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शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

⚜️️🔱1. इष्टनिष्ठा :आत्मा (पवित्र त्रयी) प्रेमस्वरूप है। (The Chosen Ideal-vol 3) / ⚜️️🔱2. 'इष्ट' आत्मा (पवित्र त्रयी) प्रेमस्वरूप है। (भक्ति योग पर प्रवचन -खण्ड 9. P/51)⚜️️🔱 (THE ISHTA) (THE ISHTA :Volume 4, Addresses on Bhakti-Yoga) ⚜️️🔱करावलम्बं मम देहि विष्णो, गोविन्द दामोदर माधवेति।

(The Chosen Ideal-vol 3) 

इष्टनिष्ठा

आत्मा (पवित्र त्रयी) प्रेमस्वरूप है।

अब हम इष्ट-निष्ठा के सम्बन्ध में विचार करेंगे। जो भक्त बनना चाहता है, उसे यह जान लेना चाहिए कि "जितने मत हैं, उतने ही पथ" (so many opinions are so many ways)। उसे यह अवश्य जान लेना चाहिए कि विभिन्न धर्मों के विविध संप्रदाय उसी एक प्रभु (ठाकुर) की महिमा की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं।  

'लोग तुम्हें कितने नामों से पुकारते हैं। लोगों ने विभिन्न नामों से तुम्हें विभाजित सा कर दिया है। परन्तु फिर भी प्रत्येक नाम (राम, कृष्ण, बुद्ध ,ईसा.....अल्ला, काली, बंदीमैया) में तुम्हारी पूर्ण शक्ति वर्तमान है। इन सभी नामों से तुम उपासक को प्राप्त हो जाते हो। यदि ह्रदय (आत्मा) में तुम्हारे प्रति अनन्य प्रेम रहे , तो तुम्हें पुकारने का कोई निर्दिष्ट समय (जप करने का special time) भी नहीं है। तुम्हें पाना इतना सहज होते हुए भी , मेरे प्रभु (ठाकुर) , यह मेरा दुर्भाग्य ही है, जो तुम्हारे प्रति मेरा अनुराग नहीं हुआ ! " 

इतना ही नहीं, भक्त को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि वह उन तेजस्वी संतों से नफ़रत न करे, न ही उनकी आलोचना करे, जो अलग-अलग संप्रदायों के संस्थापक हैं; उसे उनके बारे में बुरा बोलते हुए भी नहीं सुनना चाहिए। सच में, ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जिनमें व्यापक सहानुभूति और सराहना की शक्ति के साथ-साथ प्रेम की तीव्रता भी होती है।

इतना ही नहीं, भक्त को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि अन्य धर्म -सम्प्रदायों के तेजस्वी प्रवर्तकों के प्रति उसके मन में घृणा उत्पन्न न हो, वह उनकी निंदा न करे और न कभी उनकी निन्दा ही सुने ऐसे लोग वास्तव में बहुत कम होते हैं, जिनका ह्रदय इतना उदार हो जो दूसरों में सिर्फ महान गुणों को ही परखने में समर्थ हों , और साथ ही प्रगाढ़प्रेम- सम्पन्न भी हों। [ extensive sympathy and power of appreciation, as well as an intensity of love.' दादा कहते थे - 

मनसि वचसि काये पुण्य पीयूष पूर्णाः 

त्रिभुवनं उपकार श्रेणिभिः  प्रीणयन्तः 

परगुण परमाणून् पर्वती कृत्य नित्यं 

निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः  ।

(नीतिशतकम् (५३/२२१)

ऐसे मन में, वाणी में और शरीर में पुण्य रूपी अमृत से भरे हुए, दूसरों के छोटे छोटे गुण को भी बड़ा गुण मानते हुए, अपने ह्रदय समुद्र जितना विशाल बनाते हुए;  -तीनों लोक में उपकार कर के उन्हें पर्वत के समान बढ़ा-चढ़ाकर कहते हुए उस की प्रसन्नता को बढाते हुए, अपने मन में प्रसन्न होते हुए सज्जन इस जगत में कितने हैं ? वे तो अतीव दुर्लभ होते हैं। 

.... फिर भी हम जानते हैं कि बहुत से लोगों को ऐसे आदर्श में शिक्षित कर सकना सम्भव है, जिसमें प्रेम की तीव्रता और ह्रदय की उदारता का अपूर्व सामजंस्य हो। और ऐसा करने का उपाय है यह - इष्टनिष्ठा। ( "steadfast devotion to the chosen ideal". 'प्रत्याहार के बाद ह्रदय में धारणा का अभ्यास करने हेतु निर्धारित आदर्श -(पवित्र त्रयी ) के प्रति पक्की भक्ति" को ही इष्टनिष्ठा कहा जाता है।) धर्मों के भिन्न भिन्न सम्प्रदाय मनुष्य-जाति के सम्मुख केवल एक एक आदर्श रखते हैं।  परन्तु हिन्दू सनातन वैदिक धर्म ( eternal Vedantic religion) ने तो भगवान के मन्दिर में प्रवेश करने के लिए अनेकानेक मार्ग खोल दिए हैं, और मनुष्य-जाती के सम्मुख असंख्य आदर्श उपस्थित कर दिये हैं। और इन आदर्शों में से प्रत्येक उस अनन्तस्वरुप ईश्वर की एक एक अभिव्यक्ति है।

अतः भक्तियोग हमें इस बात का आदेश देता है कि हम भगवत्प्राप्ति के विभिन्न मार्गों में से किसी के भी प्रति घृणा न करें, किसी को भी अस्वीकार न करें। फिर भी, जब तक पौधा छोटा रहे, जब तक वह बढ़कर एक बड़ा पेड़ न हो जाय, तब तक उसे चारों ओर से घेरकर रखना आवश्यक है।आध्यात्मिकता का यह छोटा पौधा यदि आरम्भिक , अपरिपक्व दशा में ही भावों और आदर्शों के सतत परिवर्तन के लिए खुला रहे, तो वह  मर जाएगा। (The tender plant of spirituality will die if exposed too early to the action of a constant change of ideas and ideals.) 

बहुत से बहुत से लोग, जिसे 'धार्मिक उदारता' (या धर्म-निरपेक्षता religious liberalism) के नाम पर अपने आदर्शों (पवित्र त्रयी) को अनवरत बदलते रहते हैं। सदा नयी नयी बातें सुनने के लिए लालायित रहना उनके लिए एक बीमारी सा , एक नशा के जैसा हो जाता है।  उनके लिए धर्म एक प्रकार से अफ़ीम के नशे के समान (intellectual opium-eating) है और बस , उसका वहीं अन्त हो जाता है।

    भगवान श्रीरामकृष्ण कहा करते थे - " एक मनुष्य दूसरे प्रकार का भी होता है, जिसकी उपमा 'मोती बनाने वाली सीपी' (pearl-oyster, पर्ल ऑयस्टर) के कहावत (Folklore) से दी जा सकती है। सीपी समुद्र की तह (bottom) छोड़कर स्वाति नक्षत्र के पानी की एक बून्द लेने के लिए ऊपर उठ आती है , और मुँह खोले हुए सतह (surface) पर तैरती रहती है। ज्यों ही उस नक्षत्र (लग्न) का एक बूँद पानी (बीजमंत्र) पड़ता है, त्यों ही वह मुँह बन्द करके एकदम समुद्र की तह में चली जाती है। और जब तक उस बूँद से एक सुन्दर मोती का निर्माण (जीवन-गठन) नहीं कर लेती , तब तक वहीं विश्राम करती रहती है। इष्टनिष्ठा का भाव प्रकट करने के लिए यह एक अत्यन्त काव्यात्मक और सशक्त उदाहरण है, और इतनी सुन्दर उपमा शायद ही पहले कभी दी गयी हो। साधक के लिए आरम्भिक दशा में यह एक-निष्ठा नितान्त आवश्यक है।  

( It floats about on the surface of the sea with its shell wide open, until it has succeeded in catching a drop of the rain-water, and then it dives deep down to its sea-bed, and there rests until it has succeeded in fashioning a beautiful pearl out of that rain-drop.")   

हनुमान जी के समान उसे भी यह भाव रखना चाहिए - 

"श्रीनाथे जानकीनाथे अभेदः परमात्मनि। 

तथापि मम सर्वस्वः रामः कमललोचनः॥" 

यद्यपि परमात्मदृष्टि से लक्ष्मीपति और सीतापति दोनों एक हैं , तथापि मेरे सर्वस्व तो वे ही कमललोचन श्री राम हैं। अथवा तुलसीदास ने भी जैसा कहा है - 

"सबसे रसिये सबसे बसिये, सबका लीजिए नाम। 

हाँ जी हाँ जी करते रहिए, बैठिए अपने ठाम॥"

" सब के साथ बैठो , सबके साथ मीठी बोली बोलो, सबका नाम लो और सबसे 'हाँ हाँ' कहते रहो, पर अपना स्थान मत छोड़ो - अर्थात अपना भाव दृढ़ रखो। ("Take the sweetness of all, sit with all, take the name of all, say yea, yea, but keep your seat firm.) 

सच्चे भक्त को भी ऐसा ही करना चाहिए। तब साधक यदि सच्चे , निष्कपट भाव से साधना करे, तो इस बीज से भारत के बटवृक्ष (Indian banyan) की तरह एक विशाल विटप उत्पन्न होकर , सब दिशाओं में अपनी शाखायें और जड़ें फैलाता हुआ धर्म के सम्पूर्ण क्षेत्र (entire field of religion) को आच्छादित कर लेगा।

 "Thus will the true devotee realise that He who was his own ideal in life is worshipped in all ideals by all sects, under all names, and through all forms."

तभी तो सच्चे भक्त को यह अनुभव होगा कि उसका अपना ही इष्टदेवता (पवित्र त्रयी) विविध सम्प्रदायों में विभिन्न नामों और विभिन्न रूपों में पूजित हो रहा है। (खण्ड -4 P, 35)   

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इष्ट 

(भक्ति योग पर प्रवचन -खण्ड 9. P/51) 

(THE ISHTA) 

(THE ISHTA :Volume 4, Addresses on Bhakti-Yoga)  

'इष्ट' के चयन का सिद्धांत के सम्बन्ध में मैं संक्षेप में कुछ पहले बतला चुका हूँ। उसे तुम लोग ध्यान देकर सुनो , क्योंकि उसे ठीक ठीक समझ लेने पर हम दुनिया के सभी धर्मों को समझ सकेंगे। 'इष्ट' शब्द 'इष' धातु से बना है, जिसका अर्थ है इच्छा करना, चाहना या चुन लेना। (The word Ishta is derived from the root Ish, to desire, choose. The ideal of all religions, all sects, is the same — the attaining of liberty and cessation of misery.सभी धर्मों, सभी संप्रदायों का आदर्श तथा मानवजाति का आदर्श एक ही है ; और वह है मुक्ति लाभ तथा दुःखों की निवृति। जहाँ कहीं भी धर्म देखोगे, वहाँ यही पाओगे कि यही आदर्श किसी न किसी रूप में कार्य कर रहा है। यही एक लक्ष्य (goal) है, जिसकी ओर हम सब अग्रसर हो रहे हैं। हम दुःखो से, प्रतिदिन के दुःख-कष्टों से मुक्त होना चाहते हैं, और मुक्ति पाने के लिए - भौतिक , मानसिक और आध्यात्मिक मुक्ति-लाभ के लिए छटपटा रहे हैं। संसार-चक्र इसी भावना को लेकर प्रवर्तित हो रहा है। लक्ष्य एक होते हुए भी, वहाँ तक पहुँचने के मार्ग भिन्न -भिन्न हो सकते हैं। ये मार्ग हमारी प्रकृति (स्वभाव) की विशेषताओं के अनुसार निर्धारित होते हैं। एक मनुष्य भावुक प्रकृति का होता है , दूसरा बौद्धिक तथा तीसरे की प्रकृति कर्मशीलता होती है, इत्यादि इत्यादि। 

पुनः एक ही प्रकृति में अनेक प्रभेद हो सकते हैं। उदाहरणार्थ 'प्रेम ' को लो , जिसका भक्ति के साथ विशेष सम्बन्ध है। एक मनुष्य  प्रकृति में बच्चे के लिए अधिक प्रेम हो सकता है, दूसरे की प्रकृति में पत्नी के लिए , किसी में माता , किसी में पिता तथा किसी में मित्रों के लिये। इसी प्रकार किसी में अपने देश के लिये प्रेम रहता है , और कुछ इने-गिने लोगों का प्रेम विशाल मानवता के प्रति हुआ करता है। पर ऐसे लोगों की संख्या बहुत ही कम होती है , यद्यपि हर व्यक्ति इस प्रेम के विषय में इस प्रकार बात करता है , मानो वही उसके जीवन का मार्गदर्शक और प्रेरक (guiding motive power) हो। 'इस प्रकार के प्रेम' (ज्ञानमयी दृष्टि से universal love -ब्रह्ममय जगत) का अनुभव कुछ सन्तों ने ही किया है। इस वृहत मानवसमाज में केवल कुछ महापुरुषों (great soulsको ही इस सार्वभौमिक प्रेम का अनुभव हुआ करता है और हम आशा करते हैं कि यह संसार ऐसे महात्माओं से कभी शून्य न होगा।  [Some few sages have experienced it. A few great souls among mankind feel this universal love, and let us hope that this world will never be without such men.] 

हम देखते हैं कि एक ही विषय में साध्य की प्राप्ति के इतने भिन्न भिन्न मार्ग हैं। सभी ईसाई ईसा में विश्वास करते हैं; पर सोचो तो सही , उनके बारे में कितने भिन्न भिन्न विचार इन लोगों के होते हैं। हर एक चर्च (Each church) या ईसाई -सम्प्रदाय ईसा को भिन्न भिन्न रूप में देखता है , भिन्न भिन्न दृष्टिकोण से देखता है। 'Presbyterian' (पादरी-संघ) की दृष्टि (बुद्धि या मति) में ईसा के जीवन का वह दृश्य महत्वपूर्ण दीखता है , जब वे सिक्का बदलने वालों के पास गये ! उनकी दृष्टि में ईसा योद्धा (fighter) ही जँचते हैं। पर यदि तुम 'Quaker' (शांति-प्रचारक) से पूछो तो वह शायद यही कहेगा कि "He forgave his enemies." - ' उन्होंने अपने शत्रुओं को क्षमा प्रदान की। ' Quaker का यही मत है। इसी तरह और भी हैं। यदि 'Roman Catholic' से पूछो कि तुम्हें ईसा की जीवनी का कौन सा अंश विशेष प्रिय है , तो वह शायद यही कहेगा कि जब उन्होंने कुंजियाँ पीटर को दे दीं। इसी प्रकार प्रत्येक सम्प्रदाय ईसा को अपने ही तरीके से देखने के लिए बाध्य है। 

इससे यह सिद्ध होता है कि एक ही विषय में बहुत से भेद-प्रभेद होंगे। अज्ञानी लोग इनमें से किसी एक प्रभेद को ले लेते हैं और उसी को अपना आधार बना लेते हैं , और विश्व की व्याख्या अपनी दृष्टि (मति, बुद्धि) के अनुसार करके दूसरे के अधिकार का केवल निषेध ही नहीं करते , वरन यह कहने तक का साहस करते  हैं कि दूसरों का मार्ग बिल्कुल गलत है तथा केवल उन्हीं का सत्य है। यदि उनका विरोध किया जाता है, तो वे लड़ने लगते हैं। 

 [Ignorant persons (अविवेकी अर्थात अविद्या -अस्मिता -राग-द्वेष- अभिनिवेश आदि पंचक्लेश से ग्रस्त व्यक्ति ) take one of these subdivisions (समाज सेवा के अन्नदान , वस्त्रदान आदि) या कोई 'Be and Make ' का प्रचार कार्य)  and take their stand upon it, and they not only deny the right of every other man to interpret the universe according to his own light, but dare to say that others are entirely wrong, and they alone are right.  If they are opposed, they begin to fight.  They say that they will kill any man who does not believe as they believe, just as the Mohammedans doThese are people who think they are sincere, and who ignore all others. ]  

मुसलमानों की तरह वे कहते हैं कि जिस मनुष्य का धार्मिक विश्वास उन्हीं की तरह का नहीं है , उसे वे कत्ल कर डालेंगे ; जैसे कि कुछ धर्मान्धों ने अतीत में किया है और भिन्न -भिन्न देशों में आज भी कर रहे हैं। ये लोग अपने को ही सच्चा मानते हैं और शेष दूसरों को कुछ नहीं समझते। पर इस भक्तियोग में हम किस प्रकार की दृष्टि (जैसी बुद्धि या मति वैसी गति) से अपनी भूमिका निभाना चाहते हैं? दूसरों से केवल इतना कहने से ही काम न बनेगा कि तुम्हारा मार्ग गलत नहीं है, बल्कि हमें उनसे यह कहना होगा कि तुम जिस मार्ग का अनुसरण कर रहे हो , वह ठीक है। तुम्हारी प्रकृति के अनुसार जो मार्ग तुम्हारे लिए अनिवार्य हो वही तुम्हारे लिए यथार्थ मार्ग है।[ That way, which your nature makes it absolutely necessary for you to take, is the right way.

हर मनुष्य अपने पूर्व-अस्तित्व ( past existence या पूर्व -जन्म) के कारण अपनी प्रकृति में विशेषता लेकर पैदा होता है। चाहे हम उसे अपने पूर्वजन्म के कर्मों का फल कहें अथवा पूर्वजों से प्राप्त संस्कार कहें। हम उसकी व्याख्या चाहे जैसी करें, पर हम हैं तो अतीत के ही परिणाम। यदि कुछ भी तय है (absolutely certain -पक्का विश्वास है) तो इतनी बात तो बिल्कुल सत्य है , चाहे वह अतीत हमारे पास किसी भी मार्ग से आया हो। इसका स्वाभाविक निष्कर्ष यह है कि पत्येक व्यक्ति की वर्तमान दशा , अपने भूतकालीन कारण का ही कार्य है। इस कारण हममें से प्रत्येक की एक विशेष गति , एक विशेष प्रवृत्ति होती है और इसीलिए प्रत्येक को अपना मार्ग स्वयं निर्धारित करना पड़ता है। [whatever way we may put it, we are the result of the past - that is absolutely certain, through whatever channels that past may have come.  It naturally follows that each one of us is an effect, of which our past has been the cause; and as such, there is a peculiar movement, a peculiar train, in each one of us; and therefore each one will have to find way for himself.]

जो कोई भी मार्ग या पद्धति (प्रवृत्ति या निवृत्ति) हमारी स्वाभाविक प्रकृति के अनुकूल हो उसी को 'इष्ट मार्ग' (chosen way) कहते हैं। यही 'इष्ट ' का सिद्धान्त है और वही 'इष्टदेव' (पवित्र त्रयी) हमारा मार्ग भी है। 

[पवित्र त्रयी को अपने जीवन का आदर्श या 'ध्रुवतारा' बना लेने के पीछे का यही तत्व है This is the theory of Ishta, and that way which is ours we call our own Ishta.]

उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति की भगवान के विषय में यह धारणा हो कि वह सम्पूर्ण विश्व का सर्वशक्तिमान शासक है। सम्भवतः उस मनुष्य का अपना स्वभाव भी इसी प्रकार का है। वह स्वयं एक 'दबंग व्यक्ति' है (overbearing manहै, जो सब पर शासन करना करना चाहता है; अतः स्वाभाविक रूप से  भगवान को भी वह सर्वशक्तिमान शासक मानता है। [He is an overbearing man who wants to rule everyone; he naturally finds God an omnipotent Ruler.]

   दूसरा मनुष्य, जो शायद स्कूलमास्टर है और कठोर स्वभाव का है, ईश्वर को न्यायधीश या दण्ड देनेवाला भगवान (God of punishment) समझता है। वह ईश्वर के बारे में अन्य भावना नहीं कर सकता। इस प्रकार हम में से प्रत्येक व्यक्ति अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार ईश्वर का एक एक रूप मानता है। और अपनी अपनी प्रकृति (मति या बुद्धि) के अनुसार निर्माण किया हुआ यह रूप ही हमारा इष्ट होता है। 

... तुम कभी शायद किसी मनुष्य को  उपदेश देते हुए सुनकर यह सोचो कि यही उपदेश सर्वश्रेष्ठ है और तुम्हारे बिल्कुल अनुकूल है। दूसरे दिन तुम अपने एक मित्र के पास जाकर उसका उपदेश सुन आने को कहते हो। और वह यह विचार लेकर लौटता है कि आजतक उसने जितने उपदेश सुने , उनमें वह सबसे निकृष्ट है। उसका ऐसा कहना गलत नहीं है, और उसके साथ झगड़ा करना निरर्थक है। उपदेश तो ठीक था, पर उस मनुष्य के उपयुक्त नहीं था। थोड़ा और विस्तार से कहें तो , विभिन्न दृष्टिकोण (मूढ़बुद्धि- शुद्ध बुद्धि-मति) से देखने पर सत्य सत्य भी हो सकता है , और साथ ही सत्य नहीं भी। 

( He is not wrong, and it is useless to quarrel with him. The teaching was all right, but it was not fitted to that man. To extend it a little further, we must understand that truth seen from different standpoints can be truth, and yet not the same truth.

प्रारम्भ में यह विरोधाभासी जान पड़ेगा , पर याद रहे कि "निरपेक्ष सत्य एक ही है, सापेक्षिक सत्य अवश्य अनेक" हो सकते हैं।  (This would seem at first to be a contradiction in terms, but we must remember that an absolute truth is only one, while relative truths are necessarily various.) उदाहरण के लिए, इस विश्व -ब्रह्माण्ड के विषय में ही अपने विचारों पर गौर करो। 

-'This universe, as an absolute entity, is unchangeable, and unchanged, and the same throughout. But you and I and everybody else hear and see, each one his own universe.'

यह विश्व एक निरपेक्ष अखण्ड वस्तु है, जिसमें परिवर्तन नहीं हो सकता और न हुआ है। वह सदा एकरस ही है। पर तुम, हम और हर कोई इस विश्व को अलग अलग देखता सुनता है। सूर्य को ही लो। सूर्य एक है, पर जब तुम और हम और सौ अन्य मनुष्य भिन्न भिन्न स्थानों में खड़े होकर सूर्य की ओर देखते हैं , तो हममें से प्रत्येक व्यक्ति सूर्य को अलग अलग देखता है। स्थान का थोड़ा सा ही अन्तर सूर्य के दृश्य को मनुष्य के लिए भिन्न बना देता है। वातावरण में थोड़ा सा हेरफेर हो जाये तो दृश्य में और भी भिन्नता आ जाएगी। इसी तरह सापेक्ष अनुभवों में सत्य सदा अनेक दिखाई देता है। पर निरपेक्ष सत्य तो एक ही है ! (So, in relative perception, truth always appears various. But the Absolute Truth is only oneआत्मा =  ईश्वर , भगवान, ब्रह्म, सच्चिदानन्द

अतः यदि दूसरे लोग धर्म के बारे में कुछ ऐसा कह रहे हैं जो, धर्म के प्रति हमारी भावना से बिल्कुल मेल नहीं खाता हो, तब भी हमें उनसे लड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है। हमें स्मरण रखना चाहिए कि परस्पर विपरीत दीखते हुए भी हमारे और उनके दोनों के विचार सत्य हो सकते हैं। (We ought to remember that both of us may be true, though apparently contradictors.)

सूर्य को ही केंद्र मानकर यदि एक वृत्त खींचा जाये , तो ऐसे करोडो अर्धव्यास (Radius-त्रिज्या) हो सकते हैं, जो उसी सूर्य में केन्द्रित हो विलीन हो जाते हैं। दो अर्धव्यास केन्द्र से जितनी दूरी पर होंगे, उन दोनों में उतना ही अधिक अन्तर होगा , परन्तु जब वे केन्द्र में जाकर एक साथ मिलेंगे , तब सारा भेद समाप्त हो जायेगा। ऐसा ही एक 'केन्द्र' है, जो मनुष्य मात्र का 'absolute goal' - परम ध्येय है। वह है ईश्वर (आत्मा, भगवान, ब्रह्म, सच्चिदानन्द)। हम सब अर्धव्यास हैं। इन अर्धव्यासों के बीच का अन्तर ही हमारी संवैधानिक सीमाएँ हैं, जिनमें से होकर ही हम ईश्वर के स्वरुप दर्शन कर सकते हैं। (The distances between the radii are the constitutional limitations through which alone we can catch the vision of God.अवतार-वरिष्ठ के या आत्मा और परमात्मा के सच्चिदानन्द स्वरुप , ब्रह्मस्वरूप का दर्शन कर सकते हैं।) जब तक हमारी अद्वैत-बुद्धि अपने को आत्मा (ईश्वर या भगवान से अभिन्न) नहीं समझ लेती , तब तक हममें से प्रत्येक को उस एक मात्र परमतत्व (Absolute Realityआत्मा , इष्टदेव , काली या अवतार वरिष्ठ) के भिन्न भिन्न दृश्य दिखाई पड़ना अनिवार्य है। अतः ये सभी दृश्य (सम्मोहित बुद्धि की दृष्टि -मति) सत्य हैं , और हमें आपस में झगड़ा करने की आवश्यकता नहीं है।  'The only solution lies in approaching the centre. ' हमारे मतभेदों को सुलझाने का एक मात्र उपाय उस केन्द्र के निकट पहुँचना ही है। बहस या लड़ाई द्वारा यदि हम अपने मतभेदों को दूर करना चाहें , तो सैकड़ों वर्ष तक प्रयत्न करने पर भी हम किसी निर्णय पर न पहुँचेंगे। 'History proves that.'  इतिहास इस बात का साक्षी है। आपसी मतभेदों को सुलझाने का एक मात्र उपाय है - आगे बढ़ना तथा केन्द्र की ओर जाना। और जितनी जल्दी हम ऐसा करेंगे, उतनी ही जल्दी हमारे मतभेद दूर हो जायेंगे। (The only solution is to march ahead and go towards the centre; and the sooner we do that the sooner our differences will vanish.)

अतः 'इष्ट' चयन के इस सिद्धान्त का अर्थ है, हर किसीको अपना धर्म (प्रवृत्ति या निवृत्ति मार्ग) स्वयं चुन लेने की स्वतंत्रता देना। जिसकी उपासना कोई स्वयं करता हो , दूसरे को भी उसी की उपासना करने के लिए विवश नहीं करना चाहिए। सभी प्रकार के मनुष्यों को एक ही झुण्ड में शामिल करने की चेष्टा करना , सभी को भेड़िया -धसान हाँक कर एक ही कोठरी में बन्द करने का प्रयत्न भूतकाल में तो निष्फल हुए ही हैं , भविष्य में भी निष्फल ही होंगे ; क्योंकि प्रकृति की भिन्नता के कारण ऐसा हो सकना या कर सकना असम्भव है। यही नहीं , बल्कि इससे मनुष्य की प्रगति के अवरुद्ध हो जाने की भी सम्भावना है।    

[This theory of Ishta, therefore, means allowing a man to choose his own religion. One man should not force another to worship what he worships. All attempts to herd together human beings by means of armies, force, or arguments, to drive them pell-mell into the same enclosure and make them worship the same God have failed and will fail always, because it is constitutionally impossible to do so.Not only so, there is the danger of arresting their growth. ]

शायद ही कोई ऐसा बिरला पुरुष या स्त्री ऐसी मिले जो किसी न किसी धर्म के पालन की चेष्टा में न लगी हो, पर सन्तोष कितनों को मिला है ? सन्तोष या कुछ पाने वालों की संख्या कितनी अल्प है! How few find anything! And why? Simply because most of them go after impossible tasks. They are forced into these by the dictation of others कितने कम लोगों को कुछ (ईश्वरलाभ)मिल पाता है। और ऐसा क्यों होता है ? इसलिए कि उनमें से बहुतेरे असम्भव कार्यों में हाथ डाल देते हैं। वे इन मार्गों में (प्रवृत्ति या निवृत्ति में) दूसरों के आदेश से जबरदस्ती डाल दिए गए हैं। उदाहरणार्थ, मेरे बचपन में ही मेरे पिता मेरे हाथ में एक छोटी सी पुस्तक दे देते हैं और कहते हैं , ईश्वर इस प्रकार का है और ऐसा ऐसा है। मेरे मन में इन बातों को भर देने का उनका क्या प्रयोजन ? मेरा विकास किस तरह होगा, यह उन्हें क्या मालूम ? मेरी प्रकृति का विकास कहाँ तक हुआ है, यह उन्हें विदित नहीं है, फिर भी वे अपने विचारों को मेरे दिमाग में घुसाना चाहते हैं। फल यह होता है कि मेरे मन का विकास रुक जाता है। 

तुम किसी पौधे को ऐसी जमीन पर नहीं ऊगा सकते , जो उसके उपयुक्त न हो। बालक अपने आप ही सीख लेता है। तुम तो उसे उसके ही मार्ग में आगे बढ़ने के लिए सहायता मात्र दे सकते हो। तुम उसके मार्ग की कठिनाइयों को दूर कर सकते हो , पर ज्ञान तो उसके अपने स्वभाव से ही उत्पन्न होता है। बालक अपने को स्वयं ही शिक्षा देता है। तुम मेरी बातों को सुनने आये हो। घर जाकर , तुमने जो यहाँ सीखा है तथा यहाँ आने के पूर्व तुम्हारे मन में जो था , उन दोनों का मिलान करो। तब तुमको पता लगेगा कि यही बात तुमने भी सोची थी ; मैंने तो केवल उस बात को प्रकट मात्र किया है। मैं तुमको किसी बात की शिक्षा नहीं दे सकता। शिक्षा तो तुम स्वयं ही अपने को दोगे। मैं तो शायद तुमको अपने उस विचार के प्रकट करने में सहायता ही दे सकूँ। 

आदर्श बहुत से हैं। मुझे कोई अधिकार नहीं कि मैं तुमको बताऊँ कि तुम्हारा आदर्श क्या होना चाहिए ? या कि तुम्हारे गले में कोई आदर्श मढ़ दूँ। मेरा तो यह कर्तव्य होगा कि तुम्हारे सम्मुख मैं इन विभिन्न आदर्शों को रख दूँ , और तुमको अपनी प्रकृति के अनुसार जो आदर्श (नेता) सबसे अधिक अनुकूल जँचे, उसे ही तुम ग्रहण करो और उसी ओर अनवरत प्रयत्न करो।  This is your Ishta, your special ideal.वही तुम्हारा 'इष्ट' है, वही तुम्हारा विशेष आदर्श (नेता -'ध्रुवतारा'-पवित्र त्रयी) है। 

इस तरह हम देखते हैं की 'सामूहिक धर्म ' (congregational religion) कभी नहीं हो सकता। धर्म का यथार्थ कार्य क्या है , यह तो स्वयं सोचने का विषय है। (जब जैसा , तब तैसा , शान्ति चाहो तो दोष मत देखो -----) धर्म के बारे में मेरी अपनी एक भावना है। मुझे उसको पवित्र और गुप्त रखना चाहिए , क्योंकि मैं जानता हूँ कि वही भावना तुम्हारी भी हो , यह आवश्यक नहीं है। दूसरी बात यह कि हर किसी को मैं अपनी भावना के सम्बन्ध में बताकर क्षोभ क्यों फैलाऊँ ? दूसरे लोग आकर मुझसे लड़ेंगे। यदि मैं उन्हें अपने विचार न बताऊँ , तो वे मुझसे लड़ नहीं सकते। पर यदि मैं अपने विचार उन्हें बतलाता फिरूँगा , तो वे अवश्य मेरा विरोध करेंगे। अतः उनके विषय में चर्चा करते फिरने से क्या लाभ ? इस 'इष्ट ' को गुप्त ही रखना चाहिए , क्योंकि यह तो तुम्हारे और ईश्वर के बीच की बात है।    

" भले ही मुझे जीवन भर में केवल आधे दर्जन स्त्री-पुरुष ही अनुयायी मिलें , पर वे लोग सच्चे पुरुष और स्त्री हों , पवित्र और निष्ठावान हों। मुझे झुण्ड के झुण्ड अनुयायी नहीं चाहिए। झुण्डों से क्या लाभ ? संसार का इतिहास कुछ थोड़े दर्जन मनुष्यों से ही बना है। ऐसे मनुष्यों की गणना अँगुलियों पर की जा सकती है। बाकि लोग तो निकम्मे और शोरगुल मचाने वाले ही थे। गुप्त सभाओं और पाखण्डों से पुरुष और स्त्री अपवित्र , दुर्बल और संकुचित बन जाते हैं। दुर्बलों की कोई इच्छाशक्ति नहीं रहती और वे कभी काम नहीं कर सकते। अतः ऐसी चीजों से कोई वास्ता ही न रखो। सब गुप्त रूप में विषय-वासनाएं हैं , मिथ्या रहस्य-प्रेम हैं। "No one who is the least impure will ever become religious." रत्ती भर भी अपवित्रता के रहते मनुष्य धार्मिक नहीं बन सकता। पीब -भरे घावों को गुलाब के फूलों से ढाँकने का प्रयत्न मत करो।  Do you think you can cheat God? None can. क्या तुम समझते हो कि तुम ईश्वर को ठग सकते हो ? ईश्वर को कोई ठग नहीं सकता। Be common, everyday, nice people.तुम सीधे -साधे साधारण मनुष्य बनो। आजकल हर कोई आकर तुमसे अपने को प्रेरित कहता है, और आध्यात्मिकता का दावा करता है। प्रश्न है कि हम दिव्यज्ञान और धोखेबाजी (deception) को कैसे पहचाने ? यथार्थ अन्तःप्रेरणा (दिव्यज्ञान) कभी तर्कशक्ति की विरोधी नहीं होती। 

हमें सदा स्मरण रखना चाहिए कि आत्मा (पवित्र त्रयी) प्रेमस्वरूप है। 'गंगा किनारे बसकर जो पानी के लिए कुआँ खोदता है, वह मूर्ख नहीं तो क्या है ? हीरे की खान के समीप रहते हुए जो काँच की गोलियां ढूँढ़ने में ही सारी जिन्दगी व्यतीत कर देता है , वह सचमुच मूर्ख ही है।

 आत्मा (ईश्वर या ठाकुर) हीरों की खान है। हम सचमुच में मूर्ख हैं , जो भूत -प्रेतों और उसी तरह की अन्य निरर्थक गप्पों के लिये ईश्वर का परित्याग करते हैं। यह एक रोग है , विकृत कामना है। इससे मानव जाति का अधःपतन हो जाता है। ये सब उद्भ्रान्त कथायें स्नायुओं पर अप्राकृतिक रूप से अत्यधिक दबाव पहुँचाती हैं और धीरे धीरे परन्तु निश्चित रूप से इन विषयों से प्रेम रखने रखने वाली जाति को वीर्यहीन बना देती है। ईश्वर, शुद्धता , पवित्रता और धार्मिकता की बातों को छोड़कर इन निरर्थक मूर्खता भरी बातों के पीछे दौड़ना घोर पतन है। दूसरों के विचारों को जान लेने के लिए उत्कण्ठित रहना ! यदि मैं लगातार 5 मिनट दूसरों के विचारों को एक साथ जान लूँ , तो मैं पागल हो जाऊँगा।   अतः शक्तिशाली बनो, उठो और प्रेम रूपी ईश्वर की खोज करो। यही सर्वोच्च बल है। पवित्रता की शक्ति से बढ़कर कौन सी शक्ति श्रेष्ठ हो सकती है ? प्रेम और पवित्रता ही दुनिया के शासक हैं। ईश्वर का यह प्रेम बलहीनों द्वारा प्राप्य वस्तु नहीं है। अतः शारीरिक , मानसिक , नैतिक और आध्यात्मिक किसी प्रकार से दुर्बल मत बनो। केवल आत्मा ही सत्य है। अन्य सब कुछ असत्य है। अतएव आत्मा (इष्ट को चाहने) के लिए अन्य सभी वस्तुओं का त्याग कर देना चाहिए। सब कुछ व्यर्थ है, सब कुछ असारों का असार है। केवल ईश्वर और ईश्वर की ही सेवा करो ! [ प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है, इस दृष्टि में निरन्तर प्रतिष्ठित रहते हुए - उस अन्तर्निहित ब्रह्मत्व (निःस्वार्थपरता) को अभिव्यक्त करते हुए तुम स्वयं पूर्ण निःस्वार्थी मनुष्य बनो और दूसरों को भी निःस्वार्थी मनुष्य बनने में सहायता करो -'Be and Make ' यही तुम्हारा ध्येय मंत्र रहे ! नेता को माँ के समान अमजद और शरत दोनों की माँ बनकर ह्रदय में विराजित आत्मा , इष्ट, अवतार वरिष्ठ सत्य (सारदा माँ) पवित्र त्रयी जैसी प्रेम की मूर्ति बनो और बनाओं ।[ The Lord alone is true. Everything else is untrue; everything else should be rejected for the salve of the Lord. Vanity of vanities, all is vanity.  ब्रह्मैव इदं सर्वं,आत्मैव इदं सर्वं। प्रत्येक व्यक्ति के ह्रदय में विराजित 'इष्ट' (पवित्र त्रयी) ही उसकी आत्मा हैं ! Serve the Lord and Him alone. ] 

We must always remember that God is Love.  Be strong and stand up and seek the God of Love. This is the highest strength. What power is higher than the power of purity? Love and purity govern the world. This love of God cannot be reached by the weak; therefore, be not weak, either physically, mentally, morally or spiritually. The Lord alone is true. Everything else is untrue; everything else should be rejected for the salve of the Lord. Vanity of vanities, all is vanity. Serve the Lord and Him alone.

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[https://ramanujramprapnna.blog/2018/02/27/praptti-sharanagai-nyaas/

अहं मुमुक्षु शरणं प्रपद्ये  ! 

प्रपत्ति (शरणागति, न्यासं, आत्मसमर्पण, आत्म-निक्षेपं, भरन्यासम)

Prapatti (Sharanagati, Nyasam, Surrender, Self-submission, Bharanyasam)

 शरणागति :

 जब व्यक्ति यह समझता है कि वो खुद अपनी रक्षा करने में असमर्थ (क्योंकि कर्म, ज्ञान एवं भक्ति हीन) है और भगवान के अलावा कोई और उसकी रक्षा करने में समर्थ नहीं हैं। तब वह भगवान को असहाय भाव में रक्षा करने को पुकारता है। मन (बुद्धि) की इस अवस्था को शरणागति (शरणं आगति) कहते हैं। अपनी हार स्वीकार कर भगवान [हृदय में विराजित आत्मा 'पवित्र त्रयी'] से उपाय बनने की विनती करना ही उपाय है ‘उप समीपे अयते इति उपायः’। जो कर्म लक्ष्य के करीब ले जाए उसे उपाय कहते हैं। शरणागति में तत्त्व नारायण हैं, पुरुषार्थ भी नारायण हैं और हित (उपाय) भी नारायण ही हैं। 

अपनी आत्मा को परमात्मा को सौंप देना ही शरणागति (आत्म-निक्षेप) है। 

[देह रूपी रथ की सारथि शुद्ध बुद्धि को रथ में सवार  रथी -अविनाशी आत्मा (पवित्र त्रयी) को सौंप देना ही शरणागति (आत्म-निक्षेप) है।]

आत्मा आत्मीय भरण्यासो हि आत्मनिक्षेप उच्यते।। (लक्ष्मी तंत्र 17.29) 

प्रपत्ति शब्द दो मूल धातु से बना है- ‘प्र’ और ‘पद’। ‘प्र’ का अर्थ है ऊँचा और ‘पद’ यानि कदम। अर्थात सर्वोच्च की ओर कदम बढ़ाना ही प्रपत्ति है।

 

प्रमाण

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो, न मेधया न बहुना श्रुतेन।

        यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः, तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूँ स्वाम्॥

{मुण्डक उपनिषद (3.2.3) और कठोपनिषद (1.2.23)}

यह आत्मा न तो प्रवचन करने से , न बुद्धि-चातुर्य से , और न ही बहुत अधिक शास्त्र सुनने से उपलब्ध होता है । केवल उसी को यह आत्मा प्राप्त होता है , जिसे आत्मा स्वयं स्वीकार करता है ; उसी साधक के लिए यह आत्मा अपने दिव्य -स्वरूप का अनावरण करता है ।

             परमात्मा आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि आत्मा इन्द्रिय और बुद्धि की सीमाओं से परे है , इसलिए प्रवचन , मेधा (तर्क-चातुर्य) और बहुश्रुति (अनेक शास्त्रों का ज्ञान) आत्मज्ञान के साधन नहीं बन सकते हैं । आत्मा को पाने का एकमात्र उपाय है...(पवित्र त्रयी का) अनुग्रह

श्री रामानुजाचार्य जी , इस श्लोक की व्याख्या करते हुए, अपने लघु सिद्धांत में लिखते हैं:  यथा अयं प्रियतमः आत्मानम् प्राप्नोति, तथा भगवान स्वमेव प्रयतत इति भगवतैव उक्तं।"

अर्थ: जैसे हम अपने प्रियतम को स्वयं प्रयत्न कर प्राप्त करते हैं, वैसे ही भगवान स्वयं, अपनी निर्हैतुक कृपा से, शरणागत जीवात्मा को अपना लेते हैं।  एक शरणागत को भगवत-प्राप्ति हेतु अपनी ओर से कोई प्रयत्न नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करना भगवान की निर्हैतुक कृपा में बाधा होगा।

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।

      तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।

 (गीता 8.14)

जो पुरुष मुझ में अनन्य-चित्त होकर सदा ही निरंतर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है, जो मेरे साथ निरंतर संपर्क चाहता है, उसे मैं सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।18.66।।

।।18.66।। सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।। 

         कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥ 

(रामचरितमानस) 

जिसे करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या लगी हो, शरण में आने पर मैं उसे भी नहीं त्यागता। जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख होता है, त्यों ही उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। 

यहाँ सन्मुख होने का अर्थ शरणागति है। 

उपाय को दो भागों में वर्गीकरण किया गया है:

१) साध्योपाय: (बांदरी का बच्चा ) वह उपाय जो हमारे द्वारा स्थापित किया जाये और हमारे द्वारा क्रियाशील हो। इसे स्वगत स्वीकारा भी कहते हैं क्योंकि इस उपाय में हम अपने प्रयत्नों द्वारा भगवान तक पहुँचने का प्रयत्न करते है। उदाहरण स्वरुप बांदरी का बच्चा जो स्वयं उछलकर अपने माँ को पकड़ता है। कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग साध्योपाय है।

२) सिद्धोपाय: (बिल्ली का बच्चा ) 

वह उपाय जो पहले से स्थापित है और हमें सिर्फ उसका चुनाव करना है। इस उपाय में हमारे भगवान तक पहुँचने का उत्तरदायित्व भगवान पर ही होता है और भगवान ‘सत्य-संकल्प’ हैं, कभी भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं चूकते। उदाहरण स्वरुप बिल्ली का बच्चा जिसे पकड़कर ले जाने की जिम्मेदारी स्वयं बिल्ली की है। शरणागति सिद्धोपाय है। शरणागति भी भक्ति ही है पर भक्ति योग में भक्ति उपाय है और शरणागति में स्वयं भगवान ही उपाय हैं। एक शरणागत कर्म, ज्ञान, भक्ति सबका अनुशीलन करता है पर उपाय के तौर पर नहीं बल्कि सिर्फ भगवान के मुखोल्लाष के लिये। इस मार्ग में सफलता कि 100 %  गारंटी है क्योंकि बांदरी का बच्चा शायद चूक भी जाए अपनी माँ को पकड़ने में, पर बिल्ली अपने बच्चे को सुरक्षित उस पार करने में कभी नहीं चुकती। 

 कर्म और ज्ञान योग भक्ति योग के ही दो अंग हैं। ज्ञानयुक्त कर्म ही भक्ति की ओर ले जाता है। भक्ति योग में मन, बुद्धि और शरीर निर्बाध भगवान की ओर होने चाहिए (अनन्य चिंतयतो माम; सततं कीर्तयन्तो माम)। प्रपत्ति शरणागति मार्ग की सबसे बड़ी परेशानी यह है की मानसिक रूप से एक शरणागत के ढाँचे में ढलना मुश्किल है; और दूसरा यह की हमें शरण्य (भगवान) के प्रति यह अटूट श्रद्धा होनी चाहिए की वो अवश्य हमारी रक्षा करेंगे। लेकिन एक बार शरणागत होने के बाद आगे का मार्ग अत्यंत सुगम हो जाता है।

उदाहरणस्वरुप छत पर जाने के दो उपाय हैं। एक तो सीढियों के द्वारा और दूसरा लिफ्ट से। सीढ़ी से चढ़ना साध्योपाय है क्योंकि व्यक्ति को अपने सामर्थ्य पर भरोसा है। लिफ्ट के द्वारा जाना सिद्धोपाय है क्योंकि लिफ्ट का उपयोग करने का अर्थ ही है की हमने अपनी हार स्वीकार कर ली है कि हम अपने स्वयं के प्रयास से छत पे चढ़ने में असमर्थ हैं।  और दूसरा की हम जल्दी से जल्दी छत पे जाना चाहते हैं। इस उदाहरण में लिफ्ट भगवान हैं और लिफ्टमैन गुरु। हमें लिफ्ट और लिफ्टमैन पर पूर्ण विश्वास होने की जरुरत है।

विष्णु स्तुति

अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।

तस्मात्कारुण्यभावेन रक्षस्व परमेश्वर ।।

अर्थ : आपके सिवा मेरे और कोई आधार नहीं , हम आपके शरणागत हैं । अतः हे परमेश्वर अपनी करुणा बरसा कर मेरी रक्षा करें !

शरणागत होने के लिये पूर्वापेक्षा (Prerequisites for Surrender) 

यूँ तो प्रपत्ति में सभी तरह से अयोग्य होना ही सबसे बड़ी योग्यता है, फिर भी आचार्य कुछ पूर्वापेक्षा बताते हैं। ये पूर्वापेक्षा को उपाय मान लेना भारी भूल होगी। भगवान को (अवतार वरिष्ठ को) अपना रक्षक/उपाय स्वीकार करना चेतन (आत्मा) का चैतन्य -कार्य (सारथि -शुद्ध बुद्धि)  है इसके बिना भगवान रक्षा नहीं करते। 

1) स्वाधिष्ठे अनन्यसार्थे (निराश्रयता):- आकिंचन्यम: शरणागति ‘अहंकार, ममत्व और स्वातंत्र्य’ का त्याग है। 

इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति अपनी हार स्वीकार करने को तैयार नहीं है। हर व्यक्ति अपने-अपने अलग अलग प्रकार के अभिमान के साथ जी रहा है। अहंकार त्याग  करने की मुश्किल के कारण ही शरणागति मुश्किल दृष्टिगोचर होती है। हमें यह स्मरण रखना चाहिए की सर्वोत्तम तत्त्व क्या है, सर्वोत्तम पुरुषार्थ क्या है और उसका उपाय क्या है। 

  अगर मैं अपने प्रयासों से मोक्ष प्राप्त करने में सक्षम होता तो कई हजार वर्ष पहले ही कर चूका होता। आकिंचन्यम का अर्थ है अपने आप को कर्म, ज्ञान और भक्ति से हीन समझना और पछताते हुए भगवान से उपाय बनने की प्रार्थना करना। “हे श्रीमन नारायण! मैं सभी साधनों से हीन हूँ पर मैं आपके दिव्य धाम में आपके नित्य कैंकर्य की प्रार्थना करता हूँ कृपया अपने अहैतुकी कृपा से मुझे मोक्ष प्रदान करें।

 अनन्य-गतित्वं : इस बात का पूर्ण विश्वास की भगवान के अलावा कोई और हमारी मदद नहीं कर सकता। लोकाचार्य स्वामी बताते हैं की यदि पिता रक्षक होते तो हिरण्यकशिपू ने प्रह्लाद की रक्षा की होती। यदि माता रक्षक होती तो कैकेयी ने भरत की रक्षा की होती, यदि भाई रक्षक होता तो रावण ने विभीषण की रक्षा की होती। यदि पति रक्षक होते तो द्रौपदी के पाँच महाबली पतियों ने उनकी रक्षा की होती।

यदि हम स्वयं अपने रक्षक होते तो गजराज ने ग्राह से स्वयं की रक्षा की होती। इन सभी की रक्षा श्रीमन नारायण ने ही की इसलिए श्रीमन नारायण ही एकमात्र रक्षक हैं। (अवतार वरिष्ठ के अतिरिक्त) अन्य देवताओं के पास इस भाव से जाना की वो हमारी रक्षा करेंगे, यह शरणागति के प्रतिकूल है। शिव, इंद्र आदि देवता स्वयं संसार-मंडल में फंसे हैं अपनी रक्षा के लिये श्रीमन नारायण पर आश्रित हैं।

2) महाविश्वास : श्रीमन नारायण पर यह पूर्ण विश्वास की वो अवश्य ही हमारी रक्षा करेंगे। अगर महाविश्वास न हो तो फिर शरणागति का अर्थ ही क्या है।

उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा॥5॥

भावार्थ- तथा श्री राम जी के चरणों में विश्वास उत्पन्न होता है और मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार रूपी समुद्र से तर जाता है॥5॥

संसारकूपे पतितोऽत्यागाधे, मोहान्धपूर्णे विषयाभितप्ते।

करावलम्बं मम देहि विष्णो, गोविन्द दामोदर माधवेति।।

हे गोविन्द! दामोदर! माधव! मैं मोह रूपी अंधकार से व्याप्त और समस्त विषयों की ज्वाला (दावाग्नि) से संतप्त इस संसार रूपी गहरे अंधे कुएँ में (बिना पेंदी के कुएं में) पड़ा हूँ। हे विष्णो! आप मेरा हाथ पकड़कर इस कुएँ से बाहर निकालिए। मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिये, मैं अपने प्रयत्न से बाहर नहीं निकल सकता

प्रश्न ) : भगवान हमारे ‘उपाय’ (solution) बनने को क्यों तैयार होंगे?

उत्तर): जीवात्मा एवं भगवान के मध्य स्वं-स्वामी सम्बन्ध है। भगवान मालिक (Owner) हैं एवं जीव उनका माल (property-सोना आँख की पुतली) है। मालिक का कर्तव्य है अपने माल के दोषों को दूर कर (rectify-शुद्ध करके, सुधार) उसे प्राप्त करना। किन्तु भगवान तब तक हमें प्राप्त करने में विलम्ब करते हैं, जबतक हम स्वयं उन्हें उपाय न स्वीकार कर लें।  यही हमारे ज्ञान का उपयोग है। वस्तुतः, शरणागति भी भगवद-कृत है।  अनादि काल से भगवान के प्रयत्नों का ही फल है कि जीव के ह्रदय में भगवान के प्रति अद्वेष उत्पन्न हो जाता है| फिर धीरे धीरे जीव भगवान के अभिमुख होता है।  जीव के अभिमुख होने पर भगवान उसे साधू-समागम प्रदान करते हैं।  ऐसे जीवात्मा को जब भगवान गर्भकाल में जायमान-कटाक्ष (divine glance) प्रदान कर देते हैं, तब वो मुमुक्षु हो जाता है।  ऐसे मुमुक्षु को आचार्य के शरण में शरणागति करवा कर भगवान उस जीव को मोक्ष प्रदान करते हैं। 

भगवान हमेशा ही हमारे उपाय बनने को उत्सुक रहते हैं पर हमें अपने (अनित्य नाम-रूप ??) बल, बुद्धि और सामर्थ्य पर विश्वास होता है। हम भगवान से पृथक हो इस संसार का आनंद लेना चाहते हैं, इसलिए भगवान हमारे ‘उपाय’ नहीं बनते। जबतक हम अपनी  हार स्वीकार कर भगवान से असहाय अवस्था में प्रार्थना नहीं करेंगे तबतक भगवान हमारे उपाय कैसे बन सकते हैं। (गजेन्द्र और द्रौपदी का उदाहरण )

कोई कंजूष से महा-कंजूष व्यक्ति ही क्यों ना हो, यदि कोई भिखारी उसका चरण पकड़ ले तो वह कुछ न कुछ भीख अवश्य देगा तो फिर अपार-वात्सल्यमय भगवान हमारे उपाय बनने को तैयार क्यों नहीं होंगे। एक मालिक अपने कर्मचारियों को उनके योग्यता के अनुसार ही वेतन देता है पर यदि कोई उसके आगे दंडवत हो जाये और अपनी लाचारी जताए तो मालिक बिना किसी योग्यता के कुछ रुपये अवश्य देगा। इसी तरह हमारे कर्म, ज्ञान और भक्ति हीन होने के वावजूद भी हमें मोक्ष अवश्य प्रदान करेंगे अगर हम उनके चरणों का आश्रय लें। ऐसा स्वयं भगवान की प्रतिज्ञा है। जिस तरह एक बछड़ा के धूल में लिपटे होने के वावजूद गाय उसे चाट-चाटकर साफ करती है, उसी प्रकार भगवान भी अपने शरणागतों के दोष और पूर्व के संचित पाप नहीं देखते।

1. प्रश्न :  क्या शरणागति उपाय है?[Question: Is surrender a means to salvation?]  

उत्तर) वास्तव में शरणागति उपाय नहीं योग्यता (व्याज-Interest-सूद) है। उपाय तो केवल श्रीमन्नारायण की अहैतुकी कृपा (unconditional grace) है। चेतन प्राणी (conscious beings- विवेकशील मनुष्य) होने के कारण हमसे यह अपेक्षा है कि हम भगवान को उपाय (means) एवं उपेय (end-अमरत्व) मान अपनी रक्षण का भार उन्हें सौंप दें। 

[Question: Is surrender a means to salvationअर्थात क्या शरणागति 'मोक्ष' (चौथा पुरुषार्थ) प्राप्त करने का एक साधन (उपाय-a means to salvation) है ? यदि है तो फिर उद्धरेत आत्मा आत्मानं - क्या है? बुद्धि को आत्मा में समर्पित करना ही शरणागति है। Answer) In reality, surrender is not a means to an end, but rather a qualification (or prerequisite). असल में शरणागति जीवन का मुख्य लक्ष्य आत्मा (इन्द्रियातीत सत्य, ईश्वर, भगवान या ब्रह्म) को प्राप्त करने का साधन नहीं है, बल्कि यह एक योग्यता (या ज़रूरी शर्त) है(अर्थात M/F रूपी सम्मोहित अहंबुद्धि या मूढ़बुद्धि का देह-इन्द्रियों के पीछे न जाकर का 'सारथि बुद्धि' ईश्वर-प्रेरित बुद्धि बनकर शरीर रूपी रथ में बैठे रथी आत्मा के प्रति समर्पण है) मनुष्य जीवन का लक्ष्य (इन्द्रियातीत सत्य) को पाने का साधन नहीं है, बल्कि यह एक योग्यता (या ज़रूरी शर्त) है। 'सचेत प्राणी'  विवेकी मनुष्य होने के नाते, हमसे यह उम्मीद की जाती है कि हम भगवान को साधन (माध्यम) और लक्ष्य (अमरत्व) दोनों मानें, और अपनी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उन्हें सौंप दें। ]

सवाल-2.) क्या कोई भी शरण्य बन सकता है? [Question: Can anyone become a refuge सहारा, आश्रय (गुरु) ? sanctuary-शरण स्थान, refuge 

उत्तर) एक आदर्श शरण्य के पास निम्न दो गुण होने चाहिए:

१) परत्वं : जिसके जोड़ का दूसरा कोई न हो। 

[1) सर्वश्रेष्ठ - अनित्य /नश्वर देह, इन्द्रिय , मन , बुद्धि से परे है - नित्य /अविनाशी आत्मा (सत्य, ईश्वर , ब्रह्म, सच्चिदानन्द) Supremacy: That which has no equal.अनुपम ] 

२) सौलभ्यम: जो सर्व-सुलभ हो [ भगवान (=आत्मा, ईश्वर, अवतार वरिष्ठ की मूर्ति या पवित्र त्रयी) अन्तर्यामी (indwelling spirit)अर्चा (प्रेम-मूर्ति- the idol) और आचार्य (spiritual teacher) के रूप में सर्व-सुलभ हैं)

सवाल-3.) क्या शरणागति कोई भी कर सकता है? [Question: Can anyone surrender to God? सवाल: क्या भगवान के सामने कोई भी आत्मसमर्पण कर सकता है?]

उत्तर): हाँ। शरणागति में जाति, कुल, रंग, जन्म आदि का कोई भेद नहीं है। शबरी (शूद्र वर्ण में जन्म); निषाद, सुग्रीव (बन्दर), विभीषण (राक्षस), विदूर (दासीपुत्र) इत्यादि उदाहरण हैं।

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।

स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।।9.32।।

“हे अर्जुन! स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनि चाण्डाल आदि, जो कोई भी हो; वे भी मेरी शरण में आकर परमगति को ही प्राप्त होते हैं”।

इस श्लोक के द्वारा भगवान् वचन देते हैं कि अनन्य भक्ति तथा आत्मस्वरूप के सतत् निदिध्यासन से न केवल दुराचारी लोग वरन् जन्म से ही किसी प्रकार की मानसिक और बौद्धिक हीनता के शिकार हुए लोग भी सफलतापूर्वक आध्यात्मिक लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। 

स्त्रियों, वैश्यों और शूद्रों को पापयोनि में जन्मे हुए कहकर उनकी निन्दा करने का अर्थ यह होगा कि धर्म का इष्ट प्रभाव समाज के केवल कुछ मुट्ठी भर लोगों पर ही है।  ऐसा समझना माने प्रारम्भ से भगवान् श्रीकृष्ण जिस सिद्धांत का प्रतिपादन बारम्बार बल देकर कर रहे हैं, उस सबको नकारना हैं। इसलिए यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण के शब्दों के वास्तविक अभिप्राय को हमें समझना होगा।

ऐसी सभी साधनाओं में सबसे अधिक प्रभावशाली साधना है उपासना अर्थात् भक्तिपूर्ण हृदय से आत्मा (ईश्वर, भगवान, पवित्र त्रयी) का अखण्ड स्मरण करना। वेदान्त का यह घोषणा है कि उपासना के द्वारा बुद्धि की शुद्धि होती है। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मसाक्षात्कार के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं।

विकास की जिस उन्नति को धर्म लक्ष्य के रूप में इंगित करता है उसमें शरीर के लिंग जाति आदि से किञ्चिन्मात्र प्रयोजन नहीं है। आध्यात्मिक साधनाओं का प्रयोजन शरीर, इन्द्रिय मन और बुद्धि को सुगठित करना है जो विकास की अपनी परिपक्व अवस्था में स्वयं स्थिर हो जाती है (मूढ़बुद्धि स्वयं शुद्धबुद्धि बन जाती हैऔर फिर आत्मा सर्वोपाधिविनिर्मुक्त होकर स्वमहिमा में प्रतिष्ठित रहता है। 

भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने युग में सर्वपरिचित शब्दों के उपयोग के द्वारा अन्तकरण के विशेष गुणों को इंगित किया है। यहाँ स्त्रियों से तात्पर्य स्त्री के समान मन से है। ऐसे मन के लोग अत्यन्त भावुक प्रवृत्ति के होते हैं तथा जगत् की वस्तुओं में उनकी अत्यधिक आसक्ति होती है। इसी प्रकार समाज में अनेक लोग अपने विचारों एवं कर्मों में व्यापारिक वृत्ति के होते हैं। ऐसी गणना करने वाला और सदा अधिका-धिक लाभ की आशा लगाये रहने वाला मन ध्यानयोग के द्वारा विकसित होने योग्य नहीं होता है। वैश्यों की निन्दा की जाती है?  मन की वैश्य वृत्ति की निन्दा समझनी चाहिए। अन्त में शूद्र शब्द के द्वारा आलस्य,  निद्रा और प्रमाद जैसी मन की वृत्तियों को दर्शाया गया है। 

मन को स्थिर करके क्षणभर के लिए सारभूत अनन्तस्वरूप में जीवन्त रहने का एकमात्र उपाय है सब कर्मों को ईश्वरार्पण कर देना। 

हरि भक्तिविलास में (११.६७६) कृष्ण की शरण ग्रहण करने की विधि का वर्णन हुआ है-

शरणागति के 6 अंग

आनुकूल्यस्य सङ्कल्पः प्रातिकूल्यस्य वर्जनम् ।

रक्षिष्यतीति विश्वासो गोप्तृत्वे वरणं तथा ।

आत्मनिक्षेप कार्पण्ये षड्विधा शरणागतिः ॥

१) भगवान के अनुकूल कर्म करना 

(1) Performing actions that are pleasing to God.

२) भगवान के प्रतिकूल कर्म का परित्याग

2) Abandoning actions that are contrary to God's will.

३) यह विश्वास की भगवान अवश्य हमारी रक्षा करेंगे

3) This is the belief that God will surely protect us.

४) भगवान से शरणागति की प्रार्थना करना, दैन्यभाव (गोप्तृत्वे वरणं)

4) Praying for surrender to God, devotion (goptritve varanam-'गोप्तृत्वे' का अर्थ है रक्षा करने वाला/संरक्षक, और 'वरणं' का अर्थ है स्वीकार करना।यह प्रपत्ति (आत्मसमर्पण) का एक प्रमुख अंग है, जहाँ भक्त पूर्ण विश्वास के साथ स्वयं को ईश्वर के संरक्षण में सौंप देता है, यह मानते हुए कि वे ही रक्षा करेंगे। )

५) स्वयं को कर्म, ज्ञान और भक्ति से हीन समझना (कार्पण्यं)

5) Considering oneself inferior in action, knowledge and devotion (karpanyam)

६) आत्मा (शुद्धबुद्धि)  जो की आत्मा (ईश्वर, भगवान या ब्रह्म) की सम्पत्ति है, भगवान को वापस सौंप देना। आत्मनिक्षेप (Aatmanikshep) 

आत्मनिक्षेप - का अर्थ है अपनी बुद्धि को आत्मा (ईश्वर, भगवान या ब्रह्म -सच्चिदानन्द)  की धरोहर (trust -अमानत) मानकर उन्हें पूरी तरह सौंप देना।

Aatmanikshep means considering one's intellect as a trust from the Self (God, Lord, or Brahman - the absolute reality) and completely surrendering it to Him.]

कहानी: परकाल सूरी आलवार एक बार जब शालिग्राम गए थे, जहाँ विश्व का सबसे गहरा दर्रा है, उन्होंने देखा की दो कीड़े आपस में बात कर रहें हैं। पहले कीड़े ने कहा मैं दर्रे के उस पार सामने वाली पहाड़ी पे जाउँगा। दुसरे कीड़े ने मानने से इनकार कर दिया। एक कीड़े की आयु ही कितनी होती एक पहाड़ से उतरकर दूसरे पहाड़ पर चढ़ने में तो उसके कई जन्म बीत जायेंगे। दोनों में शर्त लगी। पास ही एक शेर छलाँग लगाने को था। उस कीड़े ने अपने को उसके पैरों के सामने कर लिया और वो शेर के पैर से चिपका हुआ उस पार चला गया। यही शरणागति है। सभी प्रकार से मोक्ष के अयोग्य होने के वावजूद भी अगर हम श्रीमन नारायण (अवतार वरिष्ठ) के चरणों का आश्रय लें तो श्रीमन नारायण अवश्य ही हमें परमपद देंगे।

टिप्पणी:- नारायण के प्रति कोई भी शरणागति बिना श्री (महालक्ष्मी माता) के पूर्ववर्ती शरणागति के सफल नहीं होती।

[Note: No surrender to Narayana is successful without prior surrender to Shri (Goddess Mahalakshmi -ज्ञानदायिनी माँ सारदा, राधा , सीता ।).] 

‘श्री’ शब्द महालक्ष्मी मैया (जगतजननी माँ श्री सारदा देवी) को सूचित करता है, यह श्री सूक्तं से स्पस्ट है| हम माता महालक्ष्मी के माध्यम से भगवान नारायण की शरणागति करते हैं| वात्सल्यमयी माता (लक्ष्म्या सह हृषिकेश: देव्या कारुण्यरुपया) जगतजननी माँ अपने पुत्रों को उसके दोषों समेत अपनाती हैं और हमारे अनर्थों को नष्ट कर, भगवान के समक्ष हमारे शरणागति कि सिफारिश करती हैं| माता के इस गुण को ‘पुरुषकारत्वं’ भी कहते हैं|

श्री शब्द का निम्न ३ अर्थ बताये गए हैं: (श्रिञ्- सेवायाम्, श्रृ-श्रवणे, शृ-हिंसायाम्, शृ-विस्तारे’)

[The following 3 meanings of the word Shri have been given: (Shree-Sevayam, Shri-Shravane, Shri-Hinsayam, Shri-Vistaare')] 

१) श्रयते श्रीयते इति श्रियः 

जो भगवान का आश्रय लेती हैं एवं जीवात्माओं को आश्रय प्रदान करती ।

["श्रयते श्रीयते इति श्रियः" "Shrayate Shriyate Iti Shriyah" का अर्थ है कि माता लक्ष्मी (श्री) स्वयं भगवान विष्णु का आश्रय लेती हैं और भक्तों को भी भगवान का आश्रय (शरण) प्रदान करती हैं। यह सूक्ति लक्ष्मीजी की कृपा और भगवान से उनके गहरे संबंध को दर्शाती है, जहाँ वे भक्तों की प्रार्थना भगवान तक पहुँचाती हैं और उनके दुखों का नाश करती हैं। 

२) श्रृणोति श्रावयति इति श्रिय

जो जीवात्माओं के प्रार्थनाओं को सुनती हैं एवं भगवान को सुनाती हैं (बढ़ा -चढ़ा कर)

३)शृणाति शृृणाति इति श्रियः

जो हमारे पापों सहित संचित कर्मों को नष्ट करके हमें निर्मल बनाती हैं एवं हमारे गुणों का वर्धन करती हैं ।

आकर चार लाख चौरासी। जोनि भ्रमत यह जीव अविनाशी।।

फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा॥

कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही॥

भगवान अपनी अपार करुणा से आत्मा को देह, इन्द्रियां, बुद्धि प्रदान करते हैं ताकि हम मोक्ष के पथ में अग्रसर हों|

हम अपने शुभ-अशुभ संस्कार से अनंत काल से इस संसार में भटक रहे हैं। कितनी बार आम के पेड़ से फल बने, फल से फिर गुठली और गुठली से फिर से आम। यह कब से हो रहा है इसका कोई दिन या तारीख बताने वाला नहीं है।

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शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

कालाय तस्मै नमः !


🔴 LIVE | Day 03 | श्रीरामकृष्ण विश्व सद्भावना निकेतन | लोकार्पण एवं प्राणप्रतिष्ठा | 19 जनवरी 2026

स्वामी विष्णुपादानन्द जी महाराज, सभा के अध्यक्ष का सम्बोधन -  

(3:38:33

 या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ 

आज के सभा चर्चा का विषय है - "श्री सारदा देवी , उनका दिव्य जीवन और उनका सन्देश।" अबतक अपने चार अन्य विद्वान् और अनुभवी वक्ताओं को आपने सुना। आप उनकी वाणी का आनन्द ले रहे थे। उन सबने माताजी के जीवन की महानता, सरलता , सहजता इन सारे पहलुओं पर अपने विचार रखे और हम सब को अभिभूत कर दिया। मुग्ध कर दिया। माताजी का जीवन सुनाते हुए ये लोग इतने भावपूर्ण थे मानों वे उन बातों को अपने हृदय के अन्तःकरण से कह रहे हैं। 

वे केवल बुद्धि द्वारा नहीं ,केवल अपनी स्मरण शक्ति का उपयोग करके नहीं। उसका उपयोग तो खैर करना ही पड़ता है। माँ का जीवन उनके अपने ह्रदय के भीतर कितना प्रविष्ट हुआ है , उनकी बातों को कहते समय वे अपने के भावों को ह्रदय की भावुकता के साथ प्रकट कर रहे थे। जब हम माँ का जीवन चरित्र सुन रहे थे , तो माँ के जीवन के माध्यम से , हम ठाकुर जी को भी समझ रहे हैं। और स्वामी विवेकानन्द जी को भी सुन रहे हैं। तीनों विभूतियों का जीवन एक ही है। ये हम अनुभव कर रहे हैं। 

    महापुरुषों के जीवन की दिव्यता स्वतः प्रमाणित है। वे हमारे ह्रदय को स्पर्श करती है। क्योंकि उनकी दिव्यता सहज और स्वाभाविक होती है। जैसे हम अनेक रूपों में देवी की पूजा करते हैं। सभी रूपों में प्रकृति , सृष्टि और मातृशक्ति की जो बात है , माँ की कृपा करुणा हमलोगों तक पहुँचती है। हम सन्तानों के प्रति माँ का प्रेम। माँ चाहती हैं कि उनकी सन्तान सुख में रहे, आनन्द में रहे और आगे बढ़े। पुत्र कैसा भी हो , माँ का प्रेम उसके प्रति हमेशा बना रहता है।  (https://www.facebook.com/groups/925716234695876/posts/1965143047419851/)

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति, 

सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं

तव सुतः।

मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव, 

शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता

न भवति॥३॥  

[अर्थात: माँ ! इस पृथ्वी पर तुम्हारे सीधे सादे पुत्र तो बहुत से हैं।  किन्तु उन सब में ही अत्यंत चपल तुम्हारा बालक हूँ। मेरे जैसे चंचल कोई विरला ही होगा। शिवे ! मेरा जो यह त्याग हुआ है,यह तुम्हारे लिए कदापि उचित नहीं है। क्योंकि संसार में कुपुत्र का होना संभव है किन्तु माता कभी कुमाता नहीं हो सकती।"]

शंकराचार्यजी कहते हैं -कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति'  माता के कुमाता होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।  और ये माँ श्री सारदा देवी तो हमारे लिए संघ -जननी हैं। और हम सभी भक्तो की भी जननी है , क्योंकि हम संन्यासी संघ के अटूट अंग हैं। संघ से एकाकार हुए हैं। और गृही आप सभी भक्त लोग भी रामकृष्ण मठ और मिशन, स्वामी जी द्वारा निर्धारित जिसका जुड़वाँ आदर्श वाक्य है-"आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च" (हिन्दी अर्थ : स्वयं के मोक्ष के लिए तथा जगत के कल्याण के लिए), के अभिन्न अंग हैं। अतएव इन संगठनों से जुड़े हम सभी लोग संघ के ही अटूट अंग हैं, इसलिए ठाकुर -माँ -स्वामीजी की कृपा के पात्र हैं। इसलिए श्रीरामकृष्ण देव , श्री माँ और स्वामी विवेकानन्द इस संघ के माध्यम से , हम सबके ऊपर कृपा वर्षण कर रहे हैं। इसका स्पष्ट आभास शायद हर समय हमें न होता हो , क्योंकि उतनी क्षमता या योग्यता हममें नहीं है। जिस मनुष्योचित विवेक का विकास जितनी गति से और जितनी मात्रा में होनी चाहिए , उस मात्रा में हमारे भीतर शायद न हुआ हो। लेकिन माँ का प्रेम सन्तानों के लिए एकतरफा प्रेम होती है। माँ की कृपा का वैशिष्ट्य यह है कि वो एकतरफा होती है। पुत्र , सन्तान,  बच्चा माँ को चाहे न चाहे; माँ की कृपा का अनुभव , उनका प्रभाव क्या होता है , पुत्र न समझ पाए ,यह  हो सकता है। लेकिन माँ अपने बच्चों से प्रेम पाने की अपेक्षा नहीं करती हैं। उनका प्रेम एक तरफा होता है , क्योंकि वह माँ हैं, संतान को जन्म देने वाली जननी है, अपनी सृष्टि की बात है। (3:46:00)

     सन्तान माता से बहुत प्रेम करता है। जब माता आँखों के सामने नहीं होती है , तो उसे सब तरफ अँधेरा दीखता है। वो माँ , माँ करके रोता है। लेकिन यह अवस्था बालक की होती है , जब वो छोटा होता है। श्रीरामकृष्ण देव ने बड़ा सुंदर उदाहरण दिया है , कि माँ किंवाड़ के पीछे छिपी हुई है , और बच्चा माँ को देख नहीं पाता।  चारों तरफ , इधर-उधर खोजता है , माँ कहीं दिखाई नहीं दे रही है। तो उसको रोना आ जाता है , और उसकी आँखों से अश्रु की धारा बहने लगती  हैं। जोर से रोने लगता है , तो अबतक जो माँ दरवाजे के पीछे छिपी हुई है , वो सामने आती है। और उस बालक को या बालिका को ऊपर गोद में उठा लेती है। उसे चूमते हुए अपने प्रेम को दर्शाती हैं। माँ को जब अपने बच्चे से इतना प्रेम है , तो उसकी आँखों से ओझल होने की आवश्यकता ही क्या है ? (3:47:34)    

      कोई जरुरी नहीं है। लेकिन वो माता का प्रेम है , उसे मालूम है कि मेरे बिना मेरी सन्तान नहीं रह सकती है। उसको परीक्षा लेने की भी आवश्यकता नहीं है , परखने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन फिर भी वे परीक्षा लेती हैं। क्योंकि परीक्षा उसका पुत्र के प्रति प्रेम है , पुत्र का उसका प्रति प्रेम है - उसका अनुभव वो बार -बार करना चाहती है। इसलिए माँ थोड़ा सा परेशान करती हैं हमें। उनकी इच्छा कष्ट देने की नहीं है , हमें परेशान करने की नहीं है। मेरे बिना मेरी सन्तान एक क्षण भी नहीं रह सकती है , उस आनंद का अनुभव करने के लिए छिपती है। वही बालक जब बड़ा होता है। माता-पिता के प्रति दुर्व्यवहार करता है। और वह माँ के प्रेम को भूल जाता है। जो बच्चा माँ के बिना कुछ पल भी नहीं रह सकता था। और वही माँ मानो है ही नहीं , इस प्रकार से आचरण करता है। अपनी माँ के पास कुछ पल भी बैठ नहीं सकता। माँ से बात करने के लिए समय नहीं है , बाकि सब चीजों के लिए समय है। बाकि सबको अपना कर्तव्य और महत्वपूर्ण बात समझता है।  लेकिन जिस माँ ने उसका प्रेम से पालन-पोषण किया, उसकी याद उसका महत्व अब उसे याद नहीं आता। माँ से बात करने का समय नहीं रहता।

    लेकिन हमारी जो माँ जगदम्बा हैं , उन्होंने अपने संसार को छोड़ दिया , अपने मर्त्य शरीर को त्याग दिया। कई साल हो गए , लेकिन हम अब भी माँ को भूल नहीं पाए हैं , और न कभी भूल सकेंगे। क्योंकि माँ की कृपा का जो प्रवाह है , वह बिना रुके चल रहा है। और इसका अनुभव सभी भक्तों को होता है। शास्त्र कहता है कि अविनाशी आत्मा (ईश्वर, भगवान,सत्य, ब्रह्म, सच्चिदानन्द ) के लिए समय (काल या मृत्यु) कोई बाधा ही नहीं है। वैसे संसार की अन्य  सब चीजें समय/काल से बाधित होती हैं (3: 50:28) इसीलिए कहा जाता है - कालाय तस्मै नमः ! (वैराग्य शतक) 

सा रम्या नगरी महान्स नृपतिः सामन्तचक्रं च तत्

      पार्श्वे तस्य च सा विदग्धपरिषत्ताश्चन्द्रबिम्बाननाः ।

उद्वृत्तः स च राजपुत्रनिवहस्ते बन्दिनस्ताः कथाः

      सर्वं यस्य वशादगात्स्मृतिपथं कालाय तस्मै नमः ॥ ४१॥ 

वह रम्य नगरी, उसके महान् राजा, उसके दरबार में बैठे वह सामन्त-समूह और उसके चतुर मंत्री, वे चन्द्रमुखी नृत्यांगनायें, वे सनकी, मनमौजी (whimsical) राजकुमारवे भाट-चारण और उनकी गाथाएँ। यह सब जिस समय के बल से मात्र स्मृति बन कर रह गए उस काल को, नमन है।वैराग्य शतकम् - Part 1॥ वैराग्य शतकम् भर्तृहरिविरचितम् ॥ कालमहिमानुवर्णनम् ।] 

ऐसा जो काल है - सब चीजों को बाधित करता है। व्यक्ति का महत्व कम हो जाता है , और लोग उसे भूल जाते हैं। लेकिन माँ की विस्मृति होना बहुत ही सामान्य बात है। माता-पिता को भूलना , दादा-दादी को भूलना , सबको भूल जाता है। कृतज्ञता का जो महान गुण हैं , उसको हम अपने जीवन में उतार नहीं पाते हैं। ये हमारी भूल है , और हमारे दुखों का एक प्रमुख कारण है। हम मनुष्यों में कृतज्ञता नहीं है। क्योंकि हममें अहंकार (जीव का अहं M/F ) है हममें राग-द्वेष आसक्ति है। अनेक प्रकार की वासनाओं (3K में आसक्ति) ने हमारे जीवन में स्थान बना लिया है। इसीलिए वास्तव में जो हमारे अपने हैं , जिहोंने हम पर प्रेम वर्षण किया है -हमें सब कुछ माना है। माँ सारदा के लिए (गुरुदेव और नवनीदा के लिए) बच्चा तो आँख की पुतली होता है। एक समय में हम पर कितना प्रेम , वर्षण किया है , पर वह प्रेम हमें याद नहीं आता। पुरानी बात हो गयी है।

लेकिन जो हमारी अपनी माँ नहीं हो , तो भी अपनी माँ से कई गुना अधिक प्रेम देने वाली हमारी जगतजननी है , जगदम्बा है। हमारी अपनी हो जाती है। क्यों ? क्योंकि उस प्रेम का रूप सम्पूर्णतया अलग है। वह प्रेम लौकिक नहीं है। वो प्रेम साधारण नहीं है , वो प्रेम दिव्य है। माँ का प्रेम बहुत अद्भुत चीज होती है। लेकिन उस प्रेम की दिव्यता का स्पर्श हम केवल इस प्रकार के अवतार पुरुष , भगवान जो स्वयं पुरुष देह धारण करके आते हैं। भगवान कभी स्त्री शरीर धारण करते हैं। (3:52:56) स्त्री शरीर और पुरुष शरीर अलग नहीं होते हैं। एक ही हैं!  माँ हर प्राणी में मातृ रूप में स्थित हैं। इसलिए हमारी परम्परा में , अर्धनारीश्वर का भाव है। कैसे दिखाएंगे? एक आधार में नारी भी है , नर भी है। शिव भी है शक्ति भी है। उसको कल्पना से चित्रित करना पड़ेगा।

लेकिन जब हम श्री रामकृष्ण और श्री माँ का जीवन देखते हैं , और उसमें हम स्वामी विवेकानन्द को भी जोड़ देते हैं। तब हम देखते हैं इन त्रयी की मूर्ति का जो सार है , वो प्रेम है। इनके प्रेम में किसी प्रकार की लौकिकता नहीं है। लौकिक दीखता है, लेकिन प्रेम अलौकिक है।  भोजन के बाद जो पान का बीड़ा माँ बनाती हैं , वो अपने सन्तानों के लिए अलग बनाती हैं। भक्त सन्तानों के लिए अलग बनाती हैं। उसका कारण भी देती हैं। ये तो अपने ही हैं , उनको तो अपना बनाना है। ये तो लैकिक बात है , सब जानते हैं। इसमें कौन सी अलौकिकता है ? सब माँ जानती है -अपना बच्चा अपना होता है , पराया बच्चा पराया होता है। लेकिन माँ का प्रेम के पीछे उसके जो संन्यासी संतान हैं उनके लिए थोड़ा ज्यादा प्रेम है, और गृहस्थ भक्तों के लिए कम है , ऐसी बात नहीं है। लेकिन माँ का जो व्यवहार है , उस व्यवहार में भी मधुरता है। ये जो व्यावहारिक दिव्यता (Practical divinityहै, उसका वर्णन चारो वक्ताओं ने उसका वर्णन स्वयं को भूल कर किया है। माता जी के दिव्य जीवन की इतने प्रसंग बताये हैं , श्रीरामकृष्ण के जीवन में व्यावहारिक दिव्यता के कितने ही प्रसंग हैं। एक-एक प्रसंग हमारे जीवन को पवित्र बनाता है , हमें पावन करता है। स्वामी विवेकानन्द जी के जीवन में भी कितने ऐसे प्रसंग हैं , जिनको हम जब पढ़ते हैं , तो हमारे जीवन में विकास होता है , हमारा जीवन उन्नत होता है। स्वामी जी के जीवन में उनकी व्यावहारिक दिव्यता को देखने से , हमारे विचारों में पवित्रता आती है।  हमारी बुद्धि में (दृष्टिकोण या मति में) शुद्धता आती है। पवित्र जीवन जीने के लिए जो प्रेरणा चाहिए , बल चाहिए , वह शक्ति हमें प्राप्त होती है

आज हमने इन वक्ताओं के मुख से जितनी घटनाओं को सुना - वो हमें अनेक किताबों से पढ़कर मालूम थीं। 'शतरूपे सारदा ' कृपा करने के लिए 'माँ सारदा के सैकड़ों रूप हैं !' आदि के बारे में जब हम सुनते हैं , तो अलग आनंद होता है। लेकिन वह आनन्द हमारे मानव जीवन को धन्य बनाने वाली हैं। हमें कृत-कृत्य और कृतार्थ बनाने वाली बात है। क्योंकि अवतार पुरुषों का जन्म साधारण नहीं होता है। हमलोगों का जीवन साधारण होता है , लौकिक होता है। उसमें कोई विशेषता नहीं होती है। लेकिन अवतार पुरुषों (ईश्वरकोटि?) का जीवन असाधारण होता है। असाधारण मतलब -दिव्य होता है। भगवत गीता के चौथे अध्याय का वह श्लोक - 

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया।।4.6।।

।।4.6।। यद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप हूँ और भूतमात्र का ईश्वर हूँ (तथापि) अपनी प्रकृति को अपने अधीन रखकर (अधिष्ठाय) मैं अपनी माया से जन्म लेता हूँ।।
 

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।4.9।।

।।4.9।। हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। इस प्रकार (मेरे जन्म और कर्म को) जो मनुष्य तत्त्व से जान लेता अर्थात् दृढ़तापूर्वक मान लेता है, वह शरीर का त्याग करके पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, प्रत्युत मुझे प्राप्त होता है। (4:03:48

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया।।4.6।।

।।4.6।। यद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी ब्रह्म स्वरूप हूँ और भूतमात्र का ईश्वर हूँ (तथापि) अपनी प्रकृति को अपने अधीन रखकर (अधिष्ठाय) मैं अपनी माया से जन्म लेता हूँ।।

मानो उनका जन्म हुआ है। मानो उन्होंने देह धारण किया है। मानो लोगों के ऊपर वो कृपा कर रहे हैं , अनुकम्पा, करुणा , दया  दिखा रहे हैं। लेकिन उनकी दया, कृपा हमलोगों के जैसे नहीं है , गीता में भगवान ने स्वयं कहा है। अवतार का कर्म क्या है ? वो भी स्पष्ट कहा गया है -कि धर्मसंस्थापनार्थाय - 

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।4.8।।

।।4.8।। साधुओं-(भक्तों-) की रक्षा करनेके लिये, पापकर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और धर्मकी भलीभाँति स्थापना करनेके लिये मैं युग-युगमें प्रकट हुआ करता हूँ। 

ताकि जो लोग मनुष्य होकर भी (विवेक सोया रहने के कारणअपने मार्ग से किस प्रकार भटके हुए हैं, उनको किस प्रकार फिर से 'मनुष्य का धर्म' अर्थात मनुष्य की विशेष योग्यता , या उसकी विशेष पहचान जो नित्य-अनित्य विवेक-प्रयोग क्षमता है , उस विवेक-प्रयोग के मार्ग पर किस तरह लाया जाये? इस धर्म की स्थापना कैसे की जाये ?  

प्रवृत्ति धर्म क्या है ? साथ-साथ  निवृत्ति धर्म क्या है ? वह भी उन अवतारों के जीवन को देखने से हमें पता चलता है। वेदों में बताये गए इन दोनों मार्गों का वर्णन करते हुए आदिगुरु शंकराचार्यजी अपने गीता भाष्य के प्रारम्भ में (श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्यम् ॥ उपोद्घातः ॥) ही कहते हैं - 

[ वेदोक्त धर्म दो प्रकार का है - एक प्रवृत्ति रूप है, दूसरा निवृत्ति रूप है।   जो जगत की स्थिति का कारण , तथा प्राणियों की उन्नति का और मोक्ष का साक्षात् हेतु है। एवं कल्याणकामी ब्राह्मण आदि वर्णाश्रम अवलम्बियों द्वारा जिसका अनुष्ठान किया जाता है उसका नाम धर्म है। 

सः भगवान् सृष्ट्वा-इदं जगत्, तस्य च स्थितिं चिकीर्षुः,

मरीचि-आदीन्-अग्रे सृष्ट्वा प्रजापतीन्, प्रवृत्ति-लक्षणं धर्मं

ग्राहयामास वेद-उक्तम् । 

इस जगत को रचकर इसका पालन करने की इच्छा वाले उस भगवान ने पहले मरीचि आदि प्रजापतियों को रचकर उसको वेदोक्त प्रवृत्ति रूप धर्म (कर्मयोग) ग्रहण करवाया।  

                         ततः अन्याण् च सनक-सनन्दन-आदीन् उत्पाद्य,

                         निवृत्ति-लक्षणं धर्मं ज्ञान-वैराग्य-लक्षणं ग्राहयामास । 

फिर उनसे अलग सनक , सनन्दन , सनातन आदि ऋषियों को उत्पन्न करके उनको ज्ञान और वैराग्य जिसके लक्षण हैं , ऐसे निवृत्ति रूप धर्म (ज्ञानयोग) ग्रहण करवाए।]  

" द्विविधः हि वेदोक्तः धर्मः, प्रवृत्ति-लक्षणः निवृत्ति-लक्षणः च जगतः स्थिति-कारणं , प्राणिनां साक्षात्-अभ्युदय-निःश्रेयस-हेतुः यः सः धर्मः ब्राह्मणाद्यैः वर्णिभिः आश्रमिभिः च श्रेयोर्थिभिः -अनुष्ठीयमानः ॥" 

आचार्य शंकर कहते हैं - वेदों के द्वारा धर्म के दो रूप कहे गए हैं - "प्रवृत्ति-लक्षणो निवृत्ति-लक्षणो च। " जगत का मतलब : एक यह जो दृश्यमान लौकिक जगत है और दूसरा 'हमारा' - साधाकों का, मुमुक्षुओं का , विवेकी -मनुष्यों का , उपासकों का , भक्तों का या संयासियों का जो जगत है। उसमें प्रवृत्ति और निवृत्ति का सन्तुलन किस प्रकार से रहे ? गृहस्थों और संन्यासियों में समन्वय किस प्रकार रहे ? यह तरीका हम किस से सीखेंगे ? यह केवल अवतार पुरुषों से ही सीखा जा सकता है (3:59) 

माँ और ठाकुर के जीवन में दोनों का अद्भुत संतुलन है। क्योंकि उनका आना ही -धर्मसंस्थापनार्थाय ' हुआ है। (नवनीदा जैसे 'नेता' -उस पार से लौटे ही हैं केवल  -'विवेकज-आनंद ' के धर्म को स्थापित करने हेतु।) अवतारों से हम हमेशा सीखने का प्रयास करते हैं। जिस तरह माँ ने कहा - " अगर शान्ति चाहो , तो दूसरों का दुर्गुण मत देखो - किसी का दोष मत देखना !" विवेक-सोया है ? ये देखो ? सन्त तुकाराम ने भी यही कहा है - मैं दूसरों के दुर्गुणों को क्या गिनवा सकता हूँ ? उसकी क्या आवश्यकता है ? क्या दूसरों में जिन दोषों कस मैं बखान कर रहा हूँ , वो दोष मुझमें कम हैं ? माँ कहती है - मैं दूसरों के दोष देख ही नहीं सकती गौरी माँ शिकायत करती हैं , तुम सबको क्यों अपना लेती हो ? उनका आचरण क्यों नहीं देखती ? माँ ने कहा मैं नहीं देख सकती। हमें मालूम है कि यह गुण हममें बहुत कम है। इतना तो मालूम कि यह अविचलता, सहनशीलता भी गुण है। इस गुण की परिपूर्णता हम माँ के जीवन में देखते हैं।यही हमारे लिए बहुत बड़ा सम्बल है। उनको अपना आदर्श मानकर हम अपने जीवन में आगे बढ़ सकते हैं। अपना व्यक्तिगत जीवन मधुर बना सकते हैं। और दूसरों के जीवन में भी हम मधुरता का कुछ संचार कर सकते हैं। योगदान कर सकते हैं। ये कठिन लगता है। लेकिन माँ का जीवन तो मधुर था। अभी है , और सब समय आदर्श उदाहरण बना रहेगा। माँ का जो अद्भुत जीवन है , उसमें सकारात्मक क्या है ? positive क्या है ? उसका उदाहरण देखें - दुर्गापूजा विसर्जन में लोग नाच रहे थे। माँ से किसी ब्रह्मचारी ने शिकायत कर दी। ये ठीक नहीं हो रहा है - बेढंगा  नाचता है ? माँ कहती है - अरे ऐसा ही होना चाहिए। माँ को खुश करने के लिए बच्चा ऐसे ही नाचता है। माँ की दृष्टि कितनी उदार है - ये देखने की चीज है। माँ के जीवन की जितनी भी घटनाएं हमने आज सुनी हैं। माँ का जन्म दिव्य है , माँ कर्म कितना दिव्य है। हमलोग माँ के दिव्य जीवन को - 'तत्वतः' जानेंगे- मतलब जैसा है , वैसा दिव्य जीवन को ठीक से जानेंगे। अवतार के जीवन को यथार्थतः जानने का फल बहुत बड़ा होता है,संसार-चक्र से मोक्ष। इसलिए तीन दिन का ये जो यज्ञ चल रहा है। भगवान स्वयं गीता में कहते हैं -   

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।

ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः।।18.70।।

।।18.70।। जो मनुष्य हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा -- ऐसा मेरा मत है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - हम दोनों में जो 'धर्ममय संवाद' चल रहा है, वह धर्म से भरा हुआ है।अरे अर्जुन , यहाँ ज्ञान-यज्ञ चल रहा है , और मेरी पूजा चल रही है। यह मेरी मति - भगवान की बुद्धि ऐसा कहती है। भगवान का ऐसा विचार है तो उनके कथन को प्रमाण की क्या आवश्यकता है ?   हम दोनों में जो संवाद हुआ है , वो धर्म से परिपूर्ण है।

उसी प्रकार यहाँ जो ज्ञान यज्ञ चल रहा है , यह ठाकुर , माँ स्वामी जी की उपासना ही चल रही हैं। ताकि हमलोगों में भी मातृभक्ति का विकास हो।  मातृभक्ति से व्यक्ति महान बनता है ! भगवान राम मातृभक्त थे। भगवान कृष्ण मातृ भक्त थे। व्यास मातृभक्त थे। उनको सत्यवती नन्दन कहा जाता है। शंकराचार्यजी मातृ भक्त थे। पाण्डव मातृभक्त थे। भीमसेन तो बहुत बड़ा मातृभक्त था। विवेकानन्द मातृभक्त थे। शिवाजी महाराज मातृभक्त थे। माँ ने कहा शिवा ये किला जीतना है। कोई बहस नहीं। माँ ने कहा है - होना ही है। माँ की आज्ञा का पालन होना ही चाहिए। इसको कहा जाता है मातृभक्ति। स्वामी जी ठाकुर की बात पर शंका करते थे , लेकिन माँ जब आदेश दे दिया तो - किला जीतना ही है। [गाड़ी लेना है - तो लेना है ! ] इसे कहा जाता है -मातृभक्ति। स्वामीजी कभी ठाकुर के आदेश पर तर्क करते थे , लेकिन माँ आदेश अकाट्य था। माँ सुप्रीम कोर्ट है। लास्ट आदेश ! ये मातृभक्ति है। श्री रामकृष्ण के सभी संन्यासी सन्तानों की मातृभक्ति देखने के लायक है। सभी ने माँ को बहुत स्नेह दिया , पर से उन्होंने बहुत अधिक स्नेह पाया था। हमलोग भी माँ से दूर नहीं हैं , ये जो आयोजन हुआ है - माँ की कृपा से हुआ है। इस आयोजन के माध्यम से नागरिकों को मातृप्रेम , पितृप्रेम , माँ का आशीर्वाद , पिता का प्रेम ,स्वामीजी का भ्रातृप्रेम। माँ सारदा संघजननि हैंगृहस्थ भक्त और ठाकुर के संन्यासी भक्त संघ के अटूट अंग हैं। हमें यदि मातृभक्ति हो तो , हमारी मातृभक्ति कैसी होनी चाहिए ? उसका अनुभव आज हुआ होगा। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था - " आधुनिकता हमें सुखी बनाती है। वैज्ञानिक आविष्कार से शरीर को सुख बढ़ता है। हमारे Comforts बढ़ जाते हैं। माईक है तो आप सभी सुन रहे हैं। लेकिन मशीनें हमें गुलाम बना देती है। संसार को सुखी बनाने प्रयास हजारों सालों से किया जा रहा है। लेकिन हमारा अनुभव है - वास्तव में कितने सुखी हुए हैं हमलोग ? उसको तो हम नहीं बता सकते हैं। लेकिन दुखी कितने हुए हैं - यह हम बोल सकते हैं। हमलोग बोलते हैं -मोबाइल तो बहुत जरुरी है , उसके बिना तो हम रह नहीं सकते हैं। लेकिन हम बोल सकते हैं कि इसने हमें बहुत दुखी बना दिया है। क्योंकि इस मोबाईल की जकड़ से युवा -बच्चा -बूढ़ा सभी गुलाम हैं।

स्वामीजी कहते हैं 1000 वर्षों से जगत को सुखी बनाने का जितना प्रयास किया गया है - उतना ही प्रयास यदि मनुष्य को चरित्र के गुणों से विभूषित करने में - अविचलता , सहशीलता आदि गुणों को व्यक्त करने का प्रयास किया जाता ,यदि मनुष्य को Pure , Gentle and Tolerant " पवित्र , सभ्य और सहनशील बनाने में किया जाता , तो आज मनुष्य जितना सुखी है , उससे हजारों गुना अधिक सुखी हो जाता।

सभ्यता या शिष्टाचार (gentleness) क्या है ?  जरा विचार करके देखें यदि 'क्षात्र वीर्य और ब्रह्मतेज से विभूषित' कोई भी स्त्री हो या पुरुष- दोनों यदि ज्ञानदायिनी 'माँ श्री सारदा देवी" की   'पवित्रता, शिष्टाचार (सभ्यता) और सहनशीलता' जैसी 'व्यावहारिक दिव्यता' (Practical Divinity)का उदाहरण  "यदि शांति चाहते हो तो किसी का दोष मत देखो' के इस सिद्धान्त पर चलने के साथ-साथ अन्य व्यावहारिक उपदेशों (Practical teachings), जैसे "जब जैसा- तब तैसा, जहाँ जैसा -तहाँ तैसा, जिसको जैसा उसको वैसा", का पालन करते हुए भी श्री माँ (नवनीदा या भारती दीदीके जैसा-"मेरे मन, वाणी और आचरण से किसी को कष्ट न हो'-को अपने जीवन और आचरण से प्रस्तुत कर सके, ऐसा विवेकी मनुष्य बनने और बनाने का प्रशिक्षण देना ही 'स्वामी विवेकानन्द की मनुष्यनिर्माण और चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा' है। आज यदि 'पवित्रता, सभ्यता और सहनशीलता ' के गुणों का सम्पूर्ण आदर्श यदि कहीं सच्चे रूप में देखते हैं , तो किसमें देखते हैं ? ये सारे गुण हम माँ के जीवन में पूरा देखते हैं। 

पवित्रं चरितं यस्या: पवित्रं जीवनं तथा ।

पवित्रतास्वरूपिण्यै तस्यै कुर्मो नमो नम: ।।

माँ श्री सारदा देवी पवित्रता की जीवन्त मूर्ति थीं। सहनशील बनो - स्वामीजी कहते थे। दादा कहते थे - वीर हो धीर बनो। लेकिन सहनशील होना कितना कठिन है ? पर हुआ जा सकता है। यह हमें माँ के जीवन में देखते हैं। और Gentleness ' (सभ्यता-भद्रता) का आदर्श किसे कहते हैं ? कभी अपनी वाणी से , आचरण से या विचारों से दूसरों को कष्ट नहीं हो , इसका ख्याल हर समय रखने वाला सभ्य , भद्र माना जाता है। माँ कितनी सभ्य थी यह हम माँ के जीवन के द्वारा ही हम समझ सकते हैं। क्योंकि व्यावहारिक दिव्यता की साक्षात् उदाहरण श्री माँ हैं !! भारत का आदर्श वाक्य है - "कृण्वन्तो विश्वं आर्यम्" ! सारे संसार को हम सभ्य बना देंगे। "आर्य" का अर्थ: यहां "आर्य" किसी नस्ल या पंथ से नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति से है जो चरित्रवान मनुष्य है प्रशंसनीय कार्य करता है, सच्चाई का पालन करता है, और दूसरों के प्रति दयालु होता है.वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना: यह वाक्यांश 'पूरी पृथ्वी एक परिवार है' (वसुधैव कुटुम्बकम्) के विचार से भी जुड़ा है, जो सभी के उत्थान की बात करता है।  कैसे सभ्य बना देंगे ? माँ का व्याहारिक दिव्य जीवन इसका उदाहरण है। माँ सभ्यता , पवित्रता , सहनशीलता की प्रतिमूर्ति थी। आज हमने चार वक्ताओं द्वारा प्रस्तुत अनेक उदाहरणों के माध्यम से माँ का दिव्य जीवन हमने सुना। जितनी भी घटनायें सुनी इसका प्रभाव बहुत बड़ा होता है। 

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।4.9।।

।।4.9।। हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। इस प्रकार (मेरे जन्म और कर्मको) जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता अर्थात् दृढ़तापूर्वक मान लेता है, वह शरीरका त्याग करके पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होता, प्रत्युत मुझे प्राप्त होता है।

जो पैदा हुआ है , उसके देह का त्याग तो ध्रुव है। निश्चित है। लेकिन जो मुझे तत्व से जान लेता है - उस मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता - पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ! माँ के गर्भ में फिर न जाना पड़े , पुनर्गभवास को टालने के लिए अनेक जन्मों तक , साधना -तपस्या करनी पड़ती है। वह केवल अवतार पुरुषों वरिष्ठ के दिव्य जीवन और जन्म का यथार्थ तत्व जान लेने से -मनुष्य का जीवन सार्थक हो जाता है। वह सफल हो जाता है , वह मुक्त हो जाता है। पुनर्जन्म नैति' मतलब वह जन्म-मरण के चक्कर से छूट जाता है। 

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।

स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति।।2.72।

।।2.72।। हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है।। गीता कहती है - ऋषियों को ब्रह्मनिर्वाण की प्राप्ति होती है। 

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।

छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।।5.25।।

।।5.25।। वे ऋषिगण मोक्ष को प्राप्त होते हैं - जिनके पाप नष्ट हो गये हैं, जो छिन्नसंशय, संयमी और भूतमात्र के हित में रमने वाले हैं।।

ऋषियों को ब्रह्मनिर्वाण की प्राप्ति हुई थी , उन्होंने बहुत तपस्या की थी। बहुत परिश्रम किये थे , बहुत साधना की थी। तब उनको ब्रह्म निर्वाण की प्राप्ति हुई थी। हम लोग न तो साधना कर सकते हैं , न तपस्या कर सकते हैं। माँ कहती है - कलयुग में तो और भी कठिन है। लेकिन केवल माँ के जीवन की घटना है। उनका जन्म , उनका कर्म सबकुछ दिव्य है। उनके जीवन को पढ़ें , सुनें तो भी हमलोगों को - "त्यक्त्वा  देहम्  पुनः  जन्म नः एति gets !" वो मुझे प्राप्त होता है- माम् एति सः अर्जुन ! ब्रह्म के साथ एकाकार हो जाता है। हम भगवान की , माँ जगदम्बा की बात पढ़ें , सुनें उस पर चिंतन -मनन करें। निदिध्यासन करें। तो हमारा यह मनुष्य जीवन - जो बहुत कम उम्र का है। Life is short ' स्वामीजी कहते हैं - इस छोटे से जीवन में हमें जिस महान कर्तव्य को पूरा करना है।  वो बड़ी आसानी से हो जाता है। यह आज हमने इन सभी वक्ताओं से सुना। तो माँ के जीवन की घटनाएं बहुत महत्वपूर्ण हैं। आप सब लोगों ने मुझे शांति के साथ सुना , मैं आपका अत्यंत आभारी हूँ धन्यवाद। नमस्कार ! (4 :12 :57

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" Man is made up of three qualities — brutal, human, and godly. That which tends to increase the divinity in you is virtue, and that which tends to increase brutality in you is vice. You must kill the brutal nature and become human, that is, loving and charitable. You must transcend that too and become pure bliss. Sachchidânanda, fire without burning, wonderfully loving, but without the weakness of human love, without the feeling of misery." [Volume 6, p. 112/ Notes taken down in Madras - 1892-93 Swami Vivekananda.]

" मनुष्य तीन प्रकार के गुणों से निर्मित है,पाशविक, मानवीय और दैवी। जो तुममें दैवी गुण बढ़ाता है वह पूण्य है और जो तुममें पशुता बढ़ाता है वह पाप है।  तुमको पाशविक वृत्ति को समाप्त कर 'मनुष्य ' बनना चाहिये -अर्थात प्रेममय तथा उदार होना चाहिये। इससे भी उपर उठकर तुम्हें शुद्ध आनन्द, सच्चिदानन्द, अदाहक अग्नि के समान, अद्भुत प्रेममय किन्तु मानवीय प्रेम की दुर्बलता से रहित, दुःख की भावना से रहित (मनुष्य) बनना चाहिये।" 

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[ (19 अगस्त, 1883) परिच्छेद ~ 49, श्रीरामकृष्ण वचनामृत]

श्रीरामकृष्ण (मास्टर से)- देखो, ‘अष्टावक्र-संहिता’ में आत्मज्ञान की बातें हैं । आत्मज्ञानी कहते हैं, ‘सोऽहम् अर्थात् मैं ही वह परमात्मा हूँ । यह वेदान्तवादी संन्यासियों का मत है । गृहस्थ व्यक्तियों के लिए यह मत ठीक नहीं है । सब कुछ किया जा रहा है, फिर भी ‘मैं ही वह निष्क्रिय परमात्मा हूँ’ यह कैसे हो सकता है ? वेदान्तवादी कहते हैं कि आत्मा निर्लिप्त है । सुख-दुःख, पाप-पुण्य –ये सब आत्मा का कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते; परन्तु देहाभिमानी व्यक्तियों को कष्ट दे सकते हैं । धुआँ दीवार को मैला करता है, पर आकाश का कुछ नहीं कर सकता । कृष्णकिशोर ज्ञानियों की तरह कहा करता था कि मैं ‘ख’ अर्थात् आकाशवत् हूँ वह परम भक्त था; उसके मुँह से यह बात भले ही शोभा दे, पर सब के मुँह में यह शोभा नहीं देती

[या मति सा गतिर्भवेत्' जैसी बुद्धि , दृष्टि या मति वैसी गति ! ] 

 “पर ‘मैं मुक्त हूँ’ यह अभिमान बड़ा अच्छा है । ‘मैं मुक्त हूँ’ कहते रहने से कहनेवाला मुक्त हो जाता है। और ‘मैं बद्ध हूँ’ कहते रहने से कहनेवाला बद्ध ही रह जाता है । जो केवल यह कहता है कि ‘मैं पापी हूँ’ वही सचमुच गिरता है । कहते यही रहना चाहिए – ‘मैंने उनका नाम लिया है, अब मेरे पाप कहाँ ? मेरा बन्धन कैसा ?’

[শ্রীরামকৃষ্ণ (মাস্টারের প্রতি) — দেখ, অষ্টাবক্রসংহিতায় আত্মজ্ঞানের কথা আছে। আত্মজ্ঞানীরা বলে, ‘সোঽহম্‌’ অর্থাৎ “আমিই সেই পরমাত্মা।” এ-সব বেদান্তবাদী সন্ন্যাসীর মত, সংসারীর পক্ষে এ-মত ঠিক নয়। সবই করা যাচ্ছে, অথচ “আমিই সেই নিষ্ক্রিয় পরমাত্মা” — এ কিরূপে হতে পারে? বেদান্তবাদীরা বলে, আত্মা নির্লিপ্ত। সুখ-দুঃখ, পাপ-পুণ্য — এ-সব আত্মার কোনও অপকার করতে পারে না; তবে দেহাভিমানী লোকদের কষ্ট দিতে পারে। ধোঁয়া দেওয়াল ময়লা করে, আকাশের কিছু করতে পারে না। কৃষ্ণকিশোর জ্ঞানীদের মতো বলত, আমি ‘খ’ — অর্থাৎ আকাশবৎ। তা সে পরমভক্ত; তার মুখে ওকথা বরং সাজে, কিন্তু সকলের মুখে নয়।

“কিন্তু ‘আমি মুক্ত’ এ-অভিমান খুব ভাল। ‘আমি মুক্ত’ এ-কথা বলতে বলতে সে মুক্ত হয়ে যায়। আবার ‘আমি বদ্ধ’ ‘আমি বদ্ধ’ এ-কথা বলতে বলতে সে ব্যক্তি বদ্ধই হয়ে যায়। যে কেবল বলে ‘আমি পাপী’ ‘আমি পাপী’ সেই সালাই পড়ে যায়! বরং বলতে হয়, আমি তাঁর নাম করেছি, আমার পাপ কি, বন্ধন কি!”

"जिसमें विश्वास है उसमें सब है ; विश्वास नहीं तो कुछ भी नहीं। "-- श्रीरामकृष्ण  

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" सबसे पहले संकीर्ण धारणाओं का त्याग करो, और हर व्यक्ति में ईश्वर (आत्मा) का दर्शन करो - वे सब हाथों से काम कर रहे हैं , सब पैरों से चल रहे हैं , सब मुखों से भोजन कर रहे हैं ! हर व्यक्ति में वे निवास करते हैं , हर व्यक्ति में वे निवास करते हैं, सब मनों से वे सोचते हैं। वे (आत्मा-ईश्वर -इष्टदेव)  स्वतः प्रमाण हैं , वे हमसे भी हमारे अधिक निकटवर्ती हैं। इसे जानना ही धर्म है यही विश्वास है, प्रभु हमें यह विश्वास दें जब हम इस समग्र संसार में इस एकत्व का अनुभव करेंगे , तब हम अमर हो जायेंगे।' 

[Get rid, in the first place, of all these limited ideas and see God in every person — working through all hands, walking through all feet, and eating through every mouth. 'In every being He lives, through all minds He thinks. He is self-evident, nearer unto us than ourselves. To know this is religion, is faith, and may it please the Lord to give us this faith!' When we shall feel that oneness, we shall be immortal.]

भौतिक दृष्टि से देखने पर भी हम अमर हैं, सारे संसार के साथ एक हैं। जब तक इस संसार में एक व्यक्ति भी श्वास ले रहा है, मैं उसके भीतर जीवित हूँ। मैं यह संकीर्ण क्षुद्र व्यष्टि जीव नहीं हूँ, मैं समष्टिस्वरूप हूँ। मैं सर्वमय हूँ। 

[ We are physically immortal even, one with the universe. So long as there is one that breathes throughout the universe, I live in that one. I am not this limited little being, I am the universal.]  

अतएव उठो - यही श्रेष्ठ पूजा है। तुम स्वयं समग्र जगत के साथ अभिन्न हो। यही यथार्थ विनय है - घुटने टेककर 'मैं पापी हूँ, मैं पापी हूँ ' कहकर चिल्लाने का नाम विनय नहीं है।

[Stand up then; this is the highest worship. You are one with the universe. That only is humility — not crawling upon all fours and calling yourself a sinner. ] 

जब इस भेद-बुद्धि का आवरण छिन्न-विच्छिन्न हो जाता है , तभी सर्वोच्च उन्नति समझनी होगी। समस्त जगत का एकत्व -यही श्रेष्ठ धर्ममत है। मैं अमुक हूँ - व्यक्तिविशेष - यह बहुत संकीर्ण भाव है, सच्चे 'अहम' के लिए यह सत्य नहीं है। मैं विश्वव्यापक हूँ -इस धारणा पर प्रतिष्ठित हो जाओ -और श्रेष्ठ की उपासना सदा श्रेष्ठ रूप में करो; कारण , ईश्वर चैतन्य -स्वरुप है, आत्मस्वरूप है, चैतन्य और सत्य में ही उसकी उपासना करनी होगी। 

[The highest creed is Oneness. I am so-and-so is a limited idea, not true of the real "I". I am the universal; stand upon that and ever worship the Highest through the highest form, for God is Spirit and should be worshipped in spirit and in truth. ]

...जो कुछ ससीम (नश्वर) है, वह जड़ है। चैतन्य (आत्मा) ही केवल अनन्तस्वरुप (अविनाशी ,त्रिकाल अबाधित सत्य-भगवान) है। मानव चैतन्यस्वरूप है (कारण - सभी प्राणियों में केवल मनुष्य ही नित्य-अनित्य का विवेक कर सकता है) और इसलिए मानव भी अनन्त है, और केवल अनन्त ही अनन्त की उपासना में (विवेक-दर्शन का अभ्यास करने में) समर्थ है। हम अनन्त की उपासना करेंगे ; वही सर्वोच्च आध्यात्मिक उपासना है।     

[That which is limited is material. The Spirit alone is infinite. God is Spirit, is infinite; man is Spirit and, therefore, infinite, and the Infinite alone can worship the Infinite. We will worship the Infinite; that is the highest spiritual worship. ] 

इन सब भावों के माहात्म्य का अनुभव करना कितना कठिन है ! मैं स्वमत की प्रतिष्ठा के लिए दार्शनिक विचार करता हूँ , कितनी बातें करता हूँ; इतने में कोई मेरे प्रतिकूल घटना घटती है - मैं अनजाने ही क्रुद्ध हो उठता हूँ ; भूल जाता हूँ कि -इस विश्व में क्षुद्र ससीम मेरे इस (नश्वर कच्चा 'अहम') अस्तित्व को छोड़कर और भी कुछ है। (मेरा एक सच्चा 'अहम'  भी है।) मैं कहना भूल जाता हूँ, " मैं चैतन्य स्वरुप हूँ - इस अकिंचितकर बात से मेरा क्या बिगड़ता है - मैं तो चैतन्यस्वरुप हूँ। ' मैं भूल जाता हूँ कि यह सब मेरी ही लीला है; मैं ईश्वर (आत्मा या इष्टदेव) को भूल जाता हूँ, मैं मुक्ति की बात भी भूल जाता हूँ।  

[The grandeur of realising these ideas, how difficult it is! I theorise, talk, philosophize; and the next moment something comes against me, and I unconsciously become angry, I forget there is anything in the universe but this little limited self, I forget to say, "I am the Spirit, what is this trifle to me? I am the Spirit." I forget it is all myself playing, I forget God, I forget freedom.                         

 ऋषियों ने बार बार घोषणा की है -क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति' -    -मुक्ति का पथ उस्तरे की धार की भाँति तीक्ष्ण , दीर्घ और कठिन है - इसका अतिक्रमण करना कठिन है। किन्तु इन दुर्बलताओं और विफलताओं से अपने को बँधने न दो। उपनिषदों की घोषणा है -  उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। - 'उठो , जागो , जब तक लक्ष्य पर नहीं पहुँचते , रुको नहीं। यद्यपि वह पथ उस्तरे की धार की तरह तीक्ष्ण है - यद्यपि वह पथ दीर्घ है , दूरवर्ती और कठिन है , किन्तु हम उस पथ का अवश्य ही अतिक्रमण करेंगे। 

[Sharp as the blade of a razor, long and difficult and hard to cross, is the way to freedom. The sages have declared this again and again. Yet do not let these weaknesses and failures bind you. The Upanishads have declared, "Arise ! Awake ! and stop not until the goal is reached." We will then certainly cross the path, sharp as it is like the razor, and long and distant and difficult though it be.]  

मनुष्य देवताओं और असुरों का प्रभु होता है। हमारे दुःखों के लिए स्वयं हमारे सिवा और कोई उत्तरदायी नहीं है। क्या तुम समझते हो कि यदि मनुष्य अमृत की चेष्टा करे, तो उसे बदले में सिर्फ विष का प्याला ही मिलेगा ? नहीं , अमृत है और है उसकी प्राप्ति के निमित्त प्रयत्नशील प्रत्येक मनुष्य के लिए। प्रभु ने स्वयं कहा है - 

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। 

अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ॥ 66 ॥

सर्वधर्मान - इन सभी धर्मों का, सभी उद्यमों का परित्याग कर एक मेरी शरण में आ। मैं तुझे समस्त पापों के पार लगा दूँगा। भय न कर।  हम जगत के सभी शास्त्रों में इसी वाणी की घोषणा सुनते हैं।

 [Man becomes the master of gods and demons. No one is to blame for our miseries but ourselves. Do you think there is only a dark cup of poison if man goes to look for nectar? The nectar is there and is for every man who strives to reach it. The Lord Himself tells us, "Give up all these paths and struggles. Do thou take refuge in Me. I will take thee to the other shore, be not afraid." We hear that from all the scriptures of the world that come to us.] 

 यह उपदेश ही हमसे यह कहने की शिक्षा देती है - 'स्वर्गलोक के सदृश इस पृथ्वी पर भी तेरी इच्छा ही पूर्ण हो।' कारण, 'सर्वत्र तेरा ही राज्य है, तेरी ही शक्ति और तेरी ही महिमा है। ' पर इसी विश्वास में प्रतिष्ठित हो जाना- कठिन, बड़ी कठिन बात है। अभी कहा - " हे प्रभु , मैंने अभी तेरी शरण ली - प्रेममय ! तेरे प्रेम पर सर्वस्व समर्पण किया - तेरी वेदी पर , जो कुछ भला है , जो कुछ भी पुण्यमय है, सभी कुछ स्थापन किया। मेरे पाप-ताप , भले-बुरे कार्य सब कुछ तेरे ही चरणों पर मैं समर्पण करता हूँ - तू सब ग्रहण कर - मैं अब तुझे कभी न भूलूँगा। " अभी कहा  'तेरी इच्छा पूर्ण हो ! ' पर दूसरे ही क्षण जब एक परीक्षा में पड़ गया -तब मैं क्रोध से उछल पड़ा।

[The same voice teaches us to say, "Thy will be done upon earth, as it is in heaven," for "Thine is the kingdom and the power and the glory." It is difficult, all very difficult. I say to myself, "This moment I will take refuge in Thee, O Lord. Unto Thy love I will sacrifice all, and on Thine altar I will place all that is good and virtuous. My sins, my sorrows, my actions, good and evil, I will offer unto Thee; do Thou take them and I will never forget." One moment I say, "Thy will be done," and the next moment something comes to try me and I spring up in a rage. ] 

 सब धर्मों का एक ही लक्ष्य है ,परन्तु विभिन्न आचार्य विभिन्न भाषाओँ का व्यवहार करते रहते हैं। सबकी चेष्टा इस झूठे 'अहम'  या कच्चे 'अहम' का विनाश करना है। जिसके फलस्वरूप इस सच्चे 'अहम' (Real-I) का, एकमात्र इस प्रभु का ही राज्य होगा। हिब्रू धर्मशास्त्रों में कहा गया है - ' मैं तेरा प्रभु , तेरा ईश्वर एक ईर्ष्यालु ईश्वर हूँ। मेरे सिवा तू किसी अन्य ईश्वर को नहीं रख सकता। ' केवल ईश्वर ही रह जाना चाहिए।  हमें कहना होगा , 'मैं नहीं , तू।' और उस प्रभु के सिवा हमें सर्वस्व त्यागना होगा; केवल वे ही राज्य करेंगे। मानों हमने खूब कठोर साधना की - परन्तु दूसरे ही मुहूर्त में हमारा पैर फिसल गया- और तब हमने माँ की ओर हाथ बढ़ाने की चेष्टा की -समझ गया कि अपनी चेष्टा से हम खड़े नहीं रह सकते। जीवन अनन्त है, जिसका एक अध्याय है - 'तेरी इच्छा पूर्ण हो '! यदि हम उस जीवन-ग्रन्थ के सब अध्यायों का मर्म ग्रहण न करें , तो समुदय जीवन का अनुभव नहीं कर सकते। 

[The goal of all religions is the same, but the language of the teachers differs. The attempt is to kill the false "I", so that the real "I", the Lord, will reign. "I the Lord thy God am a jealous God. Thou shalt have no other gods before me," say the Hebrew scriptures. God must be there all alone. We must say, "Not I, but Thou," and then we should give up everything but the Lord. He, and He alone, should reign. Perhaps we struggle hard, and yet the next moment our feet slip, and then we try to stretch out our hands to Mother. We find we cannot stand alone. Life is infinite, one chapter of which is, "Thy will be done," and unless we realise all the chapters we cannot realise the whole. ] 

मुख से कहते हैं - ' तेरी इच्छा पूर्ण हो '- लेकिन विश्वासघाती मन प्रतिमुहूर्त इन भावों का विरोध करता है, परन्तु हमें यदि इस कच्चे 'अहम ' को जीतना हो , तो बारम्बार इसी बात की (इसी जीवन-मुक्ति सूत्र की) आवृत्ति करनी होगी। हम एक विश्वासघाती की सेवा करें और परित्राण पा जायें - यह कभी नहीं हो सकता। सबका परित्राण है , केवल विश्वासघाती का परित्राण नहीं है - और हम विश्वासघाती के रूप में एकदम निन्दित हैं।जब हम अपनी आत्मा की ध्वनि की अवज्ञा करते हैं , तब हम अपनी आत्मा के विरुद्ध विश्वासघात करते हैं , हम उस जगतजननी की महिमा के विरुद्ध विश्वासघात करते हैं। अतएव चाहे जो कुछ भी हो , हमें अपने तन और मन को उस परम इच्छामयी की इच्छा में मिला देना पड़ेगा। 

"Thy will be done" — every moment the traitor mind rebels against it, yet it must be said, again and again, if we are to conquer the lower self. We cannot serve a traitor and yet be saved. There is salvation for all except the traitor and we stand condemned as traitors, traitors against our own selves, against the majesty of Mother, when we refuse to obey the voice of our higher Self. Come what will, we must give our bodies and minds up to the Supreme Will.

किसी हिन्दू विद्वान् ने ठीक कहा कि यदि मनुष्य - 'तेरी इच्छा पूर्ण हो ', यह बात दो बार उच्चारण करे , तो वह पाप करता है। 'तेरी इच्छा पूर्ण हो '- बस और क्या प्रयोजन है ? इसे दो बार कहने की आवश्यकता ही क्या है ? जो अच्छा है , वह तो अच्छा है ही। एक बार जब कह दिया 'तेरी इच्छा पूर्ण हो ', तब तो वह बात लौटाई नहीं जा सकती। 'स्वर्ग के भाँति मृत्युलोक में भी तेरी इच्छा पूर्ण हो , क्योंकि राज्य तो तेरा ही है , शक्ति और महिमा भी सदा तेरी ही है। ' " [धर्म क्या है ? खंड 2,प.300-303]

 Well has it been said by the Hindu philosopher, "If man says twice, 'Thy will be done,' he commits sin." "Thy will be done," what more is needed, why say it twice? What is good is good. No more shall we take it back. "Thy will be done on earth as it is in heaven, for Thine is the kingdom and the power and the glory for evermore."{ What Is Religion? (Volume 1)

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चौथे पूर्व वक्ता का सम्बोधन - 

गृहस्थ जीवन का क्या आदर्श है ? 

 ब्रह्मनिष्ठो  गृहस्थ: स्यात्  ब्रह्मज्ञानपरायण:।

यत यत कर्म प्रकुर्वीत तद् ब्रम्हणि समर्पयेत्।।

      गृहस्थ को ब्रह्मनिष्ठ होना चाहिए तथा ब्रह्म ज्ञान का लाभ ही उसके जीवन का चरम लक्ष्य होना चाहिए। परंतु फिर भी उसे निरंतर अपने सब कर्म करते रहना चाहिए - अपने कर्तव्यों का पालन करते रहना चाहिए, और अपने समस्त कर्मों के फलों को ईश्वर के चरणों में समर्पित करना  चाहिए।  

        कर्म करके कर्मफल की आकांक्षा न करना, किसी मनुष्य की सहायता करके उसे किसी प्रकार की कृतज्ञता की आशा न रखना, कोई सत्कर्म करके भी इस बात की ओर नजर तक न देना कि वह हमें यश और कीर्ति देगा अथवा नहीं, इस संसार में सबसे कठिन बात है।

  संसार जब तारीफ करने लगता है, तब एक निहायत बुजदिल भी बहादुर बन जाता है। समाज के समर्थन तथा प्रशंसा से एक मूर्ख भी वीरोचित कार्य कर सकता है; परंतु अपने आसपास के लोगों की निंदा- स्तुति की बिल्कुल परवाह न करते हुए सर्वदा सत्य कार्य में लगे रहना वास्तव में सबसे बड़ा त्याग है। [गृहस्थ हो या संन्यासी - "हरेक अपने क्षेत्र में महान है। " (खण्ड -३ /१७) में] 

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[ खंड?? विवेक-जीवन ब्लॉग - July 16, 2013धर्म क्या है ? [What Is Religion? (Vol-1, p.333एक लाख लोगों में से कोई एक व्यक्ति भी समझ ले तो बहुत है ! 1.कैम्प नोट 2005 सरीसा आश्रम| रनेन दा का शरीर त्याग आज - 27 जनवरी, 2026 को 1. 30 pm हुआ / प्रबाल मोहन्ती का फोन - 3 pm./दीपक दा का फोन 3:30 pm/ गजानन्द पाठक का फोन महामण्डल फेस-बुक में -4:14 pm] 

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