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सोमवार, 2 मार्च 2026

"उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत" : कौन जागता है? - जिसको सत् और असत् का ज्ञान है । जौं सपनें सिर काटै कोई। बिनु जागें न दूरि दुख होई।

नींद और मृत्यु में कितना अन्तर है ? 


https://www.youtube.com/watch?v=XtSz_RNrP4c


गीता में भगवान ने कहा है -
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते।।18.17।।

।।18.17।। जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है।।

जिसकी बुद्धि में 'मैंने किया है ', ऐसा भाव नहीं है। जिसकी बुद्धि कर्तापन में लिप्त नहीं होती। बुद्धि ही लिप्त होकर सोचती है -मैं कर्ता हूँ। जिसकी बुद्धि कर्तापन में लिप्त नहीं होती, उसी की बुद्धि भोक्तापन में लिप्त नहीं होती।  

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति।।14.19।।

।।14.19।। जब द्रष्टा (साधक) पुरुष तीनों गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य को कर्ता नहीं देखता, अर्थात् नहीं समझता है और तीनों गुणों से परे मेरे तत्व को जानता है, तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।।
जब गुणों के आलावा कोई करने वाला नहीं , जब गुण ही करते है -

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।

गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते।।3.28।।

।।3.28।। परन्तु हे महाबाहो ! गुण और कर्म के विभाग के सत्य (तत्त्व)को जानने वाला ज्ञानी पुरुष यह जानकर कि "गुण गुणों में बर्तते हैं" (कर्म में) आसक्त नहीं होता।।
जिसकी बुद्धि इस निर्णय में प्रतिष्ठित है कि गुण ही काम कर रहे हैं -मैं कर्ता/वक्ता नहीं हूँ ! 
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते। 
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते।
वो किसी कर्म में लिप्त नहीं होता , भोक्ता नहीं बनता। और गुणातीत भी कहते हैं - गुण आते हैं,और जाते हैं। 
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति।।14.22।।
।।14.22।। श्रीभगवान् ने कहा -- हे पाण्डव ! (ज्ञानी पुरुष) प्रकाश(सत), प्रवृत्ति (रज) और मोह (तम) के प्रवृत्त होने पर भी उनका द्वेष नहीं करता तथा निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा नहीं करता है।।
नींद आती है तो आने देता है , हटाता नहीं है, नींद को आने देता है। और जब नींद खुल गयी तो अच्छा है।  किसी गुण को न तो बुलाता है, न हटाता है। अपने आप ये आते जाते रहते हैं। जाग्रत, स्वप्न , सुषुप्ति। जाग्रत सत्वगुण है , स्वप्न रजोगुण और सुषुप्ति तमोगुण है। ये भी आते-जाते रहते हैं। साधना काल में हटाना पड़ता है। जैसे जो गाड़ी (नाईट बस) चलाता है , उसे नींद आये तो नींद हटानी पड़ती है। ये नहीं की आ जाये तो आ जाने दो। ऐसे ही Night Guard रात का पहरेदार वो जगता है। तो एक समय इनको हटाना पड़ता है। 
पर ज्ञानी को नींद आ गयी तो सो गया। नींद खुल गयी तो स्वरुप का स्मरण करने लगा मैं कौन हूँ ?। ये लक्षण ज्ञानी के हैं। (3:14) जैसे हमलोग सुबह में प्रार्थना करते हैं - कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती ।करमूले तु गोविंदः प्रभाते करदर्शनम् ॥
हम क्या कहेंगे , जब सोने जाओ तो उसके पहले - ये सबके लिए होगा। अभी आपका स्तर जो भी हो। चाहे आप नाम जपते हों , चाहे ध्यान करते हों ? चाहे उसका स्मरण करते हो। नींद आने के पहले करना है। क्योंकि यह अभ्यास मृत्यु के समय से पहले करना है। मृत्यु में क्या होगा ? देह छूटेगा बेखबर हो जाओगे। अभी रोज मर रहे हो। नींद माने थोड़ी देर की मृत्यु। मेरी दृष्टि में मृत्यु लम्बी समय की नींद। दोनों एक ही हैं। लम्बी नींद का नाम मृत्यु है , छोटी नींद भी मृत्यु जैसी है। 
तो रोज जब सोने लगते हो ,दिन भर चाहे 100 काम करो।
लेकिन नींद आने से पहले बिस्तर में लेटे हुए कुछ देर के लिए सोचें -आप कौन हैं ? देह तो लेटा पड़ा है। देह तो दृश्य है आप कौन हो ? श्वास तो चलती है , आप कौन हैं ? (4:48) मन में संकल्प आवे , दिन में जो किया वो उसकी यादें तो मन में आ रही हैं, लेकिन तुम कौन हो ? तो अपने को साक्षी , चैतन्य द्रष्टा। अपने को चैतन्य अनुभव करके सो जाओं। मतलब पहले घर पहुँचो फिर सो जाओ।  आत्मा में पहुँचकर , देह में रहते ही सो जाओ , स्वरुप में पहुँचकर सो जाओ !  
 
शेते सुखं कस्तु,  समाधिनिष्ठो,

जागर्ति को वा सदसद्विवेकी ।

के शत्रव: सन्ति निजेन्द्रियाणि,

तान्येव मित्राणि जितानि यानि ॥

 सुख से कौन सोता है?  - वही व्यक्ति जो समाधि निष्ठ है , तो तुम समाधि में जाकर सोओ। अपने घर पहुँचके सोओ। जो बच्चा माँ के साथ सत्संग में यहाँ आया और सो गया, और पूरे प्रवचन तक सोता रहा । जब उसकी माँ यहाँ से चली , तब यहाँ से जाने के बाद उसकी नींद खुली। तो वो बच्चा सतसंग से परिचित नहीं हुआ। क्योंकि सत्संग के समय जगा नहीं था। सत्संग से पहले जाग रहा था , और सत्संग के बाद जागा। जितनी देर सत्संग सभा में रहा सोया रहा। ऐसे ही हम भी घर जाते हैं , रोज जाते हैं ,हममें से कोई ऐसा नहीं है -जो घर नहीं जाता। जागृत में जगत में हो , स्वप्न में जगत में हो , सुषुप्ति में आप घर जाते हो। (6:30) पर उस बच्चे की तरह सो के गए। और जब नींद खुली तो फिर संसार में। संसार में थे तब जागे , और आये तब जागे। जब घर में थे तब सोये रहे। आप रोज घर जाते हैं , ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है , जो अपनी आत्मा में नहीं जाता। पर वहाँ नींद में होने के कारण अपने घर से परिचित नहीं है। अपने चैतन्य स्वभाव से परिचित नहीं हैं। अपनी अलिप्तता, आप अपने अलेप मुक्त अवस्था से परिचित नहीं हैं। इसलिए गुरु कहते हैं, पहले 'ध्यान' में होशपूर्वक जाओ। फिर सोओ। घर जाके सोना अलग है। सो के घर जाना अलग है (घर-पहुँच के सोना अलग है,दयानन्द -जैसे जप-ध्यान करके सोना अलग है।?) (7:21) अभी हम सो के घर जाते हैं। लेकिन गुरु कहते हैं , घर जाकर सोओ। इसी तरह कई पियक्क्ड़ होते हैं , नशे में पी। और पी कर नशे में थे। वो अपने घर पहुँच तो गए , परन्तु होश में नहीं पहुँचे। तो घर में भी कहने लगे , मुझे घर ले चलो,मुझे घर ले चलो,मुझे घर ले चलो,मुझे घर ले चलो। तो लोगों ने सोचा कैसे ले चलें ? तो क्या टोटो- रिक्सा लायें ? ये तो घर में ही है, पर नशे के कारण उसे लगता है , अभी मैं रोड में ही हूँ। अभी मैं वहीं ठेके में (बार में) ऐसे ही आप दुनिया में ही बने -रहते, रहते सो जाते हो। (8:03) इसलिए गुरु हमको परामर्श देते हैं , कि कुछ क्षण ध्यान में लेटे -लेटे , और बैठे में रीढ़ दुखेगी। या कभी कुछ दुखेगा , पैर दर्द करने लगेगा। पैर शून्य होने लगेंगे। इसलिए आप लेटे जाओ , क्यों ? कष्ट बाधा है ! कष्ट में ध्यान नहीं लगता। और यदि लगेगा भी, तो वो योगी लोग कहते हैं -पहले तीन घंटे तक एक आसन में बैठने का अभ्यास करो तब ध्यान करो। ब्रह्मविद गुरु ये नहीं कहते, वे कहते हैं लेट जाओ। शवासन में शरीर को ढीला छोड़ दो।(8:44) थोड़ी देर शरीर के द्रष्टा रहो। थोड़ी देर श्वास के आने-जाने का द्रष्टा रहो। और फिर न शरीर का , न श्वास का। (न शरीर का द्रष्टा , और न श्वास का द्रष्टा रहो।) आखिर शरीर को कौन जानता है ? (8:56) शरीर तो नहीं जानता। श्वास को कौन जानता है? श्वास तो जानती नहीं। श्वास तो नींद में भी चलती हैआप सिर्फ जागे रहो। आपके जगने की जरूरत है। हमारी ऑंखें जगती रहें, जरुरी नहीं। हमारी और कोई इन्द्रिय (घ्राणेन्द्रिय) जगता रहे , हमें इसकी जरूरत नहीं। बस मैं जगता रहूं ! आप जागे रहो ! सब कुछ सहज होने दो। धीरे-धीरे राग-द्वेष का त्याग कर दो। (9:21)

राग द्वेष युक्तेषु विषयान् इन्द्रिय यैश्चरन्।

आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।2.64।।  
 
[।।2.64।। आत्मसंयमी (विधेयात्मा) पुरुष रागद्वेष से रहित अपने वश में की हुई (आत्मवश्यै) इन्द्रियों द्वारा विषयों को भोगता हुआ प्रसन्नता (स्वरुप ???) प्राप्त करता है।। ]   
बुद्धि में किसी याद और शरीर के प्रति राग और द्वेष का त्याग कर दो ; और साक्षी चैतन्य रहकर थोड़ी देर सो जाओ ! और सोने के बाद जब नींद खुले - दो समय पर ध्यान रखना बहुत जरुरी है। (9:43) कहीं पढ़ा (या सुना) था कि एक व्यक्ति जब पैदा हुआ ,वो हँसते हुए पैदा हुआ। आप सबने भी वो दोहा सुना होगा - जब आया तू जगत में , जगत हँसा तुम रोये। जब तुम जगत में आये , तब जगत तो खुश हुआ , तुम दुःखी थे। एक ही व्यक्ति पैदा हुआ, यद्यपि उसका नाम मैं जानता हूँ , पर उसकी बताने की जरूरत नहीं- वो हँसते हुए पैदा हुआ ! (10:12) क्यों ? उसने हँसते हुए शरीर छोड़ा था। क्योंकि सोने के बीच तो पता ही नहीं रहता। (जब तू आया जगत में, लोग हँसे तू रोय | ऐसी करनी ना करो, पीछे हँसे सब कोय।।) एक बात आपने कहीं और पढ़ी होगी। ये बहुत महत्व की है। अधिकतर हमलोग बेहोश हो के मरते हैं। इसलिए पहले जन्म की हमें याद नहीं रहती। (10:34) किसीको भी पहले जन्म की याद नहीं रहती। क्योंकि हमने याद करके देह नहीं छोड़ा !(अपने/ रमात्मा के स्वरुप की ?) तो उस व्यक्ति ने हँसते हुए शरीर छोड़ा पहले , तो वो हँसते हुए पैदा हुआ !(हरियाणा पलवल?) तो यदि हम भी ध्यान करते हुए सोयें , तो दूसरी पहचान ये है कि- यदि जगते ही तुम्हें ध्यान आ जाये-इसका उदाहरण क्या होगा ? जैसे मानलो तुम 1 लाख रुपया का पैकेट या कीमती सामान लिए,सोने का गहना लिए किसी प्लेटफॉर्म में या रिटायरिंग रूम में कहीं सोये होगे। (11:08) तो सोने से पहले, सबसे पहले क्या करोगे ? सबसे पहले वो कीमती सामान सिरहाने तकिये के नीचे, या जेब या थैले में रखके सोते होगे। सोने के पहले उसका ख्याल किया, उस कीमती सामान का ध्यान कर लिया। दूसरी बात पर विचार करो , हमारे लिए सबसे कीमती सामान क्या हो सकता है? आत्मा से ज्यादा कीमती सामान , शायद ही इनमें कोई हो ? उसमें 'मैं' भी शामिल (गुरुदेव/इष्टदेव भी शामिल) मत समझना?।?? (11:35) और सो गए, तो जब-जब नींद खुली -यदि जेब में डाले हो तो जगते ही सबसे पहले हाथ जेब में जायेगा। शायद आपका भी हाथ आपके जेब में तो ऐसा-नहीं जाता होगा ? और वो कीमती सामान यदि बैग में सिरहाने है , नींद खुलते ही देखा कि मेरा बैग सिरहाने है , कि कहीं चला तो नहीं गया है ? नहीं ठीक है, कहीं गया नहीं है! तो इतना सावधानी रखो कि ध्यान करके सोये हुए हो । और जब जब नींद खुली तो शौच नहीं गए पहले। (12:03) और काम पहले नहीं किये। होटल /दुकान फोन नहीं किये ? सबसे पहले वो सामान सम्भाला। ऐसे ही सुबह उठते ही , या बीच में जब -जब नींद खुले तो ध्यान करते चैतन्य होकर सोओ ! और जब जागो , तो सबसे पहले तुम चेतन हो, ये ख्याल आना चाहिए-(बुद्धिवृत्ति में ये निर्णय -विचार उठने पहले चाहिए।) देह होने (M/F होने) का ख्याल बाद में उठना चाहिए। (12:28-गुरुदेव भगवान की जय !!) क्योंकि तुम चेतन ही तो हो न ? और ये वो चेतन है - जो चेतन होता है , और चेतन सो जाता है ! 'उस चेतन' की बात अभी कर रहा हूँ। (साक्षी चैतन्य की जो कभी नहीं मरता) इसके आगे की बात तो बाद में। चैतन्य रहते सो गए , सब कुछ सहज होता रहा , स्वीकार करते रहे, अंत में सो गएऔर जब जगे , तब पहले क्या जगा ? चेतन जगा कि देह ? (12:49) पहले चेतन जगा कि इन्द्रियाँ ? पहले चेतन जगा कि घर का ख्याल ? (पहले चेतन जगा कि सुत-दारा और लक्ष्मी का ख्याल ?) सबसे पहले "जगे" ! इसके लिए हम दूसरा उदाहरण देते हैं , अपना ही उदाहरण दिया करते हैं। चूँकि हम रोज घर बदलते हैं। खरीदते नहीं , बिना खरीदे रोज हम घर बदलते हैं। अब देखो अभीतक हम यहाँ रहे -अब कल यहाँ नहीं सोयेंगे। तुम तो रोज एक जगह सोते हो , इसलिए कम ख्याल में आता है। पर कभी कभी आपको भी हुआ होगा ? जब नए घर में सोये तो , नींद खुलते ही ख्याल करना पड़ा कि शोचालय किधर है ?(13 :31 कमोड वाला)? आप अपने घर में भी ख्याल करते हो क्या ? नींद खुली शौचालय यहाँ , तो दरवाजा किधर है ? अँधेरे में भी चले जाओगे। हम अपनी बात बताते हैं - जब हमारी नींद खुलती है , तो हमें सोचना पड़ता है कि आज हम हैं कहाँ ? यदि ये ख्याल आ गया कि मुम्बई में हूँ , फिर ख्याल आया -लक्ष्मीनारायण मन्दिर में -महालक्ष्मी। फिर ख्याल आया- मन्दिर में किस कमरे में ?जब ख्याल आया तो शौचालय इधर है , फलां चीज इधर है। तब ख्याल आया , और ख्याल बाद में। पहले जगे , पहले जगे फिर और स्मृतियाँ आयीं। ऐसी ही आप भी करो। सबसे पहले जगो [मतलब ? सत् और असत् का ध्यान करो।] अब रोज तो पहले तुमको कमरा देखना है। शौचालय ढूँढना है। अब हमने (गुरुदेव ने ) क्या काम बताया ? अब जब जगो तो , पहले ये ख्याल करो -मैं हूँ कि नहीं ? मैं हूँ , पहले 'मैं ' जगा, फिर देह मुझे पड़ा मिला। (14:39) ठीक है न ? पहले जगे तब देह मिला कि, पहले देह मिला फिर जगे ? इस पर एक बड़ा विचित्र श्लोक है , जिसका अर्थ लोग पूछते हैं। 
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।

क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति।।

जिसका अर्थ है - उठो, जागो, और जानकार श्रेष्ठ पुरुषों के सान्निध्य में ज्ञान प्राप्त करो। विद्वान् मनीषी जनों का कहना है कि ज्ञान प्राप्ति का मार्ग उसी प्रकार दुर्गम है जिस प्रकार छुरे के पैना किये गये धार पर चलना ।

पहले कहते हैं - उठो ! फिर कहते हैं -जागो ! उत्तिष्ठत जाग्रत- पहले उठोगे कि पहले जगोगे ? बिना जगे उठोगे ? तो पहले जगे फिर पड़े मिले। फिर उठो , फिर जाओ। पर पहले तुम जब जगे, तो याद करो कि मैं अभी जगा - मैं शाश्वत चैतन्य, फिर देह , फिर पैर , फिर हाथ। फिर बैग, फिर वो कीमती सामान (गुरुदेव-इष्टदेव-ठाकुर, माँ स्वामीजी) सम्भालो। फिर सारी दुनिया सम्भालो। पर पहले क्या सम्भालो ? आपन होश संभालो शरीर वाले। (15:42) ऐ शरीर वाले ! पहले तुम अपना होश सम्भालो - तुम हो ! अपना होश , तुम हो। यह जग मेरे ही करके तो भान है। [भास रहा है ! यह संपूर्ण संसार इसकी वस्तुएंऔर इसके अनुभव केवल मेरे (चेतना, आत्मा या ईश्वर) के होने या मेरे द्वारा बोध (भान) किए जाने के कारण ही प्रतीत होते हैं। मेरे (चैतन्य) बिना इस जगत का कोई अस्तित्व या ज्ञान नहीं है।] पहले मैं (चैतन्य) तब जगत भासेगा ! कि पहले जगत भासेगा , तब मैं (चैतन्य) भासेगा ?  
जगत को कभी जगत भासता है क्या ? (16:00) देखो ये इतना सुंदर मंदिर है , तो क्या इस मंदिर को मंदिर भासता है ? मंदिर को सुंदर मंदिर भास सकता है क्या ? मुझे भासता है ! देह को देह कभी भासता नहीं , मुझे भासता है ! तो मुझे देह भासता है। पहले ये याद करो ! मुझे श्वास के चलने का पता चला। मन में ख्याल क्या-क्या आये , मुझे पता चला।  (मन में कैसे -कैसे विचार उठे ,मुझे पता चला। ) तो मैं 'वो' हूँ ! ये जग मेरे ही करके तो भान है -भास रहा है। यह सब मेरे ही करके तो भान है। कैसे सुंदर-अनुभव प्रत्यक्ष प्रमाण है। एक बार मुंबई जब 50 साल पहले आये थे। पहले हम कुछ जानते भी नहीं थे , गुरुदेव के समय आये थे। उस समय के फिल्म की कोई एक लाईन सुनी थी। एक तो मुगले आजम की अगर हम न होते अगर, हम एक लाईन सुने थे।  अगर हम न होते अगर  हम न होते - (गाना फिल्म है- अगर तुम ना होते)-
"अगर हम न होते, अगर  हम न होते ? तो; जाग्रत होता ? स्वप्न होता ? सुषुप्ति होती ? अगर हम न होते ? (17:11) उस गाने में तो था कि जाने क्या ? चूड़ी न होती , या पायल न होता अगर हम न होते ? इसी तरह का कोई गाना होगा। पर हमें तो यही लाईन ख्याल आता है कि - अगर हम न होते तो क्या स्वप्ने होते ? स्वप्ने तुम्हें हुए कि पड़ोसी को ? और नींद किसे आयी ? मुझे -माने मेरे रहने से हुई !  सुषुप्ति किसे हुई ? मुझे हुई। मेरे रहते हुई। और जगे , जगना मेरे रहते हुआ। मेरे रहने से जगना हुआ , मेरे रहते स्वप्ना हुआ। और जगे , तो जगना मेरे रहते हुआ , मेरे रहते स्वप्ना हुआ , मेरे रहते नींद हुई। "पर मैं कब हुआ यह बताओ ?" (17:46) मैं ही हूँ जो अजन्मा हूँ - 
न जायते म्रियते वा कदाचि

न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो

न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।2.20।।

भगवान ने गीता में कहा - यह आत्मा किसी काल में भी न जन्मता है और न मरता है और न यह एक बार होकर फिर अभावरूप होने वाला है। यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है,  शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता
तो गीता में सबकुछ है , पर हमें अनुभव में आ जाये तब समझेंगे। गीता हमारी अनुभूति बननी चाहिए। मैं हूँ ! मुझे से ही ये सब हो रहा है। - (मेरे - आत्मा के रहने के कारण ही) मेरे गुरुदेव बोला करते थे , जिसमें यह पूरा विश्वब्रह्माण्ड है -जिसके कारण ये सब है। जिसके करके ये सब , जिसके रहते ये सब ,जिसमें सब हो रहा है - सोऽहं ! [वही आत्मा सच्चिदानन्द मैं हूँ , सो अहं ! चिदानन्द रूपः शिवोहं शिवोहं !अमर आत्मा सच्चिदानद मैं हूँ,शिवोहं शिवोहं शिवोहं शिवोहं।
जिसे शस्त्र ना काटे ना अग्नि जलावे,गलावे ना पानी, ना मृत्यु मिटावे,वही आत्मा सचिदानंद मैं हूँ।
शिवोहं शिवोहं शिवोहं शिवोहं॥] हम वो हैं ! ये दिखने वाला हम नहीं , जो हो रहा है -होता हुआ दिख रहा है , ये हम नहीं हैं। जिसके रहते ये हो रहा है। (जिस चैतन्य के रहने से ये सब भास रहा है।) जिसके रहते जगना , जिसके रहते स्वप्ना , जिसके रहते नींद -सोऽहं ! सोऽहं  का अर्थ अभी ये मत समझो कि 'वो हम'! (18:47) वैसे स्वामी रामतीर्थ ने भी लिखा है -

 " मैं न बन्दा था , न मैं खुदा था ; मुझे मालूम न था।" 

क्योंकि वेदान्त दर्शन की दृष्टि से, मायो उपाधि का नाम ईश्वर है। अतःकरण उपाधि से युक्त आत्मा का नाम जीव है। [माया (शक्ति/उपाधि) से युक्त ब्रह्म को ईश्वर (सगुण ब्रह्म) कहा जाता है। जब शुद्ध ब्रह्म माया की शक्ति के साथ मिलकर ब्रह्मांड का सृजन, पालन और संहार करता है, तो उसे ईश्वर नाम दिया जाता है। इस दशा में ईश्वर सर्वज्ञ और सृष्टिकर्ता होते हैं जबकि माया के बिना ब्रह्म निर्गुण और निराकार है। अद्वैत वेदांत के अनुसार - अंतःकरण (मन,बुद्धि, चित्त, अहंकार) की उपाधि (सीमा/आवरण) से युक्त चेतन आत्मा को ही 'जीव' कहा जाता है। यह शुद्ध चैतन्य का सीमित रूप है,  जो अहंकार के कारण स्वयं को कर्ता-भोक्ता मानता है। जब यह उपाधि हटती है तब जीव पुनः ब्रह्म (शुद्ध आत्मा) स्वरूप हो जाता है।]                   
 तो स्वामी रामतीर्थ कहते हैं -'मैं जीव भी नहीं हूँ , मैं ईश्वर भी नहीं हूँ !'
'न मैं बन्दा न खुदा था, मुझे मालूम न था। -अर्थात 'हम ईश्वर हैं, ये हम नहीं कहते' - इस बात का ध्यान रखना। कई लोग वेदान्त को पढ़कर यही समझ लेते हैं कि हम ही ईश्वर -ब्रह्म हैं। ऐसा नहीं है - मैं बंदा भी नहीं हूँ , खुदा भी नहीं हूँ। ' क्योंकि खुदा (विष्णु या अवतार-वरिष्ठ) वो है जो माया की शक्ति रखता है। और जो अन्तःकरण (मन,बुद्धि , चित्त , अहंकार) के माध्यम से काम करता है , वो जीव है। पर
 'मैं न बंदा था , न खुदा था , मुझे मालूम न था। 
दोनों इल्लत से जुदा था, मुझे मालूम न था।। 
 मैं अपने को क्यों नहीं मिला ? 
वजह मालूम हुई तुझसे न मिलने की सनम। 
खुद ही पर्दा बना था , मुझे मालूम न था।।  
आप भुलाना आप में , बंध्यो आप ही आप। 
जिसको तूँ ढूँढ़त फिरे , सो तू आप ही आप।। 
एक कहानी सुनाकर समाप्त करेंगे - एक आदमी जाता था तो सामान भूल जाता है। तो किसी ने   कहा तुम लिख लिया करो। (20:16) पहले तो लोग आदत गिन लेते हैं। फिर किसी धर्मशाला में ठहरा तो किसी ने बता दिया था कि जहाँ सामान रखो , डायरी में नोट कर लो कि बैग रख दिया। अमुक जगह में सब रखो , सुबह चेक करके उठा लो। अब सामान चेक करने के लिए सुबह उठ गया। यह भी नोट कर लिया कि मैं खाट पर था। सब नोट कर लिया ,अब सुबह उठा तो बैग अटैची वहीँ मिल गई जहाँ लिखा था। और-और सामान वहीं मिल गए जहाँ रखा था, सब मिल गया। पर खाट में रखा खुद -'मैं' नहीं मिला। अब परेशान 'मैं ' कहाँ चला गया ? 'मैं ' कहाँ चला गया ? अब असल में देह को 'मैं' मान करके सोचता है। असल में 'मैं' तो वह है , जिसको देह का पता है। (20:58) देह का पता तो 'मैं ' (अविनाशी चैतन्य) को है। इसी तरह 'मैं'  मर गया यह क्यों सोचते हो ? हम इस बारे में अपना अनुभव बता देते हैं। एक बार तो हम मरे नहीं , फिर भी मर गए। जब मैं विद्यार्थी था , तब हमारी जन्मभूमि में एक 'महाशय जी' नामक वैद्य थे। हमारे समय में गाँवों बड़े-बड़े डॉक्टर कहाँ रहा करते थे ? पहले के घरेलू डॉक्टर को अब झोला-छाप कहकर उनको कोई पूछता नहीं है। पहले वही काम करते थे। वो वैद्य थे , और स्वप्ने में मैंने देखा कि निमोनिया से मेरी मृत्यु हो गयी। तो महाशय जी मेरा हाथ देखा , और कहा -ये तो खत्म हो गया। तो मैंने कहा - एक बार और देख लीजिये। क्योंकि सपना तो 'मैं' ही देख रहा हूँ , कि मैं मर गया ? अच्छा स्वप्न में मैं मर गया , ये कौन देखता है ? अच्छा स्वप्न में तुम मर जाओ , भगवान करे स्वप्न में तो मर जाओ। स्वप्न में मर जाओ , फिर देखो।  कि स्वप्न में जब मर गए थे , तब मर जाने का दुःख किसे हो रहा था ? (22:09) विद्या किसे कहते हैं ? आत्मज्ञानी कहते हैं - यही है समझने का समय। इससे अच्छा कोई समझा नहीं सकता। यह विषय बड़ा गंभीर है। स्वप्न में तुम्हारी मृत्यु हो गई; और तुम मर जाने से दुखी होतो जिन्दा हो , कि मर गए ? मैं मर गया , और मैं ही दुखी हूँ। अब मेरे मरने पर लोग भी रोने लगे। और मैं जीवन में दो बार मरा हूँएक बार निमोनिया से और एक बार एक हाथी ने मुझे मार डाला। और एक बार मार नहीं पाया - मगर मेरे पीछे पड़ गया - मैं भागा , भागा ,भागा ,भागा ,जब भागते-भागते लगा ये अब मूझे पकड़ लेगा। इसको कहते है - psychological. जैसे मन होता है , (वैसा रूप हो जाता है)। तो मैं एकदम आसमान में उड़ गया। देखो मनुष्य था ,अब चिड़िया बन गया। लोग कहते हैं न कैसे होता है -पुनर्जन्म ? तो मैं सचमुच स्वप्न में मनुष्य से चिड़िया बन गया। पर खूब खुश हुआ कि चलो मगर से पीछा छूट गया। पर अभी था स्वप्न में ही। बच तो गया पर ये भी स्वप्न है ? पर इसी तरह हाथी ने भी मार दिया। तब उस समय वेदान्त मेरे पास आ गया। मैं तब गुरुदेव के साथ ऋषिकेश में था। तो हाथी ने मार दिया , और मेरे एक पैर पर हाथी ने एक पैर रखा , और दूसरे पैर को सुँढ़ से  पकड़ कर मुझे फाड़ दिया। मैं मर गया। अब हाथी जा रहा है , तो मुझे ख्याल आ गया कि मैं कहाँ मरा ? मैं तो देख रहा हूँ कि हाथी जा रहा है। तो स्वप्न में देख रहे हो ये ख्याल नहीं आता। जो देख रहे हो वो तो पक्का है। मैं मर गया - ये तो पक्का , मैं ऐसा -(चिड़िया) हो गया। ये तो पक्का है। लेकिन 'मैं' मर गए को देख रहा हूँ , तो ये है समझ (विवेक?) । और पशु ये विवेक नहीं कर सकता। (24:06) जो बार-बार मनुष्य शरीर की महिमा है , वो ये है कि आप जो घटना घट गयी कि -मैं मर गया। तो प्रश्न उठना चाहिए कि 'मैं मर गया हूँ', इस बात का पता मुझे है कि पड़ोसी को ? और यदि मुझे पता है , तो मैं मर गया हूँ या जिन्दा हूँ ? और मर गए का दुःख मुझे इसलिए नहीं कि  - जौं सपनें सिर काटै कोई। बिनु जागें न दूरि दुख होई।।  
यदि स्वप्न में सिर कट गया तो , दुःखी कौन होता है ? अभी तो तुम ही मरे हो, और तुम्हीं दुःखी हो। अभी तो तुम्हारे सिवा किसी को पता ही नहीं - तुम्हीं मरे हो और तुम्हीं दुःखी हो ?   
[एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई।।जौं सपनें सिर काटै कोई। बिनु जागें न दूरि दुख होई।।इसी तरह यह संसार भगवान के आश्रित रहता है। यद्यपि यह असत्य है, तो भी दुःख तो देता ही है, जिस तरह स्वप्न में कोई सिर काट ले तो बिना जागे वह दुःख दूर नहीं होता।] तो अपने मरने का दुःख कब हुआ?  जब जिन्दा हो तब हुआ कि या मर गए थे तब हुआ? यहीं पर अक्ल (मूढ़बुद्धि) काम नहीं करती।
इसलिए भारत के आध्यात्मिक ऋषि वैज्ञानिकों को (डार्विन का सिद्धान्त देने वालों को) हम बुद्धिमान नहीं मानते। इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ। एतत् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स कृत-कृत्यः च भारत। 15.20।। हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह गुह्यतम शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया, इसको जानकर मनुष्य बुद्धिमान और कृतकृत्य हो जाता है।। हमारे यहाँ चिड़िया बनकर उड़ जाने वाले को बुद्धिमान कहकर सम्बोधित नहीं किया जाता है। (24:57) बड़े योगाभ्यास से आयु बढ़ाने का नाम बुद्धिमान नहीं है। यह जो अनुभूति होती है , उस अनुभूति के तुम द्रष्टा हो ! उस अनुभूति के तुम साक्षी हो। अनुभूति तो ख्याल है , अनुभूति आती है , जाती है। अनुभूति आती-जाती रहती है , तुम नहीं आते-जाते हो। इसलिए ये ख्याल में आना आत्म-स्मरण है ,आत्म-स्मरण करना कोई भाग्यशाली जानता है। (25:23) 
तुम जब टेंशन में होते हो , तो संसार है -दिमाग में, मन में टेंशन है। तो तुम कौन हो ? देह हो या मन ? मन के माने - तुम ख्याल करो कि ये जो टेंशन है , ये ख्याल है -इसका साक्षी कौन है ? द्रष्टा कौन है ? मैं कौन हूँ ? तो 'मैं' (चैतन्य) कहीं नहीं जाता। तो ये उस आदमी की तरह, कि तुम खाट में नहीं हो। यही हालत है। मेरे देह को मार दिया, तो मुझे लगा कि मैं मर गया। जैसे वो खाट में नहीं है , तो देखता है , मैं अब खाट में नहीं हूँ। तो मैं खाट में नहीं हूँ कि, हूँ ही नहीं मैं ? मैं हूँ तभी तो खाट में नहीं हूँ को ढूँढ रहा हूँ। तो इसी तरह से यदि देहान्त हो गया , हाथी ने फाड़ दिया , स्वप्न में हाथी ने मुझे मार दिया। तो मर जाने का दुःख किसे हो रहा है ? मुझे ! तो इसका मतलब मैं हूँ। और यदि ये ख्याल आ जाये कि मैं अभी हूँ , तो मैं मरा नहीं। लो मृत्यु गयी ! इसलिए आत्मस्मृति आते ही मृत्यु चली गई। (26:21) इसलिए ध्यान करते देह छोड़ते हैं उन्हें मृत्यु नहीं है।  इसलिए तुम्हें नींद पहले तुम आत्मस्मरण करो।  देह को कम स्मरण करो , मन का भी स्मरण करो, पर तुम कौन हो ? तुम मन हो क्या ? तुम देह हो क्या ? तुम्हें तो मन का पता है , उस मन के साक्षी हो। इसलिए निष्कर्ष यह कि तुम साक्षी हो ! और जो साक्षी है , वही ब्रह्म है। साक्षी इस मन से सीमित नहीं है। क्योंकि जो सर्वव्यापक है , सब जगह है , सर्वगत है , वही यहाँ साक्षी कहलाता है। जो यहाँ साक्षी कहलाता है , यही व्यापकता की दृष्टि से ब्रह्म कहलाता है। इसका चिंतन-मनन करते रहना। हो सके तो माण्डूक्य उपनिषद पढ़ा करें। उससे बहुत बातें समझ आ जायेंगी। और जब कुछ तुम समझ लोगे तभी फिर कभी मिलना हुआ तो इशारे से बात पकड़ आ जाएगी। इसलिए स्वयं भी मिहनत करना चाहिए। और भगवान ने कह दिया - बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः।।4.10।। धूप में बैठनेवाले नहीं , भूखे मरने वाले नहीं। और भी कई तरह के तप करने वाले भी नहीं। भगवान ने कहा - बहवो ज्ञानतपसा। पूता मद्भावमागताः। बहुत से लोग ज्ञान  तप से पवित्र होकर मेरे भाव को अर्थात ब्रह्मभाव को प्राप्त हुए हैं। तो आप भी ब्रह्मभाव को प्राप्त कर सकते हो। इतने छोटे तो हम नहीं थे पर काफी बड़े थे , तो गुरुदेव के हम दर्शन करने गए। उनकी महिमा किसी ने बताई तो दर्शन करने गए थे। तो सुबह से सत्संग शुरू हुआ हम दोपहर का भोजन तक नहीं किया। पूरा दिन हम सुनते रहे , रात को आठ बजे भोजन किया था। इतना हमको अच्छा लगा। तो छोटे बच्चे ज्यादा समझदार होते हैं। ज्यादा ईमानदार होते है। सोचते है की कर्म का फल अवश्य मिलता है , तो सत्कर्म करना चाहिए। लेकिन अगले जन्म तक बुरा न करूँ ये याद रहेगा क्या ? ये प्रतिज्ञा याद रहेगी तो लगा कहीं अगले जन्म में गड़बड़ हुई तो ? तो सुना था जिसको परमात्मा मिल जाता है , वो लौट कर नहीं आता। फिर सुना जिसको ऐसे गुरु मिल जाते हैं , हमारे गुरु ब्रह्मलीन स्वामी अखण्डानन्द जी महाराज उनका जब प्रभाव और प्रचार सुना ,इतनी लग्न लग गयी। और शादी को यूपी में लगन लगती है। पहले लग्न लगती है। पहले लगन लगती है। लगनौती चढ़ती है। फिर शादी होती है।  तो हमने देखा , कि जब लग्न के बिना शादी नहीं होती , तो लग्न के बिना भगवान थोड़े ही मिलेगा। इसलिए लग्न लग जायेगा तो काम बन जायेगा। ॐ शांति , ॐ शांति,ॐ शांति !                                    
कौन जागता है? - जिसको सत् और असत् का ज्ञान है। 
शत्रु कौन है? - अपनी इन्द्रियां । 
परन्तु यदि वश में रक्खी जाय तो वही मित्र का काम करती है ।

बुद्धिमत्ता का एक विशेष लक्षण है-अनेक में एक को देखना और एक में अनेक को पाना! बुद्धि विभाजन भी करती है और सम्मिलन भी! मनुष्य में दोनों योग्यतायें हैं! वह विभाजन भी करता है और सम्मिलन भी!
जब हम सापेक्षिक संसार का विश्लेषण करते है और उस एक की खोज में सम्मिलन करते है तो बुद्धि स्वत:सत्य की खोज में विभाजन करती है! 
इसी प्रकार बुद्धि जब शांत और निर्मल होती है तब प्रज्ञा प्रखर होती है! हम समझते है कि जानकारी हासिल करके वे प्रज्ञावान बन सकते है जबकि एसा नही है! सच तो यह है कि समाधि ही प्रज्ञा लाती है! एक बुद्धिहीन व्यक्ति चाहे कितनी ही जानकारी रखता हो वह सृजनात्मक कार्यों का संपादन नही कर सकता!इसके विपरीत प्रज्ञावान जानकारियों के न होने पर भी सृजनात्मक हो सकता है!
स्वयं में ईश्वर को देखना ध्यान है,दूसरे में ईश्वर को देखना प्रेम है और सर्वत्र ईश्वर को देखना ज्ञान है!
 गुरुजी से शिष्य ने कहा,"गुरुदेव ! एक व्यक्ति ने आश्रम के लिए गाय भेंट की है।" गुरुजी ने कहा,"अच्छा हुआ ! दूध पीने को मिलेगा।"एक सप्ताह पश्चात शिष्य ने गुरुजी से आकर कहा,"गुरुदेव ! जिस व्यक्ति ने गाय दी थी,वह आज अपनी गाय वापिस ले गया।" गुरुजी ने कहा,"अच्छा हुआ ! गोबर उठाने के झंझट से मुक्ति मिलेगी।" अर्थात...♻️ ऐसा व्यक्ति जो हर हाल में राजी हो,उसे कोई भी दु:ख दु:खी नहीं कर सकता। जब परिस्थिति बदले तो अपनी मन:स्थिति बदल लो। बस ! दु:ख सुख में बदल जाएगा। सुख -दु:ख दोनों आखिर मन के ही तो समीकरण हैं। नज़रें   बदल   गईं  तो  नज़ारे   बदल   गए।   किश्ती का रुख बदला तो किनारे बदल गए।।


 

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