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सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

स्वामी भूतेशानन्द जी महाराज - आत्मा के पांच कोष - हॉलीवुड

Swami Bhuteshananda - The Five Sheaths of the Soul- Hollywood 

 (8/18/1988)

स्वामी भूतेशानन्द जी महाराज - आत्मा के पांच कोष - हॉलीवुड


मित्रों , मैं बहुत खुश हूँ कि बहुत  पुराना सपना आखिरकार पूरा हो ही गया। मैं USA जाने की सोच रहा था क्योंकि यह जगह हमारे मिशन के प्रतिष्ठता स्वामी विवेकानन्द की स्मृति के साथ  बहुत जुड़ी हुई है। वह इच्छा स्वाभाविक थी और मुझे इन इलाकों के कुछ भक्तों से मिलने का भी मौका मिला जो बेलूर मठ आए थे। और मैं उन भक्तों की लगन और समर्पण से बहुत प्रभावित हुआ था। इसलिए स्वाभाविक रूप से उस जगह जाने और ऐसे कई और पुण्य आत्माओं से मिलने की इच्छा होती है जिन्हें बारम्बार बेलूर मठ जाने का मौका नहीं मिल पाता। वह इच्छा मेरे लिए बहुत स्वाभाविक थी।
      अब मुझे नहीं पता कि मैं इस बारे में आपसे क्या कहूं, जो कि कोई लेक्चर नहीं है, बल्कि एक मित्रवत सम्भाषण है। आमतौर पर  लगभग रोज़ ऐसी सभाओं में कलकत्ता में मिशन के एक ब्रांच सेंटर में जाता हूँ, जहाँ मैं ज़्यादातर कलकत्ता में रहता हूँ, वहां मैं भक्तों से सवाल पूछता हूँ और वहीँ से मैं बातचीत करने के लिए अपना विषय चुनता हूँ। आमतौर पर ऐसा करना यह मुझे ज़्यादा दिलचस्प लगता है क्योंकि यह दो-तरफ़ा आवागमन हो सकता है।
   यहाँ के स्वामी ने बताया कि आज का टॉपिक यह है कि आप बेलुड़ मठ में कैसे आये ?  ठीक है? यह सुझाव भी यहाँ के स्वामी दे रहे हैं। किन्तु उनका सुझाव भी मुझे आदेश जैसा लगता है। (3 :19) क्योंकि वे यहाँ की संस्था के प्रमुख हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि मैं आपसे अपने जीवन के विषय में बातचीत करूँ, जिससे हम संन्यासी आमतौर पर बचते हैं। बेशक मेरे जीवन का अर्थ इस संघ (Organization) से जुड़ा हुआ जीवन है, क्योंकि वास्तव में इससे भिन्न जीवन का कोई दूसरा हिस्सा असल में है ही नहीं। मुझे नहीं पता कि , मैं पहले  कितना स्पिरिचुअल था, इस विषय पर बातचीत करना खुद की तारीफ़ करने जैसा तो नहीं लगेगा ? मुझे नहीं लगता कि मैं किसी भी तरह से इस दावे के लायक हूं कि आपको मेरी बात सुननी चाहिए। (4:37 हँसी )  
ज़रूरी नहीं कि ऐसा हो, लेकिन जब हम दोस्तों के साथ मिलते हैं तो हम अपनी पसंद के किसी भी तरीके से बात करने के लिए आज़ाद होते हैं। इसलिए कृपया आप मुझसे जो भी सुनें, उसे थोड़ी सावधानी के साथ लें। 
   क्योंकि मुझे खुद पर एक तरह की रोक-टोक महसूस होती है, जब मैं खुद के विषय में बात करता हूँ तो मुझे यह कुछ खास अच्छा नहीं लगता। लेकिन जैसा मैंने आपको बताया या जैसा मुझे स्वामी ने बताया कि मेरे शुरुआती दिनों में मैं मिशन के संपर्क में कैसे आया, यह जानना थोड़ा दिलचस्प हो सकता है, जोअतीत की इन घटनाओं के बारे में  शायद नहीं जानते होंगे। कभी-कभी मुझे अपना अनुभव शेयर करना पड़ता है, खासकर भक्तों के साथ। यह कोई पब्लिक टॉक नहीं है और इसलिए मैं इस मामले में खुद को ज़्यादा खुला महसूस करता हूँ। (6:24)
     मेरा जन्म भारत के राज्य पश्चिम बंगाल के एक गाँव में हुआ था। लेकिन मेरा अधिकांश समय कलकत्ता में बीतता था। जहाँ मेरी शिक्षा हुई। इसलिए मुझे श्री रामकृष्ण के कई प्रत्यक्ष शिष्य (direct disciples) से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। माफ़ कीजिए, मुझे श्री रामकृष्ण शब्द का इस्तेमाल करने की आदत है, मेरे हिसाब से श्री रामकृष्ण बेहतर होने चाहिए। लेकिन वे सभी भक्त हैं, वे यह कहने के आदी हैं कि उन्हें इसकी आदत है। मैं एक ऐसे स्कूल में पढ़ रहा था जो गॉस्पेल के लेखक एम. से जुड़ा हुआ था। आप लोगों ने M के बारे में जरूर सुना होगा। उनका वास्तविक नाम महेन्द्रनाथ गुप्ता था। वे श्रीरामकृष्ण के बहुत बड़े भक्त थे। और वे भी उनको बहुत पसंद करते थे। विशेष रूप से श्रीरामकृष्ण चाहते थे कि उनकी शिक्षाओं को M के द्वारा लिखा जाय। जिस कार्य को उन्होंने बहुत विश्वसनीयता के साथ पूरा किया। जिस समय मैं उस विद्यालय में पढता था , उस समय तक वे अवकाश ले चुके थे , और स्कूल से उनका कोई सम्पर्क नहीं था। लेकिन स्कूल का सम्बन्ध उनके साथ था , इसीलिए मैंने उनके नाम का उल्लेख भी किया। क्योंकि श्री रामकृष्ण के कई दूसरे प्रत्यक्ष शिष्यों के भक्तों ने इसी स्कूल में पढ़ाई की थी। इसलिए मेरे मन में उस स्कूल के कई सुखद स्मृतियाँ संजोई हुई हैं। उस स्कूल में एक शिक्षक थे ,जो अविवाहित थे और रामकृष्ण मिशन से निकट सम्पर्क में थे। उन दिनों रामकृष्ण मिशन का अर्थ था विशेष रूप से जो श्रीरामकृष्ण के प्रत्यक्ष शिष्य वहाँ थे उनका दर्शन। क्योंकि उन्हीं के माध्यम से मैं शुरू शुरू में मिशन से आकर्षित हुआ था। बेशक, जहाँ तक मुझे याद है, मेरे शुरुआती दिनों में मेरी एक इच्छा थी कि मैं एक साधु बनूँ। (10:11) यह विचार मेरे मन में कहाँ से आया , मुझे नहीं मालूम , मुझे याद नहीं है। लकिन किसी भी तरह मेरे मन में यह विचार उठा। इस विषय में मुझे केवल एक बात याद है कि मुझे एक पुस्तक मिली , I came across a book' जिसमें श्रीरामकृष्ण के एक शिष्य जिनका नाम गिरीश चंद्र घोष था। आप इस नाम से जरूर परिचित रहे होंगे। जो लोग श्रीरामकृष्ण की जीवनी से परिचित होंगे। उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी , उस उपन्यास में उन्होंने श्रीरामकृष्ण के उपदेशों को एक पात्र के जीवन में दर्शाया था। उन विचारों को पुस्तक में पढ़ा तो मैं उन विचारों से बहुत आकर्षित हुआ। 'My mother did not like that.' मेरी माँ को मेरे विचार अच्छे नहीं लगे। (11:37) हंसी - जब उन्होंने मेरे विचार सुने तो उस पुस्तक को मेरे से दूर रख दी । So when she came to know she kept the book away  from me .इसके बाद दुबारा मई उस पुस्तक को नहीं पढ़ सका। लेकिन उस पुस्तक का स्थाई-प्रभाव मेरे मन पर पड़ चुका था। जैसा मैंने आपसे कहा - 'that idea was dormant in my mind' वह विचार मेरे दिमाग में दबा हुआ था , लेकिन इसी प्रकार की घटनाओं के बाद उसके विषय में मैं और स्पष्ट रूप से जान पाया। I had a very clear idea about monastic life .  मठ-वासी जीवन (गुरु-गृहवास ?) के बारे में मुझे बहुत स्पष्ट जानकारी थी। In India those of you who have ever visited India , you may have come across such wandering monks . आप में से जो लोग कभी भारत आए होंगे , उन्हें ऐसे घुमक्कड़ वैरागी साधुओं (नागा साधु ?) को अवश्य देखा होगा। जो लोग लगभग बिना कुछ पहने एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते हैं, वे इस मामले में बिल्कुल स्वतंत्र होते हैं। और सिर पर बालों के जटाजूट बनाये रखते हैं। अपने शरीर पर राख मले रखते हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते हैं। मेरा विचार भी यही था, कि मैं भी शायद समय के साथ उनमें से एक साधु बनूंगा। किन्तु वैसा होना ही नहीं था। एक दिन, जब मैं बचपन में साईकिल (bike ) से जा रहा था, तो मैं एक ऐसे इलाके से होकर गुजरा, जहाँ पवित्र माँ रहती थीं।और जहां उद्बोधन में स्वामी सरदानंद महाराज उनकी देखभाल के लिए वहां मौजूद थे। (14:03) मेरा छात्र जीवन उधर ही बीता। एक दिन मैं गंगा नदी के किनारे वैसे ही टहल रहा था। वहाँ मैंने अपने स्कूल कुछ छात्रों को देखा, जो एक मंडली बनाकर कोई भक्तिमूलक गीत गा रहे थे। और जिस शिक्षक का उल्लेख मैंने किया था, वे भी उनके साथ थे। उत्सुकता वश मैं भी वहाँ चला गया यह देखने की वे लोग क्या कर रहे हैं। और भजन को सुनने की इच्छा भी हो रही थी। वहाँ कई छात्रों को देखा जो मुझसे परिचित थे। और शिक्षक तो मुझसे परिचित थे ही। उन्होंने मुझे इस दल में शामिल होने का आमंत्रण दिया। मैं वहाँ ठहर गया। और मुझे उनके गीत अच्छे लगे , इस प्रकार मैं उस युवा समूह में जाने लगा।  सप्ताह के अंतिम दोपहर के बाद वहां सम्मिलित होते थे। they are in small chapel-like thing , वह स्थान एक छोटे से पूजा -स्थल जैसा था। उसे कोई पूर्ण मंदिर नहीं कहा जा सकता था। लेकिन एक छोटा से गिरजा (chapel) ही था। जो भगवान शिव को समर्पित था। And Shiva I like because he was the ideal monk. और शिव मुझे इसलिए पसंद हैं क्योंकि वे आदर्श साधु थे।  इसलिए शिव के प्रति और उनके भक्तों के लिए भी मेरे मन में आकर्षण था। जो उस स्थान पर लभग रोज ही जाते थे। अतः स्वाभाविक रूप से मेरा मन उस स्थान पर जाने का करता था। और मैं उनमें से एक बन गया। (16:42)   
 फिर धीरे धीरे मेरे मन में उनके और निकट सम्पर्क में रहने की इच्छा हुई। my stay there was gradually longer, मेरा वहाँ रहना धीरे-धीरे दीर्घ काल तक का होता गया। वहाँ प्रति दिन भजनों के कार्यक्रम होते थे। शाम को संध्या आरती होती थी। उसमें से कुछ लड़के , सभी नहीं कुछ लड़के , उस पूजा स्थल में बैठकर ध्यान करते थे। मुझे वह भी अच्छा लगने लगा। उस दल के साथ मेरा सम्बन्ध और भी गहरा होता गया। फिर मैंने सोचा वहाँ केवल शाम को ही क्यों जाऊँ , वह मेरा दैनिक कार्य बन गया। अब यह देखें कि वे लोग सुबह में क्या करते हैं ? इसलिए मैं एक दिन वहाँ सुबह चला गया। उस समय बड़ा समूह तो नहीं था।  भजनों का कार्यक्रम भी नहीं हो रहा था। लेकिन पूजा हो रही थी, और ध्यान हो रहा था। मैंने आकर्षण महसूस किया और उसमें सम्मिलित हो गया। स्कूल की पढ़ाई के बाद मेरा समय वहीँ बीतने लगा। रात में घर चला जाता था। और पढाई किया करता था। उसके आलावा और सबकुछ महत्वहीन लगता था। ध्यान और पढ़ाई के साथ शास्त्र और मिशन से प्रकाशित किताबें रहती थीं। उसके विचारों से मैं परिचित होने लगा। धीरे धीरे साधु-जीवन के बारे में मेरे विचार अलग प्रकार के हो गए। मठवासी जीवन के बाहरी कर्मकांड से मेरा आकर्षण घटकर श्रीरामकृष्ण और स्वामी जी के जीवन की तरफ खींचने लगा। इस प्रकार मिशन के प्रति मेरा आकर्षण बढ़ने लगा। मजबूती से और दृष्टिकोण  स्पष्ट  होता गया। फिर उस दल के साथ रामकृष्ण मिशन के प्रधान कार्यालय मैं बेलुड़ मठ गया। जहाँ श्रीरामकृष्ण के कई प्रत्यक्ष शिष्य तब भी निवास कर रहे थे। (20:34) फिर मैं स्वामी सारदानन्द के संपर्क में आया। जो उस समय उद्बोधन में रहे थे। शायद 1916-17 की बात रही होगी ? उनके साथ मेरी घनिष्ठता , मजबूत होते हुए बढ़ती गयी , इसका सबसे मज़ेदार हिस्सा यह है कि मैं उस समय तक भी पवित्र माता के सम्पर्क में नहीं आ पाया था। वे वहाँ रह रहे थीं  , मैं इस बात को जानता था। but at that time my idea was for such holy personage to approach them will require some special preparation .लेकिन उस समय मेरा विचार था कि ऐसे पवित्र व्यक्ति से मिलने के लिए मुझे कुछ खास तैयारी करनी होगी। it will not will easy to understand them or appreciate them, उन्हें समझना या उनके गहरे आध्यात्मिक जीवन की तारीफ़ करना आसान नहीं होगा। इसलिए मैं पवित्र माता के पास जाने में इच्छुक नहीं था। मेरे कुछ मित्र श्री श्रीमाँ सारदा के सम्पर्क में आ गए थे। मैं आपको शुरू से बताना चाहूंगा। कि पवित्र मात्रा बहुत संकोच -लज्जा पालन करती थीं। वे अपने पुरुष शिष्यों से भी बात नहीं करती थीं। Only a few had direct access to her , केवल कुछ ही लोगों की उस तक सीधी पहुँच थी। केवल कुछ शिष्यों को ही उनसे सीधा मिलने की अनुमति होती थी। नहीं तो अगर वे आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए भी आते हैं, तो पवित्र माँ घूंघट ओढ़कर बैठेंगी। 
otherwise even they approach for spiritual guidance, the holy mother will seat with veil. कोई भी पुरुष शिष्य उनका चेहरा नहीं देख सकता था। and used to talk with such a low voice , और इतनी धीमी आवाज में बात-चीत करती थीं कि जिसे सुनना भी कठिन था। उनके साथ एक या दो स्त्री शिष्या रहा करती थीं। गोपाल माँ और योगिन माँ रहती थीं , जो माँ के जीवन से परिचित हैं , उन्हें जानते होंगे। वे माँ के निकट रहा करती थी। वे व्याख्या  (and used to talk with such a low voice, वे शिष्यों से अनुवाद करने का काम करती थीं की माँ ने क्या कहा है ? वे बाह्य जगत से बहुत अलग रहती थी। शायद यही कारण रहा होगा की मैं , अभी तक उनसे मिल नहीं पाया था। एक ऐसा समय आया , जब भक्तों के द्वारा पवित्र जगत जननी का जन्मदिन मनाया जा रहा था। वहाँ एक बड़ी सभा हुई थी। शिष्यगण माँ से मिलने आये थे। माँ को पूरा दिन अपने भक्तों से मिलने में बिताना था। हम छोटे बालक दल , स्वामी विवेकानन्द के शिष्य थे जिनको हमलोग 'ज्ञान महाराज' के नाम से जानते थे। वे हमलोगों को माँ से मिलवाने ले गए थे। वे बालकों के साथ बड़े हिले-मिले रहते थे। जब हमलोग बेलुड़ मठ जाते थे तो स्वामी शिवानंद मठ के प्रभारी थे। वे हमलोगों से पूछा करते थे - क्या तुमलोग दादी माँ से मिले हो ? नहीं तो तुमलोग ज्ञान महाराज के साथ जाकर मिलो। वे हमलोगों से आध्यात्मिक जीवन के ऊपर काफी चर्चा करते थे। और इतना ही नहीं युवा -किशोर दल को मठ के विविध आयोजनों में व्यस्त रखते थे। ज्ञान महाराज हमलोगों को जगतजननी माँ सारदा के पास ले गए। उस समय जो माँ की सेवा में उपस्थित महिलाएं थीं उनमें से एक ने कहा -माँ बहुत थक गयीं है। इसलिए ज्ञान महाराज अकेले आकर उन्हें प्रणाम कर लें ,इतना बड़ा लड़कों के दल को जाने नहीं है। तब ज्ञान महाराज ने उत्तर दिया -यदि मेरे लड़के माँ का दर्शन नहीं कर सकते , तो मैं यहीं से खड़े होकर माँ को अकेले प्रणाम कर लूंगा। (26:26) अकेले नहीं जा सकता। तब क्या हो सकताथा ? हम  सभी को माँ का दर्शन करने की अनुमति मिल गयी। इस प्रकार हमलोगों को माँ से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ, माँ के चरणों को स्पर्श करने का अवसर मिला। यही मेरा एक मात्र सम्बन्ध था। लोग अक्सर मुझसे पूछते है-Your reminiscence about holy mother !पवित्र माँ के बारे में आपकी यादेंका  कैसी हैं ? अगर इसे यादें कहा जा सकता है, तो हाँ! If that can be called a reminiscence, yes ! लेकिन दुर्भाग्य से इससे अधिक महत्वपूर्ण और कोई याद नहीं है। लेकिन फिर श्री रामकृष्ण और पवित्र माँ और उनके सीधे शिष्यों का प्रभाव हम जैसे युवाओं के लिए, जिनमे आध्यात्मिक जीवन के प्रति थोड़ा आग्रह था , बहुत ज़्यादा था। वे उस असर को अपनी ज़िंदगी को पूरी तरह बदलने से नहीं रोक सके। ये मेरे अपने जीवन में भी घटित हुआ। जैसा मैंने आप से कहा -आध्यात्मिक जीवन की इच्छा तो थी , किन्तु मैं यह नहीं जानता था कि  -what monasticism is ? मठवास का जीवन क्या है ? मैंने सोचा था था कि यह केवल पूरे शरीर पर राख का पोशाक पहनने, और सिर पर जटाजूट धारण करने जैसा कुछ होगा। इतना तो हम जानते थे , कि उत्तरी भारत में मठवासी जीवन जितना लोकप्रिय है, उतना ही विशेष रूप से बंगाल में जहाँ मठवासी जीवन उतना लोकप्रिय नहीं था। श्री रामकृष्ण के प्रत्यक्ष शिष्यों के माध्यम से एक बिल्कुल New type of monasticism' नए प्रकार का मठवाद प्रचलित हुआ। जिसको देखकर युवा लोग उसके साथ जुड़ने को आग्रही हुए। इसी प्रकार मेरा सम्बन्ध भी बेलुड़ मठ से हुआ। उसका एक प्रभाव यह हुआ कि सामान्य अध्ययन (usual study) के प्रति मेरा आकर्षण घटता गया। मिशन के आदर्श में मेरा आकर्षण बढ़ता गया। आप शायद इसके जानने  लिए इच्छुक नहीं होंगे। लेकिन जब मैं याद करता हूँ, तब अपने जीवन के उस हिस्से के बारे में सोचता हूँ। मैंने सोचा था कि स्कूल की पढ़ाई की समाप्त करने के बाद मैं मठ में शामिल हो जाऊंगा। मैंने सोचा था कि यदि मुझे ईश्वरलाभ नहीं करा सकता , तो इस पढाई का क्या फायदा है ? ये बड़ी बात या गहरी बात है। धीरे धीरे मैंने रामकृष्ण मठ से जुड़ने की इच्छा व्यक्त की। उस समय स्वामी शिवानन्द जी महाराज बेलूड़मठ के प्रमुख थे। उस समय वे मुझे मठ से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित नहीं किये थे। उन्होंने कहा पहले तुम अपनी पढाई पूरी कर लो। लेकिन मैं उनसे मठ से जुड़ने की अनुमति देने का आग्रह करता रहा। पर वे राजी नहीं हुए। इस लिए मैंने सोचा कि पढाई पूरी करना किसी काम की चीज नहीं है , इसलिए मैं घर से भाग कर सीधा हिमालय पहाड़ चला जाउँगा। (30:56) हमारे यहाँ मान्यता है कि हमालय पर्वत साधुओं का निवास स्थान है। इसलिए मैंने सोचा कि मैं भी वहीं चला जाऊँगा। सबसे मजेदार कहानी है -कि मैं पैदल ही हिमालय पर जाना चाहता था। मुझे दुरी का अनुमान नहीं था , और बिना पैसा लिए ही जाना था। मैं और मेरे साथ दो मित्र भी तैयार थे। मेरा एक मित्र जो बाद में वो भी संन्यासी बना। जो उम्र में मुझसे थोड़ा बड़ा था। और एक दूसरा था। और दूसरा वो शिक्षक जिनके बारे में मैंने कहा था , हम तीनों पैदल हिमालय जाने के लिए निकल पड़े। मेरे पास 1 डॉलर का 1/6 भाग पैसा था। छुट्टा पैसा था। बहुत कष्ट सहकर भी भिक्षा मांगना आसान नहीं था। क्योंकि हमलोगों को इसकी आदत नहीं थी। अक्सर भूखे रहना पड़ता था , कभी भाग्य से थोड़ा खाना मिल जाता था। ३ दिन के बाद हमलोग पूरी तरह से थका हार गए। और घर की तरफ इस विचार को लेकर लौटे कि हमलोग कलकत्ता के मित्रों से कुछ पैसा उधार लेकर , हिमालय का टिकट खरीदकर फिर से यात्रा शुरू करेंगे। पहले हमलोग उस शिक्षक से मिलेंगे , क्योंकि वे हमलोगों को साधु बनने के लिए सहायता जरूर करेंगे। उन्होंने पाया की हमलोग तीन दिन खाये बिना रहे थे , उन्होंने पहले हमें भोजन दिया। हमलोग खाना शुरू किये। इसी बीच उन्होंने मेरी माँ को सूचना दे दी। वे रोते हुए दौड़ी आ गयी। इस लिए मैं पकड़ा गया। और वापस घर ले जाया गया। हमारे प्रथम प्रयास का यही परिणाम निकला। अब मैं जिस दूसरे महत्वपूर्ण बात को कहना चाहता हूँ , कुछ समय बाद मैं अपने एक मित्र से पैसा उधार लिया। और टिकट खरीद कर हिमालय की तराई में - हरिद्वार जा पहुंचा। (34:28) वहाँ भी मिशन का एक केंद्र है। पहले मैं हरिद्वार केंद्र गया। उस समय वहां श्रीरमकृष्ण का जन्मतिथि पूजा मनाया जा रहा था। हमलोगों ने उस उत्स्व में भाग लिया। उसके बाद हमलोग हिमालय के और भीतर ऋषिकेश जाने का प्रयास किये। जहाँ जत्था में रहते हैं। वहां रामकृष्ण मिशन के स्वामी लोग भी वहां तपस्या कर रहे थे। मैं उनके साथ चला गया। उस समय मैं एक लड़का था। उनलोगों ने सोचा यदि यह वहां जायेगा उसका जीवन बर्बाद हो जायेगा। इसलिए मुझे वे अपने साथ तपस्थली में ले गए। मैं उनके साथ रहने लगा। एक स्वामी दयानन्द थे जो मुझे वापस लौटने के लिए समझने लगे। कि पढ़ाई पूरी करने के बाद ही रामकृष्ण मठ से जुड़ना ठीक रहेगा। (36 :27) बहुत समझाने के बाद मुझे लगा कि ये स्वामी मेरे भले के लिए ही बोल रहे हैं। अतः मैं वापस लौट आया। जब लौटा तो मेरा फ़ाइनल इम्तहान हो ने वाला था। मैंने सोचा यदि मैं स्कूल फ़ाइनल पास कर लूंगा तो मुझे कॉलेज जाना होगा। और उसके बाद मेरा जीवन कहाँ जायेगा , कुछ पता नहीं। इसलिए मैंने शुरू में इम्तिहान छोड़ देने का निर्णय लिया। पर उन्होंने मुझे इम्तिहान देने पर राजी किया। वो एक लम्बी कहानी है। फिर मैंने कॉलेज में नाम लिखाया। और मुझे एक आश्रम में रहने का अवसर मिला। वो आश्रम उस समय तक रामकृष्ण मठ से मान्यता प्राप्त नहीं था। यद्यपि क़ानूनी तौर से मान्यता नहीं मिली थी , लेकिन वह आश्रम  मठ से अच्छीतरह जुड़ा हुआ था। वहाँ रहते समय मैं बेलुड़ मठ और वहाँ के संन्यासियों से , और श्री रामकृष्ण के अन्य शिष्यों के संपर्क में रहा। मेरे आने के बाद वो आश्रम बाद में कार्य करना बंद कर दिया। अब उसका अस्तित्व नहीं है। (38 :38) मुझे ऐसा लगता है , शायद वह आश्रम मेरे लिए ही बना होगा। वहाँ से मैंने स्वामी सारदानन्द जी महाराज से सम्पर्क किया। स्वामी सारदानन्द जी महाराज ने कृपा करके मुझे मंत्रदीक्षा देदी। मैंने उनसे कहा कि मैं ब्रह्मचर्य दीक्षा लेना चाहता हूँ। संन्यासी होने की यह प्रथम अनुष्ठान होता है। मुझे यह देखकर ख़ुशी हुई कि उन्होंने मुझे निराश नहीं किया। उन्होंने ने कहा कि केवल बेलुड़ मठ के प्रधान स्वामी शिवानन्द जी महाराज ही तुमको ब्रह्मचर्य दीक्षा दे सकते हैं , उनके पास जाओ। मैंने कहा मुझे उनसे भय लगता है। (39:39) क्योंकि मैंने आपसे कहा था कि उन्होंने कई बार मेरे अनुरोध को टाल दिया था। तो मैं उनसे डरता हूँ , वे मुस्कुराये और बोले तुम जाकर, मेरी ओर से  ज्ञान महाराज को बोलो। वे जानते थे की ज्ञान महाराज हमलोग से नजदीक हैं। वे तुमको स्वामी शिवानन्द महाराज के पास ले जायेंगे। उन दिनों आश्रम का क़ानूनी मान्यता होना उतना जरुरी नहीं था। हमलोग मात्र उस आश्रम से जुड़े हैं , इतना कहना यथेष्ट था। उन्होंने सहमति प्रदान कर दी। पर एक शर्त के साथ कि मैं कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर लूंगा। फिर से वही शर्त वहाँ थी। पर मैंने सोचा चलो कॉलेज की पढाई पूरी करते हैं। उसी आश्रम में रहते हुए मैंने कॉलेज की पढ़ाई पूरी की। और 1923 में मेरी ब्रह्मचर्य दीक्षा हो गयी। उन दिनों जब भी छुट्टी मिलती मैं अपने गाँव चला जाता। जब कॉलेज खुला होता , तब आश्रम में रहता। स्नातक की डिग्री लेने के बाद मैंने कॉलेज और पढाई को छोड़ दिया। और बेलुड़ मठ आकर इससे जुड़ गया। मेरा यह सौभाग्य था कि स्वामी शिवानन्द जी जब वहाँ के प्रमुख थे , स्वामी सुबोधानन्द जी महाराज , वहाँ स्थायी रूप से रह रहे थे। और स्वामी सारदानन्द जी कोलकाता में रहते हुए भी अक्सर बेलुड़ मठ आते रहते थे। और जो भी स्वामी उस समय तक जीवित थे, वे हमारे साथ बेलुड़ मठ में अक्सर रहते थे। इसलिए मुझे उनके साथ अक्सर मिलने का सौभाग्य मिलता था। इस प्रकार मेरा संन्यासी जीवन प्रारम्भ हुआ। उसके बाद का जीवन खुली किताब है , इसलिए मुझे विस्तार में कहने की जरूरत नहीं है। कि किन केंद्रों में मैंने अपनी सेवाएं दी हैं। पर एक महत्वपूर्ण बात मुझे आपसे कहनी है। (43 :04)
    जब मैं बेलुड़ मठ में था तब स्वामी सारदानन्द जी महाराज से, जो मेरे गुरु थे, उनके बहुत निकट संपर्क में था। उनसे ही मैंने अपनी मंत्रदीक्षा प्राप्त की थी। उसके अतिरिक्त जब मैं बेलुड़ मठ में रहने लगा , तब मेरा परम सौभाग्य था कि मुझे स्वामी शिवानन्द महाराज के निकट सानिध्य में रहने का मौका मिला। जो यहाँ के अध्यक्ष थे। उनके एक सचिव की की कृपा से जो , स्वामी शिवानन्द महाराज के सेक्रेटरी थे। उन्होंने मुझे स्वामी शिवानन्द महाराज की व्यक्तिगत रूप से सेवा करने का अवसर प्रदान किया। उनका मालिश करना, और उनके सेवा के लिए निकट रहने के फलस्वरूप उनके सहायता से सेवा किया। मैं कभी कभी ऐसे शब्दों का प्रयोग करता हूँ , उनका attendant होने का सौभाग्य। उस समय यह अवसर मिला था real importance and significance of monastic life gradually ' यह अनुभव केवल पुस्तक पढ़ने से नहीं मिल सकता। यह सौभाग्य केवल उनके जीवंत सानिध्य में रहने से ही प्राप्त होता है। पवित्र साहचर्य से ही प्राप्त होता है। तब आदर्श के बारे में स्पष्ट धारणा होती है। inspiration and guidance, आगे बढ़ने की प्रेरणा और मार्गदर्शन मिलता है। मेरे लिए बहुत अंतरंग क्षण थे जिन्हें शब्दों में नहीं कहा जा सकता। क्योंकि उसका प्रभाव शब्दों से नहीं होता , संसर्ग में रहने से ही मिलता है। क्या मैं आगे बोलूं ? अभी आप और आधा घंटा बोल सकते हैं। मुझे एक महत्वपूर्ण बात कहनी है। उस समय मेरे मन एक विचार उठा कि श्री रामकृष्ण के शिष्य के साथ इतने करीबी संपर्क में रहना एक दुर्लभ सौभाग्य है। जिनको वे बहुत आदर करते थे। उसके साथ साथ एक दूसरा प्रबल इच्छा थी जो क्रमशः मजबूत होती जा रही थी। कुछ समय अकेले ध्यान में बिताने की इच्छा हुई। (47 :34) जब एक दिन मैं स्वामी शिवानन्द जी महाराज  की मालिश कर रहा था। मैंने उनसे पूछा महाराज मैं अपने बारे में निर्णय नंहीं ले पा रहा हूँ कि मेरे लिए क्या करना अच्छा होगा ? यहाँ के पवित्र वातावरण में रहूं , और आपकी निजी सेवा करने का सौभाग्य के साथ रहूं या ऐसा जीवन व्यतीत करूँ जो सिर्फ आध्यात्मिक अभ्यास का जीवन हो ? दोनों इच्छाएं मेरे भीतर प्रबल हैं। मैं खुद निर्णय नहीं कर पा रहा रहा हूँ। कृपया आप मेरा मार्गदर्शन करें। मैं जानता हूँ कि यह सौभाग्य छीन जाने पर दुबारा नहीं मिलेगा। किन्तु साथ ही साथ मैं आध्यात्मिक जीवन भी व्यतीत करना चाहता हूँ। जिसको आप तपस्या कहते हैं। जिसको ध्यान , सेवा , तप शारीरिक , शुद्धता , कहते हैं। 
(49 :24)  उन्होंने मुझे बहुत उत्साहित करते हुए कहा तुम्हें तप करने के लिए अवश्य जाना चाहिए। हाँ , तुम्हें अवश्य जाना चाहिए। स्वामी शिवानन्द महाराज को जब किसी बात पर जोर देना होता था , तब उसे दो बार बोलते थे। किन्तु मेरे बच्चे , तपस्या के लिए जाने के पहले आवश्यक तयारी कर लो। यहीं रहते हुए ध्यान में और गहरे उतरने का अभ्यास करो। हिमालय में तपस्या, आध्यात्मिक अभ्यास करने से ज्यादा आवश्यक यहां रहते हुए अभ्यास करो। उन्होंने मुझे देह मालिश से मना कर दिया। और ध्यान करने के लिए उत्साहित किया। पर इस समय तुम्हारा स्वास्थ्य उतना अच्छा नहीं है , इसलिए तपस्या के लिए ऐसे जगह में जाओ, जहाँ तुम्हारे स्वास्थ्य पर बुरा असर न हो।  
दो तीन दिन बाद उन्होंने निर्णय लिया कि मुझे बनारस जाना चाहिए। उस समय बनारस में ऐसे कई स्थान थे जहाँ साधु जाकर, भिक्षाटन करते हुए  रह सकते थे। और साधना भी कर सकते थे। क्योंकि हमलोगों एक आश्रम भी वहां है। वहां बीमार लोगों के इलाज के लिए साधुओं द्वारा सेवा का अस्पताल भी है। वहां भोजन और अस्पताल में दिक्क्त नहीं है , इसलिए वहां जाना अच्छा होगा। मैं खुद निर्णय नहीं ले प् रहा हूँ , लेकिन मेरी इच्छा हिमालय जाने की है जहाँ कोई मुझे पहचान न सके। मैं बनारस गया और वहां आश्रम से थोड़ी दूर स्थित एक मंदिर में रहने लगा। (53:00)
वहां साधना करता था और शहर के भक्तों से भिक्षा मांगकर खाता था। वहाँ सन्यासियों के भिक्षाटन करना मना नहीं है। मैं उसी तरह का जीवन व्यतीत करने लगा। कुछ दिनों बाद मैंने शिवानन्द जी महाराज को लिखा भिक्षा माँगकर पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन नहीं मिल सकता। इसलिए जो कुछ मिल जाता है , उससे मेरा काम चल जाता है और , मेरा स्वास्थ भी अभी तक ठीक है। यदि आप अनुमति देंगे तो मैं उत्तरकाशी चला जाऊँगा। फिर अपना भरपूर आशीर्वाद देते हुए मुझे जाने की अनुमति दे दी। मैं उत्तरकाशी चला गया और वहां रहा।
इसका उल्लेख मैंने इसीलिए किया कि रामकृष्ण मिशन केवल विभिन्न प्रकार की परोपकारी क्रियाकलापों (philanthropic activity) को ही प्रोत्साहित नहीं करता। बल्कि इसके साथ ही साथ 'Inner Life of the monk' साधु (नेता) के आन्तरिक जीवन (चरित्र) के उत्कर्ष पर भी ध्यान रखता है। (54:32) " Where he and his God "  जहाँ वह साधु (नेता) और उसके भगवान (भक्त और उसके इष्टदेव या आदर्श का अद्वैत) केवल यही दो चीजें मायने रखती हैं,  इसके अलावा और कुछ मायने नहीं रखता। 

साधु जीवन (monastic life) का ही यह दूसरा पहलू है। मेरे कहने का यह तात्पर्य नहीं कि 'एक' को महत्व देने का अर्थ 'दूसरे' पक्ष को कमजोर नहीं करना है। [आंतरिक जीवन गठन पर जोर देने का तात्पर्य , शिव ज्ञान से जीव सेवा करने के पहलु को नजरअंदाज (ignored-उपेक्षित) करना नहीं है।]    
स्वामी विवेकानन्द ने संन्यासी जीवन के लिए (या गृहस्थ नेता दोनों के लिए) यही आदर्श स्थापित किया है। जिस आदर्श को स्वामी जी ने दो जुड़वाँ आदर्श से अभिव्यक्त किया है। संन्यासियों के लिये स्वामी विवेकनन्द द्वारा प्रदत्त आदर्श वाक्य है -'आत्मनो मोक्षार्थं , जगत हिताय च।' -"For the liberation of the self and for the good of the world" .स्वामी जी ने संन्यासियों के लिए जुड़वाँ आदर्श और उद्देश्य दिया -"स्वयं की मुक्ति और जगत का कल्याण। " ये दोनों आदर्श-twin Ideals are mixed up together' परस्पर मिले हुए हैं। यह आदर्श हमें प्रेरणा देता है कि हमें स्वयं अपनी मुक्ति के लिए प्रयास करते हुए (अर्थात स्वयं ' साधन-चतुष्टय का अभ्यास' करते हुए) दूसरों के लिए 'helpful' (उपकारी, मददगार) भी बनना चाहिए, अर्थात दूसरों को भी साधन चतुष्टय का अभ्यास करने के लिए प्रेरित करते रहना चाहिए। they are mutually beneficial . क्योंकि ये दोनों आदर्श  परस्पर लाभकारी हैं आदर्श है। इसलिए ' there is necessity of having both sides maintained !' इसलिए साधना दोनों पहलू - "ज्ञान और भक्ति" को बनाए रखने की ज़रूरत है। - " Be helpful to others , they are mutually beneficial ! so there is necessity of having both sides maintained !"
और स्वामी शिवानन्द जी महाराज ने मुझे तपस्या करने जाने से रोका नहीं , बल्कि उसके लिए प्रोत्साहित भी किया। लेकिन उसके साथ ही साथ वे, मुझे सावधान करना भी नहीं भूले कि इसका भी ध्यान रखना कि इस प्रकार समाज से कट कर अलग जीवन गठन करने की साधना करना , तपस्या करना कुछ समय के लिए तो ठीक है। (56:24)  लेकिन हमेशा वैसा ही जीवन जीना ठीक नहीं है। तुम उत्तरकाशी तपस्या करने जाओ , उस तपस्वी जीवन का अनुभव भी प्राप्त करो। लेकिन उसके बाद  लौटकर वापस आओ और रामकृष्ण मठ का सक्रीय सदस्य Active Member बने रहो। क्योंकि जीवन के ये दोनों पहलू मिलकर ही एक सम्पूर्ण आध्यात्मिक जीवन का निर्माण करते हैं। because both sides together can make up one's whole spiritual life . ' किसी एक ही पहलू पर जोर देकर , दूसरे पहलू की उपेक्षा करना ठीक नहीं। यह मैंने सीखा अपने मठ के संन्यासी जीवन से।
    जैसा मैंने आपसे पहले कहा , साधु जीवन के बारे में मेरे ऐसे विचार पहले नहीं थे। शुरुआती दिनों में मेरा विचार था कि दूसरों के कल्याण की कोई चिंता किये बिना, साधु सिर्फ अपने आध्यात्मिक जीवन को उत्कृष्ट बनाने के लिए ही हुआ जाता है। 
किन्तु यह श्रीरामकृष्ण की शिक्षा ही थी , जिसको लोग बिना स्वामी विवेकानन्द के आदर्श जीवन के उदाहरण से तुलना किये बिना बहुत सही रूप में समझ नहीं पाते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने स्वयं इस शिक्षा को अपने गुरु श्री रामकृष्ण के चरणों में बैठकर सीखा था। (57:54)  कि संन्यासी/त्यागी जीवन का अर्थ यह नहीं है कि तुम अपने आस-पास के लोगों की परवाह ही मत करो , जिन्हें तुम्हारी सेवा की ज़रूरत हो सकती है। monastic life doesn't mean, being unconcerned with the people around you, who may need your service . and the service unto them will be really service unto God .और उनकी सेवा सचमुच परमेश्वर की सेवा होगी। या जरूरत मंदों की सेवा करना ही वास्तव में ईश्वर की सेवा करना है। यह एक ऐसा आदर्श था जिसे,  मानवजाति के इतिहास में स्वामी विवेकानन्द के आलावा किसी दूसरे के द्वारा अभी तक इतना जोर नहीं दिया गया था। और यह आदर्श भी उन्होंने श्रीरामकृष्ण के चरणों में बैठकर दिए गए पाठ से ग्रहण किया था। (58:40) यदि स्वामी विवेकानन्द ने इस आदर्श को अपने जीवन के उदाहरण से प्रमाणित न किया होता तो , नहीं तो संन्यासी जीवन का एक पहलू अंजाना ही रह जाता। ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि हम अपना सम्पूर्ण जीवन समाजसेवा को समर्पित कर दें। या अपने जीवन को सिर्फ आध्यात्मिक अभ्यास करने के लिए ही खपा नहीं देना चाहिए। और समाज सेवा को पूर्णतया उपेक्षित छोड़ दिया जाये। तो यही महान शिक्षा मुझे बेलुड़ मठ में अनेक वर्षों तक सेवा करके सीखना पड़ा।
 अच्छा गृहस्थ लोगों के लिए क्या सन्देश हुआ ? pertinent question प्रासंगिक प्रश्न है - गृहस्थ लोगों के लिए क्या सन्देश होगा ? [लेकिन  गृहस्थों के लिए स्वामी विवेकनन्द द्वारा प्रदत्त किन्तु अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल के 'Founder Secretary' संस्थापक सचिव श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय द्वारा विवेकानन्द साहित्य से (खण्ड 9, पेज ३७९ से) अविष्कृत आदर्श वाक्य है  "Be and Make ! " दोनों आदर्शों का एक ही अर्थ है। लेकिन सभी युवा अभी मोक्ष की प्रबल इच्छा वाले नहीं हो सकते , इसलिए हमें प्राथमिक दृष्टि से स्वयं (चरित्रवान) मनुष्य बनने का प्रयास करते हुए दूसरों को मनुष्य बनने के लिए अनुप्रेरित करना चाहिए। ]

 श्रीरामकृष्ण को ही उद्धृत करते हुए - यह करना है कि तुम अपने गृहस्थ धर्म का पालन करो , लेकिन एक हाथ से ईश्वर के चरणों को पकड़े रहो। और दूसरे हाथ से संसार के काम करो। पहले एक हाथ से भगवान को पकड़ो , बिना भगवान को पकड़े हुए नहीं। (अर्थात बिना ईश्वरलाभ किये संसार में भी आसक्त मत रहो। ) लेकिन गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी यह बहुत आवश्यक है कि, householder environment' गृहस्थ वातावरण से बाहर निकलकर साल भर में कुछ दिनों का निर्जनवास भी करते रहना चाहिए,  जहाँ उनको यह सीखने का मौका मिलेगा कि मनुष्य जीवन की दो प्रमुख चीजें है - एक भक्त और दूसरा उसका भगवान (इष्टदेव)  
 उन दोनों के बीच कम से कम साल भर में कुछ दिनों के लिए निर्जनवास या (एक महीने का कल्पवास-कोई सांसारिक आसक्ति नहीं आना  चाहिए।) गृहस्थ जीवन के वातावरण को त्याग कर कुछ दिनों का निर्जनवास अवश्य करना चाहिए। where the environment will be congenial then only you have that deep anchoring in spiritual life . जहां का माहौल साधना के अनुकूल होगा, तभी आप आध्यात्मिक जीवन में गहरी पकड़ बना पाएंगे। तभी आध्यात्मिक जीवन की सहायता से गृहस्थ धर्म का पालन भी बहुत कुशलतापूर्वक सम्पन्न होगा , और अंततोगत्वा  आध्यात्मिक जीवन और गृहस्थ जीवन का अन्तर भी मिट जायेगा। तुम्हारा गृहस्थ का जीवन और तुम्हारा ईश्वर केंद्रित जीवन पूरी तरह से एक दूसरे में  विलीन हो जायेंगे। यही है आदर्श जीवन। लेकिन उस आदर्श में प्रतिष्ठित होने के लिए तुमको समय समय पर गृहस्थ जीवन के कर्तव्यों को त्यागकर, ईश्वर केंद्रित जीवन जीने के लिए  निर्जन वास करना पड़ेगा।  इसलिए श्रीरामकृष्ण हम गृहस्थों की कठिनाई को समझते थे। इसलिए एक महीना का निर्जनवास या 6 दिनों का हो , 3 दिनों का हो , 2 दिनों का भी निर्जनवास होना जरुरी है। उससे भी जीवन गठन में सहायता मिलेगी। यह भी श्रीरामकृष्ण के उपदेश हैं। 
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Here is rare video of Swami Bhuteshananda from the Archive of the Vedanta Society of Southern California. This talk on the Five Sheaths of the Soul was given at the Hollywood Temple.

Swami Bhuteshananda, the twelfth President of the Ramakrishna Order, was born on 8 September 1901 at Somsar in Bankura district of West Bengal. His pre-monastic name was Vijay Chandra Roy. His parents were Purna Chandra Roy and Charubala Devi. As a student in Kolkata, he met Brahmachari Jnan Maharaj, a disciple of Swami Vivekananda. Under his guidance, he along with a group of other young boys started frequenting the Belur Math and met many of the direct disciples of Sri Ramakrishna.

In 1921, Swami Saradananda initiated Vijay with Mantradiksha. He was bestowed with the vows of brahmacharya by Swami Shivananda on 30 December 1923 and was named ‘Priyachaitanya’. Swami Gambhirananda was among the others who were initiated into brahmacharya on the same day. He served at the Belur Math in the temple of Sri Ramakrishna and got scriptural lessons from a pandit. For some time he served Mahapurush Maharaj also. On 23 February 1928, Swami Shivananda initiated him into sannyasa.

Thereafter, Swami Bhuteshananda set out for tapasya and spent about two years in the Himalayas. On his return, he was sent to the Dhaka Centre where he served till 1932. Then he went to Mysore to join the study circle for studying scriptures. There he taught his brother-monks the Brahmasutra.

In 1936, Swami Bhuteshananda was made the head of the centre at Shillong. There he got the opportunity to serve the hill-tribes. In 1945, he was made the head of the Rajkot Math. During his tenure there, the ashrama thrived remarkably. He took much pain for getting the Ramakrishna-Vivekananda literature translated into Gujarati. He rendered untiring service in the relief operations organized by the Order in the flooded areas of West Bengal in 1926, as the Camp-in-charge of the Burma Evacuee Relief in 1942 and many others.

In 1965, Swami Bhuteshananda was made a Trustee of the Ramakrishna Math and a member of the Governing Body of the Ramakrishna Mission. In 1966, he joined at the Belur Math as an Assistant Secretary. In 1975, he became one of the Vice Presidents of the Order and moved over to Yogodyan Math, Kankurgachhi at Kolkata. Following the ‘Mahasamadhi’ of Swami Gambhirananda, he took the onus of the President of the Ramakrishna Math and Ramakrishna Mission, on 24 January 1989.

Though Swami Bhuteshananda was an extraordinary scholar and could speak untiringly on scriptural subjects, yet he did not author a book. However, his class lectures were transcribed and brought out as books which are very popular for the lucid expositions of profound thoughts.

During the long period of twenty-three years as the Vice President and also as the President of the Order, he traveled to many countries including Singapore, Fiji, Japan, Australia, America, Canada, England, France, Bangladesh and Sri Lanka. He carried the ideals and ideas of the Ramakrishna-Vivekananda Movement to innumerable people.

Swami Bhuteshananda was austere yet jovial in nature. His extraordinary scholarship, simplicity and humanity made him an extraordinary monk. He was easily approachable and had motherly affection towards all. His erudition and total surrender to the Supreme Will were deeply ingrained in him and never were manifested externally, except under compelling situations. His personality beamed with universal love. He left his mortal body for his heavenly abode on 10 August 1998 at the age of 97.

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वर्तमान युग की अनिवार्यता 

(साधन-चतुष्टय का प्रचार प्रसार करने में समर्थ महामण्डल कर्मी का निर्माण)

स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - 
      " वर्तमान युग का हिन्दू युवक , सनातन धर्म के अनेक पंथों की भूलभुलैया में भटका हुआ है,  -महावाक्यों के मर्म को नहीं समझ पाने के कारण , जब अपने पूर्वजों के एकमात्र हिन्दू धर्म में आस्था खोकर उन पाश्चात्य देशों से जिसने भौतिकता के सिवा कभी कुछ जाना ही नहीं , उनकी दृष्टि से अपने सनातन धर्म को तौलता है। अंत में उस खोज को बिल्कुल त्याग देता है , या निपट अज्ञेयवादी बन जाता है।...केवल वे ही बच पाते हैं जिनकी आध्यात्मिक प्रकृति सद्गुरु के संजीवनी स्पर्श से जाग्रत हो चुकी है। (९/३६१)  
" अब हिन्दू वैदिक सनातन धर्म के सभी सम्प्रदायों को स्थूल रूप से - ज्ञानमार्गी और भक्तिमार्गी - इन दो श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है।  शंकराचार्य जी के अनुसार -' ब्रह्म की अनुभूति और मोक्ष की प्राप्ति किसी अनुष्ठान, मत, वर्ण , जाति या सम्प्रदाय पर अवलम्बित नहीं है। कोई भी साधन -चतुष्टय सम्पन्न साधक उसका अधिकारी बन सकता है। साधन-चतुष्टय सम्पूर्ण चित्तशुद्धि प्रदान करने में सक्षम कुछ अनुष्ठान मात्र हैं। 
[साधन चतुष्टय -1. विवेक की परिभाषा 2. वैराग्य 3 . षट सम्पत्ति (शम-दम -उपरति -तितिक्षा -श्रद्धा - समाधान) 4. मुमुक्षुत्व अर्थात मोक्षलाभ की प्रबल इच्छा।] (९/३७०) 
'जो ब्रह्मविद सो ब्रह्म है , ताको वाणी वेद।  संस्कृत या भाषा में करत भरम का छेद। ' (९/३७१) क्या भारत मर जायेगा ? तब तो संसार से सारी आध्यात्मिकता का समूल नाश हो जायेगा। ....(९/३७७) 
" अपने वैदिक हिन्दू सनातन धर्म के उसी एक मात्र केन्द्रवर्ती सत्य पर खड़े हो जाओ - जो हिन्दू, बौद्ध , और जैनियों की पैतृक सम्पत्ति है। वह सत्य है - प्रत्येक मनुष्य में अंतर्निहित आत्मा - जो अजर , अमर और अविनाशी है। जिसकी महिमा का वर्णन वेद भी नहीं कर सकते प्रत्येक स्त्री-पुरुष , उच्चतम देवों से लेकर कीड़ों तक में वही आत्मा विकसित या अविकसित रूप में व्याप्त है। अन्तर प्रकार में नहीं, केवल परिमाण में है।
" मानवमात्र में अन्तर्निहित आत्मा की इस शक्ति का प्रयोग स्थूल देह (Hand आकार) पर होने से भौतिक उन्नति होती है ,  मन (Head निराकार) पर होने से आत्मनोमुखी बुद्धि का विकास होता है , और अपने स्वरुप (Heart चेतन आत्मा) पर होने से मनुष्य भगवान (पूर्ण) बन जाता है। [भगवान मनुष्य बना था , अब प्रत्येक मनुष्य को भगवान बनना होगा।] पहले हमें भगवान बन लेने दो। उसके बाद दूसरों को भगवान बनाने में सहायता देंगे। 'Be and Make' बनो और बनाओ , यही हमारा मूल मंत्र रहे। ऐसा न कहो कि मनुष्य पापी है। उसे यह बताओ कि - प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है" (9/३७९) 
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  सुमिर-सुमिर नर उतरो पार, भव सागर की तीक्षण धार।

1. धर्म जहाज मांहि चढ़ लीजै, संभल-संभल ताहि पग दीजै,
श्रम कर मन को संगि कीजै, हरि मार्ग को लांघो पार।
2. बागवान फुन ताहि चलावे, पाप भरे तो हलन न पावे,
काम क्रोध लुटन को आए, सावधान हो कर संभार।
3. मान पहाड़ी तहां अड़त है, आसा तृष्णा भंवर पड़त है,
पांच मच्छ जहां चोट करत है, ज्ञान आंख बल चलो निहार।
4. ध्यान धनी का हृदय धारे, गुरु कृपा से लगे किनारे,
जब तेरी बोहित उतरे पार, जन्म-मरण दुख विपदा हार।
5. चौथे पद में आनन्द पावे, या जग में तू बहुर न आवे,
चरणदास गुरुदेव चितावे, सहजो बाई यही विचार
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नैहरवा हमका नहिं भावे, हमका नहि भावै।

1. साई की नगरी परम अति सुंदर, जहँ कोई जावे ना आवै।
चाँद सूरज जहाँ पवन ना पानी, को संदेश पहुँचावे।
दरद यह साईं कौन सुनावै।।
2. आगे चलो पंथ नहिं सूझै, पीछै दोष लगावै।
केहि विधि ससुरे जाव मोरी सजनी, बिरहा जोर जनावै।
विषय रस नाच नचावै।।
3. बिन सदगुरु अपनो नहिं कोई, जो यह राह बतावै।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, अपने में प्रीतम पावै।
तपन यह जिय की बुझावै।।

राम का गुणगान करिये, राम का गुणगान करिये।
राम प्रभु की भद्रता का, सभ्यता का ध्यान धरिये॥
राम के गुण गुणचिरंतन,
राम गुण सुमिरन रतन धन।
मनुजता को कर विभूषित,
मनुज को धनवान करिये, ध्यान धरिये॥
सगुण ब्रह्म स्वरुप सुन्दर,
सुजन रंजन रूप सुखकर।
राम आत्माराम,
आत्माराम का सम्मान करिये, ध्यान धरिये॥  
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शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

⚜️️🔱श्रीमद् भगवद्गीता : चतुर्थ अध्याय ⚜️️🔱ज्ञानयोग ⚜️️🔱

   42 श्लोक युक्त चौथे अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को दिए जा रहे दिव्य ज्ञान के उद्गम को प्रकट करते हुए उसके विश्वास को पुष्ट करते हैं। वे बताते हैं कि यह वही शाश्वत ज्ञान है जिसका उपदेश उन्होंने आरम्भ में सर्वप्रथम सूर्यदेव को दिया था और फिर परम्परागत पद्धति से यह ज्ञान निरन्तर राजर्षियों तक पहँचा। अब वे अर्जुन, जो उनका प्रिय मित्र और परमभक्त है, के सम्मुख इस दिव्य ज्ञान को प्रकट कर रहे हैं।

 तब अर्जुन प्रश्न करता है कि वे श्रीकृष्ण जो वर्तमान में उसके सम्मुख खड़े हैं वे इस ज्ञान का उपदेश युगों पूर्व सूर्यदेव को कैसे दे सके? इसके प्रत्युत्तर में श्रीकृष्ण अपने अवतारों का रहस्य प्रकट करते हैं। वे बताते हैं कि भगवान अजन्मा और सनातन हैं फिर भी वे अपनी योगमाया शक्ति द्वारा धर्म की स्थापना के लिए पृथ्वी पर प्रकट होते हैं लेकिन उनके जन्म और कर्म दिव्य होते हैं।  और वे भौतिक विकारों से दूषित नहीं हो सकते। जो इस रहस्य को जानते हैं वे अगाध श्रद्धा के साथ उनकी भक्ति में तल्लीन रहते हैं और उन्हें प्राप्त कर फिर इस संसार में पुनः जन्म नहीं लेते। 

इसके पश्चात् इस अध्याय में कर्म की प्रकृति का व्याख्यान किया गया है और कर्म, अकर्म तथा विकर्म से संबंधित तीन सिद्धातों पर चर्चा की गयी है। इनसे विदित होता है कि कर्मयोगी अनेक प्रकार के सांसारिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए अकर्मा की अवस्था प्राप्त कर लेते हैं और इसलिए वे कर्मचक्र  में नहीं फंसते। 

इसी ज्ञान के कारण प्राचीन काल में ऋषि मुनि सफलता और असफलता, सुख-दुःख से प्रभावित हुए बिना केवल भगवान के सुख के लिए कर्म करते थे।

यज्ञ कई प्रकार के होते हैं और इनमें से कई यज्ञों का उल्लेख यहाँ किया गया है। जब यज्ञ पूर्ण समर्पण की भावना से सम्पन्न किए जाते हैं तब इनके अवशेष अमृत के समान बन जाते हैं। ऐसे अमृत का पान करने से साधक के भीतर की अशुद्धता समाप्त हो जाती है। इसलिए यज्ञों का अनुष्ठान पूर्ण निष्ठा और ज्ञान के साथ करना चाहिए। 

  ज्ञान रूपी नौका की सहायता से महापापी भी संसार रूपी कष्टों के सागर को सरलता से पार कर लेता है। ऐसा दिव्य ज्ञान वास्तविक आध्यात्मिक गुरु से प्राप्त करना चाहिए जो परम सत्य को जान चुका हो

 श्रीकृष्ण गुरु के रूप में अर्जुन से कहते हैं कि ज्ञान की खड्ग से अपने हृदय में उत्पन्न हुए सन्देहों को काट दो, उठो और युद्ध लड़ने के अपने कर्त्तव्य का पालन करो। 

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इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।

विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।।4.1।।

।।4.1।। श्रीभगवान् ने कहा ---  मैंने इस अविनाशी योग को विवस्वान् (सूर्य देवता) से कहा (सिखाया);  विवस्वान् ने मनु से कहा;  मनु ने इक्ष्वाकु से कहा।।

 स्वस्वरूप की स्मृति से स्फूर्त होकर भगवान् घोषणा करते हैं कि उन्होंने ही सृष्टि के प्रारम्भ में- 'इमं योगं' - इस ज्ञान-मिश्रित कर्मयोग। इसमें , कर्म , ज्ञान और भक्ति का समन्वय है। तो भगवान कहते हैं इस निष्काम-कर्म -मिश्रित भक्तियोग का उपदेश सूर्य देवता (विवस्वान्) को दिया था। विवस्वान् ने अपने पुत्र मनु जो भारत के प्राचीन स्मृतिकार हुए को यह ज्ञान सिखाया। मनु ने इसका उपदेश राजा इक्ष्वाकु को दिया जो सूर्यवंश के पूर्वज थे। इस वंश के राजाओं ने दीर्घकाल तक अयोध्या पर शासन किया। 

जैसा कि इस अध्याय की प्रस्तावना में कहा गया है भगवान् यहाँ स्पष्ट करते हैं कि अब तक उनके द्वारा दिया गया उपदेश नवीन न होकर सनातन वेदों में प्रतिपादित ज्ञान की ही पुर्नव्याख्या है। वेद शब्द संस्कृत के विद् धातु से बना है जिसका अर्थ है जानना। अत वेद का अर्थ है ज्ञान अथवा ज्ञान का साधन (प्रमाण)। वेदों का प्रतिपाद्य विषय है जीव के शुद्ध ज्ञान स्वरूप तथा उसकी अभिव्यक्ति के साधनों का बोध।जैसे हम विद्युत् को नित्य कह सकते हैं क्योंकि उसके प्रथम बार आविष्कृत होने के पूर्व भी वह थी और यदि हमें उसका विस्मरण भी हो जाता है तब भी विद्युत् शक्ति का अस्तित्व बना रहेगा इसी प्रकार हमारे नहीं जानने से दिव्य चैतन्य स्वरूप आत्मा का नाश नहीं होता। 

इस अविनाशी आत्मा का ज्ञान वास्तव में अव्यय है। आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि विश्व का निर्माण सूर्य के साथ प्रारम्भ होना चाहिये। शक्ति के स्रोत के रूप में सर्वप्रथम सूर्य की उत्पत्ति हुई और उसकी उत्पत्ति के साथ ही यह महान् आत्मज्ञान विश्व को दिया गया। 

वेदों का विषय आत्मानुभूति होने के कारण वाणी उसका वर्णन करने में सर्वथा असमर्थ है। कोई भी गम्भीर अनुभव शब्दों के द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता। अत स्वयं की बुद्धि से ही शास्त्रों का अध्ययन करने से उनका सम्यक् ज्ञान तो दूर रहा विपरीत ज्ञान होने की ही सम्भावना अधिक रहती है।

 इसलिये भारत में यह प्राचीन परम्परा रही है कि अध्यात्म ज्ञान के उपदेश को आत्मानुभव में स्थित गुरु के मुख से ही श्रवण किया जाता है। गुरु-शिष्य वेदान्त शिक्षक -प्रशिक्षण परम्परा से यह ज्ञान दिया जाता रहा है। 

इस श्लोक में ब्रह्मविद्या के पूर्वकाल के विद्यार्थियों का परिचय -विवस्वान् (सूर्य देवता), मनु  और इक्ष्वाकु के रूप में कराया गया है।

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।।4.2।।

।।4.2।। इस प्रकार परम्परा से प्राप्त हुये इस योग को राजर्षियों ने जाना, (परन्तु) हे परन्तप ! वह योग बहुत काल (के अन्तराल) से यहाँ (इस लोक में) नष्टप्राय हो गया।।

 वेदों में प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्गों का उपदेश है। इस योग का ज्ञान परम्परागत रूप से गुरु-शिष्य परम्परा में राजर्षियों को प्राप्त होता था। राजा होकर भी जो लोग ऋषि -तुल्य थे उनको राजर्षि कहते हैं, जैसे जनक आदि। वे ज्ञानी होकर भी (मैं कर्ता नहीं हूँ ' जान लेने के बाद भी) निष्काम कर्म करते थे। अतः जो लोग ज्ञानी और कर्मी हैं वे ही इस योग को जान सकते हैं। इस प्रकार का ज्ञान प्राप्त होने से मनुष्य (बुद्धि ) मुक्त हो जाता है , और पाप-पुण्य से परे चला जाता है। यह अवस्था अत्यंत ही दुर्लभ है। 

 परन्तु लगता है इस योग का भी अपना दुर्भाग्य और सौभाग्य है इतिहास के किसी काल में मानव मात्र की सेवा के लिये यह ज्ञान उपलब्ध होता है , और किसी अन्य समय में अनुपयोगी सा बनकर निरर्थक हो जाता है। तब अध्यात्म का स्वर्ण युग (सतयुग) समाप्त होकर भोगप्रधान आसुरी जीवन का अन्धा युग (कलियुग-कलिः शयानो भवति )  प्रारम्भ होता है। 

कलिः शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापरः।

उत्तिष्ठम्स्रेता भवति कृतं संपद्यते चरन्।।चरैवेति,,,

-ऐतरेय ब्राह्मण,7/15/4

अर्थात्-जो सो रहा है वह कलियुग में है,निद्रा से उठने वाला द्वापर युग में है ।उठकर खड़ा होने वाला त्रेता युग में है और श्रम करने वाला सतयुग बन जाता है।इसलिए श्रम करते रहे।चलते रहो।

 किन्तु आसुरी भौतिकवाद से ग्रस्त काल में भी वह पीढ़ी अपने ही अवगुणों से पीड़ित होने के लिये उपेक्षित नहीं रखी जाती। क्योंकि उस समय कोई महान् गुरु (अवतार वरिष्ठ या युवा महामण्डल ) अध्यात्म क्षितिज पर अवतीर्ण होकर तत्कालीन पीढ़ी को प्रेरणा साहस, उत्साह और आवश्यक नेतृत्व प्रदान करके दुःख पूर्ण पगडंडी से बाहर निकाल कर सांस्कृतिक पुनरुत्थान के राजमार्ग पर ले आता है।       

    महाभारत काल का उचित मूल्यांकन करते हुए श्रीकृष्ण भगवान् ठीक ही कहते हैं कि दीर्घकाल के अन्तराल से वह योग यहाँ नष्ट हो गया है। यह देखकर कि इन्द्रिय संयम से रहित दुर्बल व्यक्तियों के हाथों में जाकर यह योग नष्टप्राय हो गया जिसके बिना जीवन का परम् पुरुषार्थ प्राप्त नहीं किया जा सकता। भगवान् आगे कहते हैं- 

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।

भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्।।4.3।।

।।4.3।। वह ही यह पुरातन योग आज मैंने तुम्हें कहा (सिखाया) क्योंकि तुम मेरे भक्त और मित्र हो। यह उत्तम रहस्य है।।

 यहाँ भगवान् अब तक के उपदिष्ट ज्ञान को पुरातन होने की घोषणा करके रूढ़िवादी विचारकों की शंका का निर्मूलन कर देते हैं। 

 तुम मेरे भक्त और मित्र हो - अर्थात शिष्य के प्रति स्नेह भाव होने पर ही कोई गुरु उत्साह और कुशलता पूर्वक उपदेश दे सकता है।  श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच ऐसा ही सम्बन्ध था और भगवान् को यह विश्वास था कि उनके द्वारा निर्दिष्ट मार्ग का वह अनुसरण करेगा। गुरु और शिष्य के बीच इस प्रकार की व्यापारिक व्यवस्था न हो कि तुम शुल्क दो और मैं पढ़ाऊँगा। 

यह उत्तम रहस्य है - यहाँ सत्य के विज्ञान को ही उत्तम रहस्य कहा जा रहा है। (अर्थात आत्मा का विज्ञान जानने वाले ब्रह्मविद गुरुदेव द्वारा प्रदत्त मायाधीश का नाम-जप मंत्र को ही यहाँ उत्तम रहस्य कहा गया है !)  इस ज्ञान को रहस्य कहने का तात्पर्य केवल इतना ही है कि कोई व्यक्ति कितना ही बुद्धिमान् क्यों न हो फिर भी अनुभवी पुरुष (ब्रह्मज्ञ गुरु) के उपदेश के बिना वह आत्मा के अस्तित्व की अनुभूति तो क्या आभास भी नहीं पा सकता। क्योंकि समस्त 'बुद्धि- वृत्तियों' (काम , क्रोध, लोभ , मद , मोह और मात्सर्य -अन्तःकरण) अर्थात चित्तवृत्ति को प्रकाशित करने वाली चेतन आत्मा स्वयं बुद्धि के परे होती है। इसलिये मनुष्य का विवेक सार्मथ्य कभी भी नित्य अविकारी आत्मा को विषय के रूप में नहीं जान सकती। यही कारण है कि सत्य के विज्ञान को यहाँ उत्तम रहस्य कहा गया है। 

किसी के मन में यह शंका न रह जाये कि भगवान् के वाक्यों में परस्पर विरोध है इसलिये अर्जुन मानो आक्षेप करता हुआ प्रश्न पूछता है-

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।

कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।।4.4।।

।।4.4।। अर्जुन ने कहा -- आपका जन्म अपर अर्थात् पश्चात का है और विवस्वान् का जन्म (आपके) पूर्व का है, इसलिये यह मैं कैसे जानूँ कि (सृष्टि के) आदि में आपने (इस योग को) कहा था?

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।

कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।।4.4।।

।।4.4।। अर्जुन ने कहा -- आपका जन्म अपर अर्थात् पश्चात का है और विवस्वान् का जन्म (आपके) पूर्व का है, इसलिये यह मैं कैसे जानूँ कि (सृष्टि के) आदि में आपने (इस योग को) कहा था?

 श्रीकृष्ण ने कहा कि उन्होंने सृष्टि के प्रारम्भ में इस योग को विवस्वान् को सिखाया। अर्जुन के लिये स्वाभाविक था कि वह श्रीकृष्ण को देवकी के पुत्र और गोकुल के मुरलीधर कृष्ण के रूप में ही जाने। श्रीकृष्ण की निश्चित जन्म तिथि थी और वे अर्जुन के ही समकालीन थे। इस दृष्टि से उनका सूर्य के प्रति उपदेश करना असंभव था।  क्योंकि सम्पूर्ण ग्रहों की सृष्टि के पूर्व सूर्य का अस्तित्व सिद्ध है। गीतोपदेष्टा भगवान् श्रीकृष्ण (जगतगुरु परम्परा के अवतार वरिष्ठ गुरु) को कोई साधारण मनुष्य न समझ ले इसलिये व्यासजी भगवान् के ही मुख से घोषणा करवाते हैं कि -

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।4.5।।

।।4.5।। श्रीभगवान् ने कहा -- हे अर्जुन ! मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म हो चुके हैं, (परन्तु) हे परन्तप ! उन सबको मैं जानता हूँ और तुम नहीं जानते।।

हिन्दू शास्त्रों के आचार्य (आत्मा के विज्ञान को जानने वाले - जगतगुरु) सदैव शिष्यों के मन में उठने वाली सभी संभाव्य शंकाओं का निरसन करने को तत्पर रहते हैं। हम उनमें असीम घैर्य और शिष्यों की कठिनाइयों को समझने की क्षमता के साक्षात् दर्शन कर सकते हैं।

यहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाने का प्रयत्न करते हैं कि किस प्रकार वे अनन्त स्वरूप हैं और सृष्टि के प्रारम्भ में कैसे उन्होंने सूर्य देवता को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया।

अनेक विदेशियों को अवतारवाद में विश्वास अत्यन्त भ्रामक प्रतीत हो सकता है। मैक्समूलर ने तो अवतारवाद की घोर निंदा की है, लेकिन श्रीरामकृष्ण को महापुरुष अवश्य माना है, उनकी जीवनी लिखी है। 

इसी अध्याय में आगे श्रीकृष्ण बतायेंगे कि किस प्रकार वे स्वेच्छा और पूर्ण स्वातन्त्र्य से उपाधियों को धारण करके मनुष्यों के मध्य रहते हुए कार्य करते हैं जो उनकी दृष्टि से लीलामात्र है। लेकिन उन्हें कभी भी अपने दिव्य स्वरूप का विस्मरण नहीं होता

किसी एक भी प्राणी का जन्म केवल संयोग ही नहीं है। डार्विन के विकास के सिद्धान्त के अनुसार भी प्रत्येक व्यक्ति जगत में विकास की सीढी पर उन्नति करने के फलस्वरूप आया है। प्रत्येक देहधारी का जीवन उस जीव के दीर्घ आत्मचरित्र को दर्शाता है। असंख्य और विभिन्न प्रकार के शरीरों में वास करने के पश्चात् ही जीव वर्तमान विकसित स्थिति को प्राप्त करता हुआ हैप्रत्येक नवीन देह में जीव को पूर्व जन्मों का विस्मरण हो जाता है किन्तु वह पूर्व जन्मों में अर्जित वासनाओं से युक्त रहता है। 

परन्तु 'मायाधीश' भगवान् श्रीकृष्ण की स्थिति एक जीव (मायाधीन) के समान नहीं समझनी चाहिये। वे अपनी सर्वज्ञता के कारण अर्जुन के और स्वयं के अतीत को जानते हैं अतः उन्होंने  कहा मैं उन सबको जानता हूँ और तुम नहीं जानते। आपके लिये धर्म-अधर्म के अभाव में जन्म की क्या आवश्यकता है? आपका जन्म कैसे सम्भव है ?  इसका उत्तर है

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया।।4.6।।

।।4.6।। यद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप हूँ और भूतमात्र का ईश्वर हूँ (तथापि) अपनी प्रकृति को अपने अधीन रखकर (अधिष्ठाय) मैं अपनी माया से जन्म लेता हूँ।।

परमेश्वर (अवतार वरिष्ठ) अपनी निर्बाध स्वतन्त्रता और पूर्ण स्वेच्छा से एक विशिष्ट देह को धारण करके जगत् में उस काल की मोहित पीढी का मार्गदर्शन करने आते हैं। अज्ञानी के समान देहादि के बन्धन में रहना उनके लिये वास्तविकता न होकर एक नाटक की भूमिका के समान है। 

र्मत्य जीव (मायाधीन जीव) अविद्या का शिकार बनता है जबकि मायाधीश ईश्वर स्वमाया के स्वामी बने रहते हैं। कार का ड्राइवर कार से बंधा रहता है और उसका मालिक स्वतन्त्र। कार का मालिक अपने प्रयोजन के लिये कार का उपयोग करता है। और गन्तव्य स्थान पर पहुँचने पर उसे छोड़कर अपने कार्य में व्यस्त हो जाता है। परन्तु कार को सुरक्षित रखने के लिये बेचारा ड्राइवर एक सेवक के समान उस कार से बंधा रहता है। 

परन्तु जगतगुरु भगवान् श्रीरामकृष्ण स्वस्वरूप में अज और अविनाशी तथा प्राणिमात्र  के ईश्वर होते हुये भी अपनी माया को पूर्णत अपने वश में रखकर स्वेच्छा से जन्म लेते हैं। जीव के समान पूर्व कर्मों के अवश्यंभावी फलों को भोगने के लिये नहीं उन्हें न स्वस्वरूप का विस्मरण है और न माया का बन्धन है

किन्तु अज्ञानी मनुष्य अपनी उपाधियों 3H (जड़ देह-मन) और चेतन आत्मा (ह्रदय) के कार्यों के विषय में कुछ नहीं जानता और इसलिये उनकी दास बना रहता है। ईश्वर के लिये जगत् (कामिनी-कांचन और कीर्ति )कोई समस्या नहीं क्योंकि वे प्रकृति को सर्वथा अपने वश में रखते हैं। ईश्वर के पूर्ण स्वातन्त्र्य को इन दो पंक्तियों में अत्यन्त सुन्दर शैली में व्यक्त किया गया है। ईश्वर का यह जन्म कब और किसलिये होता है इस पर कहते हैं

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्।।4.7।।

।।4.7।। हे भारत ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है,  तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।।

जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्कर्ष होता है तब ईश्वर अवतार लेते हैं। मनुष्य का धर्म एक पवित्र सत्य है जिसके पालन से ही समाज धारणा सम्भव होती है। जब बहुसंख्यक लोग धर्म (नित्य-अनित्य विवेक) का पालन नहीं करते तब द्विपदपशुओं के समूह द्वारा यह जगत् जीत लिया जाता है। उस समय 'संयुक्त परिवार' या परस्पर सहयोग और आनन्द से जीवन व्यतीत करते हुये  सुखी परिवार दिखाई नहीं देते। मनुष्य को शोभा देने वाला उच्च विवेकी जीवन भी कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता। 

इतिहास के ऐसे काले युग में कोई महान् व्यक्ति [ या संगठन स्वामी -विवेकानन्द द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन / या नवनीदा द्वारा स्थापित अखिलभारत विवेकानन्द युवा महामण्डल जैसा संगठन]  समाज में आकर लोगों के जीवन और नैतिक मूल्यों का स्तर ऊँचा उठाने का प्रयत्न करता है। समाज में विद्यमान नैतिक मूल्यों को आगे बढ़ाने से ही यह कार्य सम्पादित नहीं होता वरन् साथसाथ दुष्टता का भी नाश अनिवार्य होता है अर्थात चरित्र-निर्माण कारी शिक्षा का प्रचार-प्रसार द्वारा दुष्ट प्रवृत्तियों का नाश अभिप्रेत है इस कार्य के लिये अनन्तस्वरूप परमात्मा कभीकभी देहादि उपाधियों को धारण करके पृथ्वी पर प्रगट होते हैं उस बड़ी सम्पत्ति के स्वामी के समान जो कभीकभी अपनी सम्पत्ति का निरीक्षण करने और उसे सुव्यवस्थित करने के लिये हाथ में अस्त्र आदि लेकर निकलता हैधूप में काम करते श्रमिकों के बीच वह खड़ा रहता है तथापि अपने स्वामित्व को नहीं भूलता। 

इसी प्रकार समस्त जगत् के अधिष्ठाता भगवान् शरीर धारण कर र्मत्य मानवों के अनैतिक जीवन के साथ निर्लिप्त रहते हुए उनको अधर्म से बाहर निकालकर धर्म मार्ग पर लाने के लिये सदैव प्रयत्नशील रहते हैं

भगवान् के इस अवतरण में यहाँ एक बात स्पष्ट की गई है कि यद्यपि वे शरीर धारण करते हैं तथापि अपने स्वातन्त्र्य को नहीं खोते। उपाधियों में वे रहते हैं परन्तु उपाधियों के वे दास नहीं बन जातेकिस प्रयोजन के लिये ?

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।4.8।।

।।4.8।। साधु पुरुषों के रक्षण,  दुष्कृत्य करने वालों के नाश,  तथा धर्म संस्थापना के लिये,  मैं प्रत्येक युग में प्रगट होता हूँ।।

 यह तो स्पष्ट है कि बिना किसी इच्छा अथवा प्रयोजन के ईश्वर अपने को व्यक्त नहीं करता। इच्छाओं के आत्यन्तिक अभाव का अर्थ है कर्मों का पूर्ण अभाव।

सब इच्छाओं में सर्वोत्तम दैवी इच्छा है जगत् की- (जनताजनार्दन की ?) निस्वार्थ भाव से सेवा करने की इच्छा किन्तु वह भी एक इच्छा ही है। पूर्ण परमात्मा में गोपाल कृष्ण के रूप में अवतार लेने की कारण रूप जो इच्छा है उसे यहाँ व्यास जी अपने शब्दों में वर्णन करते हैं। 

 कर्तव्य पालन करने वाले साधु पुरुषों के रक्षण का कार्य करते हुये अपनी माया का आश्रय लेकर एक और कार्य अवतारी पुरुष को करना होता है वह है दुष्टों का संहार।दुष्टों के संहार से तात्पर्य शब्दश दुष्ट व्यक्तियों के संहार से ही समझना आवश्यक नहीं है उसमें दुष्ट प्रवृत्तियों का नाश अर्थात संघबद्ध होकर मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना ही अभिप्रेत है। 

वस्त्र रखने की आलमारी रखने की पुर्नव्यवस्था करने के समान यह कार्य है। जो वस्त्र अत्यन्त निरुपयोगी हो जाते हैं उन्हें नये वस्त्रों के रखने हेतु स्थान बनाने हेतु वहाँ से हटाना ही पड़ता है। इसी प्रकार अवतारी पुरुष साधुओं का उत्साह बढ़ाते हैं दुष्टों के चरित्र (निर्माण) स्वभाव को परिवर्तित करने का प्रयत्न करते हैं और साकार / पुलिस के द्वारा कभी-कभी दुष्टों का (नक्सलाईट आदि का) पूर्ण संहार भी आवश्यक हो जाता है। 

अर्जुन के लिये इतना सब कुछ विस्तार से बताना पड़ा क्योंकि वह श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप के विषय में सर्वथा अनभिज्ञ था। श्रीकृष्ण (श्रीनवनीहरण) को एक साधारण मनुष्य (नवनीदा) और मित्र के रूप में ही समझने के कारण वह प्रथम अध्याय में इतने प्रकार के तर्क प्रस्तुत करता रहा अन्यथा उसमें इतना साहस ही नहीं होता।

 जब भगवान् उसे अपना मित्र भक्त कहते हैं तब वह शिशुओं की सी सरलता से उनसे कहता है आप मुझे सिखाइये मैं आपका शिष्य हूँ। इस वाक्य में श्रीकृष्ण के प्रति उसका आदर भाव तो स्पष्ट होता है किन्तु किसी भी प्रकार उसमें उनके ईश्वरत्व का ज्ञान होना सिद्ध नहीं होता।

भगवान् श्रीकृष्ण अपने अवतार होने की जानकारी अर्जुन को क्यों दे रहे हैं ? उत्तम रहस्य? 

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।4.9।।

।।4.9।। हे अर्जुन ! मेरा जन्म और कर्म दिव्य है,  इस प्रकार जो पुरुष तत्त्वत:  जानता है, वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को नहीं प्राप्त होता;  वह मुझे ही प्राप्त होता है।। 

 अवतार कैसे होता है तथा उसका प्रयोजन भी बताने के पश्चात् श्रीकृष्ण यहाँ कहते हैं कि उनके दिव्य जन्म और कर्म को जो पुरुष तत्त्वतः  जानता है वह सब बन्धनों से मुक्त होकर - पुनः नया शरीर धारण नहीं करता - 'ब्रह्मविद ब्रह्मैव भवति !'  परमात्मस्वरूप बन जाता है। तत्त्वत शब्द से यह स्पष्ट किया गया है कि इसे केवल बुद्धि के स्तर पर जानना नहीं है वरन् यह अनुभव करना है कि अपने ही हृदय में किस प्रकार परमात्मा का अवतरण होता है।  

[यह अनुभव गुरु-शिष्य परम्परा में गुरु-प्रदत मंत्र महावाक्य या नवनीदा द्वारा प्रदत्त आदर्श वाक्य- Be and Make ! के द्वारा अपने हृदय में कैसे मायाधीश परमात्मा और मायाधीन जीव की शुद्ध आत्मा में सच्चिदानन्द अद्वैत का अनुभव किस प्रकार होता है ? दादा ने कहा था : विवेक-दर्शन अभ्यासेन विवेक-श्रोत उदघाट्यते। 12 जनवरी, 1985 को विवेक-जागरण और 18 फरवरी , 2026 को ह्रदय में विवेक-श्रोत ठाकुर देव का अवतरण कैसे होता है , और सच्चा व्यक्तित्व जो कभी नहीं बदलता प्राप्त होता है।]

आज निसन्देह ही हम एक पशु के समान जी रहे हैं परन्तु जब कभी हम निस्वार्थ इच्छा से प्रेरित हुए कर्म - आदर्श वाक्य- Be and Make ! के द्वारा करते हैं उस समय परमात्मा की ही दिव्य क्षमता हमारे कर्मों में झलकती है। इस श्लोक में सूक्ष्म संकेत यह भी है कि आत्मविकास के लिये भगवान् के सगुण साकार आनन्दरूप (समदर्शन) की उपासना करना निराकार आत्मा के ध्यान के समान ही प्रभावकारी है। कुछ पाश्चात्य विचारक ऐसे भी हैं जो भगवान् के सगुणसाकार होने की कल्पना को स्वीकार नहीं करते। अतः  =वे अवतार को भी नहीं मानते। वास्तव में यह युक्तियुक्त नहीं है। ब्रह्मविद गुरु के मार्गदर्शन में उनके निर्देशानुसार - पूरी लगन से जो पुरुष साधना (जप-ध्यान) करता है वह सगुण अथवा निर्गुण उपासना के द्वारा लक्ष्य (ईश्वरलाभ या आत्मसाक्षात्कार या आत्मज्ञान) को प्राप्त कर लेता है।

         यहाँ उस पूर्णत्व की स्थिति का संकेत किया गया है जिसे प्राप्त करके जीव का पुनर्जन्म नहीं होता।  वैदिक साहित्य में अनेक स्थानों पर इसका संकेत अमृतत्त्व शब्द से किया गया है तो दूसरे स्थानों पर पुनर्जन्म के अभाव के रूप में। 

ऐसा प्रतीत होता है मानो पहले लोग मृत्यु शब्द से डरते थे,  इसलिये पूर्णत्व की स्थिति मे पुनर्जन्म का अभाव बताया गया है।  अन्य विचारकों ने यह अनुभव किया होगा कि मृत्यु से अधिक दुखदायी तो जन्म लेना है, क्योकि जन्म लेने के बाद ही दुखों की एक शृंखला प्रारम्भ हो जाती है। अतः मोक्ष का लक्षण पुनर्जन्म का अभाव कहा गया है। 

सिद्धान्त है जो पैदा होता है (शरीर) या जिनका जन्म होता है (नाम-रूप) उसी का नाश भी होता है। इस कारण अमृतत्त्व और पुनर्जन्म के अभाव से पूर्णत्व की स्थिति का ही संकेत किया गया है। 

यह मोक्षमार्ग केवल वर्तमान में ही प्रवृत्त नहीं हुआ बल्कि प्राचीनकाल में भी अनेक साधकों ने इसका अनुसरण किया था।  अविद्या जन्य राग भय और क्रोध से रहित मन्मय (मेरे में स्थिति वाले) मेरे शरण हुए बहुत से पुरुष ज्ञानरूप तप से पवित्र हुए मेरे स्वरूप को प्राप्त

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः

बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः।।4.10।।

।।4.10।। राग भय और क्रोध से रहित मनमय मेरे शरण हुए बहुत से पुरुष (शुद्ध बुद्धि) ज्ञान रुप तप से पवित्र‌ हुए मेरे स्वरुप को प्राप्त हुए हैं।।

[सांख्य दर्शन के अनुसार पुरुष (आत्मा) वह शाश्वत, निष्क्रिय और अपरिवर्तनीय शुद्ध चेतना है, जो केवल साक्षी (observer) भाव में रहती है। यह मन, बुद्धि और इंद्रियों से परे, निर्गुण और मुक्त तत्व है। 'शुद्ध बुद्धि' वह अवस्था है जहाँ बुद्धि सांसारिक विकारों (राग-द्वेष, अहंकार) से मुक्त होकर स्वयं को प्रकृति से भिन्न और पुरुष (चेतन) के करीब अनुभव करती है।] 

इस श्लोक में अध्यात्म साधना एवं साध्य दोनों को ही स्पष्टरूप से बताया गया है।  किसी भी साधक के लिये अविद्या जनित राग आदि पंचक्लेश (दैहिक आकर्षण /प्रेम)  और उसके कार्यों का त्याग किये बिना कोई उन्नति करना संभव नहीं।  क्योंकि वे सदैव उसके मार्ग में बाधा उत्पन्न करते रहते हैं। 

एक बार मन जब इनसे राग/प्रेम में विवेक नहीं रहने उत्पन्न विक्षेपों से रहित होकर शान्त और स्थिरचित्त हो जाता है तब पूर्णत्व की स्थिति उसके जीवन का एक मात्र लक्ष्य होती है।  जो उसे आगे बढ़ने के लिये उत्साहित करती है। आत्मविकास की इस स्थिति पर पहुँचने पर उस साधक को शास्त्राध्ययन को समझने की योग्यता प्राप्त होती है।

उपनिषदों में वर्णित आत्म-ज्ञान प्राप्ति की साधना का क्रम इस प्रकार है-

 (क) गुरु के चरणों के पास बैठकर वेदान्त (नाम-जप) का श्रवण 

  (ख) श्रवण किये हुए विषय (ब्रह्म या अवतार वरिष्ठ के सत्य नाम - जीवो ब्रह्मैव न अपरः) पर युक्ति पूर्वक मनन और 

   (ग) इस प्रकार जाने हुए आत्मतत्त्व का निदिध्यासन अर्थात् ध्यान। "यदि मैं आत्मा हूँ तो अभी मरता कौन है ?" नश्वर देह की मृत्यु का साक्षी भी 'मैं' (अविनाशी आत्मा) हूँ

व्यावहारिक  वेदान्त : महावाक्य के सिद्धान्त का अध्ययन और उस ज्ञान के अनुसार व्यावहारिक जीवन में आचरण करने को ही इस श्लोक में ज्ञानतप कहा गया।

कर्म भक्ति एवं ज्ञान इन तीनों योगों के समुच्चय का उपदेश इस श्लोक में दिया गया है। कहा गया है कि  कर्मयोग की भावना से पहले विधिवत अपने को मनुष्य बंनाने के, 3H विकास के 5 अभ्यास करने के साथ साथ दूसरों को भी (निःस्वार्थी या अकर्ता होकर Be and Make') मनुष्य बनने में सहायता किये बिना राग, भय और क्रोध (अर्थात अविद्या , अस्मिता , राग-द्वेष , अभिनिवेश , पंचक्लेश) की निवृत्ति नहीं हो सकती। मन्मया और मामुपाश्रिता अर्थात् मुझमें स्थित और मेरे शरण हुए इन शब्दों में भक्तियोग का संकेत है क्योंकि ईश्वर की शरण में गया हुआ भक्त भगवान् के साथ में एकरूप हो जाता है।

आत्मानात्मविवेक (चिज्जड़-ग्रंथि विवेक) करके बुद्धि का तादात्म्य आत्मा के साथ रखने के प्रयत्न को ज्ञानयोग कहते हैं जिसे यहाँ ज्ञानतप कहा गया है।  इन सबका निष्कर्ष यह है कि भिन्नभिन्न प्रतीत होने वाले साधना मार्गों का अनुसरण करने पर साघकगण मुझ परमात्मा को ही प्राप्त होते हैं। वास्तव में देखा जाय तो ये समस्त साधनामार्ग (4 प्रकार के योग) मन को साधन सम्पन्न बनाने के लिये ही हैं; जिसे शास्त्रीय भाषा में अन्तःकरण शुद्धि (चित्तशुद्धि या शुद्ध-बुद्धि निर्माण की प्रक्रिया) कहते हैं।  

हममें से कुछ लोगों का अपनी देह के साथ अत्यधिक तादात्म्य होता है। कुछ व्यक्ति अधिक भावुक होते हैं तो अन्य लोग बुद्धिवादी। 

हममें से (3H धारी मनुष्य में से) कुछ लोगों का अपनी देह (Hand M/F शरीर प्रधान) के साथ अत्यधिक तादात्म्य होता है। कुछ व्यक्ति अधिक बुद्धिवादी (Head-बुद्धिप्रधान) होते हैं , अन्य लोग भावुक (Heart-ह्रदय प्रधान) होते हैं।  इन सबके लिये एक ही प्रकार के साधन का उपदेश करने पर इस बात की सम्भावना रहती है कि उसे सार्वभौमिक स्वीकृति न मिले तथा सबके लिये उसकी उपयोगिता सिद्ध न हो सके। 

यह स्पष्ट है कि साधना मार्गों (4 योग) में विविधता होने पर भी, सभी साधकों का आत्मानुभव एक ही है। [आत्मानुभव स्वयं के अस्तित्व (आत्मा- सत् ,चित्, आनन्द और अद्वैत ) का सीधा और प्रत्यक्ष अनुभव, जिसे स्व अनुभूति, आत्मज्ञान या आत्मबोध भी कहा जाता है। यह आत्मा की वह विशेष अवस्था है, जहाँ 'आत्मा ' (अहं नहीं रहता) अपने निजरूप का ही अनुभव करती है।]

 ज्ञानतपसा यह विशेषण इस बातका द्योतक है कि जानना , जगना , सोना ये सब मेरा - चेतन का धर्म नहीं है , बुद्धि का धर्म है। इसलिए बुद्धि की की निष्ठा , आत्मा (चेतन) के ज्ञान में होना ही सबसे बड़ा तप है , जो अन्य तपों की अपेक्षा नहीं रखती।

AI[सांख्य दर्शन के अनुसार पुरुष (आत्मा) वह शाश्वत, निष्क्रिय और अपरिवर्तनीय शुद्ध चेतना है, जो केवल साक्षी (observer) भाव में रहती है। यह मन, बुद्धि और इंद्रियों से परे, निर्गुण और मुक्त तत्व है। 'शुद्ध बुद्धि' वह अवस्था है जहाँ बुद्धि सांसारिक विकारों (राग-द्वेष, अहंकार) से मुक्त होकर स्वयं को प्रकृति से भिन्न और पुरुष (चेतन या आत्मा) के करीब अनुभव करती है। ]

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।

मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।4.11।।

।।4.11।। जो मुझे जैसे भजते हैं,  मैं उन पर वैसे ही अनुग्रह करता हूँ;  हे पार्थ सभी मनुष्य सब प्रकार से, मेरे ही मार्ग का अनुवर्तन करते हैं।।

तब क्या आपमें भी राग-द्वेष हैं जिससे कि आप किसी-किसी व्यक्ति की बुद्धि को ही आत्मभाव में निष्ठा प्रदान करते हैं सबको नहीं करते ? इसपर भगवान कहते हैं जो भक्त जिस प्रकार से जिस प्रयोजन से जिस फलप्राप्ति की इच्छा से मुझे भजते हैं उनको मैं उसी प्रकार भजता हूँ।  अर्थात् उनकी कामना के अनुसार ही फल देकर मैं उनपर अनुग्रह करता हूँ।  क्योंकि सभी मनुष्यों में मोक्ष की इच्छा नहीं होती। (बाकी लोग कामिनी-कांचन और कीर्ति ही चाहते हैं ?) 

एक ही व्यक्ति में मुमुक्षुत्व और फलार्थित्व (फलकी इच्छा करना ) यह दोनों एक साथ नहीं हो सकते।  इसलिये जो फल की इच्छावाले हैं उन्हें फल देकर,  जो फलको न चाहते हुए शास्त्रोक्त प्रकार से कर्म करने वाले और मुमुक्षु हैं,  उनको ज्ञान देकरजो ज्ञानी संन्यासी और मुमुक्षु हैं उन्हें मोक्ष देकर , तथा आर्तोंका दुःख दूर करके , इस प्रकार जो जिस तरहसे मुझे भजते हैं उनको मैं भी वैसे ही भजता हूँ। राग-द्वेष के कारण या मोह के कारण तो मैं किसी को भी नहीं भजता। 

हे पार्थ कोई भी मनुष्य सब तरह से बर्तते हुए भी सब प्रकार से , सर्वत्र स्थित मुझ ईश्वर के ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।  जो जिस फल की इच्छा (उद्देश्य भारत का कल्याण) से जिस कर्म (उपाय Be and Make) के अधिकारी बने हुए ( उस कर्म के अनुरूप) प्रयत्न करते हैं वे ही मनुष्य कहे जाते हैं। अपने जिस उद्देश्य को पाने के लिए हम ईश्वर का आह्वान करेंगे , उसी रूप में वे हमारी इच्छा को पूर्ण करेंगे। यदि भगवान् पक्षपातादि अवगुणों से सर्वथा मुक्त हैं तो उनकी कृपा सब पर एक समान ही होगी।  फिर सामान्य मनुष्य की बुद्धि भगवान् (आत्मा ) की शरण में न जाकर, अन्य इन्द्रिय-विषयों भोगों की इच्छा करती ही क्यों हैं?  इस प्रश्न का उत्तर है

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः।

क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा।।4.12।।

।।4.12।। (सामान्य मनुष्य) यहाँ (इस लोक में) कर्मों के फल को चाहते हुये देवताओं को पूजते हैं;  क्योंकि मनुष्य लोक में कर्मों के फल शीघ्र ही प्राप्त होते हैं।।

शंकरभाष्य : 

यदि राग -द्वेष आदि दोषों का अभाव होने के कारण सभी प्राणियों पर आप आत्मा, ईश्वर , भगवान (अवतार वरिष्ठ) की दया एक समान है , एवं आप सब फल देने में समर्थ भी हैं। तो फिर सभी मनुष्य मुमुक्षु होकर यह सारा विश्व वासुदेवरूप है इस प्रकार के ज्ञान से केवल आपको ही क्यों नहीं भजते

इसका कारण सुनो।  कर्मों की सिद्धि चाहने वाले अर्थात् फलप्राप्ति की कामना करने वाले मनुष्य इस लोक में इन्द्र अग्नि आदि देवों की पूजा किया करते हैं। श्रुति में कहा है कि जो अन्य देवता की इस भाव से उपासना करता है कि वह (देवता-अवतार-वरिष्ठ परमात्मा) दूसरा है और मैं (उपासक-आत्मा ) दूसरा हूँ ; वह कुछ नहीं जानता जैसे पशु होता है वैसे ही वह भी देवताओं का पशु है।

 ऐसे उन भिन्न रूप से देवताओं का पूजन करने वाले फलेच्छुक मनुष्यों की इस मनुष्यलोक में ( कर्मसे उत्पन्न हुई ) सिद्धि शीघ्र ही हो जाती है।  क्योंकि मनुष्य लोक में शास्त्र का अधिकार है ( यह विशेषता है )। क्षिप्रं हि मानुषे लोके-  इस वाक्य में क्षिप्र विशेषण से भगवान् अन्य लोकों में भी कर्मफल की सिद्धि दिखलाते हैं। पर मनुष्यलोक में वर्णआश्रम आदि के कर्मों का अधिकार है यह विशेषता है। उन वर्णाश्रम आदि में अधिकार रखनेवालोंके कर्मोंकी कर्मजनित फलसिद्धि शीघ्र होती है।

स्वामी चिन्मयानंद द्वारा हिंदी टीका 

      सुकर्म अथवा दुष्कर्म करने के लिये (देह, इन्द्रिय , मन और) बुद्धि को आत्म चैतन्य अथवा ईश्वर (अवतार वरिष्ठ) की शक्ति की समान रूप से आवश्यकता है, और वह उपलब्ध भी है। परन्तु बुद्धि की प्रवृत्ति (चित्तवृत्ति) जन्मजन्मान्तर के अभ्यास के कारण निराकार बुद्धि की निष्ठा अपने श्रेष्ठ और परे अन्तर्निहित चेतन (आत्मा) प्रति न होकर , बहिर्मुखी आकारवान देह (M/F शरीर) में ही बनी रहती है। इसका मुख्य कारण है इन्द्रियों का विषयों के साथ सम्पर्क होने पर निम्न स्तर के सुख की संवेदनाओं में उसकी आसक्ति। इस प्रकार के सुख सरलता से प्राप्त भी हो जाते हैं। अनेक प्रयत्नों के बावजूद हम वैषयिक सुख में ही रमते हैं जिसका कारण भगवान् बताते हैं मनुष्य लोक में कर्म की सिद्धि शीघ्र ही होती है। इस जगत् में विषयोपभोग के द्वारा सुख पाना सामान्य मनुष्य के लिये सरल प्रतीत होता है। वह इन्द्रिय सुख-भोग  निकृष्ट होने पर भी बिना किसी प्रतिरोध के मिलता है।  और इस कारण सुख शान्ति की इच्छा करने भ्रमित बुद्धि/मूढ़बुद्धि / सम्मोहित बुद्धि अपनी आध्यात्मिक शक्ति को व्यर्थ ही इन वस्तुओं की प्राप्ति और भोग करने में खो देती है।  इस कथन के सत्यत्व का अनुभव हम सबको है। 

उपर्युक्त विवरण का सम्बन्ध केवल लौकिक सामान्य इन्द्रिय भोगों में ही सीमित नहीं है , वरन् हमारी अन्य उपलब्धियों (धन-सम्पत्ति, नाम-यश) से भी है।  वनस्पति एवं पशु जगत् की अपेक्षा मनुष्य देह (में विशेष योग्यता विज्ञानमयकोश) द्वारा सुनियोजित कर्मों के द्वारा प्रकृति को अपने लिये अधिक सुख प्रदान करने को बाध्य कर सकते हैं। (बाघ लड़ सकता है , परन्तु बंदूक नहीं बना सकता।) जीवन के उत्कृष्ट एवं निकृष्ट मार्गों का अनुसरण करने वाले लोगों को हम उनकी अन्तर्मुखी और बहिर्मुखी प्रवृत्तियों के आधार पर विभाजित कर सकते हैं। फिर इन बहिर्मुखी मनुष्यों का वर्गीकरण चार प्रकार से  किया जा सकता है, जिसका आधार है उन व्यक्तियों के विचार (गुण) और कर्म

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।

तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।4.13।।

।।4.13।। गुण और कर्मों के विभाग से चातुर्वण्य मेरे द्वारा रचा गया है। यद्यपि मैं उसका कर्ता हूँ, तथापि तुम मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो।।

शंकर भाष्य 

 मनुष्य योनि  में ही (विज्ञानमय कोश  होता है) इसलिए मनुष्य वर्णाश्रम धर्म आदि के कर्मोंका अधिकार है।  अन्य शरीरों  में नहीं यह नियम किस कारण से है  ? यह बतानेके लिये ( अगला श्लोक कहते हैं)।  अथवा वर्णाश्रम आदि विभाग से युक्त हुए मनुष्य सब प्रकार से मेरे मार्ग के अनुसार बर्तते हैं।  ऐसा आपने कहा सो नियमपूर्वक वे आपके ही मार्गका अनुसरण क्यों करते हैं दूसरेके मार्गका क्यों नहीं करते  ? इसपर कहते हैं ( ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र इन ) चारों वर्णोंका नाम चातुर्वर्ण्य है। सत्त्व रज तम इन तीनों गुणों के विभाग से तथा कर्मों के विभाग से यह चारों वर्ण मुझ ईश्वर द्वारा रचे हुए उत्पन्न किये हुए हैं। 

 ब्राह्मण इस पुरुष का मुख हुआ इत्यादि श्रुतियोंसे यह प्रमाणित है। उनमें से सात्त्विक सत्त्वगुण प्रधान ब्राह्मण के शम, दम, तप इत्यादि कर्म हैं। क्षत्रिय वह वर्ण है जिसमें सत्त्वगुण गौण होता है और रजोगुण प्रधान होता है, इसलिए क्षत्रिय के कर्म हैं - शूरवीरता (valor), तेज (brilliance), शासन (governance) आदि। वैश्य वह वर्ण है, जिसमें तमोगुण गौण होता है और रजोगुण प्रधान होता है। ऐसे वैश्य व्यक्ति के लिए कृषि-व्यापार आदि कर्म हैं। तथा जिसमें रजोगुण गौण और तमोगुण प्रधान है उस शूद्र का कर्म केवल सेवा करना ही है।  इस प्रकार गुण और कर्मों के विभाग से चारों वर्ण मेरे द्वारा उत्पन्न किये गये हैं यह अभिप्राय है। 

ऐसी यह चार वर्णोंकी अलग- अलग व्यवस्था दूसरे शरीरों  में नहीं है इसलिये ( पूर्वश्लोकमें ) मानुषे लोके (मनुष्य देह) यह विशेषण लगाया गया है। यदि चातुर्वर्ण्य की रचना आदि कर्म के आप कर्ता हैं तब तो उसके फल से भी आपका सम्बन्ध होता ही होगा।  इसलिये आप नित्यमुक्त और नित्य ईश्वर भी नहीं हो सकते। इस पर कहा जाता है यद्यपि मायिक व्यवहार से मैं उस कर्म का कर्ता दीखता हूँ तो भी वास्तव में मुझे तू अकर्ता ही जान तथा इसीलिये मुझे अव्यय और असंसारी ही समझ।

स्वामी चिन्मयानंद द्वारा हिंदी टीका 

   कुछ काल से इस श्लोक का अत्यन्त दुरुपयोग करके, इसे विवादास्पद विषय बना दिया गया है। वर्ण शब्द का अर्थ होता है-  रंग। योगशास्त्र में प्रकृति के तीन गुणों सत्त्व रज और तम को तीन रंगों से सूचित किया जाता है। इन तीन गुणों का अर्थ है मनुष्य के विभिन्न प्रकार के स्वभाव। सत्त्व रज और तम का संकेत क्रमशः श्वेत, रक्त और कृष्ण वर्णों से किया जाता है।

    मनुष्य का चरित्र (स्वभाव)  अपने मन में उठने वाले विचारों के अनुरूप ही होता है। दो व्यक्तियों के विचारों में कुछ साम्य होने पर भी दोनों के स्वभाव में सूक्ष्म अन्तर देखा जा सकता है।  स्वभावों की भिन्नता के आधार पर अध्यात्म की दृष्टि से मनुष्य का अध्ययन करने के लिए सभी मनुष्यों का वर्गीकरण चार भागों में किया जाता है इसको ही वर्ण कहते हैं।

 जैसे पेशा (व्यवसाय) की दृष्टि से  किसी समाज में  लोगों का वर्गीकरण - डॉक्टर, वकील, शिक्षक , व्यापारी, राजनीतिज्ञ,  ड्राइवर आदि के रूप में करते हैं , उसी प्रकार प्राचीन काल में विचारों के भेद के आधार पर  मनुष्यों को वर्गीकृत किया जाता था। किसी भी समाज के लिये डॉक्टर और ड्राइवर भो उतने ही महत्व के हैं, जितने कि वकील और इंजीनियर। 

 इसी प्रकार स्वस्थ सामाजिक जीवन के लिये भी इन चारों वर्णों अथवा जातियों को आपस में प्रतियोगी बनकर नहीं वरन् परस्पर सहयोगी बनकर रहना चाहिये। एक वर्ण दूसरे का पूरक होने के कारण आपस में द्वेषजन्य प्रतियोगिता / श्रेष्ठ-तर -तम का कोई प्रश्न ही नहीं होना चाहिये।तदोपरान्त भारत में मध्य युग की सत्ता लोलुपता के कारण साम्प्रदायिकता की भावना उभरने लगी जिसने आज अत्यन्य कुरूप और भयंकर रूप धारण कर लिया है। 

हिन्दुओं के पतनोन्मुखी काल में ब्राह्मण वर्ग को इस श्लोक की प्रथम पंक्ति का अर्ध भाग अत्यन्त अनुकूल लगा और वे इसे दोहराने लगे - 'मैंने चातुर्र्वण्य की रचना की'। इसका उदाहरण देदेकर समाज के वर्तमान दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन को दैवी प्रमाणित करने का प्रयत्न किया गया।  जिन लोगों ने ऐसे प्रयत्न किये उन्हें ही हिन्दू धर्म का विरोधी समझना चाहिये। जबकि  वेदव्यासजी ने इस श्लोक की प्रथम पंक्ति में ही इसी प्रकार के वर्गीकरण का आधार भी बताया कि गुणकर्म विभागश अर्थात् गुण और कर्मों के विभाग से चातुर्र्वण्य बनाया हुआ है।  

वर्ण शब्द की यह सम्पूर्ण परिभाषा न केवल हमारी वर्तमान विपरीत धारणा को ही दूर करती है बल्कि उसे यथार्थ रूप में समझने में भी सहायता करती है। जन्म से कोई व्यक्ति ब्राह्मण नहीं होता। शुभ संकल्पों एवं श्रेष्ठ विचारों के द्वारा ही ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया जा सकता है। केवल शरीर पर तिलक चन्दन आदि लगाने से अथवा कुछ धार्मिक विधियों के पालन मात्र से हम ब्राह्मण होने का दावा नहीं कर सकते। परिभाषा के अनुसार ब्राह्मण की बुद्धि के विचारों एवं कर्मों का सात्त्विक होना अनिवार्य है। 

रजोगुणप्रधान विचारों (बुद्धि) तथा कर्मों का व्यक्ति क्षत्रिय कहलाता है। जिसके केवल विचार (बुद्धि)  ही तामसिक नहीं बल्कि जो अत्यन्त निम्न स्तर का जीवन शारीरिक सुखों के लिए ही जीता है उस व्यक्ति/बुद्धि  को शूद्र समझना चाहिये।

 गुण और कर्म के आधार पर किये गये इस वर्गीकरण से इस परिभाषा की वैज्ञानिकता सिद्ध होती है। सत्त्व (ज्ञान) रज (क्रिया) और तम (जड़त्व) इन तीन गुणों से युक्त है जड़ प्रकृति (बुद्धि) अथवा माया (बुद्धि)  । चैतन्य स्वरूप आत्मा के इसमें व्यक्त होने पर ही सृष्टि उत्पन्न होकर उसमें ज्ञान क्रिया रूप व्यवहार सम्भव होता है। उसके बिना जगत् व्यवहार संभव ही नहीं हो सकता। 

 श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे इस चैतन्य स्वरूप के साथ तादात्म्य करके  चातुर्र्वण्यादि के कर्ता हैं क्योंकि उसके बिना जगत् का कोई अस्तित्व नहीं है और न कोई क्रिया संभव है। जैसे समुद्र तरंगों लहरों फेन आदि का कर्त्ता है अथवा स्वर्ण सब आभूषणों का कर्त्ता है वैसे ही भगवान् का कर्तृत्व भी समझना चाहिये।

इसी श्लोक में भगवान् स्वयं को पहले कर्त्ता कहते हैं परन्तु दूसरे ही क्षण कहते हैं कि वास्तव में वे अकर्त्ता हैं। क्योंकि अनन्त सर्वव्यापी चैतन्य आत्मा में किसी प्रकार की क्रिया नहीं हो सकती। देशकाल से परिच्छिन्न वस्तु (नाम-रूप) ही क्रिया कर सकती हैंआत्मस्वरूप की दृष्टि से भगवान् अकर्त्ता ही है। शास्त्रों की अध्ययन प्रणाली से अनभिज्ञ विद्यार्थियों को वेदान्त के ये परस्पर विरोधी वाक्य भ्रमित करने वाले होते हैं। परन्तु हम अपने दैनिक संभाषण में भी इस प्रकार के वाक्य बोलते हैं और फिर भी उसके तात्पर्य को समझ लेते हैं। 

जैसे हम कहते हैं कार/रेल  मे बैठकर मैं गन्तव्य तक पहुँचा। अब यह तो सपष्ट है कि बैठने से मैं अन्य स्थान पर कभी नहीं पहुँच सकता तथापि कोई अन्य व्यक्ति हमारे वाक्य की अधिक छानबीन नहीं करता। इस प्रकार के वाक्यों में कार / रेल की गति का आरोप बैठे यात्री पर किया जाता है। वह अपनी दृष्टि से तो स्थिर बैठा है परन्तु वाहन की दृष्टि से गतिमान् प्रतीत होता है।  इसी प्रकार विभिन्न स्वभावों की उत्पत्ति बुद्धि का धर्म है फिर भी उसका आरोप चैतन्य आत्मा पर करके उसे ही कर्त्ता कहते हैं किन्तु स्वस्वरूप से सर्वव्यापी अविकारी चेतन आत्मा अकर्त्ता ही है।वास्तव में मैं अकर्त्ता हूँ इसलिये

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।

इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।।4.14।।

।।4.14।। कर्म मुझे लिप्त नहीं करते;  न मुझे कर्मफल में स्पृहा है। इस प्रकार मुझे जो जानता है, वह भी कर्मों से नहीं बन्धता है।।

 जिन संसारी मनुष्यों का कर्मों में मैं कर्ता हूँ ऐसा अभिमान रहता है एवं जिनकी उन कर्मों में और उनके फलों में लालसा रहती है , उनको कर्म लिप्त करते हैं।  परंतु उन दोनों का अभाव होने के कारण वे ( कर्म ) मुझे लिप्त नहीं कर सकते।  इस प्रकार जो कोई दूसरा भी मुझे आत्म -रूप से जान लेता है कि मैं कर्मों का कर्ता नहीं हूँ मेरी कर्मफल में स्पृहा भी नहीं है , वह भी कर्मों से नहीं बँधता अर्थात् उसके भी कर्म देहादि के उत्पादक नहीं होते।

नित्य शुद्ध और परिपूर्ण चेतन आत्मा को किसी प्रकार की अपूर्णता का भान नहीं हो सकता जो किसी इच्छा को जन्म दे।  इच्छा अथवा कर्म का बन्धन जीव-अहंकार (मैं देह हूँ M/F)  के लिये ही हो सकता है। जड़ और नश्वर देह, इन्द्रिय , मन और बुद्धि की उपाधियों से युक्त अविनाशी चैतन्य आत्मा (चिज्जड़ ग्रंथि)  ही जीवभाव (या M/F शरीर) कहा जाता है। इन उपाधियों के दोषयुक्त होने पर जीव ही दूषित हुआ समझा जाता है। इसे एक दृष्टान्त के द्वारा हम भली भांति समझ सकेंगे। (जैसे चाँद कुआँ में गिर गया -है और उसको बाल्टी से निकालना है।)  

यदि किसी पात्र में रखे जल में सूर्य/ या चंद्र  होता है तो उस प्रतिबिम्ब की स्थिति पूर्णतया उस जल की स्थिति पर निर्भर करती है। जल के शान्त अस्थिर अथवा मैले होने पर वह प्रतिबिम्ब भी स्थिर क्षुब्ध अथवा धुंधला दिखाई देगा। परन्तु महाकाश स्थित वास्तविक सूर्य / चंद्र पर इस चंचलता अथवा निश्चलता का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसी प्रकार इन्द्रिय -विषयों की इच्छा, आसक्ति आदि का प्रभाव अहंकार पर ही पड़ता हैनित्य मुक्त चैतन्य स्वरूप आत्मा इन सबसे किसी प्रकार भी दूषित नहीं होती। आत्मविकास की वैदिक साधना का यह अर्थ नवीन प्रतीत होता है। क्या इसके पूर्व किसी ने इसका आचरण किया था उत्तर है- 

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः

कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्।।4.15।।

।।4.15।। पूर्व के मुमुक्ष पुरुषों द्वारा भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किया गया है;  इसलिये तुम भी पूर्वजों द्वारा सदा से किये हुए कर्मों को ही करो।।

मैं न तो कर्मों का कर्ता ही हूँ और न मुझे कर्मफल की चाहना ही है ऐसा समझकर ही पूर्वकाल के मुमुक्षु पुरुषों ने भी कर्म किये थे। इसलिये तू भी कर्म ही कर। तेरे लिये चुपचाप बैठ रहना या संन्यास लेना यह दोनों ही कर्तव्य नहीं है। क्योंकि पूर्वजों ने भी कर्म का आचरण किया है इसलिये यदि तू आत्मज्ञानी नहीं है लेकिन मुमुक्षु है , तब तो अन्तःकरण की शुद्धि (चित्त-शुद्धि) या बुद्धिवृत्ति को निरंतर आत्मोन्मुखी रखने के लिए निष्काम कर्मकर करो । और यदि तत्त्वज्ञानी है तो लोकसंग्रह के लिये जनकादि पूर्वजों द्वारा सदा से किये हुए (प्रकारसे ही निष्काम होकर ) कर्म कर नये ढंगसे किये जानेवाले कर्म मत कर।

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।

तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।4.16।।

।।4.16।। कर्म क्या है और अकर्म क्या है? इस विषय में बुद्धिमान पुरुष भी भ्रमित हो जाते हैं। इसलिये मैं तुम्हें कर्म कहूँगा,  (अर्थात् कर्म और अकर्म का स्वरूप समझाऊँगा) जिसको जानकर तुम अशुभ (संसार बन्धन) से मुक्त हो जाओगे।।

कर्म क्या है और अकर्म क्या है इस कर्मादि के विषय में बड़ेबड़े बुद्धिमान् भी मोहित हो चुके हैं इसलिये मैं तुझे वह कर्म और अकर्म बतलाऊँगा जिस कर्मादि को जानकर तू अशुभ से यानी संसार से (देहाध्यास से-जीवभाव से?) मुक्त हो जायगा

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।

अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।।4.17।।

।।4.17।। कर्म का (स्वरूप) जानना चाहिये और विकर्म का (स्वरूप) भी जानना चाहिये ; (बोद्धव्यम्) तथा अकर्म का भी (स्वरूप) जानना चाहिये (क्योंकि) कर्म की गति गहन है।।

तुझे यह नहीं समझना चाहिये कि केवल देहादिकी चेष्टाका नाम कर्म है और उसे न करके चुपचाप बैठ रहनेका नाम अकर्म है उसमें जाननेकी बात ही क्या है यह तो लोकमें प्रसिद्ध ही है। क्यों ( ऐसा नहीं समझना चाहिये ) इस पर कहते हैं कर्म का शास्त्रविहित क्रिया का भी ( रहस्य ) जानना चाहिये, विकर्म का अर्थात शास्त्र-वर्जित कर्म का भी ( रहस्य ) जानना चाहिये और अकर्मका अर्थात् चुपचाप बैठ रहनेका भी ( रहस्य) समझना चाहिये। क्योंकि कर्मों की अर्थात् कर्म अकर्म और विकर्म की गति उनका यथार्थ स्वरूप तत्त्व बड़ा गहन है समझने में बड़ा ही कठिन है।

जीवन क्रियाशील है।  क्रियाशील जीवन में ही हम उत्थान और पतन को प्राप्त हो सकते हैं। क्रिया की समाप्ति ही मृत्यु का आगमन है। एक स्थान पर स्थिर जल सड़ता और दुर्गन्ध फैलाता है जबकि सरिता का प्रवाहित जल सदा स्वच्छ और शुद्ध बना रहता है। जीवन शक्ति की उपस्थिति में कर्मो का आत्यन्तिक अभाव नहीं हो सकता। 

निष्क्रियता से उन्नति और अधोगति दोनों ही सम्भव नहीं। चूँकि मनुष्य को जीवनपर्यन्त क्रियाशील रहना आवश्यक है,  इसलिये प्राचीन मनीषियों ने जीवन के सभी सम्भाव्य कर्मों का अध्ययन किया क्योंकि वे जीवन का मूल्यांकन उसके पूर्णरूप में करना चाहते थे। 

कर्म के क्षण ही मनुष्य का निर्माण (चरित्र-निर्माण) करते हैं। यह निर्माण इस बात पर निर्भर करता है कि हम किस प्रकार के कर्मों को अपने हाथों में लेकर करते हैं। प्राचीन ऋषियों के अनुसार कर्म दो प्रकार के होते हैं निर्माणकारी (शास्त्र सम्मत कर्तव्य) और विनाशकारी (शास्त्र निषिद्ध कर्म)। जिन कर्मों से मनुष्य अपने मनुष्यत्व से नीचे गिर जाता है, (अविवेकी स्वार्थी पशु हो जाता है)  उन कर्मों को यहाँ विकर्म कहा है,  जिन्हें शास्त्रों ने निषिद्ध कर्म का नाम दिया है। आत्मविकास के लिये विकर्म का सर्वथा त्याग और कर्तव्य का सभी परिस्थितियों में पालन करना चाहिये। 

कर्तव्य कर्मों का फिर तीन प्रकार से वर्गीकरण किया गया है और वे हैं नित्य, नैमित्तिक और काम्य। जिन कर्मों को प्रतिदिन करना आवश्यक है वे नित्य कर्म तथा किसी कारण विशेष से करणीय कर्मों को नैमित्तिक कर्म कहा जाता है। इन दो प्रकार के कर्मों को करना अनिवार्य है। किसी फल विशेष को पाने के लिए उचित साधन का उपयोग कर जो कर्म किया जाता है उसे काम्य कर्म कहते हैं जैसे पुत्र या स्वर्ग पाने के लिये किया गया कर्म यह सबके लिये अनिवार्य नहीं होता। 

यह आवश्यक है कि अपने भौतिक अभ्युदय तथा आध्यात्मिक उन्नति के इच्छुक साधक कर्मों के इस वर्गीकरण को भली प्रकार समझें। भगवान् श्रीकृष्ण इस बात को स्वीकार करते हैं कि कर्मों के इस विश्लेषण के बाद भी सामान्य मनुष्य को कर्म-अकर्म का विवेक करना सहज नहीं होता क्योंकि कर्म की गति गहन है

उपर्युक्त कथन से यह स्पष्ट होता है कि कर्म का मूल्यांकन केवल उसके वाह्य स्वरूप को देखकर नहीं बल्कि उसके उद्देश्य को भी ध्यान में रखते हुये करना चाहिये। उद्देश्य की श्रेष्ठता एवं शुचिता से उस व्यक्ति विशेष के कर्म श्रेष्ठ एवं पवित्र होंगे। कर्म और अकर्म के विषय में और विशेष क्या जानना है इस पर कहते हैं

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।

स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्।।4.18।।

।।4.18।। जो पुरुष कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है,  वह मनुष्यों में बुद्धिमान है,  वह योगी सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है।।

सच्चे साधकों के मन में एक प्रश्न उठता है कि उन्हें कैसे ज्ञात हो कि उन्होंने पूर्णत्व की स्थिति प्राप्त कर ली है ? इस श्लोक में श्रीकृष्ण उस स्थिति का वर्णन कर रहे हैं। शारीरिक कर्म बुद्धि में स्थित किसी ज्ञात अथवा अज्ञात इच्छा की केवल स्थूल अभिव्यक्ति है। 

पूर्ण नैर्ष्कम्य की स्थिति का अर्थ निष्कामत्व की स्थिति होनी चाहिए इसे ही पूर्ण ईश्वरत्व (आत्मस्थ) की स्थिति कहते हैं। विवेकी पुरुष (ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या , जीवो ब्रह्मैव न अपरः का अनुभवी) सहजता से अवलोकन कर सकता है कि शरीर से अकर्म होने पर भी उसके मन और बुद्धि पूर्ण वेग से कार्य कर रहे होते हैं। 

वह यह भी अनुभव करता है कि शरीर द्वारा निरन्तर कर्म करते रहने पर भी वह शान्त और स्थिर रहकर केवल द्रष्टाभाव से उन्हें स्वयं अकर्म में रहते हुए देख सकता है यह अकर्म सात्त्विक गुण की चरम् सीमा है। ऐसा व्यक्ति समत्व की महान् स्थिति को प्राप्त हुआ समझना चाहिये जो ध्यानाभ्यास की सफलता के लिए अनिवार्य है। 

जैसा कि अनेक लोगों का विश्वास है कि कर्तव्य कर्म ही हमें पूर्णत्व की प्राप्ति करा देंगे ऐसा यहाँ नहीं कहा गया है। यह सर्वथा असंभव है। इस प्रकार कर्मों के द्वारा प्राप्त किया ईश्वरत्व रविवासरीय ईश्वरत्व होगा जो आगामी सोमवार को हम से विलग हो जायेगा। कर्तव्य पालन से हुए 'शुद्धबुद्धि' आत्मनिष्ठ बुद्धि, निरंतर आत्मनोमुखी बुद्धि में वह सार्मथ्य आ जाती है कि वह स्वयं के मन में तथा बाहर होने वाली क्रियाओं को साक्षी भाव से देख सकती है। 

जब बुद्धि यह जान लेती है कि उसके कर्म विश्व में हो रहे कर्मों के ही भाग हैं तब उसे एक अनिर्वचनीय समता का भाव प्राप्त हो जाता है जो ध्यान के अभ्यास के लिए आवश्यक है।

एक विवेकी बुद्धि (अर्थात वैराग्य संपन्न मुमुक्षु बुद्धि) जब जगत् में क्रियाशील रहती है उस समय मानो वह शुद्ध बुद्धि अपने आपको सब उपाधियों से अलग करके साक्षीभाव से स्वयं अकर्म में रहते हुए सब कर्मों को होते हुए देख सकती है। जब मैं इन शब्दों को लिख रहा हूँ तब मेरी आत्मनोमुखी बुद्धि मानों द्रष्टाभाव से देख सकती है कि हाथ में पकड़ी हुई लेखनी कागज पर शब्दों को लिख रही है। इसी प्रकार साक्षी बुद्धि (चेतन आत्मा से प्रकाशित बुद्धि)  के द्वारा सभी कर्मों में स्वयं अकर्म में रहते हुए कर्मों को देखने की क्षमता दुर्लभ नहीं है।

 पंखा घूमता है विद्युत नहीं। इसी प्रकार ईंधन जलता है अग्नि नहींशरीर मन और बुद्धि कार्य करते है परन्तु चैतन्य आत्मा नहीं। इस प्रकार कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखने वाले पुरुष को सब मनुष्यों में बुद्धिमान कहा जाता है। उसे यहाँ आत्मानुभवी नहीं कहा गया है। निसन्देह वह आत्मोन्मुखी बुद्धि, मूढ़बुद्धि से श्रेष्ठ है और आत्मप्राप्ति के अत्यन्त समीपस्थ है

संक्षेप में निष्कर्ष यह है कि निस्वार्थ भाव तथा अर्पण की भावना से कर्माचरण करने पर चित्त शुद्ध होता है और साक्षी बुद्धि में कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखने की क्षमता आती है।  विवेकी बुद्धि (wisdom) की यह क्षमता दैवी (transcendent)  और श्रेष्ठ है क्योंकि इसके द्वारा ही हम अपने आप को सांसारिक बन्धनों (नश्वर शरीर समझने) से मुक्त कर सकते हैं। उपर्युक्त ज्ञान की प्रशंसा अगले श्लोकों में की गयी है

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः।

ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।।4.19।।

।।4.19।। जिसके समस्त कार्य कामना और संकल्प से रहित हैं,  ऐसे उस ज्ञानरूप अग्नि के द्वारा भस्म हुये कर्मों वाली बुद्धि को ज्ञानीजन पण्डित कहते हैं।।

जिस पुरुष के सभी कर्म कामना और फलों के संकल्प (आसक्ति) से रहित होते हैं वह पुरुष सन्त या आत्मानुभवी कहलाता है। 

भविष्य में विषयोपभोग के द्वारा सुख पाने की बुद्धि की योजना को कामना कहते  हैं। यह योजना बनाना स्वयं की स्वतन्त्रता को सीमित (देहाध्यास जीव M/F) करना ही है। कामना करने का अर्थ है कि परिस्थितियों को (जाग्रत के स्वप्न को) अपने अनुकूल होने का आग्रह करना है । इस प्रकार प्राप्त परिस्थितियों से सदा असन्तुष्ट रहते हुये भविष्य में उन्हें अनुकूल बनाने के प्रयत्न में हम अपनी बुद्धि को भ्रमित करके (मूढ़बुद्धि के कारण) अनेक विघ्नों का सामना करते रहते हैं। योजना बना कर कार्य करने वाली बुद्धि हमें आनंद और ईश्वरीय प्रेरणा से वंचित कर देती है। किसी दिव्य और श्रेष्ठ लक्ष्य (ईश्वरलाभ -आत्मज्ञान) के अभाव के कारण ही हमारा मन अनेक चिन्ताओं से ग्रस्त रहता है। ज्ञानी पुरुष की बुद्धि दिव्य चैतन्यस्वरूप में स्थित रहने के कारण जगत् में सब प्रकार के कर्म करते हुए भी वह आनन्द का ही अनुभव करता है। 

उपर्युक्त लक्षणों से युक्त ज्ञानी पुरुष समाज के लिए निःस्वार्थ कर्म करता हुआ भी वास्तव में कुछ कर्म नहीं करता है। उसके कर्म अकर्म तुल्य ही हैं क्योंकि ज्ञानाग्नि से उसके कर्म (अर्थात् बन्धन के कारणभूत अहंकार या देहाभिमान M/F देहाध्यास और स्वार्थ) भस्म हो चुके होते हैं यह सात्त्विक स्थिति की चरम सीमा है। भगवान् कहते हैं

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।

कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः।।4.20।।

।।4.20।। जो पुरुष,  कर्मफलासक्ति को त्यागकर,  नित्यतृप्त और सब आश्रयों से रहित है वह कर्म में प्रवृत्त होते हुए भी (वास्तव में) कुछ भी नहीं करता है।।

यहाँ हमें न कर्मफल त्यागने को कहा गया है और न ही उसकी उपेक्षा करने को किन्तु फल के साथ हमारी बुद्धि की दासता तथा आसक्ति का त्याग करने को कहा गया है।

आत्मस्वरूप में स्थित दैवी आनन्द की अनुभूति में रमे हुए नामरूपमय जगत् में काम करते हुए ज्ञानी पुरुष के आनन्द का क्या मापदण्ड हो सकता है वास्तव में अनन्त तत्त्व को आत्मरूप से अनुभव किया हुआ पुरुष बाह्य आश्रयों से सर्वथा मुक्त हो जाता है। फलासक्ति,  असन्तोष तथा बाह्य वस्तुओं पर आश्रय ये सब अविद्याजनित जीव के लिए ही होते हैं। यह जीव (M/F देहाभिमानी) ही इन सबसे पीड़ित होता है। 

जब 'सत्य का साधक' -सत्यार्थी  यह पहचान लेता है कि इस जीव का वास्तविक स्वरूप अनन्त और परिपूर्ण है,  तब यह जीवभाव (अहंकार M/F देहाभिमान ) नष्ट हो जाता है और स्वभावतः उसके सब दुखो का अन्त होना अवश्यंभावी है।  ऐसा आत्मज्ञानी पुरुष कर्म में प्रर्वत्त हुआ भी किञ्चिन्मात्र कर्म नहीं करता है। शरीर मन और बुद्धि बाह्य जगत् में कार्य करते रहते हैं किन्तु सर्वव्यापी/सर्वगत चेतन आत्मा नहीं।  इस चैतन्य आत्मा के बिना बुद्धि कार्य नहीं कर सकती , परन्तु उसकी क्रिया का आरोप चेतन आत्मा पर नहीं किया जा सकता है।  अतः आत्मस्वरूप में स्थित पुरुष कार्य करते हुए भी कर्त्ता नहीं कहा जा सकता।

वेदान्त के शिक्षार्थी के मन में यह शंका उठती है कि आत्मानुभव होने पर ज्ञानी के पूर्वार्जित सभी कर्म नष्ट हो सकते हैं।  परन्तु तत्पश्चात् पुन जगत् में कर्म करने से हो सकता है कि वह नये पाप-पुण्यरूप कर्म करें जिसका फल भोगने हेतु उसे नए जन्मों को भी लेना पड़े। 

इस श्लोक में उपर्युक्त शंका को निर्मूल कर दिया गया है। यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि ज्ञानी पुरुष कर्म करने पर भी किञ्चित कर्म नहीं करता है तब फिर उसे बन्धन कैसे होगा?  प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। सन्त पुरुष के शारीरिक कर्मों का भी कुछ तो फल होना ही चाहिये। यह सामान्य युक्तिवाद है जिसका खण्डन करते हुये भगवान् कहते हैं

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।

शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।4.21।।

।।4.21।। जो आशा रहित है तथा जिसने चित्त और आत्मा (शरीर) को संयमित किया है,  जिसने सब परिग्रहों का त्याग किया है,  ऐसा पुरुष शारीरिक कर्म करते हुए भी पाप को नहीं प्राप्त होता है।।

केवल शरीर द्वारा कर्म किए जाने से वासना  के रूप में प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं हो सकती। वासनायें (3K की कामनायें) अन्तःकरण में उत्पन्न होती हैं और उनकी उत्पत्ति का कारण कर्तृत्वाभिमान के साथ किए कर्म हैं। स्वार्थ के प्रबल होने पर ही ये वासनाएँ बन्धनकारक बनती हैं। 

आत्मा (चेतन) के साथ जड़ शरीर, इन्द्रिय , मन और बुद्धि इन अविद्याजनित उपाधियों के मिथ्या तादात्म्य से अहंकार उत्पन्न होता है। इस अहंकार की प्रतिष्ठा भविष्य की आशाओं तथा वर्तमान में प्राप्त विषयोपभोगजनित सन्तोष में है। 

इसलिए इस श्लोक में कहा गया है कि जो व्यक्ति (क) आशारहित है (ख) जिसने शरीर और मन को संयमित किया है (ग) जो सब परिग्रहों (possessions, धन-सम्पत्ति FD/ जमीन ,  जायदाद) से मुक्त है उस व्यक्ति में इस मिथ्या अहंकार का कोई अस्तित्व शेष नहीं रह सकता। अहंकार के नष्ट होने पर (या दास मैं बन जाने पर ) केवल शरीर द्वारा किये गये कर्मों में यह सार्मथ्य नहीं होती कि वे अंतकरण में नये संस्कारों को उत्पन्न कर सकें। 

निद्रावस्था में किसी व्यक्ति के विवस्त्र हो जाने पर किसी प्रकार के अशोभनीय व्यवहार का आरोप नहीं किया जा सकता। क्योंकि उस समय शरीर में 'मैं' नहीं था। इसलिए उस समय व्यक्ति में कर्तृत्त्व का अभिमान भी नहीं था। अत स्पष्ट है कि सभी प्रकार के दुख कष्ट बन्धन आदि केवल कर्तृत्वाभिमानी/ देहाभिमानी  जीव (M/F मूढ़बुद्धि)  को ही होते हैं और उसके अभाव में अर्थात  शुद्धबुद्धि या आत्मोन्मुखी बुद्धि से किये हुए शारीरिक कर्मों में मनुष्य को बांधने की क्षमता नहीं होती है।  

ऐसी सर्वगत चैतन्यनिष्ठ बुद्धि में कर्मों की कर्ता होने का अहंकार नहीं होता, क्योंकि आत्मनिष्ठ   बुद्धि किसी को अपने से अलग नहीं देखती इसलिए, देह, मन, आदि उपाधि को ईश्वर की इच्छा (सर्वे भवन्तु सुखिनः) को व्यक्त करने का सर्वोत्तम माध्यम समझती है। अहंकार से रहित (सकली तोमार इच्छा-सर्वव्यापी चैतन्यनिष्ठ बुद्धि) आत्मज्ञानी बुद्धि वह श्रेष्ठतम माध्यम है जिसके द्वारा ईश्वर की इच्छा पूर्णरूप से प्रगट होती है। ऐसे पुरुष के कर्म उसके लिए पाप और पुण्य रूप बन्धन नहीं उत्पन्न कर सकते वह तो केवल माध्यम है। ज्ञानयोग में स्थित शरीर धारण के लिये आवश्यक कर्म करता हुआ पुरुष (शुद्ध बुद्धि) नित्य मुक्त ही है। भगवान् कहते हैं

यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।

समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते।।4.22।।

।।4.22।। यदृच्छया (अपने आप) जो कुछ प्राप्त हो उसमें ही सन्तुष्ट रहने वाला,  द्वन्द्वों से अतीत तथा मत्सर से रहित,  सिद्धि व असिद्धि में समभाव वाला पुरुष कर्म करके भी नहीं बन्धता है।।

 अहंकार (देहाभिमान-) से परे आत्मस्वरूप (सर्वगत चैतन्य) में स्थित पुरुष (शुद्धबुद्धि) इच्छा तथा फलासक्ति से प्रेरित होकर कर्म नहीं करती । कर्मों को करने से प्राप्त फल से ही वह सन्तुष्ट रहती है।

'अहंकाररहित अवस्था'  का अर्थ है निराकार बुद्धि का अपने से परे और श्रेष्ठ आत्मा (सर्वगत चैतन्य)  में प्रतिष्ठित हो जाने के कारण आकारवान देह-इन्द्रिय  पर पूर्ण संयम। स्वभाविक ही शीत-उष्ण, सिद्धि-असिद्धि,  सुख- दुख इत्यादि द्वन्द्वात्मक अनुभव उसे व्यथित नहीं कर सकते क्योंकि वे सब मन की बाह्यजगत् के साथ होने वाली प्रतिक्रियायें मात्र हैं। 

सामान्यतः सिद्धि में हमें हर्षातिरेक और असिद्धि में अत्यन्त विषाद होता है। परन्तु जब अविद्या-जनित अहंकार (मूढ़बुद्धि) पूर्णरूप से दैवी स्वरूप (शुद्ध बुद्धि) को प्राप्त हो जाता है तब वह पुरुष सफलता और असफलता में समान भाव से स्थित रहता है। ऐसा ज्ञानी पुरुष कर्म करके भी कर्मफलों से नहीं बंधता।

जब आत्मज्ञानी पुरुष हमारे मध्य रहता हुआ कर्म करता है तब उसका व्यवहार सामान्य जनों के समान ही प्रतीत होता है।  तथापि उसके कर्मों में एक विशेष शक्ति और प्रभाव दिखाई पड़ता है जो उसे कर्मक्षेत्र में सामान्य से कहीं अधिक सफलता प्रदान करता है।  श्रीकृष्ण के कथनानुसार ऐसे पुरुष को कर्मों का बंधन नहीं होता। सामान्य जनों को ज्ञानी पुरुष की इस उपलब्धि को समझने में कठिनाई होती है।

 जिस दैवी प्रेरणा एवं भावना से ज्ञानी पुरुष जगत् में कर्म करता है उसका वर्णन भगवान् अगले श्लोकों में करते हैं

गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः

यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते।।4.23।।

।।4.23।। जो आसक्तिरहित और मुक्त है,  जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है,  यज्ञ के लिये आचरण करने वाले ऐसे पुरुष के समस्त कर्म लीन हो जाते हैं।।

अनेक प्रकार के बन्धनों का कारण है विषयों के साथ हमारी मूढ़बुद्धि की आसक्ति। विषयोपभोग में ही यह देहाभिमानी जीव (M/F शरीर से मोहित बुद्धि /मूढ़बुद्धि )  सुखसन्तोष का अनुभव करती है। यही कारण है कि वह उसमें आसक्त हो जाती है। इस प्रकार शरीर मन और मूढ़बुद्धि की धोखेबाजी (गद्दारी) दृष्टि से चैतन्यात्मा की उन्मुख शुद्ध बुद्धि क्रमश बाह्य विषयों भावनाओं एवं विचारों के साथ (चिज्जड़ग्रंथि के साथ) बंध जाती है।  ज्ञानी पुरुष इन सबसे मुक्त होता है।

ज्ञानावस्थितचेतस विवेक की परिभाषा है "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।" नित्यानित्यवस्तु के विवेक के द्वारा - अपने नित्य स्वरूप को पहचान कर उसमें प्राप्त की हुई स्थिति के द्वारा ही विषयासक्ति के बंधन से मुक्ति हो सकती है

विवेकजनित विज्ञान (चार महावाक्य) के प्रकाश में अविद्या से उत्पन्न इन्द्रिय विषय -भोग में आसक्ति के नष्ट होने पर वह पूर्णत्व प्राप्त पुरुष (शुद्ध बुद्धि) वैषयिक प्रवृत्ति और अनैतिकता की बंधनों से मुक्त हो जाती है। ऐसा पुरुष (ऐसी शुद्धबुद्धि) यज्ञ की अर्थात् निस्वार्थ सेवा और अर्पण की भावना से जीवन पर्यन्त कर्म  करती रहती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यज्ञ के लिये कर्म करने वाले पुरुष के सब कर्म लीन हो जाते हैं। अर्थात् वे नई वासनाएँ नहीं उत्पन्न करते। 

वेदों में प्रयुक्त यज्ञ शब्द को लेकर भगवान् श्रीकृष्ण ने यहाँ उसके अर्थ को और अधिक व्यापक रूप दिया है जिससे सम्पूर्ण विश्व में उसकी उपादेयता सिद्ध हो सके। केवल यज्ञयागादि ही नहीं बल्कि वे सब कर्म जो अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित न होकर सेवाभाव पूर्वक किये गये हों -(Be and Make का प्रचार -प्रसार) यज्ञ कर्म में ही समाविष्ट हैं। आगे के 6 श्लोकों में लगभग 12 प्रकार के यज्ञों का वर्णन किया गया है जिसका आचरण प्रत्येक व्यक्ति सर्वत्र सभी परिस्थितियों में और अपने कार्यक्षेत्र में कर सकता है। 

क्या कारण है कि ज्ञानी पुरुष के कर्म प्रतिक्रया उत्पन्न किये बिना लीन हो जाते हैं इसका कारण बताते हुए कहते हैं- 

ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।

ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना।।4.24।।

।।4.24।। अर्पण (अर्थात् अर्पण करने का साधन श्रुवा) ब्रह्म है और हवि (शाकल्य अथवा हवन करने योग्य द्रव्य) भी ब्रह्म है;  ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा जो हवन किया गया है,  वह भी ब्रह्म ही है। इस प्रकार ब्रह्मरूप कर्म में समाधिस्थ पुरुष (शुद्धबुद्धि) का गन्तव्य भी ब्रह्म (आत्मा)  ही है।।

इस श्लोक में वैदिक यज्ञ का रूपक है। प्रत्येक यज्ञ में चार प्रमुख आवश्यक वस्तुएं होती हैं (1) यज्ञ का देवता जिसे आहुति दी जाती है (2) अग्नि (3) हवन के योग्य द्रव्य पदार्थ हवि (शाकल्य) और (4) यज्ञकर्ता व्यक्ति। 

इसमें सम्पूर्ण वेदान्त के सार को बता दिया गया है। वह अनन्त पारमार्थिक सत्य जो इस दृश्यमान नित्य परिवर्तनशील जगत् का अधिष्ठान है वेदान्त में ब्रह्म शब्द के द्वारा निर्देशित किया जाता है। यही ब्रह्म एक शरीर से परिच्छिन्न सा हुआ आत्मा कहलाता है। एक ही तत्त्व इन दो शब्दों से लक्षित किया है और वेदान्त केसरी की यह गर्जना है कि आत्मा ही ब्रह्म है। ("प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है। अपने ब्रह्मस्वरूप को व्यक्त करना ही मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य है। " -स्वामी विवेकानन्द)  

इस श्लोक में यज्ञ भावना से कर्म करते हुए ज्ञानी पुरुष की मन की स्थिति एवं अनुभूति का वर्णन  किया गया है। उसके अनुभव की दृष्टि से एक मात्र पारमार्थिक सत्य (transcendental truth) ही विद्यमान है न कि अविद्या (अस्मिता , राग -द्वेष) से उत्पन्न नाम-रूपमय यह जगत्। अतः वह जानता है कि सभी यज्ञों की उत्पत्ति ब्रह्म (आत्मा) से ही होती है जिनमें देवता अग्नि हवि और यज्ञकर्ता सभी ब्रह्म हैं।

 जब एक तरंग दूसरी तरंग पर से उछलती हुई अन्य साथी तरंग से मिल जाती है तब इस दृश्य को देखते हुए हम जानते हैं कि ये सब तरंगे समुद्र के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। समुद्र में ही समुद्र का खेल चल रहा है। यदि कोई व्यक्ति जगत् के असंख्य नामरूपों कर्मों और व्यवहारों में अंतर्बाह्य व्याप्त अधिष्ठान स्वरूप परमार्थ तत्त्व को देख सकता है तो फिर उसे सर्वत्र सभी परिस्थितियों में वस्तुओं और प्राणियों का दर्शन अनन्त आनन्द स्वरूप सत्य (सच्चिदानन्द-सर्वगत चैतन्य ) का ही स्मरण कराता है।  संत पुरुष ब्रह्म का ही आह्वान करके प्रत्येक कर्म करता है इसलिये उसके सब कर्म लीन हो जाते हैं।

 भोजन के पूर्व इस श्लोक के पाठ का प्रयोजन अब स्वत स्पष्ट हो जाता है। शरीर धारण के लिये भोजन आवश्यक है और तीव्र क्षुधा लगने पर किसी भी प्रकार का अन्न स्वादिष्ट लगता है। इस प्रार्थना का भाव यह है कि भोजन के समय भी हमें सत्य का विस्मरण नहीं होना चाहिए। यह ध्यान रहे कि भोक्तारूप ब्रह्म, ब्रह्म का आह्वान करके अन्नरूप ब्रह्म की आहुति उदर में स्थित अग्निरूप ब्रह्म को ही दे रहा है। इस ज्ञान का निरन्तर स्मरण रहने पर शुद्धबुद्धि भोगों से ऊपर उठकर अपने अनन्तस्वरूप को प्राप्त कर लेती है।

यज्ञ की सर्वोच्च भावना को स्पष्ट करने के पश्चात् भगवान् अर्जुन को समझाते हैं कि सम्यक् भावना के होने से किस प्रकार प्रत्येक कर्म यज्ञ बन जाता है

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।

ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति।।4.25।।

।।4.25।। कोई योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ को ही करते हैं ; और दूसरे (ज्ञानीजन) ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ के द्वारा यज्ञ को हवन करते हैं।।

जगत् में कार्य करते हुए ज्ञानी पुरुष के हृदय के भाव को ही कुछ श्लोकों में बताया गया है। साधक के मन में एक शंका सदैव उठती है कि ध्यानावस्था में बुद्धि से भी परे अर्थात् उसकी द्रष्टा आत्मा का साक्षात् अनुभव होता है परन्तु कुछ काल के लिये ही। 

गौतम बुद्ध जैसे कुछ महापुरुषों को हम कार्य में अत्याधिक व्यस्त देखते हैं।  जबकि कोई महात्मा एक स्थान पर ही रहकर अपने सीमित क्षेत्र में कार्य करते देखे जाते हैं जैसे भगवान् रमण महर्षि। कुछ अन्य सन्त सामान्य जीवन ही व्यतीत करते हैं। 

जो पुरुष सभी उपलब्ध साधनों के उपयोग से अपने आपको शारीरिक मानसिक एवं बौद्धिक अपूर्णताओं दुर्बलताओं से ऊँचा उठाने का सतत् प्रयत्न करता है वह योगी कहलाता है। इस दृष्टि से इस श्लोक के केवल सामान्य अर्थ को ही ग्रहण करना उचित नहीं होगा।

जो प्रकाशरूप है उसे कहते हैं देव। अध्यात्म की दृष्टि से ये देव पंच ज्ञानेन्द्रियाँ हैंइन इन्द्रियों के द्वारा शब्द स्पर्श रूप रस और गन्ध ये पाँच विषय प्रकाशित किये जाते हैं। साधक तथा सिद्ध पुरुष भी इन्द्रियों के माध्यम से ही विषय ग्रहण करते हैं परन्तु उनकी दृष्टि में यह भी एक यज्ञ है जिसमें विषयों की आहुतियाँ इन्द्रियरूप देवों को दी जारही हैं। अज्ञानी के लिये जो विषयग्रहण की क्रिया मात्र है वही ज्ञानियों की दृष्टि से विषयों की इन्द्रियों के प्रति भक्ति की साधना है

यज्ञ की भावना बनाये रखते हुए विषय -ग्रहण करने वाली  साधक (बुद्धि)  को धीरेधीरे उत्कृष्ट अथवा निकृष्ट सभी प्रकार के इन्द्रियोपभोगों से वैराग्य हो जाता है जो आन्तरिक समता बनाये रखने में सहायक होता है। 

देवयज्ञ के वर्णन के बाद श्रीकृष्ण कहते हैं अन्य लोग ब्रह्मयज्ञ करते हैं जिसमें ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ (आत्मा) के द्वारा यज्ञ का (आत्मा का) हवन करते हैं।

 जब तक हम शरीर धारण किये हुए इस जगत् में रहते हैं तब तक विषयों के साथ हमारा सम्पर्क अवश्य रहता है। परन्तु हमें जो सुख-दुख का अनुभव होता है वह बाह्य जगत् के कारण नहीं वरन् हमारे विषयों के प्रति रागद्वेष के कारण होता है। विषयों में स्वयं सुख या दुख देने की क्षमता नहीं है। 

ज्ञानी पुरुष जानते हैं कि इन्द्रियाँ विषय ग्रहण की साधन मात्र हैं और वे केवल चैतन्य आत्मा के सानिध्य से ही कार्य कर सकती हैं। इस ज्ञान के कारण वे इन्द्रियों की ब्रह्मज्ञान की अग्नि में स्वयं ही आहुति देते हैं। यहाँ साधकों को उपदेश हैं कि वे अपनी ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का उपयोग स्वार्थ के लिये न करके जगत् की सेवार्थ करें इससे वे जगत् में रहकर कार्य करते हुए भी विषयासक्ति के बन्धन में नहीं पड़ सकते। अगले श्लोक में भगवान् दो प्रकार के यज्ञ बताते हैं

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।

शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति।।4.26।।

।।4.26।। अन्य (योगीजन) श्रोत्रादिक सब इन्द्रियों को संयमरूप अग्नि में हवन करते हैं,  और अन्य (लोग) शब्दादिक विषयों को इन्द्रियरूप अग्नि में हवन करते हैं।।

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।

आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते।।4.27।।

।।4.27।। दूसरे (योगीजन) सम्पूर्ण इन्द्रियों के तथा प्राणों के कर्मों को ज्ञान से प्रकाशित आत्मसंयमयोगरूप अग्नि में हवन करते हैं।।

दिव्य सत्य (इन्द्रियातीत सत्य) के ज्ञान के द्वारा अहंकार (देहाभिमान M/F आकार जीव भाव )   को संयमित करने को यहां आत्मसंयम योग कहा गया है।

आत्मानात्मविवेक के द्वारा परिच्छिन्न (सीमित) संसारी अहंकार से अपरिच्छिन्न (अनंत)  आनन्दस्वरूप आत्मा (infinite blissful soul) को विलग करके उसमें ही दृढ़ स्थिति प्राप्त करने के अभ्यास का अर्थ ही आत्मा (सर्वगत चेतन) के द्वारा अहंकार (नश्वर देहाभिमान) को संयमित करना है। इसे ही आत्मसंयम कहते हैं। इस साधना के द्वारा कर्मेन्द्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों के अनियन्त्रित व्यापार को नियन्त्रित किया जा सकता है। 

इस प्रकार पांच यज्ञों का वर्णन करने के पश्चात् भगवान् अगले श्लोक में पाँच और साधनाएँ बताते हैं मानो वे अर्जुन को यह समझाना चाहते हों कि इस प्रकार की सैकड़ो साधनाएं बतायी जा सकती हैं।

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।

स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः।।4.28।।

।।4.28।। कुछ (साधक) द्रव्ययज्ञ, तपयज्ञ और योगयज्ञ करने वाले होते हैं;  और दूसरे कठिन व्रत करने वाले स्वाध्याय और ज्ञानयज्ञ करने वाले योगीजन होते हैं।।

अपाने जुह्वति प्राण प्राणेऽपानं तथाऽपरे।

प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः।।4.29।।

अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।

सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः।।4.30।।

BG 4.29-30: कुछ अन्य लोग भी हैं जो बाहर छोड़े जाने वाली श्वास (रेचक) को अन्दर भरी जाने वाली श्वास (पूरक) में जबकि अन्य लोग अन्दर भरी जाने वाली श्वास (पूरक) को बाहरी श्वास में (रेचक) रोककर यज्ञ के रूप में अर्पित करते हैं। कुछ प्राणायाम की कठिन क्रियाओं द्वारा भीतरी और बाहरी श्वासों को (रेचक और पूरक दोनों को) रोक कर प्राणवायु को नियंत्रित कर उसमें (कुम्भक में) पूरी तरह से तल्लीन हो जाते हैं। कुछ योगी जन अल्प भोजन कर श्वासों को यज्ञ के रूप में प्राण शक्ति में अर्पित कर देते हैं। सब प्रकार के यज्ञों को संपन्न करने के परिणामस्वरूप साधक स्वयं को (मूढ़बुद्धि या चित्तवृत्ति को) शुद्ध करते हैं

[ प्राण (Prana) वास्तव में श्वास (Breathing) नहीं है। यह समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त सूक्ष्म जीवन-दायिनी शक्ति या ब्रह्माण्डीय ऊर्जा (Vital Life Force/ Subtle Cosmic Energy) है, जो कि विभिन्न चेतन व अचेतन पदार्थों में व्याप्त होती है। (Life Force): प्राण वह अदृश्य ऊर्जा है जो कोशिकाओं (Cells) को कार्य करने की शक्ति देती है, न कि केवल ऑक्सीजन। यह श्वास के माध्यम से शरीर में प्रवेश करती है, लेकिन यह स्वयं चेतना, ऊर्जा और अस्तित्व का सार है जो शरीर को चेतन (Alive) रखती है। सूक्ष्म ऊर्जा (Subtle Energy): इसे आयुर्वेद में पांच प्रकार की वायुओं—प्राण, अपान, समान, व्यान, और उदान—के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जो शरीर के विभिन्न कार्यों को नियंत्रित करती हैं। प्राण चेतना का सेतु है Prana is the bridge of consciousness: यह जड़ स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर मन  (Matter),और कारण शरीर आत्मा (soul या Spirit) के बीच का पुल है। ब्रह्मांडीय शक्ति (Qi): चीनी चिकित्सा पद्धति में प्राण को 'ची' (Qi) कहा जाता है, जो पूरी प्रकृति में फैली हुई है।संक्षेप में, श्वास प्राण के प्रवाह का माध्यम है, न कि स्वयं प्राण। योग के माध्यम से हम श्वास को नियंत्रित कर इस 'प्राण' यानी जीवन ऊर्जा को संतुलित करते हैं। 

इनमें से 'समान' वायु शरीर की पाचन क्रिया के कार्य को निभाता है। कुछ लोगों में उपवास रखने की प्रवृत्ति भी होती है। कुछ लोग यह जानकर कि आहार का सबके चरित्र और स्वभाव पर प्रभाव पड़ता है अल्प मात्रा में भोजन करने लगते हैं। ऐसे उपवास भारत में प्राचीनकाल से किए जा रहे हैं और यहाँ इन्हें यज्ञ के रूप में स्वीकार किया गया है। जब कम मात्रा में आहार का सेवन किया जाता है तब इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं और 'समान' जो पाचन शक्ति के लिए उत्तरदायी होता है, स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है। 

इस प्रकार से यह कुछ लोगों द्वारा किये जाने वाले यज्ञों के स्वरूप हैं। लोग मन (चित्तवृत्ति या बुद्धिवृत्ति) की शुद्धि के लिए विभिन्न प्रकार के ऐसे कठोर तप करते हैं। यह इन्द्रियों और मन के तुष्टिकरण की अभिलाषा है जो अन्त:करण को अशुद्ध करती है। इन सभी कठोर तपस्याओं का उद्देश्य इन्द्रियों और मन की सांसारिक पदार्थों से सुख पाने की स्वभाविक प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना होता है। जब ये तपस्याएँ भगवान के समर्पण के रूप में की जाती है तब इसके परिणामस्वरूप अन्तःकरण  शुद्ध हो जाता है। पहले किए गए उल्लेखानुसार अन्त:करण शब्द का प्रयोग प्रायः (चित्तवृत्ति या बुद्धिवृत्ति) के लिए किया जाता है

प्राणायाम की  क्रियाएँ जटिल हैं और इनका अभ्यास योग्य प्रशिक्षक की देखरेख में करना चाहिए अन्यथा शरीर को क्षति पहुंच सकती है। इसलिए  स्वामीजी ने नाड़ीशुद्धि प्राणायम के आलावा अन्य प्रकार के प्राणायम करने से मना किया है। 

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।

नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतो़ऽन्यः कुरुसत्तम।।4.31।।

।।4.31।। हे कुरुश्रेष्ठ ! यज्ञ के अवशिष्ट अमृत को भोगने वाले पुरुष सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ रहित पुरुष को यह लोक भी नहीं मिलता,  फिर परलोक कैसे मिलेगा?

पुरुषार्थ के बिना आत्मविकास नहीं हो सकता। अकर्मण्यता से कोई किसी भी क्षेत्र में लाभान्वित नहीं हो सकता। निस्वार्थ कर्म के बिना जब इस लोक में ही कोई शाश्वत फल नहीं प्राप्त होता तब परलोक के सम्बन्ध में क्या कर सकता है ? इस स्थान पर दो शंकाएं मन में उठ सकती हैं। क्या ये सभी मार्ग (ज्ञान और भक्ति) एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं ? अथवा विभिन्न लक्ष्यों तक तथा दूसरी शंका यह हो सकती है कि क्या ये सब मार्ग भगवान् के बौद्धिक विचार मात्र तो नहीं हैं भगवान् इन शंकाओं का निराकरण करते हुए कहते हैं

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।

कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ।।4.32।।

।।4.32।। ऐसे अनेक प्रकार के यज्ञों का ब्रह्मा के मुख अर्थात् वेदों में प्रसार है अर्थात् वर्णित हैं। उन सब को कर्मों से उत्पन्न हुए जानो;  इस प्रकार जानकर तुम माया के बंधन से मुक्त हो जाओगे।।

वेदों की एक सुन्दर विशेषता यह है कि वे मनुष्यों की विभिन्न प्रकार की प्रवृत्तियों से परिचित हैं और उसी के अनुसार उनके पालन की व्यवस्था करते हैं। इसलिए विभिन्न प्रकार की रुचि रखने वाले साधकों के लिए वेदों में विभिन्न प्रकार के यज्ञों और उनका अनुष्ठान करने की विधियों का वर्णन किया गया है। इनमें निहित सामान्य सिद्धान्त यह है कि यज्ञ का अनुपालन भक्ति के साथ भगवान को अर्पण के रूप में किया जाना चाहिए। इस ज्ञान द्वारा किसी को वेदों में वर्णित विविध उपदेशों के कारण किंकर्तव्यमूढ़ नहीं होना चाहिएअपनी प्रकृति के अनुकूल किसी एक विशेष यज्ञ (Be and Make) का अनुपालन करने से मनुष्य लौकिक बंधनों से मुक्त हो सकता है। अब अन्य यज्ञों की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ की विशेषता बताते हुए उसकी प्रशंसा करते हैं।

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप।

सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।।4.33।।

।।4.33।। हे परन्तप ! द्रव्यों से सम्पन्न होने वाले यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ ! सम्पूर्ण अखिल कर्म ज्ञान में समाप्त होते हैं,  अर्थात् ज्ञान उनकी पराकाष्ठा है।।

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं -बुद्धि को निरन्तर आत्मोन्मुखी बनाये रखने के लिए -अनेक प्रकार की पूजन सामग्री या पदार्थों के उपयोग से सिद्ध होने वाले यज्ञों की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ ही श्रेष्ठ है।

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं -बुद्धि को निरन्तर आत्मनोमुखी (गुरुमुखी जप- ध्यान) बनाये रखने के लिए - अनेक प्रकार की पूजन सामग्री या पदार्थों के उपयोग से सिद्ध होने वाले यज्ञों की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ ही श्रेष्ठ है। दूसरी पंक्ति में भगवान् ज्ञानयोग के श्रेष्ठत्व का कारण भी बताते हैं।

 कर्मकाण्ड में उपादिष्ट सामग्रियों के उपयोग से हुआ यज्ञ ऐसे फलों को उत्पन्न करते हैं जिनके उपभोग के लिए कर्तृत्वाभिमानी जीव को अनेक प्रकार के देह धारण करने पड़ते हैं;  जिनमें और भी नए-नए कर्म किये जाते रहते हैंकर्म से ही कर्म की समाप्ति नहीं होती। अतः कर्म की पूर्णता स्वयं में ही कभी नहीं हो सकती। इसके विपरीत ज्ञान (आत्मज्ञान) के प्रकाश में अज्ञान (अविद्या) जनित अहंकार और उसकी कामनायें नष्ट हो जाता है। 

अज्ञान से कामना (कामिनी-कांचन-कीर्ति की इच्छा) और कामना से कर्म उत्पन्न होते हैं। इसलिए ज्ञान के द्वारा कर्म के मूल स्रोत अज्ञान (अविद्या या आत्म-अज्ञान) के ही नष्ट हो जाने पर कर्म स्वतः समाप्त हो जाते हैं। सम्पूर्ण कर्मों की परिसमाप्ति ज्ञान में होती है। यदि केवल ज्ञान से ही पूर्णत्व की प्राप्ति होती हो तो उस ज्ञान को हम कैसे प्राप्त कर सकते हैं जिससे कि सब कर्मों का क्षय तत्काल हो जाये इसका उत्तर है

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।4.34।।

।।4.34।। उस (ज्ञान) को (गुरु के समीप जाकर) साष्टांग प्रणिपात,  प्रश्न तथा सेवा करके जानो;  ये तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुष तुम्हें ज्ञान का उपदेश करेंगे।।

जीवन के परम पुरुषार्थ (मोक्ष) को प्राप्त करने के लिए ज्ञान का उपदेश लेना अनिवार्य है। उस ज्ञानोपदेश को देने के लिए गुरु का जिन गुणों से सम्पन्न होना आवश्यक है उन्हें इस श्लोक में बताया गया है। गुरु के उपदेश से पूर्णतया लाभान्वित होने के लिए शिष्य में जिस भावना तथा बौद्धिक क्षमता का होना आवश्यक है उसका भी यहाँ वर्णन किया गया है।

यहाँ प्रणिपात से शिष्य का प्रपन्नभाव और नम्रता गुरु के प्रति आदर एवं आज्ञाकारिता अभिप्रेत है। सामान्यत लोगों को अपने ही विषय में पूर्ण अज्ञान होता है। वे न तो अपने मन की प्रवृत्तियों को जानते हैं और न ही मनसंयम की साधना को। अत उनके लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे गुरु के समीप रहकर उनके दिये उपदेशों को समझने तथा उसके अनुसार आचरण करने में सदा तत्पर रहें। 

जिस प्रकार जल का प्रवाह ऊपरी धरातल से नीचे की ओर होता है उसी प्रकार 'ज्ञान' का उपदेश- अर्थात 'विवेकज ज्ञान' का उपदेश भी ज्ञानी गुरु (विवेकी विवेकानन्द)  के मुख से जिज्ञासु शिष्य के लिये दिया जाता है। इसलिये शिष्य में नम्रता का भाव होना आवश्यक है जिससे कि उपदेश को यथावत् ग्रहण कर सके।

परिप्रश्नेन प्रश्नों के द्वारा गुरु की बुद्धि मंजूषा में निहित ज्ञान निधि को हम खोल देते हैं। एक निष्णात गुरु शिष्य के प्रश्न से ही उसके बौद्धिक स्तर को समझ लेते हैं। शिष्य के विचारों में हुई त्रुटि को दूर करते हुए वे अनायास ही उसके विचारों को सही दिशा भी प्रदान करते हैं। प्रश्नोत्तर रूप इस संवाद के द्वारा गुरु के पूर्णत्व की आभा शिष्य को भी प्राप्त हो जाती है इसलिये हिन्दू धर्म में गुरु और शिष्य के मध्य प्रश्नोत्तर की यह प्रथा प्राचीन काल से चली आ रही है जिसे सत्संग कहते हैं। 

विश्व के सभी धर्मों में शिष्य को यह विशेष अधिकार प्राप्त नहीं है। वास्तव में केवल वेदान्त दर्शन ही हमारी बुद्धि को पूर्ण स्वतन्त्रता देता है। उसका व्यापार साधकों की अन्धश्रद्धा पर नहीं चलता।अन्य धर्मों में श्रद्धा का अत्याधिक महत्व होने के कारण उनके धर्मग्रन्थों में बौद्धिक दृष्टि से अनेक त्रुटियां रह गयी हैं जिनका समाधानकारक उत्तर नहीं मिलता। अत उनके धर्मगुरुओं के लिये आवश्यक है कि शास्त्र संबन्धी प्रश्नों को पूछने के अधिकार से साधकों को वंचित रखा जाय। 

सेवया गुरु को फल फूल और मिष्ठान आदि अर्पण करना ही सेवा नहीं कही जाती। यद्यपि आज धार्मिक संस्थानों एवं आश्रमों में इसी को ही सेवा समझा जाता है। गुरु के उपदेश को ग्रहण करके उसी के अनुसार आचरण करने का प्रयत्न ही गुरु की वास्तविक सेवा है। इससे बढ़कर और कोई सेवा नहीं हो सकती।

शिष्यों को ज्ञान का उपदेश देने के लिये गुरु में मुख्यत दो गुणों का होना आवश्यक है (क) आध्यात्मिक शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान तथा (ख) अनन्त स्वरूप परमार्थ सत्य के अनुभव में दृढ़ स्थिति। इन दो गुणों को इस श्लोक में क्रमश ज्ञानिन और तत्त्वदर्शिन शब्दों से बताया गया है। 

केवल पुस्तकीय ज्ञान से प्रकाण्ड पंडित बना जा सकता है लेकिन योग्य गुरु नहीं। शास्त्रों से अनभिज्ञ आत्मानुभवी पुरुष मौन हो जायेगा क्योंकि शब्दों से परे अपने निज अनुभव को वह व्यक्त ही नहीं कर पायेगा। 

अतः  गुरु का शास्त्रज्ञ तथा ब्रह्मनिष्ठ होना अनिवार्य है। उपर्युक्त कथन से भगवान् का अभिप्राय यह है कि ज्ञानी और तत्त्वदर्शी आचार्य द्वारा उपादिष्ट ज्ञान ही फलदायी होता है और अन्य ज्ञान नहीं। अस्तु निम्नलिखित कथन भी सत्य ही है कि

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।

येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि।।4.35।।

।।4.35।। जिसको जानकर तुम पुनः इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगे,  और हे पाण्डव ! जिसके द्वारा तुम भूतमात्र को अपने आत्मस्वरूप में तथा मुझमें भी देखोगे।।

इस प्रकरण के संदर्भ किसी के मन में यह शंका उठ सकती है कि इतना अधिक परिश्रम करके ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है परन्तु हो सकता है कि मृत्यु के पश्चात् फिर हम उसी अज्ञान अवस्था को पुन प्राप्त हो जायें। 

इस प्रकार की शंका का निवारण करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण निश्चयपूर्वक कहते हैं इसे जानकर पुन तुम मोह को प्राप्त नहीं होगे। इस श्रद्धा की आवश्यकता तब तक ही है जब तक हम स्वयं आत्मा का साक्षात् अनुभव नहीं कर लेते। 

वैवाहिक जीवन का आनन्द एक बालक नहीं समझ सकता। इसी प्रकार अज्ञान अवस्था में शोक मोह से ग्रस्त हम लोग भी देशकालातीत आत्मतत्त्व (सत्य) की अनुभूति के आनन्द को नहीं समझ सकते। 

आत्मानुभूति का लक्षण बताते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं आत्मा की पहचान होने पर बाह्य विषयों भावनाओं एवं विचारों की सम्पूर्ण सृष्टि आत्मा में ही प्रतीत होगी और वह आत्मा ही श्रीकृष्ण परमात्मा का स्वरूप है

यहाँ स्पष्ट हो जाता हैं कि शिष्य को गुरु के सानिध्य की आवश्यकता तभी तक रहती है जब तक वह समस्त सृष्टि को परमात्मा से अभिन्न आत्मस्वरूप में अनुभव नहीं कर लेता। इस ज्ञान का महात्म्य देखिये कि

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।

सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि।।4.36।।

।।4.36।। यदि तुम सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाले हो,  तो भी ज्ञानरूपी नौका द्वारा,  निश्चय ही सम्पूर्ण पापों का तुम संतरण कर जाओगे।।

सर्वव्यापी दिव्य तत्त्व सर्वत्र व्यक्त हो रहा है और इसलिये -प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है। अतएव कोई भी पापी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वप्रयत्न से अपने जन्मसिद्ध पूर्णत्व के अधिकार को प्राप्त न कर सके। गीता का आश्वासन है कि अत्यन्त पापी पुरुष भी वर्तमान जीवन की परिच्छिन्नताओं तथा दुखदायी अवगुणों को तैर कर पूर्णत्व के तट पर ज्ञान नौका के द्वारा पहुँच सकता है। मनुष्य के पूर्णत्व प्राप्ति का यह अधिकार विश्व के किसी भी धर्मग्रन्थ में इतने स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं है। 

यह पहचान कर कि जीव का वास्तविक स्वरूप पूर्ण परमात्मा से भिन्न नहीं है तथा तत्पश्चात् आत्मरूप में रहने को ही सम्यक् ज्ञान कहते हैं। बड़े ही सुन्दर शब्दों में यहां कहा गया है ज्ञान नौका द्वारा तुम सम्पूर्ण पापों को तर जाओगे।किस प्रकार यह ज्ञान पापों को नष्ट करता है एक दृष्टान्त के द्वारा इसका उत्तर देते हुए भगवान् कहते हैं

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।।4.37।।

।।4.37।। जैसे प्रज्जवलित अग्नि ईन्धन को भस्मसात् कर देती है,  वैसे ही,  हे अर्जुन ! ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्मसात् कर देती है।।

शास्त्रों में इन कर्मों का वर्गीकरण तीन भागों में किया गया है (क) संचितअर्जित किये कर्म जो अभी फलदायी नहीं हुए हैं (ख) प्रारब्ध जिन्होंने फल देना प्रारम्भ कर दिया है तथा (ग) आगामी अर्थात् जिन कर्मों का फल भविष्य में मिलेगा।

 इस श्लोक में सब कर्मों से तात्पर्य संचित और आगामी कर्मों से है। इसलिये

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।

तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति।।4.38।।

।।4.38।। इस लोक में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला,  निसंदेह,  कुछ भी नहीं है। योग में संसिद्ध पुरुष स्वयं ही उसे (उचित) काल में आत्मा में प्राप्त करता है।।

 भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से स्पष्ट कहते हैं कि उसे स्वयं चित्तशुद्धि के लिये प्रयत्न करना होगा जिससे उचित समय में पारमार्थिक सत्य का वह साक्षात् अनुभव कर सकेगा।पूर्णत्व की प्राप्ति के लिये किसी निश्चित समय का यहां आश्वासन नहीं दिया गया है। केवल इतना ही कहा गया है कि जो पुरुष पूर्ण मनोयोग से पूर्व वर्णित यज्ञों का अनुष्ठान करेगा उसे आवश्यक आन्तरिक योग्यता प्राप्त होगी और फिर उचित समय में वह आत्मानुभव को प्राप्त करेगा। कालेन शब्द से यह बताया गया है कि यदि साधक अधिक प्रयत्न करे तो लक्ष्य प्राप्ति में उसे अधिक समय नहीं लगेगा। अत सभी साधकों को चाहिए कि वे इसके लिये निरन्तर प्रयत्न करते रहें।ज्ञानप्राप्ति का निश्चित साधन अगले श्लोक में बताते हैं

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।4.39।।

।।4.39।। श्रद्धावान्,  तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है।।

दिव्य मार्ग पर चलने का अर्थ है विषयोपभोग की नालियों से बाहर निकल जाना। पारमार्थिक शाश्वत आनन्द के प्राप्त होने पर मन के विक्षेप तथा शारीरिक शिथिलता दोनों का ही कष्ट समाप्त हो जाता है। इसलिये परम शान्ति का अर्थ है परम आनन्द। यही हमारे जीवन का वास्तविक लक्ष्य है।इस विषय में संशय नहीं करना चाहिये क्योंकि संशय बड़ा पापिष्ठ है। कैसे सुनो

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।

नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।4.40।।

।।4.40।। अज्ञानी तथा श्रद्धारहित और संशययुक्त पुरुष नष्ट हो जाता है,  (उनमें भी) संशयी पुरुष के लिये न यह लोक है,  न परलोक और न सुख।।

तथाकथित बुद्धिमान अश्रद्धालु और संशयी स्वभाव के पुरुषों पर इस पंक्ति मे तीक्ष्ण व्यंग्य प्रहार किया गया है।अत इस विषय में संशय नहीं करना चाहिये। भगवान् आगे कहते हैं

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्।

आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।।4.41।।

।।4.41।। जिसने योगद्वारा कर्मों का संन्यास किया है,  ज्ञानद्वारा जिसके संशय नष्ट हो गये हैं,  ऐसे आत्मवान् पुरुष को,  हे धनंजय ! कर्म नहीं बांधते हैं।।

जाग्रत्पुरुष को स्वप्न द्रष्टा का किया कर्म नहीं बांध सकता। इसी प्रकार अहंकार पूर्वक किये गये कर्म अहंकार के लिये बन्धनकारक हो सकते हैं परन्तु आत्मानुभूति में उसके ही नष्ट हो जाने पर आत्मा को वे कर्म कैसे बांध सकेंगे जिसका अहंकार नष्ट हो चुका है? उसी पुरुष को यहाँ आत्मवान् कहा गया है। इस आत्मज्ञान का फल सर्वश्रेष्ठ है इसलिये श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि

तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः।

छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।।4.42।।

।।4.42।। इसलिये अपने हृदय में स्थित अज्ञान से उत्पन्न आत्मविषयक संशय को ज्ञान खड्ग से काटकर,  हे भारत ! योग का आश्रय लेकर खड़े हो जाओ।।

यहाँ संशय को हृदय मे स्थित कहा गया है आज के शिक्षित पुरुष को यह कुछ विचित्र जान पड़ेगा क्योंकि संशय बुद्धि से उत्पन्न होता है हृदय से नहींवेदान्त की धारण के अनुसार बुद्धि का निवास स्थान हृदय है।  अनेक प्रकार के संशयों की आत्यन्तिक निवृत्ति तभी संभव होगी जब साधक पुरुष (बुद्धि ?) आत्मा का साक्षात् अनुभव कर लेगी। 

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