कुल पेज दृश्य

रविवार, 1 मार्च 2026

⚜️️🔱श्रीमद् भगवद्गीता : अध्याय पाँच ⚜️️🔱⚜️️5-संन्यास योग🔱 अज्ञान से ज्ञान ढका हुआ है, इससे सब जीव मोहित होते हैं"⚜️️🔱 अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।।5.15।। ⚜️️🔱 श्रीकृष्ण कहते हैं कि तपस्या के मार्ग का समापन भी भगवान की शरणागति में ही होता है। Unity in diversity

संन्यास योग

31 श्लोक युक्त इस पंचम अध्याय का नाम 'संन्यास योग ' है। यद्यपि श्रुति ने कहा है - "यद अहरेव (जिस दिन) विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्" (जाबालोपनिषद्याज्ञवल्क्योपनिषद्)।अर्थात जिस दिन या जिस क्षण वैराग्य का उदय होगा , उसी क्षण संन्यास आश्रम ग्रहण करना कर्तव्य है (यह एक वैदिक वाक्य है जो ज्ञानोदय  होने पर (विवेकज -वैराग्य होने पर ) तत्काल कर्मफल और सांसारिक मोह त्यागने की प्रेरणा देता है।) किन्तु भगवान श्रीकृष्ण ने इस अध्याय में कर्म , अकर्म और विकर्म सब कुछ छोड़कर तत्काल बालमुड़ाकर कपड़ा बदल कर संन्यासी हो जाने का उपदेश नहीं दिया है। बल्कि पूर्णतया कर्मफल का परित्याग करके कर्मयोगी या नित्य-संन्यासी होने का ही आदेश दिया है। [अर्थात जिस क्षण विवेकज-वैराग्य का उदय होगा, उसी क्षण इस मति या बुद्धि में प्रतिष्ठित हो जाना कि - "इस सृष्टि में कुछ भी मेरा नहीं है, सब कुछ भगवान का है!' -गृहस्थ या संन्यासी दोनों का कर्तव्य है।] कर्मत्याग या स्वधर्म त्याग गीता का उपदेश नहीं है। बल्कि स्वधर्म-पालन और कर्मफल त्याग ही गीता का उपदेश है। क्योंकि कर्मत्याग करके संसार में रहना सम्भव नहीं है। केवल वैराग्य-सम्पन्न व्यक्ति ही कर्म त्याग करके संन्यासी हो सकते हैं। जब तक मनुष्य देहाश्रित है (M/F शरीर से युक्त है) तब तक कर्मत्याग विपरीत -भावी (विसम्वादी) भाव है। क्योंकि परिव्राजक संन्यासी को भी शरीर धारण करने के लिए भिक्षाटन (या समाजसेवा का कुछ-न-कुछ काम करना) ही पड़ता है।  

श्रीभगवान ने स्वयं कहा है - 'न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठति अकर्मकृत्' -अज्ञानी हो या ज्ञानी,  किसी भी अवस्था में कोई व्यक्ति कर्म किये बिना नहीं रहता। क्योंकि प्रकृति (माया या अविद्या) से उत्पन्न गुण (अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष, अभिनिवेश आदि पंचक्लेश) सभी मनुष्यों को 'बाध्य करके' कर्म कराते हैं। 

इसलिए हमारे जैसे अविवेकी मनुष्यों (मूढ़बुद्धि) के लिए उन्होंने कर्मयोग और कर्मत्याग के अन्तर को विशेष रूप से समझाया है। 

अभीतक भगवान ने कर्मयोग के साथ ज्ञान की भी प्रशंसा की थी , इसलिए अर्जुन पूछता है ज्ञान और कर्म में मेरे लिए कौन मंगल-जनक है ? तब भगवान कहते हैं - कर्म बंधन का कारण नहीं है , फल आसक्ति ही बंधन का कारण है। कर्म फल का त्याग या अभीतक कर्म के द्वारा जो कुछ फल प्राप्त हुआ उसका त्याग यानि "इस सृष्टि में कुछ भी मेरा नहीं है, सब कुछ भगवान का है!" इस बोध में निरंतर प्रतिष्ठित रहना ही यथार्थ संन्यास है, और संसार (3K) से आसक्ति त्याग ही मोक्ष है। 

ज्ञानमार्ग ('3H नेति-नेति मार्ग') की साधना करके ब्रह्मज्ञान-लाभ करना साधारण मनुष्यों (गृहस्थ) के लिए सम्भव नहीं है। अद्वैत वेदान्त के अधिकारी व्यक्ति का निर्णय करते हुए 'वेदान्तसार ग्रहथ ' में लेखा है केवल साधनचतुष्टय सम्पन्नअर्थात 'विवेक,वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मुमुक्षुत्व' से सम्पन्न व्यक्ति व्यक्ति ही इस ब्रह्मविद्या लाभ के अधिकारी हैं। इसलिए संन्यासी होकर भी ब्रह्म-विद्या लाभ के अधिकारी व्यक्ति- विरले ही मिलते हैं। मुण्डकोपनिषद (1.2.12) में लिखा है - 

"परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान्,  

ब्रह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन ।

तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्, 

समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥"

जब जीवन कामिनी-कांचन और  (पद, प्रतिष्ठा, पुण्य और स्वर्ग) की क्षणभंगुर फलों में आसक्त होके, 3K के पीछे दौड़ते-दौड़ते सांसारिक माया-जाल में भटककर थक जाता है -तब ह्रदय में (शुद्ध बुद्धि में) एक मौन प्रश्न जागता है: “क्या बस यही जीवन का सार है?”  तब यह वह क्षण है, जब विवेक का प्रभात होता है। 

मुण्डकोपनिषद् का यह मंत्र उस प्रथम आलोक (विवेकज-वैराग्य) की ओर संकेत करता है, जहाँ साधक 'आत्मवेत्ता’ बनता है—न जन्म से, अपितु विवेक और वैराग्य की साधना से। वह ‘परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान्’—मृत्युलोक से स्वर्गलोक तक, कर्मों से अर्जित हर उपलब्धि का सूक्ष्म निरीक्षण करता है। उसे बोध होता है कि पुण्य का संचय कितना ही विशाल हो, वह नश्वर है, परिवर्तनशील है, मोक्ष का पथ नहीं

यह गहन चिन्तन साधक को ‘निर्वेद’ (3k से पूर्ण अनासक्ति) की ओर ले जाता है—न पलायन, न निराशा, बल्कि एक प्रौढ़ आत्म-जागृति है ! विवेकज-वैराग्य की शान्तिपूर्ण भूमि। यहीं वह उस सत्य का साक्षात्कार करता है‘नास्त्यकृतः कृतेन’—"कर्म (कृत) के द्वारा अकृत (परम् सत्य, अविनाशी आत्मा) को प्राप्त नहीं किया जा सकता"। जो अजन्मा, अनादि और परम सत्य (अद्वैत) है, उसे कर्मों की सीढ़ी से नहीं पाया जा सकता। (जिसे भगवान शंकराचार्य वेदान्त का हृदय मानते हैं और जिसे देखकर एथेंस का सत्यार्थी देवकुलीश अँधा हो गया था ?)यहीं से ज्ञान की पावन यात्रा का शुभारम्भ होता है (नेति से इति यात्रा का ?) , और इसका प्रथम सोपान, इसकी पहली सीढ़ी है - गुरु के पावन श्रीचरण । 

गुरु (या महामण्डल के संस्थापक सचिव ?) कोई साधारण विद्वान नहीं है , बल्कि ‘श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्’—वेदों का पारंगत और स्वयं ब्रह्म में लीन। साधक ‘समित्पाणिः’ बनकर, समर्पण की समिधा और संकल्प की ज्योति लिए, गुरु की शरण में जाता है। जैसे यज्ञ की अग्नि के लिए समिधा अर्पित की जाती है, वैसे ही ज्ञानयज्ञ में अपने अहंकार का हवन कर देता है।

यह मंत्र आत्म-साधना की सम्पूर्ण दिशा को आलोकित करता है ! 

विवेकज-ज्ञान से जन्मता है - वैराग्य। वैराग्य ले जाता है - गुरु की शरण तक। गुरु की कृपा से मिलता है - ब्रह्मज्ञान; और ज्ञान ही खोलता है - मोक्ष का द्वार। 

मुण्डकोपनिषद  की यह पुकार हर जिज्ञासु के अंतःकरण में गूंजती है—“उठो ! जागो ! ब्रह्मविद्या के पथ पर चलो !और तब तक मत रुको जब तक आत्मज्ञान न हो जाये !" क्योंकि, कर्म सुख दे सकते हैं, पर मुक्ति का एकमात्र संबल है - ज्ञान   

अर्थात कर्मजनित स्वर्ग आदि लोकों की परीक्षा करके उन्हें अनित्य जानकर -ब्राह्मण -यानि ब्रह्मविद - उनसे वैराग्य प्राप्त करें , क्योंकि 'अकृत' अर्थात नित्य-प्राप्त मोक्ष कृत कर्मों के द्वारा प्राप्त नहीं होता। [तद्विज्ञानार्थं -उस (ब्रह्म/परतत्त्व) के विशेष ज्ञान (विज्ञान) के लिए।]-वह वैराग्यवान संन्यासी नित्य , सत्य , ब्रह्मविज्ञान लाभ करने के उद्देश्य से समिधा हाथ में लेकर वेदज्ञ और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाएँ।] 

इस प्रमाण से साधन-चतुष्टय द्वारा अद्वैत ब्रह्मविद्या लाभ का अधिकारी होना कितना कठिन है , वह स्पष्ट हो जाता है। अतएव जिन्हें संन्यासी बनकर गृहस्थी छोड़ देना सम्भव नहीं है , उनके लिए श्री भगवान ने निष्काम कर्मयोगी बनकर कल्याण के मार्ग में चलने का उपदेश दिया है। 

कर्मयोगी और कर्म-संन्यासी दोनों के लिए साधन - 'अहं बुद्धि'  का त्याग। ज्ञानमयी दृष्टि द्वारा सर्वत्र ब्रह्मदृष्टि से - विवेकदर्शन तथा ध्यानयोग के अभ्यास का उपदेश दिया है। ध्यानयोग की सहायता से बुद्धि को विषय-रहित बनाकर आत्मनिष्ठ रखना होगा। उसी से प्रकृति के गुणों से बंधन मुक्त होकर बुद्धि अविनाशी आत्मा में - प्रतिष्ठित हो सकेगी। 

सर्वत्र समदर्शी होना भी 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म, नेह नानास्ति किंचन ॥' इस ज्ञान में प्रतिष्ठित होने का सोपान स्वरुप है। सर्वत्र समस्त प्राणियों में एक ही सर्वगत आत्मा का दर्शन करने से ही मनुष्य समदर्शी या आत्मदर्शी हो सकता है सर्वत्र (नर-नारी दोनों में) ब्रह्मभाव की उपलब्धि का अभ्यास ब्रह्मदर्शी होने की व्यावहारिक साधना है। इस सधना के फलस्वरूप 'तत्त्वमसि ' इस ज्ञान में प्रतिष्ठा तथा भूमानन्द की प्राप्ति होती है। गुरु के मार्गदर्शन में दोनों कर्मयोग और कर्मसंन्यास  साधना श्रीभगवान के यथार्थ स्वरुप को प्रकट करके साधक को परमशान्ति का अधिकारी कर सकते हैं।

=========

संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।

यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्।।5.1।।

।।5.1।। अर्जुन ने कहा हे --  कृष्ण ! आप कर्मों के संन्यास की और फिर योग (कर्म के आचरण) की प्रशंसा करते हैं। इन दोनों में एक जो निश्चय पूर्वक श्रेयस्कर है, उसको मेरे लिए कहिये।। 

 यह सबका अनुभव है कि भयंकर स्वप्न से जागे हुए व्यक्ति को पुन संयमित होकर निद्रा अवस्था में आने के उपक्रम में कुछ समय लग जाता है। अर्जुन की ठीक ऐसी ही स्थिति थी। मानसिक तनाव एवं उन्माद की स्थिति से बाहर आने पर भी अपने सारथी श्रीकृष्ण के उपदेश को पूर्णरूप से समझने तथा विचार करने में वह स्वयं को असमर्थ पा रहा था।  वह श्रीकृष्ण से यह जानना चाहता है कि उसके आत्मकल्याण के लिये इन दोनों में से (ज्ञान और भक्ति में) कौन सा एक निश्चित मार्ग अनुकरणीय है

संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ।

तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते।।5.2।।

।।5.2।। श्रीभगवान् ने कहा --  कर्मसंन्यास और कर्मयोग ये दोनों ही परम कल्याणकारक हैं;  परन्तु उन दोनों में कर्मसंन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है।।

 कुछ काल तक निष्काम भाव से ईश्वर की पूजा समझ कर जगत् की सेवा करने से उसे जो आनन्द प्राप्त होता है वही उसके लिए स्फूर्ति एवं प्रेरणा का स्रोत बन जाता है। इसी भावना को कर्मयोग अथवा यज्ञ की भावना कहा गया है।

विकास की जिस अवस्था में अर्जुन था उसको तथा युद्ध की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अर्जुन के लिए संन्यास की अपेक्षा कर्म करने का उपदेश ही उपयुक्त था। अर्थ यह हुआ कि दोनों ही श्रेयष्कर होने पर भी विशेष परिस्थितियों को देखते हुये संन्यास की अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ कहा गया है। क्योंकि अधिकांश (गृहस्थ) लोग अर्जुन के रोग से पीड़ित होते हैं उन सबके लिए कर्मयोग ही वासना क्षय का एकमात्र उपाय है।

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।

निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते।।5.3।।

।।5.3।। जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा,  वह सदा संन्यासी ही समझने योग्य है;  क्योंकि,  हे महाबाहो ! द्वन्द्वों से रहित पुरुष सहज ही बन्धन मुक्त हो जाता है।।

श्रीकृष्ण के विचारानुसार [आत्मा (ईश्वर या भगवान) से नहीं M/F शरीर से प्रेम करने को राग कहते हैं। इसलिएराग और द्वेष से रहित पुरुष (शुद्धबुद्धि) ही संन्यासी कहलाने योग्य है। राग-द्वेष, जय-पराजय, सुख-दुख आदि इसी प्रकार के द्वन्द्वात्मक चक्र हैं जिन पर आरूढ़ मन (मूढ़-बुद्धि) क्रमशः जीवन में अनेक प्रकार के अनुभव प्राप्त करता हुआ आगे बढ़ता है। क्योंकि हम  तुलनात्मक अध्ययन के द्वारा ही जीवन में आनेवाली परिस्थितियों को समझ पाते हैं। 

   यहाँ कहा गया है कि समस्त प्रकार के भेद दर्शनों से मुक्त हुई बुद्धि - अर्थात् देह, इन्द्रिय , मन और मूढ़बुद्धि के अतीत, चेतन आत्मा में प्रतिष्ठित शुद्धबुद्धि  ही सच्चा संन्यासी है। यह कोई सहज कार्य नहीं है। द्वन्द्वों से रहित होने का अर्थ है बुद्धि का (मूढ़ बुद्धि या जीव का) सभी बन्धनों से मुक्त हो जाना। अर्जुन के मन में दीर्घकाल से (कई-जन्मों से) अर्जित वासनाओं का संचय (प्रारब्ध कर्म) था। अत उसके आत्मविकास को ध्यान मे रखकर भगवान् उसे संन्यास जीवन को स्वीकार में जल्दीबाजी करने से परावृत करना चाहते हैं। 

सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।

एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।।5.4।।

(एकम्- अपि आस्थित: सम्यक्-उभयोः विन्दते फलम्।) बालक अर्थात् बालबुद्धि के लोग सांख्य (संन्यास) और योग (भक्ति) को परस्पर भिन्न समझते हैं;  किसी एक में भी सम्यक् प्रकार से स्थित हुआ पुरुष दोनों के फल को प्राप्त कर लेता है।।

केवल बालक अर्थात् अपरिपक्व विचार के लोग ही सांख्य और योग (भक्ति) में विरोध देखते हैं जबकि बुद्धिमान पुरुष जो किसी एक मार्ग का अवलंबन दृढ़ता से करते हैं दोनों मार्गों के समान प्रभाव को जानते हैं।यदि साधक के रूप में हम कर्तृत्व अभिमान अथवा फलासक्ति को त्यागते हैं तो हमें एक ही लक्ष्य प्राप्त होता है।

किसी भी सामान्य कर्म ( जैसे 'Be and Make') को ईश्वर का पूजा में परिवर्तित करने के दो उपाय हैं। एक है सभी कर्मों में कर्तृत्व के अभिमान का त्याग और दूसरा है फलासक्ति के कारण उत्पन्न होने वाली चिंताओं का त्याग जिसे दूसरे शब्दों में कहेंगे भोक्तृत्व के अभिमान का त्याग। प्रथम उपाय को कहते हैं सांख्य तथा दूसरे को योग (भक्ति योग)।  

[वर्तमान युग की अनिवार्यता :लीडरशिप ट्रेनिंग- साधन-चतुष्टय का प्रचार प्रसार करने में समर्थ महामण्डल कर्मी का निर्माण। 

स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - 

      " वर्तमान युग का हिन्दू युवक , सनातन धर्म के अनेक पंथों की भूलभुलैया में भटका हुआ है,  -महावाक्यों के मर्म को नहीं समझ पाने के कारण , जब अपने पूर्वजों के एकमात्र हिन्दू धर्म में आस्था खोकर उन पाश्चात्य देशों से जिसने भौतिकता के सिवा कभी कुछ जाना ही नहीं , उनकी दृष्टि से अपने सनातन धर्म को तौलता है। अंत में उस खोज को बिल्कुल त्याग देता है , या निपट अज्ञेयवादी बन जाता है।...केवल वे ही बच पाते हैं जिनकी आध्यात्मिक प्रकृति सद्गुरु के संजीवनी स्पर्श से जाग्रत हो चुकी है। (९/३६१)  

" अब हिन्दू वैदिक सनातन धर्म के सभी सम्प्रदायों को स्थूल रूप से - ज्ञानमार्गी और भक्तिमार्गी - इन दो श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है।  शंकराचार्य जी के अनुसार -' ब्रह्म की अनुभूति और मोक्ष की प्राप्ति किसी अनुष्ठान, मत, वर्ण , जाति या सम्प्रदाय पर अवलम्बित नहीं है। कोई भी साधन -चतुष्टय सम्पन्न साधक उसका अधिकारी बन सकता है। साधन-चतुष्टय सम्पूर्ण चित्तशुद्धि प्रदान करने में सक्षम कुछ अनुष्ठान मात्र हैं। 

[साधन चतुष्टय -1. नित्य-अनित्य विवेक 2. वैराग्य 3 . षट सम्पत्ति (शम-दम -उपरति -तितिक्षा -श्रद्धा - समाधान) 4. मुमुक्षुत्व अर्थात मोक्षलाभ की प्रबल इच्छा।] (९/३७०) 

'जो ब्रह्मविद सो ब्रह्म है , ताको वाणी वेद।  संस्कृत या भाषा में करत भरम का छेद। ' (९/३७१) क्या भारत मर जायेगा ? तब तो संसार से सारी आध्यात्मिकता का समूल नाश हो जायेगा। ....(९/३७७) 

" अपने वैदिक हिन्दू सनातन धर्म के उसी एक मात्र केन्द्रवर्ती सत्य पर खड़े हो जाओ - जो हिन्दू, बौद्ध , और जैनियों की पैतृक सम्पत्ति है। वह सत्य है - प्रत्येक मनुष्य में अंतर्निहित आत्मा - जो अजर , अमर और अविनाशी है। जिसकी महिमा का वर्णन वेद भी नहीं कर सकते। प्रत्येक स्त्री-पुरुष , उच्चतम देवों से लेकर कीड़ों तक में वही आत्मा विकसित या अविकसित रूप में व्याप्त है। अन्तर प्रकार में नहीं, केवल परिमाण में है।

" मानवमात्र में अन्तर्निहित आत्मा की इस शक्ति का प्रयोग स्थूल देह (Hand आकार) पर होने से भौतिक उन्नति होती है, मन (Head निराकार) पर होने से आत्मनोमुखी बुद्धि का विकास होता है, और अपने स्वरुप (Heart चेतन आत्मा) पर होने से मनुष्य भगवान बन जाता है। [भगवान मनुष्य बना था, अब प्रत्येक मनुष्य को भगवान (पूर्ण-निःस्वार्थी) बनना होगा।] पहले हमें भगवान बन लेने दो। उसके बाद दूसरों को भगवान बनाने में सहायता देंगे। 'Be and Make' बनो और बनाओ , यही हमारा मूल मंत्र रहे। ऐसा न कहो कि मनुष्य पापी है। उसे यह बताओ कि - तूँ ब्रह्म है ! (9 /379-380)   

यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।

एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति।।5.5।।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्म संन्यास के माध्यम से जो प्राप्त होता है (इन्द्रियातीत सत्य, आत्मा, ईश्वर , भगवान , ब्रह्म , अल्ला जिस नाम से पुकारें।)  उसे भक्ति युक्त कर्मयोग से भी प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार जो कर्म संन्यास और भक्ति युक्त कर्म को एक समान देखते हैं वही वास्तव में सभी वस्तुओं को यथावत् रूप में देखते हैं।

 मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्॥

(अमृतबिंदु उपनिषद्) 

अर्थात मन (बुद्धि) ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष (मुक्ति) का एकमात्र कारण है। यदि मन सांसारिक विषयों (इंद्रिय सुखों) में आसक्त है तो वह बंधन का कारण है, और यदि मन विषयों से विरक्त आत्मा (निःस्वार्थ/ईश्वर में लीन) है, तो वह मोक्ष दिलाता है।

"बंधन और मोक्ष मन (मूढ़बुद्धि ) की दशा पर निर्भर करते हैं। तुम चाहे जिस भी भक्ति के साधन का चयन करो परन्तु मन (शुद्धबुद्धि-आत्मस्थ बुद्धि) को भगवान (आत्मा , ईश्वर, सच्चिदानन्द) के स्मरण में लीन रखो।" 

वे लोग जो ऐसा आध्यात्मिक दृष्टिकोण नहीं रखते, वे कर्म संन्यास और कर्मयोग में अन्तर देखते हैं और कर्म संन्यासी को उसके बाह्य कपड़ा -परित्याग के कारण श्रेष्ठ घोषित करते हैं। किन्तु ज्ञानी-जन यह देखते हैं कि कर्म संन्यासी और भक्तियुक्त-कर्म योगी दोनों ही अपने मन को भगवान की भक्ति में तल्लीन कर लेते हैं, इसलिए वे दोनों उनकी दृष्टि में एक समान होते हैं।

संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः।

योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति।।5.6।।

BG 5.6: भक्तियुक्त होकर कर्म किए बिना पूर्णतः कर्मों का परित्याग करना कठिन है।हे महाबाहो ! किन्तु जो मननशील कर्मयोगी कर्मयोग में संलग्न रहते हैं, वे शीघ्र ही ब्रह्म को पा लेते हैं।

'Be and Make' रूपी समाज-सेवा का संसार वह क्षेत्र है जहाँ वैराग्य का परीक्षण होता है। " केवल एक दिन नगर में रहने से किसी तपस्वी की 12 वर्षों तक पर्वतों पर की गई तपस्या व्यर्थ हो गयी।"  इस श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस संसार में रहते हुए मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए धीरे-धीरे क्रोध, लोभ और कामनाओं पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। यदि इसके स्थान पर कोई पहले ही अपने कर्मों का त्याग कर देता है, तो चित्त (मन वस्तु) को शुद्ध करना अत्यंत कठिन हो जाता है।  और शुद्ध मन के बिना (3K) वास्तविक विरक्ति (3K से वैराग्य ) होना स्वप्न के समान है। 

इसलिए भगवान ने अर्जुन को उपदेश दिया-"युद्ध लड़ना जारी रखो, लेकिन अपने मनोभाव को (नजरों को/दृष्टिकोण को/ बुद्धि को ) बदलो। पहले तुम अपने राज्य को बचाने की प्रत्याशा से इस युद्ध भूमि पर आए थे। अब इसके स्थान पर निःस्वार्थ भाव से केवल अपनी सेवाएँ भगवान को समर्पित करो। इस प्रकार से तुम सहजता से अपने चित्त (मन) को शुद्ध कर पाओगे और मन में सच्चे वैराग्य की अनुभूति करोगे।" [राज़ी हैं हम उसी में जिसमें तेरी रज़ा है। याँ यूं भी वाह वा है और बूँ भी वाह वा है॥ ईश्वर की इच्छा में नहीं राजी होगे तो क्या कर लोगे ?]

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः।

सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।।5.7।।

BG 5.7: जो कर्मयोगी विशुद्ध बुद्धि युक्त हैं, अपने मन तथा इन्द्रियों को वश में रखते हैं और सभी जीवों में आत्मरूप परमात्मा को देखते हैं, वे सभी प्रकार के कर्म करते हुए कभी कर्मबंधन में नहीं पड़ते।

वैदिक ग्रंथों में आत्मा शब्द का कई अर्थों में प्रयोग किया गया है, जैसे कि भगवान के लिए, आत्मा के लिए, मन के लिए और बुद्धि के लिए। इस श्लोक में इन सभी प्रतीकों के लिए आत्मा शब्द का प्रयोग हुआ है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्म योगी योग युक्त होता है अर्थात् अपनी चेतना को भगवान के साथ युक्त करता है। आगे वे कहते हैं कि ऐसी पुण्य आत्माएँ तीन प्रकार की होती है-(1) विशुद्धात्माः विशुद्ध बुद्धि युक्त (2) विजितात्माः जिसने मन पर विजय प्राप्त कर ली है और (3) जितेन्द्रियः जिसने इन्द्रियों को वश में कर लिया है। ऐसे कर्मयोगी विशुद्ध बुद्धि से युक्त होकर सभी जीवों में भगवान को बैठा देखते हैं और बिना आसक्ति के सबके साथ सम्मानजनक व्यवहार करते हैं।

चूंकि उनके कार्य (Be and Make) स्वयं को सुखी रखने की कामना से प्रेरित नहीं होते अतः उनका ज्ञान उत्तरोत्तर स्पष्ट होता रहता है और उनकी कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं। इन्द्रियाँ, मन और मूढ़-बुद्धि जब पहले अपने को M/F शरीर समझकर राग-द्वेष से सम्मोहित थी तो भौतिक सुख के लिए लालायित होती थी, वे सब अब नियंत्रण में आ जाती हैं। अब ये सब साधन भगवान की सेवा में तत्पर रहते हैं। सेवा और समर्पण भाव से उन्हें अपने भीतर आंतरिक ज्ञान की अनुभूति होती है। इस प्रकार भक्ति-युक्त कर्मयोग स्वभाविक रूप से उत्तरोत्तर विवेकज-वैराग्य ज्ञानोदय की इन अवस्थाओं में पहुँचा देता है और इसलिए यह कर्म (वैराग्य का फाटक लगाकर? विवेक -दर्शन का अभ्यास) संन्यास से भिन्न नहीं होता। ( परन्तु देह में रहने तक लेकिन गुरु के श्रीचरण की कृपा और निर्देशन में माँ के श्रीचरण का ध्यान करना अनिवार्य है।)  

नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् |

पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् || 8||

प्रलपन्विसृजन्गृह्ण्न्नुन्मिषन्निमिषन्नपि |

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् || 9||

BG 5.8-9: भक्तियुक्त कर्म योग में दृढ़ निश्चय रखने वाले सदैव देखते, सुनते, स्पर्श करते, सूंघते, चलते-फिरते, सोते हुए, श्वास लेते हुए, बोलते हुए, त्यागते हुए, ग्रहण करते हुए और आंखें खोलते या बंद करते हुए सदैव यह सोचते हैं- 'मैं कर्ता नहीं हूँ' और दिव्य ज्ञान के आलोक में वे केवल यह देखते हैं कि भौतिक इन्द्रियाँ ही अपने विषयों में क्रियाशील रहती हैं आत्मा नहीं

क्योंकि मृगतृष्णिका में जल समझ कर उसको पीने के लिये प्रवृत्त  हुआ मनुष्य उस चमकते बालू में  जल के अभाव का ज्ञान हो जाने पर फिर भी वही जल पीनेके लिये प्रवृत्त नहीं होता।

जब हम किसी महत्त्वपूर्ण कार्य को कुशलतापूर्वक सम्पन्न कर लेते हैं तब हमें यह मिथ्या अभिमान हो जाता है कि हमने कोई महान कार्य किया है। स्वयं को किसी कार्य का कर्ता मानने का अभिमान हमें देहाभिमान ऊपर उठने में (आकार से निराकार में उठने में) बाधा उत्पन्न करता है किन्तु भगवच्चेतना (अवतारवरिष्ठ ) में लीन योगी इस बाधा को सरलता से पार कर लेते हैं। सम्मोहित बुद्धि या मूढ़बुद्धि के शुद्धिकरण द्वारा वे स्वयं को शरीर से भिन्न आत्मा (चैतन्य, परमात्मा, ठाकुर, माँ, स्वामीजी) देखते हैं और शरीर द्वारा किए गए कर्मों का श्रेय वे स्वयं को नहीं देते। क्योंकि यह शरीर (M/F शरीर) भगवान की माया शक्ति से निर्मित है, इसलिए वे अपने सभी कार्यों का श्रेय भगवान को देते हैं क्योंकि ये भगवान की शक्ति से सम्पन्न होते हैं। वे स्वयं को भगवान की इच्छा पर समर्पित कर देते हैं। वे अपने मन और बुद्धि को भगवान की दिव्य इच्छा के अनुसार नियोजित करते हैं। अतः वे यही मानते हैं कि भगवान ही सब कार्यों के कर्ता हैं।

ब्रह्मणि आधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।

लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा।। 5.10।।

BG 5.10:  जो पुरुष (आत्मस्थ-बुद्धि विवेक-चेतन-आनंद बुद्धि) अपने कर्मफल भगवान (ठाकुर-माँ -स्वामीजी) को समर्पित कर सभी प्रकार से आसक्ति रहित होकर कर्म करते हैं, वे पापकर्म से उसी प्रकार से अछूते रहते हैं- पद्म-पत्रम् इव अम्भसा। जिस प्रकार से कमल के पत्ते को जल स्पर्श नहीं कर पाता।

आत्मसाक्षात्कार के पश्चात् ज्ञानी पुरुष देहादि (अन्तःकरण) उपाधियों के साथ विषयों के मध्य उसी प्रकार रहता है जैसे कमल का पत्ता जल में। यद्यपि कमल की उत्पत्ति पोषण स्थिति और नाश भी जल में ही होता है तथापि कमल पत्र जल से सदा अस्पर्शित रहता है। जल उसे गीला नहीं कर पाता। उसी प्रकार ही एक ज्ञानी सन्त पुरुष (कायस्थ ? नहीं  आत्मस्थ-विवेक-आनन्द बुद्धि/मति/या मति ) अन्य मनुष्यों के समान जगत् में निवास करता हुआ समस्त व्यवहार करता है और फिर भी पाप- पुण्य राग-द्वेष सुन्दरता कुरूपता आदि से कभी भी लिप्त नहीं होता। सामान्य कर्म को कर्मयोग में परिवर्तित करने के दो उपाय हैं (1) कर्तृत्व का त्याग और (2) फलासक्ति का त्याग। यहां प्रथम उपाय का वर्णन किया गया है। 

 इसका हमें अपने जीवन में अनेक अवसरों पर अनुभव भी होता है। एक चिकित्सक आसक्ति के कारण अपनी पत्नी का आपरेशन करने में स्वयं को असमर्थ पाता है परन्तु वही चिकित्सक उसी दिन उसी ऑपरेशन को किसी अन्य रोगी पर कुशलतापूर्वक कर सकता है क्योंकि उस रोगी के साथ उसकी कोई आसक्ति नहीं होती। यदि मनुष्य (कायस्थ या आत्मस्थ ? M/F शरीर, आकार में स्थित या चेतन-आनन्द में स्थित ?) निराकार (आत्मस्थ-बुद्धि युक्त आदमी) स्वयं को ईश्वर (परमात्मा -आत्मा) का प्रतिनिधि अथवा सेवक समझकर कार्य करे तो वह स्वयं में ही उस प्रचण्ड सार्मथ्य एवं कार्यकुशलता को पायेगा जिन्हें वह वर्तमान में कर्तृत्वाभिमान (आकार का देहाभिमान) के कारण व्यर्थ में खोये दे रहा है। 

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि।

योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये।।5.11।।

।।5.11।। योगीजन, शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा आसक्ति को त्याग कर आत्मशुद्धि (चित्त-शुद्धि) के लिए कर्म करते हैं।।

 आत्मस्थ-बुद्धि युक्त कर्मयोगी का प्रयत्न यह होता है कि अपने स्वरूप में ही रहकर स्वयं के अन्तर्बाह्य घटित हो रही घटनाओं को उनके साथ तादात्म्य किये बिना केवल साक्षी भाव से देखे। कुछ काल तक इसका अभ्यास करने पर उसे यह स्पष्टतया ज्ञात होगा कि समस्त कर्म उपाधियों (titles-सिंह , अग्रवाल , पाण्डेय , मिश्रा) के द्वारा किये जाते हैं  और साक्षी (आत्मस्थ-बुद्धि) के साथ उनका कोई सम्बन्ध नहीं होता। [All actions are performed through titles (Singh, Agarwal, Pandey, Mishra) and they have no connection with the witness (आत्मस्थ-बुद्धि =चैतन्य soul-consciousness)]

 तथापि उसको इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि यह साक्षी स्वयं पारमार्थिक सत्य नहीं है वरन् आत्मस्थ-बुद्धि की खिड़की में से झांकता हुआ परम सत्य चैतन्य (आत्मा , परमात्मा , ईश्वर) यह साक्षी है। 

यदि परम सत्य (आत्मा,ईश्वर, ब्रह्म) साक्षित्व से भी परे है तो कर्मयोगी को इस साक्षीभाव का अभ्यास क्यों करना चाहिये इसका उत्तर है आत्मविशुद्धये अर्थात् (देहाभिमान हटाने) अन्तःकरण की शुद्धि के लिए। साक्षीभाव से कर्म करने पर स्वाभाविक ही अहंकार का त्याग होकर पूर्व संचित वासनाओं का क्षय हो जायेगा। जितनी अधिक मात्रा में वासना निवृत्ति होगी उतना ही शुद्ध और स्थिर अन्तकरण होगा जिसमें परमात्मा की अनुभूति स्पष्ट रूप से होगी।

(योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये।।5.11। अतएव सभी हिन्दुओं के लिए गीता पढ़ना अनिवार्य होना चाहिए !)  

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।

अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते।।5.12।।

।।5.12।। युक्त पुरुष ? (आत्मस्थ-बुद्धि युक्त व्यक्ति) कर्मफल का त्याग करके 'नैष्ठिकीम्' अनंत काल तक परम शान्ति को प्राप्त होता है; और अयुक्त पुरुष फल में आसक्त हुआ कामना के द्वारा बँधता है।।

कर्मफल की प्राप्ति की चिन्ताओं से मुक्त होकर सम्यक् प्रकार से कर्माचरण के द्वारा कर्मयोगी को अनिर्वचनीय शान्ति प्राप्त होती है। यज्ञ भावना से कर्म (Be and Make)  करते हुए इस शान्ति को प्राप्त करना ही यहां प्रतिपादित क्रांतिकारी सिद्धांत है। भविष्य मे अपने मन के अनुकूल स्थिति को चाहने का नाम है कामना अथवा इच्छा। एक सीमित सार्मथ्य का जीव स्वयं के अनुकूल और इष्ट परिस्थिति का निर्माण करने में सर्वथा असमर्थ है। उसका प्रयत्न 'उस मेढक के समान जो कसरत करके बैल का आकार पाना चाहता है' जैसा होने के कारण अविवेकपूर्ण है। उसको यह समझना चाहिए कि कर्म करने में वह स्वतन्त्र है परन्तु कर्मफल अनेक नियमों के अनुसार प्राप्त होने के कारण फल प्राप्ति में वह परवश है। इसलिए किसी फलविशेष में आसक्त होकर उसका आग्रह रखना केवल अज्ञान के सिवाय और कुछ नहीं

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी।

नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्।।5.13।।

।।5.13।। सब कर्मों का मन से संन्यास करके संयमी पुरुष [देही -देह में रहने वाली आत्मस्थ-बुद्धि] नवद्वार वाली शरीर रूप नगरी में सुख से रहती हुई न कर्म करती है और न करवाती है।।

नवद्वारयुक्त नगरी का रूपक उपनिषदों में प्रसिद्ध है। शरीर को उस नगरी के समान माना गया है जो प्राचीन काल में किलों की प्राचीर के अन्दर बसायी गयी होता थी। इस शरीर रूपी नगरी के नवद्वार हैं दो आँखें दो नासिका छिद्र दो कान मुँह जननेन्द्रिय तथा गुदेन्द्रिय। इस शरीर में जीवन व्यापार सुचारु रूप से चलने के लिए इनमें से समस्त अथवा अधिकांश द्वारों का होना आवश्यक है। जैसे एक राजा किले में रहकर अपने मंत्रियों द्वारा शासन करता है तब उसकी उपस्थिति मात्र से अधिकारीगण प्रेरणाशक्ति और अनुमति प्राप्त कर अपनाअपना कार्य करते है इसी प्रकार चैतन्य आत्मा स्वयं अकर्ता रहते हुये भी उसके केवल सान्निध्य से समस्त ज्ञानेन्द्रयाँ एवं कर्मेन्द्रियां स्वव्यापार मे व्यस्त रहती हैं। इस प्रसिद्ध रूपक का प्रयोग करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि संयमी एवं तत्त्वदर्शी पुरुष (आत्मस्थ-आनंद युक्त बुद्धि) शरीर में सुख से रहते हुए उपाधियों (अन्तः करण) के कार्य को देखती रहती है परन्तु स्वयं न कर्म करती है और न उपाधियों से करवाती है

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः

न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।।5.14।।

प्रभु (आत्मा या परमेश्वर) जीव का कर्तृत्व-भाव, कर्म न कर्मफल के संयोग (प्रारब्ध) को नहीं रचता है। किन्तु जीव का स्वभाव ही (अर्थात अनादि अविद्या जनित पूर्वसंस्कार ईश्वर अधीन कर्तृत्व आदि के रूप में) व्यक्त होता है। अर्थात मनुष्य पूर्व प्रारब्ध के अनुसार विवश होकर -कार्य करता है। 

पूर्वजन्मों में अर्जित सुख-दुःख जनक कर्मसंस्कार ही वर्तमान जन्म में प्रारब्ध के रूप में प्रकट होते हैं। वे संस्कार ही कर्मबीज हैं , वे कर्मबीज त्रिगुणमय अर्थात सत्त्व, रज और तम गुणयुक्त हैं। अनादि काल से यह कर्मप्रवाह सृष्टिप्रवाह के समान चला आ रहा है। परमात्मा (परमसत्य , आत्मा, ब्रह्म) निष्क्रिय है। प्रकृति ही उनकी शक्ति रूप से सृष्टि-स्थिति -प्रलय रूपी लीला करती है। हर एक जीव अपने कर्मों के अनुसार शरीर धारण करके अपने संस्कार के अनुसार कर्म करता है। कर्मों का क्षय होने से अपने स्वरुप का ज्ञान होते ही जीव मुक्त हो जाता है।       

यहाँ भगवान अर्जुन को निरुपाधिक चैतन्य आत्मा का स्वरूप समझाने का प्रयत्न कर रहे हैं। यहाँ आत्मा का तीन शरीरों स्थूल, सूक्ष्म और कारण के साथ सम्बन्ध बताया गया है।

अनंत चैतन्यस्वरूप आत्मा भी जड़ उपाधियों से देह और अन्तःकरण (इन्द्रिय -चित्त ,मन, बुद्धि, अहंकार) से चिज्जड़ग्रंथि से युक्त होकर मानो परिच्छिन्न (ससीम M/F जीव) सा हुआ कर्तृत्वादि को प्राप्त होता है। कर्मों का कर्ता और भोक्ता जीव है आत्मा नहीं। स्वभाव अर्थात् त्रिगुणात्मिका माया के सम्बन्ध से ही आत्मा में कर्तृत्व और भोक्तृत्वादि गुण प्रतीत होते हैं। पारमार्थिक दृष्टि से आत्मा प्रकृति के गुणों से सर्वथा निर्लिप्त ही है। 

 स्वभाव अर्थात् त्रिगुणात्मिका मायायह 'दैवी' या ईश्वर की प्रकृति है, जो सत्व-ज्ञान, रज-कर्म और तम-अज्ञान द्वारा संसार की नानत्व या विविधता पैदा करती है, जिसे पार करना कठिन है। (सत्व, रज, तम) ईश्वर (ब्रह्म, भगवान) की वह दिव्य शक्ति है जो सृष्ट जगत का उपादान कारण (material cause) है और जीवों को अज्ञान (ignorance-अविद्या-अस्मिता आदि), मोह व सांसारिक बंधनों में जकड़ती है। भगवान् कहते हैं कि जो केवल मेरी शरण में आते हैं, वे ही इस दुस्तर माया को पार कर सकते हैं (गीता 7.14)।

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः

अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।।5.15।।

।।5.15।। विभु सर्वव्यापी परमात्मा न किसी के पापकर्म को और न पुण्यकर्म को ही ग्रहण करता है;  (किन्तु) अज्ञान से ज्ञान ढका हुआ है, इससे सब जीव मोहित होते हैं।।

विभु न किसी के पाप-कर्म को ग्रहण करता है और न पुण्य कर्म को। केवल आत्म विस्मृति के कारण ही उपाधियों में व्यक्त हुआ वह आत्मा कर्तृत्व कर्म फलभोग आदि से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। समतल काँच के माध्यम से निर्गत सूर्य-प्रकाश में कोई विकार नहीं होता परन्तु यदि वही सूर्य-प्रकाश एक प्रिज्म (आयत) में से निकले तो सात रंगों में विभाजित हो जाता है इसी प्रकार एकमेव अद्वितीय सर्वव्यापी परिपूर्ण परमात्मा ही शरीर मन और बुद्धि इन अविद्या जन्य उपाधियों  में व्यक्त होकर नानारूप जगदाभास के रूप में प्रतीत होता है। 

माया ही अज्ञान (अविद्या) है, माया से 'अहं-कर्ता' अहंकार और कर्तृत्व-बोध होता है। यह 'अहंकर्ता भाव ' (देहाभिमान स्वयं M/F शरीर समझना) ही बंधन का कारण है , उसी से जीव= (मूढ़बुद्धि) मोहित होकर अपने अविनाशी-आत्मस्वरूप को भूलकर नश्वर शरीर समझने लगती है।श्रीरामकृष्ण देव कहा करते थे -" जो अखण्ड सच्चिदानन्द हैं, वही लीला में विविध रूप धारण कर के अवतरित होते हैं। " श्री चैतन्य चरितामृत ग्रंथ में है - 

अदृश्य ज्ञान-तत्व कृष्णेर स्वरूप। 

ब्रह्म , आत्मा , भगवान -तीन तार रूप। 

ज्ञानी के लिए ब्रह्म, योगी के लिए आत्मा या परमात्मा , भक्त के लिए सच्चिदानन्द विग्रह (अवतार वरिष्ठ।) 

अज्ञान या 'अविद्या' के कारण यह 'ज्ञान' कि 'सर्वत्र परमेश्वर व्याप्त है' (ईशावास्यं, 'ब्रह्मैव इदं सर्वं , आत्मैव इदं सर्वं)  ढका रहता है। इससे जीव (M/F शरीर बुद्धि) मोहित हो जाता है , और अपने आत्मस्वरूप (सत्य या चेतन स्वरुप) को भूल कर अविनाशी असंसारी आत्मा को नश्वर या संसारी शरीर समझता है।      

यहाँ ज्ञान (विद्या) और अज्ञान (अविद्या) के सम्बन्ध का सुन्दर वर्णन किया गया है। अज्ञान ज्ञान नहीं हो सकता और न ज्ञान अज्ञान का एक अंश। परस्पर विरोधी स्वभाव के कारण इन दोनों का सह अस्तित्व सम्भव नहीं हो सकता हैं। परन्तु यहाँ कहा गया है कि अज्ञान के द्वारा ज्ञान आवृत हुआ है। यह ऐसे ही है जैसे किसी जंगल में सर्वत्र व्याप्त अंधकार में दूर कहीं प्रकाश की किरण को देखकर कहा जा सकता है कि वह प्रकाश अंधकार से आवृत है। 

[जबकि 'नेह नानानास्ति किंचन।' अर्थात इन्द्रियों के द्वारा इस जगत-प्रपंच में जो कुछ दीखता है, वह एकमात्र ब्रह्म या आत्मा ही है, 'ब्रह्मैव इदं सर्वं ', 'आत्मैव इदं सर्वं' लेकिन यह ज्ञान ही अज्ञान से ज्ञान ढका हुआ है। (और अविद्या -अस्मिता -राग-द्वेष-अभिनिवेश पंचक्लेश जन्य) नाम-रूप M/F उपाधियों के रूप में प्रतीत होता है। इससे सब जीव मोहित होते हैं। निम्नलिखित मंत्र मन को आत्मा या ब्रह्म को जानने का साधन (मनस+ एव+ अनुद्रष्टव्यम्) साधन बताता है। 

मनसैवानुद्रष्टव्यं नेह नानास्ति किंचन॥ 

मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति॥

 (बृहदारण्यक उपनिषद 4.4.19)

 परम सत्य (ब्रह्म) का अनुभव केवल शुद्ध मन द्वारा किया जा सकता है। इसमें कोई द्वैत या भिन्नता नहीं है। जो व्यक्ति इस एकता में विविधता (अज्ञानता के कारण) देखता है, वह बार-बार मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र में भटकता रहता है।

 उन्हीं मोहित जीवों के उद्धार के लिए ही स्वामी विवेकानन्द ने कहा था - "I shall not cease to work! I shall inspire men everywhere, until the world shall know that it is one with God." लेकिन यह मन पवित्र या छल-कपट से रहित होना चाहिए। और बुद्धि नित्य-अनित्य विवेक-सम्पन्न सांसारिक वासनाओं से रहित और शुद्ध अर्थात मन-और इन्द्रियों में आसक्त मूढ़बुद्धि नहीं -होनी चाहिए , और आध्यात्मिक रूप से प्रबुद्ध निःस्वार्थी बुद्धि या आत्मस्थ बुद्धि होनी चाहिए।  

"सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन ।" (कठोपनिषद्)

अर्थः---"जन्मादि यस्य यतः" ब्रह्मसूत्र (1.1.2) का एक प्रसिद्ध सूत्र है, जिसका अर्थ है - हे जीव ! तू ब्रह्म (परम सत्य, आत्मा या ईश्वर) की उपासना कर, जिस ब्रह्म से जगत् की उत्पत्ति , स्थिति और लय (प्रलय) होता है।  जिसके बनाने और धारण करने से यह सब जगत् विद्यमान हुआ है, उसको छोड दूसरे की उपासना नहीं करनी है। किन्तु ये सब पृथक्-पृथक् नाम-रूप (M/F शरीर)  स्वरूप में परमेश्वर (आत्मा , ईश्वर , भगवान , ये भगवान) के आधार में स्थित है । 

" Although a man has not studied a single system of philosophy, although he does not believe in any God, and never has believed, although he has not prayed even once in his whole life, if the simple power of good actions has brought him to that state where he is ready to give up his life and all else for others, he has arrived at the same point to which the religious man will come through his prayers and the philosopher through his knowledge.

― Swami Vivekananda

"किसी मनुष्य ने चाहे एक भी दर्शनशास्त्र न पढ़ा हो , किसी प्रकार के ईश्वर में विश्वास न किया हो और न करता हो , चाहे उसने अपने जीवन भर में एक बार भी प्रार्थना न की हो, लेकिन केवल सत्कार्यों की शक्ति द्वारा उस अवस्था में पहुँच गया है , जहाँ वह दूसरों के लिए अपना जीवन और सब कुछ उत्सर्ग कर देने को तत्पर रहता हो। तो हमें समझना चाहिए कि वह उसी लक्ष्य (परम् सत्य आत्मा, ईश्वर या ब्रह्म) पर पहुँच गया है , जहाँ भक्त अपनी उपासना द्वारा तथा दार्शनिक अपने ज्ञान द्वारा पहुँचता है। " 

(स्वामी विवेकानन्द।अनासक्ति ही पूर्ण आत्मत्याग है'-खंड ३/पृष्ठ -६० )

[An Interesting Correspondence : Mary Hale- 1st of February, 1895, 15th February 1895] Let eyes grow dim and heart grow faint, And friendship fail and love betray, Let Fate its hundred horrors send, And clotted darkness block the way. All nature wear one angry frown, To crush you out — still know, my soul, You are Divine. March on and on, Nor right nor left but to the goal.― Swami Vivekananda]

अगले श्लोक में अज्ञान आवरण को दूर करने के उपाय तथा उसकी निवृत्ति के फल को विस्तार से बताया गया है। सत्य के अनावरण की प्रक्रिया में अज्ञान की निवृत्ति मात्र अपेक्षित है न कि ज्ञान की उत्पत्ति। इसलिए सत्य की प्राप्ति वास्तव में सिद्ध वस्तु की ही प्राप्ति है और कोई नवीन उपलब्धि नहीं। इसी बात को स्पष्ट करते हुए कहते हैं [5 मार्च, 2026

ज्ञानेन तु तत्'अज्ञानं येषां नाशितम् आत्मनः

तेषाम् आदित्यवत् ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्।।5.16।।

।।5.16।। परन्तु जिनका (मूढ़बुद्धि का) वह अज्ञान (अविद्या) आत्मज्ञान (विवेक-ज) से नष्ट हो जाता है,  उनके लिए वह ज्ञान, सूर्य के सदृश, परमात्मा (परम सत्य, आत्मा, ईश्वर, ब्रह्म) को प्रकाशित करता है।।

शोक और मोह से ग्रस्त जीवों के लिए शुद्ध आत्मस्वरूप अविद्या से आवृत रहता है अर्थात् उन्हें आत्मा का उसके शुद्ध स्वरूप में अनुभव नहीं होता। ज्ञानी पुरुष के लिए अज्ञानावरण पूर्णतया निवृत्त हो जाता है। यदि 1000 साल से किसी कमरे में अँधेरा हो,तो दीपक जलाने पर वह अंधकार तत्काल ही दूर हो जाता है न कि धी-रे-धीरे किसी विशेष क्रम से। इसी प्रकार से आत्म-ज्ञान का उदय होते ही अनादि अविद्या उसी क्षण निवृत्त हो जाती है। अविद्या से उत्पन्न होता है अहंकार  जिसका अस्तित्व शरीर, इन्द्रिय ,मन और बुद्धि के साथ हुए तादात्म्य के कारण बना रहता है। अज्ञान के नष्ट हो जाने पर अहंकार भी नष्ट हो जाता है। ( यदि समाधि शरीर में लौट आने के बाद यदि 10 साल- 40 तक देह रहे ? जब तक देहाभिमान रहे, तब तक शक्ति को मानने के लिए इसी जन्म में प्रारब्ध को भोग कर क्षय करना पड़ता है।) 

द्वैतवादियों को वेदान्त के इस सिद्धांत को समझने में कठिनाई होती है। वस्तुओं को जानने के लिए हमारे पास उपलब्ध साधन हैं इन्द्रियां मन और बुद्धि। अहंकार इनके माध्यम से देखता अनुभव करता और विचार करता है। द्वैतवादी यह समझने में असमर्थ हैं कि अहंकार इन्द्रियां मन और बुद्धि के अभाव में आत्मज्ञान कैसे सम्भव है। एक बुद्धिमान् विचारक में यह शंका आना स्वाभाविक है। 

इसका अनुमान लगाकर श्रीकृष्ण यह बताते है कि अहंकार नष्ट होने पर आत्मज्ञान स्वतः हो जाता है। विचाररत बुद्धि (मूढ़ बुद्धि-सम्मोहित या इन्द्रिय-विषयों में आसक्त बुद्धि) को यह बात सरलता से नहीं समझायी जा सकती। इसलिए दूसरी पंक्ति में प्रभु एक दृष्टान्त देते हैं आदित्यवत्। हम सबका सामान्य अनुभव है कि वर्षा ऋतु में कई दिनों तक सूर्य नहीं दिखाई देता और हम जल्दी में कह देते हैं कि सूर्य बादलों से ढक गया है।

तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः।

गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः।।5.17।।

[तत्-बुद्धयः तत्-आत्मानः -वे जिनका अंत:करण केवल आत्मा (ईश्वर, भगवान, ब्रह्म) में तल्लीन होता है; तत्-निष्ठाः-वे जिनकी बुद्धि भगवान में दृढ़ विश्वास करती है; तत्-परायणाः-भगवान को अपना लक्ष्य और आश्रय बनाने का प्रयास करना; गच्छन्ति–जाते हैं; अपुन:-आवृत्तिम्-वापस नहीं आते; ज्ञान-ज्ञान द्वारा निर्धूत निवारण होना; कल्मषाः-पाप।]

।।5.17।। जिनकी निश्चयात्मिका बुद्धि उस आत्मा (अन्तर्यामी गुरु ,अवतार वरिष्ठ,परमात्मा,ईश्वर ) में स्थित है, या जिनकी शुद्धबुद्धि आत्मस्थ या तद्रूप हुई है,  उसमें ही जिनकी निष्ठा है,  वह (ब्रह्म) ही जिनका परम लक्ष्य है, ज्ञान के द्वारा पाप-रहित पुरुष अपुनरावृत्ति को प्राप्त होते हैं,  अर्थात् उनका पुनर्जन्म नहीं होता है।।

शास्त्रों के गहन अध्ययन के द्वारा साधक अपने व्यक्तित्व के सभी पक्षों के साथ आत्मयुक्त हो जाता है। बुद्धि आत्म-स्वरूप का निश्चय करके उसमें ही स्थित हो जाती है और उसके मन की प्रत्येक भावना ईश्वर की ही स्तुति का गान करती है। अनन्त आनन्दस्वरूप (अन्तर्यामी गुरु  -अवतार वरिष्ठ ) को आत्मरूप से पहचान कर साधक की उसमें निष्ठा हो जाती है। शास्त्राध्ययन के द्वारा जो व्यक्ति अपने सत्यात्मस्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर लेता है उसके लिए पुन राग या द्वेष के बन्धन में आने का अवसर या कारण ही नहीं रह जाता। यही शास्त्राध्ययन का फल है। (चरित्र-के गुण और दोष (नेति -इति) आत्मश्रद्धा के अध्यन का फल)   

अध्ययन के पश्चात् आवश्यकता होती है उस ज्ञान के अनुसार जीवन जीने की अर्थात् उस ज्ञान के आचरण की।अध्ययन और आचरण से ही स्वस्वरूप में अवस्थान सम्भव हो सकता है। स्वरूप में अवस्थान प्राप्त पुरुष का पुनर्जन्म नहीं होता। इसका कारण क्या है हम कैसेे कह सकते हैं कि ज्ञान के उपरान्त पुन अहंकार उत्पन्न नहीं होगा ?  

ज्ञानी पुरुषों के लिए प्रयुक्त ज्ञान-निर्धूतकल्मषा इस विशेषण के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर देते हैं। कल्मष अर्थात् पाप से तात्पर्य वासनाओं से है। वासनाओं से उत्पन्न होता है अहंकार। वेदान्त में वासना को ही आत्म-अज्ञान कहते हैं। (अन्तर्यामी गुरुदेव की कृपा से अज्ञान के विरोधी आत्मज्ञान का उदय होने पर दुखदायक अज्ञान अंधकार का विनाश हो जाता है और उसके साथ ही तज्जनित अहंकार (M/F देहाभिमान) भी नष्ट हो जाता है। तत्पश्चात् अहंकार पुन जन्म नहीं ले सकता क्योंकि ज्ञान की उपस्थिति में अज्ञान लौटकर नहीं आ सकता। कारण के ही अभाव में कार्यरूप अहंकार कैसे उत्पन्न हो सकता है ? 

इस श्लोक में हमें विश्व के सबसे आशावादी तत्त्वज्ञान के दर्शन होते हैं जहाँ स्पष्ट घोषणा की गई है कि आत्मश्रद्धा -आत्मसाक्षात्कार और उसके अनुसार आचरण - ही जीव (आत्मस्थबुद्धि) के विकास का चरम लक्ष्य है।

 परम तत्त्व की अनुभूति और उसके अनुसार आचरण ही विकास के सोपान की अन्तिम सीढ़ी है जिसे प्राप्त करने के लिए ही जीव स्वनिर्मित विषयों के बन्धनों में यत्र-तत्र भटकता रहता है।

ज्ञान के द्वारा जिनका अज्ञान नष्ट हो जाता है वे ज्ञानी पुरुष किस प्रकार तत्त्व को देखते हैं उत्तर है-  

[Unity in diversity : अर्थात आत्मज्ञान के द्वारा जिनका अज्ञान (अविद्या) नष्ट हो जाता है वे ज्ञानी पुरुष (यानि निश्चात्मिका बुद्धि) अनेकता में एकता को (प्रवृत्ति में निवृत्ति को M/F देहाभिमान में किस प्रकार तत्त्व -सच्चिदानन्द को ? देखती है? उत्तर है-]

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।5.18।।

।।5.18।। (ऐसे वे) ज्ञानीजन विद्या और विनय से सम्पन्न ब्राह्मण,  तथा गाय,  हाथी,  श्वान और चाण्डाल में भी सम तत्त्व को देखते हैं।।

अपने ज्ञानानुसार (आत्मस्थ बुद्धि या शुद्धबुद्धि, शुद्ध दृष्टि, शुद्ध मति -'या मति सा गति।) ही हमारी जगत् को देखने की दृष्टि होती है। आत्मज्ञानी पुरुष सर्वत्र (स्थूल-सूक्ष्म-कारण M/F शरीर में) समरूप विद्यमान दिव्य आत्मतत्त्व का ही दर्शन करता है। 

समुद्र में उठती हुई असंख्य लहरों के प्रति समुद्र की भावना अलग-अलग नहीं हो सकती। मिट्टी की दृष्टि से मिट्टी से निर्मित सभी घट एक समान ही हैं। इसी प्रकार जिस अहंकार रहित पुरुष ने अपने ब्रह्मस्वरूप को पहचान लिया है उसकी नाम-रूपमय (M/F शरीर) सृष्टि की ओर देखने की दृष्टि सम बन जाती है। 

दृष्टिगोचर सभी प्रकार के भेद केवल उपाधियों में ही हैं। मनुष्य-मनुष्य में भेद शरीर के रूप और रंग में हो सकता है अथवा मन के स्वभाव या बुद्धि की प्रखरता में। परन्तु जीवन तत्त्व तो सबमें सदा एक ही होता है। इसलिए इस श्लोक में कहा गया है कि विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण गाय हाथी श्वान और चाण्डाल इन सब की ओर आत्मप्रज्ञा प्राप्त पण्डित पुरुष (आत्मस्थ बुद्धि) समदृष्टि से देखता है। सब उपाधियों में एक ही परम सत्य विराजमान है

आत्मसाक्षात्कार का मुख्य लक्षण है समदर्शन। ज्ञानी पुरुष (शुद्ध बुद्धि) अपने व्यक्तिगत रागद्वेष के आधार पर भेद नहीं करता। आत्मरूप से अनुभव किये परम सत्य को ही विभिन्न नाम-रूपों में व्यक्त देखता है।

जिन्हें ब्रह्मज्ञान हुआ है , अर्थात जो परोक्ष ब्रह्मानुभूति सम्पन्न हैं वे -निरंतर " सर्वं खल्विदं ब्रह्म " - अर्थात इन्द्रियों से जो कुछ दिख रहा है - ब्रह्मैव इदं सर्वं , आत्मैव इदं सर्वं - उनकी निश्चयात्मिका बुद्धि इसी ज्ञान (अनुभूति ) में प्रतिष्ठित रहती है। वे सर्वत्र ब्रह्मदृष्टि से देखते हैं - सब कुछ चैतन्यमय है और सबकुछ ब्रह्ममय है। उस समय द्वैत-बोध या बहुत्व-बोध नहीं रहता , केवल समरस सच्चिदानन्द ब्रह्म की अनुभूति (बिना इन्द्रियों के ?) होती रहती है। समाधि से लौटने के बाद उनके आचरण से भी यथार्थ समदर्शी के जैसा प्रेमपूर्ण व्यवहार  में धरती माता के जैसा  -क्षमा , सहनशीलता , धैर्य , उदारता , परोपकारिता जैसे चरित्र के गुण झलकने लगते हैं। 

[Those who have attained the knowledge of Brahma, i.e. those who have experienced the indirect Brahma, they continuously say “Sarvam Khalvidam Brahma” – that is, whatever is visible through the senses – Brahmaiva Idam Sarvam, Atmaiva Idam Sarvam – their determined intellect remains established in this knowledge (experience). He sees everywhere with Brahmadristhi - everything is conscious and everything is Brahmamay. At that time, there is no sense of duality or sense of multiplicity, only harmonious Sachchidanand Brahma is experienced (without senses?). After returning from samadhi, their behavior also begins to reflect the qualities of character like forgiveness, tolerance, patience, generosity, altruism and loving behavior like that of a true visionary, similar to Mother Earth.

हम अपने जीवन में जिससे भी जो कुछ भी सीखते हैं वो हमारे शिक्षा गुरु हैं। श्रीदत्तात्रेय जो भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा के मिलित तनु हैं। भगवान दत्तात्रेय ने अपने जीवन में (चौबीस) 24 गुरुओं को धारण किया है। (चरित्र के 24 गुण ?)

श्लोक-

“पृथिवी वायुराकाशमापो अग्निश्चन्द्रमा रविः।

कपोतोअजगरः सिन्धुः पतङ्गो मधुकृद् गजः।।

मधुहा हरिणो मीनः पिङ्गला कुररोर्भकः।

कुमारी शरकृत् सर्प ऊर्णनाभिः सुपेशकृत् ।।

[That is, 1-Earth 2-Air 3-Sky 4-Water 5-Fire 6-Moon 7-Sun 8-Pigeon 9-Sea 10-Python 11-Moth 12-Illusion 13-Elephant 14-Madhuharta 15 -Deer 16-Pisces 17-Pingla Prostitute 18-Kurar (aquatic bird of prey) 19-Child 20-Virgin 21-Sharkrit (मुख्य अर्थ विष्ठा, गोबर, या पशुओं का मल) 22-Serpent 23-Urnnabhi and 24-Bhrungi.पौराणिक कथाओं में, दत्तात्रेय जी ने कुरर (चील) पक्षी से यह शिक्षा ली थी कि प्रिय वस्तु का त्याग ही सच्चा सुख है।

यह श्लोक श्रीमद्भागवत पुराण (एकादश स्कंध) से लिया गया है, जिसमें भगवान दत्तात्रेय ने अपने 24 गुरुओं का उल्लेख किया है, जिनसे उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया। इन श्लोकों में प्रकृति, जीव-जंतुओं और तत्वों का वर्णन है जो धैर्य, त्याग, आसक्ति से मुक्ति और ज्ञान सिखाते हैं। 

[1-पृथ्वी: क्षमा -धैर्य-सहनशीलता आदि गुण !  2-वायु : निःस्वार्थपरता -अनासक्ति। 3-आकाश: सर्वव्यापी, सर्वगत।  4-जल:पवित्रता।5-अग्नि:शुद्धता। 6-चन्द्रमा : अमरता , क्षय-वृद्धि। 7-सूर्य : त्याग का गुण।  8-कपोत या कबूतर : मोह का दुष्परिणाम। 9-अजगर: (संतोष)10 -समुद्र : सिंधु गंभीरता। 11-पतिंगा : आकर्षण , मोह। 12-मधुकृद् : मधुहर्ता या शहद निकालने वाला।13-मधुकर : मधुमक्खी- संग्रह न करना। 14-हाथी : गज- कामवासना का फल। 15-हरिण : श्रवण इन्द्रिय विषयों में आकर्षण। 15-मीन : मछली- जिह्वा लोलुपता। 16-पिङ्गला वेश्या: वैराग्य। 17-कुरर पक्षी (चील)- मछलियों का शिकार करता है- चिंतामुक्त। 18- अर्भक : बालक- आनंद।19-कुमारी : निर्णय- एकाग्रता। 20-शरकृत् : तीर बनाने वाला- एकाग्रता।21- सर्प : स्वतंत्रता , घर न बनाना। 22-सुपेशकृत्: भृङ्गी, कीट- चिंतन। 23-ऊर्णनाभि: मकड़ी- सृष्टि और लय।24 -भ्रमर: भँवरा -अनासक्ति। ] 

[निश्चयात्मिका बुद्धि आत्मज्ञान के अनुसार और वैसा ही आचरण करती है, जैसे भगवान दत्तात्रेय ने पृथ्वी को सबसे पहला गुरु बनाया है। उन्होंने कहा था - मैंने पृथ्वी से धैर्य, सहनशीलता और क्षमा का पाठ सीखा।  पृथ्वी का चाहे जितना शोषण करो फिर भी पृथ्वी सदैव पोषण करने में लगी रहती है। सदैव जीवों का विस्तार करने में लगी रहती है।  किसी के प्रति प्रतिक्रिया देने से पहले अपने जीवन में धैर्य रखो, अपने आपको शिक्षा दो कि कुछ भी ऐसा ना बोल दूं कि जीवन में मेरा अपराध बन जाए।  और इतने प्रेम से जो ठाकुर-माँ -स्वामी जी  की शिक्षाओं- 'Be and Make ' का प्रचार-प्रसार  लिए जो मेरे आचरण चल रहे हैं उसमें नीचे हो जाऊं या ठाकुर, माँ स्वामी जी मुझसे कुछ दूर हो जाएं। इसलिए धैर्य को शक्ति , क्षमा को आभूषण , और परोपकार को जीवन का लक्ष्य बनाना सीखा। पृथ्वी कितना आघात सहती है , किन्तु न तो प्रतिशोध लेती है और न आर्तनाद करती है। फिर भी सबको जीवन देती है। इस संसार में सभी जीव अपने -अपने प्रारब्ध के अधीन कर्मरत हैं। समय , परिस्थिति और अज्ञानवश (अहं-कर्ता का देहाभिमान के कारण) एक -दूसरे पर आक्रमण कर बैठते हैं। ऐसे में धीर पुरुष (आत्मस्थ बुद्धि) का कर्तव्य है -" अविरोध" - दादा कहते थे वीर हो धीर बनो ! शुद्ध-बुद्धि का कर्तव्य है कि वह न तो अपना धैर्य खोये , न ही क्रोध के वशीभूत हो - क्योंकि बुद्धिनाशात प्रणस्यति ! नित्य-अनित्य विवेकी मनुष्य को अपने लक्ष्यपथ पर अडिग रहना चाहिए। पृथ्वी पर उपस्थित पर्वत और वृक्ष दोनों परोपकार के मूर्तिमान प्रतीक हैं। वे स्वयं तपस्या में स्थित रहकर , डीलरों को जल , छाया , फल , औषधि , और आश्रय प्रदान करते हैं। 

 पश्यतैतान् महाभागान् परार्थैकान्तजीवितान् ।

वातवर्षातपहिमान् सहन्तो वारयन्ति नः ॥

अहो एषां वरं जन्म सर्व प्राण्युपजीवनम् ।

सुजनस्येव येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिनः ॥ 

पत्रपुष्पफलच्छाया मूलवल्कलदारुभिः ।

गन्धनिर्यासभस्मास्थि तोक्मैः कामान् वितन्वते ॥

एतावत् जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु ।

प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय एवाचरेत् सदा ॥

(श्रीमद्भागवत १०/२२/ ३२-३५)

हे मेरे मित्र!! देखो ये वृक्ष कितने भाग्यशाली हैं।इनका सारा जीवन केवल दूसरोंकी भलाई करने के लिए ही है।ये स्वयं तो हवा के झोंके,वर्षा, धूप और पाला सबकुछ सहन करते हैं, परन्तु हमलोगों की उनसे रक्षा करते हैं।

मैं कहता हूं कि इन्हीं का जीवन सबसे श्रेष्ठ है, क्योंकि इनके द्वारा सब प्राणियों को सहारा मिलता है।उनका जीवन निर्वाह होता है। जैसे किसी सज्जन पुरुषके घरसे कोई याचक खाली हाथ नहीं लौटता, वैसे ही इन वृक्षों से भी सभीको कुछ न कुछ मिल ही जाता है।

ये अपने पत्ते, फूल,फल,छाया, जड़,छाल लकड़ी,गन्ध, गोंद,राख, कोयला,अंकुर और कोंपलों से भी लोगों की कामना पूर्ण करते हैं।

संसार में प्राणी तो बहुत हैं परन्तु उनके जीवन की सफलता इतने में ही है कि जहां तक हो सके अपने धनसे, विवेक-विचारसे, वाणी से और प्राणों से भी ऐसे ही कर्म किये जायें, जिनसे दूसरों की भलाई हो।। 

उनसे मैंने सीखा कि श्रेष्ठ जीवन वही है , जो दूसरों के -भारत के कल्याण के लिए समर्पित हो। नेता को आत्मज्ञान के अनुसार निःस्वार्थसेवा का भाव अपने जीवन और आचरण में उतारना चाहिए। 

मनुष्य के जीवन में (मति या शुद्धबुद्धि में) यदि - पृथ्वी के चरित्र के गुण जैसे धैर्य , सहनशीलता , उदारता व परोपकार विकसित हो, तो उसका जीवन स्वतः ही शान्ति और आनंद से परिपूर्ण हो जाता है। कलह और अशान्ति का मूल कारण इन सद्गुणों का अभाव है

२. वायु- भगवान दत्तात्रेय ने वायु को अपने शिक्षा गुरु के रूप में माना। प्राणवायु से शिक्षा ली है कि जितनी हमें वायु की आवश्यकता है उतनी हमें प्राप्त हो जाय तो जीवन में प्राण आ जाता है।  श्वास आ जाती है संतुष्टि आ जाती है।  ऐसे ही साधक को इन्द्रियों को तृप्त करने के लिए बहुत सारे विषयों में नहीं उलझना चाहिए। जितनी आवश्यकता है उतना ही सांसारिक  सामग्री अपने जीवन में इकट्ठा करे उसका उपभोग करे। अगर बहुत ज़्यादा विषयों में फँसेंगे तो मनुष्य जीवन का उद्देश्य  जो ईश्वरलाभ या भगवद् प्राप्ति है, उस लक्ष्य से चूक जाएंगेजैसे वायु को अनेक स्थानों पर जाना पड़़ता है, वायु सदैव चलित है हमेशा बहती चलती रहती है। अनेक स्थानों पर जाना पड़ता है परंतु वह कहीं भी आसक्त नहीं होती।  जीवन में सब चीज का आनंद लो पर अपने गुरुदेव प्रदत्त नाम-जप मार्ग से (Be and Make-विवेकी मनुष्य बनो और बनाओ) पर चलते हुए, अपने लक्ष्य  को अपने स्मरण में रखते हुए सब आनंद करो।

साधक का ह्रदय विशाल होना चाहिए उसका इतना विशाल कि भगवान श्रीरामकृष्ण देव , माँ श्री सारदा देवी , स्वामी विवेकानन्द के सभी भक्त , भक्त और अन्तर्यामी गुरुदेव अपने  हृदय में आ सके।  और अन्तर्यामी गुरुदेव भगवान (स्वामीजी) उसके ह्रदय में आ सकते हैं जो हर प्रकार से छल कपट विकारों से मुक्त है जो प्रेम से भरा हैआकाश से हमें अपने हृदय में अनंत प्रेम विद्यमान करना भरना सीखना है, हम अपने ह्रदय में इतना प्रेम विद्यमान करें कि ठाकुर जी उस में आने की चेष्टा करें। जो सच्चा साधक है वह बाहर से ठाकुरजी में कितना लगा है वह नहीं दिखेगा पर भीतर से वह हरछण ठाकुर जी को याद करता है। साधक है वह परिवार में जुड़ा होते हुए भी आरोप अंदर से केवल से ठाकुर जी का चिंतनरें

४. जल- जल स्वभाव से सदैव स्वच्छ होता है और मधुर होता है उसको ग्रहण करने से सदैव तृप्ति का अनुभव होता है। जब भी कभी विवाद हो तो तुरंत उसको ठीक करने का प्रयत्न करें मीठे वचन बोले।  क्योंकि यह सोच कर कि जब मैं अपने भजन में बैठा हूं अपने चिंतन में बैठे तो मेरे बुद्धि में मेरे मन में केवल ठाकुर, माँ और स्वामीजी ही आएं। जीवन जिस में शुद्धता -पवित्रता के  पथ पर चलने के लिए कहा गया है उसे बिना किसी छल कपट के आप अपने जीवन में उतारे।

     अगर किसी शरीर (M/F) विशेष से राग -द्वेष होगा, वासना या कटुता होगी तो मन अशान्त   हो जाता है, नगाड़े बजाते हैं। पर जब सब जगह बिल्कुल सात्विक -पवित्र भाव होगा सब जगह शांति होगी प्रेम होगा। जब आप के ह्रदय में किसी के लिए कटुता नहीं होगी तो आप का भजन और सुंदर रूप से होगा। 

५. अग्नि- अग्नि सदैव तेज और ज्योतिर्मय होती है। अग्नि को कोई दबा नहीं सकता।  अग्नि में जो कुछ भी प्रवेश करता है वह अग्नि के जैसा हो जाता है वह स्वयं का रूप स्वयं का स्वभाव त्याग कर अग्नि का रूप रूप स्वरूप ले लेता है। उसी तरह साधक को सदैव परम तेजस्वी सत्य में विद्यमान और सदैव तेजस्वी होना चाहिए। इंद्रियों से यथा योग्य सभी विषयों का उपभोग करते हुए भी अपने मन और इंद्रियों को वश मैं रख कर किसी के भी दोष और गुण को ना देखें। अग्नि किसी के भी दोष गुण को ना देख कर अपना आचरण अपना स्वभाव उसको प्रदान करती है।

[साभार :निमाई पाठशाला: शिक्षक (शिक्षागुरु)]

इस श्लोक के सन्दर्भ में श्री शंकराचार्य जी गौतमस्मृति को उद्धृत करते हुए एक शंका उठाते हैं- उस स्मृति ग्रन्थ के अनुसार जैसे पूजनीय व्यक्ति का अनादर करना दोषयुक्त है वैसे ही अनादरणीय व्यक्ति का सम्मान करने में भी उतना ही दोष है। 

 स्मृति के इस कथन की दृष्टि से ब्राह्मण के अ समान ही श्वान को आदर देना अथवा जो अनादर श्वान का किया जाता है उतना ही असम्मान एक श्रेष्ठ ब्राह्मण का करना ये दोनों ही पापपूर्ण कर्म होंगे। इस श्लोक के सन्दर्भ में श्री शंकराचार्य गौतमस्मृति को उद्धृत करते हुए एक शंका उठाते हैं ननु अभोज्यान्नाः ते दोषवन्तः समासमाभ्यां विषमसमे पूजातः इति स्मृतेः। न ते दोषवन्तः। कथम् -"(गौ0 स्म0 17.20)  जिसका निराकरण अगले श्लोक में किया गया है। 

परन्तु समदर्शी पुरुष की  = निश्चयात्मिका बुद्धि, आत्मस्थबुद्धि, या शुद्ध बुद्धि  इस दोष से सर्वथा मुक्त होती है। उसका कारण यह है कि   

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।

निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः।।5.19।।

।।5.19।। जिनका मन समत्वभाव में स्थित है,  उनके द्वारा यहीं पर यह सर्ग जीत लिया जाता है;अर्थात  वे इसी जीवन में जन्म और मरण के चक्र से मुक्ति पा लेते हैं। क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है इसलिये वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।। वे भगवान के समान गुणों से संपन्न हो जाते हैं और परमसत्य में स्थित हो जाते हैं।  

 श्रीकृष्ण ने यहाँ 'सम' शब्द का प्रयोग किया है जिसका तात्पर्य पिछले श्लोक में किए गए वर्णन के अनुसार किसी मनुष्य (विवेकी बुद्धि या शुद्धबुद्धि के ) द्वारा सभी प्राणियों को समान दृष्टि से देखना है। इसके अतिरिक्त समदृष्टि का अर्थ पसंद और नापसंद, सुख और दुःख तथा हर्ष और शोक से ऊपर उठकर देखने से भी है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो समदृष्टि रखते हैं वे 'संसार' अर्थात् जन्म और मृत्यु के अनवरत चक्र से परे हो जाते हैं। 

जब तक हम स्वयं को शरीर (M/F) समझते हैं तब तक हम समदर्शी होने की योग्यता नहीं पा सकते। क्योंकि हम शरीर के सुख और दुःख के लिए निरन्तर कामनाओं और विमुखता की अनुभूति करेंगे। संत महापुरुष (विवेकी-बुद्धि सम्पन्न होते हैं , इसलिए) शारीरिक चेतना से उपर उठकर सांसारिक मोह को त्यागकर अपना मन भगवान में तत्लीन कर लेते हैं। रामचरितमानस में वर्णन है-

जोगवहिं प्रभुसिय लखनहि कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें॥

सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि।। 

प्रभु श्री रामचन्द्रजी सीताजी और लक्ष्मणजी की कैसी सँभाल रखते हैं, जैसे पलकें नेत्रों के गोलकों की। "जिस प्रकार अज्ञानी मनुष्य अपने को शरीर मानकर उसकी सेवा करता है, वैसे ही लक्ष्मण ने भगवान राम और सीता की सेवा की।"

 जब किसी का मन दिव्यचेतना में स्थित हो जाता है तब वह भौतिक सुखों की आसक्ति और दुःखों की अनुभूति से परे हो जाता है और फिर वह समदृष्टा की अवस्था को प्राप्त कर लेता है।

 यह समदृष्टि भौतिक कामनाओं का त्याग करने से प्राप्त होती है और मनुष्य को भगवान के समान आचरण वाला बना देती है। महाभारत में यह वर्णन है-“यो न कामयते किञ्चत् ब्रह्म भूयाय कल्पते" अर्थात् "जो मनुष्य अपनी कामनाओं का त्याग कर देता है वह भगवान के समान हो जाता है।" 

प्रभु की कृपा शोर नहीं करती,पर उसका प्रभाव दूर तक दिखाई देता है। जहाँ ईश्वर का स्पर्श होता है,वहाँ कर्म स्वतः उज्ज्वल हो जाते हैं, और जीवन स्वयं कीर्ति बन जाता है। कृपा जब उतरती है, तो साधारण भी असाधारण हो जाता है। 🌸🙏

आत्मानुभूति का यह लक्ष्य मृत्यु के पश्चात् प्राप्य नहीं वरन् इसी जीवन में इसी देह में और इसी लोक में प्राप्त करने योग्य है। जीवभाव की परिच्छिन्नताओं (M/F शरीर भाव) से ऊपर उठकर मनुष्य ईश्वरानुभूति में स्थित रह सकता है। 'सत्य' (इन्द्रियातीत सत्य)  सदैव नदी के तल के समान अपरिवर्तित रहता है जबकि उसका जल प्रवाह सदैव चंचल रहता हैअधिष्ठान सदा अविकारी रहता है (सिनेमा का पर्दा जैसा ) परन्तु अध्यस्त (कल्पित) अथवा व्यक्त हुई सृष्टि का स्वभाव है नित्य परिवर्तनशीलता। जीव देहादि (MF शरीर)  के साथ तादात्म्य करके इन परिवर्तनों का शिकार बन जाता है जबकि अधिष्ठानरूप आत्मा नित्य अपरिवर्तनशील और एक समान रहता है।

 जीवत्व से ईश्वरत्व तक (देहअहं से शिवोहं) तक आरोहण करने में कौन समर्थ है? 

किस उपाय से संसार बन्धनों से मुक्ति पायी जा सकती है इस श्लोक में केवल जीवन के लक्ष्य का ही नहीं बल्कि तत्प्राप्ति के लिए साधन का भी संकेत किया गया है। भगवान् कहते हैं कि जिनका मन समत्व भाव में स्थित है वे ब्रह्म में स्थित हैं। पतंजलि मुनि इसी बात को दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहते हैं कि योगश्चित्तवृत्तिनिरोध अर्थात् चित्तवृत्तियों के निरोध को योग कहते हैं। 

    जहाँ मन की वृत्तियों का पूर्ण निरोध हुआ वहाँ मन (अहंकर्ता भाव) का अस्तित्व ही समाप्त समझना चाहिए। मन ही वह उपाधि है जिसमें व्यक्त चैतन्य जीव या अहंकार के रूप में प्रकट होकर स्वयं को सम्पूर्ण जगत् से भिन्न मानता है। अत मन के नष्ट होने पर अहंकार और उसके संसार का भी नाश अवश्यंभावी है। सांसारिक दुखों से मुक्त जीव अनुभव करता है कि वह परमात्मस्वरूप से भिन्न नहीं। इस स्वरूपानुभूति के बिना कथित समदर्शित्व प्राप्त नहीं हो सकता

     जो व्यक्ति मनुष्य को विचलित कर देने वाली समस्त परिस्थितियों में अविचलित और समभाव रहता है उसने निश्चय ही अधिष्ठान में स्थिति प्राप्त कर ली है। समुद्र की लहरों पर बढ़ती हुई लकड़ी इतस्तत भटकती रह सकती है लेकिन दृढ़ चट्टानों पर निर्मित दीपस्तम्भ अविचल खड़ा रहता है। और दादा कहते थे - वही मानवजाति का मार्गदर्शक नेता होता है ! तूफान उसके चरणों से टकराकर अपना क्रोध शान्त करते हैं। इसलिए भगवान् का कथन युक्तियुक्त ही है कि समत्वभाव में स्थित पुरुष ब्रह्म में ही स्थित है। इसलिए

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्।

स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः।।5.20।।

।।5.20।। जो स्थिरबुद्धि,  जो सम्मोह -रहित बुद्धि या ब्रह्मवित् पुरुष (विवेकी-बुद्धि या आत्मस्थ बुद्धि) ब्रह्म में स्थित है,  वह प्रिय वस्तु को प्राप्त होकर हर्षित नहीं होता और अप्रिय को पाकर उद्विग्न नहीं होता।।

जब हम अपनी इच्छाओं को भगवान की इच्छा से जोड देते हैं, और एक बार कहते हैं - "तेरी इच्छा पूर्ण हो ! " तब सुख और दुःख दोनों को उसकी कृपा मानकर सहर्ष स्वीकार किया जा सकता है

 इस सिद्धांत से संबंधित एक सुन्दर कथा इस प्रकार है-एक बार एक जंगली घोड़ा किसी किसान के खेत में आ गया। लोगों ने उस किसान  को उसके भाग्य के लिए बधाई दी। किसान ने कहा- “सौभाग्य और दुर्भाग्य के बारे में कौन जानता है। यह सब भगवान की इच्छा है।" कुछ समय पश्चात् वह घोड़ा वापिस जंगल में चला गया। उसके पड़ोसी इसे दुर्भाग्य बताते हुए उसे सांत्वना देने लगे। बुद्धिमान किसान ने उत्तर देते हुए कहा-“दुःख और सुख केवल भगवान (श्रीरामकृष्ण देव) की इच्छा के अनुसार मिलता है।" (उदाहरण हैं - स्वामी जी , नवनीदा।)

     कुछ दिनों बाद घोड़े पर सवारी करते हुए किसान के पुत्र की टांग टूट गयी। लोगों ने इस पर अपना शोक व्यक्त किया लेकिन किसान ने फिर भी यह उत्तर दिया-"दुःख और सुख केवल भगवान की इच्छा है।" इसके पश्चात् एक दिन राजा के सैनिक शीघ्र होने वाले युद्ध के लिए नवयुवकों को सेना में भर्ती करने के लिए गांव में आते हैं। किसान के पड़ोस में रहने वाले सभी युवकों को सेना में भर्ती कर लिया जाता है किन्तु किसान के पुत्र को उसकी टूटी टांग के कारण छोड़ दिया जाता है। 

कुछ दिन व्यतीत होने पर वह घोड़ा 20 अन्य जंगली घोड़ों के साथ वापस आ गया। लोगों ने किसान को फिर उसके सौभाग्य के लिए बधाई दी। किसान ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा-“सौभाग्य और दुर्भाग्य क्या है? यह सब भगवान की इच्छा पर निर्भर है।" कुछ दिनों बाद घोड़े पर सवारी करते हुए किसान के पुत्र की टांग टूट गयी। लोगों ने इस पर अपना शोक व्यक्त किया लेकिन किसान ने फिर भी यह उत्तर दिया-"दुःख और सुख केवल भगवान की इच्छा है।" इसके पश्चात् एक दिन राजा के सैनिक शीघ्र होने वाले युद्ध के लिए नवयुवकों को सेना में भर्ती करने के लिए गांव में आते हैं। किसान के पड़ोस में रहने वाले सभी युवकों को सेना में भर्ती कर लिया जाता है किन्तु किसान के पुत्र को उसकी टूटी टांग के कारण छोड़ दिया जाता है।

दिव्यज्ञान से हमें यह बोध होता है कि हमारा निजी हित केवल भगवान (श्रीरामकृष्ण) के सुख में निहित है। इसलिए हम अपनी सभी कामनाएँ भगवान को समर्पित कर देते हैं। जब हमारी निजी कामनाएँ भगवान की इच्छा में जुड़ जाती हैं तब किसी मनुष्य में भगवान की कृपा से दुःख और सुख दोनों को एक समान स्वीकार करने की दृष्टि विकसित होती है। समता में स्थित मनुष्य के यही लक्षण हैं।

 श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि महात्मा पुरुष (विवेकी नेता) कोई गंगातट की निर्जीव पाषाणी प्रतिमा नहीं होता बल्कि वह ऐसा स्फूर्त समर्थ और कुशल व्यक्ति होता है जो अपनी पीढ़ी को प्रभावित करके उसका नवनिर्माण- 'Be and Make' में लगा रहता है

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।

स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते।।5.21।।

BG 5.21: जो बाह्य इन्द्रिय सुखों में आसक्त नहीं होते वे परम आनन्द की अनुभूति करते हैंभगवान (श्रीरामकृष्ण, आत्मा , ईश्वर) के साथ एकनिष्ठ होने के कारण वे असीम सुख भोगते हैं। 

 वैदिक धर्म ग्रंथ बार-बार वर्णन करते हैं कि भगवान अनन्त आनन्द के महासागर हैं। "आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् । " "भगवान को आनन्द मानो। " (तैत्तिरीयोपनिषद्-3.6)'केवलानुभवानन्द-स्वरुपः परमेश्वरः।'- "भगवान का स्वरूप वास्तविक आनंद ही है।" (श्रीमद्भागवतम्-7.6.23) "आनन्द मात्र कर पाद मुखोदरादि। "भगवान के हाथ, पैर, मुख और उदर आदि आनन्द स्वरूप हैं।"(पद्म पुराण) "जो आनन्द सिंधु सुखरासी।" - भगवान आनन्द और सुख के महासागर हैं। (रामचरितमानस) शास्त्रों से लिए गए ये सब मंत्र और श्लोक इस पर बल देते हैं कि दिव्य आनन्द भगवान की प्रकृति है। वे योगी जो अपनी इन्द्रियों, मन और बुद्धि को भगवान में तल्लीन कर देते हैं वे अपने भीतर स्थित असीम आनन्द की अनुभूति करते हैं।

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।

आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः।।5.22।।

।।5.22।। हे कौन्तेय (इन्द्रिय तथा विषयों के) सम्पर्क से उत्पन्न होने वाले जो भोग हैं,  यद्यपि सांसारिक लोगों को आनन्द प्रदान करने वाले प्रतीत होते हैं किन्तु वे वास्तव में दुःखों के कारण हैं।  क्योंकि वे आदि-अन्त वाले हैं। बुद्धिमान् पुरुष उनमें नहीं रमता।।

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्।

कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः।।5.23।।

BG 5.23: वे मनुष्य ही योगी हैं जो शरीर को त्यागने से पूर्व काम और क्रोध के वेग को रोकने में समर्थ होते हैं, केवल वही संसार मे सुखी रहते हैं।

 'सोढुं ' शब्द का अर्थ 'सहन करना' है। इस श्लोक में हमें कामनाओं और क्रोध के वेग को सहन करने की शिक्षा दी गयी है। साधारण व्यक्ति कुछ समय तक कोई लज्जावश अपने मनोवेग को रोक सकता है। लेकिन नित्य-अनित्य विवेक सम्पन्न मनुष्य की बुद्धि स्वतः आत्मनोन्मुखी हो जाती है। अविवेकी अपमान से बचने के लिए, बुरा आचरण करने से स्वयं को रोकता है।  किन्तु यहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को लज्जा, भय और संदेह के कारण नहीं अपितु विवेक द्वारा मन के वेग को रोकने के लिए कह रहे हैं

क्योंकि मानव शरीर में ही आत्मा को भगवत्प्राप्ति करने का सुनहरा अवसर प्राप्त होता है। इस शरीर में हम विवेक शक्ति (ब्रह्म सत्यं ) से युक्त होते हैं जबकि पशु अपनी प्रवृत्ति के अनुसार जीवन निर्वाह करते हैं।  मन पर अंकुश लगाने के लिए विवेकी बुद्धि (नित्य-अनित्य विवेक)   का प्रयोग करना चाहिए। जैसे ही मन में (मूढ़बुद्धि में) भौतिक सुखों को प्राप्त करने का विचार उत्पन्न हो, उसी समय हमें बुद्धि को यह समझाना चाहिए कि ये सब दुःख के साधन हैं।

 काम और क्रोध यही दो वृत्तियां है जो साधारणत हमारे मन में अत्यन्त विक्षेप या क्षोभ उत्पन्न करती हैं। कामना की तीव्रता जितनी अधिक होती है उसमें विघ्न आने पर क्रोध का रूप भी उतना भयंकर होता है। मनुष्य विषयों की कामना केवल सुखप्राप्ति के लिये ही करता है। जिस व्यक्ति ने यह समझ लिया कि विषयों में सुख नहीं होता और आनन्द तो स्वयं का आत्मस्वरूप ही है वह व्यक्ति इन उपभोगों से विरक्त होकर स्वरूप में स्थित होने का प्रयत्न करेगा। 

ऐसे व्यक्ति के मन में विषयों की कामनाएँ नहीं होंगी और स्वाभाविक है कि उनके अभाव में क्रोध उत्पन्न होने के लिए कारण ही नहीं रह जायेगा। जिसने इन दो शक्तिशाली एवं दुर्जेय वृत्तियों को अपने वश में कर लिया है वही एक पुरुष इस जगत् के प्रलोभनों में स्वतन्त्ररूप से अप्रभावित रह सकता है।

 वही वास्तव में सुखी पुरुष है।अर्जुन के माध्यम से भगवान् का हम सबके लिये यही उपदेश है कि हमें काम और क्रोध को जीतने का प्रयत्न करना चाहिये। उनका आश्वासन है कि इन पर विजय प्राप्त करने पर हम इसी जगत् और जीवन में परमानन्द का अनुभव कर सकते हैं। किन गुणों से सम्पन्न व्यक्ति ब्रह्म में स्थित होता है भगवान् कहते हैं

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः।

स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति।।5.24।।

BG 5.24: जो (बुद्धि) अन्तर्मुखी होकर असीम आत्मिक सुख का अनुभव करते हैं वे और आत्मिक प्रकाश से प्रकाशित रहते हैं, ऐसे योगी भगवान में एकीकृत हो जाते हैं और संसार से मुक्त हो जाते हैं।

जब जीव मिथ्या और अनित्य वस्तुओं को त्यागकर आत्मस्वरूप को पहचानता है तब वह कोई शून्यावस्था नहीं बल्कि आत्मा (शुद्धबुद्धि-आत्मस्थबुद्धि ) के द्वारा आत्मा में ही आत्मानन्द की अनुभूति की स्थिति है।आध्यात्मिक साधना में उपदिष्ट विषयों से वैराग्य कोई दुख का कारण नहीं है वरन् उसके द्वारा साधक निश्चयात्मकरूप से सुखशान्ति प्राप्त करता है। यह स्वरूपानुभव का आन्तरिक आनन्द नित्य बना रहता है न कि वैषयिक सुखों के समान क्षणमात्र। उसका आनन्द बाह्य विषय निरपेक्ष होता है। उसका हृदय सदैव चैतन्य के प्रकाश से आलोकित रहता है। आत्मानुभूति में स्थित यह पुरुष (आत्मस्थबुद्धि) ब्रह्मवित् कहलाता है। ब्रह्म को जानकर वह स्वयं ब्रह्मस्वरूप बनकर परम मोक्ष को प्राप्त होता है।

योगदर्शन में वर्णन है-ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ॥ (योगदर्शन-1.48) "समाधि की अवस्था में मनुष्य की बुद्धि परम सत्य की अनुभूति में डूब जाती है।" सत्य को धारण और पुष्ट करने वाली एक चित्तवृत्ति

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः

छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।।5.25।।

BG 5.25:  वे ऋषिगण जिनके पाप समाप्त हो जाते हैं और जिनके संशय मिट जाते हैं और जिनका मन संयमित होता है, वे सभी प्राणियों के कल्याणार्थ कार्य करते हैं। वे भगवान को पा लेते हैं और सांसारिक बंधनों से भी मुक्त हो जाते हैं।

यह सत्य जीव का स्वयं सिद्ध स्वरूप ही है जिसके अज्ञान से वह अपने से ही दूर भटक गया था। आत्मानुभव में स्थित ज्ञानी पुरुष का सम्पूर्ण जीवन मनुष्यों का आत्म अज्ञान दूर करने और आत्मवैभव को प्रकट करने में समर्पित होता है। इसका संकेत भगवान् के शब्दों में सर्वभूत हिते रता के द्वारा किया गया है। यह लोक सेवा उसका स्वनिर्धारित कार्य और मनोरंजन दोनों ही है। उपाधियों के द्वारा सब की सेवा में अपने को समर्पित करते हुए ज्ञानी पुरुष स्वयं अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित रहता है। 

इस परोपकार कार्य में महापुरुष शुद्ध मन से तल्लीन रहते हैं। इससे और अधिक भगवान की कृपा प्राप्त होती है जो उन्हें इस मार्ग की ओर अग्रसर होने के लिए और अधिक प्रेरित करती है। इसलिए इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने कर्मयोग के मार्ग की प्रशंसा की है। 

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्।

अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्।।5.26।

।।5.26।। काम और क्रोध से रहित,  संयतचित्त वाले तथा आत्मा को जानने वाले संन्यासी (यतियों के राजा) के लिए सब ओर मोक्ष (या ब्रह्मानन्द/विवेकानन्द) विद्यमान रहता है।।

      इस भोगवादी आसुरी युग में लोगों को चरित्र-निर्माण करने या दैवी जीवन जीने की प्रेरणा देने,  प्राणि मात्र के प्रति हृदय मे उमड़ते प्रेम के कारण वेश्या को पापमुक्त करने,  अविद्या जन्य अंधकार को प्रकाशित करके अज्ञानियों का पथ-प्रदर्शन करने का समाज सेवा का कार्य करते हुए ज्ञानी पुरुष (जिसका प्रारब्ध जनित पाप क्षय, संशय नष्ट हो चुका है वह उसकी बुद्धि) स्वयं अपने दिव्य स्वरूप में स्थित रहती है और फिर कभी देहाभिमान की बुद्धि -M/F शरीर, या धन के आकर्षण से लिप्त नहीं होता। 

जो पुरुष अपने पुरुषार्थ के बल पर मन की काम और क्रोध की प्रवृत्तियों को विजित कर लेता है और समत्व को प्राप्त करता है जिसे कोई भी वस्तु या परिस्थिति विचलित नहीं कर पाती। वह इसी जीवन में तथा देह त्याग के पश्चात् भी ब्रह्मानन्द में ही स्थित रहता है।अब भगवान् सम्यक् दर्शन के साक्षात् अन्तरंग साधन ध्यानयोग का वर्णन अगले दो सूत्ररूप श्लोकों में करते हैं

स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवो: |

प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ || 27||

यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायण: |

विगतेच्छाभयक्रोधो य: सदा मुक्त एव स: || 28||

BG 5.27-28: समस्त बाह्य सुख के विषयों का विचार न कर अपनी दृष्टि को भौहों के बीच में स्थित कर, नासिका में विचरने वाली भीतरी और बाहरी श्वासों के प्रवाह को सम करते हुए इन्द्रिय, मन और बुद्धि को संयमित करके जो ज्ञानी कामनाओं और भय को त्याग देता है, वह सदा के लिए मुक्त हो जाता है।

प्रायः वैरागी लोगों की रुचि अष्टांगयोग  में भी होती है। उनकी विरक्ति उन्हें भक्ति के मार्ग से उदासीन रखती है जिसमें भगवान के नाम, रूपों, लीलाओं और धाम का स्मरण करना आवश्यक होता है। क्योंकि तपस्या का मार्ग भी भगवान की भक्ति के द्वारा ही पूर्ण होता है। इसे अगले श्लोक में व्यक्त किया गया है।

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।

सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।।5.29।।

।।5.29।। (सत्य का खोजी साधक भक्त) मुझे (अवतार वरिष्ठ को)  यज्ञ और तपों का भोक्ता और सम्पूर्ण लोकों का महान् ईश्वर तथा भूतमात्र का सुहृद् (मित्र) जानकर शान्ति को प्राप्त होता है।।

पिछले दो श्लोकों में जिस साधना पद्धति का उल्लेख किया गया है वह आत्मज्ञान की ओर प्रवृत्त कराती है। किन्तु ब्रह्मज्ञान के लिए भगवान की कृपा आवश्यक है जो भक्ति के द्वारा ही प्राप्त होती है। 'सर्वलोकमहेश्वरम्' शब्द का अर्थ 'समस्त संसार के परम स्वामी भगवान' तथा 'सुहृदं सर्वभूतानां' शब्द का अर्थ सभी प्राणियों का हितैषी और उपकारी होता है। इस प्रकार श्रीकृष्ण बल देते हुए कहते हैं कि तपस्या के मार्ग (अष्टांग योग) का समापन भी भगवान की शरणागति में ही होता है। 

=============






 













 






  

 



 

     




 

  


   



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें