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बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

⚜️️🔱जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति क्या है ? ।। Yug-Purush ।। What is Jeevan Mukti and Videha Mukti ?⚜️️🔱

 "चींटी के पग नूपुर बाजे सो भी साहब सुनता है।" 


जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति क्या है ? 

[।। Yug-Purush ।। What is Jeevan Mukti and Videha Mukti ?] 

जीतेजी मुक्ति या भगवत-पाप्ति कोई ऐसी चीज नहीं है , जो किसी परलोक में पहुँचने से मिलती है। मुक्ति तो जब होगी इसी जीवन में होगी। जब कभी हो , मरने के बाद नहीं जीवित रहते ही मुक्ति होती है। मुक्ति के लिए दो शब्द है, एक शब्द है जीवनमुक्ति - ('निश्चल तत्त्वे जीवनमुक्ति)।' और दूसरा शब्द है विदेहमुक्ति। अर्थात देह का न रहना। विदेहमुक्ति का अर्थ है जीतेजी जो मुक्त है , उसका देह न रहना। जीवनमुक्त है उसका देह छूटना अभी बाकी है। मानसिक तौर से तो वो मुक्त हो गया, पर शरीर का अभी जेल से बाहर आना बाकी है। जैसे जेल में बन्द कैदी कोर्ट से छूट गया , पर अभी जेल के भीतर ही है। मानसिक तौर से तो वो मुक्त हो गया पर शरीर और व्यक्ति का जेल से बाहर आना बाकी है। शरीर के रहते हुए जो ज्ञान को उपलब्ध हो गए वो मुक्त हो गए। अब रह गया उसके शरीर का छूटना। इसी तरह शरीर , इन्द्रिय , मन, बुद्धि के रहते हुए जो आत्मज्ञानी हो गया , गुणातीत हो गया वो मुक्त हो गया पर   
जीवनमुक्त होकर भी अभी शरीर में रहना पड़ेगा। ज्ञान होने के बाद एक ही दिन में नहीं जाने वाला है , ये शरीर। इसमें अभी 10 वर्ष , 50 वर्ष रहना है। जीवन्मुक्त को शरीर में अभी रहना पड़ेगा। जो कोई भी ज्ञानी जन (महापुरुष) मुक्त हुए , महर्षि रमण , अरविन्द , रामतीर्थ, आदिगुरु शंकराचार्यजी जैसे जितने भी ज्ञानी हो गए हैं , वे सभी जीवनमुक्त हैं , पर अभी शरीर में रहना पड़ेगा। शरीर में रहने से कुछ कष्ट तो होंगे। यदि आपका जो वास्तविक मैं है (Real I -आत्मा) है वो ब्रह्म के साथ चला गया , हो आया। पर अब वह फिर देह में आएगा - दुकान जायेगा। लेकिन अब आपको गुरुमंत्र लेने की जरूरत नहीं रहेगी। उसी तरह कोई ज्ञानी एक बार ब्रह्मता को प्राप्त हो गया , तो बस होगया। अब रास्ता (इष्टदेव का नाम) दिखाने वाला नहीं चाहिए। देह में आएगा , देह में रहेगा , फिर वापस जायेगा। पर एक दिन देह ही नहीं रहेगा। अभी तो देह में आएगा , लौट जायेगा अपने घर ? परमात्मा से जुड़ता रहेगा , पर एक दिन देह ही नहीं रहेगा। पर जब तक देह है , नींद से या ध्यान (समाधि?) से वापस आना पड़ता है, इन आँखों में इन हाथों में। यदि देह न रहे तो स्वप्न भी नहीं देख सकते। लेकिन जब शरीर ही न रहेगा मृत्यु के बाद तब उसको इस शरीर में आने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन जो आमलोग हैं - जो जीवनमुक्त नहीं हुए हैं , वे फिर नया शरीर प्राप्त करेंगे। अभी उनके कर्म भोग हैं , उसे भोगने पड़ेंगे। मृत्यु के बाद एक लौटता है , एक नहीं लौटता। जो  देह नहीं रहने के बाद, देह में नहीं लौटते वे विदेह मुक्त हो गए। (10:41) जो आते हैं , वो मुक्त नहीं हैं वासना वाले हैं। एक का आना  और एक का दुबारा देह में न आना वो निर्भर है , अभी की हमारी सोच पर। जिसमें वासना है , भोगने के लिए आना चाहता है , तो आ जायेगा। सभी लोग मुक्ति भी नहीं चाहते हैं, क्योंकि वे बंधन में हैं -इसका उन्हें बोध ही नहीं है। असल में हमारे अन्तःकरण में तीन गुण-सतोगुण , रजोगुण , तमोगुण हैं , जो शरीर रहने तक काम करते हैं। शरीर में रहने तक सोना और जागना होता रहेगा। शरीर रहने तक आपको इन गुणों के अधीन रहना पड़ेगा। बूढ़ा होना नहीं चाहते हो , पर बूढ़ा होना प्रकृति का नियम है , तुम्हारी इच्छा से क्या होगा ? शरीर ही न रहेगा तो बूढ़े भी नहीं होंगे। मानलो अगला जन्म ही न होगा तो बूढ़े कैसे होंगे ? तो ये अध्यात्म और सत्संग (गुरु- शिष्य) भी एक Science है - एक विज्ञान है। पर इस विज्ञान को यदि उपलब्ध नहीं कर सकते हो ,  तो दूसरा सिद्धांत है -  कर्म का सिद्धान्त है -जो करोगे सो भरोगे। बुद्धि/ मति या दृष्टि में जैसी इच्छा, वासना वाले और कर्म वाले होंगे, वैसी गति होगी - वैसी अगली यात्रा होगी। 
    इसलिए आम आदमी अगर विज्ञान (अतीन्द्रिय ज्ञान) न प्राप्त कर सकें , तो अच्छे कर्म करें। धर्म पूर्वक चलें। नहीं तो ज्ञान के बाद भी प्रारब्ध भोग कर ही नष्ट होता हैं। हमारी वासना अच्छी होगी तो अगला जन्म अच्छा होगा। अगला जन्म इस जन्म के सद्कर्मों पर निर्भर है। बुरे काम छोड़ना चाहिए, नहीं तो उसका फल भोगना पड़ेगा। इस जन्म में जिन संकटों का सामना करना पड़ा , वो क्यों करना पड़ा ? ये तुम्हारे ही किसी कर्म के फल हैं। सुख और दुःख देने वाला कोई दूसरा नहीं है। मेरे ही कर्मों के फल हैं। इसलिए आज से कर्मों के प्रति सावधान हैं , तो आगे ठीक होगा। भविष्य को अगर ठीक करना है , तो आज को ठीक करना होगा।  हमारा जो आज का जीवन है वो हमारा निर्माण किया हुआ है। जिसके बीज हमने पहले बोये थे , वो आज काट रहे हैं।इसलिए आगे हमेशा पवित्र कर्म ही करो , इसके लिए सावधान रहना होगा। (18:24) जप-ध्यान या सद्कर्म (Be and Make) मुक्ति के लिए नहीं करें , तो अगले जन्म के लिए करें। और मुक्ति के लिए तो कर्म की बात है ही नहीं।
 
न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।

बहुत कर्मों से , बहुत सन्तानों से मोक्ष नहीं होता। बल्कि मुक्ति केवल आत्मज्ञान से होती है। (मिथ्या मैं के त्याग से होती है।) भोग ही अगर चाहिए तो अच्छे कर्म करो। कई लोगों को इस जन्म में मिला हुआ है , पहले जन्म में अच्छा किया होगा। इस जन्म में सुख-सुविधा मिली है तो पहले जन्म में अच्छा किया होगा। (22:39)    
 हर व्यक्ति को पहले कर्म करने में धर्मात्मा होना चाहिए। अच्छा है दुःख -अपमान मिला तो जो प्रारब्ध था वो कट गया। एक गलत काम से यदि दुःख हुआ तो हमको प्रेरणा मिली कि आगे से कोई गलत काम नहीं करूँगा। जिसका बछड़ा उसी गाय की तरफ जाता है। पुराना किया हुआ कर्मफल आत्मज्ञानी को भी भोगना पड़ेगा। (26:08) ज्ञान इसलिए प्राप्त नहीं करते कि हमें माफ़ किया जाए , बल्कि इसीलिए कि हमें अगला जन्म -हो तो पिवत्र-त्रयी के साथ ही हो। जीव का जन्म प्रारब्ध भोगने के लिए होता है , अवतार वरिष्ठ या पवित्र -त्रयी का जन्म लोकहित के लिए होता है। या नेता को कथा सुनाने का काम मिलता है। शरीर का जो होना है , होगा। हमें जो करना चाहिए वो पवित्र कर्म करते चलो। परिवार जैसा मिला है , वो मिला है। कर्म से मिला है। अच्छे कर्म करो या ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके आवागमन से मुक्त हो जाओ। इसलिए हम फिर लेना पसंद ही न करें। हम ही परमात्मा में समा जाएँ -ब्रह्मलीन हो जाएँ। पवित्र -त्रयी से अलग मेरा फिर कभी कोई अस्तित्व ही न हो। (32:21) श्रद्धा के साथ जप करें। तो इसका परिणाम भी अच्छा आएगा। पवित्र त्रयी के सिवा कुछ न चाहो। जो होना है होगा -सब छोड़ दिया भगवान पर। प्रकृति पर छोड़ दिया , परमात्मा पर छोड़ दिया , ग्रहों पर छोड़ दिया, प्रारब्ध पर छोड़ दिया। जो होना है हो जायेगा , फिर तुम्हें क्या करना है ? जप यज्ञ करते रहो। जपात सिद्धिः - जप से सिद्धि प्राप्त होगी। प्रभु का स्मरण , जब तक शरीर है हमें श्रद्धा पूर्वक स्वामीजी का काम करना है Be and Make में लगे रहना है।
   दो तरह के भगवान - एक जो भक्त को दीखते हैं , दूसरे जो भक्त को देखते हैं। भगवान तुम्हें इस समय देख रहे हैं। (37:28) भगवान तुम्हारे जप के साक्षी हैं। गवाही हैं। वो तुम्हें देख रहे हैं , तुम्हें नहीं दिख रहे हैं।  "चींटी के पग नूपुर बाजे सो भी साहब सुनता है।" साहेब से कुछ छिपा नहीं है। जो जाप को देख रहा है , उस परमात्मा में तुम लीन हो जाओ। जो सदा निराकार , निर्विकार हमारे मन का सदा साक्षी है ,सदा अन्तर्यामी है वो हमारे मन में ही है।  
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सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

⚜️️🔱श्रीमद् भगवद्गीता : अध्याय-1. अर्जुन विषाद योग : युद्ध के परिणाम पर शोक प्रकट करना⚜️️🔱

अध्याय - 1.

अर्जुन विषाद योग 

 [युद्ध के परिणाम पर शोक प्रकट करना] 

भगवद्गीता का उपदेश एक ही वंश के दो चचेरे भाइयों कौरव और पाण्डवों के मध्य हुए महाभारत युद्ध की रणभूमि पर दिया गया है। 

भगवद्गीता का प्रारंभ राजा धृतराष्ट्र और उसके मंत्री संजय के वार्तालाप से होता है। चूंकि धृतराष्ट्र नेत्रहीन था इसलिए वह व्यक्तिगत रूप से युद्ध में उपस्थित नहीं हो सका। अत: संजय उसे युद्धभूमि पर घट रही घटनाओं का पूर्ण सजीव विवरण सुना रहा था। संजय महाभारत के प्रख्यात रचयिता वेदव्यास के शिष्य थे। ऋषि वेदव्यास अपनी अलौकिक शक्ति के द्वारा सुदूर प्रदेशों में घट रही घटनाओं को प्रत्यक्ष रूप से देखने में समर्थ थे। अपने गुरु की अनुकंपा से संजय ने भी दूरदृष्टि की दिव्य चमत्कारिक शक्ति प्राप्त की थी। इस प्रकार से वह युद्ध भूमि में घटित सभी घटनाओं को दूर से देख सका।

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 February 1, 2026 :

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।।1.1।।

धृतराष्ट्र ने कहाः हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर युद्ध करने की इच्छा से एकत्रित होने के पश्चात्, मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?

।।1.2।। संजय ने कहा -- पाण्डव-सैन्य की व्यूह रचना देखकर राजा दुर्योधन ने आचार्य द्रोण के पास जाकर ये वचन कहे।

।।1.3।। दुर्योधन ने कहाः पूज्य आचार्य! पाण्डु पुत्रों की विशाल सेना का अवलोकन करें, जिसे आपके द्वारा प्रशिक्षित बुद्धिमान शिष्य द्रुपद के पुत्र (धृष्टद्द्युम्न) ने कुशलतापूर्वक युद्ध करने के लिए सुव्यवस्थित किया है
अध्याय 1.(4.5.6यहाँ इस सेना में भीम और अर्जुन के समान बलशाली युद्ध करने वाले महारथी युयुधान, विराट और द्रुपद जैसे अनेक शूरवीर धनुर्धर हैं। यहाँ पर इनके साथ धृष्टकेतु, चेकितान काशी के पराक्रमी राजा काशिराज, पुरूजित, कुन्तीभोज और शैव्य सभी महान सेना नायक हैं। इनकी सेना में पराक्रमी युधामन्यु, शूरवीर, उत्तमौजा, सुभद्रा और द्रौपदी के पुत्र भी हैं जो सभी निश्चय ही महाशक्तिशाली योद्धा हैं।
।।1.7।। हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! हमारे पक्ष की और के उन सेना नायकों के संबंध में भी सुनिए, जो सेना को संचालित करने में विशेष रूप से निपुण हैं। अब मैं आपके समक्ष उनका वर्णन करता हूँ।
।।1.8।। इस सेना में सदा विजयी रहने वाले आप तथा भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण तथा सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा आदि महा पराक्रमी योद्धा हैं जो युद्ध में सदा विजेता रहे हैं।
।।1.9।। यहाँ हमारे पक्ष में अन्य अनेक महायोद्धा ऐसे भी हैं जो मेरे लिए अपने जीवन का बलिदान करने के लिए तत्पर हैं। वे युद्ध कौशल में पूर्णतया निपुण और विविध प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित हैं।
।।1.10।। हमारी शक्ति असीमित है और हम सब महान सेना नायक भीष्म पितामह के नेतृत्व में पूरी तरह से संरक्षित हैं जबकि पाण्डवों की सेना की शक्ति भीम द्वारा भलीभाँति रक्षित होने के पश्चात भी सीमित है।

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 February 2, 2026 :

।।1.11।।अतः मैं कौरव सेना के सभी योद्धागणों से आग्रह करता हूँ कि सब अपने मोर्चे पर अडिग रहते हुए भीष्म पितामह की पूरी सुरक्षा करें
।।1.12।।तत्पश्चात् कुरूवंश के वयोवृद्ध परम यशस्वी महायोद्धा भीष्म पितामह ने सिंह-गर्जना जैसी ध्वनि करने वाले अपने शंख को उच्च स्वर से बजाया जिसे सुनकर दुर्योधन हर्षित हुआ।
।।1.13।। इसके पश्चात् शंख, नगाड़े, बिगुल, तुरही तथा मृदंग अचानक एक साथ बजने लगे। उनका समवेत स्वर अत्यन्त भयंकर था।
।।1.14।। तत्पश्चात् पाण्डवों की सेना के बीच श्वेत अश्वों द्वारा खींचे जाने वाले भव्य में बैठे माधव (श्रीकृष्ण) और पाण्डुपुत्र अर्जुन ने भी अपने दिव्य शंख बजाये।
।।1.15।।हृषीकेश भगवान् कृष्ण ने अपना पाञ्चजन्य शंख बजाया, धनंजय (अर्जुन) ने देवदत्त शंख तथा अतिभोजी एवं अति दुष्कर कार्य करने वाले भीम ने पौण्डू नामक भीषण शंख बजाया
।।1.(16, 17, 18)  हे राजन्! राजा युधिष्ठिर ने अपना अनन्त विजय नाम का शंख बजाया तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष एवं मणिपुष्पक नामक शंख बजाये। श्रेष्ठ धनुर्धर काशीराज, महा योद्धा शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट, अजेय सात्यकि, द्रुपद, द्रौपदी के पांच पुत्रों तथा सुभद्रा के महाबलशाली पुत्र वीर अभिमन्यु आदि सबने अपने-अपने अलग-अलग शंख बजाये
।।1.19।। वह भयंकर घोष आकाश और पृथ्वी पर गूँजने लगा और उसने धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय विदीर्ण कर दिये।
।।1.20।।हे महीपते ! उस समय हनुमान के चित्र से अंकित ध्वजा (कपिध्वज ) लगे रथ पर आसीन पाण्डु पुत्र अर्जुन अपना धनुष उठा कर बाण चलाने के लिए उद्यत दिखाई दिये। हे राजन! आपके पुत्रों को अपने विरुद्ध व्यूह रचना में खड़े देख कर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से यह वचन कहे।
।।1.21।। अर्जुन ने कहा -- हे! अच्युत मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य खड़ा कीजिये। 

।।1.22।।जिससे मैं युद्ध की इच्छा से खड़े इन लोगों का निरीक्षण कर सकूँ कि इस युद्ध में मुझे किनके साथ युद्ध करना है।
कथा के इस बिन्दु तक महाभारत का अजेय योद्धा अर्जुन अपने मूल स्वभाव के अनुसार व्यवहार कर रहा था। उसमें किसी प्रकार की मानसिक उद्विग्नता के कोई लक्षण नहीं दिखाई दे रहे थे।
।।1.23।।दुर्बुद्धि धार्तराष्ट्र (दुर्योधन) का युद्ध में प्रिय चाहने वाले जो ये राजा लोग यहाँ एकत्र हुए हैं, उन युद्ध करने वालों को मैं देखूँगा। एक कर्मशील व्यक्ति होने के कारण वह कोई अनावश्यक संकट मोल नहीं लेना चाहता। इसलिये वह देखना चाहता है कि वे कौन से दुर्मति सत्तामदोन्मत्त और प्रलोभन से प्रताड़ित लोग हैं जो कौरव सेनाओं में सम्मिलित होकर सर्वथा अन्यायी तानाशाह दुर्योधन का समर्थन कर रहे हैं।

।।1.25।। 
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्य एतान् समवेतान् कुरून् इति।।1.25।।

 संजय बोले - हे भरतवंशी राजन्! निद्राविजयी अर्जुन के द्वारा इस तरह कहने पर दोनों सेनाओं के मध्यभाग में पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण के सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने श्रेष्ठ रथ को खड़ा करके, अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण ने इस तरह कहा कि 'हे पार्थ! इन इकट्ठे हुए कुरुवंशियों को देख'। सम्पूर्ण प्रथम अध्याय में केवल ये ही शब्द हैं जिन्हें भगवान ने कहा है। उन शब्दों ने उस चिनगारी का काम किया जिसने अर्जुन के (मिथ्या) अहंकार पर आधारित झूठे मूल्यों एवं धारणाओं के महल को जलाकर राख कर दिया। इसके पश्चात् हम देखेंगे कि इन शब्दों की अर्जुन पर क्या प्रतिक्रिया हुई और किस प्रकार अर्जुन का मन [मिथ्या अहं- प्रत्येक जीव (पितामह और गुरु द्रोण) भी देह नहीं ब्रह्म है ?]  टूटकर बिखर गया।
 "कुरु" शब्द का प्रयोग कौरवों और पाण्डवों दोनों के लिए किया गया है क्योंकि दोनों कुरु वंशज थे। भगवान श्रीकृष्ण ने जान बूझकर इस शब्द का प्रयोग किया ताकि अर्जुन में बंधुत्व की भावना जागृत हो और उसे यह प्रतीत हो कि वे सब एक ही हैं। वे चाहते थे कि बंधुत्व की भावना से (पितामह और गुरु में अपना और पराया कौन है ? इसे देखने से ) अर्जुन में मोह उत्पन्न होगा और जिससे वह विचलित हो जाएगा। जिसके परिणामस्वरूप उन्हें आगे आने वाले कलियुग में मानव मात्र के कल्याण के लिए गीता के सत्य सिद्धान्तों का (महावाक्यों का) दिव्य उपदेश देने का अवसर प्राप्त होगा। 

पार्थ का अर्थ है पृथापुत्र अर्जुन। पृथा कुन्ती का दूसरा नाम है। इस संस्कृत शब्द पार्थ में पार्थिव की गन्ध मिलती है जिसका अर्थ है पंचभूतों से निर्मित नश्वर देह। यह सम्बोधन अत्यन्त अर्थपूर्ण है। इसका तात्पर्य यह है कि गीता 'परम सत्य' का संदेश है जिसे अमृत स्वरूप भगवान् (अवतार-नेता) ने मनुष्य के सार्वकालिक प्रतिनिधि र्मत्य पुरुष अर्जुन को सुनाया है।
।।1.26।।वहाँ अर्जुन ने उन दोनों सेनाओं में खड़े पिता के भाइयों,  पितामहों,  आचार्यों,  मामों, भाइयों, पुत्रों,  पौत्रों,  मित्रों,  श्वसुरों और सुहृदों को भी देखा।

।।1.27।।इस प्रकार उन सब बन्धु-बान्धवों को खड़े देखकर कुन्ती पुत्र अर्जुन का मन करुणा से भर गया और विषादयुक्त होकर उसने यह कहा। 
संभवत इस दृश्य को देखकर पहली बार एक पारिवारिक कलह के भयंकर दुखदायी परिणाम का अनुमान वह कर सका जिससे उसका अन्तरतम तक हिल गया। कारण जो कुछ भी रहा हो लेकिन यह स्पष्ट है कि इस दृश्य को देखकर उसका हृदय करुणा और विषाद से भर गया। परन्तु इस समय की उसकी करुणा स्वाभाविक नहीं थी।  इस समय अर्जुन के मन तथा बुद्धि परस्पर वियुक्त हो चुके थे क्योंकि स्वयं को सर्वश्रेष्ठ वीर समझने के कारण उसके मन में युद्ध में विजयी होने की प्रबल आतुरता थी। पूर्व की दमित भावनायें और वर्तमान की विजय की व्याकुलता के कारण उसकी विवेक बुद्धि (आत्मनिष्ठ बुद्धि) विचलित हो गयी। और अब खुद को केवल शरीर समझ रहा था। 
।।1.28।।अर्जुन ने कहा -- हे कृष्ण ! युद्ध की इच्छा रखकर उपस्थित हुए इन स्वजनों को देखकर मेरे अंग शिथिल हुये जाते हैं, मुख भी सूख रहा है और मेरे शरीर में कम्प तथा रोमांच हो रहा है।।
 बुद्धि की आसक्ति सांसारिक आसक्ति देह-इन्द्रियों से या आत्मा (इष्टदेव से) आध्यात्मिक आसक्ति  हो सकती है। किसी संबंधी के लिए मोह-होना सांसारिक आसक्ति है जो स्वयं को शरीर (M/F)  समझने के कारण उत्पन्न होती है। स्वयं को शरीर समझने पर दैहिक संबंधियों (पत्नी/पुत्र-पुत्री/ भाई) में आसक्ति हो जाती है। अज्ञानता (अविद्या , अस्मिता , राग -द्वेष, अभिनिवेश पंचक्लेश )  से उत्पन्न यह आसक्ति हमें घोर सांसारिक बना देती है। अन्ततोगत्वा इस आसक्ति का अंत भी दुखदायी होता है क्योंकि शरीर का अंत होने पर पारिवारिक संबंध भी समाप्त हो जाता है।
 दूसरी ओ आत्मा (ईश्वर भगवान इष्टदेव) हमारी शुद्ध बुद्धि/मति के सच्चे पिता, माता, सखा, स्वामी और प्रियतम हैं। इसलिए शुद्ध बुद्धि का आत्मा के स्तर पर भगवान में अनुरक्त होना आध्यात्मिक आसक्ति है जो हमारी चेतना का विकास है और हमारी बुद्धि को आत्मनिष्ठ बनाता है। भगवान के प्रति प्रेम एक महासागर की तरह है जिसकी व्यापकता में सब कुछ समा जाता है जबकि दैहिक संबंध अपूर्ण और स्वार्थपरता से पूर्ण होते हैं। 
BG 1.29-31: मेरा सारा शरीर काँप रहा है, मेरे शरीर के रोएं खड़े हो रहे हैं, मेरा धनुष ‘गाण्डीव' मेरे हाथ से सरक रहा है और मेरी पूरी त्वचा में जलन हो रही है। मेरा मन उलझ रहा है और मुझे घबराहट हो रही है। अब मैं यहाँ और अधिक खड़ा रहने में समर्थ नहीं हूँ। केशी राक्षस का वध करने वाले हे केशव! मुझे केवल अमंगल के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। युद्ध में अपने वंश के बंधु बान्धवों का वध करने में मुझे कोई अच्छाई नही दिखाई देती है और उन्हें मारकर मैं कैसे सुख पा सकता हूँ?

।।1.33।।हमें जिनके लिये राज्य,  भोग और सुखादि की इच्छा है,  वे ही लोग धन और जीवन की आशा को त्यागकर युद्ध में खड़े हैं।
   यहाँ अर्जुन अनुचित भावों को प्रदर्शित कर रहा है और उसे श्रेष्ठ मान रहा है। सांसारिक भोगों और भौतिक सुख-समृद्धि के प्रति विरक्ति प्रशंसनीय है किन्तु अर्जुन आध्यात्मिक भावों से युक्त नहीं है। अपितु उसकी मूढ़बुद्धि या सम्मोहित बुद्धि - मोह और करुणा का  रूप धारण कर उससे छल कर रही  है। उसकी अपनी बुद्धि ही अर्जुन को धोखा दे रही है , ओरे नित्यमुक्त अविनाशी आत्मा से जुड़ने न देकर , पुनः नश्वर देह-इन्द्रियों में बांध रही है।  शुद्ध मनोभाव, आंतरिक सामंजस्य और संतोष आत्मा को सुख प्रदान करते हैं। यदि अर्जुन की भावनाएँ अलौकिक की होती, स्वयं को M/F नश्वर शरीर समझने से उत्पन्न न हुई होती , तब तो वह मोहजनित संवेदनाओं से ऊपर उठ चुका होता। लेकिन उसके मनोभाव सर्वथा प्रतिकूल हैं क्योंकि वह अपने मन और बुद्धि में असामंजस्य और अपने कर्तव्य पालन के प्रति असंतोष और अपने भीतर गहन दुःख का अनुभव कर रहा है। उस पर हावी संवेदनाओं का प्रभाव यह दर्शाता है कि उसकी मूढ़बुद्धि/ मति / दृष्टि में करुणा उसके मोह से उत्पन्न हुई हैं। और जैसी मति होगी , वैसी गति होगी। 
।।1.34 -- 1.35।। आचार्य, पिता, पुत्र और उसी प्रकार पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं, मुझ पर प्रहार करने पर भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, और हे मधुसूदन! मुझे त्रिलोकी का राज्य मिलता हो, तो भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिये तो, मैं इनको क्या मारूँ? 
एक ही क्षत्रिय परिवार के लोगों के बीच होने जा रहे इस गृहयुद्ध के विरुद्ध अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण को अन्य तर्क भी देता है। भावाविष्ट अर्जुन अपने कायरतापूर्ण पलायन के लिये अनेक तर्क देकर, अपने युद्ध न करने के विचार को उचित सिद्ध करना चाहता है।  जबकि वास्तव में वह भाग्य से प्राप्त कर्तव्य करने से वास्तव में वह दूर भाग रहा है। उसने जो कुछ पहले कहा था उसी को वह दोहराता रहता है क्योंकि श्रीकृष्ण अपने गूढ़ मौन द्वारा उसके तर्क स्वीकार नहीं कर रहे थेभगवान् के अधरों की तीक्ष्ण मुस्कान अर्जुन को लज्जित कर रही थी। वह अपने अपने विचारों के प्रति अपने मित्र एवं सारथि बुद्धि श्रीकृष्ण (शुद्धबुद्धि ,अन्तरात्मा , अवतारवरिष्ठ) की स्वीकृति और सहमति चाहता था परन्तु न तो उनकी दृष्टि के भाव से और न ही उनके शब्दों से उसे इच्छित सहमति मिल रही थी। जिससे कि भगवान् उसके मत की पुष्टि करें अर्जुन व्यर्थ में त्याग की बातें करता है। वह यह दर्शाना चाहता है कि वह इतना उदार हृदय है कि उसके चचेरे भाई उसको मार भी डालें तो भी वह उन्हें मारने को तैयार नहीं होगा। अतिशयोक्ति की चरम सीमा पर वह तब पहुँचता है जब वह घोषणा करता है कि त्रैलोक्य का राज्य मिलता हो तब भी वह युद्ध नहीं करेगा; फिर केवल हस्तिनापुर के राज्य की बात ही क्या है।
।।1.36।। हे जनार्दन ! धृतराष्ट्र के पुत्रों की हत्या करके हमें क्या प्रसन्नता होगी?  इन आततायियों को मारकर तो हमें केवल पाप ही लगेगा।
अपने शुद्ध दिव्य स्वरूप अविनाशी (आत्मा -इष्टदेव) के विपरीत हम जो गलत काम करते हैं वे पाप कहलाते हैं। शरीर मन और बुद्धि को (Apparent I) को ही अपना स्वरूप (Real I) समझकर कोई कर्म करना श्रेष्ठ मनुष्य (विवेकी मनुष्य, आत्मज्ञानी)  का लक्षण नहीं है। मिथ्या अहंकार (M/F भाव से ) अपने स्वार्थ के लिये किये गये कर्म हमारे 'कच्चा मैं'  और शुद्ध चैतन्य स्वरूप 'पक्का मैं' आत्मा के बीच वासना की सुदृढ़ दीवार खड़ी कर देते हैं। इन्हें ही पाप कहा जाता है। शत्रुओं की हत्या करने में अर्जुन का अविवेकपूर्ण विरोध शास्त्र को न समझने का परिणाम है और फिर अपनी समझ के अनुसार कर्म करना अपनी संस्कृति को ही नष्ट करना है।
इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के तर्कों की न स्तुति करते हैं और न ही आलोचना। वे जानते हैं कि अर्जुन को अपने मन की बात कह लेने देनी चाहिए। किसी मानसिक रोगी के लिए यह उत्तम निदान हैइस प्रकार उसका चित्त शांत हो जाता है
।।1.37।।हे माधव  !  इसलिये अपने बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारना हमारे लिए योग्य नहीं है,  क्योंकि स्वजनों को मारकर हम कैसे सुखी होंगे।
श्रीकृष्ण के मौन से वह और भी अधिक विचलित होकर उनसे दयनीय भाव से प्रार्थना करते हुए अपने मूर्खतापूर्ण निर्णय की पुष्टि चाहता है। दीर्घकाल तक साथ में रहने से दोनों में स्नेहभाव बढ़ गया था और इसी कारण अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण को माधव नाम से सम्बोधित करके पूछता है कि स्वबान्धवों की ही हत्या करके कोई व्यक्ति कैसे सुखी रह सकता है। भगवान् फिर भी मौन रहते हैं।
।।1.38 -- 1.39।। यद्यपि लोभ के कारण जिनका विवेक-विचार लुप्त हो गया है, ऐसे ये (दुर्योधन आदि) कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होनेवाले पाप को नहीं देखते, (तो भी) हे जनार्दन! कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को ठीक-ठीक जाननेवाले हमलोग इस पाप से निवृत्त होनेका विचार क्यों न करें?
इसी प्रकार अर्जुन का तर्क है कि यदि दुर्योधन और उसके मित्र अन्धे होकर अन्यायपूर्ण आक्रमण करते हैं तो क्या पाण्डवों को शान्ति की वेदी पर स्वयं का बलिदान करते हुये युद्ध से विरत हो जाना उचित नहीं है यह धारणा स्वयं में कितनी खतरनाक है इसको हम तब समझेंगे जब गीता के आगामी परिच्छेदों में तत्त्वज्ञान के महत्त्वपूर्ण अंश को देखेंगे जो भारतीय जीवन का सारतत्त्व है। अधर्म का सक्रिय प्रतिकार ही एक मुख्य सिद्धांत है जिसका भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में प्रतिपादन किया है।
।।1.40।।कुल के नष्ट होने से सनातन धर्म नष्ट हो जाते हैं। धर्म नष्ट होने पर सम्पूर्ण कुल को अधर्म (पाप) दबा लेता है।
सभ्यता और संस्कृति के क्षेत्र में नएनए प्रयोग करने में हमारे पूर्वजों की सदैव विशेष रुचि रही है। वे जानते थे कि राष्ट्र की संस्कृति की इकाई कुल की संस्कृति होती है। इसलिये यहाँ अर्जुन विशेष रूप से कुल धर्म के नाश का उल्लेख करता है क्योंकि उसके नाश के गम्भीर परिणाम हो सकते हैं।
।।1.41।। हे कृष्ण ! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियां दूषित हो जाती हैं,  और हे वार्ष्णेय ! स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है
प्राचीन काल में वर्ण विभाग का आधार समाज के व्यक्तियों की मानसिक व बौद्धिक क्षमता और पक्वता होती थी। बुद्धिमान तथा अध्ययन अध्यापन एवं अनुसंधान में रुचि रखने वाले लोग ब्राह्मण कहलाते थे। क्षत्रिय वे थे जिनमें राजनीति द्वारा राष्ट्र का नेतृत्व करने की सार्मथ्य थी और जो अपने ऊपर इस कार्य का उत्तरदायित्व लेते थे कि राष्ट्र को आन्तरिक और बाह्य आक्रमणों से बचाकर राष्ट्र में शांति और समृद्धि लायें। कृषि और वाणिज्य के द्वारा समाज सेवा करने वालों को वैश्य कहते थे। वे लोग जो उपयुक्त कर्मों में से कोई भी कर्म नहीं कर सकते थे शूद्र कहे जाते थे। उनका कर्तव्य सेवा और श्रम करना था। हमारे आज के समाज-सेवक और अधिकारी वर्ग कृषक और औद्योगिक कार्यकर्त्ता आदि सभी उपर्युक्त वर्ण व्यवस्था में आ जाते हैं।
समाज में नैतिक पतन होने पर अनियन्त्रित वासनाओं में डूबे युवक और युवतियाँ स्वच्छन्दता से परस्पर मिलते हैं। कामना के वश में वे सामाजिक और सांस्कृतिक विकास का किंचित भी विचार नहीं करते। इसलिये अर्जुन को भय है कि वर्णसंकर के कारण समाज और संस्कृति का पतन होगा।
।।1.42।।वह वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने का कारण बनता है। पिण्ड और जलदान की क्रिया से वंचित इनके पितर भी नरक में गिर जाते हैं।
पुरातन परम्पराओं और प्रथाओं के अनुसार कुल के वयोवृद्ध लोग उच्च मूल्यों और आदर्शों को अगली पीढ़ी के कल्याण हेतु उन्हें हस्तांतरित करते हैं। ये महान परम्पराएं कुल के सदस्यों को मानवीय मूल्यों और धार्मिक मर्यादाओं का पालन करवाने में सहायता करती हैं। यदि कुल के वयोवृद्धों की समय से पूर्व मृत्यु हो जाती है तब भावी पीढ़ियां कुल के उनके मार्गदर्शन और शिक्षण से वंचित हो जाती हैं। अर्जुन के कहने का तात्पर्य यह है कि जब कुलों का विनाश हो जाता है तब उसकी महान परम्पराएं भी उसके साथ समाप्त हो जाती हैं और कुल के शेष सदस्यों में अधर्म और व्यभिचार की प्रवृत्ति बढ़ती है जिससे वे अपनी आध्यात्मिक उन्नति का अवसर खो देते हैं। 
प्रत्येक पीढ़ी अपनी संस्कृति की आलोकित ज्योति भावी पीढ़ी के हाथों में सौंप देती है। नई पीढ़ी का यह कर्तव्य है कि वह इसे सावधानीपूर्वक आलोकित अवस्था में ही अपने आगे आने वाली पीढ़ी को भी सौंपे। संस्कृति की रक्षा एवं विकास करना हमारा पुनीत कर्तव्य है।
ऋषि मुनियों द्वारा निर्मित भारतीय संस्कृति आध्यात्मिक है जिसकी सुरक्षा धार्मिक विधियों पर आश्रित होती है। इसलिये हिन्दुओं के लिए संस्कृति और धर्म एक ही वस्तु है। हमारे प्राचीन साहित्य में संस्कृति शब्द का स्वतन्त्र उल्लेख कम ही मिलता है। उसमें अधिकतर धार्मिक विधियों के अनुष्ठान पर ही बल दिया गया है।
वास्तव में हिन्दू धर्म सामाजिक जीवन में आध्यात्मिक संस्कृति संरक्षण की एक विशेष विधि है। धर्म का अर्थ है उन दिव्य गुणों को अपने जीवन में अपनाना जिनके द्वारा हमारा शुद्ध आत्मस्वरूप स्पष्ट प्रकट हो। अतः कुलधर्म का अर्थ परिवार के सदस्यों द्वारा मिल-जुल कर अनुशासन और ज्ञान के साथ रहने के नियमों से है। परिवार में नियमपूर्वक रहने से देश के एक योग्य नागरिक के रूप में भी हम आर्य संस्कृति को जी सकते हैं।
।।1.43।। इन वर्णसंकर पैदा करनेवाले दोषोंसे कुलघातियों के सदा से चलते आये कुलधर्म और जातिधर्म नष्ट हो जाते हैं।
यह सुविदित है कि प्रत्येक युद्ध के बाद समाज में नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों का सहसा कितना पतन होने लगता है। अनैतिकता और छलकपट की प्रवृत्तियों के नीचे दबा हाँफ रहा आज का युग उपरोक्त तथ्य का ज्वलंत उदाहरण है। युद्ध के बाद न केवल लंगड़े लूलों की संख्या बढ़ती है वरन् उससे भी भयंकर परिणाम मन की गंभीर विकृतियों के रूप में सामने आते हैं।  इसलिए मनु स्मृति में वर्णन किया गया है:'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।' 
।।1.44।।हे जनार्दन !  हमने सुना है कि जिनके यहां कुल धर्म नष्ट हो जाता है,  उन मनुष्यों का अनियत काल तक नरक में वास होता है।
इसके उपरान्त भी भगवान् कुछ नहीं बोले। अब अर्जुन की स्थिति ऐसी हो गयी थी कि वह न तो चुप रह सकता था और न उसको नये तर्क ही सूझ रहे थे। परन्तु भगवान् के मौन का प्रभाव भी अनूठा ही था। इस श्लोक में अर्जुन पारम्परिक कथन ही उद्धृत करता है।
।।1.45।।अहो  !  शोक है कि हम लोग बड़ा भारी पाप करने का निश्चय कर बैठे हैं,  जो कि इस राज्यसुख के लोभ से अपने कुटुम्ब का नाश करने के लिये तैयार हो गये हैं।
।।1.45।।अहो  !  शोक है कि हम लोग बड़ा भारी पाप करने का निश्चय कर बैठे हैं,  जो कि इस राज्यसुख के लोभ से अपने कुटुम्ब का नाश करने के लिये तैयार हो गये हैं। ।
 आत्मविश्वास को खोकर वह कहता है अहो हम पाप करने को प्रवृत्त हो रहे हैं . इत्यादि। इस वाक्य से स्पष्ट ज्ञात होता है कि परिस्थिति पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के स्थान पर अर्जुन स्वयं उसका शिकार बन गया है। आत्मविश्वास के अभाव में एक कायर के समान वह स्वयं को असहाय अनुभव कर रहा है
।।1.46।।यदि मुझ शस्त्ररहित और प्रतिकार न करने वाले को ये शस्त्रधारी कौरव रण में मारें,  तो भी वह मेरे लिये कल्याणकारक होगा।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि युद्ध में विजयरूपी फल में अत्यन्त आसक्ति और उसकी चिन्ता के कारण अर्जुन आत्मशक्ति खोकर एक उन्माद के मानसिक रोगी के समान विचित्र व्यवहार करने लगता है।
।।1.47।।संजय ने कहा  --  रणभूमि (संख्ये) में शोक से उद्विग्न मनवाला अर्जुन इस प्रकार कहकर बाणसहित धनुष को त्याग कर रथ के पिछले भाग में बैठ गया।
अठारह अध्यायी गीतोपनिषद् के प्रथम अध्याय का नाम अर्जुनविषादयोग है। इन अध्यायों को उपनिषद् कहने का कारण यह है कि इनमें उपनिषद् के विषय का ही प्रतिपादन किया गया है। इनके लक्ष्यार्थ को ऐसे पाठक गण नहीं समझ सकेंगे जो बिना किसी पूर्व तैयारी के इनका अध्ययन करेंगे। सरल प्रतीत होने वाले श्लोकों में छिपे गूढ़ार्थ को समझने के लिये मनन की अत्यन्त आवश्यकता होती है। उपनिषद् विद्या के समान यहाँ भी गीता के श्लोकों में निहित परमार्थ निधि को पाने के लिये एक कृपालु एवं योग्य गुरु की आवश्यकता है
उपनिषद् शब्द का अर्थ है वह विद्या जिसका अध्ययन गुरु के समीप (उप) पहुँचकर उसके चरणों के पास अत्यन्त नम्र भाव से और निश्चयपूर्वक (नि) बैठकर (षद्) किया जाता है। विश्व के सभी धार्मिक शास्त्र ग्रन्थों का विषय एक ही है। वे सभी हमको यह शिक्षा देते हैं कि इस नित्य परिवर्तनशील जगत् के पीछे एक अविनाशी पारमार्थिक सत्य है जो इस जगत् का मूल स्वरूप है। इस अद्वैत सत्य को हिन्दू धर्म ग्रन्थों में ब्रह्म कहा गया है। इसलिये ब्रह्म का ज्ञान तथा उसके अनुभव के लिये साधनों का उपदेश देने वाली विद्या ब्रह्मविद्या कहलाती है। हिन्दू दर्शनशास्त्र के दो भाग हैं तत्त्वज्ञान और योगशास्त्र। इस दूसरे भाग में अभ्यसनीय साधनों का वर्णन किया गया है।
योग शब्द युज धातु से बना है जिसका अर्थ है जोड़ना । स्वयं को (देहाध्यास और जिवाध्यास में फँसी मूढ़ बुद्धि मति को, जैसी मति वैसी गति ) वर्तमान की स्थिति से ऊँचा उठाकर किसी श्रेष्ठ एवं पूर्ण आदर्श 'आत्मा' (ह्रदय में विद्यमान इष्टदेव)  को प्राप्त करने के लिये साधक जो प्रयत्न करता है उसे योग कहते हैं और इस विज्ञान को योगशास्त्र। संकल्प वाक्य में गीता को योगशास्त्र कहा जाता गया है। इसलिये इससे हम उन साधनों के ज्ञान की अपेक्षा रखते हैं जिनके अभ्यास द्वारा परमार्थ सत्य का साक्षात् अनुभव प्राप्त किया जा सकता है।
यहाँ इस ज्ञान का उपदेश स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण अपने परम मित्र अर्जुन को ऐसी संघर्षपूर्ण स्थिति के संदर्भ में दे रहे हैं जहाँ वह पूर्णतया मानसिक सन्तुलन को खोकर विषाद की अवस्था को प्राप्त होता है। इसलिये गीता से हम ऐसे उपदेश और मार्गदर्शन की अपेक्षा रख सकते हैं जो अत्यन्त सहानुभूतिपूर्वक किया गया हो। गीता की यह विशेषता संकल्पवाक्य में यह कहकर बतायी गयी है कि यह स्वयं भगवान् द्वारा एक र्मत्य पुरुष को दिया गया उपदेश है श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
किसी एक व्यक्ति समाज या राष्ट्र में धर्म और तत्त्वज्ञान की माँग तभी होगी जब उनके हृदय में अर्जुन के विषाद का अनुभव होगा। आज का जगत् जितनी अधिक मात्रा में यह अनुभव करेगा कि वह जीवन संग्राम का सामना करने में असहाय है और उसमें यह साहस नहीं कि स्वयं के द्वारा निर्मित अपने प्रिय आर्थिक मूल्यों एवं औद्योगिक लोभ का वह संहार कर सके उतनी ही अधिक मात्रा में वह गीतोपदेश का पात्र है। 
ऐसे समय में ही मनुष्य को पूर्णत्व प्राप्त करने की तीव्र अभिलाषा होती है। विषाद की स्थिति प्राप्त किये बिना अकेले शास्त्र हमारी सहायता नहीं कर सकतेआत्मयोग के पूर्व विषाद की स्थिति अनिवार्य होने के कारण उसे यहाँ योग कहा गया है। गीता में वर्णित योग को सीखने एवं जीने के लिए अर्जुन-विषाद की स्थिति को प्राप्त होना प्राथमिक साधना है
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रविवार, 1 फ़रवरी 2026

⚜️️🔱गीता ध्यान [Gita Dhyan] ⚜️️🔱

गीता ध्यान

 [Gita Dhyan]  

सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपाल नन्दन:।
पार्थो वत्स: सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्।।

अर्थात सभी उपनिषदें मानो गाय के समान हैं , श्रीकृष्ण उनका दोहन करने वाले हैं। अर्जुन बछड़े के समान है। और गीता के अमृतरूप उपदेश उत्तम दूध के समान है , "सुधीर्भोक्ता" अर्थात केवल "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः" बोध से सम्पन्न विवेकी लोग ही उस दूध के पीने वाले हैं !  
गीता के सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द ने 28 मई 1900 को सैनफ्रांसिस्को में भाषण (खण्ड 7-पृष्ठ 294) करते हुए कहा था -" गीता का प्रथम दृश्य युद्धक्षेत्र का है। दोनों ओर स्वजन सम्बन्धी और आत्मीय जन खड़े हैं -एक ओर कौरव है और दूसरी ओर पाण्डव। एक ओर पितामह भीष्म हैं तो दूसरी ओर इनके पौत्रगण , शत्रु-पक्ष में अपने आत्मीय स्वजनों को देख , उनका वध करने की बात सोचकर अर्जुन उदास हो गए और अस्त्रत्याग करने का निश्चय कर लिया। यथार्थ में गीता का आरम्भ यहीं से होता है। 
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।2.3।।

।।2.3।। हे पार्थ, स्वार्थपरता के वशीभूत होकर क्लीव (कायर) मत बनो। यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है, हे ! परंतप हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ।।

.....'हे भारत उठो , हृदय की इस दुर्बलता का त्याग करो और कायरता छोड़ दो ! उठ खड़े होओ और युद्ध करो करो।  इस तात्पर्यपूर्ण श्लोक से गीता का अभिप्राय झलकता है। अर्जुन ने तर्क और युक्ति देते हुए उच्चतर नैतिक आदर्शों का प्रसंग उठाया , कहा कि प्रतीकार करने की अपेक्षा प्रतीकार न करना ही अच्छा है , इत्यादि। लेकिन कृष्ण परमात्मा हैं , साक्षात् भगवान है। उन्होंने उसी क्षण अर्जुन की दलील का असली रूप समझ लिया, और वह थी अर्जुन की दुर्बलता। अर्जुन स्वजनों को देखकर युद्ध करने में अपने को असमर्थ पा रहे थे। उनके ह्रदय में कर्तव्य और भावुकता (माया) का द्वन्द्व चल रहा था। ,मनुष्य जितना ही पक्षीसुलभ ममता के वश में होता है , वह भावावेग में उतना ही डूब जाता है। और इसी को लोग प्यार या प्रेम कहते हैं। 

शुद्ध आत्मस्वरूप के अज्ञान के कारण "अहंकार बुद्धि या जीव बुद्धि" - अर्थात स्वयं को M/F देह से समझने की मूढ़बुद्धि उत्पन्न होती है, उससे अस्मिता, राग-द्वेष से उत्पन्न भ्रम को लोग प्यार या प्रेम कहते हैं।  यथार्थ में यह तो आत्मसम्मोहन (Self-hypnosis) है। सामान्य जीव-जन्तुओं की तरह विवेक-सम्पन्न मनुष्य को भी आवेग के अधीन होना शोभा नहीं देता है। अर्जुन इसी आवेग के वशीभूत हो गए। उन्हें जैसा होना चाहिए था , वैसा वे नहीं हो सके। उन्हें तो प्रज्ञा (अर्थात आत्मनिष्ठ बुद्धि) के अनन्त प्रकाश में कर्म में निरन्तर लगे रहकर आत्मजयी ज्ञानी ऋषि होना था। परन्तु बुद्धि की अधोगति - आत्मा से हटकर देह बुद्धि बनजाने के कारण, उनकी बुद्धि भ्रमित हो जाती है , वे 'ममता' आदि सुन्दर नामों से अपनी दुर्बलता को ढाँकने की चेष्टा करते हुए शिशु के समान हो जाते हैं। श्रीकृष्ण यह जान गए थे। अर्जुन सामान्य स्वार्थपरता के वशीभूत होकर कायर मनुष्य की तरह बात करने लगते हैं , जो कुछ भी दलील देते हैं , वह सब अज्ञानी के समान है।

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।।2.11।।

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।।2.13।। 

आत्मज्ञानी व्यक्ति जीवित या मृत किसी के लिए शोक नहीं करते। तुम मर नहीं सकते , मैं भी मर नहीं सकता। ऐसा समय कभी नहीं था जब हमलोग नहीं थे। ऐसा समय कभी नहीं आएगा जब  हम लोग नहीं रहेंगे। मनुष्य इस जीवन में जिसप्रकार शैशव अवस्था से आरम्भ करके क्रमशः यौवन , वार्धक्य को पार करता है, उसी प्रकार मृत्यु से वह केवल दूसरा शरीर ग्रहण करता है। ज्ञानी व्यक्ति उससे मोहित क्यों होंगे ? 
यह जो भावुकता तुम्हारे सिर पर सवार होकर बैठी है , (तुम्हारी बुद्धि/मति पर सवार) इसका मूल कहाँ है ? स्पर्श इन्द्रियाँ अपने अपने विषयों का भोग करके ठंढा -गर्म का अनुभव करके सुख-दुःख आदि का अनुभव करती हैं। वे आती हैं और चली जाती हैं। मनुष्य इस समय यदि दुःखी है, तो दूसरे ही क्षण सुखी हो जाता है। ऐसी स्थिति में वह आत्मा का स्वरुप नहीं जान सकता।   
  
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।

आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।2.14।।  

।।2.14।। हे कुन्तीपुत्र ! शीत और उष्ण और सुख दुख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग का प्रारम्भ और अन्त होता है;  वे अनित्य हैं,  इसलिए,  हे भारत ! उनको तुम सहन करो।।
कालाय तस्मै नमः ! जो पुरुष यह समझ लेता है कि जगत् की वस्तुयें नित्य परिवर्तनशील हैं उत्पन्न और नष्ट होती रहती हैं वह पुरुष इन वस्तुओं के कारण स्वयं को कभी विचलित नहीं होने देगा। काल के प्रवाह में भविष्य की घटनायें वर्तमान का रूप लेती हैं और हमें विभिन्न अनुभवों को प्रदान करके निरन्तर भूतकाल में समाविष्ट हो जाती हैं।  जगत् की कोई भी वस्तु एक क्षण के लिये भी विकृत हुये बिना नहीं रह सकती । यहाँ परिवर्तन ही एक अपरिवर्तनशील नियम है।

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः।।2.16।।

जो अनादि काल से है (त्रिकालाबाधित है) जो 'सत्' है ,वह नहीं है - ऐसा नहीं हो सकता। फिर जो कभी नहीं है - जो 'असत्' (मिथ्या अहं) हो,  वह है, ऐसा भी नहीं हो सकता। अतः जो सारे विश्व को परिव्याप्त किये हुए है , उसे आदि-अन्त -हीन अविनाशी रूप से जानो। इस विश्व में ऐसी कोई वस्तु नहीं है , जो अपरिवर्तनशील आत्मा को परिवर्तित कर सके।  इस शरीर का जन्म और नाश है किन्तु जो इस शरीर में निवास करता है ; वह अनादि और अविनाशी है। 
मणियों को धारण करने वाले एक सूत्र के समान हममें कुछ है जो परिवर्तनों के मध्य रहते हुये विविध अनुभवों को एक साथ बांधकर रखता है। सूक्ष्म विचार करने पर यह ज्ञान होगा कि वह कुछ अपनी स्वयं की चैतन्य स्वरूप आत्मा है।बाल्यावस्था युवावस्था और वृद्धावस्था में होने वाले अनुभवों को यह चैतन्य ही प्रकाशित करता है। अनुभव आते हैं और जाते हैं। जिस चैतन्य के कारण मैंने सबको जाना जिसके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है वह चैतन्य आत्मा जन्म और नाश से रहित नित्य सत्य वस्तु है। तत्त्वदर्शी पुरुष इन दोनों सत् और असत् को  आत्मा और अनात्मा के तत्त्व को पहचानते हैं। इन दोनों के (अविनाशी) आत्मा और (नश्वर) अनात्मा (प्रकृति देह-मन -बुद्धि) के रहस्यमय संयोग से यह विचित्र जगत् उत्पन्न होता है
इसे जानकर मोह को त्याग दो और युद्ध में प्रवृत्त हो जाओ , पीछे न हटो , यही तुम्हारा आदर्श है। फल चाहे जो हो , तुम काम करते चलो। नक्षत्र अपने गतिपथ से च्युत हो सकते हैं , सम्पूर्ण संसार हमारे विरुद्ध खड़ा हो सकता है , पर उससे हम विचलित न हों। मृत्यु तो केवल अन्य शरीर की प्राप्ति है। युद्ध करना होगा। भय और कायरता से कुछ नहीं प्राप्त किया जा सकता। पीछे हटने से किसी विपत्ति को हटाया नहीं जा सकता। कुसंस्कार के सामने सिर झुकाना या अपने 'मन के ख्याल' मूढ़बुद्धि/ सम्मोहित मति  के पास अपने (स्व) को बेच देना तुम जैसे वीर को शोभा नहीं देता।    
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत।।2.18।।
।।2.18।। इस नाशरहित अप्रमेय (अनन्त) और नित्य देही (शरीरी) आत्मा के ये सब शरीर नाशवान् कहे गये हैं। इसलिये हे भारत ! तुम युद्ध करो।।

हे पार्थ ! तुम अनन्त और अविनाशी हो ; तुम्हारा जन्म नहीं है और मृत्यु भी भी नहीं। तुम अनन्त शक्तिशाली आत्मा हो। देह-बुद्धि के गुलाम की भाँति व्यवहार करना तुम्हें उचित नहीं है। उठो , जागो , दुर्बलता छोड़कर युद्ध करो। यदि मृत्यु हो जाये तो होने दो ! सहायता देने के लिए कोई न आये तो न सही , तुम्हीं तो सर्वजगतमय हो , तुम्हें कौन सहायता दे सकता है ! जीवों का अस्तित्व शरीर के जन्म लेने से पूर्व तथा मृत्यु के बाद अव्यक्त रहता है। केवल बीच का स्थितिकाल ही व्यक्त है। अतएव उसमें शोक करने का कोई कारण नहीं है।  
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्।।2.29।।
कोई इस आत्मा को आश्चर्यरूप से देखता है , कोई इसका आश्चर्यरूप से वर्णन करता है। कोई दूसरा इस आत्मा के सम्बन्ध में आश्चर्यरूप से श्रवण करता है , फिर कोई सुनकर भी इसे जान नहीं सकता। 
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।

ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।।2.38।।

तुम्हें यह कहने का भी अधिकार नहीं है कि स्वजनों का वध करना पाप है , क्योंकि तुम क्षत्रिय हो और वर्णाश्रम धर्म के अनुसार युद्ध करना ही तुम्हारा स्वधर्म है।  सुख-दुःख और जय-पराजय को समान समझकर युद्ध करने के लिए सन्नद्ध हो जाओ। 

एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु।
बुद्ध्यायुक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि।।2.39।।

यहाँ पर गीता का एक विशेष मतवाद का निर्देश किया गया है - वह है अनासक्ति का उपदेश। हमलोग आसक्त होकर कार्य करते हैं , इस कारण हमें कर्मफल भोग करना पड़ता है। पर योगयुक्त होकर कर्म करने से कर्मबन्धन छिन्न हो जाता है। 

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।।2.40।।

सारी विपत्तियों को तुम पार कर ले सकोगे। 'इस निष्काम -कर्म योग के अल्पमात्र का भी अनुष्ठान करने से मनुष्य जन्म-मरण रूप संसार के भीषण भँवर से छुटकारा पा जाता है। 
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्।।2.41।।

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति।।2.43।।

हे अर्जुन, केवल आत्मनिष्ठ निश्चयात्मिका बुद्धि /मति का ही सुफल मिला करता है। मूढ़बुद्धि या स्वयं को M/F जीव समझकर -अविद्या, अस्मिता , राग-द्वेष , अभिनिवेश पंचक्लेश से भ्रमित बुद्धि वाले सकाम व्यक्तियों का मन हजारों विषयों में फ़ैल जाते हैं , इस कारण शक्ति का व्यर्थ में क्षय होता है। अविवेकी मनुष्य - (ब्रह्मसत्य जगत मिथ्या जो जीवो ब्रहमैव न अपरः ! नहीं जानते) वे भोगसुख प्राप्त करने हेतु स्वर्ग जाने की कामना से (बिजनेस-व्यापार -बैंकडिपॉजिट बढ़ाने) का  यज्ञ आदि अनुष्ठान करते हैं। 
            
यह भी गीता का एक महान उपदेश है कि जब तक विषय का भोगसुख नहीं छूटता, तब तक आध्यात्मिक जीवन का आरम्भ नहीं होता। इन्द्रिय-सम्भोग में भला सुख कहाँ ? इन्द्रियाँ तो हमारी बुद्धि को भ्रमित कर देती हैं(आत्मनिष्ठ बुद्धि को देह-बुद्धि M/F राग-द्वेष बुद्धि में फँसा देती हैं ?)

इन्द्रियाणि  पराणि आहुः,  इन्द्रियेभ्यः परम् मनः। 
 मनसः तु परा बुद्धिः य बुद्धेः परतः तु सः।।

 (3.42) 

अर्थात सूक्ष्म या अधिक बलशाली होने के कारण स्थूल शरीर से (Apparent I M/F शरीर से) इन्द्रियाँ पर (श्रेष्ठ) कही जाती हैं।  

यथार्थ प्रश्न यह है कि एकदम आसक्ति -रहित होकर भला कौन कर्म कर सकता है ? जो व्यक्ति आसक्ति -रहित होकर कर्म कर सकता है , उस (आत्मब्रह्म-ऐक्य) के लिए कर्म की सफलता हो या विफलता हो , दोनों समान है। 'तेरी इच्छा पूर्ण हो' इस आस्था वाले व्यक्ति का यदि जीवन भर के कर्म क्षणभर में जलकर राख हो जाएँ,  तो भी ऐसे व्यक्ति का ह्रदय आशंका से एक बार भी नहीं धड़कता।  
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।

जन्मबन्ध-विनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्ति अनामयम्।।

(2.51)

बुद्धियुक्ता मनीषी लोग कर्मजन्य फलों को त्यागकर जन्मरूप बन्धन से मुक्त हुये अनामय अर्थात् निर्दोष पद को प्राप्त होते हैं।।
बुद्धियुक्त मनीषी का अर्थ है वह विवेकी मनुष्य जो - 'जीवो ब्रह्मैव नापरः' को जानकर 'हाथी नारायण और महावत नारायण का विवेक' रखते हुए जीने की कला को सीख लेता है वह फल की चिन्ताओं से मुक्त होकर मन के पूर्ण सन्तुलन को बनाये हुये सभी कर्म करता है। वह विवेकी व्यक्ति उस समय यह देखता है कि सभी प्रकार की आसक्ति मिथ्या है। (अपने को M/F शरीर समझने से उत्पन्न राग-द्वेष मिथ्या है।)
    आत्मा (इष्टदेव) कभी (3K में) आसक्त हो नहीं सकते। यह समझ लेने के बाद वह आत्मनिष्ठ बुद्धि से युक्त योगी सुख-दुःख से परे की अवस्था में पहुँच जाता है। तब अर्जुन पूछता है  स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कौन हैं ? 
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।

 आत्मनि एव आत्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञः उच्यते।।।

(2.55) 

श्री भगवान् ने कहा -- हे पार्थ , जिस समय पुरुष बुद्धि में स्थित सब कामनाओं को त्याग देता है जो सभी वासनाओं को छोड़ चुके हैं , किसी की भी आकांक्षा नहीं करते। और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है; उस समय वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है। 

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।

वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।

(2.56)

।।2.56।। दुःख में जिसकी बुद्धि उद्विग्न नहीं होती और भोग-सुख प्राप्ति  की तीव्र इच्छा जिस बुद्धि निवृत्त हो गयी है। (स्वयं M/F) देह नहीं आत्मा समझ लेने के फलस्वरूप जिस व्यक्ति की बुद्धि से राग-द्वेष नष्ट हो गये हैं-  वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2.58।।

।।2.58।। जिस तरह कछुआ अपने अङ्गों को सब ओर से समेट लेता है, वैसे ही यह पुरुष जब सब ओर से अपनी इन्द्रियों को इन्द्रियों के विषयों से समेट लेता (हटा लेता) है, तब उसकी बुद्धि आत्मनिष्ठ हो जाती है, अर्थात उसकी बुद्धि आत्मा (इष्टदेव) में प्रतिष्ठित हो जाती है।

 संसार का कोई भी प्रलोभन उनकी इन्द्रियों को बलपूर्वक खींचकर बाहर नहीं ला सकता। संसार का कोई भी प्रलोभन- 'कामिनी -कांचन या नाम-यश' उनकी बुद्धि को प्रलोभित नहीं कर सकता। समूचे विश्व-ब्रह्माण्ड के चूर-चूर हो जाने पर भी उनके मन में एक भी तरंग नहीं उठती। आगे बढ़ते चलो , कर्म करते जाओ , केवल यह ध्यान रखना/ सचेत रहना कि बुद्धि कहीं फिर से देह-इन्द्रियों में आसक्त न हो जाये। जो व्यक्ति M/ F देहजन्य राग-द्वेष से अनासक्त होने की कला  नहीं जानता या उसकी साधना नहीं करता, उसकी प्रज्ञा (अर्थात विवेकसम्पन्न बुद्धि) कभी आत्मनिष्ठ नहीं हो पाती। 
आपूर्यमाणम् अचल-प्रतिष्ठम्

समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।

तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे

स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।

(2.70) 

जैसे पृथ्वी भर की नदियाँ निरंतर अपनी जलराशि लाकर समुद्र में उड़ेलती रहती हैं , पर उससे समुद्र अचल ही रहता है। उसी प्रकार पाँचो इन्द्रियों के द्वारा एक साथ प्रकृति की विभिन्न संवेदनायें लाये जाने पर भी आत्मज्ञानी के ह्रदय में किसी प्रकार का विक्षेप या भय नहीं उत्पन्न हो पाता।   

[आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'भज गोविंदम' के अनुसार, "निश्चलतत्त्वे जीवनमुक्तिः"यदि कोई व्यक्ति अपनी बुद्धि और संकल्प को अडिग (निश्चल) रखकर एक ही दिशा में (आत्मा या इष्टदेव की दिशा में) एकाग्र करे, तो उसे जीवित रहते हुए ही मोक्ष या परम मुक्ति प्राप्त हो सकती है।] 
'हजार स्रोतों से दुःख आवे, सैकड़ों स्रोतों से सुख आवे , मैं न तो दुःख के अधीन हूँ और न सुख का क्रीतदास ही हूँ।" - स्वामी विवेकानन्द।

ज्यायसी चेत् कर्मणः ते मता बुद्धिः जनार्दन। 

 तत् किम् कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।।

(3.1) 

अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा - " आप मुझे कर्म का उपदेश दे रहे हैं , और आत्मब्रह्म-ऐक्य ज्ञान को जीवन की उच्चतम अवस्था कहकर उसकी प्रशंसा कर रहे हैं। हे कृष्ण यदि आप ज्ञान को कर्म की अपेक्षा श्रेष्ठ समझते हैं , तो मुझे कर्म का उपदेश क्यों दे रहे हैं ? 
इसका उत्तर में भगवान कहते हैं - अतिप्राचीन काल से ही दो साधनमार्ग प्रचलित हैं। दार्शनिकों के लिए ज्ञानयोग और निष्काम कर्मियों के लिए कर्मयोग। किन्तु कर्मों का त्याग करके कोई भी शांति नहीं पा सकता। कोई भी मनुष्य कर्म किये बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता। अन्तःकरण में स्थित प्रकृति के तीन गुण मनुष्य को कर्म करने के लिए बाध्य करते हैं। जो मनुष्य बाहर से कर्मों को रोक कर मन ही मन विषयों का चिंतन करते रहते हैं - उसे कुछ भी प्राप्त नहीं होता , वह मिथ्याचारी हो जाता है। किन्तु जो व्यक्ति बुद्धि की शक्ति द्वारा इन्द्रियों को धीरे धीरे वशीभूत करके उन्हें कर्म में लगाए लगाए रखता है , वह पूर्वोक्त व्यक्तियों से श्रेष्ठ है। (गीता 3 /2-8)
        यदि तुमने इस रहस्य को समझ लिया हो तो तुम्हारे लिए कोई कर्तव्य-कर्म बाकी नहीं है , तुम मुक्त हो। फिर भी दूसरों के कल्याण के लिए तुम्हें कर्म करना होगा। क्योंकि श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करते हैं , साधारण मनुष्य उसी का अनुकरण करते हैं। (गीता -3. 20 -21) 

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि।।3.22।।

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।3.23।।

' परा शान्ति के अधिकारी मुक्त पुरुष यदि कर्मों का त्याग कर दें तो जो लोग उस आत्मज्ञान और शान्ति को अभी नहीं प्राप्त कर सके हैं , वे उन महापुरुषों का अनुकरण करने की चेष्टा करेंगे , फलस्वरूप समाज में विशृंखलता उत्पन्न होगी। 
 हे पार्थ , त्रिभुवन में मेरे लिए कुछ भी अप्राप्त नहीं है , तो भी मैं सदा कर्म करता हूँ। यदि मैं क्षणभर के लिए कर्म न करूँ तो विश्व ब्रह्माण्ड नष्ट हो जायेगा। 

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।

जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्।।

(3.26)

अज्ञानी मनुष्य फलाकांक्षी होकर जिस उत्साह और लगन से कर्म करता है , आत्मज्ञानी भी अनासक्त भाव से , किसी फल की आकांक्षा न करते हुए लेकिन उसी तीव्रता से कर्म करते हैं।

 गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं -जो लोग भक्तिपूर्वक अन्य देवताओं की पूजा करते हैं , वे भी वास्तव में मेरी ही पूजा करते हैं। (गीता ३/३३) ये मनुष्य साक्षात भगवान की ही पूजा करते हैं , भगवान को भिन्न नामों से पुकारने पर क्या वे क्रोधित हो जायेंगे ? 

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।

अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते।।

(3.27)

हे अर्जुन ! हमारे शरीर और अन्तःकरण के माध्यम से प्रकृति के तीन गुण ही प्रकृति के नियमानुसार काम कर रहे हैं। हमलोग अपरिवर्तनशील , अविनाशी आत्मा होकर भी परिवर्तनशील प्रकृति के साथ - अर्थात नश्वर M/F देह, इन्द्रिय, मन , में सम्मोहित बुद्धि के साथ अपना तादात्म्य करके - परिवर्तनीय प्रकृति के साथ अपने को अभिन्न मानकर कहते हैं - मैं ही इन कर्मों का कर्ता हूँ।  सम्पूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं, M/F बुद्धि के अहंकार से मोहित हुआ पुरुष,  "मैं कर्ता/ करती हूँ"  ऐसा मान लेता हैऔर इस प्रकार आत्मा -नित्यमुक्त होकर भी प्रकृति के पंजे में फँस जाती है। 
आत्मज्ञानी भी प्रकृति के द्वारा चालित होकर कर्म करता है। सभी लोग प्रकृति के तीनों गुणों के  अनुसार कर्म करते हैं। जब तक शरीर में है , तब तक कोई भी प्रकृति को नहीं लाँघ सकता। 

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।

प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति।।

(3.33) 

 ज्ञानवान् पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। सभी प्राणी अपनी प्रकृति पर ही जाते हैं, फिर इनमें (किसी का) हठ /निग्रह क्या करेगा।।  यह अन्तिम वाक्य भगवान् के उपदेश में निराशा का उद्गार नहीं किन्तु उनकी परिपूर्ण दृष्टि का परिचायक है। वे वस्तु स्थिति से परिचित हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जीवन के उच्च मार्ग पर चलने की क्षमता नहीं रखता। विकास के सोपान की सबसे निचली सीढ़ी पर खड़े असंख्य मनुष्यों के लिये इस मार्ग का अनुसरण कदापि सम्भव नहीं। क्योंकि विषयों में आसक्ति तथा पाशविक प्रवृत्तियों से वे इस प्रकार बंधे होते हैं कि उन सबका एकाएक त्याग करना उन सबके लिये सम्भव नहीं होता जिस मनुष्य में कर्म के प्रति उत्साह, आत्मश्रद्धा , आत्मविश्वास , आत्मनिर्भरता ,तथा जीवन में कुछ पाने की महत्त्वाकांक्षा है केवल वही व्यक्ति इस कर्मयोग का आचरण करके स्वयं को कृतार्थ कर सकता है। भगवान् का यह कथन उनकी विशाल हृदयता एवं सहिष्णुता का परिचायक है।

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।

महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।।3.37।।

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।

कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च।।3.39।।

।।3.39।। और हे कुन्तीनन्दन ! इस अग्निके समान कभी तृप्त न होनेवाले और विवेकि मनुष्यों (ब्रह्मसत्य जगत मिथ्या) विवेक का नित्य वैरी इस काम 'desire' के द्वारा मनुष्य का विवेक ढका हुआ है।

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।

एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्।।3.40।।

" अर्जुन ! सावधान, काम ही क्रोध है, यह मनुष्य का परम शत्रु है, इसे संयत रखना चाहिए। यह आत्मज्ञानी व्यक्ति के विवेक को भी ढँक देता है। इस काम की अग्नि सर्वग्रासी है। इन्द्रियों, मन तथा सम्मोहित बुद्धि/मूढ़बुद्धि में इसका अधिष्ठान हैआत्मा तो किसी पदार्थ की कामना ही नहीं करता। 
इसलिए काम रूपी शत्रु से यदि बचना चाहते हो तो शुद्ध बुद्धि/मति को निरंतर आत्मा (इष्टदेव) से जोड़े रहो। क्योंकि -बुद्धिनाशात् प्रणश्यति

क्रोधात् भवति संमोहः, संमोहात् स्मृतिविभ्रमः।

 स्मृति भ्रंशात्  बुद्धिनाशः,  बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।।2.63।। 

     विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध से उत्पन्न होता है मोह और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति के भ्रमित होने पर विवेकी -बुद्धि का नाश होता है और विवेकयुक्त बुद्धि के नाश होने से वह मनुष्य नष्ट हो जाता है।।
यदि बुद्धि में तुम कर्ता हो गए - तो हो गए ! उसी तरह बुद्धि में तुम अकर्ता हो गए , अकर्ता हो गए !  जो कुछ होना है बुद्धि में होना है। बुद्धि में मुक्त हो गए तो मुक्त हो गए। आत्मा तो सदा मुक्त है; पर क्या तुम्हारी बुद्धि मुक्त है ? तुम्हारी बुद्धि में ऐसा लगता है कि  - हम मुक्त हैं ! - (बुद्धि से ऐसा लगता है कि मैं कौन हूँ ? दहोहं कि शिवो अहं ?) - हम मुक्त हैं !  इसी तरह से एक और वाक्य है - जिसकी जैसी मति; उसकी वैसी गति। अब ये बात तो समझ में आ गई। अब मति/बुद्धि  कल्पना नहीं है। मति इमेजिनेशन नहीं है। 'जिसकी जैसी मति , उसकी वैसी गति'। 
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।

विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।।

(4.1)

।।4.1।। श्रीभगवान् बोले - मैंने बुद्धि का सम्बन्ध M/F देह-इन्द्रिय से नहीं निरन्तर आत्मा से जोड़े रहने या 'आत्मनिष्ठा बनाये रखने के अविनाशी योग' को प्राचीन काल में मैंने सूर्य को सिखाया था। सूर्य ने अपने पुत्र मनु को सिखाया, और मनुने (अपने पुत्र) राजा इक्ष्वाकु को सिखाया। इस प्रकार मनःसंयोग के अभ्यास द्वारा (3H विकास के 5 अभ्यास द्वारा) इस बुद्धि की आत्मनिष्ठा के  अविनाशी योग का ज्ञान एक राजा से दूसरे राजा के पास तथा उनसे अन्य राजाओं के पास पहुँचा। किन्तु समय / काल के प्रवाह में सब कुछ नष्ट हो जाता है , तो 'कालय तस्मै नमः।' कालवश इस योग की महान शिक्षा नष्ट हो गयी थी उसी को आज में पुनः तुम्हें सीखा रहा हूँ। 
 तब अर्जुन ने कहा -
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।।

(4.4) 
।।4.4।। अर्जुन ने कहा -- आपका जन्म अपर अर्थात् पश्चात का है और विवस्वान् का जन्म (आपके) पूर्व का है, इसलिये यह मैं कैसे जानूँ कि (सृष्टि के) आदि में आपने (इस योग को) कहा था?
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।4.5।।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।4.8।।

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।4.11।।

      उत्तर में श्री कृष्ण ने कहा -हे अर्जुन ! मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म व्यतीत हो चुके है , उन्हें तुम नहीं जानते , मैं जानता हूँ। मैं जन्मरहित और मायाधीश हूँ और सभी मायाधीन मनुष्यों का अधीश्वर हूँ। अपनी प्रकृति (दैवी माया) की सहायता से मैं शरीर धारण करता हूँ।
जब धर्म की ग्लानि और अधर्म का अभ्युत्थान होता है, तब मैं मनुष्यों को सहायता देने के लिए संसार में आविर्भूत होता हूँ। साधुओं के परित्राण , पापियों के विनाश तथा धर्मसंस्थापन के लिए मैं प्रत्येक युग में अवतीर्ण होता हूँ। जो जिस भाव से मुझे चाहता है , मैं उसी भाव से उसके पास जाता हूँ। किन्तु हे पार्थ जान लो कोई भी मेरे मार्ग से विच्युत नहीं हो सकता। 
 
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।।4.14।।

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्।।4.15।। 

कोई भी कर्म मुझे छू नहीं सकता। कर्मफल में मेरी आकांक्षा नहीं है। जो मुझे इस प्रकार जानता है , वह कर्म करने के कौशल को जान लेता है , और कर्म के द्वारा वह कभी आबद्ध नहीं होता। 
प्राचीन काल के राजर्षि लोग इस निष्काम कर्म के तत्त्व को जानते थे , इस कारण वे निश्चिन्त चित्त से कर्म में नियुक्त होते थे।  हे अर्जुन ! तुम भी उसी पद्धति (Be and Make की पद्धति) से कर्म किये जाओ।   
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।
स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्।।4.18।।
जो घोर कर्म के बीच गम्भीर शान्त भाव रख सकते हैं और गंभीर शान्त भाव में प्रबल कर्म का दर्शन करते हैं , वे ही यथार्थ ज्ञानी हैं। 
अब प्रश्न यह उठता है कि प्रत्येक इन्द्रिय और प्रत्येक स्नायु के कर्म-परायण होने के बावजूद आपके मन में गहरी शान्ति है क्या ? कोई पदार्थ /कोई घटना आपके मन -बुद्धि को -निश्चल तत्त्व में प्रतिष्ठित रहने से  विचलित तो नहीं करता ? यदि आप में शान्ति है और आपका मन चंचल नहीं होता तो आप योगी और मुक्त हैं- जीवनमुक्त हैं ? अन्यथा नहीं।  

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।।4.19।।  
।।4.19।। जिसकी प्रत्येक कर्मचेष्टा -कामना और फल पाने की आकांक्षा से रहित और पूर्णतः निःस्वार्थ होते हैं , उसीको सत्यदर्शी लोग ज्ञानी (विवेकी) कहते हैं। बिना कर्म किये हम क्षणभर भी नहीं रह सकते। काम तो करना ही होगा। 
जिनकी सारी कर्मचेष्टायें फलतृष्णा और स्वार्थबुद्धि से रहित हैं , उन्होंने ज्ञानाग्नि के द्वारा समस्त कर्मों के बन्धन को दग्ध कर लिया है और वे ही ज्ञानी हैं।  भविष्य में विषयोपभोग के द्वारा सुख पाने की बुद्धि की योजना को कामना (desire) कहते हैं । कामना करने का अर्थ है कि परिस्थितियों को अपने अनुकूल होने का आग्रह करना। इस प्रकार वर्तमान परिस्थितियों से सदा असन्तुष्ट रहते हुये भविष्य में उन्हें अनुकूल बनाने के प्रयत्न में , हम अपने आप को भ्रमित करके अनेक विघ्नों का सामना करते रहते हैं। इसका आशय इतना ही है कि ज्ञानी भक्त कर्म करते समय काल्पनिक भय चिन्ता आदि में अपने मन की शक्ति विनष्ट नहीं करता। वेदान्त मनुष्य की बुद्धि की उपेक्षा नहीं करता है, वह उसे आत्मा (इष्टदेव)  में प्रतिष्ठित रखता है।  

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।

कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः।।4.20।।

।।4.20।। जो पुरुष,  कर्मफलासक्ति को त्यागकर,  नित्यतृप्त और सब आश्रयों से रहित है वह कर्म में प्रवृत्त होते हुए भी (वास्तव में) कुछ भी नहीं करता" है।। 
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।6.5।।
।।6.5।। तुम स्वयं अपना बन्धु तथा स्वयं ही अपने शत्रु हो। आत्मा (अविशिभूत बुद्धि) के अतिरिक्त अन्य कोई शत्रु नहीं है। 
यही गीता का अन्तिम और श्रेष्ठ उपदेश है।  - स्वामी विवेकानन्द। 
महाभारत के भीष्मपर्व के अन्तर्गत भगवद्गीता आती है। गीता में कुल 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं।

 गीता सार्वजनिक धर्मग्रंथ है। श्रीरामकृष्ण का जीवन गीता-तत्त्व का जीवंत भाष्य है। " मनुष्य जिस किसी भाव से मेरी आराधना करता है, उसी भाव से मैं उस पर कृपा करता हूँ। गीता में उपदिष्ट चारो योग -ज्ञान , कर्म , भक्ति और राजयोग में से प्रत्येक मुक्ति का मार्ग है। 

गीता की अन्तिम बात और सबसे गोपनीय रहस्य है - श्री भगवान की अनन्य शरणागति के द्वारा भागवत जीवन की प्राप्ति -
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।।18.65।।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।18.66।।

अर्थात , तुम अपनी बुद्धि को मुझमें समाहित करो , मेरे भक्त बनो , मेरे पूजनशील होओ , मुझे नमस्कार करो। इस प्रकार मेरी कृपा से लब्ध ज्ञान की सहायता तुम मुझे ही प्राप्त होंगे। मैं निश्चयपूर्वक तुमसे कहता हूँ , क्योंकि तुम मेरे अत्यन्त प्रिय हो ! 
तुम सभी धर्मों और अधर्मों का परित्याग कर केवल मुझि में भक्ति रखो , इसी से सबकुछ होगा - इस दृढ़ विश्वास में प्रतिष्ठित होकर केवल मेरे शरणागत हो जाओ ! इससे मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक न करो। यही गीता का श्रेष्ठतम उपदेश है। 

1.अर्जुन विषाद योग :

 युद्ध के परिणाम पर शोक प्रकट करना

2.सांख्य योग : 

विश्लेषणात्मक ज्ञान का योग

3.कर्मयोग : 

कर्म का विज्ञान

4. ज्ञान कर्म संन्यास योग : 

ज्ञान का योग और कर्म करने का विज्ञान

5.कर्म संन्यास योग : 

वैराग्य का योग

6.ध्यानयोग : 

ध्यान का योग

7. ज्ञान विज्ञान योग :

 दिव्य ज्ञान की अनुभूति द्वारा प्राप्त योग

8.अक्षर ब्रह्म योग :

 अविनाशी भगवान का योग

9.राज विद्या योग : 

राज विद्या द्वारा योग

10.  विभूति योग :

 भगवान के अनन्त वैभवों की स्तुति द्वारा प्राप्त योग

11. विश्वरूप दर्शन योग :

 भगवान के विराट रूप के दर्शन का योग

12. भक्ति योग :

 भक्ति का विज्ञान

13. क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ विभाग योग :

 योग द्वारा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विभेद को जानना

14. गुण- त्रय विभाग योग : 

त्रिगुणों के ज्ञान का योग

15. पुरुषोत्तम योग :

 सर्वोच्च दिव्य स्वरूप योग

16. दैवासुर सम्पद् विभाग योग :

 दैवीय और आसुरी प्रकृति में भेद का योग

17. श्रद्धा- त्रय विभाग योग : 

श्रद्धा के तीन विभागों के ज्ञान का योग

18. मोक्ष-संन्यास योग :

 संन्यास में पूर्णता और शरणागति का योग
    
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शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

⚜️️🔱निःस्वार्थपरता देवत्व की ओर ले जाती है। ⚜️️🔱Selflessness leads to divinity.⚜️️🔱

युगाचार्य स्वामी विवेकानन्द  

मानवजाति के श्रेष्ठ शिक्षक 

    निःस्वार्थपरता मनुष्य को क्रमशः देवत्व की ओर ले जाती है, और स्वार्थपरता ही मनुष्य को धीरे -धीरे कायरता (पशुत्व) की ओर ले जाती है। तो क्या हमलोग स्वार्थशून्य होने का अभ्यास करके साहसी और वीर के जैसा जीवन व्यतीत नहीं कर सकते हैं ? जब महामण्डल के संस्थापक सचिव श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय (पूज्य नवनीदा) सहित महामण्डल के अन्य कई वरिष्ठ भ्रातागण, नौकरी , व्यापार , किसानी या अन्य सामान्य गृहस्थ का जीवन जीते हुए भी निःस्वार्थपरता का अभ्यास करके वीरों  के जैसा जीवन जी सकते हैं,  तो हमलोग भी वैसा अवश्य कर सकते हैं। कायरता को अपना संगी बना से हमें कुछ भी प्राप्त नहीं होता; बल्कि श्रीरामकृष्ण के शब्दों में हम अपना 'मान और हूँष' दोनों खो देते हैं - अर्थात देवदुर्लभ 'मनुष्य-जन्म प्राप्त करने का गौरव और आत्म-सम्मान' दोनों खो देते हैं और अपमान भरी ज़िंदगी जीते हैं।

यद्यपि ऐसा लग सकता है कि समाज तो हमें स्वार्थी होने की शिक्षा देता है। लेकिन दूसरी ओर, समाज में निःस्वार्थपरता का पाठ भी है, जिसे हम बड़ी चालाकी से नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन दोनों दुःख और पीड़ा से भर जाते हैं। पहली नज़र में यह कितना भी सुंदर और सुखद क्यों न लगे, असल में यह मुर्दा शरीर को खुशबूदार फूलों से सजाने जैसा है। जो कुछ ही दिनों बाद सड़- गल जाता है और समाज को प्रदूषित करता है।

     साधारण लोगों के लिए पूरी तरह से निस्वार्थपर हो पाना बहुत कठिन है। किन्तु थोड़ा थोड़ा करते हुए हमलोग भी इसका अभ्यास तो कर ही सकते हैं ?  मृत्यु जब निश्चित है, तो किसी महान उद्देश्य के लिए ही शरीर का त्याग करना श्रेय है स्वामी विवेकानन्द ने कहा था , संसार के धर्म प्राणहीन उपहास की वस्तु हो गए हैं , आज संसार को जो चाहिए वह है चरित्र। जगत को ऐसे मनुष्यों की आवश्यकता है जिसका जीवन -प्रेमपूर्ण और निःस्वार्थ हो। मानवजाति के श्रेष्ठ शिक्षक स्वामी विवेकानन्द , सम्पूर्ण मानवजाति की शिक्षा के लिए जो हमलोगों को दिए हैं , उन्हीं में से केवल 5 गुणों के ऊपर इतने दिनों तक लगातार चर्चा हुई है। 

    पारम्परिक शिक्षा के साथ साथ इस चर्चा में स्वामी विवेकानन्द की शिक्षा भी हमारा परिवार और समाज यदि ग्रहण करे तो देश में बहुत जल्दी अच्छे परिवर्तन होंगे;  और वह परिवर्तन अवश्य परिवार, समाज और देश को क्रमश विकास की दिशा में ले जायेगा। स्वामी विवेकानन्द द्वारा मानवजाति के लिए दी गयी समस्त शिक्षाओं में मुख्य शिक्षा थी - 'आदर्श मनुष्य निर्माण शिक्षा के साथ आदर्श चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा।'  इसीलिए हम सबों को यह स्मरण रखना होगा कि - स्वामीजी की शिक्षा -पद्धति 'Be and Make ' मनुष्य (आर्य =श्रेष्ठ, सभ्य, ज्ञानी) बनो और बनाओ !  ग्रहण करने से ही हमारे परिवार , समाज और देश के प्रत्येक छात्र-छात्राएं , स्त्री-पुरुष एक आदर्श चरित्र का अधिकारी मनुष्य बन सकेंगे। और उन चरित्रवान मनुष्यों की युवा पीढ़ी  निर्माण के फलस्वरूप देश में बहुत जल्द सकारात्मक बदलाव आएंगे, और ये बदलाव निस्संदेह परिवार, समाज और राष्ट्र को लगातार प्रगति की ओर ले जाएंगे। 

इसलिए, आइए सबसे पहले हम मानव जाति के सबसे महान शिक्षक स्वामी विवेकानंद द्वारा सिखाई गई "आदर्श मनुष्य निर्माणकारी शिक्षा" (पवित्र-त्रयी जैसा मनुष्य-निर्माण जिसको जगत का कुछ भी नहीं चाहिए - कामिनी-कांचन और नाम-यश कुछ भी नहीं चाहिए " त्याग और सेवा की इस शिक्षा) को सम्पूर्ण रूप  से पहले अपने जीवन में अपनाएं और उसका पालन करें। इसके बाद ही  हम स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं को समाज में ज़्यादा लड़कों और लड़कियों तक, यानी और भी ज़्यादा लोगों तक फैला सकते हैं। और साथ ही, अपने चरित्र को बनाए रखकर, हम दूसरों को सिखा सकते हैं कि वे अपना चरित्र कैसे बनाएं। And at the same time, by maintaining our own character, we can teach others how to build their character.

अगर हम इस प्रकार एक -दूसरे के साथ परस्पर मिलजुल कर काम करें और  "आदर्श मनुष्य निर्माण और चरित्र-निर्माण कारी शिक्षा" का प्रचार-प्रसार परिवार , समाज और सम्पूर्ण भारत में कर सकें, तभी हम स्वामी विवेकानन्द द्वारा हमारे देश की उन्नति के निमित्त दी गयी सहायता के कर्ज को, कम से कम कुछ हद तक, अवश्य चुका पाएंगे।

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प्रकृतिं परमामभयां वरदां

 या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ 

माँ श्री सारदा देवी 

[Kshemankari/ Thakurmani/ Saradamani Mukhopadhyay] 

प्रकृतिं परमामभयां वरदां

नररूपधरां जनतापहराम् ।

शरणागत_सेवक_तोषकरीं

प्रणमामि परां जननीं जगताम् ॥१॥

गुणहीनसुतानपराधयुतान्

कृपयाऽद्य समुद्धर मोहगतान् ।

तरणीं भवसागरपारकरीं

प्रणमामि परां जननीं जगताम् ॥२॥

विषयं कुसुमं परिहृत्य सदा

चरणाम्बुरुहामृतशान्तिसुधाम् ।

पिब भृंगमनो भवरोगहरां

प्रणमामि परां जननीं जगताम् ॥३॥

कृपां कुरु महादेवि सुतेषु प्रणतेषु च ।

चरणाश्रयदानेन कृपामयि नमोऽस्तु ते ॥४॥

लज्जापटावृते नित्यं सारदे ज्ञानदायिके ।

पापेभ्यो नः सदा रक्ष कृपामयि नमोऽस्तु ते ॥५॥

रामकृष्णगतप्राणां तन्नामश्रवणप्रियाम् ।

तद्भावरञ्जिताकारां प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥६॥

पवित्रं चरितं यस्याः पवित्रं जीवनं तथा ।

पवित्रतास्वरूपिण्यै तस्यै कुर्मो नमो नमः ॥७॥

देवीं प्रसन्नां प्रणतार्तिहन्त्रीं

योगीन्द्रपूज्यां युगधर्मपात्रीम् ।

तां सारदां भक्तिविज्ञानदात्रीं

दयास्वरूपां प्रणमामि नित्यम् ॥८॥

स्नेहेन बध्नासि मनोऽस्मदीयं

दोषानशेषान् सगुणीकरोषि ।

अहेतुना नो दयसे सदोषान्

स्वाङ्के गृहीत्वा यदिदं विचित्रम् ॥९॥

प्रसीद मातर्विनयेन याचे

नित्यं भव स्नेहवती सुतेषु ।

प्रेमैकबिन्दुं चिरदग्धचित्ते

विषिञ्च चित्तं कुरु नः सुशान्तम् ॥१०॥

जननीं सारदां देवीं रामकृष्णं जगद्गुरुम् ।

पादपद्मे तयोः श्रित्वा प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥११॥

Her Teachings

1. I am the mother of the wicked, as I am the mother of virtuous. Whenever you are in distress, just say to yourself “I have a mother”.

2.To a mother a son is always a son.

3. Everyone can break down something, but how many can build it up?

4. If you do not call upon God- indeed many people never even remember Him- what does it matter to Him? It is your misfortune. Such is the Maya of God ; He keeps them ignorant of Himself saying, “They are happy enough, let them be so!”

5. As long as a man has a desires there is no end to his transmigration. It is the desires alone that make him take one body after another. Rebirth is inevitable so long as one has desires.

6. The happiness of the world is transitory. The less you become attached to the world, the more you enjoy peace of mind.

7. The Master saw ducklings floating, diving and swimming in the water of Halder’s pond, but there would be not a drop of water sticking to them—they would just shake it off. He gave their example and said that in this world one should live like these—live in the midst of worldly possessions, but from one’s mind one should completely shake off the attachment for them. The Master used to teach everybody to live in the world completely unattached.

8. I tell you one thing—if you want peace, do not find fault with others. Rather see your own faults. Learn to make the world your own. No one is a stranger, my child; the whole world is your own.

9. Man finds faults in others after bringing down his own mind to that level. Does anything ever happen to another if you enumerate his faults? It only injures you. This has been my attitude. Hence I cannot see anybody’s faults. If a man does a trifle for me, I try to remember him even for that. To see the faults of others! One should never do it. I never do so. Forgiveness is Tapasya.

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पवित्र माँ (Holy Mother) श्री सारदा देवी श्री रामकृष्ण परमहंस की पत्नी और ' रामकृष्ण मठ और मिशन तथा 'अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल ' (शरत और अमजद) दोनों की आध्यात्मिक माता (spiritual mother) हैं। 

'रामकृष्ण मठ और मिशन' का आदर्श वाक्य है - "आत्मनो मोक्षार्थं जगत हिताय च" (Atmanah mokshartham jagat hitaya ca)! यह ऋग्वेद का एक श्लोक है जिसे स्वामी विवेकानंद ने अपनाया और यह रामकृष्ण मिशन का आदर्श वाक्य बन गया। जिसका अर्थ है "अपनी आत्मा की मुक्ति के लिए और जगत (संसार) के कल्याण के लिए !" यह महावाक्य मानव जीवन के दोहरे उद्देश्य को दर्शाता है: 'व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति (मोक्ष) और समाज के प्रति सेवाभाव (जगत हित।)'  जिसका उद्देश्य व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ दुनिया की सेवा करना है, यानी अपना उद्धार भी और समाज की भलाई भी।

उसी प्रकार 'अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल' एवं 'सारदा नारी संगठन' दोनों आदर्श वाक्य 'Be and Make' तथा 'चरैवेति, चरैवेति' है। यह आदर्श वाक्य भी स्वामी विवेकानन्द के द्वारा प्रदत्त और ऋग्वेद में आधारित दो आदर्श वाक्य हैं - जिसका अर्थ है, " तुम स्वयं एक आदर्श मनुष्य बनो और दूसरों को भी आदर्श मनुष्य बनने में सहायता करो !" इसे महामण्डल के संस्थापक सचिव श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय (पूज्य नवनीदा) ने अपनाया और यह 'अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल' एवं 'सारदा नारी संगठन' दोनों का आदर्श वाक्य बन गया। ये दोनों आदर्श वाक्य मानव जीवन के दोहरे उद्देश्य को दर्शाते है: ' स्वयं आदर्श मनुष्य (आर्य =श्रेष्ठ, सभ्य, ज्ञानी) बनो, और दूसरों को भी आदर्श मनुष्य  बनने में सहायता करो।' 

"कृण्वन्तो विश्वम् आर्यम्" (Krinvanto Vishwam Aryam) ऋग्वेद (9.63.5) का एक मंत्र है।  जिसका अर्थ है "समस्त विश्व को आर्य (श्रेष्ठ, सभ्य, ज्ञानी) बनाओ !" जो मनुष्य मात्र को श्रेष्ठ कर्म करते हुए (3H विकास के 5 अभ्यास करते हुए) स्वयं को और सम्पूर्ण विश्व को श्रेष्ठतर बनाने की प्रेरणा देता है। इसका मतलब है कि: हमें स्वयं अपने जीवन और आचरण में चरित्र के श्रेष्ठ गुणों, अच्छे कर्मों और अच्छे स्वभाव को अपनाने का प्रयास करते हुए, 'simultaneously' साथ -साथ दूसरों को भी ज्ञानी और श्रेष्ठ बनाने में मदद करनी चाहिए।  यह एक ऐसा आदर्श है जो तार्किकता, विज्ञान और कर्तव्यनिष्ठा से भरा हुआ है। 

यह ऋग्वेद की आज्ञा है कि मनुष्य को अज्ञान (अविद्या) और अशुभ कार्यों को (पंच -क्लेश) दूर करके परिवार , समाज , देश और पूरे विश्व में ज्ञान और सुसंस्कार फैलाना चाहिए। महामण्डल के प्रतीक चिन्ह में गोल घेरे के दोनों और बने , 7 -7 वज्र के निशान प्रवृत्ति मार्ग तथा निवृत्ति मार्ग के सप्तऋषियों के प्रतीक हैं ,  जो भारत के युवाओं से 'चरैवेति -चरैवेति' करते हुए  भारत को तथा उसके माध्यम से सम्पूर्ण विश्व को एक बेहतर और अधिक सभ्य स्थान बनाने का आह्वान करते हुए विश्व-परिक्रमा कर रहे हैं । 

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