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बुधवार, 1 अप्रैल 2026

⚜️️🔱श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय -16 ⚜️️🔱अध्याय सोलह: दैवासुर सम्पद् विभाग योग⚜️️🔱भय अविद्या का लक्षण है। जहाँ विद्या है , वहाँ निर्भयता है। ⚜️️🔱चरित्र के गुण उसके आध्यात्मिक विकास के समान अनुपात में होती है। ⚜️️🔱 किसी व्यक्ति के दोषों को अन्य लोगों के समक्ष प्रकट करने को पैशुन कहते हैं। पैशुन का अभाव ही अपैशुन है।⚜️️🔱(नारद जैसे प्रभु -भक्त) का मनसन्तुलन (poise) कभी विचलित नहीं होता है⚜️️🔱अहंकार को इष्टदेव का दास समझ लेने वाले व्यक्ति -के मन में विक्षेपों का कोई कारण नहीं रह जाता इसलिए उसके मन की शान्ति बनी रहती है ⚜️️🔱हिन्दू धर्म शास्त्रों में वर्णित (यम-नियम या चरित्र के गुण) का निर्माण किसी उदासीन पैगम्बर के द्वारा नहीं हुआ है, बल्कि हमारे पूर्वज ऋषियों के नित्य-अनित्य विवेक और अनुभवों की दृढ़ चट्टानों की नींव पर हुआ है⚜️️🔱साधक को सतत्त अपने क्रोध को शान्त रखने का प्रयास करते रहना चाहिए कभी उसे क्रियारूप में व्यक्त न होने दे।⚜️️🔱

 24 श्लोकों वाले इस अध्याय में श्रीकृष्ण दैवीय और आसुरी दो प्रकार की प्रकृति का वर्णन करते हैं। यह अध्याय दैवीय गुणों से सम्पन्न पुण्यात्माओं के निरूपण से शुरू होता है।  दैवीय गुण धार्मिक ग्रंथों के उपदेशों के अनुसरण, सत्त्वगुण को पोषित करने और अध्यात्मिक अभ्यास द्वारा मन को शुद्ध करने से विकसित होते हैं। ये दैवीय गुणों में वृद्धि करते हैं और अंततः भगवत्प्राप्ति तक पहुँचाते हैं।

आगे इसमें आसुरी गुणों का भी वर्णन किया गया है जिनका अति सतर्कता के साथ त्याग करना चाहिए, क्योंकि ये आत्मा को पुनः अज्ञानता और 'संसार' अर्थात् जीवन और मृत्यु के चक्र में खींचते हैं।

 श्रीकृष्ण इस अध्याय का समापन करते हुए कहते हैं कि क्या किया जाना चाहिए और क्या नहीं किया जाना चाहिए, इसका निर्णय करने का अधिकार केवल वेद शास्त्रों का ही माना जाता है अतः हमें भी वेदों के वाक्यों को मानना चाहिए। हमें इन वैदिक शास्त्रों के विधि-निषेधों को समझना चाहिए और तदनुसार इस संसार में अपने कार्यों का निष्पादन और दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए।

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⚜️️🔱अध्याय सोलह: दैवासुर सम्पद् विभाग योग⚜️️🔱

श्री भगवानुवाच

अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।

दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।16.1।।

।।16.1।। श्री भगवान् ने कहा -- अभय, अन्त:करण की शुद्धि, ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और आर्जव।।

इस श्लोक में उन आदर्श गुणों की प्राय सम्पूर्ण सूची प्रस्तुत की गयी है जो आध्यात्मिक जीवन जीने वाले एक सुसंस्कृत पुरुष (चरित्रवान मनुष्य) में देखे जाते हैं। अपने व्यावहारिक जीवन में उन बीस गुणों को जीना ही आध्यात्मिक जीवन कहलाता है।

इस श्लोक में उन आदर्श गुणों की प्राय सम्पूर्ण सूची प्रस्तुत की गयी है जो आध्यात्मिक जीवन जीने वाले एक सुसंस्कृत पुरुष में देखे जाते हैं। अपने व्यावहारिक जीवन में उन बीस गुणों को जीना ही आध्यात्मिक जीवन कहलाता है। भगवान् श्रीकृष्ण इन दैवी गुणों की गणना करते समय प्रथम स्थान अभय को देते हैं। भय अविद्या का लक्षण है। जहाँ विद्या है, वहाँ निर्भयता है।# गुणों की इस सूची में अभय को प्रथम स्थान देकर गीताचार्य़ यह इंगित करते हैं कि किसी साधक की नैतिक पूर्णता-(चरित्र के गुण) उसके आध्यात्मिक विकास के समान अनुपात में होती है

 >>#भय अविद्या का लक्षण है-जहाँ विद्या है, वहाँ निर्भयता है। 

 भगवान् श्रीकृष्ण इन दैवी गुणों की गणना करते समय प्रथम स्थान अभय को देते हैं। भय अविद्या # का लक्षण है। जहाँ विद्या है, वहाँ निर्भयता है। 

[# अविद्या -अस्मिता-राग-द्वेष-अभिनिवेश पंचक्लेश - से बचने का उपाय केवल मायाधीश (इष्टदेव/गुरुदेव) की शरण में रहना है। 

विनम्रता, सरलता और सत्यनिष्ठा (ईमानदारी -प्राण जाये पर वचन न जाए) ऐसे विशिष्ट दैवीय गुण हैं, जो हमारे जीवन में दैवत्व की प्रतिष्ठा करते हैं। अतः सरल, सहज और प्राकृतिक जीवन अभ्यासी बनें। दूसरों को प्रभावित करने के लिए अपने आसपास अनावश्यक आकर्षण ना जगाएँ। यथार्थवादी रहें।

Humility, simplicity, and integrity are divine qualities that establish divinity in our lives. Therefore, strive to live a simple, natural, and straightforward life. Do not create unnecessary attraction around you to impress others. Be realistic. ]

    गुणों की इस सूची में अभय को प्रथम स्थान देकर गीताचार्य़ (अवतार वरिष्ठ) यह इंगित करते हैं कि किसी साधक के चरित्र के गुण उसके आध्यात्मिक विकास  के समान अनुपात में होती है। 

विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।

पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धनाद् धर्मं ततः सुखम्॥

विद्या (ज्ञान) विनम्रता प्रदान करती है। विनम्रता से योग्यता (पात्रता) आती है। योग्यता से धन (संपत्ति/सामर्थ्य) प्राप्त होता है। धन से धर्म (सत्कर्म-'Be and Make') और धर्म से वास्तविक सुख सुख-शान्ति मिलती है। धर्म या सत्कर्म 'Be and Make' अर्थात 3H विकास के 5 अभ्यास द्वारा अर्जित विनम्रता, सरलता और सत्यनिष्ठा ऐसे विशिष्ट दैवीय गुण हैं, जिससे अविवेकी मनुष्य भी विवेक-सम्पन्न बुद्धि वाला  "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः। " की समझ वाला 'मनुष्य' (मान हूँश जिसको अपने अंतर्निहित देवत्व का होश हो) वही एक शिक्षक (Leader) बन सकता है।

['Unselfishness is God' निस्वार्थता ही ईश्वर है' की परिभाषा के अनुसार - स्वयं को मात्र देह (M/F) समझने वाला जो 0% निःस्वार्थी है वह पशु मानव है, जो 50 % निःस्वार्थी है वह मनुष्य  है (सद्गृहस्थ है) , जो 100% निःस्वार्थी हैं (पूर्ण त्यागी है-त्यागियों के बादशाह है) वे सम्पूर्ण मानव-जाति के मार्गदर्शक नेता अवतार वरिष्ठ ही परमात्मा हैं, ब्रह्म हैं! जिसको हम प्रेम से माँ कहते हैं !]          

 इसलिए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - "धर्म वह वस्तु है जिससे पशु, मनुष्य तक और मनुष्य देवत्व (परमात्मा) तक उठ सकता है।" 

  मनुष्य और ईसा में अन्तर (इष्टदेव, सद्गुरुदेव अथवा आचार्य नवनीदा में अन्तर।) 

" अभिव्यक्त प्राणियों में बहुत अन्तर होता है। अभिव्यक्त प्राणी के रूप में तुम ईसा कभी नहीं हो सकते। मिट्टी से एक मिट्टी का हाथी बना लो , उसी मिट्टी से एक मिट्टी का चूहा बना लो। उन्हें पानी में डालदो - वे एक बन जाते हैं। मिट्टी के रूप में वे निरंतर एक हैं , गढ़ी हुई वस्तुओं के रूप में निरंतर भिन्न हैं। ब्रह्म ही ईश्वर  तथा मनुष्य दोनों का उपादान है। पूर्ण सर्वव्यापी सत्ता के रूप में हम सब एक हैं, परन्तु वैयक्तिक प्राणियों के रूप में ईश्वर (मायाधीश) शाश्वत स्वामी हैं और हम (मायाधीन) शाश्वत सेवक हैं

    "तुम्हारे पास तीन चीजें '3H'  हैं- 1. शरीर, 2. मन 3. आत्मा! आत्मा इन्द्रियातीत है। मन (मिथ्या अहं) जन्म और मृत्यु का पात्र है और वही दशा शरीर की है। तुम वही (अविनाशी) आत्मा हो, पर बहुधा तुम सोचते हो की तुम शरीर हो। जब मनुष्य कहता है- 'मैं यहाँ हूँ',  तो उस समय वह शरीर की बात सोचता है। 

फिर एक दूसरा क्षण आता है , जब तुम उच्चतम भूमिका में होते हो, तब तुम यह नहीं कहते - " मैं यहाँ हूँ !" किन्तु जब कोई तुम्हें गाली देता है, या तुम्हारा अपमान करता है, और तुम रोष नहीं प्रकट करते, (भीतर से क्रोधित नहीं हो जाते), तब तुम आत्मा हो। 

" जब मैं सोचता हूँ कि मन (सूक्ष्म शरीर M/F जीव) हूँ, मैं उस अनन्त अग्नि की एक स्फुलिंग हूँ, जो तुम हो। जब मैं यह अनुभव करता हूँ कि मैं आत्मा हूँ, तुम और मैं एक हूँ। " यह एक प्रभु (मायाधीश) के भक्त का कथन है ! क्या मन आत्मा से बढ़कर है ? [क्या मन (M/F जीव भाव) आत्मा (मायधीश-इष्टदेव -आचार्यदेव) से बढ़कर है ? (खंड 10. पृष्ठ 40)]  

 "दृष्टिं ज्ञानमयीं  कृत्वा पश्येद्  ब्रह्ममयं जगत्!

ज्ञानमय दृष्टि से संसार को ब्रह्ममय देखना चाहिए

यह प्रसिद्ध श्लोक हनुमान जी द्वारा भगवान श्री राम को दिया गया उत्तर है, जो द्वैत (सेवक-स्वामी), विशिष्टाद्वैत (अंश-अंशी) और अद्वैत (आत्म-एकता) दर्शन का अनूठा मिश्रण है।

 "देहबुद्धया तु दासोऽहं जीवबुद्धया त्वदंशक। 

     आत्मबुद्धया  त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः ॥   

देहबुद्धि से तो मैं दास हूँ, जीवबुद्धि से आपका अंश ही हूँ और  आत्मबुद्धि से में वही हूँ जो आप हैं, यही मेरी निश्चित मति है॥ 

[" अपने धर्म के (सनातन-वैदिक धर्म के) उसी एक केन्द्रवर्ती सत्य पर खड़े हो जाओ - जो हिन्दू, बौद्ध और जैनियों के लिए पैतृक सम्पत्ति है। वह सत्य है मनुष्य की 'आत्मा' ! अजर, अमर, अविनाशी, सर्वगत मानवात्मा जिसकी महिमा का वर्णन वेद भी नहीं का सकते, जिसके वैभव के सामने सूर्य-चंद्र , तारागण और आकाशगंगा समेत सारा विश्व-ब्रह्माण्ड एक 'बिन्दु' जैसा है। प्रत्येक स्त्री-पुरुष, यही नहीं, उच्चतम देवों से लेकर छोटे -छोटे जीव सब वही अनन्त 'आत्मा ' हैं , कोई विकसित कोई अविकसित हैं। अन्तर प्रकार में नहीं , केवल परिमाण में है। आत्मा की इस अनंत शक्ति का प्रयोग जड़ वस्तु (देह,मन इन्द्रिय) पर होने से 'मूढ़ बुद्धि' का विकास होता है, और 'अपने पर' ही होने से  - 'मनुष्य' का ईश्वर बन जाता है। (मूढ़ बुद्धि को देह-मन के तादात्म्य से हटाकर आत्मा से जोड़ लेने पर, स्वार्थी क्षुद्र अहं, पूर्णतः निःस्वार्थी सर्वगत अहं ईश्वर में परिणत हो जाता है -क्योंकि Unselfishness is God!) पहले हमें ईश्वर बन लेने दो। तत्पश्चात दूसरों को ईश्वर बनाने में सहायता देंगे।  'बनो और बनाओ', "Be and Make" यही हमारा मूलमंत्र रहे। ऐसा न कहो कि मनुष्य पापी है। उसे यह बताओ कि तू ब्रह्म है। " (9/379) 

" मुझे तो केवल इसी बात की शिक्षा देनी है कि ईश्वर बार बार आता है , वह भारत में कृष्ण, राम और बुद्ध के रूप में आया और वह पुनः आयेगा। यह प्रायः दिखाया जा सकता है कि प्रत्येक 500 वर्ष के पश्चात दुनिया नीचे जाती है, और एक महान आध्यात्मिक लहर आती है और उस लहर के शिखर पर एक 'ईसा' होता है! ... और श्रीरामकृष्ण की जन्मतिथि से ही सत्ययुग का प्रारम्भ हो चुका है। (10/39)

[स्वामी विवेकानन्द और युवा समस्याएं/(স্বামী বিবেকানন্দ ও যুব-সমস্যা) /रामकृष्ण मठ और मिशन का प्रतीक चिन्ह] SVHS- 3.3 Tuesday, September 11, 2012

अन्तकरण की शुद्धि अपने व्यक्तित्व के बाह्य स्तर पर साधक को कितना ही संयम क्यों न हो  फिर भी वह संयम उसे रचनात्मक और निश्चयात्मक शक्ति प्रदान नहीं कर सकता जो कि नैतिक जीवन (मोने करबि तुमि एक जन शिक्षक (Leader) का सार है।( नेता की की शक्ति-का सार है मर्म है चित्त शुद्धि या विषयासक्त मूढ़बुद्धि को आत्मोन्मुखी शुद्धबुद्धि बना लेना। ) 

 गीता सैद्धांतिक और व्यावहारिक इन दोनों ही दृष्टियों से एक शक्तिशाली धर्म  का उपदेश देती है। निष्क्रिय सदाचार का पालन करने वाली आज्ञाकारी पीढ़ी से भगवान् श्रीकृष्ण सन्तुष्ट नहीं हैं। वे चाहते हैं कि समाज के सभी लोग न केवल अपने व्यक्तिगत जीवन में ही सर्वोच्च नैतिक मूल्यों को जियें वरन् सामाजिक जीवन में भी धर्माचरण (सत्कर्म-'Be and Make') की ऐसी नवचेतना- जाग्रत करें जिससे मनुष्यों की सम्पूर्ण पीढ़ी ही सत्य और धर्म के प्रकाश से उज्वल बन जाये। धर्म शब्द के अर्थ में उद्देश्यों की सत्यता (भारत का कल्याण) और साधनों की शुद्धता (जीवनगठन -आदि 5 अभ्यास) अन्तर्निहित है।

ज्ञानयोग व्यवस्थिति अत्यन्त देहासक्त और विषयासक्त मूढ़बुद्धि को उपर्युक्त अन्तकरण की शुद्धि (विवेकी -शुद्धबुद्धि) प्राप्त नहीं हो सकती। आत्मा के दिव्य गान के साथ एकस्वर हुए मन में ही अपनी निम्न स्तर की वृत्तियों बन्धनकारक आसक्तियों और निन्द्य उद्देश्यों को त्यागने की आवश्यक सार्मथ्य होती है। ये हीन वृत्तियां सदैव अन्तकरण में उभर कर सामने आती रहती हैं। ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति ही मन को निम्नस्तर के प्रलोभनों से निवृत्त करने का निश्चयात्मक उपाय है

 यदि कोई बालक कांच की निर्मित नाजुक कलाकृति के साथ खेल रहा हो तो उसके मातापिता उस बहुमूल्य वस्तु की सुरक्षा के लिए प्राय बालक को चॉकलेट आदि कोई वस्तु देते हैं और वह बालक उसे पाने  के लिए उस कांच की मूल्यवान् वस्तु को त्याग देता है। इसी प्रकार आत्मा (इष्टदेव) के आनन्द को अनुभव करने वाली शुद्धबुद्धि ('विद्या ददाति विनयं युक्तबुद्धि!) इन्द्रियों के विषयों तथा तज्जनित क्षणिक सुखों में स्वभावतः आसक्त नहीं होती।  दान, दम (इन्द्रिय संयम) और यज्ञ ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति प्राप्त करने के ये तीन साधन हैं जिनके द्वारा एक साधक चित्तशुद्धि (अन्तःकरण की शुद्धि) की योग्यता प्राप्त कर सकता है। 

बहुलता के भाव से उत्पन्न हुई दान की प्रवृत्ति ही वास्तविक दान है। जब हम अन्यों के साथ एकत्व का अनुभव करते हैं तभी हम सबके साथ अपने सर्वस्व का विभाजन करने के लिए तत्पर होते हैं,  अन्यथा नहीं।  इस प्रकार दान का उदय हमारी इस क्षमता से होता है जिसके द्वारा हम अपनी परिग्रह और लोभ की प्रवृत्ति को संयमित करते हैं। जहाँ इनका संयमन एक पक्ष है, तो दूसरा पक्ष है यज्ञ अर्थात् त्याग की भावना। यज्ञ भावना से प्रेरित होने पर ही हम अपने संग्रह का दान कर सकते हैं। दान शब्द से केवल धन या वस्तुओं का ही दान नहीं वरन् दुखियों के साथ सहानुभूति का भाव तथा ज्ञानदान भी इसमें सम्मिलित है।  यदि दान साधक के वैराग्य को विकसित करता है जिससे वह साधक अपनी सम्पत्ति का विनियोग दीनजनों की सहायता में करता है  तो हम कह सकते हैं कि हमारे व्यक्तिगत जीवन में इन्द्रियसंयम (दम) उसी यज्ञ भावना का संप्रयोग है। 

मूढ़बुद्धि को इन्द्रियों के विषयों में विचरण करने का पूर्ण अधिकार देने का अर्थ अपनी सम्पूर्ण शक्ति का निष्फल ही अपव्यय करना है। साधक को चाहिए कि अपनी इस शक्ति का उपयोग वह अपने ध्यानाभ्यास में करे। मन को आत्मा में समाहित करने के लिए सूक्ष्म शक्ति की आवश्यकता होती है और उसे साधक इन्द्रियसंयम के द्वारा अपने में ही निहित देख सकता है। दान और दम के बिना सत्य की तीर्थयात्रा मात्र स्वप्न ही है।

यज्ञ वैदिककाल में यज्ञ शब्द का अर्थ श्रद्धायुक्त होमहवन आदि का अनुष्ठान समझा जाता था। उस काल में साधकगण इन यज्ञों का श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करते थे। पौराणिक काल में वैदिक कर्मकाण्ड का स्थान मूर्तिपूजा प्रार्थना जैसी भक्ति साधनाओं ने ले लिया जो उसी रूप में आज भी विद्यमान हैं। यज्ञ अर्थात् पूजा के अनुष्ठान से मन को एक आलम्बन प्राप्त होने से इन्द्रियों का संयमन करने में सरलता होती है। 

स्वाध्याय से मात्र वेदपठन या बौद्धिक स्तर पर उसके अर्थ को समझना ही पर्याप्त नहीं है। संस्कृत के इस शब्द का आशय है स्वयं का अध्ययन अर्थात् आत्मनिरीक्षण। वेदप्रतिपादित सत्यों को समझकर उनका स्वानुभवकरण ही वास्तविक स्वाध्याय है। स्वाध्याय और यज्ञ से हमें आत्मसंयम का जीवन जीने का साहस प्राप्त होगा जो हमें अपने ध्यानाभ्यास में चित्त की स्थिरता प्रदान करेगा। 

तप कष्ट सहन - शारीरिक स्तर पर पालन किये जाने वाले व्रत उपवास आदि तप कहलाते हैं। तपाचरण से बाह्यजगत् के भोगों में व्यर्थ ही नष्ट होने वाली हमारी शक्ति का संचय होता है जिसके सदुपयोग आत्मविकास के लिए किया जा सकता है। 

आर्जवम् इसका अर्थ है सरलता। बुद्धि के विचार मन की भावनाओं और कर्मों में कुटिलता का साधक के व्यक्तित्व पर आत्मघातक परिणाम होता है। हमारे वास्तविक उद्देश्यों और प्रेरणाओं निश्चय और आकांक्षाओं विवेक और अनुभवों को असत्य सिद्ध करने वाले हमारे कर्मों का परिणाम अपने व्यक्तित्व की वक्रता होता है। जो व्यक्ति इस प्रकार का व्यक्तित्व जीता है उसका जीवन दो भागों में विभाजित हो जाता है और शीघ्र ही वह अपनी कार्यकुशलता की आभा को खो देता है और व्यक्तिगत दृढ़ता की शक्ति की दृष्टि से भी दुर्बल हो जाता है। 

इस प्रकार इस अध्याय के प्रथम श्लोक में ही दैवीगुणों का उल्लेख करते हुए उनके परस्पर संबंधों को भी दर्शाया गया है। हिन्दू धर्म शास्त्रों में वर्णित नैतिक मूल्य और सदाचार के नियम (साधन-चतुष्टय या यम-नियम या चरित्र के गुण) का निर्माण किसी उदासीन पैगम्बर के द्वारा नहीं हुआ है, बल्कि हमारे पूर्वज ऋषियों के नित्य-अनित्य विवेक और अनुभवों की दृढ़ चट्टानों की नींव पर  हुआ है। निष्ठापूर्वक उनका पालन करने और सजगतापूर्वक उन्हें अपने व्यवहार में अभिव्यक्त करने पर वे हमारी प्राय सुप्त दैवी क्षमताओं (निःस्वार्थपरता) को व्यक्त करते हुए (क्रमशः पशु से मनुष्य बनने में, मनुष्य से देवत्व में उठने में) अपना योगदान देते हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार  ये दैवी चरित्र के गुण अपने आप में स्वर्ग (जन्नत) में प्रवेश का अधिकार प्रदान नहीं कर सकते परन्तु मनुष्य के हृदय में स्थित दिव्य आत्मतत्त्व (अव्यक्त ब्रह्मत्व) को पूर्णतया अभिव्यक्त करने में  वे पूर्ण तैयारी के रूप में सहायक होते हैं।

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।

दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्।।16.2।।

।।16.2।। अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शान्ति, अपैशुनम् (किसी की निन्दा न करना), भूतमात्र के प्रति दया, अलोलुपता , मार्दव (वाणी की मधुरता , कोमलता), लज्जा, अचंचलता।।

अहिंसा प्राणियों को पीड़ा न पहुँचाना अहिंसा है। स्वार्थ या द्वेषवशात् किसी को पीड़ित करना हिंसा है। अहिंसा का पालन शरीर, वाणी (ह्रदय)  और मन इन तीनों स्तर पर होना चाहिए। सत्यम् सत्य का कुछ भाव आर्जव (सरलता) शब्द की व्याख्या में प्रकट किया जा चुका है। प्रमाणों से सिद्ध अर्थ को उसी रूप में प्रकट करना सत्य कहलाता है।

अक्रोध - (अविरोध) साधना की स्थिति में कभी-कभी किसी घटना अथवा किसी के दुर्व्यवहार से मन में क्रोध आ जाता है;  परन्तु तत्काल ही क्रोध को पहचान कर उसको शान्त करने की क्षमता को यहाँ अक्रोध कहा गया है। साधक को सतत्त अपने क्रोध को शान्त रखने का प्रयास करते रहना चाहिए  कभी उसे क्रियारूप में व्यक्त न होने दे। 

त्याग यहाँ यहाँ अहंकार और स्वार्थ का त्याग करने के लिए कहा गया है। पूर्व श्लोक के समान यहाँ उल्लिखित गुणों में भी परस्पर संबंध है। अहंकार त्याग के अभाव में अक्रोध या अविरोध भी सिद्ध नहीं हो सकता क्योंकि जब कोई हमारे अहंकार या स्वार्थ को चोट या हानि पहुंचता है तभी हमें क्रोध आता है।

शान्ति उपर्युक्त गुणों से सम्पन्न व्यक्ति, अहंकार (मन या सूक्ष्म शरीर M/F जीव-अंशी) को आत्मा (इष्टदेव) का दास समझने वाले व्यक्ति के मन में विक्षेपों का कोई कारण नहीं रह जाता; इसलिए उसके मन की शान्ति बनी रहती है। बाह्य जगत् की अथवा उसके व्यक्तिगत जीवन की परिस्थितियां कितनी ही दुखदायक और आक्रामक क्यों न हों उस व्यक्ति (नारद जैसे प्रभु -भक्त) का मनसन्तुलन (poise) कभी विचलित नहीं होता है

अपैशुनम् किसी व्यक्ति के दोषों को अन्य लोगों के समक्ष प्रकट करने को पैशुन कहते हैं। पैशुन का अभाव ही अपैशुन है।  मार्दव (वाणी की मधुरता , कोमलता) आत्मविकास के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचने की आकांक्षा रखने वाले उद्यमी साधक को ऐसा आन्तरिक सामञ्जस्य स्थापित करना चाहिए कि उसकी वाणी आत्मा की सुरभि का अनुकरण करे। इस प्रकार के मधुर संभाषण के गुण का स्वयं में विकास करने से अपने व्यक्तित्व के अन्य आयामों का भी स्वत विकास हो जाता है. जो अन्तकरण को अनुशासित करने के लिए आवश्यक होता है।

दया प्राणी मात्र के प्रति दया -नहीं ! सेवा   दुख और कष्ट से पीड़ित प्राणियों के प्रति सेवा का भाव दया कहलाता है। 

इसके अतिरिक्त एक साधक को समाज में रहते हुए यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि समाज के सभी लोग उन्हीं आदर्शों या जीवन मूल्यों का अनुकरण करें जिनके प्रति स्वयं उसकी श्रद्धा है। लोगों की दृष्टियों में भेद होता है और इसलिए उसे अपने आसपास के लोगों में अपूर्णता और दोष दिखाई दे सकते हैं। परन्तु उनको इन समस्त दोषों के अन्तरंग में स्थित आत्मा के असीम सौन्दर्य को देखते रहना चाहिए। आत्मदर्शन की यह क्षमता ही सभी साधुओं और सन्तों के मन में स्थित प्राणिमात्र के प्रति दया (सेवा) का रहस्य है। 

सब के प्रति मन में प्रेम होने पर ही उनके प्रति असीम सहानुभूति और स्नेह का भाव हृदय में उठ सकता है। आत्मा की इस सुन्दरता को यदि अत्यन्त दुःखी और दुश्चरित्र व्यक्ति में भी हम नहीं देख सके तो उनके प्रति हमारे हृदय में स्नेह और दया (सेवा की भावना) उत्पन्न नहीं हो सकती।

अलोलुपता प्रलोभित और आकर्षित करने वाले विषयों की उपस्थिति में भी -  "ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके, शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते।" प्रार्थना से मन में विकार उत्पन्न नहीं होना अलोलुपता है।

मार्दव (मृदुता) और लज्जा यहाँ लज्जा का अर्थ है शास्त्र-निषिद्ध और निन्द्य प्रकार के कर्म करने में लज्जा का अनुभव करना। इसे दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि निन्द्य कर्मों का त्याग करना तथा शुभ कर्मों में गर्व का न होना अर्थात् नम्रता विनयशीलता का होना लज्जा शब्द का अभिप्रेत अर्थ है। वस्तुत जो व्यक्ति उपर्युक्त गुणों से सम्पन्न होता है उसमें स्वभाव की मृदुता और विनयशीलता स्वाभाविक रूप में आ जाती है क्योंकि ये दोनों गुण मनुष्य की श्रेष्ठ संस्कृति (सुन्दर चरित्र) के द्योतक हैं। 

अचापलम् मनुष्य के मन की चंचलता और स्वभाव की अस्थिरता उसकी शारीरिक चेष्टाओं में प्रकट होती है।  जैसे जैसे व्यक्ति का आत्मिक विकास होता जाता है उसका आत्मसंयम ही उसका सौन्दर्य समझा जाता है।  जो उसकी शारीरिक चेष्टाओं के द्वारा स्पष्ट होता है।श्री शंकराचार्य जी इसका अर्थ बताते हैं- 'प्रयोजन के अभाव में हाथ, पैर,   वाणी आदि इन्द्रियों का व्यापार न होना अचापलम् कहलाता है। यह इस शब्द का व्यापक अर्थ है। और इसका आशय यह भी है कि लक्ष्य (आदर्श)  प्राप्ति के लिए उपयोगी कार्य में तत्परता और समस्त शारीरिक शक्तियों की मितव्ययिता होना चाहिए। अनावश्यक चेष्टाएं करना दुर्बल व्यक्तित्व का लक्षण है। ऐसे व्यक्ति कल्पनाओं में ही खोये रहते हैं और मानसिक तथा बौद्धिक स्तर पर अत्यन्त दुर्बल होते हैं। अत अचापलम् नामक गुण के सम्पादन से हम अपने व्यक्तित्व -चरित्र के अनेक प्रकार की सामान्य दोषों का उपचार कर सकते हैं।

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।

भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत।।16.3।।

।।16.3।। हे भारत ! तेज, क्षमा, धैर्य, शौच (शुद्धि), अद्रोह और अतिमान (गर्व) का अभाव ये सब दैवी संपदा को प्राप्त पुरुष के लक्षण हैं।।

 तेज यह तत्त्वदर्शी ऋषि का तेज है। उसकी शुद्धबुद्धि की प्रतिभा नेत्रों में जगमगाता आनन्द, सन्तप्त हृदयों को शीतलता प्रदान करने वाली शान्ति की सुरभि कर्मों में उसका अविचलित सन्तुलन, प्राणिमात्र के प्रति उसके हृदय में स्थित प्रेम का आनन्द और उसके अन्तरतम से प्रकाशित आनन्द का प्रकाश। यह तेज ही उस ऋषि के व्यक्तित्व का प्रबल आकर्षण होता है,  जो प्रचुर शक्ति और उत्साह के साथ सब की सेवा करता है। और उसी में स्वयं को धन्य समझता है।

क्षमा जिस सन्दर्भ में इस गुण का उल्लेख किया गया है उससे इसका अर्थ गाम्भीर्य बढ़ जाता है। सामान्य दुख और कष्ट अपमान और पीड़ा को धैर्यपूर्वक सहन करनै की क्षमता ही क्षमा का सम्पूर्ण अर्थ नहीं है। बाह्य जगत् के अत्यधिक शक्तिशाली विरोध तथा उत्तेजित करने वाली परिस्थितयों के होने पर भी उनका सामना करने का सूक्ष्म कोटि का साहस और अविचलित शान्ति का नाम क्षमा है। 

धृति अर्थात् धैर्य। दादा कहते थे - " वीर हो धीर बनो ! " जब कोई व्यक्ति साहसपूर्वक जीना चाहता है तब वह अपने जीवन में सदैव सुखद वातावरण-अनुकूल परिस्थितयाँ और अपने कार्य में सफलता के सहायक सुअवसरों को प्राप्त करने की अपेक्षा नहीं कर सकता है। सामान्यत एक दुर्बल व्यक्तित्व के पुरुष को अचानक निराशा आकर घेर लेती है और वह कार्य को अपूर्ण ही छोड़कर अपने कार्य क्षेत्र से निवृत्त हो जाता है।  अनेक लोग तो ऐसे समय हतोत्साह होकर कार्य को त्याग देते हैं  जब विजयश्री उन्हें वरमाला पहनाने को तत्पर हो रही होती है। पुनः यह एक आत्मदर्शन युक्त शुद्धबुद्धि में निहित गुप्त शक्ति है ही धृति अर्थात् धैर्य है। श्रद्धा की शक्ति, लक्ष्य 'Be and Make' में आस्था, उद्देश्य (भारत का कल्याण) की एकरूपता,  आदर्श का स्पष्ट दर्शन और त्याग की साहसिक भावना ये सब वे शक्ति श्रोत हैं।  जहाँ से धृति की बूंदें रिसती हुई प्रवाहित होकर श्रम, अवसाद एवं निराशा आदि का परिहार करती रहती हैं। 

शौचम् (शुद्धि) यह शब्द न केवल अन्तकरण के विचारों एवं उद्देश्यों की शुद्धि को इंगित करता है? वरन् इसके द्वारा वातावरण की शुद्धि अपने वस्त्रों की और वस्तुओं की स्वच्छता भी सूचित की गयी है। आन्तरिक शुद्धि पर ही अत्यधिक बल देने के फलस्वरूप हम अपने समाज में बाह्य शुद्धि की सर्वथा उपेक्षा की जाते हुए देखते हैं। वस्त्रों की तथा नगर की स्वच्छता हमारे राष्ट्र में दुर्लभ हो गयी है। यद्यपि हमारे धर्म में साधक के लिए शुद्धि और स्वच्छता इन दोनों को ही अपरिहार्य बताया गया है।  तथापि धर्णप्राण भक्तगण भी इनके प्रति उदासीन ही दिखाई देते हैं।

अद्रोह अहिंसा का अर्थ है किसी को भी पीड़ा न पहुँचाना और अद्रोह का अर्थ है मन में कभी हिंसा का भाव न उठना। जैसे कोई भी व्यक्ति कभी स्वप्न में भी स्वयं को पीड़ित करने का विचार नहीं करता वैसे ही आत्मैकत्व का बोध प्राप्त पुरुष के मन में किसी के प्रति भी द्रोह की भावना नहीं आती क्योंकि अन्य को कष्ट देने का अर्थ स्वयं को ही पीड़ित करना है। 

अतिमानिता–गर्वमुक्त या  प्रतिष्ठा की इच्छा से मुक्त पुरुष के लिए जीवन पक्षी के पंख के समान भारहीन होता है। 

उपर्युक्त छब्बीस/चौबीस गुण दैवीसम्पदा से सम्पन्न व्यक्ति के स्वभाव का पूर्ण चित्रण करते हैं। पूर्णत्व प्राप्ति के सभी इच्छुक साधकों के मार्गदर्शन के रूप में इन गुणों का यहाँ उल्लेख किया गया है।

जिस मात्रा में उपर्युक्त दैवीगुणों के अनुरूप हम अपने जीवन को पुर्नव्यवस्थित करने में सक्षम होते हैं और जीवन की ओर देखने के अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन ला सकते हैं उसी मात्रा में हम अपनी शक्तियों के निष्प्रयोजक व्यय को अवरुद्ध कर उन्हें सुरक्षित रख सकते हैं। इन जीवन मूल्यों का सम्मान करते हुए उन्हें जीने का अर्थ ही सम्यक् जीवन पद्धति को अपनाना है

अब आसुरी सम्पदा का वर्णन करते हैं

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।

अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्।।16.4।।

।।16.4।। हे पार्थ ! दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोर वाणी (पारुष्य) और अज्ञान यह सब आसुरी सम्पदा है।।

श्रीकृष्ण अब आसुरी प्रकृति से युक्त लोगों के छः लक्षणों की व्याख्या करते हैं। वे पाखंडी होते हैं। इसका तात्पर्य है कि वे दूसरों को प्रभावित करने के लिए शुभ लक्षणों से संपन्न न होते हुए भी सदाचरण का प्रदर्शन करते है। यह कृत्रिम (जेकिल एंड हाइड) व्यक्तित्व है जोकि आंतरिक रूप से तो अशुद्ध है किंतु बाहर से शुद्धता की प्रतीति कराता है। 

आसुरी गुण वालों का स्वभाव अहंकार से परिपूर्ण और दूसरों के प्रति अशिष्ट होता है। वे अपनी उपलब्धियों और उपाधियों जैसे धन, शिक्षा, सौन्दर्य, पद-प्रतिष्ठा आदि पर गर्व करते हैं। मन पर नियंत्रण न होने के कारण वे शीघ्र क्रोधित हो जाते हैं। कामवासना और लालच के कारण कुंठाग्रस्त रहते हैं। वे निर्दयी और कठोर होते हैं तथा दूसरों के दुःखों में संवेदनशील नहीं होते। उन्हें आध्यात्मिक सिद्धांतों का ज्ञान नहीं होता और वे अधर्म को धर्म मानते हैं।

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।

मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।।16.5।।

।।16.5।। हे पाण्डव ! दैवी सम्पदा मोक्ष के लिए और आसुरी सम्पदा बन्धन के लिए मानी गयी है, तुम शोक मत करो, क्योंकि तुम दैवी सम्पदा को प्राप्त हुए हो।।

दो प्रकार की प्रकृतियों का वर्णन करने के पश्चात् अब श्रीकृष्ण दोनों के परिणामों को व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि आसुरी गुण मनुष्य को 'संसार' की बेड़ियों में जकड़ लेते हैं जबकि दैवीय गुणों द्वारा बंधनों को काटने में सहायता मिलती है। 

आध्यात्मिक मार्ग पर सफलतापूर्वक चलने के लिए साधक को कई बिन्दुओं पर ध्यान रखना आवश्यक होता है। यहाँ तक कि यदि कोई एक भी आसुरी गुण जैसे अभिमान, पाखंड आदि रह जाता है तो यह असफलता का कारण बन सकता है। 

इसलिए हमें दैवीय गुणों को विकसित करना चाहिए। दैवीय गुणों के बिना हमारी आध्यात्मिक उन्नति पुनः हवा हो सकती है। उदाहरणार्थ धौर्य न होने पर हम विपत्ति आने पर अपना लक्ष्य छोड़ देंगे और क्षमाशीलता के बिना मन विद्वेष से युक्त हो जाएगा। 

तब वह भगवान में तल्लीन नहीं हो पाएगा। 

लेकिन यदि हम दैवीय गुणों से सम्पन्न रहते हैं तब प्रगति के मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं का सामना करने के लिए हम तैयार रहेंगे। इस प्रकार से सद्गुणों को विकसित करना और अवगुणों का उन्मूलन करना आध्यात्मिक विकास का अभिन्न अंग है। 


अपने प्रतिदिन के निजी कार्यकलापों की दैनिकी (डायरी) लिखना एक उपयोगी पद्धति जो हमारी दुर्बलताओं को दूर करने में सहायता करती है। कई सफल लोगों ने अपने संस्मरणों और कार्य-कलापों को डायरी में लिखा ताकि उन्हें सफलता प्राप्त करने में अपेक्षित गुणों को विकसित करने में सहायता मिल सके।

 महात्मा गांधी और बेंजामिन फ्रैंकलिन् दोनों ने अपनी आत्मकथाओं में ऐसा उल्लेख किया है। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि यदि हम अपनी भक्ति को पुष्ट करते हैं तब समय के साथ हम स्वाभाविक रूप से इन दैवीय गुणों को प्राप्त कर लेगें। 

यह सत्य है लेकिन प्रारंभ में ही से भक्ति मार्ग की ओर अग्रसर होते हुए सभी प्रकार के नकारात्मक लक्षणों से मुक्त रहना कठिन है। इनमें से कोई भी अवगुण हमारी प्रगति में बाधा डाल सकता है। 

अधिकांश लोगों के लिए धीरे-धीरे भक्ति भावना को विकसित करना ही उपयोगी होता है जिससे दैवीय गुणों को विकसित करने और आसुरी गुणों का उन्मूलन करने में भी सफलता मिलती है। इसलिए हमें भक्ति के अंग के रूप में श्रीकृष्ण द्वारा इस अध्याय में वर्णित दैवीय गुणों को अपने भीतर विकसित करने के लिए निरन्तर कार्य करना होगा और आसुरी गुणों का त्याग करना होगा।

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च।

दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे श्रृणु।।16.6।।

।।16.6।।इस लोकमें दो तरह के प्राणियों की सृष्टि है -- दैवी और आसुरी। दैवीका तो मैंने विस्तार से वर्णन कर दिया, अब हे पार्थ ! तुम मेरे से आसुरी का विस्तार सुनो।

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।

न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते।।16.7।।

।।16.7।। आसुरी स्वभाव के लोग न प्रवृत्ति को; जानते हैं और न निवृत्ति को उनमें न शुद्धि होती है, न सदाचार और न सत्य ही होता है।।

 निषिद्ध कर्मों से विरति ही निवृत्ति कहलाती है। अकर्तव्य का त्याग ही मनुष्य के लिए श्रेयस्कर होता है। असुर लोगों को कर्तव्य और अकर्तव्य का सर्वथा अज्ञान होता है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि आसुरी गुणों की सूची अज्ञान (अविद्या-अस्मिता,राग,द्वेष,अभिनिवेश,पंचजलेश) से  प्रारम्भ होती है। 'Ignorance of law is no excuse ' कानून की अनभिज्ञता कोई बहाना नहीं है। प्रारब्ध भोग कर ही क्षय करना पड़ता है। लेकिन शिक्षा-व्यवस्था में अज्ञान (अविद्या जनित क्लेश - और विद्या ददाति विनयं।) की कोई शिक्षा नहीं दी जाती है।  यदि कोई व्यक्ति अज्ञानवशात् किसी प्रकार का अपराध करता है तो समाज के सहृदय पुरुषों के मन में उसके प्रति क्षमा का भाव सहज उदित होता है; भले ही न्यायालय में उसे क्षमा के योग्य कारण न माना जाये। 

 यहाँ प्रवृत्ति और निवृत्ति के शब्द क्रमश कर्तव्य कर्म और अकर्तव्य अर्थात् निषिद्ध कर्म हैं। धार्मिक अनुष्ठानकर्ता कर्तव्य पालन और निस्वार्थ समाज सेवा -'Be and Make'  के द्वारा न केवल तात्कालिक लाभ को प्राप्त करता है अपितु अन्तकरण की शुद्धि भी प्राप्त करता है; क्योंकि वह कभी मनुष्य जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य (आत्मज्ञान) को विस्मृत नहीं होने देता।

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।

अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्।।16.8।।

।।16.8।। वे कहते हैं कि यह जगत् आश्रयरहित, असत्य और ईश्वर रहित है, यह (स्त्रीपुरुष के) परस्पर कामुक संबंध से ही उत्पन्न हुआ है, और (इसका कारण) क्या हो सकता है? 

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।

प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः।।16.9।।

।।16.9।।उपर्युक्त (नास्तिक) दृष्टिका आश्रय लेनेवाले जो मनुष्य अपने नित्य स्वरूपको नहीं मानते, जिनकी बुद्धि तुच्छ है, जो उग्रकर्मा और संसारके शत्रु हैं, उन मनुष्यों की सामर्थ्य का उपयोग जगत का नाश करनेके लिये ही होता है।

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।

मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः।।16.10।।

।।16.10।। दम्भ, मान और मद से युक्त कभी न पूर्ण होने वाली कामनाओं का आश्रय लिये, मोहवश मिथ्या धारणाओं को ग्रहण करके ये अशुद्ध संकल्पों के लोग जगत् में कार्य करते हैं।।

कामनाओं की तृप्ति के लिए ही जीवन धारण करना अविवेक का लक्षण है क्योंकि  कामना कभी तृप्त  नहीं होती। जैसेजैसे हम उसे तृप्त करते जाते हैं वैसेवैसे ही वह द्विगुणित होती जाती है। जो पुरुष अपने अनन्त स्वरूप को न जानकर स्वयं को परिच्छिन्न जीव ही समझता है केवल उसे ही विषयों की कामना हो सकती है। इसे ही मोह कहते हैं। 

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।

कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता:।।16.11।।

।।16.11।। मरणपर्यन्त रहने वाली अपरिमित चिन्ताओं से ग्रस्त और विषयोपभोग को ही परम लक्ष्य मानने वाले ये आसुरी लोग इस निश्चित मत के होते हैं कि "इतना ही (सत्य, आनन्द) है"।।

आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।

ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्।।16.12।।

।।16.12।। सैकड़ों आशापाशों से बन्धे हुये, काम और क्रोध के वश में ये लोग विषयभोगों की पूर्ति के लिये अन्यायपूर्वक धन का संग्रह करने के लिये चेष्टा करते हैं।।

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।

इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।।16.13।।

।।16.13।। मैंने आज यह पाया है और इस मनोरथ को भी प्राप्त करूंगा, मेरे पास यह इतना धन है और इससे भी अधिक धन भविष्य में होगा।।

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।

ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी।।16.14।।

।।16.14।। "यह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया है और दूसरे शत्रुओं को भी मैं मारूंगा", "मैं ईश्वर हूँ और भोगी हूँ", "मैं सिद्ध पुरुष हूँ", "मैं बलवान और सुखी हूँ",।।

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।

यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः।।16.15।।

।।16.15।। "मैं धनवान् और श्रेष्ठकुल में जन्मा हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है?",'मैं यज्ञ करूंगा', 'मैं दान दूँगा', 'मैं मौज करूँगा' - इस प्रकार के अज्ञान से वे मोहित होते हैं।।

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।

प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ।।16.16।।

।।16.16।। अनेक प्रकार से भ्रमित चित्त वाले, मोह जाल में फँसे तथा विषयभोगों में आसक्त ये लोग घोर, अपवित्र नरक में गिरते हैं।।

आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।

यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्।।16.17।।

।।16.17।। अपने आप को ही श्रेष्ठ मानने वाले, स्तब्ध (गर्वयुक्त), धन और मान के मद से युक्त लोग शास्त्रविधि से रहित केवल नाममात्र के यज्ञों द्वारा दम्भपूर्वक यजन करते हैं।।

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।

मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः।।16.18।।

।।16.18।। अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोध के वशीभूत हुए परनिन्दा करने वाले ये लोग अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ (परमात्मा) से द्वेष करने वाले होते हैं।।

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।

क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।।16.19।।

।।16.19।। ऐसे उन द्वेष करने वाले,  क्रूरकर्मी और नराधमों को मैं संसार में बारम्बार (अजस्रम्) आसुरी योनियों में ही गिराता हूँ अर्थात् उत्पन्न करता हूँ।।

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।

मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्।।16.20।।

।।16.20।। हे कौन्तेय ! वे मूढ़ पुरुष जन्मजन्मान्तर में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं और ( इस प्रकार) मुझे प्राप्त न होकर अधम गति को प्राप्त होते है।।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।।16.21।।

।।16.21।। काम, क्रोध और लोभ ये आत्मनाश के त्रिविध द्वार हैं, इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।।

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्।।16.23।।

।।16.23।। जो पुरुष शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी कामना से प्रेरित होकर ही कार्य करता है, वह न पूर्णत्व की सिद्धि प्राप्त करता है, न सुख और न परा गति।।

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।

ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।।16.24।।

।।16.24।। इसलिए तुम्हारे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था (निर्णय) में शास्त्र ही प्रमाण है शास्त्रोक्त विधान को जानकर तुम्हें अपने कर्म करने चाहिए।।

 पूर्व के तीन श्लोकों में दी गई युक्तियों का यह निष्कर्ष निकलता है कि साधक को शास्त्र प्रमाण के अनुसार अपनी जीवन पद्धति अपनानी चाहिए। कर्तव्य और अकर्तव्य का निश्चय शास्त्राध्ययन के द्वारा ही हो सकता है। सत्य की प्राप्ति के मार्ग को निश्चित करने में प्रत्येक साधक अपनी ही कल्पनाओं का आश्रय नहीं ले सकता । शास्त्रों की घोषणा उन ऋषियों ने की है जिन्होंने इस मार्ग के द्वारा पूर्णत्व का साक्षात्कार किया था। अत जब उन ऋषियों ने हमें उस मार्ग का मानचित्र दिया है तो हमारे लिए यही उचित है कि विनयभाव से उसका अनुसरण कर स्वयं को कृतार्थ करें। '

ज्ञात्वा इसलिए परम सत्य या आत्मदेव की तीर्थयात्रा प्रारम्भ करने के पूर्व हमें इन शास्त्रों का बुद्धिमत्तापूर्वक अध्ययन करना चाहिए। लक्ष्य, मार्ग, विघ्न और विघ्न के निराकरण के उपायों का जानना किसी भी यात्रा के लिए अत्यावश्यक और लाभदायक होता है।

तुम्हें कर्म करना चाहिए अनेक लोग शास्त्र को जानते हैं परन्तु ऐसे अत्यन्त विरले लोग ही होते हैं जिनमें शास्त्रोपदिष्ट जीवन जीने का साहस दृढ़ संकल्प और आत्मानुभूति के लक्ष्य की प्राप्ति होने तक धैर्य बना रहता है। इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण का यह उपदेश है कि काम क्रोध और लोभ का त्याग कर मनुष्य को शास्त्रानुसार जीवन यापन करना चाहिए। यही कर्मयोग का जीवन है

तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसंपद्विभागयोगो नाम षोढशोऽध्याय।।

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 प्रातः बेलुड़ मठ से गंगा दर्शन  क्षणिक भ्रमण! वाह! कहां कहां गये? प्रभु! भारत को बचा लो!भारत मर जायेगा तो विश्व मर जायेगा। भारत में गीता पढ़ने और पढ़ाने में समर्थ कम से कम एक लाख युवा पैदा करो!तुरंत करो! मुझे मुक्ति नहीं चाहिये। अगला जन्म शीघ्र दो ताकि बचपन से ही दादा के प्रशिक्षण मे विवेक - जागृत रखने का प्रशिक्षण प्राप्त करके बचपन से ही मनुष्य बनने और बनाने के आन्दोलन में जुट जाऊँ। बहुत देर हो रही है। गीता की शिक्षा फैला दो प्रभु!तुम्हारे श्री चरणों मे मेरी यही एकमात्र प्रार्थना है!प्रिय भाई उपेन्द्र, तुम इस समय कहां हो? तुम्हारे यहाँ तो ईरान वार का कोई असर तो नहीं हुआ? मैंने आज दयानन्द से भी बात किया था। उससे मालूम हुआ कि Janibigha से भी 5-6 लड़के विवेक वाहिनी कैम्प में गये है। Phulvriya से भी गये हैं। प्रमोद दा के बिना हिन्दी क्षेत्र में महामंडल का काम करना संभव नहीं है।  तब मैंने प्रमोद दा से भी बात किया। Chapra Mahamandal के पास एक email बंगला में गया था। उससे कुछ गलतफहमी हो गयी थी। प्रम दा से बात करके सब गलतफहमी दूर हो गयी है। वास्तव में " मनुष्य " बन जाना दुनिया का सबसे कठिन कार्य है।  पर इस Be and Make ' आन्दोलन  से जुड़े रहना ही एकमात्र उपाय है। इसलिए नवनी दा बोलते थे- विद्या dadati vinyam - ज्ञान से विनम्रता आती है, इसलिए आज मैं प्रमोद दा से Ranen दा आदि सभी विषय गलतफहमी को दूर कर लिया ।और आगे से उन्होंने भी मिलजुलकर काम करने का निर्णय लिया है। तुम भी उनसे कभी प्रेम पूर्वक बात कर लेना। तुम्हारा- विजय

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मंगलवार, 31 मार्च 2026

⚜️️🔱श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय -15 ⚜️️🔱अध्याय-पन्द्रह: पुरुषोत्तम योग⚜️️🔱 केवल एक शास्त्रज्ञ और ब्रह्मज्ञानी सदगुरुदेव के उपदेश से ही परमात्मज्ञान हो सकता है। ⚜️️🔱 भगवत्-तत्वज्ञान हमें शरीरजनित दुखों, मनजनित विक्षेपों और बुद्धिजनित अशान्तियों के बन्धनों से सदा के लिये मुक्त कर देता है⚜️️🔱जो भक्त इस पुरुषोत्तम के साथ पूर्ण तादात्म्य कर लेता है वह भी सर्ववित् कहलाता है ⚜️️🔱 (सांसरिक किसी देह से नहीं केवल ठाकुर, माँ स्वामी जी) अधिक प्रेम होने पर अधिक तादात्म्य होता है ⚜️️🔱अनात्मा के तादात्म्य को त्यागकर जिसने मुझ परमात्मा के साथ पूर्ण तादात्म्य स्थापित कर लिया है, वही परम भक्त है ⚜️️🔱असम्मूढः अर्थात् संमोहरहित पुरुष (शुद्धबुद्धि) है⚜️️🔱साधकों को कर्मयोग (Be and Make) और भक्तियोग के द्वारा चित्तशुद्धि प्राप्त कर नित्य-अनित्य विवेक करना चाहिये।⚜️️🔱विवेक -वैराग्य आदि साधन-चतुष्टय से सम्पन्न साधक जब (सद्गुरुवाक्य , महावाक्य वेदान्त प्रमाण के द्वारा) आत्मविचार करता है तब उस विचार से प्राप्त आत्मबोध ही ज्ञानचक्षु है⚜️️🔱केवल शुद्धबुद्धि (पुरुष) ही नाम और रूपों के विस्तार से विरक्त होकर इस आत्मा को (गुरुदेव के मार्गदर्शन में इष्टदेव को) पहचानते हैं और स्वयं अपने दैनन्दिन जीवन के व्यवहार में आत्मस्वरूप बनकर जीते हैं। ⚜️️🔱 मूढ़बुद्धि की उपाधि से युक्त चैतन्य ही विषयों का भोक्ता जीव (M/F)है। इसका कारण अज्ञान है⚜️️🔱 मनबुद्धि रूप सूक्ष्म शरीर (M/F मूढ़ बुद्धि) में व्यक्त चैतन्य जीव कहलाता है ⚜️️🔱साधक को अपने व्यक्तिगत राग और द्वेष को सर्वथा समाप्त कर देना चाहिये ⚜️️🔱हमें विवेक- पूर्वक जगत् के मिथ्यात्व का निश्चय करना चाहिये ⚜️️🔱 अध्यात्मनित्या- (सतत आत्मनुसन्धान) ⚜️️🔱मनुष्य बनने का व्यावहारिक उपाय है- प्रार्थना, "मैं उस आदि पुरुष की शरण हूँ, जिससे यह पुरातन प्रवृत्ति प्रसृत हुई है" ⚜️️🔱सृष्ट (नश्वर जीव -जगत) और सृष्टिकर्ता (अनश्वर ईश्वर) इन सबको तत्त्वत 'एक ' जानते हैं, तभी हमारा ज्ञान पूर्ण कहलाता है⚜️️🔱आत्मा के अपरोक्ष ज्ञान से यह समूल नष्ट हो जाता है⚜️️🔱 इस संसार वृक्ष को काटने का एकमात्र शस्त्र है असंग अर्थात् वैराग्य।⚜️️🔱M/F स्थूल शरीर से तादात्म्य निवृत्ति को ही वैराग्य कहते हैं। ⚜️️🔱'उस पद का अन्वेषण ' करना चाहिये जिसे प्राप्त हुये पुरुष पुनः लौटते नहीं हैं⚜️️🔱व्यावहारिक उपाय है- प्रार्थना : -तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये'- कि मैं उस आदि पुरुष (इष्टदेव -गुरुदेव) की शरण हूँ जहाँ से यह पुरातन प्रवृत्ति प्रसृत हुई है⚜️️🔱मानी व्यक्ति (arrogant-घमण्डी,हेकड़, अहंकारी व्यक्ति) अपने ऊपर मान को बनाये रखने का अनावश्यक भार या उत्तरदायित्व ले लेता है।⚜️️🔱⚜️️🔱

 श्री भगवानुवाच

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।

छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।15.1।।

।।15.1।। श्री भगवान् ने कहा -- (ज्ञानी पुरुष इस संसार वृक्ष को) ऊर्ध्वमूल और अध:शाखा वाला अश्वत्थ और अव्यय कहते हैं; जिसके पर्ण छन्द अर्थात् वेद हैं, ऐसे (संसार वृक्ष) को जो जानता है, वह वेदवित् है।।



अनित्य संसार का नित्य परमात्मा के साथ जो संबंध है उसको भी इस वर्णन में दर्शाया गया है। यदि परमात्मा एकमेव अद्वितीय सत्य है तो उससे परिच्छिन्न जड़ जगत् कैसे उत्पन्न हुआ ? उत्पन्न होने के पश्चात् कौन इसका धारण पोषण करता है सृष्टिकर्ता अनन्त ईश्वर और सृष्ट सान्त जगत् के मध्य वस्तुत क्या संबंध है ? 
जीवन के विषय में गंभीरता से विचार करना प्रारंभ करते ही मन में इस प्रकार के प्रश्न उठने लगते हैं। वनस्पति शास्त्र में अश्वत्थ वृक्ष का नाम फाइकस रिलिजिओसा है जो लोक में पीपल के वृक्ष के नाम से प्रसिद्ध है। 
अश्वत्थ का अर्थ इस प्रकार है श्व का अर्थ आगामी कल है,  त्थ का अर्थ है स्थित रहने वाला अत अश्वत्थ का अर्थ है वह जो कल अर्थात् अगले क्षण पूर्ववत् स्थित नहीं रहने वाला है।  तात्पर्य यह हुआ कि अश्वत्थ शब्द से इस सम्पूर्ण अनित्य और परिवर्तनशील दृश्यमान जगत् की ओर इंगित किया गया है। 
इस श्लोक में कहा गया है कि इस अश्वत्थ का मूल ऊर्ध्व में अर्थात् ऊपर है। शंकराचार्यजी ने ही उपनिषद् के भाष्य में यह लिखा है कि संसार को वृक्ष कहने का कारण यह है कि उसको काटा जा सकता है 'व्रश्चनात् वृक्ष' !
वैराग्य के द्वारा हम अपने उन समस्त दुखों को समाप्त कर सकते हैं जो इस संसार में हमें अनुभव होते हैं। जो संसारवृक्ष परमात्मा से अंकुरित होकर व्यक्त हुआ प्रतीत होता है उसे हम अपना ध्यान परमात्मा में (ठाकुर, माँ , स्वामीजी का नाम बताने वाले सद्गुरु देव में) केन्द्रित करके काट सकते हैं। 
इतिहास के विद्यार्थियों को अनेक राजवंशों की परम्पराओं का स्मरण रखना होता है। उसमें जो परम्परा दर्शायी जाती है वह इस ऊर्ध्वमूल वृक्ष के समान ही होती है।  एक मूल पुरुष से ही उस वंश का विस्तार होता है। इसी प्रकार  इस संसार वृक्ष का मूल ऊर्ध्व कहा है, जो सच्चिदानन्द ब्रह्म है। 
वृक्ष को आधार तथा पोषण अपने ही मूल से ही प्राप्त होता है इसी प्रकार भोक्ता जीव और भोग्य जगत् दोनों अपना आधार और पोषण शुद्ध अनन्तस्वरूप ब्रह्म से ही प्राप्त करते हैं। उच्च शब्द से तात्पर्य रेखागणितीय उच्चता से नहीं है वरन् श्रेष्ठ आदर्श अथवा मूल्य से है। भावनाओं की दृष्टि से भी स्वभावत मनुष्य सूक्ष्म और दिव्य तत्त्व को उच्चस्थान प्रदान करता है और स्थूल व आसुरी तत्त्व को अधस्थान।
 देश काल और कारण (तीनों गुणों)  के परे होने पर भी परमात्मा को यहाँ ऊर्ध्व कहा गया है। वह जड़ प्रकृति को चेतनता प्रदान करने वाला स्वयंप्रकाश स्वरूप तत्त्व है। स्वाभाविक है कि यहाँ रूपक की भाषा में दर्शाया गया है कि यह संसार वृक्ष ऊर्ध्वमूल वाला है।
इस परिवर्तनशील जगत् (अश्वस्थ) को अव्यय अर्थात् अविनाशी माना गया है। परन्तु केवल आपेक्षिक दृष्टि से ही उसे अव्यय कहा गया है। किसी ग्राम में स्थित पीपल का वृक्ष अनेक पीढ़ियों को देखता है।  जो उसकी छाया में खेलती और बड़ी होती हैं।
इस प्रकार मनुष्य की औसत आयु की अपेक्षा वह वृक्ष अव्यय या नित्य कहा जा सकता है। इसी प्रकार इन अनेक पीढ़ियों की तुलना में जो विकसित होती हैं।  कल्पनाएं और योजनाएं बनाती हैं  प्रयत्न करके लक्ष्य प्राप्त कर नष्ट हो जाती हैं; उस दृष्टि से यह जगत् अव्यय कहा जा सकता है।

छन्द अर्थात् वेद इस वृक्ष के पर्ण हैं। वेद का अर्थ है ज्ञान (इन्द्रियातीत) । ज्ञान की वृद्धि से मनुष्य के जीवन में अवश्य ही गति आ जाती है। आधुनिक जगत् की भौतिक उन्नति विज्ञान की प्रगति, औद्योगिक क्षेत्र की उपलब्धि और अतिमानवीय स्फूर्ति की तुलना में प्राचीन पीढ़ी को जीवित भी नहीं कहा जा सकता।
  वेद अर्थात् ज्ञान की तुलना वृक्ष के पर्णों के साथ करना अनुपयुक्त नहीं है। वृक्ष के पर्ण वे स्थान हैं जहाँ से जल वाष्प बनकर उड़ जाता है जिससे वृक्ष की जड़ों में एक दबाव उत्पन्न होता है। इस दबाव के कारण जड़ों को पृथ्वी से अधिक जल और पोषक तत्त्व एकत्र करने में सुविधा होती है। अत यदि वृक्ष के पत्तों को काट दिया जाये तो वृक्ष का विकास तत्काल अवरुद्ध हो जायेगा। पत्तों की संख्या जितनी अधिक होगी वृक्ष का परिमाण और विकास उतना ही अधिक होगा। 
    जो पुरुष न केवल अश्वत्थ वृक्ष को ही जानता है वरन् उसके पारमार्थिक सत्यस्वरूप ऊर्ध्वमूल  को भी पहचानता है वही पुरुष वास्तव में वेदवित् अर्थात् वेदार्थवित् है। उसका वेदाध्ययन का प्रयोजन सिद्ध हो गया है। वेदों का प्रयोजन सम्पूर्ण विश्व के आदि स्रोत एकमेव अद्वितीय परमात्मा का बोध कराना है। (कुर्थौल ब्रह्मथानी)
 'सत्य' (परम सत्य ,इन्द्रियातीत) का पूर्णज्ञान न केवल शुद्धज्ञान (भौतिक विज्ञान-अपरा विद्या) से और न केवल भक्ति (परा विद्या) से ही प्राप्त हो सकता है। यह गीता का निष्कर्ष है। जब हम इहलोक (इन्द्रियगोचर सत्य -भौतिक विज्ञान) और परलोक (इन्द्रियातीत सत्य-वेद ), सान्त (संकीर्ण ह्रदय-कच्चा मैं )  और अनन्त (विस्तृत ह्रदय-पक्का मैं), सृष्ट (जीव  -जगत)  और सृष्टिकर्ता (ईश्वर) इन सबको तत्त्वत 'एक ' जानते हैं, तभी हमारा ज्ञान पूर्ण कहलाता है। 
'तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥'
 इस एकत्व ज्ञान को अपने ववहार से (अविरोध से ) भी सभी की यथायोग्य सेवा द्वारा उसे सार्वभौमिक प्रेम को अभिव्यक्त करते हैं) तभी हमारा ज्ञान पूर्ण कहलाता है। ज्ञान की अन्य शाखाएं  कितनी ही दर्शनीय क्यों न हों वे सम्पूर्ण सत्य के किसी पक्ष विशेष (भैतिक या आध्यात्मिक) को ही दर्शाती हैं। वेदों के अनुसार पूर्ण ज्ञानी पुरुष वह है जो इस नश्वर संसारवृक्ष तथा इसके अनश्वर ऊर्ध्वमूल (परमात्मा) को भी जानता है। भगवान् श्रीकृष्ण उसे यहाँ वेदवित् कहते हैं। 
संसार वृक्ष के अन्य अवयवों का रूपकीय वर्णन अगले श्लोक में किया गया है

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके।।15.2।।

।।15.2।। उस वृक्ष की शाखाएं तीन प्रकार की गुणों से प्रवृद्ध हुईं नीचे और ऊपर फैली हुईं हैं; (पंच) विषय इसके अंकुर हैं; मनुष्य लोक में कर्मों का अनुसरण करने वाली इसकी अन्य जड़ें नीचे फैली हुईं हैं।।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस वृक्ष की शाखाएं ऊपर और नीचे फैली हुईं हैं। इनसे तात्पर्य देवता, मनुष्य, पशु इत्यादि योनियों से है। केवल विवेकी मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन तथा जगत् के विकास की दिशा कभी उर्ध्व की ओर होती है , किन्तु अधिकांश अविवेकी मनुष्यों की गति पशु जीवन के निम्न स्तर की ओर रहती है। अधः (पशु अस्तर घोर स्वार्थी) और ऊर्ध्व (देवता -पूर्ण निःस्वार्थी)  इन दो शब्दों से इन्हीं दो दिशाओं अथवा प्रवृत्तियों की ओर निर्देश किया गया है। 
 गुणों से प्रवृद्ध हुई जीवों की ऊर्ध्व या अधोगामी प्रवृत्तियों का धारण पोषण प्रकृति (शक्ति) के सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों के द्वारा किया जाता है। इन गुणों का विस्तृत विवेचन पूर्व अध्याय में किया जा चुका है। 
किसी भी वृक्ष की शाखाओं पर हम अंकुर या कोपलें देख सकते हैं जहाँ से अवसर पाकर नई-नई शाखाएं फूटकर निकलती हैं। प्रस्तुत रूपक में इन्द्रियों के शब्दस्पर्शादि विषयों को प्रवाल अर्थात् अंकुर कहा गया है। यह सुविदित तथ्य है कि विषयों की उपस्थिति में हम अपने उच्च आदर्शों को विस्मृत कर विषयाभिमुख हो जाते हैं। तत्पश्चात् उन भोगों की पूर्ति के लिये उन्मत्त होकर नये-नये कर्म करते हैं। 
मनुष्य देह में (M/F शरीर में )  यह जीव असंख्य प्रकार के कर्म और कर्मफल का भोग करता है जिसके  फलस्वरूप उसके मन में (चित्त में) नये संस्कार या वासनाएं अंकित होती जाती हैंये वासनाएं (आसक्ति) ही अन्य जड़ें हैं जो मनुष्य को अपनी अभिव्यक्ति के लिये कर्मों में प्रेरित करती रहती हैं। ये संस्कार (अविद्या जनित आदत , प्रवृत्ति या चरित्र) शुभाशुभ कर्म और कर्मफल को उत्पन्न कर मनुष्य को इस लोक के राग और द्वेष, लाभ और हानि, आय और व्यय आदि प्रवृत्तियों के साथ बाँध देते हैं। 
अगले दो श्लोकों में इसका वर्णन किया गया है कि किस प्रकार हम इस संसार वृक्ष को काटकर इसके ऊर्ध्वमूल परमात्मा का अपने आत्मस्वरूप से अनुभव कर सकते हैं
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल
मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा।।15.3।।
।।15.3।। इस (संसार वृक्ष) का स्वरूप जैसा कहा गया है वैसा यहाँ उपलब्ध नहीं होता है, क्योंकि इसका न आदि है और न अंत और न प्रतिष्ठा ही है। इस अति दृढ़ मूल वाले अश्वत्थ वृक्ष को दृढ़ असङ्ग शस्त्र से काटकर ...৷৷
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम्
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी।।15.4।।
।।15.4।। (तदुपरान्त) उस पद का अन्वेषण करना चाहिए जिसको प्राप्त हुए पुरुष पुन: संसार में नहीं लौटते हैं"मैं उस आदि पुरुष की शरण हूँ, जिससे यह पुरातन प्रवृत्ति प्रसृत हुई है"।।
 गीताचार्य भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि जैसा वर्णन किया गया है वैसा वृक्ष यहाँ उपलब्ध नहीं होता। पूर्व श्लोक में वर्णित अश्वत्थ वृक्ष इस व्यक्त हुए सम्पूर्ण जगत् का प्रतीक है। सूक्ष्म चैतन्य आत्मा विविध रूपों और विभिन्न स्तरों पर विविधत व्यक्त होता है जैसे शरीर, मन और बुद्धि में क्रमश विषय भावनाओं और विचारों के प्रकाशक के रूप में और कारण शरीर में वह अज्ञान को प्रकाशित करता है। 
आत्मअज्ञान (अविद्या-जनित) या वासनाओं (latent desires, कामिनी , कांचन और कीर्ति में आसक्ति) को ही कारण शरीर कहते हैं। ये समस्त उपाधियाँ तथा उनके अनुभव अपनी सम्पूर्णता में अश्वत्थवृक्ष के द्वारा निर्देशित किये गये हैं। 
कोई भी पुरुष इस संसार वृक्ष का आदि या अन्त या प्रतिष्ठा नहीं देख सकता। यह वृक्ष परम सत्य के अज्ञान से उत्पन्न होता है। जब तक वासनाओं का प्रभाव बना रहता है तब तक इसका अस्तित्व भी रहता है, किन्तु आत्मा के अपरोक्ष ज्ञान से यह समूल नष्ट हो जाता है। इस संसार वृक्ष को काटने का एकमात्र शस्त्र है असंग अर्थात् वैराग्य। M/F स्थूल शरीर से तादात्म्य निवृत्ति को ही वैराग्य कहते हैं। 
    भौतिक जगत् नश्वर जड़ अचेतन है। इसके द्वारा जो अनुभव (मान -अपमान, सुख-दुःख) प्राप्त किया जाता है वह चैतन्य के सम्बन्ध के कारण ही संभव होता है। जब तक कार के चक्रों का सम्बन्ध मशीन से बना रहता है तब तक उनमें गति रहती है। यदि प्रवाहित होने वाली शक्ति को रोक दिया जाये तो वे चक्र स्वत ही गतिशून्य स्थिति में आ जायेंगे।  इसी प्रकार यदि हम अपना ध्यान शरीर, (M/F शरीर) मन और मूढ़बुद्धि से निवृत्त करें तो तादात्म्य के अभाव में विषय भावनाओं तथा विचारों का ग्रहण स्वत अवरुद्ध हो जायेगा देह से तादात्म्य  की निवृत्ति को ही वैराग्य कहते हैं। यहाँ उसे असंग शस्त्र कहा गया है। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि उसको इस असंग-शस्त्र के द्वारा संसारवृक्ष को काटना चाहिये। 

हमारी वर्तमान स्थिति की दृष्टि से उपर्युक्त अवस्था का अर्थ है शून्य जहाँ न कोई विषय हैं और न भावनाएं हैं न कोई विचार ही हैं। अत हम ऐसे उपदेश को सहसा स्वीकार नहीं करेंगे। भगवान् हमारी मनोदशा को समझते हुये उसी क्रम में कहते हैं -  तत्पश्चात् 'उस पद का अन्वेषण ' करना चाहिये जिसे प्राप्त हुये पुरुष पुनः लौटते नहीं हैं
उपर्युक्त सम्पूर्ण विवेचन का निष्कर्ष यह निकलता है कि निदिध्यासन के अभ्यास के शान्त क्षणों में साधक को अपना ध्यान जगत् एवं उपाधियों से निवृत्त कर उस ऊर्ध्वमूल परमात्मा (इष्टदेव) के चिन्तन में लगाना चाहिये जहाँ से इस संसार की पुरातन प्रवृत्ति प्रसृत हुई है।

 मनुष्य बनने का व्यावहारिक उपाय है- प्रार्थना> यदि इस उपदेश को केवल यहीं तक छोड़ दिया गया होता तो अधिक से अधिक वह एक सुन्दर काव्यात्मक कल्पना ही बन कर रह जाता। आध्यात्मिक मूल्यों को अपने व्यावहारिक जीवन में जीने की कला सिखाने वाली निर्देशिका के रूप में।  गीता को यह भी बताना आवश्यक था कि किस प्रकार एक साधक इस उपदेश का पालन कर सकता है ? इनका एक व्यावहारिक उपाय है- प्रार्थना। जिसका निर्देश इस श्लोक के अन्त में इन शब्दों में किया है,-तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये'- कि मैं उस आदि पुरुष (इष्टदेव -गुरुदेव) की शरण हूँ जहाँ से यह पुरातन प्रवृत्ति प्रसृत हुई है। 
यह श्लोक दर्शाता है कि जब हमारी बहिर्मुखी प्रवृत्ति बहुत कुछ मात्रा में क्षीण हो जाती है तब हमें अपनी शुद्ध बुद्धि को सजगतापूर्वक संसार के आदिस्रोत सच्चिदानन्द परमात्मा (इष्टदेव -गुरुदेव) में भक्ति और समर्पण के भाव के साथ समाहित करने का प्रयत्न करना चाहिये। 
इस आदि पुरुष (इष्टदेव) का स्वरूप तथा उसके अनुभव के उपाय को बताना इस अध्याय का विषय है। 
किन गुणों से सम्पन्न साधक उस पद को प्राप्त होते हैं सुनो

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै
गच्छन्ति अमूढाः पदमव्ययं तत्।।15.5।।

।।15.5।। जिनका मान और मोह निवृत्त हो गया है, जिन्होंने संगदोष को जीत लिया है, जो अध्यात्म में स्थित हैं जिनकी कामनाएं निवृत्त हो चुकी हैं और जो सुख-दु:ख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त हो गये हैं, ऐसे सम्मोह रहित ज्ञानीजन उस अव्यय पद को प्राप्त होते हैं।।
        किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए कुछ आवश्यक योग्यताएं होती हैं जिनके बिना मनुष्य उस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता है। अत आत्मज्ञान भी कुछ विशिष्ट गुणों के से सम्पन्न अधिकारी को ही पूर्णत्व प्राप्त हो सकता है। उन गुणों का निर्देश इस श्लोक में किया गया है। उत्साही और साहसी साधकों को इन गुणों का सम्पादन करना चाहिये। भगवान् श्रीकृष्ण आश्वासन देते हैं कि साधन सम्पन्न साधकों को अव्यय पद की प्राप्ति अवश्य होगी। 
निर्मान-मोहा > वही कृत्कृत्यता और वही परम पुरुषार्थ है। जो मान और मोह से रहित है मान का अर्थ है स्वयं को पूजनीय व्यक्ति मानना। अपने महत्व का त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन मान अथवा गर्व कहलाता है। ऐसा मानी व्यक्ति (arrogant-अहंकारी व्यक्ति) अपने ऊपर मान को बनाये रखने का अनावश्यक भार या उत्तरदायित्व ले लेता है। तत्पश्चात् उसके पास कभी समय ही नहीं होता कि वह वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सके और अपने अवगुणों का त्याग कर सुसंस्कृत 'मनुष्य' बन सके। 
इसी प्रकार मोह का अर्थ है अविवेक। (विवेक की परिभाषा नहीं जानना और अहंकारी बने रहना) बाह्य जगत् की वस्तुओं, व्यक्तियों, घटनाओं आदि को यथार्थत,(ब्रह्ममय जगत) न समझ पाना मोह है। इसके कारण हम वास्तविक जीवन की तात्कालिक समस्याओं का सामना करने के स्थान पर अपने ही काल्पनिक जगत् में विचरण करते रहते हैं। अत आत्मज्ञान के जिज्ञासुओं को इन अवगुणों (मान और मोह अहंकार और अविवेक) का सर्वथा त्याग करना चाहिये।

 जितसङ्गदोषा >जिन्होंने संग दोष को जीत लिया है;  देह (M/F शरीर) के साथ तादात्म्य कर केवल इन्द्रियों के विषयोपभोग में रमने का अर्थ स्वयं को जीवन की श्रेष्ठतर संभावनाओं से वंचित रखकर अपनी ही प्रवंचना करना है। ऐसा मूढ़बुद्धि व्यक्ति अत्यन्त विषयासक्त होता है। यह आसक्ति जितनी अधिक होगी उतनी ही अधिक उसकी अनियंत्रित विषयाभिमुख प्रवृत्ति भी होगी। वह विषयों का दास बनकर उनके परिवर्तनों और विनाश की लय पर नृत्य करता हुआ अपनी शक्तियों का अपव्यय करता रहता है।  फिर उसे आत्मानुभव की प्राप्ति कैसे हो सकती है इसलिये जिन्होंने इस संग नामक दोष- देह से तादात्म्य  को जीत लिया है वे ही पुरुष मोक्ष के अधिकारी होते हैं।

अध्यात्मनित्या- (सतत आत्मनुसन्धान) > मन का स्वभाव है किसी न किसी वस्तु में आसक्त रहना। अत मन को बाह्य जगत् से विरत करने के लिये उसे श्रेष्ठ और दिव्य आत्मस्वरूप में स्थित करने का प्रयत्न करना चाहिये।  मनुष्य का मन विधेयात्मक उपदेश का पालन कर सकता है,  परन्तु शून्य में नहीं रह सकता। सरल शब्दों मे तात्पर्य यह है कि उसे कुछ करने को कहा जा सकता है परन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि कुछ मत करो। उदाहरणार्थ यदि किसी व्यक्ति से कहा जाये कि प्रातकाल जागने के साथ उसे अण्डे का स्मरण नहीं करना चाहिये तो दूसरे दिन सर्वप्रथम उसे अण्डे का स्मरण होगा।  परन्तु इसके स्थान पर मन को भगवान् नारायण   का स्मरण करने को कहा जाये तो अण्डे का स्मरण होने का अवसर ही नहीं रह जाता। इसी प्रकार विषयासक्ति को जीतने के लिये सतत आत्मानुसंधान करते रहना चाहिये।
विनिवृत्तकामाः > जिनकी कामनाएं पूर्णत निवृत्त हो चुकी हैं जब तक बाह्य जगत् के सम्बन्ध में यह धारणा बनी रहेगी कि वह सत्य है और उसमें सुख है तब तक कामनाओं का त्याग होना संभव ही नहीं है। अत हमें विवेक- पूर्वक जगत् के मिथ्यात्व का निश्चय करना चाहिये और यह भी जानना चाहिये कि सुख तो आत्मा का स्वरूप है विषयों का धर्म नहीं। ऐसे दृढ़ निश्चय से कामनायें निवृत्त हो सकती हैं। इच्छाओं के अभाव में मन स्वतः शान्त हो जाता है।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः > जो पुरुष सुख-दुख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त हो गये हैं,  मनुष्य कभी भी जगत् का वस्तुनिष्ठ दर्शन नहीं करता है। वह जगत् की वस्तुओं को प्रिय और अप्रिय दो भागों में विभाजित कर देता है। इस द्वन्द्व से उत्पन्न होती है प्रिय की ओर प्रवृत्ति और अप्रिय से निवृत्ति। तत्पश्चात् यदि प्रिय की प्राप्ति हो तो सुख अन्यथा दुख होता है। दुर्भाग्य से मनुष्य के राग और द्वेष भी सदैव परिवर्तित होते रहते हैं। इस कारण कल जिस वस्तु को वह सुख का साधन समझता था आज उसी वस्तु को वह दुखदायी समझता है। इस प्रकार मन की तरंगों में जो व्यक्ति फँसा रहता है,  वह इन द्वन्द्वों से कभी मुक्त नहीं हो सकता। इसलिये साधक को अपने व्यक्तिगत राग और द्वेष को सर्वथा समाप्त कर देना चाहिये। 
गच्छन्ति अमूढाः > इस श्लोक के अन्त में भगवान् श्रीकृष्ण की यह निश्चयात्मक और आशावादी घोषणा है कि ऐसे सम्मोहरहित योग्य अधिकारी साधक अव्यय पद को प्राप्त होते हैं। इस घोषणा की शैली में एक आदेश की दृढ़ता है। उपाधियों से (स्वयं को देह-मन-बुद्धि समझने वाला मूढ़बुद्धि मनुष्य) अवच्छिन्न आत्मा यह संसारी दुर्भाग्यशाली मनुष्य है और उपाधिविवर्जित मनुष्य ही सच्चिदानन्दस्वरूप आत्मा है। यही अपरोक्षानुभूति है।
उस अव्यय पद की ही विशेषता अगले श्लोक में वर्णित है।
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।15.6।।
।।15.6।। उसे न सूर्य प्रकाशित कर सकता है और न चन्द्रमा और न अग्नि। जिसे प्राप्त कर मनुष्य पुन: (संसार को) नहीं लौटते हैं, वह मेरा परम धाम है।।
        आध्यात्मिक जीवन का लक्ष्य है संसार में अपुनरावृत्ति। इसे विशेष बल देकर पूर्व के श्लोकों में प्रतिपादित किया गया था और इस श्लोक में पुन उसे दोहराया जा रहा है। परन्तु आत्मज्ञान का क्षेत्र इन्द्रिय अगोचर होने से प्रारम्भ में केवल आचार्य का ही वहाँ प्रवेश होता है शिष्यों का नहीं। अत अज्ञात अनन्तस्वरूप के अनुभव के सम्बन्ध में शिष्यों को विश्वास कराने का एकमात्र उपाय पुनरुक्ति ही है? यद्यपि यह स्थिति मन और वाणी के परे हैं तथापि उसे इंगित करने का यहाँ समुचित प्रयत्न किया गया है। सूर्य,  चन्द्र और अग्नि उसे प्रकाशित नहीं कर सकते हैं। 

यहाँ प्रकाश के उन स्रोतों का उल्लेख किया गया है जिनके प्रकाश में हमारे चर्मचक्षु दृश्य वस्तु को देख पाते हैं। वस्तु को देखने का अर्थ उसे जानना है और किसी वस्तु को देखने के लिए वस्तु का नेत्रों के समक्ष होना तथा उसका प्रकाशित होना भी आवश्यक है। प्रकाश के माध्यम में ही नेत्र रूप और रंग को देख सकते हैं। इसी प्रकार हम अन्य इन्द्रियों के द्वारा शब्द, स्पर्श, रस और गन्ध को तथा मन और बुद्धि के द्वारा क्रमश भावनाओं और विचारों को भी जानते हैं। 
   जिस प्रकाश से हमें इन सबका भान होकर बोध होता है वह चैतन्य का प्रकाश है।यह चैतन्य का प्रकाश भौतिक जगत् के प्रकाश के स्रोतोंसूर्य चन्द्र और अग्निके द्वारा प्रकाशित नहीं किया जा सकता। वस्तुत ये सभी प्रकाश के स्रोत चैतन्य के दृश्य विषय है। 
 यह नियम है कि दृश्य अपने द्रष्टा को प्रकाशित नहीं कर सकता तथा कभी भी और किसी भी स्थान पर द्रष्टा और दृश्य एक नहीं हो सकते। जिस चैतन्य के द्वारा हम अपने जीवन के सुख-दुखादि अनुभवों को जानते हैं वह चैतन्य ही सनातन आत्मा है और इसे ही भगवान् अपना परम धाम कहते हैं।  यही जीवन का परम लक्ष्य है।
वह मेरा परम धाम है यहाँ धाम शब्द से तात्पर्य स्वरूप से है न कि किसी स्थान विशेष से। पूर्व श्लोक में वर्णित गुणों से सम्पन्न साधक ध्यानाभ्यास के द्वारा मन और बुद्धि के विक्षेपों से परे परमात्मा के धाम में पहुँचकर सत्य से साक्षात्कार का समय निश्चित कर अनन्तस्वरूप ब्रह्म से भेंट कर सकता है। 
हम सब लोग उपयोगितावादी है। अत हम पहले ही जानना चाहते हैं कि क्या सत्य का अनुभव इतने अधिक परिश्रम के योग्य है क्या उसे प्राप्त कर लेने के पश्चात् पुन इस दुखपूर्ण संसार में लौटने की आशंका या संभावना नहीं है ? यह भय निर्मूल है। भगवान् श्रीकृष्ण पुन तीसरी बार हमें आश्वासन देते हैं? मेरा परम धाम वह है जहाँ पहुँचने पर साधक पुन लौटता नहीं है। 
तो एक पूर्ण ज्ञानी पुरुष / का पुन अज्ञानजनित भ्रान्तियों को लौटना कितना असंभव होगा विश्व के आध्यात्मिक साहित्य का यह एक अत्यन्त विरल श्लोक है जिसमें इतनी सरल शैली में निरुपाधिक शुद्ध परमात्मा का इतना स्पष्ट निर्देश किया गया है। 
हिन्दू धर्म में पुनर्जन्म के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है। इस सिद्धान्त के अनुसार जीव एक देह का त्याग करने के पश्चात् अपने कर्मों के अनुसार पुन नवीन देह धारण करता है। ये शरीर देवता, मनुष्य,  पशु आदि के हो सकते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि एक देह को त्यागने पर जीव का मोक्ष न होकर वह पुन संसार को ही प्राप्त होता है। परन्तु इस श्लोक में तो यह कहा गया है जहाँ पहुँचकर जीव पुन लौटता नहीं,  वह मेरा परम धाम है। अत यहाँ इन दोनों सिद्धान्तों में विरोध प्रतीत होता है। 
इस विरोध का परिहार करने के लिये भगवान् श्रीकृष्ण अगले श्लोकों में जीव के स्वरूप पर प्रकाश डालते हैं
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।15.7।।
।।15.7।। इस जीव लोक में मेरा ही एक सनातन अंश जीव बना है। वह प्रकृति (तीन गुण बंधा) में स्थित हुआ (देहत्याग के समय) पाँचो इन्द्रियों तथा मन को अपनी ओर खींच लेता है अर्थात् उन्हें एकत्रित कर लेता है।।
           अनन्तवस्तु (आत्मा , ब्रह्म, ईश्वर -)  वयव रहित होने के कारण अखण्ड और अविभाज्य है। तथापि उपाधियों के सम्बन्ध से उसमें खण्ड और विभाग होने का आभास निर्माण हो सकता है। जिस प्रकार सर्वगत आकाश का कोई आकार नहीं है तथापि घट उपाधि से अवच्छिन्न होकर बना घटाकाश बाह्य महाकाश से भिन्न प्रतीत होता है। 
मनबुद्धि रूप सूक्ष्म शरीर (M/F मूढ़ बुद्धि)  में व्यक्त चैतन्य जीव कहलाता है। अन्तकरण की वृत्तियों के अनुसार यह जीव स्वयं को सुखी-दुखी संसारी अनुभव करता है।  किन्तु उसका शुद्ध चैतन्य स्वरूप (आत्मा इष्टदेव)  सदा अविकारी ही रहता है जो सनातन कहा गया है। 
उपर्युक्त विवेचन का तात्पर्य यह है कि आत्मा को प्राप्त हुआ जीवत्व अज्ञान के कारण है। अत वह जीवत्व आभासिक है।  अज्ञान (अविद्या-अस्मिता -राग -द्वेष -अभिनिवेश) का नाश हो जाने पर जीव स्वत आत्मस्वरूप बन जाता है। तत्पश्चात् ज्ञान की उपस्थिति में अज्ञान पुन नहीं लौटता तब जीव का संसार में पुनरागमन होने का कारण ही नहीं रह जाता है।
 इसलिए पूर्व श्लोक में कहा गया था कि भगवान् के परम धाम को प्राप्त हुये जीव पुन संसार को नहीं लौटते हैं। इसका पूर्व जन्म के सिद्धान्त से कोई विरोध नहीं है क्योंकि जब तक अज्ञान बना रहता है तब तक जीव का भी अस्तित्व बने रहने के कारण उसका पुनर्जन्म हो सकता है
       यह स्थूल पंचभौतिक शरीर जड़ है और इसमें चैतन्य को व्यक्त करने की सार्मथ्य नहीं है। ज्ञानेन्द्रियाँ और अन्तकरण (मन और बुद्धि) सूक्ष्म शरीर कहलाते हैं। यद्यपि यह सूक्ष्म शरीर भी जड़ है किन्तु इसमें चैतन्य व्यक्त हो सकता है। यह चेतन सूक्ष्म शरीर ही जीव है जो किसी देह (M/F) को धारण कर उसे चेतनता प्रदान करता है। 
इस श्लोक की दूसरी पंक्ति का सम्बन्ध अगले श्लोक से है। इसमें देहत्याग के समय जीव का कार्य बताया गया है। यह जीव प्रकृतिस्थ इन्द्रियाँ तथा मन अर्थात् अन्तकरण को एकत्र कर लेता है। यहाँ प्रकृति का अर्थ है स्थूल शरीर में स्थित नेत्र,  श्रोत्र आदि इन्द्रिय गोलक। यही कारण कि मृत देह में यह गोलक तो रह जाते हैं परन्तु उनमें विषय ग्रहण की कोई सार्मथ्य नहीं होती। 

किस समय यह जीव इन इन्द्रियादि को अपने में समेट लेता है भगवान् कहते हैं
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्।।15.8।।
।।15.8।। जब (देहादि का) ईश्वर (जीव) (एक शरीर से) उत्क्रमण करता है, तब इन (इन्द्रियों और मन) को ग्रहण कर अन्य शरीर में इस प्रकार ले जाता है, जैसे गन्ध के आश्रय (फूलादि) से गन्ध को वायु ले जाता है।।
देहेन्द्रियादि का ईश्वर अर्थात् स्वामी है जीव (मूढ़बुद्धि युक्त आत्मा?) । जब तक वह किसी एक देह मे रहता है तब तक सूक्ष्म शरीर (इन्द्रियाँ और अन्तकरण) को धारण किये रहता है और असंख्य प्रकार के कर्म करता है। अपनी वासनाओं के अनुसार वह कर्म करता है और फिर कर्मो के नियमानुसार विविध फलों को भोगने के लिये उसे अन्यान्य शरीर ग्रहण करने पड़ते हैं। तब एक शरीर का त्याग करते समय वह सूक्ष्म शरीर को समेट लेता है और अन्य शरीर में जा कर पुन उसके द्वारा पूर्ववत् व्यवहार करता है। 
सूक्ष्म शरीर का स्थूल शरीर से सदा के लिये वियोग स्थूल शरीर के लिये मृत्यु है। मृत देह का आकार पूर्ववत् दिखाई देता है  ,किन्तु विषय ग्रहण अनुभव तथा विचार ग्रहण करने की क्षमता उसमे नहीं होती क्योंकि ये समस्त कार्य सूक्ष्म शरीर के होते हैं। जीव की उपस्थिति से ही देह को एक व्यक्ति के रूप में स्थान प्राप्त होता है।जिस प्रकार प्रवाहित किया हुआ वायु पुष्प, चन्दन,  इत्र आदि सुगन्धित वस्तुओं की सुगन्ध को एक स्थान से अन्य स्थान बहा कर ले जाता है उसी प्रकार जीव समस्त इन्द्रियादि को लेकर जाता है। 
वायु और सुगन्ध दृष्टिगोचर नहीं होते उसी प्रकार देह को त्यागते हुये सूक्ष्म जीव को भी नेत्रों से नहीं देखा जा सकता है। जीव की समस्त वासनाएं भी उसी के साथ रहती हैं।इस श्लोक में जीव को देहादि गुच्छा का ईश्वर (आत्मा)  कहने का अभिप्राय केवल इतना ही है कि उसी की उपस्थिति में विषय ग्रहण विचार आदि का व्यवहार सुचारु रूप से चलता रहता है। वह इन उपाधियों का शासक और नियामक है। 
 वेदान्त मे शरीर को भोगायतन कहते हैं। उपर्युक्त श्लोक वस्तुत उपनिषदों के ही सिद्धान्तों का ही सारांश है।
वे इन्द्रियाँ कौन सी हैं सुनो
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते।।15.9।।
।।15.9।। (यह जीव) श्रोत्र, चक्षु, स्पर्शेन्द्रिय, रसना और घ्राण (नाक) इन इन्द्रियों तथा मन को आश्रय करके अर्थात् इनके द्वारा विषयों का सेवन करता है।।
 शुद्ध चैतन्य स्वरूप स्वत किसी वस्तु को प्रकाशित नहीं करता है, क्योंकि उसमें विषयों का सर्वथा अभाव रहता है। परन्तु यही चैतन्य बुद्धि में परावर्तित होकर वस्तुओं को प्रकाशित करता है। यही बुद्धि का प्रकाश कहलाता है जो इन्द्रियों के माध्यम से वस्तुओं को प्रकाशित करता है। मन सभी इन्द्रियों के साथ युक्त होता है जिसके कारण बाह्य वस्तुओं का सम्पूर्ण ज्ञान संभव होता है।
मूढ़बुद्धि की उपाधि से युक्त चैतन्य ही विषयों का भोक्ता जीव (M/F) है। 
       यदि यह चैतन्य आत्मा सर्वत्र विद्यमान है और हमारा स्वरूप ही है जिसके द्वारा हम सम्पूर्ण जगत् का अनुभव कर रहे हैं तो क्या कारण है कि हम उसे पहचानते नहीं हैं इसका कारण अज्ञान है। 
भगवान् कहते हैं
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः।।15.10।।

।।15.10।। शरीर को त्यागते हुये, उसमें स्थित हुये अथवा (विषयों को) भोगते हुये, त्रिगुणों से फँसे आत्मा को विमूढ़ लोग नहीं देखते हैं; (परन्तु) ज्ञानचक्षु (शुद्धबुद्धि) वाले पुरुष उसे देखते हैं।।
यह एक सर्वत्र अनुभव सत्य है कि सामान्य बुद्धि का पुरुष यद्यपि वस्तु को देखता है? तथापि उसे पूर्ण तथा यथार्थ रूप से समझ नहीं पाता है।इसी चैतन्य आत्मा की उपस्थिति से ही हम विषय भावनाओं और विचारों का अनुभव करते हैं परन्तु केवल आत्मज्ञानी पुरुष ही इसे पहचानते हैं और स्वयं आत्मस्वरूप बनकर जीते हैं।
आत्मा तो नित्य विद्यमान है। इसका अभाव कभी नहीं होता। देहत्याग के समय सूक्ष्म शरीर को चेतनता प्रदान करने वाला आत्मा ही होता है। एक देहविशेष के जीवन काल में आत्मा ही समस्त अनुभवों को प्रकाशित करता है। सुखदुखात्मक मानसिक अनुभवों तथा बुद्धि के निर्णयों का प्रकाशक भी आत्मा ही है। इसी प्रकार क्षण-क्षण परिवर्तनशील हमारे मन के सात्त्विक (शांति), राजसिक (विक्षेप) और तामसिक (मोहादि) भावों का ज्ञान भी चैतन्य के कारण ही संभव होता है फिर भी अविवेकी जन (मूढ़बुद्धि) उसे पहचान नहीं पाते जिसकी उपस्थिति से ही कोई अनुभव संभव हो सकता है। 
सामान्य जन अपने अनुभवों तथा उनके विषयों के प्रति ही इतने अधिक आसक्त और व्यस्त हो जाते हैं कि उनका सम्पूर्ण ध्यान बाह्य विषयों और सुन्दर संरचनाओं की सुन्दरता में ही आकृष्ट आसक्त रहता है। वे उस आत्मा की उपेक्षा करते हैं तथा उसे पहचान नहीं पाते जिसकी उपस्थिति से ही कोई अनुभव संभव हो सकता है। इनके सर्वथा विपरीत वे ज्ञानीजन हैं जो नाम और रूपों के विस्तार से विरक्त होकर इस विस्तार के सार तत्त्व उस ब्रह्म को देखते हैं जो उनके हृदय में आत्मरूप से स्थित सभी को प्रकाशित करता है।
 इस आत्मतत्त्व का दर्शन वे 'ज्ञानचक्षु' से करते हैं। ज्ञानचक्षु कोई अन्तरिन्द्रिय नहीं हैं। विवेक -वैराग्य आदि गुणों से सम्पन्न साधक जब वेदान्त प्रमाण के द्वारा आत्मविचार करता है तब उस विचार से प्राप्त आत्मबोध ही ज्ञानचक्षु है। 
आत्मदर्शन करने में अज्ञानी की विफलता और ज्ञानी की सफलता का कारण अगले श्लोक में वर्णन करते हैं
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः।।15.11।।
।।15.11।। योगीजन प्रयत्न करते हुये ही अपने हृदय में स्थित आत्मा को देखते हैं, जब कि अशुद्ध अन्त:करण वाले (अकृतात्मान:) और अविवेकी (अचेतस: मूढ़बुद्धि) लोग यत्न करते हुये भी इसे नहीं देखते हैं।।
अनेक ऐसे साधक हैं जिन्हें इस बात का दुख होता है कि वर्षों की उनकी नियमित साधना के होते हुये भी उनकी इच्छित प्रगति नहीं हुई है। इसका क्या कारण हो सकता है ?  इस विवादास्पद प्रश्न का अत्यन्त युक्तियुक्त उत्तर देते हुये भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं यद्यपि वे यत्न करते हैं किन्तु अशुद्ध अन्तकरण वाले अविवेकी लोग आत्मा को नहीं देखते हैं।
 ध्यान के फल (समाधि)  की प्राप्ति के लिये दो आवश्यक गुण हैं (क) चित्तशुद्धि अर्थात् अहंकार और स्वार्थजनित विक्षेपों का अभाव तथा? (ख) वेदान्त प्रमाण के द्वारा - नित्य-अनित्य विवेक या आत्मानात्मविवेक।  जिसके द्वारा अज्ञान आवरण (देहाभिमान)  नष्ट हो जाता है। इन दोनों के अभाव में आत्मज्ञान होना सर्वथा असंभव है। अत साधकों को कर्मयोग (Be and Make) और भक्तियोग के द्वारा चित्तशुद्धि प्राप्त कर नित्य-अनित्य विवेक करना चाहिये।
अब तक के विवेचन में आत्मा को इंगित करते हुये कहा गया था कि? (1) उसे भौतिक प्रकाश के स्रोतों सूर्य ,चन्द्रमा और अग्नि के द्वारा प्रकाशित नहीं किया जा सकता (2) जिसे प्राप्त होने पर संसार में पुनरावृत्ति नहीं होती और? (3) समस्त जीव मानो उसके अंश हैं। 
      इसके पश्चात् अगले चार श्लोकों में परमात्मा के स्वरूप तथा उसकी व्यापकता का वर्णन किया गया है, कि वह (क) सर्वप्रकाशक चैतन्य का प्रकाश है (ख) सर्वपोषक जीवन तत्त्व है (ग) समस्त जीवित प्राणियों के शरीर में जीवन की उष्णता है और (घ) सभी के हृदय में वह आत्मस्वरूप से स्थित है। भगवान् कहते हैं
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्।।15.12।।
।।15.12।। जो तेज सूर्य में स्थित होकर सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और अग्नि में है, उस तेज को तुम मेरा ही जानो।।
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः।।15.13।।
।।15.13।। मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपने ओज से भूतमात्र को धारण करता हूँ और रसस्वरूप चन्द्रमा बनकर समस्त औषधियों का अर्थात् वनस्पतियों का पोषण करता हूँ।।
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्।।15.14।।
।।15.14।। मैं ही समस्त प्राणियों के देह में स्थित वैश्वानर अग्निरूप होकर प्राण और अपान से युक्त चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।।
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।15.15।।
।।15.15।। मैं ही समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (उनका अभाव) होता है। समस्त वेदों के द्वारा मैं ही वेद्य (जानने योग्य) वस्तु हूँ तथा वेदान्त का और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूँ।।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते।।15.16।।
।।15.16।। इस लोक में क्षर (नश्वर) और अक्षर (अनश्वर) ये दो पुरुष हैं, समस्त भूत क्षर हैं और 'कूटस्थ' अक्षर कहलाता है।।
।।15.16।। इस अध्याय के अब तक किये गये विवेचन से सिद्ध हो जाता है कि पूर्व के त्रयोदश अध्याय (28-29) में जिसे क्षेत्र कहा गया था वह वस्तुत परमात्मा से भिन्न वस्तु नहीं है।जब वह परमात्मा सूर्य का प्रकाश और ताप, चन्द्रमा का शीतल प्रकाश, पृथ्वी की उर्वरा शक्ति, मनुष्य में ज्ञान, समृति और विस्मृति की क्षमता आदि के रूप में व्यक्त होता है वस्तुत तब ये सब परमात्म-स्वरूप ही सिद्ध होते हैं। परन्तु इस प्रकार अभिव्यक्त होने में अन्तर केवल इतना होता है कि परमात्मा क्षेत्र के रूप में ऐसा प्रतीत होता है मानो वह विकारी और विनाशी है। 
उदाहरणार्थ स्वर्ण से बने सभी आभूषण स्वर्ण रूप ही होते हैं परन्तु आभूषणों के रूप में वह स्वर्ण परिच्छिन्न और परिवर्तनशील प्रतीत होता है। इस प्रकार सम्पूर्ण क्षेत्र को इस श्लोक में क्षर पुरुष कहा गया है।
क्षेत्र को जानने वाले क्षेत्रज्ञ आत्मा को यहाँ अक्षर पुरुष कहा गया है। उसका अक्षरत्व इस चर जगत् की अपेक्षा से ही है। जैसे कोई व्यक्ति अपनी पत्नी की दृष्टि से पति और पुत्र की दृष्टि से पिता कहलाता है। इसी प्रकार शरीर, मन और बुद्धि की परिवर्तनशील क्षर उपाधियों की अपेक्षा से इन सब के ज्ञाता आत्मा को अक्षर पुरुष कहते हैं। 
क्षेत्र को जानने वाले क्षेत्रज्ञ आत्मा को यहाँ अक्षर पुरुष कहा गया है। उसका अक्षरत्व इस चर जगत् की अपेक्षा से ही है। जैसे कोई व्यक्ति अपनी पत्नी की दृष्टि से पति और पुत्र की दृष्टि से पिता कहलाता है। इसी प्रकार शरीर, मन और बुद्धि की परिवर्तनशील क्षर उपाधियों की अपेक्षा से इन सब के ज्ञाता आत्मा को अक्षर पुरुष कहते हैं।  पुरुष शब्द का अर्थ है पूर्ण । केवल निरुपाधिक परमात्मा ही पूर्ण है। उपर्युक्त क्षर और अक्षर तत्त्व उसी पूर्ण पुरुष  के ही दो व्यक्त रूप होने के कारण उन्हें भी पुरुष (पूर्ण -शुद्धबुद्धि) की संज्ञा दी गयी है।
इस अव्यय और अक्षर आत्मा को वेदान्त में कूटस्थ कहते हैं। कूट का अर्थ है निहाई जिसके ऊपर स्वर्ण को रखकर एक स्वर्णकार नवीन आकार प्रदान करता है। इस प्रक्रिया में स्वर्ण तो परिवर्तित होता है परन्तु निहाई अविकारी ही रहती है। 
इसी प्रकार उपाधियों के समस्त विकारों में यह आत्मा (इष्टदेव) अविकारी ही रहता है इसलिये उसे कूटस्थ कहते है। पूर्ण पुरुष (शुद्ध बुद्धि)  इन क्षर और अक्षर पुरुषों से भिन्न तथा इनके दोषों से असंस्पृष्ट नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव का है। 
भगवान् कहते है-
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः।।15.17।।
।।15.17।। परन्तु उत्तम पुरुष अन्य ही है, जो परमात्मा  कहलाता है और जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण करने वाला अव्यय ईश्वर (मायाधीश) है।।
संस्कृत में लोक शब्द का अर्थ है वह वस्तु जो देखी या अनुभव की जाती है। इस दृष्टि से यहाँ लोक शब्द का अर्थ स्वर्गादि लोक हो सकता है और हमारी परिचित अनुभवों की तीन अवस्थाएं जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति भी हो सकती हैं। 
एक ही संवित् (चैतन्य) इन तीनों को प्रकाशित करता है।  यहाँ विशेष ध्यान देने की बाता यह है कि इन तीनों पुरुषों को भिन्नभिन्न नहीं समझना चाहिये। केवल उत्तम पुरुष ही पारमार्थिक सत्य है जो दो विभिन्न उपाधियों की दृष्टि से क्षर और अक्षर के रूप में प्रतीत हो रहा है। उपाधियों के अभाव में वह केवल अपने नित्यशुद्ध निरुपाधिक स्वरूप में रह जाता है। 
उदाहरणार्थ एक ही सर्वगत आकाश घट और मठ इन दो उपाधियों से अवच्छिन्न होकर घटाकाश और मठाकाश के रूप में प्रतीत होता है। यहाँ यह स्पष्ट है कि यह कोई तीन आकाश घटाकाश मठाकाश और महाकाश नहीं बन गये हैं। घट और मठ की उपाधियों से ध्यान दूर कर लें तो ज्ञात होता कि वस्तुत आकाश एक ही है। इसी प्रकार उत्तम पुरुष ही दृश्य और दृष्टा के रूप में क्षर और अक्षर पुरुष कहलाता है। परन्तु उपाधियों से विवर्जित हुआ वह परमात्मा ही है। 
अगले श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम शब्द की व्युत्पत्ति दर्शाकर यह बताते हैं कि वे किस प्रकार परम ब्रह्म स्वरूप हैं
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः।।15.18।।
।।15.18।। क्योंकि मैं क्षर से अतीत हूँ और अक्षर से भी उत्तम हूँ, इसलिये लोक में और वेद में भी पुरुषोत्तम के नाम से प्रसिद्ध हूँ।।
 जैसा कि पूर्व के दो श्लोकों के विवेचन में कहा गया है कि एक परमात्मा ही परिवर्तनशील जगत् के रूप में क्षर और उस जगत् के अपरिवर्तनशील ज्ञाता के रूप में अक्षर कहलाता है। यह सर्वविदित है कि एक अपरिवर्तनशील वस्तु के बिना अन्य परिवर्तनों का ज्ञान होना संभव नहीं होता है। अत यदि शरीर, मन,  बुद्धि और बाह्य जगत् के विकारों का हमें बोध होता है तो उससे ही इस अक्षर का अस्तित्व सिद्ध हो जाता है,  जो स्वयं कूटस्थ रहकर अन्य विचारों को प्रकाशित करता है। 
यह भी स्पष्ट हो जाता है कि केवल क्षर की दृष्टि से ही परमात्मा को अक्षर का विशेषण प्राप्त हो जाता है अन्यथा वह स्वयं निर्विशेष ही है।  इसलिये यहाँ भगवान् कहते हैं क्षर और अक्षर से अतीत होने के कारण लोक में और वेद में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ। अर्थात् भगवान् पूर्ण होने से पुरुष है तथा क्षर और अक्षर से अतीत होने से उत्तम भी है इसलिये वेदों में तथा लोक में भी कवियों और लेखकों ने उन्हें पुरुषोत्तम नाम से भी संबोधित और निर्देशित किया है।
अब परमात्मा के ज्ञान का फल बताते हुये कहते है
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत।।15.19।।
।।15.19।। हे भारत ! इस प्रकार, जो, संमोहरहित, पुरुष (शुद्धबुद्धि) मुझ पुरुषोत्तम को जानता है, वह सर्वज्ञ होकर सम्पूर्ण भाव से अर्थात् पूर्ण हृदय से मेरी भक्ति करता है।।
 जिस पुरुष ने अपने शरीर, मन और बुद्धि (M/F शरीर) तथा उनके द्वारा अनुभव किये जाने वाले इन्द्रिय विषयों भावनाओं एवं विचारों के साथ मिथ्या तादात्म्य को सर्वथा त्याग दिया है वही असम्मूढः अर्थात् संमोहरहित पुरुष (शुद्धबुद्धि) है। 
इस प्रकार मुझे पुरुषोत्तम जानता है यहाँ जानने का अर्थ बौद्धिक स्तर का ज्ञान नहीं वरन् आत्मा (इष्टदेव-सच्चिदानन्द तत्व) का साक्षात् अपरोक्ष अनुभव है। स्वयं को परमात्मस्वरूप से जानना ही वास्तविक बोध है।अनात्मा के तादात्म्य को त्यागकर जिसने मुझ परमात्मा के साथ पूर्ण तादात्म्य स्थापित कर लिया है, वही परम भक्त है। 
 जो मुझे पूर्ण हृदय से भजता है। सर्वत्र प्रेम का मापदण्ड प्रिय से तादात्म्य ही माना जाता है। (सांसरिक किसी देह से नहीं केवल ठाकुर, माँ स्वामी जी) अधिक प्रेम होने पर अधिक तादात्म्य होता है।  इसलिये अंकगणित की दृष्टि से भी पूर्ण तादात्म्य का अर्थ होगा पूर्ण प्रेम अर्थात् पराभक्ति।
        यह पुरुषोत्तम ही चैतन्य स्वरूप से तीनों काल में समस्त घटनाओं एवं प्राणियों की अन्तर्वृत्तियों को प्रकाशित करता है। इसलिये वह सर्वज्ञ कहलाता है। जो भक्त इस पुरुषोत्तम के साथ पूर्ण तादात्म्य कर लेता है  वह भी सर्ववित् कहलाता है।
इस पन्द्रहवें अध्याय की विषयवस्तु भगवत्तत्त्वज्ञान है। अब भगवान् श्रीकृष्ण इस ज्ञान सर्थात -भगवत्-तत्वज्ञान की प्रशंसा करते हैं जो ज्ञान हमें शरीरजनित दुखों,  मनजनित विक्षेपों और बुद्धिजनित अशान्तियों के बन्धनों से सदा के लिये मुक्त कर देता है
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत।।15.20।।

।।15.20।। हे निष्पाप भारत ! इस प्रकार यह गुह्यतम शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया, इसको जानकर मनुष्य बुद्धिमान और कृतकृत्य हो जाता है।।
प्रस्तुत अध्याय के इस अन्तिम श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन्होंने अर्जुन को गुह्यतम ज्ञान का उपदेश दिया है। इस ज्ञान को गुह्य या रहस्य इस दृष्टि से नहीं कहा गया है कि इसका उपदेश किसी को नहीं देना चाहिये अभिप्राय यह है कि परमात्मा इन्द्रिय अगोचर होने के कारण कोई भी व्यक्ति प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणों के द्वारा उसे अपनी बुद्धि से नहीं जान सकता है। अत वह उसके लिये रहस्य ही बना रहेगा। केवल एक शास्त्रज्ञ और ब्रह्मज्ञानी सदगुरुदेव के उपदेश से ही परमात्मज्ञान हो सकता है। अपने पुरुषोत्तम स्वरूप को जानने वाला पुरुष बुद्धिमान् (शुद्धबुद्धि) बन जाता है। 
परमात्मा के ज्ञान का फल है कृतकृत्यता। मन में पूर्ण सन्तोष का वह भाव जो जीवन के लक्ष्य (इष्टदेव गुरुदेव भक्ति) को प्राप्त कर लेने पर उदय होता है,  कृतकृत्यता कहलाता है। तत्पश्चात् उस व्यक्ति के लिये न कोई प्राप्तव्य शेष रहता है और न कोई कर्तव्य
यह श्लोक उत्तम अधिकारियों को आत्मज्ञान के इस श्रेष्ठ फल का आश्वासन देता है।
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