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बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति क्या है ? ।। Yug-Purush ।। What is Jeevan Mukti and Videha Mukti ?

 "चींटी के पग नूपुर बाजे सो भी साहब सुनता है।" 


जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति क्या है ? 

[।। Yug-Purush ।। What is Jeevan Mukti and Videha Mukti ?] 

जीतेजी मुक्ति या भगवत-पाप्ति कोई ऐसी चीज नहीं है , जो किसी परलोक में पहुँचने से मिलती है। मुक्ति तो जब होगी इसी जीवन में होगी। जब कभी हो , मरने के बाद नहीं जीवित रहते ही मुक्ति होती है। मुक्ति के लिए दो शब्द है, एक शब्द है जीवनमुक्ति - ('निश्चल तत्त्वे जीवनमुक्ति)।' और दूसरा शब्द है विदेहमुक्ति। अर्थात देह का न रहना। विदेहमुक्ति का अर्थ है जीतेजी जो मुक्त है , उसका देह न रहना। जीवनमुक्त है उसका देह छूटना अभी बाकी है। मानसिक तौर से तो वो मुक्त हो गया, पर शरीर का अभी जेल से बाहर आना बाकी है। जैसे जेल में बन्द कैदी कोर्ट से छूट गया , पर अभी जेल के भीतर ही है। मानसिक तौर से तो वो मुक्त हो गया पर शरीर और व्यक्ति का जेल से बाहर आना बाकी है। शरीर के रहते हुए जो ज्ञान को उपलब्ध हो गए वो मुक्त हो गए। अब रह गया उसके शरीर का छूटना। इसी तरह शरीर , इन्द्रिय , मन, बुद्धि के रहते हुए जो आत्मज्ञानी हो गया , गुणातीत हो गया वो मुक्त हो गया पर   
जीवनमुक्त होकर भी अभी शरीर में रहना पड़ेगा। ज्ञान होने के बाद एक ही दिन में नहीं जाने वाला है , ये शरीर। इसमें अभी 10 वर्ष , 50 वर्ष रहना है। जीवन्मुक्त को शरीर में अभी रहना पड़ेगा। जो कोई भी ज्ञानी जन (महापुरुष) मुक्त हुए , महर्षि रमण , अरविन्द , रामतीर्थ, आदिगुरु शंकराचार्यजी जैसे जितने भी ज्ञानी हो गए हैं , वे सभी जीवनमुक्त हैं , पर अभी शरीर में रहना पड़ेगा। शरीर में रहने से कुछ कष्ट तो होंगे। यदि आपका जो वास्तविक मैं है (Real I -आत्मा) है वो ब्रह्म के साथ चला गया , हो आया। पर अब वह फिर देह में आएगा - दुकान जायेगा। लेकिन अब आपको गुरुमंत्र लेने की जरूरत नहीं रहेगी। उसी तरह कोई ज्ञानी एक बार ब्रह्मता को प्राप्त हो गया , तो बस होगया। अब रास्ता (इष्टदेव का नाम) दिखाने वाला नहीं चाहिए। देह में आएगा , देह में रहेगा , फिर वापस जायेगा। पर एक दिन देह ही नहीं रहेगा। अभी तो देह में आएगा , लौट जायेगा अपने घर ? परमात्मा से जुड़ता रहेगा , पर एक दिन देह ही नहीं रहेगा। पर जब तक देह है , नींद से या ध्यान (समाधि?) से वापस आना पड़ता है, इन आँखों में इन हाथों में। यदि देह न रहे तो स्वप्न भी नहीं देख सकते। लेकिन जब शरीर ही न रहेगा मृत्यु के बाद तब उसको इस शरीर में आने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन जो आमलोग हैं - जो जीवनमुक्त नहीं हुए हैं , वे फिर नया शरीर प्राप्त करेंगे। अभी उनके कर्म भोग हैं , उसे भोगने पड़ेंगे। मृत्यु के बाद एक लौटता है , एक नहीं लौटता। जो  देह नहीं रहने के बाद, देह में नहीं लौटते वे विदेह मुक्त हो गए। (10:41) जो आते हैं , वो मुक्त नहीं हैं वासना वाले हैं। एक का आना  और एक का दुबारा देह में न आना वो निर्भर है , अभी की हमारी सोच पर। जिसमें वासना है , भोगने के लिए आना चाहता है , तो आ जायेगा। सभी लोग मुक्ति भी नहीं चाहते हैं, क्योंकि वे बंधन में हैं -इसका उन्हें बोध ही नहीं है। असल में हमारे अन्तःकरण में तीन गुण-सतोगुण , रजोगुण , तमोगुण हैं , जो शरीर रहने तक काम करते हैं। शरीर में रहने तक सोना और जागना होता रहेगा। शरीर रहने तक आपको इन गुणों के अधीन रहना पड़ेगा। बूढ़ा होना नहीं चाहते हो , पर बूढ़ा होना प्रकृति का नियम है , तुम्हारी इच्छा से क्या होगा ? शरीर ही न रहेगा तो बूढ़े भी नहीं होंगे। मानलो अगला जन्म ही न होगा तो बूढ़े कैसे होंगे ? तो ये अध्यात्म और सत्संग (गुरु- शिष्य) भी एक Science है - एक विज्ञान है। पर इस विज्ञान को यदि उपलब्ध नहीं कर सकते हो ,  तो दूसरा सिद्धांत है -  कर्म का सिद्धान्त है -जो करोगे सो भरोगे। बुद्धि/ मति या दृष्टि में जैसी इच्छा, वासना वाले और कर्म वाले होंगे, वैसी गति होगी - वैसी अगली यात्रा होगी। 
    इसलिए आम आदमी अगर विज्ञान (अतीन्द्रिय ज्ञान) न प्राप्त कर सकें , तो अच्छे कर्म करें। धर्म पूर्वक चलें। नहीं तो ज्ञान के बाद भी प्रारब्ध भोग कर ही नष्ट होता हैं। हमारी वासना अच्छी होगी तो अगला जन्म अच्छा होगा। अगला जन्म इस जन्म के सद्कर्मों पर निर्भर है। बुरे काम छोड़ना चाहिए, नहीं तो उसका फल भोगना पड़ेगा। इस जन्म में जिन संकटों का सामना करना पड़ा , वो क्यों करना पड़ा ? ये तुम्हारे ही किसी कर्म के फल हैं। सुख और दुःख देने वाला कोई दूसरा नहीं है। मेरे ही कर्मों के फल हैं। इसलिए आज से कर्मों के प्रति सावधान हैं , तो आगे ठीक होगा। भविष्य को अगर ठीक करना है , तो आज को ठीक करना होगा।  हमारा जो आज का जीवन है वो हमारा निर्माण किया हुआ है। जिसके बीज हमने पहले बोये थे , वो आज काट रहे हैं।इसलिए आगे हमेशा पवित्र कर्म ही करो , इसके लिए सावधान रहना होगा। (18:24) जप-ध्यान या सद्कर्म (Be and Make) मुक्ति के लिए नहीं करें , तो अगले जन्म के लिए करें। और मुक्ति के लिए तो कर्म की बात है ही नहीं।
 
न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।

बहुत कर्मों से , बहुत सन्तानों से मोक्ष नहीं होता। बल्कि मुक्ति केवल आत्मज्ञान से होती है। (मिथ्या मैं के त्याग से होती है।) भोग ही अगर चाहिए तो अच्छे कर्म करो। कई लोगों को इस जन्म में मिला हुआ है , पहले जन्म में अच्छा किया होगा। इस जन्म में सुख-सुविधा मिली है तो पहले जन्म में अच्छा किया होगा। (22:39)    
 हर व्यक्ति को पहले कर्म करने में धर्मात्मा होना चाहिए। अच्छा है दुःख -अपमान मिला तो जो प्रारब्ध था वो कट गया। एक गलत काम से यदि दुःख हुआ तो हमको प्रेरणा मिली कि आगे से कोई गलत काम नहीं करूँगा। जिसका बछड़ा उसी गाय की तरफ जाता है। पुराना किया हुआ कर्मफल आत्मज्ञानी को भी भोगना पड़ेगा। (26:08) ज्ञान इसलिए प्राप्त नहीं करते कि हमें माफ़ किया जाए , बल्कि इसीलिए कि हमें अगला जन्म -हो तो पिवत्र-त्रयी के साथ ही हो। जीव का जन्म प्रारब्ध भोगने के लिए होता है , अवतार वरिष्ठ या पवित्र -त्रयी का जन्म लोकहित के लिए होता है। या नेता को कथा सुनाने का काम मिलता है। शरीर का जो होना है , होगा। हमें जो करना चाहिए वो पवित्र कर्म करते चलो। परिवार जैसा मिला है , वो मिला है। कर्म से मिला है। अच्छे कर्म करो या ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके आवागमन से मुक्त हो जाओ। इसलिए हम फिर लेना पसंद ही न करें। हम ही परमात्मा में समा जाएँ -ब्रह्मलीन हो जाएँ। पवित्र -त्रयी से अलग मेरा फिर कभी कोई अस्तित्व ही न हो। (32:21) श्रद्धा के साथ जप करें। तो इसका परिणाम भी अच्छा आएगा। पवित्र त्रयी के सिवा कुछ न चाहो। जो होना है होगा -सब छोड़ दिया भगवान पर। प्रकृति पर छोड़ दिया , परमात्मा पर छोड़ दिया , ग्रहों पर छोड़ दिया, प्रारब्ध पर छोड़ दिया। जो होना है हो जायेगा , फिर तुम्हें क्या करना है ? जप यज्ञ करते रहो। जपात सिद्धिः - जप से सिद्धि प्राप्त होगी। प्रभु का स्मरण , जब तक शरीर है हमें श्रद्धा पूर्वक स्वामीजी का काम करना है Be and Make में लगे रहना है।
   दो तरह के भगवान - एक जो भक्त को दीखते हैं , दूसरे जो भक्त को देखते हैं। भगवान तुम्हें इस समय देख रहे हैं। (37:28) भगवान तुम्हारे जप के साक्षी हैं। गवाही हैं। वो तुम्हें देख रहे हैं , तुम्हें नहीं दिख रहे हैं।  "चींटी के पग नूपुर बाजे सो भी साहब सुनता है।" साहेब से कुछ छिपा नहीं है। जो जाप को देख रहा है , उस परमात्मा में तुम लीन हो जाओ। जो सदा निराकार , निर्विकार हमारे मन का सदा साक्षी है ,सदा अन्तर्यामी है वो हमारे मन में ही है।  
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