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शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

जो मेरा है -समझ छोड़ दे ' वही संन्यासी है। " गृहस्थ दुःखी रहेगा , संन्यासी सुखी रहेगा। "नर देह रूपी आलीशान मकान किराया है भगवान का भजन " वे बादशाहों के बादशाह हैं , कौन ? जिन्हें बादशाह होने की भी भूख नहीं है ! " ||Yug-Purush|| The world is false! How to know? [Swami Bhuteshananda - Reminiscences of the Direct Disciples - Part 2 - St. Louis Vedanta - 9/16/1988

जगत मिथ्या है ! कैसे जानें ? 

[||Yug-Purush|| The world is false! How to know?]


ॐ सच्चिदानन्द भगवान की जय -गोविन्द श्री रामकृष्ण की जय ! सनातन धर्म की जय ! 
आपके अनुभव में दो सत्य है -एक ऐसा सत्य जिसको अपने अनुभव में झूठ जान लेते हो। एक ऐसा सत्य जिसको अभीतक झूठा नहीं समझा है। हमारी ही समझ में हम रोज स्वप्न देखते हैं और उतनी देर वो सच्चा ही लगता है , सुख-दुःख देता है , सब इसी (जाग्रत की) तरह ही होता है। लेकिन जागते ही हम उसको झूठा समझ जाते हैं। दूसरा सत्य ये (दृष्टिगोचर जगत) है , जिसको हम सत्य समझते हैं। इसका न रहना तो हम समझते हैं (परिवर्तनशील है इतना समझते हैं), लेकिन झूठा नहीं समझते , इस न रहने को भी झूठा नहीं समझते। स्वप्न के होने को जागकर झूठा समझते हैं। और जागृत के न रहने को हम न रहना मान लेते हैं , इसका रहना भी झूठा था -ऐसा नहीं समझ पाते। (2:04) 
फिर ध्यान से सुनें - स्वप्नावस्था के प्रति जो निश्चिन्तता है , एक आध सवप्नों को छोड़कर कोई-स्वप्नों का ज्यादा इलाज नहीं सोचता। यदि स्वप्ना यदि कामुक (Sexual) हुआ तो प्रेम किया शादी हुई, शादी हुई , जब नींद खुली तब आपकी ऊर्जा नष्ट हुई। अब आपकी बुद्धि में जो नष्ट हुआ , वह सच्चा था। स्वप्न में जो मिला था , पाए थे वो झूठा था। ईमानदारी से विचार कीजिये। इसलिए डॉक्टरों के पास स्वप्न-दोष (Nightfall) के बहुत से रोगी जाते हैं। यह किशोरावस्था और युवाओं में एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है। युवक लोग स्वप्न दोष का इलाज पूछते हैं। क्यों ? उनको ये नुकसान अच्छा नहीं लगता। वही ऊर्जा जागृत में भी नुकसान करते हैं। जो ऊर्जा स्वप्न में नष्ट हुई , वही ऊर्जा जाग्रत में भी नष्ट करते हैं , परन्तु जागृत में नष्ट करके ग्लानि नहीं होती। स्वप्न में नष्ट होने से ग्लानि क्यों होती है ? नष्ट तो सच्ची चीज होगयी , और था सब सपना। जागृत में नष्ट तो की लेकिन लगता है , जैसे पत्नी तो सच्ची है। (विवाह के बंधन में बंधने के बाद पत्नी बन गयी है।)  या जो मेरी प्रेमिका है , प्रेमी है तो उसका आनंद लिया तो उसमें ग्लानि नहीं होती।  इस विवेक -को यदि गहराई से समझना है तो जाग्रत अवस्था में हुई मृत्यु हमें सच्ची लगती है। स्वप्न की भी मृत्यु सच्ची लगती है लेकिन जागने के बाद वो झूठी लग जाती है। 
क्या जाग्रत जगत की मृत्यु भी झूठी होती है ? ये बात हमारी बुद्धि के समझ में आया ? (4:19) जाग्रत में मैं ने जन्म लिया था (DOB) क्या मेरा वह जन्म झूठा है ? जाग्रत में मैं जो नानत्व देखता हूँ -अनेकता या विविधता देखता हूँ; क्या विविधता (M/F) झूठी है ? इस बात को स्वयं नहीं समझ सके। सारी शक्ति , सारी ऊर्जा इस बात में लगानी है कि , जैसे स्वप्न झूठा था-जाग्रत सच्चा है। ठीक वैसे ही सम्पूर्ण जाग्रत जगत मिथ्या है , केवल ब्रह्म सत्य है। (ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।) 
एक ओंकार सत् नाम कहो - या अभी केवल 'एक ओंकार सत्' -बाकी सब झूठ ! इसको समझने की चेष्टा करो। केवल एक आत्मा या ब्रह्म 'सत्' बाकी सब (कामिनी) मिथ्या
अब दूसरी बात आप से पूछता हूँ कि स्वप्न में धन नष्ट हो जाये तो दुःख होता है। क्यों होता है ? स्वप्न का पुत्र स्वप्न में नष्ट हो जाये, तो दुःख होता है। क्यों होता है ? उस समय मेरे लिए वही सत्य था, वह भी नष्ट हो गया। जब जाग जाता हूँ , स्वप्न के पुत्र गए ,स्वप्न का धन गया , स्वप्न का राज्य गया। जागने के बाद नष्ट होवे स्वप्न तो बिल्कुल तकलीफ नहीं होती। लेकिन बिना जागे स्वप्न का कुछ नष्ट होवे तो दुःख देता है। मेरे गुरु महाराज कहते थे  
नरपत एक सिंघासन सोया सुपने भैया भिखारी ॥     
 अक्षत राज बिछरथ दुख पाया सो गत भई हमारी ॥ 
स्वप्न में राज्य के चले जाने का दुःख है। जबकि सचमुच राज्य नहीं गया। अर्थात स्वप्न के हानि-लाभ स्वप्न तक ही रहे पर जागने पर नहीं रहे। और रोज हो रहे हैं , पर फिरभी हम स्वप्न से पीड़ित नहीं हैं। निश्चिन्त हैं। आप स्वप्नों की इतनी चिंता करते हो ? मुझे अभी तक कभी कभी ऐक्सिडेंट का सपना हो जाता है। (6:51) कभी स्वप्न में ही और तरह के नुकसान हो जाते हैं। उससे बचने के लिए मैं कोई उपाय नहीं करता। जाग जाने के बाद इस जगत के मिल जाने से, रोज इस जगत को पा जाने से स्वप्न की चिंता मिट जाती है और कोई जागा हुआ व्यक्ति स्वप्नों का (ग्रह चक्कर का) ज्यादा इंतजाम नहीं करता। (7:18) ऐसे ही ज्ञानी पुरुष (शुद्धबुद्धि -अहंकर्ता भाव रहित बुद्धि) जागृत में बड़ा होना, छोटा होना, जीना और मरना, लाभ और हानि ,वृद्धि और क्षय (growth and decay) यह सब ज्ञानी की जागृत अवस्था में हो जाता है। पर इसके लिए वो उपाय नहीं करता। या जन्म-मरण, हानि-लाभ से निश्चिन्त हो जाता है। 'मेरी मृत्यु होगी या यूँ कहो मेरी मृत्यु नहीं होगी !' 'ज्ञानी गुरु ' की मृत्यु भी शिष्य की तरह ही होगी। लेकिन गुरुदेव को सबकी तरह मृत्यु की चिंता नहीं है। शिष्य की तरह ही मृत शरीर का सबकुछ होगा। पर कहीं गहरे में (deep down ?शुद्ध बुद्धि में) निश्चिन्तता आ गई है। तुम गहरे की निश्चिन्तता (deep peace) शब्द को पकड़ना। इसका तात्पर्य यही है कि -स्वप्न के प्रति गहरे में आप निश्चिन्त हैं। (विविध प्रकार के स्वभाव वाले व्यक्तियों से बने मिथ्या महामण्डल संगठन या पारिवारिक दायित्व-पत्नी, पुत्र-पुत्री , भाई-बहन, रूपी स्वप्न के प्रति गहरे में आप निश्चिन्त हैं। ) ये बात नहीं है कुछ घटनायें हो जाने से आप बिल्कुल बुरा नहीं मानते। आप भी बुरा सपना देखना अच्छा नहीं मानते। अच्छा सपना अच्छा मानते हैं। ज्ञानी गुरु भी मानते हैं। पर गुरुदेव को उसकी ज्यादा परवाह नहीं है। (8:37) फिर एक बात बताऊँ -स्वप्न में शादी हो, प्रेम हो , पुत्र हो जाये , धन मिल जाये , अब इस स्वप्ने को देखने के बाद अपने गुरुदेव से पूछोगे - स्वप्न में शादी कर ली है , मेरे लड़के हो जाते हैं , ऐसे स्वप्न न दिखें उसका उपाय करें। या यह स्वप्न न आये उपाय कर दो ? किन्तु यदि स्वप्नदोष (Nightfall) होता है तो फिर आप चिंतित होकर इलाज पूछते हैं। क्योंकि आपने उसमें झूठ  के पीछे सत्य खोया ! झूठ के चक्कर में सत्य खोया। [क्षणिक सुख मिथ्या M/F, नाम-रूप, के पीछे सत्य खोया (आत्मा , ब्रह्म, भगवान-परमानन्द ,existence -consciousness -bliss) खोया।] अभी भी (आत्मबोध होने के बाद भी ?) आप जगत के पीछे आत्मा खो देते हैं !! (9:15) इस (जड़)देह की मृत्यु जैसे आपकी अपनी ही (चेतन) मृत्यु हो गई ! क्या आपको देह की मौत अपनी मौत नहीं लगती ? [क्या आपको इस वर्तमान देह (M/F नाम-रूप) की मौत अपनी मौत (आत्मा -ब्रह्म -ठाकुर की मौत) नहीं लगती ?] लगती है ? अर्थात जब तक देह की मौत मुझे अपनी (आत्मा की) मृत्यु लगती है, तब तक जगत जो न रहने वाला है, उसके पीछे खो दिया सदा रहने वाले को ! इसलिए उसको नाम दिया -आत्महत्या ! (9:41) यदि यह आत्महत्या न हो तो इस देह-हत्या (murder of the body) में क्या रखा है ? लेकिन अभी देह की हत्या मुझे अपनी ही हत्या लगती है। देह की मृत्यु मुझे मानो अपनी ही मृत्यु जैसी लगती है। जबकि भगवान कृष्ण कहते हैं - 'न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।2/20।' [यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है,  शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता।।शरीर के समान आत्मा का जन्म नहीं होता क्योंकि वह तो सर्वदा ही विद्यमान है। तरंगों की उत्पत्ति होती है और उनका नाश होता है परन्तु उनके साथ न तो समुद्र की उत्पत्ति होती है और न ही नाश। जिसका आदि है उसी का अन्त भी होता है। उत्ताल तरंगे ही मृत्यु की अन्तिम श्वांस लेती हैं। सर्वदा विद्यमान आत्मा के जन्म और नाश का प्रश्न ही नहीं उठता। अत यहाँ कहा है कि आत्मा अज और नित्य है।]
अर्थात शरीर के मारे जाने पर, हम जो आत्मा हैं -आत्मा नहीं मरती। इस बात को हम समझते हैं , गीता सुनते भी हैं। हमें गीता पर विश्वास भी बहुत है। गीता पर श्रद्धा है , कोई गीता को बुरा कह दे , हम उग्र हो जाते हैं। जब अख़बार में कोई भी अगर रामायण , गीता या भगवान कृष्ण की वाणी का खण्डन करें , तो हमें अच्छा नहीं लगता। लेकिन भगवान की वाणी का सत्य , गीता की वाणी का सत्य क्या है , अभी मुझे ही पता नहीं है। शरीर के मारे जाने पर आत्मा नहीं मरती - अर्थात मैं नहीं मरता! क्या ये बोध अभी स्पष्ट है ? ( The soul does not die when the body dies—meaning, 'I' do not die! ('আমি' মরবো না!) Is this realization clear now? 'मैं' अर्थात माया का कार्य 'व्यावहारिक मैं' या M/F शरीर (नाम-रूप) को ही मैं समझने वाली मूढ़बुद्धि (चित्तवृत्ति 'अहंकार' या कच्चा अहं) आत्मबोध नहीं होने तक, अपने को कर्ता समझती है !  - इसलिए मूढ़बुद्धि ही जन्मलेती और मरती रहती है। लेकिन आत्मबोध होने के बाद 'शुद्धबुद्धि या आत्मा' जान जाती है कि यह जन्म-मृत्यु तो भ्रम था , आत्मा यानि मैं -वास्तविक मैं (चेतन) तो स्वरूपतः नित्यमुक्त ही है।) 'मैं' नहीं मरता - ये तो नचिकेता ने यमराज से पूछा है। इसी पर एक पूरा उपनिषद है। नचिकेता यमराज से पूछता है , कि मैंने सुना है कि मृत्यु के बाद आत्मा रहती है। कोई कहता है -नहीं रहती। कोई यदि सिद्ध करे कि आत्मा नहीं रहती तो उसके तर्कों से भी प्रभावित होते हैं ? जब कोई कहता हैं - 'Religion is opium' धर्म अफीम है , पाप -पुण्य नहीं है , सब बकवास है। तो उसकी तर्कों से भी प्रभावित हो जाते हैं। [क्या सनातन धर्म अर्थात नित्य-अनित्य विवेक में आधारित आत्मा का धर्म अफीम है ?] जब कोई कहता है पाप करने से नरक जाओगे, तब उससे भी प्रभावित होते हैं। इसलिए न तो पूरे पाप छोड़ पा रहे हैं , न निश्चिन्त होकर पाप कर ही पा रहे हैं ! (11:52) क्या आप निश्चिन्त होके पाप कर सकते हो ? झूठ नहीं बोलना। यदि काम के वेग में , वासना के वेग में कई गलतियाँ करते हो , वेग में बच नहीं पाते। और दूसरी बात मन ही मन में , अंदर-अंदर बुरा भी लगता रहता है, कुंठा भी बनती है। इसलिए नास्तिक लोग ज्यादा निश्चित होके पाप करते हैं। [Don't lie. If you commit many mistakes in the heat of lust, in the heat of desire, you cannot escape the heat. And secondly, deep inside, one feels bad and frustration also develops.] लेकिन नास्तिकों को भी गहरे में भय बना रहता है , कि कहीं वास्तव कोई नर्क न हो , जहाँ हमें जाना ही पड़ जाये। रोज खण्डन करते हैं -नर्क नहीं होता , शास्त्रों का खंडन करेंगे। पर ऐसा व्यक्ति जो पाप से कहीं डरता न हो , और ऐसा व्यक्ति जो पाप करता न हो ? यह भी बता दो , बड़ा बुरा हाल है पाप का। इससे बच पाना भी आसान नहीं है। ऐसा व्यक्ति ढूँढ़ना मुश्किल है जिसके अंदर पाप-ग्रंथि ही न हो।    [कोई खीरा चोर तो कोई हीरा चोर ? But a person who is not afraid of sin, and a person who does not commit sin?] किसी की हुई गलती का दुःख न होता हो ? पाप कचोटता न हो ? जाने-अनजाने पाप-और पुण्य मेरी खोपड़ी में (मूढ़बुद्धि में) बैठा हुआ है। पशु पाप से दुःखी नहीं होता। (13:26) मेरे कहने का ये अर्थ नहीं कि पशु को उसकी गलती का शारीरिक कोई नुकसान नहीं होता होगा। लेकिन दिमागी तौर पर जानवर के अंदर पाप नहीं है। [पशु की बुद्धि अविवेकी है ] बिल्ली कभी चूहा को खाकर सोचती भी नहीं होगी कि मैंने कोई पाप किया है। पाप-पुण्य से मुक्त या तो जानवर होता है , या फिर परमज्ञान को उपलब्ध व्यक्ति (परमहंस ?) होता है। मनुष्य पाप-पुण्य से बच नहीं सकता। इसलिए जब अर्जुन ने पूछा कि हत्या का पाप मुझे लगेगा ?  तब भगवान ने कहा तूँ कितना भी कोशिश कर , पहले तो साधारण मनुष्य के लिए ये निर्णय करना ही कठिन है कि कर्म क्या है ? क्या अकर्म है ? क्या विकर्म है , क्या पाप है , क्या पुण्य है ? बड़े-बड़े समझदार भी इस पाप-पुण्य की कल्पना में मोहित हो जाते हैं।
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।4.16।।
।।4.16।। कर्म क्या है और अकर्म क्या है? इस विषय में बुद्धिमान पुरुष भी भ्रमित हो जाते हैं। इसलिये मैं तुम्हें कर्म कहूँगा,  (अर्थात् कर्म और अकर्म का स्वरूप समझाऊँगा) जिसको जानकर तुम अशुभ (संसार बन्धन) से मुक्त हो जाओगे।। 
पाप और पुण्य से पूर्ण निश्चिन्त होना बड़ा मुश्किल है। इसलिए श्रीकृष्ण ने कहा क्या पाप है क्या पुण्य है ? इसको समझने में अधिक जोर मत दो। वास्तव तुम कौन हो ? (या तुम क्या हो ?) यह समझने की कोशिश कर। तो स्वप्न से जागा व्यक्ति स्वप्न के लाभ-हानि से प्रभावित नहीं होता।  (14:53)  और जागा हुआ व्यक्ति आगे के भी स्वप्नों की चिन्ता नहीं करता।   
[ That's why Lord Krishna said, don't stress too much about understanding what is sin and what is virtue. Try to understand who you really is ? or what you are. So a person who wakes up from a dream is not affected by the benefits and losses of the dreamAnd the awakened person does not worry about future dreams either.]
जबकि उसे पता है , स्वप्न अभी और आएंगे , हो जायेंगे। अभी बंद नहीं हुए इस तरह से ज्ञानी को भी किसी-किसी क्षणों में भौतिक जन्म भौतिक मृत्यु, भौतिक लाभ-हानि मालूम पड़ते हैं। पर वह आत्मज्ञानी जब पहले और पीछे जब देखता है , तो अपने को पूर्ण मुक्त पाता है। पर वह आत्मज्ञानी (enlightened person) जब पहले और पीछे जब देखता है , तो अपने को पूर्ण मुक्त पाता है। अलेप पाता है। जो व्यक्ति कहीं गहरे में (शुद्ध-बुद्धि में) अपने को,-जन्म-मृत्यु , हानि-लाभ से  मुक्त पाता है। तब उस व्यक्ति को फिर अपनी मुक्ति के लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता। (15:47)[A person who, deep down, finds himself free from birth and death, loss and gain, then has no further duty to fulfill for his own liberation.] कर्तव्य शेष नहीं रहता , इसका मतलब यह नहीं कि ज्ञानी काम नहीं करता , आत्मज्ञानी भी काम करता है। गीता में ऐसे व्यक्ति के लिए कहा गया है - 
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चित् अर्थव्यपाश्रय:।।3.18।।
[न एव तस्य, कृतेन अर्थ:, न अकृतेन इह, कश्चन। न च अस्य सर्वभूतेषु कश्चित् अर्थव्यपाश्रय:॥ १८॥
आत्मज्ञानी को काम करने से और छोड़ने से दोनों में कोई प्रयोजन नहीं रहता। किसीका करने के बिना  -कामिनी-कांचन मिलेगा , धन मिलेगा, नामयश मिलेगा। बड़े हो जायेंगे , स्वर्ग जायेगा। फलाना होगा। मुक्ति मिलेगी ? ऐसा कोई चाह आत्मज्ञानी को नहीं होती। आपके कर्म के पीछे अभी कोई न कोई चाह छिपी है। दान करते हो, अमीर बनते हो , क्लब ज्वाइन करते हो। क्यों ? करते हो ? कुछ पा रहे हो। कुछ पाने का इरादा है , ख्याल है ? 
और न अकृतेन इह, कश्चन। काम न करने का (होटल न जाने का) भी कोई प्रयोजन नहीं है ? अभी कई काम या तो बदनामी के डर से नहीं करते हैं , कई काम नर्क से बचने के लिए नहीं करते। आप बहुत से अच्छे कर्म (दानधर्म) या तो अपनी मुक्ति के लिए , स्वर्ग के लिए करते हो।         

।।3.18।। परन्तु जिसने अपने परम पूर्ण आत्मस्वरूप को साक्षात् कर लिया ऐसे तृप्त और सन्तुष्ट पुरुष को कर्म करने अथवा न करने से कोई प्रयोजन नहीं रह जाता।  क्योंकि उसे न अधिक लाभ की आशा होती है और न हानि का भय। 
उस (कर्मयोग से सिद्ध हुए) महापुरुषका इस संसारमें न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है, और न कर्म न करनेसे ही कोई प्रयोजन रहता है, तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें (किसी भी प्राणीके साथ) इसका किञ्चिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता।
श्री रामकृष्णदेव ने कहा है -" जिनको ईश्वर लाभ हुआ है , उनका भाव कैसा है , जानते हो ? मैं यंत्र हूँ , तुम यंत्री हो , जैसा चलाते हो , वैसा चलता हूँ।  ज्ञानी पुरुष जानते हैं कि ईश्वर (आत्मा) ही एकमात्र कर्ता हैं , फिर सारे कर्म भी उन्हीं के हैं , वे स्वयं को ईश्वर के हाथ का यंत्र मानते हैं , इसी कारण वे अनासक्त भाव से जो कर्म सामने आता है उसे करते जाते हैं। यद्यपि आत्माराम पुरुषों को किसी कर्म से न तो लाभ है , न हानि। क्योंकि वे पूर्णकाम हैं , तथापि कर्म से विरत रहना जरुरी नहीं समझते,  क्योंकि उनके सभी कर्म लोकसंग्रह के लिए हैं।। श्री भगवान ने कहा है - " न मे पार्थस्ति कर्तव्यं ' फिर भी लोगों के कल्याण के लिए सदा कर्म करते रहते थे। उनके कर्मों का विराम नहीं है। मुक्त पुरुष ही ठीक ठीक जनहितकर कार्य किया करते हैं।] 
और कई बार वैसे बुरे कर्म जो अब नहीं करते हो वो भी सहज नहीं छोड़ा। किसी नर्क या बदनामी के डर से छोड़े हो, सहज नहीं छोड़े हो !! (17:38) पर गीता क्या कहती है ? 
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।।18.48।।
।।18.48।।हे कुन्तीनन्दन ! दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँसे अग्निकी तरह किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं। 
सहज कर्म -कुत्ते की तरह,बिल्ली की तरह। पेड़ की तरह। पेड़ जब फलता है तो क्या यह सोचता है - मैं फल दूँगा , नहीं दूंगा ? पेड़ में पतझड़ होता है , फिर नए पत्ते आते हैं , फल लगता है , पक कर फल गिरते हैं। अपनेआप सब होता है।-सहजं कर्म कौन्तेय-सहज जैसे अपनेआप हो रहे हैं। पेड़ में जो हो रहा है - सब सहज में हो रहा है। बढ़ रहा है, जवान होता है।फलता है बूढ़ा होता है। फल आने बंद हो जाते हैं। सूख जाता है। तब क्या करता है पेड़ ? या तो सबकुछ सहज हो रहा है , कर्ता है ही नहीं। हमारे गुरुओं ने कहा है - कर्ता मत बन !  
कर्ता कब बनेगा ? आगे जीता रहूं - जीने के लिए क्या करेगा ? क्या हमेशा जीता ही रहेगा ? भयभीत रहता है -मैं मर न जाऊँ ? क्या कोई बचा रहा है , जो तू बचा रहेगा ? ये कैसी दुविधा है ? जैसे पेड़ में सबकुछ  हो रहा है , वहां कोई कर्ता नहीं है। और यदि कोई कर्ता है, तो वो एक कर्ता है -  
“एक ओंकार सतनाम, करता पुरख " 
[निरभउ, निरवैर, अकाल मूरति, अजूनी, सैभं, गुर प्रसाद।”अर्थ: ईश्वर एक है (सृष्टि का रचयिता एक ही है), उसका ही नाम सत्य है (परमात्मा या आत्मा ही परम सत्य है , केवल ब्रह्म ही सत्य है)। वह सबका सृष्टिकर्ता है(सब कुछ बनाने वाला और करने वाला है)। निरभउ—वह निर्भय है (उसे किसी का डर नहीं है)। निरवैर- वह द्वेष-रहित है (उसका कोई दुश्मन नहीं है) न उसे भय है, न द्वेष। अकाल मूरति -  वह अकाल है (देश-काल से परे/निराकार) है। अजूनी (Ajooni): वह जन्म-मरण से परे है। सैभं (Saibhan/Saibhang): वह स्वयं प्रकाशमान है-सर्वगत (स्वयंभू) है  । गुर प्रसाद- वह गुरु की कृपा से प्राप्त होता है। ] अर्थात जैसे सृष्टि का जो कर्ता है , वो कर्ता पुरुष (आत्मा, परमात्मा , ब्रह्म , या ईश्वर स्यंभू) वह कर रहा है। पेड़ में वही कर रहा है , पहाड़ में वही कर रहा है। लेकिन दिखाई नहीं पड़ता। आर्यसमाज कहता है - जगन्नाथ के हाथ नहीं पर कर रहा है। पैर नहीं है , पर चल रहा है। कर्ता दीखता नहीं पर कर रहा है। और जो अपने को कर्ता समझ रहा है ,वह बेवकूफ है (मूढ़बुद्धि) है। (19:46) 
हममें से यहाँ ऐसे कितने हैं जो अपने को कर्ता नहीं समझते है ? और उसी बेवकूफी (मूढ़बुद्धि) की योजना में जीने की योजना बना रहे हैं। मरने से बचने की योजना बना रहे हैंऔर होता वही है -जो ? मंजूरे ? होता वही है , जो मंजूरे तुम्हे होता है ? या होता वही है -जो मंजूरे ? खुदा होता है ! हमें उतना शेर पढ़ना नहीं आता है। क्या वही होता है , जो तुम चाहते हो ? हुआ है ऐसा ? होता वही है जो मंजूरे खुदा (गुरु) होता है ! होता वही है जो उसका हुकुम है। [शुद्ध बुद्धि को (1985 - 1987) होता वही है जो एक ओंकार सत् नाम -माँ काली को या अवतार वरिष्ठ को या गुरुनानक देव या आत्मा, चेतन का हुकुम होता है।] और जब तुम अपने अनुसार कुछ करना चाहते हो, अपने अनुसार जीना चाहते हो ? और कभी -कभी तो मरना भी अपने अनुसार चाहते हो ? जहर खाके ? रेल की पटरी पर ? [ या ठाकुर के नागा गुरु के जैसा?  गंगाजी में डूब कर ?] (20 :44) अच्छा अगर लड़का नहीं ही हो जाये, तो क्या हो जायेगा ? और हो जायेगा तो क्या profit होगा ? जब तुम्हारे हाथ में कुछ है ही नहीं तो कर्ता क्यों बनते है ? (21:07) 
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते।।3.27।।
।।3.27।। सम्पूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं, अहंकार से मोहित हुई बुद्धि (पुरुष), "मैं कर्ता हूँ"  ऐसा मान लेता है।। 
तो आप कहोगे कि यदि हम कर्ता नहीं होते , तो हमलोग पाठचक्र में क्यों आते ? हाँ, आप इसीलिए आते हो कि आप अभीतक अपने को कर्ता ही मानते हो ! इसलिए मुक्त होने के लिए आये हो। ज्ञान पाने आये हो , ज्ञान पाने के बाद न तुम ज्ञानी रहोगे , न तुम कर्ता रहोगे। कोई झंझट ही नहीं रहेगी , समझ जाओगे कि सब कुछ सहज हो रहा है। लेकिन ज्ञान होने पहले तो आये ही हो। तुम -तुम हो ! तुम कर्ता हो ! अभी तुम्हारी योजना है - (5 करोड़ जमा करना ?) पर ज्ञान के बाद न तुम्हारी कोई योजना है - न तुम कर्ता हो ! 'सर्वमंगलमांगल्ये ' की शक्ति से वो चला रहा है - सृष्टि चल रही है। तुम कुछ हो ही नहीं। मुक्त हो जाओगे। Free - हो जाओगे , मरने के बाद नहीं। (22:06) अमेरिका गया था तो एक सरदार मुझे वहाँ मिले। उन्होंने कहा कि ये तो गुरुवाणी का है। मुझे नहीं मालूम कि ये गुरुवाणी का है कि नहीं ? वे कहते थे 
साधो भाई ,जीवत ही करो आसा ||
जीवत समझे जीवत बुझे, जीवत मुक्ति निवासा |
जीवत करम की फाँस न काटी ,मुये मुक्ति की आसा || 1 ||
तन छूटे जिव मिलन कहत है, सो सब झूठी आसा |
अबहूँ मिला तो तबहूँ मिलेगा, नहिं तो जमपुर बासा || 2 ||
सत्त गाहे सतगुरु को चिन्हे , सत्त -नाम बिस्वासा |
कहैं कबीर साधन हितकारी, हम साधन के दासा || 3 ||
यह पंक्तियाँ कबीर दास जी के आध्यात्मिक संदेश का सार हैं, जो जीवित रहते हुए ही सत्य को समझने, कर्म करने और जीवन को ज्ञान से प्रकाशमय करने पर जोर देती हैं। कबीर जी कहते हैं कि मृत्यु के बाद मुक्ति की आशा व्यर्थ है, सच्चा बोध (समझ) और कर्मों का फल भोग कर क्षय करना जीवित रहते हुए ही संभव है। 
भावार्थ : 
कबीर साहब जी कहते है कि जब तक जिन्दा रहो तब तक ईश्वर के पाने की आशा रखो | समझ -बुझ जीवन के साथ है | मुक्ति भी इस जीवन में ही संभव है | अगर तुमने अपने जीवन में अपने बंधन नहीं तोड़े करम का फंदा नहीं काटा, तो मरने के बाद मुक्ति पाने की क्या आशा रखते हो |  अगर वह अब मिल गया तो तब भी मिलेगा, नहीं तो तुम्हे यमपुरी में ही रहना पडेगा | सत्य को आज पकड़ो, सतगुरु को आज पहचानो, सत-नाम पर आज आस्था रखो। अभी मुक्त हो जाओ ! 
जीवित रहो और दर्द न हो ? ये भी तेरी योजना है ? (22:30) रसगुल्ला खाओ और स्वाद न आये , ये भी तेरी योजना है ? स्वाद न आये तो भगवान ने जिह्वा ऐसे ही बना दी है ? तलहथी में यहाँ - जैसी चमड़ी लगी है, इससे चटनी को मिलाओ - स्वाद आता है ? जिह्वा में ही क्यों आता है ? ये योजना भी क्या तुम्हारी है ? और इस जिह्वा के थोड़ा नीचे उतर जाये , कंठ में या पेट में ? क्या तुम खटाई का स्वाद, शर्बत , मिठाई का स्वाद पेट में जाके लेते रहते हो ? मिठाई का स्वाद भी हाथ से छूकर क्यों नहीं ले लेते ? आपका तो पेट में पड़े -पड़े मिठाई का मजा आता रहता है ? आता है न ? हमें तो नहीं आता , भोजन का आता है। मिठाई का नहीं , मिठाई का मजा तो जिह्वा पर ही आता है। ये किसने बनाई है ? मैं व्यंग करूँ तो कभी कभी विनोद में कहता हूँ। आपके लिए नहीं कह रहा। पर किसी को कह दूँगा पांच इन्द्रियों के अलग विषय क्या तेरे बाप ने बनाई है ? मैं पूछूँ कि मिठाई का स्वाद आना , नमकीन लगना, खट्टा लगना , क्या तेरे बाप ने बनाई है ?   -अर्थात अमेरिका , इंग्लैण्ड के साइंटिस्टों नेबनाई है। या Big Bang के बाद ऐसा अपने आप बन गया है ? लेकिन अगर उसको समझ होगी तो हँस के कह सकता हैं - हाँ यह मैंने नहीं बनाई , मेरे ऊपर वाले बाप ने बनाई है। मेरा बाप कौन है ? जानते हो न ?  (अर्थात गुरुदेव का बाप कौन है - जानते हो न ? ) (24:01) बस मेरे बाप ने बनाई है , इस पैदा हुए शरीर वाले बाप ने नहीं, जो सबका बाप है , उसने बनाया है। वो कर्ता पुरख है ! वो कर्ता है , उसने किया है। और देखो भक्त कौन है ? "तेरा भाणा मीठा लागे" [गुरु अर्जुनदेव जी की प्रसिद्ध गुरबानी शबद है, जिसका अर्थ है- "हे ईश्वर, तेरी इच्छा (भाणा) मुझे मीठी लगती है"। यह समर्पण, संतोष और ईश्वर की रजा में रहने का प्रतीक है। यह शबद सिखाता है कि सुख हो या दुःख, ईश्वर के हर फैसले को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए क्योंकि वह कभी किसी के साथ बुरा नहीं करता। (मैंने दादा से पूछा था -राजा हरिश्चंद्र को इतना दुःख क्यों भोगना पड़ा ? सर्वमंगलमंगल्ये Divine providence क्या नहीं होता ?] तूने स्वाद दिया है - तो आ रहा है। तूने काम दिया है , उससे सृष्टि होती है। ये क्या तेरी योजना है ? ये क्रिया पेड़ में और ढंग होती है ,मयूर में कामक्रिया और ढंग से होती है। मयूर को हमने पतिपत्नी की तरह  sexual सम्बन्ध करते नहीं देखा, पर संतान होती है। पेड़ में संतान होती है , पराग उड़ के जाता है और दूसरे को मिलता है, पराग नर-मादा को मिलता है। तो सृष्टिकर्ता को जैसा चलाना है , अपनी इच्छा से चला रहा है। तूँ है कौन ? तेरे से पूछता है क्या वो ? लेकिन अज्ञान के कारण (अविद्या -अस्मिता -राग -द्वेष -अभिनिवेश पंक्लेश के कारण) तूँ अपने को करने वाला - कर्ता मानता है ? तेरे जीवन अब तक जो कुछ भी हुआ वो सब किया उसने। वही जगतजननी (माँ काली) बनके बैठा है। तूँ खा म खा , बीच में आ कौन गया ? बस इसी का नाम है -अहंकार ! (25:20) तूँ बीच में -दालभात में मूसर चंद ? [यानि किसी कार्य में बाहरी व्यक्ति द्वारा बिना बुलाये रोड़ा बनना। आपने लेडीज को दाल बनाने से पहले उसमें से किरकिरी को अलग चुन कर फेंकते हुए देखा होगा, बस वही मूसर चन्द है।] इस कहावत का अर्थ क्या है ? मुझे नहीं पता। पर इतना पता है यह बिना मतलब बीच में अड़ गया है। तूँ अपने अहंकार को खुद हटा ले। तूँ क्या है ? और यदि तुझे किसी ने तुझे इस देह में प्रकट किया है , जिसका नाम मैं (M/F) है , उससे पूछ तूने क्यों प्रकट किया है ? तुमने मुझे क्यों भेजा है ? (उससे गुरुदेव से पूछ उस पार जाने  के बाद फिर से उसी देह में क्यों लौटा दिया है ?) अपनी योजना क्यों बनाता है? उससे पूछ। यदि किसी गुरु के शिष्य हो तो उससे पूछो ? या अपने से पूछो -शिष्य क्यों बने थे ? और गुरु से पूछो उन्होंने तुम्हें शिष्य क्यों बनाया है ? मुक्त हो जाओ ! हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है। हमारे हाथ में , जवानी , न बुढ़ापा , न जगना , न सोना ? न शरीर छोड़ना। कहाँ छूटेगा ? हमारे हाथ में कुछ नहीं है ! देखो व्यास गद्दी से बोलते हैं। कल हमें सर्वसमर्थ समझ करके वरदान लेने मत आना।  हमारे हाथ बिल्कुल खाली हैं , हमारे हाथ में कुछ नहीं है। हम खुद ही उसकी रजा में राजी हैं। 
[मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू  रहे,बाकी न मैं रहूं न मेरी आरजू रहे।
जब तक कि तन में जान रगों में लहू रहे,तेरा ही जिक्र या, तेरी ही जुस्तजू रहे।
----पं रामप्रसाद बिस्मिल]
और यही है हमारी मुक्ति ! कि हमें कोई शिकायत नहीं है। (26:58) उसका किया मीठा लगता है। उसके किये 'बुढ़ापा' को, मौत को , देह छोड़ने को , जगने को सोने को स्वीकार करते हैं ,100 % एक्सेप्ट कर रहे हैं ! कैसे ? यही समझ मेरे गुरु (माँ काली) ने मुझे दी है। सबकुछ स्वीकार करने की यही क्षमता दी है। (दादा कहते थे अविरोध ? मन्त्रे तीर्थे द्विजे देवे दैवज्ञे भेषजे गुरौ।यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी।।(पञ्चतन्त्र,५.९८)अर्थात् - मन्त्र में, तीर्थ में, ब्राह्मण में, देवता में, दैवज्ञ (ज्योतिषी) में, औषधि में तथा गुरु में जो जैसी भावना (निष्ठा) रखता है, उसे फल भी तदनुरूप ही प्राप्त होते हैं।) गुरु की वाणी से , उपनिषद से गीता से यही समझ मिली है। ये समझ (नित्य-अनित्य विवेक) हमने कहाँ से पायी ? सन्त लोगों की संगत से मुझे मिली। आप विवेक-लेने सब्जी मण्डी में जाते होंगे ? सर्राफा बाजार में जाते हो। बजार में भटके लोगों से समझ लेते हो ? जो घर वाले आम लोग मिलते-हैं उनको ही गुरु माने बैठे हो ? गुरु से समझ लो। सब कुछ उसका किया है। करते ती इति नायकः(28:12) गुरु भी परमात्मा (ब्रह्म या आत्मा) को ही कर्ता मानते हैं। परमात्मा को “एक ओंकार सतनाम, कर्ता पुरख " और न्याय दर्शन कहता है -कर्तेति इति न्यायः - सृष्टि का कर्ता परमात्मा ही है। [नीयते विवक्षितार्थः अनेन इति न्यायः' अर्थात जिस साधन के द्वारा हम अपने विवक्षित (ज्ञेय) तत्त्व के पास पहुँच जाते हैं, उसे जान पाते हैं, वही साधन न्याय है। ] मैं इस सृष्टि का कर्ता नहीं हूँ। मैं आयु का निर्धारण करने वाला नहीं हूँ। आँख से देखने की स्किम  मेरी बनाई नहीं है। कान से सुनने स्कीम मेरी बनाई नहीं है। पेट में भोजन हजम करने की , गर्भ में बच्चा पलने की , और समय पूरा होने पर बाहर आने --इनमें कौन सी स्कीम मेरी है ? देह में आने की , देह छोड़ने की ? तूँ यह समझ कि सबकुछ उसी भगवान (श्रीरामकृष्ण) का किया हुआ है। अपनी योजना छोड़ दे ! और तूँ मुक्त हो जा ! उसकी योजना में हाथ बँटा ले। एक घिसी-पिटी कहानी है , फिर भी बता देता हूँ। एक नाव में तमाम लोग बैठे थे , उसमें एक साधु भी बैठा था। फ़कीर भी बैठा था।  वर्षा होने लगी,नाव में पानी आने लगा ,लोग डूबने लगे नाव डूबने लगी। तो बचाने के लिए मल्लाह ने कहा पानी बाहर फेंको। पानी बाहर फेंको।  सब लोग हाथों  फेंकने लगे। सब लोग हाथों से कपड़ा गीले करके सब नाव का पानी बाहर निचोड़ने लगे। पर साधु उल्टा करना लगा , नदी का पानी नाव में डालने लगा। तो लोगों ने कहा , बाबा तुझे चिंता नहीं है, तूँ ज्ञानी है तूँ मरने को तैयार बैठा है , तूँ मर हमें क्यों मारता है ? वो कुछ बोलै नहीं , बहरा बना डालता रहा। पानी आना बंद हो गया , छेद बंद गई। नाव ठीक से सुरक्षित हो गई। सबने पानी फेंकना बंद कर दिया निश्चिन्त हो गए। तब साधु ने क्या किया ? नाव का पानी बाहर फेंकने लगा। लोगों ने कहा बाबा का दिमागी पुर्जा हिल गया है। जब खतरा था तब पानी अंदर डालता था , अब जब कोई खतरा नहीं तो पानी बाहर डालता है। ऐसा क्यों करता है , पागल है ? नहीं ; मैं तो कुछ करता ही नहीं , मैं तो उसका इशारा देखता हूँ। मुझे लगा कि भगवान डुबाना चाहता है। तभी तो नाव में पानी आ रहा है। तो मैंने डुबाने में उनकी मदत कर दी। कि चलो डुबाना है तो अपन डूबने को तैयार हैं। (31:08) जब देखा कि वो नहीं डुबाना चाहता तो , पानी बाहर फेंकने लगे। 
राज़ी हैं हम उसी में जिसमें तेरी रज़ा है। 
याँ यूं भी वाह वा है और बूँ भी वाह वा है॥
इसके अलावा निश्चिन्त होने की और भी कोई दवा है ? हम अमीर बन जाएँ , हम पुत्र वाले बन जायें। हमें सिंहासन ही मिल जाये। हम ही विश्व के मालिक बन जाएँ। पागल हो तो बन जाओ। वह जो बनाता है , बन जाओ ! उसको देखो , उसका ईशारा समझो , क्या बनाना चाहता है ? पुत्रवान बनाना चाहता है ? बन जाओ। पति-पत्नी बनाना चाहता है, बन जाओ। नहीं बनाना चाहता है, तो हम अपना दिमाग काहे को खराब करें ? साधु बनाना चाहता है , (विवेकानन्द ?) , तो बन जाओ। और देखो यदि तुम्हें वो मुक्त करना चाहता है , तो घर में ही मुक्त कर देगा ! (32:05) और यदि अभी उसका इरादा (intend ,प्रयोजन) तुम्हें मुक्त करने का नहीं है ना, तो 'बाबा ' बन जाओ (वक्ता का पोस्ट लेलो), बड़बड़ाते फिरोगे। उसका ईरादा देखो, वो तुमसे क्या आशा करता है ? ('उसका' प्रयोजन देखो - वो क्या चाहता है ? उसका मनोरथ देखो।) उसने 'तुम्हें' क्यों भेजा है ? बस वो कर लो। 
दशम गुरु जी आये, और बताओ जब 'उन्होंने'- कर्ता पुरख ने युद्ध करवाया, लड़ाई करवाई तो वो भी कर लिया ! खालसा सजवाया तो खालसा सजा दिया। खालसा सजवाना 'उनकी' कोई अपनी योजना थोड़े ही थी ? (32:45) वो तो अकाल पुरख की योजना से आये हैं। 'आज्ञा भई अकाल की ' अब आगे की पंक्ति तुम बोलो।-"आज्ञा भई अकाल की तबै चलायो पंथ; 
सब सिखन को हुक्म है गुरु मानयो ग्रंथ। 
हाँ उनको आज्ञा हुई ! तभी खालसा पंथ की स्थापना हुई , यह कोई उनकी अपनी योजना नहीं थी। अपनी कोई (3K) भूख (तृष्णा) नहीं थी, और खालसा पंथ अस्तित्व में आ गया। (जगतजननी माँ सारदा, श्री  रामकृष्ण , स्वामी विवेकानन्द की आज्ञा हुई-ABVYM और VGM अस्तित्व में आ गया ! फिर दोनों एक हो गए !] तुम खालसा पंथ नहीं चलाओ , अगर उसकी आज्ञा है , तो शादी करके परिवार ही चला लो। यदि दशम पिता का परिवार सम्पूर्ण सिख पंथ है , तो यदि वे तुम से अपना परिवार चलाने को कहते हैं , तो अपना परिवार मानकर वही चला लो।चलवा रहा है , तो चला लो  पर रोना मत - हमारे बेटों का क्या हुआ ? अब हमारा क्या बनेगा ? अपना कर्तव्य पालन करो। परमात्मा ने तुमको भी व्यर्थ में नहीं भेजा है। (33:31) अच्छा तुम्हें भेजा है कि अपनी मर्जी से आये हो ?  (मैं आया नहीं हूँ , मुझे भेजा गया है। मुझे माँ गंगा ने बुलाया है ?)(33:31) सही बोलो। फर्क क्या है ? यही कि तुम्हें लगता है हम अपने लिए आये हैं। गुरुगोविन्द सिंह महाराज को लगता है -हम उसके लिए आये हैं। इसलिए सब काम किये , युद्ध किये लेकिन उन्हें यही लगता है -मैंने कुछ नहीं किया। युद्ध का कोई पाप अगर लगे , उसे लगे जिसने करवाया है । पाप या पुण्य  जो लगता होगा गुरुगोविन्द सिंह महाराज को देखो। खालसा सजाने का पुण्य नहीं , युद्ध करने का पाप नहीं लगा। पाप-पुण्य यदि लगे तो उन्हें लगे , जिसने हमें भेजा है। और तुम्हें सब कुछ का भय लगा रहता है। क्यों लगा रहता है ? तुमको उसने नहीं भेजा ? तुम खुद आये हो ? (34:19) कैसे मैं ख
इसलिए कहते हैं -गुरुवाणी पढ़ो , वाणी सुनो , वाणी समझो ! वचनामृत पढ़ो , वचनामृत सुनो , वचनामृत समझो। गीता पढ़ो , गीता सुनो , गीता समझो। और अपने जीवन को धन्य बनाओ, अर्थात मनुष्य-जीवन को सार्थक कर लो। और हमने (हमारे गुरुदेव ने ?) खुद क्या कर लिया है ?  अच्छा उनकी बहादुरी देखो। क्या मैंने (गुरुदेव ने) अपना बुढ़ापा दूर कर लिया ? मरना बंद हो गया ? भूखप्यास बंद होगया ? हम में है कोई दम ? हम अपनी कमजोरी बता रहे हैं , हम में है कोई दम ? हमने कौन सा तीर मार लिया ? हाँ , यदि हम सचुमच कुछ कर पाये तो यही कि अपनी इच्छा छोड़ दी। जो कुछ होगा उसकी इच्छा में होगा। और केवल यह विश्वास ही हमारा बल है। लेकिन जब हम तुम्हारी तरफ देखते हैं , तो पाते हैं कि हम तुमसे भी ज्यादा निर्बल ही हैं। कई काम जो तुमने  कर लिए वो तो हम भी नहीं कर पाए। कई लोग धनी बन गए , मिनिस्टर बन गए, राजा बन गए। क्या -क्या बन गए , हम तो कुछ बन ही नहीं पाए ? हाँ एक चीज पाए है -बनने का ख्याल चला गया।  उसे और क्या मिलना चाहिए था ? जिसकी बुद्धि (मति) से (विवेकी मनुष्य बनने के सिवा- अर्थात ब्रह्मसत्य जगत मिथ्या , जीवो ब्रह्मैव न अपरः की समझ या बोध मिलने के सिवा) और कुछ बनने का, और कुछ भी भौतिक वस्तु पाने का विचार चला गया - तो उसे क्या नहीं मिला ? सबकुछ मिल गया। और क्या मिलेगा ? हर समय कुछ और धन मिल जाये, एक लड़का हो जाये ,या नाम हो जाये की होड़ में दौड़ने वाले , रोते क्यों है ? तुम्हें जब भाग्य से ऊँची कुर्सी -महंत की ये 'नेता' की कुर्सी मिली तब रोते क्यों हो ? तुमने जो भी चाहा , तुम्हें मिला -लेकिन उससे तुम्हारा रोना बंद नहीं हुआ ? हमें कुछ नहीं मिला , या कुछ मिलने की इच्छा ही नहीं रह गई -इसलिए हमें सबकुछ मिल गया। 
चाह गई चिंता मिटी ,मनवा बे -परवाह ,
जिनको कछु न चाहिए ,वे साहन के साह।  
रहीम जी कहते हैं : अगर मनुष्य की बुद्धि से इच्छा (3k) समाप्त हो जाए तो उसकी सब चिंताएं मिट जातीं हैं । जिनको इस परिवर्तनीय जगत से कुछ नहीं चाहिए वे सब राजाओं  के राजा हैं क्योंकि वे हर हाल में खुश रहते हैं। कहने का तात्पर्य है कि हमारी चिंताएं ,हमारी इच्छाओं के कारण ही बढ़ती जाती हैं। अतः हमें अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए। लेकिन हमारे मन में इच्छायें उठती ही क्यों है ? इच्छाओं के उठते रहने का कारण है -अज्ञान (ignorance)! तो क्या डिग्री लेने पर मूढ़बुद्धि में इच्छायें नहीं उठेंगी ? अज्ञान की परिभाषा क्या है ? अज्ञान अर्थात अविद्या क्या है ? अज्ञान या (अविद्या-अस्मिता-राग-द्वेष -अभिनिवेश , पंचक्लेश) का अर्थ ‘ज्ञान का अभाव’ या वास्तविकता को न जानना है। आध्यात्मिक संदर्भ में यह आत्मा के वास्तविक स्वरूप (ब्रह्म/चैतन्य) को न पहचानकर खुद को नश्वर शरीर मन या अहंकार से जोड़ना है यह माया का मूल गुण है जो जीव को संसार के दुखों और पुनर्जन्म के बंधनों में फंसाता है और ब्रह्म-ज्ञान (आत्मसाक्षात्कार-आत्मज्ञान -आत्मानुभूति) में बाधा डालता है। 
तो रहीम जी कहते हैं - वे बादशाहों के बादशाह हैं , कौन ? जिन्हें बादशाह होने की भी भूख नहीं है ! (श्रीरामकृष्ण परमहंस -जिन्हें त्यागियों के बादशाह होने के सिवा -पूरे विश्व का बादशाह होने की भी भूख नहीं है!) ये सांसारिक बादशाह तो गुलाम हैं। सब रोते ही मिलेंगे -कब ?  कोई 5 साल बाद , कोई 10 साल बाद या कोई 15 साल बाद ? हाँ कई लोग (चुनाव) - लगातार जीत जाते हैं। (36:41) तब क्या चिन्ता होती है ? कुर्सी में बने रहने की, या अन्य प्रकार की हविश (desire-लालशा 3K) बनी रहती है। 
वैसे ही 'देवदुर्लभ मनुष्य शरीर ' तो मिला किन्तु क्या चिन्ता मिटी ? देह ने चिन्ता दी है या मिटाई है ? -झूठ नहीं बोलना ! बेईमानी नहीं करना। देह मिल जाने के बाद तुम्हें कोई चिन्ता तो नहीं है? यदि देह के बूढ़ा होने , या देह के जाने की चिन्ता है , तो क्यों है ? क्योंकि देह बनाई तो उसने , परमात्मा ने और तुम रखना चाहते हो ? देने वाला वो और इस देह के मालिक तुम बन बैठे ? तो इस बेईमानी की चिन्ता भोगो। इसलिए--- उसने देह दिया है , जब चाहे ले ले। उसने दिया , तो इस देह पर अधिकार मेरा कैसे हो गया ? और जब मेरा अधिकार हो गया , तो जब चाहूँगा दूँगा ! और मैं चाहूँगा कभी नहीं। मैं कभी नहीं चाहूँगा कि देह ले लो। मैं कभी नहीं चाहूँगा कि मेरी गद्दी ले लो। कभी नहीं चाहूँगा की मेरी 5 इन्द्रियों में से 1 भी इन्द्रिय ले लो। मैं कभी नहीं चाहूँगा की मेरा कुछ भी लो। हाँ भगवान ने एक चीज तुम्हारे अंदर डाल दी है -जो भगवान ही है। जो कहता है - मेरा 'मैं ' कोई छीन ही नहीं सकता। मेरा कुछ छीन नहीं सकता। तुम यदि मेरा दिया हुआ देह-मन-बुद्धि अपना मानने लगोगे , तो एक दिन छीन जाना तय है। और जिस 'आत्मा' को भगवान ने तुम्हें दिया है - उसको क्या भगवान मार देगा ?  भगवान तुम्हें मार देगा? हाँ तुम्हें जो दिया है -सब छीन लेगा। लेकिन तुमको कैसे छिनेगा ? तुम तो उन्हीं की आत्मा हो ! भगवान कहते हैं -ज्ञानी तो मेरा साक्षात् रूप है। "ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्" श्रीमद्भगवद्गीता (7.18) - "ज्ञानी तु आत्मैव- ज्ञानी तो साक्षात् मेरा ही स्वरूप है ऐसा मेरा मत है"। भगवान कृष्ण कहते हैं कि ज्ञानी आत्मा जो स्थिर बुद्धि (शुद्धबुद्धि) के साथ स्वयं को परमात्मा (श्रीरामकृष्ण) में एकीकृत (युक्त) रखती है वह निश्चित रूप से उनकी सर्वोच्च गति है। (38:29)' खालसा मेरो रूप है खास।' खालसे मह हौ करौ निवास।। परमात्मा में, गुरु में और जो गुरुओं से ज्ञान प्राप्त करते हैं -उनमें (उस 'खालसे में' उस शिष्य में जिसने आत्मा को जाना है ) जरा भी भेद नहीं है। वो मर जायेगा ? उसका कुछ छीन जायेगा ? उसका है क्या ? और दूसरा वस्तु क्या है ? ईश्वर ही एकमात्र वस्तु है -और सब अवस्तु है ! वही सर्वगत है , हर मनुष्य में वो आत्मा या ईश्वर ही अकेला सत्य है। वही तुम हो ! इसलिए  
ब्रह्मज्ञानी आप परमेश्वर। ब्रह्मज्ञानी को ढूँढे महेश्वर।।

शंकरजी ढूँढते रहते हैं किः 'मुझे कहीं कोई ब्रह्मज्ञानी मिल जाये।' गुरुबाणी (सुखमनी साहिब) का एक परम सत्य है जिसका अर्थ है कि जो व्यक्ति (अहं नहीं आत्मा)  ब्रह्म (परमात्मा) का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेता है वह स्वयं परमेश्वर के समान हो जाता हैऐसे ज्ञानी में अहंकार-द्वैत और माया का बंधन समाप्त हो जाता है। भगवान शिव (महेश्वर) भी ऐसे ब्रह्मज्ञानी की खोज में रहते हैंक्योंकि वह चलता-फिरता ईश्वर रूप है। ब्रह्मज्ञानी में और ब्रह्म में कोई फर्क नहीं है। साधु में और साहेब में कोई फर्क नहीं है। साधु भगवान का ही रूप है। तो आप अपने को पहचाने। (39:42) बार-बार ध्यान में निदिध्यासन करें - कि यह देह मुझे थोड़े दिनों के लिए मिला है। अपने गुरु या इष्टदेव से कभी पूछ तो लिया करो। कई बार कई चीजें सशर्त -99 years लीज पर दी जाती है। तो मनुष्य को ये देह कितने दिन के लिए मिला है ? सदा के लिए ? अच्छा प्रत्येक मनुष्य यह जानता भी है कि देह सदा नहीं रहता है। ऐसा कोई बुद्धू व्यक्ति खोजो , जिसको पता न हो कि देह सदा नहीं रहता है। किसी को देह सदा के लिए नहीं मिलता है। जब उसने सदा के लिए नहीं दिया , तब तुम उसे सदा रखना चाहते हो कि नहीं ? देखो झूठ नहीं बोलना। दिया है उसने थोड़े दिनों के लिए। और तुम उसे सदा रखना चाहते हो। तो तुम भगवान श्रीरामकृष्ण के कैसे भक्त हो ? जो उनकी इच्छा के विरोधी हो। तुम उसकी योजना के विरोधी हो , तुम राष्ट्र द्रोही हो। राष्ट्रद्रोही मतलब राष्ट्र के संविधान को न मानने वाला। तुम ईश्वर द्रोही हो ? ईश्वर कुछ चाहता है , तुम अड़ंगा लगाते हो। और यदि राजी हो गए तो तुम राष्ट्र-भक्त हो। जैसे यदि तुम देश के संविधान का पालन करते हो तो देशभक्त हो वैसे ही ईश्वर के संविधान का पालन करते हो तब , तुम ईश्वर भक्त हो। (41:10) और यदि ईश्वरभक्त हो तो मुक्त हो। कोई दण्ड नहीं कोई सजा नहीं। यदि ईश्वर के विधान को स्वीकार नहीं करते , तो कहीं न कहीं दुःखी होना होगा। ईश्वर सीधा डण्डा लेकर तुम्हें मारने नहीं आएगा। लेकिन तुम्हें दुःखी रखेगा। जो दुःखी हैं - तो समझो उन्होंने ईश्वर के संविधान का 100 % पालन नहीं कर रहे हैं। और पालन मुझे क्या करना है ? जवान से बूढ़ा होने के लिए मुझे कुछ करना होगा ? आज्ञा पालन करने का क्या मतलब है ? मैं बूढ़ा हो जाऊँ ,या शरीर छूटना तो मैं अभी छोड़ दूँ ? यह मतलब है ? ईश्वर के संविधान का पालन का मतलब है , उसके हुकुम को पहचान कर राजी बने रहना। छोड़ने को राजी हूँ। मुझे छोड़ना पड़ेगा क्या ? कोई अपने शरीर को पकड़े रख सकता है क्या ? शरीर को सदा बनाये रखना मनुष्य के हाथ में है ? कोर्ट के वकील कहते हैं -कानून को अपने हाथ में मत लो।लेकिन हम कानून को अपने हाथ में ले रहे हैं ? न तो तुम आत्महत्या करो। यदि जबरदस्ती शरीर छोड़ोगे तो वो भी कानून का उलंघन ही होगा। यदि भगवान ने शरीर दिया है , तो जहर खाने वाले , (गंगा नदी में डूबकर मरने की कोशिश करने वाले) तुम कौन हो ? उसी तरह क्या उसने तुम्हें सदा रहने वाला देह दिया है कि वेंटिलेटर पर ऑक्सीजन चढ़ाकर उसको जीवित रखने का दुष्प्रयास क्यों करें ? उस (आत्मज्ञानी मनुष्य) को बधाई है - जब ऐसी नौबत आ जाये तो , जो डॉक्टर को यह कह दे कि जब वो बुलाता है - तो डॉक्टर साहब कृपा करो -हम राजी हैं। हम आपसे कोई सिफारिश नहीं कर रहे , जब ईश्वर बुला रहा है , तो डॉक्टर रोकने वाला कौन है ? या वो बुलाता है तो इन्कार करने वाला मैं कौन हूँ ? और फिर मर्जी चलेगी किसकी ? पहलवान और दुबले व्यक्ति में कुश्ती हो जाये , तो जीतेगा कौन ? तो अंत में तुम्हारी इच्छा पूरी होगी या उनकी ? एक डॉक्टर ने अपने अस्पताल में लिखा था - " प्रभु तेरी इच्छा पूरी हो ! " वैसे कोई डॉक्टर ऐसा न लिखे तब भी किसकी इच्छा पूरी होगी ? (43:55) इच्छा तो उसीकी पूरी होगी। पर चलो हम भी राजी हैं प्रभु -तेरी इच्छा (will) पूरी हो ! प्रभु तेरा संकल्प (resolve)  पूरा हो। मेरी रचना में - तेरा उद्देश्य (purpose) पूरा हो। प्रभु का उद्देश्य क्या होगा ? आप अपने बेटे का भला चाहते हो कि बुरा ? जब तुम जैसा नासमझ भी अपने बेटे का भला चाहता है ,  तब परम बुद्धिमान -सर्वज्ञ परमात्मा  हमारा नुकसान चाहेगा ? नहीं , तो फिर हमें दुःख क्यों है ? उसकी विधान को न समझने  से हम दुःखी हैं। इसिलए अन्य शरीरों में भेजकर देखा कि ये यहाँ नहीं छूटा तो उसने हमें  नर शरीर दे दिया। हमको ये नर देह किस लिए दे दी ? कि अब हम भगवान को समझें , उसके विधान को समझें , और उसका पालन करें। उनके विधान से राजी यानि -उनके भक्त हो जाएँ। भगवान ने मनुष्य को भक्त बनने के लिए बनाया है। (45:17) और संसार भी उसकी योजना से चलता रहे -और हम (नर) मुक्त हो जायें। इसलिए -

नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥

नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥5॥
नर (मनुष्य) शरीर के समान कोई शरीर नहीं है। चर-अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं। वह मनुष्य शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्ति को देने वाला है॥5॥  
ये नर का देह भगवान की भक्ति के लिए मिला है। भक्ति क्या है? भगवान का भजन करना। भजन क्या है ? उनके विधान में अड़ंगा नहीं लगाना। मंदिर जाएँ  और जाकर वहाँ ईश्वर के नियम को तोड़ने की कोशिश करें? वहाँ यह माँगने जायें कि मुझे अमर कर दो ? वहाँ पैसा-धन माँगने की अब जरूरत न हो ? अब कहना हे प्रभु मेरी नासमझी (foolishness) हटाओ। भक्ति , दो विवेक दो , वैराग्य  दो , ज्ञान दो। आप मेरा अज्ञान हटा दो ! आप मेरी गलत सोच ठीक कर दो। क्योंकि आप तो दुःख दे ही नहीं सकते। दुखी मैं अपनी नासमझी  से हूँ। आत्मज्ञानियों ने भी क्या किया ? बुद्ध ने अपना बुढ़ापा दूर किया क्या ? बुद्ध ने मृत्यु हटाई क्या ? फिर भी यदि वो सुखी थे तो, इसका अर्थ है कि उन्होंने  इस सृष्टि के रहस्य को समझा , उसके उद्देश्य को , उसके हुकुम को पहचाना। क्या हमलोग भी ईश्वर के हुकुम को पहचानते हैं- ये शरीर उन्होंने छोड़ने वाला दिया है। लेकिन हम कहते हैं - बूढ़ा नहीं हो , और सदाबना रहे। उसका हुकुम जब जानते हो , उसके हुकुम को पहचानो , उसके हुकुम को स्वीकार कर लो। उनके आदेश  को स्वीकार लेना ही भक्ति है। उनके आदेश को स्वीकार लेना ही मुक्ति है। (47:24 ) उसकी रजा में राजी होना , उसके किये को मीठा समझना ! अब अंतिम बात ये समझ लो कि हमारे कौन -कौन हैं, जिनकी तुम्हें चिन्ता है? और हम कौन हैं ? पहले तो यही भूल - हम कौन हैं ? आत्मा हैं कि देह ? अच्छा तो हमारे कौन -कौन हैं ? और तुम्हें चिंताकिसकी है ? अपनों की या सभी की ? तो कुछ लोगों को अपना बनाने का अपराध किसने किया ? सारी सृष्टि भगवान की - तो उसमें अटक (मेरा होटल) कहाँ है ?

सकल भूमि गोपाल की, तामें अटक कहाँ?

 जाके मन में अटक है , सोई अटक रहा ! 

जब  समस्त धरती ईश्वर (गोपाल/कृष्ण) की है तो इसमें अटकाव कैसा? यह दर्शन बताता है कि सांसारिक मोह-माया संकीर्ण मानसिकता और अज्ञानता ही इंसान को बांधती है।  जबकि वास्तविकता में ईश्वर की इस दुनिया में सब कुछ मुक्त है। 
अच्छा इस संसार में कितना जमीन तुम्हारा है ? जो भगवान का नहीं है ? जो भगवान का नहीं है? आप जरा रजिस्टर 2 में उलट कर देख लेना ? जो भगवान का न हो , तुम्हारा हो ? या भगवान वाले में से ही कुछ में अपना कब्जा कर लिए हो ? जब सारी सृष्टि भगवान की है तो  कुछ पर कब्जा (अपने देह पर कब्जा )हमारा कैसे है ? तब यदि अवैध कब्जा था तो छीन जाने  से रोना क्यों चाहिए ? कब्जा अपने  लिए किया था कि सबके लिए ? अवैध कब्जा वाले देह पर जब बाबा का बुलडोजर चलता है , तो रोते क्यों हो ? तो हमारा दुःख -देह पर अवैध कब्जे वाला दुःख है। ईश्वर से मिले देह का गैर कानूनी मालिक बने बैठे हो ? भगवान ने शरीर किराये का दिया था -तुमने पट्टा (लीज) ही करा लिया ? इस नरदेह रूपी आलीशान मकान का आप किराया कितना देते हो ? किराया भी नहीं दे रहे हो ? कम से कम किराया ही देते रहो। तो इस नर देह रूपी आलीशान मकान किराया है भगवान का भजन। और नर देह-मंदिर को भगवान का घर समझकर रहो तो कोई किराया देने की भी जरूरत नहीं है। (50:07) उसका भगवान का परिवार है - तुम्हारा परिवार नहीं है ? उसका समझकर परिवार में रहो। उसका परिवार है कि तुम्हारा है ? सही बताना मेरे को। दुःख का कारण -है गलत समझ (बुद्धि -मति)  ? सही मति / सही समझ मुक्ति का हेतु! जिसकी जैसी मति , उसकी वैसी गति ! 

मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि।

किवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत्॥१-११॥ 

स्वयं को मुक्त मानने वाला मुक्त ही है और बद्ध मानने वाला बंधा हुआ ही है, यह कहावत सत्य ही है कि जैसी बुद्धि होती है वैसी ही गति होती है॥११॥
कुछ 'मैं ' और मेरा , कुछ 'तुम' और तुम्हारा ? " मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।।   मैं और मेरा तू  और तेरा अर्थात मेरा पर तुम्हारा,  अपना और पाराया  यह प्रपंच ही माया है।  इसी भूल भुलैया में बसा हुआ मानव अपना पराया  इन्द्रयों और उनके विषयो के प्रपंच में उलझा रहता है। मंनुष्य जब अपने पाराए के ज्ञान और अभिमान से ऊपर उठकर सब को एक समान  मानकर सब में परब्रह्म परमेश्वर को स्थापित मानते हुए सबके प्रति समभाव सृद्धा और प्रेम रखता है। तथा गुरु पिता माता भाई मित्र पति(पत्नि) सेवक और स्वामी इन सब को मेरा स्वरूप मानते हुए काम मद दम्भ और अहंकार को त्यागकर  मन बचन और कर्म से सबके प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह करता है।  मैं( ईश्वर) ऐसे ही निष्काम मंनुष्य के  बसीभूत रहता हूं और सदा उन्ही के ह्रदय कमल में बस करता हूँ।  
अन्त में फिर वहीं आता हूँ ? ज्ञानी ने क्या कर लिया ? क्या ज्ञानी ने अपने स्थूल शरीर रूपी 'मैं' को मरने से बचा लिया?यदि कोई ज्ञानी (बुद्ध) अपने को स्थूल शरीर को 'मैं 'समझे और उसे बचा के दिखा सकता है ? यदि ये दिखने वाला परिवार ही ज्ञानी का भी अपना परिवार है , तो क्या ज्ञानी अपने परिवार को - पत्नी, भाई , बहन , आदि- आदि को अपने साथ ले जायेगा ? (51:23) ये आकर ज्ञानी को (उसके शरीर को) बचा लेंगे? ज्ञानी का परिवार भी जब ज्ञानी के शरीर को नहीं बचा सकता , तो साधारण लोगों का अपना परिवार उसे बचा लेगा ? तुम अपने परिवार को अपना क्यों बनाते हो ? सुख पाने के लिए ही न ? 

जतन बहुत सुख के किये, दुख को कियो न कोइ।

कहु नानक सुन रे मना, हरि भावे सो होइ॥  

मनुष्य सुख पाने के लिए हरसंभव प्रयास (जतन) करता है। लेकिन दुख से बचने का प्रयास नहीं करता।  जबकि अंततः ईश्वर (हरी) की इच्छा ही होती है
सुखी होने के लिए हमने जिस भाई , बहन , पत्नी , पुत्र को अपना माना- दुःख भी उन्हीं से मिला की नहीं ? अब समझ आ गया तो अपना बनाना बंद करोगे ? हम साधु हो के भी अपना आश्रम , चेला बढ़ा रहे हैं। जिसके अपना चेला ज्यादा दीखते हैं उससे जलन होती है। अपना चेला बनाओ , अपना प्यारा भाई मानो -और बाद में उस आसक्ति में कष्ट पाओ। गृहस्थ ही नहीं साधु बाबा भी यदि अपना मठ -बिल्डिंग -धन बनाने लगे , तो गृहस्थ ही बन जाता है। और कोई गृहस्थ भी यदि घर-परिवार को अपना बनाये , भगवान का समझे तो वो संन्यासी हो जाता है। (53:07) गृहस्थ अवस्था कपड़ों के रंग में नहीं है , गृहस्थी घर में रहने में नहीं है। संन्यास साधु में नहीं है। संन्यास है मेरा कुछ नहीं समझने में। 
गृहस्थ कहता है - इतना जमीन मेरा है। उतना तुम्हारा है। इससे गृहस्थ दुःखी रहेगा , संन्यासी सुखी रहेगा। और यदि संन्यासी भी सुखी न हो , तो उसको खुल के कहो कि संन्यासी नहीं ये तो गेरुआ भेषधारी गृहस्थ है ! अपना प्रॉपर्टी बनाने की होड़ लगी हो तो गृहस्थ है। उसको संन्यासी मत कहो। बड़े होने की अविश में लगा पड़ा हो , तो गृहस्थ है। जिसका होने का ख्याल मिट जाये, न कुछ होना न कुछ पाना। अपना कुछ भी नहीं। -जो ऐसा समझता है , वही संन्यासी है। गुरु ये चाहते है कि लुधियाना वाले (सभी बड़े गृहस्थ उद्योगपति)-बिना गेरुआ वस्त्र पहने संन्यासी बन जायें बिना बाल मुड़ाये ,बिना जटा रखे , बिना घर छोड़े। 'सिर्फ मेरा है '-समझ छोड़ दो। जो मेरा है -समझ छोड़ दे ' वही संन्यासी है। और सब मेरा समझ लेके बाबा बन जाओ , मेरा बढ़ाते रहने वाला संन्यासी नहीं है। एक धर्म का सूत्र है

द्वे पदे बन्धमोक्षाय, निर्ममेति ममेतिच ।

ममेति बध्यते जन्तुः, निर्ममेति विमुच्यते ।।

अर्थात्―बन्धन और मोक्ष के दो ही कारण हैं, ममता और मोह-शून्यता। ममता से प्राणी बन्धन में पड़ता है और ममतारहित होने पर मुक्त हो जाता है।
बन्धन और मोक्ष के कारण रूप ये ही दो पद (शब्द) हैं, ‘यह मेरा है’ (बन्धन), ‘यह मेरा नहीं है’ (मोक्ष)॥सिर्फ दो पद हैं -सिर्फ दो शब्द है- ममेति ये मेरा है ! और एक वाक्य है - ये मेरा नहीं हैं ! एक यह मेरा है -और दूसरा यह मेरा नहीं है।  
ये मेरा होटल , मेरा आश्रम , मेरा घर है। मेरा चेला है। मेरा देह है , मेरा मन है। यहाँ तक कि ये मेरा मंदिर है। तेरा नहीं है। इसमें हरिजन नहीं जायेगा। भगवान के मंदिर में हर भक्त का प्रवेश है। सिर्फ नास्तिक का नहीं है। भगवान का भक्त जरूर जाये। -निर्ममेति ममेति च। ममेति बध्यते जन्तुः। कोई भी चीज मेरा है -ऐसा सोचना , ऐसी बुद्धि मनुष्य को नश्वर देह से बांध देती है। और मेरा कुछ भी नहीं है- ऐसा सोचना तुम्हें मुक्त करता है - निर्ममेति विमुच्यते। देखो जब तुम देह नहीं हो तो , ये परिवार तुम्हारा है ? (56:15) अच्छा ये शरीर मेरा कब बना ? मेरा बनाने वाला वो पोल या खूँटा -जहाँ से जमीन नापा जाता है। ये 'मेरा ' का विचार कहाँ से शुरू होता है ? मेरा भाई ? मेरा घर ? मेरी पत्नी कहाँ से बनता है ? ये पोल है देह -यदि मैं अपने को देह मानता हूँ -तभी मेरा बनता है। यदि यह स्थूल देह मैं नहीं हूँ , तो तेरा -मेरा क्या बनता है ? जिस दिन समझ लेगा - 
मैं नहीं, मेरा नहीं,
यह तन किसी का है दिया ।
जो भी अपने पास है,
वह धन किसी का है दिया ॥

इसको समझो और अपने दैनन्दिन जीवन के व्यवहार में अभिव्यक्त करो। यह मंत्र रोज जपा करो! प्रातः काल से लेकर सोने तक। दिन भर में कई बार जपो। वैसे हमलोग जपते बहुत हैं। "राम राम जपनापराया माल अपना"  यह उस व्यक्ति के लिए इस्तेमाल होती है जो ढोंगी हो और जो धर्म की आड़ में बेईमानी करता हो। अपना ढेर बढ़ाते जाओ ? खूब शहद एकट्ठा करो , एक दिन निकालने वाला आएगा और धुआँ करके सब ले जायेगा। 
जोड़त जोड़त मुंजी मरगया,मौज लेई खचेंगें ने।
खोदत खोदत चूहा मरगया,मौज लेई भुजंगे ने।
सींचत सींचत माली मरगया,मौज लेई भवरंगे ने।
धंधा करके दुनिया  मर गयीं, और मौज लिया सत्संगा ने। 

कंजूस आदमी पैसे जोड़ने जोड़ने मर जाता है और उसकी अगली पीढ़ी में कोई खर्च करने वाला आनंद लेता है। चूहे के खोदे हुए बिल में हमेशा सर्प मौज करता है।  माली पौधों की खींचता है और आनंद लेता है फूलों का भंवरा। सारी दुनिया धंधा-में मेहनत करते मरगी,और आनंद ले गया भगवान के भजन करने वाला। बिजनेस -घर-परिवार की चिंता करते करते मर जाओ।  या निश्चिन्त रहना चाहो तो सत्संग जरूर करो - पाठचक्र में जरूर जाओं।

सुत दारा और लक्ष्मी, पापी के भी होय।

सन्त समागम हरिकथा, तुलसी दुर्लभ दोय।।

यदि इसको थोड़ा बदल के कहा जाये -सुत दारा और लक्ष्मी, पापी के ही होय॥ तो यह कहना अच्छा नहीं होगा। सिर्फ एक शब्द बदला गया -ही / भी -सुत दारा और लक्ष्मी, पापी के भी होय॥
सन्त समागम हरिकथा, तुलसी दुर्लभ होय। सन्त का मिलना और सत्संग। अच्छा सन्तों के मिलने से क्या मिलता है ? (59:29) अच्छा सन्त समागम हो और हरिकथा दो कहा है। संत से मिलने से क्या होता है ? मनुष्य की थोड़ी बेवकूफी कम होती है। वो भी ठाट वाले बाबा से नहीं , टाट वाले बाबा से। ठाठ वाले बाबा को देखकर गरीब को लगता है , मैं भी बाबा ही बन जाऊँ तो खूब लूट लूँ। लूटने की प्रवृति जिसको देखने से आती है , वो उस साधु के दर्शन पुण्य नहीं होता। जिस साधु /या गृहस्थ के दर्शन जिसको अपना धन व्यर्थ लगे , पद व्यर्थ लगे, वैसे साधु के दर्शन से पूर्ण होता है।सन्त समागम हरिकथा, तुलसी दुर्लभ दोयपहले तो ऐसे सन्त को देखो कि, जिसको देखकर ऐसा लगे कि ये क्यों इतना मस्त रहते है ? मेरे गुरुदेव का प्रवचन पहली बार किसी ने टेप किया - उतना अच्छा रेकॉर्डिंग नहीं हुआ। तो कलकत्ते के एक ने सेठ ने कहा स्टूइडिओ में रिकार्डिंग करूँगा। पहले के साधु समझदार नहीं होते थे , साधु होते थे। अब समझदार होते हैं , साधु नहीं होते। उनको बहला कर स्टूडियो ले गए। कीर्तन गाने लगे तो रकार्डिँग करने वाले ने कहा -हरि बत्ती जलूँगा तब गाइएगा। हमारे गुरु नासमझ थे पर संत थे। उन्होंने कहा जब हम गायें , तब तुम हरी बत्ती जलाना।                  
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"आज्ञा भई अकाल की तबै चलायो पंथ सब सिखन को हुक्म है गुरु मानयो ग्रंथ" श्री गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा खालसा पंथ की स्थापना के बादगुरु पद (मानव गुरु) को समाप्त कर गुरु ग्रंथ साहिब को शाश्वत गुरु के रूप में स्थापित करने की घोषणा थी। यह संदेश देता है कि सिखों के लिए अब साक्षात गुरु केवल वाणी (ग्रंथ) है। 

खालसा पंथ की स्थापना 13 अप्रैल 1699 को वैसाखी के दिन आनंदपुर साहिब में सिखों के दसवें गुरुगुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा की गई थी। उन्होंने पांच प्यारों को अमृत छकाकर जाति-पाति मुक्त"शुद्ध" खालसा समुदाय की नींव रखी। जिसमें पुरुषों के लिए 'सिंह' और महिलाओं के लिए 'कौर' सरनेम अनिवार्य किया और पांच ककार (केशकंघाकड़ाकच्छाकृपाण) धारण करने का आदेश दिया। खालसा सजवाने के प्रमुख तथ्य:उद्देश्य: अत्याचारों के खिलाफ मानवता की रक्षा के लिए एक वीर योद्धा समुदाय (काल पुरख की फौज) बनाना।पाँच प्यारे: गुरुजी ने पांच स्वयंसेवकों को अमृत संचार के जरिए अमृत चखाकर खालसा बनाया: भाई दया सिंहभाई धर्म सिंहभाई हिम्मत सिंहभाई मोहकम सिंह और भाई साहिब सिंह। खालसा बनाने की प्रक्रिया: गुरु जी ने 'खंडे दी पाहुल' (दोधारी तलवार से अमृत) तैयार की और फिर स्वयं भी उन पांच प्यारों से अमृत लेकर 'गोविंद राय' से 'गोविंद सिंह' बने। पांच ककार: खालसा के लिए 5  'क' अनिवार्य किए गए - केश,कंघा (कंघी),कड़ा, कच्छा (सैन्य वस्त्र) और कृपाण। खालसा पंथ ने सिखों को एक विशिष्ट पहचान और साहस प्रदान किया।                       
 [ जैसे सिंहासन पर सोया हुआ एक राजा, अपने सपने मे भिखारी बन जाता है।  तथा राज्य के होते हुए भी उससे, बिछड़ने का दुख प्राप्त कर्ता है।  वैसी ही हालत हमारे समाज की है। वह इस देश के मुलनिवासी होते हुए भी सुपने मे सोए हुऐ राजे की तरहा अपने राज्य से बिछड़ने का दुख प्राप्त कर रहे  है।  और वह भिखारियों की तरह जी रहे है , अपनी आंखे कब खोलोगे कब अपना सिंहासन संभालोगे ?] 
यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी।।
(पञ्चतन्त्र,५.९८)
जो जैसी भावना (निष्ठा) रखता है, उसे फल भी तदनुरूप ही प्राप्त होते हैं।
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Swami Bhuteshananda - Reminiscences of the Direct Disciples - 

Part 2 - St. Louis Vedanta - 9/16/1988

स्वामी विवेकानन्द के गुरुभाई : श्रीरामकृष्ण की अनुभूति के अनुसार सर्वोच्च श्रेणी के केवल 6 शिष्य थे उनमें से स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज (बाबूराम) एक थे।  (6:08) उनके बारे में श्रीरामकृष्ण कहते थे कि - 'He is pure to the very bone' वह हड्डी तक पवित्र है। जब ठाकुर देव समाधि में जाते थे , तब सामान्य मनुष्यों के छूने से उन्हें कष्ट होता था, लेकिन केवल स्वामी प्रेमानन्द जी को अनुमति थी कि वे उन्हें छू सकते थे। इससे आप समझ सकते हैं कि स्वामी प्रेमानन्द जी कितने उच्च श्रेणी के थे ? स्वामी प्रेमानन्द जी के बारे में मेरे यादें बहुत धुँधली हैं। मुझे उनके शरीर त्याग करने के एक-दो वर्ष पहले देखने की थोड़ी याद है। उन्होंने 1918 में देहत्याग किया था , और मैंने उनको शायद 1917 या 1916 में देखा होगा। उनके शारीरिक गठन की भी मुझे हल्का सा याद है। वे सभी लोगों के प्रति अत्यन्त स्नेही थे। इसलिए जो भी भक्त बेलुड़ मठ आते थे उन सबके प्रति प्रेम से से भरे रहते थे। इसलिए स्वामीजी ने उनको प्रेमानन्द नाम दिया था। उनकी पहचान थी -A man of unbounded love 'असीम प्रेम का मनुष्य। उनसे पहली ही भेंट में भक्त लोग उनकी ओर आकर्षित हो जाते थे। भक्त लोग देखते थे कि दूसरे लोग उनके प्रेम को आसानी से महसूस कर सकते थे , वे एक खुली किताब की तरह थे। स्वामी रामकृष्णानन्द जी के देहत्याग के बाद , ठाकुर देव की सेवा -पूजा करने की जिम्मेदारी स्वामी प्रेमानन्द जी ने ग्रहण किया। और शारीरक जीवन के लगभग अंतिम दिनों तक निभाया। (12:31) ऐसा कहा जाता है की एक दिन स्वामीजी बहुत ही प्रसन्न मुद्रा में बेलुड़ मठ के प्रांगण में बैठे हुए थे, स्वामी प्रेमानन्द पूजा-घर से बाहर आ रहे थे। उन्होंने उनकी ओर संकेत करके कहा - स्वामी प्रेमानन्द को दिखाते हुए कहा - यहाँ ब्रह्म प्रत्यक्ष है, तुरन्त अनुभव किया जा सकता है, और सुनते ही स्वामी प्रेमानन्द वहीं खड़े हुए समाधि में चले गए। स्वामीजी के शब्दों ने उन्हें तुरंत प्रभावित कर दिया था, क्योंकि उनका जीवन पवित्र था। उनके बारे में भक्त लोग उनके असीम स्नेह को देखकर कहते थे कि -वे मठ के माँ हैं। अब मैं उनके अन्य शिष्यों की तरफ आऊंगा। (14:39) दूसरे प्रत्यक्ष शिष्य स्वामी अद्भुतानन्द की स्मृति भी बहुत हल्की सी है। मैंने जब उन्हें देखा तब उनका शरीर ठीक नहीं था। और उस समय वे बलराम बाबू के घर में निवास कर रहे थे। जहाँ श्री रामकृष्ण के कई शिष्य कभी-कभी रहा करते थे। वह स्थान हमलोगों के लिए बहुत पवित्र था , और बाद में उसको बेलुड़ का शाखा केंद्र घोषित किया गया। वहां जब मैं स्वामी अद्भुतानन्द जी के कमरे में गया तब वे बैठे हुए थे। उनका नाम था - अद्भुत को Wonderful या remarkable (अनूठा) यहाँ क्या कहते हैं ? स्वामीजी ने कहा था , हम बाकी लोग जितने श्रीरामकृष्ण के शिष्य थे , हमारे पास आधुनिक शिक्षा , और शस्त्रीय शिक्षा भी पर्याप्त शिक्षा थी। इसलिए हमलोग गहरे धार्मिक विचारों को भी  समझ सकते थे। लेकिन स्वामी अद्भुतानन्द सभी प्रकार की शिक्षा से बिल्कुल अनभिज्ञ थे। श्रीरामकृष्ण ने भी एक बार उनको अक्षरज्ञान देने की चेष्टा की थी , किन्तु 'क' बोलने कहे तो उन्होंने कहा - 'का !' तब श्री रामकृष्ण ने कहा तुम ठीक उच्चारण नहीं कर सकते तो आगे कैसे पढोगे ? और पढ़ाई उनकी रुक गयी। केवल श्रीरामकृष्ण के आशीर्वाद से उनके जैसा अनपढ़ व्यक्ति भी महान सन्त हो गए। यह श्रीरामकृष्ण की असाधारण कृपा है। तभी सभी शीषलोग अद्भुतानन्द की प्रशंसा किया करते थे। क्योंकि श्रीरामकृष्ण की कृपा से आत्मानुभूति हो गयी थी। एक दिन कोई बड़े विद्वान् पंडित उपनिषदों की व्याख्या कर रहे थे। (20:44) जैसे पुआल को भूसी से अलग किया जा सकता है , वैसे ही  घास के ब्लेड के कोर को धीरे-धीरे स्टॉक से अलग किया जा सकता है, उसी प्रकार आत्मा को भी देह-मन समुच्य से अलग किया जा सकता है। जैसे उन्होंने ऐसा कहा स्वामी अद्भुतानन्द ने हुए कहा -बहुत अच्छा कहा। और स्वामी विवेकानन्द के शिष्य स्वामी शुद्धानन्द से कहा पंडित ने सही कहा। अर्थात पंडित की बातों को वे अपनी अनुभूति से मिलाकर देख रहे थे। वे कुश्ती भी लड़ते थे। एक दिन उनको कड़ा अभ्यास करना पड़ा तो सो रहे थे। ईश्वरलाभ करना चाहते हो तो शाम को सोते क्यों हो ?  शर्मिन्दा होकर क्षमा माँगे। फिर रात में कभी नहीं सोये। ध्यान करते रहते। आप समझ सकते हैं कितने दृढ़ निश्चय के साथ वे ईश्वरलाभ के पथ पर आगे बढ़े थे। तीसरे शिष्य थे स्वामी तुरियानन्द। (24:18) जन्मजात ईश्वर के खोजी थे। श्रीरामकृष्ण से मिलने के पहले ही वेदान्त साधना कर रहे थे। वे सदैव रीढ़ की हड्डी सीधी रखकर योगी की मुद्रा में बैठते थे। वे बहुत गोरा रंग के थे। ईश्वर छोड़कर और कोई बात नहीं करते थे। बलरामबाबू का घर मेरे घर से काफी निकट था। मैं जब भी उनसे मिलता वे हमेशा रीढ़ की हड्डी सीधी करके बैठे मिलते थे। इसलिए श्रीरामकृष्ण उनको बहुत प्यार करते थे। वे एकबार आत्मा की निर्लेपता पर चिंतन कर रहे थे जो -देहमन-बुद्धि से परे है।                   




 

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

स्वामी भूतेशानन्द जी महाराज - आत्मा के पांच कोष - हॉलीवुड

Swami Bhuteshananda - The Five Sheaths of the Soul- Hollywood 

 (8/18/1988)

स्वामी भूतेशानन्द जी महाराज - आत्मा के पांच कोष - हॉलीवुड


मित्रों , मैं बहुत खुश हूँ कि बहुत  पुराना सपना आखिरकार पूरा हो ही गया। मैं USA जाने की सोच रहा था क्योंकि यह जगह हमारे मिशन के प्रतिष्ठता स्वामी विवेकानन्द की स्मृति के साथ  बहुत जुड़ी हुई है। वह इच्छा स्वाभाविक थी और मुझे इन इलाकों के कुछ भक्तों से मिलने का भी मौका मिला जो बेलूर मठ आए थे। और मैं उन भक्तों की लगन और समर्पण से बहुत प्रभावित हुआ था। इसलिए स्वाभाविक रूप से उस जगह जाने और ऐसे कई और पुण्य आत्माओं से मिलने की इच्छा होती है जिन्हें बारम्बार बेलूर मठ जाने का मौका नहीं मिल पाता। वह इच्छा मेरे लिए बहुत स्वाभाविक थी।
      अब मुझे नहीं पता कि मैं इस बारे में आपसे क्या कहूं, जो कि कोई लेक्चर नहीं है, बल्कि एक मित्रवत सम्भाषण है। आमतौर पर  लगभग रोज़ ऐसी सभाओं में कलकत्ता में मिशन के एक ब्रांच सेंटर में जाता हूँ, जहाँ मैं ज़्यादातर कलकत्ता में रहता हूँ, वहां मैं भक्तों से सवाल पूछता हूँ और वहीँ से मैं बातचीत करने के लिए अपना विषय चुनता हूँ। आमतौर पर ऐसा करना यह मुझे ज़्यादा दिलचस्प लगता है क्योंकि यह दो-तरफ़ा आवागमन हो सकता है।
   यहाँ के स्वामी ने बताया कि आज का टॉपिक यह है कि आप बेलुड़ मठ में कैसे आये ?  ठीक है? यह सुझाव भी यहाँ के स्वामी दे रहे हैं। किन्तु उनका सुझाव भी मुझे आदेश जैसा लगता है। (3 :19) क्योंकि वे यहाँ की संस्था के प्रमुख हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि मैं आपसे अपने जीवन के विषय में बातचीत करूँ, जिससे हम संन्यासी आमतौर पर बचते हैं। बेशक मेरे जीवन का अर्थ इस संघ (Organization) से जुड़ा हुआ जीवन है, क्योंकि वास्तव में इससे भिन्न जीवन का कोई दूसरा हिस्सा असल में है ही नहीं। मुझे नहीं पता कि , मैं पहले  कितना स्पिरिचुअल था, इस विषय पर बातचीत करना खुद की तारीफ़ करने जैसा तो नहीं लगेगा ? मुझे नहीं लगता कि मैं किसी भी तरह से इस दावे के लायक हूं कि आपको मेरी बात सुननी चाहिए। (4:37 हँसी )  
ज़रूरी नहीं कि ऐसा हो, लेकिन जब हम दोस्तों के साथ मिलते हैं तो हम अपनी पसंद के किसी भी तरीके से बात करने के लिए आज़ाद होते हैं। इसलिए कृपया आप मुझसे जो भी सुनें, उसे थोड़ी सावधानी के साथ लें। 
   क्योंकि मुझे खुद पर एक तरह की रोक-टोक महसूस होती है, जब मैं खुद के विषय में बात करता हूँ तो मुझे यह कुछ खास अच्छा नहीं लगता। लेकिन जैसा मैंने आपको बताया या जैसा मुझे स्वामी ने बताया कि मेरे शुरुआती दिनों में मैं मिशन के संपर्क में कैसे आया, यह जानना थोड़ा दिलचस्प हो सकता है, जोअतीत की इन घटनाओं के बारे में  शायद नहीं जानते होंगे। कभी-कभी मुझे अपना अनुभव शेयर करना पड़ता है, खासकर भक्तों के साथ। यह कोई पब्लिक टॉक नहीं है और इसलिए मैं इस मामले में खुद को ज़्यादा खुला महसूस करता हूँ। (6:24)
     मेरा जन्म भारत के राज्य पश्चिम बंगाल के एक गाँव में हुआ था। लेकिन मेरा अधिकांश समय कलकत्ता में बीतता था। जहाँ मेरी शिक्षा हुई। इसलिए मुझे श्री रामकृष्ण के कई प्रत्यक्ष शिष्य (direct disciples) से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। माफ़ कीजिए, मुझे श्री रामकृष्ण शब्द का इस्तेमाल करने की आदत है, मेरे हिसाब से श्री रामकृष्ण बेहतर होने चाहिए। लेकिन वे सभी भक्त हैं, वे यह कहने के आदी हैं कि उन्हें इसकी आदत है। मैं एक ऐसे स्कूल में पढ़ रहा था जो गॉस्पेल के लेखक एम. से जुड़ा हुआ था। आप लोगों ने M के बारे में जरूर सुना होगा। उनका वास्तविक नाम महेन्द्रनाथ गुप्ता था। वे श्रीरामकृष्ण के बहुत बड़े भक्त थे। और वे भी उनको बहुत पसंद करते थे। विशेष रूप से श्रीरामकृष्ण चाहते थे कि उनकी शिक्षाओं को M के द्वारा लिखा जाय। जिस कार्य को उन्होंने बहुत विश्वसनीयता के साथ पूरा किया। जिस समय मैं उस विद्यालय में पढता था , उस समय तक वे अवकाश ले चुके थे , और स्कूल से उनका कोई सम्पर्क नहीं था। लेकिन स्कूल का सम्बन्ध उनके साथ था , इसीलिए मैंने उनके नाम का उल्लेख भी किया। क्योंकि श्री रामकृष्ण के कई दूसरे प्रत्यक्ष शिष्यों के भक्तों ने इसी स्कूल में पढ़ाई की थी। इसलिए मेरे मन में उस स्कूल के कई सुखद स्मृतियाँ संजोई हुई हैं। उस स्कूल में एक शिक्षक थे ,जो अविवाहित थे और रामकृष्ण मिशन से निकट सम्पर्क में थे। उन दिनों रामकृष्ण मिशन का अर्थ था विशेष रूप से जो श्रीरामकृष्ण के प्रत्यक्ष शिष्य वहाँ थे उनका दर्शन। क्योंकि उन्हीं के माध्यम से मैं शुरू शुरू में मिशन से आकर्षित हुआ था। बेशक, जहाँ तक मुझे याद है, मेरे शुरुआती दिनों में मेरी एक इच्छा थी कि मैं एक साधु बनूँ। (10:11) यह विचार मेरे मन में कहाँ से आया , मुझे नहीं मालूम , मुझे याद नहीं है। लकिन किसी भी तरह मेरे मन में यह विचार उठा। इस विषय में मुझे केवल एक बात याद है कि मुझे एक पुस्तक मिली , I came across a book' जिसमें श्रीरामकृष्ण के एक शिष्य जिनका नाम गिरीश चंद्र घोष था। आप इस नाम से जरूर परिचित रहे होंगे। जो लोग श्रीरामकृष्ण की जीवनी से परिचित होंगे। उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी , उस उपन्यास में उन्होंने श्रीरामकृष्ण के उपदेशों को एक पात्र के जीवन में दर्शाया था। उन विचारों को पुस्तक में पढ़ा तो मैं उन विचारों से बहुत आकर्षित हुआ। 'My mother did not like that.' मेरी माँ को मेरे विचार अच्छे नहीं लगे। (11:37) हंसी - जब उन्होंने मेरे विचार सुने तो उस पुस्तक को मेरे से दूर रख दी । So when she came to know she kept the book away  from me .इसके बाद दुबारा मई उस पुस्तक को नहीं पढ़ सका। लेकिन उस पुस्तक का स्थाई-प्रभाव मेरे मन पर पड़ चुका था। जैसा मैंने आपसे कहा - 'that idea was dormant in my mind' वह विचार मेरे दिमाग में दबा हुआ था , लेकिन इसी प्रकार की घटनाओं के बाद उसके विषय में मैं और स्पष्ट रूप से जान पाया। I had a very clear idea about monastic life .  मठ-वासी जीवन (गुरु-गृहवास ?) के बारे में मुझे बहुत स्पष्ट जानकारी थी। In India those of you who have ever visited India , you may have come across such wandering monks . आप में से जो लोग कभी भारत आए होंगे , उन्हें ऐसे घुमक्कड़ वैरागी साधुओं (नागा साधु ?) को अवश्य देखा होगा। जो लोग लगभग बिना कुछ पहने एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते हैं, वे इस मामले में बिल्कुल स्वतंत्र होते हैं। और सिर पर बालों के जटाजूट बनाये रखते हैं। अपने शरीर पर राख मले रखते हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते हैं। मेरा विचार भी यही था, कि मैं भी शायद समय के साथ उनमें से एक साधु बनूंगा। किन्तु वैसा होना ही नहीं था। एक दिन, जब मैं बचपन में साईकिल (bike ) से जा रहा था, तो मैं एक ऐसे इलाके से होकर गुजरा, जहाँ पवित्र माँ रहती थीं।और जहां उद्बोधन में स्वामी सरदानंद महाराज उनकी देखभाल के लिए वहां मौजूद थे। (14:03) मेरा छात्र जीवन उधर ही बीता। एक दिन मैं गंगा नदी के किनारे वैसे ही टहल रहा था। वहाँ मैंने अपने स्कूल कुछ छात्रों को देखा, जो एक मंडली बनाकर कोई भक्तिमूलक गीत गा रहे थे। और जिस शिक्षक का उल्लेख मैंने किया था, वे भी उनके साथ थे। उत्सुकता वश मैं भी वहाँ चला गया यह देखने की वे लोग क्या कर रहे हैं। और भजन को सुनने की इच्छा भी हो रही थी। वहाँ कई छात्रों को देखा जो मुझसे परिचित थे। और शिक्षक तो मुझसे परिचित थे ही। उन्होंने मुझे इस दल में शामिल होने का आमंत्रण दिया। मैं वहाँ ठहर गया। और मुझे उनके गीत अच्छे लगे , इस प्रकार मैं उस युवा समूह में जाने लगा।  सप्ताह के अंतिम दोपहर के बाद वहां सम्मिलित होते थे। they are in small chapel-like thing , वह स्थान एक छोटे से पूजा -स्थल जैसा था। उसे कोई पूर्ण मंदिर नहीं कहा जा सकता था। लेकिन एक छोटा से गिरजा (chapel) ही था। जो भगवान शिव को समर्पित था। And Shiva I like because he was the ideal monk. और शिव मुझे इसलिए पसंद हैं क्योंकि वे आदर्श साधु थे।  इसलिए शिव के प्रति और उनके भक्तों के लिए भी मेरे मन में आकर्षण था। जो उस स्थान पर लभग रोज ही जाते थे। अतः स्वाभाविक रूप से मेरा मन उस स्थान पर जाने का करता था। और मैं उनमें से एक बन गया। (16:42)   
 फिर धीरे धीरे मेरे मन में उनके और निकट सम्पर्क में रहने की इच्छा हुई। my stay there was gradually longer, मेरा वहाँ रहना धीरे-धीरे दीर्घ काल तक का होता गया। वहाँ प्रति दिन भजनों के कार्यक्रम होते थे। शाम को संध्या आरती होती थी। उसमें से कुछ लड़के , सभी नहीं कुछ लड़के , उस पूजा स्थल में बैठकर ध्यान करते थे। मुझे वह भी अच्छा लगने लगा। उस दल के साथ मेरा सम्बन्ध और भी गहरा होता गया। फिर मैंने सोचा वहाँ केवल शाम को ही क्यों जाऊँ , वह मेरा दैनिक कार्य बन गया। अब यह देखें कि वे लोग सुबह में क्या करते हैं ? इसलिए मैं एक दिन वहाँ सुबह चला गया। उस समय बड़ा समूह तो नहीं था।  भजनों का कार्यक्रम भी नहीं हो रहा था। लेकिन पूजा हो रही थी, और ध्यान हो रहा था। मैंने आकर्षण महसूस किया और उसमें सम्मिलित हो गया। स्कूल की पढ़ाई के बाद मेरा समय वहीँ बीतने लगा। रात में घर चला जाता था। और पढाई किया करता था। उसके आलावा और सबकुछ महत्वहीन लगता था। ध्यान और पढ़ाई के साथ शास्त्र और मिशन से प्रकाशित किताबें रहती थीं। उसके विचारों से मैं परिचित होने लगा। धीरे धीरे साधु-जीवन के बारे में मेरे विचार अलग प्रकार के हो गए। मठवासी जीवन के बाहरी कर्मकांड से मेरा आकर्षण घटकर श्रीरामकृष्ण और स्वामी जी के जीवन की तरफ खींचने लगा। इस प्रकार मिशन के प्रति मेरा आकर्षण बढ़ने लगा। मजबूती से और दृष्टिकोण  स्पष्ट  होता गया। फिर उस दल के साथ रामकृष्ण मिशन के प्रधान कार्यालय मैं बेलुड़ मठ गया। जहाँ श्रीरामकृष्ण के कई प्रत्यक्ष शिष्य तब भी निवास कर रहे थे। (20:34) फिर मैं स्वामी सारदानन्द के संपर्क में आया। जो उस समय उद्बोधन में रहे थे। शायद 1916-17 की बात रही होगी ? उनके साथ मेरी घनिष्ठता , मजबूत होते हुए बढ़ती गयी , इसका सबसे मज़ेदार हिस्सा यह है कि मैं उस समय तक भी पवित्र माता के सम्पर्क में नहीं आ पाया था। वे वहाँ रह रहे थीं  , मैं इस बात को जानता था। but at that time my idea was for such holy personage to approach them will require some special preparation .लेकिन उस समय मेरा विचार था कि ऐसे पवित्र व्यक्ति से मिलने के लिए मुझे कुछ खास तैयारी करनी होगी। it will not will easy to understand them or appreciate them, उन्हें समझना या उनके गहरे आध्यात्मिक जीवन की तारीफ़ करना आसान नहीं होगा। इसलिए मैं पवित्र माता के पास जाने में इच्छुक नहीं था। मेरे कुछ मित्र श्री श्रीमाँ सारदा के सम्पर्क में आ गए थे। मैं आपको शुरू से बताना चाहूंगा। कि पवित्र मात्रा बहुत संकोच -लज्जा पालन करती थीं। वे अपने पुरुष शिष्यों से भी बात नहीं करती थीं। Only a few had direct access to her , केवल कुछ ही लोगों की उस तक सीधी पहुँच थी। केवल कुछ शिष्यों को ही उनसे सीधा मिलने की अनुमति होती थी। नहीं तो अगर वे आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए भी आते हैं, तो पवित्र माँ घूंघट ओढ़कर बैठेंगी। 
otherwise even they approach for spiritual guidance, the holy mother will seat with veil. कोई भी पुरुष शिष्य उनका चेहरा नहीं देख सकता था। and used to talk with such a low voice , और इतनी धीमी आवाज में बात-चीत करती थीं कि जिसे सुनना भी कठिन था। उनके साथ एक या दो स्त्री शिष्या रहा करती थीं। गोपाल माँ और योगिन माँ रहती थीं , जो माँ के जीवन से परिचित हैं , उन्हें जानते होंगे। वे माँ के निकट रहा करती थी। वे व्याख्या  (and used to talk with such a low voice, वे शिष्यों से अनुवाद करने का काम करती थीं की माँ ने क्या कहा है ? वे बाह्य जगत से बहुत अलग रहती थी। शायद यही कारण रहा होगा की मैं , अभी तक उनसे मिल नहीं पाया था। एक ऐसा समय आया , जब भक्तों के द्वारा पवित्र जगत जननी का जन्मदिन मनाया जा रहा था। वहाँ एक बड़ी सभा हुई थी। शिष्यगण माँ से मिलने आये थे। माँ को पूरा दिन अपने भक्तों से मिलने में बिताना था। हम छोटे बालक दल , स्वामी विवेकानन्द के शिष्य थे जिनको हमलोग 'ज्ञान महाराज' के नाम से जानते थे। वे हमलोगों को माँ से मिलवाने ले गए थे। वे बालकों के साथ बड़े हिले-मिले रहते थे। जब हमलोग बेलुड़ मठ जाते थे तो स्वामी शिवानंद मठ के प्रभारी थे। वे हमलोगों से पूछा करते थे - क्या तुमलोग दादी माँ से मिले हो ? नहीं तो तुमलोग ज्ञान महाराज के साथ जाकर मिलो। वे हमलोगों से आध्यात्मिक जीवन के ऊपर काफी चर्चा करते थे। और इतना ही नहीं युवा -किशोर दल को मठ के विविध आयोजनों में व्यस्त रखते थे। ज्ञान महाराज हमलोगों को जगतजननी माँ सारदा के पास ले गए। उस समय जो माँ की सेवा में उपस्थित महिलाएं थीं उनमें से एक ने कहा -माँ बहुत थक गयीं है। इसलिए ज्ञान महाराज अकेले आकर उन्हें प्रणाम कर लें ,इतना बड़ा लड़कों के दल को जाने नहीं है। तब ज्ञान महाराज ने उत्तर दिया -यदि मेरे लड़के माँ का दर्शन नहीं कर सकते , तो मैं यहीं से खड़े होकर माँ को अकेले प्रणाम कर लूंगा। (26:26) अकेले नहीं जा सकता। तब क्या हो सकताथा ? हम  सभी को माँ का दर्शन करने की अनुमति मिल गयी। इस प्रकार हमलोगों को माँ से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ, माँ के चरणों को स्पर्श करने का अवसर मिला। यही मेरा एक मात्र सम्बन्ध था। लोग अक्सर मुझसे पूछते है-Your reminiscence about holy mother !पवित्र माँ के बारे में आपकी यादेंका  कैसी हैं ? अगर इसे यादें कहा जा सकता है, तो हाँ! If that can be called a reminiscence, yes ! लेकिन दुर्भाग्य से इससे अधिक महत्वपूर्ण और कोई याद नहीं है। लेकिन फिर श्री रामकृष्ण और पवित्र माँ और उनके सीधे शिष्यों का प्रभाव हम जैसे युवाओं के लिए, जिनमे आध्यात्मिक जीवन के प्रति थोड़ा आग्रह था , बहुत ज़्यादा था। वे उस असर को अपनी ज़िंदगी को पूरी तरह बदलने से नहीं रोक सके। ये मेरे अपने जीवन में भी घटित हुआ। जैसा मैंने आप से कहा -आध्यात्मिक जीवन की इच्छा तो थी , किन्तु मैं यह नहीं जानता था कि  -what monasticism is ? मठवास का जीवन क्या है ? मैंने सोचा था था कि यह केवल पूरे शरीर पर राख का पोशाक पहनने, और सिर पर जटाजूट धारण करने जैसा कुछ होगा। इतना तो हम जानते थे , कि उत्तरी भारत में मठवासी जीवन जितना लोकप्रिय है, उतना ही विशेष रूप से बंगाल में जहाँ मठवासी जीवन उतना लोकप्रिय नहीं था। श्री रामकृष्ण के प्रत्यक्ष शिष्यों के माध्यम से एक बिल्कुल New type of monasticism' नए प्रकार का मठवाद प्रचलित हुआ। जिसको देखकर युवा लोग उसके साथ जुड़ने को आग्रही हुए। इसी प्रकार मेरा सम्बन्ध भी बेलुड़ मठ से हुआ। उसका एक प्रभाव यह हुआ कि सामान्य अध्ययन (usual study) के प्रति मेरा आकर्षण घटता गया। मिशन के आदर्श में मेरा आकर्षण बढ़ता गया। आप शायद इसके जानने  लिए इच्छुक नहीं होंगे। लेकिन जब मैं याद करता हूँ, तब अपने जीवन के उस हिस्से के बारे में सोचता हूँ। मैंने सोचा था कि स्कूल की पढ़ाई की समाप्त करने के बाद मैं मठ में शामिल हो जाऊंगा। मैंने सोचा था कि यदि मुझे ईश्वरलाभ नहीं करा सकता , तो इस पढाई का क्या फायदा है ? ये बड़ी बात या गहरी बात है। धीरे धीरे मैंने रामकृष्ण मठ से जुड़ने की इच्छा व्यक्त की। उस समय स्वामी शिवानन्द जी महाराज बेलूड़मठ के प्रमुख थे। उस समय वे मुझे मठ से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित नहीं किये थे। उन्होंने कहा पहले तुम अपनी पढाई पूरी कर लो। लेकिन मैं उनसे मठ से जुड़ने की अनुमति देने का आग्रह करता रहा। पर वे राजी नहीं हुए। इस लिए मैंने सोचा कि पढाई पूरी करना किसी काम की चीज नहीं है , इसलिए मैं घर से भाग कर सीधा हिमालय पहाड़ चला जाउँगा। (30:56) हमारे यहाँ मान्यता है कि हमालय पर्वत साधुओं का निवास स्थान है। इसलिए मैंने सोचा कि मैं भी वहीं चला जाऊँगा। सबसे मजेदार कहानी है -कि मैं पैदल ही हिमालय पर जाना चाहता था। मुझे दुरी का अनुमान नहीं था , और बिना पैसा लिए ही जाना था। मैं और मेरे साथ दो मित्र भी तैयार थे। मेरा एक मित्र जो बाद में वो भी संन्यासी बना। जो उम्र में मुझसे थोड़ा बड़ा था। और एक दूसरा था। और दूसरा वो शिक्षक जिनके बारे में मैंने कहा था , हम तीनों पैदल हिमालय जाने के लिए निकल पड़े। मेरे पास 1 डॉलर का 1/6 भाग पैसा था। छुट्टा पैसा था। बहुत कष्ट सहकर भी भिक्षा मांगना आसान नहीं था। क्योंकि हमलोगों को इसकी आदत नहीं थी। अक्सर भूखे रहना पड़ता था , कभी भाग्य से थोड़ा खाना मिल जाता था। ३ दिन के बाद हमलोग पूरी तरह से थका हार गए। और घर की तरफ इस विचार को लेकर लौटे कि हमलोग कलकत्ता के मित्रों से कुछ पैसा उधार लेकर , हिमालय का टिकट खरीदकर फिर से यात्रा शुरू करेंगे। पहले हमलोग उस शिक्षक से मिलेंगे , क्योंकि वे हमलोगों को साधु बनने के लिए सहायता जरूर करेंगे। उन्होंने पाया की हमलोग तीन दिन खाये बिना रहे थे , उन्होंने पहले हमें भोजन दिया। हमलोग खाना शुरू किये। इसी बीच उन्होंने मेरी माँ को सूचना दे दी। वे रोते हुए दौड़ी आ गयी। इस लिए मैं पकड़ा गया। और वापस घर ले जाया गया। हमारे प्रथम प्रयास का यही परिणाम निकला। अब मैं जिस दूसरे महत्वपूर्ण बात को कहना चाहता हूँ , कुछ समय बाद मैं अपने एक मित्र से पैसा उधार लिया। और टिकट खरीद कर हिमालय की तराई में - हरिद्वार जा पहुंचा। (34:28) वहाँ भी मिशन का एक केंद्र है। पहले मैं हरिद्वार केंद्र गया। उस समय वहां श्रीरमकृष्ण का जन्मतिथि पूजा मनाया जा रहा था। हमलोगों ने उस उत्स्व में भाग लिया। उसके बाद हमलोग हिमालय के और भीतर ऋषिकेश जाने का प्रयास किये। जहाँ जत्था में रहते हैं। वहां रामकृष्ण मिशन के स्वामी लोग भी वहां तपस्या कर रहे थे। मैं उनके साथ चला गया। उस समय मैं एक लड़का था। उनलोगों ने सोचा यदि यह वहां जायेगा उसका जीवन बर्बाद हो जायेगा। इसलिए मुझे वे अपने साथ तपस्थली में ले गए। मैं उनके साथ रहने लगा। एक स्वामी दयानन्द थे जो मुझे वापस लौटने के लिए समझने लगे। कि पढ़ाई पूरी करने के बाद ही रामकृष्ण मठ से जुड़ना ठीक रहेगा। (36 :27) बहुत समझाने के बाद मुझे लगा कि ये स्वामी मेरे भले के लिए ही बोल रहे हैं। अतः मैं वापस लौट आया। जब लौटा तो मेरा फ़ाइनल इम्तहान हो ने वाला था। मैंने सोचा यदि मैं स्कूल फ़ाइनल पास कर लूंगा तो मुझे कॉलेज जाना होगा। और उसके बाद मेरा जीवन कहाँ जायेगा , कुछ पता नहीं। इसलिए मैंने शुरू में इम्तिहान छोड़ देने का निर्णय लिया। पर उन्होंने मुझे इम्तिहान देने पर राजी किया। वो एक लम्बी कहानी है। फिर मैंने कॉलेज में नाम लिखाया। और मुझे एक आश्रम में रहने का अवसर मिला। वो आश्रम उस समय तक रामकृष्ण मठ से मान्यता प्राप्त नहीं था। यद्यपि क़ानूनी तौर से मान्यता नहीं मिली थी , लेकिन वह आश्रम  मठ से अच्छीतरह जुड़ा हुआ था। वहाँ रहते समय मैं बेलुड़ मठ और वहाँ के संन्यासियों से , और श्री रामकृष्ण के अन्य शिष्यों के संपर्क में रहा। मेरे आने के बाद वो आश्रम बाद में कार्य करना बंद कर दिया। अब उसका अस्तित्व नहीं है। (38 :38) मुझे ऐसा लगता है , शायद वह आश्रम मेरे लिए ही बना होगा। वहाँ से मैंने स्वामी सारदानन्द जी महाराज से सम्पर्क किया। स्वामी सारदानन्द जी महाराज ने कृपा करके मुझे मंत्रदीक्षा देदी। मैंने उनसे कहा कि मैं ब्रह्मचर्य दीक्षा लेना चाहता हूँ। संन्यासी होने की यह प्रथम अनुष्ठान होता है। मुझे यह देखकर ख़ुशी हुई कि उन्होंने मुझे निराश नहीं किया। उन्होंने ने कहा कि केवल बेलुड़ मठ के प्रधान स्वामी शिवानन्द जी महाराज ही तुमको ब्रह्मचर्य दीक्षा दे सकते हैं , उनके पास जाओ। मैंने कहा मुझे उनसे भय लगता है। (39:39) क्योंकि मैंने आपसे कहा था कि उन्होंने कई बार मेरे अनुरोध को टाल दिया था। तो मैं उनसे डरता हूँ , वे मुस्कुराये और बोले तुम जाकर, मेरी ओर से  ज्ञान महाराज को बोलो। वे जानते थे की ज्ञान महाराज हमलोग से नजदीक हैं। वे तुमको स्वामी शिवानन्द महाराज के पास ले जायेंगे। उन दिनों आश्रम का क़ानूनी मान्यता होना उतना जरुरी नहीं था। हमलोग मात्र उस आश्रम से जुड़े हैं , इतना कहना यथेष्ट था। उन्होंने सहमति प्रदान कर दी। पर एक शर्त के साथ कि मैं कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर लूंगा। फिर से वही शर्त वहाँ थी। पर मैंने सोचा चलो कॉलेज की पढाई पूरी करते हैं। उसी आश्रम में रहते हुए मैंने कॉलेज की पढ़ाई पूरी की। और 1923 में मेरी ब्रह्मचर्य दीक्षा हो गयी। उन दिनों जब भी छुट्टी मिलती मैं अपने गाँव चला जाता। जब कॉलेज खुला होता , तब आश्रम में रहता। स्नातक की डिग्री लेने के बाद मैंने कॉलेज और पढाई को छोड़ दिया। और बेलुड़ मठ आकर इससे जुड़ गया। मेरा यह सौभाग्य था कि स्वामी शिवानन्द जी जब वहाँ के प्रमुख थे , स्वामी सुबोधानन्द जी महाराज , वहाँ स्थायी रूप से रह रहे थे। और स्वामी सारदानन्द जी कोलकाता में रहते हुए भी अक्सर बेलुड़ मठ आते रहते थे। और जो भी स्वामी उस समय तक जीवित थे, वे हमारे साथ बेलुड़ मठ में अक्सर रहते थे। इसलिए मुझे उनके साथ अक्सर मिलने का सौभाग्य मिलता था। इस प्रकार मेरा संन्यासी जीवन प्रारम्भ हुआ। उसके बाद का जीवन खुली किताब है , इसलिए मुझे विस्तार में कहने की जरूरत नहीं है। कि किन केंद्रों में मैंने अपनी सेवाएं दी हैं। पर एक महत्वपूर्ण बात मुझे आपसे कहनी है। (43 :04)
    जब मैं बेलुड़ मठ में था तब स्वामी सारदानन्द जी महाराज से, जो मेरे गुरु थे, उनके बहुत निकट संपर्क में था। उनसे ही मैंने अपनी मंत्रदीक्षा प्राप्त की थी। उसके अतिरिक्त जब मैं बेलुड़ मठ में रहने लगा , तब मेरा परम सौभाग्य था कि मुझे स्वामी शिवानन्द महाराज के निकट सानिध्य में रहने का मौका मिला। जो यहाँ के अध्यक्ष थे। उनके एक सचिव की की कृपा से जो , स्वामी शिवानन्द महाराज के सेक्रेटरी थे। उन्होंने मुझे स्वामी शिवानन्द महाराज की व्यक्तिगत रूप से सेवा करने का अवसर प्रदान किया। उनका मालिश करना, और उनके सेवा के लिए निकट रहने के फलस्वरूप उनके सहायता से सेवा किया। मैं कभी कभी ऐसे शब्दों का प्रयोग करता हूँ , उनका attendant होने का सौभाग्य। उस समय यह अवसर मिला था real importance and significance of monastic life gradually ' यह अनुभव केवल पुस्तक पढ़ने से नहीं मिल सकता। यह सौभाग्य केवल उनके जीवंत सानिध्य में रहने से ही प्राप्त होता है। पवित्र साहचर्य से ही प्राप्त होता है। तब आदर्श के बारे में स्पष्ट धारणा होती है। inspiration and guidance, आगे बढ़ने की प्रेरणा और मार्गदर्शन मिलता है। मेरे लिए बहुत अंतरंग क्षण थे जिन्हें शब्दों में नहीं कहा जा सकता। क्योंकि उसका प्रभाव शब्दों से नहीं होता , संसर्ग में रहने से ही मिलता है। क्या मैं आगे बोलूं ? अभी आप और आधा घंटा बोल सकते हैं। मुझे एक महत्वपूर्ण बात कहनी है। उस समय मेरे मन एक विचार उठा कि श्री रामकृष्ण के शिष्य के साथ इतने करीबी संपर्क में रहना एक दुर्लभ सौभाग्य है। जिनको वे बहुत आदर करते थे। उसके साथ साथ एक दूसरा प्रबल इच्छा थी जो क्रमशः मजबूत होती जा रही थी। कुछ समय अकेले ध्यान में बिताने की इच्छा हुई। (47 :34) जब एक दिन मैं स्वामी शिवानन्द जी महाराज  की मालिश कर रहा था। मैंने उनसे पूछा महाराज मैं अपने बारे में निर्णय नंहीं ले पा रहा हूँ कि मेरे लिए क्या करना अच्छा होगा ? यहाँ के पवित्र वातावरण में रहूं , और आपकी निजी सेवा करने का सौभाग्य के साथ रहूं या ऐसा जीवन व्यतीत करूँ जो सिर्फ आध्यात्मिक अभ्यास का जीवन हो ? दोनों इच्छाएं मेरे भीतर प्रबल हैं। मैं खुद निर्णय नहीं कर पा रहा रहा हूँ। कृपया आप मेरा मार्गदर्शन करें। मैं जानता हूँ कि यह सौभाग्य छीन जाने पर दुबारा नहीं मिलेगा। किन्तु साथ ही साथ मैं आध्यात्मिक जीवन भी व्यतीत करना चाहता हूँ। जिसको आप तपस्या कहते हैं। जिसको ध्यान , सेवा , तप शारीरिक , शुद्धता , कहते हैं। 
(49 :24)  उन्होंने मुझे बहुत उत्साहित करते हुए कहा तुम्हें तप करने के लिए अवश्य जाना चाहिए। हाँ , तुम्हें अवश्य जाना चाहिए। स्वामी शिवानन्द महाराज को जब किसी बात पर जोर देना होता था , तब उसे दो बार बोलते थे। किन्तु मेरे बच्चे , तपस्या के लिए जाने के पहले आवश्यक तयारी कर लो। यहीं रहते हुए ध्यान में और गहरे उतरने का अभ्यास करो। हिमालय में तपस्या, आध्यात्मिक अभ्यास करने से ज्यादा आवश्यक यहां रहते हुए अभ्यास करो। उन्होंने मुझे देह मालिश से मना कर दिया। और ध्यान करने के लिए उत्साहित किया। पर इस समय तुम्हारा स्वास्थ्य उतना अच्छा नहीं है , इसलिए तपस्या के लिए ऐसे जगह में जाओ, जहाँ तुम्हारे स्वास्थ्य पर बुरा असर न हो।  
दो तीन दिन बाद उन्होंने निर्णय लिया कि मुझे बनारस जाना चाहिए। उस समय बनारस में ऐसे कई स्थान थे जहाँ साधु जाकर, भिक्षाटन करते हुए  रह सकते थे। और साधना भी कर सकते थे। क्योंकि हमलोगों एक आश्रम भी वहां है। वहां बीमार लोगों के इलाज के लिए साधुओं द्वारा सेवा का अस्पताल भी है। वहां भोजन और अस्पताल में दिक्क्त नहीं है , इसलिए वहां जाना अच्छा होगा। मैं खुद निर्णय नहीं ले प् रहा हूँ , लेकिन मेरी इच्छा हिमालय जाने की है जहाँ कोई मुझे पहचान न सके। मैं बनारस गया और वहां आश्रम से थोड़ी दूर स्थित एक मंदिर में रहने लगा। (53:00)
वहां साधना करता था और शहर के भक्तों से भिक्षा मांगकर खाता था। वहाँ सन्यासियों के भिक्षाटन करना मना नहीं है। मैं उसी तरह का जीवन व्यतीत करने लगा। कुछ दिनों बाद मैंने शिवानन्द जी महाराज को लिखा भिक्षा माँगकर पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन नहीं मिल सकता। इसलिए जो कुछ मिल जाता है , उससे मेरा काम चल जाता है और , मेरा स्वास्थ भी अभी तक ठीक है। यदि आप अनुमति देंगे तो मैं उत्तरकाशी चला जाऊँगा। फिर अपना भरपूर आशीर्वाद देते हुए मुझे जाने की अनुमति दे दी। मैं उत्तरकाशी चला गया और वहां रहा।
इसका उल्लेख मैंने इसीलिए किया कि रामकृष्ण मिशन केवल विभिन्न प्रकार की परोपकारी क्रियाकलापों (philanthropic activity) को ही प्रोत्साहित नहीं करता। बल्कि इसके साथ ही साथ 'Inner Life of the monk' साधु (नेता) के आन्तरिक जीवन (चरित्र) के उत्कर्ष पर भी ध्यान रखता है। (54:32) " Where he and his God "  जहाँ वह साधु (नेता) और उसके भगवान (भक्त और उसके इष्टदेव या आदर्श का अद्वैत) केवल यही दो चीजें मायने रखती हैं,  इसके अलावा और कुछ मायने नहीं रखता। 

साधु जीवन (monastic life) का ही यह दूसरा पहलू है। मेरे कहने का यह तात्पर्य नहीं कि 'एक' को महत्व देने का अर्थ 'दूसरे' पक्ष को कमजोर नहीं करना है। [आंतरिक जीवन गठन पर जोर देने का तात्पर्य , शिव ज्ञान से जीव सेवा करने के पहलु को नजरअंदाज (ignored-उपेक्षित) करना नहीं है।]    
स्वामी विवेकानन्द ने संन्यासी जीवन के लिए (या गृहस्थ नेता दोनों के लिए) यही आदर्श स्थापित किया है। जिस आदर्श को स्वामी जी ने दो जुड़वाँ आदर्श से अभिव्यक्त किया है। संन्यासियों के लिये स्वामी विवेकनन्द द्वारा प्रदत्त आदर्श वाक्य है -'आत्मनो मोक्षार्थं , जगत हिताय च।' -"For the liberation of the self and for the good of the world" .स्वामी जी ने संन्यासियों के लिए जुड़वाँ आदर्श और उद्देश्य दिया -"स्वयं की मुक्ति और जगत का कल्याण। " ये दोनों आदर्श-twin Ideals are mixed up together' परस्पर मिले हुए हैं। यह आदर्श हमें प्रेरणा देता है कि हमें स्वयं अपनी मुक्ति के लिए प्रयास करते हुए (अर्थात स्वयं ' साधन-चतुष्टय का अभ्यास' करते हुए) दूसरों के लिए 'helpful' (उपकारी, मददगार) भी बनना चाहिए, अर्थात दूसरों को भी साधन चतुष्टय का अभ्यास करने के लिए प्रेरित करते रहना चाहिए। they are mutually beneficial . क्योंकि ये दोनों आदर्श  परस्पर लाभकारी हैं आदर्श है। इसलिए ' there is necessity of having both sides maintained !' इसलिए साधना दोनों पहलू - "ज्ञान और भक्ति" को बनाए रखने की ज़रूरत है। - " Be helpful to others , they are mutually beneficial ! so there is necessity of having both sides maintained !"
और स्वामी शिवानन्द जी महाराज ने मुझे तपस्या करने जाने से रोका नहीं , बल्कि उसके लिए प्रोत्साहित भी किया। लेकिन उसके साथ ही साथ वे, मुझे सावधान करना भी नहीं भूले कि इसका भी ध्यान रखना कि इस प्रकार समाज से कट कर अलग जीवन गठन करने की साधना करना , तपस्या करना कुछ समय के लिए तो ठीक है। (56:24)  लेकिन हमेशा वैसा ही जीवन जीना ठीक नहीं है। तुम उत्तरकाशी तपस्या करने जाओ , उस तपस्वी जीवन का अनुभव भी प्राप्त करो। लेकिन उसके बाद  लौटकर वापस आओ और रामकृष्ण मठ का सक्रीय सदस्य Active Member बने रहो। क्योंकि जीवन के ये दोनों पहलू मिलकर ही एक सम्पूर्ण आध्यात्मिक जीवन का निर्माण करते हैं। because both sides together can make up one's whole spiritual life . ' किसी एक ही पहलू पर जोर देकर , दूसरे पहलू की उपेक्षा करना ठीक नहीं। यह मैंने सीखा अपने मठ के संन्यासी जीवन से।
    जैसा मैंने आपसे पहले कहा , साधु जीवन के बारे में मेरे ऐसे विचार पहले नहीं थे। शुरुआती दिनों में मेरा विचार था कि दूसरों के कल्याण की कोई चिंता किये बिना, साधु सिर्फ अपने आध्यात्मिक जीवन को उत्कृष्ट बनाने के लिए ही हुआ जाता है। 
किन्तु यह श्रीरामकृष्ण की शिक्षा ही थी , जिसको लोग बिना स्वामी विवेकानन्द के आदर्श जीवन के उदाहरण से तुलना किये बिना बहुत सही रूप में समझ नहीं पाते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने स्वयं इस शिक्षा को अपने गुरु श्री रामकृष्ण के चरणों में बैठकर सीखा था। (57:54)  कि संन्यासी/त्यागी जीवन का अर्थ यह नहीं है कि तुम अपने आस-पास के लोगों की परवाह ही मत करो , जिन्हें तुम्हारी सेवा की ज़रूरत हो सकती है। monastic life doesn't mean, being unconcerned with the people around you, who may need your service . and the service unto them will be really service unto God .और उनकी सेवा सचमुच परमेश्वर की सेवा होगी। या जरूरत मंदों की सेवा करना ही वास्तव में ईश्वर की सेवा करना है। यह एक ऐसा आदर्श था जिसे,  मानवजाति के इतिहास में स्वामी विवेकानन्द के आलावा किसी दूसरे के द्वारा अभी तक इतना जोर नहीं दिया गया था। और यह आदर्श भी उन्होंने श्रीरामकृष्ण के चरणों में बैठकर दिए गए पाठ से ग्रहण किया था। (58:40) यदि स्वामी विवेकानन्द ने इस आदर्श को अपने जीवन के उदाहरण से प्रमाणित न किया होता तो , नहीं तो संन्यासी जीवन का एक पहलू अंजाना ही रह जाता। ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि हम अपना सम्पूर्ण जीवन समाजसेवा को समर्पित कर दें। या अपने जीवन को सिर्फ आध्यात्मिक अभ्यास करने के लिए ही खपा नहीं देना चाहिए। और समाज सेवा को पूर्णतया उपेक्षित छोड़ दिया जाये। तो यही महान शिक्षा मुझे बेलुड़ मठ में अनेक वर्षों तक सेवा करके सीखना पड़ा।
 अच्छा गृहस्थ लोगों के लिए क्या सन्देश हुआ ? pertinent question प्रासंगिक प्रश्न है - गृहस्थ लोगों के लिए क्या सन्देश होगा ? [लेकिन  गृहस्थों के लिए स्वामी विवेकनन्द द्वारा प्रदत्त किन्तु अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल के 'Founder Secretary' संस्थापक सचिव श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय द्वारा विवेकानन्द साहित्य से (खण्ड 9, पेज ३७९ से) अविष्कृत आदर्श वाक्य है  "Be and Make ! " दोनों आदर्शों का एक ही अर्थ है। लेकिन सभी युवा अभी मोक्ष की प्रबल इच्छा वाले नहीं हो सकते , इसलिए हमें प्राथमिक दृष्टि से स्वयं (चरित्रवान) मनुष्य बनने का प्रयास करते हुए दूसरों को मनुष्य बनने के लिए अनुप्रेरित करना चाहिए। ]

 श्रीरामकृष्ण को ही उद्धृत करते हुए - यह करना है कि तुम अपने गृहस्थ धर्म का पालन करो , लेकिन एक हाथ से ईश्वर के चरणों को पकड़े रहो। और दूसरे हाथ से संसार के काम करो। पहले एक हाथ से भगवान को पकड़ो , बिना भगवान को पकड़े हुए नहीं। (अर्थात बिना ईश्वरलाभ किये संसार में भी आसक्त मत रहो। ) लेकिन गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी यह बहुत आवश्यक है कि, householder environment' गृहस्थ वातावरण से बाहर निकलकर साल भर में कुछ दिनों का निर्जनवास भी करते रहना चाहिए,  जहाँ उनको यह सीखने का मौका मिलेगा कि मनुष्य जीवन की दो प्रमुख चीजें है - एक भक्त और दूसरा उसका भगवान (इष्टदेव)  
 उन दोनों के बीच कम से कम साल भर में कुछ दिनों के लिए निर्जनवास या (एक महीने का कल्पवास-कोई सांसारिक आसक्ति नहीं आना  चाहिए।) गृहस्थ जीवन के वातावरण को त्याग कर कुछ दिनों का निर्जनवास अवश्य करना चाहिए। where the environment will be congenial then only you have that deep anchoring in spiritual life . जहां का माहौल साधना के अनुकूल होगा, तभी आप आध्यात्मिक जीवन में गहरी पकड़ बना पाएंगे। तभी आध्यात्मिक जीवन की सहायता से गृहस्थ धर्म का पालन भी बहुत कुशलतापूर्वक सम्पन्न होगा , और अंततोगत्वा  आध्यात्मिक जीवन और गृहस्थ जीवन का अन्तर भी मिट जायेगा। तुम्हारा गृहस्थ का जीवन और तुम्हारा ईश्वर केंद्रित जीवन पूरी तरह से एक दूसरे में  विलीन हो जायेंगे। यही है आदर्श जीवन। लेकिन उस आदर्श में प्रतिष्ठित होने के लिए तुमको समय समय पर गृहस्थ जीवन के कर्तव्यों को त्यागकर, ईश्वर केंद्रित जीवन जीने के लिए  निर्जन वास करना पड़ेगा।  इसलिए श्रीरामकृष्ण हम गृहस्थों की कठिनाई को समझते थे। इसलिए एक महीना का निर्जनवास या 6 दिनों का हो , 3 दिनों का हो , 2 दिनों का भी निर्जनवास होना जरुरी है। उससे भी जीवन गठन में सहायता मिलेगी। यह भी श्रीरामकृष्ण के उपदेश हैं। 
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Here is rare video of Swami Bhuteshananda from the Archive of the Vedanta Society of Southern California. This talk on the Five Sheaths of the Soul was given at the Hollywood Temple.

Swami Bhuteshananda, the twelfth President of the Ramakrishna Order, was born on 8 September 1901 at Somsar in Bankura district of West Bengal. His pre-monastic name was Vijay Chandra Roy. His parents were Purna Chandra Roy and Charubala Devi. As a student in Kolkata, he met Brahmachari Jnan Maharaj, a disciple of Swami Vivekananda. Under his guidance, he along with a group of other young boys started frequenting the Belur Math and met many of the direct disciples of Sri Ramakrishna.

In 1921, Swami Saradananda initiated Vijay with Mantradiksha. He was bestowed with the vows of brahmacharya by Swami Shivananda on 30 December 1923 and was named ‘Priyachaitanya’. Swami Gambhirananda was among the others who were initiated into brahmacharya on the same day. He served at the Belur Math in the temple of Sri Ramakrishna and got scriptural lessons from a pandit. For some time he served Mahapurush Maharaj also. On 23 February 1928, Swami Shivananda initiated him into sannyasa.

Thereafter, Swami Bhuteshananda set out for tapasya and spent about two years in the Himalayas. On his return, he was sent to the Dhaka Centre where he served till 1932. Then he went to Mysore to join the study circle for studying scriptures. There he taught his brother-monks the Brahmasutra.

In 1936, Swami Bhuteshananda was made the head of the centre at Shillong. There he got the opportunity to serve the hill-tribes. In 1945, he was made the head of the Rajkot Math. During his tenure there, the ashrama thrived remarkably. He took much pain for getting the Ramakrishna-Vivekananda literature translated into Gujarati. He rendered untiring service in the relief operations organized by the Order in the flooded areas of West Bengal in 1926, as the Camp-in-charge of the Burma Evacuee Relief in 1942 and many others.

In 1965, Swami Bhuteshananda was made a Trustee of the Ramakrishna Math and a member of the Governing Body of the Ramakrishna Mission. In 1966, he joined at the Belur Math as an Assistant Secretary. In 1975, he became one of the Vice Presidents of the Order and moved over to Yogodyan Math, Kankurgachhi at Kolkata. Following the ‘Mahasamadhi’ of Swami Gambhirananda, he took the onus of the President of the Ramakrishna Math and Ramakrishna Mission, on 24 January 1989.

Though Swami Bhuteshananda was an extraordinary scholar and could speak untiringly on scriptural subjects, yet he did not author a book. However, his class lectures were transcribed and brought out as books which are very popular for the lucid expositions of profound thoughts.

During the long period of twenty-three years as the Vice President and also as the President of the Order, he traveled to many countries including Singapore, Fiji, Japan, Australia, America, Canada, England, France, Bangladesh and Sri Lanka. He carried the ideals and ideas of the Ramakrishna-Vivekananda Movement to innumerable people.

Swami Bhuteshananda was austere yet jovial in nature. His extraordinary scholarship, simplicity and humanity made him an extraordinary monk. He was easily approachable and had motherly affection towards all. His erudition and total surrender to the Supreme Will were deeply ingrained in him and never were manifested externally, except under compelling situations. His personality beamed with universal love. He left his mortal body for his heavenly abode on 10 August 1998 at the age of 97.

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वर्तमान युग की अनिवार्यता 

(साधन-चतुष्टय का प्रचार प्रसार करने में समर्थ महामण्डल कर्मी का निर्माण)

स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - 
      " वर्तमान युग का हिन्दू युवक , सनातन धर्म के अनेक पंथों की भूलभुलैया में भटका हुआ है,  -महावाक्यों के मर्म को नहीं समझ पाने के कारण , जब अपने पूर्वजों के एकमात्र हिन्दू धर्म में आस्था खोकर उन पाश्चात्य देशों से जिसने भौतिकता के सिवा कभी कुछ जाना ही नहीं , उनकी दृष्टि से अपने सनातन धर्म को तौलता है। अंत में उस खोज को बिल्कुल त्याग देता है , या निपट अज्ञेयवादी बन जाता है।...केवल वे ही बच पाते हैं जिनकी आध्यात्मिक प्रकृति सद्गुरु के संजीवनी स्पर्श से जाग्रत हो चुकी है। (९/३६१)  
" अब हिन्दू वैदिक सनातन धर्म के सभी सम्प्रदायों को स्थूल रूप से - ज्ञानमार्गी और भक्तिमार्गी - इन दो श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है।  शंकराचार्य जी के अनुसार -' ब्रह्म की अनुभूति और मोक्ष की प्राप्ति किसी अनुष्ठान, मत, वर्ण , जाति या सम्प्रदाय पर अवलम्बित नहीं है। कोई भी साधन -चतुष्टय सम्पन्न साधक उसका अधिकारी बन सकता है। साधन-चतुष्टय सम्पूर्ण चित्तशुद्धि प्रदान करने में सक्षम कुछ अनुष्ठान मात्र हैं। 
[साधन चतुष्टय -1. विवेक की परिभाषा 2. वैराग्य 3 . षट सम्पत्ति (शम-दम -उपरति -तितिक्षा -श्रद्धा - समाधान) 4. मुमुक्षुत्व अर्थात मोक्षलाभ की प्रबल इच्छा।] (९/३७०) 
'जो ब्रह्मविद सो ब्रह्म है , ताको वाणी वेद।  संस्कृत या भाषा में करत भरम का छेद। ' (९/३७१) क्या भारत मर जायेगा ? तब तो संसार से सारी आध्यात्मिकता का समूल नाश हो जायेगा। ....(९/३७७) 
" अपने वैदिक हिन्दू सनातन धर्म के उसी एक मात्र केन्द्रवर्ती सत्य पर खड़े हो जाओ - जो हिन्दू, बौद्ध , और जैनियों की पैतृक सम्पत्ति है। वह सत्य है - प्रत्येक मनुष्य में अंतर्निहित आत्मा - जो अजर , अमर और अविनाशी है। जिसकी महिमा का वर्णन वेद भी नहीं कर सकते प्रत्येक स्त्री-पुरुष , उच्चतम देवों से लेकर कीड़ों तक में वही आत्मा विकसित या अविकसित रूप में व्याप्त है। अन्तर प्रकार में नहीं, केवल परिमाण में है।
" मानवमात्र में अन्तर्निहित आत्मा की इस शक्ति का प्रयोग स्थूल देह (Hand आकार) पर होने से भौतिक उन्नति होती है ,  मन (Head निराकार) पर होने से आत्मनोमुखी बुद्धि का विकास होता है , और अपने स्वरुप (Heart चेतन आत्मा) पर होने से मनुष्य भगवान (पूर्ण) बन जाता है। [भगवान मनुष्य बना था , अब प्रत्येक मनुष्य को भगवान बनना होगा।] पहले हमें भगवान बन लेने दो। उसके बाद दूसरों को भगवान बनाने में सहायता देंगे। 'Be and Make' बनो और बनाओ , यही हमारा मूल मंत्र रहे। ऐसा न कहो कि मनुष्य पापी है। उसे यह बताओ कि - प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है" (9/३७९) 
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  सुमिर-सुमिर नर उतरो पार, भव सागर की तीक्षण धार।

1. धर्म जहाज मांहि चढ़ लीजै, संभल-संभल ताहि पग दीजै,
श्रम कर मन को संगि कीजै, हरि मार्ग को लांघो पार।
2. बागवान फुन ताहि चलावे, पाप भरे तो हलन न पावे,
काम क्रोध लुटन को आए, सावधान हो कर संभार।
3. मान पहाड़ी तहां अड़त है, आसा तृष्णा भंवर पड़त है,
पांच मच्छ जहां चोट करत है, ज्ञान आंख बल चलो निहार।
4. ध्यान धनी का हृदय धारे, गुरु कृपा से लगे किनारे,
जब तेरी बोहित उतरे पार, जन्म-मरण दुख विपदा हार।
5. चौथे पद में आनन्द पावे, या जग में तू बहुर न आवे,
चरणदास गुरुदेव चितावे, सहजो बाई यही विचार
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नैहरवा हमका नहिं भावे, हमका नहि भावै।

1. साई की नगरी परम अति सुंदर, जहँ कोई जावे ना आवै।
चाँद सूरज जहाँ पवन ना पानी, को संदेश पहुँचावे।
दरद यह साईं कौन सुनावै।।
2. आगे चलो पंथ नहिं सूझै, पीछै दोष लगावै।
केहि विधि ससुरे जाव मोरी सजनी, बिरहा जोर जनावै।
विषय रस नाच नचावै।।
3. बिन सदगुरु अपनो नहिं कोई, जो यह राह बतावै।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, अपने में प्रीतम पावै।
तपन यह जिय की बुझावै।।

राम का गुणगान करिये, राम का गुणगान करिये।
राम प्रभु की भद्रता का, सभ्यता का ध्यान धरिये॥
राम के गुण गुणचिरंतन,
राम गुण सुमिरन रतन धन।
मनुजता को कर विभूषित,
मनुज को धनवान करिये, ध्यान धरिये॥
सगुण ब्रह्म स्वरुप सुन्दर,
सुजन रंजन रूप सुखकर।
राम आत्माराम,
आत्माराम का सम्मान करिये, ध्यान धरिये॥  
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