कुल पेज दृश्य

शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2023

$$🔱Sri Birendra Kumar Chakraborty, at '7th Interstate Youth Training Camp- 2019' : श्री बिरेन्द्र कुमार चक्रवर्ती द्वारा अंग्रेजी में प्रदत्त भाषण का हिन्दी अनुवाद |

[### The Inaugural Speech of Sri Birendra Kumar Chakraborty, General Secretary of Akhil Bharat Vivekananda Yuva Mahamandal delivered at the occasion of '7th Interstate Youth Training Camp- 2019' held at Jhumritelaiya, Jharkhand:-

        " Respected my beloved friend Sri Bijay Singh, who actually started spreading the ideas of Mahamandal in this area and country since 1987 and from then he has been working tirelessly covering a big part of India spreading the man-making  idea of Mahamandal and Swami Vivekananda. I also express my thanks and gratitude to all the speakers who all spoke so well that I have learned from them and they also reduced my task. 

          In the inaugural programs of Mahamandal, we do not permit any lengthy speeches. Since campers have come from different areas, They feel tired. They have been provided very light tiffin in the evening and now they are restless so I think that it is not necessary to make the speech lengthy and I would like to sum up in short.  I thought that not only as an inaugurator of the camp but as the General Secretary of this organization, I will introduce the Mahamandal to them because most of the campers are new. 
     Mahamandal was established in the year 1967, twenty years after attaining India's independence in 1947. The idea was to spread the man-making and character-building ideas of Swami Vivekananda among young men because of an Agrarian Movement #(in the year 1967) in the eastern part of India .
      Young men in around West Bengal and some other eastern states and some the south mostly in Andhra Pradesh. A young man in discipline and some senior monks of Ramakrishna Mission order and founder secretary of Mahamandal Sri Nabani Haran Mukhopadhyay who came here many times took the decision to establish an organization and started a movement to spread this man making and character building idea of Swami  Vivekananda among the young men. In this way, the work started in the later part of 1967. So far I remember that it was on the 25 of October. 
     The first meeting was held a four-five months later in January 1968. They sat together. A very senior monk, the president of Ramakrishna Mission, General Secretary Swami Abhayananda, Assistant General Secretary Swami Bhuteshananda, and a very senior monk Swami Ranganathananda who also subsequently became president of Ramakrishna Mission took part in that meeting. They all advised it will have to spread the man making ideas of Swami Vivekananda. This is the idea behind establishing Mahamandal. 
      Then the next was to contemplate what was the way? How was the idea to be spread? They decided that youth training camps should be organized periodically and in these training camps, man-making and character-building ideas will be taught. The first training camp was possibly held five months after Mahamandal started. According to Swami Vivekananda, the necessary things in order to be real men are simultaneous development of body, mind, and heart. Youth should have a strong body, intellectual mind, and an expanded heart. They should not leave self-centered life. They should lead a life for the sake of all. 
      In this camp, campers will start from tomorrow morning attending a class on the concentration of mind. Swami Vivekananda emphasized more to be educated on how to concentrate the mind. Various classes on man-making and character-building education will be held thereafter. Theoretical ideas are not enough, practical method is essential which will be also taught here. Therefore I appeal to all the campers not to miss any class of the camp. 
      Swamiji used to narrate a story of pearl oyster. Be like the pearl oyster. There is a pretty Indian fable to the effect that if it rains when the star Swati is in the ascendant, and a drop of rain falls into an oyster, that drop becomes a pearl. The oysters know this, so they come to the surface when the star shines and wait to catch the precious raindrop. When a drop falls into them, quickly the oysters close their shells and dive down to the bottom of the sea, there to patiently develop the drop into the pearl. 
       So this camp may be assumed this occasion where you can get the pearl-like valuable things to be absorbed. Believe, this evening, when the camp was inaugurated by flag hoisting, the Swati star has raised on the sky of this camp periphery and it will sustain till the end of the camp. I fervently hope, you all will take the maximum advantage of the camp to make your life better grasping the man making and character building ideas of Swami Vivekananda. "

=======

[N.B. आर.पी मोदी स्कूल,  झुमरीतिलैया (झारखण्ड) में आयोजित "7th  Interstate Youth Training Camp- 2019" : " सातवें अन्तर राज्जीय युवा प्रशिक्षण शिविर' के उद्घाटन सत्र में महामण्डल के तात्कालीन महासचिव (उस इन्टरस्टेट कैम्प के C-IN-C) श्री बिरेन्द्र कुमार चक्रवर्ती द्वारा  '1967 में स्थापित अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल' के उद्भव का प्रामाणिक इतिहास "  अंग्रेजी में प्रदत्त भाषण का हिन्दी अनुवाद। (यह भाषण केवल 'विवेक-अंजन के इंटरनेट संस्करण' पर ही पब्लिश हुआ था। उसका हिन्दी अनुवाद महामण्डल के मासिक पत्रिका 'विवेक -अंजन' में भी छपना चाहिए। इस पर एक बैठक अजय-रामचन्द्र जी मिश्र की उपस्थिति में आयोजित करना है।] 

      " मेरे आदरणीय और प्रिय  मित्र श्री बिजय सिंह के प्रति अपना आभार व्यक्त करता हूँ,   जिन्होंने 1987 से (उस समय झारखण्ड -बिहार एक ही राज्य था ) वास्तव में इस क्षेत्र में, तथा देश के कुछ अन्य राज्यों में महामण्डल भावधारा का प्रचार-प्रसार करना प्रारम्भ किया था। और तब से लेकर अभी तक महामण्डल एवं स्वामी विवेकानन्द विचारधारा को भारत के बड़े भूभाग तक फैला देने के लिये अथक परिश्रम करते चले आ रहे हैं। मैं अन्य सभी पूर्व वक्ताओं के प्रति भी अपना आभार और धन्यवाद व्यक्त करता हूँ , जिन्होंने अपने विचारों को इतने सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया कि मुझे उनसे कुछ सीखने को मिला , और उन्होंने मेरे कार्य को भी आसान बना दिया है। 

    आमतौर से महामंडल द्वारा आयोजित युवा-प्रशिक्षण शिविर के किसी भी उद्घाटन सत्र में, हमलोग लंबे भाषण की अनुमति नहीं देते हैं। क्योंकि शिविरार्थी लोग दूर-दराज के क्षेत्रों से आये हुए हैं, इसलिये वे थोड़ी थकान महसूस करते होंगे। उन्हें शाम को बहुत हल्का टिफिन प्रदान किया गया है, इसलिये अभी वे बेकल हैं। इसलिए मुझे लगता है कि भाषण को बड़ा करना जरूरी नहीं है, अतः मैं अपने वक्तव्य को बहुत संक्षेप में रखूँगा। क्योंकि अधिकांश campers नये हैं (पहली बार आये हैं), इसलिए इस शिविर के उद्घाटनकर्ता के रूप में ही नहीं, बल्कि इस संगठन के महासचिव (General Secretary) के रूप में- महामण्डल की मूल भावना (Fundamental Spirit) और आविर्भूत होने का प्रामाणिक इतिहास (authentic history) से मैं उनका परिचय कराना चाहूँगा 

       महामंडल की स्थापना स्वामी विवेकानन्द की मनुष्य-निर्माण तथा चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा को युवाओं के बीच फैला देने के उद्देश्य से, 1947 में भारत की स्वतंत्रता प्राप्त करने के बीस साल बाद 1967 में हुई थी।  इस युवा संगठन के आविर्भूत होने का मुख्य कारण 1967 के आसपास ही उत्तरी बंगाल के एक गाँव नक्सलबाड़ी से प्रारम्भ हुआ एक 'सशस्त्र' किसान आन्दोलन (Agrarian Movement)# था। जिसकी चिंगारी आगे चलकर भारत के कुछ अन्य  पूर्वी राज्यों - उड़ीसा , छत्तीसगढ़ , बिहार तथा दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों -विशेष रूप से आन्ध्र प्रदेश तक फ़ैल गया था। (शायद इसी कारण महामण्डल के सबसे अधिक केन्द्र, पश्चिमी भारत की अपेक्षा, पूर्वी भारत के इन्हीं राज्यों में  सक्रीय भी है?)

[>>> 'नक्सलबाड़ी किसान आन्दोलन' # :(Naxalbari Agrarian Movement) चीन में एक कम्युनिस्ट नेता हुए नाम था- माओ त्से तुंग।  माओ ने एक बार कहा था- 'एक चिंगारी सारे जंगल में आग लगा देती है। ' माओ वही नेता थे जिन्होंने चीन में सशस्त्र क्रांति की थी। पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी जिले में एक गांव पड़ता है- नाम है- नक्सलबाड़ी। नक्सलबाड़ी गांव में भी आज से 56 साल पहले, इसी तर्ज पर 1967 में  एक ऐसा आंदोलन शुरू हुआ था, जिसके बाद पूरे  भारत में माओवाद फैल गया। इसे 'नक्सलबाड़ी किसान आंदोलन' कहा जाता है। आंदोलन के तहत, आदिवासी किसानों ने हथियार उठा लिए थे।  ये वो लोग थे जो माओ की विचारधारा को मानते थे। इसलिए इन्हें माओवादी भी कहा जाता है। नक्सलबाड़ी आंदोलन की शुरुआत सन् 1967 मेंं बंगाल के गांव नक्सलबाड़ी से चारु मजूमदार, जंगल संथाल और कानू सान्याल की अगुवाई में हुई थी । यह व्यवस्था के खिलाफ सशस्त्र क्रांति की शुरुआत थी । इसमें सरकारी कर्मचारी द्वारा किए गए अन्याय पर उसकी गोली मारकर हत्या कर वह जंगल में कूदकर फरार हो गया था, और पीड़ित ग्रामीण जनों का संगठन बनना शुरू हुआ जो इस तरह के सशस्त्र संघर्ष में तब्दील हो गया। 

आजादी एक लम्बे गौरवपूर्ण संघर्ष के बाद 1947 में आजादी  हासिल की गई थी और इससे करोड़ो लोगों का सपना पूरा हुआ था। लेकिन अंग्रेजों से आजादी के बीस साल बाद भी जब भारत में भ्रष्टाचार , भुखमरी , बेरोजगारी, शोषण  में कोई कमी न होते देखकर जनसाधारण और विशेष रूप से पढ़ा-लिखा युवावर्ग अपने को ठगा हुआ सा महसूस कर रहा था। भारत के पुनर्निर्माण की पंचवर्षीय योजनाएँ बनाई गईं थीं , लेकिन उसमें किसानों  की समस्याओं पर कम ध्यान दिया गया। 

1967 के आम चुनाव के बाद ग्यारह राज्यों में पहली बार कांग्रेस की केन्द्रीकृत शासन को चुनौती देते हुए संविद सरकारें बनी थीं। बिहार में महामाया प्रसाद जैसे नेता भी मुख्यमंत्री बन गए थे। और कुछ  स्वार्थी राजनीतिज्ञों के बहकावे में आकरयुवा -समुदाय  जल्दीबाजी या हड़बड़ी में - In a hurry - पहले अपने चरित्र-निर्माण और जीवन-गठन का कार्य शुरू किये बिना ही तोड़-फोड़ के द्वारा व्यवस्था-परिवर्तन के लिये उतावला हो रहा था। जिसके फलस्वरूप कई शिक्षित युवाओं का जीवन भी नष्ट होने के कागार पर पहुँच गया था। और उस संकट की घड़ी 1967 में में ही 'अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल' नामक इस युवा संगठन को आविर्भूत होना पड़ा था। इसके पीछे भावना यह थी कि इस संगठन  माध्यम से स्वामी विवेकानन्द की " मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माणकारी " शिक्षा को युवाओं के बीच फैला दिया जाय। ]

        जिस समय (1967 के आसपास) जब कुछ स्वार्थी राजनीतिज्ञों के बहकावे में आकर युवा-समुदाय - In a hurry (जल्दीबाजी में) अपने चरित्र-निर्माण और जीवन-गठन के कार्य को शुरू करने के पहले ही, तोड़-फोड़ के द्वारा व्यवस्था-परिवर्तन के लिये उतावला हो रहा था। उस समय अनुशासित जीवन में प्रतिष्ठित एक युवा ~नवनीदा ( श्री नवनी हरण मुखोपाध्याय) महामंडल के संस्थापक सचिव  - A young man in discipline, जो कई बार यहां भी पधार चुके हैं; तथा 'रामकृष्ण मिशन परम्परा'  (Ramakrishna Mission Order) के कुछ वरिष्ठ संन्यासियों ने परस्पर चर्चा करके एक युवा संगठन स्थापित करने का निर्णय लिया। और स्वामी विवेकानन्द के 'मनुष्य-निर्माण एवं चरित्र-निर्माणकारी विचार-धारा को युवाओं के बीच फैला देने का एक आंदोलन प्रारम्भ किया ।  इस प्रकार वर्ष 1967 के आखरी तिमाही में आयोजित प्रथम बैठक में इस आंदोलन का सूत्रपात हुआ था। और जहाँ तक मुझे याद है वह 25 अक्टूबर,1967 की तिथि थी ।

      अद्वैत आश्रम में आयोजित पहली बैठक के चार-पाँच महीने बाद जनवरी 1968 में दूसरी बैठक आयोजित हुई। उस बैठक में आमंत्रित अन्य व्यक्तियों के साथ रामकृष्ण मिशन के कुछ बहुत ही वरिष्ठ संन्यासी, जैसे रामकृष्ण मिशन के अध्यक्ष स्वामी भूतेशानन्दरामकृष्ण मिशन के  महासचिव स्वामी अभयानन्द एवं सहायक महासचिव स्वामी रंगनाथानन्द ,जो आगे चलकर रामकृष्ण मिशन के अध्यक्ष भी बने --उपस्थित थे। बैठक में चर्चा चली कि, मनुष्य का 'ढाँचा' प्राप्त करने से ही कोई व्यक्ति " मनुष्य" नहीं बन जाता , बल्कि ~ "धर्मेण हीनाः पशुभिः सामना" - धर्म (शिक्षा) या 'चरित्र' के बिना मनुष्य भी पशुतुल्य है।  अतः उन सभी वरिष्ठ संन्यासियों ने हमें यही परामर्श दिया कि इस संगठन का उद्देश्य स्वामी विवेकानन्द की ' मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा' का युवाओं के बीच प्रचार -प्रसार करना होना चाहिये, ताकि सुन्दरतर मनुष्यों के निर्माण से सुन्दरतर समाज को निर्मित किया जा सके। महामण्डल  की स्थापना के पीछे यही भावना क्रियाशील है। "

    अगला काम इस बात पर चिंतन (contemplate) करना था कि हमलोग तो स्कूल -कॉलेज खोलने वाले हैं नहीं, फिर युवाओं के बीच स्वामी जी के मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षाओं को फैला देने  उपाय क्या होना चाहिये? सम्पूर्ण भारत के युवाओं के बीच 'श्रीरामकृष्ण -विवेकानन्द वेदान्त भावधारा' (अर्थात गुरु-शिष्य वेदान्त शिक्षक-प्रशिक्षण परम्परा- में 'Be and Make') का प्रचार-प्रसार कैसे किया जा सकता है ? उनलोगों ने यह निर्णय लिया कि, इसके लिए महामण्डल के द्वारा ही (संन्यासियों के द्वारा नहीं), समय -समय पर युवा प्रशिक्षण शिविर (Youth Training Camps) आयोजित करना चाहिये।  तथा उन शिविरों में युवाओं का आह्वान कर उन्हें 'मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माणकारी ' प्रशिक्षण देना चाहिये। महामण्डल स्थापित होने के संभवतः पांच महीने बाद इसका प्रथम 'अखिल भारतीय युवा प्रशिक्षण शिविर ' बंगाल के अरियादह में आयोजित किया गया था।

      स्वामी विवेकानन्द के अनुसार यथार्थ "मनुष्य" बनने के लिये युवाओं को छात्रजीवन में (किशोरावस्था में) ही उसके तीन प्रमुख अवयव - देह (Hand) , मन (Head) और हृदय (Heart) इन तीनों (3'H') को समानुपातिक रूप से विकसित करने (के 5 जरुरी अभ्यास) का प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिये। युवाओं के पास एक ऐसा मजबूत  शरीर (strong body) होना चाहिये जिसमें प्रखर-बुद्धि से युक्त मन (Sharp intellect mind) का वास हो , और उसका हृदय विशाल (expanded heart) होना चाहिये। अर्थात उन्हें आत्मकेन्द्रित जीवन (self- centred life)  नहीं बिताकर दूसरों के कल्याण के लिये जीना चाहिये।  

इस प्रशिक्षण -शिविर का प्रारम्भ सभी शिविरार्थी भाई कल प्रातःकाल 'मन की एकाग्रता' पर एक कक्षा में भाग ले कर करेंगे। स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षित मनुष्य बनने के लिये सबसे अधिक जोर इसी विषय~ ' मन को एकाग्र कैसे करें' (how to concentrate the mind) पर दिया करते थे। तत्पश्चात मनुष्य -निर्माण और चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा के विभिन्न विषयों पर कक्षाएं आयोजित की जाएंगी। लेकिन मनुष्य बनने के लिये केवल सैद्धान्तिक विचारों को सुनते रहना ही पर्याप्त नहीं हैं , अतः उन सद्गुणों को अपने जीवन और व्यवहार में धारण करने की व्यावहारिक पद्धति (practical method ) भी यहाँ सिखाई जायेगी। इसलिए सभी शिविरार्थी भाइयों से मैं अपील करता हूँ , तुम इस शिविर के किसी भी कक्षा को मत छोड़ना।  
         स्वामी विवेकानन्द अपने शिष्यों को (Would be Leaders या उपास्य को) 'Pearl Oyster ' (मोती वाले सीप) की  कहानी सुनाया करते थे। " शुक्ति (याने मोती वाले सीप) के समान बनो। भारतवर्ष में एक सुन्दर किंवदन्ती प्रचलित है। वह यह कि आकाश में स्वाति नक्षत्र के तुंगस्थ रहते यदि पानी गिरे और उसकी एक बून्द किसी सीपी में चली जाय, तो उसका मोती बन जाता है। सीपियों को यह मालूम है। अतएव जब वह नक्षत्र उदित होता है, तो वे सीपियाँ पानी की उपरी सतह पर आ जाती हैं, और उस समय की एक अनमोल बून्द की प्रतीक्षा करती रहती हैं। ज्यों ही एक बून्द पानी उनके पेट में जाता है, त्यों ही उस जलकण को लेकर मुँह बन्द करके वे समुद्र के अथाह गर्भ में चली जाती हैं और वहाँ बड़े धैर्य के साथ उनसे मोती तैयार करने के प्रयत्न में लग जाती हैं।" 
      उसी प्रकार इस युवा प्रशिक्षण शिविर को भी आप मोतियों जैसे बहुमूल्य विचारों का संग्रह करने के एक दुर्लभ अवसर के रूप में ग्रहण कर सकते हैं। यहाँ आप स्वामी विवेकानन्द की शिक्षा रूपी मोतियों जैसी मूल्यवान विचारों को प्राप्त कर सकते हैं। ध्वजारोहण के साथ आज संध्या जब इस शिविर का उद्घाटन हुआ, विश्वास कीजिये ठीक उसी समय इस शिविर परिधि (camp periphery) के आकाश में स्वाति नक्षत्र तुंगस्थ हो चुका है, और इस शिविर की समाप्ति होने तक वहीं पर तुंगस्थ बना रहेगा। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप सभी शिविरार्थी भाई , स्वामी विवेकानन्द के 'मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माणकारी ' शिक्षाओं को ग्रहण करके अपने जीवन को सुन्दर रूप से गठित करने के लिये इस शिविर का अधिकतम लाभ उठाएंगे। "
===============