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रविवार, 15 मार्च 2026

⚜️️🔱श्रीमद् भगवद्गीता : अध्याय -6⚜️️🔱ध्यान योग 🔱⚜️️" सर्वं अत्यन्तं गर्हितम् "-अर्थात किसी भी विषय की अति या अधिकता योग में बाधक है। ⚜️️🔱मिथ्या से वियोग और सत्य से संयोग ही योग है।⚜️️🔱 कोई भी विपत्ति प्रह्लाद को (की शुद्धबुद्धि) आत्मा (इष्टदेव भगवान) की भक्ति से विलग नहीं कर पायी⚜️️🔱योगी आत्मा (इष्टदेव) को सब भूतों में और भूतमात्र को आत्मा (इष्टदेव) में देखता है।।⚜️️🔱हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है। बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा।। Do not die without realizing that you are deathless.

ध्यान योग  

47 श्लोकों वाले इस अध्याय का नाम ध्यान योग है। प्रथम कुछ श्लोकों में यथार्थ संन्यासी कौन है-इसी विषय में चर्चा की गयी है। यहाँ संन्यासी शब्द से सन्यासाश्रम नहीं कहा गया है बल्कि कहा गया है कि कर्मफल-त्यागी कर्मयोगी ही यथार्थ संन्यासी या योगी है , अर्थात जिन्होंने कर्मफल का परित्याग पूर्णतः कर दिया है। या जिसने अपने द्वारा (अर्थात अपने कच्चा मैं द्वारा) अनुष्ठित समस्त कर्मों का फल ईश्वर में (आत्मा, चैतन्य, ब्रह्म, पक्का मैं में) सौंप दिया है , चाहे वह गृहस्थाश्रमी हो या चतुर्थाश्रमी, वही यथार्थ संन्यासी या योगी है।

तो महामण्डल के कैम्प में इसी 'आत्मा ' के विषय पर चर्चा को सुनकर किसी छात्र ने एक बार पूज्य 'नबनी दा' (महामण्डल के संस्थापक सचिव श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय) से प्रश्न किया था - वास्तव में ' मैं कौन हूँ और आत्मा क्या है ? उसके उत्तर में 'पूज्य दादा' ने बंगला भाषा में जो कहा था उसका हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है - 


मैं कौन हूँ, Who am I ?

[What exactly lies within the 'heart-cavity' 
of our body—and how can we come to know it?]

तुम जो पूछते हो कि हमारे शरीर के भीतर 'हृदय -गुहा ' में जो है वो क्या है , उसको कैसे जाने? तो जो ह्रदय -गुहा के भीतर में विद्यमान है , उस ह्रदय की गहराई को समझना , इतना कठिन है कि अधिकांश मनुष्य को सारा जीवन साधन-भजन करने पर भी समझ में नहीं आता है। और इसके भी ऊपर तुम्हारा दूसरा प्रश्न, 'असले आमि के' ? -वास्तव में मैं कौन हूँ ? इसकी जिज्ञासा ही अधिकांश मनुष्य के मन कभी नहीं उठती। 

  


प्रत्येक योग का उद्देश्य ही है -जीवात्मा का उद्धार या आत्मानुभूति। इसके अन्तर्गत अष्टांग-योग या मनःसंयोग की पद्धति की वर्णना है। सभी योग  साधनाओं का लक्ष्य ब्राह्मी स्थिति है । ब्राह्मणी स्थिति वह अवस्था है जहाँ बुद्धि के पहुँचने का फल अत्यन्त सुख, भूमानन्द,  परमानन्द, सच्चिदानन्द, यथार्थ स्वरूप में प्रतिष्ठा होती है। 

[ब्राह्मी स्थिति -  " एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ "  हे अर्जुन ! यह ब्राह्मी स्थिति  अर्थात ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है। चित्तवृत्ति निरोध की वह स्थिति है, जहाँ पहुँचकर चंचल मन बिल्कुल  शांत स्थिर होता है, और बुद्धि आत्मस्थ या ब्रह्मस्थ हो जाती है । इस अवस्था वर्णन करते हुए गीता 2/72  में कहा है-

एषा ब्राह्मी स्तिथिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।

स्थित्वास्यामन्तकालेलेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥

 " एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ " इसको प्राप्त होकर वह फिर कभी मोहित नहीं होता। और अन्तकाल में भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर वह ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाता है। (क्योंकि जो कुछ होना है, अर्थात ब्रह्म, आत्मा, ईश्वर, भगवान को प्राप्त होना है, या आत्मस्थ होना है तो कीचड़ में कमल के पुष्प जैसी खिली हुई  'शुद्ध बुद्धि' को ही होना है - क्योंकि आत्मा तो नित्य चैतन्य या नित्यमुक्त है ही !) उस अवस्था में दृष्टि, बुद्धि या 'मति' ज्ञानमयी हो जाती है। और ज्ञानमयी दृष्टि से जगत ब्रह्ममय दीखता है। ("दृष्टिं ज्ञानमयीं कृत्वा पश्येद् ब्रह्ममयं जगत्") उस अवस्था में पहुँची हुई  आत्मस्थबुद्धि को सर्वत्र ब्रह्मदर्शन होता है , अर्थात 'एकमेवाद्वितीयं','नेह नानास्ति किंचन', 'ब्रह्मैव इदं सर्वं ', या 'आत्मैव इदं सर्वं'-ऐसी अनुभूति होती है। 

सर्वत्र ब्रह्मदर्शन का अर्थ है सर्वत्र समदर्शन, सर्वभूतों में ईश्वर (आत्मा, भगवान, इष्टदेव, अन्तर्यामी गुरु) का दर्शन - 'जहाँ जहाँ नेत्र पड़े तहाँ तहाँ कृष्ण स्फुरे'! ऐसी अवस्था में प्रतिष्ठित होना बुद्धि का लक्ष्य है। निष्काम ध्यानयोग (अष्टांग योग) के अभ्यास के फलस्वरूप ध्यान समाधि में परिणत हो जाता है। वह समाधि जब निर्बीज समाधि [निर्विकल्प समाधि] में परिणत होगी तभी सब प्राणियों में ईश्वर दर्शन (आत्मदर्शन ?) की अवस्था में प्रतिष्ठित होना सम्भव होगा।

   ध्यानयोग या मनःसंयोग बहुत कठिन है। इसके लिए दीर्घकाल तक गुरु /आचार्य के निर्देशन में अष्टांग योग' का पाँच अंग - प्रत्याहार और धारणा तक का अभ्यास करने की आवश्यकता होती है। इसके बाद ध्यान और समाधि में सिद्धि लाभ करने से - ध्यानयोग का लक्ष्य 'ब्राह्मणी स्थिति' प्राप्त होती है।  

इस अध्याय में एक और आशा की वाणी भगवान श्रीकृष्ण ने सुनाई है - वो यह कि शुभ करने वालों को (भारत कल्याण के उद्देश्य से 'Be and Make' लीडरशिप ट्रेनिंग में लगे लोगों को) कभी दुःख नहीं होता- "न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति" और भगवान की अन्य कल्याणकारी वाणी है -'स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्' (श्रीमद् भगवद्गीता 6/40) निःस्वार्थ भाव से 'भारत का कल्याण ' सोंचकर बहुत थोड़ा भी धार्मिक कर्म अनुष्ठित होने से अन्त में मृत्यु भय और नरक भय से मुक्त करके हमें ब्रह्मपद या श्रीभगवान (ठाकुर-माँ -स्वामीजी) के चरणकमलों की प्राप्ति करा देता है। 

श्रीभगवान ने अपना स्वरुप प्रकट करके अर्जुन से कहा - सब प्रकार के योगियों में जो मेरा भक्त अर्थात वासुदेव-परायण है, वही श्रेष्ठतम योगी है। अर्थात श्रीभगवान में फल का अर्पण करके जो भी निष्काम कर्म, ज्ञान , भक्ति या योग जो भी अनुष्ठित हो वही अद्वैत ब्रह्मरूप वासुदेव प्राप्ति का कारण हो जाता है। श्रीमद्भागवत महापुराण (1.2.28-29) में लिखा है - 

वासुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखाः।

वासुदेवपरा योगा वासुदेवपराः क्रियाः॥ (1.2.28)

वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरं तपः।

वासुदेवपरो धर्मो वासुदेवपरा गतिः॥ (1.2.29)

 अर्थात समस्त वेदों (उपनिषदों) के एकमात्र प्रतिपाद्य विषय-या सभी वेदों का परम लक्ष्य वासुदेव ही हैं। (जीवन के 'प्राप्य ' -लक्ष्य ठाकुरदेव) हैं, सारे यज्ञ (ज्ञान-यज्ञ) भी वासुदेव की तुष्टि के लिए अनुष्ठित होते हैं , योग -शास्त्र में निहित 5 अंग, 'यम-नियम -आसन - प्रत्याहार -धारणा' का अभ्यास भी वासुदेव की प्राप्ति के लिए ही विहित है। और वर्णाश्रम धर्म में कहे गए सभी कर्म भी वासुदेव के लिए ही किये जाते हैं और वासुदेव ही मानव-आत्मा की एकमात्र गति है।

निष्काम कर्मी, निष्काम ज्ञानी, निष्काम योगी और निष्काम भक्त -सभी श्री भगवान के परमपद को प्राप्त होंगें, इतना कहकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ने ज्ञान , कर्म, योग (मनःसंयोग) और भक्ति का समन्वय किया है।              

क्योकि जब हम समर्पण की भावना (ब्रह्मार्पणं बुद्धि) से कार्य करते हैं तब इससे हमारा चित्त शुद्ध हो जाता है और हमारी आध्यात्मिक अनुभूति गहन हो जाती है। (वह आध्यात्मिक अनुभूति -'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः" की अनुभूति गहन हो जाती है अर्थात आत्मस्थ शुद्ध बुद्धि या विवेकी बुद्धि में यह विश्वास दृढ़ हो जाता है कि अभी तक सब कुछ ईश्वर की इच्छा से हुआ था, हो रहा है और आगे भी होता ही रहेगा।

मन के शांत हो जाने पर साधना उत्थान का मुख्य साधन बन जाती है।ध्यान द्वारा योगी मन को वश में करने काप्रयास करते हैं क्योंकि अनियंत्रित मन हमारा शत्रु है और नियंत्रित मन हमारा प्रिय मित्र है।

श्रीकृष्ण अर्जुन को सावधान करतेहैं कि कठोर तप में लीन रहने से कोई सफलता प्राप्त नहीं कर सकता इसलिए मनुष्य को अपने खान-पान, कार्य-कलापों, आमोद-प्रमोद और निद्रा को संतुलित रखना चाहिए। 

फिर वे मन को भगवान में एकीकृत करने के लिए साधना विधि का वर्णनकरते हैं।जिस प्रकार से वायु रहित स्थान पर रखे दीपक की ज्वाला अचल होती है। ठीक उसी प्रकार साधक को भी मनसाधना में स्थिर रखना चाहिए।वास्तव में मन को वश में करना कठिन है लेकिन अभ्यास और वैराग्य द्वारा इसे नियंत्रित कियाजा सकता है।

इसलिए मन यदि कहीं भटकने लगे तो हमें वहाँ से इसे वापस लाकर निरन्तर भगवान में लगाना चाहिए। जब मनशुद्ध हो जाता है तब यह दिव्य बन जाता है।आनन्द की इस अवस्था को समाधि कहते हैं। 

इसके पश्चात् अर्जुन उस साधक की गति के संबंध में प्रश्न करता है जो इस मार्ग का अनुसरण करना आरम्भ तो करता है लेकिन अस्थिर मन के कारण लक्ष्य तक पहुँचने में असमर्थ रहता है। श्रीकृष्ण उसे आश्वस्त करते हैं कि जो भगवत्प्राप्ति केलिए प्रयास करता है, उसका कभी पतन नहीं हो सकता।

"भगवान हमारे पूर्व जन्मों में संचित आध्यात्मिक गुणों का लेखा-जोखा रखते हैं" # और अगले जन्मों में उस ज्ञान को पुनः जागृत करते हैं ताकि हमने अपनी यात्रा को जहाँ छोड़ा था उसे वहीं से पुनः आगेजारी रख सकें। पूर्व जन्मों से अर्जित कर्मों के बल पर योगी अपने वर्तमान जीवन में भगवान तक पहुँचने में समर्थ हो सकता है

इस अध्याय का समापन इस उद्घोषणा के साथ होता है कि सभी योगियों में से जो भक्ति में तल्लीन रहता है वह सर्वश्रेष्ठ होता है। या जो योगी भगवान के साथ एकीकृत होने का प्रयास करता है वह तपस्वी, ज्ञानी और कर्मी से श्रेष्ठ होता है। 

 [#श्री रामकृष्ण के छः प्रमुख ईश्वरकोटि के शिष्य - 1.स्वामी विवेकानंद (नरेंद्रनाथ दत्त): रामकृष्ण के सबसे प्रमुख शिष्य, जिन्होंने शिकागो में वेदांत का प्रचार किया। 2.स्वामी ब्रह्मानंद (राखल चंद्र घोष  21 जनवरी 1863 - 10 अप्रैल 1922): रामकृष्ण इन्हें 'ईश्वरकोटि' (दिव्य पुरुष) मानते थे, जो आध्यात्मिक रूप से बहुत ऊंचे थे।  श्री रामकृष्ण परमहंस के प्रमुख संन्यासी शिष्य और रामकृष्ण मठ व मिशन के प्रथम अध्यक्ष थे। पूर्व नाम राखल चंद्र घोष था, जिन्हें रामकृष्ण 'मानस-पुत्र' मानते थे। उन्हें 'राजा महाराज' के रूप में जाना जाता है।3.स्वामी प्रेमानंद (बाबूराम घोष): ये भी रामकृष्ण के अति प्रिय और आध्यात्मिक रूप से उन्नत शिष्य थे। 4. स्वामी सारदानंद (शरद चंद्र चक्रवर्ती): 'श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग' के लेखक। 5. स्वामी शिवानंद (तारकनाथ घोष)-रामकृष्ण मिशन के दूसरे अध्यक्ष और श्री रामकृष्ण के प्रत्यक्ष संन्यासी शिष्य थे। उन्हें 'महापुरुष महाराज' के रूप में जाना जाता है। उनका जन्म पश्चिम बंगाल के बरसात में हुआ था। वे ब्रह्मज्ञानी थे और उन्होंने बेलूर मठ में रामकृष्ण मंदिर की नींव रखी थी। 6. स्वामी योगानंद ('योग आनन्द ' योगेंद्रनाथ राय चौधरी-का जन्म 30 मार्च 1861 (चैत्र कृष्ण तृतीया) को दक्षिणेश्वर के पास एक संपन्न परिवार में हुआ था।  वे रामकृष्ण मिशन के प्रथम उपाध्यक्ष थे।  इनके अतिरिक्त, स्वामी अद्भुतानंद (लाटू महाराज) को विवेकानंद ने "रामकृष्ण का सबसे बड़ा चमत्कार" कहा था। आत्म-मूल्यांकन तालिका (Self-assessment table) भरने का महत्व : 'दादा' ने एक बार मनःसंयोग के क्लास में बतलाया था कि विवेक-दर्शन के अभ्यास से वह विवेक-स्रोत (श्रेय-प्रेय विवेक-प्रयोग स्रोत) उद्घाटित हो जाता है- जो 'मनःसंयोग आदि चरित्र-निर्माण के 5 अभ्यास' के अनुसार आत्म-मूल्यांकन तालिका में चरित्र के 24 (आध्यात्मिक) गुणों के मानांक (Grade: श्रेणी या कोटि) में  निरंतर वृद्धि करते रहने के अभ्यास द्वारा पशु-मानव को (M/F देहाभिमानी घोरस्वार्थी बुद्धि को) सामान्य मनुष्य (50 % स्वार्थी जीवकोटि या सद्गृहस्थ बनने और बनाने) और जीवकोटि से उन्नत होते हुए क्रमशः (100 % पूर्ण निःस्वार्थी) ईश्वरकोटि का मनुष्य बनने और बनाने के लक्ष्य पर पहुँचने के लिए निरंतर अभ्यास करते रहने के प्रेरणा देती है। इसीलिए......

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श्री भगवानुवाच

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।

स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः।।6.1।।

BG 6.1: श्रीभगवान् ने कहा -- वे मनुष्य जो कर्मफल की कामना से रहित होकर अपने नियत कर्मों (prescribed duties) का पालन करते हैं, वे वास्तव में संन्यासी और योगी होते हैं, न कि वे जो अग्निहोत्र यज्ञ संपन्न नहीं करते या शारीरिक कर्म नहीं करते।

प्रथम अध्याय में अर्जुन का विचार युद्धभूमि से पलायन करके संन्यास जीवन व्यतीत करने का था। उसे यह नहीं ज्ञात था कि निस्वार्थ भाव से कर्म करने वाला कर्मयोगी पुरुष ही सबसे बड़ा संन्यासी है। 

स्वार्थ  का त्याग किये बिना  (देहाभिमान M/F बुद्धि जनित अहंकार या स्वार्थ का त्याग किये बिना) कर्म का आचरण अथवा उससे पलायन करने का अर्थ है विश्व के सामंजस्य में अनर्थकारी हस्तक्षेप करना।

मन (मूढ़बुद्धि-काचा आमि ) की अपरिपक्व स्थिति में जीवन संघर्ष से पलायन करके गंगा के किनारे शान्त वातावरण में ध्यानाभ्यास के लिए जाने से सामान्य स्तर के अच्छे मनुष्य का भी गंगा में पड़े पाषाण के स्तर तक पतन होगा। 

 इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के इस त्रुटिपूर्ण विचार की मानो हंसी उड़ाते हैं। परन्तु भगवान् के व्यंग्य में किसी प्रकार की कटुता नहीं है। हम आगे देखेंगे कि अर्जुन को स्वयं भी अपनी गलत धारणा पर हंसी आती है।

निदिध्यासन की सफलता के लिए आन्तरिक शक्तियों का विकास (3H की शक्तियों का विकास - भुजबल , बुद्धिबल और आत्मबल का विकास)  तथा उनका सही दिशा में उचित उपयोग करना अत्यन्त आवश्यक है। भगवान् ने इस अध्याय में हमारी बुद्धि के उद्देश्यों तथा मन की भावनाओं में  परिवर्तन लाने के लिए विशेष बल दिया है। कर्मफल-त्याग ही संन्यासी या योगी के लिए प्रथम साधन है।  इसके द्वारा हम आध्यात्मिक मार्ग में प्रवेश कर सकते हैं।

[योगा नहीं 'योग' शब्द का वास्तविक अर्थ है 'जुड़ना' अर्थात देहाभिमानी जड़बुद्धि को आत्मा (अन्तर्हित चेतन 'Inherent divinity' ईश्वर या भगवान) के साथ जोड़कर एकत्व (Oneness) की अनुभूति करना।]  

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।

न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन।।6.2।।

।।6.2।।  हे पाण्डव ! जिसको (शास्त्रवित्) संन्यास कहते हैं, उसी को तुम योग समझो; क्योंकि संकल्पों को न त्यागने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता।। (न हि असंन्यस्त सङ्कल्पः योगी भवति कश्चन।)  

'फल की आकांक्षा' या लौकिक कामना-वासना नहीं छोड़ने से कोई भी साधना सिद्ध नहीं होती। 

साधारणतः मनुष्य का मन संकल्प-विकल्प किये बिना नहीं रह सकता। वह निरंतर  भविष्य की सुन्दर-सुन्दर कल्पनाएँ करता रहता है। परन्तु अपनी योजनाओं को पूर्णतया कार्यान्वित करने के पूर्व ही मन की कभी न थकने वाली क्रियाशील कल्पना शक्ति हमें नये लक्ष्य का निर्देश करती है जो पूर्व निर्धारित लक्ष्य से सर्वथा भिन्न होता है।  हमारे अन्तकरण में जो सूक्ष्म शक्ति इस उन्मत्त स्वभाव को जन्म देती है वह है निरंकुश संकल्पशक्ति। जब तक हम इस विनाशकारी संकल्प-विकल्प द्विधा शक्ति को वश में करके विनष्ट नहीं कर देते, तब तक हम पूर्वनिर्धारित मनुष्य जीवन का भौतिक और आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते हैं। इसे समझने के लिए किसी व्याख्याकार की आवश्यकता नहीं हैं।  

यह कहकर कि कोई भी (कश्चन) शुद्ध बुद्धि मन के संकल्प-विकल्प को वशीभूत किये  बिना योगी (आत्मस्थ) नहीं बन सकती। भगवान् यह दर्शाते हैं कि मन के संकल्प-विकल्प शक्ति जुडी (उधेड़-बुन में लगी अविवेकी बुद्धि) को विनष्ट किये बिना इस विषय में किसी प्रकार का समझौता नहीं हो सकता।

फलनिरपेक्ष कर्मयोग का अनुष्ठान ध्यानयोग का बहिरंग साधन है। अत उसकी प्रशंसा करने के पश्चात् अब भगवान् यह बताते हैं कि किस प्रकार कर्मयोग ध्यान का साधन है 

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।

योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।।6.3।

।।6.3।। ज्ञान योग में उन्नत होने की इच्छा वाले मुनि के लिए निष्काम -कर्म  ही चित्तशुद्धि का उपाय होने का कारण है। वही ज्ञानी (बुद्धि) जब योगारूढ़  हो जाये  (आत्मस्थ हो जाये) तो उसके लिए कर्मनिवृत्ति या कर्म का त्याग ज्ञान का पूर्णता साधक है। 

'योग-आरुरुक्षो' वे साधक हैं जो भगवान में (इष्टदेव में) एकाकार होने की अभिलाषा करते हैं और इस योग रुपी सीढ़ी पर चढ़ना आरम्भ करते हैं।

'योग-आरुढस्य' वे साधक हैं जो इस योग रूपी सीढ़ी के सबसे ऊपर के पाये तक -(या छत तक)? पहुँच चुके होते हैं। 

निष्काम कर्म के फलस्वरूप चित्तशुद्धि होकर आत्मानुभूति और ब्राह्मी-स्थिति होती है। निष्काम कर्म चित्तशुद्धि का करणमात्र है। ब्राह्मीस्थिति में सुप्रतिष्ठित होने पर चित्तशुद्धि के कारण निष्काम कर्म का भी परित्याग हो जाता है। 

    श्रीरामकृष्ण देव ने कहा है, 'ज्ञान-काँटे से अज्ञान-काँटे को निकालना होता है , उसके बाद दोनों काँटे फेंक दिए जाते हैं। उसके अनन्तर ज्ञान और अज्ञान के परे पहुँचना होता है।

[ (14 सितंबर,1884) श्रीरामकृष्ण वचनामृत~ 90

श्रीरामकृष्ण - (सहास्य)- तुम ज्ञानी होकर भी अज्ञानी क्यों हो ? हाँ, मैं समझा, जहाँ ज्ञान है, वहीं अज्ञान है ! वशिष्ठ देव इतने ज्ञानी थे, परन्तु लड़कों के शोक से वे भी रोये थे । अतएव तुम ज्ञान और अज्ञान के पार हो जाओ । पैरों में अज्ञान का काँटा लग गया है, उसे निकालने के लिए ज्ञानरूपी काँटे की जरूरत है । निकल जाने पर दोनों काँटे फेंक देना चाहिए । "ज्ञानी कहते हैं, यह संसार धोखे की टट्टी  (माया -भ्रम framework of illusion) है; और जो ज्ञान और अज्ञान के पार चले गये हैं, वे कहते हैं, यह संसार  'आनन्द की हवेली -mansion of mirth' है ! वह देखता है, ईश्वर ही जीव-जगत् और चौबीसों सृष्टि-तत्त्व हुए हैं। अर्थात {आत्मा (ईश्वर, भगवान ब्रह्म, परमात्मा ) ही जीव-जगत् और चौबीसों सृष्टि-तत्त्व हुए हैं। जग जाने पर सोई हुई विवेकी बुद्धि देखती है -"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः" -मनुष्य की विशिष्ट पहचान है-विवेक!   

The thorn of ignorance has to be removed with the thorn of knowledge, after which both the thorns are thrown away. 'This is a state where there is no 'I' or 'ego' left.] 

 ध्यानयोग पर आरूढ़ होने के इच्छुक व्यक्ति के लिए प्रथम साधन कहा गया है कर्म। जगत् में कर्तृत्व के अभिमान और फलासक्ति का त्याग करके कर्म करने से पूर्व संचित वासनाओं का क्षय होता है और नई वासनाएं उत्पन्न नहीं होतीं

यहाँ योगारूढ़ होने के विषय को स्पष्ट करने के लिए अश्वारोहण (घोड़े की सवारी) के अत्यन्त उपयुक्त रूपक का प्रयोग किया गया है। प्रारम्भ में हम केवल कर्म करने वाले होते हैं अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित हुए हम परिश्रम करते हैं पसीना बहाते हैं रोते हैं हँसते हैं। जब व्यक्ति इस प्रकार के कर्मों से थक जाता है तब वह मनोरूप अश्व (निराकार मन) पर आरूढ़ होना चाहता है।

  ऐसे व्यक्ति को ही आरुरुक्ष (आरूढ़ होने की इच्छा वाला) कहते हैं। वह पुरुष कर्म तो पूर्व के समान ही करता है परन्तु अहंकार और स्वार्थ को त्यागकर। यज्ञ भावना से किये गये कर्म (Be and Make) वासनाओं को नष्ट करके चित्त को शुद्ध एवं सुसंगठित कर देते हैं। 

ऐसे शुद्ध चीत्त वृत्ति (या शुद्धबुद्धिवृत्ति )  वाले साधक को धीरे -धीरे कर्म से निवृत्त होकर ध्यान का अभ्यास अधिक करना चाहिए। जब वह मन (मोहित बुद्धि या मूढ़ बुद्धि) पर विजय प्राप्त करके उसकी चित्त-वृत्ति (बुद्धि की) प्रवृत्तियों को अपने वश में कर लेता है- आत्मोन्मुखी बना लेता है। तब वह योगारूढ़ कहा जाता है

मन के समत्व प्राप्त योगारूढ़ व्यक्ति (योगः चित्त-वृत्ति निरोधः) के लिए ज्ञानरूप शम   " शांति वह साधन है जिसके द्वारा वह अपने वास्तविक स्वरुप " मैं सत्यमात्र हूँ" पूर्णस्वरूप में स्थित (निराकार आत्मस्थ बुद्धि में प्रतिष्ठित) हो सकता है।

इस प्रकार एक ही व्यक्ति के लिए उसके (मूढ़बुद्धि के शुद्ध बुद्धि में) विकास की अवस्थाओं को देखते हुए कर्म और ध्यान की दो साधनाएँ बतायी गयी हैं, जो परस्पर विरोधी नहीं है । साधना की प्रथम अवस्था में निष्काम कर्मों (Be and Make)  का आचरण उपयुक्त है तथापि कुछ काल के पश्चात् वह भी मनुष्य की शांति को भंग करके कभी-कभी उसे मानो पृथ्वी पर पटक देता है।

  इस प्रकार साधना की प्रारम्भिक अवस्था में निष्काम कर्म समीचीन है परन्तु और अधिक विकसित हुए साधक को आवश्यक है आत्मचिन्तनरूप निदिध्यासनपहले अहंकार रहित कर्म साधन है और तत्पश्चात् आत्मस्वरूप (सत्यमात्र) का ध्यान। 

इस ध्यानाभ्यास की आवश्यकता तब तक होती है जब तक साधक निश्चयात्मक रूप से यह अनुभव न कर ले कि शुद्ध आत्मा ही पारमार्थिक सत्य वस्तु है न कि अहंकार। तत्पश्चात् वह कर्म करे अथवा न करे उसे इस ज्ञान की विस्मृति नहीं होती। 

इस प्रकार (बुद्धि की) आत्मोन्नति के मार्ग में कर्मों का एक निश्चित स्थान होना सिद्ध होता है और उसी प्रकार इसका उपदेश देने वाले मनीषियों की बुद्धिमत्ता भी प्रमाणित होती है।

इसलिए हम योग विज्ञान में कैसे उन्नत हो सकें, इसकी विवेचना श्रीकृष्ण अगले श्लोक में करेंगे।

[जब तक साधक की निश्चयात्मिका बुद्धि अर्थात् " मैं प्रभु श्रीरामकृष्ण, जगतजननी श्रीश्री माँ सारदा देवी, और युगनायक स्वामी विवेकानन्द का दास हूँ!" या अपने व्याहारिक पहचान (साकार M/F) 'युगनायक स्वामी विवेकानन्द- कैप्टन सेवियर परम्परा में' मैं श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय का छोटा भाई हूँ।]

[रावण को ज्ञानी बोलना, मोटे तौर पर, कामचलाऊ तौर पर तो ठीक है। पर ज्ञान का अनिवार्य लक्षण होता है कि वो अहंकार को काटता है। अहंकार क्या है? झूठी मान्यता का पुतला, “मैं ये हूँ, मैं वो हूँ, आई ऐम एक्स, आई ऐम वाय।” इसको ही तो ‘ईगो’ कहते हैं न। और झूठे ज्ञान को ही अज्ञान कहते हैं, तो अहंकार माने झूठा ज्ञान

ज्ञानी बस उसको बोल सकते हैं जिसने अपना झूठा ज्ञान काटा हो, जिसने अपना अज्ञान, यानि अहंकार काटा हो।

तो सिर्फ़ उसी को ज्ञानी बोल सकते हैं। ज्ञान रखकर भी जो अहंकार पकड़े बैठा हो, उसको ज्ञानी नहीं बोलते। उसने तो ज्ञान को सिर्फ़ सूचना की तरह रखा है और ज्ञान को अहंकार का खिलौना बना दिया है, खिलौना ही नहीं, अहंकार का पोषण बना दिया है। है न?

उसने ज्ञान को अविद्या की तरह लिया है, एक बाहरी सूचना। उसका इस्तेमाल सिर्फ़ वो किसलिए कर रहा है? ताकि जो मेरे उद्देश्य हैं, मेरी कामनाएँ हैं, मेरा हठ है, वो सब और मजबूत हो जाए। उसे ज्ञानी नहीं बोलते। अगर आप कहते हो कि ज्ञान है और उस ज्ञान के बावजूद आप अहंकार पकड़े बैठे हो, उल्टी-पुल्टी मान्यताएँ पकड़े बैठे हो, अपने आप को कुछ मान रहे हो, “मैं लंकेश हूँ।” ज्ञान होता तो अपने आप को कोई लंकेश थोड़ी बोलेगा ? अगर रावण को ज्ञान होता, तो अपने आप को अपने आप को कोई पुरुष (M/F शरीर) थोड़ी बोलेगा, कि स्त्री का अपहरण करेगा!

ज्ञान तो कहता है, “तुम इनमें से कुछ भी नहीं हो।” ज्ञान तो कहता है, “तत् त्वम् असि।” ज्ञान कहता है कि तुम 'सत्य' मात्र हो। ज्ञान होता रावण को तो वो अपने आप को और 'कुछ' क्यों मान रहा होता? वो तो अपने आप को बहुत कुछ मानता था न। “मैं असुरों का सम्राट हूँ, मैं स्वर्णनगरी लंका का अधिपति हूँ, मैं एक पुरुष हूँ और रानियाँ हैं, और मैं ला रहा हूँ, मैं सीता को भी ले आऊँगा और रानी बनाऊँगा।” वो तो अपने आप को बहुत कुछ मान रहा था। जो अपने आप को इतना कुछ मान रहा है, वो ज्ञानी कहाँ है?

‘ज्ञानी’ का अर्थ है, जो अपने आप से सीधे यह कह दे कि “मैं कुछ नहीं हूँ।” या फिर कह दे, “मैं सत्य मात्र हूँ।” रावण ने ऐसा तो कहा नहीं कि, मैं सत्यमात्र हूँ।” अर्थात “मैं निराकार सत्य मात्र हूँ।” या “मैं कुछ नहीं हूँ !” तो रावण ज्ञानी नहीं है। 

हाँ, रावण ने जरूर बहुत सारी सांसारिक सूचनाओं का संग्रह कर रखा है, बहुत तरह की सांसारिक कुशलताएँ (worldly skills) अर्जित कर रखी हैं। लेकिन कुशलताएँ (skills)  ले लेने से, या सांसारिक धन-दौलत इकट्ठा कर लेने से, या ज़मीन-जायदाद का मुकदमा जीत लेने से आप ज्ञानी नहीं हो जाते।

(साभार आचार्य प्रशांत: https://acharyaprashant.org/en/articles/kya-raavan-sach-mei-gyaani-tha-1_ab4d06db0] 

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मसु अनुषज्जते।

सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योग-आरूढ: तदा उच्यते।।।6.4।।

।।6.4।। जब (साधक) न इन्द्रियों के विषयों में और न कर्मों में आसक्त होता है तब सर्व संकल्पों  के संन्यासी को योगारूढ़ कहा जाता है।।

योगारूढ़ होने के लिए सब प्रकार की वासनाओं को -शुभ और अशुभ सभी को छोड़ना होगा। वासनाओं का लेशमात्र रहने से मन निर्विकल्प भूमि में उन्नत नहीं हो सकता। श्रीरामकृष्ण देव कहा करते थे -" सूत में जरा सा भी रेशा रहने से यह सूई के छेद में नहीं घुसता। उसी प्रकार मन में मामूली वासना रहने से भी वह ईश्वर के चरणकमलों के ध्यान में लवलीन नहीं हो सकता।"

  यम, नियम , आसन, प्रत्याहार आदि अष्टांग योग की सहायता से जब योगी मन को ब्रह्म में निमग्न कर देते हैं , तब समस्त कर्मों का त्याग अपने आप हो जाता है।      

स्वयं  की साधना अवस्था में मन के साथ संघर्ष चलने का अनुभव होने से एक साधक को आरुरुक्ष की स्थिति समझना कठिन नहीं है। उस अवस्था में साधक के लिए निष्काम कर्म ही साधन है। कर्मों का संन्यास तभी करना चाहिए जब मन  के ऊपर पूर्ण संयम प्राप्त हो गया हो। (अर्थात निश्चयात्मिका बुद्धि के आत्मस्थ हो चुकी हो। ) इसके पूर्व ही  कर्मों का त्यागना उतना ही हानिकारक होगा जितना कि योगारूढ़त्व की अवस्था (चित्त-वृत्ति निरोध की अवस्था) को प्राप्त होने पर कर्मों से मन को क्षुब्ध करना। उस अवस्था में तो साधन है शम। 

यदि मन (निश्चयात्मिकाबुद्धि) को आनन्दस्वरूप आत्मतत्त्व (निराकार सच्चिदानन्द) के ध्यान में लगाया जाय तो उस निर्विषय आनन्द का अनुभव कर लेने के उपरान्त वह स्वयं ही विषयों के क्षणिक सुखों की खोज में नहीं भटकेगा। जैसे किसी धनवान् व्यक्ति का हष्टपुष्ट पालतू कुत्ता स्थानस्थान पर रखे कूड़ेदानों में अन्न के कणों को नहीं खोजता।

स्पष्ट है कि ऐसे योगारूढ़ के लिए ध्यान की गति तीव्र करने के लिए शम की आवश्यकता होती है। योगारूढ़ पुरुष अनर्थ रूप संसार से अपना उद्धार कर लेता है। इसलिए

उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।6.5।।

।।6.5।। मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये और अपना अध: पतन नहीं करना चाहिये; क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र है और आत्मा (मनुष्य स्वयं) ही आत्मा का (अपना) शत्रु है।।

विवेकयुक्त मन के द्वारा जीवत्व-अभिमानी बुद्धि (देहाभिमानी M/F शरीर समझने वाली बुद्धि को उन्नत करें। बुद्धि के नीचे (इन्द्रिय,विषयों में) न उतरने दें। क्योंकि शुद्ध और पवित्र मन ही जीवत्वाभिमानी बुद्धि का उपकारक मित्र है अर्थात मुक्ति के सहायक हैं (आत्मस्थ होने में सहायक है) और विषयासक्त मन ही जीवात्मा का अपकारक शत्रु है।

'योगः चित्तवृत्ति निरोधः' पवित्र मन या शुद्ध बुद्धि को जब विषयों से खींचकर जब आत्मस्थ या आत्मनिष्ठ किया जायेगा तभी शुद्धबुद्धि स्वरुप में प्रतिष्ठित होगी। योगशास्त्र में लिखा है " तदा द्रष्टु: स्वरूपेऽवस्थानम् ।। 3 ।। " चित्त-वृत्तियों का निरोध हो जाने पर , अर्थात बुद्धि-वृत्तियों के शांत हो जाना पर दृष्टपुरुष साक्षी अपने स्वरुप में अवस्थित रहते हैं। इसी अज्ञान (अविद्या) के आवरण से आत्मा का उद्धार है।   

जिनका मन  विषयों में आसक्त है , उसका वह मन (मूढ़बुद्धि) ही बंधन का कारण है। मन या बुद्धि के शुद्ध होने पर श्रीभगवान का दर्शन लाभ होता है। पवित्र मन (शुद्धबुद्धि ) गुरु का काम करता है , मनुष्य को भगवान (सत्य या आत्मा) की और ले जाता है।  श्रीरामकृष्णदेव ने कहा है - " मन (बुद्धि) आसक्ति-रहित होने से ही भगवान का दर्शन होता है। पवत्र-मन या शुद्ध बुद्धि से जो वाक्य निकलता है वही उनकी वाणी है। शुद्ध मन और शुद्ध बुद्धि चेतन आत्मा के ही समान है। कयोंकि उनके अतिरिक्त और कोई शुद्ध पदार्थ नहीं है। ...उनका  दर्शन मिलने पर धर्म-अधर्म के परे जाया जा सकता है। "

" अन्त में मन (शुद्धबुद्धि) ही गुरु बनता है और गुरु का काम करता है, किन्तु वह मन शुद्ध , सत्त्व-गुणान्वित , पवित्र होकर ईश्वर की उच्च शक्ति को अभिव्यक्त करने का यंत्र स्वरूप होता है। मनुष्य-गुरु शिष्य के कान में मंत्र देते हैं और जगद्गुरु योग्य शिष्य के ह्रदय में मंत्र शक्ति संचारित करते हैं। गुरु इष्टदेवता में लयप्राप्त हो जाते है। गुरु , कृष्ण, वैष्णव तीनों एक हैं और एक में तीन हैं। 

वासनाओं से मुक्त वशीभूत मन जीव का परम मित्र है।  फिर वासनात्मक मन ही उसका भयंकर शत्रु है। शुद्ध बुद्धि (गुरु) ही जीवात्मा को आत्मोन्मुखी या ब्रह्माभिमुखी करता है और संसार-सागर से उसका उद्धार करता है। दूसरी ओर वासनात्मक मन जीव को नरक में गिराता है।

बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।

अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।।6.6।।

।।6.6।। जो देह-इन्द्रिय-मन विवेकयुक्त बुद्धि (शुद्ध बुद्धि) द्वारा वशीभूत है , वह विवेकी बुद्धि ही जीवात्मा का मित्र है , और यदि मन (मूढ़बुद्धि) को जीता नहीं गया शत्रु की तरह जीवात्मा को हर प्रकार से हानि पहुँचता है।     

जिस मात्रा में जीवात्मा जड़ शरीर (M/F आकार वान )  और (जड़ किन्तु निराकार ) मन और बुद्धि से तादात्म्य को त्यागता है उस मात्रा में वह आत्मा (चेतन ,सत्य , ईश्वर , भगवान ) के दिव्य प्रभाव से प्रभावित होता है। तब आत्मा उसका मित्र कहलाता है। वही मन जब बहिर्मुखी होकर विषयों मे आसक्त होता है तब मानों आत्मा उसका शत्रु होता है।  

निष्कर्ष यह निकला कि चैतन्य आत्मा समान रूप से विद्यमान रहता है परन्तु मन की अन्तर्मुखी अथवा बहिर्मुखी प्रवृत्तियों की दृष्टि से वह मनुष्य का मित्र अथवा शत्रु कहलाता है। 

और यदि आत्मा शब्द का अर्थ मन करें तो अर्थ होगा कि संयमित मन (शुद्धबुद्धि)  मनुष्य का मित्र है और स्वेच्छाचारी मन (मूढ़बुद्धि) उसका शत्रु । यह श्लोक पूर्व श्लोक के अर्थ को अधिक स्पष्ट करता है। 

योगरूढ़ मनुष्य के पूर्णत्व की स्थिति को अगले श्लोक में बताया गया है 

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।

शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः।।6.7।।

।।6.7।। शीत-उष्ण, सुख-दु:ख तथा मान-अपमान में जो प्रशान्त रहता है, ऐसे जितात्मा पुरुष के लिये परमात्मा (इष्टदेव) सम्यक् प्रकार से स्थित है, अर्थात्, आत्मरूप से विद्यमान है।

 जब योगारूढ़ शुद्ध बुद्धि (विवेक-युक्त बुद्धि) आत्मचिन्तन में स्थित हो जाती है, या आत्मस्थ हो जाती है, तब उस में वह क्षमता आ जाती है कि वह जीवन की सभी अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में ध्यानाभ्यास की निरन्तरता बनाये रख सकती है। यहाँ दूसरी पंक्ति में स्पष्ट दर्शाया है कि बाह्य जगत् में कोई ऐसा पर्याप्त कारण नहीं रह जाता जो उस शुद्धबुद्धि (विवेक-युक्त बुद्धि) को आत्म-ध्यान से विचलित कर सके

शीत-उष्ण, सुख-दुख तथा मान- अपमान इन तीन द्वन्द्वों के द्वारा भगवान् सभी संभाव्य विघ्नों को सूचित करते हैं जो मनुष्य के जीवन में आकर उसकी समता और शांति को भंग करने में समर्थ होते हैं। 

शीत-उष्ण इसका अनुभव स्थूल शरीर (आकार वान) के स्तर पर होता है। शीत या उष्ण में हमारे (निराकार) मन के विचारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। शीत-उष्ण इस द्वन्द्व के द्वारा वे सभी अनुभव बताये गये हैं जो शरीर को होते हैं जैसे रोग, युवावस्था, वृद्धावस्था आदि।

सुख-दुख मन के स्तर पर प्राप्त होने वाले सभी अनुभवों को सुखदुख रूप द्वन्द्व से दर्शाया गया है। स्पष्ट है कि इसका अनुभव मन को होता है शरीर को नहीं। 

मान-अपमान के कारण यदि किसी साधक को विक्षेप होता है तो उसके प्रति सहानुभूति दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं। मान-अपमान की कल्पना बुद्धि की होती है और फिर मनुष्य अपनी कल्पना के अनुसार प्राप्त परिस्थितियों में प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। 

शरीर मन और बुद्धि ये तीन उपाधियाँ हैं जिनके द्वारा उपर्युक्त द्वन्द्वरूप विघ्न आने की संभावनायें रहती हैं।

भगवान् कहते हैं कि प्रशान्त चित्त वाले जितेन्द्रिय पुरुष के लिये परमात्मा (इष्टदेव) सदा ही आत्मभाव से विद्यमान रहता है। इसलिए इन परिस्थितियों का उस पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता।

अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितयाँ हों अच्छा या बुरा वातावरण हो अथवा मूर्ख या बुद्धिमान का साथ हो आत्मज्ञानी पुरुष (विवेकयुक्त बुद्धि) सदा प्रशान्त और समभाव में स्थित रहती है।

ऐसे ज्ञानी पुरुष की क्या विशेषता है?  क्यों कोई पुरुष इस कठिन साधना का अभ्यास करे ?इसके उत्तर में भगवान् कहते हैं

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।

युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः।। 6.8।।

।।6.8।। जो योगी ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जो विकार रहित (कूटस्थ) और जितेन्द्रिय है, जिसको मिट्टी, पाषाण और कंचन समान है, वह (परमात्मा से) युक्त कहलाता है।।

शास्त्र और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के उपदेश से ज्ञात 'आत्मा' का जो निरन्तर ध्यान करता है सा आत्म-संयमी पुरुष शीघ्र ही दिव्य तृप्ति और आनन्द का अनुभव पाकर पूर्ण-योगी (100 % निःस्वार्थी) बन जाता है।  उसकी तृप्ति शास्त्रों के पाण्डित्य की नहीं वरन् दिव्य आत्मानुभूति की होती है जो शास्त्राध्ययन के सन्तोष से कहीं अधिक उत्कृष्ट होती है। (प्रश्न आत्मा तो निराकार है तो निराकार 'आत्मा' का निरन्तर ध्यान कैसे करता है? अतएव आत्मा का ध्यान करने के लिए शास्त्र का सिद्धान्त है जिसका जो 'इष्ट है' वही उसका आत्मा है।)

श्री शंकराचार्य के अनुसार -ज्ञान का अर्थ है शास्त्रोक्त पदार्थों (3H) का परिज्ञान और विज्ञान है -शास्त्र तथा गुरुदेव के उपदेश से ज्ञात तत्त्व 'आत्मा (इष्टदेव) की अनुभूति आत्मसाक्षात्कार या स्वानुभवकरण है। ज्ञान और विज्ञान के प्राप्त होने पर पुरुष का हृदय अलौकिक तृप्ति का अनुभव करता है।

[श्री शंकराचार्य के अनुसार - ' ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा ज्ञानं शास्त्रोक्तपदार्थानां परिज्ञानम् विज्ञानं' -अर्थात शास्त्रोक्त पदार्थों (3H) को समझने का नाम ज्ञान है और शास्त्र और गुरुदेव से समझे हुए भावों को वैसे ही अपने अन्तःकरण में प्रत्यक्ष अनुभव करने का नाम विज्ञान है।  ऐसे ज्ञान और विज्ञान से जिसका अन्तःकरण तृप्त है अर्थात् जिसके अन्तःकरण में (ह्रदय , शुद्धबुद्धि, विवेक-युक्त बुद्धि में) ऐसा विश्वास उत्पन्न हो गया है कि बस अब कुछ भी जानना बाकी नहीं है !  ऐसा जो ज्ञान-विज्ञान से तृप्त हुए अन्तःकरण वाला है; तथा जिसकी विवेकयुक्त बुद्धि कूटस्थ अर्थात अविचल और जितेन्द्रिय हो जाती है।  वह (स्वयं M/F समझने वाली मूढ़ बुद्धि नहीं) उस शुद्धबुद्धि को आत्मस्थ यानी  समाहित ( समाधिस्थ ) कही जाती है। वह योगी (विवेक-युक्त शुद्ध बुद्धि) मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण को समान समझने वाली होती है अर्थात् उसकी दृष्टि में मिट्टी, पत्थर और सोना सब समान हैं ( एक ब्रह्मरूप है! सत्यमात्र है!)

[हिन्दी विवेकानन्द साहित्य खंड-6, पेज- 135 , वर्ष 1898] 

" शिष्य -स्वामी जी, ज्ञानयोग और भक्तियोग का मेल किस प्रकार हो सकता है ? मैं देखता हूँ कि भक्तिमार्गी (भक्त)  लोग आचार्य श्री शंकर का नाम सुनते ही कानों में अँगुली दे देते हैं; और उधर ज्ञानयोगी (ज्ञानी) लोग भक्त लोगों को जब भगवान (आत्मा , ईश्वर या इष्टदेव) से विछोह के नाम पर आकुल क्रंदन करते या उल्लास से गाते , नाचते देखते हैं तो भक्तों को उन्मादी या धर्मान्ध (fanatics) कहते हैं ! 

स्वामीजी - बात क्या है जानता है ? यह सारा विवाद, गौण ज्ञान और गौण भक्ति लेकर ही होता है। अर्थात यह विवाद साधना के शुरुआती दौर में ही होता है। तुमने श्रीरामकृष्ण की नीतिकथा (parable) में कथित शिवजी के भूत और राम जी के बन्दरों की कहानी तो सुनी है न # [# शिव और राम में युद्ध हुआ था। उधर राम के गुरु हैं शिव और शिव के गुरु हैं राम ; अतः युद्ध के बाद दोनों में मेल भी हो गया। परन्तु शिव के चेले भूत-प्रेत तथा राम के चेले बन्दरों का आपस का झगड़ा-झंझट चलता ही रहा।]  

शिष्य - जी हाँ !

स्वामी जी - किन्तु मुख्य भक्ति और मुख्य ज्ञान में कोई अन्तर नहीं है। मुख्य भक्ति का अर्थ, भगवान (निराकार सत्य ,आत्मा,ईश्वर या इष्टदेव) की उपलब्धि प्रेम के रूप करना। (भगवान या आत्मा केवल शरीर समझने वाली अविद्या से राग-द्वेष होगा, प्रेम नहीं होगा।) यदि तू सर्वत्र सभी के भीतर (ह्रदय आत्मा में) भगवान की प्रेममूर्ति का दर्शन करता है तो फिर हिंसा -द्वेष किससे करेगा? (यदि तू सर्वत्र सभी के भीतर इष्टदेव की अर्थात ठाकुर, माँ और स्वामीजी की प्रेममूर्ति का दर्शन करता है-तो फिर हिंसा -द्वेष किससे करेगा? If you see the loving form of God manifest everywhere and in everything, how can you hate or injure others?), जरा भी वासना के रहते जिसे श्रीरामकृष्ण काम-कांचन (sense-pleasure and wealth) के प्रति आसक्ति कहते थे , वह प्रेमानुभूति (एकत्व की अनुभूति) प्राप्त नहीं हो सकती। सम्पूर्ण (निःस्वार्थ) प्रेमानुभूति देहबुद्धि तक नहीं रहती। और मुख्य ज्ञान का अर्थ है सर्वत्र एकत्व की अनुभूति , आत्मस्वरूप का सर्वत्र दर्शन , पर वह जरा सी भी अहंबुद्धि (Aham-consciousness of the ego). के रहते प्राप्त नहीं हो सकता।   [अर्थात जब तक हम देहाभिमानी हैं अपने को 'सत्यमात्र' न समझकर (आकार वाला M/F शरीर) समझते हैं तब तक राग-द्वेष होगा और निराकार सर्वगत आत्मा की अनुभूति होने पर मुख्य प्रेम होगा।] 

शिष्य - तो क्या आप जिसे प्रेम कहते हैं , वही परम ज्ञान है ? 

स्वामीजी - नहीं तो क्या ? पूर्ण प्रज्ञ न होने पर किसी को प्रेमानुभूति नहीं होती। (अर्थात विवेकी बुद्धि के आत्मनिष्ठ और समाधिस्त न होने पर किसीको प्रेमानुभूति नहीं होती।) देखता है न, वेदान्त शास्त्र में ब्रह्म को सच्चिदानन्द कहा है। उस सच्चिदानन्द शब्द का अर्थ है 'सत्' यानि अस्तित्व, 'चित्'-अर्थात चैतन्य या ज्ञान और आनन्द अर्थात प्रेम। [चित्त वृत्ति निरोध के बाद-स्वरुप का ज्ञान और आनन्द अर्थात प्रेम (निरकार से प्रेम)  होता है स्थूल-देह समझने से राग-द्वेष होता है।] भगवान के  'सत्' यानि अस्तित्व के विषय में भक्त और ज्ञानी में कोई विवाद नहीं है। परन्तु ज्ञानमार्गी ब्रह्म (आत्मा , ईश्वर या भगवान) की  'चित्'-अर्थात चैतन्य सत्ता (निराकार सत्य-मात्र) पर ही सदा अधिक जोर देते हैं, और भक्त सदा आत्मा (ईश्वर या इष्टदेव की) 'आनन्द' सत्ता पर दृष्टि रखते हैं। परन्तु 'चित्' स्वरुप की अनुभूति होने के साथ ही आत्मा (इष्टदेव) के आनंद-स्वरुप की उपलब्धि भी हो जाती है , क्योंकि जो चित् है, वही आनन्द है।"

Disciple: Swamiji, how can Jnâna and Bhakti be reconciled? We see the followers of the path of devotion (Bhaktas) close their ears at the name of Shankara, and again, the followers of the path of knowledge (Jnanis) call the Bhaktas fanatics, seeing them weep in torrents, or sing and dance in ecstasy, in the name of the Lord.

Swamiji: The thing is, all this conflict is in the preliminary (preparatory) stages of Jnana and Bhakti. Have you not heard Shri Ramakrishna's story about Shiva's demons and Râma's monkeys? (There was once a fight between Shiva and Rama. Shiva was the Guru of Rama, and Rama was the Guru of Shiva. They fought but became friendly again. But there was no end to the quarrels and wranglings between the demons of Shiva and the monkeys of Rama!)

Disciple: Yes, sir, I have.

Swamiji: But there is no difference between the supreme Bhakti and the supreme Jnana. The supreme Bhakti is to realise God as the form of Prema (love) itself. If you see the loving form of God manifest everywhere and in everything, how can you hate or injure others? That realisation of love can never come so long as there is the least desire in the heart, or what Shri Ramakrishna used to say, attachment for Kâma-Kânchana (sense-pleasure and wealth). In the perfect realisation of love, even the consciousness of one's own body does not exist. Also, the supreme Jnana is to realise the oneness everywhere, to see one's own self as the Self in everything. That too cannot come so long as there is the least consciousness of the ego (Aham).

Disciple: Then what you call love is the same as supreme knowledge?

Swamiji: Exactly so. Realisation of love comes to none unless one becomes a perfect Jnani. Does not the Vedanta say that Brahman is Sat-Chit-Ânanda— the absolute Existence-Knowledge-Bliss?

Disciple: Yes, sir.

Swamiji: The phrase Sat-Chit-Ananda means — Sat, i.e. existence, Chit, i.e. consciousness or knowledge, and Ananda, i.e. bliss which is the same as love. There is no controversy between the Bhakta and the Jnani regarding the Sat aspect of Brahman. Only, the Jnanis lay greater stress on His aspect of Chit or knowledge, while the Bhaktas keep the aspect of Ananda or love more in view. But no sooner is the essence of Chit realised than the essence of Ananda is also realised. Because what is Chit is verily the same as Ananda.

[~ Complete-Works / Volume 5 / Conversations and Dialogues/recorded by a disciple of Swamiji - Sharatchandra Chakravarty] 

 वेदान्त में आत्मा को कूटस्थ (अविचल) कहा गया है। कूट का अर्थ है निहाई। लुहार तप्त लौहखण्ड को निहाई पर रखकर हथौड़े से उस पर चोट करके लौहखण्ड को विभिन्न आकार देता है। हथौड़े की चोट का प्रभाव लौहखण्ड पर तो पड़ता है परन्तु निहाई पर नहीं। वह स्वयं अविचल रहते हुये लोहे को अनेक आकार देने के लिये आश्रय देती है। इस प्रकार कूटस्थ का अर्थ हुआ जो कूट के समान अविचल अविकारी रहता है।

ज्ञान-विज्ञान से सन्तुष्ट पुरुष कूटस्थ आत्मा को जानकर स्वयं भी सभी परिस्थितियों में कूटस्थ बनकर रहता है। वह समदर्शी बन जाता है। उसके लिए मिट्टी, पाषाण और सुवर्ण सब समान होते हैं अर्थात् वह इन सबके प्रति समान भाव से रहता है।  

जबकि सामान्य देहाभिमानी जन (जो स्वयं को सत्य नहीं केवल M/F शरीर समझते हैं वे )  इसमें राग-द्वेषादि रखकर प्रिय-अप्रिय की प्राप्ति या हानि में सुखी या दुखी होते हैं।  ज्ञान का मापदण्ड यही है कि इन वस्तुओं के प्राप्त होने पर पुरुष एक समान रहता है।

स्वप्नावस्था में कोई पुरुष कितना ही धन अर्जित करे अथवा सम्पत्ति को खो दे परन्तु जाग्रत अवस्था में आने पर स्वप्न में देखे हुये धन के लाभ या हानि का कोई अर्थ नहीं रह जाता

 इसी प्रकार उपाधियाँ के द्वारा अनुभूत जगत के परे परमपूर्ण स्वरूप में स्थित पुरुष के लिए मिट्टी पाषाण और स्वर्ण का कोई अर्थ नहीं रह जाता।  वे उसके आनन्द में न वृद्धि कर सकते हैं न क्षय। वह परमानन्द का एकमात्र स्वामी बन जाता है। 

स्वर्ग के कोषाधिपति कुबेर के लिए पृथ्वी का राज्य कोई बड़ी उपलब्धि नहीं कि वे हर्षोल्लास में झूम उठें।

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।

साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते।।6.9।।

।।6.9।। जो पुरुष सुहृद्, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेषी और बान्धवों में तथा धर्मात्माओं में और पापियों में भी समान भाव वाला है, वह श्रेष्ठ है।।

पूर्व श्लोक में ज्ञानी पुरुष की जड़ वस्तुओं की ओर अवलोकन करने की दृष्टि (बुद्धि या मति) का वर्णन किया गया है। परन्तु जगत् केवल जड़ वस्तुओं से ही नहीं बना है। उसमें चेतन प्राणी भी हैं। मानव मात्र के साथ ज्ञानी पुरुष किस भाव से रहेगा?

 क्या उन्हें मिथ्या कहकर उनके अस्तित्व का निषेध कर देगा?  क्या जगत् के अधिष्ठान स्वरूप परमात्मा में स्थित होकर वह लोगों की सेवा के प्रति उदासीन रहेगा ? इन प्रश्नों का उत्तर इस श्लोक में दिया गया है।

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा ज्ञानी पुरुष सभी मनुष्यों के साथ समान प्रेम भाव से रहता है चाहे वे सुहृद् हों या मित्र शत्रु उदासीन मध्यस्थ बन्धु साधु हों या पापी। अपनी विशाल सहृदयता में वह सबका आलिंगन करता है। प्रेम और आदरभाव से सबके साथ रहता है। उसकी दृष्टि में वे सभी समान महत्त्वपूर्ण हैं।

उसका प्रेम साधु और पापी उत्कृष्ट और निकृष्ट में भेद नहीं करता। वह जानता है कि आत्मस्वरूप के अज्ञान से ही पुरुष (मूढ़बुद्धि) पापकर्म में प्रवृत्त होता है और अपने ही कर्मों से दुख उठाता है। स्वामी रामतीर्थ इसे बड़ी सुन्दरता से व्यक्त करते हुये कहते हैं कि हम अपने पापों से दण्डित होते हैं न कि पापों के लिए

आत्मस्वरूप के अपरोक्ष अनुभव से वह यह पहचान लेता है कि एक ही आत्मा सर्वत्र व्याप्त है। अनेकता में एकता को वह जानता है औऱ विश्व के सामञ्जस्य को पहचानता है। सर्वत्र व्याप्त आत्मस्वरूप का अनुभव कर लेने पर वह किसके साथ प्रेम करेगा और किससे घृणा ? मनुष्य के शरीर के किसी भी अंग में पीड़ा होने पर सबकी ओर देखने का उसका भाव एक ही होता है क्योंकि सम्पूर्ण शरीर में ही वह स्वयं व्याप्त है। 

इस उत्तम फल को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को क्या करना चाहिये उत्तर है

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।

एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः।।6.10।।

।।6.10।।  शरीर और मन को संयमित किया हुआ योगी एकान्त स्थान पर अकेला रहता हुआ आशा और परिग्रह से मुक्त (एकाकी यत चित्त आत्मा निराशी: अपरिग्रहः।  सुखों का संग्रह करने की भावना से रहित।होकर निरन्तर मन को आत्मा में स्थिर करे।।

 ध्यानविधि (अर्थात वैराग्य पूर्वक प्रत्याहार और धारणा का अभ्यास करने की पद्धति)  की विस्तृत जानकारी यहाँ दी गयी है। ध्यान का अभ्यास एकांत में करने को कहा गया हैं। लेकिन कुछ समय पहले भारत में एकान्त शब्द पर इतना अधिक बल दिया गया कि ध्यान शब्द से ही लोगों के मन डर बैठ गया। 

 विवेक-युक्त बुद्धि से देखने पर वैराग्य के लिए एकान्त में जाने- या ठाकुर के शब्दों में निर्जन-वास का अर्थ जंगल या गुफा नहीं जाना है वरन् इन्द्रिय विषयों में आसक्ति को विष जैसा जानकर बाह्य विषयों से मन को विमुख करना है। अपने ही घर में शान्त समय में एक आसन में बैठकर ध्यान का अभ्यास किया जा सकता है। वास्तविक एकान्त तो तभी प्राप्त होगा जब मन की (मति, दृष्टि) या मन की मूढ़बुद्धि की विषयाभिमुखी प्रवृत्ति क्षीण होगी, और शुद्धबुद्धि आत्मनोन्मुखी हो जाएगी (या मति सा गति भवेत ?) मन इच्छाओं (कामनाओं के - कामिनी , कांचन और यश)  से परिपूर्ण होने पर निर्जन वन अथवा गुफा में जाने से भी मनुष्य की मूढ़ बुद्धि विषयों का ही चिन्तन करती रहेगी और उसे एकान्त की प्राप्ति नहीं होगी। 

'रहसि अर्थात् एकान्त में रहने ' इस शब्द के द्वारा यह सूचित करते हैं कि धर्म आत्म प्रचार का कोई साधन नहीं वरन् जीवन में उच्च मूल्यों को जीने का (चरित्र- के 24 गुणों को अभिव्यक्त करने , और 12 दोषों को दूर केने का) सतत् प्रयत्न है जिनका गोपन शैली में अभ्यास करना चाहिए।

 साधक को चाहिए कि वह पूरी लगन से मन में उठने वाले विचारों को सही दिशा प्रदान कर लक्ष्य की ओर अग्रसर होने का प्रयत्न करे। दैनिक जीवन में ध्यानाभ्यास की सफलता साधक के (वैराग्य) आत्मसंयम पर निर्भर करती है।  जब तक हम वस्तुओं (कामिनी-कांचन) की प्राप्ति की आशा तथा वस्तुओं का संग्रह (परिग्रह) करने की प्रवृत्ति से स्वयं को मुक्त करना नहीं सीखते तब तक वास्तविक अर्थ में आत्मसंयम संभव नहीं होता।

महाभारत में स्पष्ट कहा गया है कि श्रीकृष्ण सर्वज्ञ ईश्वरके  अवतार थे । वे यहाँ अर्जुन को आत्मोन्नति के साधन का उपदेश दे रहे हैं। अर्जुन उनका परम मित्र था। स्वयं भगवान् की मित्रता प्राप्त होने पर भी महाभारत में किसी भी स्थान पर यह नहीं कहा गया है कि अर्जुन को स्वयं संघर्ष किये बिना आत्मविकास की प्राप्ति के लिए भगवान् कोई गुप्त साधन (बकलमा देदो का अर्थ) भी  बतलायेंगे जिसका सम्पूर्ण उत्तरदायित्व श्रीकृष्ण के ऊपर होगा। इस श्लोक की प्रथम पंक्ति ही किसी ऐसी मिथ्या आशा को साधक के मन से दूर कर देती है। 

यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि योगी को निरन्तर मन (मूढ़ बुद्धि/मति या दृष्टि)  को आत्मा में स्थिर करने का प्रयत्न करना चाहिएध्यानाभ्यास के द्वारा (अर्थात प्रत्याहार -धारणा में मन को नहीं मूढ़ बुद्धि को विषयों से खींचकर आत्मा, ईश्वर या इष्टदेव में एकाग्र करने का अभ्यास के द्वारा) ही मनुष्य अपने दोषों से मुक्त होकर पूर्णत्व को प्राप्त हो सकता है।

 अतएव  साधक को निराशी अर्थात् झूठी आशाओं से रहित तथा अपरिग्रह होना चाहिए।उक्त गुणों से युक्त होकर जो साधक ध्यान का अभ्यास करता है वह जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सही दिशा में आगे बढ़ता है।

अब योगाभ्यास करने वाले साधक के लिए उपयोगी आसन आहार विहार आदि के नियम बताते हैं। सर्वप्रथम आसन का वर्णन करते हैं,  ऐसे उपयुक्त आसन पर बैठने के पश्चात् साधक को मन और बुद्धि से क्या करना चाहिए ? इसका उपदेश अगले श्लोक में किया गया है।

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।

नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्।।6.11।।

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।

उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये।।6.12।।

।।6.11।। शुद्ध भूमिपर, जिसपर क्रमशः कुश, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न अत्यन्त ऊँचा है और न अत्यन्त नीचा, ऐसे अपने आसनको स्थिरस्थापन करके।

।।6.12।। उस आसनपर बैठकर चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको वशमें रखते हुए मनको एकाग्र करके अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये योगका अभ्यास करे।

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।

संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्।।6.13।

।।6.13।। काया, शिर और ग्रीवाको सीधे अचल धारण करके तथा दिशाओंको न देखकर केवल अपनी नासिका के अग्रभाग को देखते हुए स्थिर होकर बैठे।

[शंकराचार्यजी ने अपरोक्षानुभूति ग्रंथ के 116 वें श्लोक में कहा है - 

दृष्टिं ज्ञानमयीं कृत्वा पश्येद ब्रह्ममयं जगत।  

   सा दृष्टिः परमोदारा न नासाग्रावलोकिनी।। 

ध्यान करते समय जो दृष्टि केवल नासाग्र के ऊपर ही टिकी रहती हो, उसे सर्वोत्कृष्ट-दृष्टि (विवेक-उक्त बुद्धि या मति) नहीं समझना चाहिये। 

बल्कि दृष्टिगोचर M/F शरीर या आकार और इन्द्रिय-विषयों से मूढ़बुद्धि को  गुरुदेव निर्देशित पद्धति के अनुसार खींचकर निर्गुण निराकार सर्वव्यापी आत्मा या ब्रह्म  की शक्ति के सगुण -साकार स्वरुप, अवतार -वरिष्ठ (इष्टदेव) को अपने ह्रदय में अष्टदल कमल पर साक्षात् -जीवन्त बैठे हुए देखकर, बाहरी आँखों को मूँदकर - 'तीसरी आँख या दृष्टि' को उनके नाम-रूप , लीला-धाम का चिंतन करते हुए एकाग्र रखना चाहिए। 

और ध्यान (अर्थात  समाधि) से लौटने के बाद, पुनः बाहरी ऑंखें खोल कर M/F शरीर न देखकर विवेकी बुद्धि (या मति ?) से 'सियाराम-हनुमान मय सब जानी' या  (श्रीरामकृष्ण , श्रीश्री माँ सारदा स्वामीजी (गुरु-कृष्ण -वैष्णव'- अर्थात गुरु-इष्टदेव और भक्त को एक देखते हुए ) यह समझना चाहिए की एक मेवाद्वितीय यह अविनाशी ब्रह्म ही - 'हाथी नारायण और महावत नारायण ' के रूप में आगे पीछे, दाहिने बांये और ऊपर नीचे सर्वत्र व्याप्त है । यह ब्रह्म ही सम्पूर्ण विश्व है । दृष्टि को ज्ञानमय करके संसार को ब्रह्ममय देखे यही दृष्टि, बुद्धि या मति अति उत्तम है।

क्योंकि (अष्टावक्र गीता 1.11) में कहा गया

मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि।

किवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत्॥१-११॥ 

स्वयं को मुक्त मानने वाली बुद्धि (विवेक-युक्त बुद्धि) मुक्त ही है और बद्ध मानने वाली बुद्धि (मूढ़बुद्धि) बंधी हुई है, यह कहावत सत्य ही है कि जैसी बुद्धि होती है वैसी ही गति होती है॥११॥

 "या मतिः सा गतिर्भवेत्" का अर्थ है- जैसी बुद्धि, सोच या दृष्टि होती है, वैसी ही गति (परिणाम/अवस्था) होती है। यह सूक्ति बताती है कि स्वयं को मुक्त मानने वाला मुक्त है और बंधा हुआ मानने वाला बद्ध है; अर्थात, हमारे विचार ही हमारी नियति निर्धारित करते हैं।  जैसी मति होती है, वैसी ही गति होती है।

यह नियम है कि जहाँ हमारी दृष्टि जाती है वहीं पर हमारा मन (बुद्धि) भी होता है । यही कारण है कि मूढ़बुद्धि की सम्मोहित अवस्था या भ्रमित अवस्था में मनुष्य की दृष्टि (विवेक-युक्त बुद्धि) आत्मनिष्ठ नहीं रहती , और विषयों में आसक्त रहने के कारण स्थिर नहीं रहती। मनुष्य के विचित्र सन्देहास्पद व्यवहार का लक्षण है और प्रमाण भी मन की चंचलता या दृष्टि की अस्थिरता ही (मूढ़ बुद्धि की अस्थिरता) है । आगे कहते हैं

प्रशान्त आत्मा, विगत भिः, ब्रह्मचारि-व्रते स्थितः। 

 मनः संयम्य मत्-चित्तः युक्तः आसीत मत्-परः।। 6.14।

।।6.14।। जिसका अन्तःकरण शान्त है, जो भय-रहित है और जो ब्रह्मचारि-व्रत में स्थित है, ऐसा सावधान योगी मन का संयम करके 'मुझमें चित्त लगाता हुआ', मेरा परायण होकर बैठे।

इस श्लोक में वर्णित तीनों गुणों से सम्पन्न साधक को ध्यान साधना में कठिनाई नहीं होती। प्रशान्ति, निर्भयता और ब्रह्मचर्य ये तीनों गुण क्रमशः बुद्धि , मन और शरीर को ध्यान के योग्य बनाते हैं इन तीनों गुणों प्रशान्ति, निर्भयता और ब्रह्मचर्य की नवशक्ति से सम्पन्न विवेकी बुद्धि क्षमतावान हो जाती है।

["जगत् के साहित्य में केवल उपनिषदों में 'अभिः' (भयशून्य) यह शब्द बार बार व्यवहृत हुआ है - और संसार के किसी शास्त्र में ईश्वर अथवा (विवेकी) मानव के प्रति 'अभिः' - 'भयशून्य' - यह विशेषण प्रयुक्त नहीं हुआ है। 'अभिः' - निर्भय बनो! -"#स्वामी विवेकानन्द

" पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन्‌ समूह। तेजो यत् ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १६॥ (ईशावास्य-उपनिषद) 

पदच्छेद (शब्दों का अर्थ): पूषन् (Fosterer-पोषक) : हे पालनहार ! एकर्षे हे एकमात्र द्रष्टा! (O sole Seer): हे ज्ञान के एकमात्र ऋषि (साक्षी या द्रष्टा)! हे नियंत्रक ! यम (O Ordainer), सूर्य: हे सूर्य! प्राजापत्य: हे प्रजापति के पुत्र! व्यूह रश्मीन् समूह तेजः: अपनी (चकाचौंध) किरणों को हटा लें, अपने तेज को समेट लें। यत् ते रूपं कल्याणतमं: जो आपका सबसे कल्याणकारी/सुंदर रूप है। तत् ते पश्यामि: वह मैं देखूँ। योऽसावसौ पुरुषः: जो वह (सूर्य मंडल में स्थित) पुरुष है। सोऽहमस्मि: वह मैं ही हूँ। 

हे पोषक, हे एकमात्र द्रष्टा, हे विधाता एवं नियन्ता, हे प्रकाशदाता सूर्य, हे प्रजापति की (प्राणियों एवं प्रजाओं के पिता की) शक्ति! अपनी किरणों को व्यूहबद्ध एवं व्यवस्थित कर, अपने प्रकाश को एकत्र एवं पुञ्जीभूत कर ले जो तेज तेरा सबसे अधिक कल्याणकारी रूप है, तेरा वही रूप मैं देखता हूं। वहां, वहां जो पुरुष है वही हूँ मैं।

O Fosterer, O sole Seer, O Ordainer, O illumining Sun, O power of the Father of creatures, marshal thy rays, draw together thy light; the Lustre which is thy most blessed form of all, that in Thee I behold. The Purusha there and there, He am I.

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मांतं शरीरम्‌। ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर ॥१७॥

वस्तुओं का प्राण, वायु, अमर जीवनतत्त्व है, परन्तु इस का अन्त है भस्म। ओ३म। हे दिव्य संकल्पशक्ति! स्मरण कर, जो किया था उसे स्मरण कर! हे दिव्य संकल्पशक्ति, स्मरण कर, किये हुए कर्म का स्मरण कर।

The Breath of things is an immortal Life, but of this body ashes are the end. OM! O Will, remember, that which was done remember! O Will, remember, that which was done remember.

अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्‌ विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्‌। युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम‍उक्तिं विधेम ॥१८॥

सब व्यक्त वस्तुओं के जानने वाले हे अग्निदेव! हमे सुपथ से, उत्तम मार्ग से आनन्द की ओर ले चल; पाप का कुटिलतापूर्ण आकर्षण हमसे हटा दे, दूर कर दे। तेरे प्रति अन्तर्नमन (समर्पण) की सर्वाङ्गपूर्ण वाणी (स्तोत्र) हम निवेदित करें।

O god Agni, knowing all things that are manifested, lead us by the good path to the felicity; remove from us the devious attraction of sin. To thee completest speech of submission we would dispose.]

आत्मा को अपने शुद्ध और दिव्य स्वरूप में व्यक्त होने के लिए प्रशान्त अन्तकरण (विवेकी बुद्धि) ही अत्यन्त उपयुक्त माध्यम है।  उपाधियों (परिवर्त्तनशील स्थूल शरीर और निराकार मन 2H) के साथ तादात्म्य करके अनादि काल से जीवभाव में (M/F शरीर) रहने से उसे विश्वास भी नहीं होता कि इन उपाधियों से परे किसी तत्त्व (3rd H-अपरिवर्तनीय सत्य या अविनाशी आत्मा) का  अस्तित्व भी हो सकता है

 यहाँ श्रीरामकृष्ण की नीतिकथा में उन मछली बेचने वाली स्त्रियों की कथा का स्मरण होता है जिन्हें किसी कारणवश फूलों की दुकान मेें एक रात व्यतीत करनी पड़ी। मछली की दुर्गन्ध की अभ्यस्त होने से वे फूलों की सुगन्ध के कारण तब तक नहीं सो पायीं जब तक कि मछली की टोकरियों को उन्होंने अपने सिरहाने नहीं रख लिया। उन्हीं मछुआरिनों की तरह हमलोग भी ससीम स्थूल शरीर की पहचान (आकार M/F शरीर से तादात्म्य को छोड़कर, या अविद्या-अस्मिता आदि) दुखदायी उपाधियों से दूर रहकर निराकार अनन्त आनन्द में प्रवेश करने से हम भयभीत हो जाते हैं। (अर्थात नाम-रूप छोड़कर बिन्दु से सिन्धु बनने के क्षणों में हम भयभीत हो जाते हैं)   इस भय के कारण आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग ही अवरूद्ध हो जाता है यदि सफलता (समाधि) प्राप्त भी होने लगे तो इसी मानसिक भय के कारण साधक उसकी उपेक्षा कर देगा। प्रशान्तचित्त होकर शास्त्राध्ययन के द्वारा निर्भय मन से नित्य ध्यान का अभ्यास करने पर भी यदि ब्रह्मचर्य व्रत में दृढ़ स्थिति न हो तो सफलता प्राप्त नहीं हो सकती। 

 ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल संभोग की वृत्ति का संयम ही नहीं वरन् समस्त इन्द्रियों की प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण होना ब्रह्मचर्य है। परन्तु  इन्द्रियों की प्रवृत्तियों पर यह संयम विवेक-युक्त बुद्धि की परिभाषा (ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या) पूर्वक होना चाहिए अविवेकी -बुद्धि की इच्छाओं का मूढ़ दमन नहीं। 

असंयमित मन (बुद्धि) विषयों की संवेदनाओं से विचलित और क्षुब्ध हो जाता है और अपनी सम्पूर्ण शक्ति को विनष्ट कर देता है। इन्द्रिय संयम के इस सामान्य अर्थ के अतिरिक्त भी ब्रह्मचर्य का विशेष प्रयोजन है। संस्कृत भाषा में ब्रह्मचारी का अर्थ है वह विवेक-युक्त शुद्ध बुद्धि जिसका स्वभाव ब्रह्म (आत्मा , इष्टदेव , अवतार-वरिष्ठ) में विचरण करने का हो। इस दृष्टि से ब्रह्मचर्य का अर्थ होगा अपने बुद्धि को निरन्तर आत्मचिंतन (ब्रह्मविचार) और निदिध्यासन में स्थिर करने का प्रयत्न करना। यही एकमात्र मुख्य उपाय है जिसके द्वारा हम बुद्धि की बहिर्मुखी प्रवृत्ति को आत्मोन्मुखी बनाकर शांत एवं संयमित कर सकते हैं।

मन का स्वभाव ही किसी न किसी इन्द्रिय विषय का चिन्तन करना है। जब तक मूढ़बुद्धि को विवेकी-बुद्धि में रूपान्तरित करके उसे विषयों से उत्कृष्ट लक्ष्य (प्रभु परमेश्वर-ठाकुर, माँ और स्वामीजी) में एकाग्र करने का वैराग्य पूर्वक अभ्यास नहीं कराया जाता तब तक उसकी विषयाभिमुखी प्रवृत्ति उनसे विमुख नहीं हो सकती। पूर्ण ब्रह्मचर्य की सफलता का रहस्य भी यही है।

 किसी योगी की ओर आश्चर्यचकित होकर देखने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हममें से प्रत्येक व्यक्ति उस योगी की सफलता को प्राप्त कर सकता है। उस सफलता के लिए बुद्धि को शास्त्र की परिभाषा के अनुसार विवेक-युक्त बनाकर आत्मनिष्ठ करने या आत्मसंयम की आवश्यकता है।  M/F शरीर का देहाभिमानी मूढ़बुद्धि को इन्द्रियों के विषयों के आकर्षण से स्वयं को बचाने के निश्चयात्मक उपायों का ज्ञान न होने से ही मनुष्य (बुद्धि) उनके प्रलोभन में फँस जाता है और लोभ संवरण नहीं कर पाता। 

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया यह निर्देश अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि साधक को मुझे (अवतार वरिष्ठ को) ही सर्वोच्च लक्ष्य समझकर ध्यान के लिए बैठना चाहिए। यह हम अपने अनुभव से जानते हैं कि जिस वस्तु को हम सर्वाधिक महत्त्व देते हैं उसकी प्राप्ति के लिए सर्व प्रथम प्रयत्न करते हैं। 

इसलिए जो विवेकी बुद्धि भगवान (अवतार वरिष्ठ या आत्मा) को ही सर्वोच्च लक्ष्य समझकर निरन्तर साधनारत रहती है, वह शीघ्र ही अपने अनन्त सनातन शान्त और आनन्द स्वरूप का साक्षात् अनुभव करता है।

युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः।

शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।।6.15।

।।6.15।। योगी पुरुष [विवेकी बुद्धि] इस प्रकार सदा अपने मन को आत्मा में (हृदय में विद्यमान ठाकुर,माँ , स्वामीजी में) स्थिर करने का प्रयास करता हुआ मेरी (भगवान की) स्वरूपता प्राप्ति रूपी परम निर्वाण (मोक्ष) की नित्य शान्ति स्वरूप शांति को प्राप्त होता है।।

सदा का अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि साधक को अपने परिवार एवं समाज के प्रति कर्तव्यों की उपेक्षा करने की सीख यहाँ दी गयी है। ऐसा करना समाज के प्रति अपराध होगा। सदा का तात्पर्य प्रतिदिन के ध्यान के अभ्यास के समय से है। पूरी लगन से ध्यान करने पर साधक पूर्ण शांति का अनुभव करता है।

यहाँ योगाभ्यास (मनःसंयोग) का फल बताया जाता है। योगी इस ढंग से मन को पूर्णतया संयत रखते हुए आत्मा में सदा संलग्न रहें तो उनका संसार-बंधन छिन्न हो जाता है। तथा मुक्ति, ब्रह्मस्वरूपता प्राप्ति (ईश्वर-प्राप्ति) रूप परम निर्वाण की शान्ति प्राप्त होती है। 

किन्तु अवस्था दो चार दिनों या दो चार सालों में नहीं होती। बहुत धैर्य पूर्वक लक्ष्य-प्राप्ति होने तक योगाभ्यास में लगे रहना चाहिए -नहीं तो सफलता प्राप्ति बहुत दूर की बात है। जन्म-जन्मान्तर भी व्यतीत हो सकते हैं। 

भगवान् के इस कथन से कि योगी मुझमें स्थित परम शांति को प्राप्त होता है, कुछ लोगों को  ऐसा प्रतीत हो सकता है कि यहाँ श्रीकृष्ण द्वैतवाद के मत का प्रतिपादन कर रहे हैंभगवान् श्रीकृष्ण तत्त्व (सच्चिदानन्द) का ज्ञान  कराने में भाषा की असमर्थता एवं सीमित योग्यता को जानते हैं।  इसलिए वे उक्त दोष का परिहार करने के लिए शांति को एक विशेषण देते हैं निर्वाण परमाम् अर्थात् मोक्ष स्वरूप शांति। 

तात्पर्य यह है कि जब योगी का मन इन्द्रिय विषयों से पूर्णतया निवृत्त होता है,  तब वह उस शांति का अनुभव करता है जो उसने बाह्य जगत् में कभी अनुभव नहीं की थी

 शीघ्र ही वह पुरुष (शुद्ध बुद्धि) परम सत्य स्वरूप के साथ एक हो जाती है जिसकी सुगंध पूर्वानुभूत शांति होती है। ध्यान के अन्तिम चरण में (समाधि में) योगी अपने शुद्ध स्वरूप का साक्षात् अनुभव तद्रूप होकर ही करता है। इसी अद्वैतानुभूति का वर्णन सम्पूर्ण गीता में किया गया है।

अब योगी के लिए आहारादि के नियम का वर्णन करते हैं- 

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।

न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जु न।।6.16।।

।।6.16।। परन्तु, हे अर्जुन ! यह योग उस पुरुष के लिए सम्भव नहीं होता, जो अधिक खाने वाला है या बिल्कुल न खाने वाला है तथा जो अधिक सोने वाला है या सदा जागने वाला है।।

 यहाँ खाने का अर्थ केवल मुख के द्वारा अन्न भक्षण ही नहीं वरन् सभी इन्द्रियों के द्वारा किये जाने वाले विषय ग्रहण है। इस शब्द में समाविष्ट हैं विषय ग्रहण मन की भावनाएँ और बुद्धि के विचार।

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।

युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।6.17।।

।।6.17।। युक्त स्वप्न-अवबोधस्य योगो भवति दुःखहा। उस पुरुष के लिए योग दु:खनाशक होता है, जो युक्त आहार और विहार करने वाला है, यथायोग्य चेष्टा करने वाला है और परिमित शयन और जागरण करने वाला है।। 

योग सिद्धि के लिए आहार , विहार , साधन , भजन, कर्म, निद्रा, जागरण आदि सभी परिमित और नियमित होना चाहिए। " सर्वं अत्यन्तं गर्हितम् " अर्थात किसी भी विषय की अति या अधिकता योग में बाधक है। 'योग' में प्रतिष्ठित रहने के लिए, जीवन के सभी कर्मों तथा सभी प्रयत्नों में समभाव या सन्तुलन रखना अपरिहार्य और अत्यन्त आवश्यक है। 

विवेकानन्द साहित्य की भूमिका में भगिनी निवेदिता लिखती हैं - " स्वामी विवेकानन्द ने अद्वैत दर्शन के श्रेष्ठत्व की घोषणा करते हुए कहा था - " द्वैत , विशिष्टाद्वैत और अद्वैत एक ही विकास के तीन सोपान या स्तर हैं, जिनमें अन्तिम अद्वैत ही लक्ष्य है। .....एक और अनेक यदि सचमुच एक ही सत्य हैं, तो केवल उपासना के विभिन्न ढंग ही नहीं, वरन सामान्य रूप से कर्म के भी सभी प्रकार, संघर्ष के सभी प्रकार, सर्जन के सभी प्रकार भी, सत्य-साक्षात्कार के मार्ग हैं। अतः लौकिक और धार्मिक में अब आगे कोई भेद नहीं रह जाता। कर्म करना ही उपासना करना है। विजय प्राप्त करना ही त्याग करना है। स्वयं जीवन ही धर्म है।  प्राप्त करना और और अपने अधिकार में रखना उतना ही कठोर न्यास है, जितना कि त्याग करना और विमुख होना। "  

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।

निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा।।6.18।।

।।6.18।। 'यदा चित्तम् आत्मनि एव अवतिष्ठते।' वश में किया हुआ चित्त (मन-वस्तु)  जिस काल में अपने स्वरुप में ही स्थित हो जाता है, और स्वयं सम्पूर्ण पदार्थों से नि:स्पृह हो जाता है, उस काल में वह योगी कहा जाता है।

जिस समय योगीपुरुष का चित्त इन्द्रिय विषयों से पूर्णतया उपरत हो जाता है, और आत्मा (इष्टदेव या भगवान) में ही निश्चल भाव से अवस्थित रहता है तभी वैसे पुरुष (पवित्र या विवेकी-बुद्धि) को योग-सिद्ध कहते हैं।  

इस श्लोक से लेकर अगले पाँच श्लोकों में 'योग' (अर्थात चित्त वृत्ति का निरोध) का फल पर विचार किया गया है तथा पूर्ण योगी का आत्मसाक्षात्कार के समय और तदुपरान्त जीवन में जीते हुये क्या अनुभव होता है इसे भी स्पष्ट किया गया है।

सम्पूर्ण गीता में श्रीकृष्ण ने 'युक्त ' शब्द का प्रयोग अनेक स्थानों पर किया है तथा साधक के युक्त बनने पर विशेष बल दिया है। तथापि इस शब्द की सम्पूर्ण परिभाषा अब तक नहीं बतायी गई यद्यपि यत्रतत्र उसका संकेत अवश्य किया गया है। विचाराधीन श्लोक में हमें युक्त शब्द की विस्तृत परिभाषा मिलती है।

पूर्णतया संयमित किया हुआ मन (शुद्धबुद्धि या विवेकयुक्त-बुद्धि) आत्मा में ही स्थित होता है। इस कथन पर विचार करने से इसका सत्यत्व स्वयं ही स्पष्ट हो जायेगा। असंयमित मन (मूढ़बुद्धि) का लक्षण है इन्द्रिय विषयों में सुख की खोज करना।

जैसा कि पहले बताया जा चुका है मन की इस बहिर्मुखी प्रवृत्ति को अवरुद्ध (अन्तर्मुखी) करने का सर्वोत्तम उपाय उसके प्रकाशक चैतन्यस्वरूप आत्मा का अनुसंधान # करना है। उस ध्यान का स्थिति में स्वाभाविक ही विषयों से परावृत्त हुआ मन आत्मस्वरूप में स्थिर होकर रहेगा।

{मन की इस बहिर्मुखी प्रवृत्ति को अन्तर्मुखी करने का सर्वोत्तम उपाय उसके प्रकाशक  चैतन्यस्वरूप आत्मा का अनुसंधान करना है। #आत्मानुसंधान करना अर्थात श्रीरामकृष्ण -स्वामी विवेकानन्द वेदान्त शिक्षक-प्रशिक्षण परम्परा -'Be and Make' में स्वयं चरित्रवान मनुष्य बनने और दूस्र्रों को चरित्रवान मनुष्य बनने में सहायता करते हुए आत्मा का अनुसन्धान करना। और अपने इष्टदेव "ठाकुर, माँ , स्वामीजी" के सच्चे अनुयायी  के अनुरूप 'सर्वेभवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया की' की कामना करना।} 

उपर्युक्त विवेचन की पुष्टि श्लोक की दूसरी पंक्ति में होती है जिसमें मन के स्थिरीकरण का उपाय बताया गया है सब कामनाओं से निस्पृहता।

दुर्भाग्य से अनेक व्याख्याकारों ने कामनाओं के त्याग पर अत्याधिक बल देकर उसे हिन्दू धर्म का प्रमुख गुण घोषित किया है। कामना (Desire) और विषयों की स्पृहा (तृष्णा-craving) में धरती-आकाश का अन्तर है। कामना या इच्छा का होना अनुचित नहीं है और न ही वह स्वयं हमें किसी प्रकार का दुख पहुँचा सकती है। किन्तु इच्छापूर्ति के प्रति हमारे मन में जो अत्याधिक लालसा या तृष्णा होती है वही जीवन में हमारे कष्टों का कारण होती है। 

उदाहरणार्थ धनार्जन की इच्छा अनुचित नहीं क्योंकि वह मनुष्य को कर्म करने लक्ष्य को प्राप्त करने और उसे सुरक्षित रखने में प्रोत्साहित करती है। परन्तु यदि वह पुरुष धनार्जन की उस इच्छा के वशीभूत होकर आसक्ति के कारण उन्माद के रोगी के समान व्यवहार करने लगे तो वह अपने लक्ष्य को पाने में असमर्थ हो जायेगा। उसकी असफलता का कारण है स्पृहा। अतएव गीता हमें केवल विषयों की स्पृहा त्यागने का उपदेश देती है। 

इन्द्रिय-विषयों की उपयोगिता का विवेकपूर्ण मूल्यांकन करने से मन (बुद्धि) विषयों से परावृत्त होकर आत्मा (इष्टदेव) के आश्रित हो जाती है। परिच्छिन्न विषय मन को क्षुब्ध करते हैं। जबकि अनन्त स्वरूप आत्मा उसे आनन्द से परिपूर्ण कर देता है। मन (शुद्ध या विवेकी -बुद्धि) का विषयों से निवृत्त होकर आत्मा  (गुरुदेव -इष्टदेव) में स्थिर होना ही युक्तता का लक्षण है। उक्त लक्षण सम्पन्न व्यक्ति ही युक्त कहलाता है। 

ऐसे योगी के समाहित चित्त का वर्णन वे इस प्रकार करते हैं- 

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।

योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः।।6.19।।

।।6.19।। जैसे स्पन्दन-रहित वायु के स्थान में स्थित दीपक की लौ चेष्टारहित हो जाती है, योग का अभ्यास करते हुए यतचित्तवाले योगी के चित्त की वैसी ही उपमा कही गयी है।।

इस श्लोक में ब्रह्मज्ञान के लाभ या फल के बारे बताया गया है। जिनकी शुद्धबुद्धि या विवेकी बुद्धि ज्ञानदायिनी माँ सारदा और स्वामी विवेकानन्द की कृपा से समाधि में जाकर एक क्षण के लिए भी आत्मा में प्रतिष्ठित हो चुकी है; और शरीर में लौटने के बाद जब तक शरीर है , तब तक ब्रह्मज्ञानी  को भी माँ के राज्य में ही रहना होता और प्रारब्ध को धैर्य पूर्वक भोग कर क्षय  करते समय भी ठाकुर देव की शिक्षा -तीन स, श, ष (सहो -सहो -सहो) का स्मरण करते हुए जो मुक्ताभिमानी हैं, वह जीवित अवस्था में ही मुक्त हैं। ऐसी ही मनुष्य को जीवन्मुक्त कहा जाता है। 

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।

योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः।।6.19।।

।।6.19।। जैसे स्पन्दनरहित वायु के स्थानमें स्थित दीपककी लौ चेष्टारहित हो जाती है, योग का अभ्यास करते हुए यतचित्तवाले योगी के चित्त की वैसी ही उपमा कही गयी है।।

इस श्लोक में श्रीकृष्ण दीपक की ज्योति की उपमा देते हैं। वायु वाले स्थान पर जिसकी ज्योति स्वाभाविक रूप से झिलमिलाहट करती है और जिसे स्थिर रखना असंभव होता है। जबकि वायु रहित स्थान में यह चित्र की भाँति स्थिर रहती है। इसी प्रकार से मन भी स्वाभाविक रूप से चंचल होता है और इसे वश में करना कठिन होता है। किन्तु जब किसी योगी का मन (पवित्रबुद्धि)  - आत्मा का ध्यान (इष्टदेव -भगवान का ध्यान) में लीन होकर उसमें एकाग्र हो जाती है तब वह कामनाओं की आँधी से बचने का आश्रय पा लेता है। ऐसा योगी भक्ति की शक्ति द्वारा मन को स्थिर एवं नियंत्रित करता है।

योगाभ्यास या आत्मध्यान से इस एकाग्रता को प्राप्त करने के पश्चात् प्रगति के क्या सोपान होंगे ?अगले चार श्लोकों में इसका वर्णन किया गया है

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।

यत्र चैवात्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति।।6.20।।

।।6.20।। योगका सेवन करनेसे जिस अवस्थामें निरुध्द चित्त उपराम हो जाता है तथा जिस अवस्थामें स्वयं अपने-आपमें अपने-आपको देखता हुआ अपने-आपमें सन्तुष्ट हो जाता है।। 

सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।

वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः।।6.21।।

।।6.21।। जो सुख आत्यन्तिक, अतीन्द्रिय और बुध्दिग्राह्म है, उस सुखका जिस अवस्थामें अनुभव करता है और जिस सुखमें स्थित हुआ यह ध्यानयोगी फिर कभी तत्वसे विचलित नहीं होता है।।

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।

यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते।।6.22।।

।।6.22।। जिस लाभकी प्राप्ति होनेपर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ उसके माननेमें भी नहीं आता और जिसमें स्थित होनेपर वह बड़े भारी दु:ख से भी विचलित 

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।

स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा।।6.23।।

।।6.23।। दु:ख के संयोग से वियोग है, उसीको 'योग' नामसे जानना चाहिये । (वह योग जिस ध्यानयोग लक्ष्य है,) उस ध्यानयो का अभ्यास न उकताये हुए चित्त से निश्चयपूर्वक करना चाहिये।।

 इन चार श्लोकों में योग की स्थिति का सम्पूर्ण वर्णन करते हुये भगवान् सब का आह्वान करते हैं कि इस योग का अभ्यास निश्चयपूर्वक करना चाहिये। इस मार्ग पर चलने के लिये सबको उत्साहित करने के लिए भगवान् योगी को प्राप्त सर्वोत्तम लक्ष्य का भी वर्णन करते हैं।

 पूर्व उपदिष्ट साधनों के अभ्यास के फलस्वरूप जब चित्त पूर्णतया शान्त हो जाता है तब उस शान्त चित्त में आत्मा का साक्षात् अनुभव होता है स्वयं से भिन्न किसी विषय के रूप में नहीं वरन् अपने आत्मस्वरूप से।

मन की अपने ही शुद्ध चैतन्य स्वरूप की अनुभूति की यह स्थिति परम आनन्द स्वरूप है। परन्तु यह साक्षात्कार तभी संभव है जब जीव शरीर, इन्द्रिय मन और बुद्धि इन परिच्छेदक उपाधियों के साथ के अपने तादात्म्य को पूर्णतया त्याग देता है। 'सुखम्-आत्यन्तिकम्- यत्- तत्- बुद्धिग्राह्मम्-अतीन्द्रियम् ' इस सुख को अतीन्द्रिय कहने से स्पष्ट है कि विषयोपभोग के सुख के समान यह सुख नहीं है। सामान्यतः हमारे सभी अनुभव इन्द्रियों के द्वारा ही होते हैं। इसलिए जब आचार्यगण आत्मसाक्षात्कार को आनन्द की स्थिति के रूप में वर्णन करते हैं तब हम उसे बाह्य और स्वयं से भिन्न कोई लक्ष्य समझते हैं। परन्तु जब उसे अतीन्द्रिय कहा जाता है तो साधकों को उस इन्द्रियातीत सत्य (आत्मा) के अस्तित्व और सत्यत्व के प्रति शंका होती है कि कहीं यह मिथ्या आश्वासन तो नहीं ?

इस शंका का निवारण करने लिए इस श्लोक में भगवान्स्पष्ट करते हैं कि यह आत्मानन्द  केवल-बुद्धिग्राह्मम् (मूढ़बुद्धि या सम्मोहित बुद्धि नहीं) अर्थात केवल 'शुद्ध बुद्धि' के द्वारा ही ग्रहण करने योग्य है। यहाँ एक शंका मन में उठ सकती है कि लगभग अति-मानवीय प्रयत्न करने के पश्चात् इस अनन्त आनन्द का जो अनुभव होगा कहीं वह क्षणिक तो नहीं होगा ?  जिसके लुप्त हो जाने पर उसकी प्राप्ति के लिए पुनः उतना ही कड़ा परिश्रम तो नहीं करना पड़ेगा ? भगवान् का स्पष्ट कथन है कि जिसमें स्थित होने पर योगी तत्त्व से कभी दूर नहीं होता। यह शाश्वत सुख है जिसे प्राप्त कर लेने पर साधक पुनः दुःखरूप संसार को प्राप्त नहीं होता। क्या उस योगी को सामान्य जनों को अनुभव होने वाले दुख कभी नहीं होंगे ? क्या उसमें संसारी मनुष्यों के समान अधिक-से- अधिक वस्तुओं को संग्रह करने की इच्छा नहीं होगी ? क्या वह लोगों से प्रेम करने के साथ उनसे उसकी अपेक्षा नहीं रखेगा ? इस प्रकार की उत्तेजनाएं केवल अज्ञानी (अविद्या ग्रस्त) पुरुष के लिए ही कष्टप्रद हो सकती हैं ज्ञानी के लिए नहीं। 

    यहाँ बाइसवें श्लोक में उस परमसत्य को उद्घाटित करते हैं जिसे प्राप्त कर लेने पर योगी इससे अधिक अन्य कोई भी लाभ नहीं मानता है। इतने अधिक स्पष्टीकरण के पश्चात् भी केवल बौद्धिक स्तर पर वेदान्त को समझने का प्रयत्न करने वाले लोगों के मन में शंका आ सकती है कि क्या इस आनन्द के अनुभव को जीवन की तनाव दुख कष्ट और शोक-पूर्ण परिस्थितियों में भी निश्चल रखा जा सकता है ? दूसरे शब्दों में , क्या धर्म धनवान् और समर्थ लोगों के लिए के लिए केवल मनोरंजन और विलास दुर्बल एवं असहाय लोगों के लिए अन्ध-विश्वास जन्य सन्तोष और पलायनवादियों के लिए काल्पनिक स्वर्गमात्र नहीं है ? क्या जीवन में आनेवाली कठिन परिस्थितियों में जैसे प्रिय का वियोग, हानि, रुग्णता , दरिद्रता, भुखमरी, आदि में धर्म के द्वारा आश्वासित पूर्णत्व अविचलित रह सकता है ? लोगों के मन में उठने वाली इस शंका का असंदिग्ध उत्तर देते हुए यहाँ स्पष्ट कहते हैं कि जिसमें स्थित हो जाने पर पर्वताकार दुखों से भी वह योगी विचलित नहीं होता (Q :समाधि वापस M/F शरीर में लौटने के बाद भी, जब तक प्रारब्ध क्षय नहीं होता -क्या वह योगी विचलित नहीं होता ?)

     उपर्युक्त विवेचन का संक्षेप में सार यह है -  योगाभ्यास से मन के एकाग्र होने पर योगी को अपने उस परम आनन्दस्वरूप की अनुभूति होती है जो अतीन्द्रिय तथा केवल शुद्ध बुद्धि के द्वारा ग्राह्य हैउस अनुभव में फिर बुद्धि भी लीन हो जाती है इस स्थिति में न संसार में पुनरागमन होता है न इससे श्रेष्ठतर कोई अन्य लाभ ही है। इसमें स्थित पुरुष गुरुतम दुखों से भी विचलित नहीं होता।

गीता में इस अद्भुत सत्य का आत्मस्वरूप से निर्देश किया गया है और जो सभी विवेक-सम्पन्न बुद्धि के साधकों का परम लक्ष्य है। इस आत्मा को जानना चाहिए। आत्मज्ञान तथा आत्मानुभूति के साधन को गीता में योग कहा गया है और इस अध्याय में योग की बहुत सुन्दर परिभाषा दी गई है

गीता की प्रस्तावना में हम देख चुकें है कि किस प्रकार गीता में महाभारत के सन्दर्भ में उपनिषद् प्रतिपादित सिद्धांतों का पुनर्विचार किया गया है। योग के विषय में व्याप्त इस मिथ्या धारणा का कि यह कोई अद्भुत साधना है;  जिसका अभ्यास करना सामान्य जनों के लिए अति कठिन है गीता में पूर्णतया परिहार कर दिया गया है। 

आत्मविकास (3H विकास) के साधन के रूप में जो योग कुछ विरले लोगों के लिए ही उपलब्ध था उसका गीता में (मनःसंयोग पद्धति में)  मानो सार्वजनिक उद्यान में रूपान्तरण कर दिया गया है। जिसमें कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से प्रवेश करके यथायोग्य लाभान्वित हो सकता है। इस दृष्टि से गीता को हिन्दुओं के पुनर्जागरण का क्रान्तिकारी ग्रन्थ कहना उचित ही है। 

योग को परिभाषित करते हुए भगवान् कहते हैं- दुःख के संयोग से वियोग की स्थिति योग है। योग की यह पुर्नव्याख्या इस प्रकार विरोधाभास की भाषा में गुंथी हुई है कि प्रत्येक पाठक का ध्यान सहसा उसकी ओर आकर्षित होता है।  और वह उस पर विचार करने के लिए बाध्य सा हो सकता है।  योग शब्द का अर्थ है संबंध अज्ञान दशा में मनुष्य (मूढ़बुद्धि या सम्मोहित बुद्धि) का संबंध केवल अनित्य परिच्छिन्न विषयों के साथ ही होने के कारण उसे जीवन में सदैव अनित्य सुख ही मिलते हैं। इन विषयों का अनुभव शरीर (M/F देहाभिमान), इन्द्रिय , मन और बुद्धि के द्वारा होता है।  एक सुख का अन्त ही दुःख का प्रारम्भ है। इसलिए उपाधियों के साथ तादात्म्य किया हुआ जीवन दुख-संयुक्त होगा।

स्पष्ट है कि योग विधि में हमारा प्रयत्न यह होगा कि इन उपाधियों से अपना (मूढ़बुद्धि का)  तादात्म्य त्याग दें अर्थात् उनसे (विवेकी बुद्धि का) ध्यान दूर कर लें। जब तक इनका उपयोग हम करते रहेंगे तब तक जगत् से हमारा सम्पूर्ण अथवा आंशिक वियोग नहीं होगा। अत शरीर मन और बुद्धि से वियुक्त होकर आत्मा को उसके शुद्ध स्वरूप में अनुभव करना ही दुखसंयोगवियोग योग है।

विषयों में आसक्ति से ही मन का अस्तित्व बना रहता है। किसी एक वस्तु से वियुक्त करने के लिए उसे अन्य श्रेष्ठतर वस्तु का आलम्बन देना पड़ता है। अत पारमार्थिक सत्य के आनन्द में स्थित होने का आलम्बन देने से ही दुखसंयोग से वियोग हो सकता है। परन्तु इसके लिए प्रारम्भ में मन को प्रयत्नपूर्वक बाह्य विषयों से हटाकर आत्मा (इष्टदेव या भगवान) में स्थिर करना होगा। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस योग का अभ्यास उत्साहपूर्ण और निश्चयात्मक बुद्धि से करना चाहिए। निश्चय और उत्साह ही योग की सफलता के लिए आवश्यक गुण हैं, क्योंकि मिथ्या से वियोग और सत्य से संयोग ही योग है

यदि अग्नि की उष्णता असह्य लग रही हो तो हमें केवल इतना ही करना होगा कि उससे दूर हटकर किसी शीतल स्थान पर पहुँच जायें। इसी प्रकार परिच्छिन्नता का जीवन (देहाभिमानी जीवन) यदि दुखदायक है तो उससे मुक्ति पाने के लिए शुद्धबुद्धि को आनन्दस्वरूप आत्मा (इष्टदेव) में स्थित होने की आवश्यकता है। यही है दुखसंयोगवियोग योग

कभी-कभी बाहर से देखने पर प्रतीत होता कि ऐसे सिद्ध संत भी अस्वस्थता, विरोधी लोगों और कष्टदायी परिवेश के रूप में संकटों का सामना कर रहे हैं। किन्तु आंतरिक दृष्टि से वे दिव्य चेतना में लीन रहते हैं और निरन्तर भगवान के दिव्य सुख का आस्वादन करते रहते हैं। इस प्रकार बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ भी ऐसे संतों को विचलित नहीं कर सकतीं। 

   आत्मा (इष्टदेव-ठाकुर,माँ स्वामीजी) के साथ संबंध स्थापित कर ऐसे संत (की शुद्धबुद्धि) शारीरिक चेतना से ऊपर उठ जाते हैं। और इसलिए वे शारीरिक कष्टों से होने वाली क्षति से प्रभावित नहीं होते।  तदनुसार हमने पुराणों में यह सुना है कि प्रह्लाद को कैसे-कैसे गड्ढे में डाला गया, हथियारों से यातना दी गयी, अग्नि में बिठाया गया, पहाड़ से गिराया गया आदि। किन्तु कोई भी विपत्ति प्रह्लाद को (की शुद्धबुद्धि) आत्मा (इष्टदेव भगवान) की भक्ति से विलग नहीं कर पायी

योग के संदर्भ में कुछ अवान्तर विषय (ancillary topics) का वर्णन करने के पश्चात पुन अभ्यास विधि का वर्णन (अष्टांग या मनःसंयोग की पद्धति का वर्णन) करते हुए भगवान् कहते हैं- 

सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषत: |

मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्तत: || 24||

शनै: शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया |

आत्मसंस्थं मन: कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् || 25||

BG 6.24-25: संसार संबंधित सभी इच्छाओं का पूर्ण रूप से त्याग कर हमें मन द्वारा इन्द्रियों पर सभी ओर से अंकुश लगाना चाहिए, फिर धीरे-धीरे निश्चयात्मक बुद्धि  केवल आत्मा (इष्टदेव भगवान) में स्थिर हो जाएगा और भगवान के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहेगी ।

पूर्व श्लोकों के अनुसार योग का लक्ष्य है शुद्धबुद्धि का अपने स्वस्वरूप में, आत्मा (इष्टदेव) में स्थित हो जाना। यह स्थिति परम आनन्दस्वरूप बतायी गयी है। विचाराधीन दो श्लोकों में मनःसंयोग की पद्धति (ध्यान की सूक्ष्म कला) का वर्णन किया गया है। 

 यहाँ विशेष रूप से कहा गया है कि सब कामनाओं का (3K में आसक्ति का) निशेष त्याग करना आवश्यक है। इससे आत्मानुभूति की स्थिति के स्वरूप के सम्बन्ध में किसी भी साधक के मन में कोई शंका नहीं रह जानी चाहिए। ऐसी कामनाओं को त्यागना है जो विषयों में सुख होने के संकल्प से उत्पन्न होकर मन में असंख्य विक्षेपों को जन्म देती हैं। जब कोई मनुष्य (सर्वमङ्गल मांगल्ये प्रार्थना की शक्ति से) इन संकल्पजनित इच्छाओं को त्यागने में सफल हो जाता है तो उसकी शुद्धबुद्धि में वह सार्मथ्य और दृढ़ता आ जाती है कि वह (देह-मन, इन्द्रियों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर सकती है।

 सर्वप्रथम इन्द्रिय रूपी उन्मत्त अश्वों को वश में कर लें तो फिर उन्हें सब विषयों से परावृत्त करने में सरलता होती है। यह एक अनुभूत सत्य है कि मन (मूढ़बुद्धि) स्वनिर्मित विक्षेपों के कारण दुर्बल होकर इन्द्रियों को अपने वश में नहीं रख पाती। कामना-त्याग (3K में आसक्ति त्याग) से उसमें यह क्षमता आ जाती है।

 उसका उपाय बताते हुए भगवान् कहते हैं सर्वप्रथम सूक्ष्म इन्द्रियों को , उससे सूक्ष्म मन के द्वारा संयमित करे और तत्पश्चात् उससे भी सूक्ष्मतर विवेकवती बुद्धि को को आत्मा (इष्टदेव) में लीन करे। मनुष्य अपने सजग पुरुषार्थ के द्वारा इस स्थिति तक पहुँच सकता है जो ध्यानयोग का अन्तिम सोपान है। सभी साधकों के द्वारा अभ्यसनीय इस योग का उपदेश देते हुये भगवान् उन्हें सावधान करते हैं कि योग की उपर्युक्त चरम स्थिति तक पहुँचने के पश्चात् किसी अन्य विषय का चिन्तन नहीं करना चाहिये। इस शांत क्षणको पाने के उपरान्त साधक को और कोई कर्तव्य और प्राप्तव्य शेष नहीं रह जाता। उसको इतना ही ध्यान रखना होता है कि, प्रारब्ध भोगने के बाद पुनः  किसी नवीन वृत्तिप्रवाह का प्रारम्भ न हो और मन की शान्ति सुदृढ़ रहे। 

द्वार खटखटाओ और तुम अन्दर प्रवेश करोगे यह भगवान् का आश्वासन है। विश्व के किसी भी धर्मग्रन्थ में केवल दो श्लोकों में ध्यानयोग की विधि से सम्बन्धित निर्देशों का इतना विस्तृत विवरण नहीं मिलता। स्वयं गीता में भी किसी अन्य स्थान पर ऐसा वर्णन नहीं किया गया है। इस दृष्टि से ये दो सारगर्भित श्लोक अतुलनीय और अनुपम हैं।

योगाभ्यास में प्रवृत्त जिन साधकों का मन चंचल औरअस्थिर होता है उनके लिए अगले श्लोक में उपाय बताते हैं

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।

ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्।।6.26।।

।।6.26।। यह चंचल और अस्थिर मन जिन कारणों से (विषयों में) विचरण करता है, उनसे संयमित करके उसे आत्मा के ही वश में लावे अर्थात् आत्मा में स्थिर करे।।

यद्यपि ध्यान के समय साधक अपनी इन्द्रियों को वश में कर लेता है तथापि मन पूर्व अनुभवों की स्मृति (प्रारब्ध ?) से विचलित होकर पुन विषयों का चिन्तन प्रारंभ करने लगता है ये क्षण एक सच्चे साधक के लिए घोर निराशा के क्षण होते हैं। मन का यह भटकाव अनेक कारणों से हो सकता है जैसे भूतकाल की स्मृतियां किसी आकर्षक वस्तु (M/F देह) का सामीप्य किसी व्यक्ति विशेष से राग या द्वेष और यहाँ तक कि आध्यात्मिक विकास के लिए अधीरता भी। 

भगवान् का उपदेश हैं कि मन के विचरण का चाहे कुछ भी कारण हो साधक को कभी निराश और अधीर होने की आवश्यकता नहीं है। उसको यह समझना चाहिए कि अस्थिरता तो मन का स्वभाव ही है और ध्यान का प्रयोजन ही मन के इस विचरण को शांत करना है।साधक को उपदेश दिया गया है कि जब-जब यह मूढ़बुद्धि ध्येय को छोड़कर विषयों की ओर जाय तब-तब उसे वहाँ से हटाकर करके पवित्रता  शुद्धबुद्धि या विवेकी बुद्धि को ध्येय आत्मा (ब्रह्म ,भगवान , ठाकुर,माँ , स्वामीजी) में स्थिर करे।

 दृढ़ इच्छा शक्ति के द्वारा कुछ सीमा तक मूढ़बुद्धि को विषयों से निवृत्त किया जा सकता है परन्तु वह पुनः उनकी ही ओर जाएगी। साधकगण यह अक्सर यह भूल जाते हैं कि चित्त-वृत्तिप्रवाह ही मन है।  और इसलिए चित्त-वृत्तिशून्य होने पर मन रहेगा ही नहीं। अतः मूढ़बुद्धि को  विषयों से निवृत्त करने के पश्चात् साधक को यह आवश्यक है कि उस शुद्ध पवित्र, विवेकवती बुद्धि को आत्मानुसंधान में प्रवृत्त करे।  भगवान् इसी बात को इस प्रकार कहते हैं कि मन को पुनः आत्मा के ही वश में लावे

अगले कुछ श्लोकों में योगी पर इस योग का क्या प्रभाव होता है उसे बताया गया है

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।

उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतम अकल्मषम्।।6.27।।

।।6.27।। जिसका मन प्रशान्त है, जो पापरहित (अकल्मषम्) है और जिसका रजोगुण (विक्षेप) शांत हुआ है, ऐसे ब्रह्मरूप हुए इस योगी को उत्तम सुख प्राप्त होता है।।

मन को शांत आनन्दस्वरूप आत्मा में स्थिर करने के प्रयत्न में जब पूर्वसंचित वासनाएं (प्रारब्ध) क्षीण पड़ जाती हैं। उस  वासनारहित मन को ही निष्पाप (अकल्मष) कहते हैं।

वेदान्त में मन की अशुद्धि को कहते हैं मल। आत्मतत्त्व का अज्ञानऔर उससे उत्पन्न मन के विक्षेप संयुक्त रूप से मल कहलाते हैं। अज्ञान ,आवरण (अविद्या -आवरण- अस्मिता -राग-द्वेष -अभिनिवेश ) तमोगुण का कार्य है।  जबकि तज्जनित विक्षेप रजोगुण का। यह विक्षेप ही मनुष्य के विवेकी बुद्धि को दुखमय संसार में पतन करवा देती है। 

भगवान् के इन शब्दों में इसका स्पष्ट निर्देश मिलता है (क) शांतरजस और (ख) अकल्मष।तमोगुण और रजोगुण के प्रभाव से मुक्त योगी (शुद्धबुद्धि) को आत्मज्ञानी ही मानना पड़ेगा।

 जब तक विक्षेप है तब तक मन का अस्तित्व है और उसके साथ मूढ़बुद्धि के तादात्म्य से जीवभाव उत्पन्न होता है। (अर्थात M/F शरीर आकार में आकर्षण उत्पन्न होता है।)  अर्थात् वह साधक जो ध्यानाभ्यास में प्रवृत्त होता है ध्यानविधि के अनुसार मन के साथ के तादात्म्य की निवृत्ति होने पर जीव अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को पहचान लेता है। ब्रह्मभूत शब्द से अद्वैत सत्य की स्पष्ट घोषणा यहाँ की गयी है जिसके अर्थानुसार योगी (शुद्धबुद्धि) स्वयं आत्मा (इष्ट, ब्रह्म, भगवान श्रीरामकृष्णदेव) स्वरूप ही जाता है।

अब भगवान् यह बताते हैं कि आत्मसाक्षात्कार (ईश्वरलाभ)  के पश्चात् ज्ञानी पुरुष (पापरहित पवित्रबुद्धि)  का सम्पूर्ण जीवन किस प्रकार उस अऩुभव से युक्त होता है -

युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः।

सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।।6.28।।

।।6.28।। इस प्रकार मन को सदा आत्मा में स्थिर करने का योग करने वाला पापरहित योगी (शुद्ध बुद्धि) सुखपूर्वक ब्रह्मसंस्पर्श का परम सुख प्राप्त करता है।।

 जब साधक योगाभ्यास से मन को शान्त रखता है तब मानो ध्यान की उष्णता में मन का (मूढ़बुद्धि का) शुद्धीकरण वैसे ही होता है, जैसे अग्नि की उष्णता में किसी लौहखण्ड का। 

जैसा पहले बताया जा चुका है मनुष्य अपने पुरुषार्थ से मन को (मूढ़बुद्धि को ) विषयों से परावृत्त करके शुद्धबुद्धि को आत्मा में स्थिर कर सकता है। 

इसी प्रकार ध्यान की चरम स्थिति में मन नष्ट होता है तब अहंकार गिर जाता है और वह शुद्धबुद्धि परमात्मा के साथ एकीभाव को प्राप्त हो जाता है ; और तब उसे पवित्र बुद्धि को ब्रह्मसंस्पर्श  के परम सुख की अनुभूति होती है। आत्मानुभव और ब्रह्मसंस्पर्श पर्यायवाची शब्द ही समझने चाहिये।अब अगले श्लोक में योग के फल एकत्वदर्शन का वर्णन किया गया है

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।

ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः।।6.29।।

।।6.29।। योगयुक्त अन्त:करण वाला और सर्वत्र समदर्शी योगी आत्मा (इष्टदेव) को सब भूतों में और भूतमात्र को आत्मा (इष्टदेव) में देखता है।।

वह पुरुष (विवेक-सम्पन्न बुद्धि - शुद्धबुद्धि या आत्मा) जिसने कि सम्पूर्ण भूतों में विराजमान एक ही आत्मतत्त्व  के दर्शन किये हों आत्मज्ञानी कहा जायेगा। अपने हृदय में स्थित चैतन्य आत्मा (इष्टदेव)  ही सर्वत्र सभी नाम- रूपों में स्थित है। और यही चैतन्य सम्पूर्ण दृश्यमान जगत् का अधिष्ठान है।  अत हृदयस्थ चैतन्य आत्मा (इष्टदेव) के अनुभव का अर्थ ही सर्वत्र व्याप्त नित्य तत्व को अनुभव करना है।

हिन्दू धर्म में ऐसा कोई आत्मानुभवी महापुरुष नहीं है, जिसने किसी मनुष्य को (साधक को अपने स्वार्थ के लिए) पापी या पापपुत्र जैसे अशोभनीय सम्बोधन द्वारा सम्बोधित किया हो। स्वामी विवेकानंद , के समान हिन्दू महात्मा पुरुष ने सभी प्रकार के मनुष्यों को हे अमृत के पुत्रों ! के अतिरिक्त किसी अन्य शब्द से संबोधित नहीं किया

 "अहं ब्रह्मास्मि और तत्वमसि " का अनुभव ही पूर्णत्व का द्योतक है जिसे ऋषियों ने सदैव अपना लक्ष्य बनाया है। इसी अनुभव को इस श्लोक में अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से दर्शाया गया है। गीता के प्राय सभी अध्यायों में इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है कि नाम-रूपमय यह सृष्टि सत्य की अभिव्यक्ति है, अथवा यह सृष्टि उस परम् -सत्य पर अध्यस्त (कल्पित) है। इस दृष्टि से, (इस शुद्धबुद्धि या मति से) सम्पूर्ण नाम-रूपों का अधिष्ठान यह देशकालातीत आत्मतत्व (इष्टदेव) ही है।  जैसे  समस्त मिट्टी के बने पात्रों में मिट्टी,समस्त आभूषणों में सुवर्ण , समस्त तरंगों में जल, वैसे ही आत्मा समस्त नामरूपों में अधिष्ठान के रूप में स्थित है।

हम अपने शरीर मन और बुद्धि के द्वारा क्रमश भौतिक पदार्थ दूसरों की भावनाएँ और विचारों को देख और समझ पाते हैं। जिसने इन उपाधियों से परे आत्मा का साक्षात्कार कर लिया वह पुरुष उस आध्यात्मिक दृष्टि से जब जगत् को देखता है तब उसे सर्वत्र व्याप्त आत्मा का ही अनुभव होता है। वह योगी स्वयं आत्मस्वरूप बन जाता है। मिट्टी की दृष्टि से घट नहीं है, और न सुवर्ण की दृष्टि से आभूषण। उसी प्रकार आत्मदृष्टि से आत्मा ही विद्यमान है और उससे भिन्न कोई वस्तु नहीं है।इस ज्ञान को समझने से श्लोक का अर्थ स्पष्ट हो जाता है।

जिसने अनेकता में एक सत्य का दर्शन कर लिया वही आत्मज्ञानी पुरुष (श्रीमद्भगवद्गीता 5.18) के अनुसार सर्वत्र समदृष्टि से ब्राह्मण, गाय, हाथी, श्वान और चाण्डाल को देख सकता है। अगले श्लोक में इस आत्मैकत्व दर्शन का फल बताते हैं

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।

तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।।6.30।।

।।6.30।। जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझ में देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता।।

इस प्रकार एकात्मदर्शी के लिए समस्त प्राणियों की आत्मा (इष्टदेव) के रूप मेरी उपासना ही मुक्ति (मोक्ष-जीवनमुक्ति) के लिए मुख्य उपाय है। वे सदा सर्वत्र मेरा दर्शन करते हैं और मैं भी प्रत्यक्षीभूत होकर कृपादृष्टि से उनपर अनुग्रह करता हूँ। एकात्मबोध में प्रतिष्ठित हो जाने पर परमात्मा के साथ कभी विच्छेद नहीं होता , एकरस अनुभव होता है। यह भी एक प्रकार की ब्राह्मी स्थिति है। 

पहले (29 में) यह कहा गया था कि ब्रह्मसंस्पर्श से योगी अत्यन्त सुख प्राप्त करता है। ब्रह्मसंस्पर्श से तात्पर्य आत्मा और ब्रह्म (इष्टदेव) के एकत्व से है जो उपनिषदों का प्रतिपाद्य विषय है। उसी  ज्ञान को स्वयं भगवान् ही यहाँ स्पष्ट दर्शा रहे हैं। आत्मज्ञानी पुरुष सर्वत्र आत्मा का अनुभव करता है

    "जो मुझे सबमें और सब को मुझमें देखता है" - अन्य स्थानों के समान ही यहाँ प्रयुक्त "मैं" शब्द का अर्थ आत्मा है न कि देवकीपुत्र कृष्ण । इस व्याख्या के प्रकाश में जो पुरुष पूर्व श्लोक के साथ इस श्लोक को पढ़ेगा उसे प्रसिद्ध ईशावास्योपनिषद्/ केनोपनिष्द की इस घोषणा का गूढ़ अर्थ स्पष्ट हो जायेगा । भगवान स्वयं कह रहे हैं -वह मुझसे वियुक्त नहीं होता --निष्काम कर्म द्वारा चित्तशुद्धि होने के बाद बुद्धि से अतीत  आत्मा का अनुभव उससे भिन्न रहकर नहीं होता वरन् जीव पाता है कि उस अवस्था में वह स्वयं आत्मस्वरूप (शिवोऽहम्) है। फिर देखता है - ब्रह्मैव इदं सर्वं ! आत्मैव इदं सर्वं !  

    स्वप्नद्रष्टा पुरुष जागने पर स्वयं जाग्रत् पुरुष बन जाता है ; वह जाग्रत् पुरुष को उससे भिन्न रहकर कभी नहीं जान सकता

और न मैं उससे वियुक्त होता हूँ द्वैतवादी लोग अपने जीवभाव और देहात्मभाव (M/F) शरीर में आकर्षण  की दृढ़ता के कारण इस अद्वैत स्वरूप को स्वीकार नहीं कर पाते । जिस स्पष्टता से यहाँ जीव के दिव्य स्वरूप की घोषणा की गयी है उसे और अधिक स्पष्ट नहीं किया जा सकता।

भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ किसी भी प्रकार से इस तथ्य को गूढ़ और गोपन नहीं रखना चाहते कि अनात्म उपाधियों से तादात्म्य को त्यागने पर योगी स्वयं परमात्मस्वरूप बन जाता है। हो सकता है कि किन्हीं- किन्हीं लोगों के लिए यह सत्य चौंका देने वाला हो तथापि है तो वह सत्य ही। 

जिन्हें इसे स्वीकार करने में संकोच होता हो वे अपने जीव भाव को ही दृढ़ बनाये रख सकते हैं।  परन्तु भारत में गुरुओं की परम्परा ने तथा विश्व के अन्य अनुभवी सन्तों ने इसी सत्य की पुष्टि की है कि एक व्यक्ति के हृदय में स्थित आत्मा ही सर्वत्र नामरूपों में स्थित है

वर्तमान दशा में हम अपने आप से ही दूर हो चुके हैं अहंकार एक राजद्रोही है जिसने आत्मसाम्राज्य से स्वयं का निष्कासन कर लिया है।  आत्मप्राप्ति होने पर अहंकार उसमें पूर्णतया विलीन हो जाता है। स्वप्नद्रष्टा के जागने पर वह जाग्रत् पुरुष से भिन्न नहीं रह सकता।

भगवान् यहाँ कहते हैं कि साधक और मैं एक दूसरे से कभी वियुक्त नहीं होते। वास्तव में यदि हम यह समझ लेते हैं कि आत्मविस्मृति के कारण परमात्मा ही जीवभाव को प्राप्त सा हुआ है।  तो यह भी स्पष्ट हो जायेगा कि आत्मज्ञान के द्वारा जीव पुन परमात्मस्वरूप को प्राप्त हो सकता है।  जैसे एक अभिनेता रंगमंच पर भिक्षुक का अभिनय करते हुए भी वास्तव में भिक्षुक नहीं बन जाता और नाटक की समाप्ति पर भिक्षुक के वेष को त्यागकर पुन स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।  वैसे ही आत्मज्ञान के विषय में भी जीव का ब्रह्मरूप होना है। वेदान्त की यह साहसिक घोषणा समझनी कठिन नहीं है परन्तु सामान्य अज्ञानी जन इससे स्तब्ध होकर रह जाते हैं।  और अपने दोषों (भूलों ) के कारण इस सत्य को स्वीकार नहीं कर पातेअभी उनमें इतना साहस और विश्वास नहीं कि वे दिव्य जीवन जीने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले सकें।  इस श्लोक में भगवान् का कथन परमार्थ/इन्द्रियातीत सत्य (आत्मा) के स्वरूप के संबंध में उपनिषदों के निष्कर्ष के विषय में रंचमात्र भी सन्देह नहीं रहने देता।

नवनीदा के जैसा या उनके पितामह के जैसा पारखी -बहुत कम लोग होते हैं जो योग्य पात्र को उसके योग्य जिम्मेवारी सौंप सके।

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न 

चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।

भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः 

प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति।।५।।

 "केनोपनिषद् - द्वितीयः खण्डः"

यह मन्त्र जीवन में ब्रह्मज्ञान की आवश्यकता एवं उसके परिणाम को अत्यन्त स्पष्ट और तेजस्वी शब्दों में प्रकट करता है। यह कहता है कि यदि इस देह-जीवन में ही ब्रह्म को जान लिया, तभी जीवन धनी है, तभी सत्य है। यदि इसे यहाँ न जान पाए तो महान हानि है, स्वयं के सत्य स्वरूप का विनाश है। अर्थात् यह मानव जन्म केवल भोग के लिए नहीं; परम सत्य की प्राप्ति का अद्वितीय अवसर है। यदि यह अवसर चूक गया तो जीवन उद्देश्यहीन व्यर्थ हो गया।

भगवत्पाद आदि शंकराचार्य कहते हैं कि ब्रह्मज्ञान यहीं इसी जीवन में सम्भव है। अगले जन्म की प्रतीक्षा अविद्या की प्रवृत्ति है। जो आत्मा को न पहचाने - वह अज्ञान के अन्धकार में भटकता है, चाहे कितना ही बड़ा संसार-सफल क्यों न हो। आदि शंकराचार्य स्पष्ट रूप में कहते हैं कि “अविद्या का विनाश न हुआ, यही महती विनष्टि है।” जो संसार में ही उलझा रहे, उसका यह दुर्लभ मानव शरीर भी व्यर्थ और निष्फल हो जाता है।

“भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः”

धीर - अर्थात् विवेकयुक्त, सत्यनिष्ठ साधक। जो जगत के प्रत्येक प्राणी और पदार्थ में एक ही ब्रह्म-चैतन्य को पहचान लेता है। वह दृश्यमान नाम-रूप से परे; उस एकत्व आत्मतत्त्व को जान लेता है। उसी को कहा गया है कि “धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति” यह ज्ञानी शरीर-त्याग के बाद अमरत्व को प्राप्त होते हैं। वास्तव में मृत्य उसका क्या बिगाड़ेगी, जिसने अमर स्वरूप को पहचान लिया?

उपनिषद् का शाश्वत निर्णय :  

  यहीं इसी देह में आत्मज्ञान अनिवार्य है। जीवन का सत्य आत्मा का साक्षात्कार है। मनुष्य बनकर यदि यह न किया तो जीवन की सबसे बड़ी हानि हुई। आत्मा को इसी जीवन में जानो यही सत्य है, यही अमृत है

“If one realizes Brahman here, in this very life truly blessed is he. If not realized here, great is the loss indeed. The wise, recognizing the Self in all beings, become immortal even while departing from this world.”

This mantra is a ringing call to spiritual urgency. Human birth rare and sacred is not meant for mere survival, pleasure, or achievement. It is given for Self-realization, the discovery of the Infinite within.

Immortality must be attained here in this embodied existence. Postponement is spiritual ruin. To miss Brahman now is not simply failure. it is the greatest loss imaginable: not of wealth, not of status, not even of life but the loss of the very Truth of existence, one’s own eternal nature.

Adi Śhaṅkarācārya therefore affirms: Freedom from ignorance must happen while living not after death. Mokṣa is not a distant reward. It is the lifting of the veil right now.

“Seeing the Self in all beings” —The Vision of the Wise The dhīra the steadfast and discerning seeker: perceives one Consciousness as the essence of all life, sees no separation between self and other, transcends birth and death before leaving the body. Then, when such a sage “passes on,” it is not a movement into the unknown but a serene transition from the seen to the Seer, from the mortal shell to the immortal Self. Death becomes powerless before the one who has realized the Deathless within.

This mantra urges: Do not delay the quest for Truth. Do not leave this world without knowing who you are. Do not die without realizing that you are deathless.

Essence of the Teaching : 

Human life is for Self-realization nothing less. If accomplished here life is fulfilled. If missed everything is lost. 

Final Vedāntic Message : 

Know Brahman now for It is your own Self, ever-present and immortal. Awaken in this life be free forever.

[साभार https://x.com/AvdheshanandG/status/2003276915109720573Swami Avdheshanand @AvdheshanandG : Official account of Swami Avdheshanand Giri Acharya Mahamandleshwar Juna Akhara. A Great Motivator Renowned Scholar, Excellent Orator.Managed by dedicated team.]

[ब्राह्मी स्थिति पहुँचने पर यह समझ में आता है कि - काम बुरी चीज नहीं है - सृष्टि चलाने के लिए ईश्वर ने काम बनाया है। लेकिन इसके साथ ही भगवान ने केवल मनुष्य को ही नित्य-अनित्य विवेक भी दिया है। मानव-जन्म केवल भोग के लिए नहीं मिलता है, इसलिए ब्रह्मचर्याश्रम के बाद बहुत मुट्ठीभर लोग ही सन्यास-आश्रम में जाने के योग्य होते हैं। अधिकांश लोग पवित्र विवाह-बंधन में बंधने के बाद गृहस्थाश्रम में जाकर विवेक-सम्पन्न बुद्धि से यह समझते हैं कि किसी भी मनुष्य की माँ , कभी उसके पिता की भी माँ नहीं होती। मानव-इतिहास में एकमात्र उदाहरण हमारे पिता श्रीरामकृष्ण और जगतजननी माँ सारदा हैं -जो सभी के माता -पिता हैं! और स्वामी विवेकानन्द सभी के बड़े भाई हैं। जो केवल हमें मनुष्य बनाने के लिए ही इस धरती पर अवतरित होते हैं।    

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है। 

बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा।। 

यह प्रसिद्ध शेर अल्लामा इक़बाल का है। नर्गिस (Daffodils) एक फूल है जो देखने में आँख जैसा लगता है, लेकिन उसमें देखने की शक्ति (नूर) नहीं होती। डैफोडिल के फूल में छह पंखुड़ियाँ होती हैं, और केंद्र में एक "ट्रम्पेट" या प्याला (corona) होता है। ये फूल अपने बेहतरीन रंग और खुशबू के लिए जाने जाते हैं।

 शेर का भावार्थ: बे-नूरी (रोशनी की कमी): यह अंतर्दृष्टि, अज्ञानता या प्रतिभा की कमी का प्रतीक है।

दीदावर [पारखी- नवनीदा के जैसा या उनके पितामह के जैसा पारखी -जो योग्य पात्र को उसके योग्य जिम्मेवारी सौंप सके। दीदावर -ऐसा व्यक्ति जो गहराई से दुनिया को (जीव -जगत को ब्रह्ममय) देख और समझ सके।

अर्थ: जैसे नरगिस के एक फूल को शानदार बनने में बहुत समय लगता है, वैसे ही समाज में एक महान, दूरदर्शी या प्रतिभाशाली इंसान का जन्म बड़ी कठिनाई से होता है। 

यहाँ नरगिस को आँख,का रूपक माना गया है; और “बे-नूरी” से आशय है ज्ञानमयी दृष्टि (तीसरी आँख) का अभाव/ भीतर की रोशनी/समझ की कमी। “चमन” है समाज या दुनिया (जीव -जगत), जहाँ सही दृष्टि रखने वाला व्यक्ति (जगत को ब्रह्ममय देखने वाली विवेकी बुद्धि, मति या दृष्टि) बहुत कम मिलता है। भाव यह है कि अज्ञान और अंधापन लंबे समय तक रहता है, और सच्ची दूरदृष्टि का जन्म दुर्लभ होता है। (अविद्या , अस्मिता, राग-द्वेष, अभिनिवेश रूपी अंधापन जन्म-जन्मान्तर तक चलता रहता है। ज्ञानमयी दृष्टि से जगतको ब्रह्ममय समझने वाली दृष्टि अत्यन्त दुर्लभ है। गृहस्थाश्रंम में रहकर भी ऐसी मति / ऐसी बुद्धि / ऐसी ब्राह्मी स्थिति /केवल आन्दुल मौरी के हेडमास्टर- आचार्यदेव को यानि नवनीदा के पितामह को प्राप्त थी। आन्दुल मौरी के आचार्यदेव आत्मज्ञानी थे और सर्वत्र आत्मा का ही अनुभव करते थे। और अपने विद्यार्थियों को (नवनीदा को) भी इसकी-'Be and Make ' की ही शिक्षा देते थे।

नर्गिस एक फूल है जो देखने में आँख जैसा लगता है, लेकिन उसमें देखने की शक्ति (नूर) नहीं होती

अर्थात एक चमन (दुनिया/समाज) में नवनीदा के पितामह जैसा सच्चा दीदावर (पारखी दृष्टि रखने वाला, प्रतिभाशाली मनुष्य) सदियों की मेहनत और इंतज़ार के बाद ही मिलता है। ]

पूर्व श्लोक में कथित सम्यक् दर्शन को पुनः बताकर कहते हैं

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।

सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते।।6.31।।

।।6.31।। जो पुरुष एकत्वभाव (Oneness) में स्थित हुआ सम्पूर्ण भूतों में स्थित मुझे भजता है, वह योगी सब प्रकार से वर्तता हुआ (रहता हुआ) मुझमें स्थित रहता है।।

 समाहित चित्त का योगी निरन्तर मेरा अनुसंधान करता है (भजता है-भजगोविन्दं,भजगोविन्दं अर्थात सत्य को जानो , अर्थात  सत्य को जानने की चेष्टा में ही लगा रहता है। )। फलत बाह्य जगत् में सब प्रकार के व्यवहार करता हुआ भी (अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन करता हुआ भी) वह मुझमें ही स्थित रहता है। इस श्लोक का मुख्य प्रयोजन यह दर्शाना है कि कोई आवश्यक नहीं कि एक आत्मानुभवी पुरुष को तपस्या करने के लिए हिमालय की किसी अज्ञात गुफा में जाकर निवृत्ति का जीवन व्यतीत करना चाहिए। 

भगवान् कहते हैं कि जीवन के समस्त सामान्य व्यवहार करता हुआ सभी परिस्थितियों में वह अपने स्वरूप के ज्ञान में स्थित रह सकता है। वास्तव में देखा जाय तो चिरस्थायी फलदायी कर्म कुशलतापूर्वक तभी किये जा सकते हैं जब कर्ता आत्मस्वरूप के ज्ञान में स्थित हो। गीता का यही संदेश है कि समर्पण की भावना से किये गये कर्म आत्मोन्नति के साधन हैं। 

यहाँ ध्यान देने की बात है कि श्रीकृष्ण संभवत अर्जुन की अपेक्षा स्वयं को ही युद्ध की विपत्तियों में अधिक डाल रहे थे। रथ में बैठे योद्धा (रथी आत्मा) तक पहुँचने के पूर्व प्रतिपक्षी के बाण सारथि (शुद्ध बुद्धि) पर पहले प्रहार करते हैं। केवल समस्त संसार को मुग्ध कर देने वाली मन्द स्मिति के अतिरिक्त किसी अन्य शस्त्र को न लेकर श्रीकृष्ण ने युद्धभूमि में प्रवेश किया था। 

तत्पश्चात् वे ही सम्पूर्ण युद्ध के स्वामी और केन्द्र बिन्दु बने रहे और सम्पूर्ण महायुद्ध का घटनाचक्र उनके ही चारों तरफ घूमता रहा। इसका अर्थ यह हुआ कि आत्मज्ञानी पुरुष किसी भी कार्यक्षेत्र में कर्म करते हुए भी अपने वास्तविक स्वरूप आत्मा (इष्टदेव या परमात्मा) का भान रख सकता है

भगवान कहते हैं - योगी ब्रह्मात्म-स्वरूप होकर सभी अवस्थाओं में एक रस आनन्दमय भगवान के साथ एकत्व में स्थित होकर संसार में आनन्द से विचरण करते हैं।  

1. आँख नहीं देखती -मूढ़ बुद्धि ही सभी को केवल शरीर के रूप में (M/F) नाम-रूप में देखती हैं। और जाति, नस्ल, लिंग, आयु और सामाजिक प्रतिष्ठा के आधार पर एक-दूसरे से भेद-भाव बनाए रखती है। 

2. लेकिन शुद्ध बुद्धि या विवेक-सम्पन्न बुद्धि सभी मनुष्यों को आत्मा के रूप में देखते हैं। इसलिए ब्रह्मविद या आत्मानुभवी विद्वान लोग बुद्धि को ज्ञानमयी बनाकर जगत को ब्रह्ममय देखते हैं।  ज्ञान की दृष्टि से ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और कुत्ते का मांस भक्षण करने वाले चाण्डाल को समान दृष्टि से देखते हैं। 

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।

सुखं वा यदि वा दुःखं सः योगी परमो मतः।।6.32।।

।।6.32।। हे अर्जुन ! जो पुरुष अपने समान सर्वत्र सम देखता है, चाहे वह सुख हो या दु:ख, वह परम योगी माना गया है।।

पूर्व श्लोकों में इसका स्पष्टीकरण किया गया है कि क्यों हमें प्राणीमात्र से प्रेम करना चाहिए। योगी आत्मसाक्षात्कार के द्वारा समस्त सृष्टि को आत्मा की ही अभिव्यक्ति के रूप में पहचानता है अत सबसे प्रेम होना स्वाभाविक ही है। आत्मैकत्व दर्शन करने वाला व्यक्ति (शुद्धबुद्धि) को ही गीता में परम योगी माना गया है। जो समाज को देता अधिक है और लेता कम है। प्रेम उसका श्वास है और करुणा उसकी जीविका।

 प्रसिद्ध नैतिक नियम है कि अन्य के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा कि उससे तुम अपेक्षा रखते हो।  परन्तु यह नियम सामान्य मनुष्य को अप्रिय लगता है।  क्योंकि स्वार्थ के कारण वह सोचता है कि क्यों वह दूसरों को अपने ही समान समझे। अज्ञान तथा स्वार्थ के कारण लोगों की स्वाभाविक प्रवृत्ति अनैतिकता की ओर झुक जाती है।

शरीर के सभी अंग हमारे हैं और यदि किसी भी अंग में विकार आ जाता है तब हम समान रूप से उसकी चिन्ता करते हैं। हम निर्विवाद रूप से स्वीकार करते हैं कि यदि हमारे किसी अंग को कोई कष्ट होता है तो उससे हमें भी कष्ट होगा। यदि अकस्मात् दांतों से जिह्वा कट जाती है तो मनुष्य कभी भी दांतों को दण्ड देने का विचार नहीं करता। उसी तरह जो सब प्राणियों में आत्मा (इष्टदेव, भगवान) को देखते हैं उन्हें सबके सुख और दु:ख अपने समान लगते हैं। इसलिए ऐसे योगी सभी जीवात्माओं के शुभ चिन्तक होते हैं और सभी के आंतरिक लाभ के लिए प्रयास करते हैं। यही पूर्ण योगी (शुद्धबुद्धि) का समदर्शन है।

किन्तु व्यावहारिक बुद्धि (स्वयं को केवल शरीर समझने वाली बुद्धि) का अर्जुन उक्त लक्ष्य को पाने में स्वयं को असमर्थ पाता है ; और वह प्रश्न के रूप में अपनी शंका को व्यक्त करता है।

अर्जुन उवाच

योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन।

एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम्।।6.33।।

BG 6.33: अर्जुन ने कहा-हे मधुसूदन! आपने जिस योगपद्धति का वर्णन किया वह मेरे लिए अव्यावहारिक और अप्राप्य है क्योंकि मन चंचल है।

अर्जुन इस श्लोक के प्रारम्भ में 'योऽयं' शब्द का उच्चारण करता है।  इसका अर्थ 'यह योग की पद्धति है' जिसका इस अध्याय के 10वें श्लोक से आगे वर्णित श्लोकों में उल्लेख किया गया है। 1. इन्द्रियों का दमन करना। 2. सभी कामनाओं का त्याग करना। 3. मन को केवल भगवान पर केन्द्रित करना। 4. स्थिर मन से भगवान का चिन्तन करना। 5. सबको समान दृष्टि से देखना।  मन को नियंत्रित किए बिना इनमें से किसी का भी पालन नहीं किया जा सकता।  अर्जुन यह कहकर कि जो भी उसने सुना वह अव्यवहारिक है, नि:संकोच अपना संदेह प्रकट करता है। 

 अत्यन्त व्यावहारिक बुद्धि का आर्य पुरुष होने के नाते अर्जुन क्रियाशील स्वभाव का था। इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने सिद्ध किया है कि दुखसंयोग-वियोग ही योग है। तत्प्राप्ति का उपाय मन (मूढ़बुद्धि) को विषयों से परावृत्त करके आत्मानुसंधान में प्रवृत्त करना है। सिद्धांत यह है कि -आत्मस्वरूप में मन के स्थिर होने पर सत्य के अज्ञान से उत्पन्न अहंकार और सभी विपरीत धारणाएं समाप्त होकर साधक मुक्त हो जाता है

योग का लक्ष्य है जीवन में आने वाले सभी चुनौतियों पूर्ण परिस्थितियों में समत्व भाव को प्राप्त होना जो प्रशंसनीय तो है, परन्तु अर्जुन को प्रतीत होता है कि उसकी पद्धति जीवन की वस्तुस्थिति से सर्वथा भिन्न होने के कारण अव्यावहारिक है। कुछ व्यंग के साथ अर्जुन इस समत्व योग की व्यावहारिकता के विषय में सन्देह प्रगट करता है।

वेदान्त के विद्यार्थी का यही लक्षण है कि,अन्धविश्वास से वह किसी की कही हुई बात को स्वीकार नहीं करता। अर्जुन को समत्व योग का अभ्यास दुष्कर दिखाई दिया जिसका कारण वह बताता है कि मनुष्य मन के चंचल स्वभाव के कारण योग की चिरस्थायी स्थिति नहीं रह सकती।

 तात्पर्य यह है कि अनेक वर्षों की साधना के फलस्वरूप आत्मानुभव प्राप्त भी होता है तो भी वह क्षणिक ही होगा।  यद्यपि वह क्षणिक अनुभव भी आत्मा की पूर्णता में हो सकता है तथापि मन के चंचल स्वभाव के कारण ज्ञानी पुरुष उस अनुभव को स्थायी नहीं बना सकता।

अपने प्रश्न को और अधिक स्पष्ट करने के लिए अर्जुन कहता है

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।

तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।।6.34।।

।।6.34।। क्योंकि हे कृष्ण ! यह मन चंचल और प्रमथन स्वभाव का तथा बलवान् और दृढ़ है; उसका निग्रह करना मैं वायु के समान अति दुष्कर मानता हूँ ।।

अर्जुन अपने मन को सम्यक् प्रकार से जानता है कि वह अति चंचल प्रमथनधर्मी बलवान् और दृढ़ है। प्रमाथि, बलवान् और दृढ़ ये तीन शब्द अत्यन्त महत्वपूर्ण और अर्थ गर्भित हैं।

प्रमाथि शब्द से वृत्तिप्रवाह की द्रुत गति तथा उसके द्वारा उत्पन्न विक्षेपों की लहराती लहरें भी दर्शायी गयी हैं। अर्जुन कहता है कि यह मन प्रमाथि होने के साथसाथ बलवान् भी है। द्रुत गति का वृत्तिप्रवाह इष्ट विषयकी ओर अग्रसर होते हुए उसे प्राप्त होने पर उस विषय के साथ दृढ़ आसक्ति से बंधकर इतना बलवान् हो जाता है कि उसे उस इन्द्रिय-विषय से विलग करना दुष्कर कार्य हो जाता है। उसका तीसरा लक्षण है दृढ़ता अर्थात् एक बार यह स्वेच्छाचारी मन किसी विषय का चिन्तन प्रारम्भ कर दे तो उसे उससे परावृत्त करना सरल कार्य नहीं होता।  इन लक्षणों से युक्त मन (मूढ़बुद्धि) को किस प्रकार विषय पराङ्मुख करके (नित्य-अनित्य विवेकी-बुद्धि बनाकर, शुद्धबुद्धि) आत्मा में स्थिर कर सकते हैं जैसा कि ध्यान विधि में बताया गया है। 

(इसलिए अर्जुन को इन्द्रिय-विषय में उन्मुख या आसक्त मूढ़बुद्धि को आत्मोन्मुखी (इष्टदेव) की छवि पर एकाग्र करना दुष्कर प्रतीत हैं।)  अर्जुन यहाँ श्रीकृष्ण से उन उपायों को जानना चाहता है जिनके द्वारा प्रचण्ड वायु/तूफ़ान के समान वेग वाले मन को पूर्णतया वश में किया जा सकता है ?  

अर्जुन भगवान् को उनके अत्यन्त सुपरिचित नाम कृष्ण के द्वारा सम्बोधित करता है जो अत्यन्त उपयुक्त है क्योंकि कृष् धातु से कृष्ण शब्द बनता है, जिसका अर्थ है जो आत्मानुभवी भक्तों के समस्त दोषों अर्थात् वासनाओं का कर्षण कर लेता है, नष्ट कर देता है। 

स्वप्न में किसी की हत्या करने वाला स्वप्नद्रष्टा जैसे ही जाग्रत् अवस्था में आता है उसके रक्तरंजित हाथ और कलंक की कालिमा तत्काल ही स्वच्छ हो जाती हैं। इसी प्रकार जब आत्मा के वास्तविक रूप की पहचान हो जाती है, तब मन और उसकी आक्रामक प्रवृत्तियाँ वासनाएं और उनकी दुष्टता बुद्धि और उसकी खोज की प्रवृत्ति शरीर और उसके भोग ये सभी नष्ट हो जाते हैं।

 इसके लिए दार्शनिक कवि महर्षि व्यासजी ने महाभारत में इस अन्तरात्मा का चित्रण वृन्दावन के मुरली मनोहर श्याम कृष्ण के रूप में किया है। 

 प्रकरण के सन्दर्भ में किसी विशेष गुण को दर्शाने के लिए व्यक्ति को एक विशेष संज्ञा प्रदान करने की कला संस्कृत भाषा की अपनी विशेषता है जो विश्व की अन्य भाषाओं में नहीं मिलती।अर्जुन के तर्क को स्वीकार करते हुए भगवान् कहते हैं

श्री भगवानुवाच

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।6.35।।

।।6.35।। श्रीभगवान् कहते हैं --  हे महबाहो ! नि:सन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है; परन्तु, हे कुन्तीपुत्र ! उसे अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वश में किया जा सकता है।।

श्री भगवानुवाच

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।6.35।।

।।6.35।। श्रीभगवान् कहते हैं --  हे महबाहो ! नि:सन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है; परन्तु, हे कुन्तीपुत्र ! उसे अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वश में किया जा सकता है।।

 भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के इस कथन के साथ कि मन पर नियंत्रण प्राप्त करना कठिन है, अपनी सहमति प्रकट करते हैं। यद्यपि संसार में बहुत-सी वस्तुओं को प्राप्त करना कठिन होता है तथापि हम निडर होकर आगे बढ़ते हैं। नाविकों को ज्ञात होता है कि समुद्र में नाव चलाना जोखिम भरा कार्य है और भयानक तूफान आने की आशंका बनी रहती है। फिर भी वे इन जोखिमों को तट पर खड़े रहने का बहाना नहीं बनाते। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि मन को वैराग्य और अभ्यास द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है।

 मन को संसार से हटाना वैराग्य है और मन को भगवान में स्थित करना अभ्यास है। ऋषि पतंजलि ने भी यही उपदेश दिया है -अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध:।। (पतंजली योगदर्शन-1.12) 'मन की चंचलता को निरन्तर अभ्यास और विरक्ति द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है।'

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।

वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः।।6.36।

।।6.36।। असंयत मन के पुरुष द्वारा योग प्राप्त होना कठिन है, परन्तु स्वाधीन मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा उपाय से योग प्राप्त होना संभव है, यह मेरा मत है।।

अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।

अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति।।6.37।।

।।6.37।। अर्जुन ने कहा -- हे कृष्ण ! जिसका मन योग से चलायमान हो गया है, ऐसा अपूर्ण प्रयत्न वाला (अयति) श्रद्धायुक्त पुरुष योग की सिद्धि को न प्राप्त होकर किस गति को प्राप्त होता है?

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।

अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि।।6.38।।

।।6.38।। हे महबाहो ! क्या वह ब्रह्म के मार्ग में मोहित तथा आश्रयरहित पुरुष छिन्न-भिन्न मेघ के समान दोनों ओर से भ्रष्ट हुआ नष्ट तो नहीं हो जाता है?

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।

त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते।।6.39।।

।।6.39।। हे कृष्ण ! मेरे इस संशय को नि:शेष रूप से छेदन (निराकरण) करने के लिए आप ही योग्य है; क्योंकि आपके अतिरिक्त अन्य कोई इस संशय का छेदन करन वाला (छेत्ता) मिलना संभव नहीं है।।

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।

नहि कल्याणकृत्कश्िचद्दुर्गतिं तात गच्छति।।6.40।।

।।6.40।। श्रीभगवान् ने कहा -- हे पार्थ ! उस पुरुष का, न तो इस लोक में और न ही परलोक में ही नाश होता है; हे तात ! कोई भी शुभ कर्म करने वाला दुर्गति को नहीं प्राप्त होता है।।

 अपने उत्तर के प्रारम्भ में ही भगवान् स्पष्ट आश्वासन देते हैं कि कोई भी शुभ कर्म करने वाला न इहलोक में और न परलोक में दुर्गति को प्राप्त होता है।वर्तमान में पुण्य कर्म करने वाला भविष्य में कभी दुख नहीं पायेगा क्योंकि भूत और वर्तमान का परिणत रूप ही भविष्य है।

 इसी पितृप्रेम से श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि साधक का कभी वास्तविक पतन नहीं होता। आत्मिक विकास की सीढ़ी पर एक भी सोपान चढ़ने का अर्थ है पूर्णत्व की ओर बढ़ना।                   योगसिद्धि को जो प्राप्त नहीं हुआ उसकी निश्चित रूप से क्या गति होती है ? भगवान् कहते हैं- 

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।

शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।।6.41।।

।।6.41।। योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को प्राप्त होकर वहाँ दीर्घकाल तक वास करके शुद्ध आचरण वाले श्रीमन्त (धनवान) पुरुषों के घर में जन्म लेता है।।

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।

एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्।।6.42।।

।।6.42।। अथवा, (साधक) ज्ञानवान् योगियों के ही कुल में जन्म लेता है, परन्तु इस प्रकार का जन्म इस लोक में नि:संदेह अति दुर्लभ है।।

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।

यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन।।6.43।।

।।6.43।। हे कुरुनन्दन ! वह पुरुष वहाँ पूर्व देह में प्राप्त किये गये ज्ञान से सम्पन्न होकर योगसंसिद्धि के लिए उससे भी अधिक प्रयत्न करता है।।

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।

जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते।।6.44।।

।।6.44।। उसी पूर्वाभ्यास के कारण वह अवश हुआ योग की ओर आकर्षित होता है। योग का जो केवल जिज्ञासु है वह शब्दब्रह्म (वेदों के कर्मकाण्ड से संबंधित भाग) का अतिक्रमण करता है।।

       जब हम नींद से होकर उठते हैं , तो सोचते हैं -जैसे आज ही मेरा जन्म हुआ है! तो बीते कल तक हमारे खाते में जमा राशि वही होगी जो पासबुक में दर्शायी गयी होती है। बैंक से हमे जमा राशि से अधिक धन नहीं प्राप्त हो सकता ,और न ही कम राशि दिखाकर हमें धोखा दिया जा सकता है। 

इसी प्रकार व्यक्ति के हृदय के विकास # में भी कोई भी देवता उस व्यक्ति को उसके प्रयत्नों से अधिक न दे सकता है और न कुछ अपहरण कर सकता है। 

[#Heart :'ह्रदय का विकास' यानि अपने भीतर ह्रदय गुहा में, हृदय कमल पर विराजमान  आत्मा चैतन्य , स्वामी विवेकानन्द  

  की  आत्मानेवषण या सत्य की खोज। 

 के लिए मन को जगत के बाह्य-विषयों (कामिनी-कांचन और नामयश) में घोर आसक्त चित्तवृत्ति या मनोवृत्ति अर्थात मूढ़ बुद्धि 

 में भटकने से खींचकर , बाह्य विषय भोगों, से भी अधिक आकर्षक  अर्थात ह्रदय कमल पर विराजमान आत्मा (स्वामी विवेकानन्द ,माँ और ठाकुर पर स्थिर रखने के लिए बहिर्मुखी मूढ़ बुद्धि को बाह्य जगत के आकर्षण   अन्तर्मुखी      

  हमारे भीतर ह्रदय में विराजमान आत्मा (आत्मविकास -शुद्धि बुद्धि , अन्तर्दृष्टि 

प्रतिदिन के जीवन में अनुभूत अखण्डता के समान ही प्रत्येक जन्म पूर्व जीवन की अगली कड़ी है। जैसे आज का दिन बीते हुए कल का विस्तार है। इस तथ्य को सम्यक् प्रकार से ध्यान में रखकर इस श्लोक का मनन करने पर इसका तात्पर्य सरलता से समझ में आ जायेगा।






 


 




















  

 








 


















 






 















   


 




  













 
















   





 






        







     



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