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गुरुवार, 19 मार्च 2026

⚜️️🔱मैं कौन हूँ, Who am I ? वास्तव में ' मैं कौन हूँ और आत्मा क्या है ? ⚜️️🔱

  महामण्डल के एक कैम्प में 'आत्मा ' के विषय पर चर्चा को सुनकर किसी छात्र ने एक बार श्रद्धेय 'नबनी दा' (महामण्डल के संस्थापक सचिव श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय) से प्रश्न किया था - वास्तव में ' मैं कौन हूँ और आत्मा क्या है ? 


मैं कौन हूँ, Who am I ?

[Vivekananda Yuva Mahamandal-

Lec-Nabani Haran Mukhopadhyaya]

उसके उत्तर में 'श्रद्धेय दादा' ने बंगला भाषा में जो कहा था उसका हिन्दी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत है -

       " तुम जो पूछते हो कि हमारे शरीर के भीतर 'हृदय -गुहा ' में जो है वो क्या है , उसको कैसे जाने? तो जो ह्रदय -गुहा के भीतर में विद्यमान है, उस ह्रदय की गहराई को समझना , इतना कठिन है कि अधिकांश मनुष्य को सारा जीवन साधन-भजन करने पर भी समझ में नहीं आता है।
    और इसके भी ऊपर तुम्हारा दूसरा प्रश्न, 'असले आमि के' ? -वास्तव में मैं कौन हूँ ? इसकी जिज्ञासा ही अधिकांश मनुष्य के मन में कभी उठती ही नहीं है। बड़े संयोग से, लाखों में एक-दो मनुष्यों के मन में ऐसा प्रश्न उठता है। और  उन ऐसे हजारों -हजार प्रयत्न करने वालों में किसी एक व्यक्ति को उस 'आत्मतत्व ' की अनुभूति होती है। 
      तो तुम्हारे बुद्धि में यह प्रश्न कैसे उठा , मैं कह नहीं सकता। क्योंकि हमलोग अपने प्रशिक्षण-कार्यक्रम इस विषय पर चर्चा नहीं करते। मुझे लगता है यह बात तुमने अन्य कहीं से सुनकर पूछ ली है। शायद कल के संध्या-कालीन सत्र के समय ही किसी वक्त के द्वारा कही हुई ये मेरे कानों तक पहुँची थी कि, "अपने वास्तविक स्वरुप में हमलोग आत्मा हैं।"
        लेकिन आत्मा है क्या चीज ? इसको भला हमलोग अभी कैसे समझ सकते हैं ?  आत्मा का अर्थ होता है चैतन्य ! लेकिन यदि हम सोचते हैं कि होश या चैतन्य को ही आत्मा के रूप में हमने ठीक ठीक समझ लिया है, या आत्मा का वास्तविक परिभाषा या अर्थ समझ लिया है, तो दोनों शब्दों में कोई भी शब्द पर्याप्त नहीं है। क्योंकि 'चेतना' (consciousness) को 'शक्ति' का केवल एक कण मात्र भी कहा जा सकता है -It could be called a particle of energy, इसलिए आत्मा के संबंध में - या चेतना के सम्बन्ध में मुख से जो कुछ भी उच्चारित किया जायेगा, उसका विवरण देने की चेष्टा होगी , या व्याख्या करने की जितनी भी चेष्टा की जाएगी, वही गलत सिद्ध होगी। क्योंकि आत्मा—या चेतना—का वर्णन नहीं किया जा सकता। For the soul—or consciousness—cannot be described.' इसलिए उसका नाम-करण ही नहीं हो सकता!  (1:23 मिनट)
 उसका (उस अनन्त -असीम का एकमेवाद्वितीय का) कोई भी 'नाम '( ससीम नाम चेतना या आत्मा) नहीं रखा जा सकता। क्योंकि उनके गुणों या विशेषताओं को नाम देकर और लिस्ट बनाकर कभी समाप्त नहीं किया जा सकता, और न मुख से ही कहा जा सकता है। हमलोग अपने वास्तविक स्वरुप में (पक्का मैं) आत्मवस्तु -आत्मतत्व ही हैं। वास्तव में वह आत्मतत्व ही शाश्वत चैतन्य स्वरुप है !वही चैतन्य; जिससे सारी सृष्टि उत्पन्न हुई है, उसको 'ब्रह्म' भी कहा जाता है, चैतन्य भी कहा जाता है।  वास्तव में हमलोग 'वह' ब्रह्म, आत्मा या चैतन्य ही हैं।
 किन्तु इस सत्य को कितने लोग जानते हैं ? क्योंकि स सूक्ष्म आत्मतत्व को जानना अत्यन्त कठिन है; इसलिए  "ब्रह्मैव इदं सर्वं'  या 'आत्मैव इदं सर्वं" या "जगत्यां यत् किं च जगत् अस्ति इदं सर्वम्" रूप से इस तरह आत्मनु-सन्धान करते हुए परम् सत्य को जानने में रूचि- बताओ कितनों को होती है ?  और जब किसी को आत्मानुभूति या,चैतन्य-बोध हो जाता है , तब यह बहुत स्वाभाविक है कि , हमारी जो यह चेतना है  - यह बोध कि इस शरीर M/F में है , जिसका एक नाम-रूप है। अपना परिवार , समाज और जगत है , जिस जगत में हमलोग जो रह रहे हैं। हमारा एक परिचय है(एक आधारकार्ड वाला परिचय ,apparent 'I')  एक पेशा है -जिसका एक 'Pan Card' संख्या है। हमारे पास अमुक -अमुक डिग्री है ! जब हम उस 'व्यावहारिक मैं ' वाले परिचय के आलावा वास्तव में कौन है; जब यह जानने की जिज्ञासा होती है कि वास्तव में कौन हूँ , तब आत्मा या चैतन्य को जानने का सवाल मन में उठता है। लेकिन जिनको (सत्यान्वेषी को) ऐसी ठीक- ठीक चैतन्य अनुभूति या आत्मानुभूति हो जाती है - फिर उनके मन में अपने वास्तविक स्वरुप के बारे में इस तरह की कोई दुविधा नहीं होती। (2:13 मिनट) क्योंकि चैतन्य और ज्ञान (आत्मज्ञान) समानार्थक शब्द हैं। जो ज्ञानस्वरूप है , वही चैतन्य है। (आनन्द-स्वरूप है ?) इसलिए इसकी कोई परिचयात्मक विवरण या व्याख्या नहीं की सकती। वास्तव में हमलोग वही हैं। किन्तु इस सत्य (इन्द्रियातीत) को हम समझ नहीं पाते हैं।
लेकिन किसी ब्रह्मज्ञानी या आत्मज्ञानी महापुरुष के मुख से सुनकर भी , उदाहरण के लिए जैसे स्वामी विवेकानन्द के शक्तिदायी विचार को पढ़कर, या श्रीरामकृष्ण देव के वचनामृत को पढ़कर या किसी के मुख से श्रवण कर यदि उनपर हमारी थोड़ी भी आस्था, विश्वास श्रद्धा है। और हम अपने मन को (अन्तर्मुखी शुद्धबुद्धि-विवेकी बुद्धि जोड़कर) यही बात यह समझाना चाहें कि -हमारा नाम चाहे जो कुछ हो , परिवार जो कुछ हो, शरीर M/F -स्त्री-पुरुष कुछ भी हो , किसी भी जाति का हो, डिग्री भी कितनी बड़ी हो , इन सब ऊपरी भेद-दृष्टि/बुद्धि/मति से हमारे वास्तविक स्वरुप में कोई अन्तर नहीं पड़ता है। हमारी आयु कम हो या हम अधिक उम्र के ही क्यों न हों। वास्तव में हमलोग उसी चैतन्य शक्ति के एक छोटे से कण या अंश मात्र है, जो एक विशेष शरीर (M/F) शरीर और एक नाम-रूप  धारण करके (अर्थात अनेकों प्रकार के जीव -जगत और ईश्वर आदि का नाम-रूप  धारण करके इस धरती पर विचरण कर रहे हैं। 
       यही वास्तविक बात या परम  सत्य है। किन्तु इस सत्य को सामान्य जनों के समझने की भाषा में कहना तो कठिन तो  है ही,लेकिन सुनकर इसे समझ लेना तो और भी अधिक कठिन है। यदि तुमने केवल प्रश्न करने को कहा गया है , इसलिए तुमने भी मजा करने के लिए एक प्रश्न पूछ लिया है , तो इससे तुम्हें कुछ लाभ नहीं होगा। लेकिन यदि तुमने अपने मन में काफी सोच-विचार करने के बाद यह प्रश्न किया है , और सचमुच इसी प्रश्न का उत्तर खोजने की दिशा में , आत्मानु-संधान करने या सत्य को जानने की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हो। और इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने तक  रुकना नहीं चाहते हो ; तो तुम्हारे जीवन में किसी न किसी दिन, ऐसा खास समय में आ सकता है जब तुम इस प्रश्न के उत्तर- अपने यथार्थ स्वरुप के प्राप्त करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के बहुत निकट पहुँच सकते हो। 
    और इसके उत्तर के निकट तक पहुँच पाने जाने से भी तुम्हें उसी आनन्द की उपलब्धि होनी आरम्भ हो जाएगी। जिस 'परमानन्द' के विषय में बोलते हुए, " श्रीरामकृष्ण देव कहते हैं कुछ लोग समुद्र देखने के लिए गए थे। (4:00 मिनट) उनमें से एक व्यक्ति दूर से समुद्र की गर्जना सुनकर ही अचेत (unconscious) हो गया, या मूर्छित हो गया। और वह महाआनन्द में लीन हो गया !   हे भगवान ! मैंने समुद्र की दहाड़ सुनी ??!! और वह "Oh, Father—I have heard the roar of the sea!" সমুদ্রের জল দেখে নীল ! আপাতত দৃষ্টিতে অনন্ত সমুদ্র -যেন সমুদ্রের পার  নেই। 
    और एक दूसरा व्यक्ति थोड़ा आगे बढ़कर दूर से ही देखता है - समुद्र का जल तो एकदम नीला पानी है , और मानो उसका कहीं किनारा ही नहीं है ! Upon seeing his blue waves' তার নীল তরঙ্গরাজি দেখে ' - उसकी नीली-नीली लहरों को देखकर ही वह सम्मोहित होकर अचेत हो गया। मूर्छित हो गया। और कोई-कोई ऐसा भी है , जो समुद्र की दहाड़ सुनकर भी अचेत नहीं हुआ ! उसका दृश्य (रूप) देखकर भी वह मूर्छित नहीं हुआ; और बिल्कुल निकट , समुद्र के किनारे जाकर , थोड़ा जल में उतर कर उसका स्पर्श भी कर लिया ! यह अवस्था बहुत थोड़े से,गिने-चुने लोगों को ही प्राप्त होती है।
      यह जो आत्मवस्तु है - वास्तव में हमलोग जो आत्मा या चैतन्य हैं, यह अनुभव भी ठीक उसी तरह का होता है। आत्मा या चैतन्य कहने से क्या हमारा शरीर रोमांचित जैसा अनुभव होता है ? (5:03) या अपने ह्रदय में एक अद्भुत आनन्द की अनुभूति , Wondrous Thrill - अद्भुत पुलकन की अनुभूति क्या हमारे ह्रदय का स्पर्श करती है ! किन्तु चैतन्य , ब्रह्म या आत्मा कहने से ही , उसी प्रकार कुछ हो जाने की बात सोचकर ही हम बोल पड़ते है ! " अरे वाह—यह विशेष शब्द ठीक वही सत्ता है, जो न केवल हर चीज़ के *भीतर* विद्यमान है, बल्कि जिसके बारे में हम कहते हैं कि *वही* सब कुछ है।  [Oh my—this particular word is that very entity which resides not merely *within* everything, but which we say *is* everything.]  
     लेकिन ऐसा कहना भी ठीक नहीं है। सभी कुछ के भीतर वह है नहीं -बल्कि जिसमें से सबकुछ उत्पन्न हुआ है -उसकी आत्मा कहते हैं। उसीको ब्रह्म कहते हैं , उसी को ही चैतन्य कहते हैं ! उसका नाम सुनते ही हमलोगों के शरीर और ह्रदय में एक रोमांच होता है , ह्रदय में एक आनन्द का स्पर्श जो हमारे मन को ही पुलकित कर देती है। ह्रदय को विशाल बना देती है। और जितना ही उसके निकट होते जायेंगे , उसका जितना सौन्दर्य दिखाई देगा , जितने भी रूप दिखाई देंगे -जितने उसके गुण दिखाई देंगे -उतने ही आनंद में डूबते जायेंगे। उस समय हमलोग उसी ब्रह्मसमुद्र में -इसी चैतन्य समुद्र में बिल्कुल लीन हो जायेंगे। (6:09) उस समय (अहंकार के गिर जाने पर) देखेंगे -'चैतन्य और मेरे बीच में कोई पार्थक्य नहीं है !" हम देखेंगे -' मैं' चैतन्य (आत्मा ,ब्रह्म) से भिन्न कोई अलग सत्ता नहीं है ! उस समय देखेंगे - 'मैं ही चैतन्य हूँ ! 'अहंब्रह्मास्मि ' मैं ही ब्रह्म हूँ ! मैं ही आत्मा हूँ ! चैतन्य , ब्रह्म, आत्मा - ये तीन नाम हैं किन्तु वस्तु एक ही है ! Consciousness, Brahman, the Soul—these are three names, yet the reality is one and the same! जो चैतन्य है , वही आत्मा है , वही ब्रह्म है। और उससे यह यह सब  दृष्टिगोचर सृष्टि अभिव्यक्त हुई है। और हमें अनेक प्रकार के जड़-चेतन नाम और रूपों में - जिसको हम 'जड़' या 'जीव'- कहते हैं , वास्तव में 'जड़' नामक कोई चीज है ही नहीं। जो कुछ भी है - सबकुछ चैतन्यमय हैं ! अचैतन्य या जड़ कोई नहीं है। सभी के भीतर वही एक चैतन्य वही एक आत्मवस्तु (इष्टदेव) ही हैं ! (6:49)  
प्रतिदिन के जीवन में अनुभूत अखण्डता के समान ही प्रत्येक जन्म पूर्व जीवन की अगली कड़ी है। जैसे आज का दिन बीते हुए कल का विस्तार है। पुनर्जन्म के इसी सिद्धान्त को मुसलमान सूफी कवि जलालुद्दीन रूमी ने बड़े सुंदर ढंग से व्याख्या करते हुए कहा था - 
      मनुष्य का जीवन मिट्टी के नीचे जो खनिज या धातु रहता है, उसी खनिज से देवता और फरिश्ता या पैगम्बर से भी परे जाने की यात्रा की समान है--

"मैं एक खनिज (मिट्टी) के रूप में मरा और पौधा हो गया,

मैं पौधे के रूप में मरा और पशु बन गया,
मैं पशु के रूप में मरा और मनुष्य बन गया,

तो फिर मरने से डरूँ क्यों, क्या मरने से कभी मैं कम हुआ ?

एक और बार मैं मनुष्य से मरूँगा,
ताकि फ़रिश्तों के पंख और सिर (उच्च अवस्था) को प्राप्त करूँ।

और फ़रिश्ते से भी मुझे आगे बढ़ना होगा,
क्योंकि “हर चीज़ नष्ट होने वाली है, 
केवल उसका (ईश्वर का) मुख शेष है।”

फिर एक बार फ़रिश्ते से भी क़ुर्बान हो जाऊँगा,
और वह बन जाऊँगा जो कल्पना में भी नहीं आता।

पस अदम गर्दम अदम चूँ अर्घनून गोयदम, 
“इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन” -

"निःसंदेह हम अल्लाह के हैं; और निःसंदेह 

उसी की ओर लौटकर जाने वाले हैं।" 

[कुरान की एक आयत (2:156) है, जिसे
 इस्लाम में "इस्तिरजा" (Istirja) कहा जाता है। ]

अंततः मैं ‘अदृश्य, निराकार’ हो जाऊँगा—जैसे वीणा (अर्घनून) की ध्वनि—

हमारे जीवन-विणा की आकारहीन आवाज कहेगी 

(Voice without Form-कहेगा ) 
  
और वह (सत्य) कहेगा:

 “हम उसी की ओर लौट कर जाने वाले हैं।”

(मिट्टी के नीचे जाने के बाद- खनिज? या मोक्ष का मार्ग ?) 

'देवता' (100 % निस्वार्थ) बन जाने से भी भी यात्रा पूरी नहीं हुई ? देवता भी तुच्छ वस्तु है देवत्व से भी मुझे परे अनन्त के आलोक में जाना है ! उसी को ब्रह्म कहते हैं उसी को चैतन्य कहते हैं ! (7:47) उसीको आत्मा कहते हैं। और हम सभी लोग वास्तव में उन्हीं के अंश हैं। जो सर्वशक्तिमान हैं ! प्रेममय ! आनन्दमय ! हैं वही वस्तु हमलोग भी हैं ! वही प्रेम , वही आनन्द , उसी सत्य का एक कण मात्र हैं ! यही हमारा वास्तविक परिचय है ! Real I- पक्का मैं है !      
देवता/फरिश्ता सबसे बड़े हैं। किन्तु -- "परन्तु देवदूत /फरिश्ता की स्थिति से भी मुझे आगे जाना है;ईश्वर (अल्लाह) के सिवा सब कुछ नाशवान है। जब मैं देवदूत की आत्मा का त्याग कर दूँगा,
तब मैं वह बनूँगा जो कोई मन सोच भी नहीं सकता।"

 तो तुमने जो पूछा है उस अवस्था को ऐसी अद्भुत अवस्था में पहुँचना समझ सको , और तुमने बड़े मन की आकुलता से यह प्रश्न पूछा है, इस प्रश्न के उत्तर का अनुसरण करते रहो ; जीवन में अन्य जो कुछ भी कर रहे हो , उसको करने के साथ -साथ यह आत्मान्वेषण या सत्यान्वेषण भी जारी रखो , तो हो सकता है , एक दिन तुम्हारे जीवन में वह अद्भुत अनुभूति एक दिन होगी, और उसी दिन तुम्हें इस चैतन्य , इस ब्रह्म ,इस आत्मा के अभेद-बोध होगा , और तब तुम अद्वैत में प्रतिष्ठित हो जाओगे। वह अवस्था तुम्हारी हो , हम सभी को वह अवस्था प्राप्त हो यही प्रार्थना करता हूँ !    
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अज जमादी मुर्दम ओ नामी शुदम
वज़ नमा मुर्दम ब-हैवान बर ज़दम

[मैं जड़ (पदार्थ) से मरा और वनस्पति बन गया।
वनस्पति से मरा तो पशु बनकर उभरा।]

मुर्दम अज़ हैवानी ओ आदम शुदम
पस चे तरसम? के ज़ मुर्दन कम शुदम?
[पशु से मरकर मैं मनुष्य बन गया।
फिर मैं क्यों डरूँ? मृत्यु से मैं कब घटा हूँ?]
हमला-ए दीगर बमीरम अज़ बशर
ता बरारम अज़ मलाइक पर्र ओ सर
[एक और बार मैं मनुष्य से मरूँगा,
ताकि फ़रिश्तों के पंख और सिर (उच्च अवस्था) को प्राप्त करूँ।]
वज़ मलिक हम बायदम जस्तन ज़ जू
कुल्लु शय्इन हालिक इल्ला वज्हहु
[और फ़रिश्ते से भी मुझे आगे बढ़ना होगा,
क्योंकि “हर चीज़ नष्ट होने वाली है, केवल उसका (ईश्वर का) मुख शेष है।”]
बार-ए दीगर अज़ मलिक कुर्बान शवम
आन्चे अंदर वह्म नायद आन् शवम
[फिर एक बार फ़रिश्ते से भी क़ुर्बान हो जाऊँगा,
और वह बन जाऊँगा जो कल्पना में भी नहीं आता।]
पस अदम गर्दम अदम चूँ अर्घनून
गोयदम के इन्ना इलैहि राजिऊन
[अंततः मैं ‘अदृश्य/शून्य’ हो जाऊँगा—
जैसे वीणा (अर्घनून) की ध्वनि—
और वह (सत्य) कहेगा: “हम उसी की ओर लौटने वाले हैं।”]
[दृष्टिं ज्ञानमयीं  कृत्वा पश्येद्  ब्रह्ममयं जगत्। 
देहबुद्धया तु दासोऽहं  जीवबुद्धया त्वदंशक
आत्मबुद्धया  त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः ॥ 
ज्ञानमय दृष्टि से संसार को ब्रह्ममय देखना चाहिए; देहबुद्धिसे तो मैं दास हूँ, जीवबुद्धिसे आपका अंश ही हूँ और  आत्मबुद्धिसे में वही हूँ जो आप हैं, यही मेरी निश्चित मति है॥ यह प्रभु के एक भक्त श्रीहनुमान जी का कथन है। ]  
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RCM
तुम जो पूछते हो कि हमारे शरीर के भीतर 'हृदय -गुहा’में जो है वो क्या है,उसको कैसे जाने? ह्रदय गुहा में विद्यमान है,उस की गहराई को समझना,इतना कठिन है कि सारा जीवन साधन-भजन करने पर भी समझ में नहीं आता है।
    और इसके भी ऊपर तुम्हारा दूसरा प्रश्न, 'असले आमि के'(वास्तव में मैं कौन हूँ ? )इसकी जिज्ञासा अधिकांश मनुष्य के मन में कभी नहीं उठती है।बड़े संयोग से,लाखों में एक-दो मनुष्यों के मन में ऐसा प्रश्न उठता है।और उनमें भी हजारों -हजार प्रयत्न करने वालों में से किसी एक को उस 'आत्मतत्व ' की अनुभूति होती है। 
      तो तुम्हारी बुद्धि में यह प्रश्न कैसे उठा,मैं कह नहीं सकता क्योंकि हमलोग अपने प्रशिक्षण-कार्यक्रम में इस विषय पर चर्चा नहीं करते।मुझे लगता है यह बात तुमने अन्य कहीं से सुनकर पूछ ली है।शायद कल की संध्या-कालीन सत्र में किसी वक्ता ने ये कही थी कि, "अपने वास्तविक स्वरुप में हमलोग आत्मा हैं।"
        लेकिन आत्मा है क्या ? इसको भला हमलोग अभी कैसे समझ सकते हैं ? आत्मा का अर्थ होता है चैतन्य ! लेकिन यदि हम सोचते हैं कि होश या चेतना  ही आत्मा है और हमने इसे ठीक-ठीक समझ लिया है,या आत्मा का वास्तविक परिभाषा या अर्थ समझ लिया है,तो ऐसा नहीं है।दोनों शब्द पर्याप्त नहीं हैं।क्योंकि 'चेतना' (consciousness) को 'शक्ति' का एक कण मात्र कहा जा सकता है -It could be called a particle of energy,इसलिए आत्मा के संबंध में - या चेतना के संबंध में मुख से जो कुछ भी उच्चारित किया जायेगा,विवरण देने की चेष्टा होगी,या व्याख्या की जाएगी,वह गलत सिद्ध होगी क्योंकि आत्मा या चेतना—का वर्णन नहीं किया जा सकता। For the soul—or consciousness—cannot be described.' इसलिए उसका नामकरण ही नहीं हो सकता! 
 उसका (उस अनन्त -असीम,एकमेवाद्वितीय का) कोई भी 'नाम '( ससीम नाम चेतना या आत्मा) नहीं रखा जा सकता क्योंकि उनके गुणों या विशेषताओं को कोई नाम नहीं दिया जा सकता,न ही उसके गुणों की सूची बनाई जा सकती है।हमलोग अपने वास्तविक स्वरुप में आत्मवस्तु या आत्मतत्व ही हैं।वह आत्मतत्व ही शाश्वत चैतन्य स्वरुप है !वही चैतन्य; जिससे सारी सृष्टि उत्पन्न हुई है,उसको 'ब्रह्म' भी कहा जाता है,चैतन्य भी कहा जाता है।वास्तव में हमलोग 'वह' ब्रह्म,आत्मा या चैतन्य ही हैं।
 किन्तु इस सत्य को कितने लोग जानते हैं ?इस सूक्ष्म आत्मतत्व को जानना अत्यन्त कठिन है; इसलिए  "ब्रह्मैव इदं सर्वं'  या 'आत्मैव इदं सर्वं" या "जगत्यां यत् किं च जगत् अस्ति इदं सर्वम्" रूप से इस तरह आत्मानुसन्धान करते हुए परम् सत्य को जानने में कितनों की रूचि होती है ?  और जब किसी को आत्मानुभूति या,चैतन्य-बोध हो जाता है,तब यह बहुत स्वाभाविक है कि , हमारी जो यह चेतना है-यह बोध है कि इस शरीर में हैं,इसका एक नाम-रूप है,अपना परिवार,समाज और जगत है,हमारा एक परिचय है,एक पेशा है -जिसका एक 'Pan Card' भी है।हमारे पास अमुक -अमुक डिग्री है!तब इस 'व्यावहारिक मैं ' वाले परिचय के अलावा मैं कौन हूँ यह जानने की जिज्ञासा होती है,इस आत्मा या चैतन्य को जानने का सवाल मन में उठता है।लेकिन जिनको ऐसी ठीक- ठीक चैतन्य अनुभूति या आत्मानुभूति हो जाती है - फिर उनके मन में अपने वास्तविक स्वरुप के बारे में इस तरह की कोई दुविधा नहीं होती। क्योंकि चैतन्य और ज्ञान (आत्मज्ञान) समानार्थक शब्द हैं।जो ज्ञानस्वरूप है,वही चैतन्य है।इसलिए इसकी कोई परिचयात्मक विवरण या व्याख्या नहीं की जा सकती। वास्तव में हमलोग वही हैं।किन्तु इस सत्य (इन्द्रियातीत) को हम समझ नहीं पाते हैं।
लेकिन किसी ब्रह्मज्ञानी या आत्मज्ञानी महापुरुष के मुख से सुनकर या स्वामी विवेकानन्द के शक्तिदायी विचारों तथा श्रीरामकृष्ण देव के वचनामृत को पढ़कर या किसी के मुख से श्रवण कर यदि उनपर हमारी थोड़ी भी आस्था,विश्वास और श्रद्धा हो और हम अपने मन को यही बात समझाना चाहें कि -हमारा नाम चाहे जो कुछ हो,परिवार जो कुछ हो, शरीर स्त्री-पुरुष कुछ भी हो,किसी भी जाति का हो,डिग्री भी कितनी बड़ी हो,इन सब ऊपरी भेद-दृष्टि से हमारे वास्तविक स्वरुप में कोई अन्तर नहीं पड़ता है।हमारी आयु कम हो अधिक ही क्यों न हो वास्तव में हमलोग उसी चैतन्य शक्ति के एक छोटे से कण या अंश मात्र हैं ,जो एक विशेष शरीर  और एक नाम-रूप  धारण करके (अर्थात अनेकों प्रकार के जीव -जगत और ईश्वर आदि का नाम-रूप  धारण करके ) इस धरती पर विचरण कर रहे हैं।1
यही वास्तविक बात या परम सत्य है।किन्तु इस सत्य को सामान्य जनों की भाषा में कहना तो कठिन है ही,लेकिन सुनकर इसे समझ लेना तो और भी अधिक कठिन है।यदि तुमने केवल प्रश्न करने को कहा गया है इसलिए प्रश्न पूछ लिया है,तो इससे तुम्हें कुछ लाभ नहीं होगा। लेकिन यदि तुमने अपने मन में काफी सोच-विचार करने के बाद यह प्रश्न किया है,और सचमुच इस प्रश्न का उत्तर खोजने की दिशा में,आत्मानुसंधान करने या सत्य को जानने की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हो और इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने तक  रुकना नहीं चाहते हो ; तो तुम्हारे जीवन में किसी न किसी दिन,ऐसा खास समय में आ सकता है जब तुम इस प्रश्न का उत्तर या अपने यथार्थ स्वरुप को प्राप्त करने के लक्ष्य के बहुत निकट पहुँच सकते हो। 
    और इसके उत्तर के निकट तक पहुँच जाने पर भी तुम्हें उसी आनन्द की उपलब्धि होनी आरम्भ हो जाएगी जिस 'परमानन्द' के विषय में बोलते हुए, " श्रीरामकृष्ण देव कहते हैं कुछ लोग समुद्र देखने के लिए गए थे। उनमें से एक व्यक्ति दूर से समुद्र की गर्जना सुनकर ही अचेत (unconscious) हो गया या मूर्छित हो गया तथा महाआनन्द में लीन हो गया ! हे भगवान ! मैंने समुद्र की दहाड़ सुनी ??!! और वह "Oh, Father—I have heard the roar of the sea!" 
    और एक दूसरा व्यक्ति थोड़ा आगे बढ़कर दूर से ही देखता है - समुद्र का जल जो एकदम नीला  है,और मानो उसका कहीं किनारा ही नहीं है ! उसकी नीली-नीली लहरों को देखकर ही वह सम्मोहित होकर अचेत हो गया,मूर्छित हो गया।और कोई-कोई ऐसा भी है , जो समुद्र की दहाड़ सुनकर भी अचेत नहीं हुआ ! उसका दृश्य देखकर भी वह मूर्छित नहीं हुआ;और बिल्कुल निकट,समुद्र के किनारे जाकर,थोड़ा जल में उतर कर उसका स्पर्श भी कर लिया ! यह अवस्था बहुत थोड़े से,गिने-चुने लोगों को ही प्राप्त होती है।
      यह जो आत्मवस्तु है - वास्तव में हमलोग जो आत्मा या चैतन्य हैं, यह अनुभव भी ठीक उसी तरह का होता है।आत्मा या चैतन्य कहने से क्या हमारा शरीर रोमांचित होता है?या अपने ह्रदय में एक अद्भुत आनन्द की अनुभूति , Wondrous Thrill - अद्भुत पुलकन की अनुभूति क्या हमारे ह्रदय का स्पर्श करती है ?किन्तु चैतन्य,ब्रह्म या आत्मा कहने से ही,उसी प्रकार कुछ हो जाने की बात सोचकर ही हम बोल पड़ते हैं ! " अरे वाह—यह विशेष शब्द ठीक वही सत्ता है,जो न केवल हर चीज़ के भीतर विद्यमान है, बल्कि जिसके बारे में हम कहते हैं कि वही सब कुछ है।  [Oh my—this particular word is that very entity which resides not merely within everything, but which we say is everything.]  
     लेकिन ऐसा कहना भी ठीक नहीं है। सभी कुछ के भीतर वह है नहीं -बल्कि जिसमें से सबकुछ उत्पन्न हुआ है -उसी को आत्मा कहते हैं।उसीको ब्रह्म कहते हैं,उसी को ही चैतन्य कहते हैं!उसका नाम सुनते ही हमलोगों के शरीर और ह्रदय में एक रोमांच होता है,ह्रदय में एक आनन्द का स्पर्श जो हमारे मन को ही पुलकित कर देता है,ह्रदय को विशाल बना देता है।और जितना ही उसके निकट होते जायेंगे , उसका जितना सौन्दर्य दिखाई देगा , जितने भी रूप दिखाई देंगे -जितने उसके गुण दिखाई देंगे -उतने ही आनंद में डूबते जायेंगे। उस समय हमलोग उसी ब्रह्मसमुद्र में -इसी चैतन्य समुद्र में बिल्कुल लीन हो जायेंगे।उस समय देखेंगे -'चैतन्य और मेरे बीच में कोई पार्थक्य नहीं है !" हम देखेंगे -' मैं' चैतन्य (आत्मा ,ब्रह्म) से भिन्न कोई अलग सत्ता नहीं है ! उस समय देखेंगे - 'मैं ही चैतन्य हूँ ! 'अहं ब्रह्मास्मि ' मैं ही ब्रह्म हूँ ! मैं ही आत्मा हूँ ! चैतन्य , ब्रह्म, आत्मा - ये तीन नाम हैं किन्तु वस्तु एक ही है ! Consciousness, Brahman, the Soul—these are three names, yet the reality is one and the same! जो चैतन्य है , वही आत्मा है , वही ब्रह्म है। और उससे यह यह सब  दृष्टिगोचर सृष्टि अभिव्यक्त हुई है। और हमें अनेक प्रकार के जड़-चेतन नाम और रूपों में - जिसको हम 'जड़' या 'जीव'- कहते हैं , वास्तव में 'जड़' नामक कोई चीज है ही नहीं। जो कुछ भी है - सबकुछ चैतन्यमय है ! अचैतन्य या जड़ कोई नहीं है। सभी के भीतर वही एक चैतन्य वही एक आत्मवस्तु (इष्टदेव) ही हैं ! (6:49)  
प्रतिदिन के जीवन में अनुभूत अखण्डता के समान ही प्रत्येक जन्म पूर्व जीवन की अगली कड़ी है।जैसे आज का दिन बीते हुए कल का विस्तार है।पुनर्जन्म के इसी सिद्धान्त को मुसलमान सूफी कवि जलालुद्दीन रूमी ने बड़े सुंदर ढंग से व्याख्या करते हुए कहा था - 
      जीवन खनिज से मनुष्य,मनुष्य से देवता या फरिश्ता या पैगम्बर से भी ऊपर जाने की यात्रा है--2
अज जमादी मुर्दम ओ नामी शुदम
वज़ नमा मुर्दम ब-हैवान बर ज़दम
(मैं खनिज से मरा और वनस्पति बन गया।वनस्पति से मरा तो पशु बनकर उभरा)
मुर्दम अज़ हैवानी ओ आदम शुदम
पस चे तरसम?के ज़ मुर्दन कम शुदम?
(पशु से मरकर मैं मनुष्य बन गया।फिर मैं क्यों डरूँ?मृत्यु से मैं कब घटा हूँ?)
हमला-ए-दीगर बमीरम अज़ बशर
ता बरारम अज़ मलाइक पर्र ओ सर 
(एक और बार मैं मनुष्य से मरूँगा,ताकि फ़रिश्तों के पंख और पूर्ण विकसित बुद्धि प्राप्त कर सकूँ)
वज़ मलिक हम बायदम जस्तन ज़ जू
कुल्लु शय्इन हालिक इल्ला वज्हहु 
(और फरिश्ते से भी मुझे आगे बढ़ना होगा क्योंकि यहाँ हर चीज़ नष्ट होने वाली है केवल ईश्वर ही शेष रहेगा)
बार-ए-दीगर अज़ मलिक क़ुर्बान शवम
आन्चे अंदर वह्म नायद आन् शवम
(फिर एक बार फरिश्ते से भी कुर्बान हो जाऊँगा,फिर वह बन जाऊँगा जो कल्पनातीत है।)
पस अदम गर्दम अदम चूँ अघर्नून 
गोयदम के इन्ना इलैहि राजिऊन 
(अंततः मैं अदृश्य हो जाऊँगा-जैसे वीणा की ध्वनि।
और वह ध्वनि कहती रहेगी -हम उसी की ओर लौटने वाले हैं।)
'देवता' बन जाने पर भी यात्रा पूरी नहीं हुई,देवता भी तुच्छ है,देवत्व से भी मुझे परे अनन्त के आलोक में जाना है ! उसी को ब्रह्म कहते हैं उसी को चैतन्य कहते हैं ! (7:47) उसीको आत्मा कहते हैं।और हम सभी लोग वास्तव में उन्हीं के अंश हैं।जो सर्वशक्तिमान हैं प्रेममय ,आनन्दमय हैं ,वही वस्तु हमलोग भी हैं ।वही प्रेम ,वही आनन्द ,उसी सत्य का एक कण मात्र हैं !यही हमारा वास्तविक परिचय है!      
देवता/फरिश्ता सबसे बड़े हैं।किन्तु -- "परन्तु देवदूत /फरिश्ता की स्थिति से भी मुझे आगे जाना है;ईश्वर के सिवा सब कुछ नाशवान है। जब मैं देवदूत की आत्मा का त्याग कर दूँगा,
तब मैं वह बनूँगा जो कोई मन सोच भी नहीं सकता।"
 तो तुमने जो पूछा है उस अवस्था को ऐसी अद्भुत अवस्था में पहुँचना समझ सको , और तुमने बड़े मन की आकुलता से यह प्रश्न पूछा है, इस प्रश्न के उत्तर का अनुसरण करते रहो ; जीवन में अन्य जो कुछ भी कर रहे हो , उसको करने के साथ -साथ यह आत्मान्वेषण या सत्यान्वेषण भी जारी रखो तो हो सकता है एक दिन तुम्हारे जीवन में वह अद्भुत अनुभूति एक दिन होगी, और उसी दिन तुम्हें इस चैतन्य , इस ब्रह्म ,इस आत्मा का अभेद-बोध होगा ,और तब तुम अद्वैत में प्रतिष्ठित हो जाओगे। वह अवस्था तुम्हें प्राप्त हो ,हम सभी को वह अवस्था प्राप्त हो यही प्रार्थना करता हूँ !

                        समाप्त
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⚜️️🔱श्रीमद् भगवद्गीता : अध्याय -8 ⚜️️🔱अध्याय -8 : अक्षरब्रह्म योग ⚜️️🔱 [गीता 8.26 में] सफल योगी बनने के लिए दिये गये निर्देश : दो प्रकार के शुक्ल और कृष्ण मार्ग सनातन माने गये हैं ⚜️️🔱 वर्तमान जीवन में ही अहंकार का नाश और जीवन्मुक्ति संभव है। ⚜️️🔱 श्रीकृष्ण आत्मा को अन्धकार से परे अर्थात् अविद्या से परे बताते हैं ⚜️️🔱अन्तकाल में भी आत्मस्वरूप का स्मरण ⚜️️🔱

अध्याय -8  

 ⚜️️🔱अक्षरब्रह्म योग⚜️️🔱

(अविनाशी भगवान का योग)

अष्टम अध्याय का सारामृत : अक्षरब्रह्मयोग का अर्थ है अक्षरब्रह्म की प्राप्ति का मार्ग । इस अध्याय के प्रारम्भ में अर्जुन द्वारा किये गये प्रश्नों का उत्तर देने के पश्चात् अपनी दिव्य प्रेरणा से प्रेरित होकर भगवान् श्रीकृष्ण ने प्रयाणकाल में परम पुरुष का स्मरण करने वालों को अनन्त की प्राप्ति कैसे होती है इसका वर्णन किया है और अर्जुन को ईश्वर स्मरण करते हुए जीवनसंघर्षों की चुनौतियों का कुशलता से सामना करने का उपदेश दिया है।

अर्जुन उवाच

किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।

अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते।।8.1।।

।।8.1।। अर्जुन ने कहा -हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है अध्यात्म क्या है? तथा कर्म क्या है? और अधिभूत नाम से क्या कहा गया है? तथा अधिदैव नाम से क्या कहा जाता है?

अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।

प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः।।8.2।।

।।8.2।। और हे मधुसूदन ! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? और संयत चित्त वाले पुरुषों द्वारा अन्त समय में आप किस प्रकार जाने जाते हैं

।।8.2।। पूर्व अध्याय के अन्तिम दो श्लोकों में अकस्मात् ब्रह्म अध्यात्म अधिभूत आदि जैसे नवीन पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग किया गया है और कहा है कि ज्ञानी पुरुष मरण काल में भी चित्त युक्त होकर मुझे इनके सहित जानते हैं। 

  इससे अर्जुन कुछ भ्रमित हो गया।इस अध्याय का प्रारम्भ अर्जुन के प्रश्न के साथ होता है जिसमें वह उन शास्त्रीय शब्दों की निश्चित परिभाषायें जानना चाहता है जिनका प्रयोग भगवान् ने अपने उपदेश में किया था। 

  वह यह भी जानने को उत्सुक है कि जीवन काल में सतत आध्यात्मिक साधना के अभ्यास के फलस्वरूप प्राप्त पूर्ण आत्मसंयम के द्वारा मरणकाल में भी आत्मा का अनुभव किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है। भगवान् श्रीकृष्ण प्रत्येक शब्द की परिभाषा देते हुए कहते हैं --

श्री भगवानुवाच

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।

भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः।।8.3।।

।।8.3।। श्रीभगवान् ने कहा -- परम अक्षर (अविनाशी) तत्त्व ब्रह्म है; स्वभाव (अपना स्वरूप) अध्यात्म कहा जाता है; भूतों के भावों को उत्पन्न करने वाला विसर्ग (यज्ञ, प्रेरक बल) कर्म नाम से जाना जाता है।। { प्राणियों का उद्भव (सत्ता को प्रकट) करनेवाला जो त्याग है उसको कर्म कहा जाता है।}

इन प्रश्नों का क्रम से निर्णय करने के लिये श्रीभगवान् बोले,परम अक्षर ब्रह्म है अर्थात् हे गार्गि ! इस अक्षर के शासन में ही यह सूर्य और चन्द्रमा धारण किये हुए स्थित हैं ' इत्यादि श्रुतियोंसे जिसका वर्णन किया गया है' जो कभी नष्ट नहीं होता वह परमात्मा ही ब्रह्म है। (अक्षरं न क्षरतीति अक्षरं परमात्मा एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि (बृह0 उ0 3।8।9 इति श्रुतेः।)

परम विशेषण से युक्त होने के कारण यहाँ अक्षर शब्द से ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म इस वाक्य में वर्णित ओंकार का ग्रहण नहीं किया गया है ; क्योंकि परम वह विशेषण निरतिशय अक्षर ब्रह्म में ही अधिक सम्भव -- युक्तियुक्त है। 

उसी परब्रह्म का जो प्रत्येक शरीर (M/F शरीर) में अन्तरात्मभाव है उसका नाम स्वभाव है वह स्वभाव ही अध्यात्म कहलाता है। अभिप्राय यह कि यानी शरीर को आश्रय बनाकर जो अन्तरात्मभाव से उसमें रहने वाला है और परिणाम में जो परमार्थ ब्रह्म ही है;  वही तत्त्व स्वभाव है उसे ही अध्यात्म कहते हैं। ( हवन करने योग्य ) द्रव्यों का त्याग करना है वह त्याग रूप यज्ञ कर्म नाम से कहा जाता है, इस बीजरूप यज्ञ से ही वृष्टि आदि के क्रम से स्थावरजङ्गम समस्त भूतप्राणी उत्पन्न होते हैं।

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्।

अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर।।8.4।।

।।8.4।। हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! नश्वर वस्तु (पंचमहाभूत) अधिभूत और पुरुष अधिदैव है; इस शरीर में मैं ही अधियज्ञ हूँ।।

 'परम अक्षर तत्त्व ब्रह्म है' - ब्रह्म शब्द उस अपरिवर्तनशील और अविनाशी तत्त्व का संकेत करता है जो इस दृश्यमान जगत् का अधिष्ठान है। वही आत्मरूप से शरीर मन और बुद्धि को चैतन्य प्रदान कर उनके जन्म से लेकर मरण तक के असंख्य परिवर्तनों को प्रकाशित करता है।

ब्रह्म का ही प्रतिदेह में आत्मभाव अध्यात्म कहलाता है। यद्यपि परमात्मा स्वयं निराकार और सूक्ष्म होने के कारण सर्वव्यापी है तथापि उसकी सार्मथ्य और कृपा का अनुभव प्रत्येक भौतिक शरीर में स्पष्ट होता है।  देह उपाधि से मानो परिच्छिन्न हुआ ब्रह्म जब उस देह में व्यक्त होता है तब उसे अध्यात्म कहते हैं।

 श्री शंकाचार्य इसे स्पष्ट करते हुए लिखते हैं प्रतिदेह में प्रत्यगात्मतया प्रवृत्त परमार्थ ब्रह्म अध्यात्म कहलाता है। मात्र उत्पादन ही कर्म नही है। उत्पादन की मात्रा में वृद्धि करने का आदेश दिया जा सकता है तथा केवल अधिक परिश्रम से उसे सम्पादित भी किया जा सकता है। 

यहाँ प्रयुक्त कर्म शब्द का तात्पर्य और अधिक गम्भीर सूक्ष्म और दिव्य है। बुद्धि में निहित वह सृजन शक्ति वह सूक्ष्म आध्यात्मिक शक्ति जिसके कारण बुद्धि निर्माण कार्य में प्रवृत्त होकर विभिन्न भावों का निर्माण करती है कर्म नाम से जानी जाती है। अन्य सब केवल स्वेद और श्रम है अर्जन और अपव्यय है स्मिति और गायन है सुबकन और रुदन है।

नश्वर भाव अधिभूत है अक्षर तत्त्व के विपरीत क्षर प्राकृतिक जगत् है जिसके माध्यम से आत्मा की चेतनता व्यक्त होने से सर्वत्र शक्ति और वैभव के दर्शन होते हैं। क्षर और अक्षर में उतना ही भेद है जितना इंजिन और वाष्प में रेडियो और विद्युत् में। संक्षेप में सम्पूर्ण दृश्यमान जड़ जगत् क्षर अधिभूत है।

अध्यात्म दृष्टि से क्षर उपाधियाँ हैं शरीर इन्द्रियाँ मन और बुद्धि। पुरुष अधिदैव है। पुरुष का अर्थ है पुरी में शयन करने वाला अर्थात् देह में वास करने वाला। वेदान्तशास्त्र के अनुसार प्रत्येक इन्द्रिय मन और बुद्धि का अधिष्ठाता देवता है उनमें इन उपाधियों के स्वविषय ग्रहण करने की सार्मथ्य है। समष्टि की दृष्टि से शास्त्रीय भाषा में इसे हिरण्यगर्भ (कारणशरीर) कहते हैं। [हिरण्यगर्भ ईश्वर का अर्थ लगाया जाता है - यानि वो गर्भ जहाँ हर कोई वास करता हो।]

इस देह में अधियज्ञ मैं हूँ वेदों के अनुसार देवताओं के उद्देश्य से अग्नि में आहुति दी जाने की क्रिया यज्ञ कहलाती है। अध्यात्म (व्यक्ति) की दृष्टि से यज्ञ का अर्थ है विषय भावनाएं एवं विचारों का ग्रहण। बाह्य यज्ञ के समान यहाँ भी जब विषय रूपी आहुतियाँ इन्द्रियरूपी अग्नि में अर्पण की जाती हैं तब इन्द्रियों का अधिष्ठाता देवता (ग्रहण सार्मथ्य) प्रसन्न होता है जिसके अनुग्रह स्वरूप हमें फल प्राप्त होकर अर्थात् तत्सम्बन्धित विषय का ज्ञान होता है।

 इस यज्ञ का सम्पादन चैतन्य आत्मा की उपस्थिति के बिना नहीं हो सकता। अत वही देह में अधियज्ञ कहलाता है।भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा यहाँ दी गयी परिभाषाओं का सूक्ष्म अभिप्राय या लक्ष्यार्थ यह है कि ब्रह्म ही एकमात्र पारमार्थिक सत्य है और शेष सब कुछ उस पर भ्रान्तिजन्य अध्यास है।

 अतः आत्मा को जानने का अर्थ है सम्पूर्ण जगत् को जानना। एक बार अपने शुद्ध स्वरूप को पहचानने के पश्चात् वह ज्ञानी पुरुष कर्तव्य अकर्तव्य और विधिनिषेध के समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है। कर्म करने अथवा न करने में वह पूर्ण स्वतन्त्र होता है।

जो पुरुष इस ज्ञान में स्थिर होकर अपने व्यक्तित्व के शारीरिक मानसिक एवं बौद्धिक स्तरों पर क्रीड़ा करते हुए आत्मा को देखता है वह स्वाभाविक ही स्वयं को उस दिव्य साक्षी के रूप में अनुभव करता है, जो स्वइच्छित खण्डन -भवबन्धन अनात्म बन्धनों की तिलतिल हो रही मृत्यु का भी अवलोकन करता रहता है।

अन्तकाल में आपका स्मरण करता हुआ जो देहत्याग करता है उसकी क्या गति होती है

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।

यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः।।8.5।।

।।8.5।। और जो कोई पुरुष अन्तकाल में मुझे ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं।।

 महर्षि व्यास वेदान्त के इस मूलभूत सिद्धांत पर बल देते हुए नहीं थकते कि -" कोई भी जीव किसी देह विशेष (M/F शरीर) के साथ तभी तक तादात्म्य किये रहता है,  जब तक  वह देह उसे अपने इच्छित अनुभवों को प्राप्त करने में उपयोगी और आवश्यक होता है। एक बार यह प्रयोजन सिद्ध हो जाने पर वह उस शरीर को सदा के लिए त्याग देता है। तत्पश्चात उस देह के प्रति न कोई कर्तव्य रहता है न सम्बन्ध और न ही कोई अभिमान। 

किसी देह विशेष से विलग होने के समय जीव के मन में उस विषय के सम्बन्ध में विचार होंगे जिसके लिए वह प्रबल इच्छा या महत्वाकांक्षा रखता था, चाहे वह इच्छा किसी भी जन्म में उत्पन्न हुई हो। इस प्रकार की मान्यता युक्तियुक्त है। 

ध्यान और भक्ति की साधना (जप-ध्यान) मन को एकाग्र करने की वह कला है जिसमें ध्येय विषयक एक अखण्ड वृत्ति बनाए रखी जाती है। ऐसा साधक अन्तकाल में मुझ पर ही ध्यान करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है। 

"मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि। 

किवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत्॥"

 मरण के पूर्व की जीव की यह अन्तिम प्रबल इच्छा उसकी भावी गति को निश्चित करती है। 

जब कोई साधक स्वविवेक से कामुक जीवन की व्यर्थता को पहचान लेता है और इस कारण स्वयं को उन बन्धनों से मुक्त करने के लिए आतुर हो उठता है तब देह त्याग के पश्चात् वह साधक निश्चित ही पशुत्व से मनुष्य और मनुष्य से देवत्व तक (या जलाल उद्दीन रूमी की -'खनिज से मनुष्य , मनुष्य से फरिश्ता और फरिश्ता से भी उन्नत अवस्था -तक)  विकास यात्रा  की उच्चतर स्थिति को प्राप्त होता है। 

इसके विपरीत जो जीव अपने जीवन काल में केवल पशुओं के जैसा M/F शरीर में देहाभिमान या अहंकार और स्वार्थ का जीवन जीता रहा हो और देह के साथ तादात्म्य करके, अंतिम क्षणों तक निम्न स्तर की इन्द्रियभोगों में आसक्त रहेगा , या कामनाओं को ही पूर्ण करने में व्यस्त रहा हो, ऐसा जीव वैषयिक वासनाओं से युक्त होने के कारण ऐसे ही शरीर को धारण करेगा जिसमें उसकी पाशविक प्रवृत्तियाँ अधिक से अधिक सन्तुष्ट हो सकें

इसी युक्तियक्त एवं बुद्धिगम्य सिद्धांत के अनुसार वेदान्त यह घोषणा करता है कि मरणासन्न पुरुष की अन्तिम इच्छा उसके भावी शरीर तथा वातावरण को निश्चित करती है। 

इसलिए भगवान् यहाँ कहते हैं कि अन्तकाल में आगे जो पुरुष मेरा स्मरण करता हुआ देह त्यागता है वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।

यह निश्चय केवल मेरे ही विषय में नहीं है वरन् --

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।

तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।।8.6।।

।।8.6।। हे कौन्तेय ! (यह जीव) अन्तकाल में जिस किसी भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागता है, वह सदैव उस भाव के चिन्तन के फलस्वरूप उसी भाव को ही प्राप्त होता है।।

 भारत के महान तत्त्वचिन्तक ऋषियों द्वारा सम्यक् विचारोपरांत पहुँचे हुए निष्कर्ष को भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ घोषित करते हैं अन्तकाल में जिस किसी भाव का स्मरण करते हुए जीव देह को त्यागता है वह उसी भाव को प्राप्त होता है। 

चाहे वह पशुत्व का भाव हो अथवा देवत्व का। जैसा तुम सोचोगे वैसे ही बनोगे यह एक ऐसा सिद्धांत है जो किसी भी बुद्धिमान पुरुष को किसी दार्शनिक द्वारा दिए गये स्पष्टीकरण के बिना भी स्वत स्पष्ट हो जाता है। 

कर्मों के प्रेरक विचार हैं और किसी भी एक विशेष क्षण पर मनुष्य के मन में जो विचार आते हैं वे उसके पूर्वार्जित संस्कारों के अनुरूप ही होते हैं। इन संस्कार या वासनाओं का मनुष्य स्वयं निर्माण करता है (जप-ध्यान का अभ्यास )। स्वाभाविक है जिस पुरुष ने जीवन पर्यन्त अनात्म उपाधियों से तादात्म्य हटाकर मन को आत्मा में स्थिर करने का सतत प्रयत्न किया हो ऐसे साधक पुरुष के मन में अध्यात्म संस्कार दृढ़ हो जाते हैं

 इस सतत चिन्तन और संस्कारों के प्रभाव से मरणकाल में भी उसकी चित्तवृत्ति सहज ही ध्येय (ठाकुर-माँ-स्वामीजी)  विषयक होगी और तदनुसार ही मरणोपरांत उसकी यात्रा भी अपने निर्धारित लक्ष्य की ओर ही होगी। 

हम यह नहीं सोचें कि अन्तकाल में हम ईश्वर का स्मरण कर लेंगे। अन्तकाल में अपनी भावी यात्रा को निर्धारित करने का अवसर नहीं होता; क्योंकि पूर्वाभ्यास के अनुसार उसी प्रकार की ही वृत्ति मन में उठती है

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्।।8.7।।

।।8.7।। इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे।।

।।8.7।। कोई भी धर्म तब तक समाज की निरन्तर सेवा नहीं कर सकता जब तक वह धर्मानुयायी लोगों को अपना व्यावहारिक दैनिक जीवन में सफलतापूर्वक जीने की विधि और साधना का उपदेश नहीं देता।

 यहाँ एक ऐसी साधना बतायी गयी है जो भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से लागू होती है। इस सरल उपदेश के पालन से न केवल रहन सहन का स्तर बल्कि सम्पूर्ण जीवन का स्तर भी उच्च किया जा सकता है।

 बहुत ही कम अवसरों पर व्यक्ति का मन पूर्णतया उसी स्थान पर होता है जहाँ वह काम कर रहा होता है। सामान्यतः मन का एक बड़ा भाग भय के भयंकर जंगलों में या ईर्ष्या की गुफाओं में या फिर असफलता की काल्पनिक सम्भावनाओं के रेगिस्तान में सदैव भटकता रहता है। 

इस प्रकार मन की सम्पूर्ण शक्ति का अपव्यय करने के स्थान पर भगवान् उपदेश देते हैं कि भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में सर्वोच्च लाभ पाने के इच्छुक और प्रयत्नशील पुरुष को अपना मन शान्त और पावन सत्यस्वरूप - आत्मा (इष्टदेव) में स्थिर करना चाहिए। ऐसा करने से वह अपनी सम्पूर्ण क्षमता को अपने कार्य के उपयोग में ला सकता है और इस प्रकार इह और पर दोनों ही लोकों में सर्वोच्च सम्मान का स्थान प्राप्त कर सकता है।

हिन्दु धर्म में धर्म और जीवन परस्पर विलग नहीं हैं। एक दूसरे से विलग होने से दोनों ही नष्ट हो जायेंगे। वे परस्पर वैसे ही जुड़े हुए हैं जैसे मनुष्य का धड़ और मस्तक। वियुक्त होकर दोनों ही जीवित नहीं रह सकते। 

जीवन में आने वाली परीक्षा का घड़ियों में भी एक सच्चे साधक को चाहिए कि वह अपने मन के निरन्तर शुद्ध आत्मस्वरूप तथा विश्व के अधिष्ठान ब्रह्म में एकत्व भाव से स्थिर रखना सीखे। न तो यह कठिन है और न ही अनभ्यसनीय।

रंगमंच पर राजा की भूमिका करते हुये एक अभिनेता को कभी यह विस्मृत नहीं होता कि शहर में उसकी एक पत्नी और पुत्र भी है। यदि अपनी यह पहचान भूलकर रंगमंच के बाहर भी वह राजा के समान व्यवहार करने लगे तो तत्काल ही उसे समाज के हित में किसी पागलखाने में भर्ती करा दिया जायेगा। परन्तु वह अपने वास्तविक व्यक्तित्व को जानता है इसलिए वह कुशल अभिनेता होता है

 इसी प्रकार सदा अपने दिव्य स्वरूप के प्रति निरंतर जागरूक रहते हुए भी हम जगत् में बिना किसी बाधा के कार्य कर सकते हैं। इस ज्ञान में स्थित होकर कर्म करने से हमारी उपलब्धियों को विशेष आभा प्राप्त होती है और उसके साथ ही जीवन में आने वाली निराशा की घड़ी में उत्पन्न होने वाली मन की प्रतिक्रियाओं को हम शान्त और मन्द करने में समर्थ बनते हैं। 

वास्तविक अर्थ में एक सुशिक्षित एवं सुसंस्कृत पुरुष/ चरित्रवान मनुष्य  को कभी भी अपनी शिक्षा का विस्मरण नहीं होता। वह तो उसके जीवन का अंग बन जाती है। उसके आचार विचार और व्यवहार में शिक्षा की सुरभि का सतत निस्सरण होता रहता है। 

उसी प्रकार आत्मभाव में स्थित योगी पुरुष के मन में सबके प्रति करुणा और प्रेम तथा कर्मों में निःस्वार्थ भाव होता है। यही वह रहस्य है जिसके कारण वैदिक सभ्यता ने अपने काल में सम्पूर्ण विश्व को अपनी ओर आकर्षित किया और वह भावी पीढ़ियों के सम्मान का पात्र बनी।

भगवान् यहाँ स्पष्ट कहते हैं कि जो पुरुष केवल धर्म प्रतिपादित फल के लिए युद्ध का जीवन जीते हुए भी मेरा स्मरण करता है उसका मन और बुद्धि मुझमें ही समाहित हो जाती है। 

अपने विचारों के अनुसार तुम बनोगे इस सिद्धांत के अनुसार तुम मुझे निःसन्देह प्राप्त होगे।आगे कहते हैं --

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।

परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्।।8.8।।

।।8.8।। हे पार्थ ! अभ्यासयोग से युक्त अन्यत्र न जाने वाले चित्त से निरन्तर चिन्तन करता हुआ (साधक) परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।।

इस श्लोक में प्रयुक्त याति क्रियापद का अर्थ है- जाता है। परन्तु यह परम पुरुष को जाना या प्राप्त होना मृत्यु के पश्चात् ही नहीं समझना चाहिए। मृत्यु से तात्पर्य अहंकार के नाश से है जिसका उपाय है ध्यानाभ्यास। 

इस श्लोक का प्रयोजन यह दर्शाना है कि परिच्छिन्न अहंकार के लुप्त होने पर कोई भी साधक मुक्त पुरुष के रूप में इसी जीवन में सदा स्वस्वरूप में स्थित रहकर जी सकता है

जो कोई विवेक-सम्पन्न बुद्धि व्यक्ति जगत् में अस्थायी यात्री - या पर्यटक के रूप में अपना जीवन व्यतीत करता है , और इस शहर के मकान का /या धरती का स्थायी निवासी नहीं बनकर बनकर उपर्युक्त जीवन पद्धति के अनुसार जीता है और नित्यनिरन्तर आत्मचिन्तन का अभ्यास करता है वह निश्चय ही ध्यान में एकाग्र हो जाता है

 वास्तव में यह वेदोपदिष्ट प्रार्थना और उपासना का तथा पुराणों में वर्णित भक्ति और प्रपत्ति (शरणागति) की साधनाओं का ही स्पष्टीकरण है।  जबकि पूर्व श्लोक में जो उपदेश है - मामनुस्मर युध्य च वह धर्म के व्यावहारिक स्वरूप का है अर्थात् अपने कार्यक्षेत्र में ही संन्यास के स्वरूप का है।

इस अभ्यासयोग के फलस्वरूप भक्त को चित्त की एकाग्रता प्राप्त होती है जो बुद्धि को सुगठित करने में उपयोगी होती है। ऐसे अन्तःकरण के आत्म साक्षात्कार के योग्य हो जाने पर आत्मा की अनुभूति सहज सिद्ध हो जाती है।

हे पार्थ ! निरन्तर चिन्तन से  साधक परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है। यह नियम न केवल परम पुरुष की प्राप्ति के विषय में सत्य प्रमाणित है वरन् किसी भी वस्तु के लिए यह समान रूप से लागू होता है। 

इससे इस श्लोक का गूढ़ार्थ स्पष्ट हो जाता है। यदि साधक सर्वसाधन सम्पन्न- विवेकचतुष्टय सम्पन्न  हो तो आत्मा का अनुभव तथा उसमें दृढ़ निष्ठा इसी वर्तमान जीवन में ही प्राप्त की जा सकती है। यहाँ प्रयुक्त अनुचिन्तयन् शब्द का यही अभिप्राय है। 

ध्येयविषयक सजातीय वृत्ति प्रवाह को चिन्तन या ध्यान कहते हैं। अनु उपसर्ग का अर्थ है निरन्तर। अत यहाँ दिव्य पुरुष आत्मा या (अपने इष्टदेव) का निरन्तर चिंतन करने का उपदेश दिया गया है।

वह ध्येय पुरुष - आत्मा (इष्टदेव या ब्रह्म)  किन गुणों से विशिष्ट है भगवान् कहते हैं --

कविं पुराणमनुशासितार

मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।

सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप

मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।।8.9।।

।।8.9।। जो पुरुष सर्वज्ञ, प्राचीन (पुराण), सबके नियन्ता, सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर, सब के धाता, अचिन्त्यरूप, सूर्य के समान प्रकाश रूप और (अविद्या) अन्धकार से परे तत्त्व का अनुस्मरण करता है।।

मन को आत्मा के चिन्तन में एकाग्र करने के फलस्वरूप साधक भक्त के मन में अध्यात्म संस्कार दृढ़ हो जाते हैं। स्वाभाविक है कि ऐसे साधक को अन्तकाल में भी आत्मस्वरूप का स्मरण होगा।

 पूर्व के श्लोकों में यह भी संकेत किया गया था कि वर्तमान जीवन में ही अहंकार का नाश और जीवन्मुक्ति संभव है। 

      इस अविद्याजनित विपरीत धारणाओं (अविद्या -अस्मिता आदि) तथा तज्जनित गर्व मद आदि विकारों का समूल नाश तभी संभव हो सकता है। जब साधक ध्यानाभ्यास के द्वारा देहादि जड़ उपाधियों के साथ अपने मिथ्या तादात्म्य का सर्वथा परित्याग कर दे

पूर्व के श्लोक में अस्पष्ट रूप से केवल इतना संकेत किया गया था कि आत्मा का ध्यान परम दिव्य पुरुष (इष्टदेव) के रूप में करना चाहिए। 

विचाराधीन दो श्लोकों में इस साधना का विस्तृत विवेचन किया गया है। कोई भी साधक इसका सफलतापूर्वक उपयोग कर सकता है। इस श्लोक में दिये गये अनेक विशेषण उस सत्य को लक्षित करते हैं (परिभाषित नहीं) जो ऐसा सार तत्त्व है जिसके कारण जड़ और मिथ्या पदार्थ भी चेतन और सत्य प्रतीत होते हैं।

आत्मा को 'कवि ' या सर्वज्ञ क्यों कहते हैं ? देहविशेष में उपहित चैतन्य आत्मा मन में उठने वाली समस्त वृत्तियों को प्रकाशित करती है। आत्मा एक अनन्त और सर्वव्यापी होने के कारण वही सारे शरीरों तथा वृत्तियों को प्रकाशित करती है। जैसे पृथ्वी पर स्थित सभी वस्तुओं का प्रकाशक होने से सूर्य को सर्वसाक्षी कहा जाता है , वैसे ही इस आत्मा को कवि अर्थात् सर्वज्ञ कहा जाता है। क्योंकि इसके बिना कोई भी ज्ञान संभव नहीं है। आत्मा का कवि यह विशेषण जगत् के परिच्छिन्न औपाधिक ज्ञान की दृष्टि से है।

पुराण सृष्टि के आदि मध्य और अन्त में समान रूप से विद्यमान होने के कारण आत्मा को पुराण कहा गया है। यह शब्द दर्शाता है कि यही एक अविकारी सर्वव्यापी आत्मा काल की कल्पना का भी अधिष्ठान है

अनुशासितारम् (सब का शासक) इस विशेषण के द्वारा हम यह न समझें कि आत्मा कोई सुल्तान है जो क्रूरता से इस संसार पर शासन कर रहा है।

यहाँ शासक से अभिप्राय इतना ही है कि चैतन्य तत्त्व की उपस्थिति के बिना विषयों भावनाओं एवं विचारों को ग्रहण करने की हमारी शरीर मन और बुद्धि की उपाधियाँ कार्य नहीं कर सकतीं और उस स्थिति में जीवन में आने वाले नानाविध अनुभवों को एक सूत्र में गूंथा भी नहीं जा सकता।

हमारा जीवन जो कि अनुभवों की अखण्ड धारा है आत्मा के बिना संभव नहीं हो सकता मिट्टी के बिना घट स्वर्ण के बिना आभूषण और समुद्र के बिना तरंगे नहीं हो सकती और इसीलिए मिट्टी स्वर्ण और समुद्र अपनेअपने कार्यों (विकारों) के अनुशासिता कहे जा सकते हैं। इसी अर्थ में यहाँ आत्मा को अनुशासिता समझना चाहिए। 

ईश्वर (आत्मा , भगवान) की इस रूप में कल्पना करना कि वह कोई शक्तिशाली पुलिस है जो अपने हाथ में स्वर्ग और नरक के द्वार खोलने के लिए सोने की और लोहे की बनी दो कुन्जियां लिए खड़ा है। तो यह ईश्वर की एक असभ्य कल्पना है। 

 जिसमें बुद्धिमान जागरूक व्यक्तियों को आकर्षित करने के लिए कोई पवित्रता नहीं है अणु से भी सूक्ष्मतर किसी तत्त्व का परिमाण में वह अत्यन्त सूक्ष्म अविभाज्य कण जिसमें उस तत्त्व की विशेषताएं विद्यमान होती हैं अणु कहलाता है।

 आत्मा अणु से भी सूक्ष्मतर है। जितनी ही सूक्ष्मतर वस्तु होगी उसकी व्यापकता उतनी ही अधिक होगी। जल बर्फ से सूक्ष्मतर है और वाष्प जल से अधिक सूक्ष्म है। वस्तुओं की व्यापकता सूक्ष्मता का तुलनात्मक अध्ययन करने का मापदण्ड है। ब्रह्म विद्या में आत्मा को सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर अर्थात् सूक्ष्मतम कहा है जिसका अभिप्राय है आत्मासर्वव्यापक है परन्तु उसे कोई व्याप्त नहीं कर सकता

सर्वस्य धातारम् आत्मा सबका धारण पोषण करने वाला है। इसका अर्थ है कि वह सबका आधार है। सिनेमा में जो स्थिर अपरिवर्तशील पर्दा होता है वह चलचित्र का धाता कहा जा सकता है।  क्योंकि उसके बिना निरन्तर परिवर्तित हो रही चित्रों की धारा हमें एक सम्पूर्ण कहानी का बोध नहीं करा सकती।  इसी प्रकार यदि चैतन्य तत्त्व हमारे आन्तरिक और बाह्य जगत् को निरन्तर प्रकाशित न करता होता तो हमें एक अखण्ड जीवन का अनुभव ही नहीं हो सकता था।

अचिन्त्यरूपम् कवि पुराण आदि विशेषणों से विशिष्ट किसी तत्त्व पर हमें ध्यान करने को कहा जाय तो संभव है कि हम तत्काल यह धारणा बना लें कि किसी अन्य परिच्छिन्न वस्तु या विचार के समान आत्मा का भी ध्यान हृदय या बुद्धि के द्वारा किया जा सकता है। इस प्रकार की त्रुटिपूर्ण धारणा को दूर करने तथा इस पर बल देने के लिए कि अनन्त आत्मा को इन्द्रियों मन और बुद्धि के द्वारा नहीं जाना जा सकता। भगवान कहते हैं कि आत्मा अचिन्त्य रूप है उसका चिन्तन नहीं किया जा सकता। 

यद्यपि यह सत्य है कि आत्मा का स्वयं से भिन्न किसी विषय रूप में चिन्तन अथवा ज्ञान संभव नहीं है परन्तु उपाधियों के परे जाने से अर्थात् उनसे तादात्म्य न होने पर आत्मा का स्वयं के स्वरूप में साक्षात् अनुभव होता है न कि स्वयं से भिन्न किसी विषय के रूप में।

आदित्यवर्णम् यदि अचिन्त्यरूप का तात्पर्य सही हो तो कोई भी बुद्धिमान् साधक यह प्रश्न पूछने का लोभ संवरण नहीं कर सकता कि फिर आत्मा का अनुभव किस प्रकार हो सकता है ? साधक के रूप में साधना की प्रारम्भिक अवस्था में हमारा तादात्म्य शरीरादि उपाधियों के साथ दृढ़ होता है। उसी प्रकार ज्ञान प्राप्त करने के साधन भी इन्द्रियाँ मन और बुद्धि ही होते हैं जिसके द्वारा हम आत्मतत्त्व को भी समझने का प्रयत्न करते हैं क्योंकि इन्हीं के द्वारा ही हम अपने अन्य अनुभवों को भी प्राप्त करते हैं। अत स्वाभाविक है कि गुरु के इस उपदेश से कि अचिन्त्य का चिन्तन करो अप्रमेय को जानो शिष्य भ्रमित हो जाता है।  आत्मा को अचिन्त्य अथवा अप्रमेय केवल यह दर्शाने के लिए कहा जाता है कि हमारे पास उपलब्ध प्रमाणों के द्वारा किसी विषय के रूप में आत्मा का ज्ञान नहीं हो सकता। 

स्वप्नद्रष्टा ने जिस स्वाप्निक अस्त्र से स्वप्न में अपने शत्रु की हत्या की थी वह अस्त्र उसे जाग्रत अवस्था में आने पर उपलब्ध नहीं होता। यहाँ तक कि उसके रक्त रंजित हाथ भी स्वत ही बिना पानी या साबुन के स्वच्छ हो जाते हैं जब तक मनुष्य अनात्म उपाधियों को अपना श्वरूप समझकर स्वकल्पित रागद्वेष युक्त बाह्य जगत् में रहता है तब तक उसके लिए यह आत्मतत्त्व अचिन्त्य और अज्ञेय रहता है। परन्तु जिस क्षण आत्मज्ञान के फलस्वरूप वह उपाधियों से परे चला जाता है उस क्षण वह अपने शुद्ध पारमार्थिक स्वरूप के प्रति जागरूक हो जाता है

वेदान्त के इस मूलभूत सिद्धांत को ग्रहण कर लेने पर यहाँ दिये गये सूर्य के अनुपम दृष्टान्त की सुन्दरता समझना सरल हो जाता है। सूर्य को देखने के लिए किसी अन्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि सूर्य स्वयं ही प्रकाशस्वरूप है प्रकाश का स्रोत है। वह सब वस्तुओं का प्रकाशक होने से उसका प्रकाश स्वयंसिद्ध है। 

भौतिक जगत् में जैसे यह सत्य है वैसे ही आध्यात्मिक क्षेत्र में स्वयं चैतन्य स्वरूप आत्मा को जानने के लिए किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। स्वप्न पुरुष कभी जाग्रत पुरुष को नहीं जान सकता क्योंकि जाग्रत अवस्था में आने पर स्वप्नद्रष्टा लुप्त होकर स्वयं जाग्रत् पुरुष बन जाता है।

 स्वप्न से जागने का अर्थ है जाग्रत् पुरुष को जानना और जानने का अर्थ है स्वयं वह बन जाना। ठीक इसी प्रकार आत्मसाक्षात्कार के क्षण जीव नष्ट हो जाता है। वह यह पहचानता है कि वास्तव में सदा सब काल में वह चैतन्यस्वरूप आत्मा ही था जीव नहीं

 आदित्यवर्ण इस शब्द में इतना अधिक अर्थ निगूढ़ है।तमसः परस्तात् (अन्धकार से परे) कोई भी दृष्टान्त पूर्ण नहीं हो सकता। सूर्य के दृष्टान्त से साधक के मन में कुछ विपरीत धारणा बनने की संभावना हो सकती है। पृथ्वी के निवासियों का अनुभव है कि उनके लिए रात्रि में सूर्य का अभाव हो जाता है और दिन में भी सूर्य के प्रकाश और उष्णता की तीव्रता एक समान नहीं होती। उसमें परिवर्तन प्रतीत होता है। 

कोई मन्दबुद्धि का साधक कहीं यह न समझ ले कि आत्मा की चेतनता का भी कभी अभाव हो जाता हो तथा उस चेतनता में किसी प्रकार का तारतम्य हो सूर्य के दृष्टान्त में संभावित इन दो दोषों की निवृत्ति के लिए भगवान् श्रीकृष्ण आत्मा को अन्धकार से परे अर्थात् अविद्या से परे बताते हैंअज्ञानरूप अन्धकार का ही निषेध कर देने पर सूर्य की परिच्छिन्नता आत्मा को प्राप्त नहीं होती। वह सदा ही चैतन्य रूप से ज्ञान और अज्ञान दोनों ही वृत्तियों को समान रूप से प्रकाशित करता है अत वह अविद्या के परे है। यही अविद्या माया भी कहलाती है।

जो साधक पुरुष इस कवि पुराण अनुशासिता सूक्ष्मतम सर्वाधार अचिन्त्यरूप स्वयं प्रकाशस्वरूप अविद्या के परे आत्मतत्त्व का ध्यान करता है वह उस परम पुरुष को प्राप्त होता है।

प्रयाणकाले मनसाऽचलेन

भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।

भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्

स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्।।8.10।।

।।8.10।। वह (साधक) अन्तकाल में योगबल से प्राण को भ्रकुटि के मध्य सम्यक् प्रकार स्थापन करके निश्चल मन से भक्ति युक्त होकर उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।।

इस श्लोक का केवल वाच्यार्थ लेकर प्रायः इसे विपरीत रूप से समझा जाता हैं जो कि वास्तव में इसका तात्पर्य नहीं है। प्रस्तुत प्रकरण का विषय है एकाग्र चित्त से परम पुरुष का ध्यान। अतः प्रयाणकाल से अभिप्राय अहंकार की मृत्यु के क्षण से समझना चाहिए। 

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति

विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः।

यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति

तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये।।8.11।।

।।8.11।। वेद के जानने वाले विद्वान जिसे अक्षर कहते हैं; रागरहित यत्नशील पुरुष जिसमें प्रवेश करते हैं; जिसकी इच्छा से (साधक गण) ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं - उस पद (लक्ष्य) को मैं तुम्हें संक्षेप में कहूँगा।।

।।8.11।।

फिर भी भगवान् आगे बतलाये जानेवाले उपायोंसे प्राप्त होनेयोग्य और वेदविदो वदन्ति इत्यादि विशेषणों द्वारा वर्णन किये जाने योग्य ब्रह्म का प्रतिपादन करते हैं , हे गार्गि ब्राह्मणलोग उसी इस अक्षरका वर्णन किया करते हैं इस श्रुतिके अनुसार वेदके परम अर्थको, जाननेवाले विद्वान् जिस अक्षरका अर्थात् जिसका कभी नाश न हो ऐसे परमात्माका वह न स्थूल है न सूक्ष्म है इस प्रकार सब विशेषोंका निराकरण करके वर्णन किया करते हैं तथा जिनकी आसक्ति  नष्ट हो चुकी है ऐसे वीतराग यत्नशील संन्यासी यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति हो जाने पर जिसमें प्रविष्ट होते हैं।

 एवं जिस अक्षर को जानना चाहने वाले ( साधक ) गुरुकुल में ब्रह्मचर्यव्रत का पालन किया करते हैं वह अक्षरनामक पद अर्थात् प्राप्त करने योग्य स्थान मैं तुझे संग्रह से -- संक्षेप से बतलाता हूँ। संग्रह संक्षेपको कहते हैं। 

सत्यकाम के यह पूछनेपर कि हे भगवन्,  मनुष्यों में से वह जो कि मरणपर्यन्त ओंकार का भली प्रकार ध्यान करता रहता है वह उस साधन से किस लोक को जीत लेता है ? पिप्पलाद ऋषिने कहा कि हे सत्यकाम यह ओंकार ही निःसन्देह परब्रह्म है और यही अपर ब्रह्म भी है। 

इस प्रकार प्रसङ्ग आरम्भ करके फिर जो कोई इस तीन मात्रावाले ओम् इस अक्षरद्वारा परम पुरुषकी उपासना करता रहता है। इत्यादि वचनोंसे ( प्रश्नोपनिषद्में ) तथा जो धर्मसे विलक्षण है और अधर्मसे भी विलक्षण है इस प्रकार प्रसङ्ग आरम्भ करके फिर समस्त वेद जिस परमपदका वर्णन कर रहे हैं समस्त तप जिसको बतला रहे हैं तथा जिस परमपदको चाहनेवाले ब्रह्मचर्यका पालन किया करते हैं वह परमपद संक्षेपसे तुझे बतलाऊँगा वह है ओम् ऐसा यह ( एक अक्षर )। इत्यादि वचनोंसे ( कठोपनिषद्में )। 

परब्रह्मका वाचक होनेसे एवं प्रतिमा की भाँति उसका प्रतीक ( चिह्न ) होने से मन्द और मध्यम बुद्धि वाले साधकों के लिये जो परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति का साधनरूप माना गया है उस ओंकार की कालान्तर में मुक्तिरूप फल देनेवाली जो उपासना बतलायी गयी है।

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।

मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्।।8.12।।

।।8.12।। सब (इन्द्रियों के) द्वारों को संयमित कर मन को हृदय में स्थिर करके और प्राण को मस्तक में स्थापित करके योगधारणा में स्थित हुआ।। 

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।

मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्।।8.12।।

।।8.12।। सब (इन्द्रियों के) द्वारों को संयमित कर मन को हृदय में स्थिर करके और प्राण को मस्तक में स्थापित करके योगधारणा में स्थित हुआ।।

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।

यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।।8.13।।

।।8.13।। जो पुरुष ओऽम् इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।।

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।

तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।।8.14।।

।।8.14।। हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ।।

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।

नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः।।8.15।।

।।8.15।। परम सिद्धि को प्राप्त हुये महात्माजन मुझे प्राप्त कर अनित्य दुःख के आलयरूप (गृहरूप) पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होते हैं।।

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।

मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।।8.16।।

।।8.16।। हे अर्जुन ! ब्रह्म लोक तक के सब लोग पुनरावर्ती स्वभाव वाले हैं। परन्तु, हे कौन्तेय ! मुझे प्राप्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता।।

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः।

रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः।।8.17।।

।।8.17।। जो लोग ब्रह्मा जी के एक दिन की अवधि जानते हैं जो कि सहस्र वर्ष की है तथा एक सहस्र वर्ष की अवधि की एक रात्रि को जानते हैं वे दिन और रात्रि को जानने वाले पुरुष हैं।।

अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे।

रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके।।8.18।।

।।8.18।। (ब्रह्माजी के) दिन का उदय होने पर अव्यक्त से (यह) व्यक्त (चराचर जगत्) उत्पन्न होता है; और (ब्रह्माजी की) रात्रि के आगमन पर उसी अव्यक्त में लीन हो जाता है।।

भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।

रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे।।8.19।।

।।8.19।। हे पार्थ ! वही यह भूतसमुदाय, है जो पुनः पुनः उत्पन्न होकर लीन होता है। अवश हुआ (यह भूतग्राम) रात्रि के आगमन पर लीन तथा दिन के उदय होने पर व्यक्त होता है।।

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः।

यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति।।8.20।।

।।8.20।। परन्तु उस अव्यक्त से परे अन्य जो सनातन अव्यक्त भाव है, वह समस्त भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।।

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्।

यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।8.21।।

 ।।8.21।। जो अव्यक्त अक्षर कहा गया है, वही परम गति (लक्ष्य) है। जिसे प्राप्त होकर (साधकगण) पुनः (संसार को) नहीं लौटते, वह मेरा परम धाम है।।

।।8.21।। श्री शंकराचार्य > -- श्रेष्ठ गति कहते हैं। जिस परम भाव को प्राप्त होकर ( मनुष्य ) फिर संसारमें नहीं लौटते वह मेरा परम श्रेष्ठ स्थान है अर्थात् मुझ विष्णु का परमपद है। (भगवान गदाधर विष्णु का परमपद !)

पूर्व श्लोक में जिसे सनातन अव्यय भाव कहा गया है जो अविनाशी रहता हैं उसे ही यहाँ अक्षर शब्द से इंगित किया गया है। अध्याय के प्रारम्भ में कहा गया था कि अक्षर तत्त्व ब्रह्म है जो समस्त विश्व का अधिष्ठान है। ॐ या प्रणव उस ब्रह्म का वाचक या सूचक है जिस पर हमें ध्यान करने का उपदेश दिया गया था। यह अविनाशी चैतन्य स्वरूप आत्मा ही अव्यक्त प्रकृति को सत्ता एवं चेतनता प्रदान करता है जिसके कारण प्रकृति इस वैचित्र्यपूर्ण सृष्टि को व्यक्त करने में समर्थ होती है

 यह सनातन अव्यक्त अक्षर आत्मतत्त्व ही मनुष्य के लिए प्राप्त करने योग्य पररम लक्ष्य है।संसार में जो कोई भी स्थिति या लक्ष्य हम प्राप्त करते हैं उससे बारम्बार लौटना पड़ता है। संसार शब्द का अर्थ ही है वह जो निरन्तर बदलता रहता है। 

निद्रा कोई जीवन का अन्त नहीं वरन् दो कर्मप्रधान जाग्रत अवस्थाओं के मध्य का विश्राम काल है उसी प्रकार मृत्यु भी जीवन की समाप्ति नहीं है। प्रायः वह जीव के दो विभिन्न शरीर धारण करने के मध्य का अव्यक्त अवस्था में विश्राम का क्षण होता है

 यह पहले ही बताया जा चुका है कि ब्रह्मलोक तक के सभी लोक पुनरावर्ती हैं जहाँ से जीवों को पुनः अपनी वासनाओं के क्षय के लिए शरीर धारण करने पड़ते हैं। पुनर्जन्म दुःखालय कहा गया है इसलिए परम आनन्द का लक्ष्य वही होगा जहाँ से संसार का पुनरावर्तन नहीं होता। 

श्रीकृष्ण के निवास स्थान के रूप में वर्णित किया है तद्धाम परमं मम। अनेक स्थलों पर यह स्पष्ट किया गया है कि गीता में भगवान् श्रीकृष्ण मैं शब्द का प्रयोग आत्मस्वरूप की दृष्टि से करते हैं। अतः यहाँ भी धाम शब्द से किसी स्थान विशेष से तात्पर्य नहीं वरन् उनके स्वरूप से ही है। यह आत्मानुभूति ही साधक का लक्ष्य है जो उसके लिए सदैव उपलब्ध भी है।

    ध्यान द्वारा परम दिव्य पुरुष की प्राप्ति के प्रकरण में इसका विस्तृत वर्णन किया जा चुका है।अब उस परम धाम की उपलब्धि का साक्षात् उपाय बताते हैं --

पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।

यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्।।8.22।।

।।8.22।। हे पार्थ ! जिस (परमात्मा) के अन्तर्गत समस्त भूत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण (जगत्) व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त करने योग्य है।।

पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।

यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्।।8.22।।

।।8.22।। हे पार्थ ! जिस (परमात्मा) के अन्तर्गत समस्त भूत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण (जगत्) व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त करने योग्य है।।

।।8.22।।उस परमधाम की प्राप्ति का उपाय बतलाया जाता है --, शरीररूप पुरमें शयन करनेसे या सर्वत्र परिपूर्ण होनेसे परमात्माका नाम पुरुष है। हे पार्थ वह निरतिशय परमपुरुष जिससे पर ( सूक्ष्मश्रेष्ठ ) अन्य कुछ भी नहीं है जिस पुरुष के अन्तर्गत समस्त कार्यरूप भूत स्थित हैं -- क्योंकि कार्य कारण के अन्तर्वर्ती हुआ करता है -- और जिस पुरुष से यह सारा संसार आकाश से घट आदि की भाँति व्याप्त है। ऐसा परमात्मा अनन्य भक्ति  से अर्थात् आत्मविषयक ज्ञानरूप भक्ति  से प्राप्त होने योग्य है।

हिन्दुओं के उपदेष्टा भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ उस साधन मार्ग को बताते हैं जिसके द्वारा उस परम पुरुष को प्राप्त किया जा सकता है , जिसे अव्यक्त अक्षर कहा गया था। वह साधन मार्ग है अनन्य भक्ति। 

परम पुरुष से भक्ति (निष्काम परम प्रेम) तभी वास्तविक और पूर्ण हो सकती है जब साधक भक्त स्वयं को शरीर मन और बुद्धि द्वारा अनुभूयमान जगत् से विरत और वियुक्त करना सीख लेता है।

'नित्य परम सत्य' आत्मा (इष्टदेव) से प्रेम ही वह साधन है जिसके द्वारा मिथ्या वस्तु से वैराग्य होता है।

 सत्यार्थी की प्रखर जिज्ञासा से अनुप्राणित हुई- 'सत्य की खोज' , जब आत्मतत्त्व (इष्टदेव बताने वाले गुरु) की खोज बनजाति है, और फिर उसके साथ एकत्त्व की यह अनुभूति कि यह आत्मा मैं हूँ ! अनन्य भक्ति है जिसके विषय में यहाँ बताया गया है

समाधि में ध्यानावस्थित मन के द्वारा जिस आत्मा की अनुभूति स्वस्वरूप के रूप में होती है उसे कोई परिच्छिन्न चेतन तत्त्व नहीं समझना चाहिए,  जो केवल एक व्यष्टि उपाधि में ही स्थित होकर उसे चेतनता प्रदान कर रहा हो। यद्यपि आत्मा की खोज और अनुभव साधक अपने हृदय में करता है तथापि उसका ज्ञान यह होता है कि यह चैतन्य आत्मा सम्पूर्ण विश्व का अधिष्ठान है।

इस हृदयस्थ आत्मा का जगदधिष्ठान सत्य ब्रह्म के साथ एकता का निर्देश भगवान् श्रीकृष्ण इस वाक्य में देते हैं कि जिसमें भूतमात्र स्थित है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है वह पुरुष है। 

मिट्टी के बने सभी आकार चाहे घड़ा हो या कुल्हड़ मिट्टी में ही स्थित होते हैं। और उनके नाम- रूप रंग और आकार विविध होते हुए भी एक ही मिट्टी उन सबमें व्याप्त होती है। 

सभी लहरें, तरंगें, फेन आदि समुद्र में ही स्थित होते हैं, और समुद्र ही (पानी) उन्हें व्याप्त किये रहता है। घटों के अन्तर्बाह्य उनका उपादान कारण (मूल स्वरूप) मिट्टी और लहरों में समुद्र (पानी) होता है।

शुद्ध चैतन्य स्वरूप (आत्मा) ही वह सनातन सत्य है जिसमें अव्यक्त सृष्टि व्यक्त होती है। किसी वस्त्र पर धागे से बनाये गये चित्र का अधिष्ठान कपास है, जिसके बिना वह चित्र नहीं बन सकता था।

शुद्ध चैतन्य तत्त्व वासनाओं के विविध सांचों में ढलकर अविद्या से स्थूल रूप को प्राप्त होकर असंख्य नामरूपमय जगत् के रूप में प्रतीत होता है। तत्पश्चात् सर्वत्र सब लोग विषयों को देखकर आकर्षित होते हैं उनकी कामना करते हैं उन्हें प्राप्त करने के लिए संघर्ष करते हैं। 

जो पुरुष (शुद्धबुद्धि-विवेकीबुद्धि ) आत्मस्वरूप का साक्षात् अनुभव कर लेता है वह यह समझ लेता है कि इस नानाविध सृष्टि का एक ही अधिष्ठान है जिसके अज्ञान से ही इस जीव (M/F) -जगत् का प्रत्यक्ष हो रहा है।  जीव अज्ञान के वश इसे (परिवर्तनशील को) ही सत्य समझ कर संसार के मिथ्या दुःखों से पीड़ित रहता है। 

 व्यक्त से अव्यक्त को लौटने के दो विभिन्न मार्ग हैं - एक  जहाँ से संसार का पुनरावर्तन होता है तथा अन्य लक्ष्य वह है जिसे प्राप्त कर पुनः संसार को नहीं लौटना पड़ता। इस तथ्य को बताने के पश्चात् , कोई साधक उस लक्ष्य को प्राप्त कैसे होते हैं वे दो मार्ग कौन से हैंअब भगवान् अगले प्रकरण में साधकों द्वारा प्राप्त किये जा सकने वाले दो विभिन्न लक्ष्यों के भिन्नभिन्न मार्गों का वर्णन करते हैं। भगवान् कहते हैं --

यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः।

प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ।।8.23।।

।।8.23।। हे भरतश्रेष्ठ ! जिस काल में (मार्ग में) शरीर त्याग कर गये हुए योगीजन अपुनरावृत्ति को, और (या) पुनरावृत्ति को प्राप्त होते हैं, वह काल (मार्ग) मैं तुम्हें बताऊँगा।।

।।8.23।। अभ्युदय और निःश्रेयस ये वे दो लक्ष्य हैं जिन्हें प्राप्त करने के लिए मनुष्य अपने जीवन में प्रयत्न करते हैं। अभ्युदय का अर्थ है लौकिक सम्पदा और भौतिक उन्नति के माध्यम से अधिकाधिक विषयों के उपभोग के द्वारा सुख प्राप्त करनायह वास्तव में सुख का आभास मात्र है क्योंकि प्रत्येक उपभोग के गर्भ में दुःख छिपा रहता है

निःश्रेयस का अर्थ है अनात्मबंध से मोक्ष। इसमें मनुष्य आत्मस्वरूप का ज्ञान प्राप्त करता है जो सम्पूर्ण जगत् का अधिष्ठान है। इस स्वरूपानुभूति में संसारी जीव की समाप्ति और परमानन्द की प्राप्ति होती है।  

ये दोनों लक्ष्य परस्पर विपरीत धर्मों वाले हैं। भोग अनित्य है और मोक्ष नित्य एक में संसार का पुनरावर्तन है तो अन्य में अपुनरावृत्ति

 अभ्युदय में जीवभाव बना रहता है जबकि ज्ञान में आत्मभाव दृढ़ बनता है। आत्मानुभवी पुरुष अपने आनन्दस्वरूप का अखण्ड अनुभव करता है। 

यदि लक्ष्य परस्पर भिन्नभिन्न हैं तो उन दोनों की प्राप्ति के मार्ग भी भिन्न-भिन्न होने चाहिए। भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ भरतश्रेष्ठ अर्जुन को वचन देते हैं कि वे उन दो आवृत्ति और अनावृत्ति मार्गों का वर्णन करेंगे।

यहाँ काल शब्द का द्वयर्थक प्रयोग किया गया है। काल का अर्थ है प्रयाण काल और उसी प्रकार प्रस्तुत सन्दर्भ में उसका दूसरा अर्थ है वह मार्ग जिससे साधकगण देहत्याग के उपरान्त अपने लक्ष्य तक पहुँचते हैं।

प्रथम अपुनरावृत्ति का मार्ग बताते हैं --

अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।

तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः।।8.24।।

।।8.24।। जो ब्रह्मविद् साधकजन मरणोपरान्त अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण के छः मास वाले मार्ग से जाते हैं, वे ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।।

उपनिषदों के अनुसार ये साधक जन देह त्याग के पश्चात् देवयान (देवताओं के मार्ग) के द्वारा ब्रह्मलोक अर्थात् सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी के लोक में प्रवेश करते हैं। वहाँ कल्प की समाप्ति तक दिव्य अलौकिक विषयों के आनन्द का अनुभव करके प्रलय के समय ब्रह्माजी के साथ वे सर्वथा मुक्त हो जाते हैं।

 उपनिषदों में प्रयुक्त शब्दों का उपयोग कर भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ देवयान को इंगित करते हैं। ऋषि प्रतिपादित तत्त्व ज्ञान के जिज्ञासुओं के लिये अध्यात्म दृष्टि से यह श्लोक विशेष अर्थपूर्ण है।अग्नि ज्योति दिन शुक्लपक्ष उत्तरायण के षण्मास ये सब सूर्य के द्वारा अधिष्ठित देवयान को सूचित करते हैं। 

प्रश्नोपनिषद् में परम सत्य की सृष्टि से उत्पत्ति का वर्णन करते हुए इन मार्गों को स्पष्ट रूप से बताया गया है। वहाँ गुरु बताते हैं कि सृष्टिकर्ता प्रजापति स्वयं सूर्य और चन्द्र बन गये। 

आकाश में दृश्यमान सूर्य और चन्द्र क्रमशः चेतन और जड़ तत्त्व के प्रतीक स्वरूप हैं। चेतन तत्त्व के साथ तादात्म्य स्थापित करके जो सत्य का उपासक अपना जीवन जीता है वह मरण के समय भी जीवन पर्यन्त की गई उपासना के उपास्य (ध्येय) का ही चिन्तन और स्मरण करता है। 

 स्वाभाविक है कि ऐसा उपासक अपने उपास्य के लोक को प्राप्त होगा क्योंकि वृत्ति/बुद्धि /मति  के अनुरूप व्यक्ति बनता है। सम्पूर्ण जीवन काल में रचनात्मक दैवी एवं विकासशील विचारों का ही चिन्तन करते रहने पर मनुष्य निश्चित ही वर्तमान शरीर का त्याग करने पर विकास के मार्ग पर ही अग्रसर होगा। 

इस मार्ग को अग्नि ज्योति दिन आदि शब्दों से लक्षित किया गया है। इस प्रकार उपनिषदों की अपनी विशिष्ट भाषा में ब्रह्म के उपासकों की मुक्ति का मार्ग उत्तरायण कहलाता है। क्रममुक्ति को बताने के लिए ऋषियों द्वारा प्रायः प्रयोग किये जाने वाले इस शब्द उत्तरायण में उपर्युक्त सभी अभिप्राय समाविष्ट हैं।

 इस मार्ग के विपरीत वह मार्ग जिसे प्राप्त करने पर पुनः संसार को लौटना पड़ता है उसका वर्णन करते हुए भगवान् कहते हैं --

धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्।

तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते।।8.25।।

।।8.25।। धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन के छः मास वाले मार्ग से चन्द्रमा की ज्योति को प्राप्त कर, योगी (संसार को) लौटता है।।

।।8.25।। पुनरावृत्ति के मार्ग को पितृयाण (पितरों का मार्ग) कहते हैं। इसका अधिष्ठाता देवता है चन्द्रमा जो जड़ पदार्थ जगत् का प्रतीक है। जो लोग उपासनारहित पुण्य कर्मों को जिनमें समाज सेवा तथा यज्ञयागादि कर्म सम्मिलित हैं करते हैं वे मरणोपरान्त पितृलोक को प्राप्त होते हैं जिसे प्रचलित भाषा में स्वर्ग कहते हैं। 

पुण्यकर्मों के फलस्वरूप प्राप्त इस स्वर्गलोक में विषयोपभोग करने पर जब पुण्यकर्म क्षीण हो जाते हैं तब इन स्वर्ग के निवासियों को अपनी अवशिष्ट वासनाओं के अनुसार उचित शरीर को धारण करने के लिए पुनः संसार में आना पड़ता है। उस देह में ही उनकी वासनाएं व्यक्त एवं तृप्त हो सकती हैं।

धूम रात्रि कृष्णपक्ष और दक्षिणायन ये सब पितृलोक प्राप्ति का मार्ग बताने वाले हैं।चन्द्रमा जड़ पदार्थ का प्रतीक और विषयोपभोग का अधिष्ठाता है। उसके अनुग्रह से कुछ काल तक स्वर्ग सुख भोगने के पश्चात् जीव को पुनः र्मत्यलोक में आना पड़ता है।

संक्षेप में इन दो श्लोकों में यह बताया गया है कि निःश्रेयस की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील साधक परम लक्ष्य को प्राप्त होता है ! और भोग की कामना करने वाला पुरुष भोग के पश्चात् पुनः शरीर को धारण करता है जहाँ वह चाहे तो अपना उत्थान अथवा पतन कर सकता है। (

विषय का उपसंहार करते हुए भगवान् कहते हैं --

शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते।

एकया यात्यनावृत्तिमन्ययाऽऽवर्तते पुनः।।8.26।।

।।8.26।। एकया-याति–अनावृत्तिम् अन्यथा आवर्तते- पुनः। जगत् के ये दो प्रकार के शुक्ल और कृष्ण मार्ग सनातन माने गये हैं । इनमें एक (शुक्ल) के द्वारा (साधक) अपुनरावृत्ति को तथा अन्य (कृष्ण) के द्वारा पुनरावृत्ति को प्राप्त होता है।।

।।8.26।। पूर्वोक्त देवयान और पितृयान को ही यहाँ क्रमशः शुक्लगति और कृष्णगति कहा गया है। लक्ष्य के स्वरूप के अनुसार यह उनका पुनर्नामकरण किया गया है। प्रथम मार्ग साधक को उत्थान के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचाता है तो अन्य मार्ग परिणामस्वरूप पतन की गर्त में ले जाता है। इन्हीं दो मार्गों को क्रमशः मोक्ष का मार्ग और संसार का मार्ग माना जा सकता है।

मानव की प्रत्येक पीढ़ी में जीवन जीने के दो मार्ग या प्रकार होते हैं भौतिक और आध्यात्मिक। भौतिकवादियों के अनुसार मानव की आवश्यकताएं केवल भोजन, वस्त्र और आवास है। (कच्चा-पक्का ?) उनके मतानुसार (उनकी बुद्धि,दृष्टि मति के अनुसार) जीवन का परम पुरुषार्थ वैषयिक सुखोपभोग के द्वारा शरीर और मन की उत्तेजनाओं को सन्तुष्ट करना ही हैकेवल इतने से ही उनको सन्तोष हो जाता है। इससे उच्चतर तथा दिव्य आदर्श के प्रति न कोई उनकी रुचि होती है और न प्रवृत्ति।  

परन्तु अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाले विवेकी-जन (स्वामी विवेकानन्द को अपना आदर्श मानने वाले युवा)अपने समक्ष आकर्षक विषयों को देखकर लुब्ध नहीं हो जाते। उनकी विवेक-सम्पन्न बुद्धि अग्निशिखा के समान सदा उर्ध्वगामी होती है, जो सतही जीवन में उच्च और श्रेष्ठ लक्ष्य की खोज में रमण करती है।

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये दोनों ही मार्ग सनातन हैं, अर्थात अनादिकाल से इन पर चलने वाले दो भिन्न प्रवृत्तियों के लोग रहे हैं व्यापक अर्थ की दृष्टि से यह जगत इन दोनों का सम्मिलित रूप है।

 परन्तु वेदान्त का सिद्धांत है कि सृष्टि के समस्त जीवों में केवल मनुष्य शरीर में ही नित्य-अनित्य विवेक को जाग्रत करने का सामर्थ्य होता है। इसलिए प्रत्येक विवेकी मनुष्य अपने यथार्थ स्वरुप को, चैतन्य स्वरूप (अविनाशी आत्मा) को पहचान कर - संसार दुःख से निवृत्त हो सकता हैयह ऋषियों का प्रत्यक्ष अनुभव है

एक साधक की दृष्टि से विचार करने पर इस श्लोक में [गीता 8.26 में] सफल योगी बनने के लिए दिये गये निर्देश का बोध हो सकता है।  साधना काल में कभी-कभी मन की बहिर्मुखी प्रवृत्ति के कारण 'साधक' (विवेकी साधक भी) विषयों की ओर आकर्षित होकर उनमें आसक्त हो जाता है।  ऐसे क्षणों में न हमें स्वयं को धिक्कारने की आवश्यकता है और न आश्चर्य मुग्ध होने की। 

भगवान् स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य के मन में उच्च जीवन की महत्वाकांक्षा और निम्न जीवन के प्रति आकर्षण इन दोनों विरोधी प्रवृत्तियों में अनादि काल से कशिश चल रही है। (मन ही रहने वाले देव और असुर में संग्राम)  धैर्य से काम लेने पर निम्न प्रवृत्तियों पर (3K में आसक्ति पर) हम विजय प्राप्त कर सकते हैं

इन दो मार्गों तथा उनके सनातन स्वरूप को जानने का निश्चित फल क्या है ?

नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन।

तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन।।8.27।।

।।8.27।। हे पार्थ इन दो मार्गों को (तत्त्व से) जानने वाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इसलिए, हे अर्जुन ! तुम सब काल में योगयुक्त बनो ।।

।।8.27।। शुक्लगति और कृष्णगति इन दोनों के ज्ञान का फल यह है कि इनका ज्ञाता योगी पुरुष कभी मोहित नहीं होता है। मन में उठने वाली निम्न स्तर की प्रवृत्तियों के संघर्ष के कारण धैर्य खोकर वह कभी निराश नहीं होता। 

भगवान् श्रीकृष्ण ने अब तक पुनरावृत्ति और अपुनरावृत्ति के मार्गों का वर्णन किया और अब इस श्लोक में वे ज्ञान और उसके फल को संग्रहीत करके -निष्कर्ष देते हुए कहते हैं-  कि इसलिए हे अर्जुन तुम सब काल में योगी बनो। जिसने अनात्मा से तादात्म्य हटाकर मन को आत्मस्वरूप में एकाग्र करना सीखा हो वह पुरुष योगी है। [जिस व्यक्ति ने M/F शरीर के देहाभिमान के कारण उत्पन्न अनात्मा से तादात्म्य या 3K में आसक्ति से मन को (मूढ़बुद्धि को)  खींचकर आत्मस्वरूप में (इष्टदेव में) धारण करना या एकाग्र करना सीख लिया वो (विवेकी बुद्धि) ही योगी है।]

संक्षेप में इस सम्पूर्ण अध्याय के माध्यम से भगवान् द्वारा अर्जुन को उपदेश दिया गया है कि उसको जगत् में कार्य करते हुए भी सदा अक्षर पुरुष के साथ अनन्य भाव से तादात्म्य स्थापित कर आत्मज्ञान में स्थिर होने का प्रयत्न करना चाहिए। (अर्थात Be and Make के प्रचार -प्रसार में लगे रहना चाहिए।)

अन्त में इस योग का महात्म्य बताते हुए भगवान् कहते हैं --

वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव

दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्।

अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा

योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्।।8.28।।

।।8.28।। योगी पुरुष यह सब (दोनों मार्गों के तत्त्व को) जानकर वेदाध्ययन, यज्ञ, तप और दान करने में जो पुण्य फल कहा गया है, उस सबका उल्लंघन कर जाता है और आद्य (सनातन), परम स्थान को प्राप्त होता है।

यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण इस पर बल देते हैं कि जिस पुरुष में कुछ मात्रा में भी (विवेक-वैराग्य है या) योग्यता  है उसको ध्यान का (मनःसंयोग का) अभ्यास अवश्य करना चाहिए।  क्योंकि शास्त्रों में वेदाध्ययन यज्ञ तप और दान को करने में जो पुण्य फल कहा गया है उस फल को योगी प्राप्त करता है।  इतना ही नहीं भगवान् विशेष रूप से बल देकर कहते हैं कि योगी उन फलों का उल्लंघन कर जाता है अर्थात् सर्वोच्च फल को प्राप्त होता है

  ध्यानाभ्यास द्वारा- व्यक्तित्व का संगठन उपर्युक्त यज्ञादि साधनों की अपेक्षा लक्षगुना अधिक सरलता एवं शीघ्रता से हो सकता है। [अर्थात श्री रामकृष्ण -विवेकानन्द शिक्षक-प्रशिक्षण परम्परा Be and Make ' में  मनःसंयोग के अभ्यास द्वारा 'जीवन-गठन और मनुष्य -निर्माण तथा चरित्रनिर्माण या व्यक्तित्व विकास (Personality Development) यज्ञादि साधनों की अपेक्षा लक्षगुना अधिक सरलता एवं शीघ्रता से हो सकता है।]   किन्तु यहाँ यह मानकर चलते हैं कि ध्यान के साधक में आवश्यक मात्रा में विवेक और वैराग्य दोनों ही हैंइसलिए सतत नियमपूर्वक ध्यान करने से इनका भी विकास हो सकता है। 

इस प्रकार जब कोई योगी ध्यान साधना (मनःसंयोग) से निष्काम कर्म 'Be and Make ' एवं उपासना का फल प्राप्त करता है। और ध्यान की निरन्तरता को निराशा के क्षणों में भी बनाये रखता है, तो वह सफलता के उच्चतर शिखर की ओर अग्रसर होता है। और अन्त में इस आद्य अक्षर पुरुष स्वरूप मेरे परम धाम को प्राप्त होकर पुनः संसार को नहीं लौटता

conclusion ॐ  तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो नाम अष्टमोऽध्याय।।

इस प्रकार श्रीकृष्णार्जुनसंवाद के रूप में ब्रह्मविद्या और योगशास्त्र स्वरूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का अक्षरब्रह्मयोग नामक आठवां अध्याय समाप्त होता है।

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