कर्मयोग : तृतीय अध्याय का सारामृत
43 श्लोकों में समाप्त इस अध्याय का नाम है कर्मयोग। अर्जुन के प्रश्न पर श्री भगवान ने ज्ञान और कर्म का मेल कराके , इस अध्याय में विशेष रूप से कर्म-माहात्म्य और स्वधर्म -पालन का उपदेश दिया है। सन्यास -आश्रम में ज्ञानयोग और अन्य तीन आश्रमों में कर्मयोग है। अनासक्त भाव से ईश्वर के प्रति फलाफल अर्पित करके कर्म करना ही कर्मयोग है। इन्द्रिय-संयम और इन्द्रियजयी न होने से साधक कर्मयोगी नहीं हो सकता। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " तो कर्मयोग क्या है ? कर्म के रहस्य को जान लेना। हम देखते हैं संसार के सारे मनुष्य कर्म करते हैं। किस लिए ? मुक्ति के लिए , स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिए। परमाणु से लेकर सर्वोच्च ज्ञानी तक सभी जानकर या बिना जाने उसी एक उद्देश्य से काम करते जा रहे हैं। मनुष्य सदा से शरीर , मन और आत्मिक स्वतंत्रता -हर विषयों में स्वतंत्रता चाहता है। वह जाने-अनजाने सारे बंधनों से छुटकारा पाने , मुक्ति प्राप्त करने की चेष्टा करता चला आ रहा है। सूर्य ,चंद्र , पृथ्वी , ग्रह सभी बंधन से भाग जाने का प्रयत्न कर रहे हैं। सारे संसार को हम केंद्राभिसरि और केंद्रप्रसारी शक्तियों की क्रीड़ाभूमि कह सकते हैं। कर्मयोग हमें कर्म का रहस्य और कर्म करने की प्रणाली बता देता है। - कर्मयोग कहता है - तुम निरंतर कर्म करते रहो, किन्तु उसमें आसक्ति मत रखो। किसी विषय के साथ अपने को युक्त न करो। मन को स्वतंत्र रखो। जो कुछ देख रहे हो , दुःख कष्ट सभी संसार की अवश्यम्भावी बातें हैं। दरिद्रता , धन और सुख सब सामयिक हैं , वे हमारे स्वभाव में नहीं हैं। हमारा निज स्वरुप दुःख या सुख , प्रत्यक्ष या कल्पना से परे है। तो भी हमें कर्म करते रहना होगा। दुःख आसक्ति से आता है , कर्म से नहीं। " 'मैं' और 'मेरा' भाव - देहध्यास ही दुःख का जनक है। सबकुछ ईश्वर को सौंप दो। इस संसार रूप भयानक अग्निमय कड़ाही में , जहाँ कर्तव्य रूपी अनल सबको झुलसा रहा है, ईश्वरार्पण रूपी अमृत का पान कर सुखी हो जाओ।
गीता का मूल सूत्र भी यही है -निरंतर कर्म करो , किन्तु उसमें आसक्त न होओ। अनासक्ति ही पूर्ण आत्मत्याग है। कर्मयोग निःस्वार्थपरता या सत् कर्म के द्वारा मुक्तिलाभ करने की सुगम प्रणाली मात्र है। कर्मयोगी को किसी प्रकार के धर्ममत का अनुयायी होने की आवश्यकता नहीं है।
दूसरों के प्रति हमारे कर्तव्य का अर्थ है- दूसरों की सहायता करना। संसार का भला करना। अब प्रश्न उठता है कि हम संसार का भला क्यों करें? वास्तव में ऊपर से तो हम संसार का उपकार करते हैं, परंतु असल में हम अपना ही उपकार करते हैं। हमें सदैव संसार का उपकार करने की चेष्टा करनी चाहिए और कार्य करने का यही हमारा सर्वोच्च उद्देश्य होना चाहिए।
संसार न तो अच्छा है, न बुरा। प्रत्येक मनुष्य अपने लिए अपना-अपना संसार बना लेता है। अग्नि स्वयं में अच्छी है न बुरी। जब यह हमें गर्म रखती है, तो हम कहते हैं यह कितनी अच्छी है, जब हमारी अंगुली जल जाती है, तो हम इसे दोष देते हैं। यही हाल संसार का है। संसार में अपने सभी प्रयोजन पूर्ण करने की क्षमता है। हमें जान लेना चाहिए कि हमारे बिना भी यह संसार बड़े मजे से चलता जाएगा। हमें उसकी सहायता करने के लिए माथापच्ची करने की आवश्यकता नहीं। परंतु फिर भी हमें सदैव परोपकार करते ही रहना चाहिए। यदि हम सदैव यह ध्यान रखें कि दूसरों की सहायता करना एक सौभाग्य है, तो परोपकार करने की इच्छा एक सवरेत्तम प्रेरणा शक्ति है।
एक दाता के ऊंचे आसन पर खड़े होकर और अपने हाथ में दो पैसे लेकर यह मत कहो, ‘ऐ भिखारी, ले, मैं तुझे यह देता हूं।’ तुम स्वयं इस बात के लिए कृतज्ञ होओ कि इस संसार में तुम्हें अपनी दयालुता का प्रयोग करने और इस प्रकार पूर्ण होने का अवसर प्राप्त हुआ। धन्य पाने वाला नहीं, देने वाला होता है। सभी भलाई के कार्य हमें शुद्ध और पूर्ण बनाने में सहायता करते हैं। हम आखिर अधिक से अधिक कर ही क्या सकते हैं? या तो एक अस्पताल बनवा देते हैं, सड़कें बनवा देते हैं या स्कूल खुलवा देते हैं। परंतु उतने से हुआ क्या? आंधी का एक झोंका तो तुम्हारी इन सारी इमारतों को पांच मिनट में नष्ट कर सकता है- फिर तुम क्या करोगे?
एक भूकंप तुम्हारी तमाम सड़कों, अस्पतालों, नगरों और इमारतों को धूल में मिला सकता है। अतएव संसार की सहायता करने की खोखली बातों को हमें मन से निकाल देना चाहिए। इसके बावजूद हमें निरंतर परोपकार करते रहना चाहिए। क्यों? इसलिए कि इसमें हमारा ही भला है। यही एक साधन है, जिससे हम पूर्ण बन सकते हैं।
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अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।।3.1।।
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ||3.2||
BG 3.1-2: अर्जुन ने कहा! हे जनार्दन, यदि आप ज्ञान को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं तब फिर आप मुझे इस भीषण युद्ध में भाग लेने के लिए क्यों कहते हैं? आपके अस्पष्ट उपदेशों से मेरी बुद्धि भ्रमित हो गयी है। कृपया मुझे निश्चित रूप से कोई एक ऐसा मार्ग बताएँ जो मेरे लिए सर्वाधिक लाभदायक हो।
उन्होंने कर्म का त्याग करने का परामर्श नहीं दिया अपितु इसके विपरीत उन्होंने कर्म के फल की आसक्ति का त्याग करने का उपदेश दिया। अर्जुन श्रीकृष्ण के अभिप्राय को यह सोंचकर गलत समझता है कि यदि ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है तब फिर वह इस युद्ध में भाग लेने जैसे कर्त्तव्य का पालन क्यों करें? इसलिए वह कहता है-"विरोधाभासी कथनों से आप मेरी बुद्धि को भ्रमित कर रहे हैं। मैं जानता हूँ कि आप करुणामय हैं और आपकी इच्छा मुझे निष्फल करने की नहीं है, अतः कृपया मेरे संदेह का निवारण करें।"
अर्जुन को इसमें संदेह नहीं था कि मनुष्य जीवन केवल धन के उपार्जन परिग्रह और व्यय के लिए नहीं है। वह जानता था कि उसका जीवन श्रेष्ठ सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए था जिसके लिए भौतिक उन्नति केवल साधन थी साध्य नहीं। अर्जुन मात्र यह जानना चाहता था कि वह उपलब्ध परिस्थितियों का जीवन की लक्ष्य प्राप्ति और भविष्य निर्माण में किस प्रकार सदुपयोग करे।
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।।3.3।।
।।3.3।। श्री भगवान् ने कहा हे निष्पाप (अनघ) अर्जुन इस श्लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है ज्ञानियों की (सांख्यानां) ज्ञानयोग से और योगियों की कर्मयोग से।।
कर्मयोग और ज्ञानयोग को परस्पर प्रतिद्वन्द्वी मानने का अर्थ है उनमें से किसी एक को भी नहीं समझना। परस्पर पूरक होने के कारण उनका क्रम से अर्थात् एक के पश्चात् दूसरे का आश्रय लेना पड़ता है। प्रथम निष्काम भाव से कर्म करने पर मन में स्थित अनेक वासनाएँ क्षीण हो जाती हैं। इस प्रकार मन के निर्मल होने पर उसमें एकाग्रता और स्थिरता आती है जिससे वह ध्यान में निमग्न होकर परमार्थ तत्त्व का साक्षात् अनुभव करता है।
अध्यात्म साधना करने के योग्य साधकों में दो प्रकार के लोग होते हैं क्रियाशील और मननशील। इन दोनों प्रकार के लोगों के स्वभाव में इतना अन्तर होता है कि दोनों के लिये एक ही साधना बताने का अर्थ होगा किसी एक विभाग के लोगों को निरुत्साहित करना और उनकी उपेक्षा करना।अतः सभी के उपयोगार्थ उनकी मानसिक एवं बौद्धिक क्षमताओं के अनुरूप दोनों ही वर्गों के लिये साधनायें बताना आवश्यक है। अतः भगवान् यहाँ स्पष्ट कहते हैं कि क्रियाशील स्वभाव के मनुष्य के लिये कर्मयोग तथा मननशील साधकों के लिये ज्ञानयोग का उपदेश किया गया है। पुरा शब्द से वह यह इंगित करते है कि ये दो मार्ग सृष्टि के आदिकाल से ही जगत् में विद्यमान हैं।
यहाँ श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं सृष्टि के आदि में (पुरा) ये दो मार्ग मेरे द्वारा कहे गये थे। इसका तात्पर्य यह है कि यहाँ भगवान् वृन्दावन के नीलवर्ण गोपाल गोपियों के प्रिय सखा अथवा अपने युग के महान् राजनीतिज्ञ के रूप में नहीं बोल रहे थे। किन्तु भारतीय इतिहास के एक स्वस्वरूप के ज्ञाता तत्त्वदर्शी उपदेशक सिद्ध पुरुष (श्रीगुरु) एवं ईश्वर के रूप में उपदेश दे रहे थे।
कर्मयोग लक्ष्य प्राप्ति का क्रमिक साधन है साक्षात् नहीं। अर्थात् वह ज्ञान प्राप्ति की योग्यता प्रदान करता है जिससे ज्ञानयोग के द्वारा सीधे ही लक्ष्य की प्राप्ति होती है। इसे समझाने के लिए भगवान् कहते हैं-
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।।3.5।।
।।3.5।। कोई भी पुरुष कभी क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता क्योंकि प्रकृति से उत्पन्न गुणों के द्वारा अवश हुए सब (पुरुषों) से कर्म करवा लिया जाता है।।
मनुष्य का अन्तःकरण प्रकृति के सत्त्व रज और तम इन तीन गुणों के प्रभाव में सदैव रहता है। मनुष्य बाध्य है कि वह क्षणमात्र भी पूर्णरूप से निष्क्रिय होकर वह नहीं रह सकता। शरीर से कोई कर्म न करने पर भी हम मन और बुद्धि से क्रियाशील रहते ही हैं। जब तक हम इन गुणों के प्रभाव में रहते हैं तब तक कर्म करने के लिए हम विवश होते हैं। इसलिए कर्म का सर्वथा त्याग करना प्रकृति के नियम के विरुद्ध होने के कारण असम्भव है। शारीरिक कर्म न करने पर भी मनुष्य व्यर्थ के विचारों में मन की शक्ति को गँवाता है।
अतः गीता का उपदेश है कि मनुष्य शरीर से तो कर्म करे परन्तु समर्पण की भावना से इससे शक्ति के अपव्यय से बचाव होने के साथसाथ उसके व्यक्तित्व का भी विकास होता है।आत्मस्वरूप को नहीं जानने वाले पुरुष के लिए कर्तव्य का त्याग उचित नहीं है।
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते।।3.6।।
।।3.6।। जो मूढ बुद्धि पुरुष कर्मेन्द्रियों का निग्रह कर इन्द्रियों के भोगों का मन से स्मरण (चिन्तन) करता रहता है वह मिथ्याचारी (दम्भी) कहा जाता है।।
मन का स्वभाव है एक विचार को बारंबार दोहराना। इस प्रकार एक ही विचार के निरन्तर चिन्तन से मन में उसका दृढ़ संस्कार (वासना) बन जाता है और फिर जो कोई विचार हमारे मन में उठता है उनका प्रवाह पूर्व निर्मित दिशा में ही होता है। विचारो की दिशा निश्चित हो जाने पर वही मनुष्य का स्वभाव बन जाता है जो उसके प्रत्येक कर्म में व्यक्त होता है। अत निरन्तर विषयचिन्तन से वैषयिक संस्कार चित्त में गहराई से उत्कीर्ण हो जाते हैं और फिर उन विषयभोगों में आसक्ति से प्रेरित विवश मनुष्य संसार में इसी प्रकार के कर्म करते हुये देखने को मिलता है।
जो व्यक्ति बाह्य रूप से नैतिक और आदर्शवादी होने का प्रदर्शन करते हुये मन में निम्न स्तर की वृत्तियों में रहता है वास्तव में वह अध्यात्म का सच्चा साधक नहीं वरन् जैसा कि यहाँ कहा गया है विमूढ और मिथ्याचारी है। हम सब जानते हैं कि शारीरिक संयम होने पर भी मन की वैषयिक वृत्तियों को संयमित करना सामान्य पुरुष के लिये कठिन होता है। यह समझते हुये कि सामान्य पुरुष अपनी स्वाभाविक प्रवृत्तियों से स्वयं को सुरक्षित रखने का उपाय नहीं जान सकता इसलिये भगवान कहते हैं -
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते।।3.7।।
।।3.7।। परन्तु हे अर्जुन जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ कर्मेंन्द्रियों से कर्मयोग का आचरण करता है वह श्रेष्ठ है।।
सरल सी प्रतीत होने वाली इन दो पंक्तियों में सही कर्म करने एवं जीवन जीने की कला का सम्पूर्ण ज्ञान सन्निहित है। इस श्लोक में साधक को मन के द्वारा इन्द्रियों को संयमित करने की सलाह दी गयी है। इसे सफलतापूर्वक तभी किया जा सकता है जब मन को एक श्रेष्ठ दिव्य लक्ष्य की ओर प्रेरित किया जाय। केवल हठपूर्वक मन के तीव्र वेग को रोकने का प्रयत्न करना जलप्लावित नदी का प्रवाह रोकने के प्रयत्न के समान है। इसका व्यर्थ होना निश्चित है।
यदि मन इन्द्रियों के साथ युक्त न हो तो विषयों के बाह्य देश में स्थित होने पर भी उनका ज्ञान संभव नहीं होता। इसीलिये अनेक बार जब हम पुस्तक के अध्ययन में एकचित्त हो जाते हैं तब समीप से किसी के पुकारने पर भी उसकी आवाज हम नहीं सुन पाते। मन की एकाग्रता के ऐसे अनेक उदाहरण हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कर्मयोगी को सब कर्म अनासक्त होकर करने चाहिये।
इन्द्रिय संयम से शक्ति के अपव्यय को रोक कर अनासक्त भाव से कर्मेंद्रियों के द्वारा श्रेष्ठ कर्म करने में उसका सदुपयोग करने से चित्तशुद्धि होगी। इस प्रकार जो कर्मक्षेत्र हमारे बन्धन का कारण था उसी में गीता में वर्णित जीवन की शैली अपनाते हुये कर्म करने पर वही क्षेत्र मोक्ष का साधन बन जायेगा।
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः।।3.8।।
।।3.8।। तुम (अपने) नियत (कर्तव्य) कर्म करो क्योंकि अकर्म से श्रेष्ठ कर्म है। तुम्हारे अकर्म होने से (तुम्हारा) शरीर निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।।
अपने व्यावहारिक जीवन में जो कर्म हमें परिवार, कार्यालय, समाज एवं राष्ट्र के व्यक्ति होने के नाते करने पड़ते उन नियत कर्म को अपना कर्तव्य कर्म समझने चाहिये । इस दृष्टि से अकर्म का अर्थ होगा अपने इन कर्तव्यों को कुशलता से न करना। निष्क्रियता से तो शरीर निर्वाह भी असम्भव होता है।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर।।3.9।।
।।3.9।। यज्ञ के लिये किये हुए कर्म के अतिरिक्त अन्य कर्म में प्रवृत्त हुआ यह पुरुष कर्मों द्वारा बंधता है इसलिए हे कौन्तेय आसक्ति को त्यागकर यज्ञ के निमित्त ही कर्म का सम्यक् आचरण करो।।
यहां यज्ञ शब्द का अर्थ है वे सब कर्म जिन्हें मनुष्य निस्वार्थ भाव एवं समर्पण की भावना से विश्व के कल्याण के लिये करता है। ऐसे कर्म व्यक्ति के पतन में नहीं वरन् उत्थान में ही सहायक होते हैं। यज्ञ शब्द का उपर्युक्त अर्थ समझ लेने पर आगे के श्लोक और अधिक स्पष्ट होंगे और उनमें उपदिष्ट ज्ञान सम्पूर्ण विश्व के उपयुक्त होगा। जब (नामयश में आसक्त या ढोंगी देशभक्त नहीं) बल्कि समाज के सच्चे निःस्वार्थ लोग आगे आकर परस्पर सहयोग एवं समर्पण की भावना से कर्म करेंगे केवल तभी वह समाज दारिद्रय और दुखों के बन्धनों से मुक्त हो सकता है, यह एक ऐतिहासिक सत्य है। ऐसे कर्मों का सम्पादन अनासक्ति के होने से ही संभव होगा।
प्रत्येक कर्म कर्त्ता के लिये बन्धन उत्पन्न नहीं करता। केवल अविवेकपूर्वक किये हुये कर्म ही मन में वासनाओं की वृद्धि करके परिच्छिन्न (परिवर्तनीय) अहंकार और अपरिच्छिन्न आत्मस्वरूप के मध्य एक अभेद्य दीवार खड़ी कर देते हैं। अर्जुन में यह दोष आ गया था कि वह विरुद्ध पक्ष के व्यक्तियों के देह के साथ अत्यन्त आसक्त हो गया और परिणामस्वरूप परिस्थिति को ठीक समझ नहीं पाया इसलिये समसामयिक कर्तव्य का त्याग कर कर्मक्षेत्र से पलायन करने की उसकी प्रवृत्ति हो गयी। कर्ममार्ग के अधिकारी व्यक्ति को निम्नलिखित कारणों से भी कर्म करना चाहिये
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्।।3.10।।
।।3.10।। प्रजापति (सृष्टिकर्त्ता) ने (सृष्टि के) आदि में यज्ञ सहित प्रजा का निर्माण कर कहा इस यज्ञ द्वारा तुम वृद्धि को प्राप्त हो और यह यज्ञ तुम्हारे लिये इच्छित कामनाओं को पूर्ण करने वाला (इष्टकामधुक्) होवे।।
स्वयं सृष्टिकर्त्ता प्रजापति पंचमहाभूतों की सृष्टि रचकर अन्य प्राणियों के साथ मनुष्य को भी कर्म करने और फल पाने के लिये उत्पन्न करते हैं। उस समय वे यज्ञ को भी बनाते हैं अर्थात् उसका उपदेश देते हैं।
यज्ञ का अर्थ है समर्पण बुद्धि और सेवा भाव से किये हुये कर्म। प्रकृति में सर्वत्र यज्ञ की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। सूर्य प्रकाशित होता है और चन्द्रमा प्रगट होता है समुद्र स्पन्दित होता है पृथ्वी प्राणियों को धारण करती है ये सब मातृभाव से तथा यज्ञ की भावना से कर्म करते हैं जिनमें रंचमात्र भी आसक्ति (ढोंग) नहीं होती।
सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा जी ने सेवा की भावना तथा यज्ञ करने की क्षमता के साथ जगत् की रचना की। ब्रह्माण्ड की शक्तियाँ और प्राकृतिक घटना चक्र अपने आप सब की सेवा में संलग्न रहता है। जगत् में जीवन के प्रादुर्भाव के पूर्व ही प्रकृति ने उसके लिये उचित क्षेत्र निर्माण कर रखा था। जब विभिन्न स्तरों पर जीवन का विकास होता है तब भी हम प्रकृति में सर्वत्र चल रहा यज्ञ कर्म देख सकते हैं जिसके कारण सबका अस्तित्व बना रहता है और विकास होता रहता है। इसलिए ब्रह्माजी ने मानो घोषणा की इस यज्ञ में तुम वृद्धि को प्राप्त हो यह तुम्हारे लिये कामधेनु सिद्ध हो।
पौराणिक कथाओं के अनुसार कामधेनु नामक गाय वशिष्ट ऋषि के पास थी जो सभी इच्छाओं की पूर्ति करती थी। इसलिये इस शब्द का अर्थ इतना ही है कि यदि मनुष्य (ढोंग से नहीं) सहयोग और अनुशासन में रह कर अनासक्ति और त्याग की भावना से कर्म करने में तत्पर रहे तो उसके लिये कोई लक्ष्य अप्राप्य नहीं हो सकता।
जब हम किसी कार्य को समर्पण की भावना से सम्पन्न करते हैं तब हम यह पाते हैं कि यह सारा संसार और उसमें व्याप्त सभी वस्तुएँ भगवान से संबंधित हैं और उनका उपयोग भगवान की सेवा के लिए ही है। भगवान राम के पूर्वज राजा रघु ने विश्वजित् यज्ञ का अनुष्ठान किया जिसमें अपने स्वामित्व की सभी वस्तुएँ और धन संपदा को परोपकार के लिए दान में देना आवश्यक होता है।उन्होंने इसका उच्च आदर्श स्थापित किया गया।
"रघु ने इसी भावना से यज्ञ किया। जिस प्रकार बादल पृथ्वी से अपने सुख के लिए जल एकत्रित नहीं करते अपितु वर्षा के रूप में उसे पृथ्वी को लौटा देते हैं। इसी प्रकार राजा द्वारा जनता से कर के रूप में इकट्ठा की गयी धन सम्पदा उसके सुख के लिए नहीं होती अपितु प्रजा तथा भगवान के सुख के लिए होती है। इसलिए उन्होंने अपनी धन सम्पदा को भगवान के सुख के लिए अपने नागरिकों की सेवा में अर्पित करने का निर्णय लिया।"
यज्ञ के पश्चात् रघु ने अपनी सारी सम्पत्ति अपनी प्रजा को दान में दे दी और फिर वह भिखारी के भेष में मिट्टी का पात्र उठाकर भिक्षा के लिए निकल पड़े। जब वह एक वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे, तब उन्होंने कुछ लोगों द्वारा किए जा रहे इस वार्तालाप को सुना-"हमारा राजा अत्यंत परोपकारी है। राजा ने अपना सर्वस्व दान कर दिया।" रघु को अपनी प्रशंसा सुनकर दुःख हुआ और वह बोले-"तुम क्या चर्चा कर रहे हो?" उन्होंने उत्तर दिया-"हम अपने राजा का गुणगान कर रहे हैं। हमारे राजा जैसा दानी इस संसार में कोई दूसरा नहीं है।" रघु ने कहा-"पुनः ऐसा न कहना। रघु ने कुछ भी दान नहीं किया।" तब उन्होंने कहा, "तुम किस प्रकार के मनुष्य हो जो हमारे राजा की बुराई कर रहे हो? सभी जानते हैं कि रघु ने जो भी अर्जित किया वह सब दान में दे दिया।"
रघु ने उत्तर दिया-"जाओ और अपने राजा से पूछो कि जब वह संसार में आया था तब उसके पास क्या था? क्या उसने खाली हाथ जन्म नहीं लिया? आख़िर उसका क्या था जिसका उसने त्याग कर दिया?"
यही कर्मयोग है जिससे हमें यह ज्ञात होता है कि समस्त संसार भगवान (मायाधीश) का है और यहाँ का सब कुछ भगवान (अवतार वरिष्ठ) को संतुष्ट करने के निमित्त है, तभी हम अपने कर्तव्यों का निर्वहन अपने मन और इन्द्रियों की तुष्टि के लिए न करके केवल भगवान के सुख के लिए करते हैं। यज्ञ से इसका कैसे सम्पादन किया जा सकता है
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ।।3.11।।
।।3.11।। तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं की उन्नति करो और वे देवतागण तुम्हारी उन्नति करें। इस प्रकार परस्पर उन्नति करते हुये परम श्रेय को तुम प्राप्त होगे।।
इस श्लोक के सर्वमान्य और सर्वत्र उपयुक्त होने के लिये देव शब्द का अर्थ यह समझना चाहिये कि वे किसी भी कर्म क्षेत्र का वह अधिष्ठाता देवता जो कर्म करने वाले कर्मचारी या कर्त्ता को फल प्रदान करता हो। वह देवता और कोई नहीं उस कर्म क्षेत्र की उत्पादन क्षमता ही होगी।
जब हम किसी क्षेत्र विशेष में पूर्ण मनोयोग से परिश्रम करते हैं तब उस क्षेत्र की उत्पादन क्षमता प्रगट होकर हमें फल प्रदान करती है। यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है यदि हम समझने का प्रयत्न करें कि अपने देश को भारतमाता कहने का हमारा क्या तात्पर्य है। राष्ट्र की शक्ति को एक रूप देने में हमारा तात्पर्य उस राष्ट्र के सभी प्रकार के कर्मक्षेत्रों की उत्पादन क्षमता से ही होता है।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि कहीं पर भी निर्माण की जो क्षमता अव्यक्त रूप में रहती है उसे व्यक्त करने के लिये आवश्यक है केवल मनुष्य का परिश्रम। इस अव्यक्त क्षमता को कहते हैं देव। इन देवों को यज्ञ कर्म से प्रसन्न कर उनका आह्वान किये जाने पर वे प्रगट होकर यज्ञकर्ता को फल प्रदान कर प्रसन्न करेंगे। इस प्रकार परस्पर उन्नति कर मनुष्य परम श्रेय को प्राप्त करेगा यह ब्रह्माजी का दिव्य उद्देश्य इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने बताया।
इस सेवाधर्म का पालन प्रकृति में सर्वत्र होता दिखाई देता है। एक मात्र मनुष्य ही है जिसे स्वेच्छा से कर्म करने की स्वतन्त्रता दी गई है इस सार्वभौमिक सेवाधर्मयज्ञ भावना का पालन करने पर वह शुभफल प्राप्त करता है। परन्तु जिस सीमा तक अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित हुआ वह कर्म करेगा उतना ही वह दुःख पायेगा क्योंकि प्रकृति के सामंजस्य में वह विरोध उत्पन्न करता है। और
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः।।3.12।।
।।3.12।। यज्ञ द्वारा पोषित देवतागण तुम्हें इष्ट भोग प्रदान करेंगे। उनके द्वारा दिये हुये भोगों को जो पुरुष उनको दिये बिना ही भोगता है वह निश्चय ही चोर है।।
यह संसार जिसमें हम रहते हैं, वह भगवान द्वारा बनाया गया है और उसकी प्रत्येक वस्तु भगवान की ही है। यदि हम सृष्टि के इन सुख साधनों पर भगवान के आधिपत्य को स्वीकार किए बिना अपने सुख के लिए इनका उपभोग करते हैं तब दैवीय दृष्टिकोण से हम निश्चित रूप से चोरी करते हैं।
भारतीय इतिहास के सुप्रसिद्ध राजा चन्द्रगुप्त ने अपने गुरु आचार्य चाणक्य से पूछा-"एक राजा का अपनी प्रजा के प्रति क्या कर्त्तव्य है?" आचार्य चाणक्य ने उत्तर दिया-"राजा प्रजा के सेवक के अलावा कुछ नहीं है। भगवान ने उसे राज्य के नागरिकों की सेवा करने का दायित्व सौंपा है ताकि वे भगवद्धाम की अपनी यात्रा में उन्नति कर सकें।" चाहे कोई राजा, व्यवसायी, किसान या श्रमिक हो, सभी व्यक्ति भगवान के संसार के अभिन्न अंग हैं और उनसे परमात्मा की सेवा के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन करने की अपेक्षा की जाती है।
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्।।3.13।।
।।3.13।। यज्ञ के अवशिष्ट अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं किन्तु जो लोग केवल स्वयं के लिये ही पकाते हैं वे तो पापों को ही खाते हैं।।
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः।।3.14।।
।।3.14।। समस्त प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं अन्न की उत्पत्ति पर्जन्य से। अर्थात बादल , वर्षा या मेघ या पर्जन्य की उत्पत्ति यज्ञ से और यज्ञ कर्मों से उत्पन्न होता है।।
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्।।3.15।।
।।3.15।। कर्म की उत्पत्ति ब्रह्माजी से होती है और ब्रह्माजी अक्षर तत्त्व से व्यक्त होते हैं। इसलिये सर्व व्यापी ब्रह्म सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है।।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति।।3.16।।
।।3.16।। जो पुरुष यहाँ इस प्रकार प्रवर्तित हुए चक्र का अनुवर्तन नहीं करता हे पार्थ इंन्द्रियों में रमने वाला वह पाप आयु पुरुष व्यर्थ ही जीता है।।
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते।।3.17।।
।।3.17।। परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमने वाला आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं रहता।।
निस्वार्थ कर्म के द्वारा प्राप्त अन्तकरण की शुद्धि एवं एकाग्रता का उपयोग जब निदिध्यासन में किया जाता है तब साधक अहंकार के परे अपने शुद्ध आत्मस्वरूप की अनुभूति प्राप्त करता है।पूर्णत्व प्राप्त ऐसे सिद्ध पुरुष के लिये कर्म की चित्तशुद्धि के साधन के रूप में कोई आवश्यता नहीं रहती वरन् कर्म तो उसके ईश्वर साक्षात्कार की अभिव्यक्ति मात्र होते हैं।
यह एक सुविदित तथ्य है कि तृप्ति एवं सन्तोष के लिये ही हम कर्म में प्रवृत्त रहते हैं। तृप्ति और सन्तोष मानो जीवनरथ के दो चक्र हैं। इन दोनों की प्राप्ति के लिये ही हम धन का अर्जन रक्षण परिग्रह और व्यय करने में व्यस्त रहते हैं।
परन्तु आत्मानुभवी पुरुष अपने अनन्त आनन्द स्वरूप में उस तृप्ति और सन्तोष का अनुभव करता है कि उसे फिर बाह्य वस्तुओं की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। जहाँ तृप्ति और सन्तोष है वहाँ सुख प्राप्ति की इच्छाओं की उत्पत्ति कहाँ इच्छाओं के अभाव में कर्म का अस्तित्व कहाँ इस प्रकार आत्म अज्ञान के कार्य इच्छा विक्षेप और कर्म का उसमें सर्वथा अभाव होता है।
स्वाभाविक है ऐसे पुरुष के लिये कोई अनिवार्य कर्तव्य नहीं रह जाता। सभी कर्मों का प्रयोजन उसमें पूर्ण हो जाता है। अत जगत् के सामान्य नियमों में उसे बांधा नहीं जा सकता। वह ईश्वरीय पुरुष बनकर पृथ्वी पर विचरण करता है।और
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रय: || 18||
।।3.18।। इस जगत् में उस पुरुष का कृत और अकृत से कोई प्रयोजन नहीं है और न वह किसी वस्तु के लिये भूतमात्र पर आश्रित होता है।।
।।3.18।। सामान्य मनुष्य कर्म में दो कारणों से प्रवृत्त होता है (क) कर्म करने से (कृत) कुछ लाभ की आशा और (ख) कर्म न करने से (अकृत) किसी हानि का भय।
परन्तु जिसने अपने परम पूर्ण आत्मस्वरूप को साक्षात् कर लिया ऐसे तृप्त और सन्तुष्ट पुरुष को कर्म करने अथवा न करने से कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। क्योंकि उसे न अधिक लाभ की आशा होती है और न हानि का भय।
आत्मानुभूति में स्थित वह पुरुष आनन्द के लिये किसी भी वस्तु या व्यक्ति पर आश्रित नहीं होता। परमार्थ दृष्टि से बाह्य विषय रूप जगत् आत्मस्वरूप से भिन्न नहीं है। वास्तव में आत्मा ही अविद्या वृत्ति से जगत् के रूप में प्रतीत होता है।
श्री रामकृष्णदेव ने कहा है -" जिनको ईश्वर लाभ हुआ है , उनका भाव कैसा है , जानते हो ? मैं यंत्र हूँ , तुम यंत्री हो , जैसा चलाते हो , वैसा चलता हूँ।
ज्ञानी पुरुष जानते हैं कि ईश्वर (आत्मा) ही एकमात्र कर्ता हैं , फिर सारे कर्म भी उन्हीं के हैं , वे स्वयं को ईश्वर के हाथ का यंत्र मानते हैं , इसी कारण वे अनासक्त भाव से जो कर्म सामने आता है उसे करते जाते हैं। यद्यपि आत्माराम पुरुषों को किसी कर्म से न तो लाभ है , न हानि। क्योंकि वे पूर्णकाम हैं , तथापि कर्म से विरत रहना जरुरी नहीं समझते, क्योंकि उनके सभी कर्म लोकसंग्रह के लिए हैं।। श्री भगवान ने कहा है - " न मे पार्थस्ति कर्तव्यं ' फिर भी लोगों के कल्याण के लिए सदा कर्म करते रहते थे। उनके कर्मों का विराम नहीं है। मुक्त पुरुष ही ठीक ठीक जनहितकर कार्य किया करते हैं। चूँकि तुमने समुद्र के समान पूर्णत्व प्राप्त नहीं किया है इसलिए
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः।।3.19।।
।।3.19।। इसलिए, तुम अनासक्त होकर सदैव कर्तव्य कर्म का सम्यक् आचरण करो; क्योकि, अनासक्त पुरुष कर्म करता हुआ परमात्मा को प्राप्त होता है।।
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि।।3.20।।
।।3.20।। जनकादि (ज्ञानी जन) भी कर्म द्वारा ही संसिद्धि को प्राप्त हुये लोकसंग्रह (लोक रक्षण) को भी देखते हुये; तुम कर्म करने योग्य हो।।
अपने जीवन द्वारा आदर्श दिखाकर कुमार्ग से निवृत्त करके सुमार्ग में परिचालित करना ही लोकसंग्रह है। यहाँ तक कि साधक और सिद्ध पुरुष भी लोकशिक्षा नहीं दे सकते। बहुत हुआ तो स्वयं ईश्वरदर्शन या ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। किन्तु उच्चतम अवस्था को प्राप्त करने के बाद उनका मन नीचे नहीं उतरता। वे क्रमशः ब्रह्मलीन हो जाते हैं। या मुक्ति लाभ करके वैकुण्ठधाम चले जाते हैं।
परमहंदेव ने कहा था - ईश्वरकोटि , (अवतार आदि) यदि न हों , तो वे निर्विकल्प समाधि से वापस नहीं लौटते। ईश्वर जब स्वयं मनुष्य बनते हैं, तब जीव के मुक्ति की कुंजी उनके हाथ में रहती है और समाधि के बाद वे लोगों के मंगल के लिए लौट आते हैं। जनक आदि आधिकारिक पुरुष हैं। ईश्वर की विशेष शक्ति लेकर वे देहधारण करते हैं। वे ईश्वर प्रेरित हैं।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।3.21।।
।।3.21।। श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही अनुकरण करते हैं; वह पुरुष जो कुछ प्रमाण कर देता है, लोग भी उसका अनुसरण करते हैं।।
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि।।3.22।।
।।3.22।। यद्यपि मुझे त्रैलोक्य में कुछ भी कर्तव्य नहीं हैं तथा किंचित भी प्राप्त होने योग्य (अवाप्तव्यम्) वस्तु अप्राप्त नहीं है, तो भी मैं कर्म में ही बर्तता हूँ।।
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।3.23।।
।।3.23।। यदि मैं सावधान हुआ (अतन्द्रित:) कदाचित कर्म में न लगा रहूँ तो, हे पार्थ ! सब प्रकार से मनुष्य मेरे मार्ग (र्वत्म) का अनुसरण करेंगे।।
आत्मज्ञानी पुरुष अपने उस शुद्ध चैतन्यस्वरूप को जानता है जिस पर जड़ अनात्म पदार्थों का खेल हो रहा होता है जैसे जाग्रत पुरुष के मन पर आश्रित स्वप्न। यदि इस परम तत्त्व का नित्य आधार या अधिष्ठान न हो तो वर्तमान में अनुभूत जगत् का अस्तित्व ही बना नहीं रह सकता। यद्यपि लहरों की उत्पत्ति से समुद्र उत्पन्न नहीं होता तथापि समुद्र के बिना लहरों का नृत्य भी सम्भव नहीं है। इसी प्रकार भगवान् क्रियाशील रहकर जगत् में न रहें तो समाज का सांस्कृतिक जीवन ही गतिहीन होकर रह जायेगा।
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः।।3.24।।
।।3.24।। यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये समस्त लोक नष्ट हो जायेंगे; और मैं वर्णसंकर का कर्ता तथा इस प्रजा का हनन करने वाला होऊँगा।।
आत्मज्ञान प्राप्त कर लेने पर स्वयं को कर्म से कोई प्रयोजन न होने पर भी ज्ञानी पुरुष को कर्म करना चाहिये।
सक्ता: कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत |
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् || 25||
।।3.25।। हे भारत ! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जैसे कर्म करते हैं वैसे ही विद्वान् पुरुष अनासक्त होकर, लोकसंग्रह (लोक कल्याण) की इच्छा से कर्म करे।।
मन का यह स्वभाव है कि वह किसी न किसी वस्तु के साथ आसक्त होकर ही कार्य करता है। इस श्लोक में वर्णित अनासक्ति का अर्थ है मिथ्या विषयों के प्रति मन में आकर्षण का अभाव। इसे प्राप्त करने का उपाय है मन को उच्च और श्रेष्ठ लक्ष्य (Be and Make) की ओर प्रवृत्त करना। अत श्रीकृष्ण जब अनासक्त होकर कर्म करने का उपदेश देते हैं तब उसका उपाय भी बताते हैं कि विद्वान् पुरुष को लोक कल्याण की इच्छा से कर्म करना चाहिए। अत्यधिक अहंकारकेन्द्रित होने पर ही आसक्ति कल्याण के मार्ग में बाधक बनती है। जिस सीमा तक हम अपनी दृष्टि को व्यापक करते हुए किसी बड़ी योजना अथवा समाज के लिये कार्य करते हैं उसी सीमा तक आसक्ति का दुखदायी विष समाप्त होकर युग को आनन्द विभोर करता है।
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्।।3.26।।
।।3.26।। ज्ञानी पुरुष, कर्मों में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करे, स्वयं (भक्ति से) युक्त होकर कर्मों का सम्यक् आचरण करे, और उनसे भी वैसा ही कराये।।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते।।3.27।।
।।3.27।। सम्पूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं, अहंकार से मोहित हुआ पुरुष, "मैं कर्ता हूँ" ऐसा मान लेता है।।
परब्रह्म की मायाशक्ति ही प्रकृति है। शक्ति और शक्तिमान अभिन्न है। यह प्रकृति त्रिगुणमयी है। श्रीरामकृष्णदेव ने कहा है - " हमलोग जो कुछ देख रहे हैं , कर रहे हैं , या सोच रहे हैं वह सब उस आद्याशक्ति या चिति शक्ति का ही ऐश्वर्य है। सृष्टि, पालन , संहार , जीवजगत , ध्यान, ध्याता , भक्ति , प्रेम सभी उनके ऐश्वर्य हैं , किन्तु ब्रह्म और उनकी शक्ति यह माया दोनों अभिन्न हैं। " आद्या शक्ति या महामाया ने जीव की बुद्धि को आवृत्त कर रखा है। ....अवतार लीला के कार्य चितिशक्ति के ऐश्वर्य हैं। जो ब्रह्म है वही राम, कृष्ण और शिव है।
प्रकृति के कारण यह जगत्प्रपंच प्रतीयमान हो रहा है। देह, इन्द्रिय ,मन, बुद्धि सभी प्रकृति के परिणाम हैं। इस प्रकृति के परिणाम देह , इन्द्रिय, मन , बुद्धि आदि में चेतन आत्मा का अभिमान ही अहंकार है। अज्ञानी व्यक्ति समझता है कि मैं ही कर्ता हूँ , किन्तु ज्ञानी जानते हैं एक मात्र कर्ता 'ठाकुरजी' हैं। परमहंसदेव ने कहा है - " मनुष्य के भीतर दो प्रकार के 'मैं ' है - 'कच्चा' मैं और 'पक्का' मैं। ... कच्चा मैं बंधन का कारण है। मुक्ति कब होगी ? जब 'अहं' जायेगा तब। ...अहं तो एकदम नहीं जायेगा नहीं , तो रहने दो निगोड़े अहं को - 'मैं दास हूँ ' बनकर। 'मैं भगवान का दास हूँ' - ऐसे बोध होने से कोई हानि नहीं है। ....समाधि होने पर उनके साथ मिलन हो जाता है , तब 'अहं' नहीं रहता। ज्ञान होने पर यदि 'अहं' रहे तो जान लेना वह विद्या का मैं , भक्ति का मैं , दास मैं है। वह अविद्या का 'मैं ' नहीं, वह पक्का 'मैं' है। प्रह्लाद , नारद , हनुमान आदि समाधि से लौटने के बाद भक्त बनकर रहे थे। आचार्य शंकर ने लोकसंग्रह के लिए विद्या के 'अहं' को रखा था। प्रह्लाद , नारद , हनुमान, शंकर आदि आधिकारिक पुरुष थे। वे श्री भगवान की विशेष शक्ति लेकर लोककल्याण के लिए माया की देह अपनाकर विराजमान थे। कर्म करने से ही कोई कर्मयोगी नहीं हो जाता। कर्तृत्व का अभिमान और कर्म में आसक्ति छोड़कर कर्म अनुष्ठान करते रहने से ही कर्म योग होता है। कर्मयोगी और ज्ञानयोगी का गन्तव्य स्थान और प्राप्तव्य वस्तु एक ही है।
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते।।3.28।।
।।3.28।। परन्तु हे महाबाहो ! गुण और कर्म के विभाग के सत्य (तत्त्व) को जानने वाला ज्ञानी पुरुष यह जानकर कि "गुण गुणों में बर्तते हैं" (कर्म में) आसक्त नहीं होता।।
इन्द्रियों के साथ विषयों का संयोग ही कर्म है। आत्मज्ञ व्यक्ति जानते हैं कि आत्मा (चेतना) निष्क्रिय है इन्द्रियां ही कर्म करती हैं। जिसे आत्मज्ञान नहीं हुआ है वह समझता है कि 'मैं कर्ता हूँ' और कर्म का फलभोग भी 'मैं ही करूँगा। ' इसी कारण वह फल की आशा में कर्म में आसक्त होता है।
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्।।3.29।।
।।3.29।। प्रकृति के गुणों से मोहित हुए पुरुष गुण और कर्म में आसक्त होते हैं, उन अपूर्ण ज्ञान वाले (अकृत्स्नविद:) मंदबुद्धि पुरुषों को पूर्ण ज्ञान प्राप्त पुरुष विचलित न करे।।
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः।।3.30।।
।।3.30।। सम्पूर्ण कर्मों का मुझ में संन्यास करके, आशा और ममता से रहित होकर, संतापरहित हुए तुम युद्ध करो।।
आचार्य शंकर ने इसके भाष्य में लिखा है - ईश्वर ही सबकुछ करते हैं , वही कर्ता हैं , मैं उनके दास के रूप में काम करता हूँ , मन में ऐसा विचार रखकर , चित्त को आत्मस्थ करके आवश्यक कार्य करते रहना चाहिए।
भगवान (मायाधीश) ही सबकुछ करते हैं , उनकी इच्छा से ही सब कुछ होता है , (मायाधीन) जीव निमित्त मात्र है। इस भाव को परमहंस देव जी ने (राजा -नवचन्द्र -विरचित) एक संगीत के माध्यम से सुंदर रूप से प्रकट किया है। वे गाया करते थे -
सकलि तोमारि इच्छा इच्छामयी तारा तुमि ।
तोमार कर्म तुमि करो माँ, लोके बोले करि आमि।।
पंके बद्ध करो करि, पंगुरे लंघाओ गिरि,
कारे दाओ माँ ब्रह्मपद, कारे करो अधोगामी ।।
आमि यंत्र तुमि यंत्री, आमि घर तुमि घरनी,
आमि रथ तुमि रथी, जेमन चालाओ तेमनि चलि ।।
अर्थात हे माँ तारा , तुम इच्छामयी हो, सभी तुम्हारी इच्छा है। अपना काम तुम्हीं करती हो माँ , पर लोग कहते हैं कि ' मैं करता हूँ।' हाथी को तुम कीचड़ में फँसा देती हो , पंगु को तुम पर्वत लंघवा देती हो , किसी को तुम ब्रह्मपद देती हो , तो किसीको अधोगामी बना देती हो। मैं यंत्र हूँ और तुम यंत्री हो। मैं गृह हूँ और तुम गृहणी हो। मैं रथ हूँ और तुम रथी हो , जैसा चलती हो मैं वैसा ही चलता हूँ।
फल की इच्छा और कर्तापन का अहंकार छोड़कर जो व्यक्ति समस्त कर्म ईश्वर (आत्मा, भगवान) में समर्पित बुद्धि से कर्म करता है वही सच्चा कर्मयोगी है। अतः कर्मयोग की मूल भित्ति है त्याग। (मिथ्या अहं का त्याग) कर्मयोगी होने के लिए बुद्धि को देह-मन से खींचकर आत्मा में स्थित रहना। इस प्रकार त्याग के आदर्श में स्थित होकर निष्काम भाव से नित्य ,नैमित्तिक और लौकिक कर्म करता है , अर्थात जो पूजा , अर्चना , सेवा , वंदना , दान , ध्यान , तप आदि समस्त कर्मों को आत्मसंस्थ होकर करता है , वही कर्मयोगी है। इस प्रकार अनुष्ठित कर्म में ज्ञान ,कर्म और भक्ति तीनों का समन्वय निहित है।
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः।।3.31।।
।।3.31।। जो मनुष्य दोष बुद्धि से रहित (अनसूयन्त:) और श्रद्धा से युक्त हुए सदा मेरे इस मत (उपदेश) का अनुष्ठानपूर्वक पालन करते हैं, वे कर्मों से (बन्धन से) मुक्त हो जाते हैं।।
कर्म करने का आह्वान करते हुए श्रीकृष्ण अब भगवद्गीता के उपदेशों के महत्त्व को श्रद्धापूर्वक स्वीकार करने और उन्हें अपने जीवन में अपनाने का संदेश देते हैं।
अनसूयन्त:-" परगुणेषु दोषाविष्करणम् असूया" का अर्थ है दूसरों के गुणों (अच्छाइयों) में दोष (कमियां) निकालना। जिसका चित्त शुद्ध नहीं हुआ है , जिसका चित्त मलिन है वही दूसरों में दोष देखता है , इससे अपनी ही हानि होती है , वह अपने को दुःखी बनाता है। एक महिला भक्त के प्रति माँ सारदा देवी का अन्तिम उपदेश था - " यदि शान्ति चाहती हो, बेटी तो किसी का दोष न देखो।"
यह ईर्ष्या या जलन की भावना को दर्शाता है, जहाँ कोई व्यक्ति दूसरे की सफलता या योग्यता को सहन नहीं कर पाता और उसमें खामियां ढूंढता है। यह सिद्धांत कौमुदी के अनुसार एक प्रकार का मानसिक विकार है। मानव के रूप में हमारा दायित्व है कि हम सत्य को जानें और तदनुसार अपने जीवन को सुधारे। ऐसा करने से हमारे मानसिक सन्ताप, काम, लोभ, ईर्ष्या, मोह आदि शान्त हो जाते हैं।
असूया (गुणों में दोष दर्शन) का त्याग करके एवं श्रद्धापूर्वक कर्मयोग का पालन करने से ही यह संभव हो सकेगा। श्रद्धा संस्कृत में श्रद्धा का भाव गम्भीर है जिसे अंग्रेजी भाषा के किसी एक शब्द द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता। श्रीशंकराचार्य श्रद्धा को पारिभाषित करते हुए कहते हैं कि शास्त्र और गुरु के वाक्यों (महावाक्यों) में वह विश्वास जिसके द्वारा 'सत्य' का ज्ञान होता है श्रद्धा कहलाता है। यहाँ किसी प्रकार के अन्धविश्वास को श्रद्धा नहीं कहा गया है वरन् उसे बुद्धि का वह सार्मथ्य - बताया गया है जिससे सत्य का ज्ञान होता है। (नित्य-अनित्य विवेक ही मनुष्य की वह विशेष योग्यता है जिससे त्रिकाल अबाधित सत्य या इन्द्रियातीत सत्य का ज्ञान होता है।)
वे भी कर्म से मुक्त होते हैं ऐसे वाक्यों को पढ़कर अनेक विद्यार्थी स्तब्ध रह जाते हैं। अब तक भगवान् कुशलतापूर्वक कर्म करने का उपदेश दे रहे थे और अब अचानक कहते हैं कि वे भी कर्म से मुक्त हो जाते हैं। नैर्ष्कम्य शब्द के अर्थ को स्पष्ट करते समय हमने देखा कि आत्मअज्ञान ही इच्छा, विचार और कर्म के रूप में व्यक्त होता है। अतः आनन्दस्वरूप आत्मा को पहचानने पर अविद्याजनित इच्छायें और कर्मों का अभाव हो जाता है।
इसलिये यहाँ बताई हुई कर्मों से मुक्ति का वास्तविक तात्पर्य है अज्ञान के परे स्थित आत्मस्वरूप की प्राप्ति। केवल कर्मों के द्वारा परमात्मस्वरूप में स्थिति नहीं प्राप्त की जा सकती। संसदमार्ग स्वयं संसद नहीं है किन्तु वहाँ तक पहुँचने पर संसद भवन दूर नहीं रह जाता। इसी प्रकार यहाँ कर्मयोग को ही परमार्थ प्राप्ति का मार्ग कहकर उसकी प्रशंसा की गई है क्योंकि, कर्मयोग के पालन से अन्तकरण शुद्ध होकर साधक नित्यमुक्त स्वरूप का ध्यान करने योग्य बन जाता है।परन्तु इसके विपरीत
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः।।3.32।।
।।3.32।। परन्तु जो असुयायुक्त होकर दोष दृष्टि वाले मूढ़बुद्धि/ सम्मोहित बुद्धि के लोग इस मेरे मत का पालन नहीं करते, उन सब ज्ञानों में मोहित चित्तवालों को नष्ट हुये ही तुम समझो।।
विवेकी बुद्धि के कारण ही मनुष्य को प्राणि जगत् में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। बुद्धि में स्थित आत्मानात्मविवेक सत्य और मिथ्या का विवेक करने की क्षमता केवल मनुष्य की विशेष योग्यता है। विवेक-प्रयोग क्षमता का सदुपयोग ही आत्मविकास का एकमात्र उपाय है। विवेक के नष्ट होने पर वह पशु के समान मन की प्रवृत्तियों के अनुसार व्यवहार करने लगता है तथा मनुष्य जीवन के परम पुरुषार्थ को प्राप्त नहीं कर पाता। यही उसका विनाश है। अहंकार और स्वार्थ को त्यागकर कर्म करना ही आदर्श जीवन है जिसके द्वारा मनुष्य को नित्य और महान् उपलब्धियां प्राप्त हो सकती हैं। ऐसे जीवन का त्याग करने का अर्थ है अविवेक को निमन्त्रण देना और अन्त में स्वयं का नाश कराना।
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति।।3.33।।
।।3.33।। ज्ञानवान् पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। सभी प्राणी अपनी प्रकृति पर ही जाते हैं, फिर इनमें (किसी का) निग्रह क्या करेगा।।
यहाँ 'ज्ञानवान् ' शब्द का प्रयोग आत्मज्ञान में प्रतिष्ठित व्यक्ति के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। जो लोग तत्वज्ञान में प्रतिष्ठित होने की चेष्टा करते हैं केवल उन्हीं के सम्बन्ध इस शब्द का प्रयोग किया गया है। 'अपरोक्षानुभूति ' होने के पूर्व तक सभी मनुष्य प्रारब्ध के अधीन रहते हैं। आत्मज्ञान हो जाने के बाद भी पूर्व जन्मों में अर्जित कर्मफल के अनुसार परिचालित होते हैं। इस कर्मसंस्कार को ही यहाँ प्रकृति कहा गया है। पूर्वजन्म के धर्माधर्म कर्मों के फलस्वरूप विशेष-विशेष गुणों के विकास को पुराने संस्कार, आदत या प्रवृत्ति कहते हैं। इसका ही नाम स्वभावजात कर्म है। प्रत्येक मनुष्य अपने स्वभाव के अनुसार बाध्य होकर काम करता है।
'निग्रहः किं करिष्यति '-- स्वभाव के शक्तिशाली होने पर किसी का निग्रह क्या करेगा यह अन्तिम वाक्य भगवान् के उपदेश में निराशा का उद्गार नहीं किन्तु उनकी परिपूर्ण दृष्टि का परिचायक है।इस आक्षेप का तात्पर्य यह है कि मनुष्य के स्वभाव /प्रवृत्ति /चरित्र का संशोधन बहुत ही कठिन है। वे वस्तु स्थिति से परिचित हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जीवन के उच्च मार्ग पर चलने की क्षमता नहीं रखता। विकास के सोपान की सबसे निचली सीढ़ी पर खड़े असंख्य मनुष्यों के लिये इस मार्ग का अनुसरण कदापि सम्भव नहीं क्योंकि विषयों में आसक्ति तथा पाशविक प्रवृत्तियों से वे इस प्रकार बंधे होते हैं कि उन सबका एकाएक त्याग करना उन सबके लिये सम्भव नहीं होता। जिस मनुष्य में कर्म के प्रति उत्साह तथा जीवन में कुछ पाने की महत्त्वाकांक्षा है केवल वही व्यक्ति इस कर्मयोग का आचरण करके स्वयं को कृतार्थ कर सकता है।
प्रत्येक व्यक्ति का अपना निजी स्वभाव है यदि उसी के अनुसार कर्म करने को वह विवश है तो फिर पुरुषार्थ के लिये कोई अवसर ही नहीं रह जाता। इस कारण यह उपदेश भी निष्प्रयोजन हो जाता है। इस पर भगवान् कहते हैं
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ।।3.34।।
।।3.34।। इन्द्रियइन्द्रिय (अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय) के विषय के प्रति (मन में) रागद्वेष रहते हैं; मनुष्य को चाहिये कि वह उन दोनों के वश में न हो; क्योंकि वे इसके (मनुष्य के) शत्रु हैं।।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये अविद्या -अस्मिता, राग-द्वेष , अभिनिवेश पंचक्लेश ही लुटेरे हैं जो मन की शांति का हरण कर लेते हैं और जिनके कारण मनुष्य सच्चा जीवन नहीं जी पाता। वास्तव में यह दुख की बात है। वस्तुस्थिति को दर्शाकर भगवान् समस्त साधकों को उपदेश देते हैं कि मनुष्य को चाहिये कि वह इन दोनों के वश में न होवे। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी भी रूप में बाह्य जगत् से पलायन करने का उपदेश गीता में कहीं पर भी नहीं मिलता।
भगवान् का उपदेश तो यहाँ और अभी जीवन की उपलब्ध परिस्थितियों में शरीर मन और बुद्धि के माध्यम से सब अनुभवों को प्राप्त करते हुये जीने के लिये है। आग्रह केवल इस बात का है कि सभी परिस्थितियों में मनुष्य को जड़ देह, इन्द्रिय, मन बुद्धि आदि उपाधियों का स्वामी बनकर रहना चाहिये और न कि उनका दास बनकर। इस प्रकार के स्वामित्व को प्राप्त करने का उपाय राग और द्वेष से मुक्त हो जाना है।
अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए हमें अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। हमें न तो अनुकूल परिस्थितियों के लिए लोभ करना चाहिए और न ही प्रतिकूल परिस्थितियों की उपेक्षा करनी चाहिए। जब हम मन और इन्द्रियों के रुचिकर और अरुचिकर दोनों विषयों की दासता से मुक्त हो जाते हैं तब हम अपनी अधम प्रकृति (देह-मन) से ऊपर उठ जाते हैं और फिर हम अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करते समय सुख और दुःख दोनों में समभाव से रहते हैं। तब हम वास्तव में अपनी विशिष्ट स्वभाव से/ जीवभाव से //प्रकृति से मुक्त होकर कार्य करते हैं।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।3.35।।
।।3.35।। सम्यक् प्रकार से अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म का पालन श्रेयष्कर है; स्वधर्म में मरण कल्याणकारक है (किन्तु) परधर्म भय को देने वाला है।।
धर्म की परिभाषा हम देख चुके हैं कि जिसके कारण वस्तु का अस्तित्व सिद्ध होता है वह उस वस्तु का धर्म कहलाता है। मनुष्य की विशेष योग्यता है, नित्य-अनित्य विवेक यही मनुष्य का धर्म है। वर्णाश्रम धर्म के अनुसार एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति का भिन्नत्व उसके विवेक-पूर्ण विचारों द्वारा निश्चित किया जाता है।
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः।।3.36।।
।।3.36।। अर्जुन ने कहा -- हे वार्ष्णेय ! फिर यह पुरुष बलपूर्वक बाध्य किये हुये के समान अनिच्छा होते हुये भी किसके द्वारा प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है?
वृष्णि वंश में जन्म होने से श्रीकृष्ण का नाम वार्ष्णेय था। बुद्धि से प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि पुण्य क्या है किन्तु जब कर्म करने का समय आता है तब पाप में ही उसकी प्रवृत्ति होती है। यह एक दुर्भाग्य पूर्ण विडम्बना है। स्वयं के आदर्श और वास्तविक आचरण में जो दूरी रहती है वह सभी आत्मनिरीक्षक विचारकों के लिये वास्तव में एक बड़ी समस्या बन जाती है। हमारे हृदय मे स्थित दैवी गुण व्यक्त होकर श्रेष्ठतर उपलब्धि प्राप्त करना चाहते हैं परन्तु पाशविक प्रवृत्तियां हमें प्रलोभित करके श्रेयमार्ग से दूर ले जाती हैं। और हम निम्न स्तर के शारीरिक सुखों में ही रमण करते रहते हैं। अधिकांश समय यह सब हमारी अनिच्छा से ही होता रहता है। अर्जुन पूछता है मन में बैठे इस राक्षस का स्वरूप क्या है जो हममें स्थित दैवी गुणों को सुनियोजित ढंग से लूट ले जाता है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान ने कहा -
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।।3.37।।
।।3.37।। श्रीभगवान् ने कहा -- रजोगुण में उत्पन्न हुई यह 'कामना' है, यही क्रोध है; यह महाशना (जिसकी भूख बड़ी हो) और महापापी है, इसे ही तुम यहाँ (इस जगत् में) शत्रु जानो।।
आत्म-अज्ञान ही बुद्धि में इच्छा रूप में व्यक्त होता है। देहात्मबुद्धि (मूढ़ या सम्मोहित बुद्धि) में स्थित यह काम (कामिनी-कांचन की कामना) यह काम-क्रोध अर्थात् इच्छा ही मनुष्य के ह्रदय में स्थित राक्षस है।
काम और क्रोध दोनों एक ही चित्तवृत्ति है। यहाँ 'काम-क्रोध' शब्द से षडरिपुओं - काम , क्रोध, लोभ , मद ,मोह और मात्सर्य का संकेत है , जो आत्मोन्नति के मार्ग - 'योगः चित्तवृत्ति निरोधः' के छः रिपु या शत्रु हैं।
काम बाधित होने पर क्रोध के रूप में परिणत हो जाता है। अतः जहाँ काम है वहीँ क्रोध उत्पन्न होने की सम्भावना है। जगत् में असंख्य व्यक्तियों और परिस्थितियों के मध्य सदैव इच्छा का पूर्ण होना सम्भव नहीं होता और इस प्रकार हमारे और इच्छित वस्तु के बीच कोई विघ्न आता है तो प्रतिहत इच्छा ही क्रोध का रूप ले लेती है। इस प्रकार काम अथवा क्रोध ही वह छः रिपु या शत्रु या राक्षस है जो हमें परिस्थितियों के साथ समझौता करने को विवश कर देता है। आदर्शों को भुलाकर हमें पापाचरण में प्रवृत्त करता है।
हमारी निम्न कोटि की इच्छायें जितनी प्रबल होगी उतना ही पापपूर्णं हमारा जीवन होगा। कामनाएं हमारे विवेक को आच्छादित कर देती हैं। काम के उत्पन्न होने पर उससे ही असंख्य प्रकार की दुखदायक वृत्तियां उत्पन्न होती हैं। इन सब के वश में होना अज्ञान और उनके ऊपर शासन करना ज्ञान है। अब भगवान् दृष्टांतों के द्वारा समझाते हैं कि किस प्रकार हमारा शत्रु यह काम हमारे विवेक को आच्छादित करता है ?
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्।।3.38।।
।।3.38।। जैसे धुयें से अग्नि और धूलि से दर्पण ढक जाता है तथा जैसे गर्भाशय से भ्रूण ढका रहता है, वैसे उस (काम) के द्वारा यह (ज्ञान) आवृत होता है।।
जगत् की अनित्य वस्तुओं के साथ आसक्ति के कारण मनुष्य का नित्य-अनित्य विवेक-प्रयोग सार्मथ्य आच्छादित हो जाता है। आत्म -अज्ञान के कारण हमारी आसक्तियाँ अथवा इच्छाएँ तीन भागों में '3H' में - अर्थात देह (Hand) , मन (Head), हृदय (Heart) में विभाजित की जा सकती हैं। अत्यन्त निम्न स्तर (इन्द्रिय-विषय भोग) की इच्छाएँ मुख्यतः शारीरिक उपभोगों (कामिनी) के लिये दूसरे हमारी महत्त्वाकांक्षाएँ हो सकती हैं सत्ता धन (कांचन) प्रसिद्धि और कीर्ति पाने के लिये। इनसे भिन्न तीसरी इच्छा हो सकती है आत्मविकास और आत्मसाक्षात्कार की। ये तीन प्रकार की इच्छाएँ त्रिगुणों के प्राधान्य से क्रमशः तामसिक राजसिक और सात्त्विक कहलाती हैं। यहाँ तीन दृष्टान्तों के द्वारा इन तीन प्रकार की इच्छाओं से उत्पन्न विभिन्न प्रकार के आवरणों को स्पष्ट किया गया है।
1 . जैसे धुयें से अग्नि अनेक बार धुयें से अग्नि की चमकती ज्वाला पूर्णत या अंशत आवृत हो जाती है। इसी प्रकार सात्त्विक इच्छाएँ भी अनन्त स्वरूप आत्मा के प्रकाश को आवृत सी कर लेती हैं।
2.जैसे धूलि से दर्पण रजोगुण से उत्पन्न विक्षेपों के कारण बुद्धि पर पड़े आवरण (षडरिपु ) को इस उदाहरण के द्वारा स्पष्ट किया गया है। धुएँ के आवरण की अपेक्षा दर्पण पर पड़े धूलि को दूर करने के लिये अधिक प्रयत्न की आवश्यकता होती है। बहते हुये वायु के एक हल्के से झोंके से ही धुआँ हट जाता है जबकि तूफान के द्वारा भी दर्पण स्वच्छ नहीं किया जा सकता। केवल एक स्वच्छ सूखे कपड़े से पोंछकर ही उसे स्वच्छ करना सम्भव है। धुँए के होने पर भी कुछ मात्रा में अग्नि दिखाई पड़ती है परन्तु धूलि की मोटी परत जमी हुई होने पर दर्पण में प्रतिबिम्ब बिल्कुल नहीं दिखाई पड़ता।
3.जैसे गर्भाशय से भ्रूण तमोगुण जनित अत्यन्त निम्न पशु जैसी वैषयिक कामनाएँ दिव्य स्वरूप को पूर्णत आवृत कर देती हैं जिसे समझने के लिए यह भ्रूण का दृष्टांत दिया गया है। गर्भस्थ शिशु पूरी तरह आच्छादित रहता है और उसके जन्म के पूर्व उसे देखना संभव भी नहीं होता। यहाँ आवरण पूर्ण है और उसके दूर होने के लिये कुछ निश्चित काल की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार तामसिक इच्छाओं से उत्पन्न बुद्धि पर के आवरण को हटाने के लिए जीव को विकास की सीढ़ी पर चढ़ते हुए दीर्घकाल तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
यह विषय-भोग में आसक्ति अहं भाव को आश्रय करके रहती है। इसी कारण श्रीरामकृष्ण देव ने कहा है- " मुक्त कब होगा ? जब 'मैं' जायेगा तब। अहंभाव के दूर होने पर भगवान प्रकट होते हैं। यह 'मैं' दो प्रकार का है , पहला है कच्चा 'मैं ' दूसरा है पक्का 'मैं।' मेरा घर , मेरा लड़का, मेरा छाता - यह कच्चा मैं है। और पक्का मैं है - मैं उनका दास हूँ , मैं उनका पुत्र हूँ , मैं नित्यमुक्त -ज्ञानस्वरूप आत्मा (चेतन) हूँ। फिर 'मैं' का ज्ञान रहने से 'तुम' का भी बोध रहेगा। जैसे प्रकाश का ज्ञान रहने से अँधकार का भी ज्ञान आता है। पाप के ज्ञान के साथ पुण्य-ज्ञान भी रहता है। उत्तम का ज्ञान रहने से अधम का भी ज्ञान रहता है। अतएव अहं भाव ही सारे बंधनों का कारण है। इस अहं -रूप अज्ञान के नाश से ही मुक्ति होती है।
इस प्रकार इन भिन्नभिन्न प्रकार की इच्छाओं से उत्पन्न विभिन्न तारतम्य में अनुभव में आने वाले आवरणों को स्पष्ट किया गया है। इस श्लोक में केवल सर्वनामों का उपयोग करके कहा गया है कि उसके द्वारा यह आवृत है। अब अगले श्लोक में इन दोनों सर्वनामों 'उसके द्वारा' और 'यह' को स्पष्ट किया गया है
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च।।3.39।।
।।3.39।। हे कौन्तेय ! अग्नि के समान जिसको तृप्त करना कठिन है ऐसे कामरूप, ज्ञानी के इस नित्य शत्रु द्वारा ज्ञान आवृत है।।
यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि उस कामरूप शत्रु के द्वारा यह 'ज्ञान' अर्थात् " ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या , जीवो ब्रह्मैव न अपरः" वाला विवेक सार्मथ्य आच्छादित हो जाती है। आत्मानात्म नित्यानित्य और सत्यासत्य में जिस विवेक सार्मथ्य के कारण सब प्राणियों में मनुष्य को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है उसी विवेक-सम्पन्न बुद्धि की क्षमता को यह आवृत कर देता है। यह काम दुष्पूर अर्थात् इसका पूर्ण होना असम्भव ही होता है। अब भगवान् उस काम के निवास स्थान बताते हैं जिसके ज्ञान से शत्रु को नष्ट करना सरल होगा
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्।।3.40।।
।।3.40।। इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इसके निवास स्थान कहे जाते हैं; यह काम इनके द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके देही पुरुष को मोहित करता है।।
मन की शान्ति और सन्तोष को लूट ले जाने वाले शत्रु काम के पहचाने जाने पर एक सैनिक के समान राजकुमार अर्जुन की अपने शत्रु के निवास स्थान के विषय में जानने की इच्छा थी। अध्यात्म के उपदेशक के रूप में भगवान् को यह बताना आवश्यक था कि यह काम कौन से स्थान पर रहकर अपनी अत्यन्त दुष्ट योजनाएँ बनाता है। कामना का निवास स्थान है इन्द्रियाँ मन और बुद्धि। बड़े विस्तृत क्षेत्र में अपराध करने वाले दस्यु दल के सरदार के एक से अधिक रहने के स्थान होते हैं जहाँ से वह पूरे दल का संचालन करता है। यहाँ भी कामनारूप शत्रु के स्थानों का स्पष्ट निर्देश किया गया है।
अविद्या जनित पंचक्लेश से मोहित जीव शरीर के साथ तादात्म्य करके विषयोपभोग चाहता है। अविवेक पूर्वक मन और बुद्धि के साथ तादात्म्य करके भावनाओं एवं विचारों की सन्तुष्टि की वह इच्छा करता है। इन स्थानों पर इच्छा को खोजना माने शत्रु का सामना करना है। अन्त में शत्रु नाश कैसे करना है ? इसका वर्णन आगे के श्लोकों में किया गया है
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्।।3.41।।
।।3.41।। इसलिये, हे अर्जुन ! तुम पहले इन्द्रियों को वश में करके, ज्ञान और विज्ञान के नाशक इस कामरूप पापी को नष्ट करो।।
आत्म -अज्ञान के कारण उत्पन्न इच्छा को ही यहाँ पापी कहने का कारण यह है कि वह अपने स्थूल रूप में हमें अत्यन्त निम्न स्तर के जीवन को जीने के लिए विवश कर देती है। धुएँ के समान सात्त्विक इच्छा होने पर भी हमारा शुद्ध अनन्तस्वरूप पूर्णरूप से प्रगट नहीं हो पाता। अतः सभी प्रकार की इच्छाएँ कम-अधिक मात्रा में पापयुक्त ही कही गयी हैं।
गुरु का शिष्य को इन्द्रिय संयम का उपदेश देना तो सरल है परन्तु जब तक वे उसका कोई साधन नहीं बताते तब तक उनका उपदेश आकाश पुष्प से बनी औषधि के समान ही असम्भव समझा जायेगा। हम किस वस्तु का आश्रय लेकर इस इच्छा का त्याग करें इस प्रश्न का उत्तर है
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः।।3.42।।
।।3.42।। (शरीर से) परे (श्रेष्ठ) इन्द्रियाँ कही जाती हैं; इन्द्रियों से परे मन है और मन से परे बुद्धि है, और जो बुद्धि से भी परे है, वह है आत्मा।।
इस दृष्टि से बुद्धि की व्यापकता और भी अधिक विस्तृत है इसलिए बुद्धि को मन से श्रेष्ठतर कहा गया है। जो बुद्धि के भी परे तत्त्व है उसे ही आत्मा कहते हैं। बुद्धिवृत्तियों को प्रकाशित करने वाला चैतन्य बुद्धि से भी सूक्ष्म और श्रेष्ठ होना ही चाहिये। उपनिषदों में कहा गया है कि इस चैतन्यस्वरूप आत्मा के परे या सूक्ष्म और कुछ नहीं है।
अणोरणीयान् महतो महीयान्। ।
आत्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्। कठ १/२/२०
अर्थात सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर और विशाल से भी विशालतर आत्मा है। यह आत्मा जीव के ह्रदय रूपी गुहा में अवस्थित है।
मनःसंयोग का अभ्यास (ध्यानसाधनामें) शरीर, इन्द्रिय , मन और बुद्धि उपाधियों से अपने तादात्म्य को हटाकर आत्मस्वरूप में स्थित होने का सजग प्रयत्न किया जाता है। ये सभी प्रयत्न तब समाप्त हो जाते हैं जब सब मिथ्या वस्तुओं की ओर से अपना ध्यान हटाकर हम निर्विषय चैतन्यस्वरूप बनकर स्थित हो जाते हैं। भगवान् आगे कहते हैं-
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।3.43।।
।।3.43।। इस प्रकार बुद्धि से परे (चैतन्य) आत्मा को जानकर आत्मा (सुद्ध बुद्धि) के द्वारा आत्मा (मन) को वश में करके, हे महाबाहो ! तुम इस दुर्जेय (दुरासदम्) कामरूप शत्रु को मारो।।
कामना वासना ही बंधन का का कारण है। वासना रहित होने से भगवत प्राप्ति अर्थात मुक्ति होती है। आत्मशक्ति (शुद्ध बुद्धि- निश्चयात्मिका बुद्धि) की सहायता से जीवात्मा को वासना रहित करना होगा। इसके लिए विवेक-वैराग्य आदि साधन चतुष्टय की विशेष आवश्यकता है। श्रीरामकृष्ण देव ने कहा है - " विवेक और वैराग्य न हो तो भगवान नहीं मिलते।
आत्मानुभव रूप ज्ञान के द्वारा ही हम आत्मअज्ञान को नष्ट कर सकते हैं। आत्मा के अज्ञान का ही परिणाम है इच्छा; जिसके निवास स्थान हैं इन्द्रियाँ मन और बुद्धि। प्रत्याहार और धारण के अभ्यास से जब हम अपना ध्यान बाह्य विषय शरीर मन और बुद्धि से विलग करके स्व-स्वरूप में (अवतार वरिष्ठ में) स्थिर करते हैं, तब इच्छा की जननी बुद्धि ही समाप्त हो जाती है।
शरीर मन आदि उपाधियों के साथ जब तक हमारा तादात्म्य बना रहता है तब तक हम अपने शुद्ध दिव्य स्वरूप को पहचान ही नहीं पाते। इतना ही नहीं बल्कि सदैव दुखी बद्ध परिच्छिन्न अहंकार को ही अपना स्वरूप समझते हैं। स्वस्वरूप के वैभव का साक्षात् अनुभव कर लेने पर हम अपने मन को पूर्णतया वश में रख सकेंगे।
गौतम बुद्ध के समान ज्ञानी पुरुष का मन किसी भी प्रकार उसके अन्तकरण में क्षोभ उत्पन्न नहीं कर सकता क्योंकि वह मन ज्ञानी पुरुष के पूर्ण नियन्त्रण में रहता है। जो व्यक्ति इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है वही साधक ईश्वरीय पुरुष, ऋषि, पैगम्बर या मानवजाति का मार्गदर्शक नेता कहलाता है।
इस अध्याय का नाम है कर्मयोग। योग शब्द का अर्थ है आत्मविकास की साधना द्वारा अपर निकृष्ट वस्तु (मूढ़ बुद्धि) को पर और उत्कृष्ट वस्तु (चेतन) के साथ संयुक्त करना। जिस किसी साधना के द्वारा यह लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है उसे ही योग कहते हैं। इस प्रकार श्रीकृष्णर्जुन संवाद के रूप में ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रस्वरूप श्रीभगवद्गीतोपनिषद् का कर्मयोग नामक तीसरा अध्याय समाप्त होता है।
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