गीता ध्यान
[Gita Dhyan]
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपाल नन्दन:।
पार्थो वत्स: सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्।।
अर्थात सभी उपनिषदें मानो गाय के समान हैं , श्रीकृष्ण उनका दोहन करने वाले हैं। अर्जुन बछड़े के समान है। और गीता के अमृतरूप उपदेश उत्तम दूध के समान है , "सुधीर्भोक्ता" अर्थात केवल "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः" बोध से सम्पन्न विवेकी लोग ही उस दूध के पीने वाले हैं !
गीता के सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द ने 28 मई 1900 को सैनफ्रांसिस्को में भाषण (खण्ड 7-पृष्ठ 294) करते हुए कहा था -" गीता का प्रथम दृश्य युद्धक्षेत्र का है। दोनों ओर स्वजन सम्बन्धी और आत्मीय जन खड़े हैं -एक ओर कौरव है और दूसरी ओर पाण्डव। एक ओर पितामह भीष्म हैं तो दूसरी ओर इनके पौत्रगण , शत्रु-पक्ष में अपने आत्मीय स्वजनों को देख , उनका वध करने की बात सोचकर अर्जुन उदास हो गए और अस्त्रत्याग करने का निश्चय कर लिया। यथार्थ में गीता का आरम्भ यहीं से होता है।
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।2.3।।
।।2.3।। हे पार्थ, स्वार्थपरता के वशीभूत होकर क्लीव (कायर) मत बनो। यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है, हे ! परंतप हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ।।
.....'हे भारत उठो , हृदय की इस दुर्बलता का त्याग करो और कायरता छोड़ दो ! उठ खड़े होओ और युद्ध करो करो। इस तात्पर्यपूर्ण श्लोक से गीता का अभिप्राय झलकता है। अर्जुन ने तर्क और युक्ति देते हुए उच्चतर नैतिक आदर्शों का प्रसंग उठाया , कहा कि प्रतीकार करने की अपेक्षा प्रतीकार न करना ही अच्छा है , इत्यादि। लेकिन कृष्ण परमात्मा हैं , साक्षात् भगवान है। उन्होंने उसी क्षण अर्जुन की दलील का असली रूप समझ लिया, और वह थी अर्जुन की दुर्बलता। अर्जुन स्वजनों को देखकर युद्ध करने में अपने को असमर्थ पा रहे थे। उनके ह्रदय में कर्तव्य और भावुकता (माया) का द्वन्द्व चल रहा था। ,मनुष्य जितना ही पक्षीसुलभ ममता के वश में होता है , वह भावावेग में उतना ही डूब जाता है। और इसी को लोग प्यार या प्रेम कहते हैं।
शुद्ध आत्मस्वरूप के अज्ञान के कारण "अहंकार बुद्धि या जीव बुद्धि" - अर्थात स्वयं को M/F देह से समझने की मूढ़बुद्धि उत्पन्न होती है, उससे अस्मिता, राग-द्वेष से उत्पन्न भ्रम को लोग प्यार या प्रेम कहते हैं। यथार्थ में यह तो आत्मसम्मोहन (Self-hypnosis) है। सामान्य जीव-जन्तुओं की तरह विवेक-सम्पन्न मनुष्य को भी आवेग के अधीन होना शोभा नहीं देता है। अर्जुन इसी आवेग के वशीभूत हो गए। उन्हें जैसा होना चाहिए था , वैसा वे नहीं हो सके। उन्हें तो प्रज्ञा (अर्थात आत्मनिष्ठ बुद्धि) के अनन्त प्रकाश में कर्म में निरन्तर लगे रहकर आत्मजयी ज्ञानी ऋषि होना था। परन्तु बुद्धि की अधोगति - आत्मा से हटकर देह बुद्धि बनजाने के कारण, उनकी बुद्धि भ्रमित हो जाती है , वे 'ममता' आदि सुन्दर नामों से अपनी दुर्बलता को ढाँकने की चेष्टा करते हुए शिशु के समान हो जाते हैं। श्रीकृष्ण यह जान गए थे। अर्जुन सामान्य स्वार्थपरता के वशीभूत होकर कायर मनुष्य की तरह बात करने लगते हैं , जो कुछ भी दलील देते हैं , वह सब अज्ञानी के समान है।
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।।2.11।।
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।।2.13।।
आत्मज्ञानी व्यक्ति जीवित या मृत किसी के लिए शोक नहीं करते। तुम मर नहीं सकते , मैं भी मर नहीं सकता। ऐसा समय कभी नहीं था जब हमलोग नहीं थे। ऐसा समय कभी नहीं आएगा जब हम लोग नहीं रहेंगे। मनुष्य इस जीवन में जिसप्रकार शैशव अवस्था से आरम्भ करके क्रमशः यौवन , वार्धक्य को पार करता है, उसी प्रकार मृत्यु से वह केवल दूसरा शरीर ग्रहण करता है। ज्ञानी व्यक्ति उससे मोहित क्यों होंगे ?
यह जो भावुकता तुम्हारे सिर पर सवार होकर बैठी है , (तुम्हारी बुद्धि/मति पर सवार) इसका मूल कहाँ है ? स्पर्श इन्द्रियाँ अपने अपने विषयों का भोग करके ठंढा -गर्म का अनुभव करके सुख-दुःख आदि का अनुभव करती हैं। वे आती हैं और चली जाती हैं। मनुष्य इस समय यदि दुःखी है, तो दूसरे ही क्षण सुखी हो जाता है। ऐसी स्थिति में वह आत्मा का स्वरुप नहीं जान सकता।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।2.14।।
।।2.14।। हे कुन्तीपुत्र ! शीत और उष्ण और सुख दुख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग का प्रारम्भ और अन्त होता है; वे अनित्य हैं, इसलिए, हे भारत ! उनको तुम सहन करो।।
कालाय तस्मै नमः ! जो पुरुष यह समझ लेता है कि जगत् की वस्तुयें नित्य परिवर्तनशील हैं उत्पन्न और नष्ट होती रहती हैं वह पुरुष इन वस्तुओं के कारण स्वयं को कभी विचलित नहीं होने देगा। काल के प्रवाह में भविष्य की घटनायें वर्तमान का रूप लेती हैं और हमें विभिन्न अनुभवों को प्रदान करके निरन्तर भूतकाल में समाविष्ट हो जाती हैं। जगत् की कोई भी वस्तु एक क्षण के लिये भी विकृत हुये बिना नहीं रह सकती । यहाँ परिवर्तन ही एक अपरिवर्तनशील नियम है।
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः।।2.16।।
जो अनादि काल से है (त्रिकालाबाधित है) जो 'सत्' है ,वह नहीं है - ऐसा नहीं हो सकता। फिर जो कभी नहीं है - जो 'असत्' (मिथ्या अहं) हो, वह है, ऐसा भी नहीं हो सकता। अतः जो सारे विश्व को परिव्याप्त किये हुए है , उसे आदि-अन्त -हीन अविनाशी रूप से जानो। इस विश्व में ऐसी कोई वस्तु नहीं है , जो अपरिवर्तनशील आत्मा को परिवर्तित कर सके। इस शरीर का जन्म और नाश है किन्तु जो इस शरीर में निवास करता है ; वह अनादि और अविनाशी है।
मणियों को धारण करने वाले एक सूत्र के समान हममें कुछ है जो परिवर्तनों के मध्य रहते हुये विविध अनुभवों को एक साथ बांधकर रखता है। सूक्ष्म विचार करने पर यह ज्ञान होगा कि वह कुछ अपनी स्वयं की चैतन्य स्वरूप आत्मा है।बाल्यावस्था युवावस्था और वृद्धावस्था में होने वाले अनुभवों को यह चैतन्य ही प्रकाशित करता है। अनुभव आते हैं और जाते हैं। जिस चैतन्य के कारण मैंने सबको जाना जिसके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है वह चैतन्य आत्मा जन्म और नाश से रहित नित्य सत्य वस्तु है। तत्त्वदर्शी पुरुष इन दोनों सत् और असत् को आत्मा और अनात्मा के तत्त्व को पहचानते हैं। इन दोनों के (अविनाशी) आत्मा और (नश्वर) अनात्मा (प्रकृति देह-मन -बुद्धि) के रहस्यमय संयोग से यह विचित्र जगत् उत्पन्न होता है।
इसे जानकर मोह को त्याग दो और युद्ध में प्रवृत्त हो जाओ , पीछे न हटो , यही तुम्हारा आदर्श है। फल चाहे जो हो , तुम काम करते चलो। नक्षत्र अपने गतिपथ से च्युत हो सकते हैं , सम्पूर्ण संसार हमारे विरुद्ध खड़ा हो सकता है , पर उससे हम विचलित न हों। मृत्यु तो केवल अन्य शरीर की प्राप्ति है। युद्ध करना होगा। भय और कायरता से कुछ नहीं प्राप्त किया जा सकता। पीछे हटने से किसी विपत्ति को हटाया नहीं जा सकता। कुसंस्कार के सामने सिर झुकाना या अपने 'मन के ख्याल' मूढ़बुद्धि/ सम्मोहित मति के पास अपने (स्व) को बेच देना तुम जैसे वीर को शोभा नहीं देता।
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत।।2.18।।
।।2.18।। इस नाशरहित अप्रमेय (अनन्त) और नित्य देही (शरीरी) आत्मा के ये सब शरीर नाशवान् कहे गये हैं। इसलिये हे भारत ! तुम युद्ध करो।।
हे पार्थ ! तुम अनन्त और अविनाशी हो ; तुम्हारा जन्म नहीं है और मृत्यु भी भी नहीं। तुम अनन्त शक्तिशाली आत्मा हो। देह-बुद्धि के गुलाम की भाँति व्यवहार करना तुम्हें उचित नहीं है। उठो , जागो , दुर्बलता छोड़कर युद्ध करो। यदि मृत्यु हो जाये तो होने दो ! सहायता देने के लिए कोई न आये तो न सही , तुम्हीं तो सर्वजगतमय हो , तुम्हें कौन सहायता दे सकता है ! जीवों का अस्तित्व शरीर के जन्म लेने से पूर्व तथा मृत्यु के बाद अव्यक्त रहता है। केवल बीच का स्थितिकाल ही व्यक्त है। अतएव उसमें शोक करने का कोई कारण नहीं है।
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्।।2.29।।
कोई इस आत्मा को आश्चर्यरूप से देखता है , कोई इसका आश्चर्यरूप से वर्णन करता है। कोई दूसरा इस आत्मा के सम्बन्ध में आश्चर्यरूप से श्रवण करता है , फिर कोई सुनकर भी इसे जान नहीं सकता।
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।।2.38।।
तुम्हें यह कहने का भी अधिकार नहीं है कि स्वजनों का वध करना पाप है , क्योंकि तुम क्षत्रिय हो और वर्णाश्रम धर्म के अनुसार युद्ध करना ही तुम्हारा स्वधर्म है। सुख-दुःख और जय-पराजय को समान समझकर युद्ध करने के लिए सन्नद्ध हो जाओ।
एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु।
बुद्ध्यायुक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि।।2.39।।
यहाँ पर गीता का एक विशेष मतवाद का निर्देश किया गया है - वह है अनासक्ति का उपदेश। हमलोग आसक्त होकर कार्य करते हैं , इस कारण हमें कर्मफल भोग करना पड़ता है। पर योगयुक्त होकर कर्म करने से कर्मबन्धन छिन्न हो जाता है।
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।।2.40।।
सारी विपत्तियों को तुम पार कर ले सकोगे। 'इस निष्काम -कर्म योग के अल्पमात्र का भी अनुष्ठान करने से मनुष्य जन्म-मरण रूप संसार के भीषण भँवर से छुटकारा पा जाता है।
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्।।2.41।।
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति।।2.43।।
हे अर्जुन, केवल आत्मनिष्ठ निश्चयात्मिका बुद्धि /मति का ही सुफल मिला करता है। मूढ़बुद्धि या स्वयं को M/F जीव समझकर -अविद्या, अस्मिता , राग-द्वेष , अभिनिवेश पंचक्लेश से भ्रमित बुद्धि वाले सकाम व्यक्तियों का मन हजारों विषयों में फ़ैल जाते हैं , इस कारण शक्ति का व्यर्थ में क्षय होता है। अविवेकी मनुष्य - (ब्रह्मसत्य जगत मिथ्या जो जीवो ब्रहमैव न अपरः ! नहीं जानते) वे भोगसुख प्राप्त करने हेतु स्वर्ग जाने की कामना से (बिजनेस-व्यापार -बैंकडिपॉजिट बढ़ाने) का यज्ञ आदि अनुष्ठान करते हैं।
यह भी गीता का एक महान उपदेश है कि जब तक विषय का भोगसुख नहीं छूटता, तब तक आध्यात्मिक जीवन का आरम्भ नहीं होता। इन्द्रिय-सम्भोग में भला सुख कहाँ ? इन्द्रियाँ तो हमारी बुद्धि को भ्रमित कर देती हैं। (आत्मनिष्ठ बुद्धि को देह-बुद्धि M/F राग-द्वेष बुद्धि में फँसा देती हैं ?)
इन्द्रियाणि पराणि आहुः, इन्द्रियेभ्यः परम् मनः।
मनसः तु परा बुद्धिः य बुद्धेः परतः तु सः।।
(3.42)
अर्थात सूक्ष्म या अधिक बलशाली होने के कारण स्थूल शरीर से (Apparent I M/F शरीर से) इन्द्रियाँ पर (श्रेष्ठ) कही जाती हैं।
यथार्थ प्रश्न यह है कि एकदम आसक्ति -रहित होकर भला कौन कर्म कर सकता है ? जो व्यक्ति आसक्ति -रहित होकर कर्म कर सकता है , उस (आत्मब्रह्म-ऐक्य) के लिए कर्म की सफलता हो या विफलता हो , दोनों समान है। 'तेरी इच्छा पूर्ण हो' इस आस्था वाले व्यक्ति का यदि जीवन भर के कर्म क्षणभर में जलकर राख हो जाएँ, तो भी ऐसे व्यक्ति का ह्रदय आशंका से एक बार भी नहीं धड़कता।
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
जन्मबन्ध-विनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्ति अनामयम्।।
(2.51)
बुद्धियुक्ता मनीषी लोग कर्मजन्य फलों को त्यागकर जन्मरूप बन्धन से मुक्त हुये अनामय अर्थात् निर्दोष पद को प्राप्त होते हैं।।
बुद्धियुक्त मनीषी का अर्थ है वह विवेकी मनुष्य जो - 'जीवो ब्रह्मैव नापरः' को जानकर 'हाथी नारायण और महावत नारायण का विवेक' रखते हुए जीने की कला को सीख लेता है वह फल की चिन्ताओं से मुक्त होकर मन के पूर्ण सन्तुलन को बनाये हुये सभी कर्म करता है। वह विवेकी व्यक्ति उस समय यह देखता है कि सभी प्रकार की आसक्ति मिथ्या है। (अपने को M/F शरीर समझने से उत्पन्न राग-द्वेष मिथ्या है।)
आत्मा (इष्टदेव) कभी (3K में) आसक्त हो नहीं सकते। यह समझ लेने के बाद वह आत्मनिष्ठ बुद्धि से युक्त योगी सुख-दुःख से परे की अवस्था में पहुँच जाता है। तब अर्जुन पूछता है स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कौन हैं ?
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।
आत्मनि एव आत्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञः उच्यते।।।
(2.55)
श्री भगवान् ने कहा -- हे पार्थ , जिस समय पुरुष बुद्धि में स्थित सब कामनाओं को त्याग देता है जो सभी वासनाओं को छोड़ चुके हैं , किसी की भी आकांक्षा नहीं करते। और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है; उस समय वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।
(2.56)
।।2.56।। दुःख में जिसकी बुद्धि उद्विग्न नहीं होती और भोग-सुख प्राप्ति की तीव्र इच्छा जिस बुद्धि निवृत्त हो गयी है। (स्वयं M/F) देह नहीं आत्मा समझ लेने के फलस्वरूप जिस व्यक्ति की बुद्धि से राग-द्वेष नष्ट हो गये हैं- वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2.58।।
।।2.58।। जिस तरह कछुआ अपने अङ्गों को सब ओर से समेट लेता है, वैसे ही यह पुरुष जब सब ओर से अपनी इन्द्रियों को इन्द्रियों के विषयों से समेट लेता (हटा लेता) है, तब उसकी बुद्धि आत्मनिष्ठ हो जाती है, अर्थात उसकी बुद्धि आत्मा (इष्टदेव) में प्रतिष्ठित हो जाती है।
संसार का कोई भी प्रलोभन उनकी इन्द्रियों को बलपूर्वक खींचकर बाहर नहीं ला सकता। संसार का कोई भी प्रलोभन- 'कामिनी -कांचन या नाम-यश' उनकी बुद्धि को प्रलोभित नहीं कर सकता। समूचे विश्व-ब्रह्माण्ड के चूर-चूर हो जाने पर भी उनके मन में एक भी तरंग नहीं उठती। आगे बढ़ते चलो , कर्म करते जाओ , केवल यह ध्यान रखना/ सचेत रहना कि बुद्धि कहीं फिर से देह-इन्द्रियों में आसक्त न हो जाये। जो व्यक्ति M/ F देहजन्य राग-द्वेष से अनासक्त होने की कला नहीं जानता या उसकी साधना नहीं करता, उसकी प्रज्ञा (अर्थात विवेकसम्पन्न बुद्धि) कभी आत्मनिष्ठ नहीं हो पाती।
आपूर्यमाणम् अचल-प्रतिष्ठम्
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।
(2.70)
जैसे पृथ्वी भर की नदियाँ निरंतर अपनी जलराशि लाकर समुद्र में उड़ेलती रहती हैं , पर उससे समुद्र अचल ही रहता है। उसी प्रकार पाँचो इन्द्रियों के द्वारा एक साथ प्रकृति की विभिन्न संवेदनायें लाये जाने पर भी आत्मज्ञानी के ह्रदय में किसी प्रकार का विक्षेप या भय नहीं उत्पन्न हो पाता।
[आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'भज गोविंदम' के अनुसार, "निश्चलतत्त्वे जीवनमुक्तिः"यदि कोई व्यक्ति अपनी बुद्धि और संकल्प को अडिग (निश्चल) रखकर एक ही दिशा में (आत्मा या इष्टदेव की दिशा में) एकाग्र करे, तो उसे जीवित रहते हुए ही मोक्ष या परम मुक्ति प्राप्त हो सकती है।]
'हजार स्रोतों से दुःख आवे, सैकड़ों स्रोतों से सुख आवे , मैं न तो दुःख के अधीन हूँ और न सुख का क्रीतदास ही हूँ।" - स्वामी विवेकानन्द।
ज्यायसी चेत् कर्मणः ते मता बुद्धिः जनार्दन।
तत् किम् कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।।
(3.1)
अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा - " आप मुझे कर्म का उपदेश दे रहे हैं , और आत्मब्रह्म-ऐक्य ज्ञान को जीवन की उच्चतम अवस्था कहकर उसकी प्रशंसा कर रहे हैं। हे कृष्ण यदि आप ज्ञान को कर्म की अपेक्षा श्रेष्ठ समझते हैं , तो मुझे कर्म का उपदेश क्यों दे रहे हैं ?
इसका उत्तर में भगवान कहते हैं - अतिप्राचीन काल से ही दो साधनमार्ग प्रचलित हैं। दार्शनिकों के लिए ज्ञानयोग और निष्काम कर्मियों के लिए कर्मयोग। किन्तु कर्मों का त्याग करके कोई भी शांति नहीं पा सकता। कोई भी मनुष्य कर्म किये बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता। अन्तःकरण में स्थित प्रकृति के तीन गुण मनुष्य को कर्म करने के लिए बाध्य करते हैं। जो मनुष्य बाहर से कर्मों को रोक कर मन ही मन विषयों का चिंतन करते रहते हैं - उसे कुछ भी प्राप्त नहीं होता , वह मिथ्याचारी हो जाता है। किन्तु जो व्यक्ति बुद्धि की शक्ति द्वारा इन्द्रियों को धीरे धीरे वशीभूत करके उन्हें कर्म में लगाए लगाए रखता है , वह पूर्वोक्त व्यक्तियों से श्रेष्ठ है। (गीता 3 /2-8)
यदि तुमने इस रहस्य को समझ लिया हो तो तुम्हारे लिए कोई कर्तव्य-कर्म बाकी नहीं है , तुम मुक्त हो। फिर भी दूसरों के कल्याण के लिए तुम्हें कर्म करना होगा। क्योंकि श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करते हैं , साधारण मनुष्य उसी का अनुकरण करते हैं। (गीता -3. 20 -21)
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि।।3.22।।
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।3.23।।
' परा शान्ति के अधिकारी मुक्त पुरुष यदि कर्मों का त्याग कर दें तो जो लोग उस आत्मज्ञान और शान्ति को अभी नहीं प्राप्त कर सके हैं , वे उन महापुरुषों का अनुकरण करने की चेष्टा करेंगे , फलस्वरूप समाज में विशृंखलता उत्पन्न होगी।
हे पार्थ , त्रिभुवन में मेरे लिए कुछ भी अप्राप्त नहीं है , तो भी मैं सदा कर्म करता हूँ। यदि मैं क्षणभर के लिए कर्म न करूँ तो विश्व ब्रह्माण्ड नष्ट हो जायेगा।
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्।।
(3.26)
अज्ञानी मनुष्य फलाकांक्षी होकर जिस उत्साह और लगन से कर्म करता है , आत्मज्ञानी भी अनासक्त भाव से , किसी फल की आकांक्षा न करते हुए लेकिन उसी तीव्रता से कर्म करते हैं।
गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं -जो लोग भक्तिपूर्वक अन्य देवताओं की पूजा करते हैं , वे भी वास्तव में मेरी ही पूजा करते हैं। (गीता ३/३३) ये मनुष्य साक्षात भगवान की ही पूजा करते हैं , भगवान को भिन्न नामों से पुकारने पर क्या वे क्रोधित हो जायेंगे ?
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते।।
(3.27)
हे अर्जुन ! हमारे शरीर और अन्तःकरण के माध्यम से प्रकृति के तीन गुण ही प्रकृति के नियमानुसार काम कर रहे हैं। हमलोग अपरिवर्तनशील , अविनाशी आत्मा होकर भी परिवर्तनशील प्रकृति के साथ - अर्थात नश्वर M/F देह, इन्द्रिय, मन , में सम्मोहित बुद्धि के साथ अपना तादात्म्य करके - परिवर्तनीय प्रकृति के साथ अपने को अभिन्न मानकर कहते हैं - मैं ही इन कर्मों का कर्ता हूँ। सम्पूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं, M/F बुद्धि के अहंकार से मोहित हुआ पुरुष, "मैं कर्ता/ करती हूँ" ऐसा मान लेता है। और इस प्रकार आत्मा -नित्यमुक्त होकर भी प्रकृति के पंजे में फँस जाती है।
आत्मज्ञानी भी प्रकृति के द्वारा चालित होकर कर्म करता है। सभी लोग प्रकृति के तीनों गुणों के अनुसार कर्म करते हैं। जब तक शरीर में है , तब तक कोई भी प्रकृति को नहीं लाँघ सकता।
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति।।
(3.33)
ज्ञानवान् पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। सभी प्राणी अपनी प्रकृति पर ही जाते हैं, फिर इनमें (किसी का) हठ /निग्रह क्या करेगा।। यह अन्तिम वाक्य भगवान् के उपदेश में निराशा का उद्गार नहीं किन्तु उनकी परिपूर्ण दृष्टि का परिचायक है। वे वस्तु स्थिति से परिचित हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जीवन के उच्च मार्ग पर चलने की क्षमता नहीं रखता। विकास के सोपान की सबसे निचली सीढ़ी पर खड़े असंख्य मनुष्यों के लिये इस मार्ग का अनुसरण कदापि सम्भव नहीं। क्योंकि विषयों में आसक्ति तथा पाशविक प्रवृत्तियों से वे इस प्रकार बंधे होते हैं कि उन सबका एकाएक त्याग करना उन सबके लिये सम्भव नहीं होता। जिस मनुष्य में कर्म के प्रति उत्साह, आत्मश्रद्धा , आत्मविश्वास , आत्मनिर्भरता ,तथा जीवन में कुछ पाने की महत्त्वाकांक्षा है केवल वही व्यक्ति इस कर्मयोग का आचरण करके स्वयं को कृतार्थ कर सकता है। भगवान् का यह कथन उनकी विशाल हृदयता एवं सहिष्णुता का परिचायक है।
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।।3.37।।
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च।।3.39।।
।।3.39।। और हे कुन्तीनन्दन ! इस अग्निके समान कभी तृप्त न होनेवाले और विवेकि मनुष्यों (ब्रह्मसत्य जगत मिथ्या) विवेक का नित्य वैरी इस काम 'desire' के द्वारा मनुष्य का विवेक ढका हुआ है।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्।।3.40।।
" अर्जुन ! सावधान, काम ही क्रोध है, यह मनुष्य का परम शत्रु है, इसे संयत रखना चाहिए। यह आत्मज्ञानी व्यक्ति के विवेक को भी ढँक देता है। इस काम की अग्नि सर्वग्रासी है। इन्द्रियों, मन तथा सम्मोहित बुद्धि/मूढ़बुद्धि में इसका अधिष्ठान है। आत्मा तो किसी पदार्थ की कामना ही नहीं करता।
इसलिए काम रूपी शत्रु से यदि बचना चाहते हो तो शुद्ध बुद्धि/मति को निरंतर आत्मा (इष्टदेव) से जोड़े रहो। क्योंकि -बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।
क्रोधात् भवति संमोहः, संमोहात् स्मृतिविभ्रमः।
स्मृति भ्रंशात् बुद्धिनाशः, बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।।2.63।।
विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध से उत्पन्न होता है मोह और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति के भ्रमित होने पर विवेकी -बुद्धि का नाश होता है और विवेकयुक्त बुद्धि के नाश होने से वह मनुष्य नष्ट हो जाता है।।
यदि बुद्धि में तुम कर्ता हो गए - तो हो गए ! उसी तरह बुद्धि में तुम अकर्ता हो गए , अकर्ता हो गए ! जो कुछ होना है बुद्धि में होना है। बुद्धि में मुक्त हो गए तो मुक्त हो गए। आत्मा तो सदा मुक्त है; पर क्या तुम्हारी बुद्धि मुक्त है ? तुम्हारी बुद्धि में ऐसा लगता है कि - हम मुक्त हैं ! - (बुद्धि से ऐसा लगता है कि मैं कौन हूँ ? दहोहं कि शिवो अहं ?) - हम मुक्त हैं ! इसी तरह से एक और वाक्य है - जिसकी जैसी मति; उसकी वैसी गति। अब ये बात तो समझ में आ गई। अब मति/बुद्धि कल्पना नहीं है। मति इमेजिनेशन नहीं है। 'जिसकी जैसी मति , उसकी वैसी गति'।
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।।
(4.1)
।।4.1।। श्रीभगवान् बोले - मैंने बुद्धि का सम्बन्ध M/F देह-इन्द्रिय से नहीं निरन्तर आत्मा से जोड़े रहने या 'आत्मनिष्ठा बनाये रखने के अविनाशी योग' को प्राचीन काल में मैंने सूर्य को सिखाया था। सूर्य ने अपने पुत्र मनु को सिखाया, और मनुने (अपने पुत्र) राजा इक्ष्वाकु को सिखाया। इस प्रकार मनःसंयोग के अभ्यास द्वारा (3H विकास के 5 अभ्यास द्वारा) इस बुद्धि की आत्मनिष्ठा के अविनाशी योग का ज्ञान एक राजा से दूसरे राजा के पास तथा उनसे अन्य राजाओं के पास पहुँचा। किन्तु समय / काल के प्रवाह में सब कुछ नष्ट हो जाता है , तो 'कालय तस्मै नमः।' कालवश इस योग की महान शिक्षा नष्ट हो गयी थी उसी को आज में पुनः तुम्हें सीखा रहा हूँ।
तब अर्जुन ने कहा -
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।।
(4.4)
।।4.4।। अर्जुन ने कहा -- आपका जन्म अपर अर्थात् पश्चात का है और विवस्वान् का जन्म (आपके) पूर्व का है, इसलिये यह मैं कैसे जानूँ कि (सृष्टि के) आदि में आपने (इस योग को) कहा था?
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।4.5।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।4.8।।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।4.11।।
उत्तर में श्री कृष्ण ने कहा -हे अर्जुन ! मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म व्यतीत हो चुके है , उन्हें तुम नहीं जानते , मैं जानता हूँ। मैं जन्मरहित और मायाधीश हूँ और सभी मायाधीन मनुष्यों का अधीश्वर हूँ। अपनी प्रकृति (दैवी माया) की सहायता से मैं शरीर धारण करता हूँ।
जब धर्म की ग्लानि और अधर्म का अभ्युत्थान होता है, तब मैं मनुष्यों को सहायता देने के लिए संसार में आविर्भूत होता हूँ। साधुओं के परित्राण , पापियों के विनाश तथा धर्मसंस्थापन के लिए मैं प्रत्येक युग में अवतीर्ण होता हूँ। जो जिस भाव से मुझे चाहता है , मैं उसी भाव से उसके पास जाता हूँ। किन्तु हे पार्थ जान लो कोई भी मेरे मार्ग से विच्युत नहीं हो सकता।
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।।4.14।।
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्।।4.15।।
कोई भी कर्म मुझे छू नहीं सकता। कर्मफल में मेरी आकांक्षा नहीं है। जो मुझे इस प्रकार जानता है , वह कर्म करने के कौशल को जान लेता है , और कर्म के द्वारा वह कभी आबद्ध नहीं होता।
प्राचीन काल के राजर्षि लोग इस निष्काम कर्म के तत्त्व को जानते थे , इस कारण वे निश्चिन्त चित्त से कर्म में नियुक्त होते थे। हे अर्जुन ! तुम भी उसी पद्धति (Be and Make की पद्धति) से कर्म किये जाओ।
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।
स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्।।4.18।।
जो घोर कर्म के बीच गम्भीर शान्त भाव रख सकते हैं और गंभीर शान्त भाव में प्रबल कर्म का दर्शन करते हैं , वे ही यथार्थ ज्ञानी हैं।
अब प्रश्न यह उठता है कि प्रत्येक इन्द्रिय और प्रत्येक स्नायु के कर्म-परायण होने के बावजूद आपके मन में गहरी शान्ति है क्या ? कोई पदार्थ /कोई घटना आपके मन -बुद्धि को -निश्चल तत्त्व में प्रतिष्ठित रहने से विचलित तो नहीं करता ? यदि आप में शान्ति है और आपका मन चंचल नहीं होता तो आप योगी और मुक्त हैं- जीवनमुक्त हैं ? अन्यथा नहीं।
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।।4.19।।
।।4.19।। जिसकी प्रत्येक कर्मचेष्टा -कामना और फल पाने की आकांक्षा से रहित और पूर्णतः निःस्वार्थ होते हैं , उसीको सत्यदर्शी लोग ज्ञानी (विवेकी) कहते हैं। बिना कर्म किये हम क्षणभर भी नहीं रह सकते। काम तो करना ही होगा।
जिनकी सारी कर्मचेष्टायें फलतृष्णा और स्वार्थबुद्धि से रहित हैं , उन्होंने ज्ञानाग्नि के द्वारा समस्त कर्मों के बन्धन को दग्ध कर लिया है और वे ही ज्ञानी हैं। भविष्य में विषयोपभोग के द्वारा सुख पाने की बुद्धि की योजना को कामना (desire) कहते हैं । कामना करने का अर्थ है कि परिस्थितियों को अपने अनुकूल होने का आग्रह करना। इस प्रकार वर्तमान परिस्थितियों से सदा असन्तुष्ट रहते हुये भविष्य में उन्हें अनुकूल बनाने के प्रयत्न में , हम अपने आप को भ्रमित करके अनेक विघ्नों का सामना करते रहते हैं। इसका आशय इतना ही है कि ज्ञानी भक्त कर्म करते समय काल्पनिक भय चिन्ता आदि में अपने मन की शक्ति विनष्ट नहीं करता। वेदान्त मनुष्य की बुद्धि की उपेक्षा नहीं करता है, वह उसे आत्मा (इष्टदेव) में प्रतिष्ठित रखता है।
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः।।4.20।।
।।4.20।। जो पुरुष, कर्मफलासक्ति को त्यागकर, नित्यतृप्त और सब आश्रयों से रहित है वह कर्म में प्रवृत्त होते हुए भी (वास्तव में) कुछ भी नहीं करता" है।।
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।6.5।।
।।6.5।। तुम स्वयं अपना बन्धु तथा स्वयं ही अपने शत्रु हो। आत्मा (अविशिभूत बुद्धि) के अतिरिक्त अन्य कोई शत्रु नहीं है।
यही गीता का अन्तिम और श्रेष्ठ उपदेश है। - स्वामी विवेकानन्द।
महाभारत के भीष्मपर्व के अन्तर्गत भगवद्गीता आती है। गीता में कुल 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं।
गीता सार्वजनिक धर्मग्रंथ है। श्रीरामकृष्ण का जीवन गीता-तत्त्व का जीवंत भाष्य है। " मनुष्य जिस किसी भाव से मेरी आराधना करता है, उसी भाव से मैं उस पर कृपा करता हूँ। गीता में उपदिष्ट चारो योग -ज्ञान , कर्म , भक्ति और राजयोग में से प्रत्येक मुक्ति का मार्ग है।
गीता की अन्तिम बात और सबसे गोपनीय रहस्य है - श्री भगवान की अनन्य शरणागति के द्वारा भागवत जीवन की प्राप्ति -
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।।18.65।।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।18.66।।
अर्थात , तुम अपनी बुद्धि को मुझमें समाहित करो , मेरे भक्त बनो , मेरे पूजनशील होओ , मुझे नमस्कार करो। इस प्रकार मेरी कृपा से लब्ध ज्ञान की सहायता तुम मुझे ही प्राप्त होंगे। मैं निश्चयपूर्वक तुमसे कहता हूँ , क्योंकि तुम मेरे अत्यन्त प्रिय हो !
तुम सभी धर्मों और अधर्मों का परित्याग कर केवल मुझि में भक्ति रखो , इसी से सबकुछ होगा - इस दृढ़ विश्वास में प्रतिष्ठित होकर केवल मेरे शरणागत हो जाओ ! इससे मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक न करो। यही गीता का श्रेष्ठतम उपदेश है।
1.अर्जुन विषाद योग :
युद्ध के परिणाम पर शोक प्रकट करना
2.सांख्य योग :
विश्लेषणात्मक ज्ञान का योग
3.कर्मयोग :
कर्म का विज्ञान
4. ज्ञान कर्म संन्यास योग :
ज्ञान का योग और कर्म करने का विज्ञान
5.कर्म संन्यास योग :
वैराग्य का योग
6.ध्यानयोग :
ध्यान का योग
7. ज्ञान विज्ञान योग :
दिव्य ज्ञान की अनुभूति द्वारा प्राप्त योग
8.अक्षर ब्रह्म योग :
अविनाशी भगवान का योग
9.राज विद्या योग :
राज विद्या द्वारा योग
10. विभूति योग :
भगवान के अनन्त वैभवों की स्तुति द्वारा प्राप्त योग
11. विश्वरूप दर्शन योग :
भगवान के विराट रूप के दर्शन का योग
12. भक्ति योग :
भक्ति का विज्ञान
13. क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ विभाग योग :
योग द्वारा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विभेद को जानना
14. गुण- त्रय विभाग योग :
त्रिगुणों के ज्ञान का योग
15. पुरुषोत्तम योग :
सर्वोच्च दिव्य स्वरूप योग
16. दैवासुर सम्पद् विभाग योग :
दैवीय और आसुरी प्रकृति में भेद का योग
17. श्रद्धा- त्रय विभाग योग :
श्रद्धा के तीन विभागों के ज्ञान का योग
18. मोक्ष-संन्यास योग :
संन्यास में पूर्णता और शरणागति का योग
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