"चींटी के पग नूपुर बाजे सो भी साहब सुनता है।"
इस ब्लॉग में व्यक्त कोई भी विचार किसी व्यक्ति विशेष के दिमाग में उठने वाले विचारों का बहिर्प्रवाह नहीं है! इस ब्लॉग में अभिव्यक्त प्रत्येक विचार स्वामी विवेकानन्द जी से उधार लिया गया है ! ब्लॉग में वर्णित विचारों को '' एप्लाइड विवेकानन्दा इन दी नेशनल कान्टेक्स्ट" कहा जा सकता है। एवं उनके शक्तिदायी विचारों को यहाँ उद्धृत करने का उद्देश्य- स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाओं को अपने व्यावहारिक जीवन में प्रयोग करने के लिए युवाओं को 'अनुप्राणित' करना है।
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बुधवार, 4 फ़रवरी 2026
⚜️️🔱जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति क्या है ? ।। Yug-Purush ।। What is Jeevan Mukti and Videha Mukti ?⚜️️🔱
सोमवार, 2 फ़रवरी 2026
⚜️️🔱श्रीमद् भगवद्गीता : अध्याय-1. अर्जुन विषाद योग : युद्ध के परिणाम पर शोक प्रकट करना⚜️️🔱
अध्याय - 1.
अर्जुन विषाद योग
[युद्ध के परिणाम पर शोक प्रकट करना]
भगवद्गीता का उपदेश एक ही वंश के दो चचेरे भाइयों कौरव और पाण्डवों के मध्य हुए महाभारत युद्ध की रणभूमि पर दिया गया है।
भगवद्गीता का प्रारंभ राजा धृतराष्ट्र और उसके मंत्री संजय के वार्तालाप से होता है। चूंकि धृतराष्ट्र नेत्रहीन था इसलिए वह व्यक्तिगत रूप से युद्ध में उपस्थित नहीं हो सका। अत: संजय उसे युद्धभूमि पर घट रही घटनाओं का पूर्ण सजीव विवरण सुना रहा था। संजय महाभारत के प्रख्यात रचयिता वेदव्यास के शिष्य थे। ऋषि वेदव्यास अपनी अलौकिक शक्ति के द्वारा सुदूर प्रदेशों में घट रही घटनाओं को प्रत्यक्ष रूप से देखने में समर्थ थे। अपने गुरु की अनुकंपा से संजय ने भी दूरदृष्टि की दिव्य चमत्कारिक शक्ति प्राप्त की थी। इस प्रकार से वह युद्ध भूमि में घटित सभी घटनाओं को दूर से देख सका।
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February 1, 2026 :
रविवार, 1 फ़रवरी 2026
⚜️️🔱गीता ध्यान [Gita Dhyan] ⚜️️🔱
गीता ध्यान
शुक्रवार, 30 जनवरी 2026
⚜️️🔱निःस्वार्थपरता देवत्व की ओर ले जाती है। ⚜️️🔱Selflessness leads to divinity.⚜️️🔱
युगाचार्य स्वामी विवेकानन्द
मानवजाति के श्रेष्ठ शिक्षक
निःस्वार्थपरता मनुष्य को क्रमशः देवत्व की ओर ले जाती है, और स्वार्थपरता ही मनुष्य को धीरे -धीरे कायरता (पशुत्व) की ओर ले जाती है। तो क्या हमलोग स्वार्थशून्य होने का अभ्यास करके साहसी और वीर के जैसा जीवन व्यतीत नहीं कर सकते हैं ? जब महामण्डल के संस्थापक सचिव श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय (पूज्य नवनीदा) सहित महामण्डल के अन्य कई वरिष्ठ भ्रातागण, नौकरी , व्यापार , किसानी या अन्य सामान्य गृहस्थ का जीवन जीते हुए भी निःस्वार्थपरता का अभ्यास करके वीरों के जैसा जीवन जी सकते हैं, तो हमलोग भी वैसा अवश्य कर सकते हैं। कायरता को अपना संगी बना से हमें कुछ भी प्राप्त नहीं होता; बल्कि श्रीरामकृष्ण के शब्दों में हम अपना 'मान और हूँष' दोनों खो देते हैं - अर्थात देवदुर्लभ 'मनुष्य-जन्म प्राप्त करने का गौरव और आत्म-सम्मान' दोनों खो देते हैं और अपमान भरी ज़िंदगी जीते हैं।
यद्यपि ऐसा लग सकता है कि समाज तो हमें स्वार्थी होने की शिक्षा देता है। लेकिन दूसरी ओर, समाज में निःस्वार्थपरता का पाठ भी है, जिसे हम बड़ी चालाकी से नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन दोनों दुःख और पीड़ा से भर जाते हैं। पहली नज़र में यह कितना भी सुंदर और सुखद क्यों न लगे, असल में यह मुर्दा शरीर को खुशबूदार फूलों से सजाने जैसा है। जो कुछ ही दिनों बाद सड़- गल जाता है और समाज को प्रदूषित करता है।
साधारण लोगों के लिए पूरी तरह से निस्वार्थपर हो पाना बहुत कठिन है। किन्तु थोड़ा थोड़ा करते हुए हमलोग भी इसका अभ्यास तो कर ही सकते हैं ? मृत्यु जब निश्चित है, तो किसी महान उद्देश्य के लिए ही शरीर का त्याग करना श्रेय है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था , संसार के धर्म प्राणहीन उपहास की वस्तु हो गए हैं , आज संसार को जो चाहिए वह है चरित्र। जगत को ऐसे मनुष्यों की आवश्यकता है जिसका जीवन -प्रेमपूर्ण और निःस्वार्थ हो। मानवजाति के श्रेष्ठ शिक्षक स्वामी विवेकानन्द , सम्पूर्ण मानवजाति की शिक्षा के लिए जो हमलोगों को दिए हैं , उन्हीं में से केवल 5 गुणों के ऊपर इतने दिनों तक लगातार चर्चा हुई है।
पारम्परिक शिक्षा के साथ साथ इस चर्चा में स्वामी विवेकानन्द की शिक्षा भी हमारा परिवार और समाज यदि ग्रहण करे तो देश में बहुत जल्दी अच्छे परिवर्तन होंगे; और वह परिवर्तन अवश्य परिवार, समाज और देश को क्रमश विकास की दिशा में ले जायेगा। स्वामी विवेकानन्द द्वारा मानवजाति के लिए दी गयी समस्त शिक्षाओं में मुख्य शिक्षा थी - 'आदर्श मनुष्य निर्माण शिक्षा के साथ आदर्श चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा।' इसीलिए हम सबों को यह स्मरण रखना होगा कि - स्वामीजी की शिक्षा -पद्धति 'Be and Make ' मनुष्य (आर्य =श्रेष्ठ, सभ्य, ज्ञानी) बनो और बनाओ ! ग्रहण करने से ही हमारे परिवार , समाज और देश के प्रत्येक छात्र-छात्राएं , स्त्री-पुरुष एक आदर्श चरित्र का अधिकारी मनुष्य बन सकेंगे। और उन चरित्रवान मनुष्यों की युवा पीढ़ी निर्माण के फलस्वरूप देश में बहुत जल्द सकारात्मक बदलाव आएंगे, और ये बदलाव निस्संदेह परिवार, समाज और राष्ट्र को लगातार प्रगति की ओर ले जाएंगे।
इसलिए, आइए सबसे पहले हम मानव जाति के सबसे महान शिक्षक स्वामी विवेकानंद द्वारा सिखाई गई "आदर्श मनुष्य निर्माणकारी शिक्षा" (पवित्र-त्रयी जैसा मनुष्य-निर्माण जिसको जगत का कुछ भी नहीं चाहिए - कामिनी-कांचन और नाम-यश कुछ भी नहीं चाहिए " त्याग और सेवा की इस शिक्षा) को सम्पूर्ण रूप से पहले अपने जीवन में अपनाएं और उसका पालन करें। इसके बाद ही हम स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं को समाज में ज़्यादा लड़कों और लड़कियों तक, यानी और भी ज़्यादा लोगों तक फैला सकते हैं। और साथ ही, अपने चरित्र को बनाए रखकर, हम दूसरों को सिखा सकते हैं कि वे अपना चरित्र कैसे बनाएं। And at the same time, by maintaining our own character, we can teach others how to build their character.
अगर हम इस प्रकार एक -दूसरे के साथ परस्पर मिलजुल कर काम करें और "आदर्श मनुष्य निर्माण और चरित्र-निर्माण कारी शिक्षा" का प्रचार-प्रसार परिवार , समाज और सम्पूर्ण भारत में कर सकें, तभी हम स्वामी विवेकानन्द द्वारा हमारे देश की उन्नति के निमित्त दी गयी सहायता के कर्ज को, कम से कम कुछ हद तक, अवश्य चुका पाएंगे।
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प्रकृतिं परमामभयां वरदां

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
[Kshemankari/ Thakurmani/ Saradamani Mukhopadhyay]
प्रकृतिं परमामभयां वरदां
नररूपधरां जनतापहराम् ।
शरणागत_सेवक_तोषकरीं
प्रणमामि परां जननीं जगताम् ॥१॥
गुणहीनसुतानपराधयुतान्
कृपयाऽद्य समुद्धर मोहगतान् ।
तरणीं भवसागरपारकरीं
प्रणमामि परां जननीं जगताम् ॥२॥
विषयं कुसुमं परिहृत्य सदा
चरणाम्बुरुहामृतशान्तिसुधाम् ।
पिब भृंगमनो भवरोगहरां
प्रणमामि परां जननीं जगताम् ॥३॥
कृपां कुरु महादेवि सुतेषु प्रणतेषु च ।
चरणाश्रयदानेन कृपामयि नमोऽस्तु ते ॥४॥
लज्जापटावृते नित्यं सारदे ज्ञानदायिके ।
पापेभ्यो नः सदा रक्ष कृपामयि नमोऽस्तु ते ॥५॥
रामकृष्णगतप्राणां तन्नामश्रवणप्रियाम् ।
तद्भावरञ्जिताकारां प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥६॥
पवित्रं चरितं यस्याः पवित्रं जीवनं तथा ।
पवित्रतास्वरूपिण्यै तस्यै कुर्मो नमो नमः ॥७॥
देवीं प्रसन्नां प्रणतार्तिहन्त्रीं
योगीन्द्रपूज्यां युगधर्मपात्रीम् ।
तां सारदां भक्तिविज्ञानदात्रीं
दयास्वरूपां प्रणमामि नित्यम् ॥८॥
स्नेहेन बध्नासि मनोऽस्मदीयं
दोषानशेषान् सगुणीकरोषि ।
अहेतुना नो दयसे सदोषान्
स्वाङ्के गृहीत्वा यदिदं विचित्रम् ॥९॥
प्रसीद मातर्विनयेन याचे
नित्यं भव स्नेहवती सुतेषु ।
प्रेमैकबिन्दुं चिरदग्धचित्ते
विषिञ्च चित्तं कुरु नः सुशान्तम् ॥१०॥
जननीं सारदां देवीं रामकृष्णं जगद्गुरुम् ।
पादपद्मे तयोः श्रित्वा प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥११॥
Her Teachings
1. I am the mother of the wicked, as I am the mother of virtuous. Whenever you are in distress, just say to yourself “I have a mother”.
2.To a mother a son is always a son.
3. Everyone can break down something, but how many can build it up?
4. If you do not call upon God- indeed many people never even remember Him- what does it matter to Him? It is your misfortune. Such is the Maya of God ; He keeps them ignorant of Himself saying, “They are happy enough, let them be so!”
5. As long as a man has a desires there is no end to his transmigration. It is the desires alone that make him take one body after another. Rebirth is inevitable so long as one has desires.
6. The happiness of the world is transitory. The less you become attached to the world, the more you enjoy peace of mind.
7. The Master saw ducklings floating, diving and swimming in the water of Halder’s pond, but there would be not a drop of water sticking to them—they would just shake it off. He gave their example and said that in this world one should live like these—live in the midst of worldly possessions, but from one’s mind one should completely shake off the attachment for them. The Master used to teach everybody to live in the world completely unattached.
8. I tell you one thing—if you want peace, do not find fault with others. Rather see your own faults. Learn to make the world your own. No one is a stranger, my child; the whole world is your own.
9. Man finds faults in others after bringing down his own mind to that level. Does anything ever happen to another if you enumerate his faults? It only injures you. This has been my attitude. Hence I cannot see anybody’s faults. If a man does a trifle for me, I try to remember him even for that. To see the faults of others! One should never do it. I never do so. Forgiveness is Tapasya.
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पवित्र माँ (Holy Mother) श्री सारदा देवी श्री रामकृष्ण परमहंस की पत्नी और ' रामकृष्ण मठ और मिशन तथा 'अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल ' (शरत और अमजद) दोनों की आध्यात्मिक माता (spiritual mother) हैं।
'रामकृष्ण मठ और मिशन' का आदर्श वाक्य है - "आत्मनो मोक्षार्थं जगत हिताय च" (Atmanah mokshartham jagat hitaya ca)! यह ऋग्वेद का एक श्लोक है जिसे स्वामी विवेकानंद ने अपनाया और यह रामकृष्ण मिशन का आदर्श वाक्य बन गया। जिसका अर्थ है "अपनी आत्मा की मुक्ति के लिए और जगत (संसार) के कल्याण के लिए !" यह महावाक्य मानव जीवन के दोहरे उद्देश्य को दर्शाता है: 'व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति (मोक्ष) और समाज के प्रति सेवाभाव (जगत हित।)' जिसका उद्देश्य व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ दुनिया की सेवा करना है, यानी अपना उद्धार भी और समाज की भलाई भी।
उसी प्रकार 'अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल' एवं 'सारदा नारी संगठन' दोनों आदर्श वाक्य 'Be and Make' तथा 'चरैवेति, चरैवेति' है। यह आदर्श वाक्य भी स्वामी विवेकानन्द के द्वारा प्रदत्त और ऋग्वेद में आधारित दो आदर्श वाक्य हैं - जिसका अर्थ है, " तुम स्वयं एक आदर्श मनुष्य बनो और दूसरों को भी आदर्श मनुष्य बनने में सहायता करो !" इसे महामण्डल के संस्थापक सचिव श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय (पूज्य नवनीदा) ने अपनाया और यह 'अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल' एवं 'सारदा नारी संगठन' दोनों का आदर्श वाक्य बन गया। ये दोनों आदर्श वाक्य मानव जीवन के दोहरे उद्देश्य को दर्शाते है: ' स्वयं आदर्श मनुष्य (आर्य =श्रेष्ठ, सभ्य, ज्ञानी) बनो, और दूसरों को भी आदर्श मनुष्य बनने में सहायता करो।'
"कृण्वन्तो विश्वम् आर्यम्" (Krinvanto Vishwam Aryam) ऋग्वेद (9.63.5) का एक मंत्र है। जिसका अर्थ है "समस्त विश्व को आर्य (श्रेष्ठ, सभ्य, ज्ञानी) बनाओ !" जो मनुष्य मात्र को श्रेष्ठ कर्म करते हुए (3H विकास के 5 अभ्यास करते हुए) स्वयं को और सम्पूर्ण विश्व को श्रेष्ठतर बनाने की प्रेरणा देता है। इसका मतलब है कि: हमें स्वयं अपने जीवन और आचरण में चरित्र के श्रेष्ठ गुणों, अच्छे कर्मों और अच्छे स्वभाव को अपनाने का प्रयास करते हुए, 'simultaneously' साथ -साथ दूसरों को भी ज्ञानी और श्रेष्ठ बनाने में मदद करनी चाहिए। यह एक ऐसा आदर्श है जो तार्किकता, विज्ञान और कर्तव्यनिष्ठा से भरा हुआ है।
यह ऋग्वेद की आज्ञा है कि मनुष्य को अज्ञान (अविद्या) और अशुभ कार्यों को (पंच -क्लेश) दूर करके परिवार , समाज , देश और पूरे विश्व में ज्ञान और सुसंस्कार फैलाना चाहिए। महामण्डल के प्रतीक चिन्ह में गोल घेरे के दोनों और बने , 7 -7 वज्र के निशान प्रवृत्ति मार्ग तथा निवृत्ति मार्ग के सप्तऋषियों के प्रतीक हैं , जो भारत के युवाओं से 'चरैवेति -चरैवेति' करते हुए भारत को तथा उसके माध्यम से सम्पूर्ण विश्व को एक बेहतर और अधिक सभ्य स्थान बनाने का आह्वान करते हुए विश्व-परिक्रमा कर रहे हैं ।
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