कुल पेज दृश्य

शुक्रवार, 18 मई 2018

'स्वामी विवेकानन्द- कैप्टन जेम्स हेनरी सेवियर अद्वैत शिक्षक प्रशिक्षण परम्परा'

'अचिन्त्य-भेदाभेद अद्वैत परम्परा में 'Be and Make' लीडरशिप ट्रेनिंग प्रणाली:  
अखिल भारत विवेकानन्द युवा महमामण्डल के संस्थापक श्री नवनीहरन मुखोपाध्या अपनी पुस्तक [ सन्दर्भ महामण्डल पुस्तक 'जीवन-नदी के हर मोड़ पर' संस्मरणात्मक निबंध 'दर्शन बनाम फिलॉसफी' पृष्ठ ४०/জীবন নদীর বাঁকে বাঁকে-পৃষ্ঠ ২৯ /] में लिखते हैं -
" कॉलेज में थर्ड ईयर समाप्त हो गया। दिसम्बर का महिना था, परन्तु मैं कभी भी गर्म कपड़े नहीं पहनता था, ऊनि कुर्ता या स्वेटर आदि, उस समय तक कभी पहना ही नहीं था। मैं दिनभर ऑफिस में रहता था, शाम को क्लास करता था। एक दिन मुझे कुण्डू सर ने (केमिस्ट्री के प्रोफ़ेसर प्रियनाथ कुन्डू) टोका तथा चेहरे को थोड़ा गंभीर करते हुए कहा- " तुम गर्म कपड़े नहीं पहनते हो ? तुमको Pox हो सकता है।" पॉक्स एक बहुत ही खराब बीमारी है। इसको 'चिकेन पॉक्स' या 'स्माल पॉक्स' कहना उचित होगा। बहरहाल जो भी हो, दिसम्बर के अन्त में मुझे स्माल पॉक्स हो गया।  
पहली जनवरी (वर्ष ?) के दिन मैं बिस्तर से उठ नहीं पा रहा था, ऑफिस जाने में भी असमर्थ था। किसी प्रकार ऑफिस आकर वेतन लिया। किन्तु, जब घर लौटा तो शरीर में भीषण यंत्रणा हो रही थी, छत पर धूप में एक दरी बिछा कर लेट गया। मैं पहली जनवरी को ही बेहोश (विवेकज-ज्ञान की अवस्था) हो गया। उसके बाद क्या हुआ, कितने दिनों तक बेहोश पड़ा रहा कुछ पता नहीं। हठात ऐसा लगा मानो मेरे कानों में जो ध्वनी आ रही है, वह मेरी जानी-पहचानी है, मैं उसे (..... नेताजी अमर रहें जैसी ?जानता हूँ। ऐसा लगा कि आज नेताजी का जन्मदिन (२३जनवरी?) है और उसी उपलक्ष्य में कोई शोभायात्रा जा रही है। मैं भी अपने गले से आवाज निकालने की चेष्टा करता हूँ -'नेताजी अमर रहें' कहना चाहता हूँ; किन्तु कह नहीं पा रहा हूँ। अरे अरे, यह क्या हुआ, क्या हुआ?  मुझे ऐसा लग रहा था ... मानो मैं हाथ उठाकर कह रहा हूँ -'मैं जिन्दा हूँ अभी!' किन्तु, गले से आवाज नहीं निकल पा रही थी और इस तरह २३ दिन बीत गये थे!
 (निर्विकल्प समाधि में ? ठाकुरदेव कहते थे जीवकोटि का मनुष्य २१ दिनों तक निर्विकल्प समाधि में रह सकता है, उसके बाद उसका शरीर सूखे पत्ते की तरह झड़ जाता है; पूज्य दादा २२ वें दिन पुनः अपने शरीर में लौट आये ! तो क्या दादा ईश्वर कोटि के मनुष्य नहीं थे ? )  इस बीच जो समय बीता था वह स्वप्न के समान अनुभव हो रहा था।  .... इसी क्रम में मैंने एक बार देखा कि मैं मर गया हूँ, और मुझे सजा-धजा कर बहुत से लोग ले जा रहे हैं। सभी बहुत उदास हैं, मैं भी सब कुछ देख पा रहा हूँ। ... कितनी दूर ले जा रहे हैं ये लोग ! धरती-आकाश, पेड़-पौधे, उनके पत्ते, विभिन्न रंगो के सुन्दर-सुन्दर फूल ! ऊँची चढ़ाई -वृक्ष सुंदर फूल जिन्हें मैं पहचानता भी नहीं। बहुत दूर... बहुत दूर। एक छोटी सी पहाड़ी पार करने के बाद मुझे धीरे से नीचे रख दिया गया। चिता सजाई गयी। उसके ऊपर शरीर को रख दिया गया, चिता में अग्नि प्रदान की गयी, मेरा शरीर जलकर राख में परिणत हो गया। 
कई वर्षों बाद जब मैं मायावती गया हुआ था।  तब उस स्वप्न में देखे गए ठीक उसी दृश्य के समान वहाँ का  दृश्य भी दिखाई दिया ! मायावती में जहाँ पर कैप्टन सेवियर की स्मृति फलक लगी हुई है (या समाधि है)   वहाँ जिस प्रकार के वृक्ष, पत्ते, फल-फूल लगे हुए हैं तथा थोड़ी सी चढ़ाई चढ़ने के बाद नीचे समतल भूमि है -ऐसा लगा उस दिन स्वप्न में मैंने ठीक इसी जगह को देखा था !
इस सबसे उबरने के बाद जब मैं स्वस्थ हो गया; तो मैंने अपने अध्यापक कुन्डू सर से कहा - " सर ! आपने जैसा कहा था,आखिर मुझे स्माल पोक्स हो ही गया था। सर बोले - 'मैंने तो तुमसे कहा ही था तुम गर्म कपड़े क्यों नहीं पहते?' मैंने कहा देखिये सर, मुझसे बड़ी भूल हो गयी है। ' किन्तु अब मेरा क्या होगा ? क्या आप मुझे प्रमोशन देकर चतुर्थ वर्ष के क्लास में बैठने की अनुमति देंगे?' तब उन्होंने कहा, " देखो यदि मेरे कहने पर फिजिक्स,केमिस्ट्री और मैथेमेटिक्स तीनो विषयों के प्रोफ़ेसर यदि यह मन्तव्य लिख कर दें कि इसको promotion देने के बाद भी तुम अपनी छुटी हुई पढ़ाई को मेक-अप कर लोगे तो हम promotion दे देंगे। किन्तु, मुझे ऐसा लगता है, ऐसा करना उचित नहीं होगा। तुम तीन महीने से कॉलेज नहीं आये हो, न ही तुमने पढाई की है, ऊपर से तुम नौकरी करते हुए पढाई करते हो, इसीलिये यदि तुमको चतुर्थ वर्ष में promotion दिया जायेगा तो ठीक से पढ़-लिख नहीं पाओगे। तुमको परीक्षा के समय असुविधा होगी।  तुम यदि मेरी बात मानो तो, तुम्हें फिर से तृतीय वर्ष में ही नाम लिखावाना चाहिये। "
अगले ही दिन मैंने फिर से तृतीय वर्ष में नाम लिखवा लिया। नामांकन के पश्चात् जब मैंने उनको इसकी जानकारी दी, तो वे बड़े खुश हुए तथा कहा - " तुमने थर्ड ईयर में पुनः नामांकन करवा लिया? वाह ! ये तो मैंने सोचा भी नहीं था।  आजकल तो छात्र तो शिक्षकों कि बात मानते नहीं है।  मैं तो यह सोंच रहा था कि तुम फिर से मेरे पास आकर मझसे कहोगे, कि नहीं सर चतुर्थ वर्ष में ही प्रमोशन कर दीजिये। " मैंने कहा -"नहीं सर, मैंने यह सोचा कि जब आप कह रहे हैं तो अवश्य मेरे भले के लिये ही कह रहे होंगे।" मैंने फिर से तृतीय वर्ष तथा चतुर्थ वर्ष की पढाई पूरी की।
चतुर्थ वर्ष की पढाई समाप्त कर मैंने उसके बाद के वर्ष में परीक्षा दिया। परीक्षा के पश्चात् फिर से दूसरी नौकरी की खोज शुरू हुई| 'Central Fuel Research Institute' जियलगोड़ा में नौकरी मिली। वहाँ उस समय 'Synthetic Petroleum' के निर्माण पर अनुसंधान कार्य चल रहा था। लैबरोटरी में विश्लेषण  (Analysis) का कार्य करना पड़ता था। 
किन्तु, कुछ ही दिनों के बाद फिरसे यह लगने लगा कि इस तरह तो मैं और कुछ कर ही नहीं पाउँगा! क्यूँ ऐसा लगा था अब याद नहीं है। पर बीच-बीच में विचार आता था कि, M.Sc. करने के लिए प्रयास करना चाहिए। मैंने यूनिवर्सिटी में जाकर एक व्यक्ति से बुद्धउ की तरह  पूछा कि देखिये, मैंने B.Sc.पास किया है, क्या मै एक Private Candidate के रूप में M.Sc. की परीक्षा नहीं दे सकता?  उन्होंने बताया, " हाँ, हो तो सकता है, किन्तु फिजिक्स, केमिस्ट्री में नहीं केवल मैथेमेटिक्स से हो सकता है। एक विषय के रूप में 'मैथेमेटिक्स' कभी मुझे प्रिय नहीं था। एस्ट्रोनौमी में मुझे ५० में ५० अंक मिले थे। ५० अंक का एस्ट्रोनौमी मेरा हाफ पेपर था। तब मैंने उन सज्जन से जानना चाहा कि आखिर फिजिक्स य़ा केमिस्ट्री में M.Sc.क्यों नहीं हो सकता ? उन्होंने बताया कि  फिजिक्स,केमिस्ट्री में practical का क्लास किये बिना M.Sc. कैसे होगा, उसके लिये तो ६ घंटा -७ घंटा लैबरोटरी में काम करना पड़ता है। तब मैंने पूछा कि दूसरा उपाय क्या है? क्या आर्ट्स के किसी विषय में किया जा सकता ? उन्होंने बताया कि " हाँ, आर्ट्स के किसी भी विषय में किया जा सकता है। किन्तु B.Sc.के पश्चात् फैकल्टी चेंज करने पर M.A.में नाम लिखावाने के लिये पहले अंग्रेजी य़ा बंगला में बी.ऐ .की स्पेशल परीक्षा देनी होगी। "  मैंने वैसा ही किया पन्द्रह दिनों तक पढ़ कर स्पेशल परीक्षा दे दिया और पास हो गया। उसके बाद प्रश्न उठा कि एम्.ऐ. किस विषय में किया जाय? मेरा व्यक्तिगत पसंदीदा विषय तो हमेशा से दर्शनशास्त्र ही रहा है। किन्तु कालेज में नाम लिखाते समय जब पिताजी ने कहा कि तुम्हें 'आर्ट्स' नहीं 'साइन्स' पढना है तो मैंने वैसा ही किया था। 
जिस समय मैं आन्दुल स्कूल में आठवीं कक्षा का छात्र था, उस समय हमारे स्कूल में मौड़ी ग्राम के एक सज्जन भी रहते थे। वे हर समय गेरुआ रंग का कुर्ता और सफ़ेद धोती (नाम ?) पहना करते थे।  उन्होंने विवाह नहीं किया था, वे हमेशा संगीत की सेवा तथा साधना में ही लगे रहते थे। वे अत्यन्त ही सज्जन व्यक्ति थे। हमलोग अपने घर से अलग स्कूल बिल्डिंग में ही रहा करते थे। इसलिए वे बीच-बीच में आकर हमलोगों का हाल-चाल पूछ लिया करते थे। कैसे हो, क्या कर रहे हो? इत्यादि पूछा करते थे। हठात एक दिन उन्होंने मुझसे प्रश्न किया-'तुम्हें किस फिलॉस्फर की फिलॉसफी अच्छी लगती है ? मैं उस समय क्लास ऐट में ही पढ़ता था, किन्तु उस समय मैंने जो उत्तर दिया था वह मुझे अब भी याद है। मैंने कहा था - 'आई हैव माई ओन फिलॉसफी! ' अर्थात दर्शन को लेकर मेरी बिल्कुल स्पष्ट धारणा है ! भारत में तो दर्शन प्राप्त कर लेने अर्थात आत्मसाक्षात्कार या प्रभु-दर्शन (इन्द्रियातीत निरपेक्ष सत्य का दर्शन) को ही दर्शन कहा जाता है। जबकि ताउम्र अंधरे में टटोलते रहने का नाम है 'फिलॉसफी' इसीलिये मैं दूसरों की फिलॉसफी को लेकर अधिक माथापच्ची नहीं करता। 
अभी कुछ समय पहले ही मुझे वह चिट्ठी प्राप्त हुई है जिसे घर से बाहर रहकर नौकरी करते हुए मैंने अपने पिताजी को अंग्रेजी में लिखा था। पुराने फाइलों को ढूंढते समय मुझे मिल गया था। ढेर - सारे कागज -पत्र आदि तो नष्ट हो चुके हैं, किन्तु यह चिट्ठी अभी भी बची हुई है। (डेटेड ? आस्क रनेन दा /मिन्टूदा) उस पत्र में अपने ही द्वारा लिखित एक सेन्टेंस को पढ़कर मैं अवाक् रह गया। मैंने लिखा था - " आइ नो दैट आइ वाज नॉट (री ?) बॉर्न फॉर नथिंग !" 
अभी भी हमेशा यह महसूस होता रहता है कि - (विवेकज ज्ञान द्वारा पुनरुज्जीवित होने के बाद ?) " यह दूसरे का शरीर है!" ( अर्थात यह शरीर मेरा नहीं है, माँ जगदम्बा का है, जो इसको निमित्त बनाकर कार्य कर रही हैं! ) स्वामी अनन्यानन्दजी ने एक दिन मुझसे कहा था - " Take care of your body. "( अपने शरीर का ध्यान रखो)  मैंने उत्तर दिया था कि -' महाराज, दिस बॉडी इज नॉट माइन। दिस इज डेडिकेटेड (निवेदित ?) टू ठाकुर, माँ एण्ड स्वामी जी। व्हाई शुड आइ केयर अबाउट दिस बॉडी?" ( This body is not mine. this is dedicated to Thakur, Maa and Swamiji. What do I care about this body ?) जहाँ पर इसका अन्त होना है, हो ! इसको चाहे गिद्ध नोच खायें, य़ा अग्नि में जला डाला जाय, य़ा जल में फेंक दिया जाय, जो भी होना है, हो जाये!"( 'मरणो भला विदेश में जहाँ न अपणो कोय माटी खाय जनवरा महामहोत्स्व होय।)  " व्हाट डिड आइ केयर अबाउट दिस बॉडी ? व्हाट इज दिस ? इट्स नथिंग ! ('What did I care about this body? What is this? It's nothing.)
जब मैं नौकरी में था उस समय एक बहुत बड़े ऑफिसर ने अचानक मुझसे  पूछा -'व्हाट इज योर ओपिनियन अबाउट वेस्टर्न फिलॉसफी ? मैंने उत्तर दिया - " दी वेस्टर्न फिलॉसफी इज जस्ट क्रॉलिंग ऑन इट्स फोर लेग्स।" अर्थात पाश्चात्य फिलॉसफी तो अभी तक अपने शैशव अवस्था में ही है और चार पैरों से घुटनों के बल ही चल रहा है। बचपन से ही मुझमें ऐसी धारणा थी कि जो ठाकुर-ग्रामीण भाषा वेदान्त के रहस्य को उद्घाटित करने वाली माँ सारदादेवी -स्वामीजी का दर्शन है, उसके निकट भी दूसरा कौन पहुँच सकता है ? "
-----------------
पूज्य नवनीदा के जीवन की इस घटना को पढ़ने के बाद मुझे यह जानने की इच्छा हुई कि यह 'कैप्टन सेवियर' कौन थे, मायावती में जिनकी समाधि पर लगे स्मृति-फलक को देखकर नवनीदा को वह अदभुत स्वप्न याद हो आया जो बिल्कुल इसी स्थान के सदृश था ! [ " वी आर हिज चिल्ड्रेन, वी आर बॉर्न इन द " स्पिरिचुअल लाइन ऑफ़ द टीचर ! " "We are his children, we are born in the "Spiritual Line of the Teacher." 4/177 मेरा ब्लॉग  गुरुवार, 10 अगस्त 2017/स्वामी विवेकानन्द का जीवन और सन्देश ]  
अद्वैत आश्रम, मायावती(लोहाघाट से 9 किलोमीटर दूर।) समुद्र तल से 1,940 मीटर ऊंचाई पर स्थित यह आश्रम हिमालय का अद्भुत नजारा प्रस्तुत करता है। आश्रम हिमालयी ऋंखला खासकर नंदा देवी, नंदकोट एवं त्रिशूल शिखरों का कुछ अद्भुत दृश्य पेश करता है। यह भारत तथा विदेशों से अध्यात्मवादियों को आकर्षित करता है, खासकर उन बंगाल वासियों को जो आश्रम से निकटता से जुड़े थे। आश्रम आगंतुकों के अनुरोध पर उन्हें रहने की सुविधा प्रदान करता है तथा यहां एक छोटा पुस्तकालय एवं संग्रहालय भी है।आश्रम परिसर में शामिल है: प्रमुख भवन जिसमें कार्यालय, एक प्रार्थना भवन, रसोईघर तथा भोजन कक्ष निचले तल में है एवं संयासियों का आवास दूसरी मंजिल पर है तथा यही पुस्तकालय भवन एवं अस्पताल आदि भी हैं। अधिकांश आकर्षणों की संबद्घता स्वरूपानंद एवं सेवियर दम्पत्ति की स्मृतियाँ यथा एक आराधना शिविर, एक झील, धर्मघर, सेवियर दंपत्ति का आवास आदि से ही है। धर्मघर ? जो चार किलो मीटर के घने जंगलों के अंत में स्थित है, जाते समय एक मार्गदर्शक का साथ होना उचित है।
यह आश्रम स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित बंगाल के बेलूर मठ की शाखा का एक केंद्र है। स्वामी विवेकानंद की इच्छानुसार मायावती आश्रम की स्थापना कैप्टन जेम्स हेनरी सेवियर  [James Henry Sevier- मृत्यु 28 October 1900]  James Henry Sevier was a non commissioned officer in the British army.Both he and his wife Charlotte Elizabeth Sevier had been seekers of spiritual knowledge. The very first time they met the Swami in private, the latteer addressed Mrs. Sevier as "mother" and appealed to her to come to India, where he promised that he would give them the best of his realizations.
एवं उनकी पत्नी शार्लोट सेवियर [Charlotte Sevier(1847-19 30)] द्वारा की गयी। सेवियर दम्पत्ति तथा स्वामी विवेकानंद के शिष्य स्वामी स्वरूपानन्द (Ajay Hari Bannerjee: 1871- 1906) (aged 34) ने मिलकर स्वामी विवेकानन्द  के इस सपने को साकार किया।
the Seviers established the Advaita Ashrama, the first monastic branch of the Ramakrishna Order in the Himalayas, dedicated to the contemplation of THE ONENESS OF ALL BEINGS. Here will be taught and practiced nothing but the Doctrine of Unity, pure and simple; and though in entire sympathy with all other systems, this Ashrama is dedicated to Advaita and Advaita alone.  
Many eminent persons visited the Advaita Ashrama. The list included Sister Nivedita, Sister Christine, Sir Jagadish Chandra Bose and his wife Lady Abala Bose, Chittaranjan Das, Nandalal Bose, Gertrude Emerson Sen, Josephine MacLeod, and Marie Louise Burke among others. Swami Vivekananda visited Mayavati on hearing the news of the demise of Captain Sevier from 3 to 18 January 1901.
[Charlotte Sevier (1847–1930), also known as Mrs. Sevier, was a direct disciple of Swami Vivekananda and was British in origin. She, together with her husband Captain James Henry Sevier, established the Advaita Ashrama in Mayavati, a branch of the Ramakrishna Order, in the Himalayas. the Seviers led an austere life together with four monks. Captain Sevier died on 28 October 1900 after suffering from urinary infection. Mrs. Sevier continued to live in Mayavati Ashrama.  She also assisted in the editing of the Prabuddha Bharat magazine and contributed towards compilation and editing of the Life of Swami Vivekananda by Eastern and Western Disciples. She also contributed in compiling the Complete Works of Swami Vivekananda. Mrs. Sevier also purchased land for Vivekananda Ashrama at Shyamla Tal.She contributed towards the Vivekananda Memorial Temple Fund to build a temple at the site of Swami Vivekananda's cremation.
The husband and wife both decided to become disciples of Swami Vivekananda and follow him to India. In 1896, the Seviers accompanied Swami Vivekananda to his travels in the continent of Europe, through Switzerland, Italy and Germany, esp. in the Alps. Seviers accompanied the Swami when the latter returned to India, after selling all their properties in England. They stayed in Almora in the Himalayas. 
स्वामी विवेकानन्द द्वारा १८ मार्च १८९९ में प्रबुद्ध भारत के सम्पादक स्वामी स्वरूपानन्द को अद्वैत आश्रम, मायावती, अल्मोड़ा, हिमालय आश्रम के संचालन के संबंध में प्रोस्पेक्ट्स या 'परिचय-पत्रिका' में छपवाने के लिये लिखित पत्र : 
मेरी प्रिय स्वरूपानन्द , मुझे कोई आपत्ति नहीं है कि श्रीमती सेवियर का नाम शीर्ष पर हो या मेरा या किसी और का;किन्तु 'प्रॉस्पेक्टस' या 'कर्तव्य विवरणिका' में प्रेषक के जगह पर सेवियर दंपत्ति का ही नाम रहना चाहिए।  यदि आवश्यक लगे तो  मेरा नाम भी दे सकते हो। मैं तुम्हें 'प्रॉस्पेक्टस' या 'कर्तव्य-विवरणिका' में छापने के लिए तुम्हारे विचारार्थ कुछ पंक्तियां भेज रहा हूं। बाकी ठीक हैं। मैं जल्द ही ड्राफ्ट डीड भेजूंगा। प्रॉस्पेक्टस के लिए लाइनें नीचे दी गई हैं।
                   [जन्मादि यस्य यतः] सम्पूर्ण ब्रह्मांड जिसके उदर में है, जो स्वयं ब्रह्मांड में जीव-जगत रूप से व्यक्त है, जो स्वयं विश्वरूप है; जिसके भीतर आत्मा का निवास है, जो स्वयं आत्मा के भीतर है,अर्थात जो मनुष्य की आत्मा है -उसे जान लेने से ; तथा उसके माध्यम से सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड को ही - अपनी आत्मा के रूप में जान लेने से; हमारे सारे भय सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं, समस्त दुखों का अंत हो जाता है; और वह अनुभूति ही हमें अनन्त स्वतंत्रता अर्थात 'आत्मनिर्भरता' (डीहिप्नोटाइज्ड अवस्था) की ओर अग्रसर करा देती है।
          जहाँ कहीं भी व्यक्ति या समुदाय के प्रति प्रेम का विकास तथा जनकल्याण-भावना में वृद्धि हुई है, वह इस इन्द्रियातीत (निरपेक्ष) शाश्वत सत्य- 'द वननेस ऑफ़ ऑल बीइंग्स' (THE ONENESS OF ALL BEINGS.) अर्थात 'समस्त प्राणियों में निहित एकात्मकता'  की अवधारणा एवं अनुभूति को प्रयोगात्मक रूप देने से ही प्राप्त हुई है।
 "डिपेन्डन्स इज मिज़री। इन्डिपेन्डन्स इज हैप्पीनेस।" 'पराधीन (मन का दास) बने रहना दुर्भाग्य है, आत्मनिर्भर हो जाना परम् सौभाग्य है !' (मन की गुलामी करते रहना-हिप्नोटाइज्ड अवस्था में रहना दुर्भाग्य (misery) है, मन की गुलामी से मुक्त हो जाना -'डीहिप्नोटाइज्ड' हो जाना, अर्थात'भेंड़त्व-भ्रम से मुक्त सिंह-शावक' हो जाना सौभाग्य (happiness) है !)
             [ गुरु-शिष्य अद्वैत परम्परा या 'विवेकानन्द-कैप्टन सेवियर अद्वैत वेदान्त शिक्षक प्रशिक्षण परम्परा'] अचिन्त्य-भेदाभेद अथवा अद्वैत दर्शन में 'BE AND MAKE' लीडरशिप ट्रेनिंग प्रणाली ही एकमात्र उपाय है जो मनुष्य को सम्पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर बना सकती है, जो मनुष्य को स्वयं पर (अपने मन पर) पूर्ण अधिकार प्रदान करती है। समस्त पराधीनता (मन का दासत्व) और इससे संबंधित मिथ्या-भ्रम (कुसंस्कार,सुपरस्टीशंस) को दूर करती है, और इस प्रकार हमें निर्भीकता के साथ-'Brave to Suffer'- अर्थात दुःख-कष्ट झेलने में समर्थ या 'महातेजा' बना देती है। और अन्ततोगत्वा हमें 'Absolute Freedom.' परम मुक्त अवस्था (मृत्युभय से मुक्त, भ्रममुक्त या डीहिप्नोटाइज्ड अवस्था) में प्रतिष्ठित करा देती है!
             ''समस्त प्राणियों में निहित एकात्मकता'  की अवधारणा एवं अनुभूति को प्रयोगात्मक रूप देने में असफल रहना ही वह कारण है, जिसके चलते उस 'श्रेष्ठ सत्य' (Noble Truth) या अद्वैत-तत्व का उपदेश देना- जो 'Dualistic Weakness' द्वैतवादी दुर्बलताओं के समायोजन से सम्पूर्णतया मुक्त हो, अभी तक सम्भव नहीं हो सका है। हम आश्वस्त हैं कि यही वह कारण है, जो यह व्याख्या करता है कि अद्वैतवाद अबतक 'Hitherto' सम्पूर्ण मानव जाति के लिए अधिक प्रभावी और उपयोगी क्यों नहीं हो सका है।
              वह सत्य (इन्द्रियातीत -निरपेक्ष सत्य) जो हमें सभी सीमाओं से मुक्त करता है, व्यक्ति और समुदाय के जीवन को उन्नततर कर देता है, तथा 'BE AND MAKE' आन्दोलन के साथ जुड़ जाने के लिये सम्पूर्ण मानवजाति को उत्प्रेरित करता है- उस 'ONE TRUTH' अद्वैत वस्तु (भगवान श्रीरामकृष्णदेव को, जो  द्वैतवादी दुर्बलताओं के समायोजन से सम्पूर्णतया मुक्त हैं- प्रदान करने के लिए हम उसी शुद्ध अद्वैत-सत्य की आदि स्फुरण-भूमि, हिमालय के शिखर -'The Land of its First Expiration.'  पर, इस 'अद्वैत आश्रम' की स्थापना कर रहे हैं। 
               यह आशा की जाती है कि यहाँ, अद्वैत दर्शन (सर्वधर्म समन्वयाचार्य श्रीरामकृष्णदेव के जितने मत उतने पथ' के सिद्धान्त) को समस्त द्वैतवादी दुर्बलताओं तथा मलिनताओं से मुक्त रखा जायेगा। अन्य समस्त मतवादों तथा अन्य अवतारों के प्रति पूर्ण सहानुभूति रखते हुए,यहाँ केवल अवतारवरिष्ठ भगवान श्रीरामकृष्णदेव द्वारा प्रदत्त शुद्ध और सरल 'अनेकता में एकता' ( Doctrine of Unity) के सिद्धांत का ही अभ्यास किया जायेगा तथा प्रशिक्षण दिया जायेगा; इसके अतिरिक्त (इस आश्रम में -युवा प्रशिक्षण शिविर में, ५ अभ्यासों के अतिरिक्त) और न कुछ सिखाया जायेगा, न व्यव्हार में लाया जायेगा। क्योंकि मायावती स्थित यह आश्रम एकमात्र अद्वैत और केवल अद्वैत को ही समर्पित है ! 
(हिन्दी विवेकानन्द साहित्य /खण्ड -९ / पृष्ठ -३१८ का पुनरानुवाद) 
---------------------
[Letter to Swami Swarupananda, editor of Prabuddha Bharata, Mayavati, on the way the Ashram was to be conducted:[March 1899/vol 4/page -435]
MY DEAR S, I have no objection whether Mrs. Sevier's name goes on top or mine or anybody else's; the Prospectus ought to go in the name of the Seviers, mustering my name also if necessary. I send you few lines for your consideration in the prospectus. The rest are all right.I will soon send the draft deed.The lines for the prospectus are given below.
In Whom is the Universe, Who is in the Universe, Who is the Universe; in Whom is the Soul, Who is in the Soul, Who is the Soul of Man; knowing Him — and therefore the Universe — as our Self, alone extinguishes all fear, brings an end to misery and leads to Infinite Freedom. 
Wherever there has been expansion in love or progress in well-being, of individuals or numbers, it has been through the perception, realisation, and the practicalisation of the Eternal Truth — THE ONENESS OF ALL BEINGS"Dependence is misery. Independence is happiness." 
The Advaita is the only system which gives unto man complete possession of himself, takes off all dependence and its associated superstitions, thus making us brave to suffer, brave to do, and in the long run attain to Absolute Freedom. 
Hitherto it has not been possible to preach this Noble Truth entirely free from the settings of dualistic weakness; this alone, we are convinced, explains why it has not been more operative and useful to mankind at large. 
To give this ONE TRUTH a freer and fuller scope in elevating the lives of individuals and leavening the mass of mankind, we start this Advaita Ashrama on the Himalayan heights, the land of its first expiration. 
Here it is hoped to keep Advaita free from all superstitions and weakening contaminations. Here will be taught and practiced nothing but the Doctrine of Unity, pure and simple; and though in entire sympathy with all other systems, this Ashrama is dedicated to Advaita and Advaita alone.
-------------------------
Captain Sevier died on 28 October 1900, while the Swami was out of India and the Captain was cremated in the nearby river Sarada, according to Hindu traditions as he wished. Swami Vivekananda visited the ashram from January 3-18 1901, primarily to console Mrs. Sevier. Where the Swami stayed has been turned into a library.Mrs. Sevier continued to live at the Ashram for several years.
http://www.vivekananda.net/HistoricalPreservation/MayavatiAshram.html
----------------------------
मृणालिनी बसु को लिखित पत्र 23 दिसम्बर 1898 हिन्दी खण्ड 7/ महामण्डल के लीडरशिप ट्रेनिंग में नेता को यही प्रशिक्षण दिया जाता है कि  " मुक्त करो ! लोगों के बन्धन खोल दो।"/ OUR PRESENT SOCIAL PROBLEMS /Volume 4/ page -488/ " I say, liberate, undo the shackles of people as much as you can. What glory is there in the renunciation of an eternal beggar? What virtue is there in the sense control of one devoid of sense-power?When you would be able to sacrifice all desire for happiness for the sake of society, then you would be the Buddha, then you would be free: that is far off."]  
----------------------------













                              






शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018

" हृदय में सोना दबा पड़ा है"ड्रिलिंग की पद्धति को मनःसंयोग कहते हैं।

 [1.5 मिनट] भारत के समस्त समस्याओं की एक दवा (Panacea) या सर्व रोग नाशक औषधी है,आत्मश्रद्धा 'Drilling पद्धति द्वारा 'विवेक-प्रयोग को ही वृत्ति (आँधी) बना लेना।     
                " हृदय में सोना दबा पड़ा है"- उसको निकालने की ड्रिलिंग प्रक्रिया (Drilling Process) या ड्रिलिंग की पद्धति को मनःसंयोग कहते हैं। अतः किसी भी प्रयोजनीय कार्य को कुशलता-पूर्वक सम्पन्न करने या किसी भी प्रयोजनीय विषय का ज्ञान अर्जित करने के लिए एकाग्रता के अभ्यास में सिद्ध  होना अर्थात ' मनः संयोग'  की 'विद्या' को सीख लेना अत्यन्त आवश्यक है। 'सा विद्या या विमुक्तये।' = वह विद्या कहाती है जो मुक्तिदायक होती है। कामिनी-कांचन में घोर आसक्ति रूपी 'वृत्ति' की 'आँधी' (सहज प्रवृत्ति या Instinct ) से पार होकर  हृदय में दबा सोना को ड्रिलिंग करके निकाल लेने के लिये 'मनः संयोग' की पद्धति (विवेक-प्रयोग शक्ति को ही वृत्ति की आँधी बना लेने की पद्धतिस्वयं सीखना और दूसरों को भी यह पद्धति सीखने में सहायता करना आधुनिक युग की सर्वोत्तम धार्मिक साधना  है। 
                  किन्तु 'गुरु-शिष्य वेदान्त शिक्षक-प्रशिक्षण परम्परा' (लीडरशिप ट्रेनिंग) में  मानवजाति के मार्गदर्शक नेता या माँ जगदम्बा से 'चपरास' प्राप्त कोई  'धारणासिद्ध-योगी' ( 'मनः संयोग' या एकाग्रता के अभ्यास में सिद्ध प्रशिक्षक) ही 'वुड बी लीडर्स' को विवेक-प्रयोग द्वारा अपनी वृत्ति को बुद्धि में; फिर बुद्धि को 'सहज-विवेक-सामर्थ्य' में परिणत करने का प्रशिक्षण दे सकता है!  (अर्थात खुली आँखों से ध्यान करने और 'मानवमात्र को शिव ज्ञान से देखने और उसकी सेवा करने का प्रशिक्षण दे सकता है! )  
 श्रीरामकृष्णवचनामृत (२४ अगस्त १८८२ ): श्रीरामकृष्ण का मुख सहास्य है। 'मास्टर' से कह रहे हैं - " ईश्वरचन्द्र विद्यासागर से और भी दो एक बार मिलने की आवश्यकता है। मूर्तिकार को जब मूर्ति गढ़नी होती है, तो वह पहले उसका एक खाका (blueprint) तैयार कर लेता है, फिर उस पर रंग चढ़ाता रहता है। प्रतिमा गढ़ने के लिये पहले दो तीन बार मिट्टी चढ़ाई जाती है, फिर सफेद रंग चढ़ाया जाता है, फिर वह ढंग से रंगी जाती है। विद्यासागर का सब कुछ ठीक है, सिर्फ ऊपर कुछ मिट्टी पड़ी हुई है। वह कुछ अच्छे काम (शिक्षा -समाज-सेवा आदि ) तो करता है, परन्तु स्वयं अपने हृदय में क्या है, इस बात की उसे कोई खबर नहीं है। हृदय में सोना दबा पड़ा है। हृदय में ही ईश्वर हैं यह जान लेने के बाद, सब कुछ छोड़कर व्याकुल हो उन्हें पुकारने की इच्छा होती है। "
             .... श्रीरामकृष्ण मास्टर से खड़े खड़े वार्तालाप कर रहे हैं, कभी बरामदे में टहल रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण : "हृदय (Heart) में क्या है इसका ज्ञान प्राप्त करने के लिये कुछ साधना आवश्यक है। (अन्तरे कि आछे जानबार जन्ये एकटू साधन चाई।)
मास्टर: 'साधना'  क्या बराबर करते ही रहना चाहिये ?
[अर्थात भ्रममुक्त होने या डीहिप्नोटाइज्ड होने की औषधि (विवेकदर्शन का अभ्यास और लालचत्याग) क्या ता-उम्र या आजीवन खानी पड़ेगी ?]
             श्रीरामकृष्ण : " नहीं, पहले कुछ कमर कसकर करनी चाहिये। फिर ज्यादा मेहनत नहीं उठानी पड़ती। जब तक जीवन नदी में ' हिलोरा (surge), चक्रवात (storm),आँधी चल रही होती है, और नौका नदी के तीखे मोड़ों से होकर गुजर रही होती है, तभी तक मल्लाह को मजबूती से पतवार पकड़नी पड़ती है।  उतने से पार हो जाने पर नहीं। जब वह मोड़ से बाहर हो गया और अनुकूल हवा चली तब वह आराम से बैठा रहता है, पतवार में हाथ भर लगाये रहता है। फिर तो पाल टाँगने का बंदोबस्त करके आराम से चिलम भरता है। 'कामिनी और कांचन' की आँधी (वृत्ति) से निकल (विवेक-प्रयोग-वृत्ति में)  जाने पर शान्ति मिलती है ! 
                " तराजू में किसी ओर कुछ रख देने से नीचे की सुई और ऊपर की सुई दोनों बराबर नहीं रहतीं। नीचे की सुई मन है और ऊपर की सुई ईश्वर। नीचे की सुई का ऊपर की सुई से एक होना ही योग है। (अर्थात 'मनः संयोग' है अर्थात एकाग्रता के अभ्यास में सिद्ध होना है (Proven in concentration practice !)
                "धारणा-सिद्ध योगियों का मन सदा ईश्वर में लगा रहता है --सदा आत्मस्थ रहता है। शून्य दृष्टि ( zero in on/गहराई से निशाने पर सधी हुई दृष्टि/ लक्ष्यवस्तु में तल्लीन दृष्टि/ লক্ষ্যবস্তুর দিকে তাক করা/কোনো কিছুর প্রতি মনোযোগ নিবদ্ধ করা) , देखते ही उनकी अवस्था सूचित हो जाती है । समझ में आ जाता है, कि चिड़िया अण्डे को से रही है। सारा मन अण्डे ही की ओर है, ऊपर दृष्टि तो नाममात्र की है। अच्छा, ऐसा चित्र (दी मदरबर्ड हैचिंग हर एग्स) क्या मुझे दिखा सकते हो ? " 
मणि- जैसी आज्ञा। चेष्टा करूँगा, यदि कहीं मिल जाय।"
-------------------------------
[2.5 मिनट:]   कार्य और ज्ञान क्या है ? 
मनः संयोग किये बिना अर्थात मन को एकाग्र किये बिना, हम न तो किसी प्रयोजनीय कार्य को अच्छी तरह कर सकते हैं, न किसी ज्ञातव्य विषय का सम्यक ज्ञान ही अर्जित कर सकते हैं। प्रातः काल में सूर्य उदित होता है,फूल खिल जाते हैं, नदी बहती जा रही हैं, बारिश से सूखी हुई मिट्टी गीली हो जाती है। ये सभी कार्य प्रकृति के नियमानुसार घटित होते रहते हैं। कुछ ऐसे कार्यों को भी घटित होते देखते हैं जिनमें प्रत्येक के पीछे मनुष्य की इच्छा, और प्रयत्न आवश्यक होता है। प्रत्येक मनुष्य को जीवन यापन करना होता है और उसके लिये सबका अर्थोपार्जन करना आवश्यक है। इसीलिये हम देखते हैं, कोई किसान खेत में हल चला रहा है, मछुआरा मछली पकड़ रहा है। कोई वैज्ञानिक किसी प्राकृतिक घटना पर मन को एकाग्र करके गहराई से विचार करने में लगा है, और न्यूटन की तरह किसी नये नियम या नये उदाहरण का आविष्कार कर रहा है! कोई खेल रहा है तो कोई पढ़ने में लगा हुआ है आदि-आदि। ये सब भी विभिन्न प्रकार के कार्य ही हैं ! 
 मन की कल्पनाओं को साकार रूप देना ही 'कार्य' है; तथा किसी भी कार्य को करने का सबसे बड़ा साधन मन ही है। जिस विषय या वस्तु के ऊपर कार्य किया जा रहा है, उसके रूप या स्थान में परिवर्तन हो जाता है। जैसे लकड़ी के तख्ते से कुर्सी का निर्माण हो गया, सूत से गमछा बन गया, धरती पर पड़े गोबर से जलाने वाला उपला बन गया, कोयले के चूरे से जलाऊ गोटे बन गये, हल चलाने से धरती खेती करने योग्य हो गयी आदि-आदि। इच्छाशक्ति , विवेक-प्रयोग द्वारा 'प्रयोजनीय कार्य' विषयक संकल्प लेने, चिंतन द्वारा उसका खाका (ब्लूप्रिन्ट) तैयार करने में जिस शक्ति का क्षय होता है उसे मानसिक शक्ति कहते हैं, जबकि काम करने में जो शक्ति लगती है वह शारीरिक शक्ति कहलाती है। 
ज्ञान क्या है ? ज्ञान का अर्थ है, (पूर्व में देखी-सुनी) वस्तुओं की साहचर्य प्राप्ति। अपनी आँखों से मैं जब कोई फूल, या कोई पक्षी,भूखे व्यक्ति, बिच्छू या बिल्ली को देखता हूँ; तो पहले साहचर्य के नियमानुसार उन्हें वगीकृत कर लेता हूँ , फिर आसानी से पहचान लेता हूँ। इस जगत में अनगिनत वस्तुएँ एवं विषय जानने योग्य हैं। अद्वैतवादी कहते हैं, ' नाम-रूप को अलग कर लेने पर क्या प्रत्येक वस्तु ब्रह्म नहीं है ? लघु (पिण्ड) से क्रमशः बृहद (ब्रह्म) का ज्ञान भी मन की शक्ति के द्वारा प्राप्त होता है। किसी विषय का ज्ञान प्राप्त करने के पहले 'मनःसंयोग' का ज्ञान प्राप्त करना ही सबसे ज्यादा जरुरी है।
[3.15 मिनट:] (i) मन क्या है (ii) बंदर का रूपक (iii) मन बनता कैसे है ? (iv) हमलोग जिसे 'मैं' कहते हैं, वह क्या है ? (v) मन का गुणस्वभाव (property, विशेष धर्म) (vi) 'अहं' को मिटा देना है, एक दाग के रूप में रखना है ? (vii) शिक्षा क्या है ?   
मन क्या है : मन एक ऐसा 'अद्भुत कम्प्यूटर' है, जो केवल सूचनाओं और संवादों को एकत्र करता है, बल्कि कई प्रकार से उनका विश्लेषण भी करता है, उन्हें वर्गीकृत कर उनकी व्याख्या करता है और उनमें से सार अर्थ ढूंढ़ निकालता है। यह एक ऐसा 'अद्भुत लेंस' है, जो एक साथ टेलिस्कोप (telescope,दूर-वीक्षणयंत्र) और माइक्रोस्कोप (Microscope,अणु -वीक्षणयंत्र) दोनों के सम्मिलित रूप जैसा कार्य करता है। फिर वही मन कल्पना करता है, इच्छा करता है, उद्यम भी करता है। वस्तुतः मन कि शक्ति के द्वारा ही हमलोग सब कुछ जानने और करने में समर्थ होते हैं। इस प्रकार मन की शक्ति अनन्त है। इतना सब कहने-सुनने पर भी हम मन को ठीक से समझ क्यों नहीं पाते हैं ? 
क्योंकि वह स्थूल नहीं एक सूक्ष्म पदार्थ है। इतना अधिक सूक्ष्म है कि उसे न तो देखा जा सकता है, और न उसे मुट्ठी में ही पकड़ा जा सकता है; तथापि मन के विषय  में हर कोई जानता है कि 'मन' है । वायु को तो हम देख भी नहीं सकते, फ़िर भी हम जानते है कि वह है। वृक्ष की पत्तियाँ या जल की सतह को हिलता हुआ देखकर हम समझ जाते हैं कि वायु प्रवाहित हो रही है। मन भी सूक्ष्म है- उसको आँखों से तो नहीं देख सकते, उसके कार्यो से समझा जा सकता है कि 'मन' है । वास्तव में मन हमारे इतने निकट है कि हम उसे देख ही नहीं पाते, किन्तु बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि मेरा 'मन' है। 
बन्दर का रूपक :  अत्यन्त चंचल है, प्रचण्ड गति से दौड़ता है। मन के दौड़ने/उड़ने की गति ध्वनि ही नहीं प्रकाश की गति से भी अधिक वेगवान है। सर्वदा विभिन्न प्रकार के विचारों, भावनाओ या कल्पनाओं के उधेड़-बुन में डूबा ही रहता है।   मनुष्य का मन उस बन्दर के ही सदृश्य है। मन तो स्वभावतः सतत चंचल है ही, फ़िर वह वासनारूप मदिरा से मत्त है।  इससे उसकी अथिरता बढ़ गयी है। जब वासना आकर मन पर अधिकार कर लेती है, तब सुखी लोगों को देखने पर इर्ष्या रूपी बिच्छू डंक मारता ही है, जिससे मन और तड़पने लगता है। (वह अतिरिक्त चंचल हो जाता है) उसके ऊपर भी जब अहंकार रूपी भूत मन पर सवार हो जाता है, तब तो वह अपने आगे किसी को नहीं गिनता। अहंकाररूपी भूत का क्या कहना, जो सर्वदा उस पर सवार रहता है। (मैं क्या कम हूँ? दिखा दूंगा) जरा विचार तो करो, इस प्रकार के मन वाले मनुष्य की दशा कैसी होती होगी ? और ऐसे मन को नियंत्रित करना कितना कठिन होगा ?
मन बनता कैसे है: मनवस्तु (Mind Stuff ) को, जिससे मन बनता है उसको - 'चित्त' कहते हैं ।मन की तुलना प्रायः किसी शान्त सरोवर से की जाती है। चित्त-सरोवर में पंचेंद्रियों के विषय रूपी कंकड़  गिरते रहते हैं,इसीसे वह सदैव उद्वेलित और दोलायमान बना रहता है। 'मन' का कार्य है प्रश्न करना। 'बुद्धि' का कार्य है निर्णय करना , जैसे ही बुद्धि ने निर्णय किया वैसे ही 'अहंकार' या मैं-पन आ जाता है। अंतःकरण के चार पार्ट हैं, 'चित्त-मन-बुद्धि और अहंकार'। अहंकार या 'अहं' भी आत्मा का ही अभिकरण (Agency) जिसके सहारे वह जगत-व्यवहार (नेता अथवा दैत्य विवेक? का कार्य) करता है। मन रूपी बंदर पर चढ़ा अहंकार का भूत (दैत्य )हमें कहीं खा नहीं जाय, इसके लिये कोई अन्य शिक्षा लेने के पहले मन को अपने वश में करने  की विद्या अवश्य सीखनी होगी।
हमलोग जिसे 'मैं' कहते हैं, वह क्या है ?  शरीर भी मेरा है, और मन भी मेरा ही है। अगर शरीर ही 'मैं' होता तो, तो हमलोग 'मेरा शरीर' क्यों कहते  ? अतः  हम सोचने पर बाध्य हो जाते हैं कि- ' मैं ', शरीर और मन के अतिरिक्त कुछ और ही वस्तु है। इसी 'मैं ' को हमारे देश में आत्मा  की संज्ञा दी गयी है। इनमें से आत्मा (ब्रह्म) ही हमारी वास्तविक सत्ता है। स्वामी जी (3H) - शरीर (Hand), मन (Head) और हृदय या आत्मा (Heart) कहते थे। इस शरीर और आत्मा के मध्य हमारा मन एक सेतु (Bridge) की तरह कार्य करता है।  इस स्थूल शरीर और समग्र जगत् को जानने, समझने और देखने के लिए मन मानो एक दिव्य चक्षु है जिसे हमारी आत्मा के समक्ष रख दिया गया है।  दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्।।11.8।। 
मन का गुणस्वभाव (property):मन को दोष देते हुए कहा जाता है कि, यह मन बन्दर के समान चंचल है, किन्तु मनुष्यों का मन यदि चंचल नहीं होता, सर्वदा स्थिर ही रहता, तो उसे भले और कुछ संज्ञा दी जा सकती थी पर उसे मन नहीं कहा जाता। पारा यदि ठोस होता, यदि उसमें गाढ़ापन, सांद्रता (viscosity) और विशिष्ट गुरुत्व (Specific gravity) आदि गुणस्वभाव  (property-विशेष धर्म) नहीं होते तो  थर्मामीटर (Thermometer, ताप-मापक यंत्र)  या बैरोमीटर (Barometer,वायुमंडलीय-दबाव  मापी यंत्र) कैसे बनता ? मनुष्य के दैनंदिन जीवन में प्रकृति द्वारा निर्मित रासायनिक धातु पारा का उपयोग करने के लिए यह गुण उसके आपेक्षिक गुरुत्व तथा सांद्रता का रहना आवश्यक था। उसी तरह हृदय में दबे सोना को ड्रिल करके निकालने की विद्या सीखने के लिये मन का गुणस्वभाव (property) चंचल और गति का प्रचण्ड रहना भी आवश्यक था।अतः मन की स्वाभाविक चंचलता और द्रुत-गतिशीलता उसके दोष नहीं, बल्कि विशिष्ट गुण-धर्म हैं ! हमें केवल 'विवेकानन्द-सिस्टर निवेदिता वेदान्त लीडर प्रशिक्षण परम्परा' में मनःसंयोग के अभ्यास द्वारा इच्छाशक्ति के 'उभयतोवहिनी -तीव्र प्रवाह' एकोन्मुखी बनाकर, उसका मोड़ घुमा देने की विद्या सीखना आवश्यक है।
'अहं' को मिटाना नहीं, एक दाग के रूप में रखना है:  (बरही के संदीप ने पूछा है)-" अगर कोई व्यक्ति अपने अहंकार को मिटाना चाहता है, तो वह अहंकार को कैसे मिटा सकता है? यह अहंकार या 'अहं' अन्तःकरण का एक पार्ट है, यह आत्मा के एक एजेंसी के रूप में सर्वदा साथ ही लगा रहता है। क्योंकि यह अहंकार दैवी माया (ब्रह्म की शक्ति) है; इसीलिये कभी मिटता  ही नहीं। शक्ति (माँ काली-भवतारिणी) की आराधना (दे माँ निज चरणों का ज्ञान ! की प्रार्थना) के द्वारा इस 'अहं रूपी वृत्ति' की आंधी (घोर-स्वार्थपरता) को, इच्छाशक्ति का विकास करके (पूर्णतः निःस्वार्थपरता) 'माँ का भक्त', वीर या हीरो के रूप में रूपान्तरित कर लेना आवश्यक है। और इसी कार्य को कुशलतापूर्वक सम्पन्न करने के लिये 'मनः संयोग' द्वारा [ मानसिक-व्यायाम अर्थात 'प्रत्याहार-धारणा अथवा विवेक-दर्शन अभ्यास का प्रशिक्षण' और स्वाध्याय रूपी पौष्टिक आहार  के द्वारा]  चेतना की वृत्ति (आँधी) को बुद्धि में, फिर विवेक-प्रयोग क्षमता को ही सहज-वृत्ति आँधी में परिणत करके 'इच्छाशक्ति' के 'उभयतो-मुखी' प्रवाह और विकास को नियंत्रण में लाना अनिवार्य है।
शिक्षा क्या है: धारणासिद्ध योगी स्वामी विवेकानन्द जी कहते हैं, " शिक्षा क्या है ? क्या वह पुस्तक विद्या है ? नहीं ! क्या वह नाना प्रकार का ज्ञान है ? नहीं ! जिस संयम के द्वारा इच्छाशक्ति के (उभयतोवहिनी) प्रवाह और विकास को वश में लाया जाता है (अर्थात उसे एकोन्मुखी बना लिया जाता है) और वह फलदायक होता है, वह शिक्षा कहलाती है। ... शिक्षा का अर्थ है उस पूर्णता को व्यक्त करना जो सब मनुष्यों में पहले से विद्यमान है।"  मन में केवल कल्याणकारी विचार (मनुष्य-निर्माणकारी और चरित्र-निर्माणकारी विचार) भरने होंगे। पवित्रता, धैर्य और अध्यवसाय (अटलता) (3P -'Purity, Patience, Perseverance ) ये सभी मन के गुण हैं, और सर्वोपरि है- हृदय - विकसित या 'मातृहृदय-स्थित 'प्रेम' (Love) ! प्रेम में वह शक्ति है कि वह पत्थर को भी पानी बना सकती है। इसीलिये स्वामी विवेकानन्द ने 'मन की एकाग्रता' को ही शिक्षा की आधारभूत सामग्री कहा है।
[4.5 मिनट] एकाग्रता (Convex lens) की सहायता से मन को विषयों से खींचकर हृदय में दबा सोना पर धारण करना। जीवन के खेल में हार-जीत। जीवन और जीवनपुष्प का प्रस्फुटन।   
अत्यन्त आवश्यक कार्य है प्रत्याहार: जैसे उन्नत ताल (Convex lens) की सहायता से सूर्य की किरणों को जब कागज पर केन्द्रीभूत किया जाता है, तब कागज जल जाता है। उसी तरह  मन की शक्ति की अदृश्य रश्मियों को अकारण चारों ओर बिखर कर नष्ट नहीं होने देकर, अर्थात   इन्द्रिय-विषयों से खींचकर उन्हें एकीकृत या संघटित करके अपने प्रयोजनीय विषय में नियोजित करने को ही मन की एकाग्रता (Concentration of Mind) या 'मनः संयोग' कहते है। प्रत्याहार के अभ्यास द्वारा मन की शक्ति-रश्मियों को एकोन्मुखी (Unidirectional) करके 'हृदय में दबा सोना' पर केन्द्रीभूत करते करते एक दिन १००० वर्षों से कमरे में भरा अँधेरा क्षणभर में प्रकाशित हो उठता है। अतः विवेक-प्रयोग के द्वारा प्रत्याहार के कौशल को सीखना ही सबसे आवश्यक कार्य है। 
जीवन के खेल में हार-जीत: मनुष्य जीवन की सार्थकता सबकुछ विवेक-प्रयोग और आत्मश्रद्धा को अपनी सहज प्रवृत्ति बना लेने पर ही निर्भर करता है।  अपनी यह कार्य बहुत कठिन है, किन्तु असम्भव नहीं है। मनुष्य के लिये कुछ भी करना असंभव  नहीं है, क्योंकि मनुष्य अनन्त शक्ति का अधिकारी है। हमारा पूरा जीवन भी एक महान खेल की तरह ही है। जीवन के इस खेल में विजयी होने से जिस आनन्द और गर्व की अनुभूति होती है, वैसा आनन्द क्या अन्यत्र कहीं उपलब्ध है ? जो  सही समय पर (युवा काल में ही) सही दाँव चलता है, वही विजयी होता है। यह निर्णय हमें स्वयं करना है कि क्या हम जीवन को व्यर्थ में (आहार,निद्रा,भय, मैथुन में) नष्ट होने देंगे ?  
जीवनपुष्प का प्रस्फुटन : एक अन्तर्निहित शक्ति मानो लगातार अपने स्वरूप में व्यक्त होने के लिए- अविराम चेष्टा कर रही है,और बाह्य परिवेश या परिस्थितियाँ उसको दबाये  रखने के लिए प्रयासरत है, बाहरी दबाव को हटा कर प्रस्फुटित हो जाने के इस प्रयत्न (महान-खेल) का नाम ही जीवन है। 
[5.10 मिनट] प्रारंभिक कार्य : ५ यम-५ नियम 24 X 7- " सुखार्थिनः कुतो विद्या विद्यार्थिनः कुतो सुखम्" 
कार्य मन की अतिरिक्त चंचलता को के द्वारा संयम में रखना।  कुछ गुणों (यम-नियम) को जानकर उन्हें सदैव याद रखना, तथा उन्हें अपने जीवन में (मन-वचन-कर्म)  धारण करने का अभ्यास निरंतर करते रहना आवश्यक है।  ' ईश्वर-प्रणिधान' ब्रह्म, ईश्वर, या उनके अवतार, जैसे- राम, कृष्ण, बुद्ध, यीशु, मोहम्मद, चैतन्य और श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द/ या किसी महापुरुष  में विश्वास रखते हुए उनका -स्मरण -मनन करने से मन सहजता से शांत और संयत हो जाता है।
[6.5 मिनट] चित्तवृत्ति निरोध का नुस्खा क्या है ? 
मन ही हमलोगों का सबसे अनमोल संसाधन (Most Precious Human Resources) है, ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान है। व्यासदेव मानो  ५००० वर्ष पहले ही  जानते थे कि एक दिन स्वामी विवेकानन्द का एक मार्गदर्शक नेता आएगा ! इसलिये मन की चंचलता और द्रुत गति की वृत्ति आँधी पर विजय-प्राप्ति  का नुस्खा दिया- दो बातों पर निर्भर है :  
                   " इति उभय अधीनः चित्तवृत्तिनिरोधः"  (i) 'विवेकदर्शनाभ्यासेन' यह दवा प्रतिदिन दो बार-ब्रह्ममुहूर्त में और गोधूलि बेला में।(ii) 'वासना और धन' के प्रति घोर आसक्ति या अत्यधिक लालच का  त्याग। ('विवेकदर्शनाभ्यासेन'-यह दवा 2 बार सुबह-शाम; तथा 'विवेक-प्रयोग' या 'Lust and Lucre' में आसक्ति का त्याग/ 'How much land a man needs ?' यह दवा 24 X 7 X 365/लेनी है। )  
            "चित्तनदी नाम उभयतो वाहिनी, वहति कल्याणाय वहति पापाय च" = चित्तरूपी नदी दो दिशाओं में (उभयतः /ऊपर -नीचे) प्रवाहित होती है, कल्याण के लिए बहती है और पाप के लिए भी बहती है।  
             "विवेकविषयनिम्ना सा चित्तनदी कल्याणाय वहति' (सा=वह) 'कैवल्यप्राग्भारा': कैवल्य (मुक्ति) की ओर ले जानेवाली विवेकयुक्त वह चित्तनदी की धारा कल्याण के लिए बहती है। अर्थात चित्तनदी की धारा की तली, या इच्छाशक्ति के प्रवाह और विकास के धारा की तली जब विवेकविषय-निम्ना बन जाती है, और विवेक-प्रयोग शक्ति ही जब सहज-प्रवृत्ति (Instinct,आँधी) बन जाती है, तब बुद्धि भी सहज रूप से (नश्वर) और पुरुष (शाश्वत) के बीच के अंतर को अनुभव करने की अनुमति देती है; इसीलिये वह धारा " कैवल्य" मुक्ति की ओर (भ्रममुक्त या डीहिप्नोटाइज्ड करने की ओर)  ले जानेवाली है और कल्याण-वहा है।              "अविवेकविषयनिम्ना सा पापाय वहति'-वह 'संसारप्राग्भारा" = संसार की ओर ले जाने वाली अविवेक से युक्त वह पाप के लिए बहती है। संसार या देहान्तर-गमन  (Transmigration) की ओर (अवनति की ओर) ले जाने वाली धारा पाप-वहा है।  
             "तत्र वैराग्येण विषयस्रोतः खिलीक्रियते "  = उस (तत्र) बाह्य वस्तुओं या 'विषयस्रोतः' अर्थात विषयस्रोत की ओर बहने वाली, इन्द्रिय विषयों (रूप, रस, गंध,शब्द,स्पर्श) की ओर बहने वाली धारा पर (वैराग्येण) वैराग्य का फाटक लगाकर, उस धारा  को मन्द बनाते हुए अर्थात 'वासना और धन में' घोर आसक्ति या लालच को कम करते हुए " खिलीक्रियते " अर्थात शक्तिहीन किया जाता है।
               "विवेकदर्शनाभ्यासेन विवेकस्रोत उद्घाट्यते।"= और तब  विवेक-दर्शन के नियमित अभ्यास द्वारा बुद्धि या चित्त-नदी के प्रवाह कल्याण की दिशा में मोड़ने का अभ्यास  करते-करते (शाश्वत-नश्वर विवेकशील ज्ञान पर चिंतन-मनन करते-करते) एक दिन चित्तवृत्ति निरुद्ध हो जाती है और विवेकस्रोत (विवेक-प्रयोग शक्ति का श्रोत अर्थात आत्मा या अपना सच्चिदानन्द स्वरुप 'ब्रह्म-स्वरूप') उद्घाटित हो जाती है। 
               "इत्युभयाधीनश्चित्तवृत्तिनिरोधः।  इति उभय अधीनः चित्तवृत्तिनिरोधः" = इस  प्रकार  चित्तवृत्तिनिरोधः -अर्थात  चित्त की स्वाभाविक चंचलता और बहिर्मुखी वृत्ति (आँधी) पर नियंत्रण, या विवेक-प्रयोग शक्ति को ही अपनी सहज-वृत्ति [Instinct] बना लेने का सामर्थ्य, १. विवेक-दर्शन का अभ्यास सुबह-शाम दो बार और २. 'वासना और धन' के प्रति Lust and Lucre) में घोर आसक्ति या अत्यधिक लालच का  त्याग How much land a man needs ?  इस कथा के चिंतन-मनन की दवा घंटे-घंटे के अंतराल से (24 X 7 X 365) लेने पर निर्भर करता है।                  
अब हमलोग ' मनः  संयोग ' के महत्व को जानकर मन ही मन निश्चित रूप से संकल्प ले रहे होंगे कि हम 'मनः संयोग ' अवश्य सीखेंगे और इसका अभ्यास किस तरह किया जाता है, इसकी भी  जानकारी प्राप्त करेंगे। 
[7.मिनट] सम्यक आसन:[अर्धपद्मासन,मेरुदण्ड सीधा रख कर बैठने से श्वास-प्रश्वास सहज,सुगन्धित-फूल या धूपबत्ती।] 
 'अर्धपद्मासन'  में बैठने से एक सुविधा और होता है कि कमर, मेरुदण्ड और ग्रीवा (गर्दन) को एक सीध में रहता है। कमर और रीढ़ की हड्डी (मेरुदण्ड ) को सीधा रख कर बैठने से श्वास-प्रश्वास सहज रूप में चलता रहता है। ऐसा न होने पर कुछ ही देर में थकावट का अनुभव होगा, और मन उसी ओर चला जायेगा। सुगन्धित-फूल या धूपबत्ती कि भीनी-भीनी सुगन्ध यदि नासिका तक आती रहे तो अच्छा है।शब्द, गीत या बातचीत आदि सुनाई पड़ सकती है। इन्हें रोकने का कोई उपाय तो नहीं है, फिर मैं इतना कर सकता हूँ कि उस ओर मन को नहीं जाने दूंगा ! 
[8.3 मिनट] प्रत्याहार (i) 'मन को देखना'।  प्रत्याहार (ii) 'मन को आदेश देना।' 
 मन को देखना: 'मन की यह दोहरी विद्यमानता' (Double Presence of Mind) शक्ति से : अर्धपद्मासन में बैठ जाने के बाद, इसी प्रकार द्रष्टा-मन या व्यक्तिपरक मन (Subjective Mind) की सहायता से दृश्य-मन या विषयाश्रित मन (Objective Mind) की गतिविधियों को थोड़ी देर तक पर्यवेक्षण करना है। परन्तु मन के जैसी सूक्ष्म, दूसरी कोई सूक्ष्म वस्तु तो है ही नहीं।  इसीलिये मन को मन के द्वारा ही देखना पड़ता है। शुरू -शुरू में यह सुनकर विस्मय होना स्वाभाविक है कि 'मन की यह दोहरी विद्यमानता' (Double Presence of Mind) कैसे संभव है ? किन्तु जाने-अनजाने हमलोग प्रायः यही तो सदैव करते रहते हैं।  जब अकस्मात हमारी तंद्रा टूटती है, तब हम स्वयं अवाक् होकर सोचने लगते हैं कि अरे ! क्या मैं ही इतनी देर से इस विषय पर चिन्तन कर रहा था ? 
मन को आदेश देना: मन पर धीरे धीरे विवेक-अंकुश का प्रयोग करना होगा। उससे कहना होगा -  नहीं अब तुम्हें पहले जैसा इधर-उधर दौड़ने नहीं दिया जायगा। [यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः।-पंचतंत्र] 
[9.मिनट] मनः संयोग,'Concentration' धारणा (i) मन को एकमुखी बना कर हृदय में धारण करने के लिये पवित्र मूर्त-आदर्श का चयन। धारणा (ii)-तल्लीनता (Engrossment)  धारणा (iii) तल्लीनता-परीक्षा और परिणाम। 'मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।' 'या मति सा गतिर्भवेत।'  
धारणा (i) पवित्र मूर्त-आदर्श का चयन: 'साहचर्य का नियम' (Law of Association) के अनुसार ऐसे मूर्त आदर्श पर मन को बैठना ज्यादा अच्छा होता है जिस पर हमारे मन में स्वाभाविक रूप से श्रद्धा-भक्ति हो।भारत सरकार द्वारा घोषित युवा-आदर्श स्वामी विवेकानन्द  या अन्य किसी पवित्र प्रतीक  'ॐ' (या 786/ पवित्र काबा) जिन्हें हम पवित्रता स्वरूप या प्रेम-स्वरूप मानकर 'श्रद्धा-भक्ति के साथ पूजने योग्य  या परिक्रमा करने योग्य मानते हैं। प्रत्याहार और धारणा के अभ्यास को मन का व्यायाम भी कहा जा सकता है। "धारणा सिद्ध व्यक्ति की पहचान यह है कि उसकी निगाहें स्थिर रहती है। ऐसे चित्त की शक्ति बढ़ जाती है, फिर वह जो भी सोचता है वह घटित होने लगता है।
 मन को अन्य विषयों से हटाते हुए, एक विशेष 'ध्येय-वस्तु' या विषय की ओर स्थिर करने को ही धारणा  या एकाग्रता कहते हैं।  किन्तु यह ध्येय (ध्यान का विषय) क्या हो ? मनः संयोग का अर्थ है मात्र मनमाने ढंग से किसी भी व्यक्ति या विषय के चिंतन में तल्लीन (engrossed) हो जाना (जैसे शकुंतला दुष्यंत की याद में इतनी लीन हो गयी थी कि उसे दुर्वासा ऋषि के पधारने का पता ही नहीं चला ....) नहीं है! मनोविज्ञान के 'साहचर्य का नियम' (Law of Association) के अनुसार उस आदर्श के सदगुणों (पवित्रता और प्रेम) का विचार भी हमारी कल्पना में आने लगते हैं। इसलिये किसी मूर्त-आदर्श पर मन को केन्द्रीभूत करना अधिक श्रेयस्कर होता है। किसी ऐसे मूर्त आदर्श पर मन को बैठना ज्यादा अच्छा होता है जिस पर हमारे मन में स्वाभाविक रूप से श्रद्धा-भक्ति हो। भारत सरकार द्वारा घोषित युवा-आदर्श स्वामी विवेकानन्द की मूर्ति या जीवन्त छवि हमारे लिये एक अत्यन्त प्रेरणादायी आदर्श हो सकती है। जितना उनका धारणा-ध्यान सिद्ध था वैसा ही कर्म भी था। वे चरित्र के सभी गुणों के वे मूर्तरूप लगते हैं।उनकी छवि पर मनः संयोग का अभ्यास करने से- अर्थात 'विवेक-दर्शन' का अभ्यास करने से हममें भी इसी प्रकार का आत्मविश्वास पैदा होगा। उन्होंने कहा है-" मनुष्य सब कुछ कर सकता है, मनुष्य के लिए असंभव कुछ भी नहीं है।"वे मानव-मानव के बीच जाति या धर्म के आधार पर किसी प्रकार का भेद नहीं देखते थे। कोई चाहे तो अपने मन को दीपक की लौ पर, दीवार पर वृत्त बनाकर उसके केन्द्र पर, या अन्य किसी पवित्र प्रतीक  'ॐ' (या 786/ पवित्र काबा) पर भी मन को लगाने का प्रयत्न-तल्लीन करने का प्रयत्न कर सकते हैं। किन्तु किसी ऐसे देवी-देवताओं, महापुरुष या इष्ट की मूर्ति या चित्र पर मन को केन्द्रीभूत करना अधिक सहज होता है, जिन्हें हम पवित्रता स्वरूप या प्रेम-स्वरूप मानकर श्रद्धा-भक्ति के साथ पूजने योग्य (या परिक्रमा करने योग्य) मानते हैं। 
धारणा (ii):तल्लीनता (Engrossment) किन्तु वैसी नहीं जैसे शकुंतला दुष्यंत की याद में इतनी लीन हो गयी थी कि उसे दुर्वासा ऋषि के पधारने का पता ही नहीं चला ....।  'धारणा' के अभ्यास को -अर्थात बार बार मन को इन्द्रियविषयों से खींच कर,थोड़ी देर तक पूर्व-निर्धारित मूर्त आदर्श में तल्लीन रखने की चेष्टा- प्रत्याहार और धारणा के अभ्यास को मन का व्यायाम भी कहा जा सकता है। जिस प्रकार शरीर को शक्तिशाली बनाने के लिये  पौष्टिक आहार होते हैं, उसी प्रकार मन को भी शक्तिशाली बनाने का आहार होता है। निरंतर पवित्र विचार या शुभ-संकल्प से मन को भरे रखना वह मानसिक पुष्टि है, जो  मन को हृष्ट-पुष्ट बनाये रखता है।इस प्रकार मनः संयोग का अभ्यास करने से कोई भी व्यक्ति इसी जीवन में यथार्थ सुख, शान्ति और आनन्द का अधिकारी बन सकता है। प्रतिदिन दो बार, प्रातः और संध्या में 'विवेक-दर्शन' का अभ्यास करते रहने से धीरे-धीरे अपनी इच्छानुसार मन को किसी भी वस्तु या विषय पर एकाग्र किये रखने की क्षमता बढ़ती जाती है। "धारणा सिद्ध व्यक्ति की पहचान यह है कि उसकी निगाहें स्थिर रहती है। ऐसे चित्त की शक्ति (इच्छाशक्ति) बढ़ जाती है, फिर वह जो भी सोचता है वह घटित होने लगता है।  
धारणा (iii) परीक्षा और परिणाम:  हम यह कैसे जानेंगे कि मन की दृष्टि उसी ध्येय वस्तु (आराध्य-आदर्श) पर पड़ रही है? इसकी पहचान यही है कि मन जब किसी वस्तु पर पुर्णतः एकाग्र रहता है, या तल्लीन (engrossed) हो जाता है, तो उस समय मन में अन्य कोई विचार उठता ही नहीं है।अभी आँखों से विवेक-दर्शन का अभ्यास कर रहा हूँ, या विवेकानन्द की छवि पर मनःसंयोग कर रहा हूँ। जब तक यह विचार मन में रहता है कि मैं विवेक-दर्शन कर रहा हूँ, तब तक यह समझना चाहिए कि मन अपने आराध्य-देव का दर्शन करने में ही लगा हुआ है। इसका अर्थ यह हुआ कि नेत्रों कि दृष्टि जिस वस्तु पर पड़ रही है, मन की दृष्टि भी उसी वस्तु के ऊपर केन्द्रीभूत है। 
तल्लीनता की परीक्षा यह है कि उस समय प्रयोजनीय कार्य, लक्ष्य के सिवा मन में अन्य कोई विचार उठता ही नहीं है। धारणा सिद्ध व्यक्ति की पहचान यह है कि उसकी निगाहें स्थिर रहती है। ऐसे चित्त की शक्ति (इच्छाशक्ति) बढ़ जाती है, फिर वह जो भी सोचता है वह घटित होने लगता है। 
ठाकुर कहते हैं - "धारणा-सिद्ध योगियों का मन सदा ईश्वर में लगा रहता है --सदा आत्मस्थ रहता है। शून्य दृष्टि ( zero in on/गहराई से निशाने पर सधी हुई दृष्टि/ लक्ष्यवस्तु में तल्लीन दृष्टि/ লক্ষ্যবস্তুর দিকে তাক করা/কোনো কিছুর প্রতি মনোযোগ নিবদ্ধ করা) , देखते ही उनकी अवस्था सूचित हो जाती है । समझ में आ जाता है, कि चिड़िया अण्डे को से रही है। सारा मन अण्डे ही की ओर है, ऊपर दृष्टि तो नाममात्र की है। अच्छा, ऐसा चित्र (दी मदरबर्ड हैचिंग हर एग्स) क्या मुझे दिखा सकते हो ?" "एक विचार लो, उस विचार को अपना जीवन बना लो - उसके बारे में सोचो उसके सपने देखो, उस विचार को जीओ। अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, नसों, शरीर के हर हिस्से को उस विचार में डूब जाने दो, और बाकी सभी विचार को किनारे रख दो। यही सिद्ध होने का तरीका है।
"एक विचार लो, उस विचार को अपना जीवन बना लो - उसके बारे में सोचो उसके सपने देखो, उस विचार को जीओ। अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, नसों, शरीर के हर हिस्से को उस विचार में डूब जाने दो, और बाकी सभी विचार को किनारे रख दो। यही सिद्ध होने का तरीका है।"
" जब मनुष्य अपने मन का विश्लेषण करते करते ऐसी एक वस्तु के साक्षात् दर्शन कर लेता है, जिसका किसी काल में नाश नहीं, जो स्वरूपतः नित्य-पूर्ण और नित्य-शुद्ध है, तब उसको फ़िर दुःख नहीं रह जाता, उसका सारा विषाद न जाने कहाँ गायब हो जाता है। भय और अपूर्ण वासना ही समस्त दुखों का मूल है। पूर्वोक्त अवस्था के प्राप्त होने पर मनुष्य समझ जाता है कि उसकी मृत्यु किसी काल में नहीं है, तब उसे फ़िर मृत्यु-भय नहीं रह जाता। अपने को पूर्ण समझ सकने पर असार वासनाएं फ़िर नहीं रहतीं। पूर्वोक्त कारणद्वय का आभाव हो जाने पर फ़िर कोई दुःख नहीं रह जाता। उसकी जगह इसी देह में परमानन्द की प्राप्ति हो जाती है।"(१:४० ) "  ---स्वामी विवेकानन्द 
[102 मिनट] सीपियों की तरह होना होगा : 'Be' like the Shells:
 विवेकानन्द जी कहते हैं - भारतवर्ष में एक सुंदर किंवदन्ती प्रचलित है। वह यह कि आकाश में स्वाति नक्षत्र के तुन्गस्थ रहते यदि पानी गिरे और उसकी एक बूंद किसी सीपी में चली जाय, तो उसका मोती बन जाता है। सीपियों को यह बात मालूम है। अतएव जब वह नक्षत्र उदित होता है, तो वे सीपियाँ पानी की ऊपरी सतह पर आ जाती हैं, और उस समय की एक अनमोल बूंद की प्रतीक्षा करती रहती है।ज्यों ही एक बूंद पानी उनके पेट में जाता है, त्यों ही उस जलकण को लेकर मुंह बन्द करके वे समुद्र के अथाह गर्भ में चली जाती हैं और  वहाँ बड़े धैर्य के साथ उनसे मोती तैयार करने के प्रयत्न में लग जाती हैं।"
हमें भी उन्हीं सीपियों की तरह होना होगा। पहले सुनना होगा, फ़िर समझना होगा, अन्त में बाहरी संसार से दृष्टि हटाकर, सब प्रकार की विक्षेपकारी बातों से दूर रहकर हमें अन्तर्निहित सत्य-तत्त्व के विकास के लिए प्रयत्न करना होगा।
[11.2 मिनट] प्रैक्टिकल-' हृदय में सोना दबा पड़ा है ' उसको निकालने की ड्रिलिंग प्रक्रिया (Drilling Process):अभी जो कुछ सुना है, उन्हीं बातों पर २ मिनट मन को एकाग्र कर के देखो। 
---------------------------------------------
'Two- Day Inter-District Youth Training Camp' of ABVYM arranged by Hazaribag Vivekananda Yuva Pathchakra, at Gautam Buddha Private ITI, Hazaribag, Jharkhand from 14 April evening to 15 April afternoon 1018 .Before the camp started Sri Ajay Pandeya conducted a meeting to distribute duties .   
: Saturday Evening to Sunday Afternoon [दो दिवसीय अन्तर्जिला युवा प्रशिक्षण कैंप: शनिवार शाम से रविवार दोपहर] 
Saturday Evening Program (शनिवार का कार्यक्रम):  
4:00                                : Reporting at Camp site 
5:45                                : Flag Hoisting (Srimat Swami Bhaveshananda,                                                 Secretary,Ramakrishna Mission Ashrama,                                                        Morabadi, Ranchi.)                                                                                                                               
6:00 - 6:10                      : Auditorium prayer (सभागार प्रार्थना-मूर्तमहेश्वर)
6:10 - 6:20                      : Welcome Address  (स्वागत सम्बोधन-Sri Ghjananda                                                                                    Pathak)
6:20 - 6:50                      : Aims and Objectives of Mahamandal                                                        (महामण्डल  का  उद्देश्य और कार्यक्रम : सर्वरोगनाशक औषधि :                                              विवेक-प्रयोग द्वारा आत्मश्रद्धा का जागरण! श्री रामचन्द्र मिश्र।,                                                  उपाध्यक्ष, झुमरीतिलैया विवेकानन्द युवा महामण्डल।)                                                         
6:50 - 7:50                       : Inaugural Speech 
                                              (3H or 4H ? विकास द्वारा मनुष्य-                                                                              निर्माणकारी शिक्षा, Swami Bhaveshananda)
7:50 - 8:10                        : Address by Central Camp Observer (Sri                                                        Arunabh Sen Gupta , Kalyani (W.B)
8:10 - 8:30                        : Patriotic and Youth Inspiring Song (Sri                                                        Subodh Dubey)
8:30 - 8:45                        : Instruction by Camp Commandant ( Sri                                                            Subodh Pnadit  शिविर कमांडेंट द्वारा निर्देश) 
9:00                                   : Dinner (रात्रिभोज )   
10:30                                  : Go to bed  
10:35                                   : switch off 
-------------------------------------------------------


Sunday Program

04:40                                    : Waking up /Chanting 
05:40                                    : Flag Hoisting  
05:50                                     : Prayer (सभागार प्रार्थना : विश्वस्यधाता) 
06:00 -6:58                           : Mental Concentration [Theory] (Sri Bijay                                                      Singh- मनः संयोग विद्या" )
[1.सारे रोगों की एक दवा, आत्मश्रद्धा-हृदय में सोना दबा पड़ा है, विवेक-प्रयोग ड्रिलिंग- 05 मिनट] 
2.कार्य और ज्ञान क्या है ?-05 मिनट ] 
3.(i) मन क्या है (ii) बंदर का रूपक (iii) मन बनता कैसे है ? (iv) हमलोग जिसे 'मैं' कहते हैं, वह क्या है ? (v) मन का गुणस्वभाव (property, विशेष धर्म) (vi) 'अहं' को मिटा देना है, एक दाग के रूप में रखना है ? (vii) शिक्षा क्या है ? -15 मिनट] 
4. एकाग्रता (Convex lens) की सहायता से मन को विषयों से खींचकर हृदय में दबा सोना पर धारण करना। जीवन के खेल में हार-जीत। अत्यन्त आवश्यक कार्य जीवन और जीवनपुष्प का प्रस्फुटन-05 मिनट] 
5.प्रारंभिक कार्य :यम नियम 24 X 7- " सुखार्थिनः कुतो विद्या विद्यार्थिनः कुतो सुखम्-05 मिनट ] 6. चित्तवृत्ति निरोध का नुस्खा-इति उभय अधीनः चित्तवृत्तिनिरोधः -08 मिनट ] 
7. सम्यक आसन -02 मिनट ]
8. प्रत्याहार (i) 'मन को देखना'।  प्रत्याहार (ii) 'मन को आदेश देना।' -05 मिनट ] 
9. धारणा (i) मन को एकमुखी बना कर हृदय में धारण करने के लिये पवित्र मूर्त-आदर्श का चयन। धारणा (ii) तल्लीनता (Engrossment) धारणा (iii) तल्लीनता-परीक्षा और परिणाम। 'मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।' 'या मति सा गतिर्भवेत।'05 मिनट]
10.'Be' like the Shells: 02 मिनट सीपियों की तरह होना।  
6:58 - 7:00                            : Mental Concentration [Practical :" मनः संयोग                                                   विद्या: प्रयोगात्मक-कक्षा " 
[Mental Concentration " Theory + Practical"  Total Time Required 58+2=60 मिनट।मनः संयोग विद्या : सिद्धान्त-कक्षा एवं  प्रयोगात्मक-कक्षा के लिए कुल अपेक्षित समय - 58+2 =60 मिनट।]  
07:00-7:05                            : Jay Jay Ramakrishna 
07:10 -7:40                           : Physical Fitness ( Sri Jayprakash Mehta) 
07:40 -8:30                           : Break Fast 
08:30 - 8:40                          : Mahamandal Song 
08:40- 9:20                           : Character Building [part -I]                                                                               (Sri Dharemendra  Singh)                         09:20 -10:00                          : Take up the Challenge, [Character Building                                                     part -II- Sri Apurva Das संकल्प उठाना]
10:00 - 10:05                          : Mahamandal Song 
10:05 - 10:35                         : Quiz & Quizmaster : [Sri Ajay Agarwal :on 
                                                 Atmshraddha, Vivek, Habit, Yama-Niyma                                                         Propensity, Prtyahar, Dharna.
                                                 कूटप्रश्न तथा कूटप्रश्न-कर्ता: आत्मश्रद्धा, 'जवानी क्या जो                                                       रोया नहीं बुढ़ापा क्या जो हँसा नहीं ! मन और अहं,आदत-                                                     प्रवृत्ति-चरित्र, वृत्ति-बुद्धि-विवेक,यम-नियम,प्रत्याहार,धारणा       
10:35 -10:40                            :Announcement [Camp Commandant] 
10:40                                       :Bathing and Lunch 
01:00 -01:10                            :Mahamandal Song 
01:10 -01:50                            :Character Qualities (Sri Pintu Kumar) 
01:50 -02:40                            :Question & Answer (Sri Bijay Singh)
02:40 -03:10                            :Camp Experience (Sri Jayprakash Mehta) 
03:10                                       :Flag Down 
---------------------------------------

Two-day Vizag (Visakhapatnam) Interstate Preparatory Youth Training Camp of ABVYM:
दो दिवसीय विजाग (विशाखापत्तनम) अंतरराज्यीय तैयारी युवा प्रशिक्षण शिविर: लक्ष्मीनारायण से बात करके शिविर तिथि का निर्धारण, वेन्यू,सभी आगंतुक शिविरार्थियों तथा भावप्रचार के लोगों को भी शनिवार संध्या ४ बजे तक रेजिस्ट्रेशन करवा लेना होगा। हज़ारीबाग़ शिविर के सभी वक्ताओं को अपना अपना विषय 'मोदी -अंग्रेजी' में बोलने का अभ्यास करके जाना होगा। इन्दौर,देवास, मंगलिया, छत्तीसगढ़, नागपुर, जयपुर, दिल्ली, जामनगर,बड़ौदा तथा समस्त राज्यों के प्रतिनिधियों को निमंत्रण भेजना है ,  मुख्य अतिथि-वेंकट महाराज, से ऐड्रेस पूछकर 'आन्ध्रा, केरला, तमिलनाडु, बैंगलोर' के रामकृष्ण मिशन में कैम्प का ऐप्लिकेशन फॉर्म भेजना है। साथ झुमरीतिलैया, जानीबीघा, फुलवरिया, हजारीबाग, बरही,जमशेदपुर, बहरागोड़ा, राँची, उड़ीसा,का पूरा टीम जायेगा।