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शनिवार, 4 अप्रैल 2026

⚜️️🔱श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय -17 ⚜️️🔱अध्याय सत्रह: श्रद्धा त्रय विभाग योग ⚜️️🔱

 ⚜️️🔱अध्याय सत्रह: श्रद्धा त्रय विभाग योग ⚜️️🔱

[श्रद्धा के तीन विभागों के ज्ञान का योग] 

चौदहवें अध्याय में श्रीकष्ण ने माया के तीन गुणों की व्याख्या की थी और यह भी समझाया था कि किस प्रकार से ये मनुष्यों पर प्रभाव डालते हैं। इस सत्रहवें अध्याय में श्रीकृष्ण विस्तारपूर्वक गुणों के प्रभाव के विषय में बताते हैं। सर्वप्रथम वह श्रद्धा के विषय पर चर्चा करते हैं और यह बताते हैं कि कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो श्रद्धा विहीन हो क्योंकि यह मानवीय प्रकृति का निहित स्वरूप है। लेकिन मन की प्रकृति के अनुसार व्यक्तियों की श्रद्धा सात्विक, राजसिक अथवा तामसिक होती है। उनकी श्रद्धा की प्रकृति ही उनकी जीवन शैली का निर्धारण करती है। लोग अपनी रुचि के अनुसार ही अपने भोजन का चयन करते हैं। 

श्रीकृष्ण भोजन को तीन श्रेणियों में विभाजित करते हैं तथा प्रत्येक भोजन के हमारे स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव की चर्चा करते हैं। तत्पश्चात् वह यज्ञ के विषय में यह बताते हैं कि प्रकृति के तीन गुणों में यज्ञ किस प्रकार विभिन्न रूप से सम्पन्न होता है। इस अध्याय में आगे तपस्या के विषय में बताया गया है तथा शरीर, वाणी एवं मन के तप की व्याख्या की गई है। प्रत्येक तपस्या का स्वरूप सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण के प्रभाव के कारण भिन्न होता है। तत्पश्चात् दान पर चर्चा की गई है तथा इसके तीन विभागों का वर्णन किया गया है। 

अंततः श्रीकृष्ण “ओम-तत्-सत्" शब्दों की प्रासंगिकता तथा अर्थ के विषय पर प्रकाश डालते हैं जो परम सत्य के विभिन्न रूपों के प्रतीक हैं। 'ओउम्' पद ईश्वर के निराकार रूप की अभिव्यक्ति है। 'तत्' का उच्चारण, परमपिता परमात्मा को अर्पित की जाने वाली क्रियाओं तथा वैदिक रीतियों के लिए किया जाता है, 'सत्' शब्दांश का तात्पर्य सनातन भगवान तथा धर्माचरण है। एक साथ प्रयोग करने पर ये अलौकिक सत्ता का बोध कराते हैं।

 इस अध्याय का अंत इस सिद्धांत से होता है कि यदि यज्ञ, तप और दान विधि-निषेधों की उपेक्षा करते हुए किए जाते हैं, तब ये सभी कृत्य निरर्थक सिद्ध होते हैं।

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अर्जुन उवाच

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः।

तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः।।17.1।।

।।17.1।। अर्जुन ने कहा -- हे कृष्ण ! जो लोग शास्त्रविधि को त्यागकर (केवल) श्रद्धा युक्त यज्ञ (पूजा) करते हैं, उनकी स्थिति (निष्ठा) कौन सी है ? क्या वह सात्त्विक है अथवा राजसिक या तामसिक ?

पूर्वाध्याय के अन्त में भगवान् श्रीकृष्ण ने शास्त्रों के प्रामाण्य एवं अध्ययन पर विशेष बल दिया था। उसी बिन्दु से विचार को आगे बढ़ाते हुए अर्जुन यहाँ प्रश्न पूछ रहा है। वह चाहता है कि भगवान् श्रीकृष्ण विस्तृतरूप से इसका विवेचन करें कि किस प्रकार हम प्रभावशाली और लाभदायक आध्यात्मिक जीवन को अपना सकते हैं। इसके साथ ही अध्यात्मविषयक भ्रान्त धारणाओं का भी वे निराकरण करें।

 धर्मशास्त्रों से अनभिज्ञ होने के कारण सामान्य जनों को शास्त्रीय विधिविधान उपलब्ध नहीं होते हैं। यदि शास्त्रों को उपलब्ध कराया भी जाये तो बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जिनमें तत्प्रतिपादित ज्ञान को समझने की बौद्धित क्षमता होती है। सांसारिक जीवन में कर्मों की उत्तेजनाओं तथा मानसिक चिन्ताओं और व्याकुलता के कारण शास्त्रनिर्दिष्ट मार्ग के अनुसार अपना जीवन सुनियोजित करने की पात्रता हम में नहीं होती। 

परन्तु इन सबका अभाव होते हुए भी एक लगनशील साधक को श्रेष्ठतर जीवन पद्धति तथा धर्म के आदर्श में दृढ़ श्रद्धा और भक्ति हो सकती है। इसलिए अर्जुन के प्रश्न का औचित्य सिद्ध होता है। 

यज्ञ शब्द की परिभाषा में वे समस्त कर्म समाविष्ट हैं जिन्हें समाज के लोग अपनी लौकिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए निस्वार्थ भाव से करते हैं। 

अर्जुन की जिज्ञासा यह है कि जगत् के पारमार्थिक अधिष्ठान या अपने सत्यस्वरूप को जाने बिना भी यदि मनुष्य यज्ञभावना से कर्म करता है तो क्या वह परम शान्ति को प्राप्त कर सकता है ?  अपने प्रश्न को और अधिक स्पष्ट करते हुए वह पूछता है कि ऐसे श्रद्धावान् साधक की निष्ठा कौन सी श्रेणी में आयेगी सात्त्विक,  राजसिक या तामसिक? 

श्री भगवानुवाच

त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।

सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु।।17.2।।

।।17.2।। श्री भगवान् ने कहा -- देहधारियों (अपने M/F शरीर मात्र समझने वाले मनुष्यों) की वह स्वाभाविक श्रद्धा (सत्य-ज्ञानरहित श्रद्धा) तीन प्रकार की - सात्त्विक, राजसिक और तामसिक - होती हैं, उसे तुम मुझसे सुनो।।

 भगवान् कहते हैं कि श्रद्धा के अनुसार हमारी वासनाएं होती हैं और वे ही जीवन विषयक हमारे दृष्टिकोण को निश्चित करती हैंहमारे समस्त विचार भावनाएं और कर्म हमारे दृष्टिकोण (बुद्धि - मूढ़बुद्धि या शुद्धबुद्धि या मति)  के अनुरूप ही होते हैं। और जैसी मति होती है -वैसी गति होती है।  मनुष्य के शारीरिक कर्म , मानसिक व्यवहार और बौद्धिक संरचनाएं सब उसकी श्रद्धा से निश्चित होते हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपनी श्रद्धा के अनुरूप होता है,  यह नियम है। 

जो मनुष्य अपनी देह (M/F शरीर) के साथ जितना अधिक तादात्म्य करेगा उतना ही अधिक स्थूल और दृढ़ उसका अभिमान या अहंकार होगा। यह सब सत्त्व,  रज और तम इन गुणों के न्यूनाधिक्य पर निर्भर करता है

श्रद्धा के समझने के लिए इन तीन गुणों के सन्दर्भ का क्या औचित्य है ? इस पर कहते हैं

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।17.3।।

।।17.3।। हे भारत सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके सत्त्व (स्वभाव, संस्कार, चरित्र) के अनुरूप होती हैयह पुरुष (शुद्धबुद्धि) श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जिस श्रद्धा वाला है वह स्वयं भी वही है अर्थात् जैसी जिसकी श्रद्धा (मूढ़बुद्धि या शुद्धबुद्धि ? मति) वैसा ही उसका स्वरूप (गति) होता है।।

 सत्त्वानुरूप श्रद्धा हम जगत् में देखते हैं कि प्रत्येक मनुष्य के चरित्र (या व्यक्तित्व) की पोषक श्रद्धा भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है।

सामान्य दृष्टि से प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा का गुण और वर्ण उसके चरित्र (स्वभाव) के अनुरूप ही होता है। श्रद्धा का मूल या सारतत्त्व मनुष्य की उस गूढ़ शक्ति में निहित होता है जिसके द्वारा वह अपने चयन किये हुए लक्ष्य (इष्टदेव) की प्राप्ति का निश्चय दृढ़ बनाये रखता है। मनुष्य की सार्मथ्य ही लक्ष्य प्राप्ति में उसके आत्म विश्वास को निश्चित करती है। तत्पश्चात् यह आत्म विश्वास उसकी सार्मथ्य को द्विगुणित कर उस मनुष्य की योजनाओं को कार्यान्वित करने में सहायक होता है। इस प्रकार क्षमता और श्रद्धा परस्पर पूरक और सहायक होते हैं मनुष्य के स्वभाव पर गुणों के प्रभाव का वर्णन पहले किया जा चुका है। 

पूर्वकाल में अर्जित किसी गुणविशेष के आधिक्य का प्रभाव मनुष्य में उसकी बाल्यावस्था से ही दिखाई देता है। यहाँ प्रयुक्त सत्त्वानुरूपा शब्द के द्वारा इसी तथ्य को इंगित किया गया है। मनुष्य श्रद्धामय है प्रत्येक भक्त श्रद्धापूर्वक जिस देवता की उपासना या आराधना करता है वह अपनी उस श्रद्धा के फलस्वरूप अपने उपास्य को प्राप्त होता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि मनुष्य अपनी श्रद्धा के अनुरूप ही होता है। मनुष्य के कर्म और उपलब्धियों में श्रद्धा के महत्व को सभी विचारकों ने स्वीकार किया है। 

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।

प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः।।17.4।।

।।17.4।। सात्त्विक पुरुष देवताओं को पूजते हैं और राजस लोग यक्ष और राक्षसों को, तथा अन्य तामसी जन प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं।।

प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में किसी न किसी आदर्श या पूजावेदी को अपनी सम्पूर्ण भक्ति अर्पित करता है। उपर्युक्त परिभाषा के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी की आराधना करता है फिर उसका आराध्य नाम धन, यश, कीर्ति, देवता आदि कुछ भी हो सकता है। प्रत्येक मनुष्य का आराध्य उसकी श्रद्धा के अनुसार ही होता है जिसका वर्णन यहाँ किया गया है। 

सात्त्विक स्वभाव के लोग अपने श्रेष्ठ और दिव्य संस्कारों के कारण सहज ही देवताओं की अर्थात् दिव्य और उच्च आदर्शों की पूजा करते हैं।

रजोगुण प्रधान लोग अत्यन्त महत्त्वाकांक्षी और क्रियाशील स्वभाव के होते है। इसलिए वे यक्ष, राक्षसों की ही पूजा करते हैं। जगत् में भी यह देखा जाता है कि असत् शिक्षा और अनैतिकता से युक्त लोग अपनी दुष्ट और अपकारक महत्त्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने के लिए प्राय नीच प्रतिशोधपूर्ण और दुराचारी लोगों की सहायता (भूत- प्रेत) सहायता लेते हैं। ये नीच लोग यद्यपि शरीर से जीवित किन्तु मनुष्य जीवन की मधुरता और सुन्दरता के प्रति मृत होते हैं। राजसी और प्रमादशील तामसी जन क्रमश सहृदय मित्रों से सहायता धनवान् और समर्थ लोगों से सुरक्षा और अपराधियों से शक्ति प्राप्त करने के लिए उपयुक्त देव यक्ष और प्रेतात्माओं की पूजा करते हैं। 

मनुष्य के कार्यक्षेत्र से ही कुछ सीमा तक उसकी श्रद्धा को समझा जा सकता है। समाज के सत्त्वनिष्ठ पुरुष विरले ही होते हैं। सामान्यत राजसी और तामसी जनों की संख्या अधिक होती है और उनके पूजादि के प्रयत्न भी दोषपूर्ण होते हैं। कै

से भगवान् बताते हैं

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।

दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः।।17.5।।

।।17.5।। जो लोग शास्त्रविधि से रहित घोर तप करते हैं तथा दम्भ, अहंकार, काम और राग से भी युक्त होते हैं।।

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।

दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः।।17.5।।

।।17.5।। जो लोग शास्त्रविधि से रहित घोर तप करते हैं तथा दम्भ, अहंकार, काम और राग से भी युक्त होते हैं।।

कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।

मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्।।17.6।।

।।17.6।।जो मनुष्य शास्त्रविधि से रहित घोर तप करते हैं; जो दम्भ और अहङ्कार से अच्छी तरह युक्त हैं; जो भोग-पदार्थ, आसक्ति और हठ से युक्त हैं; जो शरीर में स्थित पाँच भूतों को अर्थात् पाञ्च-भौतिक शरीर को तथा अन्तःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले हैं उन अज्ञानियों को तू आसुर निश्चयवाले (आसुरी सम्पदा वाले) समझ।

साधक का अत्युत्साह केवल शारीरिक थकान और मानसिक अवसाद को ही उत्पन्न कर सकता है। केवल धर्म के नाम पर अविवेकपूर्ण साधना करने से किसी प्रकार का आध्यत्मिक विकास नहीं हो सकता। बहुसंख्यक साधकगण अपनी क्षमताओं का दुरुपयोग करके व्यर्थ में कष्ट पाते हैं। इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ ऐसे अविवेकी साधकों का चित्रण कर उनकी मूढ़बुद्धि की साधना का उपहास करते हैं। 

तपश्चर्या भी विवेकपूर्ण होनी चाहिए इसलिए धर्मशास्त्रों के विधानों के विरुद्ध उनका आचरण नहीं करना चाहिए।कुछ लोग केवल प्रदर्शन के लिए तप करते हैं। दम्भ और अहंकार से युक्त लोग वास्तविक तप के अधिकारी नहीं होते हैं। उसी प्रकार जिन लोगों के मन में विषयों की कामना और आसक्ति दृढ़ होती है वे भी मानसिक रूप से तपश्चर्या के योग्य नहीं होते। पुराणों में वर्णित हिरण्यकश्यपादि के चरित्र इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं। इस प्रकार शास्त्रविधि की उपेक्षा करके तप करने वाले तपस्वी लोग आसुरी श्रेणी में ही गिने जाते हैं।ऐसे अविवेकी जन घोर तप के द्वारा न केवल अपने शरीर को पीड़ा पहुँचाते हैं वरन् मुझ दिव्य अन्तर्यामी को भी कष्ट देते हैं।

 विवेकपूर्ण संयम तप कहलाता है न कि निर्मम शारीरिक पीड़ा भगवान् आगे कहते हैं

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।

यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु।।17.7।।

।।17.7।। (अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार) सब का प्रिय भोजन भी तीन प्रकार का होता है? उसी प्रकार यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं; उनके भेद को तुम मुझसे सुनो।।

 हिन्दू धर्म आत्म-विद्या का उपदेश देता है। अत साधक का प्रयत्न अपने आत्मस्वरूप को अभिव्यक्त करने के लिए होना चाहिए। आत्मा के सौन्दर्य को व्यक्त करने एवं आत्मिक बल को प्राप्त करने के लिए समस्त साधकों को चित्त शुद्धि के हेतु प्रयत्न करना होगा। चित्तशुद्धि का अर्थ है रजोगुण के विक्षेप तथा तमोगुण के प्रमाद और मोह का त्यागकर सत्त्वगुण की रचनात्मक सजगता और आध्यात्मिक आभा में मन की दृढ़ स्थिति। 

सर्व प्रथम आहार को बताते हैं

आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।

रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः।।17.8।।

।।17.8।। आयु, सत्त्व (शुद्धि), बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को प्रवृद्ध करने वाले एवं रसयुक्त, स्निग्ध ( घी आदि की चिकनाई से युक्त) स्थिर तथा मन को प्रसन्न करने वाले आहार अर्थात् भोज्य पदार्थ सात्त्विक पुरुषों को प्रिय होते हैं।।

आयु अरोग्यवर्धक आहार सात्त्विक पुरुष को प्रिय होता है। उसी प्रकार प्रीति और मन की प्रसन्नतावर्धक आहार सात्त्विक कहलाता है। 

भोज्य पदार्थों के गुणानुसार यहाँ उन्हें चार भागों में वर्गीकृत किया गया है। वे हैं रस्या रसयुक्त, स्निग्ध चिकनाई से युक्त,  स्थिर और मनप्रसाद के अनुकूल हृद्या। सात्त्विक पुरुषों को ऐसे समस्त पदार्थ स्वभावत प्रिय होते हैं जो उपर्युक्त गुणों से युक्त होते हैं अर्थात् आयुबलादि विवर्धक होते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि भोक्ता पर भोजन का प्रभाव पड़ता है। सामान्यत  मनुष्य जिस प्रकार का भोजन करता है वैसा ही प्रभाव उसके मन पर पड़ता है। उसी प्रकार मनुष्य का स्वभाव उसके आहार की रुचि को नियन्त्रित करता है। 

कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।

आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः।।17.9।।

।।17.9।। कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, अति उष्ण, तीक्ष्ण (तीखे, मिर्च युक्त), रूखे. दाहकारक, दु:ख, शोक और रोग उत्पन्न कारक भोज्य पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं।।

भगवान् श्रीकृष्ण का कथन यह है कि सात्त्विक या राजसिक विचारों के लोगों को उपर्युक्त प्रकार के पदार्थ रुचिकर लगते हैं।क्रियाशील तथा कामक्रोधादि प्रवृत्ति वाले रजोगुणी लोगों को इस श्लोक में कथित कटु अम्ल आदि आहार अत्यन्त प्रिय होता है। 

 अर्थात् विचारों के परिवर्तन से आहार में परिवर्तन आता है।

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।

उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्।।17.10।।

।।17.10।। अर्धपक्व, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी, उच्छिष्ट तथा अपवित्र (अमेध्य) अन्न तामस जनों को प्रिय होता है।।

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।

यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः।।17.11।।

।।17.11।। जो यज्ञ शास्त्रविधि से नियन्त्रित किया हुआ तथा जिसे "यह मेरा कर्तव्य है" ऐसा मन का समाधान (निश्चय) कर फल की आकांक्षा नहीं रखने वाले लोगों के द्वारा किया जाता है, वह यज्ञ सात्त्विक है।।

अफलाकांक्षिभि सात्त्विक पुरुषों के यज्ञ कर्म सदैव फलासक्ति से रहित और निस्वार्थ भाव से किये जाते हैं। फल की प्राप्ति भविष्य में ही होती है और इसलिए वर्तमान समय में उनकी चिन्ता करने में अपनी क्षमताओं को क्षीण करना अविवेक का ही लक्षण है

कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हंसा हम रोए, 

ऐसी करनी कर चलो, हम हंसे जग रोए

[धीरे -धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।] 

ऐसी करनी कर चलो , तुम हँसो जग रोये !]

शास्त्रविधि से नियत किया हुआ वेदों में कर्मों का वर्गीकरण चार भागों में किया गया है। (1) काम्य कर्म अर्थात् व्यक्तिगत लाभ को लिए कामना से प्रेरित होकर किया गया कर्म (2) निषिद्ध कर्म (3) नित्य कर्म और (4) नैमित्तिक अर्थात् किसी निमित्त वशात् करने योग्य कर्म। 

इनमें से प्रथम दो प्रकार के कर्मों- " काम्य कर्म और शास्त्र निषिद्ध कर्म "  को त्यागना चाहिए तथा शेष दो कर्मों- " नित्य कर्म और नैमित्तिक कर्म " का पालन करना चाहिए। 

नित्य और नैमित्तिक कर्मों को ही सम्मिलित रूप में कर्तव्य कर्म कहते हैं।  यह शास्त्रविधान है-injunction of the scriptures. " 

 तमोगुणी लोग शास्त्रविधि का सर्वथा उल्लंघन करते हैं परन्तु सत्त्वगुणी लोग उसका सम्मान करते हैं। 'यह मेरा कर्तव्य है ' - सदाचारी पुरुष सदा अपने कर्मों को केवल कर्तव्य की भावना से ही करते हैं। अत उन्हें फल की चिन्ता कभी नहीं होती है। इस प्रकार व्यर्थ में वे अपनी शक्तियों का अपव्यय नहीं होने देते। वे अपनी स्वरूपभूत शान्ति में स्थित रहते हैं। 

सात्त्विक पुरुष को इसी बात की प्रसन्नता होती है कि- उसे प्रभु ने सेवा करने का अवसर दिया ! इसलिए वह समाज कल्याण के उपयोगी  कर्म कर सकता है। ऐसे कर्म ही सात्त्विक कहलाते हैं।

अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।

इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्।।17.12।।

।।17.12।।परन्तु हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! जो यज्ञ फल की इच्छा को लेकर अथवा दम्भ-(दिखावटीपन-) के लिये भी किया जाता है, उसको तुम राजस समझो।

कामना तो रजोगुण का लक्षण ही है। अत रजोगुणी लोग जो भी कर्म करते हैं स्वभावत कामना से ही प्रेरित होते हैं। फलासक्त पुरुष को सदैव यह चिन्ता लगी रहती है कि उसे इच्छित फल मिलेगा अथवा नहीं। इस प्रकार वह विभिन्न कल्पनाएं करके भयभीत होता रहता है। 

अनेक रजोगुणी व्यक्ति केवल अपने ज्ञान या धन का प्रदर्शन करने के लिए यज्ञ कर्म करते हैं। उसके अनुष्ठान में उनका कोई अन्य विशेष प्रयोजन नहीं होता है।

 ऐसे दम्भपूर्वक किये गये कर्म सात्त्विक कर्म नहीं कहलाते और न ही ऐसे कर्मों से मनशान्ति एवं प्रसन्नता का पुरस्कार प्राप्त हो सकता है। ये राजस यज्ञ हैं।

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।

श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।।17.13।।

।।17.13।। शास्त्रविधि से रहित, अन्नदान से रहित, बिना मन्त्रों, बिना दक्षिणा और बिना श्रद्धा के किये हुए यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं।।

अन्नदान रहित / धर्मशास्त्र की भाषा में हमारे जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को अन्न शब्द के द्वारा सूचित किया जाता है। आधुनिक काल की भाषा में भोजन-वस्त्र और गृह के द्वारा उन्हें इंगित किया जाता है। मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपने पास उपलब्ध वस्तुओं का दान उन लोगों को दें जिन्हें उनकी आवश्यकता होती है। ऐसा दान प्रेम के बिना कभी संभव ही नहीं हो सकता।

 तमोगुणी पुरुष यज्ञ कर्म के अनुष्ठान में भी शास्त्रोक्त दान नहीं करता है। कर्मकाण्ड के अनुष्ठान में मन्त्रों का उच्चारण तथा शिक्षित पुरोहितों को दक्षिणा देना आवश्यक होता है-परन्तु तमोगुणी पुरुष इन सब नियमों की ओर ध्यान ही नहीं देता है। अत उसके द्वारा अनुष्ठित यज्ञ तामस कहलाता है।

अगले तीन श्लोकों में तप के वास्तविक स्वरूप को दर्शाकर  तत्पश्चात् गुण भेद से त्रिविध तपों का वर्णन किया गया है

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।

ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते।।17.14।।

।।17.14।। देव, द्विज (ब्राह्मण), गुरु और ज्ञानी जनों का पूजन, शौच, आर्जव (सरलता), ब्रह्मचर्य और अहिंसा, यह शरीर संबंधी तप कहा जाता है।।

देव, द्विज, गुरु और ज्ञानी जनों का पूजन/ अपने आराध्य के साथ तादात्म्य बनाये रखने की साधना पूजा कहलाती है। इस पूजा के फलस्वरूप पूजक अपने आराध्य के गुणों से सम्पन्न हो जाता है। नैतिक विकास या चरित्र-निर्माण का उपाय यह देव-द्विज-गुरु -ज्ञानी जन का पूजन ही है। यह बहुत कुछ चुम्बकीकरण की स्पर्शविधि -"touch method of magnetization." के समान ही है। 

जो पुरुष अपने व्यक्तित्व के प्रतिबन्धनों से मुक्त होना चाहता है उसको अपने आराध्य आदर्श (देव) के प्रति श्रद्धा और भक्ति आदर और सम्मान का भाव होना अत्यावश्यक है। उसी प्रकार जिन सत्पुरुषों ने इस आदर्श को प्रस्तुत किया उन द्विजों (ब्राह्मणों) के प्रति तथा उपदेष्टा गुरु और इस आदर्श के अनुमोदक ज्ञानी जनों के प्रति भी वही भक्ति भाव होना चाहिए। द्विज इस शब्द का वाच्यार्थ है वह व्यक्ति जो दो बार जन्मा हो । यह 'द्विज ' शब्द ब्राह्मणों का सूचक है और ब्रह्मवित् पुरुष को ही ब्राह्मण कहते हैं। 

माता के गर्भ से जन्म लेने पर सभी मनुष्य एक समान ही होते हैं।  यद्यपि सब मनुष्य में में बौद्धिक क्षमता और सुन्दरता होती है परन्तु उसके साथ ही अनेक नैतिक दोष भी होते हैं। 

हम एक गर्भ से तो मुक्त होते हैं परन्तु प्रकृति की जड़ उपाधियों (स्थूल शरीर और मन या  सूक्ष्म-शरीरM/F ) के गर्भ में बन्धे ही रहते हैं।  इन उपाधियों के तादात्म्य से स्वयं को मुक्त कर अपने आत्मस्वरूप के परमानन्द में निष्ठा प्राप्त करना ही दूसरा जन्म माना जाता है। इसलिए आत्मानुभवी पुरुष (शुद्धबुद्धि) को द्विज कहा जाता है

शौच और सरलता शरीर की स्वच्छता के साथसाथ आसपास के वातावरण की स्वच्छता की ओर भी साधक को ध्यान देना चाहिए। यह बाह्य शुद्धि ही यहाँ शौच शब्द से इंगित की गयी है। उसी प्रकार साधक के बाह्य व्यवहार में सरलता होनी चाहिए। कुटिलता के कारण व्यक्तित्व के विभाजन की आशंका बनी रहती है। ऐसे विभाजित पुरुष के मन का सन्तुलन सार्मथ्य और शान्ति नष्ट हो जाती है।

ब्रह्मचर्य सदैव ब्रह्मस्वरूप में रमने के स्वभाव को ही ब्रह्मचर्य कहते हैं।यह रमण तब तक संभव नहीं हो सकता जब तक हमारा शरीर और मन विषयोपभोगों से विरत नहीं होता है। इसलिए इन्द्रियों व मन के संयम को भी ब्रह्मचर्य की संज्ञा प्रदान की गयी है।  जैसे मेडिकल कालेज में प्रवेश प्राप्त कर लेने पर ही विद्यार्थी को डाक्टर कहा जाने लगता है क्योंकि उसका साध्य तब दूर नहीं रह जाता। 

अहिंसा किसी भी प्राणी को पीड़ा न पहुँचाने का नाम ही अहिंसा है। जीवन में जाने या अनजाने किसी प्राणी को कदापि शारीरिक पीड़ा न पहुँचाना असम्भव है। परन्तु अपने मन में हिंसा का भाव कभी न आने देना चाहिए। 

उपर्युक्त पूजनादि साधनाओं में शरीर की प्रधानता होने से उन्हें शरीर तप कहा गया है।तप का अर्थ शरीर उत्पीड़न ही नहीं है। वस्तुत तप तो वह विवेकपूर्ण जीवन पद्धति है जिसके द्वारा हम अपनी समस्त शक्तियों के अपव्यय को अवरुद्ध कर उनका संचय कर सकते हैं।

 नई शक्तियों को प्राप्त कर उनका संचय करना और तत्पश्चात् उनका रचनात्मक कार्यों में प्रयोग करना यह सम्पूर्ण योजना तप शब्द के व्यापक अर्थ में समाविष्ट है। ऐसे विवेकपूर्ण तप को यहाँ वास्तविक शरीर तप के रूप में प्रमाणित किया गया है।

अब अगले श्लोक में वाङ्मय (वाणी संबंधी) तप को बताते हैं

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।

स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते।।17.15।।

।।17.15।। जो वाक्य (भाषण) उद्वेग उत्पन्न करने वाला नहीं है, जो प्रिय, हितकारक और सत्य है तथा वेदों (उपनिषदों -महामण्डल पुस्तिकाओं -स्वामीजी का साहित्य)  का स्वाध्याय अभ्यास वाङ्मय (वाणी का) तप कहलाता है।।

 मनुष्य के पास स्वयं को अभिव्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम है वाणी। इस वाणी के द्वारा वक्ता की बौद्धिक पात्रता मानसिक शिष्टता एवं शारीरिक संयम प्रकट होते हैं। 

वाणी एक कर्मेन्द्रिय है जिसके सतत क्रियाशील रहने से मनुष्य की शक्ति का सर्वाधिक व्यय होता है। अत वाणी के संयम के द्वारा बहुत बड़ी मात्रा में शक्ति का संचय किया जा सकता है जिसका सदुपयोग हम अपनी साधना में कर सकते हैं। 

 इस वाणी शक्ति का सदुपयोग करने की एक कला है जो वक्ता के तथा अन्य लोगों के लिए भी हितकारी है। वाणी की इस हितकारी कला का वर्णन इस श्लोक में किया गया है। 

अनुद्वेगकर / वक्ता द्वारा प्रयुक्त शब्द ऐसे नहीं होने चाहिए जो श्रोता के मन में उद्वेग या उत्तेजना उत्पन्न करें वे शब्द न तो उत्तेजक हों और न अश्लील। वक्ता द्वारा प्रयुक्त किये गये शब्दों की उपयुक्तता की परीक्षा श्रोताओं की प्रतिक्रिया से हो जाती है। परन्तु लोग प्राय अपनी आंखें बन्द करके ही बोलते हैं और जब उनकी आंखें खुली रहती हैं तब भी वे अन्धवत् ही रहते हैं। अनेक दुर्भागी लोग अपने जीवन में विफल होते हैं और मित्र बन्धुओं को खो देते हैं। प्रिय और हित सत्य भाषण श्रेष्ठ है। परन्तु सत्य वचन प्रिय और हितकारी भी हो। इन तीनों के होने पर ही वह वक्तृत्व वाङ्मय तप कहलाता है जो साधक के लिए कल्याणकारी सिद्ध होता है। 

में अनेक लोग सत्यवादिता के नाम पर अत्यन्त कटुभाषी हो जाते हैं। परन्तु वह वाङ्मय तप न होने के कारण एक साधक के लिए अनुपयुक्त है। गीता के अनुसार हमारे वचन सत्य हों तथा प्रिय भी हों। इसका अभिप्राय यह प्रतीत होता है कि जब कथनीय सत्य श्रोता को प्रिय न हों तो वक्ता को विवेकपूर्वक मौन ही रहना चाहिए केवल सत्य और प्रिय वचन ही पर्याप्त नहीं है अपितु वे हितकारक भी होने चाहिए। 

शब्दों का अपव्यय नहीं करना चाहिए। निरर्थक भाषण से वक्ता को केवल थकान ही होगी। मनुष्य को केवल तभी बोलना चाहिए जब वह किसी श्रेष्ठ सत्य को मधुर वाणी में समझाना चाहता हो जो कि श्रोता के हित में है। सत्य प्रिय और हितकारी वचनों का अभ्यास ही वाङ्मय तप कहलाता है।आत्मोन्नति के रचनात्मक कार्य में वाक्शक्ति का सदुपयोग करना ही भगवान् की दृष्टि में वाक्संयम अथवा वाङ्मय तप है।

स्वाध्याय का अर्थ है वेदों का पठन उनके अध्ययन के द्वारा अर्थ ग्रहण और तत्पश्चात् उनका अनुशीलन करना। सत्य प्रिय और हितकारक भाषण के द्वारा सुरक्षित रखी गयी शक्ति का सदुपयोग उपर्युक्त स्वाध्याय में करना चाहिए। साधना का विस्तृत विवेचन करने में यह श्लोक स्वयं में सम्पूर्ण है। अब मानसतप को बताते हैं

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।

भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते।।17.16।।

।।17.16।। मन की प्रसन्नता, सौम्यभाव, मौन आत्मसंयम और अन्त:करण की शुद्धि यह सब मानस तप कहलाता है।।

मनःप्रसादः / विषय भोग की इच्छाएं ही मन की इस अन्तहीन दौड़ का कारण है।  बाह्य विषय ग्रहण तथा आन्तरिक इच्छाओं से मन को सुरक्षित रखे जाने पर ही मनुष्य को शान्ति प्राप्त हो सकती है। जिस साधक को ऐसा दिव्य और श्रेष्ठ आदर्श (ठाकुर -माँ -स्वामीजी) प्राप्त हो गया है जिसमें मन और बुद्धि अपनी चंचलता को विस्मृत कर समाहित हो जाती है उसे ही वास्तविक मन प्रसाद की उपलब्धि हो सकती है। 

सौम्यत्व / प्राणिमात्र के प्रति प्रेम और कल्याण की भावना ही सौम्यता है।

 मन के शान्त रहने पर ही वाणी का मौन या संयम संभव हो सकता है। अत मौन का अर्थ हुआ मननशीलता। 

आत्मसंयम / उपर्युक्त मन प्रसाद सौम्यता और मौन की सिद्धि तब तक सफल नहीं होती? जब तक हम सावधानी और प्रयत्नपूर्वक आत्मसंयम नहीं कर पाते हैं। प्राय हमारी पाशविक प्रवृत्तियां प्रबल होकर हमें अपने वश में कर लेती हैं। अत विवेक और सजगतापूर्वक उनको अपने वश में रखना आवश्यक हो जाता है।

भावसंशुद्धि / इस शब्द से तात्पर्य हमारे उद्देश्यों की पवित्रता और शुद्धता से है। भावसंशुद्धि के बिना आत्मसंयम कर पाना कठिन होता है। जीवन में कोई श्रेष्ठ लक्ष्य न हो तो विषयों के प्रलोभन के शिकार बन जाने की आशंका बनी रहती है। इसलिए साधक को अपना लक्ष्य निर्धारित करके उसकी प्राप्ति होने तक धैर्यपूर्वक अपने मार्ग पर आगे बढ़ते जाना चाहिए। इस कार्य में हमारा लक्ष्य तथा उद्देश्य ऐसा दिव्य हो जो हमें स्फूर्ति और प्रेरणा प्रदान कर सके अन्यथा हम अपनी ही क्षमताओं की जड़े खोदकर अपने ही नाश में प्रवृत्त हो सकते हैं। 

इस प्रकार उपर्युक्त तीन श्लोकों में तप के वास्तविक स्वरूप का वर्णन किया गया है।

विभिन्न साधकों के द्वारा समान श्रद्धा के साथ इस तप का आचरण किया जाता है परन्तु सबको विभिन्न फल प्राप्त होते दिखाई देते हैं। यह कोई संयोग की ही बात नहीं है। तप करने वाले तपस्वी साधक तीन प्रकार के होते हैं सात्त्विक राजसिक और तामसिक। अत इन गुणों के भेद के कारण उनके तपाचरण में भेद होता है। स्वाभाविक ही है कि उनके द्वारा प्राप्त किये गये फलों में भी भेद होगा।

अब अगले तीन श्लोकों में त्रिविध तप का वर्णन करते हैं

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरै:।

अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते।।17.17।।

।।17.17।। फल की आकांक्षा न रखने वाले युक्त पुरुषों के द्वारा परम श्रद्धा से किये गये उस पूर्वोक्त त्रिविध तप को सात्त्विक कहते हैं।।

वे योगयुक्त पुरुष सात्त्विक हैं जो भविष्य में प्राप्त होने वाले फलों की कदापि चिन्ता नहीं करते हैं। वे जानते हैं कि प्रकृति में सामञ्जस्य और नियमबद्धता है। वर्तमान की कर्मकुशलता पर ही भावी फल निर्भर करता है। इसलिए फल की चिन्ता करके वर्तमान के सुअवसरों को खोना मूढ़ता का ही लक्षण है। सात्त्विक पुरुष फलासक्ति का त्याग कर त्रिविध तप का आचरण करते हैं जिसका उन्हें सर्वाधिक फल प्राप्त होता है।

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।

क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्।।17.18।।

।।17.18।। जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए अथवा केवल दम्भ (पाखण्ड) से ही किया जाता है, वह अनिश्चित और क्षणिक तप यहाँ राजस कहा गया है।।

वस्तुत तपाचरण का प्रयोजन अपनी शक्तियों का संचय करके उनके द्वारा आत्मविकास करना है। परन्तु जो लोग तप का अनुष्ठान केवल समाज से सत्कार, सम्मान और पूजा प्राप्त करने के लिए अथवा अपने गुण प्रदर्शनमात्र के लिए करते हैं उनका तप राजस कहलाता है।  भगवान् श्रीकृष्ण ने इसके पूर्व ऐसे लोगों को मिथ्याचारी भी कहा था।

इस प्रकार के तप से क्या हानि होती है इसका उत्तर यह है कि ऐसा तप चलम् अर्थात् अस्थिर होने से इसका फल भी अध्रुवम् अर्थात् अनिश्चित या क्षणिक ही होता है। किसी भी कर्म का फल कालान्तर में ही प्राप्त होता है। 

  इसलिए कर्म का अनुष्ठान स्थिरता और सातत्य की अपेक्षा रखता है परन्तु सत्कार अथवा प्रदर्शन के हीन उद्देश्य से किये गये तप में ये दोनों ही गुण नहीं हो सकते। इस प्रकार जब तप ही क्षणिक हो तो उसका फल चिरस्थायी कैसे हो सकता है राजस तप चलम् और अध्रुवम होने से त्याज्य ही समझना चाहिए।

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।

परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्।।17.19।।

।।17.19।। जो तप मूढ़तापूर्वक स्वयं को पीड़ित करते हुए अथवा अन्य लोगों के नाश के लिए किया जाता है, वह तप तामस कहा गया है।।

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।

देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।।17.20।।

।।17.20।। "दान देना ही कर्तव्य है" - इस भाव से जो दान योग्य देश, काल को देखकर ऐसे (योग्य) पात्र (व्यक्ति) को दिया जाता है, जिससे प्रत्युपकार की अपेक्षा नहीं होती है, वह दान सात्त्विक माना गया है।।

 दान को कर्तव्य समझकर दिये जाने पर वह सात्त्विक दान कहलाता है।  जिस प्रकार एक वृक्ष अपने फलों को सभी वर्गों के लोगों को देता है उसी प्रकार मनुष्य को अपने पास उपलब्ध वस्तुओं का दान करना चाहिए। 

मनुष्य को इस बात का विचार करना चाहिए कि उसका दान समाज के योग्य पुरुषों को प्राप्त हो रहा है अथवा नहीं।

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।

दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्।।17.21।।

।।17.21।। और जो दान क्लेशपूर्वक तथा प्रत्युपकार के उद्देश्य से अथवा फल की कामना रखकर दिया जाता हैं, वह दान राजस माना गया है।।

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।

असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्।।17.22।।

।।17.22।। जो दान बिना सत्कार किये, अथवा तिरस्कारपूर्वक, अयोग्य देशकाल में, कुपात्रों के लिए दिया जाता है, वह दान तामस माना गया है।।

ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।

ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा।।17.23।।

।।17.23।। ', तत् सत्' ऐसा यह ब्रह्म का त्रिविध निर्देश (नाम) कहा गया है; उसी से आदिकाल में (पुरा) ब्राहम्ण, वेद और यज्ञ निर्मित हुए हैं।।

 तत् सत् /जिस शब्द के द्वारा किसी वस्तु को इंगित किया जाता है उसे निर्देश कहते हैं। इस प्रकार तत्सत् ब्रह्म का त्रिविध निर्देश माना गया है अर्थात् इनमें से प्रत्येक शब्द ब्रह्म का ही संकेतक है। 

प्राय कर्मकाण्ड के विधान में कर्म करते समय इस प्रकार के निर्देश के स्मरण और उच्चारण का उपदेश दिया जाता है जिसके फलस्वरूप कर्मानुष्ठान में रह गयी अपूर्णता या दोष की निवृत्ति हो जाती है। 

प्रत्येक कर्म अपना फल देता है परन्तु वह फल केवल कर्म पर ही निर्भर न होकर कर्त्ता के उद्देश्य की शुद्धता की भी अपेक्षा रखता है।  हम सबके कर्म एक समान प्रतीत हो सकते हैं तथापि एक व्यक्ति को प्राप्त फल दूसरे से भिन्न होता है। इसका कारण कर्ता के उद्देश्य का गुणधर्म ही हो सकता है। ईश्वर के स्मरण के द्वारा हम अपने उद्देश्यों की आभा को और अधिक तेजस्वी बना सकते हैं। 

अनात्म उपाधियों से तादात्म्य (M/F शरीर भाव) को त्यागने से ही हम अपने परमात्म स्वरूप में स्थित हो सकते हैं। जिस मात्रा में हमारे कर्म निस्वार्थ होंगे उसी मात्रा में प्राप्त पुरस्कार भी शुद्ध होगा। अहंकार के नाश के लिए साधक को अपनी आध्यात्मिक प्रतिष्ठा का बोध होना आवश्यक है।

तत् - उस आत्मतत्त्व का प्रतीक है जो अजन्मा, अविनाशी, सर्व उपाधियों के अतीत और शरीरादि उपाधियों का अधिष्ठान है। तत् शब्द परब्रह्म का सूचक है।  उपनिषदों के प्रसिद्ध महावाक्य 'तत्त्वमसि ' में तत् उस परम सत्य को इंगित करता है जो सम्पूर्ण विश्व की उत्पत्ति स्थिति और लय का स्थान है। अर्थात् जगत्कारण ब्रह्म तत् शब्द के द्वारा इंगित किया गया है।

 सत् का अर्थ त्रिकाल अबाधित सत्ता (सत्य)। यह सत्स्वरूप सर्वत्र व्याप्त है। इस प्रकार ॐ तत्सत् इन तीन शब्दों के द्वारा विश्वातीत, विश्वकारण और विश्व व्यापक परमात्मा (मायाधीश प्रभु 'माँ' काली) का स्मरण करना ही उसके साथ तादात्म्य करना है। 

ईश्वर स्मरण से हमारे कर्म शुद्ध हो जाते हैं।  ॐ तत्सत् द्वारा निर्दिष्ट ब्रह्म से ही समस्त वर्ण धर्म वेद और यज्ञ उत्पन्न हुए हैं। अध्यस्त सृष्टि का कारण उसका अधिष्ठान ही होता है। 

अब आगामी श्लोकों में इन तीन शब्दों -'ॐ तत्सत्'  के प्रयोग के विधान को बताते हैं

तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।

प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्।।17.24।।

।।17.24।। इसलिए, ब्रह्मवादियों (वैदिक सिद्धान्तों को माननेवाले) की शास्त्र प्रतिपादित यज्ञ, दान और तप की क्रियायें सदैव ओंकार के उच्चारण के साथ प्रारम्भ होती हैं।।

ब्रह्मवादियों से तात्पर्य सात्त्विक जिज्ञासु साधकों से है। अपने सभी कर्मों में परमात्मा का स्मरण रखने से उन्हें श्रेष्ठता शुद्धता और दिव्यता प्राप्त होती है। परमात्मा (माँ काली) के स्मरण में ही अहंकार और उसके बन्धनों (देहाभिमान) का विस्मरण है। अहंकार के अभाव में साधक अपने तपाचरण में अधिक कुशल यज्ञ कर्मों में निस्वार्थ और दान में अधिक उदार बन जाता है।

तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।

दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभि:।।17.25।।

।।17.25।। 'तत्' शब्द का उच्चारण कर, फल की इच्छा नहीं रखते हुए, मुमुक्षुजन यज्ञ, तप, दान आदि विविध कर्म करते हैं।।

 जो पुरुष स्वयं को अपनी आसक्तियों, स्वार्थी इच्छाओं, अहंकार और उससे उत्पन्न होने वाले विक्षेपों के बन्धनों (मूढ़बुद्धि) से मुक्त रहना चाहता है उसे मुमुक्षु कहते हैं। ऐसे मुमुक्षुओं को यह श्लोक एक उपाय बताता है जिसके द्वारा समस्त साधक स्वयं को अपनी वासनाओं के बन्धन से मुक्त कर सकते हैं। 

मुमुक्षुओं को चाहिए कि वे फलासक्ति को त्यागकर और तत् शब्द के द्वारा परमात्मा का स्मरण करके अपने कर्तव्यों का पालन करें। तत् शब्द जगत्कारण ब्रह्म (माँ काली) का वाचक है, जहाँ से सम्पूर्ण सृष्टि व्यक्त होती है। इस प्रकार यह शब्द प्राणी मात्र के 'आत्मैकत्व' का -आत्मैव इदं सर्वं', 'ब्रह्मैव इदं सर्वं', का भी सूचक है। 

अपने कुटुम्ब के कल्याण के स्मरण रहने पर व्यक्तिगत लाभ विस्मरण हो जाता है , समाज के लिए कार्य करने में परिवार के लाभ का विस्मरण हो जाता है , और भारत कल्याण की भावना का उदय होने पर अपने समाजमात्र के लाभ की कामना नहीं रह जाती।  तथा विश्व और मानवता के लिए कर्म करने में राष्ट्रीयता की सीमायें टूट जाती हैं। 

इसी प्रकार आत्मैकत्व के भाव में चित्त को समाहित करके यज्ञदानादि कर्मों के आचरण से अहंकार के अभाव में अन्तकरण (मूढ़बुद्धि)की पूर्वार्जित वासनाएं नष्ट हो जाती हैं और नई वासनाएं उत्पन्न नहीं होतीयही मुक्ति है

अब सत् शब्द का प्रयोग बताते हैं

सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।

प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते।।17.26।।

।।17.26।। हे पार्थ ! सत्य भाव व साधुभाव में 'सत्' शब्द का प्रयोग किया जाता है, और प्रशस्त (श्रेष्ठ, शुभ) कर्म में 'सत्' शब्द प्रयुक्त होता है।।

सत्यता और साधुता तथा कर्म की प्रशस्तता को सत् शब्द के द्वारा लक्षित किया जाता है। हम सब सापेक्षिक सत्यत्व (relative truth) वाले जगत् में रहते हैं। हमारे लिए यह स्वाभाविक है कि अपने शरीर मन और बुद्धि के द्वारा अनुभूयमान इस जगत् को ही हम पारमार्थिक सत्य समझ लें।

अत सत् शब्द के द्वारा हमें यह स्मरण कराया जाता है कि पारमार्थिक सत्य (Real I) इस सापेक्षिक/आपेक्षिक सत्य (Apparent I) रूप जगत् का भी अधिष्ठान है

यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।

कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते।।17.27।।

।।17.27।। यज्ञ, तप और दान में दृढ़ स्थिति भी सत् कही जाती है, और उस (परमात्मा) के लिए किया गया कर्म भी सत् ही कहलाता है।।

तत्सत् से प्रारम्भ किये गये प्रकरण का तात्पर्य यह है कि यदि साधक के यज्ञ,  दान और तप ये कर्म पूर्णतया शास्त्रविधि से सम्पादित नहीं भी हों तब भी परमात्मा के स्मरण तथा परम श्रद्धा के साथ यथाशक्ति उनका आचरण करने पर वे उसे श्रेष्ठ फल प्रदान कर सकते हैं। 

इसका सिद्धांत यह है कि मनुष्य जगत् में अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित होकर शुभाशुभ कर्म करता है। इन कर्मों के फलस्वरूप उसके अन्तकरण में वासनाएं निर्मित होती जाती हैं जो उसे कर्मों में प्रवृत्त करके उसके बन्धनों को दृढ़ करती जाती हैं। 

इन कर्म बन्धनों से मुक्ति पाने का उपाय भी कर्म ही है,  परन्तु वे कर्म केवल कर्तव्य कर्म ही हों और उनका आचरण ईश्वरार्पण बुद्धि (शुद्धबुद्धि) से किया जाना चाहिए ईश्वर के स्मरण से अहंकार नहीं रह जाता और इस प्रकार वासनाओं की निवृत्ति हो जाती है। \

इसीलिए इस श्लोक में कहा गया है कि परमात्मा के लिए किया गया कर्म सत् कहलाता है क्योंकि वह मोक्ष का साधन है। यज्ञदानादि कर्म परम श्रद्धा के साथ युक्त होने पर ही पूर्ण होते हैं।

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।

असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह।।17.28।।

।।17.28।। हे पार्थ ! जो यज्ञ, दान, तप और कर्म अश्रद्धापूर्वक किया जाता है, वह 'असत्' कहा जाता है; वह न इस लोक में (इह) और न मरण के पश्चात् (उस लोक में) लाभदायक होता है।।

इस श्लोक में निषेध की भाषा में निश्चयात्मक रूप से भगवान् कहते हैं कि श्रद्धारहित कोई भी कर्म न इस लोक में और न मरण के पश्चात् ही लाभदायक होता है। कर्मों का फल कर्ता की श्रद्धा, उत्साह और निश्चय पर ही निर्भर करता है। मनुष्य की श्रद्धा ही उसके कर्मों को आभा प्रदान करती है। अत कर्म का फल बहुत अधिक मात्रा में कर्ता की श्रद्धा पर निर्भर करता है। 

यहाँ निश्चयात्मक रूप से कहा गया है कि श्रद्धारहित यज्ञ, दान, तप और अन्य कर्म असत् होते हैं। असत् से सत् की उत्पत्ति नहीं हो सकती। इसलिए ऐसे असत् कर्मों से कोई वास्तविक श्रेष्ठ फल प्राप्त नहीं किया जा सकता। भगवान् के इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि सब कर्मों में श्रद्धा की प्रमुखता है और उसके बिना कर्म निष्फल होते हैं।

श्रद्धा का यह नियम न केवल आध्यात्मिक क्षेत्र में ही सत्य है अपितु लौकिक फलों की प्राप्ति में भी उतना ही सत्य प्रमाणित होता है। कर्ता को स्वयं अपने में कर्म में तथा प्राप्य लक्ष्य में श्रद्धा आवश्यक होती है केवल तभी वह अपनी सम्पूर्ण क्षमता के साथ प्रयत्न कर सकता है अन्यथा नहीं।

अत भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि अश्रद्धा से किये गये यज्ञ दान और तप असत् होते हैं।

इस प्रकार श्रीकृष्णार्जुनसंवाद के रूप में ब्रह्मविद्या और योग शास्त्र स्वरूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का श्रद्धा त्रय विभाग योग नामक सत्रहवां अध्याय समाप्त होता है।

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बुधवार, 1 अप्रैल 2026

⚜️️🔱श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय -16 ⚜️️🔱अध्याय सोलह: दैवासुर सम्पद् विभाग योग⚜️️🔱भय अविद्या का लक्षण है। जहाँ विद्या है , वहाँ निर्भयता है। ⚜️️🔱चरित्र के गुण उसके आध्यात्मिक विकास के समान अनुपात में होती है। ⚜️️🔱 किसी व्यक्ति के दोषों को अन्य लोगों के समक्ष प्रकट करने को पैशुन कहते हैं। पैशुन का अभाव ही अपैशुन है।⚜️️🔱(नारद जैसे प्रभु -भक्त) का मनसन्तुलन (poise) कभी विचलित नहीं होता है⚜️️🔱अहंकार को इष्टदेव का दास समझ लेने वाले व्यक्ति -के मन में विक्षेपों का कोई कारण नहीं रह जाता इसलिए उसके मन की शान्ति बनी रहती है ⚜️️🔱हिन्दू धर्म शास्त्रों में वर्णित (यम-नियम या चरित्र के गुण) का निर्माण किसी उदासीन पैगम्बर के द्वारा नहीं हुआ है, बल्कि हमारे पूर्वज ऋषियों के नित्य-अनित्य विवेक और अनुभवों की दृढ़ चट्टानों की नींव पर हुआ है⚜️️🔱साधक को सतत्त अपने क्रोध को शान्त रखने का प्रयास करते रहना चाहिए कभी उसे क्रियारूप में व्यक्त न होने दे।⚜️️🔱

 24 श्लोकों वाले इस अध्याय में श्रीकृष्ण दैवीय और आसुरी दो प्रकार की प्रकृति का वर्णन करते हैं। यह अध्याय दैवीय गुणों से सम्पन्न पुण्यात्माओं के निरूपण से शुरू होता है।  दैवीय गुण धार्मिक ग्रंथों के उपदेशों के अनुसरण, सत्त्वगुण को पोषित करने और अध्यात्मिक अभ्यास द्वारा मन को शुद्ध करने से विकसित होते हैं। ये दैवीय गुणों में वृद्धि करते हैं और अंततः भगवत्प्राप्ति तक पहुँचाते हैं।

आगे इसमें आसुरी गुणों का भी वर्णन किया गया है जिनका अति सतर्कता के साथ त्याग करना चाहिए, क्योंकि ये आत्मा को पुनः अज्ञानता और 'संसार' अर्थात् जीवन और मृत्यु के चक्र में खींचते हैं।

 श्रीकृष्ण इस अध्याय का समापन करते हुए कहते हैं कि क्या किया जाना चाहिए और क्या नहीं किया जाना चाहिए, इसका निर्णय करने का अधिकार केवल वेद शास्त्रों का ही माना जाता है अतः हमें भी वेदों के वाक्यों को मानना चाहिए। हमें इन वैदिक शास्त्रों के विधि-निषेधों को समझना चाहिए और तदनुसार इस संसार में अपने कार्यों का निष्पादन और दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए।

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⚜️️🔱अध्याय सोलह: दैवासुर सम्पद् विभाग योग⚜️️🔱

श्री भगवानुवाच

अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।

दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।16.1।।

।।16.1।। श्री भगवान् ने कहा -- अभय, अन्त:करण की शुद्धि, ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और आर्जव।।

इस श्लोक में उन आदर्श गुणों की प्राय सम्पूर्ण सूची प्रस्तुत की गयी है जो आध्यात्मिक जीवन जीने वाले एक सुसंस्कृत पुरुष (चरित्रवान मनुष्य) में देखे जाते हैं। अपने व्यावहारिक जीवन में उन बीस गुणों को जीना ही आध्यात्मिक जीवन कहलाता है।

इस श्लोक में उन आदर्श गुणों की प्राय सम्पूर्ण सूची प्रस्तुत की गयी है जो आध्यात्मिक जीवन जीने वाले एक सुसंस्कृत पुरुष में देखे जाते हैं। अपने व्यावहारिक जीवन में उन बीस गुणों को जीना ही आध्यात्मिक जीवन कहलाता है। भगवान् श्रीकृष्ण इन दैवी गुणों की गणना करते समय प्रथम स्थान अभय को देते हैं। भय अविद्या का लक्षण है। जहाँ विद्या है, वहाँ निर्भयता है।# गुणों की इस सूची में अभय को प्रथम स्थान देकर गीताचार्य़ यह इंगित करते हैं कि किसी साधक की नैतिक पूर्णता-(चरित्र के गुण) उसके आध्यात्मिक विकास के समान अनुपात में होती है

 >>#भय अविद्या का लक्षण है-जहाँ विद्या है, वहाँ निर्भयता है। 

 भगवान् श्रीकृष्ण इन दैवी गुणों की गणना करते समय प्रथम स्थान अभय को देते हैं। भय अविद्या का लक्षण है। जहाँ विद्या है, वहाँ निर्भयता है। 

    गुणों की इस सूची में अभय को प्रथम स्थान देकर गीताचार्य़ (जगतगुरु) यह इंगित करते हैं कि किसी साधक की नैतिक पूर्णता (चरित्र के गुण) उसके आध्यात्मिक विकास के समान अनुपात में होती है। भय अविद्या का लक्षण है- अविद्या-अस्मिता-राग-द्वेष-अभिनिवेश पंचक्लेश - से बचने का उपाय केवल मायाधीश (इष्टदेव/आचार्यदेव की शरण) में रहना है। किसी साधक के चरित्र के गुण उसके आध्यात्मिक विकास (आत्मश्रद्धा -सत्यानुभूति -सत्यनिष्ठा) के समान अनुपात में होती है। 

विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।

पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धनाद् धर्मं ततः सुखम्॥

विद्या (ज्ञान) विनम्रता प्रदान करती है। विनम्रता से योग्यता (पात्रता) आती है। योग्यता से धन (संपत्ति/सामर्थ्य) प्राप्त होता है। धन से धर्म (सत्कर्म) और धर्म (सत्कर्म-'Be and Make') से वास्तविक सुख-शान्ति मिलती है।

 इसलिए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - "धर्म वह वस्तु है जिससे पशु, मनुष्य तक और मनुष्य देवत्व (परमात्मा) तक उठ सकता है।" 

[विनम्रता, सरलता और सत्यनिष्ठा ऐसे विशिष्ट दैवीय गुण हैं, जो हमारे जीवन में दैवत्व की प्रतिष्ठा करते हैं। अतः सरल, सहज और प्राकृतिक जीवन अभ्यासी बनें। दूसरों को प्रभावित करने के लिए अपने आसपास अनावश्यक आकर्षण ना जगाएँ। यथार्थवादी रहें।

Humility, simplicity, and integrity are divine qualities that establish divinity in our lives. Therefore, strive to live a simple, natural, and straightforward life. Do not create unnecessary attraction around you to impress others. Be realistic. 

[2 अप्रैल 2026 महामण्डल के 5 अभ्यास से अर्जित  विनम्रता, सरलता और सत्यनिष्ठा (ईमानदारी -रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई।” ) ऐसे विशिष्ट दैवीय गुण हैं, विवेक -प्रयोग अर्थात विद्या जनित विनम्रता प्रयोग।-जीवो ब्रह्मैव न अपरः! की समझ तक उठ सकता है।]  

 इसलिए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - "धर्म वह वस्तु है जिससे पशु, मनुष्य तक और मनुष्य देवत्व (परमात्मा) तक उठ सकता है।" 

[धर्म (सत्कर्म या 'Be and Make') आन्दोलन से जुड़े रहना वह वास्तु है - जिससे स्वयं को मात्र स्वार्थी देह M/F शरीर समझने वाला घोर 100% स्वार्थी पशुमानव, 50 % स्वार्थी मनुष्य (सद्गृहस्थ) तक और 'मनुष्य' (अर्थात मान हूँश जिसको अंतर्निहित देवत्व का होश है या जो सत्यान्वेषी या आत्मान्वेषी है) देवत्व (परमात्मा तक) पूर्ण-निःस्वार्थी मनुष्य तक (नवनीदा तक) उठ सकता है।।  श्री हनुमान जन्मोत्स्व  2 अप्रैल 2026 : महामण्डल के 5 अभ्यास से अर्जित  विनम्रता, सरलता और सत्यनिष्ठा (ईमानदारी -प्राण जाये पर वचन न जाए) ऐसे विशिष्ट दैवीय गुण हैं, विवेक -प्रयोग अर्थात विद्या जनित विनम्रता प्रयोग।-जीवो ब्रह्मैव न अपरः! की समझ तक उठ सकता है।]  

 इसलिए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - मनुष्य और ईसा में अन्तर (इष्टदेव, सद्गुरुदेव अथवा आचार्य नवनीदा में अन्तर।) 

" अभिव्यक्त प्राणियों में बहुत अन्तर होता है। अभिव्यक्त प्राणी के रूप में तुम ईसा कभी नहीं हो सकते। मिट्टी से एक मिट्टी का हाथी बना लो , उसी मिट्टी से एक मिट्टी का चूहा बना लो। उन्हें पानी में डालदो - वे एक बन जाते हैं। मिट्टी के रूप में वे निरंतर एक हैं , गढ़ी हुई वस्तुओं के रूप में निरंतर भिन्न हैं। ब्रह्म ही ईश्वर  तथा मनुष्य दोनों का उपादान है। पूर्ण सर्वव्यापी सत्ता के रूप में हम सब एक हैं, परन्तु वैयक्तिक प्राणियों के रूप में ईश्वर (मायाधीश) शाश्वत स्वामी हैं और हम (मायाधीन) शाश्वत सेवक हैं

    "तुम्हारे पास तीन चीजें '3H'  हैं- 1. शरीर, 2. मन 3. आत्मा! आत्मा इन्द्रियातीत है। मन (मिथ्या अहं) जन्म और मृत्यु का पात्र है और वही दशा शरीर की है। तुम वही (अविनाशी) आत्मा हो, पर बहुधा तुम सोचते हो की तुम शरीर हो। जब मनुष्य कहता है- 'मैं यहाँ हूँ',  तो उस समय वह शरीर की बात सोचता है। 

फिर एक दूसरा क्षण आता है , जब तुम उच्चतम भूमिका में होते हो, तब तुम यह नहीं कहते - " मैं यहाँ हूँ !" किन्तु जब कोई तुम्हें गाली देता है, या तुम्हारा अपमान करता है, और तुम रोष नहीं प्रकट करते, (भीतर से क्रोधित नहीं हो जाते), तब तुम आत्मा हो। 

" जब मैं सोचता हूँ कि मन (सूक्ष्म शरीर M/F जीव) हूँ, मैं उस अनन्त अग्नि की एक स्फुलिंग हूँ, जो तुम हो। जब मैं यह अनुभव करता हूँ कि मैं आत्मा हूँ, तुम और मैं एक हूँ। " यह एक प्रभु (मायाधीश) के भक्त का कथन है ! क्या मन आत्मा से बढ़कर है ? [क्या मन (M/F जीव भाव) आत्मा (मायधीश-इष्टदेव -आचार्यदेव) से बढ़कर है ? (खंड 10. पृष्ठ 40)]  

 "दृष्टिं ज्ञानमयीं  कृत्वा पश्येद्  ब्रह्ममयं जगत्!

ज्ञानमय दृष्टि से संसार को ब्रह्ममय देखना चाहिए

यह प्रसिद्ध श्लोक हनुमान जी द्वारा भगवान श्री राम को दिया गया उत्तर है, जो द्वैत (सेवक-स्वामी), विशिष्टाद्वैत (अंश-अंशी) और अद्वैत (आत्म-एकता) दर्शन का अनूठा मिश्रण है।

 "देहबुद्धया तु दासोऽहं जीवबुद्धया त्वदंशक। 

     आत्मबुद्धया  त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः ॥   

देहबुद्धि से तो मैं दास हूँ, जीवबुद्धि से आपका अंश ही हूँ और  आत्मबुद्धि से में वही हूँ जो आप हैं, यही मेरी निश्चित मति है॥ 

[" अपने धर्म के (सनातन-वैदिक धर्म के) उसी एक केन्द्रवर्ती सत्य पर खड़े हो जाओ - जो हिन्दू, बौद्ध और जैनियों के लिए पैतृक सम्पत्ति है। वह सत्य है मनुष्य की 'आत्मा' ! अजर, अमर, अविनाशी, सर्वगत मानवात्मा जिसकी महिमा का वर्णन वेद भी नहीं का सकते, जिसके वैभव के सामने सूर्य-चंद्र , तारागण और आकाशगंगा समेत सारा विश्व-ब्रह्माण्ड एक 'बिन्दु' जैसा है। प्रत्येक स्त्री-पुरुष, यही नहीं, उच्चतम देवों से लेकर छोटे -छोटे जीव सब वही अनन्त 'आत्मा ' हैं , कोई विकसित कोई अविकसित हैं। अन्तर प्रकार में नहीं , केवल परिमाण में है। आत्मा की इस अनंत शक्ति का प्रयोग जड़ वस्तु (देह,मन इन्द्रिय) पर होने से 'मूढ़ बुद्धि' का विकास होता है, और 'अपने पर' ही होने से  - 'मनुष्य' का ईश्वर बन जाता है। (मूढ़ बुद्धि को देह-मन के तादात्म्य से हटाकर आत्मा से जोड़ लेने पर, स्वार्थी क्षुद्र अहं, पूर्णतः निःस्वार्थी सर्वगत अहं ईश्वर में परिणत हो जाता है -क्योंकि Unselfishness is God!) पहले हमें ईश्वर बन लेने दो। तत्पश्चात दूसरों को ईश्वर बनाने में सहायता देंगे।  'बनो और बनाओ', "Be and Make" यही हमारा मूलमंत्र रहे। ऐसा न कहो कि मनुष्य पापी है। उसे यह बताओ कि तू ब्रह्म है। " (9/379) 

" मुझे तो केवल इसी बात की शिक्षा देनी है कि ईश्वर बार बार आता है , वह भारत में कृष्ण, राम और बुद्ध के रूप में आया और वह पुनः आयेगा। यह प्रायः दिखाया जा सकता है कि प्रत्येक 500 वर्ष के पश्चात दुनिया नीचे जाती है, और एक महान आध्यात्मिक लहर आती है और उस लहर के शिखर पर एक 'ईसा' होता है! ... और श्रीरामकृष्ण की जन्मतिथि से ही सत्ययुग का प्रारम्भ हो चुका है। (10/39)

[स्वामी विवेकानन्द और युवा समस्याएं/(স্বামী বিবেকানন্দ ও যুব-সমস্যা) /रामकृष्ण मठ और मिशन का प्रतीक चिन्ह] SVHS- 3.3 Tuesday, September 11, 2012

अन्तकरण की शुद्धि अपने व्यक्तित्व के बाह्य स्तर पर साधक को कितना ही संयम क्यों न हो  फिर भी वह संयम उसे रचनात्मक और निश्चयात्मक शक्ति प्रदान नहीं कर सकता जो कि नैतिक जीवन का सार है। (मोने करबि तुमि एक जन शिक्षक-शिक्ष -नेता की की शक्ति-का सार है मर्म है चित्त शुद्धि या विषयासक्त मूढ़बुद्धि को आत्मोन्मुखी शुद्धबुद्धि बना लेना। ) 

 गीता सैद्धांतिक और व्यावहारिक इन दोनों ही दृष्टियों से एक शक्तिशाली धर्म  का उपदेश देती है। निष्क्रिय सदाचार का पालन करने वाली आज्ञाकारी पीढ़ी से भगवान् श्रीकृष्ण सन्तुष्ट नहीं हैं। वे चाहते हैं कि समाज के सभी लोग न केवल अपने व्यक्तिगत जीवन में ही सर्वोच्च नैतिक मूल्यों को जियें वरन् सामाजिक जीवन में भी धर्माचरण (सत्कर्म-'Be and Make') की ऐसी नवचेतना- जाग्रत करें जिससे मनुष्यों की सम्पूर्ण पीढ़ी ही सत्य और धर्म के प्रकाश से उज्वल बन जाये। धर्म शब्द के अर्थ में उद्देश्यों की सत्यता (भारत का कल्याण) और साधनों की शुद्धता (जीवनगठन -आदि 5 अभ्यास) अन्तर्निहित है।

ज्ञानयोग व्यवस्थिति अत्यन्त देहासक्त और विषयासक्त मूढ़बुद्धि को उपर्युक्त अन्तकरण की शुद्धि (विवेकी -शुद्धबुद्धि) प्राप्त नहीं हो सकती। आत्मा के दिव्य गान के साथ एकस्वर हुए मन में ही अपनी निम्न स्तर की वृत्तियों बन्धनकारक आसक्तियों और निन्द्य उद्देश्यों को त्यागने की आवश्यक सार्मथ्य होती है। ये हीन वृत्तियां सदैव अन्तकरण में उभर कर सामने आती रहती हैं। ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति ही मन को निम्नस्तर के प्रलोभनों से निवृत्त करने का निश्चयात्मक उपाय है

 यदि कोई बालक कांच की निर्मित नाजुक कलाकृति के साथ खेल रहा हो तो उसके मातापिता उस बहुमूल्य वस्तु की सुरक्षा के लिए प्राय बालक को चॉकलेट आदि कोई वस्तु देते हैं और वह बालक उसे पाने  के लिए उस कांच की मूल्यवान् वस्तु को त्याग देता है। इसी प्रकार आत्मा (इष्टदेव) के आनन्द को अनुभव करने वाली शुद्धबुद्धि ('विद्या ददाति विनयं युक्तबुद्धि!) इन्द्रियों के विषयों तथा तज्जनित क्षणिक सुखों में स्वभावतः आसक्त नहीं होती।  दान, दम (इन्द्रिय संयम) और यज्ञ ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति प्राप्त करने के ये तीन साधन हैं जिनके द्वारा एक साधक चित्तशुद्धि (अन्तःकरण की शुद्धि) की योग्यता प्राप्त कर सकता है। 

बहुलता के भाव से उत्पन्न हुई दान की प्रवृत्ति ही वास्तविक दान है। जब हम अन्यों के साथ एकत्व का अनुभव करते हैं तभी हम सबके साथ अपने सर्वस्व का विभाजन करने के लिए तत्पर होते हैं,  अन्यथा नहीं।  इस प्रकार दान का उदय हमारी इस क्षमता से होता है जिसके द्वारा हम अपनी परिग्रह और लोभ की प्रवृत्ति को संयमित करते हैं। जहाँ इनका संयमन एक पक्ष है, तो दूसरा पक्ष है यज्ञ अर्थात् त्याग की भावना। यज्ञ भावना से प्रेरित होने पर ही हम अपने संग्रह का दान कर सकते हैं। दान शब्द से केवल धन या वस्तुओं का ही दान नहीं वरन् दुखियों के साथ सहानुभूति का भाव तथा ज्ञानदान भी इसमें सम्मिलित है।  यदि दान साधक के वैराग्य को विकसित करता है जिससे वह साधक अपनी सम्पत्ति का विनियोग दीनजनों की सहायता में करता है  तो हम कह सकते हैं कि हमारे व्यक्तिगत जीवन में इन्द्रियसंयम (दम) उसी यज्ञ भावना का संप्रयोग है। 

मूढ़बुद्धि को इन्द्रियों के विषयों में विचरण करने का पूर्ण अधिकार देने का अर्थ अपनी सम्पूर्ण शक्ति का निष्फल ही अपव्यय करना है। साधक को चाहिए कि अपनी इस शक्ति का उपयोग वह अपने ध्यानाभ्यास में करे। मन को आत्मा में समाहित करने के लिए सूक्ष्म शक्ति की आवश्यकता होती है और उसे साधक इन्द्रियसंयम के द्वारा अपने में ही निहित देख सकता है। दान और दम के बिना सत्य की तीर्थयात्रा मात्र स्वप्न ही है।

यज्ञ वैदिककाल में यज्ञ शब्द का अर्थ श्रद्धायुक्त होमहवन आदि का अनुष्ठान समझा जाता था। उस काल में साधकगण इन यज्ञों का श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करते थे। पौराणिक काल में वैदिक कर्मकाण्ड का स्थान मूर्तिपूजा प्रार्थना जैसी भक्ति साधनाओं ने ले लिया जो उसी रूप में आज भी विद्यमान हैं। यज्ञ अर्थात् पूजा के अनुष्ठान से मन को एक आलम्बन प्राप्त होने से इन्द्रियों का संयमन करने में सरलता होती है। 

स्वाध्याय से मात्र वेदपठन या बौद्धिक स्तर पर उसके अर्थ को समझना ही पर्याप्त नहीं है। संस्कृत के इस शब्द का आशय है स्वयं का अध्ययन अर्थात् आत्मनिरीक्षण। वेदप्रतिपादित सत्यों को समझकर उनका स्वानुभवकरण ही वास्तविक स्वाध्याय है। स्वाध्याय और यज्ञ से हमें आत्मसंयम का जीवन जीने का साहस प्राप्त होगा जो हमें अपने ध्यानाभ्यास में चित्त की स्थिरता प्रदान करेगा। 

तप कष्ट सहन - शारीरिक स्तर पर पालन किये जाने वाले व्रत उपवास आदि तप कहलाते हैं। तपाचरण से बाह्यजगत् के भोगों में व्यर्थ ही नष्ट होने वाली हमारी शक्ति का संचय होता है जिसके सदुपयोग आत्मविकास के लिए किया जा सकता है। 

आर्जवम् इसका अर्थ है सरलता। बुद्धि के विचार मन की भावनाओं और कर्मों में कुटिलता का साधक के व्यक्तित्व पर आत्मघातक परिणाम होता है। हमारे वास्तविक उद्देश्यों और प्रेरणाओं निश्चय और आकांक्षाओं विवेक और अनुभवों को असत्य सिद्ध करने वाले हमारे कर्मों का परिणाम अपने व्यक्तित्व की वक्रता होता है। जो व्यक्ति इस प्रकार का व्यक्तित्व जीता है उसका जीवन दो भागों में विभाजित हो जाता है और शीघ्र ही वह अपनी कार्यकुशलता की आभा को खो देता है और व्यक्तिगत दृढ़ता की शक्ति की दृष्टि से भी दुर्बल हो जाता है। 

इस प्रकार इस अध्याय के प्रथम श्लोक में ही दैवीगुणों का उल्लेख करते हुए उनके परस्पर संबंधों को भी दर्शाया गया है। हिन्दू धर्म शास्त्रों में वर्णित नैतिक मूल्य और सदाचार के नियम (साधन-चतुष्टय या यम-नियम या चरित्र के गुण) का निर्माण किसी उदासीन पैगम्बर के द्वारा नहीं हुआ है, बल्कि हमारे पूर्वज ऋषियों के नित्य-अनित्य विवेक और अनुभवों की दृढ़ चट्टानों की नींव पर  हुआ है। निष्ठापूर्वक उनका पालन करने और सजगतापूर्वक उन्हें अपने व्यवहार में अभिव्यक्त करने पर वे हमारी प्राय सुप्त दैवी क्षमताओं (निःस्वार्थपरता) को व्यक्त करते हुए (क्रमशः पशु से मनुष्य बनने में, मनुष्य से देवत्व में उठने में) अपना योगदान देते हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार  ये दैवी चरित्र के गुण अपने आप में स्वर्ग (जन्नत) में प्रवेश का अधिकार प्रदान नहीं कर सकते परन्तु मनुष्य के हृदय में स्थित दिव्य आत्मतत्त्व (अव्यक्त ब्रह्मत्व) को पूर्णतया अभिव्यक्त करने में  वे पूर्ण तैयारी के रूप में सहायक होते हैं।

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।

दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्।।16.2।।

।।16.2।। अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शान्ति, अपैशुनम् (किसी की निन्दा न करना), भूतमात्र के प्रति दया, अलोलुपता , मार्दव (वाणी की मधुरता , कोमलता), लज्जा, अचंचलता।।

अहिंसा प्राणियों को पीड़ा न पहुँचाना अहिंसा है। स्वार्थ या द्वेषवशात् किसी को पीड़ित करना हिंसा है। अहिंसा का पालन शरीर, वाणी (ह्रदय)  और मन इन तीनों स्तर पर होना चाहिए। सत्यम् सत्य का कुछ भाव आर्जव (सरलता) शब्द की व्याख्या में प्रकट किया जा चुका है। प्रमाणों से सिद्ध अर्थ को उसी रूप में प्रकट करना सत्य कहलाता है।

अक्रोध - (अविरोध) साधना की स्थिति में कभी-कभी किसी घटना अथवा किसी के दुर्व्यवहार से मन में क्रोध आ जाता है;  परन्तु तत्काल ही क्रोध को पहचान कर उसको शान्त करने की क्षमता को यहाँ अक्रोध कहा गया है। साधक को सतत्त अपने क्रोध को शान्त रखने का प्रयास करते रहना चाहिए  कभी उसे क्रियारूप में व्यक्त न होने दे। 

त्याग यहाँ यहाँ अहंकार और स्वार्थ का त्याग करने के लिए कहा गया है। पूर्व श्लोक के समान यहाँ उल्लिखित गुणों में भी परस्पर संबंध है। अहंकार त्याग के अभाव में अक्रोध या अविरोध भी सिद्ध नहीं हो सकता क्योंकि जब कोई हमारे अहंकार या स्वार्थ को चोट या हानि पहुंचता है तभी हमें क्रोध आता है।

शान्ति उपर्युक्त गुणों से सम्पन्न व्यक्ति, अहंकार (मन या सूक्ष्म शरीर M/F जीव-अंशी) को आत्मा (इष्टदेव) का दास समझने वाले व्यक्ति के मन में विक्षेपों का कोई कारण नहीं रह जाता; इसलिए उसके मन की शान्ति बनी रहती है। बाह्य जगत् की अथवा उसके व्यक्तिगत जीवन की परिस्थितियां कितनी ही दुखदायक और आक्रामक क्यों न हों उस व्यक्ति (नारद जैसे प्रभु -भक्त) का मनसन्तुलन (poise) कभी विचलित नहीं होता है

अपैशुनम् किसी व्यक्ति के दोषों को अन्य लोगों के समक्ष प्रकट करने को पैशुन कहते हैं। पैशुन का अभाव ही अपैशुन है।  मार्दव (वाणी की मधुरता , कोमलता) आत्मविकास के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचने की आकांक्षा रखने वाले उद्यमी साधक को ऐसा आन्तरिक सामञ्जस्य स्थापित करना चाहिए कि उसकी वाणी आत्मा की सुरभि का अनुकरण करे। इस प्रकार के मधुर संभाषण के गुण का स्वयं में विकास करने से अपने व्यक्तित्व के अन्य आयामों का भी स्वत विकास हो जाता है. जो अन्तकरण को अनुशासित करने के लिए आवश्यक होता है।

दया प्राणी मात्र के प्रति दया -नहीं ! सेवा   दुख और कष्ट से पीड़ित प्राणियों के प्रति सेवा का भाव दया कहलाता है। 

इसके अतिरिक्त एक साधक को समाज में रहते हुए यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि समाज के सभी लोग उन्हीं आदर्शों या जीवन मूल्यों का अनुकरण करें जिनके प्रति स्वयं उसकी श्रद्धा है। लोगों की दृष्टियों में भेद होता है और इसलिए उसे अपने आसपास के लोगों में अपूर्णता और दोष दिखाई दे सकते हैं। परन्तु उनको इन समस्त दोषों के अन्तरंग में स्थित आत्मा के असीम सौन्दर्य को देखते रहना चाहिए। आत्मदर्शन की यह क्षमता ही सभी साधुओं और सन्तों के मन में स्थित प्राणिमात्र के प्रति दया (सेवा) का रहस्य है। 

सब के प्रति मन में प्रेम होने पर ही उनके प्रति असीम सहानुभूति और स्नेह का भाव हृदय में उठ सकता है। आत्मा की इस सुन्दरता को यदि अत्यन्त दुःखी और दुश्चरित्र व्यक्ति में भी हम नहीं देख सके तो उनके प्रति हमारे हृदय में स्नेह और दया (सेवा की भावना) उत्पन्न नहीं हो सकती।

अलोलुपता प्रलोभित और आकर्षित करने वाले विषयों की उपस्थिति में भी -  "ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके, शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते।" प्रार्थना से मन में विकार उत्पन्न नहीं होना अलोलुपता है।

मार्दव (मृदुता) और लज्जा यहाँ लज्जा का अर्थ है शास्त्र-निषिद्ध और निन्द्य प्रकार के कर्म करने में लज्जा का अनुभव करना। इसे दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि निन्द्य कर्मों का त्याग करना तथा शुभ कर्मों में गर्व का न होना अर्थात् नम्रता विनयशीलता का होना लज्जा शब्द का अभिप्रेत अर्थ है। वस्तुत जो व्यक्ति उपर्युक्त गुणों से सम्पन्न होता है उसमें स्वभाव की मृदुता और विनयशीलता स्वाभाविक रूप में आ जाती है क्योंकि ये दोनों गुण मनुष्य की श्रेष्ठ संस्कृति (सुन्दर चरित्र) के द्योतक हैं। 

अचापलम् मनुष्य के मन की चंचलता और स्वभाव की अस्थिरता उसकी शारीरिक चेष्टाओं में प्रकट होती है।  जैसे जैसे व्यक्ति का आत्मिक विकास होता जाता है उसका आत्मसंयम ही उसका सौन्दर्य समझा जाता है।  जो उसकी शारीरिक चेष्टाओं के द्वारा स्पष्ट होता है।श्री शंकराचार्य जी इसका अर्थ बताते हैं- 'प्रयोजन के अभाव में हाथ, पैर,   वाणी आदि इन्द्रियों का व्यापार न होना अचापलम् कहलाता है। यह इस शब्द का व्यापक अर्थ है। और इसका आशय यह भी है कि लक्ष्य (आदर्श)  प्राप्ति के लिए उपयोगी कार्य में तत्परता और समस्त शारीरिक शक्तियों की मितव्ययिता होना चाहिए। अनावश्यक चेष्टाएं करना दुर्बल व्यक्तित्व का लक्षण है। ऐसे व्यक्ति कल्पनाओं में ही खोये रहते हैं और मानसिक तथा बौद्धिक स्तर पर अत्यन्त दुर्बल होते हैं। अत अचापलम् नामक गुण के सम्पादन से हम अपने व्यक्तित्व -चरित्र के अनेक प्रकार की सामान्य दोषों का उपचार कर सकते हैं।

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।

भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत।।16.3।।

।।16.3।। हे भारत ! तेज, क्षमा, धैर्य, शौच (शुद्धि), अद्रोह और अतिमान (गर्व) का अभाव ये सब दैवी संपदा को प्राप्त पुरुष के लक्षण हैं।।

 तेज यह तत्त्वदर्शी ऋषि का तेज है। उसकी शुद्धबुद्धि की प्रतिभा नेत्रों में जगमगाता आनन्द, सन्तप्त हृदयों को शीतलता प्रदान करने वाली शान्ति की सुरभि कर्मों में उसका अविचलित सन्तुलन, प्राणिमात्र के प्रति उसके हृदय में स्थित प्रेम का आनन्द और उसके अन्तरतम से प्रकाशित आनन्द का प्रकाश। यह तेज ही उस ऋषि के व्यक्तित्व का प्रबल आकर्षण होता है,  जो प्रचुर शक्ति और उत्साह के साथ सब की सेवा करता है। और उसी में स्वयं को धन्य समझता है।

क्षमा जिस सन्दर्भ में इस गुण का उल्लेख किया गया है उससे इसका अर्थ गाम्भीर्य बढ़ जाता है। सामान्य दुख और कष्ट अपमान और पीड़ा को धैर्यपूर्वक सहन करनै की क्षमता ही क्षमा का सम्पूर्ण अर्थ नहीं है। बाह्य जगत् के अत्यधिक शक्तिशाली विरोध तथा उत्तेजित करने वाली परिस्थितयों के होने पर भी उनका सामना करने का सूक्ष्म कोटि का साहस और अविचलित शान्ति का नाम क्षमा है। 

धृति अर्थात् धैर्य। दादा कहते थे - " वीर हो धीर बनो ! " जब कोई व्यक्ति साहसपूर्वक जीना चाहता है तब वह अपने जीवन में सदैव सुखद वातावरण-अनुकूल परिस्थितयाँ और अपने कार्य में सफलता के सहायक सुअवसरों को प्राप्त करने की अपेक्षा नहीं कर सकता है। सामान्यत एक दुर्बल व्यक्तित्व के पुरुष को अचानक निराशा आकर घेर लेती है और वह कार्य को अपूर्ण ही छोड़कर अपने कार्य क्षेत्र से निवृत्त हो जाता है।  अनेक लोग तो ऐसे समय हतोत्साह होकर कार्य को त्याग देते हैं  जब विजयश्री उन्हें वरमाला पहनाने को तत्पर हो रही होती है। पुनः यह एक आत्मदर्शन युक्त शुद्धबुद्धि में निहित गुप्त शक्ति है ही धृति अर्थात् धैर्य है। श्रद्धा की शक्ति, लक्ष्य 'Be and Make' में आस्था, उद्देश्य (भारत का कल्याण) की एकरूपता,  आदर्श का स्पष्ट दर्शन और त्याग की साहसिक भावना ये सब वे शक्ति श्रोत हैं।  जहाँ से धृति की बूंदें रिसती हुई प्रवाहित होकर श्रम, अवसाद एवं निराशा आदि का परिहार करती रहती हैं। 

शौचम् (शुद्धि) यह शब्द न केवल अन्तकरण के विचारों एवं उद्देश्यों की शुद्धि को इंगित करता है? वरन् इसके द्वारा वातावरण की शुद्धि अपने वस्त्रों की और वस्तुओं की स्वच्छता भी सूचित की गयी है। आन्तरिक शुद्धि पर ही अत्यधिक बल देने के फलस्वरूप हम अपने समाज में बाह्य शुद्धि की सर्वथा उपेक्षा की जाते हुए देखते हैं। वस्त्रों की तथा नगर की स्वच्छता हमारे राष्ट्र में दुर्लभ हो गयी है। यद्यपि हमारे धर्म में साधक के लिए शुद्धि और स्वच्छता इन दोनों को ही अपरिहार्य बताया गया है।  तथापि धर्णप्राण भक्तगण भी इनके प्रति उदासीन ही दिखाई देते हैं।

अद्रोह अहिंसा का अर्थ है किसी को भी पीड़ा न पहुँचाना और अद्रोह का अर्थ है मन में कभी हिंसा का भाव न उठना। जैसे कोई भी व्यक्ति कभी स्वप्न में भी स्वयं को पीड़ित करने का विचार नहीं करता वैसे ही आत्मैकत्व का बोध प्राप्त पुरुष के मन में किसी के प्रति भी द्रोह की भावना नहीं आती क्योंकि अन्य को कष्ट देने का अर्थ स्वयं को ही पीड़ित करना है। 

अतिमानिता–गर्वमुक्त या  प्रतिष्ठा की इच्छा से मुक्त पुरुष के लिए जीवन पक्षी के पंख के समान भारहीन होता है। 

उपर्युक्त छब्बीस/चौबीस गुण दैवीसम्पदा से सम्पन्न व्यक्ति के स्वभाव का पूर्ण चित्रण करते हैं। पूर्णत्व प्राप्ति के सभी इच्छुक साधकों के मार्गदर्शन के रूप में इन गुणों का यहाँ उल्लेख किया गया है।

जिस मात्रा में उपर्युक्त दैवीगुणों के अनुरूप हम अपने जीवन को पुर्नव्यवस्थित करने में सक्षम होते हैं और जीवन की ओर देखने के अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन ला सकते हैं उसी मात्रा में हम अपनी शक्तियों के निष्प्रयोजक व्यय को अवरुद्ध कर उन्हें सुरक्षित रख सकते हैं। इन जीवन मूल्यों का सम्मान करते हुए उन्हें जीने का अर्थ ही सम्यक् जीवन पद्धति को अपनाना है

अब आसुरी सम्पदा का वर्णन करते हैं

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।

अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्।।16.4।।

।।16.4।। हे पार्थ ! दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोर वाणी (पारुष्य) और अज्ञान यह सब आसुरी सम्पदा है।।

श्रीकृष्ण अब आसुरी प्रकृति से युक्त लोगों के छः लक्षणों की व्याख्या करते हैं। वे पाखंडी होते हैं। इसका तात्पर्य है कि वे दूसरों को प्रभावित करने के लिए शुभ लक्षणों से संपन्न न होते हुए भी सदाचरण का प्रदर्शन करते है। यह कृत्रिम (जेकिल एंड हाइड) व्यक्तित्व है जोकि आंतरिक रूप से तो अशुद्ध है किंतु बाहर से शुद्धता की प्रतीति कराता है। 

आसुरी गुण वालों का स्वभाव अहंकार से परिपूर्ण और दूसरों के प्रति अशिष्ट होता है। वे अपनी उपलब्धियों और उपाधियों जैसे धन, शिक्षा, सौन्दर्य, पद-प्रतिष्ठा आदि पर गर्व करते हैं। मन पर नियंत्रण न होने के कारण वे शीघ्र क्रोधित हो जाते हैं। कामवासना और लालच के कारण कुंठाग्रस्त रहते हैं। वे निर्दयी और कठोर होते हैं तथा दूसरों के दुःखों में संवेदनशील नहीं होते। उन्हें आध्यात्मिक सिद्धांतों का ज्ञान नहीं होता और वे अधर्म को धर्म मानते हैं।

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।

मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।।16.5।।

।।16.5।। हे पाण्डव ! दैवी सम्पदा मोक्ष के लिए और आसुरी सम्पदा बन्धन के लिए मानी गयी है, तुम शोक मत करो, क्योंकि तुम दैवी सम्पदा को प्राप्त हुए हो।।

दो प्रकार की प्रकृतियों का वर्णन करने के पश्चात् अब श्रीकृष्ण दोनों के परिणामों को व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि आसुरी गुण मनुष्य को 'संसार' की बेड़ियों में जकड़ लेते हैं जबकि दैवीय गुणों द्वारा बंधनों को काटने में सहायता मिलती है। 

आध्यात्मिक मार्ग पर सफलतापूर्वक चलने के लिए साधक को कई बिन्दुओं पर ध्यान रखना आवश्यक होता है। यहाँ तक कि यदि कोई एक भी आसुरी गुण जैसे अभिमान, पाखंड आदि रह जाता है तो यह असफलता का कारण बन सकता है। 

इसलिए हमें दैवीय गुणों को विकसित करना चाहिए। दैवीय गुणों के बिना हमारी आध्यात्मिक उन्नति पुनः हवा हो सकती है। उदाहरणार्थ धौर्य न होने पर हम विपत्ति आने पर अपना लक्ष्य छोड़ देंगे और क्षमाशीलता के बिना मन विद्वेष से युक्त हो जाएगा। 

तब वह भगवान में तल्लीन नहीं हो पाएगा। 

लेकिन यदि हम दैवीय गुणों से सम्पन्न रहते हैं तब प्रगति के मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं का सामना करने के लिए हम तैयार रहेंगे। इस प्रकार से सद्गुणों को विकसित करना और अवगुणों का उन्मूलन करना आध्यात्मिक विकास का अभिन्न अंग है। 


अपने प्रतिदिन के निजी कार्यकलापों की दैनिकी (डायरी) लिखना एक उपयोगी पद्धति जो हमारी दुर्बलताओं को दूर करने में सहायता करती है। कई सफल लोगों ने अपने संस्मरणों और कार्य-कलापों को डायरी में लिखा ताकि उन्हें सफलता प्राप्त करने में अपेक्षित गुणों को विकसित करने में सहायता मिल सके।

 महात्मा गांधी और बेंजामिन फ्रैंकलिन् दोनों ने अपनी आत्मकथाओं में ऐसा उल्लेख किया है। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि यदि हम अपनी भक्ति को पुष्ट करते हैं तब समय के साथ हम स्वाभाविक रूप से इन दैवीय गुणों को प्राप्त कर लेगें। 

यह सत्य है लेकिन प्रारंभ में ही से भक्ति मार्ग की ओर अग्रसर होते हुए सभी प्रकार के नकारात्मक लक्षणों से मुक्त रहना कठिन है। इनमें से कोई भी अवगुण हमारी प्रगति में बाधा डाल सकता है। 

अधिकांश लोगों के लिए धीरे-धीरे भक्ति भावना को विकसित करना ही उपयोगी होता है जिससे दैवीय गुणों को विकसित करने और आसुरी गुणों का उन्मूलन करने में भी सफलता मिलती है। इसलिए हमें भक्ति के अंग के रूप में श्रीकृष्ण द्वारा इस अध्याय में वर्णित दैवीय गुणों को अपने भीतर विकसित करने के लिए निरन्तर कार्य करना होगा और आसुरी गुणों का त्याग करना होगा।

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च।

दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे श्रृणु।।16.6।।

।।16.6।।इस लोकमें दो तरह के प्राणियों की सृष्टि है -- दैवी और आसुरी। दैवीका तो मैंने विस्तार से वर्णन कर दिया, अब हे पार्थ ! तुम मेरे से आसुरी का विस्तार सुनो।

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।

न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते।।16.7।।

।।16.7।। आसुरी स्वभाव के लोग न प्रवृत्ति को; जानते हैं और न निवृत्ति को उनमें न शुद्धि होती है, न सदाचार और न सत्य ही होता है।।

 निषिद्ध कर्मों से विरति ही निवृत्ति कहलाती है। अकर्तव्य का त्याग ही मनुष्य के लिए श्रेयस्कर होता है। असुर लोगों को कर्तव्य और अकर्तव्य का सर्वथा अज्ञान होता है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि आसुरी गुणों की सूची अज्ञान (अविद्या-अस्मिता,राग,द्वेष,अभिनिवेश,पंचजलेश) से  प्रारम्भ होती है। 'Ignorance of law is no excuse ' कानून की अनभिज्ञता कोई बहाना नहीं है। प्रारब्ध भोग कर ही क्षय करना पड़ता है। लेकिन शिक्षा-व्यवस्था में अज्ञान (अविद्या जनित क्लेश - और विद्या ददाति विनयं।) की कोई शिक्षा नहीं दी जाती है।  यदि कोई व्यक्ति अज्ञानवशात् किसी प्रकार का अपराध करता है तो समाज के सहृदय पुरुषों के मन में उसके प्रति क्षमा का भाव सहज उदित होता है; भले ही न्यायालय में उसे क्षमा के योग्य कारण न माना जाये। 

 यहाँ प्रवृत्ति और निवृत्ति के शब्द क्रमश कर्तव्य कर्म और अकर्तव्य अर्थात् निषिद्ध कर्म हैं। धार्मिक अनुष्ठानकर्ता कर्तव्य पालन और निस्वार्थ समाज सेवा -'Be and Make'  के द्वारा न केवल तात्कालिक लाभ को प्राप्त करता है अपितु अन्तकरण की शुद्धि भी प्राप्त करता है; क्योंकि वह कभी मनुष्य जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य (आत्मज्ञान) को विस्मृत नहीं होने देता।

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।

अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्।।16.8।।

।।16.8।। वे कहते हैं कि यह जगत् आश्रयरहित, असत्य और ईश्वर रहित है, यह (स्त्रीपुरुष के) परस्पर कामुक संबंध से ही उत्पन्न हुआ है, और (इसका कारण) क्या हो सकता है? 

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।

प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः।।16.9।।

।।16.9।।उपर्युक्त (नास्तिक) दृष्टिका आश्रय लेनेवाले जो मनुष्य अपने नित्य स्वरूपको नहीं मानते, जिनकी बुद्धि तुच्छ है, जो उग्रकर्मा और संसारके शत्रु हैं, उन मनुष्यों की सामर्थ्य का उपयोग जगत का नाश करनेके लिये ही होता है।

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।

मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः।।16.10।।

।।16.10।। दम्भ, मान और मद से युक्त कभी न पूर्ण होने वाली कामनाओं का आश्रय लिये, मोहवश मिथ्या धारणाओं को ग्रहण करके ये अशुद्ध संकल्पों के लोग जगत् में कार्य करते हैं।।

कामनाओं की तृप्ति के लिए ही जीवन धारण करना अविवेक का लक्षण है क्योंकि  कामना कभी तृप्त  नहीं होती। जैसेजैसे हम उसे तृप्त करते जाते हैं वैसेवैसे ही वह द्विगुणित होती जाती है। जो पुरुष अपने अनन्त स्वरूप को न जानकर स्वयं को परिच्छिन्न जीव ही समझता है केवल उसे ही विषयों की कामना हो सकती है। इसे ही मोह कहते हैं। 

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।

कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता:।।16.11।।

।।16.11।। मरणपर्यन्त रहने वाली अपरिमित चिन्ताओं से ग्रस्त और विषयोपभोग को ही परम लक्ष्य मानने वाले ये आसुरी लोग इस निश्चित मत के होते हैं कि "इतना ही (सत्य, आनन्द) है"।।

आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।

ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्।।16.12।।

।।16.12।। सैकड़ों आशापाशों से बन्धे हुये, काम और क्रोध के वश में ये लोग विषयभोगों की पूर्ति के लिये अन्यायपूर्वक धन का संग्रह करने के लिये चेष्टा करते हैं।।

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।

इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।।16.13।।

।।16.13।। मैंने आज यह पाया है और इस मनोरथ को भी प्राप्त करूंगा, मेरे पास यह इतना धन है और इससे भी अधिक धन भविष्य में होगा।।

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।

ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी।।16.14।।

।।16.14।। "यह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया है और दूसरे शत्रुओं को भी मैं मारूंगा", "मैं ईश्वर हूँ और भोगी हूँ", "मैं सिद्ध पुरुष हूँ", "मैं बलवान और सुखी हूँ",।।

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।

यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः।।16.15।।

।।16.15।। "मैं धनवान् और श्रेष्ठकुल में जन्मा हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है?",'मैं यज्ञ करूंगा', 'मैं दान दूँगा', 'मैं मौज करूँगा' - इस प्रकार के अज्ञान से वे मोहित होते हैं।।

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।

प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ।।16.16।।

।।16.16।। अनेक प्रकार से भ्रमित चित्त वाले, मोह जाल में फँसे तथा विषयभोगों में आसक्त ये लोग घोर, अपवित्र नरक में गिरते हैं।।

आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।

यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्।।16.17।।

।।16.17।। अपने आप को ही श्रेष्ठ मानने वाले, स्तब्ध (गर्वयुक्त), धन और मान के मद से युक्त लोग शास्त्रविधि से रहित केवल नाममात्र के यज्ञों द्वारा दम्भपूर्वक यजन करते हैं।।

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।

मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः।।16.18।।

।।16.18।। अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोध के वशीभूत हुए परनिन्दा करने वाले ये लोग अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ (परमात्मा) से द्वेष करने वाले होते हैं।।

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।

क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।।16.19।।

।।16.19।। ऐसे उन द्वेष करने वाले,  क्रूरकर्मी और नराधमों को मैं संसार में बारम्बार (अजस्रम्) आसुरी योनियों में ही गिराता हूँ अर्थात् उत्पन्न करता हूँ।।

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।

मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्।।16.20।।

।।16.20।। हे कौन्तेय ! वे मूढ़ पुरुष जन्मजन्मान्तर में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं और ( इस प्रकार) मुझे प्राप्त न होकर अधम गति को प्राप्त होते है।।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।।16.21।।

।।16.21।। काम, क्रोध और लोभ ये आत्मनाश के त्रिविध द्वार हैं, इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।।

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्।।16.23।।

।।16.23।। जो पुरुष शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी कामना से प्रेरित होकर ही कार्य करता है, वह न पूर्णत्व की सिद्धि प्राप्त करता है, न सुख और न परा गति।।

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।

ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।।16.24।।

।।16.24।। इसलिए तुम्हारे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था (निर्णय) में शास्त्र ही प्रमाण है शास्त्रोक्त विधान को जानकर तुम्हें अपने कर्म करने चाहिए।।

 पूर्व के तीन श्लोकों में दी गई युक्तियों का यह निष्कर्ष निकलता है कि साधक को शास्त्र प्रमाण के अनुसार अपनी जीवन पद्धति अपनानी चाहिए। कर्तव्य और अकर्तव्य का निश्चय शास्त्राध्ययन के द्वारा ही हो सकता है। सत्य की प्राप्ति के मार्ग को निश्चित करने में प्रत्येक साधक अपनी ही कल्पनाओं का आश्रय नहीं ले सकता । शास्त्रों की घोषणा उन ऋषियों ने की है जिन्होंने इस मार्ग के द्वारा पूर्णत्व का साक्षात्कार किया था। अत जब उन ऋषियों ने हमें उस मार्ग का मानचित्र दिया है तो हमारे लिए यही उचित है कि विनयभाव से उसका अनुसरण कर स्वयं को कृतार्थ करें। '

ज्ञात्वा इसलिए परम सत्य या आत्मदेव की तीर्थयात्रा प्रारम्भ करने के पूर्व हमें इन शास्त्रों का बुद्धिमत्तापूर्वक अध्ययन करना चाहिए। लक्ष्य, मार्ग, विघ्न और विघ्न के निराकरण के उपायों का जानना किसी भी यात्रा के लिए अत्यावश्यक और लाभदायक होता है।

तुम्हें कर्म करना चाहिए अनेक लोग शास्त्र को जानते हैं परन्तु ऐसे अत्यन्त विरले लोग ही होते हैं जिनमें शास्त्रोपदिष्ट जीवन जीने का साहस दृढ़ संकल्प और आत्मानुभूति के लक्ष्य की प्राप्ति होने तक धैर्य बना रहता है। इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण का यह उपदेश है कि काम क्रोध और लोभ का त्याग कर मनुष्य को शास्त्रानुसार जीवन यापन करना चाहिए। यही कर्मयोग का जीवन है

तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसंपद्विभागयोगो नाम षोढशोऽध्याय।।

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 प्रातः बेलुड़ मठ से गंगा दर्शन  क्षणिक भ्रमण! वाह! कहां कहां गये? प्रभु! भारत को बचा लो!भारत मर जायेगा तो विश्व मर जायेगा। भारत में गीता पढ़ने और पढ़ाने में समर्थ कम से कम एक लाख युवा पैदा करो!तुरंत करो! मुझे मुक्ति नहीं चाहिये। अगला जन्म शीघ्र दो ताकि बचपन से ही दादा के प्रशिक्षण मे विवेक - जागृत रखने का प्रशिक्षण प्राप्त करके बचपन से ही मनुष्य बनने और बनाने के आन्दोलन में जुट जाऊँ। बहुत देर हो रही है। गीता की शिक्षा फैला दो प्रभु!तुम्हारे श्री चरणों मे मेरी यही एकमात्र प्रार्थना है!प्रिय भाई उपेन्द्र, तुम इस समय कहां हो? तुम्हारे यहाँ तो ईरान वार का कोई असर तो नहीं हुआ? मैंने आज दयानन्द से भी बात किया था। उससे मालूम हुआ कि Janibigha से भी 5-6 लड़के विवेक वाहिनी कैम्प में गये है। Phulvriya से भी गये हैं। प्रमोद दा के बिना हिन्दी क्षेत्र में महामंडल का काम करना संभव नहीं है।  तब मैंने प्रमोद दा से भी बात किया। Chapra Mahamandal के पास एक email बंगला में गया था। उससे कुछ गलतफहमी हो गयी थी। प्रम दा से बात करके सब गलतफहमी दूर हो गयी है। वास्तव में " मनुष्य " बन जाना दुनिया का सबसे कठिन कार्य है।  पर इस Be and Make ' आन्दोलन  से जुड़े रहना ही एकमात्र उपाय है। इसलिए नवनी दा बोलते थे- विद्या dadati vinyam - ज्ञान से विनम्रता आती है, इसलिए आज मैं प्रमोद दा से Ranen दा आदि सभी विषय गलतफहमी को दूर कर लिया ।और आगे से उन्होंने भी मिलजुलकर काम करने का निर्णय लिया है। तुम भी उनसे कभी प्रेम पूर्वक बात कर लेना। तुम्हारा- विजय

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