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शनिवार, 29 मार्च 2025

🔆🙏मधुमत् पार्थिवं रजः🔆🙏

🔆🙏मधुमत् पार्थिवं रजः🔆🙏

 "मधु नक्तमुतोषसो मधुमत् पार्थिवं रजः।

मधु द्यौरस्तु नः पिता।।" (यजुर्वेदः--13.28)


अन्वयः--मधु नक्तम् उत उषसः मधुमत् पार्थिवं रजः । मधु द्यौः अस्तु नः पिता  ।।

शब्दार्थः----(नक्तम्) रात्रि, (उत) और, (उषसः) उषा काल, (मधु) मधुरता-युक्त हो, (पार्थिवं रजः) यह पार्थिव लोक या पृथिवी की मिट्टी के लिए, (मधुमत) मधुरता या आनन्द से युक्त, (पिता) पितृतुल्य, (द्यौः) द्युलोक, (नः) हमारे लिए, (मधु) मधुरता-युक्त, श्(अस्तु) होवे।।

भावार्थः---रात्रि और उषःकाल मधुरता-युक्त हों। माता पृथिवी और पृथिवी की धूल सब मधुरता-युक्त हों। पितातुल्य द्युलोक हमारे लिए मधुर हो।

व्याख्याः---मधुरता अपने कर्मों का फल है। व्यक्ति के जीवन में यदि माधुर्य (मिठास) है, स्नेह है, प्रेम है, अनुराग है और उदारता है तो उसे सभी ओर माधुर्य और स्नेह मिलेगा। सबसे प्यार मिलेगा, छिडकी या ठोकर नहीं मिलेगी। अपनी सोच, वाणी, व्यवहार और कर्मों से चारों ओर माधुर्य (मिठास) फैलाये बदले में आपको कितना प्रेमरूपी सुख मिलेगा। वाणी में जिह्वा का व्यवहार मुख्य है। यह जिह्वा ही है जो हमें सम्मान और असम्मान भी दिलाती है। शरीर का घाव तो शीघ्र ही ठीक हो जाता है, किन्तु वाणी या जिह्वा से मिला घाव कभी ठीक नहीं होता, जीवनपर्यन्त चलता है। इसलिए वाणी का ठीक-ठीक प्रयोग करें। सोचकर बोलें, बोलने से पहले कई बार सोचे। क्रोध आ रहा हो तो थोडा रुककर बोले। वाणी हमारे व्यक्तित्व, परिवार, कुल और समाज की परिचायिका है। इसका ठीक-ठीक प्रयोग करें। यह आपका भविष्य है।

प्रसन्नचित्त, सहृदय एवं परोपकारी व्यक्ति के लिए चाहे दिन हो या रात, प्रातः हो या सायं, पृथिवी हो या द्युलोक, धूप हो या वर्षा, गर्मी हो या सर्दी, सर्वत्र मधुरता एवं आनन्द का वातावरण मिलेगा। इसलिए वेदवाणी हमें परामर्श देती है कि चारों ओर मधुरता का वातावरण उत्पन्न करो, जिससे सबमें प्रेम, परस्पर सौहार्द का प्रसार हो। 

(साभार -https://www.facebook.com/vaidiksanskrit/photos/a.510099815677031.111820.510066709013675/714930558527288/)] 

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