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शनिवार, 21 मार्च 2026

⚜️️🔱श्रीमद् भगवद्गीता : अध्याय -10⚜️️🔱ऋग्वेद का सार ही सामवेद है⚜️️🔱पराभक्ति को प्राप्त भक्त ⚜️️🔱 परमात्मा और आत्मा का अद्वैत -अविकम्प योग है ? ⚜️️🔱अविकम्प योग के द्वारा ब्रह्मनिष्ठता ⚜️️🔱समष्टि और व्यष्टि की सृष्टि के कारण : सप्तर्षि, सनकादि चार कुमार और चौदह मनु ⚜️️🔱सप्तर्षि समष्टि सृष्टि के , और चार मानस पुत्र व्यष्टि सृष्टि के निमित्त और उपादान कारण हैं।⚜️️🔱

  ⚜️️🔱विभूतियोग ⚜️️🔱

 दशम अध्याय का सारामृत

       श्रीभगवान की सबसे बड़ी विभूति यही है कि विशवानुगत होकर भी विश्वातीत हैं , प्रपंचा-भिमानी होकर भी प्रपंचातीत हैं। वे निर्गुण होते हुए भी सगुण की तरह प्रतीत होते हैं, वे एक होकर भी अनेक की तरह प्रतीत होते हैं।
       वेदों में जिन्हें 'अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः।' इत्यादि तथा - 'अंगुष्ठमात्रः पुरुषः '/सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। / नमस्ते नमस्ते अस्तु विद्युते नमस्ते स्तनयित्नवे ।/ इत्यादि वाक्यों में स्तुति की गयी है। इसी कारण ऊपर से विरुद्ध स्वभाव वाले श्रीभगवान का ज्ञान अत्यन्त दुर्लभ है। 
     'अविज्ञातं विजानतां, विज्ञातम् अविजानताम् । (- केनोपनिषत् २-३) अर्थात जो कहते हैं परब्रह्म या भगवान को हम जानते हैं , वे उन्हें नहीं जानते और जो कहते हैं कि परब्रह्म को हम नहीं जानते , वे ही उन्हें जानते हैं। क्योंकि वे अज्ञेय हैं, इसे वे समझ गए हैं। 
     श्रीरामकृष्णदेव ने कहा है - " उनका अर्थात भगवान का अन्त नहीं किया जा सकता। उनका कार्य मनुष्य क्या समझेगा ? उनके अनन्त कार्य हैं। उन्हें कौन जानेगा ? मैं जानने की चेष्टा नहीं करता , केवल माँ माँ कहकर पुकारता हूँ , माँ चाहे जो करें। " इत्यादि 
     श्रीभगवान ने इस अध्याय के प्रारम्भ में ही कहा है - मेरा स्वरुप तत्व देवता भी नहीं जानते , क्योंकि मैं उनका भी आदि कारण हूँ अर्थात वे भी श्रीभगवान से ही उत्पन्न हैं। श्रीभगवान बताते हैं कि वे सृष्टि में प्रकट प्रत्येक वस्तु का स्रोत हैं। मनुष्यों में विविध प्रकार के गुण उन्हीं से उत्पन्न होते हैं। सात महर्षि, चार ऋषि और चतुर्दश मनु का जन्म उनसे हुआ और बाद में संसार के सभी मनुष्य इनसे प्रकट हुए।
अर्जुन के पूछे जाने पर श्री भगवान ने कहा है - " मेरी विभूतियों का अन्त नहीं है। मैं प्राणियों का आदि , मध्य और अन्त हूँ। आदित्यों में मैं विष्णु , ज्योतिषयों में मैं सूर्य , नक्षत्रों में मैं चन्द्र, देवताओं में मैं इन्द्र , रुद्रों में मैं शंकर , वायुओं में मैं मरीचि हूँ। .....जो कुछ श्रीसम्पन्न या विशेष शक्तिपूर्ण हैं वे सभी मेरी शक्ति का मामूली प्रकाश मात्र है। मैं ही एकांश में समस्त जगत व्याप्त किये हुए हूँ। " 
छोटा सा मनुष्य उनकी पूर्ण महिमा कैसे समझेगा ? इसलिए श्री भगवान ने कृपा पूर्वक अर्जुन को लक्ष्य कर जगतवासियों के लिए उन्हें पाने का सहज उपाय बता दिया है - " जो लोग मुझमें चित्त अर्पण कर भक्ति से मेरी उपासना करते हैं , वे मुझे पाने में समर्थ होते हैं। " 
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श्री भगवानुवाच
भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया।।10.1।।
।।10.1।। श्रीभगवान् ने कहा -- हे महाबाहो ! पुन: तुम मेरे परम वचनों का श्रवण करो, जो मैं तुझ अतिशय प्रेम रखने वाले के लिये हित की इच्छा से कहूँगा।।

।।10.1।। प्रथम अध्याय के अनिश्चय की स्थिति में देखे गये कम्पित अर्जुन ने अब तक एक अतुलनीय आन्तरिक सन्तुलन प्राप्त कर लिया था। हिन्दू दर्शन के बुद्धिमत्तापूर्वक किये गये अध्ययन से जो आन्तरिक शान्ति प्राप्त होती है उसे भगवान् इस अध्याय के प्रारम्भ में ही अपने शिष्य अर्जुन को प्रीयमाण कहकर स्पष्ट करते हैं। प्रीयमाण का अर्थ है जो प्रसन्न हो।
        यहाँ अर्जुन की प्रसन्नता का कारण भगवान् के उपदेश का श्रवण है। शिष्यों के उत्साह एवं रुचिपूर्ण श्रवण से गुरु का उत्साह भी द्विगुणित हो जाता है। वेदान्त दर्शन के गूढ़ अभिप्रायों को अधिकाधिक समझने पर आन्तरिक शान्ति और सन्तोष का अनुभव हुए बिना नहीं रह सकता।
      गीताचार्य श्रीकृष्ण पुन उत्साह से भरकर इस ज्ञान का विस्तार से वर्णन करते हैं। पुन तुम मेरे परम वचनों को सुनो? जो मैं तुम्हारे हित की इच्छा से कहूँगा।
यहाँ अर्जुन को महाबाहो कहकर सम्बोधित किया गया है। यह सम्बोधन अर्जुन को इस बात का स्मरण कराता है कि उसको अपने आन्तरिक जीवन में भी एक वीर पुरुष के समान प्राप्त परिस्थिति में से ही एक दिव्य आनन्द के राज्य का निर्माण करना चाहिए जो कि उसकी वास्तविक धरोहर है। यह स्पष्ट है कि भगवान् का प्रवचन किसी लौकिक विषय पर न होकर मनुष्य में ही निहित आध्यात्मिक श्रेष्ठता की सम्भावनाओं तथा उन्हें उजागर करने के उपायों पर है। 
 क्योंकि यहाँ कहा गया है कि तुम मेरे परम वचनों को सुनो जो मैं तुम्हारे (आध्यात्मिक) हित की इच्छा से कहूंगा।
पुनः प्रवचन प्रारम्भ करने का क्या प्रयोजन है? इसे वे अब बताते हैं --

न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः।।10.2।।

।।10.2।। मेरी उत्पत्ति (प्रभव) को न देवतागण जानते हैं और न महर्षिजन; क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का भी आदिकारण हूँ।।
।।10.2।। जब कभी हम प्रत्यक्ष प्रमाण या अनुभव के द्वारा कोई ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते हैं तब हम उसे उस विषय के ज्ञाता पुरुषों से समझना चाहते हैं। उन्हें आप्त पुरुष कहा जाता है। 
किन्तु ब्रह्मविद्या के क्षेत्र में आत्मप्रशिक्षण की यह अप्रत्यक्ष विधि भी कठिन है।  क्योंकि,  भगवान् कहते हैं मेरी उत्पत्ति को न देवतागण जानते हैं और न महर्षिजन। बाद में भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही स्पष्ट करेंगे कि महर्षि शब्द से उनका निश्चित अभिप्राय क्या है। 
ये महर्षिगण पुराणों में बताये हुए भृगु आदि सप्त ऋषि नहीं है। सप्त ऋषियों का दार्शनिक अर्थ निम्न प्रकार से है। 
      जब अनन्तस्वरूप ब्रह्म केवल आभासिक रूप से समष्टि बुद्धि (महत् तत्त्व) के साथ तादात्म्य को प्राप्त कर अपना एक व्यक्तित्व प्रकट (अहंकार) करता है तब वह स्वयं ही स्वयं को? स्वयं के आनन्द के लिए इस विषयात्मक जगत् में प्रपेक्षित करता है अथवा व्यक्त करता है। 
      वास्तव में ये भोग के विषय सूक्ष्म होते हैं जिन्हें तन्मात्रा कहते हैं। इन  बको पुराणों में सप्त ऋषि कह कर विभिन्न नाम भी दिये गये हैं वे सप्तर्षि हैं महत् तत्त्व, अहंकार और पंचतन्मात्राएं। 
     पुराणों में इन्हें मानवीय रूप दे दिया गया है। संयुक्त रूप में ये सप्तर्षि मनुष्य के बौद्धिक और मानसिक जीवन के तथा सृष्टि के निमित्त और उपादान कारण के प्रतीक हैं। 
देव (सुर) शब्द का वाच्यार्थ स्वर्ग के निवासी यहाँ अभिप्रेत नहीं है।  यद्यपि वह अर्थ भी संभव है। देव शब्द द्यु धातु से बनता है,  जिसका अर्थ है प्रकाशित करना। अत हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ ही वे देव हैं जो हमारे असंख्य अनुभवों के लिए विषयों को प्रकाशित करते हैं।
    इसलिए यह कथन उचित ही है कि चिन्मय स्वरूप मैं सब देवगणों तथा महर्षिजनों का आदिकारण हूँ। अर्थात् आत्मा हमारे स्थूल और सूक्ष्म शारीरिक और मानसिक जीवन का अधिष्ठान है।
 यद्यपि वे इस सत्य आत्मा में ही स्थित रहते हैं किन्तु वे मेरे प्रभव को नहीं जान सकते।चैतन्य आत्मा हमारे हृदय में द्रष्टा के रूप में स्थित है इसलिए वह इन्द्रियों का दृश्य विषय या मन की भावना अथवा बुद्धि के ज्ञान का विषय कदापि नहीं बन सकता। 
  तब क्या यह सत्य है कि सम्पूर्ण जगत् के आदिकारण इस आत्मा का ज्ञान और अनुभव किसी को भी नहीं हो सकता है ऐसी आशंका को दूर करने के लिए भगवान् कहते हैं --
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते।।10.3।।
।।10.3।। जो मुझे अजन्मा, अनादि और लोकों के महान् ईश्वर के रूप में जानता है, र्मत्य मनुष्यों में ऐसा सम्मोहरहित (ज्ञानी) पुरुष (मूढ़बुद्धि नहीं शुद्ध बुद्धि या विवेकी बुद्धि) सब पापों से मुक्त हो जाता है।।

     "जो मुझे जानता है" -- यह जानना केवल भावना के प्रवाह में अथवा बुद्धि के विचारों से जानना नहीं है वरन् यह पूर्ण और वास्तविक आत्मानुभूति है,  जो आत्मा के साथ घनिष्ठ तादात्म्य के क्षणों में होती है। 
 आत्मा को किसी दृश्य के समान नहीं किन्तु स्वस्वरूप से इस प्रकार जानना है कि वह अजन्मा, अनादि और सर्वलोकमहेश्वर है।  जो लोग वेदान्त दर्शन की प्राचीन परम्परा से कुछ परिचित हैं उनके लिए उपर्युक्त ये तीन विशेषण अत्यन्त सारगर्भित हैं।  जबकि उससे अनभिज्ञ लोगों को ये विशेषण निरर्थक ही प्रतीत होंगे। 
अनात्म जड़ जगत् finite या ससीम या सीमित है जहाँ कि प्रत्येक वस्तु, प्राणी (स्थूल शरीर, इन्द्रिय, मन,बुद्धि) या विषयों के अनुभव अनित्य हैं, अर्थात्  समस्त वस्तुएं सभी नामरूप आदि (जन्म) और अन्त (मत्यु) से युक्त हैं
असीम अनन्त परमात्मा (आत्मा) का कभी जन्म नहीं हो सकता , क्योंकि जो उत्पन्न हुआ है वह सीमित है। और किसी भी सीमित वस्तु में अनन्त तत्त्व कभी अपने अनन्त स्वरूप में व्यक्त नहीं हो सकता
 आत्मा नित्य सनातन है इसलिए वह जन्मरहित है। अन्य वस्तुओं का जन्म, स्थिति और नाश इस आत्मा में ही होता है। तरंगे समुद्र से उत्पन्न होती हैं परन्तु समुद्र स्वयं अजन्मा है। प्रत्येक तरंग का आदि है मध्य है और अन्त भी। किन्तु उन सबका सारतत्त्व इन समस्त विकारों से सर्वथा मुक्त है।और इसलिए  इस श्लोक में आत्मा को 'अनादि'  विशेषण दिया गया है।
   लोकमहेश्वर लोक शब्द जिस धातु से बनता है उसका अर्थ है देखना अनुभव करना। अत इसका सम्पूर्ण अर्थ होगा अनुभव का क्षेत्र। हमारे दैनिक जीवन में भी इसी अर्थ में लोक शब्द का प्रयोग किया जाता है - जैसे धनवानों का लोक,  अपराधियों का लोक, विद्यार्थी लोक, कवियों का लोक आदि। इसलिए उसके व्यापक अर्थ में लोक शब्द से मात्र भौतिक जगत् ही नहीं बल्कि भावनाओं एवं विचारों के जगत् का भी बोध होता है। 
इस प्रकार मेरा लोक वह है जो मैं अपने शरीर, मन और बुद्धि के द्वारा अनुभव करता हूँ। यह तो स्पष्ट है कि जब तक मुझे इनका निरन्तर भान नहीं होता तब तक ये अनुभव मेरे नहीं हो सकते। यह चैतन्य तत्त्व जिसके कारण ही मैं जीता हूँ और जगत् का अनुभव करता हूँ वास्तव में मेरे लोक का ईश्वर होना ही चाहिए। जो मेरे व्यष्टि के विषय में सत्य है वही जगत् के समस्त प्राणियों के विषय में भी सत्य है।  क्योंकि आत्मा सर्वत्र एक ही है।  इस समष्टि लोक का शासक महान् ईश्वर स्वयं परमात्मा ही हो सकता है। यह लोक महेश्वर शब्द का वास्तविक अर्थ है। आत्मा हमारे लोक का ईश्वर ऐसे ही है जैसे दिन के समय सूर्य इस बाह्य जगत् का स्वामी है।  क्योंकि वही जगत् को प्रकाशित करता है। 
जो मुझे अजन्मा, अनादि और लोक महेश्वर के रूप में जानता है वह सम्मोहरहित हो जाता है।झुरमुठ में भूत  देखकर भयभीत व्यक्ति जैसे ही टॉर्च के लाईट में  उस झुरमुठ को  पहचानता है,  वैसे ही वह मोह और भ्रान्ति से मुक्त हो जाता है।
 हिन्दू धर्म में मनुष्य अपने पापों के लिए दण्डित नहीं होता, वरन् अपने पापों के द्वारा ही दण्डित होता है। जिसका कारण है मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप का अज्ञान। जब कोई व्यक्ति अपने शुद्ध आत्मस्वरूप से भटक कर दूर चला जाता है तब वह जगत् की घटनाओं के साथ तादात्म्य कर सुख-दुख का अनुभव करता है। 
एक बार आत्मस्वरूप को पहचान कर उसमें प्रतिष्ठित हो जाने पर / दृढ़ निष्ठा प्राप्त कर लेने पर वह व्यक्ति पुन कभी पापकर्म में प्रवृत्त नहीं होता। पापवृत्तियाँ वे विषैले फोड़े हैं जिनके कारण हम अपनी परिच्छिन्नताओं की पीड़ा और बंधनों के दुख सहते रहते हैं। जिस क्षण हम अपने आत्मस्वरूप को पहचानते हैं कि वह अजन्मा और अनादि है तथा उसका विकारी और विनाशी उपाधियों M/F शरीर के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है उस समय हम वह सब कुछ प्राप्त कर लेते हैं जो जीवन में प्राप्तव्य है,  और वह सब कुछ जान लेते हैं जो ज्ञातव्य है।
 ऐसा सम्यक् तत्त्वदर्शी पुरुष (शुद्ध बुद्धि) विवेकी नुद्धि  स्वयं ही लोकमहेश्वर बन जाता है। जो कुछ बनना है - बुद्धि को ही बनना है।  
निम्न कारण से भी (शुद्ध बुद्धि) आत्मा लोकमहेश्वर है --

बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः।

सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च।।10.4।।

।।10.4।। बुद्धि, ज्ञान, मोह का अभाव, क्षमा, सत्य, दम (इन्द्रिय संयम), शम (मन: संयम), सुख, दु:ख, जन्म और मृत्यु, भय और अभय।।

अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः।।10.5।।

।।10.5।। अहिंसा, समता, सन्तोष, तप, दान. यश और अपयश ऐसे ये प्राणियों के नानाविध भाव मुझ से ही प्रकट होते हैं।।

प्रस्तुत प्रकरण के विचार को ही आगे बढ़ाते हुए कि परमात्मा ही सम्पूर्ण विश्व का उपादान और निमित्त कारण है। भगवान् श्रीकृष्ण इन दो श्लोकों में उन विविध गुणों को गिनाते हैं जो मनुष्य के मन और बुद्धि में व्यक्त होते हैं। 
साधारणतः सृष्टि शब्द से केवल हम स्थूल भौतिक जगत् ही समझते हैं।  परन्तु उपर्युक्त समस्त गुण उसके व्यापक एवं सर्वग्राहक अर्थ को सूचित करते हैं। उनसे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि आकार वाला जगत् शब्द के अर्थ में हमारे निराकार मानसिक और बौद्धिक जीवन भी सम्मिलित हैं।
पुनः सभी मनुष्यों और प्राणियों का वर्गीकरण इन्हीं गुणों के आधार पर किया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने गुण या स्वभाव के वशीभूत है। जैसी बुद्धि /जैसी मति वैसी गति /यथा मन तथा मनुष्य। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यहाँ केवल शुभ दैवी गुणों का ही गणना की गई है।
क्योंकि जिस व्यक्ति में इन गुणों का अधिकता होती है उसकी शुद्ध बुद्धि में आत्मा की शुद्धता एवं दिव्यता के दर्शन होते हैं। 
इन विभिन्न प्रकार की भावनाओं एवं विचारों से प्रेरित होकर प्रत्येक व्यक्ति अपनेअपने विवेकी या अविवेकी बुद्धि के संस्कारों के अनुसार कर्म में प्रवृत्त होता है। इस प्रकार यहाँ विविध प्रकार के जीवन/मनुष्य दृष्टिगोचर होते है। ये समस्त गुण विवेक-अविवेक मुझसे ही प्रकट होते हैं
 आत्मचैतन्य के बिना शुद्धबुद्धि या मूढ़बुद्धि, विवेक या अविवेक आदि गुणों का न अस्तित्व है और न भान। 
इन गुणों के द्वारा सम्पूर्ण प्राणियों का तथा उनके अनुभवों का प्राय पूर्ण वर्गीकरण किया गया है। इसलिए जैसा कि शंकराचार्य कहते हैं  ये दो श्लोक आत्मा (इष्टदेव) का सर्वलोकमहेश्वर होना सिद्ध करते हैं।
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः।।10.6।।

।।10.6।। सात महर्षिजन, पूर्वकाल के चार (सनकादि) तथा (चौदह) मनु ये मेरे प्रभाव वाले मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी संसार (लोक) में यह प्रजा है।।
    इस अध्याय के दूसरे श्लोक में जिस सिद्धांत का संकेत मात्र किया गया है कि किस प्रकार सप्तर्षि, सनकादि चार कुमार और चौदह मनु, परमेश्वर के मन से उत्पन्न हुए हैं। ये सभी मिलकर जगत् के उपादान और निमित्त कारण हैं।  क्योंकि यहाँ कहा गया है इनसे यह सम्पूर्ण प्रजा उत्पन्न हुई है।
       सप्तर्षि जिन्हें पुराणों में मानवीय रूप में चित्रित किया गया है वे सप्तर्षि अध्यात्मशास्त्र की दृष्टि से महत् तत्त्व, अहंकार और पंच तन्मात्राएं हैं। इन सब के संयुक्त रूप को ही जीव- जगत् कहते हैं। 
सप्तर्षियों के रूपक का आशय व्यक्तिगत दृष्टि से समझना बहुत सरल है। हम जानते हैं कि जब हमारे मन में कोई संकल्प जब उठता है तब वह स्वयं हमें किसी भी प्रकार से विचलित करने में समर्थ नहीं होता। परन्तु किसी एक विषय के प्रति जब यह संकल्प केन्द्रीभूत होकर कामना का रूप ले लेता है, तब कामना में परिणित वही संकल्प अत्यन्त शक्तिशाली बनकर हमारी शान्ति और सन्तुलन को नष्ट कर देता है। 
   >>>मन में कामिनी-कांचन या नाम-यश (3K) के प्रति आकर्षण से प्रेरित ये संकल्प ही बाहर प्रक्षेपित होकर पंच विषयों का ग्रहण और उनके प्रति हमारी प्रतिक्रियायें व्यक्त कराते हैं। यह संकल्पधारा और इसका प्रक्षेपण ये दोनों मिलकर हमारे सुख-दुख पूर्ण यश-अपयश तथा प्रयत्न और प्राप्ति के छोटे से जगत् के निमित्त और उपादान कारण बन जाते हैं
श्री शंकराचार्य अपने भाष्य में पूर्वकाल पूर्वकाल के चार (सनकादि) और मनु का पदच्छेद करते हैं कि पूर्वकाल सम्बन्धी भृगु आदि सप्त महर्षि और पहले होने वाले चार (सनकादि) मनु।  जिनका अतीत काल से सम्बन्ध है और जो सावर्ण इस नाम से पुराणों में प्रसिद्ध हैं। [सावर्ण (सावर्णि/सावर्ण्य) मुख्य रूप से एक हिंदू ब्राह्मण गोत्र है, जो ऋषि सावर्ण मुनि के वंशज माने जाते हैं। इस गोत्र में कान्यकुब्ज और सरयूपारीण ब्राह्मण शामिल होते हैं। जिनके आराध्य मुख्य रूप से भगवान विष्णु होते हैं। यह एक प्राचीन गोत्र और ऐतिहासिक परिवार (सावर्ण रायचौधुरी) से संबंधित है।  ये कान्यकुब्ज ब्राह्मणों की शाखा जो रामायण काल में अयोध्या के सरयूपार क्षेत्र में स्थापित हुए थे। ये मुख्य रूप से शुक्ल, मिश्र, पांडे, तिवारी, दुबे, पाठक, ओझा और उपाध्याय उपजातियों में बंटे हैं।]
लेकिन यहाँ इसका आध्यात्मिक विश्लेषण करना उचित है जिसके लिए हमें दूसरी पंक्ति में आधार भी मिलता है। भगवान् कहते हैं ये सब मेरे मन से अर्थात् संकल्प से ही प्रकट हुए हैं।पुराणों में ऐसा वर्णन किया गया है कि सृष्टि के प्रारम्भ में ही सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी से चार मानस पुत्र सनत्कुमार सनक, सनातन और सनन्दन का जन्म हुआ। 
  
#प्रत्येक व्यक्ति (व्यष्टि) में अन्तर्निहित सृजन शक्ति अथवा सृजन की प्रवृत्ति के माध्यम से व्यक्त चैतन्य ही व्यष्टि सृष्टि का निर्माता है। प्रत्येक व्यक्ति में निहित यह चैतन्य (आत्मा-इष्टदेव) में अन्तर्निहित सृजन शक्ति ही अन्तःकरण के चार भागों में -व्यक्त होकर - चित्त (मनवस्तु -पूर्वज्ञान का स्मरण), मन का संकल-विकल्प (क्या है जिज्ञासा ?) बुद्धि -मूढ़ बुद्धि / विवेकबुद्धि का निर्णय ? और कर्तृत्वाभिमान (अहंकार) में जब व्यक्त होती है, तभी  किसी प्रकार का निर्माण कार्य होता है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार इन चारों को उपर्युक्त चार मानस पुत्रों के द्वारा इंगित किया गया है। {सनक: पुरातन (पुरानी ऊर्जा)।सनन्दन: हर्षित (आनंदित अवस्था)। सनातन: जीवंत या शाश्वत (Eternal)।सनत्कुमार: चिर तरुण (हमेशा युवा रहने वाले)।}  
     इस प्रकार एक ही श्लोक में समष्टि और व्यष्टि की सृष्टि के कारण बताए गए हैं। समष्टि सृष्टि की उत्पत्ति एवं स्थिति के लिए महत् तत्त्व अहंकार और पंच तन्मात्राएं कारण हैं। ? जबकि व्यष्टि सृष्टि का निर्माण मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार की क्रियाओं से होता हैसंक्षेप में सप्तर्षि समष्टि सृष्टि के तथा चार मानस पुत्र व्यष्टि सृष्टि के निमित्त और उपादान कारण हैं।

व्यष्टि और समष्टि की दृष्टि से सृष्टि (जीव -जगत और ईश्वर) के अभिप्राय को समझने की क्या आवश्यकता है ?  सुनो -- 
(अविकम्प योग)
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः।।10.7।।
।।10.7।। जो पुरुष इस मेरी विभूति और योग को तत्त्व से जानता है, वह पुरुष अविकम्प योग (अर्थात् निश्चल ध्यान योग) से युक्त हो जाता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।।

      जो इस मेरी विभूति और योग को तत्त्व से जानता है वह ब्रह्मज्ञान में निष्ठा प्राप्त करता है। इस श्लोक में प्रयुक्त इन दो शब्दों विभूति और योग का जो अर्थ सदैव बताया जाता है वह क्रमश भूतमात्र का विस्तार और ऐश्वर्य सार्मथ्य है।यद्यपि ये अर्थ सही हैं , तथापि वे इतने प्रभावी नहीं हैं कि पूर्व श्लोक में वर्णित सिद्धांत और इस श्लोक के साथ उसकी सूक्ष्म और सुन्दर संगति को व्यक्त कर सकें। 
सप्तर्षियों के माध्यम से समष्टि विश्व की अभिव्यक्ति ही परमात्मा की विभूति है।  जबकि चार मानस पुत्रों द्वारा सृष्ट जीव (व्यष्टि) के अनुभव का जगत् आत्मा का दिव्य योग है। व्यष्टि जीव के जगत् का अधिष्ठान आत्मा (इष्टदेव) ही परमात्मा (ब्रह्म) है, जो सम्पूर्ण विश्व का आधार है। अतएव यहाँ यह  कहा गया है कि जो पुरुष विभूति और योग इन दोनों को ही परमात्मा की दिव्य अभिव्यक्ति के रूप में साक्षात् जानता है; वही पुरुष (शुद्धबुद्धि) अनन्त ब्रह्म का अपरोक्ष अनुभव करता है। उपर्युक्त विवेचन द्वारा पूर्व श्लोक में कथित सप्तर्षि तथा चार कुमारों की-उत्पत्ति ब्रह्माजी के मन से हुई की उपयुक्तता को समझने में कठिनाई नहीं रह जाती।

 >>>जब परमात्मा व्यष्टि और समष्टि मनों (अहंकार-मूढ़बुद्धि आदि) से अपने तादात्म्य को त्याग देता है, तब वह अपनी स्वमहिमा में ही प्रतिष्ठित होकर रमता है। समष्टि उपाधि के साथ तादात्म्य से वह ब्रह्म "ईश्वर " बन जाता है और व्यष्टि के साथ संबंध से जीवभाव (जीवात्मा भाव M/F) को प्राप्त हो जाता है। वेदान्त के इस अभिप्राय को समझना और उसी अनुभव में जीना ही अविकम्प योग हैइस योग से ही आत्मानुभूति में दृढ़ और स्थायी निष्ठा प्राप्त होती है। 
      समाज में योग शब्द से कुछ ऐसा अर्थ प्रचलित हो गया था कि लोगों के मन में उसके प्रति भय व्याप्त हो गया था। गीता में महर्षि व्यास स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण के मुखारविन्द से इस परिचित शब्द योग का अर्थ नए सन्दर्भ-(अविकम्प योग) में इस प्रकार स्पष्ट करते हैं कि उसके प्रति व्याप्त आशंका निर्मूल हो जाती है और वह सबके लिए कल्याणकारक भी सिद्ध होता है।
     गीता हिन्दूपुनरुत्थान की रचनात्मक क्रांति का वह एकमात्र धर्मग्रन्थ है जिसका स्थान अन्य कोई ग्रन्थ नहीं ले सकता। अविकम्प योग उतना ही अपूर्व है जितनी कि योग शब्द की विविध परिभाषायें हैं जो गीता के पूर्वाध्यायों के विभिन्न श्लोकों में दी गयी हैं।
आत्मस्वरूप के अखण्ड अनुभव में दृढ़ और स्थायी निष्ठा प्राप्त करने के लिए कौन सा निश्चित साधन है ? भगवान् श्रीकृष्ण अगले श्लोक में बताते हैं --
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः।।10.8।।
।।10.8।। मैं ही सबका प्रभव स्थान हूँ; मुझसे ही सब (जगत्) विकास को प्राप्त होता है, इस प्रकार जानकर बुधजन भक्ति भाव से युक्त होकर मुझे ही भजते हैं।।
       व्यष्टि (आत्मा) और समष्टि (परमात्मा) में जो भेद है वह उन उपाधियों के कारण है जिनके माध्यम से एक ही सनातन परिपूर्ण सत्य प्रकट होता है। इन दो उपाधियों के कारण ब्रह्म को ही क्रमश जीव और ईश्वर भाव प्राप्त होते हैं।  जैसे एक ही विद्युत् शक्ति बल्ब और हीटर में क्रमश प्रकाश और ताप के रूप में व्यक्त होती है। स्वयं विद्युत् में न प्रकाश है और न उष्णता। इसी प्रकार स्वयं परमात्मा में न ईश्वर भाव है और न जीव भाव। जो पुरुष इसे तत्त्वत जानता है वह अविकम्प योग के द्वारा ब्रह्मनिष्ठता को प्राप्त होता है।
एक कुम्भकार कुम्भ बनाने के लिए सर्वप्रथम घट के निर्माण के उपयुक्त लचीली मिट्टी तैयार करता है। तत्पश्चात् उस मिट्टी के गोले को चक्र पर रखकर घटाकृति में परिवर्तित करता है। तीसरी अवस्था में घट को सुखाकर उसे चमकीला किया जाता है और चौथी अवस्था में उस तैयार घट को पकाकर उस पर रंग लगाया जाता है। घट निर्माण की इस क्रिया में मिट्टी निश्चय ही कह सकती है कि वह घट का प्रभव स्थान है। चार अवस्थाओं में घट का जो विकास होता है? उसका भी अधिष्ठान मिट्टी ही थी? न कि अन्य कोई वस्तु। यह बात सर्वकालीन घटों के सम्बन्ध में सत्य है। किसी भी घट की उत्पत्ति वृद्धि और विकास उसके उपादान कारणभूत मिट्टी के बिना नहीं हो सकता
 इसी प्रकार एक ही चैतन्यस्वरूप परमात्मा ईश्वर, जीव और जगत के रूप में प्रतीत होता है। जिस पुरुष ने विवेक-सम्पन्न बुद्धि  के द्वारा व्यष्टि और समष्टि के इस सूक्ष्म भेद को समझ लिया है;  वही पुरुष अपने मन को (विवेकी बुद्धि) बाह्य जगत् से निवृत्त करके इन दोनों के अधिष्ठान स्वरूप आत्मा में स्थिर कर सकता है।  मन (शुद्धबुद्धि) के इस भाव को ही यहाँ इस अर्थपूर्ण शब्द भावसमन्विता (विवेकी बुद्धि)  के द्वारा दर्शाया गया है। प्रेम या भक्ति का मापदण्ड है पुरुष की अपनी प्रिय वस्तु के साथ तादात्म्य करने की क्षमता। संक्षेपत प्रेम की परिपूर्णता इस तादात्म्य की पूर्णता में है। 
जब एक भक्त स्वयं यह अनुभव कर लेता है कि एक परमात्मा ही समष्टि और व्यष्टि की अन्तकरण की उपाधियों के माध्यम से मानो ईश्वर, जीव और बन गया है  तब वह पराभक्ति को प्राप्त भक्त कहा जाता हैएक परमात्मा ही ईश्वर , जीव और जगत बन गया है !जिस भक्ति के विषय में पूर्व श्लोक में केवल एक संकेत ही किया गया था उसी को यहाँ क्रमबद्ध करके एक साधना का रूप दिया गया है जिसके अभ्यास से उपर्युक्त ज्ञान प्रत्येक साधक का अपना निजी और घनिष्ट अनुभव बन सकता है।
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।।10.9।।
।।10.9।। मुझमें ही चित्त को स्थिर करने वाले और मुझमें ही प्राणों (इन्द्रियों) को अर्पित करने वाले भक्तजन, सदैव परस्पर मेरा बोध कराते हुए, मेरे ही विषय में कथन करते हुए सन्तुष्ट होते हैं और रमते हैं।।
एक बार निश्चयात्मक रूप से यह जान लेने पर कि ईश्वर, जीव और जगत का का वास्तविक स्वरूप एक चैतन्य आत्मा ही है ! मन में किसी भी प्रकार की वृत्ति उठने पर भी सत्य के साधक को इस आत्मा का भान बनाये रखने में कोई कठिनाई नहीं होती। 
इस आशय को यहाँ मच्चिता इस शब्द से स्पष्ट किया गया है।समस्त प्राणों अर्थात् इन्द्रियों को मुझमें अर्पित करके (मद्गतप्राणा) प्राण शब्द से केवल प्राणवायु से ही तात्पर्य नहीं समझना चाहिए। प्राणियों के शरीर में होने वाली पाचनादि क्रियाओं को प्राण शब्द से दर्शाया जाता है।किन्तु यहाँ इस शब्द का प्रयोग मुख्यत पाँच ज्ञानेन्द्रियों को सूचित करने के लिए किया गया है। ये इन्द्रियाँ ही वे पाँच द्वार या वातायन हैं जिनके द्वारा मन बाह्य विषयों में विचरण करता है और इनके माध्यम से ही जगत् के विषय मन में प्रवेश करते हैं। 

इस देह और जगत् में जीते हुए विषयों से पलायन कदापि सम्भव नहीं हो सकता। वेदान्त कभी भी इन विषयों से पलायन का उपदेश नहीं देता। वेदान्त या ज्ञानयोग विवेकपूर्ण-वैराग्य विचार का मार्ग है। इसमें विवेक के द्वारा मन को इस प्रकार संयमित और प्रशिक्षित किया जाता है कि जब कभीभी बाह्य विषय मन पर अपना प्रभाव डालते हैं; विवेक-जनित वैराग्य से तत्काल ही साधक को अपने उस आत्मस्वरूप का स्मरण हो जाता है जिसके सहयोग के बिना वे विषय कभी प्रकाशित नहीं हो सकते थे
परस्पर चर्चा करते हुए किसी एक विषय में समान बौद्धिक रुचि के विद्यार्थीगण जब आपस में उस विषय की चर्चा करते हैं तब न केवल वे अपने ज्ञान को स्पष्टत व्यक्त करते हैं, वरन् इस प्रक्रिया में उनका ज्ञान दृढ़ निश्चयात्मक रूप भी ले लेता है जो प्रारम्भ में केवल पुस्तकीय ज्ञान ही था। परस्पर चर्चा -संवाद , पाठचक्र की इस सर्वविदित पद्धति का वेदान्त में अथक रूप से अनुमोदन एवं उपदेश दिया गया है। वेदान्त में इसका नाम है ब्रह्माभ्यास , शिविर -पाठचक्र जो साधना का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। अध्यात्म का सच्चा साधक वही है जो अपने मन और इन्द्रियों की सभी प्रकार की क्रियाओं में आत्मा का स्मरण बनाये रखता है। इसका एक उपाय है आत्म विषय में अन्य साधकजनों के साथ चर्चा एवं निदिध्यासन। 
ऐसे साधक साधना के फलस्वरूप उस परम आनन्द को प्राप्त करते हैं जो उनके जीवन रथ के चक्रों के लिए पथरीले मार्ग पर सरलता से अग्रसर होने के लिए चिकने तेल का काम करता है और यात्रा को सुगम बना देता है।  तुष्यन्ति और रमन्ति के भाव को ही उपनिषदों में सुन्दर प्रकार से क्रीडन्ति और रमन्ति शब्दों के द्वारा इंगित किया गया है
भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ आश्वासन देते हैं कि पूर्णत्व का साधक जब विचार मार्ग पर अग्रसर होता है तब उसी समय उसे सन्तोष और रमण का अनुभव होता है। सन्तोष और आनन्द से मन में ऐसा सुन्दर वातावरण निर्मित होता है जो आध्यात्मिक प्रगति के लिए अत्यन्त अनुकूल बनकर साधक की सफलता निश्चित कर देता है।  सदैव असन्तुष्ट,  शोक मनाने वाले मानसिक स्तब्धता और बौद्धिक दरिद्रता का चित्र प्रस्तुत करने वाले साधक कदापि अपने इस परम आनन्दस्वरूप में प्रवेश नहीं कर सकते हैं। 
प्रगति की इस सीमा तक पहुँचने पर साधकों को कहाँ से मार्गदर्शन और बल मिलता है जिससे वे अपनी यात्रा के लक्ष्य तक पहुँचते हैं इसका उत्तर है --
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।।10.10।।
।।10.10।। उन (मुझ से) नित्य युक्त हुए और प्रेमपूर्वक मेरा भजन करने वाले भक्तों को, मैं वह 'बुद्धियोग' देता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त होते हैं।।

जब तक सबसे श्रेष्ठ आनन्ददायक वस्तु या लक्ष्य को नहीं पाया गया है जिसमें हमारा मन पूर्णतया रम सके तब तक बाह्य विषयों भावनाओं तथा विचारों के जगत् के साथ हुए तादात्म्य से हमारी सफलतापूर्वक निवृत्ति नहीं हो सकती। आनन्दस्वरूप आत्मा में ध्यानाकर्षण करने की ऐसी सार्मथ्य है और इसलिए जिस मात्रा या सीमा तक इस आत्मस्वरूप में मन स्थित होता है उसी मात्रा में वह दुखदायी मिथ्या बंधनों की पकड़ से मुक्त हो जाता है। 
      इस वेदान्तिक सत्य का भगवान् श्रीकृष्ण इस वाक्य में वर्णन करते हैं  जो मेरा भक्तिपूर्वक भजन करते हैं। प्रिय (आत्मा) के साथ तादात्म्य का ही अर्थ है प्रेम। आत्मा (इष्टदेव-ठाकुर, माँ -स्वामी विवेकानन्द-गुरुदेव-प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म) के साथ हुए तादात्म्य के अनुपात में ही जीव भक्त कहलाता है और जब वह सततयुक्त हो जाता है, तभी वह वास्तविक रूप में हृदयस्थित अपनी अव्यक्त दिव्यता को (प्रत्येक प्राणी में इष्टदेव को देखकर) अभिव्यक्त कर पाता हैऐसे भक्त जो निरन्तर भक्ति सन्तोष और आनन्द के वातावरण में सतत आत्मा का चिन्तन करते हैं उन भक्तों को स्वयं भगवान् ही वह बुद्धियोग देते हैं जिसके द्वारा वे भगवान् को ही प्राप्त होते हैं।
बुद्धियोग का पहले भी वर्णन किया जा चुका है। आत्मा के अनन्त स्वरूप पर निदिध्यासन से सम्यक् ज्ञान प्राप्त करना ही बुद्धियोग है। (गीता 2: 39,2:50 ) निसंदेह हमारा वह अभिप्राय कदापि नहीं है कि परिच्छिन्न बुद्धि के द्वारा कभी अनन्त वस्तु का ग्रहण किया जा सकता है। (शुद्धबुद्धि या आत्मा ही आत्मा का दर्शन करती है !) 
   जब तक बुद्धि से ग्रहण किया गया एक अनुभव किसी अन्य अनुभव से बाधित नहीं होता तब तक उस पूर्व अनुभव को प्रामाणिक और संदेह रहित माना जाता है। (आत्मा इष्टदेव परम सत्य है - जो त्रिकाल अबाधित है। इसलिए) आत्मा का अनुभव कदापि बाधित नहीं हो सकता क्योंकि वह अनुभवकर्ता का ही स्वरूप है। ऐसा दृढ़ ज्ञान केवल उन साधकों को ही प्राप्त होता है जिनमें आत्मानुसंधान करने की परिपक्वता एवं स्थिरता आ जाती है। इस प्रकार उक्त ध्यानाभ्यास के द्वारा सत्य पर पड़े आवरण और तज्जनित विक्षेपों की सर्वथा निवृत्ति हो जाती है तब वह साधक समाधि का साक्षात् अनुभव करता है जो बुद्धियोग की परिसमाप्ति और पूर्णता है। 
इस बुद्धियोग के द्वारा भगवान् अपने भक्तों के लिए निश्चित रूप से क्या करते हैं? इसका वर्णन अगले श्लोक में है --
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।।10.11।।

।।10.11।। उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए मैं उनके अन्त:करण में स्थित होकर, अज्ञान-जनित अन्धकार को प्रकाश-मय ज्ञान के दीपक द्वारा नष्ट करता हूँ।।

कभीकभी कोई वस्तु विद्यमान होते हुए भी हमारी दृष्टि के लिए आच्छादित रहती है क्योंकि उसे देखने के लिए कुछ अनुकूल परिस्थितियों की आवश्यकता होती है। ध्वनि सुनने के लिए उसमें आवश्यक स्पन्दन होने चाहिए तथा यह भी आवश्यक है कि वे ध्वनि तरंगे हमारे कानों तक पहुँचे। इसी प्रकार अपेक्षित प्रकाश के अभाव में वस्तु के समक्ष होने पर भी उसका नेत्रों द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता।
यदि हम अन्धकार में मेज पर पड़ी अपना कुंजी (चाभी) को टटोलकर खोज रहे हों और उसी समय कोई व्यक्ति स्विच दबाकर कमरे को प्रकाशित कर देता है? तो हमें अपनी कुंजी दिखाई पड़ती है। हम कह सकते हैं कि उस व्यक्ति के इस दयापूर्ण कार्य ने हमें कुंजी की प्राप्ति करायी परन्तु यह कहना सर्वथा असंगत होगा कि प्रकाश ने उस कुंजी को उत्पन्न किया
इस दृष्टान्त के द्वारा वेदान्त में यह ज्ञान कराया जाता है कि आत्मा तो सदा हमारे हृदय में ही विद्यमान है, किन्तु प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण यथार्थ अनुभव के लिए उपलब्ध नहीं है। उन प्रतिकूल तत्त्वों की निवृत्ति होने पर वह आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप से अनुभव किया जा सकता है। आत्मा को आच्छादित करने वाला वह आवरण है अज्ञानजनित अंधकार/ अज्ञानजनित सम्मोहन। 
     स्मरण रहे कि इस अज्ञान अवस्था में भी आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप से विद्यमान रहता है परन्तु हमारे साक्षात् अनुभव के लिए उपलब्ध नहीं होता। जो साधक बुद्धियोग में दृढ़ स्थिति प्राप्त कर लेते हैं वे आत्मा के अपरोक्ष ज्ञान के पात्र बन जाते हैं।

      बुद्धियोग की साधना अवस्था में ध्याता और ध्येय में भेद होता है जिसे सविकल्प समाधि कहते हैं। इस श्लोक में यह कहा गया है कि इस सविकल्प अवस्था से वह साधक मानो किसी ईश्वरीय कृपा से पूर्ण निर्विकल्प समाधि की स्थिति में स्थानान्तरित किया जाता है।  वस्तुतः  सविकल्प समाधि की स्थिति तक ही साधक अपने पुरुषार्थ के द्वारा पहुँच सकता है।
     लेकि यह बुद्धियोग भी मानो किसी अन्य स्थान से प्राप्त होता है तात्पर्य यह है कि वह कोई सावधानीपूर्वक किये गये किसी प्रयत्न का फल नहीं वरन् सहज स्वाभाविक दैवी प्रेरणा है। 

     अहंकार और शुद्ध आत्मा के मध्य का सघन कुहासा जब विरल हो जाता है तब इस दैवी प्रेरणा (बुद्धियोग) का अनुभव होता है। (मैं आत्मा (इष्टदेव) का हूँ - रामकाज करने को आतुर दासोऽहं ,शुद्धबुद्धि!) जब यह कोहरा पूर्णतया नष्ट हो जाता है तब पूर्ण आत्म साक्षात्कार अपने स्वयं -प्रकाश स्वरूप में होता है
एक अन्धेरे कमरे में मेज पर रेडियम के डायल की एक घड़ी रखी हुई है जिस पर कागज पुस्तक आदि पड़े हुए होने से वह दिखाई नहीं देती। जब कोई व्यक्ति अन्धेरे में ही उसे खोजता हुआ उन कागजों को हटा देता है,  तो वह घड़ी स्वयं ही चमकती हुई दिखाई पड़ती हैउसकी चमक ही उसकी परिचायक होती है।  सनातन सत्य भी अज्ञान से आवृत्त हुआ अभाव रूप प्रतीत हो सकता है किन्तु अज्ञान की निवृत्ति होने पर? वह स्वयं अपने प्रकाश से ही प्रकाशित होता है और उसे जानने के लिए अन्य किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती।जब अज्ञान का अन्धकार प्रकाशमय ज्ञान के दीपक से नष्ट हो जाता है तब आत्मा अपने एकमेव अद्वितीय सर्वव्यापी और परिपूर्ण स्वरूप में स्वत प्रकट होता है। 
     अपने भक्तों के हृदय में स्थित स्वयं भगवान् इस आत्मा के प्रकटीकरण की क्रिया को उनके ऊपर अनुग्रह करने के भाव से सम्पन्न करते हैं, किन्तु वास्तविकता यह है कि यह अनुग्रह स्वयं के ऊपर ही है। जब मैं चलतेचलते थक जाता हूँ तब मैं किसी स्थान पर बैठ जाता हूँ केवल अपने ही प्रति अनुकम्पा के कारण।इस अनुकम्पा के लिए उचित मूल्य चुकाये बिना साधक को सीधे ही इसकी प्राप्ति नहीं हो सकती
 दिन के समय मेरे कमरे की खिड़कियां खोल देने पर सूर्य प्रकाश अनुकम्पावशात् मेरे लिए कमरे को प्रकाशित करता है। जैसा कि हम जानते हैं कि जब तक वे खिड़कियां खुली रहती हैं तब तक सूर्य को यह स्वतन्त्रता नहीं है कि वह अपनी दया का द्वार बन्द कर ले। उसी प्रकार उसकी दया तब तक प्रकट भी नहीं होगी जब तक मैं अपने कमरे की खिड़कियां नहीं खोल देता हूँ। संक्षेपत सूर्य प्रकाश का आह्वान उसी क्षण होता है जब उसके मार्ग का अवरोधक दूर हो जाता है। इसी प्रका? प्रारम्भिक साधनाओं के अभ्यास से साधक बुद्धियोग का पात्र बनता है।  तत्पश्चात् इसके निरन्तर प्रयत्नपूर्वक किये गये अभ्यास से वह अज्ञान तथा तज्जनित विक्षेपों के आवरण को सर्वथा नष्ट कर देता है। तत्काल ही आत्मा अपने स्वयं के प्रकाश में ही प्रकाश स्वरूप से प्रकाशित होता हैमेघों को चीरकर जाती हुई विद्युत् को देखने के लिए किसी अन्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती। जीवन के सर्वोच्च व्यवसाय अथवा लक्ष्य चित्तशुद्धि और आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति के लिए दिये गये उपदेश का खण्ड यहाँ पर समाप्त हो जाता है। 
 तथापि अर्जुन को इससे सन्तोष नहीं होता और इसलिए वह अपनी शंका को व्यक्त करते हुए भगवान् से सहायता के लिए अनुरोध करता है जिससे कि साक्षात् अनुभव के द्वारा वह स्वयं सत्य की पुष्टि कर सके। 
भगवान् के मुख से उनकी विभूति और योग के विषय में श्रवण कर अर्जुन अपनी जिज्ञासा प्रकट करता है --
अर्जुन उवाच
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्।।10.12।।
।।10.12।। अर्जुन ने कहा आप -परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हंै; सनातन दिव्य पुरुष, देवों के भी आदि देव, जन्म रहित और सर्वव्यापी हैं।।
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे।।10.13।।
।।10.13।। ऐसा आपको समस्त ऋषिजन कहते हैं;  वैसे ही देवर्षि नारद, असित, देवल ऋषि तथा व्यास और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं।।
 अर्जुन वैदिक साहित्य से परिचित था। वह यहाँ कहता है कि प्राचीन ऋषियों ने अनन्त सनातन सत्य को जिन शब्दों के द्वारा सूचित किया है उससे वह परिचित है।  जैसे परं ब्रह्म, परं धाम परम पवित्र आदि। परन्तु उसने अब तक यही समझा था कि ये सब परम सत्य के गुण हैं। इसलिए जब वह भगवान् को इन्हीं शब्दों का प्रयोग स्वयं के लिए करते हुए सुनता है तब वह कुन्तीपुत्र आश्चर्यचकित रह जाता है। उसे समझ में नहीं आता कि वह अपने रथसारथि श्रीकृष्ण को विश्व के आदिकारण के रूप में किस प्रकार जाने ?
       व्यावहारिक बुद्धि का व्यक्ति होने के नाते अर्जुन को श्रीकृष्ण के स्वरूप को समझने के लिए अधिक तथ्यों की जानकारी की आवश्यकता थी। हम देखेंगे कि उसकी मांग को पूर्ण करने हेतु इसी अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण ने पर्याप्त सूचनाएं और तथ्य प्रस्तुत किये हैं। परन्तु अर्जुन को सन्तुष्ट करने के स्थान पर वह जानकारी उसकी उत्सुकता को द्विगुणित कर देती है।  और वह बाध्य होकर भगवान् से उनके विश्वरूप को दिखाने की मांग प्रस्तुत करता है भक्तवत्सल करुणासागर भगवान् श्रीकृष्ण अगले अध्याय में अपने विश्वरूप को दर्शाकर अर्जुन को कृतार्थ कर देते हैं। 
        यद्यपि अर्जुन ने इसके पूर्व भी परम पुरुष आदि शब्दों को ऋषियों से सुना था किन्तु उसे वे अर्थहीन और निष्प्रयोजन ही प्रतीत हुए थे। उसका आश्चर्य इन शब्दों में स्पष्ट रूप से व्यक्त होता है कि  आप भी मेरे प्रति ऐसा ही कहते हैं। यहाँ उनके कुछ आश्चर्यचकित एवं भ्रमित होने का अवसर इसलिए था कि वह समझ नहीं पाया कि उसके समकालीन श्रीकृष्ण जो उसके समक्ष खड़े थे जिन्हें वह कई वर्षों से जानता था और जो उसके सम्बन्धी भी थे।  वे किस प्रकार अनन्त, परम, जन्मरहित और सर्वव्यापी हो सकते हैं ?
     अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण को अपने चर्म चक्षुओं से देखता है और इसलिए उसे उनका केवल शरीर ही दिखाई देता है। सम्पूर्ण गीता में श्रीकृष्ण स्वयं को आत्मस्वरूप में ही प्रकट करते हैं और न कि समाज के एक सदस्य के रूप में।  गीता के उपदेष्टा श्रीकृष्ण परमात्मा हैं,  वसुदेव के पुत्र या गोपियों के प्रियतम नहीं। 
 श्रीकृष्ण को सदैव मित्र या प्रेमी अथवा एक विश्वसनीय बुद्धिमान्, कूटनीतिज्ञ के रूप में देखते रहने से अर्जुन आत्मस्वरूप श्रीकृष्ण को पहचान नहीं पाया। यही उसके आश्चर्य और भ्रम का कारण था।
अगला श्लोक अर्जुन में स्थित एक जिज्ञासु साधक के भाव को स्पष्ट करता है --
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव।
न हि ते भगवन् व्यक्तिम् विदुः देवाः न दानवाः।।10.14।।
।।10.14।। हे केशव ! जो कुछ भी आप मेरे प्रति कहते हैं, इस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन्, आपके (वास्तविक) स्वरूप को न देवता जानते हैं और न दानव।।

यहाँ अर्जुन अपने मन के भावों को स्पष्ट करते हुए गुरु के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा को भी व्यक्त करता है जो कुछ आप मेरे प्रति कहते हैं उसे मैं सत्य मानता हूँ। केशव शब्द का अर्थ है जिनके केश सुन्दर हैं अथवा केशि नामक असुर का वध करने वाले। यद्यपि वह श्रीकृष्ण के कथन को सत्य मानता है? परन्तु वह उनके सम्पूर्ण आशय को ग्रहण नहीं कर पाता। तात्पर्य यह है कि उसे हृदय से भगवान के वचनों में पूर्ण विश्वास है किन्तु उसकी बुद्धि अभी भी असन्तुष्ट ही है।ज्ञान-पिपासा के वशीभूत अर्जुन का असन्तुष्ट व्यक्तित्व मानो कराहता है ।

      यह ज्ञानपिपासा दूसरी पंक्ति में प्रतिध्वनित होती है जहाँ वह कहता है आपके व्यक्तित्व को न देवता जानते है और न दानव। दानव दनु के पुत्र थे जो प्राय स्वर्ग पर आक्रमण करते रहते थे- यज्ञयागादि में बाधा पहुँचाते थे और आसुरी जीवन जीते थे। इसके विपरीत पुराणों के वर्णनानुसार देवतागण स्वर्ग के निवासी हैं जो र्मत्य मानवों की अपेक्षा शारीरिक मानसिक और बौद्धिक क्षमताओं में अधिक शक्तिशाली होते हैं।वैयक्तिक दृष्टि से देव और दानव हमारे मन की क्रमश शुभ और अशुभ प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं
 जब अर्जुन कहता है कि आत्मा के स्वरूप का निर्धारण न तो सूक्ष्म और शुभ के दर्शन के समान हो सकता है  और न ही दानवी प्रवृत्ति के समान तब उसकी निराशा स्पष्ट झलकती है। न तो हमारी दैवी प्रवृत्तियां सत्य का आलिंगन कर सकती हैं और न ही दानवी गुण उसको युद्ध के लिए आह्वान करके शत्रु रूप में हमारे सामने ला सकते हैं। जगत् में हम वस्तुओं या व्यक्तियों को केवल दो रूप में मिलते हैं प्रिय और अप्रिय अथवा मित्र और शत्रु के रूप में। 
आत्मा के व्यक्तित्व की पहचान इन दोनों ही प्रकारों से नहीं हो सकती क्योंकि वह योग और विभूति की अभिव्यक्तियों में द्रष्टा है। यदि सत्य को कोई नहीं जान सकता है तो फिर अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण से उसका वर्णन करने का अनुरोध क्यों करता है ? उनमें ऐसा कौन सा विशेष गुण है जिसके कारण वे उस वस्तु का वर्णन करने में समर्थ हैं जिसे अन्य कोई जान भी नहीं पाता है ?
स्वयमेवात्मनाऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते।।10.15।।

।।10.15।। हे पुरुषोत्तम ! हे भूतभावन ! हे भूतेश ! हे देवों के देव ! हे जगत् के स्वामी ! आप स्वयं ही अपने आप को जानते हैं।।
 यह श्लोक दर्शाता है कि किस प्रकार श्रीकृष्ण उस परम सत्य का वर्णन करने में सक्षम हैं जिसे न स्वर्ग के देवता जान सकते हैं और न दानवगण। आत्मा को कभी प्रमाणों (इन्द्रियों) के द्वारा दृश्य पदार्थ के रूप में नहीं जाना जा सकता है और न वह हमारी शुभ अशुभ प्रवृत्तियों के द्वारा ही अनुभव किया जा सकता है। 
परन्तु आत्मा चैतन्य स्वरूप होने से स्वयं ज्ञानमय है और ज्ञान को जानने के लिए किसी अन्य प्रमाण (ज्ञान का साधन) की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए अर्जुन यहाँ कहता है? आप स्वयं अपने से अपने आप को जानते हैं। 
        सांख्यदर्शन के अनुसार प्रतिदेह में स्थित चैतन्य पुरुष (आत्मा) कहलाता है। यहाँ श्रीकृष्ण को पुरुषोत्तम नाम से सम्बोधित किया गया है जिसका अर्थ है  वह एकमेव अद्वितीय तत्त्व जो भूतमात्र की आत्मा है। 
     पुरुषोत्तम शब्द का लौकिक अर्थ है पुरुषों में उत्तम तथा अध्यात्मशास्त्र के अनुसार अर्थ है परमात्मा। अब अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण के शुद्ध ब्रह्म के रूप में स्वीकार करके उनका गौरव गान करते हुए उन्हें इन नामों से सम्बोधित करता है।  हे भूतभावन (भूतों की उत्पत्ति करने वाले)! हे भूतेश ! हे देवों के देव ! हे जगत् के शासक स्वामी किसी भी वस्तु का सारतत्त्व उस वस्तु के गुणों का शासक और धारक होता है। 
      स्वर्ण आभूषणों के आकार, आभा आदि गुणों का शासक होता है। परन्तु चैतन्य की नियमन एवं शासन की शक्ति अन्य की अपेक्षा अधिक है क्योंकि उसके बिना हम न कुछ जान सकते हैं और न कुछ कर्म ही कर सकते हैं।  वस्तुओं और घटनाओं का भान या ज्ञान तभी संभव होता है जब इनके द्वारा अन्तकरण में उत्पन्न वृत्तियाँ इस शुद्ध चैतन्यरूप आत्मा  से प्रकाशित होती हैं।
अपने आश्चर्य आदर और भक्ति को व्यक्त करने वाले इस कथन के बाद अब अर्जुन सीधे ही भगवान् के समक्ष अपनी बौद्धिक जिज्ञासा को प्रकट करता है --
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि।।10.16।।
।।10.16।। आप ही उन अपनी दिव्य विभूतियों को अशेषत: कहने के लिए योग्य हैं, जिन विभूतियों के द्वारा इन समस्त लोकों को आप व्याप्त करके स्थित हैं।।

राजपुत्र अर्जुन को इस बात का निश्चय हो गया है कि भगवान् ही विश्व के अधिष्ठान हैं जिनके बिना विश्व का अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता। परन्तु जब वह अपने उपलब्ध और परिचित प्रमाणों इन्द्रियों मन और बुद्धि के द्वारा बाह्य जगत् को देखता है तब उसे केवल विषयों भावनाओं M/F और विचारों का ही अनुभव होता है जिन्हें किसी भी दृष्टि से दिव्य नहीं कहा जा सकता। 

विराट् ईश्वर के रूप में भगवान् ही इस नामरूपमय संसार की समष्टि सृष्टि (विभूति) और व्यष्टि सृष्टि (योग) बने हुए हैं। यद्यपि श्रद्धा से परिपूर्ण हृदय के द्वारा इसे अनुभव किया जा सकता है परन्तु बुद्धि के तीक्ष्ण होने पर भी उसके द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता। इसलिए स्वाभाविक ही अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण से उन विभूतियों का वर्णन करने का अनुरोध करता है जिनके द्वारा वे इस जगत् को व्याप्त करके स्थित हैं
 कर्मशील होने के कारण अर्जुन अत्यन्त व्यावहारिक बुद्धि का पुरुष था इसलिए वह और अधिक पर्याप्त तथ्यों को एकत्र करना चाहता था जिन पर वह विचार करके और उनका वर्गीकरण करके उन्हें समझ सके। 
क्या अर्जुन की यह केवल बौद्धिक जिज्ञासा ही है जिसके कारण वह ऐसा प्रश्न करता है वह स्वयं स्पष्ट करते हुए कहता है
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्।

केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया।।10.17।।

।।10.17।। हे योगेश्वर ! मैं किस प्रकार निरन्तर चिन्तन करता हुआ आपको जानूँ, और हे भगवन् ! आप किनकिन भावों में मेरे द्वारा चिन्तन करने योग्य हैं।।

 किस प्रकार मैं आपका चिन्तन या ध्यान करूँ जिससे कि मैं आपको साक्षात् जान सकूँ साधक का लक्ष्य है एकत्व भाव से आत्मा को साक्षात् जानना। अब तक के अध्यायों में कहीं भी गीता ने ध्यानाभ्यास के लिए किसी नदी के तट पर या एकान्त गुफा में जाकर संन्यास का जीवन व्यतीत करने का समर्थन नहीं किया है। 
श्रीकृष्ण का मनुष्य को आह्वान कर्त्तव्य कर्म करने के लिए है और अपने इसी व्यावहारिक जीवन में ईश्वरानुभूति में जीने के लिए है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गीताशास्त्र का उद्घोष महाभारत के समरांगण में उस क्षण हुआ था जब तत्कालीन समस्त राष्ट्र अपने समय की सबसे बड़ी ऐतिहासिक क्रांति वेला का सामना करने के लिए उद्यत थे। 
यह क्रांति वेला लौकिक और आध्यात्मिक दोनों ही मूल्यों की निर्णायक थी।अर्जुन कर्त्तव्य पालन के गीताधर्म में पूर्णतया परिवर्तित हो गया था। उसका यह परिवर्तन श्रीकृष्ण को सम्बोधित किये योगिन शब्द से विशेष रूप से दर्शाया गया है। श्रीकृष्ण ऐसे सर्वश्रेष्ठ कर्मयोगी थे  जिन्होंने विविध घटनाओं से परिपूर्ण जीवन में अत्यन्त व्यस्त रहते हुए भी कभी अपने शुद्ध दिव्यस्वरूप का विस्मरण नहीं होने दिया
इस श्लोक में अर्जुन अपने अनुरोध का कारण भी बताते हुए कहता है,  आप किनकिन भावों में मेरे द्वारा चिन्तन करने योग्य हैं व्यावहारिक जीवन जीते हुए और उसकी चुनौतियों का सामना करते हुए यदि सर्वत्र व्याप्त आत्मा का अखण्ड स्मरण बनाये रखना हो  तो साधक को निश्चित रूप से यह जानना आवश्यक होगा कि वह उस तत्त्व को प्रत्येक वस्तु वस्तुओं के समूह और मनुष्यों के समाज में कहाँ और कैसे देखे ?। 
अर्जुन अपनी इच्छा को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहता है कि यदि भगवान् का उत्तर विस्तृत भी हो तब भी उन्हें सुनने और समझने में वह थकान नहीं अनुभव करेगा
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन।
भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्।।10.18।।
।।10.18।। हे जनार्दन ! अपनी योग शक्ति और विभूति को पुन: विस्तारपूर्वक कहिए, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं होती।।
दर्शनशास्त्र के तथा अन्य किसी विषय के विद्यार्थी में भी सर्वप्रथम प्रखर जिज्ञासा का होना अत्यावश्यक है। विषय को जानने और समझने की इस जिज्ञासा के बिना कोई भी ज्ञान दृढ़ नहीं होता है और न विद्यार्थी के लिए वह लाभदायक ही हो सकता है। 
आत्मविकास के आध्यात्मिक ज्ञान में यह बात विशेष रूप से लागू होती है क्योंकि अन्य ज्ञानों के समान? न केवल इसे ग्रहण और धारण ही करना है वरन् यह आत्मज्ञान होने पर उसे अपने जीवन में दृढ़ता से जीना भी होता है। 
इसलिए श्रवण की इच्छा को एक श्रेष्ठ और आदर्श गुण माना गया है जो वेदान्त के उत्तम अधिकारी के लिए अनिवार्य है। इस गुण के होने से ज्ञानमार्ग में प्रगति तीव्र गति से होती है।पाण्डुपुत्र अर्जुन इस श्रेष्ठ गुण से सम्पन्न था जो कि उसके इस कथन से स्पष्ट होता है कि आपके अमृतमय वचनों को सुनकर मेरी तृप्ति नहीं होती है। 

इसमें कोई सन्देह नहीं कि वेदान्त का शुद्धिकारी प्रभाव रुचिपूर्वक श्रवण करने वाले सभी बुद्धिमान विद्यार्थियों पर पड़ता है। एक सच्चे ज्ञानी गुरु के मुख से आत्मतत्त्व का उपदेश सुनकर प्रारम्भ में शिष्य को होने वाला आनन्द क्षणिक उल्लास ही देता है  जो स्थिर नहीं रह पाता। जब वह शिष्य प्रवचन के बाद अकेला रह जाता है तब उसका मन पुनः अनेक कारणों से अशान्त हो सकता है। और फिर भी कितना ही क्षणिक आनन्द क्यों न हो उसमें अर्जुन के समान नवदीक्षित विद्यार्थियों को आकर्षित करने की सार्मथ्य होती है। 
 जिसके कारण उनकी उस विषय के प्रति रुचि एक व्यसन के समान बढ़ती ही जाती है। वेदान्त प्रवचनों के श्रवणार्थ इस अधिकाधिक अभिरुचि को यहाँ स्पष्ट दर्शाया गया है। यद्यपि यह साधना है साध्य नहीं तथापि निसन्देह यह एक शुभ प्रारम्भ है। 
जिन लोगों को तत्त्वज्ञान के बौद्धिक अध्ययन से ही सन्तोष का अनुभव होता हो वे भी निश्चय ही उन सहस्रों लोगों से श्रेष्ठतर हैं जो दिव्य आत्मस्वरूप को दर्शाने वाले एक भी आध्यात्मिक प्रवचन को नहीं सुन सकते या सह नहीं सकते
  एक अथक धर्म प्रचारक के रूप में भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त धैर्य के साथ अर्जुन से कहते हैं
श्री भगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे।।10.19।।
।।10.19।। श्रीभगवान् ने कहा -हन्त (हाँ-विस्तार से)  अब मैं तुम्हें अपनी दिव्य विभूतियों को प्रधानता से कहूँगा। हे कुरुश्रेष्ठ मेरे विस्तार का अन्त नहीं है।।

प्रस्तुत अध्याय को बृहत् आकार देने वाला भगवान् श्रीकृष्ण का यह विस्तृत एवं व्याख्यापूर्ण उत्तर एक-एक वस्तु और व्यक्ति में तथा उनके समूह में आत्मा की वास्तविक पहचान का वर्णन करता है। 
यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि अपनी विभूति और योग का वर्णन करते समय भगवान् श्रीकृष्ण निम्नलिखित दो बातों को बताने का विशेष ध्यान रखते हैं। (क) प्रत्येक वस्तु में अपना सर्वोच्च महत्त्व? (ख) उनके बिना किसी भी एक वस्तु या समूह का सामञ्जस्यपूर्ण अस्तित्व सम्भव नहीं हो सकता। 
इस खण्ड का प्रारम्भ जिस हन्त शब्द से होता है वह अर्जुन के प्रति गीताचार्य के प्रेमपूर्ण सहानुभूति को दर्शाता है  तथा उससे अर्जुन में प्रतीत होने वाली अक्षमता के प्रति भगवान् की चिन्ता भी व्यक्त होती है  क्योंकि उस अक्षमता के कारण वह उस तत्त्व को नहीं अनुभव कर पा रहा था जो उसके अत्यन्त समीप है उसका स्वरूप ही है
समष्टि और व्यष्टि उपाधियों के द्वारा इस बहुविध सृष्टि के रूप में व्यक्त हुए आत्मा के विस्तार का अन्त नहीं हो सकता। इसलिए उसका वर्णन करना असंभव है  तथापि करुणासागर भगवान् श्रीकृष्ण अपने शरणागत् शिष्य अर्जुन के प्रति अपनी असीम अनुकम्पा के कारण इस असंभव कार्य को अपने हाथ में लेते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि उनके विस्तार का कोई अन्त नहीं है फिर भी वे अर्जुन को अपनी प्रधान विभूतियाँ बतायेंगे
भौतिक जगत् में यह एक अनुभूत सत्य है कि सूर्यप्रकाश सभी वस्तुओं की सतह पर से परावर्तित होता है चाहे वह पाषाण हो या दर्पण किन्तु दर्पण में उसका प्रतिबिम्ब या परावर्तन अधिक स्पष्ट और तेजस्वी होता है।
भगवान् वचन देते हैं कि वे ऐसे दृष्टान्त देंगे जिनमें दिव्यता की अभिव्यक्ति के साक्षात् दर्शन हो सकते हैं।
परन्तु उन विभूतियों के वर्णन में प्रवेश करने के पूर्व एक मूलभूत सत्य को बताते हैं
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च।।10.20।।
।।10.20।। हे गुडाकेश (निद्राजित्) ! मैं समस्त भूतों के हृदय में स्थित सबकी आत्मा हूँ तथा सम्पूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अन्त भी मैं ही हूँ।।
भूतमात्र के हृदय में स्थित आत्मा मैं ही हूँ इस सामान्य कथन के साथ श्रीकृष्ण इस प्रकरण का प्रारम्भ करते हैं।  यहाँ पर भी हम देखेंगे कि इस अध्याय की समाप्ति पर भगवान् इसी विचार को और अधिक प्रभावशाली ढंग से दोहराते हैं कि मैं इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक अंशमात्र से धारण करके स्थित हूँ।
इस श्लोक की पहली पंक्ति में भगवान् अपनी सर्वात्मकता दर्शाते हैं और दूसरी पंक्ति में इसी भाव को प्रकारान्तर से बताते हैं कि मैं समस्त भूतों का आदि, मध्य और अन्त हूँ।
वस्तुत बाह्य चराचर जगत् मन की प्रक्षेपित सृष्टि है दूसरे शब्दों में बाह्य जगत् परिच्छिन्न मन के द्वारा किया गया अनन्त का अन्यथा दर्शन है। 
यह तथ्य आन्तरिक वैचारिक जगत् से सम्बन्धित भी समझा जा सकता है। प्रत्येक बुद्धिवृत्ति चैतन्य में प्रकट होकर उसी में लीन हो जाती है। चैतन्य के अभाव में वृत्ति की उत्पत्ति नहीं हो सकती। आगे भी इसी विचार को दोहराया गया है। भगवान् श्रीकृष्ण इस महान् सत्य को दोहराते कभी नहीं थकते हैं।
इस चराचर जगत् में रहते हुए ईश्वरोपासना की साधनाओं को या पद्धति को अब बताते हैं।
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी।।10.21।
।।10.21।। मैं (बारह) आदित्यों में विष्णु और ज्योतियों में अंशुमान् सूर्य हूँ; मैं (उनचास) मरुतों (वायु देवताओं) में मरीचि हूँ और नक्षत्रों में शशी (चन्द्रमा) हूँ।।

 मैं आदित्यों में विष्णु हूँ वैदिक परम्परा में आदित्यों का संख्या कहीं पाँच तो कहीं छ बतायी गई है। ये अदिति के पुत्र थे। तत्पश्चात् पारम्परिक विश्वास के अनुसार इनकी संख्या बारह मानी गई  जो बारह मासों के सूचक हैं।  विष्णु पुराण के अनुसार विष्णु नामक एक आदित्य है जो अन्य आदित्यों की अपेक्षा श्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण है। 
मैं ज्योतियों में सूर्य हूँ आधुनिक भौतिक विज्ञान भी सूर्य को समस्त ऊर्जाओं के स्रोत के रूप में स्वीकार करता है। अत भगवान् के कथन का अभिप्राय स्वत स्पष्ट हो जाता है। जहाँ कहीं भी कोई ऊर्जा व्यक्त होती है उसका स्रोत आत्मा ही है।मैं वायु देवताओं में मरीचि हूँ वायु के अधिष्ठाता देवता मरुत कहलाते हैं जिनकी संख्या उनचास कही गई है। इन में मरीचि नामक मरुत मैं हूँ। 

मरुतगण रुद्र पुत्र माने गये हैं। ऋग्वेद के अनुसार मरीचि उनमें प्रमुख है। मैं नक्षत्रों में चन्द्रमा हूँ भारतीय खगोलशास्त्र में जिस अर्थ में नक्षत्र शब्द प्रयुक्त किया जाता है वह चन्द्रमा के मार्ग के तीन तारों का सूचक है। इस दृष्टि स? विश्व में चन्द्रमा का यह मार्ग भगवान् की विभूति की ही एक अभिव्यक्ति है और चन्द्रमा उनमें सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि वह नियन्त्रक और नियामक है तथा तेज में भी अपूर्व है। 
परन्तु हम नक्षत्र शब्द से सामान्य प्रचलित अर्थ को भी स्वीकार कर सकते हैं, जिसके अनुसार रात्रि के समय आकाश में जड़े हुए छोटेछोटे चमकते हुए असंख्य तारे ही नक्षत्र हैं। कुछ व्याख्याकार एक पग आगे जाकर कहते हैं कि नक्षत्र शब्द रात्रि के मस्त प्रकाशों का सूचक है। चिन्तन के लिए उपयोगी होने से यह अर्थ भी स्वीकार्य हो सकता है। 
रात्रि के समय एक छोटी सी कुटिया से लेकर संसद भवन तक को चमकाने वाले चन्द्रमा का प्रकाश शीतल शान्तिप्रद और गौरवमय होता हैठीक उसी प्रकार आत्मा का प्रकाश भी अतुलनीय है। 
यहाँ 22 श्लोकों की इस मालिका में भगवान् श्रीकृष्ण कुल 75 उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। उनका उद्देश्य ज्ञानयोग के मार्ग पर चलने वाले साधक की सहायता करना है। यहाँ उक्त उपासनाओं के द्वारा साधकगण अपने मनबुद्धि को सुगठित करके चित्त की एकाग्रता प्राप्त कर सकते हैं। ध्यान के लिए उपयोगी ये पचहत्तर अभ्यास हैं

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना।।10.22।।

।।10.22।। मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में वासव (इन्द्र) हूँ; मैं इन्द्रियों में मन और जीवित  प्राणियों में चेतना ( intelligence -'बुद्धि' , 'मति', प्रतिभा' ज्ञानशक्ति) हूँ।।
10.22 Among the Vedas I am the Sama-Veda; I am Vasava among the gods; among the senses I am the mind; and I am intelligence among living beings.

 मैं वेदों में सामवेद हूँ ऋग्वेद का सार ही सामवेद है। चारों वेदों में ऋग्वेद का स्थान सबसे प्रमुख है। सामवेद को छान्दोग्योपनिषद् में सुन्दरता से गौरवान्वित किया गया है। सामवेद में संगीत का विशेष आनन्द भी जुड़ा हुआ है क्योंकि साम मन्त्रों को सुन्दर राग सुर और लय में गाया जाता है।  जो इस बात के प्रमाण हैं कि संगीत की इस सुन्दर और शक्तिशाली कला को हमारे पूर्वजों ने इतना अधिक विकसित किया था। इस उपमा के सौन्दर्य के द्वारा हम कह सकते हैं कि श्रीकृष्ण संगीत की आत्मा हैं ! जैसे ऋग्वेद का सार सामवेद है। 
मैं देवों में इन्द्र हूँ स्वर्ग के निवासी देवों का राजा वासव इन्द्र है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि वैदिक सिद्धान्त के अनुसार यद्यपि रहनसहन का सर्वोच्च स्तर स्वर्ग में है परन्तु वहाँ भी देवताओं के पदों में श्रेष्ठता और हीनता का तारतम्य होता है।
 स्वर्ग की प्राप्ति इह लोक में किये गये पुण्य कर्मों के फलस्वरूप होती है और इस कारण जिस पुरुष ने यहाँ अधिक पुण्य अर्जित किया होगा उसे वहाँ श्रेष्ठतर भोगों की प्राप्ति होगी। इस नियम के अनुसार उन सब देवों के जीवन की अपेक्षा इन्द्र का जीवन अधिक वैभव एवं विलासपूर्ण तथा शक्तिशाली और समर्थ होना स्वाभाविक है। 
देवताओं में इन्द्र मैं हूँ जो अन्य देवों का शासक और नियन्ता है जिससे कि उनका जीवन सुखी एवं समृद्धशाली होता है। मैं इन्द्रियों में मन हूँ आधिदैविक दृष्टि से जिसे इन्द्र कहते हैं आध्यात्मिक दृष्टि से वही मन कहलाता है  क्योंकि देव शब्द का अर्थ इन्द्रिय होता है। जैसे इन्द्र देवताओं का राजा है वैसे ही मन इन्द्रियों का राजा है। मन के बिना इन्द्रियाँ स्वतन्त्र रूप से अपना व्यापार नहीं कर सकती हैं। इसलिये यहाँ कहा गया है कि मैं इन्द्रियों में मन हूँ। जगत् की समस्त सृष्ट वस्तुओं में सर्वाधिक श्रेष्ठ और अद्भुत वस्तु है बुद्धिमत्ता। 
intelligence


From AI to AI /swami Shuddhidananda

Among all created things in the world, the most excellent and wondrous is intelligence. यह एक ऐसी रहस्यमयी शक्ति है जिसके विषय में आधुनिक वैज्ञानिक एक अस्पष्ट और काल्पनिक धारणा बनाने के अतिरिक्त कुछ विशेष ज्ञान प्राप्त नहीं कर सके हैं।
[This is a mysterious power about which modern scientists have been unable to acquire any substantial knowledge, beyond forming a vague and speculative concept.] 















 


 



























 




























 




 









 
























 





 





 








 








 










  







 

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