" Respected my beloved friend Sri Bijay Singh, who actually started spreading the ideas of Mahamandal in this area and country since 1987 and from then he has been working tirelessly covering a big part of India spreading the man-making idea of Mahamandal and Swami Vivekananda. I also express my thanks and gratitude to all the speakers who all spoke so well that I have learned from them and they also reduced my task.
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[N.B. आर.पी मोदी स्कूल, झुमरीतिलैया (झारखण्ड) में आयोजित "7th Interstate Youth Training Camp- 2019" : " सातवें अन्तर राज्जीय युवा प्रशिक्षण शिविर' के उद्घाटन सत्र में महामण्डल के तात्कालीन महासचिव (उस इन्टरस्टेट कैम्प के C-IN-C) श्री बिरेन्द्र कुमार चक्रवर्ती द्वारा '1967 में स्थापित अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल' के उद्भव का प्रामाणिक इतिहास " अंग्रेजी में प्रदत्त भाषण का हिन्दी अनुवाद। (यह भाषण केवल 'विवेक-अंजन के इंटरनेट संस्करण' पर ही पब्लिश हुआ था। उसका हिन्दी अनुवाद महामण्डल के मासिक पत्रिका 'विवेक -अंजन' में भी छपना चाहिए। इस पर एक बैठक अजय-रामचन्द्र जी मिश्र की उपस्थिति में आयोजित करना है।]
" मेरे आदरणीय और प्रिय मित्र श्री बिजय सिंह के प्रति अपना आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने 1987 से (उस समय झारखण्ड -बिहार एक ही राज्य था ) वास्तव में इस क्षेत्र में, तथा देश के कुछ अन्य राज्यों में महामण्डल भावधारा का प्रचार-प्रसार करना प्रारम्भ किया था। और तब से लेकर अभी तक महामण्डल एवं स्वामी विवेकानन्द विचारधारा को भारत के बड़े भूभाग तक फैला देने के लिये अथक परिश्रम करते चले आ रहे हैं। मैं अन्य सभी पूर्व वक्ताओं के प्रति भी अपना आभार और धन्यवाद व्यक्त करता हूँ , जिन्होंने अपने विचारों को इतने सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया कि मुझे उनसे कुछ सीखने को मिला , और उन्होंने मेरे कार्य को भी आसान बना दिया है।
आमतौर से महामंडल द्वारा आयोजित युवा-प्रशिक्षण शिविर के किसी भी उद्घाटन सत्र में, हमलोग लंबे भाषण की अनुमति नहीं देते हैं। क्योंकि शिविरार्थी लोग दूर-दराज के क्षेत्रों से आये हुए हैं, इसलिये वे थोड़ी थकान महसूस करते होंगे। उन्हें शाम को बहुत हल्का टिफिन प्रदान किया गया है, इसलिये अभी वे बेकल हैं। इसलिए मुझे लगता है कि भाषण को बड़ा करना जरूरी नहीं है, अतः मैं अपने वक्तव्य को बहुत संक्षेप में रखूँगा। क्योंकि अधिकांश campers नये हैं (पहली बार आये हैं), इसलिए इस शिविर के उद्घाटनकर्ता के रूप में ही नहीं, बल्कि इस संगठन के महासचिव (General Secretary) के रूप में- महामण्डल की मूल भावना (Fundamental Spirit) और आविर्भूत होने का प्रामाणिक इतिहास (authentic history) से मैं उनका परिचय कराना चाहूँगा ।
महामंडल की स्थापना स्वामी विवेकानन्द की मनुष्य-निर्माण तथा चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा को युवाओं के बीच फैला देने के उद्देश्य से, 1947 में भारत की स्वतंत्रता प्राप्त करने के बीस साल बाद 1967 में हुई थी। इस युवा संगठन के आविर्भूत होने का मुख्य कारण 1967 के आसपास ही उत्तरी बंगाल के एक गाँव नक्सलबाड़ी से प्रारम्भ हुआ एक 'सशस्त्र' किसान आन्दोलन (Agrarian Movement)# था। जिसकी चिंगारी आगे चलकर भारत के कुछ अन्य पूर्वी राज्यों - उड़ीसा , छत्तीसगढ़ , बिहार तथा दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों -विशेष रूप से आन्ध्र प्रदेश तक फ़ैल गया था। (शायद इसी कारण महामण्डल के सबसे अधिक केन्द्र, पश्चिमी भारत की अपेक्षा, पूर्वी भारत के इन्हीं राज्यों में सक्रीय भी है?)
[>>> 'नक्सलबाड़ी किसान आन्दोलन' # :(Naxalbari Agrarian Movement) चीन में एक कम्युनिस्ट नेता हुए नाम था- माओ त्से तुंग। माओ ने एक बार कहा था- 'एक चिंगारी सारे जंगल में आग लगा देती है। ' माओ वही नेता थे जिन्होंने चीन में सशस्त्र क्रांति की थी। पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी जिले में एक गांव पड़ता है- नाम है- नक्सलबाड़ी। नक्सलबाड़ी गांव में भी आज से 56 साल पहले, इसी तर्ज पर 1967 में एक ऐसा आंदोलन शुरू हुआ था, जिसके बाद पूरे भारत में माओवाद फैल गया। इसे 'नक्सलबाड़ी किसान आंदोलन' कहा जाता है। आंदोलन के तहत, आदिवासी किसानों ने हथियार उठा लिए थे। ये वो लोग थे जो माओ की विचारधारा को मानते थे। इसलिए इन्हें माओवादी भी कहा जाता है। नक्सलबाड़ी आंदोलन की शुरुआत सन् 1967 मेंं बंगाल के गांव नक्सलबाड़ी से चारु मजूमदार, जंगल संथाल और कानू सान्याल की अगुवाई में हुई थी । यह व्यवस्था के खिलाफ सशस्त्र क्रांति की शुरुआत थी । इसमें सरकारी कर्मचारी द्वारा किए गए अन्याय पर उसकी गोली मारकर हत्या कर वह जंगल में कूदकर फरार हो गया था, और पीड़ित ग्रामीण जनों का संगठन बनना शुरू हुआ जो इस तरह के सशस्त्र संघर्ष में तब्दील हो गया।
आजादी एक लम्बे गौरवपूर्ण संघर्ष के बाद 1947 में आजादी हासिल की गई थी और इससे करोड़ो लोगों का सपना पूरा हुआ था। लेकिन अंग्रेजों से आजादी के बीस साल बाद भी जब भारत में भ्रष्टाचार , भुखमरी , बेरोजगारी, शोषण में कोई कमी न होते देखकर जनसाधारण और विशेष रूप से पढ़ा-लिखा युवावर्ग अपने को ठगा हुआ सा महसूस कर रहा था। भारत के पुनर्निर्माण की पंचवर्षीय योजनाएँ बनाई गईं थीं , लेकिन उसमें किसानों की समस्याओं पर कम ध्यान दिया गया।
1967 के आम चुनाव के बाद ग्यारह राज्यों में पहली बार कांग्रेस की केन्द्रीकृत शासन को चुनौती देते हुए संविद सरकारें बनी थीं। बिहार में महामाया प्रसाद जैसे नेता भी मुख्यमंत्री बन गए थे। और कुछ स्वार्थी राजनीतिज्ञों के बहकावे में आकर, युवा -समुदाय जल्दीबाजी या हड़बड़ी में - In a hurry - पहले अपने चरित्र-निर्माण और जीवन-गठन का कार्य शुरू किये बिना ही तोड़-फोड़ के द्वारा व्यवस्था-परिवर्तन के लिये उतावला हो रहा था। जिसके फलस्वरूप कई शिक्षित युवाओं का जीवन भी नष्ट होने के कागार पर पहुँच गया था। और उस संकट की घड़ी 1967 में में ही 'अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल' नामक इस युवा संगठन को आविर्भूत होना पड़ा था। इसके पीछे भावना यह थी कि इस संगठन माध्यम से स्वामी विवेकानन्द की " मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माणकारी " शिक्षा को युवाओं के बीच फैला दिया जाय। ]
जिस समय (1967 के आसपास) जब कुछ स्वार्थी राजनीतिज्ञों के बहकावे में आकर युवा-समुदाय - In a hurry (जल्दीबाजी में) अपने चरित्र-निर्माण और जीवन-गठन के कार्य को शुरू करने के पहले ही, तोड़-फोड़ के द्वारा व्यवस्था-परिवर्तन के लिये उतावला हो रहा था। उस समय अनुशासित जीवन में प्रतिष्ठित एक युवा ~नवनीदा ( श्री नवनी हरण मुखोपाध्याय) महामंडल के संस्थापक सचिव - A young man in discipline, जो कई बार यहां भी पधार चुके हैं; तथा 'रामकृष्ण मिशन परम्परा' (Ramakrishna Mission Order) के कुछ वरिष्ठ संन्यासियों ने परस्पर चर्चा करके एक युवा संगठन स्थापित करने का निर्णय लिया। और स्वामी विवेकानन्द के 'मनुष्य-निर्माण एवं चरित्र-निर्माणकारी विचार-धारा को युवाओं के बीच फैला देने का एक आंदोलन प्रारम्भ किया । इस प्रकार वर्ष 1967 के आखरी तिमाही में आयोजित प्रथम बैठक में इस आंदोलन का सूत्रपात हुआ था। और जहाँ तक मुझे याद है वह 25 अक्टूबर,1967 की तिथि थी ।
अद्वैत आश्रम में आयोजित पहली बैठक के चार-पाँच महीने बाद जनवरी 1968 में दूसरी बैठक आयोजित हुई। उस बैठक में आमंत्रित अन्य व्यक्तियों के साथ रामकृष्ण मिशन के कुछ बहुत ही वरिष्ठ संन्यासी, जैसे रामकृष्ण मिशन के अध्यक्ष स्वामी भूतेशानन्द, रामकृष्ण मिशन के महासचिव स्वामी अभयानन्द एवं सहायक महासचिव स्वामी रंगनाथानन्द ,जो आगे चलकर रामकृष्ण मिशन के अध्यक्ष भी बने --उपस्थित थे। बैठक में चर्चा चली कि, मनुष्य का 'ढाँचा' प्राप्त करने से ही कोई व्यक्ति " मनुष्य" नहीं बन जाता , बल्कि ~ "धर्मेण हीनाः पशुभिः सामना" - धर्म (शिक्षा) या 'चरित्र' के बिना मनुष्य भी पशुतुल्य है। अतः उन सभी वरिष्ठ संन्यासियों ने हमें यही परामर्श दिया कि इस संगठन का उद्देश्य स्वामी विवेकानन्द की ' मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा' का युवाओं के बीच प्रचार -प्रसार करना होना चाहिये, ताकि सुन्दरतर मनुष्यों के निर्माण से सुन्दरतर समाज को निर्मित किया जा सके। महामण्डल की स्थापना के पीछे यही भावना क्रियाशील है। "
अगला काम इस बात पर चिंतन (contemplate) करना था कि हमलोग तो स्कूल -कॉलेज खोलने वाले हैं नहीं, फिर युवाओं के बीच स्वामी जी के मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षाओं को फैला देने उपाय क्या होना चाहिये? सम्पूर्ण भारत के युवाओं के बीच 'श्रीरामकृष्ण -विवेकानन्द वेदान्त भावधारा' (अर्थात गुरु-शिष्य वेदान्त शिक्षक-प्रशिक्षण परम्परा- में 'Be and Make') का प्रचार-प्रसार कैसे किया जा सकता है ? उनलोगों ने यह निर्णय लिया कि, इसके लिए महामण्डल के द्वारा ही (संन्यासियों के द्वारा नहीं), समय -समय पर युवा प्रशिक्षण शिविर (Youth Training Camps) आयोजित करना चाहिये। तथा उन शिविरों में युवाओं का आह्वान कर उन्हें 'मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माणकारी ' प्रशिक्षण देना चाहिये। महामण्डल स्थापित होने के संभवतः पांच महीने बाद इसका प्रथम 'अखिल भारतीय युवा प्रशिक्षण शिविर ' बंगाल के अरियादह में आयोजित किया गया था।
स्वामी विवेकानन्द के अनुसार यथार्थ "मनुष्य" बनने के लिये युवाओं को छात्रजीवन में (किशोरावस्था में) ही उसके तीन प्रमुख अवयव - देह (Hand) , मन (Head) और हृदय (Heart) इन तीनों (3'H') को समानुपातिक रूप से विकसित करने (के 5 जरुरी अभ्यास) का प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिये। युवाओं के पास एक ऐसा मजबूत शरीर (strong body) होना चाहिये जिसमें प्रखर-बुद्धि से युक्त मन (Sharp intellect mind) का वास हो , और उसका हृदय विशाल (expanded heart) होना चाहिये। अर्थात उन्हें आत्मकेन्द्रित जीवन (self- centred life) नहीं बिताकर दूसरों के कल्याण के लिये जीना चाहिये।