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बुधवार, 1 अप्रैल 2026

⚜️️🔱श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय -16 ⚜️️🔱अध्याय सोलह: दैवासुर सम्पद् विभाग योग⚜️️🔱भय अविद्या का लक्षण है। जहाँ विद्या है , वहाँ निर्भयता है। ⚜️️🔱चरित्र के गुण उसके आध्यात्मिक विकास के समान अनुपात में होती है। ⚜️️🔱 किसी व्यक्ति के दोषों को अन्य लोगों के समक्ष प्रकट करने को पैशुन कहते हैं। पैशुन का अभाव ही अपैशुन है।⚜️️🔱(नारद जैसे प्रभु -भक्त) का मनसन्तुलन (poise) कभी विचलित नहीं होता है⚜️️🔱अहंकार को इष्टदेव का दास समझ लेने वाले व्यक्ति -के मन में विक्षेपों का कोई कारण नहीं रह जाता इसलिए उसके मन की शान्ति बनी रहती है ⚜️️🔱हिन्दू धर्म शास्त्रों में वर्णित (यम-नियम या चरित्र के गुण) का निर्माण किसी उदासीन पैगम्बर के द्वारा नहीं हुआ है, बल्कि हमारे पूर्वज ऋषियों के नित्य-अनित्य विवेक और अनुभवों की दृढ़ चट्टानों की नींव पर हुआ है⚜️️🔱साधक को सतत्त अपने क्रोध को शान्त रखने का प्रयास करते रहना चाहिए कभी उसे क्रियारूप में व्यक्त न होने दे।⚜️️🔱

 24 श्लोकों वाले इस अध्याय में श्रीकृष्ण दैवीय और आसुरी दो प्रकार की प्रकृति का वर्णन करते हैं। यह अध्याय दैवीय गुणों से सम्पन्न पुण्यात्माओं के निरूपण से शुरू होता है।  दैवीय गुण धार्मिक ग्रंथों के उपदेशों के अनुसरण, सत्त्वगुण को पोषित करने और अध्यात्मिक अभ्यास द्वारा मन को शुद्ध करने से विकसित होते हैं। ये दैवीय गुणों में वृद्धि करते हैं और अंततः भगवत्प्राप्ति तक पहुँचाते हैं।

आगे इसमें आसुरी गुणों का भी वर्णन किया गया है जिनका अति सतर्कता के साथ त्याग करना चाहिए, क्योंकि ये आत्मा को पुनः अज्ञानता और 'संसार' अर्थात् जीवन और मृत्यु के चक्र में खींचते हैं।

 श्रीकृष्ण इस अध्याय का समापन करते हुए कहते हैं कि क्या किया जाना चाहिए और क्या नहीं किया जाना चाहिए, इसका निर्णय करने का अधिकार केवल वेद शास्त्रों का ही माना जाता है अतः हमें भी वेदों के वाक्यों को मानना चाहिए। हमें इन वैदिक शास्त्रों के विधि-निषेधों को समझना चाहिए और तदनुसार इस संसार में अपने कार्यों का निष्पादन और दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए।

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⚜️️🔱अध्याय सोलह: दैवासुर सम्पद् विभाग योग⚜️️🔱

श्री भगवानुवाच

अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।

दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।16.1।।

।।16.1।। श्री भगवान् ने कहा -- अभय, अन्त:करण की शुद्धि, ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और आर्जव।।

इस श्लोक में उन आदर्श गुणों की प्राय सम्पूर्ण सूची प्रस्तुत की गयी है जो आध्यात्मिक जीवन जीने वाले एक सुसंस्कृत पुरुष (चरित्रवान मनुष्य) में देखे जाते हैं। अपने व्यावहारिक जीवन में उन बीस गुणों को जीना ही आध्यात्मिक जीवन कहलाता है।

इस श्लोक में उन आदर्श गुणों की प्राय सम्पूर्ण सूची प्रस्तुत की गयी है जो आध्यात्मिक जीवन जीने वाले एक सुसंस्कृत पुरुष में देखे जाते हैं। अपने व्यावहारिक जीवन में उन बीस गुणों को जीना ही आध्यात्मिक जीवन कहलाता है। भगवान् श्रीकृष्ण इन दैवी गुणों की गणना करते समय प्रथम स्थान अभय को देते हैं। भय अविद्या का लक्षण है। जहाँ विद्या है, वहाँ निर्भयता है।# गुणों की इस सूची में अभय को प्रथम स्थान देकर गीताचार्य़ यह इंगित करते हैं कि किसी साधक की नैतिक पूर्णता-(चरित्र के गुण) उसके आध्यात्मिक विकास के समान अनुपात में होती है

 >>#भय अविद्या का लक्षण है-जहाँ विद्या है, वहाँ निर्भयता है। 

 भगवान् श्रीकृष्ण इन दैवी गुणों की गणना करते समय प्रथम स्थान अभय को देते हैं। भय अविद्या का लक्षण है। जहाँ विद्या है, वहाँ निर्भयता है। 

    गुणों की इस सूची में अभय को प्रथम स्थान देकर गीताचार्य़ (जगतगुरु) यह इंगित करते हैं कि किसी साधक की नैतिक पूर्णता (चरित्र के गुण) उसके आध्यात्मिक विकास के समान अनुपात में होती है। भय अविद्या का लक्षण है- अविद्या-अस्मिता-राग-द्वेष-अभिनिवेश पंचक्लेश - से बचने का उपाय केवल मायाधीश (इष्टदेव/गुरुदेव) की शरण में रहना है। किसी साधक के चरित्र के गुण उसके आध्यात्मिक विकास (आत्मश्रद्धा -सत्यानुभूति -सत्यनिष्ठा) के समान अनुपात में होती है। 

विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।

पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धनाद् धर्मं ततः सुखम्॥

विद्या (ज्ञान) विनम्रता प्रदान करती है। विनम्रता से योग्यता (पात्रता) आती है। योग्यता से धन (संपत्ति/सामर्थ्य) प्राप्त होता है। धन से धर्म (सत्कर्म-'Be and Make') और धर्म से वास्तविक सुख सुख-शान्ति मिलती है।

 इसलिए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - "धर्म वह वस्तु है जिससे पशु, मनुष्य तक और मनुष्य देवत्व (परमात्मा) तक उठ सकता है।" 

विनम्रता, सरलता और सत्यनिष्ठा ऐसे विशिष्ट दैवीय गुण हैं, जो हमारे जीवन में दैवत्व की प्रतिष्ठा करते हैं। अतः सरल, सहज और प्राकृतिक जीवन अभ्यासी बनें। दूसरों को प्रभावित करने के लिए अपने आसपास अनावश्यक आकर्षण ना जगाएँ। यथार्थवादी रहें।

Humility, simplicity, and integrity are divine qualities that establish divinity in our lives. Therefore, strive to live a simple, natural, and straightforward life. Do not create unnecessary attraction around you to impress others. Be realistic. 

 इसलिए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - "धर्म वह वस्तु है जिससे पशु, मनुष्य तक और मनुष्य देवत्व (परमात्मा) तक उठ सकता है।" 

[अर्थात 3H विकास के 5 अभ्यास द्वारा अर्जित विनम्रता, सरलता और सत्यनिष्ठा (रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई।) ऐसे विशिष्ट दैवीय गुण हैं, जिससे मनुष्य "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।"  की समझ तक उठ सकता है।]  

धर्म (सत्कर्म या 'Be and Make') आन्दोलन से जुड़े रहना वह वास्तु है - जिससे स्वयं को मात्र स्वार्थी देह M/F शरीर समझने वाला घोर 100% स्वार्थी पशुमानव, 50 % स्वार्थी मनुष्य (सद्गृहस्थ) तक और 'मनुष्य' (अर्थात मान हूँश जिसको अंतर्निहित देवत्व का होश है या जो सत्यान्वेषी या आत्मान्वेषी है) देवत्व (परमात्मा तक) पूर्ण-निःस्वार्थी मनुष्य तक (नवनीदा तक) उठ सकता है।।  श्री हनुमान जन्मोत्स्व  2 अप्रैल 2026 : महामण्डल के 5 अभ्यास से अर्जित  विनम्रता, सरलता और सत्यनिष्ठा (ईमानदारी -प्राण जाये पर वचन न जाए) ऐसे विशिष्ट दैवीय गुण हैं, विवेक -प्रयोग अर्थात विद्या जनित विनम्रता प्रयोग।-जीवो ब्रह्मैव न अपरः! की समझ तक उठ सकता है।]  

 इसलिए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - मनुष्य और ईसा में अन्तर (इष्टदेव, सद्गुरुदेव अथवा आचार्य नवनीदा में अन्तर।) 

" अभिव्यक्त प्राणियों में बहुत अन्तर होता है। अभिव्यक्त प्राणी के रूप में तुम ईसा कभी नहीं हो सकते। मिट्टी से एक मिट्टी का हाथी बना लो , उसी मिट्टी से एक मिट्टी का चूहा बना लो। उन्हें पानी में डालदो - वे एक बन जाते हैं। मिट्टी के रूप में वे निरंतर एक हैं , गढ़ी हुई वस्तुओं के रूप में निरंतर भिन्न हैं। ब्रह्म ही ईश्वर  तथा मनुष्य दोनों का उपादान है। पूर्ण सर्वव्यापी सत्ता के रूप में हम सब एक हैं, परन्तु वैयक्तिक प्राणियों के रूप में ईश्वर (मायाधीश) शाश्वत स्वामी हैं और हम (मायाधीन) शाश्वत सेवक हैं

    "तुम्हारे पास तीन चीजें '3H'  हैं- 1. शरीर, 2. मन 3. आत्मा! आत्मा इन्द्रियातीत है। मन (मिथ्या अहं) जन्म और मृत्यु का पात्र है और वही दशा शरीर की है। तुम वही (अविनाशी) आत्मा हो, पर बहुधा तुम सोचते हो की तुम शरीर हो। जब मनुष्य कहता है- 'मैं यहाँ हूँ',  तो उस समय वह शरीर की बात सोचता है। 

फिर एक दूसरा क्षण आता है , जब तुम उच्चतम भूमिका में होते हो, तब तुम यह नहीं कहते - " मैं यहाँ हूँ !" किन्तु जब कोई तुम्हें गाली देता है, या तुम्हारा अपमान करता है, और तुम रोष नहीं प्रकट करते, (भीतर से क्रोधित नहीं हो जाते), तब तुम आत्मा हो। 

" जब मैं सोचता हूँ कि मन (सूक्ष्म शरीर M/F जीव) हूँ, मैं उस अनन्त अग्नि की एक स्फुलिंग हूँ, जो तुम हो। जब मैं यह अनुभव करता हूँ कि मैं आत्मा हूँ, तुम और मैं एक हूँ। " यह एक प्रभु (मायाधीश) के भक्त का कथन है ! क्या मन आत्मा से बढ़कर है ? [क्या मन (M/F जीव भाव) आत्मा (मायधीश-इष्टदेव -आचार्यदेव) से बढ़कर है ? (खंड 10. पृष्ठ 40)]  

 "दृष्टिं ज्ञानमयीं  कृत्वा पश्येद्  ब्रह्ममयं जगत्!

ज्ञानमय दृष्टि से संसार को ब्रह्ममय देखना चाहिए

यह प्रसिद्ध श्लोक हनुमान जी द्वारा भगवान श्री राम को दिया गया उत्तर है, जो द्वैत (सेवक-स्वामी), विशिष्टाद्वैत (अंश-अंशी) और अद्वैत (आत्म-एकता) दर्शन का अनूठा मिश्रण है।

 "देहबुद्धया तु दासोऽहं जीवबुद्धया त्वदंशक। 

     आत्मबुद्धया  त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः ॥   

देहबुद्धि से तो मैं दास हूँ, जीवबुद्धि से आपका अंश ही हूँ और  आत्मबुद्धि से में वही हूँ जो आप हैं, यही मेरी निश्चित मति है॥ 

[" अपने धर्म के (सनातन-वैदिक धर्म के) उसी एक केन्द्रवर्ती सत्य पर खड़े हो जाओ - जो हिन्दू, बौद्ध और जैनियों के लिए पैतृक सम्पत्ति है। वह सत्य है मनुष्य की 'आत्मा' ! अजर, अमर, अविनाशी, सर्वगत मानवात्मा जिसकी महिमा का वर्णन वेद भी नहीं का सकते, जिसके वैभव के सामने सूर्य-चंद्र , तारागण और आकाशगंगा समेत सारा विश्व-ब्रह्माण्ड एक 'बिन्दु' जैसा है। प्रत्येक स्त्री-पुरुष, यही नहीं, उच्चतम देवों से लेकर छोटे -छोटे जीव सब वही अनन्त 'आत्मा ' हैं , कोई विकसित कोई अविकसित हैं। अन्तर प्रकार में नहीं , केवल परिमाण में है। आत्मा की इस अनंत शक्ति का प्रयोग जड़ वस्तु (देह,मन इन्द्रिय) पर होने से 'मूढ़ बुद्धि' का विकास होता है, और 'अपने पर' ही होने से  - 'मनुष्य' का ईश्वर बन जाता है। (मूढ़ बुद्धि को देह-मन के तादात्म्य से हटाकर आत्मा से जोड़ लेने पर, स्वार्थी क्षुद्र अहं, पूर्णतः निःस्वार्थी सर्वगत अहं ईश्वर में परिणत हो जाता है -क्योंकि Unselfishness is God!) पहले हमें ईश्वर बन लेने दो। तत्पश्चात दूसरों को ईश्वर बनाने में सहायता देंगे।  'बनो और बनाओ', "Be and Make" यही हमारा मूलमंत्र रहे। ऐसा न कहो कि मनुष्य पापी है। उसे यह बताओ कि तू ब्रह्म है। " (9/379) 

" मुझे तो केवल इसी बात की शिक्षा देनी है कि ईश्वर बार बार आता है , वह भारत में कृष्ण, राम और बुद्ध के रूप में आया और वह पुनः आयेगा। यह प्रायः दिखाया जा सकता है कि प्रत्येक 500 वर्ष के पश्चात दुनिया नीचे जाती है, और एक महान आध्यात्मिक लहर आती है और उस लहर के शिखर पर एक 'ईसा' होता है! ... और श्रीरामकृष्ण की जन्मतिथि से ही सत्ययुग का प्रारम्भ हो चुका है। (10/39)

[स्वामी विवेकानन्द और युवा समस्याएं/(স্বামী বিবেকানন্দ ও যুব-সমস্যা) /रामकृष्ण मठ और मिशन का प्रतीक चिन्ह] SVHS- 3.3 Tuesday, September 11, 2012

अन्तकरण की शुद्धि अपने व्यक्तित्व के बाह्य स्तर पर साधक को कितना ही संयम क्यों न हो  फिर भी वह संयम उसे रचनात्मक और निश्चयात्मक शक्ति प्रदान नहीं कर सकता जो कि नैतिक जीवन का सार है। (मोने करबि तुमि एक जन शिक्षक-शिक्ष -नेता की की शक्ति-का सार है मर्म है चित्त शुद्धि या विषयासक्त मूढ़बुद्धि को आत्मोन्मुखी शुद्धबुद्धि बना लेना। ) 

 गीता सैद्धांतिक और व्यावहारिक इन दोनों ही दृष्टियों से एक शक्तिशाली धर्म  का उपदेश देती है। निष्क्रिय सदाचार का पालन करने वाली आज्ञाकारी पीढ़ी से भगवान् श्रीकृष्ण सन्तुष्ट नहीं हैं। वे चाहते हैं कि समाज के सभी लोग न केवल अपने व्यक्तिगत जीवन में ही सर्वोच्च नैतिक मूल्यों को जियें वरन् सामाजिक जीवन में भी धर्माचरण (सत्कर्म-'Be and Make') की ऐसी नवचेतना- जाग्रत करें जिससे मनुष्यों की सम्पूर्ण पीढ़ी ही सत्य और धर्म के प्रकाश से उज्वल बन जाये। धर्म शब्द के अर्थ में उद्देश्यों की सत्यता (भारत का कल्याण) और साधनों की शुद्धता (जीवनगठन -आदि 5 अभ्यास) अन्तर्निहित है।

ज्ञानयोग व्यवस्थिति अत्यन्त देहासक्त और विषयासक्त मूढ़बुद्धि को उपर्युक्त अन्तकरण की शुद्धि (विवेकी -शुद्धबुद्धि) प्राप्त नहीं हो सकती। आत्मा के दिव्य गान के साथ एकस्वर हुए मन में ही अपनी निम्न स्तर की वृत्तियों बन्धनकारक आसक्तियों और निन्द्य उद्देश्यों को त्यागने की आवश्यक सार्मथ्य होती है। ये हीन वृत्तियां सदैव अन्तकरण में उभर कर सामने आती रहती हैं। ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति ही मन को निम्नस्तर के प्रलोभनों से निवृत्त करने का निश्चयात्मक उपाय है

 यदि कोई बालक कांच की निर्मित नाजुक कलाकृति के साथ खेल रहा हो तो उसके मातापिता उस बहुमूल्य वस्तु की सुरक्षा के लिए प्राय बालक को चॉकलेट आदि कोई वस्तु देते हैं और वह बालक उसे पाने  के लिए उस कांच की मूल्यवान् वस्तु को त्याग देता है। इसी प्रकार आत्मा (इष्टदेव) के आनन्द को अनुभव करने वाली शुद्धबुद्धि ('विद्या ददाति विनयं युक्तबुद्धि!) इन्द्रियों के विषयों तथा तज्जनित क्षणिक सुखों में स्वभावतः आसक्त नहीं होती।  दान, दम (इन्द्रिय संयम) और यज्ञ ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति प्राप्त करने के ये तीन साधन हैं जिनके द्वारा एक साधक चित्तशुद्धि (अन्तःकरण की शुद्धि) की योग्यता प्राप्त कर सकता है। 

बहुलता के भाव से उत्पन्न हुई दान की प्रवृत्ति ही वास्तविक दान है। जब हम अन्यों के साथ एकत्व का अनुभव करते हैं तभी हम सबके साथ अपने सर्वस्व का विभाजन करने के लिए तत्पर होते हैं,  अन्यथा नहीं।  इस प्रकार दान का उदय हमारी इस क्षमता से होता है जिसके द्वारा हम अपनी परिग्रह और लोभ की प्रवृत्ति को संयमित करते हैं। जहाँ इनका संयमन एक पक्ष है, तो दूसरा पक्ष है यज्ञ अर्थात् त्याग की भावना। यज्ञ भावना से प्रेरित होने पर ही हम अपने संग्रह का दान कर सकते हैं। दान शब्द से केवल धन या वस्तुओं का ही दान नहीं वरन् दुखियों के साथ सहानुभूति का भाव तथा ज्ञानदान भी इसमें सम्मिलित है।  यदि दान साधक के वैराग्य को विकसित करता है जिससे वह साधक अपनी सम्पत्ति का विनियोग दीनजनों की सहायता में करता है  तो हम कह सकते हैं कि हमारे व्यक्तिगत जीवन में इन्द्रियसंयम (दम) उसी यज्ञ भावना का संप्रयोग है। 

मूढ़बुद्धि को इन्द्रियों के विषयों में विचरण करने का पूर्ण अधिकार देने का अर्थ अपनी सम्पूर्ण शक्ति का निष्फल ही अपव्यय करना है। साधक को चाहिए कि अपनी इस शक्ति का उपयोग वह अपने ध्यानाभ्यास में करे। मन को आत्मा में समाहित करने के लिए सूक्ष्म शक्ति की आवश्यकता होती है और उसे साधक इन्द्रियसंयम के द्वारा अपने में ही निहित देख सकता है। दान और दम के बिना सत्य की तीर्थयात्रा मात्र स्वप्न ही है।

यज्ञ वैदिककाल में यज्ञ शब्द का अर्थ श्रद्धायुक्त होमहवन आदि का अनुष्ठान समझा जाता था। उस काल में साधकगण इन यज्ञों का श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करते थे। पौराणिक काल में वैदिक कर्मकाण्ड का स्थान मूर्तिपूजा प्रार्थना जैसी भक्ति साधनाओं ने ले लिया जो उसी रूप में आज भी विद्यमान हैं। यज्ञ अर्थात् पूजा के अनुष्ठान से मन को एक आलम्बन प्राप्त होने से इन्द्रियों का संयमन करने में सरलता होती है। 

स्वाध्याय से मात्र वेदपठन या बौद्धिक स्तर पर उसके अर्थ को समझना ही पर्याप्त नहीं है। संस्कृत के इस शब्द का आशय है स्वयं का अध्ययन अर्थात् आत्मनिरीक्षण। वेदप्रतिपादित सत्यों को समझकर उनका स्वानुभवकरण ही वास्तविक स्वाध्याय है। स्वाध्याय और यज्ञ से हमें आत्मसंयम का जीवन जीने का साहस प्राप्त होगा जो हमें अपने ध्यानाभ्यास में चित्त की स्थिरता प्रदान करेगा। 

तप कष्ट सहन - शारीरिक स्तर पर पालन किये जाने वाले व्रत उपवास आदि तप कहलाते हैं। तपाचरण से बाह्यजगत् के भोगों में व्यर्थ ही नष्ट होने वाली हमारी शक्ति का संचय होता है जिसके सदुपयोग आत्मविकास के लिए किया जा सकता है। 

आर्जवम् इसका अर्थ है सरलता। बुद्धि के विचार मन की भावनाओं और कर्मों में कुटिलता का साधक के व्यक्तित्व पर आत्मघातक परिणाम होता है। हमारे वास्तविक उद्देश्यों और प्रेरणाओं निश्चय और आकांक्षाओं विवेक और अनुभवों को असत्य सिद्ध करने वाले हमारे कर्मों का परिणाम अपने व्यक्तित्व की वक्रता होता है। जो व्यक्ति इस प्रकार का व्यक्तित्व जीता है उसका जीवन दो भागों में विभाजित हो जाता है और शीघ्र ही वह अपनी कार्यकुशलता की आभा को खो देता है और व्यक्तिगत दृढ़ता की शक्ति की दृष्टि से भी दुर्बल हो जाता है। 

इस प्रकार इस अध्याय के प्रथम श्लोक में ही दैवीगुणों का उल्लेख करते हुए उनके परस्पर संबंधों को भी दर्शाया गया है। हिन्दू धर्म शास्त्रों में वर्णित नैतिक मूल्य और सदाचार के नियम (साधन-चतुष्टय या यम-नियम या चरित्र के गुण) का निर्माण किसी उदासीन पैगम्बर के द्वारा नहीं हुआ है, बल्कि हमारे पूर्वज ऋषियों के नित्य-अनित्य विवेक और अनुभवों की दृढ़ चट्टानों की नींव पर  हुआ है। निष्ठापूर्वक उनका पालन करने और सजगतापूर्वक उन्हें अपने व्यवहार में अभिव्यक्त करने पर वे हमारी प्राय सुप्त दैवी क्षमताओं (निःस्वार्थपरता) को व्यक्त करते हुए (क्रमशः पशु से मनुष्य बनने में, मनुष्य से देवत्व में उठने में) अपना योगदान देते हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार  ये दैवी चरित्र के गुण अपने आप में स्वर्ग (जन्नत) में प्रवेश का अधिकार प्रदान नहीं कर सकते परन्तु मनुष्य के हृदय में स्थित दिव्य आत्मतत्त्व (अव्यक्त ब्रह्मत्व) को पूर्णतया अभिव्यक्त करने में  वे पूर्ण तैयारी के रूप में सहायक होते हैं।

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।

दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्।।16.2।।

।।16.2।। अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शान्ति, अपैशुनम् (किसी की निन्दा न करना), भूतमात्र के प्रति दया, अलोलुपता , मार्दव (वाणी की मधुरता , कोमलता), लज्जा, अचंचलता।।

अहिंसा प्राणियों को पीड़ा न पहुँचाना अहिंसा है। स्वार्थ या द्वेषवशात् किसी को पीड़ित करना हिंसा है। अहिंसा का पालन शरीर, वाणी (ह्रदय)  और मन इन तीनों स्तर पर होना चाहिए। सत्यम् सत्य का कुछ भाव आर्जव (सरलता) शब्द की व्याख्या में प्रकट किया जा चुका है। प्रमाणों से सिद्ध अर्थ को उसी रूप में प्रकट करना सत्य कहलाता है।

अक्रोध - (अविरोध) साधना की स्थिति में कभी-कभी किसी घटना अथवा किसी के दुर्व्यवहार से मन में क्रोध आ जाता है;  परन्तु तत्काल ही क्रोध को पहचान कर उसको शान्त करने की क्षमता को यहाँ अक्रोध कहा गया है। साधक को सतत्त अपने क्रोध को शान्त रखने का प्रयास करते रहना चाहिए  कभी उसे क्रियारूप में व्यक्त न होने दे। 

त्याग यहाँ यहाँ अहंकार और स्वार्थ का त्याग करने के लिए कहा गया है। पूर्व श्लोक के समान यहाँ उल्लिखित गुणों में भी परस्पर संबंध है। अहंकार त्याग के अभाव में अक्रोध या अविरोध भी सिद्ध नहीं हो सकता क्योंकि जब कोई हमारे अहंकार या स्वार्थ को चोट या हानि पहुंचता है तभी हमें क्रोध आता है।

शान्ति उपर्युक्त गुणों से सम्पन्न व्यक्ति, अहंकार (मन या सूक्ष्म शरीर M/F जीव-अंशी) को आत्मा (इष्टदेव) का दास समझने वाले व्यक्ति के मन में विक्षेपों का कोई कारण नहीं रह जाता; इसलिए उसके मन की शान्ति बनी रहती है। बाह्य जगत् की अथवा उसके व्यक्तिगत जीवन की परिस्थितियां कितनी ही दुखदायक और आक्रामक क्यों न हों उस व्यक्ति (नारद जैसे प्रभु -भक्त) का मनसन्तुलन (poise) कभी विचलित नहीं होता है

अपैशुनम् किसी व्यक्ति के दोषों को अन्य लोगों के समक्ष प्रकट करने को पैशुन कहते हैं। पैशुन का अभाव ही अपैशुन है।  मार्दव (वाणी की मधुरता , कोमलता) आत्मविकास के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचने की आकांक्षा रखने वाले उद्यमी साधक को ऐसा आन्तरिक सामञ्जस्य स्थापित करना चाहिए कि उसकी वाणी आत्मा की सुरभि का अनुकरण करे। इस प्रकार के मधुर संभाषण के गुण का स्वयं में विकास करने से अपने व्यक्तित्व के अन्य आयामों का भी स्वत विकास हो जाता है. जो अन्तकरण को अनुशासित करने के लिए आवश्यक होता है।

दया प्राणी मात्र के प्रति दया -नहीं ! सेवा   दुख और कष्ट से पीड़ित प्राणियों के प्रति सेवा का भाव दया कहलाता है। 

इसके अतिरिक्त एक साधक को समाज में रहते हुए यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि समाज के सभी लोग उन्हीं आदर्शों या जीवन मूल्यों का अनुकरण करें जिनके प्रति स्वयं उसकी श्रद्धा है। लोगों की दृष्टियों में भेद होता है और इसलिए उसे अपने आसपास के लोगों में अपूर्णता और दोष दिखाई दे सकते हैं। परन्तु उनको इन समस्त दोषों के अन्तरंग में स्थित आत्मा के असीम सौन्दर्य को देखते रहना चाहिए। आत्मदर्शन की यह क्षमता ही सभी साधुओं और सन्तों के मन में स्थित प्राणिमात्र के प्रति दया (सेवा) का रहस्य है। 

सब के प्रति मन में प्रेम होने पर ही उनके प्रति असीम सहानुभूति और स्नेह का भाव हृदय में उठ सकता है। आत्मा की इस सुन्दरता को यदि अत्यन्त दुःखी और दुश्चरित्र व्यक्ति में भी हम नहीं देख सके तो उनके प्रति हमारे हृदय में स्नेह और दया (सेवा की भावना) उत्पन्न नहीं हो सकती।

अलोलुपता प्रलोभित और आकर्षित करने वाले विषयों की उपस्थिति में भी -  "ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके, शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते।" प्रार्थना से मन में विकार उत्पन्न नहीं होना अलोलुपता है।

मार्दव (मृदुता) और लज्जा यहाँ लज्जा का अर्थ है शास्त्र-निषिद्ध और निन्द्य प्रकार के कर्म करने में लज्जा का अनुभव करना। इसे दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि निन्द्य कर्मों का त्याग करना तथा शुभ कर्मों में गर्व का न होना अर्थात् नम्रता विनयशीलता का होना लज्जा शब्द का अभिप्रेत अर्थ है। वस्तुत जो व्यक्ति उपर्युक्त गुणों से सम्पन्न होता है उसमें स्वभाव की मृदुता और विनयशीलता स्वाभाविक रूप में आ जाती है क्योंकि ये दोनों गुण मनुष्य की श्रेष्ठ संस्कृति (सुन्दर चरित्र) के द्योतक हैं। 

अचापलम् मनुष्य के मन की चंचलता और स्वभाव की अस्थिरता उसकी शारीरिक चेष्टाओं में प्रकट होती है।  जैसे जैसे व्यक्ति का आत्मिक विकास होता जाता है उसका आत्मसंयम ही उसका सौन्दर्य समझा जाता है।  जो उसकी शारीरिक चेष्टाओं के द्वारा स्पष्ट होता है।श्री शंकराचार्य जी इसका अर्थ बताते हैं- 'प्रयोजन के अभाव में हाथ, पैर,   वाणी आदि इन्द्रियों का व्यापार न होना अचापलम् कहलाता है। यह इस शब्द का व्यापक अर्थ है। और इसका आशय यह भी है कि लक्ष्य (आदर्श)  प्राप्ति के लिए उपयोगी कार्य में तत्परता और समस्त शारीरिक शक्तियों की मितव्ययिता होना चाहिए। अनावश्यक चेष्टाएं करना दुर्बल व्यक्तित्व का लक्षण है। ऐसे व्यक्ति कल्पनाओं में ही खोये रहते हैं और मानसिक तथा बौद्धिक स्तर पर अत्यन्त दुर्बल होते हैं। अत अचापलम् नामक गुण के सम्पादन से हम अपने व्यक्तित्व -चरित्र के अनेक प्रकार की सामान्य दोषों का उपचार कर सकते हैं।

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।

भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत।।16.3।।

।।16.3।। हे भारत ! तेज, क्षमा, धैर्य, शौच (शुद्धि), अद्रोह और अतिमान (गर्व) का अभाव ये सब दैवी संपदा को प्राप्त पुरुष के लक्षण हैं।।

 तेज यह तत्त्वदर्शी ऋषि का तेज है। उसकी शुद्धबुद्धि की प्रतिभा नेत्रों में जगमगाता आनन्द, सन्तप्त हृदयों को शीतलता प्रदान करने वाली शान्ति की सुरभि कर्मों में उसका अविचलित सन्तुलन, प्राणिमात्र के प्रति उसके हृदय में स्थित प्रेम का आनन्द और उसके अन्तरतम से प्रकाशित आनन्द का प्रकाश। यह तेज ही उस ऋषि के व्यक्तित्व का प्रबल आकर्षण होता है,  जो प्रचुर शक्ति और उत्साह के साथ सब की सेवा करता है। और उसी में स्वयं को धन्य समझता है।

क्षमा जिस सन्दर्भ में इस गुण का उल्लेख किया गया है उससे इसका अर्थ गाम्भीर्य बढ़ जाता है। सामान्य दुख और कष्ट अपमान और पीड़ा को धैर्यपूर्वक सहन करनै की क्षमता ही क्षमा का सम्पूर्ण अर्थ नहीं है। बाह्य जगत् के अत्यधिक शक्तिशाली विरोध तथा उत्तेजित करने वाली परिस्थितयों के होने पर भी उनका सामना करने का सूक्ष्म कोटि का साहस और अविचलित शान्ति का नाम क्षमा है। 

धृति अर्थात् धैर्य। दादा कहते थे - " वीर हो धीर बनो ! " जब कोई व्यक्ति साहसपूर्वक जीना चाहता है तब वह अपने जीवन में सदैव सुखद वातावरण-अनुकूल परिस्थितयाँ और अपने कार्य में सफलता के सहायक सुअवसरों को प्राप्त करने की अपेक्षा नहीं कर सकता है। सामान्यत एक दुर्बल व्यक्तित्व के पुरुष को अचानक निराशा आकर घेर लेती है और वह कार्य को अपूर्ण ही छोड़कर अपने कार्य क्षेत्र से निवृत्त हो जाता है।  अनेक लोग तो ऐसे समय हतोत्साह होकर कार्य को त्याग देते हैं  जब विजयश्री उन्हें वरमाला पहनाने को तत्पर हो रही होती है। पुनः यह एक आत्मदर्शन युक्त शुद्धबुद्धि में निहित गुप्त शक्ति है ही धृति अर्थात् धैर्य है। श्रद्धा की शक्ति, लक्ष्य 'Be and Make' में आस्था, उद्देश्य (भारत का कल्याण) की एकरूपता,  आदर्श का स्पष्ट दर्शन और त्याग की साहसिक भावना ये सब वे शक्ति श्रोत हैं।  जहाँ से धृति की बूंदें रिसती हुई प्रवाहित होकर श्रम, अवसाद एवं निराशा आदि का परिहार करती रहती हैं। 

शौचम् (शुद्धि) यह शब्द न केवल अन्तकरण के विचारों एवं उद्देश्यों की शुद्धि को इंगित करता है? वरन् इसके द्वारा वातावरण की शुद्धि अपने वस्त्रों की और वस्तुओं की स्वच्छता भी सूचित की गयी है। आन्तरिक शुद्धि पर ही अत्यधिक बल देने के फलस्वरूप हम अपने समाज में बाह्य शुद्धि की सर्वथा उपेक्षा की जाते हुए देखते हैं। वस्त्रों की तथा नगर की स्वच्छता हमारे राष्ट्र में दुर्लभ हो गयी है। यद्यपि हमारे धर्म में साधक के लिए शुद्धि और स्वच्छता इन दोनों को ही अपरिहार्य बताया गया है।  तथापि धर्णप्राण भक्तगण भी इनके प्रति उदासीन ही दिखाई देते हैं।

अद्रोह अहिंसा का अर्थ है किसी को भी पीड़ा न पहुँचाना और अद्रोह का अर्थ है मन में कभी हिंसा का भाव न उठना। जैसे कोई भी व्यक्ति कभी स्वप्न में भी स्वयं को पीड़ित करने का विचार नहीं करता वैसे ही आत्मैकत्व का बोध प्राप्त पुरुष के मन में किसी के प्रति भी द्रोह की भावना नहीं आती क्योंकि अन्य को कष्ट देने का अर्थ स्वयं को ही पीड़ित करना है। 

अतिमानिता–गर्वमुक्त या  प्रतिष्ठा की इच्छा से मुक्त पुरुष के लिए जीवन पक्षी के पंख के समान भारहीन होता है। 

उपर्युक्त छब्बीस/चौबीस गुण दैवीसम्पदा से सम्पन्न व्यक्ति के स्वभाव का पूर्ण चित्रण करते हैं। पूर्णत्व प्राप्ति के सभी इच्छुक साधकों के मार्गदर्शन के रूप में इन गुणों का यहाँ उल्लेख किया गया है।

जिस मात्रा में उपर्युक्त दैवीगुणों के अनुरूप हम अपने जीवन को पुर्नव्यवस्थित करने में सक्षम होते हैं और जीवन की ओर देखने के अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन ला सकते हैं उसी मात्रा में हम अपनी शक्तियों के निष्प्रयोजक व्यय को अवरुद्ध कर उन्हें सुरक्षित रख सकते हैं। इन जीवन मूल्यों का सम्मान करते हुए उन्हें जीने का अर्थ ही सम्यक् जीवन पद्धति को अपनाना है

अब आसुरी सम्पदा का वर्णन करते हैं

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।

अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्।।16.4।।

।।16.4।। हे पार्थ ! दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोर वाणी (पारुष्य) और अज्ञान यह सब आसुरी सम्पदा है।।

श्रीकृष्ण अब आसुरी प्रकृति से युक्त लोगों के छः लक्षणों की व्याख्या करते हैं। वे पाखंडी होते हैं। इसका तात्पर्य है कि वे दूसरों को प्रभावित करने के लिए शुभ लक्षणों से संपन्न न होते हुए भी सदाचरण का प्रदर्शन करते है। यह कृत्रिम (जेकिल एंड हाइड) व्यक्तित्व है जोकि आंतरिक रूप से तो अशुद्ध है किंतु बाहर से शुद्धता की प्रतीति कराता है। 

आसुरी गुण वालों का स्वभाव अहंकार से परिपूर्ण और दूसरों के प्रति अशिष्ट होता है। वे अपनी उपलब्धियों और उपाधियों जैसे धन, शिक्षा, सौन्दर्य, पद-प्रतिष्ठा आदि पर गर्व करते हैं। मन पर नियंत्रण न होने के कारण वे शीघ्र क्रोधित हो जाते हैं। कामवासना और लालच के कारण कुंठाग्रस्त रहते हैं। वे निर्दयी और कठोर होते हैं तथा दूसरों के दुःखों में संवेदनशील नहीं होते। उन्हें आध्यात्मिक सिद्धांतों का ज्ञान नहीं होता और वे अधर्म को धर्म मानते हैं।

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।

मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।।16.5।।

।।16.5।। हे पाण्डव ! दैवी सम्पदा मोक्ष के लिए और आसुरी सम्पदा बन्धन के लिए मानी गयी है, तुम शोक मत करो, क्योंकि तुम दैवी सम्पदा को प्राप्त हुए हो।।

दो प्रकार की प्रकृतियों का वर्णन करने के पश्चात् अब श्रीकृष्ण दोनों के परिणामों को व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि आसुरी गुण मनुष्य को 'संसार' की बेड़ियों में जकड़ लेते हैं जबकि दैवीय गुणों द्वारा बंधनों को काटने में सहायता मिलती है। 

आध्यात्मिक मार्ग पर सफलतापूर्वक चलने के लिए साधक को कई बिन्दुओं पर ध्यान रखना आवश्यक होता है। यहाँ तक कि यदि कोई एक भी आसुरी गुण जैसे अभिमान, पाखंड आदि रह जाता है तो यह असफलता का कारण बन सकता है। 

इसलिए हमें दैवीय गुणों को विकसित करना चाहिए। दैवीय गुणों के बिना हमारी आध्यात्मिक उन्नति पुनः हवा हो सकती है। उदाहरणार्थ धौर्य न होने पर हम विपत्ति आने पर अपना लक्ष्य छोड़ देंगे और क्षमाशीलता के बिना मन विद्वेष से युक्त हो जाएगा। 

तब वह भगवान में तल्लीन नहीं हो पाएगा। 

लेकिन यदि हम दैवीय गुणों से सम्पन्न रहते हैं तब प्रगति के मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं का सामना करने के लिए हम तैयार रहेंगे। इस प्रकार से सद्गुणों को विकसित करना और अवगुणों का उन्मूलन करना आध्यात्मिक विकास का अभिन्न अंग है। 


अपने प्रतिदिन के निजी कार्यकलापों की दैनिकी (डायरी) लिखना एक उपयोगी पद्धति जो हमारी दुर्बलताओं को दूर करने में सहायता करती है। कई सफल लोगों ने अपने संस्मरणों और कार्य-कलापों को डायरी में लिखा ताकि उन्हें सफलता प्राप्त करने में अपेक्षित गुणों को विकसित करने में सहायता मिल सके।

 महात्मा गांधी और बेंजामिन फ्रैंकलिन् दोनों ने अपनी आत्मकथाओं में ऐसा उल्लेख किया है। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि यदि हम अपनी भक्ति को पुष्ट करते हैं तब समय के साथ हम स्वाभाविक रूप से इन दैवीय गुणों को प्राप्त कर लेगें। 

यह सत्य है लेकिन प्रारंभ में ही से भक्ति मार्ग की ओर अग्रसर होते हुए सभी प्रकार के नकारात्मक लक्षणों से मुक्त रहना कठिन है। इनमें से कोई भी अवगुण हमारी प्रगति में बाधा डाल सकता है। 

अधिकांश लोगों के लिए धीरे-धीरे भक्ति भावना को विकसित करना ही उपयोगी होता है जिससे दैवीय गुणों को विकसित करने और आसुरी गुणों का उन्मूलन करने में भी सफलता मिलती है। इसलिए हमें भक्ति के अंग के रूप में श्रीकृष्ण द्वारा इस अध्याय में वर्णित दैवीय गुणों को अपने भीतर विकसित करने के लिए निरन्तर कार्य करना होगा और आसुरी गुणों का त्याग करना होगा।

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च।

दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे श्रृणु।।16.6।।

।।16.6।।इस लोकमें दो तरह के प्राणियों की सृष्टि है -- दैवी और आसुरी। दैवीका तो मैंने विस्तार से वर्णन कर दिया, अब हे पार्थ ! तुम मेरे से आसुरी का विस्तार सुनो।

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।

न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते।।16.7।।

।।16.7।। आसुरी स्वभाव के लोग न प्रवृत्ति को; जानते हैं और न निवृत्ति को उनमें न शुद्धि होती है, न सदाचार और न सत्य ही होता है।।

 निषिद्ध कर्मों से विरति ही निवृत्ति कहलाती है। अकर्तव्य का त्याग ही मनुष्य के लिए श्रेयस्कर होता है। असुर लोगों को कर्तव्य और अकर्तव्य का सर्वथा अज्ञान होता है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि आसुरी गुणों की सूची अज्ञान (अविद्या-अस्मिता,राग,द्वेष,अभिनिवेश,पंचजलेश) से  प्रारम्भ होती है। 'Ignorance of law is no excuse ' कानून की अनभिज्ञता कोई बहाना नहीं है। प्रारब्ध भोग कर ही क्षय करना पड़ता है। लेकिन शिक्षा-व्यवस्था में अज्ञान (अविद्या जनित क्लेश - और विद्या ददाति विनयं।) की कोई शिक्षा नहीं दी जाती है।  यदि कोई व्यक्ति अज्ञानवशात् किसी प्रकार का अपराध करता है तो समाज के सहृदय पुरुषों के मन में उसके प्रति क्षमा का भाव सहज उदित होता है; भले ही न्यायालय में उसे क्षमा के योग्य कारण न माना जाये। 

 यहाँ प्रवृत्ति और निवृत्ति के शब्द क्रमश कर्तव्य कर्म और अकर्तव्य अर्थात् निषिद्ध कर्म हैं। धार्मिक अनुष्ठानकर्ता कर्तव्य पालन और निस्वार्थ समाज सेवा -'Be and Make'  के द्वारा न केवल तात्कालिक लाभ को प्राप्त करता है अपितु अन्तकरण की शुद्धि भी प्राप्त करता है; क्योंकि वह कभी मनुष्य जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य (आत्मज्ञान) को विस्मृत नहीं होने देता।

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।

अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्।।16.8।।

।।16.8।। वे कहते हैं कि यह जगत् आश्रयरहित, असत्य और ईश्वर रहित है, यह (स्त्रीपुरुष के) परस्पर कामुक संबंध से ही उत्पन्न हुआ है, और (इसका कारण) क्या हो सकता है? 

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।

प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः।।16.9।।

।।16.9।।उपर्युक्त (नास्तिक) दृष्टिका आश्रय लेनेवाले जो मनुष्य अपने नित्य स्वरूपको नहीं मानते, जिनकी बुद्धि तुच्छ है, जो उग्रकर्मा और संसारके शत्रु हैं, उन मनुष्यों की सामर्थ्य का उपयोग जगत का नाश करनेके लिये ही होता है।

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।

मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः।।16.10।।

।।16.10।। दम्भ, मान और मद से युक्त कभी न पूर्ण होने वाली कामनाओं का आश्रय लिये, मोहवश मिथ्या धारणाओं को ग्रहण करके ये अशुद्ध संकल्पों के लोग जगत् में कार्य करते हैं।।

कामनाओं की तृप्ति के लिए ही जीवन धारण करना अविवेक का लक्षण है क्योंकि  कामना कभी तृप्त  नहीं होती। जैसेजैसे हम उसे तृप्त करते जाते हैं वैसेवैसे ही वह द्विगुणित होती जाती है। जो पुरुष अपने अनन्त स्वरूप को न जानकर स्वयं को परिच्छिन्न जीव ही समझता है केवल उसे ही विषयों की कामना हो सकती है। इसे ही मोह कहते हैं। 

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।

कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता:।।16.11।।

।।16.11।। मरणपर्यन्त रहने वाली अपरिमित चिन्ताओं से ग्रस्त और विषयोपभोग को ही परम लक्ष्य मानने वाले ये आसुरी लोग इस निश्चित मत के होते हैं कि "इतना ही (सत्य, आनन्द) है"।।

आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।

ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्।।16.12।।

।।16.12।। सैकड़ों आशापाशों से बन्धे हुये, काम और क्रोध के वश में ये लोग विषयभोगों की पूर्ति के लिये अन्यायपूर्वक धन का संग्रह करने के लिये चेष्टा करते हैं।।

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।

इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।।16.13।।

।।16.13।। मैंने आज यह पाया है और इस मनोरथ को भी प्राप्त करूंगा, मेरे पास यह इतना धन है और इससे भी अधिक धन भविष्य में होगा।।

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।

ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी।।16.14।।

।।16.14।। "यह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया है और दूसरे शत्रुओं को भी मैं मारूंगा", "मैं ईश्वर हूँ और भोगी हूँ", "मैं सिद्ध पुरुष हूँ", "मैं बलवान और सुखी हूँ",।।

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।

यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः।।16.15।।

।।16.15।। "मैं धनवान् और श्रेष्ठकुल में जन्मा हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है?",'मैं यज्ञ करूंगा', 'मैं दान दूँगा', 'मैं मौज करूँगा' - इस प्रकार के अज्ञान से वे मोहित होते हैं।।

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।

प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ।।16.16।।

।।16.16।। अनेक प्रकार से भ्रमित चित्त वाले, मोह जाल में फँसे तथा विषयभोगों में आसक्त ये लोग घोर, अपवित्र नरक में गिरते हैं।।

आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।

यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्।।16.17।।

।।16.17।। अपने आप को ही श्रेष्ठ मानने वाले, स्तब्ध (गर्वयुक्त), धन और मान के मद से युक्त लोग शास्त्रविधि से रहित केवल नाममात्र के यज्ञों द्वारा दम्भपूर्वक यजन करते हैं।।

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।

मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः।।16.18।।

।।16.18।। अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोध के वशीभूत हुए परनिन्दा करने वाले ये लोग अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ (परमात्मा) से द्वेष करने वाले होते हैं।।

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।

क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।।16.19।।

।।16.19।। ऐसे उन द्वेष करने वाले,  क्रूरकर्मी और नराधमों को मैं संसार में बारम्बार (अजस्रम्) आसुरी योनियों में ही गिराता हूँ अर्थात् उत्पन्न करता हूँ।।

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।

मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्।।16.20।।

।।16.20।। हे कौन्तेय ! वे मूढ़ पुरुष जन्मजन्मान्तर में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं और ( इस प्रकार) मुझे प्राप्त न होकर अधम गति को प्राप्त होते है।।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।।16.21।।

।।16.21।। काम, क्रोध और लोभ ये आत्मनाश के त्रिविध द्वार हैं, इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।।

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्।।16.23।।

।।16.23।। जो पुरुष शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी कामना से प्रेरित होकर ही कार्य करता है, वह न पूर्णत्व की सिद्धि प्राप्त करता है, न सुख और न परा गति।।

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।

ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।।16.24।।

।।16.24।। इसलिए तुम्हारे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था (निर्णय) में शास्त्र ही प्रमाण है शास्त्रोक्त विधान को जानकर तुम्हें अपने कर्म करने चाहिए।।

 पूर्व के तीन श्लोकों में दी गई युक्तियों का यह निष्कर्ष निकलता है कि साधक को शास्त्र प्रमाण के अनुसार अपनी जीवन पद्धति अपनानी चाहिए। कर्तव्य और अकर्तव्य का निश्चय शास्त्राध्ययन के द्वारा ही हो सकता है। सत्य की प्राप्ति के मार्ग को निश्चित करने में प्रत्येक साधक अपनी ही कल्पनाओं का आश्रय नहीं ले सकता । शास्त्रों की घोषणा उन ऋषियों ने की है जिन्होंने इस मार्ग के द्वारा पूर्णत्व का साक्षात्कार किया था। अत जब उन ऋषियों ने हमें उस मार्ग का मानचित्र दिया है तो हमारे लिए यही उचित है कि विनयभाव से उसका अनुसरण कर स्वयं को कृतार्थ करें। '

ज्ञात्वा इसलिए परम सत्य या आत्मदेव की तीर्थयात्रा प्रारम्भ करने के पूर्व हमें इन शास्त्रों का बुद्धिमत्तापूर्वक अध्ययन करना चाहिए। लक्ष्य, मार्ग, विघ्न और विघ्न के निराकरण के उपायों का जानना किसी भी यात्रा के लिए अत्यावश्यक और लाभदायक होता है।

तुम्हें कर्म करना चाहिए अनेक लोग शास्त्र को जानते हैं परन्तु ऐसे अत्यन्त विरले लोग ही होते हैं जिनमें शास्त्रोपदिष्ट जीवन जीने का साहस दृढ़ संकल्प और आत्मानुभूति के लक्ष्य की प्राप्ति होने तक धैर्य बना रहता है। इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण का यह उपदेश है कि काम क्रोध और लोभ का त्याग कर मनुष्य को शास्त्रानुसार जीवन यापन करना चाहिए। यही कर्मयोग का जीवन है

तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसंपद्विभागयोगो नाम षोढशोऽध्याय।।

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 प्रातः बेलुड़ मठ से गंगा दर्शन  क्षणिक भ्रमण! वाह! कहां कहां गये? प्रभु! भारत को बचा लो!भारत मर जायेगा तो विश्व मर जायेगा। भारत में गीता पढ़ने और पढ़ाने में समर्थ कम से कम एक लाख युवा पैदा करो!तुरंत करो! मुझे मुक्ति नहीं चाहिये। अगला जन्म शीघ्र दो ताकि बचपन से ही दादा के प्रशिक्षण मे विवेक - जागृत रखने का प्रशिक्षण प्राप्त करके बचपन से ही मनुष्य बनने और बनाने के आन्दोलन में जुट जाऊँ। बहुत देर हो रही है। गीता की शिक्षा फैला दो प्रभु!तुम्हारे श्री चरणों मे मेरी यही एकमात्र प्रार्थना है!प्रिय भाई उपेन्द्र, तुम इस समय कहां हो? तुम्हारे यहाँ तो ईरान वार का कोई असर तो नहीं हुआ? मैंने आज दयानन्द से भी बात किया था। उससे मालूम हुआ कि Janibigha से भी 5-6 लड़के विवेक वाहिनी कैम्प में गये है। Phulvriya से भी गये हैं। प्रमोद दा के बिना हिन्दी क्षेत्र में महामंडल का काम करना संभव नहीं है।  तब मैंने प्रमोद दा से भी बात किया। Chapra Mahamandal के पास एक email बंगला में गया था। उससे कुछ गलतफहमी हो गयी थी। प्रम दा से बात करके सब गलतफहमी दूर हो गयी है। वास्तव में " मनुष्य " बन जाना दुनिया का सबसे कठिन कार्य है।  पर इस Be and Make ' आन्दोलन  से जुड़े रहना ही एकमात्र उपाय है। इसलिए नवनी दा बोलते थे- विद्या dadati vinyam - ज्ञान से विनम्रता आती है, इसलिए आज मैं प्रमोद दा से Ranen दा आदि सभी विषय गलतफहमी को दूर कर लिया ।और आगे से उन्होंने भी मिलजुलकर काम करने का निर्णय लिया है। तुम भी उनसे कभी प्रेम पूर्वक बात कर लेना। तुम्हारा- विजय

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