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गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

"अद्वैत ही रामकृष्ण मिशन और रामकृष्ण मठ की मूल विचारधारा है !" ["Advaita is the core ideology of the Ramakrishna Mission and the Ramakrishna Math!"-[AI (Advaitic Intelligence) vs. AI (Artificial Intelligence)]

"अद्वैत ही रामकृष्ण मिशन और रामकृष्ण मठ की मूल विचारधारा है !"

ॐ स्थापकाय च धर्मस्य, सर्वधर्म स्वरुपणे। 

अवतारवरिष्ठाय रामकृष्णये ते नमः।।

ॐ यथाग्नेर्दाहिका शक्ती रामकृष्णे स्थिता हि या ।

सर्वविद्या स्वरूपा तां सारदां प्रणमाम्यहम् ॥

ॐ नमः श्री यतिराजाय विवेकानन्द सूरये।

सच्चित् सुख स्वरूपाय स्वामिने तापहारिणे॥ 


" This Advaita was never allowed to come to the people. At first some monks got hold of it and took it to the forests, and so it came to be called the "Forest Philosophy". By the mercy of the Lord, the Buddha came and preached it to the masses, and the whole nation became Buddhists. Long after that, when atheists and agnostics had destroyed the nation again, it was found out that Advaita was the only way to save India from materialism. Thus has Advaita twice saved India from materialism !

-Swami Vivekananda : (The Absolute and Manifestation/ Volume-2/Jnana-Yoga/page -138)  

"अद्वैतवाद का प्रचार साधारण लोगों में कभी होने नहीं दिया गया संन्यासी लोग ही अरण्य (जंगलों) में उसकी साधना करते थे , इसी कारण वेदान्त का एक नाम 'आरण्यक' ("Forest Philosophy") भी हो गया अन्त में भगवान की कृपा से बुद्धदेव ने आकर जब सर्वसाधारण के बीच इसका प्रचार किया , तब सारा देश बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गया। फिर बहुत समय बाद नास्तिकों (atheists-ईश्वर को न मानने वाले) और अज्ञेयवादियों (agnostics) ने जब सारे देश को ध्वंश करने की चेष्टा की, तब उस भौतिकवाद से भारत की रक्षा करने में पुनः एक बार अद्वैत-वाद ही एकमात्र उपाय सिद्ध हुआ। इस प्रकार 'अद्वैत' ने  दो बार भौतिकवाद से भारत की रक्षा की है !स्वामी विवेकानन्द  ('ब्रह्म एवं जगत' : वि ० सा० /खंड-२./पृष्ठ- ९३)

[ॐ यथाग्नेर्दाहिका शक्ती रामकृष्णे स्थिता हि या ।

सर्वविद्या स्वरूपां तां शारदां प्रणमाम्यहम् ॥

यह मंत्र श्री शारदा देवी (माँ सारदा) की वंदना और ध्यान के लिए उपयोग किया जाता है, जिन्हें रामकृष्ण मिशन में रामकृष्ण परमहंस की शक्ति (सर्वविद्या स्वरूपा) माना जाता है।

[अर्थ: 'यथाग्नेर्दाहिका शक्ती:' =  जिस प्रकार अग्नि में दाहिका शक्ति (जलाने की शक्ति) निहित है, 'रामकृष्णे स्थिता हि या:' उसी प्रकार जो (शक्ति) श्रीरामकृष्ण में स्थित थी,'सर्वविद्या स्वरूपां:' जो सर्वविद्या (ज्ञान) मूर्ति  (रूप) में हैं, 'तां शारदां प्रणमाम्यहम्:' उन माँ सारदा को मैं प्रणाम करता हूँ। 

यह स्तोत्र इस बात को रेखांकित करता है कि श्री माँ सारदा रामकृष्ण परमहंस की ऊर्जा और ज्ञान का ही रूप हैं। 

[रामकृष्ण मिशन सारदापीठ !Ramakrishna Mission Saradapitha] 

गुरुवार -23 अप्रैल, 2026 तदनुसार, गंगा सप्तमी , कमला सप्तमी (लक्ष्मी जी का एक रूप)-बाबू कुँवर सिंह , तेगवा बहादुर की जयन्ती (जन्मोत्सव)।  

गंगा सप्तमी और कमला सप्तमी 2026 में 23 अप्रैल (गुरुवार) को मनाई जा रही है। 'वैशाख शुक्ल सप्तमी' को गंगाजी का धरती पर पुन: अवतरण (जाह्नवी सप्तमी) माना जाता है, इसलिए इसे गंगा जयंती भी कहते हैं। इस दिन गंगा स्नान, दीपदान और पूजा से पापों से मुक्ति, मोक्ष और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। 

बाबू कुंवर सिंह (1777–1858) 1857 की भारतीय क्रांति के महान योद्धा और बिहार के जगदीशपुर (आरा) के जमींदार थे। 80 वर्ष की आयु में उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अद्भुत वीरता दिखाई, जिसके कारण उन्हें 'तेगवा बहादुर' (तलवार का धनी) कहा गया। उन्होंने गुरिल्ला युद्धनीति से अंग्रेजों को कई बार हराया और घायल अवस्था में अपना हाथ काटकर माँ गंगा को समर्पित कर दिया। लोक गीतों में इन्हें "बाबू कुंवर सिंह 'तेगवा बहादुर', बंगला में उड़ेला अबीर" के रूप में याद किया जाता है, जो उनके वीर रस के चरित्र को दर्शाता है।

[AI  (Advaitic Intelligence- 'अद्वैत बुद्धि ')  

बनाम/ vs. 

AI (Artificial Intelligence- ' कृत्रिम बुद्धि ']

'समाधि' कविता 

सूर्य भी नहीं है, ज्योति -सुन्दर शशांक नहीं,

छाया सा व्योम में यह विश्व नजर आता है। 

मनोआकाश अस्फुट , भासमान विश्व वहाँ #,

(अवाङ्मनसगोचरं # जहाँ  'विवेक-दर्शन के अभ्यास से'

 विवेक -स्रोत उद्घाटित हो जाता है। वहाँ ......) 

अहंकार -स्रोत ही में तिरता डूब जाता है। 

धीरे धीरे छायादल  लय में समाया जब, 

धारा निज अहंकार मन्दगति बहाता है।

बन्द वह धारा हुई , शून्य में है शून्य ,

अवाङ्मनसगोचरं...वह जाने जो ज्ञाता है

[ अवाङ्मनसगोचरं...अवांग मनस गोचरम' (Avan-Manasa-Gocaram) का अर्थ है- जो वाणी (शब्दों) और मन (कल्पना) की पहुँच से परे है। यह वैदिक भाषा (संस्कृत) में भगवान, परब्रह्म या परम सत्य का वर्णन करने वाला वाक्यांश है। 

अवांग मनस गोचरम' (Avan-Manasa-Gocaram) का अर्थ है- जो वाणी (शब्दों) और मन (कल्पना) की पहुँच से परे है। पूरा श्लोक कहाँ से लिया गया है ?

यह वैदिक भाषा - 'संस्कृत ' में भगवान, परब्रह्म या परम सत्य का वर्णन करने वाला वाक्यांश है।इस वाक्यांश और आपके प्रश्न के संदर्भ में मुख्य बातें यहाँ दी गई हैं:

अर्थ: 'अवांग' (अ+वाणी - शब्दों से परे), 'मनस' (मन/बुद्धि से परे), 'गोचर' (इंद्रियों का विषय/पहुँच)। अर्थात, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता और न ही मन के द्वारा सोचा जा सकता है।

ज्ञाता का अनुभव: इसे केवल वह जान सकता है जो 'ज्ञाता' है (अर्थात योगी, साधक या ब्रह्मज्ञानी), जो अपनी आत्मा (शुद्धबुद्धि) के द्वारा ही उस परम सत्ता को अनुभव करता है।

शून्य की अवस्था: यह सहस्रार की साधना का परिणाम है, जहाँ योगी का अहंकार मिट जाता है और वह परम शून्य (परमात्मा) में विलीन हो जाता है।

अनुभवजन्य ज्ञान: चूँकि यह वाणी और मन से परे है, इसलिए इसे शब्दों में समझाना असंभव है, इसे केवल अनुभव (अनुभूति) से जाना जा सकता है। यह आत्मविकास (self development)  की अंतिम अवस्था है, जहाँ निर्वाण या 'महाज्योति' में विलीन होने का बोध होता है। 

संक्षेप में, जो शब्दों और मन की सीमा से परे का सत्य है, उसे ज्ञानी पुरुष अपनी आत्मा के अनुभव से जानते हैं।

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् । 

तत्पदं दर्शितं येन  तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १॥

                  अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया । 

                  चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ २॥

गुरुर्ब्रह्मा      गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो     महेश्वरः । 

गुरुरेव  परं  ब्रह्म  तस्मै  श्रीगुरवे  नमः ॥ ३॥

                स्थावरं जङ्गमं व्याप्तं यत्किञ्चित्सचराचरम् । 

                तत्पदं दर्शितं येन   तस्मै  श्रीगुरवे  नमः ॥ ४॥

चिन्मयं व्यापि यत्सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् । 

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ५॥

                सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजितपदाम्बुजः       । 

                वेदान्ताम्बुजसूर्यो यस्तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ६॥

चैतन्यश्शाश्वतश्शान्तो व्योमातीतो निरञ्जनः । 

बिन्दुनादकलातीतः तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ७॥

                ज्ञानशक्तिसमारूढः तत्त्वमालाविभूषितः । 

              भुक्तिमुक्तिप्रदाता च तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ८॥

अनेकजन्मसम्प्राप्तकर्मबन्धविदाहिने । 

आत्मज्ञानप्रदानेन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ९॥

            शोषणं  भवसिन्धोश्च   ज्ञापनं   सारसम्पदः । 

            गुरोः पादोदकं सम्यक् तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १०॥

न   गुरोरधिकं   तत्त्वं   न   गुरोरधिकं   तपः । 

तत्त्वज्ञानात् परं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ११॥

           मन्नाथः  श्रीजगन्नाथो  मद्गुरुः श्रीजगद्गुरुः । 

           मदात्मा सर्वभूतात्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १२॥

गुरुरादिरनादिश्च    गुरुः   परमदैवतम् । 

गुरोः परतरं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १३॥

          ध्यानमूलं गुरोर्मूर्ति:  पूजामूलं गुरो: पदम् |

          मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरो: कृपा ||१४ ||

इस वाक्यांश और आपके प्रश्न के संदर्भ में मुख्य बातें यहाँ दी गई हैं:

अर्थ: 'अवांग' (अ+वाणी - शब्दों से परे), 'मनस' (मन/बुद्धि से परे), 'गोचर' (इंद्रियों का विषय/पहुँच)। अर्थात, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता और न ही मन के द्वारा सोचा जा सकता है।

ज्ञाता का अनुभव: इसे केवल वह जान सकता है जो 'ज्ञाता' है (अर्थात -मूढ़ बुद्धि नहीं, शुद्धबुद्धि-योगी, साधक या ब्रह्मज्ञानी), जो अपनी आत्मा के द्वारा ही उस परम सत्ता को अनुभव करता है। ['आत्मैव इदं सर्वं ' -'ब्रह्मैव इदं सर्वं। 

शून्य की अवस्था: यह सहस्रार की साधना का परिणाम है, जहाँ योगी का अहंकार मिट जाता है और वह परम शून्य (परमात्मा) में विलीन हो जाता है।

अनुभवजन्य ज्ञान: चूँकि यह वाणी और मन से परे है, इसलिए इसे शब्दों में समझाना असंभव है, इसे केवल अनुभव (अनुभूति) से जाना जा सकता है। यह (5 अभ्यास के द्वारा 3H विकास विकास) की अंतिम अवस्था है, जहाँ निर्वाण या 'महाज्योति' में विलीन होने का बोध होता है। 

संक्षेप में, जो शब्दों और मन की सीमा से परे का 'सत्य' [इन्द्रियातीत सत्य या ईश्वर, भगवान या आत्मा (इष्टदेव)] है, उन्हें ज्ञानी पुरुष अपनी आत्मा के अनुभव से जानते हैं। इसीलिये। ......

ज्ञान हुआ… फिर भी टिक क्यों नहीं रहा ? #paramvani / जो हमेशा है, उसे कैसे टिकाओगे ? 

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥

 (कठोपनिषद:- अध्याय :1 ,वल्ली: 3, मंत्र : 14)   

उठो, जागो, वरिष्ठ पुरुषों को पाकर उनसे बोध प्राप्त करो। छुरी की तीक्ष्णा धार पर चलकर उसे पार करने के समान दुर्गम है यह पथ-ऐसा ऋषिगण कहते हैं।

योद्धा सन्यासी स्वामी विवेकानंद का सारा जीवन सार इस एक श्लोक और उसके अर्थ में निहित है! भारत विश्व में सबसे ज्यादा युवाओं वाला देश है ! हमारे देश के युवा तेजस्वी बनें शक्तिशाली बने समर्थ बनें संकल्प वान बन संकल्प की सिद्धि प्राप्त करें और इस दिशा में प्रयत्नों प्रयासों में कोई कमी ना रखें !! 

('युवा दिवस' पर -बस इतना ही कहना है !!) जय मां भारती !  जय श्रीराम ! जय श्रीकृष्ण ! जय श्रीरामकृष्ण परमहंस, जय माँ श्री सारदा देवी,  स्वामी विवेकानन्द महाराज जी की जय !! 

🙏🏻🙏🏻🙏🏻 

शुक्रवार , 24 अप्रैल , 2026 : 

1. प्रार्थना, 2. मनःसंयोग , 3.पौष्टिक आहार , 4.व्यायाम, 5. स्वाध्याय :आत्म-मूल्यांकन- तालिका में स्वयं के चारित्रिक गुणों के विकास में विवेक-प्रयोग का मानांक स्वयं भरना।    

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