे आत्मा! जब से तुम भगवान से अलग हुई हो, तुमने इस शरीर को अपना घर मान लिया है। माया के प्रभाव में आकर, तुम अपने सच्चे 'सत्-चित्-आनंद' स्वरूप को भूल गई हो, और इस भ्रम के कारण तुम्हें भयानक कष्ट सहने पड़े हैं। तुमने बार-बार जन्म और मृत्यु का असहनीय दर्द सहा है। सुख का तो नामोनिशान भी नहीं है, सपने में भी नहीं। तुम हठपूर्वक अनगिनत सांसारिक कष्टों और दुखों से भरे रास्ते पर चलती रही। तुमने कई जन्मों तक भटकती रही, बूढ़ी हुई, कई विपत्तियाँ सहीं, और मर गई, लेकिन हे मूर्ख! इन सबके बाद भी तुमने श्री हरि को (पवित्र त्रयी को ) नहीं पहचाना! हे भ्रमित बुद्धि /मूढ़बुद्धि / सम्मोहित बुद्धि! सोचो और देखो, क्या भगवान को छोड़कर किसी को कहीं भी सच्चा सुख और शांति मिली है?" ||
यह अंश श्री गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्री विनय पत्रिका से लिया गया है। यहाँ, श्री गोस्वामी जी,हम जैसे जीवों के दुख से द्रवित होकर, मार्गदर्शन देते हुए कहते हैं:
जब से जीव ने (अविवेकी मनुष्य ने) देह को अपना घर मान लिया , तभी से जीव (आत्मा) चैतन्य होकर भी जड़ प्रकृति (मूढ़बुद्धि) के पंजे में फंस गयी। देह को मैं मानने से जीवभाव - जीवभाव क्या है ?
जीव धर्म अहमिति अभिमाना ॥७॥
(बालकाण्ड)
मैं M/F शरीर हूँ इस अभिमान का नाम जीव है। यदि जीव में यह अभिमान न रहे कि मैं जीव हूँ; तो वह मुक्त हो जाये। देह को ही 'मेरा' और 'मैं' मान लेता है। भगवान सारी सृष्टि में रहते हैं वे अहंता ममता से मुक्त हैं।
मैं अरु मोर तोर तैं माया।
जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।
(रामचरितमानस : अरण्य कांड।)
श्री राम ने लक्ष्मण को समझाते हुए कहा : मैं और मेरा, तू और तेरा- यही माया है, जिसने समस्त जीवों को वश में कर रखा है।
डरना मत ! पहले यह समझो देहाध्यास का हमारे लक्षण क्या हैं ? और इससे बचना कैसे है ? इसका उपाय है। लेकिन हम पहले यह स्वीकारें कि हमें M/F होने का भ्रम होता है। और जैसा हमको लगता है , यह हमारे ऋषियों को हमारे गुरुओं को पता था। इसलिए उन्होंने बताया -ऐसा जिसको लगता है , वे विवेकी-मनुष्य नहीं जीव कहलाते हैं। देहाध्यास होना परमत्मा की दैवी मायाशक्ति है। कोई जन्म-जन्मांतर से योगी हैं वे यहाँ मुक्त होकर आते हैं। (14:20) हमको तारने आते हैं। हमलोग तो वासनाओं में बंधे पशु हैं। कर्मों का फल भोगने आये हैं। शरीर का नाम ही भोगायतन है। यह शब्द याद रखने लायक है, भोग-आयतन। यह शरीर सुख-दुःख भोगने के लिए मिलता है। शादी के पहले यदि पत्नी यदि मर जाती , तो उसके दुःख से तुम दुखी नहीं होते। या पति मर जाता तो उसे पत्नी को दुःख न होता। जब प्रारब्ध खोटा होता है , तब वैसा ही संयोग मिल जाता है। जैसे -जैसे कर्म का फल भोगना होता है , वैसी -वैसी परिस्थिति आती है। अच्छी जगह शादी न होगी , जहाँ न होना चाहिए वहीँ हो जाएगी। देखोगे 100 जगह , पर पुत्र का और तुम्हारा जैसा ग्रहयोग होगा , शादी वहीं होगी। 30 -35 की लड़की को लड़का नहीं मिलेगा। बुढ़िया को लड़का कहाँ से मिलेगा ? बच्चियों की भी गलती नहीं है , उनका प्रारब्ध ऐसा ही था। नहीं मिलना था।
तुलसी जस भवितव्यता, तैसी मिलै सहाय।
आपु न आवै ताहि पै, ताहि तहाँ लै जाय।।
गोस्वामी जी कहते हैं कि जैसी होनहार होती है मनुष्य को वैसी ही सहायता प्राप्त हो जाती है। होनहार स्वयं मनुष्य के पास नहीं आती प्रत्युत उसे ही स्वयं खींच कर वहाँ ले जाती है। भाव यह है कि होनहार या भाग्य के आगे किसी का कुछ वश नहीं चलता।
जब राम का बनवास होना था , तब सरस्वरती ने मंथरा की बुद्धि फेर दी। मंथरा ने नौकरानी होकर भी मालिकन की बुद्धि फेर दी। जो सेवा में रहते हैं , वे बड़े खतरनाक होते हैं। नवनीदा के PA, चेले या नौकर बड़े खतरनाक होते हैं। चौटाला ने एक बार हरियाणा में मंदिर गिरवा दी। जैसा प्रारब्ध होता है , वैसा सब योग मिल जाते हैं। हम जब जन्म लेते हैं , तो अपने कर्मों के अनुसार -स्थान , शरीर , परिवार सब मिलता है। गुरुदेव (स्वामी विवेकानन्द) ने पहले पहचाना, वे तो त्रिकालाज्ञ होते ही हैं। अंदर कुछ बीज अच्छा पड़ा होगा। मुझे इंगिलश नहीं आती है , विदेश चला गया। भारतीय मुझे नहीं मानते नहीं , और जिनको हिन्दी नहीं आती वे मेरे पीछे पड़े हैं। अभी हाल में 19 अमेरिका से आये थे , और 17 रूस से आये थे। 5 दिनों के ध्यान शिविर में भाग लिया। (19:08) जिनका जिनका प्रारब्ध है , उनका उनका जुगाड़ बैठ गया। घबड़ाओ मत , ज्योतिष को और प्रारब्ध को ठीक से समझ ले व्यक्ति तो दुखी नहीं होगा। मानलो बहु खोटी है बुरा बोलती है तो तुम दुखी हो जाते हो। बहु बनके तुम्हारे खोटे कर्म ही तुम्हारे सामने आये हैं। तुम्हारे कर्म दुःख दे रहे हैं , बहु थोड़े दे रही है। आरोप बहु पर लगाते हो , तुम्हारे कर्म कुछ नहीं थे ? ऐसे ही बहु आ गयी ?
सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥171॥
मुनिनाथ ने बिलखकर (दुःखी होकर) कहा- हे भरत! विलाप न करो ! सुनो, भावी (होनहार) बड़ी बलवान है। हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-पयश, ये सब विधाता के हाथ हैं॥171॥ अभिनय में सब पहले से निश्चित रहता है। कब उठना है , कब लड़ना है ? अभिनेता को पहले से पता होता है। तुम्हें अभी परसों क्या होगा ? पता नहीं है। जैसे प्रत्येक मनुष्य का मरना निश्चित है , मरना कच्चा है कि पक्का ? पर किस दिन मरना है ? और कहाँ मरना ? रोड में कि अस्पताल में, या कि घर में, नाव में , कि ट्रेन में , की जहाज में ? ये किसीको नहीं पता। मुझे भी नहीं पता है। हमें पता नहीं है कि किस दिन क्या होगा ? लेकिन हम इतने ज्ञानी नहीं हैं। हमको ये पता नहीं है कि किस दिन क्या होगा ? लेकिन जो जो होगा , या होता जा रहा है , उसे स्वीकार कर रहे हैं। (22:00) जो होगा वो निश्चित है। वो होगा !
राजी हैं हम उसी में जिस में तेरी रजा है।
जैसे प्रोड्यूसर ने रंगमंच बनाया , जो नाटक कम्पनी चलाता है वो जाने। अभिनेता को सिर्फ अपना अभिनय करना है। जो हमें पाठ दिया गया है करेंगे। हमलोग केवल अभिनेता हैं , हमारे पीछे निर्देशक है। हम सब ऐक्टर हैं , पर हमें ये पता नहीं है कि कल कौन सी एक्टिंग है ? रामकृष्ण मिशन के स्वामी आत्मानन्द जी हमारे सम्पर्क में थे। कानपूर के हमारे सम्मलेन में आये। पर इस साल के पहले हमने सोचा भी नहीं था कि रायपुर आएंगे। निश्चय किया था जिसने वही खिंच कर ले लाये हम नहीं आये। वही डॉयरेक्टर घुमाता रहता है। जिस दिन तुम ये जान जाओगे कि कोई डायरेक्टर है हम सिर्फ एक्टर हैं। और केवल ऐक्टर ही हैं , यहाँ कुछ लाभहानि नहीं है। एक्टिंग करने वाला मरने की एक्टिंग कर ? कि गरीबी की करे ? शादी की ऐक्टिंग करे। अमीर बन जाये , राजा बन जाये। वो एक्टिंग ही करेगा। होता -वोता कुछ नहीं है। क्यों ? क्योंकि वो एक्टर है , देहधारी M/F का अभिनय कर रहा है। हम भी कोई दुःख-सुख भोगने नहीं आये हैं , आप अपने को एक ऐक्टर मानकर एक्टिंग करोगे तो सुखी रहोगे। भगवान या ज्योतिष के अनुसार हमको काम सौंपा है , काम कर रहे हैं।
ये ना पूछो के मरकर किधर जाएंगे वो जिधर भेज देंगे उधर जाएंगे !
कोई प्रवचन ऐसा नहीं जो तुम्हें थोड़ा आता न हो। (24:06 ) इधर (रायपुर) में भेज दिया तो इधर आना पड़ा। गोंदिया तो गुरुदेव आते थे। अब राजनन्द गाँव आये , रायपुर आये। भण्डारा आये और अभी बालाघाट जाना है। यहाँ जिनका समय आ गया होगा , वही मुझे प्रेम से सुनेंगे। क्योंकि अगर यहाँ सबकुछ हमारे चाहने से हो , तुम्हारे चाहने से , तो तुम कभी बूढ़े न होते। कोई बूढ़ा होने की इच्छा नहीं करता , लेकिन होना पड़ता है। मेरे चाहने से मेरा शरीर जैसा चाहूँ वैसा नहीं रहता। हम केवल यही कर सकते हैं कि हम चाहना ही छोड़ दें। अभी भगवान जैसा अभिनय करवाएं करते रहें। जिस दिन शरीर छोड़वायें , छोड़ देंगे। बोरिया-विस्तरा बांध कर जाने के लिए हम तैयार रहें बस।
हम अपने कहें कि हम अभी नहीं जायेंगे। पर उनका निर्णय हो जाये तो लोग ऑक्सीजन (Oxygen) चढ़ाते रहें। यदि वो कह देंगे आ जाओ , तो गए। तो हम नहीं रोक सकते डॉक्टर नहीं रोक सकते। डॉक्टर अगर रोक सकते तो अपने घर वालों को तो रोक ही लेते। एक वैद्य का लड़का नहीं रहा। विवाह हो चुका था। मातायें उसको चूड़ी फोड़ने ले गयीं। एक जुलाहे की घरवाली ने पूछा ये क्या रिवाज है ? विधवा की चूड़ी फोड़ने जाना है , तो वो भी चली गयी। जब उसकी चूड़ी फोड़ी जा रही थी , तब जुलाहे की घरवाली ने अपनी चूड़ी फोडनी शुरू कर दी। तेरा कौन मर गया ? तू क्यों चूड़ी फोड़ रही है ? उसने कहा जब -वैद्य जी का लड़का मर गया तो मेरा तो मेरा मरा हुआ ही है। तो जब वैद्य नहीं बचा सका , तो हम भी तैयार हैं -चूड़ी फोड़ ही लेते हैं। समझदार लोग पहले से तैयार रहते हैं। (27:51) जब जुलाहा गर्मी में अंगीठी ताप रहे हैं , तो ठंढी में तो मर ही जायेंगे। तो आप क्या समझते हो ? यहाँ है कोई जो रह जायेगा ? क्या गुरुदेव बुढ़ापे को रोक लेंगे ? गुरुदेव की कथा सुनने से क्या होगा ? जो हमने समझा है , वो तुम भी समझ लो बस। अगर गुरुदेव अपने को बचाकर नमूना दिखाते , तो तुम मेरे शिष्य बनते तो ठीक है। गुरूजी ने बुढ़ापा नहीं आने दिया , तो इनका चेला बनना ठीक था। हम किसी को बचायेंगे नहीं - हाँ हम देहाध्यास ( जिवाध्यास जीवभाव M/F देहाभिमान) छुड़ा देंगे। तुमको ब्रह्माध्यास बतायेंगे। जिससे हम मुक्त हुए हैं , वही तुम्हें बतायेंगे। हम तुम्हारे सिर पर हाथ रखकर भाग्य बदल देंगे। मातायें बच्चे के सिर पर हाथ रखवाती हैं। हमारी माँ ने भी हाथ रखाया होगा। हम तो पैदा ही वरदान से हुए हैं। हमारी माँ के 11 -12 मर चुके थे। फिर देवी-देवता मनाया तो कोई देवी खुश हो गयी। फिर हम बचे हुए हैं। चलो बच गए। पर बकरे की मम्मी कब तक खैर मनाएगी ? हाँ हमभी अगर जल्दी मरते तो ठीक नहीं लगता। हम तो बूढ़े होकर जायेंगे। लकिन
आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर।
एक सिंहासन चढ़ी चले, एक बँधे जात जंजीर।।
मैं वही कथा कहता हूँ , जो तुम्हें मालूम हैं। नई कथा कहने को साधु के पास कुछ है ही नहीं। कपड़ा फिसल गया नदी में तो एक पत्थर पर साबुन रगड़ रहा था। तुम यहाँ बैठे हो तो मन कहीं चला गया , तो नहीं समझोगे। एकबार यदि समझ जाओ , तो मुक्त हो जाओ।
रायपुर के कुछ लोग कहते हैं , हमें मुक्त कर दो। मैं इसी इरादे से आया भी हूँ कि मैं तुमको मुक्त ही कर दूँ। वही ग्रन्थ ,हैं वही उपनिषद हैं , वही गीता है। बस जहाँ तुम्हारा ध्यान नहीं जाता - वहाँ तुम्हारा ध्यान ले जाना चाहता हूँ। तुमको तुम्हारी बुद्धि फिर कभी धोखा नहीं दे सके तुम्हारा ध्यान वहाँ ले जाना चाहता हूँ। वैसे ही जवानी-बुढ़ापा नींद सबका होता रहता है।
फिरभी यदि मैं मुक्त हूँ , तो मैं तुम्हें मुक्त कर दूँगा। बस इतनी ही। पर यदि तुम्हारी समझ में मैं ही मुक्त नहीं हूँ , तो ये तुम्हारी समझ का मामला है , श्रद्धा इसी को कहते हैं। तुम्हारी समझ में यदि मैं मुक्त हूँ , तो तुम्हें बताऊँगा कि मुक्ति का अर्थ क्या है ? शादी के लिए पढ़ते हैं , मुक्त होने के लिए पढ़ते हैं ? सभी लोग मोक्ष भी नहीं पाना चाहते हैं। दर्शन करने आये हो , थोड़ा पुण्य हो जायेगा।
संत दरस जिमि पातक टरई॥3॥
संत के दर्शन से कुछ पाप कट जाते हैं। इसलिए जिसने संत नहीं देखा उसकी आँखे मोर के पंख जैसे हैं। भागवत कथा परीक्षित ने केवल एक बार सुना , वो तर गया। तुमने तो कई भागवत कथायें सुनी होगी ? जो भागवत तुमने सुनी , वही भागवत परीक्षित ने भी सुनी। वही गीता सुनके अर्जुन तर गए।
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।।18.73।।
गीता के वही श्लोक हैं , जिसको सुनकर अर्जुन कहता है मैं धन्य हो गया , मुझे स्मृति आ गयी । मैं अपने-आप में स्थित हो गया। (मेरी बुद्धि देहाध्यास छोड़कर आत्मा में स्थित हो गयी ?)
कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ॥.
कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा॥5॥
मैं न तो कवि हूँ, न चतुर कहलाता हूँ, अपनी बुद्धि के अनुसार श्री रामजी के गुण गाता हूँ। कहाँ तो श्री रघुनाथजी के अपार चरित्र, कहाँ संसार में आसक्त मेरी बुद्धि !॥5॥। (देह, इन्द्रिय, मन से सूक्ष्म बुद्धि उससे भी परे आत्मा है) अपनी समझ के अनुसार मैं चालाकी नहीं करता। बेईमानी नहीं करता , जितनी मेरी समझ है , ईमानदारी से मैं परमात्मा (अवतारवरिष्ठ) के गुण गाता हूँ। अपनी समझ में मैं बेईमानी नहीं करूँगा। जो जानता हूँ , दो टूक कहूँगा। जरा भी पर्दा नहीं।
गूढ़उ तत्त्व न साधु दुरावहिं। आरत अधिकारी जहँ पावहिं॥
संत लोग जहाँ आर्त अधिकारी पाते हैं, वहाँ गूढ़ तत्त्व भी उससे नहीं छिपाते। गूढ़ से गूढ़ रहस्य साधु नहीं छुपाते। कब ? जब आर्त अधिकारी , दुखी व्यक्ति मिल जाये , उसके लिए चाहने वाला मिले। तड़प रहा हो, बीमार हो तो वैद्य दवा देते हैं। साँप काटा हो तो झाड़ने वाला मंत्र से झाड़ते हैं नहीं तो उसकी विद्या नष्ट हो जाती है। इसीतरह कोई ब्रह्मज्ञानी अगर किसी जिज्ञासु को , जरूरत-मंद को यदि ब्रह्मविद्या नहीं सुनाता हो , तो उसकी ब्रह्मविद्या की शक्ति नष्ट हो जाएगी। इसलिए (जिसका देहाध्यास चला गया हो और जो स्थित प्रज्ञ हो उसे )जिज्ञासु के साथ कपट नहीं करना चाहिए। लेकिन जो पात्र ही नहीं है , उसके लिए ज्ञानी भी क्या करेगा ? सुबह योग की क्लास है , उसमें बूढ़ा, बच्चा , स्त्रियाँ सभी आ सकता है। बूढ़ों के जैसा आसन -हम भी कर लेते हैं। ध्यान के लिए योगदर्शन के तीन सूत्र हैं - योगः चित्तवृत्ति निरोधः ! 'तदा द्रष्टुः स्वरूपे-ऽवस्थानम्' (योग सूत्र 1.3)-जब वृत्ति का निरोध होता है , तब द्रष्टा (=शुद्धबुद्धि) अपने स्वरुप में (आत्मा में या ईश्वर में) स्थित हो जाता है , अभी हमारी मूढ़बुद्धि, इन्द्रियों में स्थित है, विषयों में स्थित है। अभी हमारी मूढ़बुद्धि (सम्मोहित बुद्धि) जीव-देह में (M/F शरीर में स्थित है) लेकिन 'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' ! जब वृत्तियों का निरोध होता है , तब जीव (अहं बुद्धि) अर्थात द्रष्टा अपने स्वरुप में अर्थात , अपने अधिष्ठान आत्मा में (परमात्मा, ईश्वर, ब्रह्म में) स्थित हो जाता है। तीसरा सूत्र है - यदि जीव चित्त वृत्तियों का निरोध नहीं करे , तो क्या होगा ? तो कहते हैं - 'वृत्ति सारूप्यम् इतरत्र' अन्य सभी अवस्थाओं में वृत्ति के अनुसार हो जाता है। तुम दुखी होते हो तो क्यों होते हो ? 'वृत्ति सारूप्यम् ! जैसी मति वैसी गति। वृत्ति दुःखाकार हो गयी है। तो दुःखी हो गए , निद्रा वृत्ति हो गयी तो सो गए। सुखानुभूति हो गयी तो सुखी हो गए। पैसा बढ़ गया , तो धनी हो गए। ऐसा लगता है कि नहीं ? झूठ नहीं बोलना। धनी होने पर क्या होता है ? भूख ज्यादा लगती है ? हाजमा जायदा हो जाता है ? बुढ़ापा नहीं आता ? धनी होने का लाभ क्या है ? मुझे ये बताओ। दिमाग में सिर्फ ये अहंकार का भूत चढ़ जाता है कि मैं बड़ा आदमी हो गया ! बड़े होने का एक मानसिक वृति बनती है। बाकी तो बड़े होने का कोई लाभ नहीं है। मैंने तो सन्तों से सुना था , जो ये दहीबड़े होते हैं न, जो उड़द की दाल से बनते हैं। हमारे सन्त कहते थे बड़े ऐसे नहीं बनते , पहले पीसा जाता है। फिर तले जाते हैं , फिर मट्ठे में डाले जाते हैं। ऐसे बड़े बनते हैं। और बड़े बनने का लाभ क्या है ? (38:22) लोगों के बीच सिर्फ एक अभिमान के सिवा - कि मैं बड़ा हूँ ! जिमखाना का मेंबर, रोटरी का मेंबर को मरने में कुछ तो फर्क पड़ता होगा क्या ? अमीर आदमी कैसे मरता है ? और बड़े आराम से मरता है ? बल्कि गरीब शायद आराम से मरता हो , जितने बड़े हैं , वही ज्यादा चिन्ता से मरते हैं। गुरु ग्रंथ साहिब में कबीर जी का एक शब्द है"बड़े-बड़े जो दीसै लोग, तिन कउ व्यापे चिंता रोग"। एक हँसी की बात बताऊँ ? मुझे लोग बिगड़ा नल कहते हैं - जो बहता ही रहता है। कोई प्यासा हो न हो , बह रहा है। आज भूमिका बना दी है। अभ्यास कल कराउंगा। ध्यान में आइये -जिसका नहीं लगा उसका भी लगेगा उसका भी लगेगा ये हमारी जिम्मेदारी है। (39:32) तुम पढ़े हो या नहीं पढ़े हो , बल्कि बड़े बड़े सन्त अवतारी पुरुष ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं होते हैं। गुरुनानक देव जी कोई बहुत पढ़ेलिखे नहीं थे। ठाकुर देव भी पढ़े नहीं थे? हस्ताक्षर भी ठीक से नहीं कर पाते थे। उनके चेला (विवेकानन्द) के हम चेला हैं। तुम पढ़े हो या नहीं पढ़े हो हमारा काम है उधर ले चलना। कबीर साहेब के ऊपर phd होता है। ये कोई पढ़े की विद्या नहीं है। कबीर साहेब ने तो कह दिया -
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान (ब्रह्मविद) न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप (देहदृष्टि नहीं -अद्वैत दृष्टी-एकत्व की दृष्टि , कोई पराया नहीं , सभी अपने हैं।) पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा। आप साधना में लग जाओगे तो आपका जीवन धन्य हो जायेगा।
आपका विश्वास यदि बच्चे की तरह होगा , तो पढ़ जाओगे। अधिक उम्र में पढ़ना बहुत मुश्किल है। इसीलिए कहते हैं - बूढ़े तोते या मिट्ठू को गुजराती में पोपट कहते हैं। तो बूढ़े तोते नहीं पढ़ते। नए नए को पढ़ाओ। पढ़ो मिट्ठू - दूधरोटी -चित्र-कोटि पढ़ो तो वो पढ़ने लगता है। जानवर के बच्चे भी जो पढ़ाओ पढ़ जायेगा। जब वो परिपक्व हो जाते है -एक भाषा में तो नहीं पढ़ते। मुश्किल ये है कि तुम देहाभिमान में (जीवभाव या M/F) अहं बुद्धि में परिपक्व हो गए हो। हम ये हैं , हम वो हैं , अब इसको सबको पोछना है। नए सीरे से तुम कौन हो ? ये तुमको बताना है। उसके लिए गीता और ग्रंथों के उदाहरण देंगे। देखो भगवान ने ये कहा। ये तुलसीदास ने कहा , अमुक संत ने ये कहा। और भारत के जितने भी संत हैं - किसी भी सम्प्रदाय के संत क्यों न हों ? रायपुर में सभी ने मिलजुलकर एक शोभायात्रा निकाली ये अच्छी बात है। आप अपनी बात को व्यावहारिक रूप से रखते हुए , व्यवहार में वही एकत्व का भाव -समाज और देश चलाने के लिए, ठीक है। पर जब थोड़ा गहरी नींद में जाते हो , तब क्या होते हो ? ऐसे ही जब ध्यान -समाधि में जाओ तब तुम पुरुष नहीं स्त्री नहीं हो, उसको अमन दशा कहते हैं। संक्षेप में, यह एक ऐसा समय है जब जीवन में उथल-पुथल की जगह शांति, सकारात्मकता और संतुलन का अनुभव होता है। शंकराचार्य जी ने हस्तामलक स्तोत्र में कहा है-
नाहं मनुष्यो न च देवयक्षौ,
न ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राः।
न ब्रम्हचारी न गृही वनस्थो,
भिक्षुर्न चाहं निजबोधरूपः ॥२॥
- न मैं मनुष्य हूँ , न देवता अथवा यक्ष हूँ , न मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र हूँ, न ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ या सन्यासी हूँ , मैं केवल आत्मज्ञान स्वरुप हूँ॥२॥
शंकराचार्य ने यह किसके लिए कहा - नाहं मनुष्यो ! इसको क्या कोई पशु पढ़ेगा कि मनुष्य ही पढ़ेगा? माने विवेकी मनुष्यों को ये समझाना चाहते हैं कि तुम मनुष्य नहीं हो , 'वह' हो तत्त्वमसि! देखो हमारा एक ग्रन्थ कहेगा तुम मनुष्य हो , तुम्हें पशुओं जैसा स्वार्थी नहीं रहना चाहिए। पहले तुम यह समझो कि तुम पशु नहीं हो , इसलिए मनुष्य की तरह ही चलो।
पर जब तुमको देहाध्यास से मुक्त करना है , तब ये बताएंगे की तुम मनुष्य भी नहीं , हो पुरुष भी नहीं हो , स्त्री भी नहीं हो। और अंत में कहेंगे कितुम जीव भी नहीं हो। जीवो ब्रह्मैव न अपरः ! ये तुम्हें अध्यास है , देहाध्यास , जिवाध्यास है , इन दो अध्यासों को छोड़कर तुम आत्मा हो ये जानने की कोशिश करो। कल इस पर विस्तार से बताएंगे आज यही पर समाप्त करते हैं।
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परमात्मा और प्रकृति में क्या भेद है ?।। Yug-Purush।। What is the difference between God and nature?
" जो कुछ भी हम करते हैं - प्रकृति हमें करवाती है। जो कुछ हम चाहते हैं -वो भी हमारी प्रकृति, हमारा स्वभाव कुछ करने या पाने के लिए ,हमें मजबूर कर देता है। हम दो प्रकार की प्रकृतियों से बने हैं।वास्तव में वो दो प्रकृति नहीं है , वो तो हमारी भाषा में एक को प्रकृति कहते हैं , एक को परमात्मा कहते हैं। इन्हीं दो से जगत बना है। गीता के अनुसार -
[13.20।। प्रकृति और पुरुष -- दोनों को ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो। कार्य और करण के द्वारा होने वाली क्रियाओं को उत्पन्न करने में प्रकृति हेतु कही जाती है और सुख-दुःखों के भोक्तापन में पुरुष हेतु कहा जाता है।]
प्रकृति और पुरुष - दो चीजें अनादि हैं। यानि दो चीजें पैदा नहीं हुईं। ध्यान से समझें दो चीजों का जन्म (लौकिक अर्थों में) नहीं हुआ। एक प्रकृति का दूसरा परमात्मा का जन्म नहीं हुआ है।
यावत् संजायते किंचित् सत्त्वम्- स्थावर- जङ्गमम्।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञ संयोगात्, तत्- विद्धि भरतर्षभ।।
(13.27)
।।13.27।। हे भरत श्रेष्ठ ! यावन्मात्र जो कुछ भी स्थावर जंगम (चराचर) वस्तु उत्पन्न होती है, उस सब को तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न हुई जानो।।]
और बाकि जो कुछ भी पैदा हुआ है जड़ -चेतन इन दोनों से ही हुआ है। (1:53) एक का नाम प्रकृति दूसरे का नाम पुरुष।
अभी अभी मैंने दो प्रकृतियों शब्द का प्रयोग किया है , वो पाश्चात्य शिक्षा पाए लोगों को समझने के लिए। एक होती है'Nature'दूसरी होती है 'True Nature' ! एक नेचर जो मेरी नहीं है , या नंबर 2 की है। या दो प्रकृतियाँ - एक परा प्रकृति , दूसरी अपरा प्रकृति। या यूँ कहो , एक जड़ प्रकृति , दूसरी चैतन्य। जड़ प्रकृति निरंतर परिवर्तित होती रहती है , ये इसका स्वभाव है। उसमे,मन, बुद्धि, अहंकार, शरीर आदि सब जड़ प्रकृति के हैं।
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता ७/४)
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और अहंकार - ये जो कुछ भी दिखाई सुनाई देता है, या वैज्ञानिक लोग दिमाग लगाकर सोंचते है ये सब जड़ अपरा प्रकृति है। पंचभूत , मन , बुद्धि अहंकार ये सब पैदा होते हैं, ये बदलते रहते हैं। और जो तुम जो कर रहे हो वो प्रकृति के द्वारा मजबूर हो।
मेरे कहने का अर्थ ये नहीं है कि आप गाँजा पीने को , शराब पीने को मजबूर हो। आप मजबूर हो खाने के लिए, जीने के लिए, बूढ़े होने के लिए। भूख के लिए , सोने के लिए मजबूर हो। आप मलमूत्र त्याग करने बाथरूम जाने के लिए , और लगभग लगभग ये सृष्टि पैदा करने के लिए मजबूर हो। पेड़ पैदा कर रहे हैं , पशु पैदा कर रहे हैं। पेड़ को अकल /बुद्धि नहीं है पर वो काम कर रहा है। दिमाग होता तो ये पेड़ भी कहता -ये फल मैंने पैदा किये हैं। मैं इतना बड़ा हूँ , तुम इतने छोटे हो। पर उसमें बुद्धि नहीं है , पर प्रकृति के कुछ अंश उसमें कार्य कर रही है।
तो मैंने प्रकृति शब्द का प्रयोग इसलिए किया , जो हो रहा है वह, सब नेचर से (बाह्य प्रकृति और अन्तः प्रकृति से। ) जो तुम चाह रहे हो - वह भी Nature से। तुम जीना चाहते हो , मरना नहीं चाहते ; क्यों ? मैं आपसे पूछ बैठूँ कि तुम्हें सुख क्यों पसंद है ? दुःख क्यों पसन्द नहीं है ? साधु -संन्यासियों को भी क्या दुःख पसंद है ? सन्त हैं घरबार छोड़ा है - जरा उनसे पूछ लेना। और जिसे पसंद हो उसे जरा दुःख देके परीक्षा कर लेना। वे तुरंत गुस्सा हो जायेंगे। नाराज हो जायेंगे। हमारे अंदर की एक Nature है , जिससे तुम परिचित नहीं हो। आपकी जो सच्ची प्रकृति है ,तुम्हारे अंदर जो परमात्मा का स्वभाव है वह तुम्हें मजबूर करता है। (5:09)
एक बात फिर से समझो हम सब दो से बने हैं। इधर जो पुरुष दीर्घा में बैठे हैं , क्या वे लोग अकेले सिर्फ पिता की सन्तान हैं ? या माँ के भी अंश हैं ? जो अकेला का हो हाथ उठा दो। जो स्त्री दीर्घा में हैं , आपलोग भी क्या दो से पैदा हुए हो , या अकेली माँ से ? आपकी शकल-सूरत माँ से मिलती है। पर क्या पिता आप में नहीं हैं ?
पुरुष वर्ग (गृहस्थ) के लोगों की प्रकृति , इनका शरीर पिता से मिलता है। पर ये बिना माँ के हैं क्या ? ये जो स्थूल शरीर दो से बने हैं , यही दो शरीरों के बीच M/F आकर्षण का कारण है। हम (त्यागी-संन्यासी ) भी दो से बने हैं , जड़ प्रकृति और चैतन्य -परमात्मा। जितने भी प्राणी हैं , दुनिया में हम सभी दो से बने हैं। परमात्मा है -सत चित आनंद।प्रकृति है अनिर्वचनीय परिवर्तनशील।
वो निरंतर बदलती रहती है। लेकिन परमात्मा को बदलना पसंद नहीं है। परमात्मा को मरना पसंद नहीं है। वो हमारे अंदर ही बैठा है , वो कहता है -मरना नहीं है ! परमात्मा माँग रहा है -न मरना। परमात्मा माँग रहा है -आनंद। नहीं तो प्रत्येक मनुष्य आनंद क्यों चाहता है ? (6:28) हमारे प्रशिक्षण के बाद , हमारे शिष्य भी दुःख पसंद नहीं करते। किसी भी शिष्य को छोटा रहना पसंद नहीं है। सभी बड़े बनना चाहते हैं। सब बड़े होने के (गुरु बनने के ?)संघर्ष में पड़े हैं। क्यों ?इसमें इनकी गलती नहीं है।हम सबके अन्तर में जो सबसे महान , बृहत है -ब्रह्म !है उसका स्वभाव है बड़ा (असीम) होना।और प्रकृति का स्वभाव है परिच्छिन्न कर देना, असीम को बाँट देना(सीमायुक्त, परिमित, मर्यादित, विभक्त, विभाजित, अलग अलग कर देना)। नानत्व पैदा करना। प्रकृति है अनेक रूप, और परमात्मा (मायाधीश) एक है। (7:08 ) ये प्रकृति अनेक रूप बनाती है।
जीव परतंत्र (परवश) है, भगवान स्वतंत्र (स्ववश) हैं, जीव अनेक हैं, श्री पति भगवान एक हैं। यद्यपि माया का किया हुआ यह भेद (जीव और ब्रह्म का भेद) असत् है-"जीवो ब्रह्मवै नापरः" है। तथापि वह (भ्रम) भगवान (मायाधीश) के भजन बिना करोड़ों उपाय करने पर भी नहीं जा सकता॥4॥ (7:15)
ये जो विरोधों से जीवन बना है , (प्रकृति और परमात्मा से जीवन बना है) अन्तरात्मा यानि अन्तर्मन चाहता है , आनंद। कभी कभी छोटे बच्चे के सामने जिलेबी रखे, दूसरी तरफ सोने का टुकड़ा (सोने का बिस्कूट) और उन्हें कहें जो इच्छा हो उठा लो। तो वो जिलेबी उठाएगा , सोना नहीं उठाएगा। आप भी दुःख सह लोगे पर दिल से नहीं। दिल से तो सुख पसंद है। आपका जो दिल है वो - सुख की) तरफ है। अमरता की तरफ है , शाश्वत जीवन की तरफ है। दिल तो मृत्यु की तरफ नहीं है , पर आ जाएगी तो क्या करोगे ? बस यही दुःख है कि जो नापसंद है (बुढ़ापा) , वो भी तुम्हारे पीछे पड़ा है , जो पसंद है , बड़ा बनना उस इच्छा को हम छोड़ भी नहीं पाते। यदि परमात्मा का स्वभाव भीतर न होता तो हम भी नहीं चाहते। परमात्मा का स्वभाव है - सत होना , चित होना , आनंद होना और व्यापक होना (सर्वगत होना) तुम बड़े होना क्यों चाहते हो ? तुम विस्तार क्यों चाहते हो ? (लैण्ड प्लॉट बढ़ाते रहना?) सभी जगहों तुम्हारा प्रभाव हो जाये ? परमात्मा व्यापक हैं -तुम्हें वह व्यापक होने के लिए मजबूर करता है। तुम बढ़ जाओ , सब तुम्हारा हो जाये। अमेरिका चाहता है, सब जगह मेरा बर्चस्व होना चाहिए। हिन्दू चाहता है मेरा हो जाये , मुस्लिम चाहता है मेरा, ईसाई चाहते हैं , मेरा हो जाये। सब हमारे साम्राज्य के नीचे हों। सब मजबूर हों।इससे छुट्टी कैसे मिलेगी ?(9:40)
जिसका जो धर्म हो वो समझे। वो मेरा स्वधर्म नहीं है। (देह, इन्द्रिय, मन, भ्रमित बुद्धि का जो धर्म है-विषयभोग। वो 'मेरा' धर्म मतलब विवेक-सम्पन्न बुद्धि या 'आत्मा' का धर्म विषय-भोग नहीं है।) जैसे पुरुष का आकर्षण यदि मिटाना हो , तो हम पुरुष जाएँ। स्त्री का आकर्षण मिटाना हो तो हम स्त्री हो जायें। रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में काकभुशुण्डि जी गरुड़ जी को ज्ञान देते हुए कहते हैं:
मोह न नारि नारि कें रूपा।
पन्नगारि यह रीति अनूपा॥1॥"
हे गरुड़! यहाँ (इस प्रसंग में) मैं कोई पक्षपात नहीं कर रहा हूँ, वेद, पुराण और संतों का मत ही कह रहा हूँ कि एक स्त्री-देह के रूप पर दूसरी स्त्री-देह मोहित नहीं होती, यह एक अनुपम रीति है। सांसारिक सौंदर्य पर (नारी देह) पर स्त्री-देह का मोहित न होना एक विलक्षण बात है।
उसी प्रकार आत्मा के (ब्रह्म के अवतार वरिष्ठ के) आकर्षण से यदि मुक्त होना है , यदि अमरता की इच्छा से मुक्त होना है , सुख की इच्छा से यदि मुक्त होना है -तो हम क्या हो जाएँ ? हम आत्मा (परमात्मा-अवतारवरिष्ठ) ही हो जायेंगे। तो हम नहीं चाहेंगे परमात्मा (अवतार-वरिष्ठ) होना। नहीं होंगे तो तड़पते रहेंगे।जब तक हम परमात्मा नहीं होंगे, परमात्मा होने को तड़पते रहेंगे। बड़े होने को (ब्रह्म होने को), बृहत होने को तड़पते रहेंगे।(10:34)और प्रकृति को पकड़ के तुम बड़े (ब्रह्म) नहीं हो सकते;प्रकृति को छोड़कर हो सकते हो। (परिवर्तनशील, नश्वर जड़ देहमन को पकड़ के तुम बड़े अविनाशी चेतन आत्मा या नहीं हो सकते। नश्वर देह-मन को मैं मानने के भ्रम को छोड़कर तुम बृहत या अमर हो सकते हो।)
"न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः ॥"
तुम देह का अभिमान (M/F भाव) छोड़ो। तुम इन्द्रियों के धर्म का त्याग करो। अपने स्वधर्म को पहचानो।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।3.35।।
देहका धर्म (जाति या धर्म) को अपना धर्म नहीं मानो। क्योंकि देहधर्म को तुम यदि अपने साथ जोड़ोगे तो इसका धर्म मरना है , वही तुम्हारा (चैतन्य आत्मा, ब्रह्म या सच्चिदानन्द का) धर्म भी हो जायेगा। परिवर्तनशील नश्वर देह के धर्म के साथ अगर तुम अपरिवर्तनीय चैतन्य अविनाशी आत्मा (सत्य) के साथ जोड़ोगे तो जड़ शरीर का धर्म (बूढ़ा होना -मरना) वो तुम्हारा हो जायेगा। जड़ के धर्म को यदि चेतन का धर्म समझ लोगे , तो क्या होगा ?इसका धर्म(परिवर्तनशील पंचभौतिक जड़ देह का धर्म) है पैदा होना और मरना ; और तुम्हारा धर्म (अपरिवर्तनीय , शाश्वत चैतन्य आत्मा का धर्म) है न जन्म लेना न मरना। ये न मरनेवाला (आत्मा) और मरनेवाला (देह-बुद्धि) ये दो इकट्ठे हो गए। दो 'Nature' और 'True Nature'मिल गए -परमात्मा का स्वभाव और प्रकृति का स्वभाव एकत्र हो गए हैं।चेतन और जड़ इकट्ठे हो गए हैं। इसीको रामायण में तथा और सब योग, वेदांत आदि ग्रंथों में कहा है,चिज्जड़ ग्रंथि। [(Chid-Jada Granthi) : अर्थात चेतना (चित्-आत्मा) और जड़ प्रकृति (अहंकार/शरीर) के बीच की अविद्याजन्य गाँठ को चिज्जड़ ग्रंथि कहते हैं। यह अस्मिता या 'मैं' भाव का प्रतीक है, जो अविनाशी आत्मा और नश्वर शरीर को एक मान लेता है। गुरु की कृपा से ज्ञान द्वारा इस ग्रंथि का खुलना ही मोक्ष (देह होने के भ्रम से मुक्ति) है। ] (11:28)
चेतन परमात्मा, जड़ प्रकृति दोनों मिलकर एक तीसरीसन्तान पैदा हुई जिसका नाम है - जीव। अब जीव दो विरोधों से बना है। इस जीव में प्रकृति भी काम करती है, और इसमें परमात्मा भी हैं । इस जीव को दोनों अपनी अपनी तरफ खींच रहे हैं। परमात्मा मुझे आनंद की तरफ खींच रहा है।
ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥
सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं॥
जीव ईश्वर का अंश है। (अतएव) वह अविनाशी, चेतन, निर्मल और स्वभाव से ही सुख की राशि है॥ वह माया के वशीभूत होकर- नाईं 'मानो' तोते और वानर की भाँति किसीने बंदर की मुट्ठी को हण्डी में बाँधा नहीं है , वह चने से भरी मुट्ठी को खोलता नहीं है , इसलिए अपने आप ही बँध गया। हम आनंद के बिना नहीं रहना चाहते हैं। और ये परिवर्तन (बुढ़ापा) और मृत्यु हमें घेरे हुए है।
तो छूटने का एक उपाय है।दीपक जलता हुआ देखा होगा ? (12:23) बर्तन जो मिट्टी का है , तेल और बत्ती वो ऐसे पदार्थ का हिस्सा है ,जो जमीन का है नीचे का हिस्सा है। वो उड़ता नहीं। इसलिए दीपक उड़के सूर्य तक जाता नहीं। ज्योति ऊपर की ओर जाती है। मोमबत्ती को आप नीचे कर सकते हैं, ज्योति ऊपर की ओर ही जाएगी। बड़ी जिद्दी है ज्योति ! कोई कहता है हमारा बच्चा बड़ा जिद्दी है। अरे बच्चे क्या जिद्दी ही है सब जिद्दी ही हैं। ये शरीर भी बहुत जिद्दी है, इतना इसको नहलाओ -धुलाओ पर यह शरीर भी बिना बदले नहीं रहता , फिर भी बूढ़ा हो जाता है। अपनी जिद नहीं छोड़ता। कोई किसी की सुनता ही नहीं।
फिर एक ही तरीका है ,विवेकी बुद्धि को देह-मन से खींचकर आत्मा से जोड़े रखना-क्योंकि देह,इन्द्रिय मन बुद्धि सब आत्मा से ही निकले हैं , उसी में स्थित हैं , और उसी में लीन हो जाते हैं। इसीलिए विवेकी बुद्धि हमेशा अपने से पर आत्मा से जुड़े रहने की जिद करती है।) इसलिए ज्योति को आप नीचे करते हैं वो ऊपर जाती है। क्योंकि ज्योति अग्नि का अंश है , और अग्नि का केन्द्र सूर्य है। इसीलिए ज्योति भी ऊपर की ओर भागती है। और मिट्टी का तेल और दिया मिट्टी का है , वो ऊपर जाता नहीं। बत्ती ज्योति खींचते रहो जलते रहो वो भी तड़पता रहे? (जड़ शरीर मिट्टी का हिस्सा है), शरीर मरना चाहता है , हम (आत्मा) मरना नहीं चाहते। यह शरीर भी एक दिया है।(14:15)
ये जिंदगी क्या है ? यह भी एक दिया है। यह देह जैसे मिट्टी का एक दिया है , और ज्योति चैतन्य (आत्मा) है, उससे दिया जल रहा है।ज्योति तड़पती है ईश्वर को मिलने के लिए (अपने स्वधर्म आत्मस्वरूप में स्थित रहने के लिए), और ये शरीर मरने के लिए मिट्टी में मिलने के लिए तैयार बैठा है। ये विरोध (जड़-चेतन ग्रंथि) ही दुःख है। इसको दूर कैसे करें ? इस मृत्यु की समस्या का हल क्या है ? ये ग्रंथि तो पड़ गयी है , परन्तु गोस्वामी तुलसीदास जी , सभी सन्त महामात्मा यही कहते हैं कि -"जदपि मृषा" यद्यपि यह ग्रंथि मिथ्या है। यद्यपि चेतन आत्मा और जड़ प्रकृति- अहंकार (देहाभिमान)के बीच की अविद्याजन्य गाँठ ही अस्मिता है जो व्यावहारिक 'मैं' भाव का-(Apparent I) का प्रतीक है। वह अविद्याजन्य अस्मिता बुद्धि अविनाशी आत्मा और नश्वर शरीर को एक जैसी मान लेती है, और अविद्या , अस्मिता , राग-द्वेष , अभिनिवेश पंचक्लेश बन जाती है। चेतन और जड़ की गाँठ लगी नहीं है।पर नाईं - मानो लगी जैसी लगती है। (14:51) हम समझ ही नहीं पाते कि ये मेरा धर्म नहीं है। मैं नश्वर शरीर से अलग ही हूँ। मैं अमर ही हूँ ! मुझे अमर होना नहीं है। अमर होने की इच्छा तब खत्म होगी , जब तुम अमर हो ये समझ जाओगे।(15:06)
दुःख से बचने की सुख पाने की इच्छा पूरी हो जाएगी ,जब तुम्हें ये समझ आयेगा कि दुःख मुझमें नहीं है! (दुःख-सुख तो देह का है-वो जाने- विवेकबुद्धि तुम आनन्द में रहो !) सभी उपनिषद , ग्रन्थ, गुरु क्या कहते हैं ?
सर्व-निवासी सदा अलेपा, तोही संग समाई।
आप अलेप हैं , पर आप अलेप लगते नहीं हैं। आप दुःख से लिप्त हैं , विकार से लिप्त हैं। मृत्यु के भय से लिप्त हैं।
ब्रह्म (आत्मा) वहाँ है , जहाँ ये काम -क्रोध स्पर्श नहीं करते। कोई चाह नहीं , क्रोध नहीं , लोभ नहीं , भय नहीं। तो आप कहोगे - कहाँ ? बस जहाँ तुमने अपने को पा लिया कि ये गए। जहाँ ये काम-क्रोध आये कि ब्रह्म गया। ब्रह्म (भगवान या आत्मा कहाँ निवास करते हैं ?) (16:07) भक्ति मार्ग के ग्रंथ में रामायण में आप देखें -
आत्मा (भगवान या परमात्मा)वहाँ रहते है ,जहाँ ये काम, क्रोध ,कपट , दम्भ, माया यानि छल-प्रपंच नहीं रहते। जहा जहाँ ये रहते हैं , वे नहीं रहेंगे।
जहाँ राम तहँ काम नहिं, जहाँ काम नहिं राम ।
तुलसी कबहूँ होत नहिं, रवि रजनी इक ठाम ।।
जहाँ राम तहाँ काम नहीं रहता , जिस ह्रदय में काम रहता है वहाँ राम नहीं रहते।तो जब किसी के हृदय (Heart)में काम आ जाता है , तब उस ह्रदय से राम (आत्मा -पवित्र त्रयी, या गुरुदेव) निकलकर कहीं और चले जाते हैं क्या ? जाते कहीं नहीं, पर मालूम पड़ने बंद हो जाते हैं। (ह्रदय के आनंद पर पर्दा पड़ जाता है !)(16:49)
जहाँ काम (desire-कामना-वासना) है तहाँ राम (आत्मा या आनंद) छिप जाता है, खो जाता है, मालूम नहीं पड़ता। राम (या आत्मा) को समाप्त तो कोई कर नहीं सकता , राम कभी भी मिटता नहीं, पर मालूम नहीं पड़ता। नहीं तो कई लोग राम (आत्मा) को ही मार देते। कई तो 'राम' (आत्मा) के ही दुश्मन हैं कि ये मर जायें, तो झंझट ही खत्म हो जाये। रावण 'राम' से लड़ाई करता है। (यानि संशय रूपी राक्षस रावण आत्मा, ब्रह्म या भगवान से लड़ाई करता है) कहता है अगर राम मनुष्यहोंगे तो मैं उन्हें निपटा दूँगा, और भगवान होंगे तो मैं ही निपट जाऊँगा। इतनी सी बात है। 'राम' (आत्मा या ब्रह्म) को कौन निपटा देगा? तो काम भी राम को मार नहीं सकता पर राम मतलब आनंद पर पर्दा डाल देता है।छिपा देता है। मालूम नहीं पड़ते। (17:29)(बुद्धि नाशात् प्रणश्यति, मति को भ्रमित कर देता है, जैसी मति , वैसी गति। )राम में पर्दा मतलब आनंद में पर्दा। आनन्दा बाधक आवरण , आनंद को ढाक लेने वाला। आनंद को छिपाने वाला , मेरी व्यापकता पर्दा डाल देता है।(आत्मानन्द या विवेकानन्द में पर्दा ? यानी आत्मा के अमरत्व , व्यापकता , निर्भीकता पर पर्दा ?)
घड़ा देखो तो वैसे कुछ नहीं है , पर मिट्टी की व्यापकता में पर्दा डाल देता है। इतनी बड़ी विशाल मिट्टी घड़ा होते ही छोटा हो गया। -मैं इतना हूँ , अब व्यापक नहीं लगेगा। घड़े के भीतर-बाहर मिट्टी ही मिट्टी। लहर के बाहर और भीतर पानी ही पानी , पर लहर (देहाभिमान) का विचार आते , इतना ही है बस ? सीमित हो गए , पर्दा पड़ गया। तुम्हारी ब्रह्मता में पर्दा है। तुम्हारे आनंद में पर्दा है। तुम्हारी चैतन्यता में पर्दा है। वो पर्दा भी क्या है ? पर्दा यही है कि, पर्दा है भी नहीं। जड़-चेतन की ग्रंथि पड़ गयी है -इसको तुम्हारे 'गुरु' 'तुम्हें' (M/F शरीर अभिमानी को) कैसे समझावें ? जो बहस करने वाले , दिमागी तर्क लगाने वाले वकील हैं, मजहब हैं , सरौता श्रेणी के अर्ध-पंडित लोग हैं। (18:49) सो मायाबस भयउ गोसाईं : (आत्मा होकर भी खुद को नश्वर शरीर मान रहे हैं ?
सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं॥
जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥2॥
(उत्तरकाण्ड)
यद्यपि मृषा - यद्यपि गाँठ झूठी है, (विवाह-की गाँठ झूठी है) मिथ्या है। फिर खोलने का प्रयत्न क्यों करते हो ? जदपि मृषा छूटत कठिनई ? इस चौपाई को तुम्हारे गुरु कैसे समझाते? (तो सच्चिदानन्द के अनुभव पर पर्दा का अनुभव भी करवा दिए ?) (19:06) इस बातको (जड़-चेतन की गाँठ -अविद्या अस्मिता पंचक्लेश को ) किसी मजहबी के गले कैसे उतारें ? उनके पास इसके लिए कोई शब्द ही नहीं है। अब अगर किसी विदेशी को यही बात (पंचक्लेश) बताना हो अंग्रेजी में अनुवाद करें तो कहेंगे भारतीय लोगों का कोई ठिकाना ही नहीं है। अब माया की परिभाषा में माया का जो लक्षण है , उसको या तो सत कहो, या असत कहो या सत -असत उभय कहो-
कोउ कह सत्य, झूठ कह कोऊ, जुगल प्रबल कोउ मानै।
तुलसिदास परिहरै तीन भ्रम, सो आपन पहिचानै॥
इस जगत (जीव -जगत और ईश्वर) को कोई सत्य कहता है, कोई मिथ्या बतलाता है और कोई सत्य—मिथ्या से मिला हुआ मानता है।
⚜️️केसव! कहि न जाइ का कहिये⚜️️
(-सन्त तुलसीदास जी महाराज)
केसव! कहि न जाइ का कहिये।
देखत तव रचना बिचित्र हरि! समुझि मनहिं मन रहिये॥
हे केशव! क्या कहूँ? कुछ कहा नहीं जाता! हे हरे! आपकी यह विचित्र रचना देखकर मन-ही-मन आपकी लीला समझकर रह जाता हूँ।
सून्य भीति पर चित्र, रंग नहिं, तनु बिनु लिखा चितेरे।
धोये मिटइ न मरइ भीति, दुख पाइय एहि तनु हेरे॥
कैसी अद्भुत लीला है कि इस संसार-रूपी चित्र को निराकार चित्रकार ने शून्य की दीवार पर बिना रंग के संकल्प से ही बना दिया। यह महामायावी-रचित माया चित्र किसी प्रकार धोने से नहीं मिटता। (साधारण चित्र जड़ है, उसे मृत्य का डर नहींलगता परंतु) इसको मरण का भय बना हुआ है। (साधारण चित्र देखने से दुःख होता है परंतु) इस संसार रूपी भयानक चित्र की ओर देखने से दुःख होता है।
रबिकर-नीर बसै अति दारुन मकर रूप तेहि माहीं।
बदन-हीन सो ग्रसै चराचर, पान करन जे जाहीं॥
सूर्य की किरणों में जो कल दिखाई देता है, उस जल में एक भयानक मगर रहता है। उस मगर के मुँह नहीं है, तो भी वहाँ जो भी जल पीने जाता है, चाहे वह जड़ हो या चेतन, यह मगर उसे ग्रस लेता है। ( यही “स्तन्याभिलाषात्"-जब माँ अपने बच्चे के मुँह में स्तन का अग्रभाग डालती है, तब बच्चा स्वतः अपने पूर्व जन्म के अभ्यास के कारण अपनी माँ का स्तनपान करना आरंभ कर देता है। जो 'कल' आशा रूपी काल है,प्रत्येक ज्ञानदायिनी माता में भी इच्छा बनकर रहती है मेरा बेटवा के विवाह गोरी सुंदर लड़की से हो जाये।)
भाव यह कि यह संसार तपते रेगिस्तान की रेत पर सूर्य की किरणों में जल के समान भ्रमजनित है। जैसे सूर्य की किरणों में जल समझकर उनके पीछे दौड़ने वाला मृग जल न पाकर प्यासा ही मर जाता है, उसी प्रकारइस भ्रमात्मक संसार में सुख समझकर उसके पीछे दौड़ने वालों को भी बिना मुख का मगर यानी निराकार काल खा जाता है।
कोउ कह सत्य, झूठ कह कोऊ, जुगल प्रबल कोउ मानै।
तुलसिदास परिहरै तीन भ्रम, सो आपन पहिचानै॥
इस संसार को कोई सत्य कहता है, कोई मिथ्या बतलाता है और कोई सत्य—मिथ्या से मिला हुआ मानता है; तुलसीदास के मत से तो जो विवेकी मनुष्य इन तीनों भ्रमों से निवृत हो जाता है वही अपने असली स्वरूप को पहचान सकता है।
[तुलसीदास। पुस्तक : विनय-पत्रिका (पृष्ठ 142) रचनाकार : तुलसी प्रकाशन : गीताप्रेस संस्करण : 1998
भगवान कृष्ण स्वयं कहते हैं -सत् असत् च अहम् अर्जुन (गीता 9 /19) मैं सद भी हूँ और असद भी हूँ। बताओ ! (19:54) जब हिन्दू धर्म के भगवानों का ही ठिकाना नहीं है ? जब भगवान खुद दो बात कहते हों , अपनी बात पर ही नहीं टिकते -सत् असत् च अहम् अर्जुन, इसलिए हिन्दू धर्म पर पश्चमी धर्म/मजहब वाले बड़े लांछन लगाते हैं। ये अपनी बात पर ही नहीं टिकते।-सत् असत् च अहम् अर्जुन। मैं सद भी हूँ असद भी हूँ। किस कोर्ट में गुरु प्रमाण दें ?
कोई तुम्हारी उम्र पूछे , तो तुम कहो हम 10 साल के भी हैं , 100 साल के भी हैं। बिना उम्र के भी हैं। तुमसे कोई पूछे तुम कौन हो ? तुम कहो हम पुरुष भी है, स्त्री भी हैं। भगवान कहते हैं , सब कुछ मैं हूँ। कोई होता है -सबकुछ ? जो आदमी होता है , वो औरत भी होता है। जो पशु है , वो मनुष्य नहीं है। जो घड़ा है , वो कपटी नहीं है। एक ही नाम होगा। पर मिट्टी घड़ा भी है , कपटी भी है। ईंट भी है , वो सब कुछ है। ये कैसी चीज है जो सबकुछ है ? (21:38)
तभी तो भगवान को किसी ने कुत्ते में देख लिया। ये कोई चमत्कार नहीं है , देखने वाले की दृष्टि का चमत्कार है। भगवान का कोई चमत्कार नहीं है, देखने वाले ने भगवान को सब जगह देखा। कण कण में देखा। वहीं रावण के सामने स्वयं राम खड़े थे -और वो राम को नहीं देख सका। रावण को शक है कि यदि भगवान होंगे तो , और यदि भगवान नहीं हैं , मनुष्य हैं तो मैं देखता हूँ। रावण को संदेह था कि राम भगवान (आत्मा, परमात्मा, ईश्वर या ब्रह्म) हैं या नहीं? और तुम्हें भी संदेह है। कि तुम मरते हो या नहीं ? M/F शरीर से लिप्त तो पक्का हो। पर तुम मरते हो इसमें तो पक्का है। पर तुम नहीं मरते हो इसमें थोड़ा संदेह है। देखो दुःख-सुख होते हैं -ये पक्का है।
सुख सनेह अरु भय नहिं जाके कंचन माटी जानै॥
जिसमें न सुख के लिए आसक्ति है , और न जिसमें मरने का डर ही है। और तुम्हें भय नहीं है ? मान-अपमान का भय नहीं है ? अविद्या -अस्मिता से उत्पन्न राग- द्वेष नहीं है। (22:58) और तुम देहाभिमान लेकर बैठे हो। तुम सकोरा, मिट्टी की प्याली (नाम-रूप) होकर बैठे हो , प्याली हटा दो , तो फूटने का डर हो गया। तुम भी देह और मन (अहंकार) लेकर बैठे हो। जिस समय मन न हो , देह न हो, तो तुम डर कर दिखा दो। (23:14)तुम जिसको जीवन समझे हो , वो मृत्यु है। जिसको सुख समझे बैठे हो , ये दुःख है। जिसको मेरा समझे बैठे हो - ये भ्रम है। (जिसको मेरा भाई-बहन ,मेरी पत्नी-दाई -मैनेजर -चपरासी समझे बैठे हो ये भ्रम है।) और ये कब समझोगे ? ये 2 -चार मिनट में किसी भाग्यशाली को ही समझ में आ सकती है। 2 घड़ी में खट्वांग की मुक्ति हुई। [शुकदेव ने राजा खटवांग की कथा सुनाई, जिन्होंने अपने अंत का ज्ञान होते ही सभी सांसारिक विचारों का त्याग कर ध्यान किया।] युद्ध के मैदान में गीता सुनकर अर्जुन के भ्रम टूटे। 7 दिन में परीक्षित का भ्रम टूट गया। हमारा तो 7 जन्म में भी जायेगा या नहीं ? कितने पंडित घिस गए ? पर तुम्हारी नासमझी नहीं मिटी। कितने पंडित -भागवत कथा ,भागवत कथा, भागवत कथा सुनाते सुनाते चले गए। परीक्षित को ज्ञान हुआ कि उसके सामने समस्या थी। (24:06)
सातवें दिन सांप काटना था , मृत्यु होनी थी , उसे ये सब जगत झूठा लग रहा था। तुम्हें अभी सब सच्चा लगता है - आत्मा (भगवान या परमात्मा) ही झूठा लगता है। तुम्हारे सामने तो अभी कोई चुनौती ही कोई नहीं है। युद्ध के मैदान में गीता समझ में आ गयी। ये भारत के लोग , भी बड़े समझदार हैं। जब कोई मर जाता है , तब पुराणों की कथा (गरुड़ पुराण) सुनता है। जानते हैं -इसी समय ये सुनेगा। वैसे तो ये सब सुनना ही नहीं चाहते। यही मौका है। जब संकट हो तब कोई साधु की सुनता है। साधु तो तुम्हारी सुन सुन के थक गए। बूढ़े हो गए। कितने साधु (नवनीदा नेता) घिस गए। साबुन खत्म हो गया , कपड़ा फिर गंदे का गंदा।मनुष्य का अन्तःकरण जो करता रहता है, नासमझी लिए फिरता है। कोई कोई -
नर सहस्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होई धर्म ब्रतधारी॥
धर्मसील कोटिक महँ कोई। बिषय बिमुख बिराग रत होई॥1
हे त्रिपुरारि! सुनिए, हजारों मनुष्यों में कोई एक धर्म के व्रत का धारण करने वाला होता है और करोड़ों धर्मात्माओं में कोई एक विषय से विमुख (विषयों का त्यागी) और वैराग्य परायण होता है॥1॥
कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई। सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई॥
ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ। जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ॥2॥
श्रुति कहती है कि करोड़ों विरक्तों में कोई एक ही सम्यक (यथार्थ) ज्ञान को प्राप्त करता है और करोड़ों ज्ञानियों में कोई एक ही जीवन मुक्त होता है। जगत् में कोई विरला ही ऐसा (जीवन मुक्त) होगा॥2॥
'सम्यक ज्ञान ' ये क्या है ? जैन भी बोलता है।सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई ! कोई सकृत,कोई पुण्यात्मा जिसको यथार्थ ज्ञान -ऐसे कथा सुनने वाले तो सर्वत्र है। आत्मा ही परमात्मा है, तो परमात्मा को ढूँढ़ने की क्या जरूरत ? यदि आत्मा अलेप है , तो तुम यहाँ कैसे मर रहे हो ? असल में समझने की बात यही है। हमलोग कुछ छिपाते नहीं हैं, हम न कोई झूठी विनम्रता दिखाते हैं , न कोई झूठा अहंकार दिखाते हैं। अभी एक श्लोक सुना था -
भावार्थ : ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तोत्रों द्वारा जिनकी स्तुति करते हैं, सामवेद के गाने वाले अंग, पद, क्रम और उपनिषदों के सहित वेदों द्वारा जिनका गान करते हैं, योगीजन ध्यान में स्थित तद्गत हुए मन से जिनका दर्शन करते हैं, देवता और असुर गण (कोई भी) जिनके अन्त को नहीं जानते, उन (परमपुरुष नारायण) देव "आत्मा " के लिए मेरा नमस्कार है।
तुम हिन्दू धर्म की दो-तीन चीजें समझ जाओ। तो विश्व में किसी मजहब के सामने शर्मिन्दा नहीं हो सकते हो। लोग हिन्दू धर्म की आलोचना यह कहकर करते हैं कि इनके इतने देवी देवता , इतने भगवान ? भारत की या हिन्दू धर्म की एक ही कमाई है। इसने आत्मा या भगवान (को खोजने के पीछे) आर्थिक, वैज्ञानिक पिछड़ापन स्वीकार कर लिया। पर आध्यात्मिकता या भगवान या आत्मा के बारे में जानने के पैमाने पर विश्व में सबसे आगे है। इसके मामले में पीछे नहीं है। भारत का कोई संत ही आज भी उनके व्यंगवाणी का मुँह तोड़ जवाब दे सकता है।
कौन ब्रह्मा ? वही ब्रह्मा जिसको हिन्दू मानता है। ब्रह्मा जिसकी स्तुति करता है -वो कौन है ? मजहब क्या है ? और आस्था क्या है ? और तथ्य क्या है ? तुलसीदास राम के भक्त हैं - कोई शिव के भक्त हैं , कोई गुरु के भक्त हैं। (28:10)
गुरु -ब्रह्मा , विष्णु , शिव कहावे। तो गुरुओं ने आत्मा को वही नाम दे दिया। तुलसी दास ने यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुत: स्तुन्वन्ति दिव्यै: स्तवै- जिसकी स्तुति करते हैं। जिसका ध्यान स्वामी विवेकानन्द करते हैं। अवतार वरिष्ठ -He is eternal always : वह हमेशा शाश्वत है ! जिसका ध्यान तुम करना चाहते हो , पर कर नहीं पाते हो। (28:56) मैं मीठी-मीठी, चिकनी-चुपड़ी बातें नहीं करता। जिसका ध्यान ब्रह्मा ,विष्णु, महेश करते हैं। जिसका ध्यान बड़े बड़े योगी करते हैं। जिसकी खोज के लिए बुद्ध और महाबीर विद्यमान हैं। जिसके लिए हम निकले हैं , जिसकी याद हम करते हैं। जिससे सब उपजे हैं -स्वामी विवेकानन्द, स्वामी शिवानन्द , स्वामी अभेदानन्द , अमुकानन्द आदि-जिससे सब उपजे हैं। ब्रह्मा-विष्णु सब जिससे उपजे हैं। जैसे वकील अपने दलील कानून की किताबों से देता है। हम मंचपर अपनी दलीलें ग्रंथों से देते हैं। यदि सहमत नहीं तो निर्भय होकर तर्क दे सकते हैं।
जिससे (शाश्वत आत्मा से) ब्रह्मा विष्णु उपजते हैं। इतने ही नहीं कितने ब्रह्मा उपज के मर चुके। दुबारा , तिबारा , जैसे तुम्हीं केवल बार बार उपजते हो ? कभी ध्यान से सोचा कि हम एक देवता के उपासक हैं ? या अनेक देवता के ? (30:56) हमारे यहाँ एक तरफ जैसे भगवानों की प्रदर्शनी है। एक आत्मा के सिवा बाकि सब प्रदर्शनी ही है। भगवान 'एक' आत्मा ही है। पर झगड़ा ये है कि हर आचार्य ने उसका एक अलग नाम दे दिया है। तुलसीदास उसका नाम ब्रह्मा नहीं दे रहे हैं। उसका नाम विष्णु नहीं दे रहे हैं। उसका नाम शंकर नहीं दे रहे हैं। इनको तो उपजने वाला कह रहे हैं। किससे उपजे ? तो कहते हैं राम से। राम माने जो उपजे नहीं। जरा ध्यान रखना।जो उपजे नहीं वो है राम। तुलसी के राम उपजे नहीं हैं , ब्रह्मा उपजे , विष्णु उपजे , कोई शिव को उठाएगा। तो शिवपुराण का अनुयायी होगा तो वो कहेगा 'राम' उपजे। (31:52)गुरु भक्त कहेगा -ब्रह्मा,विष्णु ये सब उपजे हैं। गुरु नहीं उपजे ! मेरे गुरुदेव थे , हैं और रहेंगे। 10 सच क्या हो गए ?
"एकम सत विप्राः बहुधा वदन्ति '
ये श्लोक भी मेरा बनाया हुआ नहीं है। एक 'सत्य' है , जो कालातीत है, इन्द्रियातीत है, विद्वानों ने एक ही सत्य को अनेक नामों से कहा। है कोई दूसरा ऐसा दर्शन ? विश्व भर में ये बात केवल भारत के गुरु - हमारे ऋषियों ने कहा। हमारे ऋषि एक सत्य को अनेक प्रकार से बताते हैं। जिन्होंने सत्य को नहीं देखा , तरीके के पकड़ लिया , और कहने लगे हिन्दुओं में अनेक मत है , अनेक भगवान हैं , पर उन्होंने विधि पकड़ ली। जो समझाने का ढंग था उसीको पकड़ लिया। जैसे पानी को अंग्रेजी में water कहते हैं , हिन्दी में जल, नीर अम्बु आदि भी कहते हैं। यदि पानी के लिए हिन्दी में बहुत शब्द हैं , तो हिन्दू भ्रमित हैं क्या ? (33:21) हिन्दू को उस एक 'सत्य' का पता है , जिस 'सत्य' से भिन्न कोई नहीं है। अर्थात सत्य (आत्मा) एक ही है और उसी से सब हुए हैं। ( देह,इन्द्रिय ,मन, बुद्धि अहंकार आदि ये सब आत्मा से ही-हुए हैं , उपजे हैं।)
यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते।
येन जातानि जीवन्ति।
यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।
तद्विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्मेति॥
(तैत्तिरीयोपनिषद्- 3.1)
परमात्मा या आत्मा एक है ,सब उसीसे निकला है। यह वाक्य भृगु ऋषि के पिता वरुण द्वारा दी गई ब्रह्म की परिभाषा है। इसका अर्थ है: "निश्चय ही ये समस्त प्राणी जिससे उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीवित रहते हैं, और अंत में (प्रलयकाल में) जिसमें विलीन हो जाते हैं, उस (परम तत्त्व) को जानने की इच्छा करो, वही ब्रह्म (आत्मा , ईश्वर या भगवान) है"। यह श्लोक आत्मा (ब्रह्म या ईश्वर) को सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता के रूप में परिभाषित करता है।
(34:04)
जासु सत्यता तें जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥
"माया शक्ति अपने आप में जड़ है लेकिन यह भगवान (आत्मा-परमात्मा) की आज्ञा प्राप्त कर इस प्रकार से अपना कार्य करना आरम्भ करती है, जैसे कि यह चेतन हो।"
[माया शक्ति के पास स्वयं कुछ करने का बल नहीं होता। जब भगवान सृष्टि के सृजन की इच्छा करते हैं तब वे केवल माया शक्ति पर दृष्टि डालते हैं और इसे प्रकट करते हैं। इस संबंध में मुख्य रूप से यह ध्यान रखें कि यद्यपि सृष्टि की प्रकिया भगवान की इच्छा और निर्देश से कार्यान्वित होती है किन्तु फिर भी वे माया शक्ति के कार्यों से अप्रभावित रहते हैं। वे सदैव अपनी ह्लादिनी शक्ति (आनन्दमयी शक्ति) के कारण अपने सच्चिदानन्द स्वरूप में स्थित रहते हैं। इसलिए वेद उन्हें 'आत्माराम' कहते हैं जिसका तात्पर्य है वह जो बिना किसी बाहरी सुख के स्वयं में आनन्दमय रहता है।' ]
तो यह सृष्टि कैसे बनी ? इसे अगर पढ़ना और समझना है , तो और कहीं के गुरुओंके चक्कर में नहीं पड़ना। गुरु ढूँढ़ना हो तो भारत में मिलेंगे । इसलिए सुकरात ने सिकंदर से कहा था तुम भारत जा रहे हो , जरा गंगाजल ले आना। ये बात कितना सत्य है नहीं जानता , कहा हो न कहा हो ? पर एक बात दावे से कह सकता हूँ कि उसने कहा था यदि भारत जा रहे हो , तो वहाँ से एक ज्ञानी गुरु ले आना। इसका मतलब भारत गुरुओं की मण्डी है। हरिद्वार कुम्भ मेला गुरुओं की मण्डी है। यदि गुरु ढूँढ़ना है तो भारत में इसकी खुली बजार है- एक से एक छाँट सकते हो । जैसे नागपुर में सन्तरे की मण्डी। हर जगह की कोई कोई चीज प्रसिद्द है। इंग्लैण्ड की प्रसिद्द-चीज है कुटिल राजनीती। इसीलिए मुट्ठीभर लोग पूरे विश्व पर इतने वर्षों तक शासन कर गए। राजीनीति के माहिर इंग्लैण्ड है। कोई धनी देश है। पर भारत एक गुरु-प्रधान देश है। (35:26) यहाँ गुरु हुए हैं। इसलिए यदि गुरु ढूँढ़ना है , तो भारत में मिलेंगे।
पर एक बात ध्यान रखना , जहाँ बाजार होता है , वहाँ रद्दी माल भी बिकता है। हाँ यहाँ रद्दी गुरु भी मिल जायेंगे। यहाँ गंजेड़ी , भंगेड़ी , नशेड़ी गुरु भी मिल जायेंगे। पर वहीं एक माँ जैसी गुरु भी होगी , जो वहाँ से हटा देगी ? कोई न कोई श्लोक रट के कथा करेगा - जब उसकी दुकान चल जाएगी। भोन्दु लोग बहुत हैं यहाँ। किसीको चौपाई , गला बाजी , कलाबाजी ,आ जाये। गाना क्या मुझे भी आता है न ? नहीं आता। सीखने का दिल भी नहीं है। भगवान न करे मुझे गला मिले। एक महिला आयी- श्यामा मित्रा , बम्बई। वो इतना अच्छा गाती थी। लोगों ने उनको सुना। और मैंने सुनाया वेदान्त। मेरा वेदान्त उसको भी अच्छा लगा। शुरू में तो मेरी तरफ नजर टेढ़ी करके देखा। पर मेरी रूखी-सुखी बात सुनने से लगा कि ये बाबा भी है कुछ ? फिर हाथ जोड़ कहती है -हे कृष्ण भगवान , हे कलुआ , कृष्ण-कन्हैया ! तेरी लीला देख -देख मैं चकित हूँ। मेरे जैसा गला बाबा को दे दिया होता, फिर कहती है , इसके जैसा दिमाग यदि मुझे होता ? भगवान ने किसी को कुछ , किसी को कुछ शक्ति दी है। मेरे पास गला नहीं है , तो हमारी कथा में भीड़ ज्यादा नहीं होती है। अगली बार आएंगे , तो एक गलाबाज और कलाबाज को भी ले आएंगे। (37 :10)
गुड़ वाला ढेला और पत्थर दोनों चलेंगे। कड़वी दवा देनी हो तो मधु के साथ देनी पड़ती है। बच्चो की दवा मीठी होती है। ये कड़वी जरूर लगती है , पर एक बार भी यदि तुम्हारी बुद्धि इसे स्वीकार कर ले -(कि देह नहीं हो, देहि आत्मा हो)तो मृत्यु जैसे चीज भी झूठी हो जाती है। मृत्यु, दुःख , चिंता क्या है ? स्वयं को देह समझने से ही आती है।
हममें तुम में क्या फर्क है ? बस कथा का प्रताप है। पर वो कथा हमें गुरु से मिली है। ये कथा ये समझ हमको अपनी श्रद्धा से गुरुओं से मिली है। हमने अपने गुरुदेव से भक्ति दो , विवेक दो , वैराग्य दो , ज्ञान दो के सिवा और कुछ नहीं माँगा।
>>अपने को नश्वर शरीर मानने का कुसंस्कार पूरी तरह त्यागो :
किसी भी अवतार का शरीर रहा क्या ? बुद्ध का शरीर रहा क्या ? महाबीर का शरीर रहा क्या ? श्री रामकृष्ण परमहंस का शरीर रहा क्या ? शंकराचार्यजी का रहा क्या ? और तुम्हारा रह जायेगा ? तांत्रिकों , बाबाओं और योगियों के चक्कर में क्योंपड़े हो ? शरीर जितना स्वस्थ रह सकता है , उसके लिए प्रयास करो। पर याद रखना कि 'तुम माता के लिए प्रदत्त हो ! ' याद रखना 'तुम माता के लिए बलिप्रदत्त हो !' ये शरीर देवी पर चढ़ने वाला है , बकरे की माँ वाली कहानी , ये शरीर बलि का बकरा है। पता नहीं किस दिन बलि होगी ? तुम बस तैयार रहो। (40:34) ये जब किसी संन्यासी का नहीं रहता , तब तुम्हारा क्या ? जब हम अपने शरीर को नहीं बचा सकते , तो तुम्हारे शरीर को बचा लेंगे ? अगर हमारे हाथ में करामात होता , तो हम रोज अपने सिर हाथ रखते हैं, लेकिन बुढ़ापा आ गया, रोक नहीं पाए । रोज नहलाते हैं , पूरे शरीर पर हाथ फेरते हैं। हमतो खुद पर हाथ फेरते हैं , पर बुढ़ापा चला आ रहा है। पर चिंता क्यों नहीं ? बस, गुरुओं का ज्ञान-तत्वमसि । इसीलिए अंत में कहते हैं-
जे सौ चंदा उगवे, सूरज चढ़े हजार ।
एते चानन होन्दिया, गुरु बिन घोर अंधार।।"
गुर बिनु सुरति न सिद्ध, गुरू बिनु मुकति न पावै ॥
गुरु के बिना समझ में नहीं आता। बिना गुरु के मुक्ति नहीं मिल सकती। वैसे नशा छुटाने वाले गुरु हैं , अच्छे रस्ते पर चलने की सलाह देने वाले गुरु हैं। माता-भी गुरु ही हैं। पर हम गुरु उसे कहते हैं - जो तुम्हारे भ्रम तोड़ दे। देह होने का भ्रम, जन्म-मरण का भ्रम तोड़ दे। आवागमन की भ्रान्ति, विकार की भ्रान्ति। (42:05) विकार भी भ्रान्ति है , नहीं तो - 'सर्वनिवासी सदा अलेपा।' अर्थात ब्रह्मज्ञानी सदा निर्लेप रहता है। कोई भी अज्ञानी अज्ञानी (जीवन में आने वाली सुख-दुःख में) सदा निर्लेप नहीं हो सकता। एक भी अज्ञानी ये नहीं कह सकता -मैं सदा निर्विकार हूँ ! कोई भी देहाभिमानी अन्तःकरण का व्यक्ति सदा निर्विकार कैसे रहेगा ? इसलिए-
ब्रह्मज्ञानी सदा निर्लेप, जैसे जल माहि कमल अलेप।
ब्रह्मज्ञानी सदा निर्लेप इसलिए है कि वो 'ब्रह्म' है -'मन' है ही नहीं। (42:41) इसलिए ब्रह्मज्ञानी सदा निर्लेप रहता है। नहीं तो मन से जुड़ा रहने पर कुछ न कुछ तो लगा रहता है। यदि मैं देह और मन की तरफ ध्यान दूँ, अर्थात यदि मैं भी देहाभिमानी बन जाऊँ , तो मैं भी तुम्हारी ही तरह सभी प्रकार की दुर्बलताओं से ग्रस्त हूँ। पर मैं जब अपने यथार्थ स्वरुप पर ध्यान/बुद्धि को प्रतिष्ठित रखूं तो आत्मा में कोई दुर्बलता है ही नहीं। दोनों दृष्टियाँ /बुद्धि / मति आएंगी। यदि अपने घड़ा सोचने वाली बुद्धि (नाम-रूप आकार नश्वर देहाभिमान) सोचने वाली बुद्धि है, तो मिट जाओगे। और यदि मिट्टी हो (आत्मा से जुड़ी बुद्धि /मति/दृष्टि है) तो कोई मिटा न सकेगा। तुम्हारी दृष्टि किस पर है- घड़े पर रहती है या मिट्टी पर ? दो नजर (बुद्धि/दृष्टि/मति) है , एक दृष्टि हमेशा घड़े पर रहती है ,एक दृष्टि हमेशा मिट्टी पर रहती है । देह पर है कि आत्मा पर ? जिससे सब निकला है , सब स्थित है और जिसमें सब लीन हो जाता है। (43 :31)
नजरें बदल गयीं तो नजारे बदल गए , किश्ती का रुख बदला तो किनारे बदल गए।
मुख्य प्रश्न ये है कि तुम्हारी नजर में तुम कौन हो ? अपनी दृष्टि में तुम क्या हो ? अपनी दृष्टि में तुम स्वयं घड़ा हो या मिट्टी हो ? पानी हो कि लहर हो ? सोना हो कि गहना हो ? तुम्हारी दृष्टि कहाँ रहती है; घड़े पर रहती है , या मिट्टी पर ? नश्वर देह हो कि अविनाशी आत्मा ? अपनी दृष्टि/बुद्धि में तुम क्या हो ? अपनी नजर में अभी जाग्रत अवस्था में अपनी अनुभूति के अनुसार क्या तुम अभी भी बिना देह और इन्द्रियों के आनंद स्वरुप सच्चिदानन्द हो ?
जाग्रत में अपनी नजर में ये देह है , तुम्हारा। निद्रा में ये देह सोया था तुम्हें पता नहीं था। सपने में आपने एक नया देह बना लिया और आपकी पहचान वही हो गयी। मैं रोड पर हूँ और एक कार आयी। पैर को कुचल दी , पैर टूट गया। आप नींद से उठ गए।
अब बताओ आप कहाँ हो ? खाट पर हो या रोड पर हो ? तो फिर परेशान क्यों हो ? तुम सही में कुछ हो जो देखते हो वही हो यह तुम्हारा सच है। पर वास्तविक सच है यह है कि तुम खाट पर हो। यह भी तुम्हारी समझ का एक सच है कि तुम्हारा पैर टूट गया। (44:21)
इसी तरह ये सच है कि आत्मा सदा निर्लेप है। पर ये भी सच है कि तुम्हारी बुद्धि तुम्हें लिप्त बना देती है।इसलिए ब्रह्मज्ञानी के सिवा कोई सदा निर्लेप हो ही नहीं सकता। जो देहाभिमानी बुद्धि से ग्रस्त है वह लिप्त-अलिप्त होता रहता है। सदा अलेप का अनुभव उन्हीं को होगा जो आत्मज्ञ हैं। मुझे कुछ और कहना का था , पर आपके मतलब का था , कह दिया। पर एक चीज ध्यान रखना आप गीता का स्वाध्याय जरूर करें। उपनिषदों का स्वाध्याय करो। स्वामीजी का स्वाध्याय करो।
ॐ शांति , ॐ शांति,ॐ शांति। (45 :35) भगवती गीता जी की आरती। आरती कीजे हनुमान लला की।
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[ "जय भगवान गदाधर श्री विष्णुपद मन्दिर श्रीहरि की जय , श्री श्री माँ महालक्ष्मी की जय !"
[ भगवान गदाधर श्री विष्णुपद श्री हरि मंदिरगयाजी में एक ही पद का चिन्ह है। क्यों ?-चिज्जड़ ग्रंथि को समझने के लिए।मेरे मन में प्रश्न उठा -ये पदचिन्ह जिसकी लम्बाई 40 सेंटीमीटर है, यह पदचिन्ह कहीं भगवान गदाधर (ठाकुरदेव) के'वामन अवतार' समय का तो नहीं है ?
"O Lord, where should I lay the second step of desire?
I found the entire desert of possibility to be only a footprint ! "
हे भगवान, तमन्ना का दूसरा कदम कहाँ रखूँ?
"मैंने संभावना के पूरे रेगिस्तान को सिर्फ़ एक पदचिह्न पाया !"
रेखा फाउंडेशन के संस्थापक संजीव सर्राफ की जीवन यात्रा को मिर्ज़ा ग़ालिब का यह शेर रेखा फाउंडेशन के उद्देश्य को पूरे सार में दर्शाता है- "लाखों लोगों के दिलों में समृद्ध विरासत (श्रद्धा?) को जगाना!" संजीव सर्राफ एक उद्योगपति, उद्यमी, निवेशक, लेखक और साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षक हैं। सर सैयद एक्सीलेंस नेशनल अवार्ड के प्राप्तकर्ता, उन्होंने रेखा फाउंडेशन की स्थापना करके भारत और उसके बाहर उर्दू भाषा के संरक्षण और प्रचार के लिए खुद को समर्पित किया है। जो एक आदमी के उर्दू के प्रति जुनून के रूप में शुरू हुआ था, वह अब भारतीय भाषाओं के संरक्षण, डिजिटलीकरण और प्रचार में बदल गया है। संजीव ने कई किताबें लिखी हैं, जिनमें वेवर्ड वर्सेज, गोल्डन वर्सेज गोल्डन वॉयस, नवा-ए-सरोश और उर्दू कविता में लव लॉन्गिंग लॉस शामिल हैं। ]
बिहार के ' गयाजी ' में भगवान विष्णु के पैरों के निशान पर मंदिर बना है। जिसे विष्णुपद मंदिर कहा जाता है। इसे धर्म शिला (धर्म-शील) के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि पितरों के तर्पण के बाद भगवान विष्णु के पैरों के निशान के दर्शन करने से दुःख खत्म होते हैं और पितर संतुष्ट होते हैं। इन पदचिह्नों का श्रृंगार लाल चंदन से किया जाता है। इस पर गदा, चक्र, शंख बनाए जाते हैं। यह परंपरा मंदिर में कई सालों से चली आ रही है। ये मंदिर फल्गु नदी के पश्चिमी किनारे पर है। कुछ ग्रंथों के मुताबिक राक्षस गयासुर को धरती पर स्थिर करने के लिए धर्मपुरी से धर्मवत्ता शिला लाई गई थी। जिसे गयासुर पर रखकर भगवान विष्णु ने अपने पैरों से दबाया। इसके बाद इस चट्टान पर भगवान के पैरों के निशान है। माना जाता है कि दुनिया में विष्णुपद ही ऐसी जगह स्थान है, जहां भगवान विष्णु के श्री चरणों के दर्शन कर सकते हैं।
विष्णुपद मंदिर के शीर्ष पर 50 किलो सोने का कलश और 50 किलो सोने की ध्वजा लगी है। गर्भगृह में 50 किलो चांदी का छत्र और 50 किलो चांदी का अष्ट पहल है, जिसके अंदर भगवान विष्णु की चरण पादुका विराजमान है। इसके अलावा गर्भगृह का पूर्वी द्वार चांदी से बना है। वहीं भगवान विष्णु के चरण की लंबाई करीब 40 सेंटीमीटर है। 18 वीं शताब्दी में महारानी अहिल्याबाई ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था, लेकिन यहां भगवान विष्णु का चरण सतयुग काल से ही है।
सोने को कसने वाले कसौटी पत्थर से बना है विष्णुपद मंदिर, जिसे जिले के उत्तरी हिस्से के पत्थरकट्टी से लाया गया था। इस मंदिर की ऊंचाई करीब सौ फीट है। सभा मंडप में 44 पिलर हैं। 54 वेदियों में से 19 वेदी विष्णुपद में ही हैं, जहां पर पितरों के मुक्ति के लिए पिंडदान होता है। यहां सालों भर पिंडदान होता है। यहां भगवान विष्णु के चरण चिन्ह के स्पर्श से ही मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं।
अरण्य वन बना सीताकुंड विष्णुपद मंदिर के ठीक सामने फल्गु नदी के पूर्वी तट पर स्थित है सीताकुंड। यहां स्वयं माता सीता ने महाराज दशरथ का पिंडदान किया था। प्रबंधकारिणी समिति के सचिव गजाधर लाल पाठक ने बताया कि पौराणिक काल मेंयह स्थल अरण्य वन जंगल के नाम से प्रसिद्ध था। भगवान श्रीराम, माता सीता के साथ महाराज दशरथ का पिंडदान करने आए थे, जहां माता सीता ने महाराज दशरथ को बालू फल्गु जल से पिंड अर्पित किया था, जिसके बाद से यहां बालू से बने पिंड देने का महत्व है।
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आत्मभाव में सतत कैसे रहें ? ।। APROKSHANUBHUTI ।। How to be persistent in
spirit?
आत्मानं सततं जानन् कालं नय महामते ।
प्रारब्धमखिलं भुजन्नोद्वेगं कर्तुमर्हसि || ८९
[हे ज्ञानवान् पुरुष ! तुम सतत प्रयत्न करते हुए आत्मा के स्वरूप को समझने का प्रयास करो। उसी के सच्चिन्तन में अपने समय को लगाओ। प्रारब्ध कर्मानुसार जो भी कष्ट कठिनाइयाँ सामने आयें, उनको भोगते हुए तुम्हें उद्विग्न (खिन्न-दु:खी) नहीं होना चाहिए॥]
आत्मा को जान लेना और सदा जानते रहना, जैसे स्वप्न से जग जाना और जगे रहना। अर्थात सतत स्मरण रखना है - मैं क्या हूँ ? चेतन आत्मा हूँ , जड़ शरीर मन (अहंकार) नहीं हूँ। इसका अभ्यास करना कठिन है , पर जब इसकी आदत पड़ जाती तो आसान हो जाता है। ये अब आपकी जिम्मेवारी है। शंकराचार्यजी ने एक स्थान पर लिखा है - जैसे तुम दिन भर चाहे लड़ो-झगड़ो आपकी वृत्ति लड़ते समय , चलते समय भी रहती है कि मैं मनुष्य हूँ ! यह वृत्ति सिर्फ गहरी नींद में सो जाती है। तब आप मनुष्य नहीं रहते। (1:09) शंकराचार्यजी ने लिखा है -'आसुप्ते', अर्थात जब तक नींद न आवे। तब तक आप क्या बने रहो ? आत्मा बने रहो ! सोने के बाद तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं। आत्मा रहते हुए जिओ -जागो और आत्मा के जानते फिर सो जाओ। वहाँ याद रहे न रहे , ये जिम्मेदारी नहीं। और जब जग जाओ , तो फिर शुरू कर दो। आप जैसे ही जग जाते हो , वैसे ही मनुष्य हो जाते हो। जब तक सो नहीं जाते , मनुष्य ही रहते हो। इसी तरह से -आत्मानं सततं ज्ञानं ! (1:56) आत्मा को सतत जानते रहो। सतत जानते रहना -लगातार। जैसे कोई दिया जलाया जलता रहे। जलायें और तुरंत बुझ जाये , ऐसा नहीं दिया जलता रहे। जब तक को कुछ पाठ करना है , या कोई दूसरा जरुरी काम करना है-आत्मानं सततं ज्ञानं ! आत्मा को सतत जानते रहें। दिया जलायें तो जलता रहे ; कम से कम तब तक जबतक हमें पढ़ना है ? या कुछ काम करना है। या देखना है। यदि सोना हो तब फिर जाके सो जाओ। या तुम सो जाओ तो दिया तुम्हारे लिए बुझे ही जैसा है। (2:53)
आत्मानं सततं जानन् कालं नय महामते । ऐ बुद्धिमान ! आत्मा को सतत जानते रहो; या तुम नश्वर देह नहीं अविनाशी आत्मा हो -यह स्मरण बनाये रखो। जान गए हो तो अब स्मरण ही तो करना है। जानना तो है नहीं। स्मरण ही जानना है। अलग से प्रयत्न नहीं करना है। तुम चूँकि जानते हो कि तुम देह और बैठे हो, लेटे या चलते हो तो , बस देह ही हो। अब अंदर सहज भाव से याद रखो तुम चैतन्य हो !आत्मा हो ! इसका स्मरण 'जानन्' का स्मरण करो ! फिर क्या करो ? -प्रारब्धमखिलं भुञ्जन्नोद्वेगं कर्तुमर्हसि ॥ प्रारब्धं अखिलं माने सभी प्रकार के प्रारब्ध - दोनों तरह के प्रारब्ध , बुरे भी और अच्छे भी। कभी मैंने बुरे कर्म और अच्छे कर्म जैसे भी कर्म किये हैं , जिसका फल प्रारब्ध है यह शरीर। इसको जानते हुए, बिना उद्विग्न हुए भोगते रहो। भोगने में उद्विग्न न हो , शीघ्रता न दिखाओ। प्रारब्ध के लिए ,सुखभोग के लिए , बहुत लालायित भी न रहो, और दुःख से उद्विग्न भी न हो। जो प्रारब्धवश आ रहा है, उसको ज्यादा बदलने के लिए व्यग्र न हो। केवल सुख ही मिलता रहे , दुःख आये ही नहीं ऐसी इच्छा छोड़ दो। (5:08) जैसे स्वप्न से जागा हुआ व्यक्ति , यह सोचे कि आगे कोई बुरा स्वप्न ही न आये, केवल अच्छा स्वप्न ही आये ? यह चुनाव नहीं करना है। कई लोग तो स्वप्नों से भी बड़े परेशान हो जाते हैं। और स्वप्नों की शिकायत -स्वप्न के समय नहीं करके जगने के बाद करते हैं। बुरे -बुरे सपने आने की शिकायत जगने के बाद करते हो। जग जाने के बाद क्या शिकायत ? पर हो न बुद्धू ? जब सपने चले गए , तब शिकायत करते हो ? कहने के तात्पर्य यह है कि ज्ञानी को प्रारब्ध का भी चुनाव नहीं करना चाहिए। जगने के बाद स्वप्न का चुनाव में हमें तो लॉटरी आने का स्वप्न ही आना चाहिए। स्वप्न में ही तो सुख-दुःख हुआ था ? तब जगने पर क्यों शिकायत करें ? झूठा जानने के बाद भी शिकायत ? यदि आप आत्मज्ञानी हो, अगर आपको स्पष्ट रूप से यह ज्ञात है , कि आप आत्मा हो। तो बाकी सब सपना है ! (6:58) यदि मिट्टी सत्य है , तो घड़ा हो , सुराही हो , छोटा हो या बड़ा हो ? वो बर्तन स्वप्ने से ज्यादा नहीं है। भले ही यह सपना कितना लम्बा क्यों न हो ? वो तो एक आत्मा ही सत्य है , बाकी सब सपना है। कोई स्वप्न ही स्वप्न नहीं होता है। सत्य वस्तु (पर्दा) में प्रतीत होने वाली हर वस्तु सपना ही है। ऐसा नहीं है कि बड़ा आकार वाला बर्तन सच होता है , छोटा आकार वाला सपना होता है ? सच तो सिर्फ मिट्टी होती है। ये जगत जो जैसा दिख रहा है , सब सपना ही है। जागके भी सपनों का चुनाव करना , ऐसा लगता है जैसे सपनों से तुम घबड़ाये हुए हो ? स्वप्न के समय का डर , जो सुख-दुःख अनुभव हो गया , उसको तुम जागने के बाद भो झूठा नहीं कर पा रहे हो ? स्वप्न में सुख दुःख हो गया था , लेकिन जगने पर क्या पता चला ? सच था ? इसलिए अब आगे के सपनों का भी चुनाव नहीं करो। और गीता का यह श्लोक हमेशा याद रखो -
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।।2.11।।
ज्ञानी बीत गए स्वप्नों के लिए भी नहीं सोचता और आगे की सपनों को सोचकर उसकी परवाह नहीं करता। (8:29) जगने के बाद तो स्वप्न रहता ही नहीं है। अभी तो तुम जगे हुए हो। जो सपना बीत गया और जो आने वाला है। इस समय -इस जाग्रत अवस्था में भी अगर तू सुख-दुःख से मुक्त नहीं , तो तू ज्ञानी ही नहीं है। हमेशा याद रखना - वर्तमान में जो मुक्त नहीं है , वो ज्ञानी ही नहीं है ! (9:07) वर्तमान में जो 'कर्ता' है वो ज्ञानी नहीं है। तो वर्तमान में जब तुम कुछ कर ही नहीं रहे हो , तो वर्तमान में कोई समस्या ही नहीं है। समस्या है जो बीत गयी उसकी याद। बीते स्वप्न क्या दुबारा आ सकते हैं ? जो यह चुनाव करे कि अच्छा स्वप्न आये , बुरा नहीं आये , तो उससे ज्यादा बुद्धू कौन होगा ? जैसे कोई एक्टर यह चुनाव करे कि हम तो जीतने वाले राजा का ही अभिनय करेंगे। हारने वाला राजा का अभिनय नहीं करेंगे ? यदि अभिनेता है , तो डाइरेक्टर जो भूमिका दे उसका अभिनय करना होगा। या जवान बनने का अभिनय करेंगे , बूढ़ा , कमजोर बनने का अभिनय नहीं करेंगे ? अभिनेता को कैसी भूमिका मिलेगी ? इसका चुनाव कौन करेगा ? यदि सब नाटक ही है , तो कुछ भी बन जाओ। यदि स्वप्न मिथ्या है , तो आगे का भी चुनाव नहीं करना चाहिए। जब तूने अभी सपनो का चुनाव नहीं छोड़ा , तो जगत का चुनाव क्या छोड़ेगा ? गता असून्- अगता असून्- च- न अनुशोचन्ति पण्डिताः। यदि ज्ञानी है , तो पहले क्या हुआ, आगे क्या होगा, इन दोनों में माथा नहीं खपाना । इस समय तो तूँ मुक्त है ही। (11:30) यदि इस समय भी यदि तूँ नहीं जाग रहे , तो तूँ अभी ज्ञानी नहीं है। (विवाह-बंधन में बंधा मान रहा ?) यदि इस समय तूँ ब्रह्म नहीं है ? इस समय यदि तू आत्मा नहीं है , (देह का अभिमानी है ?) तो तूँ आत्मा कब है ? यही तो सही समय और समझ (दृष्टि) था , जहाँ तूँ आत्मा होता ? और जो बीत गया - (1950 से 2025 तक =75 वर्ष) वो भी स्वप्न था , और जो शरीर छूटने की निश्चित भविष्य की कोई तारीख और समय है ,वो भी स्वप्न है। वर्तमान में तो तुम्हारे आलावा और कोई दूसरा सत्य है ही नहीं ! (12:00) जो सपने चले गए , उनको क्या सोचना? और जो सपना अभी चल रहा है , दुबारा सोने के बाद का नहीं। अभी जगा है तो सपना गया। लेकिन अभी कोई नया सपना तो नहीं देखने लगे ? इस समय जब तुम जागा है , इस समय तूँ क्या है ? जिस मूर्ख ने स्वप्न को देखा था- वो सपना तो चला गया। पर क्या तूँ अभी जागा है ? कि सपना झूठा था मैं सच्चा हूँ। अब देह को तो सत्य नहीं बना लिया ? जगत (होटल-मकान नाते -रिश्ते ?) को तो कहीं सच्ची नहीं बना ली ? नहीं तो एक सपना छोड़ा दूसरे में आ गया , सोने की जरूरत ही नहीं पड़ी ? अब भी तो तूँ सोया ही है , जगा कहाँ है ? अगर स्वप्न स्वप्न तो हुआ , पर जगत यदि सच्चा है (मिथ्या नहीं हुआ ?), तो तूँ अभी जागा है क्या ? सिर्फ सपना चेंज हुआ है। सपने से जाग जाने के बाद - "ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव न अपरः" का अनुभव हो जाने के बाद भी क्या तूँ आत्मा नहीं बना ? (13:07) स्वप्ने यदि झूठे होते तो आत्मा केवल आत्मा ही सच्ची लगती ? जाग के भी लोग अभी कहाँ जागे हैं ? यदि जग गए तो - जगत मिथ्या यानि सपना है ? यदि तुम स्वप्नों के द्रष्टा (साक्षी) हो , तो जगत का द्रष्टा कौन है ? देखने वाला साक्षी /द्रष्टा तो अब भी सत्य है। स्वप्न से जागे व्यक्ति को , आगे के स्वप्न की चिंता तो करनी ही नहीं है। स्वप्न से जगे व्यक्ति की आत्मा अभी सत्य नहीं हुई है - अर्थात अपने देहाभिमान को अभी भी त्याग नहीं सका है। जब ठीक जगे होते तो स्वप्न का देहाभिमान (M/F शरीर) मिथ्या होता, 'मैं' (आत्मा हूँ ) यह सच्चा होता। नहीं तो हर जागा हुआ आदमी मुक्त हो जाता। अभी केवल स्वप्न मिथ्या हुआ है , जगत सत्य लग रहा है ? स्वप्न देखते समय का देह तो झूठा हो गया , पर जब तक शरीर है , यही देह सच्चा हो गया ? स्वप्न का सुख-दुःख तो झूठा हो गया पर जगने के बाद प्रारब्धवश जो दुःख-दुःख मिल रहा है वे सच्चे हो गए ? तो अभी जागा कहाँ ? तूँ सदा सत्य रह , स्वप्न में भी तूँ सच्चा था , जाग के भी तूँ ही सच्चा है। (15:04) जाग ऐसा कि तेरे अलावा सच कोई न हो। पूरा जगने का मतलब तूँ ही सच्चा; माने तुम्हारी देह-मन सच्चा नहीं, देहमन सच्चा तो फिर तेरा सपना भी सच्चा था ? केवल तूँ सच्चा और कुछ भी दृश्य -सच्चा नहीं , इसका नाम जागना है। जाग के भी तूँ आत्मा पर फिर देह को आरोपित करता है कि मेरा दुःख सच्चा ? मेरा घर सच्चा , मेरा होटल सच्चा , मेरा पैदा होना सच्चा ? (1950 से 2025 तक =75 वर्ष तक का अनुभव सच्चा ?) अमुक तारीख को मेरा मर जाना सच्चा ? इसीलिए अभी भी तूँ जागा नहीं है।
एक बार जगकर जो भी देखा जाना जाता है, वो विज्ञान का विषय है। वहाँ से सब स्वप्न है - चाहे जाग्रत हो या स्वप्न हो। इसका नाम जागना है। (16:05) स्वप्न से जागा हुआ व्यक्ति , अज्ञानी भी जो पूरा नहीं जागा , वह भी स्वप्न से जागकर स्वप्नों की चिंता नहीं करता। इस देह का अभिमानी भी आगे के स्वप्नों के विषय में नहीं पूछता। स्वप्न के दुष्परिणाम की चिंता से मुक्त होने का मंत्र पाना चाहते हो ? यदि तुम अपनी आत्मा के सिवा कुछ भी सच मानते हो , वो अवश्य सपना है। (17:10) जैसे मिट्टी के आलावा कुछ भी सच नहीं है। नींद से जगने के बाद अपना घर-मकान -होटल फिर सच हो गया ? अधिष्ठान में आत्मा (ब्रह्म) होने के कारण चाहे , तुम स्वप्न में मनुष्य बने तब भी वहाँ चेतन (सच्चिदानन्द) ही था , और अब भी यदि देह में हो तो भी चेतन ही हो। क्योंकि एक मात्र चेतन आत्मा (ब्रह्म) के सिवा दूसरा कोई सत्य तो है ही नहीं ! यदि तुम चेतन ही हो तो तुम्हारा DOB क्या हुआ ? (18:22) चेतन का आश्रित देह स्वप्न में भी कल्पना थी , जाग्रत में भी चेतन का आश्रित देह कल्पना ही है। यदि तुम चेतन ही हो तो पैदा कहाँ हुए ? और मरोगे कैसे ? जब जगना और सोना आभास मात्र है , जब जन्म लेना और मरना आभास मात्र ही है, तो सच में तुम सोये कहाँ और स्वप्न में तुम जागे कहाँ हो ? ये जगना और सोना तुम्हारे में कल्पित है। यदि तुम जाग्रत , स्वप्न , सुषुप्ति को सच मानते हो ? तो तुम जागे ही नहीं हो। सपना ही केवल झूठा नहीं है , जागना और सुषुप्ति भी झूठी है। (18:50) स्वप्ने से जाग जाना Nature का सहज स्वभाव है , पर सपने से जागकर जगे ही रहना ? स्वप्न से जागने पर भी जो सच्चा चेतन मिला , पर उसको सच्चा नहीं मानते। पर इस देह-इन्द्रिय -मन को सच्चा मानते हो ? यदि स्वप्न से जगने पर तुमको देह -इन्द्रिय नहीं चेतन मिल जाये। आत्मा का सतत स्मरण बनाये रखो। चैतन्य अधिष्ठान के अतिरिक्त सब कुछ स्वप्न है , जगत स्वप्न है - इसका सतत स्मरण रखो। जो भी घटना घट जावें वे तुम्हारे पुरुषार्थ या कर्म पर निर्भर नहीं है। (20:07) योजना बनाके नहीं जो कुछ सामने आ रहा है, योजना बनाके स्वप्न को हटाने की कोशिश नहीं करना। सपने अपने आप चले जायेंगे, बदल जायेंगे। सपनों की चिंता मत करो। यदि करते हो तो जगने का लाभ क्या हुआ? चैतन्य आत्मा के अतिरिक्त जाग्रत, स्वप्न , सुषुप्ति सब स्वप्न है। "ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव न अपरः"(21:18) इसी बोध में तुम यदि सतत जाग्रत रहो , तो जाग्रत की दुःख -चिंता नहीं रहेगी। जितनी देर जाग्रत में जागे हो , उतनी देर जगत सपना है। जागते हुए भी यदि आत्मा में जागृत नहीं हो , तो जगत सत्य लगेगा। जागृत अवस्था में जगत को न पकड़े के तुम चेतन आत्मा हो इस बोध में जागते रहो। यहां इस जगत में भी यदि ज्ञानी अपने आत्मस्वरूप के प्रति मूर्छित हो जाये ? तो जगत सच्चा दिखेगा। और जगत को सच्चा देखे बिना प्रारब्ध नहीं होता है। (22:39)
तो यहाँ इस श्लोक में शंकराचार्य जी कहते हैं , प्रारब्ध से विचलित हुए बिना , भोगते हुए , स्वप्न का चुनाव नहीं करना। इलेक्शन जो हो गया , उसकी चिंता अब नहीं करना। जागे आदमी को तो आगे के स्वप्न की चिंता नहीं करनी चाहिए। जो बीत गया जब वो सपना था , तो आगे वाला भी सपना ही होगा। यदि बीते सभी जन्म-मृत्यु झूठे हैं , बीते सुख-दुःख यदि झूठे हैं , तो आगे आने वाले सच्चे कैसे हो सकते हैं ? (24:15) इसलिए ज्ञानी लोग- गता असून्- अगता असून्- च- न अनुशोचन्ति पण्डिताः। जो भूत -भविष्य में क्या हुआ और होगा - इसकी चिंता न करो। जो आगे की चिंता करते हैं , वे ज्ञानी नहीं हैं। ज्ञानी कभी यह चिंता नहीं करता कि - कब मरेंगे ? कितने दिन की आयु आगे होगी ? या कौन ग्रह लगने वाला है ? ये सोचते ही तुम भूल गए कि मैं आत्मा हूँ, तुम भोक्ता देह बन गए ? जागते समय कोई चिंता मत करो। आगे का सपना कैसा होगा , इसकी चिंता तो मत करो। लेकिन जागते समय भी सपने का चुनाव मत करो। जागे आदमी (ज्ञानी आदमी) को सपने की चिंता क्यों होगी ? बुरा सपना न हो , अच्छा वाला हो ? विधवा होने वाला या विधुर होने वाला सपना न हो। (25:46) ज्ञानी को परिवार का मोह -कैसे होगा ? मुझे कोई दुःख नहीं होना चाहिए, इसका चुनाव कोई ज्ञानी नहीं कर सकता। जागा व्यक्ति यदि सपनों को रत्ती भर भी सच मानता है , तो जगा कैसे है ? यदि आगे 'मेरी' (आत्मा की , चेतन की ) मृत्यु होगी ? तो कभी भी हो ही जाएगी। (26:43) लोगों को लग सकता है , पर जब मैं मर ही नहीं सकता ? यह मुझे इस समय पक्का है। तो उस समय पक्का नहीं रहेगा ? आत्मा होकर भी उस समय मैं मर जाऊंगा ? जब अभी पक्का है कि मैं मरता नहीं हूँ , तो मरने का सपना न आये क्यों सोचूं ? आज इस समय तूँ आत्मा चेतन है , कल मरोगे ? जिस समय आत्मा को भूल जायेगा , तब की बात छोड़। पर जिस समय तूँ ज्ञानी है , तूँ जानता है कि मैं आत्मा हूँ ! इस समय तू मरने की बात कैसे सोच पा रहा है ? आगे के दुःख की कल्पना ही क्यों कर रहा है ? इसलिए ज्ञानी प्रारब्ध से विचलित नहीं होता। (यही टेस्ट है ?) यदि तुम्हें अभी तक प्रारब्ध की भी चिंता है - तो कुछ गड़बड़ हो रहा है। अतएव ज्ञानी को प्रारब्ध के लिए उद्विग्न नहीं होना चाहिए। बल्कि बीते सपनो पर हँसना चाहिए। एक बार मैं पहाड़ पर चढ़ रहा था हड्डा / बिढ़नी ने इतनी जोर से काटा ? कि उसका डंक वहीं रह गया। मुझे लगा इसे मारना नहीं चाहिए, इसका डंक रूपी हथियार नहीं है , पर वो जाकर अपने साथियों को सुचना दे रही थी। फिर मुझे कंबल में लपेट कर लाये। (मेरे पुराने टीना छत वाले घर की छत पर मुझे भी हड्डा ने काटा कि पूरा चेहरा फूल गया। और हफ्ते भर फूला ही रहा। प्रभु चाचा की लड़की मुझे चिढ़ाने आती थी।) पुराने कष्ट बातके आनंद आना चाहिए। पहले हम ऐसे लड़ते थे , गाली देते थे। तो इसे बताके अब ग्लानि क्यों होना चाहिए ? बीती बातों से तो आनंद है। कई लोगों ने अपनी कथा खुद ही लिख दी। महात्मा गाँधी ने अपने भोग लिख दिए -सत्य के साथ प्रयोग लिख दिए। मैं ऐसा था ? ख़ुशी से बताओ पहले हम बहुत बदमाश थे। पर अब तो नहीं हैं ? यदि अब भी थोड़े हो तो डरोगे। यदि अभी भी थोड़ी कमी है तो बताने की हिम्मत नहीं करोगे। यदि अभी आप में कोई कमी नहीं है , और आगे फिर वैसी गलती दोहराने की तैयारी नहीं है , तो बताने में क्या है ? पहले जन्म में हम शैतान थे !(30:53) उसके पहले जन्म में जाने हम क्या -क्या रहे होंगे ? उसकी कोई ग्लानि है , इस जन्म में ? कितने बड़े पापी रहा हूँ पिछले जन्मों में ये याद भी नहीं है। उसकी क्या चिंता है ? वैसे ही बीते समय की चिंता क्यों करें ? जो सचमुच मिट्टी है (सच्चिदानन्द स्वरुप है) ऐसा बिल्कुल स्पष्ट है, इस समय एकदम क्लियर है। तो ये मिट्टी पहले क्या रही होगी ? घड़ा रही होगी, या सुराही रही होगी? इसकी चिंता क्यों करें ? जब अभी मिट्टी है (आत्मा ही सच्चिदानंद है) तो पहले क्या है? पहले हम अपने सिर्फ देह ही मानते रहे , पर आज जब जान लिया मिट्टी हूँ। तो पहले जितने समय जो भी रहे , तो वह सभी नाम -रूप झूठे रहे कि सच्चे रहे ? पहले तो यही याद नहीं कि इस जन्म के पहले क्या रहे थे। यदि इस समय ये सचमुच मिट्टी है , इस बर्तन के रूप में आने के पहले , जिस रूप के बर्तन थे , वह झूठ था या सच था ? तो फिर पुराने समय की क्या चिंता ? तो जब पुराने की चिंता नहीं , अभी की नहीं तो आगे क्या हो जाओगे ? आगे घड़ा या सुराही बन जाओगे ये बनने का ख्याल आएगा ? तो ख्याल या कल्पना कोई चिंता करने की चीज है। इसलिए ज्ञानी मुक्त होकर जो भी होता रहे, वो हो जाने दे। कोई भी प्रारब्ध सपने से ज्यादा कुछ नहीं है। (32:50) जो होगा झूठा होगा - नंबर 2 का होगा। नंबर 1 में 'सत्य मैं हूँ !' था , हूँ और सत्य ही रहूँगा ! तुम्हारे सिवा सृष्टि में कुछ भी सत्य नहीं है। 'तुम्हारे' सिवा माने ? 'मनोज भाई; जो बैठा है ? जरा सी भी चुके (जड़-चेतन ग्रंथि समझने में) तो वेदांत की बात बिल्कुल गप्प लगेगी। और जरा सी भी समझ आयी तो एक -एक बात तुम्हारे दिमाग में धँस जायेगी। तुम यदि मनुष्य हो तो तुम्हें समझ नहीं आएगी। क्योंकि तुम देह हो ! तुम यदि अपने को देह समझते हो , तो मरना ही सत्य लगेगा। चेतन आत्मा मर कैसे सकती है ? इस शाश्वत चैतन्य अधिष्ठान का विचार करके जीवन को धन्य बनाओ !....
उत्पन्ने तत्त्वविज्ञाने प्रारब्धं नैव मुञ्चति।
तत्त्वज्ञानोदयादूर्ध्वं प्रारब्धं नैव विद्यते॥
चाहे ये पूर्वपक्ष का है या हमारी कमजोरी को स्वीकार करते हुए शंकराचार्य कहते हैं। -उत्पन्ने आत्मविज्ञाने - यानि आत्मविज्ञान के उत्पन्न होने पर भी, प्रारब्धं नैव मुञ्चति' प्रारब्ध नहीं छोड़ते। जग जाने के बाद स्वप्न आना नहीं छोड़ेगा , अभी होगा। परन्तु जगने का एक ही लाभ है कि पहले और आगे की सपनों की तुम परवाह ही न करोगे ! (34:15) ज्ञान का लाभ इतना ही है कि फिर शरीर है , कि भूख है कि बुढ़ापा आदि घटनायें नहीं घटेंगी , ऐसा नहीं होगा। ये प्रारब्ध है, ये घटेंगी। लेकिन उसका निराकरण का उपाय है। जब इसको समझेंगे तो प्रारब्ध भी कब मालूम पड़ेगा, जब सपना सच्चा लगने लगेगा। इस समय नहीं , लेकिन जितनी देर नींद आ गयी और सपना हुआ उतनी देर दुःख देगा। यदि आत्मस्वरूप में सतत जागे रहोगे तो प्रारब्ध नहीं होगा। इसका मतलब प्रारब्ध केवल सोये हुए लोगों का ही होता है। (35:28) अज्ञान काल में ही प्रारब्ध होता है। ज्ञानकाल में व्यक्ति प्रारब्ध को स्वीकार नहीं करता। या तो थोड़ी देर की मूर्छा हो गयी , ध्यान न रहा। मेरे गुरु विनोद में कहते थे कि प्रारब्ध विधवा को भी नहीं छोड़ता। किसी विधवा को लड़का हो गया। पर शंकराचार्य प्रारब्ध को सिद्ध करना नहीं चाहते। कहते हैं ये जो तुमने सुन रखा है कि आत्मज्ञान होने पर भी प्रारब्ध नहीं छोड़ता ,ये बात सच्ची नहीं है। तत्त्वज्ञानोदयादूर्ध्वं प्रारब्धं नैव विद्यते॥तत्वज्ञान के उदय होने पर - प्रारब्ध नहीं रहता। देहादिनां सत्यं त्वा यथा स्वप्न- अधिष्ठान के तत्व का बोध होने पर सम्पूर्ण जगत स्वप्नवत हो जाता है। जिस समय तुमको ये लगता है कि ये सब सपना है, केवल चैतन्य ही सत्य है। तब जागे समय प्रारब्ध हो ही नहीं सकता। स्वप्न से जागने पर जाग्रत का प्रारब्ध आ जाता है। स्वप्न से जगे तो , स्वप्न का प्रारब्ध गया। लेकिन तब जाग्रत का प्रारब्ध उसकी सर/खोपड़ी पर चढ़ जाता है। पर जो जागृत में भी जाग गया है , उसके लिए तीसरा जगत कहाँ है ? स्वप्न और जाग्रत दोनों ही जब स्वप्न हैं -तो तीसरा कोई जगत नहीं है। (37:58) जो तुम पर हावी हो जाये। एक बात और बताएं , छिपी छिपी सी बात है। जब सुख होता है तब लोग प्रारब्ध नहीं मानते। असल में दुःख को ही लोग प्रारब्ध मानते हैं। जबकि सुख भी प्रारब्ध है। यदि आप लौकिक सफलताओं को सच्ची मानकर फूल जाते हो , तो प्रारब्ध में आ जाओगे। फर्क इतना है कि सुख भोगना पसंद हैं , दुःख भोगना नहीं चाहते इसलिए उस समय हमें चिंता हो जाती है। उपाय खोजते हो कि भोगना न पड़े। पर जो भोगता है उसको सुख-दुःख दोनों भोगना होगा। जो सपने का सुख भोगता है , वो सपने का दुःख भी भोगता है। और जगने पर सपने का सुख सच्चा बना रहेगा ? और दुःख झूठा हो जाये ये नहीं हो सकता। अज्ञान के कारण भीतर भोगने का स्वाभाव बना हुआ है। सतत याद रखो , तुम चेतन आत्मा हो , सुख-दुःख के साक्षी हो ब्रह्म हो। ब्रह्मज्ञानी अकर्ता , अभोक्ता है। दुःख निर्लेप सदा निर्लेप। अंदर से सुख को पकड़ना न चाहो। कर्म जन्मांतर कृतं प्रारब्धं - प्रारब्ध किसे कहते हैं ? जन्म-जन्मांतर में जो कर्म किये हैं , इस जन्म के अतिरिक्त जो जन्म हुए, उसमें किये गए कर्म को प्रारब्ध बोलते हैं। प्रारब्ध भोगने के लिए ये शरीर बना। माँ-बाप का चुनाव प्रारब्ध से हुआ। लेकिन ज्ञान के समय यह पता चला कि यह जन्म भी सपना था ? तो आप कर्ता नहीं रह जाते। वैसे ही पहले भी आप कर्ता नहीं थे। यदि इस जन्म में आप समझ गए मैं आत्मा हूँ , मैं जन्मा ही नहीं हूँ। तो कर्ता नहीं , भोगता भी नहीं हूँ। जब आप जान गए कि आत्मा जन्मती ही नहीं है , तो पहले भी नहीं जन्मी है। अब तुम अविनाशी , अजन्मा , अविकारी आत्मा हो। तुम देहाभिमानी मनुष्य भी नहीं हो -कर्ता भी नहीं हो। यदि इस समय ये घड़ा मिथ्या ही है , तो पहले भी मिथ्या ही था। उस समय नासमझी से सच मान लिया था। यदि तुम सतत ज्ञान में प्रतिष्ठित हो तो प्रारब्ध नहीं है। (45:25) ज्ञान होने के बाद जब तक शरीर में हो , ये ठाकुर-माँ -स्वामीजी के वश में ही रहेगा। मृत्यु होने तक देह यही रहेगा। जब तक आप जागे रहोगे , सपने का भोग नहीं होगा। लेकिन देहाभिमानी हुए तो प्रारब्ध आ जायेगा। जिसमे अज्ञान जनित कोई भी संस्कार बचा नहीं है - जड़ M/F जीव का आकर्षण। और चेतन आत्मानंद का होश है। जो अभी चिंतन के रस्ते पर चल रहे हैं , उनको लगेगा कि अभी प्रारब्ध है। जिनके अंदर ज्ञान की निष्ठा सतत बनी रहती है , वह दुखी नहीं होता। जब तुम्हारा कोई मरा ही नहीं , तुम न पति हो , न पत्नी हो। यदि बुद्धि की ये निष्ठा है तो प्रारब्ध नहीं है। जो सुखी -दुःखी होते हैं , तो है प्रारब्ध। तुम्हें कुछ सुख हुआ तो अच्छा प्रारब्ध है , कुछ दुःख हुआ तो बुरा प्रारब्ध है। जिनके घर में किसी की मृत्यु हो गयी और वो दुःखी नहीं है , तो प्रारब्ध क्या है ?(50:43) ज्ञानी की बात से लोगों को चिढ़ भी हो जाती है। तुम्हारी जरा सी बात से हम अपमानित हो जाएँ ? अभी घड़ा है - घड़ा बने हो पर दोनों दृष्टि जाग्रत है , मिट्टी का हाथी और मिट्टी का चूहा ? देह रहने तक उपास्य-उपासक है , पर मिट्टी की दृष्टि से दोनों एक है। अपनी समझ में मैं घड़ा नहीं मिट्टी हूँ। अभी यदि तुम जन्मे नहीं हो , तो अगले जन्म का प्रश्न कैसे उठेगा ? अभी यदि तुम घड़ा हो तो ये पूछो कि फूटने के बाद क्या बनोगे ? (53:19) अगर अभी तुम जन्में नहीं हो आत्मा हो तो आगे जन्म कैसे होगा ? यदि अभी ये ठीक ज्ञान है कि मैं जन्मा नहीं हूँ। तो आगे कैसे जन्मूँगा ? यदि कोई घड़े के रहते ये दृढ़ता से यह कह रहा है , कि मैं मिट्टी हूँ , घड़ा तो हूँ ही नहीं , तो क्या वो ये पूछेगा कि आगे क्या होगा ? ये आगे या पीछे जन्म की बात सोचने वाले कहीं न कहीं अभी ज्ञानी नहीं हैं। सारे संसार में ढूँढ़ो तो ज्ञानी ऊँगली पर गिनने योग्य भी नहीं मिलेंगे। (54:22) जिनका अपना कोई प्रारम्भ नहीं , जिनका अपना कोई जन्म नहीं - जो शाश्वत चैतन्य है - जिसके अतिरिक्त दूसरा कुछ है नहीं। सच्चे अर्थों में वही मनुष्य है , वही ज्ञानी है -जो जन्मा नहीं है। वो पहले ही घड़ा नहीं बने। पहले नासमझ थे हम बन गए घड़ा। अब समझ में आ गया कि मिट्टी हैं , तो अब क्या होगा ? जो सचमुच ज्ञानी है , वो घड़ा ही नहीं है। एक हुआ ही नहीं घड़ा , और एक अब घड़ा नहीं रहा मिट्टी हो गया। ज्ञानी (गुरुदेव?) घड़ा हुआ ही नहीं , जिज्ञासु (सत्यार्थी -शिष्य) पहले घड़ा था। (55:22) पर अब घड़ा नहीं रहा , अब मिट्टी हो गया। तो जो पहले ही ज्ञानी थे (नित्यमुक्त नारद , शुकदेव आदि) वे तो जन्मे ही नहीं। उनको लगता है की वे जन्मे ही नहीं। जिनको बाद में ज्ञान हुआ (विवेकानन्द?) ,अब रहे ही नहीं मरने वाले। देहधारी मनुष्य ही नहीं रहे। श्री कृष्ण कहते हैं , मैं अजन्मा हूँ ! ये नहीं कहते मैं आगे अजन्मा हो जाऊंगा। कृष्ण ये नहीं कहते कि अब मेरा जन्म बंद हो जायेगा। बंद होगा मूर्खों का। कृष्ण का तो जन्म ही नहीं हुआ। अज्ञानियों को ज्ञानी के बातें चुभती हैं। जिज्ञासु कहता है , पहले मैं जन्मा तो था (1950) पर वो तो 14 अप्रैल 1992, ऊँच बनारस में मर गया है। जो पैदा हुआ था मर गया। तो अब क्या आगे मरेंगे ? पहले ही मर गए। जो देह रहा ही नहीं - अब आप केवल चैतन्य हो। स्वप्न देहो यथा तथैव - स्वप्न का देह जन्मा ही नहीं। जाग्रत में वो जन्मा है ? जैसे स्वप्न से जगा व्यक्ति जानता है कि स्वप्न का सबकुछ अध्यस्थ था , था ही नहीं। ऐसे ही जाग्रत का भी अध्यस्थ है। जाग्रत का देह भी आत्मा (ब्रह्म) में अध्यस्थ है। इसलिए जन्म ही नहीं हुआ , तो प्रारब्ध कैसा ?
उपादानं प्रपञ्चस्य ब्राह्मणोऽन्यन्न विद्यते।
तस्मात्सर्वप्रपञ्चोऽयं ब्रह्मैवास्ति न चेतरत् ।।४५।।
जैसे घड़े आदि का उपादान मिट्टी है। मिट्टी के सिवा घड़ा नाम की कोई वस्तु नहीं है। ऐसे इस जगत प्रपंच का उपादान अज्ञान [अविद्या -अस्मिता -राग द्वेष -पंच क्लेश] है। सारे स्वप्न का उपादान , कल्पनाओं (M/F आकर्षण) का उपादान अज्ञान (अविद्या) है। किसकी अज्ञानता है - आत्मा की अज्ञानता है और देहाभिमान है ? अपनी आत्मा (ब्रह्मता) का अज्ञान ही सारी सृष्टि का उपादान है। यदि मुझे अपना अज्ञान खत्म हो गया , तो ये सारा जगत क्या है ? जैसा निद्रा से जागकर सपना , जैसे मिट्टी में बर्तन क्या है , यदि तुम मिट्टी हो तो ! जैसे उपादान के जानने पर वस्तु कुछ भी नहीं। ऐसे ही अज्ञान के निवृत्त होते ही , जगत का उपादान अज्ञानता। अज्ञानता मिट्टी यदि खत्म कर दी जाये , तो क्या आप घड़ा बना सकते हैं ? वहाँ मिट्टी से बना घड़ा , यहाँ अज्ञान से बना जगत। जिस अज्ञान से जगत बना , वो अज्ञान ही ख़त्म हो गया। तो प्रपंच कैसे खड़ा हो ? और बिना प्रपंच के खड़े हुए प्रारब्ध क्या होगा ?
यथा रज्जुं परित्यज्य सर्पं गृह्णाति वै भ्रमात्।
तद्वत्सत्यमविज्ञाय जगत्पश्यति मूढधीः ॥
जैसे कोई मूढ़ बुद्धि रज्जु न ग्रहण करके उसे सर्प ग्रहण कर रहा हो। (1:00 :05) कि ये तो सर्प है। जिसकी बुद्धि रस्सी को ग्रहण नहीं करती , उसकी बुद्धि सर्प को ग्रहण करती है। तो रस्सी को ग्रहण न करना अज्ञानता है ? सम्मोहित बुद्धि रस्सी ग्रहण नहीं करती ,सर्प ग्रहण करती है। अर्थात सर्प है यह जानता है , रस्सी है यह नहीं जानता। यदि रस्सी को ग्रहण न करने से सर्प खड़ा हो जाता है। यदि रस्सी विषयक अज्ञान चला जाये , तो सर्प प्रपंच खड़ा रहेगा ? तो मैं जन्मा हूँ , मैं व्यक्ति हूँ , M/F देह हूँ , यह बुद्धि ग्रहण कर रही है , क्योंकि अजन्मा अविनाशी आत्मा का तुम्हें ज्ञान नहीं हो रहा है। तो आत्मा को ग्रहण नहीं करने से आपका प्रपंच खड़ा हो गया है। और जैसे ही आत्मा का अज्ञान निवृत्त हुआ प्रपंच गया। (1 :01:12) जैसे सत्य को न देखने वाले रज्जु को सर्प ग्रहण करते हैं , वैसे ही सत्य को ग्रहण करने वाले जगत को प्रपंच देखते हैं। जिनको उपादान पकड़ में नहीं आता वे जगत देखते हैं , बर्तन भांड देखते हैं। रज्जु रुपे परित्यजे सर्व भ्रान्ति - रस्सी का विज्ञान होने पर रस्सी में सर्प की भ्रान्ति टिक नहीं सकती। ये सर्प है ये भ्रान्ति गयी। जिनको रस्सी है यह ज्ञान नहीं होता उनको भ्रान्ति होती है। अज्ञान से सर्प ज्ञान हुआ , ब्रह्मज्ञान होने से जगतज्ञान खो जाता है। ब्रह्म के अज्ञान से जगत प्रपंच है। ज्ञाते यस्मिन् निवर्तते - शंकराचार्य जी कहते हैं
[ऐ बुद्धिमान ! अर्थात हे स्थित-प्रज्ञ,जैसी मति वैसी गति।तुम तो आत्मा हो स्वयं ब्रह्म ही हो और यही आत्म चेतना मन को सदा प्रकाशित करते रहती है। देहाभिमान से या मन से तादात्म्य करने पर ही हम मन की समस्याओं से प्रभावित हो सकते हैं। अतएव आत्मा को सतत मन से असंग रखो जीवन में जो समस्याएं आए उनका ना प्रतिकार, न चिंता, न विलाप, न किसी वस्तु की कामना, सपना कैसा आये ? इसकी फ़िक्र छोड़ दो।न किसी वस्तु का तिरस्कार जीवन पथ पर जो कुछ भी आए उसे सहर्ष स्वीकार करो। शारीरिक और मानसिक रूप से अपने साथ कुछ ना रखो जो भी परिस्थिति आए उसमें असंग रहो। उसके तटस्थ साक्षी होकर रहो। चिंता सर्पिणी को दूर रखो। प्रारब्ध वश आने वाली सुख-दुःख की घटनाओं को भी जाग्रत का स्वप्न समझकर इन सब विक्षेप का तिरस्कार करके जो विवेकी मनुष्य सदा अपने आत्म भाव में प्रतिष्ठित रहता है, वह शरीर के द्वारा प्रारब्ध भोगकरउसे समाप्त कर देता है।
जिह घटि सिमरन राम को, सो नर मुक्ता जान।
तिहि नर हरि अंतर नहीं, नानक साची मान॥
जिस व्यक्ति के हृदय में निरंतर परमात्मा का स्मरण है, वही वास्तव में मुक्त है। उस साधक (आत्मा) और परमात्मा (अवतार वरिष्ठ) के बीच कोई अंतर नहीं रहता — दोनों एक ही सत्ता हो जाते हैं। यह सत्य है, इसे दृढ़ता से मानना चाहिए। स्मरण (सिमरन) का अर्थ केवल “नाम जपना” नहीं है, बल्कि — देह ,मन और हृदय का पूर्णतः राम (=आत्मा ) में लीन हो जाना है। जब यह पूर्णता आती है, तब साधक की अहंता मिट जाती है,और वही “मैं” — हरि (परमात्मा) में विलीन हो जाता है। तब उसे जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा (मोक्ष) मिल जाता है। निरंतर राम का सिमरन (अवतार वरिष्ठ का सिमरन) ही सच्ची मुक्ति है। जहाँ अखंड स्मरण है, वहाँ साधक और राम एकरूप हो जाते हैं। नानक जी ने पूरे सहज भाव से मोक्ष का उपाय बता दिया —“राम (अवतार वरिष्ठ आत्मा ही ब्रह्म है) का सच्चा स्मरण करो — यही मोक्ष है।]
जागने के बाद भी भूतकाल, भविष्य की चिंता छोड़ वर्तमान का आनंद लो।
आत्मज्ञान के प्रादुर्भूत होने पर भी प्रारब्ध (संस्कार) स्वयं त्याग नहीं करता, किन्तु जैसे ही तत्त्वज्ञान का प्राकट्य होता है, वैसे ही प्रारब्ध कर्म का क्षय हो जाता है। जैसा कि स्वप्नलोक के देहादिक असत् होने के कारण जाग्रत् होने पर विलुप्त हो जाते हैं, विगत जन्मों में जो किये हुए कर्म हैं, उन्हीं कर्मों को प्रारब्ध कर्म को संज्ञा प्रदान की गई है॥
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आत्मज्ञान के बाद का जीवन कैसा होता है?
रामकृष्ण परमहंस
शुभम् अथर्व- Spirituality
[11 अक्टूबर, 1884 को दिया था। यह प्रसंग वचनामृत के 'ईशान के साथ बातचीत' या 'स्त्रियों के साथ बातचीत' के अंतर्गत आता है।
(9:26) ईश्वर दर्शन के बाद भी क्या शरीर रह जाता है महाराज ?
श्रीरामकृष्ण - किसी किसी का कुछ कर्मों के लिए रह जाता है। लोक शिक्षा के लिए। गंगा नहाने से पाप धुल जाता है , और मुक्ति हो जाती है।
>>>श्री श्री रामकृष्ण कथामृत (एपिसोड 1) | रामकृष्ण परमहंस की दिव्य शिक्षाएँ | Insight FM
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भूल से आत्मबोध की पूरी यात्रा ! रामकृष्ण परमहंस
माया जीव को रस्सी को सांप समझने पर मजबूर करती है। (6:19)
माया मधुमक्खी के छत्ते जैसी -मधु भी है डंक भी है। माया में आसक्ति और मोह का डंक छिपा रहता है।
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नेति से इति
श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय
अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल
प्रकाशक
श्री विजय कुमार सिंह
स्थायी प्रतिनिधि
अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल
झुमरीतिलैया शाखा,
तारा निकेतन
विशुनपुर रोड, झुमरीतिलैया ,
कोडरमा, झारखण्ड , पिन -825409
नवंबर, 1993 में प्रकाशित प्रथम बंगाली संस्करण की भूमिका
यह पुस्तिका महामंडल की अंग्रेजी मासिक पत्रिका विवेक जीवन में अलग-अलग समय पर छपे बारह सम्पादकीय निबन्धों का संकलन है। विभिन्न समय पर प्रकाशित होने से भी , समस्त लेखों का विषयवस्तु एक ही प्रकार का है। इसीलिए उन्हें संकलित करके एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया गया है। नेति वाचक शीर्षक होने के बावजूद, उनके पीछे स्वामी जी के सकारात्मक भावों को ही पाठकों के सम्मुख रखा गया है। हमें आशा है कि पाठकवृन्द इन निबन्धों में निहित सकारात्मक विचारों को ही चरित्रगत करके अपने जीवन को सुंदर रूप से गठित कर सकेंगे।
पब्लिशर
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[गुरु खोजने हरिद्वार कुम्भ 1986 - गया में मैंने देखा देवराहा बाबा जीवित थे। सभी सद गुरु तत्व से एक ही हैं। रामकृष्ण मिशन आश्रम, कनखल (साधुओं के लिए अस्पताल) के सौजन्य से सभी हिन्दू अखाड़ों की शोभायात्रा निकल जाने के बाद - अंत में रामकृष्ण मिशन के साधु स्नान करते हैं। नागा साधु से लेकर , देवराहा बाबा , संन्यासी , संन्यासिनी , भारतमाता मंदिर-आपका नाम क्या है ? रामसुखदास हो कि सबसुख दास हो ? तुम कछु न करिहों , सब हम करिहों। फिर कब मिलयेगा ? जब तुमको जरूरत होगी , मैं आ जाऊँगा। इसके बाद मैंने मिशन का फॉर्म भर दिया यहाँ का कलाकन्द प्रसिद्ध है। मलयपुर का रसगुल्ला। रायपुर का भी कुछ फेमस होगा। (बिनीता के नाना सत्यरूपानन्द नन्द जी महाराज? रायपुर।]
নেতি থেকে ইতি
শ্রী নবনীহরন মুখোপাধ্যায়
অখিল ভারত বিবেকানন্দ যুব মহামন্ডল
নভেম্বর, ১৯৯৩
ভূমিকা
এই গ্রন্থ মহামণ্ডলের মাসিক পত্রিকা বিবেক জীবনে বিভিন্ন সময়ে প্রকাশিত বারোটি সম্পাদকীয় নিবন্ধের সঙ্কলন। বিভিন্ন সময়ে প্রকাশিত হলেও প্রবন্ধগুলির মধ্যে ভাবের সাযুজ্য থাকায় এগুলিকে সঙ্কলিত করে একটি পুস্তক আকারে প্রকাশ করা হল। নেতিবাচক শিরোনামের আড়ালে স্বামীজীর ইতিবাচক ভাবই প্রবন্ধগুলির মধ্যে প্রকাশিত হয়েছে। আশা করি এই পুস্তক স্বামীজীর ভাবে জীবন গড়তে যুবকদের সহায়তা করবে।