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शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

कर्मयोग

 कर्मयोग : तृतीय अध्याय का सारामृत 

43 श्लोकों में समाप्त इस अध्याय का नाम है कर्मयोग। अर्जुन के प्रश्न पर श्री भगवान ने ज्ञान और कर्म का मेल कराके , इस अध्याय में विशेष रूप से कर्म-माहात्म्य और स्वधर्म -पालन का उपदेश दिया है। सन्यास -आश्रम में ज्ञानयोग और अन्य तीन आश्रमों में कर्मयोग है। अनासक्त भाव से ईश्वर के प्रति फलाफल अर्पित करके कर्म करना ही कर्मयोग है। इन्द्रिय-संयम और इन्द्रियजयी न होने से साधक कर्मयोगी नहीं हो सकता। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " तो कर्मयोग क्या है ? कर्म के रहस्य को जान लेना। हम देखते हैं संसार के सारे मनुष्य कर्म करते हैं। किस लिए ? मुक्ति के लिए , स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिए। परमाणु से लेकर सर्वोच्च ज्ञानी तक सभी जानकर या बिना जाने उसी एक उद्देश्य से काम करते जा रहे हैं। मनुष्य सदा से शरीर , मन और आत्मिक स्वतंत्रता -हर विषयों में स्वतंत्रता चाहता है। वह जाने-अनजाने सारे बंधनों से छुटकारा पाने , मुक्ति प्राप्त करने की चेष्टा करता चला आ रहा है। सूर्य ,चंद्र , पृथ्वी , ग्रह सभी बंधन से भाग जाने का प्रयत्न कर रहे हैं। सारे संसार को हम केंद्राभिसरि और केंद्रप्रसारी शक्तियों की क्रीड़ाभूमि कह सकते हैं। कर्मयोग हमें कर्म का रहस्य और कर्म करने की प्रणाली बता देता है। - कर्मयोग कहता है - तुम निरंतर कर्म करते रहो, किन्तु उसमें आसक्ति मत रखो। किसी विषय के साथ अपने को युक्त न करो। मन को स्वतंत्र रखो। जो कुछ देख रहे हो , दुःख कष्ट सभी संसार की अवश्यम्भावी बातें हैं। दरिद्रता , धन और सुख सब सामयिक हैं , वे हमारे स्वभाव में नहीं हैं। हमारा निज स्वरुप दुःख या सुख , प्रत्यक्ष या कल्पना से परे है। तो भी हमें कर्म करते रहना होगा। दुःख आसक्ति से आता है , कर्म से नहीं। " 'मैं' और 'मेरा' भाव - देहध्यास ही दुःख का जनक है। सबकुछ ईश्वर को सौंप दो। इस संसार रूप भयानक अग्निमय कड़ाही में , जहाँ कर्तव्य रूपी अनल सबको झुलसा रहा है, ईश्वरार्पण रूपी अमृत का पान कर सुखी हो जाओ। 

गीता का मूल सूत्र भी यही है -निरंतर कर्म करो , किन्तु उसमें आसक्त न होओ। अनासक्ति ही पूर्ण आत्मत्याग है। कर्मयोग निःस्वार्थपरता या सत् कर्म के द्वारा मुक्तिलाभ करने की सुगम प्रणाली मात्र है। कर्मयोगी को किसी प्रकार के धर्ममत का अनुयायी होने की आवश्यकता नहीं है।

दूसरों के प्रति हमारे कर्तव्य का अर्थ है- दूसरों की सहायता करना। संसार का भला करना। अब प्रश्न उठता है कि हम संसार का भला क्यों करें? वास्तव में ऊपर से तो हम संसार का उपकार करते हैं, परंतु असल में हम अपना ही उपकार करते हैं। हमें सदैव संसार का उपकार करने की चेष्टा करनी चाहिए और कार्य करने का यही हमारा सर्वोच्च उद्देश्य होना चाहिए।

संसार न तो अच्छा है, न बुरा। प्रत्येक मनुष्य अपने लिए अपना-अपना संसार बना लेता है। अग्नि स्वयं में अच्छी है न बुरी। जब यह हमें गर्म रखती है, तो हम कहते हैं यह कितनी अच्छी है, जब हमारी अंगुली जल जाती है, तो हम इसे दोष देते हैं। यही हाल संसार का है। संसार में अपने सभी प्रयोजन पूर्ण करने की क्षमता है। हमें जान लेना चाहिए कि हमारे बिना भी यह संसार बड़े मजे से चलता जाएगा। हमें उसकी सहायता करने के लिए माथापच्ची करने की आवश्यकता नहीं। परंतु फिर भी हमें सदैव परोपकार करते ही रहना चाहिए। यदि हम सदैव यह ध्यान रखें कि दूसरों की सहायता करना एक सौभाग्य है, तो परोपकार करने की इच्छा एक सवरेत्तम प्रेरणा शक्ति है।

एक दाता के ऊंचे आसन पर खड़े होकर और अपने हाथ में दो पैसे लेकर यह मत कहो, ‘ऐ भिखारी, ले, मैं तुझे यह देता हूं।’ तुम स्वयं इस बात के लिए कृतज्ञ होओ कि इस संसार में तुम्हें अपनी दयालुता का प्रयोग करने और इस प्रकार पूर्ण होने का अवसर प्राप्त हुआ। धन्य पाने वाला नहीं, देने वाला होता है। सभी भलाई के कार्य हमें शुद्ध और पूर्ण बनाने में सहायता करते हैं। हम आखिर अधिक से अधिक कर ही क्या सकते हैं? या तो एक अस्पताल बनवा देते हैं, सड़कें बनवा देते हैं या स्कूल खुलवा देते हैं। परंतु उतने से हुआ क्या? आंधी का एक झोंका तो तुम्हारी इन सारी इमारतों को पांच मिनट में नष्ट कर सकता है- फिर तुम क्या करोगे?

एक भूकंप तुम्हारी तमाम सड़कों, अस्पतालों, नगरों और इमारतों को धूल में मिला सकता है। अतएव संसार की सहायता करने की खोखली बातों को हमें मन से निकाल देना चाहिए। इसके बावजूद हमें निरंतर परोपकार करते रहना चाहिए। क्यों? इसलिए कि इसमें हमारा ही भला है। यही एक साधन है, जिससे हम पूर्ण बन सकते हैं।

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अर्जुन उवाच

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।

तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।।3.1।।

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।

तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ||3.2||

BG 3.1-2: अर्जुन ने कहा! हे जनार्दन, यदि आप ज्ञान को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं तब फिर आप मुझे इस भीषण युद्ध में भाग लेने के लिए क्यों कहते हैं? आपके अस्पष्ट उपदेशों से मेरी बुद्धि भ्रमित हो गयी है। कृपया मुझे निश्चित रूप से कोई एक ऐसा मार्ग बताएँ जो मेरे लिए सर्वाधिक लाभदायक हो।

उन्होंने कर्म का त्याग करने का परामर्श नहीं दिया अपितु इसके विपरीत उन्होंने कर्म के फल की आसक्ति का त्याग करने का उपदेश दिया। अर्जुन श्रीकृष्ण के अभिप्राय को यह सोंचकर गलत समझता है कि यदि ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है तब फिर वह इस युद्ध में भाग लेने जैसे कर्त्तव्य का पालन क्यों करें? इसलिए वह कहता है-"विरोधाभासी कथनों से आप मेरी बुद्धि को भ्रमित कर रहे हैं। मैं जानता हूँ कि आप करुणामय हैं और आपकी इच्छा मुझे निष्फल करने की नहीं है, अतः कृपया मेरे संदेह का निवारण करें।"

अर्जुन को इसमें संदेह नहीं था कि मनुष्य जीवन केवल धन के उपार्जन परिग्रह और व्यय के लिए नहीं है। वह जानता था कि उसका जीवन श्रेष्ठ सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए था जिसके लिए भौतिक उन्नति केवल साधन थी साध्य नहीं। अर्जुन मात्र यह जानना चाहता था कि वह उपलब्ध परिस्थितियों का जीवन की लक्ष्य प्राप्ति और भविष्य निर्माण में किस प्रकार सदुपयोग करे

लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।

ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।।3.3।।

।।3.3।। श्री भगवान् ने कहा हे निष्पाप (अनघ) अर्जुन इस श्लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है ज्ञानियों की (सांख्यानां) ज्ञानयोग से और योगियों की कर्मयोग से।।

 कर्मयोग और ज्ञानयोग को परस्पर प्रतिद्वन्द्वी मानने का अर्थ है उनमें से किसी एक को भी नहीं समझना। परस्पर पूरक होने के कारण उनका क्रम से अर्थात् एक के पश्चात् दूसरे का आश्रय लेना पड़ता है। प्रथम निष्काम भाव से कर्म करने पर मन में स्थित अनेक वासनाएँ क्षीण हो जाती हैं। इस प्रकार मन के निर्मल होने पर उसमें एकाग्रता और स्थिरता आती है जिससे वह ध्यान में निमग्न होकर परमार्थ तत्त्व का साक्षात् अनुभव करता है।

अध्यात्म साधना करने के योग्य साधकों में दो प्रकार के लोग होते हैं क्रियाशील और मननशील। इन दोनों प्रकार के लोगों के स्वभाव में इतना अन्तर होता है कि दोनों के लिये एक ही साधना बताने का अर्थ होगा किसी एक विभाग के लोगों को निरुत्साहित करना और उनकी उपेक्षा करना।अतः सभी के उपयोगार्थ उनकी मानसिक एवं बौद्धिक क्षमताओं के अनुरूप दोनों ही वर्गों के लिये साधनायें बताना आवश्यक है। अतः भगवान् यहाँ स्पष्ट कहते हैं कि क्रियाशील स्वभाव के मनुष्य के लिये कर्मयोग तथा मननशील साधकों के लिये ज्ञानयोग का उपदेश किया गया है।  पुरा शब्द से वह यह इंगित करते है कि ये दो मार्ग सृष्टि के आदिकाल से ही जगत् में विद्यमान हैं।

 यहाँ श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं सृष्टि के आदि में (पुरा) ये दो मार्ग मेरे द्वारा कहे गये थे। इसका तात्पर्य यह है कि यहाँ भगवान् वृन्दावन के नीलवर्ण गोपाल गोपियों के प्रिय सखा अथवा अपने युग के महान् राजनीतिज्ञ के रूप में नहीं बोल रहे थे। किन्तु भारतीय इतिहास के एक स्वस्वरूप के ज्ञाता तत्त्वदर्शी उपदेशक सिद्ध पुरुष (श्रीगुरु) एवं ईश्वर के रूप में उपदेश दे रहे थे।

कर्मयोग लक्ष्य प्राप्ति का क्रमिक साधन है साक्षात् नहीं। अर्थात् वह ज्ञान प्राप्ति की योग्यता प्रदान करता है जिससे ज्ञानयोग के द्वारा सीधे ही लक्ष्य की प्राप्ति होती है। इसे समझाने के लिए भगवान् कहते हैं


 















  

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