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सोमवार, 13 नवंबर 2017

$$$ अन्तः प्रकृति का विजेता ही सच्चा हीरो (वीरपुरुष) होता है !

अन्तर्निहित ब्रह्मभाव को अभिव्यक्त करो, और मुक्त हो जाओ ! 
अन्तः प्रकति (Inherent nature,जन्मजात प्रकृति) पर विजय प्राप्त करने में सफल मनुष्य ही 'सच्चा हीरो-वीरपुरुष' होता है ! मानव-सभ्यता का इतिहास प्रकृति के विरुद्ध संग्राम करने वाले वीरों का इतिहास है। प्रकृति दो प्रकार की होती है- अन्तः प्रकृति (Internal Nature-काम-क्रोध-लोभ-मद-मोह आदि भीतरी स्वभाव) एवं बाह्य प्रकृति (External nature)। विश्व में जितनी भी प्रगति हुई है, मनुष्य जाति ने जो भी कीर्तिमान स्थापित किया है; वह सब प्रकृति के ऊपर विजय प्राप्त करने से ही हुई है। प्रकृति का अनुसरण करने वाला, अथवा मन की गुलामी करने वाला कोई भी मनुष्य कभी सेलेब्रिटी (ख्याति-प्राप्त व्यक्ति-Celebrity) नहीं बन सकता। 
इसीलिये स्वामी विवेकानन्द जी युवाओं को अन्तः प्रकृति और बाह्य प्रकृति के विरुद्ध संग्राम करने का 
आह्वान करते हुए कहते हैं- " प्रत्येक आत्मा अव्यक्त (संभावित) ब्रह्म है। बाह्य एवं अन्तःप्रकृति को वशीभूत करके इस ब्रह्मभाव को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है। कर्म, उपासना, मनःसंयम अथवा ज्ञान, इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर अपना ब्रह्मभाव व्यक्त करो -और मुक्त हो जाओ ! बस, यही धर्म का सर्वस्व है। मत (ism), अनुष्ठान-पद्धति, मन्दिर अथवा अन्य बाह्य क्रिया-कलाप तो उसके सेकेंडरी डिटेल्स मात्र हैं। " 
 'तुम दोनों प्रकृति पर विजय प्राप्त करो और हीरो (वीर) बनो; आज तुम्हारे देश को ऐसे ही वीरपुरुषों की आवश्यकता है।' किन्तु इस संग्राम का प्रारम्भ,हमें अपनी अन्तःप्रकति के ऊपर विजय प्राप्त करने के द्वारा 'Victory on Intra-type Nature ' द्वारा ही करना होगा। स्वामीजी के कहने का तात्पर्य यही है कि ईश्वर के अनुग्रह से अभी हमें केवल मनुष्य का शरीर भर ही प्राप्त हुआ है, किन्तु वास्तविक 'मनुष्य' तो बनना पड़ता है। अभी तो केवल हमारा ढांचा ही मनुष्य का है, भीतर में जन्मजात पाशविक प्रवृत्तियां भरी हुई हैं। हमारे शास्त्रों में कहा गया है -
येषां न विद्या, न तपो, न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः । 
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ।। 
जो व्यक्ति उस विद्या को प्राप्त करने के लिये, जो विद्या मनुष्यों को मुक्त कर देती, विनय प्रदान करती है, प्रयत्न नहीं करते। न तप करते हैं, न दान देते हैं, न ज्ञान के लिये यत्न करते हैं, न शील हैं और न ही जिनमें और कोई चारित्रिक-गुण हैं, न धर्म है (सही आचरण है), ऍसे लोग मृत्युलोक में इस धरती पर बोझ ही हैं, मनुष्य रुप में वे वास्तव में जानवर ही हैं । (विवेक-प्रयोग आदि ५ अभ्यासों के द्वारा)  अन्तः प्रकृति पर विजय प्राप्त करके स्वयं को एक 'यथार्थ मनुष्य',  वीर पुरुष या हीरो के रूप में प्रतिष्ठित कर लेने का जो वैशिष्ट्य  एकमात्र मनुष्य को ही वैशिष्ट्य प्राप्त है, उसी को 'धर्म' (मानवोचित वर्णाश्रम धर्म या कर्तव्य) कहते हैं।    
उसी मुक्त कर देने वाली विद्या (मोक्ष या डीहिप्नोटाइज्ड कर देने वाली विद्या) की तरफ संकेत करते हुए स्वामी जी कहते हैं, उपरोक्त चार प्रकार के उपायों द्वारा, सर्वपर्थम अपने अन्तः प्रकृति को जीत कर, अपने अन्तर्निहित ब्रह्मभाव को अभिव्यक्त करो, और मुक्त हो जाओ ! हमें ब्रह्मवेत्ता मनुष्य बनना होगा - क्योंकि ब्रह्मविद् मनुष्य ब्रह्म ही हो जाता है ! इसीको धर्म कहते हैं।  जीवन में पशु से मनुष्य और मनुष्य को ईश्वर में उन्नत कर देने वाले 'धर्म' का उपस्थित रहना भी परमावश्यक है। हमें अपने जीवन और आचरण से भी यह प्रमाणित करना पड़ेगा कि हम मनुष्य हैं-पशु नहीं हैं। हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है -  
आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् । 
धर्मो हि तेषामधिको विशेष: धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥
अर्थात आहार निद्रा भय और वंश-विस्तार की चेष्टा सभी प्राणियों मे समान रूप से पाये जाते हैं। मनुष्य शरीर में जन्म लेने का वैशिष्ट्य- धर्म का पालन करने में है। ' धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः' --यदि हमलोग धर्म का पालन न कर सकें, तो भले ही हमारा ढाँचा मनुष्य का हो, किन्तु ' मनुष्य' कहलाने के लायक नहीं होंगे। 

किन्तु धर्म क्या है ? एक बार (२००५ सरीसा आश्रम में) पूज्य नवनीदा ने कहा था, यदि एक लाख लोगों में से कोई एक व्यक्ति भी यह बता दे, कि धर्म क्या है -तो बहुत समझना होगा ! अँगरेज़ी में जो 'रिलीजन' है, वह हिन्दी में क्या है—धर्म कि पंथ? धर्म को ठीक प्रकार से समझने के लिये पहले हमें इस बात पर विचार करना होगा, कि क्या भारत एक पन्थ-निरपेक्ष राष्ट्र है या धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र हैं ? भारत में अब २६नवम्बर को भी २६जनवरी के जितना महत्वपूर्ण क्यों माना जा रहा है ?  किन्तु ऐतिहासिक रूप से भारत में 'सर्वधर्म-समन्वय' और वैचारिक एवं दार्शनिक स्वतन्त्रता तो अनादी काल से चली आ रही है। इसीलिये हमारे संविधान निर्माताओं ने भारतीय संविधान की मूल पूर्वपीठिका (preamble) में 'सेक्युलर' शब्द नहीं लिखा था। किन्तु सन १९७६ में इमरजेंसी लगाकर  ४२वें संविधान संसोधन किया गया और 'सेक्युलर' शब्द जोड़ दिया गया। इसका अर्थ होता है- 'पंथ-निरपेक्ष', 'धर्म-निरपेक्ष' नहीं।  क्योंकि धर्म के बिना या चरित्र के बिना तो मनुष्य केवल पशु ही नहीं राक्षस भी बन जाता है , इसका प्रमाण आयेदिन हम समाचार पत्रों में देख सकते हैं। हमारे शास्त्रों में कहा गया है -

श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चैव अनुवर्त्यताम् । 
आत्मनः प्रतिकूलानि , परेषां न समाचरेत् ॥ 
 - अर्थात धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो और सुनकर उस पर चलो ! उसको भली-भांति धारण करो। जो कुछ तुम्हें अपने लिए हितकर प्रतीत नहीं होता, उसका व्यवहार दूसरों पर न करो। 
अर्थात धर्म का सार एक ही है-प्रेम, इसीलिये कभी किसी के ऊपर अपनी मान्यता को बलपूर्वक न थोपो। कुछ नादान लोग " धर्म " का अर्थ Religion,या मतवाद या मजहब समझते हैं, इसीलिये वे इस धारणा को किसी भी प्रकार स्वीकार नहीं करते। उनकी धारणा के अनुसार उनकी जो मान्यता है वही सत्य है और जो उसके मत को स्वीकार नहीं करेंगे, वे उन्हें तलवार की धार से मौत की घाट उतार देंगे।  
मनुष्य और पशु में अन्तर क्या है ? पशु पराधीन रहता है, वह इन्द्रियों के वश में रहता है। स्वर्ग प्राप्ति की कामना, भोग वांछा की कामना, कल्प-वृक्ष पाने की कामना, या काम-धेनु को पाने की कामना भी पशु भाव है। भीतर की पशुता से मुक्त हो जाने, या अन्तः प्रकृति (Inherent Nature जन्मजात प्रवृत्ति) पर विजय प्राप्त करने की साधना, भ्रममुक्त या 'डीहिप्नोटाइज्ड' हो जाने की साधना का नाम ही पुरुषार्थ है। 
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चार पुरुषार्थ में पहला पुरुषार्थ है- " धर्म "!  धर्म उसे कहते हैं, जो अर्थ भी देता है, भोग भी देता है, अच्छा जीवन भी देता है। पद और यश भी देता है और अंत में दिव्य जीवन भी देता है, जिसको मोक्ष कहते हैं। मनुष्य को एक विशेष शक्ति, 'विवेकप्रयोग-शक्ति' प्राप्त है, जिसको धर्म कहा जाता है। ये ' धर्म ' जिसमें नहीं है, उसका ढाँचा तो मनुष्य का है, किन्तु आचरण में वह पशु के बराबर होता है, क्योंकि वह भी इन्द्रियों के वश में रहता है।
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, "  धर्म वह वस्तु है, जिससे पशु  मनुष्य तक और मनुष्य परमात्मा तक उठ सकता है। " हमारे शास्त्रों के अनुसार मानव , किसी भी लोक- लोकांतर में या किसी प्रकार के निर्जन स्थानों मै भी क्यों न चला जाये, वहाँ भी वर्णाश्रम-धर्म का पालन करना या मानवोचित कर्तव्य (विवेक-सम्मत कर्तव्य) को पालना करने का नाम धर्म है। क्या प्रतिमास घटने वाली नक्सली क्रान्तियां, राजनीतिक हत्याएं, गोली वर्षा अथवा राग, द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, अभिमान का प्रदर्शन कम हो गया है ? क्या इस सम्पूर्ण तकनीकी उन्नति से मानव मन को शान्ति प्राप्त हो रही है? शान्ति, सुख, निश्चिन्तता और निर्भयता तो दिखाई देती नहीं। यह क्यों ? महर्षि व्यास देव कहते हैं -
 ‘ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिद् शृणोति माम,
धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते।
- ‘मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार-पुकारकर कह रहा हूँ, पर मेरी बात कोई नहीं सुनता । धर्म से मोक्ष तो सिद्ध होता ही है अर्थ और काम भी सिद्ध होते हैं; तो भी लोग उस वर्णाश्रम-धर्म ये चार पुरुषार्थों का  सेवन क्यों नहीं करते?’ 
अर्थोपार्जन करना प्रत्येक मनुष्य का पवित्र कर्तव्य है। परन्तु उसके लिए धर्माचरण का ठोस आधार का होना भी अवश्यंभावी है। धर्म से विमुख हो कर अर्थोपार्जन में सलंग्न हम प्राकृतिक संपदा का विवेकहीन दोहन  करके संसार के पर्यावरण संतुलन को नष्ट करते हैं। काम को धर्म और अर्थ के बाद तीसरा स्थान दिया गया है। इसलिए काम को धर्म और अर्थ दोनों पर ही आश्रित होना चाहिए।  यदि मनुष्य में कोई कामना या इच्छा ही नहीं रहेगी तो वह मृतप्राय ही हो जाएगा। इसीलिये शास्त्रों में विवाह को धर्म-संस्कार माना गया है, और त्याग भाव से काम का उपभोग करने की शिक्षा दी गयी है। केवल अपने ही क्षुद्र स्वार्थों का को पूरा करने में न लग जाएँ, पहले स्वयं त्याग करें और  अन्य सभी का ध्यान रखे, फिर स्वयं उपभोग करें। दूसरों को खिलाकर तब स्वयं खाएं। माँ को इसीलिये देवी कहा जाता है, वे सबको खिला लेने के बाद जो बचाखुचा मिल जाता है, उसी को खाकर तृप्त हो जाती है।  मोक्ष का स्थान सबसे अन्त में आता है। अर्थात अपने-पराये के भ्रम से मुक्त हो जाने की अवस्था सवसे अंत में आती है ! यह अवस्था हमें तभी प्राप्त हो सकती है, जब हमारा अर्थ व, काम दोनों ही धर्म से संचालित होंगे। धर्म की जिस दुरवस्था पर वेदव्यास सरीखा क्रांतदर्शी कवि रो रहा है (‘विरौमि’ष्) वह धर्म क्या है?  धर्म कोई कर्मकाण्डी उपासना पद्धति नहीं है।  महाभारत में व्यास-मुनि कहते हैं- 

धारणात् धर्ममित्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः ।
 यश्च  धारण संयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ।।  
अर्थात्—‘जो हमारे मनुष्यत्व को धारण करता है, एकत्र करता है, अलगाव-वाद को दूर करता है, उसे ‘‘धर्म’’ कहते हैं। जिसके रहने से ही हमलोग मनुष्य कहलाने योग्य बनते हैं, ऐसा धर्म प्रजा को धारण करता है। जिसमें प्रजा को 'एकात्मबोध ' में बाँध देने की ताकत है, वह निश्चय ही धर्म है।’ विवेक-प्रयोग करके चरित्र के जिन गुणों (निःस्वार्थपरता आदि) को धारण करने से हमलोग पशुत्व से उपर उठकर मनुष्य बन सकें और, उससे उपर उठकर देवता बन सकते हों वही धर्म है। 
किसी विशेष परिस्थिति या चार-आश्रम में रहते समय मनुष्य का मानवोचित कर्तव्य होता है, उसी को उसका धर्म कहा जाता है। किसी विशेष अवसर के उपस्थित होने पर, जब हम किसी कार्य को,बुद्धि और हृदय द्वारा गहन चिंतन करके बिना किसी डर या दबाव के श्रेय-प्रेय,शाश्वत और नश्वर के बीच विवेक-प्रयोग करने के बाद,विचार-स्वातंत्र्य से केवल अपना मनुष्योचित कर्तव्य या अपना वर्णाश्रम-धर्म समझकर करने का निर्णय लेते हैं, उस समय वही हमारा धर्म होता है ! जैसे महर्षि दधिची ने जब  अस्थिदान का निर्णय लिया तब वह उनका धर्मं था, भगवान राम ने पिता का आदेश पालन करने हेतु वन जाने का निर्णय लिया - तब वही उनका धर्मं था, अर्जुन के लिये अपने गुरु-और पितमामह से भी युद्ध लड़ना धर्मं था।  
किन्तु अज्ञानवश प्रत्येक व्यक्ति अपने मन-मर्जी के अनुसार विचार करके, या कहीं से सुनकर धर्म के बारे में अपनी कोई न कोई अलग धारणा बना लेता है, और साम्प्रदायिक झगड़ों को धार्मिक -दंगा फसाद कहता है । 'धर्म' के बारे में जो सबसे महत्वपूर्ण बात है, जिसे समझना हर किसी के लिए जरूरी है, वह है- रिलिजन (Religion) या पंथ जो किसी व्यक्ति-विशेष के द्वारा स्थापित किया जाता है, तथा मानव-धर्म या निःस्वार्थपरता जैसे मानवीय गुणों और मानवीय-कर्तव्यों के अन्तर को समझना। रिलिजन या मजहब तथा 'पुरुषार्थ' या 'वर्णाश्रम धर्म' के बीच अन्तर को ठीक से न समझ सकने के कारण ही, हमलोग किसी मजहब या पंथ के अनुयायिओं या 'मतावलम्बीयों' को भी 'धर्मावलम्बी' कहकर सम्बोधित कर देते हैं।  दूसरी बात यह समझने की है कि 'धर्म' को किसी व्यक्ति-विशेष के द्वारा उद्धाटित और स्थापित नहीं किया जा सकता  है,वह तो सभी मनुष्यों के लिए होता है। जबकि कोई विशेष नाम वाला मत या मजहब (Religion) एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों के जरिए स्थापित और संचालित किया जाता है। भारत के जितने आयातित पन्थ हैं, वे अभी तक 'धर्म' और 'मजहब' (पंथ या संप्रदाय) के अन्तर को नहीं समझ सके हैं; इसीलिये वे अपने को भारतीय संस्कृति 'अनेकता में एकता-भारत की विशेषता' के अनुकूल अपने को ढाल नहीं सके हैं, और मजहबी-विवाद का सबसे बड़ा कारण भी यही है।  
टकराव वहां पैदा होता है जहां धर्म (चरित्र) का लोप हो जाता है। ब्रह्माण्ड के असंख्य स्थूल पिंडों की गमन-व्यवस्था कितनी आश्चर्यजनक है ! सभी ग्रहों के आकार भिन्न हैं, सबकी दिशाएँ भिन्न हैं, गतियाँ भिन्न हैं किन्तु कहीं पारस्परिक मुठभेड़ नहीं होता। भिन्नता के बाद भी टकराव क्यों नहीं होता ? इनमें से कोई भी एक दूसरे के कार्यों में बाधा उत्पन्न नहीं करता, कोई ग्रह यह नहीं कहता कि हमारी ही दिशा सही है, हमारी ही गति सही है, सब ग्रहों को हमारा ही अनुसरण करना होगा। क्योंकि उन भौतिक पिंडों को पता है,पता है कि सब एक दूसरे का अनुसरण करने लगेंगे तो आपस में मुठभेड़ हो जायेगी। सब का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।  इसलिए सब अपने-अपने रास्ते में अपनी-अपनी गति से गमनशील हैं, सब एक दूसरे का सम्मान करते हुए, उनकी परम्पराओं का सम्मान करते हुए, उनके सिद्धांतों का आदर करते हुए गतिमान हैं। तथापि कुछ नियम हैं जिनका पालन सबके लिए अनिवार्य है। जैसे गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांतों का धर्मपालन किये बिना, गति के सामान्य सिद्धांतों का धर्मपालन किये बिना उनका अस्तित्व संभव ही नहीं है। वस्तुतः भिन्नता के कारण ही टकराव नहीं होता है। एकरूपता होती तो सोचिये क्या होता? 
तथा 'मतावलम्बी' होने को 'धर्मावलम्बी' होने का पर्यायवाची मानकर आजीवन भ्रम में पड़े रहते हैं, तथा साम्प्रदायिक झगड़ों, या मजहबी टकराव को भी रिलीजियस राइट या धार्मिक-दंगा कह देते हैं।      भारतीय संस्कृति विविधताओं का सम्मान करती  है और 'अनेकता में एकता को ही भारत की विशेषता' मानती है !' हम केवल अपने ही पंथ या कबीले के हित की बात ही नहीं सोचते, हमलोग 'वसुधैव कुटुंबकम' मानकर, या सम्पूर्ण पृथ्वी को एक विशाल परिवार मानकर 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' की, जगत के सभी मनुष्यों
के कल्याण की कामना भी करते हैं। हमारी संस्कृति "बीती ताहि बिसारिए" में विश्वास रखती है ताकि आगे की सुध ली जा सके। हम वर्तमान में विश्वास रखते हैं, ताकि भविष्य की मजबूत बुनियाद खड़ी कर सकें,किसी भी पंथिक या जातिवादी अलगाववाद में हमारी आस्था नहीं है। 
यही उचित अवसर है जब हम अपनी सनातन संस्कृति की अमृत-धारा से टूटकर अलग हुए - कश्मीर के अलगाववादियों के साथ-साथ सभी समुदाय ले लोगों को सनातन भारतीय-संस्कृति के निकट लाएं और हमारे ये प्रयास तब तक जारी रहें जब तक कि हम उन्हें उसी अमृतधारा से नहीं जोड़ लेते। अगर राष्ट्र को ही हमलोग सर्वोपरि समझते हैं, तो संस्कृति की धारा में हमें एक साथ चलना होगा और वही सच्चे अर्थों में एकता होगी। सेक्युलरिज्म या पंथ-निरपेक्षता का भी तभी कोई अर्थ होगा। जब तक सभी पंथों की मजहबी मान्यताएं राष्ट्र की मूल सांस्कृतिक धारा के साथ जुड़ना नहीं सिखातीं तब तक यह 'वीर मनुष्य' बन जाने की चुनौती भारत के युवाओं के समक्ष शेष है। 
कल शाम को महामण्डल का आदर्श उद्देश्य एवं प्रतीक चिन्ह (Emblem ) तथा ध्वजा के बारे में सुना कि ' मनुष्य' बनना पड़ता है। अंग्रेजी के कवी ब्राउनिङ्ग की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं -
 " प्रोग्रेस इज मैन्स डिस्टिंक्टिव मार्क अलोन, नॉट गोड्स ऐंड नॉट द बिस्ट्स। 
गॉड इज (परफेक्ट) दे आर; मैन पार्टली इज ऐंड फुल्ली होप्स टू बी !" 
(Progress, man's distinctive mark alone,Not God's, and not the beasts: God is, they are;Man partly is, and wholly hopes to Be.)  
 -अर्थात उन्नति,आरोहण, डीहिप्नोटाइज्ड मनुष्य बन जाने की आवश्यकता, या संसार-सागर से पार-गमन (crossing) की चेष्टा करने की आवश्यकता ईश्वर को  नहीं है।  और पशुओं में तो इसकी क्षमता भी नहीं है,यह केवल मनुष्यों का ही वैशिष्ट्य है। ईश्वर तो पूर्णता में ही विराजमान रहते हैं, उनके आरोहण (ascension) का तो प्रश्न ही नहीं उठता। पशु की प्रजातियाँ (गाय-भैंसें,गधे आदि) ' सतयुग ' में जैसे थे, आज तक  वैसी ही हैं। किन्तु अपूर्ण होने पर भी मनुष्य पूर्णता में पहुँचने की आशा लेकर, या अपने-पराये के भ्रम से मुक्त हो जाने की आशा लेकर केवल मनुष्य ही उन्नति के लिये प्रयत्न करता है। और जीवन-मृत्यु से होता हुआ मनुष्य निरन्तर अंश से पूर्णता की दिशा में ही बढ़ता रहता है।
यही बुद्धत्व या पूर्णत्व पशु योनियों में भी क्रम-संकुचित अवस्था में रहता है, किन्तु पशुओं को पुरुषार्थ करने या सद्गुरु के पास जाकर अपने पूर्णत्व को अभिव्यक्त करने, या जो विद्या मनुष्य को मुक्त कर देती है, उसे सीखने का अवसर नहीं होता है। क्योंकि बड़े से बड़े पशु का अन्तःकरण भी मनुष्यों के जैसा उन्नत नहीं होता कि वे नश्वर-शाश्वत में विवेक-विचार करना सीख सकें। इसलिये वे जीवन भर पशु के जैसा-आहार,निद्रा, भय और मैथुन करते हुए ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। 

किन्तु मनुष्य योनि सर्व-श्रेष्ठ योनि है, वह भोग योनि नहीं है, मनुष्य भी पशु के जैसा आहार,निद्रा, भय और वंश-विस्तार करते हुए एक दिन बूढ़ा होकर मर जाने के लिये बाध्य नहीं है। मनुष्य अपने गुरु से विवेक-प्रयोग करने की विद्या सीखकर आंशिक मनुष्य और आंशिक पशु की मिली-जुली अवस्था से पूर्ण-मनुष्य में उन्नत हो सकता है। 

मनुष्य मात्र में प्रच्छन्न भाव से अंतर्निहित देवत्व को विकसित करने का उपाय क्या है ? विभिन्न युगों मे विभिन्न महापुरुषों ने कई प्रकार के मार्गों का आविष्कार किया है। इस युग मे श्रीरामकृष्ण के उपदेशों के अनुरूप स्वामी विवेकानन्द ने जो सहज मार्ग दिखलाया है, वह है - 'कर्म और उपासना' साथ साथ करना । श्रीरामकृष्ण देव कहते थे 'दया नहीं, शिव ज्ञान से जीव सेवा।' किन्तु स्वामीजी ने बाद मे कहा था, 'सेवा' कहने से मेरी भक्ति-भाव को संतुष्टि नहीं मिलती। इसलिये सेवा के समय मेरा अपना भाव रहता है - ' सेवा नहीं पूजा !'  'सेवा' करने के बदले यदि मन में 'पूजा' का भाव रखा जाय तभी- जीव मात्र को शिव जानकर उसकी सेवा की जा सकती है।
देव-प्रतिमा की पूजा किस प्रकार की जाती है उपासना शास्त्रों में कहा गया ‘‘रामो भूत्वा रामं यजेत्।’ यानी हम जिस किसी भी देवता की उपासना करतें है उनके जैसे विचार हैं, मंतव्य है, गुण हैं, वे सभी गुण हमें अपने भीतर आत्मसात करने चाहिए । तथा उसके लिये साधना करनी चाहिए । अपने उपास्य के (आदर्श या नेता के) गुणों को अपने भीतर धारण करने की साधना के बिना उपासना निरर्थक है। आगम वचन है- 'देहो देवालयो साक्षात्' तथा 'देवो भूत्वा देवं यजेत्' - कर्मकांड में देवता होकर देवता का यजन करना पड़ता है। उपासना में उपास्य जैसा बनना अभ्यास है । अर्थात मेरे इष्टदेव या आराध्य देव ने अपने जीवन काल में जिस प्रकार कुछ युवाओं को एकत्र कर, उन्हें 'रामकृष्ण -विवेकानन्द वेदाध्यापक प्रशिक्षण परम्परा ' में अपने ब्रह्मभाव को अभिव्यक्त कर मुक्त हो जाने का प्रशिक्षण दिया था, वही कार्य करना उनकी उपासना करना है। उस वैदिक-युग की भावना यह थी कि अपने इष्टदेव का जैसा रूप या बिम्ब भक्त या शिल्पी के मन में है, उसी का सदृश्य और प्रतिबिम्ब ही देवता का वास्तविक रूप है। पहले स्वयं देवता बनने की पूजा करनी होगी, फिर दूसरों को भी वुड बी लीडर्स या भावी देव (भावी ब्रह्मविद मनुष्य)  समझकर का पूजन करें तो उससे अमिट फल की प्राप्ति अवश्य होगी।' 
हमलोग अपने बेटे-बेटिओं को महान मनुष्य, सेलेब्रिटी, या प्रख्यात मनुष्य बनाना चाहते हैं। हमारे अभिभावक गण चाहते हैं कि  हमारे बच्चे बड़े होकर इतने महान बनें कि वे इस देश के भूखे-नंगे लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाने का सामर्थ्य प्राप्त कर सकें; और साधारण मनुष्य लोग भी उनको पूजनीय मनुष्य जैसा सम्मान दे सकें। महामण्डल अपने सदस्यों को इस प्रकार का मनुष्य बनाना चाहता है, जो जन-हृदय सम्राट बन सके।  यदि हमलोग इतिहास का विश्लेषण करें तो यही पायेंगे कि जगत वैसे ही लोगों की पूजा करता है, जो सम्पूर्ण रूप से निःस्वार्थपर बन गए थे, और जिन लोगों ने आत्मकेन्द्रित जीवन जीया, केवल अपने स्वार्थ का ख्याल रखा था, जगत में उनकी पूजा कभी नहीं हुई है। 
आइये हमलोग श्रीरामकृष्ण देव के जीवन को देखते हैं; बंगाल के एक अत्यन्त दूरदराज के एक छोटे से गाँव में ठाकुर (श्रीरामकृष्ण) ने जन्म ग्रहण किया था।  वे बिल्कुल अनपढ़ थे, लिखना-पढ़ना कुछ नहीं जानते थे; फिर भी आज ठाकुर देश-विदेश में पूजित हो रहे हैं। क्यों लोग उनकी पूजा करते हैं ? माँ सारदा देवी को देखिये, वे भी लिखना-पढ़ना नहीं जानती थीं, वे एम.ए पास नहीं थी, एम. टेक. भी नहीं की थी, क्यों लोग उनकी पूजा करते हैं? इसका कारण यही था कि वे लोग इतने निःस्वार्थी बन गए थे कि साधारण मनुष्यों की चिन्ता में स्वयं को भी भूल गए थे। इसीलिये आज जगत उनकी पूजा कर रहा है। 
उनकी शिक्षा से शिक्षित होकर स्वामी विवेकानन्द सम्पूर्ण विश्व को यही पूर्णतः निःस्वार्थपर मनुष्य बनने और बनाने की शिक्षा दे गए हैं। जब निर्विकल्पसमाधि के आनन्द में लीन होने की इच्छा उन्होंने व्यक्त की तब, 
स्वामीजी को ठाकुर ने सिखलाया था, जो व्यक्ति अपनी मुक्ति की बात सोचता है, वह भी स्वार्थपरता है।  ठाकुर ने कहा था, ' मैंने तो सोचा था की तुम विशाल बटवृक्ष की तरह बनेगा, स्वयं धुप सहकर लोगों को छाया देगा, तुम्हारी छाया में बैठने से कितने ही लोगों को शान्ति प्राप्त होगी। और तू केवल अपनी मुक्ति की बात सोचता है रे? छिः धिक्कार है तुझे !" ऐसा कहकर ठाकुर ने उनकी इस कमी को-ब्रह्मानन्द में लीन होकर रहने की स्वार्थपरता को भी दूर कर दिया था। वही विशाल बटवृक्ष, जिसके जन्म का १५० वर्ष से अधिक बीत चूका है, वे हमारे सामने एक आदर्श मनुष्य के रूप में उपस्थित हैं। अब यह हमारे उपर निर्भर करता है कि हम उन्हें अपने जीवन-आदर्श मानकर ग्रहण करते हैं या नहीं ? अर्थात हमलोग क्या स्वयं को पूजा के आसन पर बैठाना चाहते हैं या नहीं ? आप सभी लोग अपने देवत्व को विकसित करने के लिये आगे आइये। 
इसीलिये यदि हम अपने बेटे-बेटियों को भी यदि पूजनीय मनुष्य बनाना चाहते हों, या उनको पूजा के आसन पर देखना चाहते हों, तो उनको निःस्वार्थी बनने की शिक्षा देनी होगी। उनको देवत्व को विकसित करने की शिक्षा देनी होगी। तभी वे लोग देवता के आसन पर बैठने योग्य हो सकेंगे। हमलोग अपने बेटे-बेटियों को मैनेजमेन्ट पढ़ा रहे हैं, डाक्टरी पढ़ा रहे हैं, इन्जियरिंग पढ़ा रहे हैं -यह सब ठीक है। किन्तु क्या वे देवता के आसन पर बैठने के योग्य मनुष्य बन पा रहे हैं? क्या वे देशवासियों के ह्रदय के आसन पर बैठने योग्य बन पा रहे हैं ? 
हमलोग अत्यन्त स्वार्थपर जीवन बिता रहे हैं, बिल्कुल पशुओं के जैसा जीवन व्यतीत कर रहे हैं। स्वामीजी की शिक्षा से शिक्षित होकर हमलोग देव-तुल्य मनुष्य बनेंगे। जगत की पूजा प्राप्त करने योग्य बनेंगे। स्वामीजी ने कहा था -हमलोगों के हर कदम पर हमारे देवत्व की अभिव्यक्ति जब होने लगेगी तभी हम अपने को स्वामीजी की शिक्षा से शिक्षित मनुष्य कह सकेंगे। 
'कबीरा जब पैदा हुए जग हँसा हम रोये, ऐसी करनी कर चलो तुम हँसो- जग रोये !' जिस मनुष्य के जाने के बाद लोग उसको याद करके अश्रु बहते हैं उसी मनुष्य का मानव-शरीर में जन्म धारण करना सार्थक होता है। और अगर जाने के बाद कोई कहे कि चलो अच्छा हुआ, धरती का बोझ कम हो गया तो उस मनुष्य का अनमोल जीवन व्यर्थ माना जाता है। यदि जीवन को व्यर्थ के कामों -आहार,निद्रा,मैथुन में ही गँवा देना था, तो हमलोग मनुष्य क्यों बने पशु क्यों नहीं बने ? इसिलिये हमलोगों को मनुष्य के जैसा आचरण करके दिखलाना होगा कि हमलोग पशु नहीं हैं। 
इसी युवा अवस्था में हमें अपने जीवन के लक्ष्य को निश्चित कर लेना होगा। जो अभिभावक हैं उन्हें यह विचार करना चाहिये कि हमारा मनुष्य जीवन बीतता जा रहा है, हमलोग दिनोंदिन मृत्यु के निकट बढ़ते जा रहे हैं। हमलोग अपने बेटे-बेटियों को भी ऐसी स्वार्थपरता की शिक्षा तो नहीं दे रहे हैं ? हमें स्वामीजी के उसी जागरण मंत्र को गाँव गाँव तक पहुँचा देने के लिये कमर कस कर खड़े होना होगा। विवेकानन्द युवा महामण्डल अपने प्रत्येक पाठचक्र में आत्मा के जागरण का यही मंत्र उच्चारित करता आ रहा है। अपने ही प्रयोजन को पूर्ण करने के लिये महामण्डल पाठचक्र से जुड़िये। 
केवल यह कहने से कुछ नहीं होगा कि मैंने तो 'रामकृष्ण मिशन से दीक्षा ?' ली है (या अपने गुरुदेव से ?), और भाव-प्रचार भी करता रहता हूँ! हमलोग रामकृष्ण मिशन भी जाते हैं, और अमुक-अमुक महाराज का संग भी किया हूँ। किन्तु जब तक अपने जीवन की ओर नहीं देखते, आत्मसमीक्षा करके अपने अन्तःकरण को शुद्ध नहीं करते, तबतक इस तरह की बातों से कुछ होने वाला नहीं है। क्रमशः स्वामीजी की शिक्षाओं को अपने जीवन में प्रतिष्ठित करना होगा, आचरण से दिखाना होगा। हमलोग विवेकानन्द के साहित्य को बड़े ध्यान से अध्यन करेंगे, chew and digest -केवल स्वाध्याय-नियम की रक्षा के लिए नहीं बल्कि उन्हें आत्मसात करने के चबा चबा कर पचा लेने के लिए पढूंगा।
मैंने बहुत से छात्रों से पूछा है, क्या तुमलोग स्वामीजी की पुस्तकों को पढ़े हो ? अधिकांश छात्र कहते हैं, ' नहीं, मैंने नहीं पढ़ा है; स्कूल -कॉलेज में नहीं पढ़ाया जाता, क्योंकि पैसा कमाने का गुर उसमें नहीं है। इसीलिए हम वे सब नहीं पढ़ते।' किन्तु कुछ भी पढ़ने के लिये पहले मन को तैयार करना पड़ता है-मन लगाकर पढ़ने की सीख सभी देते हैं। किन्तु इच्छा-शक्ति का प्रयोग करके मन को किस प्रकार संयत किया जाता है-इसकी शिक्षा तो कोई नहीं देता ? इच्छा-शक्ति स्वयं ईश्वर से आती है, इच्छा-शक्ति के द्वारा ही हमलोग विवेक-प्रयोग करके अन्तः प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। तभी हमलोग ठीक ठीक मनुष्य बन सकते हैं। दिनों दिन हम बेहतर मनुष्य बन सकते हैं, अच्छा इंसान बन सकते हैं। यही शिक्षा स्वामीजी ने हमलोगों को दी है। रामकृष्ण मिशन और महामण्डल इसी शिक्षा पर चर्चा करता आ रहा है। 
हममें से कुछ लोग स्वामीजी के संदेशों को पढ़ते भी हैं; किन्तु कैसे पढ़ना चाहिये- यह हमलोग नहीं जानते। हमें स्वामी जी के संदेशों पर चर्चा करनी होगी, शास्त्रों में कहा गया है -श्रवण, मनन और निदिध्यासन। सबसे पहले ठाकुर, माँ, स्वामीजी की जीवनी के साथ साथ उनके संदेशों को पढ़ना चाहिये। उसके बाद उनपर मनन करना चाहिये। यही मुख्य बात है। उसके बाद निदिध्यासन करना होगा। स्वामीजी के उपर ध्यान करना होगा। फिर शास्त्रों के साथ मिलाकर देखना होगा -तभी ठीक ढंग से पढ़ना कहेंगे। किस प्रसंग में स्वामीजी यह कह रहे हैं, उसके ऊपर विवेचना करते हुए पढ़ना होगा। हमलोगों के दैनन्दिन जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान स्वामीजी के जीवन और सन्देश के माध्यम से करना होगा। तभी हम लाभ उठा सकेंगे। जिन लोगों ने भी पढ़ा है सभी को इससे फायदा हुआ है।  
गुरु स्वामी विवेकानन्द ने इसी अंश से पूर्ण मनुष्य बन जाने का आह्वान करते हुए युवाओं से कहा था-
" मनुष्य तीन प्रकार के गुणों से निर्मित है,पाशविक, मानवीय और दैवी। जो तुममें दैवी गुण बढ़ाता है वह पूण्य है और जो तुममें पशुता बढ़ाता है वह पाप है।  तुमको पाशविक वृत्ति को समाप्त कर 'मनुष्य ' बनना चाहिये -अर्थात प्रेममय तथा उदार होना चाहिये। इससे भी उपर उठकर तुम्हें शुद्ध आनन्द, सच्चिदानन्द, अदाहक अग्नि के समान, अद्भुत प्रेममय किन्तु मानवीय प्रेम की दुर्बलता से रहित, दुःख की भावना से रहित (डीहिप्नोटाइज्ड) बनना चाहिये।" 
यह ठीक है कि मनुष्य जन्म के समय अपूर्ण रहता है, किन्तु पूर्णता या बुद्धत्व उसके भीतर जन्म के समय से ही क्रम-संकुचित रहता है। स्वामीजी कहते हैं- " मनुष्य में जो स्वाभाविक बल (ब्रह्मत्व) है, उसको अभिव्यक्त करना ही धर्म है। असीम शक्ति का स्प्रिंग इस छोटी सी काया में कुण्डली मारे विद्यमान ( बीज में वृक्ष के जैसा-क्रमसंकुचित) है, और वह स्प्रिंग अपने को फैला रहा है। ...यही है मनुष्य का,धर्म का, सभ्यता या प्रगति का-इतिहास !"( Religion is the manifestation of the natural strength that is in man. A spring of infinite power is coiled up and is inside this little body, and that spring is spreading itself. ...This is the history of man, of religion, civilization, or progress.)    

युवाओं के प्रति उनका आह्वान था- Be and Make ! पहले Be होने अर्थात यथार्थ मनुष्य बनने को कहा फिर उसका उपाय बताते हुए कहा था- Make ! ' अपने भीतर के 'ब्रह्म-भाव' को अभिव्यक्त करने का सबसे सरल तरीका है, दूसरों को इस कार्य में सहायता करना। ' तुम स्वयं यथार्थ मनुष्य बनने और दूसरों को मनुष्य बनाने के प्रयत्न (पुरुषार्थ) में आगे बढ़ो! आगे बढ़ो! 'चरैवेति चरैवेति !' यही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। ऐतरेय ब्राह्मण के एक श्लोक में कहा गया है कि युग-परिवर्तन तो मनुष्य के विचार जगत में होता है -

" कलिः शयानो भवति, संजिहानस्तु द्वापरः । 
उत्तिष्ठँस्त्रेताभवति, कृतं संपद्यते चरन् ।
 चरैवेति चरैवेति॥  
- जो सो रहा है अर्थात जो अन्तः प्रकृति जन्मजात प्रकृति की पाशविक वृत्तियों को ही तुष्ट करने में लगा हुआ है, उसके लिए अभी कलि-काल चल रहा है। निद्रा से उठ बैठने वाला द्वापर में है, और वर्णाश्रम धर्म का पालन करने के लिए जो उठकर खड़ा हो जाता है, वह त्रेता-युग में है। किन्तु जो अपने साथ कुछ और साथियों को लेकर, अन्तः प्रकृति पर विजय प्राप्त करने में समर्थ मनुष्य बनने और बनाने के कार्य में जुट जाता है ( जो वीरभाव या सन्तान भाव का साधक है), वह कृतयुग, सतयुग और स्वर्णयुग (देवभाव का साधक) में निवास करने लगता है। इसलिए हे मनुष्यों - 'चलते रहो, चलते रहो। लक्ष्य के प्राप्त होने तक बिना विश्राम लिये चलना और चलते रहना ही जीवन का लक्षण है। 

 इसीलिये मात्र राजनीति के लिए ' सर्व-धर्म समभाव ' की लुभावनी बातें करना एक अलग बात है तथापि, दुर्भाग्य से विभिन्न नाम वाले  मजहबों; में सम-भाव बैठाना (जिन्हें "धर्म "या रूहानियत) कहना ही ठीक प्रतीत नहीं होता), एक टेढ़ी खीर है। इसीलिये श्रीरामकृष्ण देव (स्वामी विवेकानन्द के गुरु ) " सर्व-धर्म समन्वय " अर्थात विश्व में प्रचलित समस्त उपासना पद्धतियों में सामान्य (common) सार बात में समन्वय लाना आज के विश्व की प्रमुख आवश्यकता मानते थे। अपनी विशिष्ट साम्प्रदायिक-पहचान को सबसे पृथक रखना विभिन्न मतावलम्बियों (सम्प्रदायों) की एक बड़ी समस्या है। प्रश्न यह है कि- जीवन के लिए आवश्यक क्या है ? अपनी पृथक पहचान बनाये रखना या धर्मानुशीलन करना ? सच्चाई तो यह है कि धर्म आचरण में उतारने या धारण करने की चीज है न कि टकराव पैदा करने की। अतः किसी सम्प्रदाय विशेष की केवल पहचान ( प्रतीक-चिन्ह -त्रिपुण्ड,रामनामी चादर,चेक का तौलिया आदि ) धारण करके घूमना पाखण्ड है और धर्मानुशीलन या वर्णाश्रम-धर्म का पालन आचरण है।हमारे किसी भी शास्त्र में, वेदों या उपनिषदों में " हिन्दू-धर्म " कहकर किसी धर्म की चर्चा नहीं हुई है। अठारह पुराणों में नहीं है, महाभारत में नहीं है, रामायण में भी नहीं है। हमारे यहाँ किसी व्यक्ति के द्वारा स्थापित धर्म का पालन नहीं होता है, हमारा धर्म " सनातन-धर्म " है, या उसे वैदिक धर्म भी कह सकते हैं। यह तो विदेशी आक्रमणकारियों की भाषा में 'स' को 'ह' कहने की परम्परा थी, इसीलिये उनलोगों ने ' सिन्धु नदी ' के पूर्वी भाग में रहने वाली मानव-जाति को 'हिन्दू' के नाम से सम्बोधित किया था। 
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, " जिस हिन्दू नाम से परिचित होना आजकल हम लोगों में प्रचलित है, इस समय उसकी कुछ सार्थकता नहीं है, क्योंकि उस शब्द का केवल यह अर्थ था- सिन्धुनद के पूर्वी छोर पर बसने वाले। प्राचीन फारसियों के गलत उच्चारण (स को ह कहने) से सिन्धु शब्द 'हिन्दू 'हो गया है। वे सिन्धु नदी के इस पार रहनेवाले सभी लोगों को हिन्दू कहते थे। 
इस प्रकार हिन्दू शब्द हमें मिला है। फिर मुसलमानों के शासनकाल में हमने अपने आप यह शब्द अपने लिए स्वीकार कर लिया था। इस शब्द के व्यवहार करने में कोई हानी न भी हो, (अब हिन्दुओं से कोई जजिया टैक्स नहीं ले सकता) पर मैं पहले ही कह चूका हूँ कि अब इसकी कोई सार्थकता नहीं रही; क्योंकि तुम लोगों को इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि वर्तमान समय में सिन्धु नदी के इस पारवाले (पूर्वी हिस्से में रहने वाले) सब लोग प्राचीनकाल की तरह एक ही धर्म को नहीं मानते। इसलिये उस शब्द से केवल हिन्दू मात्र का ही बोध नहीं होता, बल्कि मुसलमान, ईसाई, जैन तथा भारत में विदेशों से आकर बस गए सभी अन्यान्य अधिवासियों का भी होता है। अतः मैं हिन्दू शब्द का प्रयोग नहीं करूँगा। तो हम किस शब्द का प्रयोग करें ? हम वैदिक हैं (अर्थात वेद के माननेवाले हैं) अथवा वेदान्ती शब्द का प्रयोग अपने लिये कर सकते हैं, जो उससे भी अच्छा है।" (वि० सा० ख० ५ पृष्ठ १९)   
इसको ऐसे समझें कि जैसे किसी व्यक्ति का नाम ' पंचानन पाठक ' को बिगाड़ कर उसे कोई केवल अरे 'पाँचू' कहकर पुकारे तो क्या उससे उस व्यक्ति का गौरव बढ़ेगा ? उसे स्वयं को ' पाँचू ' (या हिन्दू) कहे जाने पर गर्व क्यों होना चाहिये ? बहुत से उपनिषद आधुनिक काल के वामपंथी इतिहासकारों और  के द्वारा भी लिखवाये गए थे। उन्हीं में से एक"अल्लोपनिषद" पढ़ने का मौका मिला था। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में और छन्दों में लिखा गया है, किन्तु उन छन्दों को पढ़ने से कोई अर्थ ही नहीं निकलता है। अंश से पूर्ण हो जाना,सिद्धार्थ से बुद्ध बन जाना, बिन्दू से सिन्धु (हिन्दू नहीं) बन जाना यही धर्म का सार है। 
हम चाहे हिन्दू हों या मुसलमान या अन्य किसी सम्प्रदाय मेँ जन्म ग्रहण क्यों न किये हों; बाहरी वेश-भूषा चाहे जैसी भी हो, हमारा चरित्र ही हमारे मनुष्यत्व को धारण किये रहता है। अपने जीवन मेँ प्रतिमुहूर्त हमलोग जिन अनुशासनों का पालन अथवा यम-नियम का अभ्यास करते हैं, चरित्र के वे अनिवार्य गुण हमें मनुष्यत्व की सीमा मेँ पकड़े रखते  है, हमें पशु या राक्षस बनने की सीमा मेँ जाने से रोकता है; उसी को धर्म कहते हैं। हमलोग अभी क्या हैं -मनुष्य हैं या पशु ? हमलोग अपने आप को किस श्रेणी में देखते हैं ? यदि मनुष्य हैं, तो क्या हमलोग अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हैं ?  क्या रामनवमी-मुहर्रम में डांडा भांजना या जन्माष्टमी के अवसर पर दही-हाण्डी फोड़ना युवाओं का धर्म है ? नहीं, धार्यते इति धर्म: अर्थात धर्म चरित्र के उन गुणों (निःस्वार्थपरता आदि चारित्रिक गुणों) को, या ५ अभ्यास को कहते हैं जिन्हें अपने जीवन धारण करने से हमें 'सिद्धार्थ से बुद्ध या भ्रममुक्त-मनुष्य कहलाने का अधिकार' प्राप्त होता है। हमलोग यदि धर्म (यम-नियम) का पालन करके अपने अंतःप्रकृति को जीतने का प्रयत्न नहीं करें, तो हमलोग पशु बन जायेंगे।
पशु प्रकृति का अनुकरण करता है, प्रकृति के विरुद्ध संग्राम नहीं करता। पशु अपने बायोलॉजिकल इंस्टिंक्ट (पाशविक-प्रवृत्ति) को कायम रखने के लिये जिस संग्राम को अवश्यक समझता है, उतना ही संग्राम करता है। किन्तु केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है, जो प्रकृति के विरुद्ध संग्राम करके मनुष्य अपने प्रच्छ्न्न आन्तरिक देवत्व को विकसित कर सकता है। जो मनुष्य प्रच्छन्न भाव से अन्तर्निहित अपने भीतरी देवत्व को विकसित नहीं कर सका-उस मनुष्य जीवन सार्थक नहीं होता- व्यर्थ हो जाता है। 
महामण्डल विगत ५० वर्षों से देवता बनने और देवता बनाने की पूजा करता चला आ रहा है। यह पूजा हम अपने व्यक्तिगत जीवन मेँ शुरू कर सकते हैं। क्यों हम यह पूजा करेंगे? देवता बनने के लिये। अपने असली स्वार्थ को पूरा करने के लिये ही करना होगा। दूसरों का कल्याण तो स्वतः हो जायेगा। पहले मैं अच्छा चरित्रवान मनुष्य बनूँगा। इसिलिये महामण्डल का आदर्श वाक्य है Be and Make में  Be स्वयं देवता बनना है,और Make है देवता की पूजा करना। जो पूजा कर रहा है, और जो पूजित हो रहे हैं- इससे दोनों की उन्नति होगी। श्रीरामकृष्ण कहते हैं, शालिग्राम शीला मेँ जब भगवान विष्णु की पूजा हो सकती है, तो जीवंत मानव-शरीर मेँ ईश्वर की पूजा क्यों नहीं हो सकती? इसी प्रत्यक्ष देवता की पूजा करो, अन्य देवता की पूजा बाद मेँ देखी जाएगी।          
इसलिए महामण्डल विगत ५० वर्षों से वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर आयोजित करता आ रहा है, जहा समस्त सम्प्रदाय एवं जाति के युवाओं को बिना किसी भेदभाव के एक स्थान में एकत्र होने का और विचार-मंथन करने का अवसर बार बार प्राप्त होता है। 
[ महामण्डल द्वारा आयोजित 'वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर' केवल स्वामी विवेकानन्द का गुणगान करने या उनके प्रति आस्था और  विश्वास व्यक्त करने का उत्सव नहीं है। यह एक ऐसी घड़ी है, जो विगत ५० वर्षों से सही समय बतला रही है, और प्रति  वर्ष २५ से ३० दिसम्बर तक आयोजित होती आ रही है। और यह छः दिवसीय प्रशिक्षण युवाओं को एक नए युग के द्वार पर (सत्ययुग के द्वार पर) छोड़ जाती है। यही वह घड़ी है जो सोने वालों को जगाने, जागे हुओं को उठ खड़े होने और जो उठ गए हैं, उन्हें चल पड़ने की सीख देती है।अब कोई कारण नहीं है कि भारत के एक सौ बीस करोड़ लोग निराशा के भाव में जीने को विवश हों।  और कोई कारण नजर नहीं आता कि स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रदत्त भारत-निर्माण सूत्र - ' Be and Make' को जीवन में उतार  लेने से भारत का उदय न हो! वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर जैसे आयोजन अगर जीवन में आगे बढ़ने और सत्ययुग को स्थापित करने के मार्ग पर चलते रहने का पाठ पढ़ाते हैं तो कहीं यह सीख भी देते हैं कि पल भर ठहरकर हम अवोकन कर लें, अपनी दिशाएं स्पष्ट कर लें और पीछे जो भूलें हुई हैं, उन्हें ठीक करते हुए आगे बढ़ चलें। यह शिविर विचार मंथन का अवसर है। महामण्डल की 'शीक्षा'-२ : मनःसंयोग का प्रशिक्षण देकर महामण्डल अन्तः प्रकृति पर विजय प्राप्त करने में समर्थ मनुष्यों का निर्माण करना चाहता है। किसी भी युवा प्रशिक्षण शिविर के उद्घाटन सत्र में (इनॉगरल सेसन) महामण्डल के आदर्श उद्देश्य, उसके अविर्भूत होने की अनिवार्यता, धर्म और मजहब के अंतर समझने के युवाओं की बुद्धि को अनुप्रेरित करना चाहिये। और अन्तः प्रकृति को वशीभूत करने की पद्धति  'मनःसंयोयग का प्रशिक्षण' देने सर्वोत्तम उपाय है -गुरुगृह वास करते हुए प्रातः काल में लड़कों और लड़कियों के लिये अलग अलग 'युवा प्रशिक्षण शिविर' को आयोजित करना। और मनःसंयम की प्रथम कक्षा अगले दिन प्रातः ६ बजे से शंतिमंत्र के साथ शुरुआत करते हुए दी जानी चाहिये।  प्रशिक्षणार्थीयोंको (दो दिवसीय-लोकल लेवल शाम ४ बजे से अगले दिन शाम ४ बजे तक एकाग्रता पर (४९+१)= ५० मिनट का एक क्लास): त्रिदिवसीय- स्टेट लेवल एकाग्रता↬ का दो क्लास, चारदिवसीय- इंटरस्टेट लेवल एकाग्रता पर तीन क्लास, छःदिवसीय - ऑल इंडिया लेवल एकाग्रता पर ५ क्लास) युवा प्रशिक्षण शिविर (स्ट्रिक्टली फॉर मेन ओनली) में प्रशिक्षण देना। प्रशिक्षणार्थियों न्यूनतम आयु १८ वर्ष या शैक्षणिक योग्यता  मिनिमम क्वालिफिकेशन होगा हाइ स्कूल।सेमिनार या वन डे/हाफ़ डे डिस्कशन विचारगोष्ठी-जहाँ कार्य-कर्ताओं का अभाव है, वहाँ एक दिवसीय ( प्रातः ९ बजे से शाम ४ बजे तक)/ अर्ध दिवसीय  (१० से २ बजे तक) स्पीच डे, व्याख्यान दिवस या  सेमिनार  आयोजित हो सकते हैं। उसमें सेमिनार के वक्ता मनःसंयोग के साथ ऑटोसजेशन पर विशेष जोर देंगे। एवं प्रश्नोत्तरी कक्षा में चर्चा के विषय,शिक्षार्थियों की न्यूनतम आयु एवं शैक्षणिक योग्यता पीएचडी, एम.ए,बी.एड, ग्रेजुएशन, हाई स्कूल,आदि 'महामण्डल के आदर्श-उद्देश्य और कार्यपद्धति के अनुरूप ही होने चाहिये,तथा उन्हें केंद्रीय कार्यालय से अनुमोदित करवा लेना उचित होगा। 
1.Tuesday, July 16, २०१३ का ब्लॉग। कैम्प नोट २००५ पूज्य नवनीदा द्वारा सरीसा आश्रम में  धर्म क्या है?  एक लाख लोगों में से कोई एक व्यक्ति भी समझ ले तो बहुत है ! पर दिया गया व्याख्यान पूज्य दादा ने कहा है कि २००५ का ऐन्युअल कैम्प का मनःसंयोग क्लास सबसे अच्छा हुआ था। उस कैम्प में आठ राज्यों से १०६६ कैम्पर्स आये थे। 
 2.स्वामी विवेकानन्द जयन्ती के अवसर पर १९ जनवरी २०१४ को आज़ाद हिन्द पार्क में आयोजित महामण्डल के एक युवा रैली में अद्वैत आश्रम, कोलकाता के कार्यकारी अध्यक्ष स्वामी आत्मलोकानन्द का भाषण। ] 


गुरुवार, 2 नवंबर 2017

महर्षि कपिल का परिणामवाद

हमारा यह स्थूल शरीर और दृष्टिगोचर विश्व-ब्रह्माण्ड अस्तित्व में कैसे आ गया ? आइये इस रहस्य को हम आधुनिक युग में में ईश्वर (ब्रह्म) के अवतार भगवान श्रीरामकृष्ण द्वारा भारत की प्राचीन ' गुरु-शिष्य वेदाध्यापक प्रशिक्षण परम्परा' में  प्रशिक्षित एवं आधुनिक युग में मानवजाति के मार्गदर्शक नेता, लोक-शिक्षक,या 'वेदाध्यापक' (टीचर ऑफ़ वेदान्ता) स्वामी विवेकानन्द जी के शब्दों में समझने का प्रयास करते हैं। स्वामी विवेकानन्द जी कहते हैं -
 " भगवान कपिल ही दर्शन शास्त्र के पितामह हैं, वे व्यासदेव से भी प्राचीन हैं, इसीलिये हम उनकी बात सुनने के लिये बाध्य हैं। कपिल का 'सांख्य-दर्शन' ही विश्व का ऐसा सर्वप्रथम दर्शन है, जिसमें 'युक्ति-विचार पद्धति' से जगत् की उत्पत्ति और लय के सम्बन्ध में विचार किया गया है। विश्व के प्रत्येक तत्त्व जिज्ञाषु- वैज्ञानिक को उनके प्रति श्रद्धांजली अर्पित करनी चाहिये।" (४:२०४) " 
 " ... वयोवृद्ध और अत्यन्त पवित्र महर्षि भी इन प्रश्नों (सृष्टी-रचना के सिद्धान्त) का समाधान करने में असमर्थ हो रहे हैं; पर तभी एक ' युवक ' - उनके बीच खड़ा हो कर घोषणा करता है- ' हे अमृत के पुत्र सुनो, हे दिव्यधाम के निवासी सुनो - मुझे मार्ग मिल गया है ! जो अंधकार या अज्ञान के परे है, उसे जान लेने पर ही हम मृत्यु के परे जा सकते हैं, अन्य कोई मार्ग नहीं है। " (श्वेताशतर२/५/३-८) (वि० सा० ख० २:५८)
" कपिल का प्रधान मत है, 'परिणाम-वाद'। इस कार्य-कारण वाद या ' परिणाम- वाद ' से तात्पर्य है- 'कार्य' भी अन्य रूप में परिणत ' कारण ' मात्र ही है। जैसे ' घड़ा ' कार्य है, और ' मिट्टी ' है उसका कारण। कपिल के अनुसार अव्यक्त प्रकृति से ले कर चित्त,मन, बुद्धि, अहंकार तक कोई भी वस्तु पुरूष अर्थात भोक्ता या प्रशासक नहीं है। स्वरूपतः मन में चैतन्य नहीं है; किन्तु हम देखते हैं कि वह तर्कना करता है।अतएव उसके परे, निश्चित रूप से ऐसी कोई ' सत्ता ' होनी चाहिए, जिसका आलोक- महत्, बुद्धि, अहं-ज्ञान और अन्य परवर्ती परिणामों में व्याप्त है। इस सत्ता को कपिल ' पुरूष ' कहते हैं, वेदान्ती उसी को 'आत्मा' कहते हैं।...बुद्धि स्वतः क्रियाशील नहीं है- उसकी पृष्ठ भूमि में जो पुरूष विद्यमान हैं, उसीसे मानो उसमे कार्यशीलता आती है। " (४:२१२) 

" हमारे दो जगत हैं, बाह्य-जगत और अन्तर्जगत। यह सम्पूर्ण बाह्य-जगत्, अन्तर्जगत् या सूक्ष्मजगत् का स्थूल विकास मात्र है। विकसित होने या अभिव्यक्त होने की प्रक्रिया की सभी अवस्थाओं में सूक्ष्म को 'कारण' और स्थूल को 'कार्य' समझना होगा। इस नियम से, बाह्य-जगत् कार्य है और अन्तर्जगत् कारण। " (१:४२)
' बाह्य-जगत्'  तो तुम्हे अपने मन के अध्यन में प्रेरित करने के लिए एक उद्दीपक तथा अवसर मात्र है। सेब के गिरने ने न्यूटन को एक उद्दीपक प्रदान किया, उसने अपने मन का अध्यन किया और गुरुत्वाकर्षण का नियम मिल गया। ' (३:४)
 " एक पत्थर गिरा और हमने प्रश्न किया- इसके गिरने का कारण क्या है? हम यह निश्चित रूप से जानते हैं कि - बिना कारण कुछ कुछ भी घटित नहीं होता। मेरा अनुरोध है कि इस ' क्यों ' कि धारणा को खूब स्पष्ट रूप से समझ लो। जब हम यह प्रश्न करते हैं कि यह घटना क्यों हुई? तब यह मान लेते हैं, कि सभी घटनाओं का एक ' क्यों ' रहता ही है। अर्थात उसके घटित होने के पूर्व और कुछ अवश्य हुआ होगा, जिसने कारण का कार्य किया। इसी पूर्ववर्तिता और परवर्तिता के अनुक्रम को ही ' निमित्त ' अथवा कार्य-कारणवाद कहते हैं। " (२:८६) 
" शापेनहावर ने यह निष्कर्ष निकला कि ' इच्छा ' (Will) ही सभी चीजों का कारण है। ' होने ' की इच्छा से ही हमारी अभिव्यक्ति होती है"- किन्तु हम इससे इन्कार करते हैं। वास्तव में इच्छा और प्रेरक-नाड़ी (Motor-nerve) एक रूप है। जब हम किसी वस्तु को देखते हैं, तो इसमे इच्छा की कोई बात नहीं होती, जब इसकी संवेदनायें मस्तिष्क में स्थित दर्शन इन्द्रिय तक पहुँचती हैं- तब प्रतिक्रिया स्वरूप बुद्धि निर्णय करती है - 'यह करो ' अथवा ' यह न करो '। अहं तत्व की इस अवस्था को ही इच्छा कहते हैं। इच्छा का एक भी कण ऐसा नहीं है, जो प्रतिक्रिया का फल न हो। अतएव ' इच्छा ' के पूर्व बहुत सी वस्तुयें रहनी आवश्यक हैं। यह ' इच्छा ' अहं तत्व से निर्मित कोई प्रतिक्रिया मात्र है। और अहं तत्व का सृजन - उससे भी ऊँची वस्तु बुद्धि से होती है। और वह बुद्धि भी अविभक्त प्रकृति का परिणाम है। मनुष्य में महत्, महान् तत्व ( the  Great Principle) या बुद्धि (the Intelligence) सम्बन्धी बात को समझना बहुत आवश्यक है। " (वि० सा० ख ० ४: २०४ )
" देश-काल-निमित्त या नाम-रूप के साँचे से जब ' वह ' जो इच्छा रूप में परिणत हो जाता है, जो पहले इच्छा के रूपमें नहीं था, परन्तु बाद में देश-काल-निमित्त के साँचे में पड़ने से जो मानवीय इच्छा हो गया, वह अवश्य स्वाधीन है। और जब यह इच्छा इस वर्तमान नाम-रूप या देश-काल-निमित्त के साँचे से मुक्त हो जायगी तो ' वह ' पुनःस्वतंत्र हो जाएगा। " (३:६९) 
" अतएव ' इच्छा ' के पूर्व बहुत सी वस्तुयें जरुरी है। यह इच्छा- अहं तत्त्व से निर्मित कोई प्रतिक्रिया मात्र है। औरअहं तत्व का सृजन उससे भी ऊँची वस्तु बुद्धि से होती है। और यह बुद्धि भी अविभक्त प्रकृति का परिणाम है।"(४:२०४)
" इसे (परिणामवाद E=M को) समझना तुम्हारे लिए अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि समस्त विश्व में कोई ऐसा दर्शन नहीं है जो कपिल का ऋणी न हो। पाइथागोरस भारत आये और उन्होंने इस दर्शन का अध्यन किया। और वही ग्रीक लोगों के दार्शनिक विचारों का समारंभ था। " (४:२०४) 
" आधुनिक विकास-वाद का सिद्धांत कहता है, हर कार्य पूर्ववर्ती कारण की आवृत्ति मात्र है। परिस्थिति या परिवेश के कारण रूप-परिवर्तन होता है। योनी-परिवर्तनों के कारण को खोजने सृष्टि से बाहर जाने की जरुरत नहीं है। कार्य में ही कारण श्रृंखला विद्यमान है। विश्व का मूल कारण, ऐसी कोई शक्ति नहीं है, या कोई सत्ता नहीं है, जो इससे अलग रह कर रिमोट से इसको चला रही है। " (२:२८२)
" क्रमविकास-वाद क्या है? उसके दो अवयव क्या हैं ? एक है प्रबल अन्तर्निहित शक्ति, जो अपने को व्यक्त करने की चेष्टा कर रही है, और दूसरा है बाहर की परिस्थितियाँ, जो उसे अवरुद्ध किए हुये है, या वह परिवेश है जो उसे व्यक्त होने नहीं देता। अतः इन परिस्थितियों से युद्ध करने केलिये यह ' शक्ति ' नये नये शरीर धारण कर रही है। एक अमीबा इस संघर्ष में एक और शरीर धारण करता है, और कुछ बाधाओं पर जय-लाभ करता है, और इस प्रकार भिन्न भिन्न शरीर धारण करते हुये अन्त में मनुष्य में परिणत हो जाता है। " (२:९१)
" प्रकृति या Nature का अधिक वैज्ञानिक नाम है- ' अव्यक्त '। जो अभिव्यक्त या प्रकट नहीं या भेदात्मक नहीं है, उससे ही सब पदार्थ उत्पन्न हुये हैं। उसीसे अणु-परमाणु, जड़-पदार्थ, शक्ति, मन, बुद्धि सब प्रसूत हुये हैं। सांख्यों ने अव्यक्त का लक्षण बताया है, त्रि-शक्तियों की (तीन शक्ति -सत्, रज, तम) साम्यावस्था। जब आकर्षण-शक्ति (Centripetal-force) अर्थात ' तमस ' और विकर्षण-शक्ति (Centrifugal-force) अर्थात ' रजस ' - जब पूरी तरह से ' सत्व ' के द्वारा संयत रहतीं हैं, अथवा पूर्ण साम्य की अवस्था में रहतीं हैं, तब सृष्टि का अस्तित्व नहीं रहता। किन्तु यह साम्यावस्था ज्योंही नष्ट होती है, उनका संतुलन भंग हो जाता है, और उनमे से एक शक्ति दूसरे से प्रबलतर हो उठती है, त्योंही गति (प्राण) का आरम्भ होता है और सृष्टि होने लगती है ।" (४:१९३)
" प्रकृति या अव्यक्त ...एक सर्वव्यापी जड़-राशिस्वरूप है। इसी अव्यक्त या प्रकृति में बाह्य-जगत् के समस्त वस्तुओं के ' कारण ' विद्यमान हैं। व्यक्त अवस्था की सूक्ष्म दशा को- ' कारण ' कहते हैं, यह उस वस्तु की अन्-अभिव्यक्त अवस्था है, जो अभिव्यक्ति को प्राप्त होती है।...कारण में प्रत्यावर्तन का नाम ही विनाश है। " (४:२०१)
 ' नाशः कारणलयः ' - नाश (मृत्यु) का अर्थ है कारण में लय हो जाना। (वि० सा० ख० २:१०१) 
" अव्यक्त (Nature) अर्थात एक अखण्ड, अविभक्त (द्रव्य या ) जड़-राशि के उस सर्वव्यापी विस्तार की कल्पना करो - जो प्रत्येक वस्तु की प्रथम अवस्था है, और यह उसी प्रकार परिवर्तित होने लगता है, जिस प्रकार दूध परिवर्तित हो कर दही बन जाता है। ब्रह्माण्ड (Cosmos) में इस Nature या अव्यक्त की प्रथम अभिव्यक्ति को सांख्य के शब्दों में-' महत्' कहा जाता है।' महत् ' तत्त्व का शाब्दिक अर्थ है, 'द अल्टीमेट सोर्स' (The Ultimate Source) ' महान आधारभूत कारण - हम इसे बुद्धि (Intelligence) कह सकते हैं। अर्थात प्रकृति में जो प्रथम परिवर्तन हुआ उससे ' बुद्धि ' की उत्पत्ति हुई। 
मैं उस ' महान आधारभूत कारण ' या महत् को अंग्रेजी में चेतना, होश,या आत्म-चेतना (Self-Consciousness) नहीं कह सकता, क्योंकि वह ग़लत होगा। चेतना तो इस ' सार्वभौम बुद्धि ' का अंशमात्र है। महत् तत्व सर्वव्यापी है, चेतन (जाग्रतअवस्था -Consciousness), अवचेतन (स्वप्नावस्था Sub-Consciousness), अचेतन (सुषुप्ति -Unconsciousness)और अतिचेतन(तुरीयावस्था Super-Consciousness) सब (मन-बुद्धि के सारे स्तर) इसके अर्न्तगत आ जाते हैं। इसीलिये इस महत् या बुद्धि के 'अल्टीमेट सोर्स' या महान आधारभूत कारण के लिए चेतना की किसी अकेली अवस्था मात्र के लिए प्रयुक्त करना पर्याप्त नहीं माना जाएगा। फ़िर यह महत् पदार्थ या ' बुद्धि ' जब (दूध से दही के समान) स्थूलतर पदार्थ (Grosser Matter) में परिवर्तित होता है, तब प्रकृति या अव्यक्त के दुसरे परिवर्तन को 'अहं-तत्व' (Egoism) कहते हैं।
फिर यह अव्यक्त (नेचर या प्रकृति) अपने तीसरे और अन्तिम परिवर्तन में स्वयं को -' सार्वभौम संवेदक इन्द्रियों' (Universal Sense-Organs) तथा 'सार्वभौम तन्मात्राओं' (Universal Fine-Particles)  के रूप में अभिव्यक्त करती है। और ये अन्तिम वस्तुएं पुनः संयुक्त हो कर इस स्थूल-' बाह्य जगत् ' में परिणत हो जातीं हैं। इस प्रकार वह सूक्ष्म ' महत् ' तत्त्व ही बाह्य ' जगत् ' के रूप में परिणत हो गया है। जड़-पदार्थों और मन में परिणामगत भेद के अतिरिक्त कोई भेद नहीं है। सूक्ष्म एवं स्थूल स्वरूप में एक ही पदार्थ है, एक ही दुसरे में बदल जाता है। ... मन (mind) और मस्तिष्क(Brain) में अन्तर नहीं है, दोनों जड़ पदार्थ हैं, मन सूक्ष्म जड़ है, मस्तिष्क स्थूल जड़ है। " (वि० सा० ख० ४: २०२)
" सत्व,रज और तम- जगत के उपादान हैं, जिनसे समग्र विश्व विकसित हुआ है। कल्प के प्रारम्भ में ये साम्यावस्था में रहते हैं। सृष्टि का आरम्भ होने पर ही ये उपादान परस्पर अनन्त प्रकार से संयुक्त हो कर इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि करते हैं। इसका प्रथम विकास महत् अथवा सर्वव्यापी बुद्धि है, और उससे अंहकार की उत्पत्ति होती है। अंहकार से मन अथवा सर्वव्यापी मनस-तत्व  का उद्भव होता है। इस अहंकार से ही, मस्तिष्क में अवस्थित ज्ञान और कर्म के इन्द्रियों या स्नायू-केन्द्रों तथा तन्मात्राओं की उत्पत्ति होती है। तन्मात्राओं को प्रत्यक्ष नहीं किया जा सकता, किन्तु वे जब स्थूल परमाणु बन जाते हैं, तब हम उन्हें अनुभव और इन्द्रियगोचर कर सकते हैं। बुद्धि, अंहकार और मन - इन तीन माध्यमों से कार्य करने वाला, ' चित्त ' - ही प्राण नामक शक्तियों की सृष्टि कर के उन्हें परिचालित कर रहा है। तुम्हे इस कुसंस्कार को अवश्य त्याग देना चाहिए कि प्राण केवल श्वास-प्रश्वास (Breath) है, श्वास-प्रश्वास तो प्राण का कार्य मात्र है। प्राण ही वायु पर कार्य कर रहा है, वायु प्राण के ऊपर नहीं। " (४:२११)
" प्राण का अभिप्राय है ऊर्जा (Energy)- जो सभी तरह की गति या सम्भाव्य गति, शक्ति या आकर्षण के रूपों में अपने को अभिव्यक्त करता है। "(४:१५२)
"आजकल हम जिसे जड़-पदार्थ (matter) कहते हैं, उसे प्राचीन हिंदू भूत अर्थात बाह्य तत्व कहते थे। उनके मतानुसार एक तत्व नित्य है, शेष सब इसी एक से उत्पन्न हुए हैं। इस मूल तत्व को ' आकाश ' की संज्ञा प्राप्त है। आजकल ईथर शब्द से जो भाव व्यक्त होता है, यह बहुत कुछ उसके सदृश है, यद्दपि पुर्णतः नहीं। इस मूलभूत आकाश-तत्व के साथ प्राण नाम की आद्य उर्जा भी रहती है। प्राण (Energy) और आकाश (Matter) संघटित और पुनः संघटित हो कर शेष तत्वों (वायु,अग्नि,जल,पृथ्वी) का निर्माण करते हैं। कल्पान्त में सबकुछ प्रलयगत हो कर आकाश और प्राण में लौट जाता है। " (४:१९४) 
" ब्रह्माण्ड में जो उर्जा व्याप्त है, उसका नाम है प्राण और वह इन भूतों में शक्ति के रूप में निवास करती है। प्राण के प्रयोग का महान उपकरण है मन। मन भी भौतिक पदार्थ है। मन से परे है आत्मा, जो प्राण को धारण करता है। आत्मा वह ' विशुद्ध बुद्धि ' है जिससे प्राण नियंत्रित और निर्दिष्ट होता है। मन अत्यन्त सूक्ष्म भौतिक पदार्थ है, जो प्राण को अभिव्यक्त करने का एक उपकरण है। अभिव्यक्ति के लिए  ऊर्जा या शक्ति (Energy) को भौतिक पदार्थ (Matter) की आवश्यकता होती है। " (४:९७) 
" कॉस्मिक-प्लान या ब्रह्माण्ड का विधान है-' यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे ' - जो ब्रह्माण्ड में है, वह अवश्य पिण्ड में भी होगी। (What is in The Cosmos must also be microcosmic.) उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति (Individual) को लो; उसमे निहित वह भौतिक प्रकृति (अव्यक्त) इस ' सार्वभौम-बुद्धि ' या महत् के एक लघु कण में परिवर्तित हो जाती है। फ़िर उस सार्वभौम बुद्धि का एक लघु कण ' अहं-तत्त्व ' में परिणत हो जाता है, यह ' अहं ' ही उस व्यक्ति के स्थूल एवं सूक्ष्म भौतिक शरीर का संयोजन और निर्माण करते हैं। " (४:२०३)
" मैं तुम लोगों को देख रहा हूँ। इस दर्शन-क्रिया के लिए किन किन बातों की आवश्यकता है ? पहले तो आँख --आँखें रहनी ही चाहिए। मेरी अन्य सब इन्द्रियाँ भले ही अच्छी रहें, पर यदि मेरी आँखें न हों, तो मैं तुम लोगों को न देख सकूँगा। अतएव पहले मेरी आँखें अवश्य रहनी चाहिए। दुसरे, आंखों के पीछे और कुछ रहने की आवश्यकता है, और वास्तव में वही तो दर्शन-इन्द्रिय है। यह यदि हममे न हो, तो दर्शन -क्रिया असंभव है। 
वस्तुतः आँखें इन्द्रिय नहीं हैं, वे तो दृष्टि की यंत्र मात्र हैं। यथार्थ इन्द्रिय आंखों के पीछे, हमारे मस्तिष्क में अवस्थित इसका नाड़ी-केन्द्र (Optic- nerve) है। यदि यह केन्द्र किसी प्रकार नष्ट हो जाये, तो दोनों आँखें रहते हुए भी मनुष्य कुछ देख न सकेगा।अतएव दर्शन क्रिया के लिए इस असली इन्द्रिय का अस्तित्व नितान्त आवश्यक है। हमारी अन्यान्य इन्द्रियों के बारे में भी ठीक ऐसा ही है। बाहर के कान धवनी-तरंगों को भीतर ले जाने के यन्त्र मात्र हैं, पर उस ध्वनी-तरंग को मस्तिष्क में अवस्थित उसके नाड़ी-केन्द्र या श्रवण - इन्द्रियों तक अवश्य पहुंचना चाहिए।
 पर इतने से ही श्रवण-क्रिया पूर्ण नहीं हो जाती। कभी-कभी ऐसा होता है कि पुस्तकालय में बैठ कर तुम ध्यान से कोई पुस्तक पढ़ रहे हो,घड़ी में बारह बजने का टंकार पड़ता है, पर तुम्हे वह ध्वनी सुनायी नहीं देती। क्यों ? वहाँ ध्वनी तो है, वायु-स्पन्दन, कान और केन्द्र भी वहाँ हैं और कान के मध्यम से मस्तिष्क में अवस्थित उसके नाड़ी-केन्द्र तक स्पन्दन पहुँच भी गए हैं, पर तो भी तुम उसे सुन नहीं सके। किस चीज कि- कमी थी ? इस इन्द्रिय के साथ मन का योग नहीं था। 
अतएव हम देखते हैं कि मन का रहना भी नितान्त आवश्यक है। पहले चाहिए यह बहिर्यंत्र, जो मानो विषय को वहन करके नाड़ी-केन्द्र या इन्द्रिय के निकट ले जाता है। फ़िर(स्थूल शरीर में अवस्थित) उस इन्द्रिय (Optic-nerve) के साथ (सूक्ष्म-शरीर में अवथित) मन को भी  युक्त रहना चाहिए। जब मस्तिष्क में अवस्थित इन्द्रिय से मन का योग नहीं रहता, तब कर्ण-यन्त्र और मस्तिष्क के केन्द्र पर भले ही कोई विषय आकर टकराये, पर हमें उसका अनुभव न होगा। 
मन भी केवल एक वाहक है, वह इस विषय की संवेदना को और भी आगे ले जा कर बुद्धि को ग्रहण कराता है। बुद्धि उसके सम्बन्ध में निश्चय करती है, पर इतने से ही नहीं हुआ। बुद्धि को उसे फ़िर और भी भीतर ले जाकर (स्थूल और सूक्ष्म दोनों) शरीर के राजा आत्मा के पास पहुँचाना पड़ता है। उसके पास पहुँचने पर वह आदेश देती है, ' हाँ, यह करो' या 'मत करो'। तब जिस क्रम में वह विषय संवेदना आत्मा तक गयी थी, ठीक उसी क्रम से वह बहिर्यंत्र में आती है- पहले बुद्धि में, उसके बाद मन में, फ़िर मस्तिष्क-केन्द्र में और अन्त में बहिर्यंत्र में; तभी विषय-ज्ञान की क्रिया पूरी होती है। " (२: १०९-१०)
" ये सब यंत्र आँख, कान, नाक आदि और उनका मस्तिष्क में स्थित स्नायु केन्द्र अथवा ' इन्द्रिय ' मनुष्य के स्थूल देह में अवस्थित है, पर मन और बुद्धि नहीं। मन और बुद्धि तो उसमें है, जिसे हिंदूशास्त्र - 'सूक्ष्म-शरीर' कहते हैं और इसाई शास्त्र 'आध्यात्मिक-शरीर' कहते हैं। वह इस स्थूल शरीर से अवश्य बहुत ही सूक्ष्म है, परन्तु फ़िर भी आत्मा नहीं है। क्योंकि जिस प्रकार शरीर कभी सबल कभी दुर्बल होता है, उसी प्रकार मन भी कभी सबल कभी निर्बल हो जाता है। अतः मन आत्मा नहीं है, क्योंकि आत्मा कभी जीर्ण या क्षयग्रस्त नहीं होती। आत्मा इन सबके अतीत है। "(२:११०)
"जब मन किसी बाह्य-वस्तु का अध्यन करता है, तब वह उससे अपना तादात्म्य स्थापित कर लेता है, और स्वयं लूप्त हो जाता है। यह 'मन' आत्मा का ' दिव्य चक्षू ' है ! हमारा  मन उस  स्फटिक खंड के समान है, जो अपने निकट की वस्तुका रंग ग्रहण कर लेता है। हम लोगों ने शरीर का रंग ग्रहण कर लिया है,अर्थात शरीर के साथ अपना तादात्म्य स्थापित कर लिया है, और भूल गये हैं कि हम क्या हैं। ....हम लोग उसी प्रकार शरीर नहीं हैं, जिस प्रकार स्फटिक ' लाल फूल ' नहीं है।... आत्मा की स्वस्थतम अवस्था - तब है जब वह 'स्व' का चिन्तन कर रही हो और अपनी गरिमा में स्थित हो।" (४:१३१)
" मनुष्य दिव्य है, यह दिव्यता ही हमारा स्वरूप है। अन्य जो कुछ है वह अध्यास मात्र है। उसके दिव्य स्वरूप का कभी भी नाश नहीं होता। यह जिस प्रकार ' परम-संत ' में है, वैसे ही ' महा-अधम ' व्यक्ति में भी है। हमे अपने इसदेव-स्वभाव का केवल आह्वान करना होगा, और वह स्वयं ही अपने को प्रकट कर देगा। चकमक पत्थर और सूखी- लकड़ी में आग रहती है, पर उस आग को बाहर निकालने के लिये घर्षण आवश्यक था। नीचे धरती पर रेंगने वाला क्षुद्र कीड़ा और स्वर्ग का श्रेष्ठतम देवता इन दोनों में ज्ञान का भेद प्रकार्गत नहीं, परिणाम गत है। " (२:१८२)
" अगर कोई व्यक्ति हत्यारा है, तो उसमे प्रतिफलक (मन-दर्पण) बुरा है, न कि आत्मा। दूसरी ओर अगर कोई साधू है तो उसमे प्रतिफलक शुद्ध है। सत्ता केवल एक ही है जो कीट से लेकर पूर्णतया विकसित मनुष्य (बुद्ध या ईशा) तक में प्रतिबिम्बित है। इस तरह सम्पूर्ण विश्व एक एकत्व, एक सत्ता है- भौतिक, मानसिक, आध्यात्मिक, हर दृष्टि से। इस एक सत्ता को ही हम विभिन्न रूपों में देखते हैं। " (२:११२)
" जगत को विचार कि दृष्टि से देखने पर.… प्रतीत होगा कि, इसका एक-एक आदमी एक-एक विशेष मन है। तुम एक मन हो, मैं एक मन हूँ, प्रत्येक व्यक्ति केवल एक मन है। फ़िर इसी जगत को ज्ञान कि दृष्टि से देखने पर,.... अर्थात जब आंखों पर से मोह का आवरण हट जाता है, जब मन शुद्ध और पवित्र हो जाता है, तब यही पहले के एक-एक मन उसी अखंड पूर्णस्वरूप 'पुरूष' के विभिन्न रूप प्रतीत होते हैं।" (२:३२) 
 " अहं को निकाल डालो , उसका नाश कर डालो, उसे भूल जाओ, अपने द्वारा ईश्वर को कार्य करने दो- यह उन्ही का कार्य है,उन्हें ही करने दो।...." पहले अपने (मन) को जीत लो , फ़िर सम्पूर्ण जगत तुम्हारे पैरों के नीचे आ जायगा ।" (७:२२)
." तुच्छ अहं को नष्ट कर डालो , केवल महत अहं को रहने दो। हम अभी जो कुछ हैं, वह सब अपने चिन्तन का फल है। इसलिए तुम क्या चिन्तन करते हो, इस विषय में ध्यान दो, विशेष ध्यान रखो। शब्द-वाणी तो गौण वस्तु हैं। चिन्तन ही बहुकाल स्थाई है और उसकी गति भी दूर व्यापी है। हम जो कुछ चिन्तन करते हैं, उसमे हमारे चरित्र की छाप लग जाती है."(७:२२).... 
" जितनी बार तुम कहते हो, ' तू नहीं मैं' ; उतनी बार तुम अनन्त को यहाँ ( अपने देह-मन के माध्यम से) अभिव्यक्त करने का व्यर्थ में प्रयास करते हो। इसी से संसार में प्रतिद्वंदिता, संघर्ष और अनिष्ट की उत्पत्ति होती है। पर अन्त में 'मिथ्या-मैं' का त्याग होगा, यह 'मैं' मर जायगा। इस तुच्छ पृथक अहंता को नष्ट होना ही चाहिए।" (२:१७७)
" यह जो (अमुक नाम वाले व्यक्ति) के रूप में मेरा नाम- रूपात्मक चेहरा दिख रहा है, इसके पीछे जो असीम विद्यमान है, उसी ने अपने को बहिर्जगत में व्यक्त करने के लिए जैसा रूप धारण करने कि इच्छा की थी- उसी का परिणाम है। इस (नाम-रूपात्मक)- 'मैं' को फ़िर पीछे लौट कर अपने अनन्तस्वरूप में मिल जाना होगा."(२:१७६) 
..." अहं - ही वह वज्रदृढ़ प्राचीर है, जिसने हमे बद्ध कर रखा है, और भोग वासना है लाख फन वाला सर्प , हमे उसे कुचलना ही होगा."(७:२३)..
" प्रत्येक वस्तु क्रम-परिवर्तन शील है। यह सारा विश्व ही परिवर्तन शीलता का एक पिंड है।आज के पर्वत कल समुद्र थे , और कल वहां पुनः समुद्र दिखाई देगा।  एकमात्र ईश्वर ही ऐसा है, जिसमे कभी परिवर्तन नहीं होता, हम उसके जितने समीप लौटेंगे, प्रकृति का अधिकार हम पर उतना ही कम होता जायगा,उतना ही कम परिवर्तन या विकार हम में होगा। और जब हम उस तक पहुंच जायेंगे- तो हम प्रकृति पर विजय प्राप्त कर लेंगे, प्रकृति के सारे व्यापार हमारे अधीन हो जायेंगे,और हम पर उनका कोई प्रभाव न पडेगा।"(३:१०६)
" हमारा यह शरीर वृद्धि और क्षय के नियमों से बद्ध है, - जिसकी जन्म और वृद्धि है, उसका क्षय भी अवश्यमेव होगा। परन्तु देहमध्यस्त आत्मा तो असीम एवं सनातन है, वह अनादी और और अनन्त है। ...काल कि गति काशाश्वत सत्ता पर कोई असर नहीं होता।....मानव-बुद्धि के लिये सर्वथा अगम्य जो 'अतीन्द्रिय-भूमि ' है, वहाँ न तो 'भूत' है न 'भविष्य'। वेदों का कथन है कि मानव कि आत्मा अमर है। "(१:२५४)
'सूक्ष्म-शरीर' क्या है ? " मन, अहं-बोध, मस्तिष्क स्नायु-केन्द्र या इन्द्रिय, और प्राण - इन सबके संयोग से ' सूक्ष्म-शरीर ' बनता है, जिसे इसाई दर्शन में मानव का आध्यात्मिक देह कहते हैं।  इस देह (सूक्ष्म शरीर या मन ) को ही उद्धार और दण्ड प्राप्त होता है, इसका ही बार- बार जन्म और पुनर्जन्म होता है। " (४:२१३)
"परन्तु मुझमे कुछ अहं था, इसीलिए उस समाधि कि अवस्था से लौट आया था." (६:९९)...
" जब मैं लड़ता हूँ , कमर कस कर लड़ता हूँ- इसके मर्म को समझता हूँ। श्री रामकृष्ण के दासानुदासों में से कोई न कोई मुझ जैसा अवश्य बनेगा, जो मुझे समझेगा। "(६:३८३)
" इस जन्म-मृत्यु की समस्या की यथार्थ मीमांसा के लिए यदि यम के द्वार पर जा कर भी सत्य का लाभ कर सको तो निर्भय ह्रदय से वहाँ जाना उचित है। भय ही मृत्यु है। भय से पर हो जाना चाहिए। अपने मोक्ष तथा परहित के निमित्त आत्मोसर्ग करने के लिए अग्रसर हो जाओ। ...दधिची के समान औरों के लिए अपना हाड-मांस दान कर दो। जो ब्रह्मज्ञ हैं, जो अन्य को भय से पार ले जाने में समर्थ हैं,वे ही यथार्थ गुरु हैं। "(६:३३)
" यह मानव आत्मा देह से देहान्तर में संक्रमित हो रही है, इस प्रवास में वह कितने ही भिन्न भिन्न रूपों में व्यक्त हुई है एवं होगी। आध्यात्मिक विकास के उस महान नियमानुसार वह अधिकाधिक अभिव्यक्त हो रही है। परन्तु जब वह सम्पूर्ण अभिव्यक्त हो जायेगी, तब उसमे और अधिक परिणाम न होगा। (१:२५४)
" (यदि कार्य-कारण वाद या परिणाम वाद सच है) तो हमे अपने पूर्व जन्मों का कुछ भी स्मरण क्यों नहीं है?मनः समुद्र की उपरी सतह का नाम ही चेतन अवस्था है। किन्तु उसकी गहराई में (अवचेतन मन में) संचित है, मानव के समस्त सुखात्मक और दुखात्मक अनुभव। मानव आत्मा कुछ ऐसी वस्तु पाने की इच्छा करती है, जोअचल हो, अविनाशी हो। जबकि हमारा यह शरीर और मन ही क्या, नाना रूपात्मक यह समस्त प्रकृति ही अनवरत परिवर्तनशील है। पर हमारी अन्तरात्मा की सर्वोच्च अभिलाषा (या तड़प) यही है, कि उसे कुछ ऐसा प्राप्त हो जाये, जिसका परिवर्तन नहीं होता, जो चिर(शान्ति) पूर्णता को पा चुकी हो। और यही है उस असीम के लिये मानवात्मा कि अभीप्सा ! हमारा नैतिक और मानसिक विकास (अर्थात चरित्र-निर्माण) जितना ही सूक्ष्मतर होता जायेगा, उस अपरिवर्तनशील सत्ता के प्रति हमारी अभीप्सा (व्याकुलता) भी उतनी ही दृढ़ होती जायेगी। "(१:२५५)
" हमारे ऋषि तो यह कहते हैं, कि इन्द्रियजन्य सुखों में तृप्त रहना उन कारणों में से एक है, जिसने सत्य और हमारे बीच परदा सा डाल दिया है। केवल कर्म-कांडों में रूचि, इन्द्रियों में तृप्ति तथा नाना प्रकार मतवादों ने हमारे और सत्य के बीच एक आवरण डाल रखा है।' एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति ' - सत्ता केवल एक है, ऋषिगण उसे विभिन्न नामों से पुकारते हैं।...सत्य तो चिरकाल से ही विद्यमान था, केवल इस (नाम-रूप) के आवरण ने ही उसे ढँक रखा था। " (१:२५५) 
"हम विश्व के रहस्य को हल करने की चेष्टा करते हैं। ऐसा लगता है कि यह सब हमे अवश्य जान लेना चाहिए, हमे ऐसा कभी महसूस नहीं होता कि 'ज्ञान' कोई प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं है। ....किन्तु अति बलवान इन्द्रियाँ मनुष्य की आत्मा को, 'अवशीभूत मन' - रूपी शत्रु की सहायता से बाहर की विषयों में खींच लातीं हैं। और मनुष्य ऐसे स्थान में सुख की खोज करने लगता है, जहाँ वे हैं ही नहीं, जहाँ वह उन्हें कभी पा नहीं सकता। ...हम कुछ कदम आगे जाते हैं, कि अनादी-अनन्त कालरुपी प्राचीर व्यवधान बन जाता है; जिसे हम लाँघ नहीं सकते। कुछ दूर बढ़ते ही असीम देश का व्यवधान खड़ा हो जाता है, फ़िर यह सब कार्य-कारण रूपी दीवार द्वारा सुदृढ़ रूप से सीमा-बद्ध है !...तो भी हम संघर्ष करते हैं !" (२:७४)
" इन्द्रियपरायण जीवन से अतीत होने की हमारी असमर्थता, और शारीरक विषय-भोगों के लिये उद्यम ही संसार में सभी प्रकार के आतंकों (भ्रष्टाचार) तथा दुखों का कारण है। "(४:११४)
." हमारे चारो ओर अनेक मोह रूपी जाल हैं, कुछ क्षण के लिए हमे प्रतीत होता है कि हम स्वर्गीय दिव्य ज्योति में तन्मय हो जाएंगे , परन्तु कुछ ही देर बाद कोई दृश्य या स्मृति हमारे पाशविक भाव को भड़का देती है।" (७:२४९)
" वास्तव में पाशविक भाव के उपर विजय प्राप्त कर लेने, तथा जन्म-मरण के प्रश्न को सुलझा लेने और श्रेय -प्रेय के बीच के भेद को जान लेने कि अपेक्षा और श्रेष्ठ है ही क्या ?"(७:२५०)
" स्वाधीनता ही उच्च जीवन की कसौटी है।आध्यात्मिक जीवन उस समय प्रारम्भ होता है, जिस समय तुम अपने को इन्द्रिय बन्धनों से मुक्त करलेते हो। जो इन्द्रियों के अधीन है, वही संसारी है, वही दास है। " (४:४३)
" एक अन्तर्निहित शक्ति मानो लगातार अपने स्वरूप में व्यक्त होने के लिये - अविराम चेष्टा कर रही है, और बाह्य परिवेश उसको दबाये रखने के लिये प्रयासरत है, बाहरी दबाव को हटा कर प्रस्फुटित हो जानेकी इस चेष्टा का नाम ही जीवन है।" (विवेकानन्द चरित-पृष्ठ १०८)
"सच पूछा जाय तो 'पूर्ण-जीवन' शब्द ही स्वविरोधात्म्क है। जीवन तो हमारे एवं प्रत्येक वाह्य वस्तु के बीच एक प्रकार का निरन्तर संघर्ष है।" (३:५९)
 " मैं जीवन से उच्चतर कोई वस्तु हूँ; जीवन सदैव दासता है। हम (और जीवन ) सदा घुल-मिल जाते हैं। "(४:१३६) 
" हम सबों में मुक्ति की भावना-स्वाधीनता की भावना हुआ करती है, उसी से यह संकेत मिलता है कि हमारे अन्तराल में, शरीर(Hand) और मन (Head) से परे भी कुछ और है। हमारी अन्तर्यामी आत्मा(Heart) स्वरूपतः स्वाधीन है और वही हममे मुक्ति की इच्छा जाग्रत करती है। " (१:२५६)
" प्रकृति हमे चारो ओर से दमित करने का प्रयास कर रही है, और आत्मा अपने को अभिव्यक्त करना चाहती है। प्रकृति कहती है - ' मैं विजयी होउंगी ' ; आत्मा कहती है- ' विजयी मुझे होना है '। प्रकृति कहती है- ठहरो, मैं तुम्हे चुप रखने के लिये थोड़ा सुख भोग दूंगी। आत्मा को थोड़ा मज़ा आता है, क्षण भरके लिये वह धोखे में पड़ जाती है, पर दुसरे ही क्षण वह फ़िर मुक्ति के लिये चीत्कार कर उठती है।" (३:१७३) 
" हम वस्तुतः वही अनन्तस्वरूप हैं- अपने उसी अनन्त स्वरूप को अभिव्यक्त कर रहे हैं। यहाँ तक तो ठीक है। पर इसका क्या मतलब कि, जब तक हम सब पूर्ण नहीं हो जाते, अनन्त क्रमशः अधिकाधिक व्यक्त होता रहेगा ? पूर्णता का अर्थ है-अनन्त , और अभिव्यक्ति का अर्थ है- ससीम। तो क्या हम असीम रूप से ससीम बन जायेंगे ? पर यह स्वविरोधी वाक्य है।  (तात्पर्य यह है कि )....हम अपने ईश्वर भाव को भूल कर, पशु जैसे हो गये थे। अब हम फ़िर उन्नत्ति के मार्ग पर चल रहे हैं, और इस बंधन से बाहर होने का प्रयत्न कर रहे हैं, हम प्राणपन से उसकी चेष्टा कर रहे हैं,....पर अन्त में एक समय आएगा, जब हम देखेंगे कि - जब तक हम इन्द्रियों के गुलाम बने हुए हैं, तब तक पूर्णता कि प्राप्ति असंभव है। तब हम अपने मूल अनन्तस्वरूप कि ओर लौटना शुरू करेंगे। यही त्याग है, यही नैतिकता है। "(२:१७५)
" यह चित्त अपनी स्वाभाविक पवित्र अवस्था को फ़िर से प्राप्त कर लेने के लिये सतत् चेष्टा कर रहा है, किन्तु इन्द्रियाँ उसे बाहर खींचे रहती हैं। चित्त में बाहर जाने और विषय भोगों में चिपके रहने की जो प्रवृत्ति है- उसका दमन करना होगा और उसके बहिर्मुखी प्रवाह (पर वैराग्य का फाटक लगा कर, या लालच को कम करके ) को आत्मा की ओर मोड़ देना होगा। यही योग का पहला सोपान है। "(१:११८)
" असीम शक्ति का एक स्प्रिंग इस छोटी सी काया में कुण्डली मारे विद्यमान है, और वह स्प्रिंग अपने को फैला रहा है। और ज्यों ज्यों यह फैलता है, त्यों त्यों एक के बाद दूसरा शरीर अपर्याप्त होता जाता है, वह उनका परित्याग कर उच्चतर शरीर धारण करता है। यही है मनुष्य का धर्म, सभ्यता या प्रगति का इतिहास। वह भीमकाय ' प्रोमिथियस ' (एक यूनानी देवता जिसने olampious से चुराई हुई अग्नि मनुष्य को दिया और जिसे दंड स्वरूप जंजीरों में जकड़ दिया गया) मानो अपने को बंधन मुक्त कर रहा है। " (९:१५६)
" मेरी ही यह 'विश्वजनीन बुद्धि' - क्रमसंकुचित हुई थी, और वही क्रमशः अपने को अभिव्यक्त कर रही है, जब तक कि वह पूर्ण मानव में परिणत नहीं हो जाती। फ़िर वह अपने उत्पत्ति-स्थान में लौट जायगी , ब्रह्मलीन हो जायेगी । धर्म तत्वज्ञ इस विश्वव्यापी बुद्धि को ही ईश्वर कहते हैं।" (२:१०६)
" हमारे इस अविराम,कठोर जीवन-संग्राम का लक्ष्य है, अंत में उनके निकट पहुँच कर उनके साथ एकीभूत हो जाना। " (४:५०)
" पूर्णता ही मनुष्य का स्वभाव है, केवल उसके किवाड़ बंद हैं, वह अपना यथार्थ रास्ता नहीं पा रही है, यदि कोई इस बाधा को दूर कर सके तो, उसकी स्वभाविक पूर्णता अपनी शक्ति के बल से अभिव्यक्त होगी ही। मनःसंयोग का अभ्यास और चरित्र निर्माण की साधना ही उस पूर्णता के किवाड़ को खोल देता है, जो हमारा स्वभाव है,वह दिव्यता प्रकट हो जाती है।" (१:२०६)
 " स्वयं 'व्यास देव' भी पूर्णत्व प्राप्त करने में , पूर्ण रूप से सफल न हो सके थे, परन्तु उनके पुत्र - ' शुकदेव' जन्म से ही सिद्ध थे।......जो मनुष्य ' विदेह' बन चुका है; जिस मनुष्य ने स्वयं पर अधिकार प्राप्त कर लिया है, ( मन को पूरी तरह से जीत लिया है ) उसके उपर बाहर की कोई भी चीज अपना प्रभाव नहीं डाल सकती, उसके लिए किसी भी प्रकार की दासता शेष नहीं रह जाती। उसका मन स्वतन्त्र हो जाता है- और केवल ऐसा पुरूष ही संसार में रहने के योग्य है। "(३:६६)
 " जो पूर्ण है , वह किसी के द्वारा कभी अपूर्ण कैसे हो सकता है? जो मुक्त है, वह कभी बंधन में कैसे पड़ सकता है? तुम कभी बंधन में नहीं थे। तुम पूर्ण हो, ईश्वर पूर्ण है, तुम सब पूर्ण हो, सत्ता एक ही हो सकती है, दो नहीं। पूर्ण को कभी अपूर्ण नहीं बनाया जा सकता।......तुम लक्ष्य तक पहुंच चुके हो-जो भी गन्तव्य है। मन को कदापि न सोंचने दो कि - तुम लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाये हो। हम जो कुछ सोंचते हैं, वही बन जाते हैं। यदि तुम अपने को हीन पापी सोंचते हो तो, तुम अपने को सम्मोहित कर रहे हो।...यह सब कौतुक है। " (९:१४३)
" पूर्णता का मार्ग यह है कि, स्वयं पूर्णता को प्राप्त होना ,तथा कुछ थोड़े से स्त्री-पुरुषों को पूर्णता को प्राप्त होने में सहायता करना। फिर मैं भैंस के आगे बीन बजा कर - समय, स्वास्थ्य और शक्ति का अपव्यय क्यों करूँ? "(२:३३२)
" पूर्ण ( या असंख्य) में पूर्ण का भाग दो, पूर्ण जोडो , पूर्ण से पूर्ण में गुना करो, पूर्ण ही रहेगा।" 
 ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुद्च्च्यते ।   
  पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवा वशिष्यते । । 
(संस्कृत भाषा - पूर्णांग भाषा है !) (१०:११७)
" जीवन का अर्थ ही वृद्धि अर्थात विस्तार यानि प्रेम है। इसलिए प्रेम ही जीवन है, यही जीवन का एकमात्र नियम है, और स्वार्थपरता ही मृत्यु है। परोपकार ही जीवन है, परोपकार न करना ही मृत्यु है। ...जीसमे प्रेम नहीं वह जी भी नहीं सकता। ( ३:३३३)
" एकमात्र परोपकार को ही मैं कार्य मानता हूँ, बाकि सब कुकर्म है। " (४:२९८)
" जीवन का सर्वश्रेष्ठ उपयोग यही है कि उसे सर्वभूतों कि सेवा में न्योछावर कर दिया जाये।"(४:५८)
 " तुमलोग चारो ओर फ़ैल जाओ , अर्थात जगह जगह शाखाएं स्थापित करने का प्रयत्न करो। मौका खाली न जाने पाये, मद्रासियों (हर प्रांत वालों), से मिल कर जगह जगह समिति आदि की स्थापना करनी होगी। ( हिन्दी में महामंडल पुस्तिकाओं- पत्रिकाओं ) के ग्राहक क्यों नहीं बढ़ रहे ? अपनी बहादुरी तो दिखाओ। प्रिय भाई, मुक्ति न मिली, तो न सही, दो-चार बार नर्क ही जाना पडे,तो हानि क्या है ? क्या यह बात असत्य है ?--
-'मनसी वचसी काये पुण्यपियूष पूर्णाः,त्रिभुवनम उपकारश्रेणीभिः प्रीण यन्तः । 
परगुण परमाणुंग पर्वतीकृत्य नित्यं,निजहृदि विकसंतः सन्ति सन्तः कियन्तह।।
अर्थात ऐसे साधू कितने हैं, जिनके कार्य , मन तथा वाणी पुण्यरूप अमृत से परिपूर्ण हैं, और जो विभिन्न उपकारों के द्वारा त्रिभुवन की प्रीति सम्पादन कर दूसरों के परमाणु तुल्य - अर्थात अत्यंत स्वल्प गुण को भी- पर्वत प्रमाण बढ़ा कर अपने हृदयों का विकास साधन करते हैं ? श्री परमहंस देव के प्रति श्रद्धासम्पन्न १० व्यक्ति भी जहाँ हैं, वहीं एक सभा स्थापित करो। हरी-सभा इत्यादि को धीरे धीरे स्वाहा करना होगा।
'परोपकाराय हि सतां जीवितं , परार्थ प्राग्य उत्सृजेत -' साधुओं का जीवन परोपकार के लिए ही है, प्राज्ञ व्यक्तियों को दूसरों के लिए सब कुछ न्योच्छावर कर देना चाहिए।" (४:३०७)
" बुद्धदेव की जीवनी, ' ललित-विस्तार ' के प्रसिद्द गीत में कहा गया है - बुद्ध ने मनुष्य जाती के परित्राता  या मार्गदर्शक ' नेता ' के रूप में जन्म लिया; किन्तु जब राज-प्रासाद की विलासिता में वे अपने को भूल गये, तब उनको जगाने के लिये देवदूतों ने एक गीत गाया, जिसका मर्मार्थ इस प्रकार है - ' हम एक प्रवाह में बहते चले जा रहे हैं; हम अविरत रूप से परिवर्तित हो रहे हैं- कहीं निवृत्ति नहीं है, कहीं विराम नहीं है; सारा संसार मृत्यु की ओर चला जा रहा है-सभी मरते हैं ! हमारी सभी प्रगति, व्यर्थ का आडम्बरी जीवन, हमारे समाज-सुधार ! हमारी विलासिता, हमारे ऐश्वर्य, हमारा ज्ञान - इन सबकी मृत्यु ही एक मात्र गति है ! हम क्यों इस जीवन में आसक्त हैं ? क्यों हम इसका परित्याग नहीं कर पाते ?... यह हम नहीं जानते ! और यही माया है !! " (२:४७)
" भारतीय कुशल-प्रश्न है, ' आप स्वस्थ तो हैं ? '- जिसका अर्थ है आप अपने में स्थित हैं या देह में?...ध्यान करने का तात्पर्य है- आत्मा का अपने में (या स्व में) स्थित होने के लिए यत्न करना। "
" आगे बढ़ो ! सैकड़ो युगों तक संघर्ष करने से एक चरित्र का गठन होता है। निराश न होओ! सत्य के एक शब्द का भी लोप नहीं हो सकता। सत्य अविनाशी है, पुण्य अनश्वर है,पवित्रता अनश्वर है। मुझे सच्चे मनुष्य की आवश्यकता है, मुझे शंख-ढपोर चेले नहीं चाहोये। ... सदाचार सम्बन्धी जिनकी उच्च अभिलाषा मर चुकी है, भविष्य की उन्नति के लिए जो बिल्कुल चेष्टा नहीं करते, और भलाई करने वालों को धर दबाने में जो हमेशा तत्पर हैं- ऐसे ' मृत-जड़पिण्डों ' के भीतर क्या तुम प्राण का संचार कर सकते हो ? क्या ' तुम ' उस वैद्य की जगह ले सकते हो, जो लातें मारते हुए उदण्ड बच्चे के गले में दवाई डालने की कोशिश करता हो ? भारत को नव-विद्युत की आवशयकता है, जो राष्ट्र की धमनियों में नविन चेतना कासंचार कर सके। यह काम हमेशा धीरे धीरे हुआ है, और होगा। " ( ३:३४४)
'गुरु-शिष्य वेदाध्यापक प्रशिक्षण परम्परा' के अनुसार चपरास प्राप्त वेदाध्यापकों  या मानव-जाति के मार्गदर्शक नेताओं का निर्माण करने की अनिवार्यता पर स्वामी विवेकानन्द जी के विचार :
 " मनुष्य स्वयं ही अपने भाग्य का निर्माता है !"- इस कथन का अर्थ यह नहीं कि, हमे किसी बाहरी सहायता कि आवश्यकता ही नहीं है।..जब ऐसी सहायता प्राप्त होती है तो, उसकी उन्नति वेगवती हो जाती है, और अंत में साधक पवित्र एवं सिद्ध बन जाता है। यह संजीवनी-शक्ति पुस्कों से नहीं मिल सकती। इस शक्ति कि प्राप्ति तो एक आत्मा, एक दूसरी आत्मा से ही कर सकती है, अन्य किसी से नहीं। "(वि०सा० ख० ४:२५)
" जिन्हों ने धर्म-लाभ कर लिया है, वे ही दूसरों में धर्मभाव संचारित कर सकते हैं। वे ही मनुष्य जाती के श्रेष्ठ आचार्य हो सकते हैं।" (७:२६७)
" मनुष्य को पहले चरित्रवान होना चाहिए तथा आत्मज्ञान प्राप्त करना चाहिए और उसके बाद फल स्वयं मिल जाता है। ...अतः अपने विचारों का दूसरो में प्रचार करने के लिए जल्दी नहीं करनी चाहिए, पहले हमारे पास देने के लिए कुछ होना चाहिए। "(७:२५८)
 " प्रथम तुम स्वयं आत्मज्ञानी हो जाओ तथा संसार को कुछ देने के योग्य बन जाओ और फ़िर संसार के सम्मुख देने के लिए खडे होओ ।"(७:२६०)
" स्वयं आध्यात्मिक सत्य कि उपलब्धी करने और दूसरों में उसका संचार करने का एक मात्र उपाय है- हृदय और मन कि पवित्रता।"(४:२२)
" शिक्षा (=शीक्षा) देना केवल लेक्चर देना नहीं है, और न सिद्धांत बघारना ही शिक्षा है, इसका अर्थ है -सम्प्रेष्ण !" (७:२५८)
विद्या-गुरुमुखी: " जिस व्यक्ति की आत्मा से दूसरी आत्मा में शक्ति का संचार होता है, वह गुरु (नेता ) कहलाता है। और जिसकी आत्मा में यह शक्ति संचारित होती है, उसे शिष्य (या भावी वेदाध्यापक या वुड बी लीडर) कहते हैं।"(४:१७).
 " सच्चे गुरु वह हैं , जिनके द्वारा हमको अपना आध्यात्मिक जन्म प्राप्त हुआ है। वे ही वह साधन हैं , जिसमे से हो कर आध्यात्मिक प्रवाह हम लोगों में प्रवाहित होता है।" (७:१००)॥ 
" एक लोकप्रिय गीत , जो मेरे गुरु देव सदा गाया करते थे, मुझे इस समय याद आ रहा है- ' दिल जिस से मिल जाता है, वह जन अपनी आंखों से व्यक्त कर देता है !   हैं ऐसे दो-एक जन , जो करते विचरण - जगत की अनजानी राहों पर.' (७:३६९)...
" गुरु वह आभामय चेहरा है, जिसे ईश्वर हम तक पहुँचने के लिए धारण करता है। जब हम एकटक उसे निहारते हैं तो, धीरे-धीरे वह चेहरा गिर जाता है और ईश्वर प्रकट हो जाते हैं।" (३:१९९)
गुरु (या नेता) का चुनाव करते समय पहले उनको जाँच कर देखो, जो वे कहते हैं स्वयं उनका जीवन उस प्रकार का है या नहीं ? कथनी और करनी में कहीं अन्तर तो नहीं है ? हर एक आदमी गुरु होना चाहता है। एक भिखारी भी चाहता है कि लाखों का चेक दान में काट कर देदे। जैसे हास्यास्पद ये भिखारी हैं, वैसे ही ये गुरु भी हैं।"(४:१९) 
 " बहुत से लोग ऐसे हैं, जो स्वयं तो बडे अज्ञानी हैं, परन्तु फ़िर भी अंहकार वश अपने को सर्वज्ञ समझते हैं; इतना ही नहीं , बल्कि दूसरो को भी अपने कन्धों पर ले जाने को तैयार रहते हैं। इस प्रकार जो स्वयं अँधा है वही अन्य अंधों का अगुवा- 'पथ प्रदर्शक' (नेता)  बन जाता है, फलतः दोनों ही गड्ढे में गिर पड़ते हैं।"

" कुछ अपवाद -स्वरूप आत्माएँ , पहले से ही मुक्त हैं, और जो संसार की भलाई के लिए, संसार को सहायता देने के लिए यहाँ जन्म लेतीं हैं। वे पहले से ही मुक्त होतीं हैं, उन्हें अपनी मुक्ति की चिंता नहीं होती, वे केवल दूसरो की सहायता करना चाहती हैं। वे तो उन अभिनेताओं के समान हैं, जिनका अपना अभिनय समाप्त हो चुका है। "(७:८)॥
"साधारण गुरुओं से श्रेष्ठ एक और श्रेणी के गुरु होते हैं, वे हैं- इस संसार में ईश्वर के अवतार। वे केवल स्पर्श से, यहाँ तक कि इच्छा मात्र से ही आध्य्मिकता प्रदान कर सकते हैं। वे गुरुओं के भी गुरु हैं। हम उनकी उपासना किए बिना रह नहीं सकते, हम उनकी उपासना करने को विवश हैं। "(४:२५) 
..."ईश्वर है पारस मणि, उसके स्पर्श से मनुष्य एक क्षण में सोना बन जाता है."(७:१३) ..." एक सच्चा गुरु शिष्य से कहेगा- जा अब और पाप न कर। और शिष्य अब पाप नहीं कर सकता।"(३:१९८) 
...वे उन प्रथम दीपों के समान हैं, जिनसे अन्य दीप जलाये जाते हैं,..उनके सम्पर्क में आने वाले मनो उनसे अपना दीप जला लेते हैं, परन्तु वह 'प्रथम दीप' अमंद ज्योति से जगमगाता रहता है।" (३:१९६)
" बौद्धों कि एक उदार प्रार्थना है- ' पृथ्वी के सभी पवित्र मनुष्यों के समक्ष (मानवजाति के भावी मार्गदर्शक नेताओं के समक्ष ) मैं नतमस्तक हूँ।'... जब तुम जैसे पवित्र और आनंदित लोगों के दर्शन मिलते हैं -जिसके मस्तक पर प्रभु अपनी ऊँगली से 'यह मेरा है' स्पष्ट रूप से अंकित कर दिए होते हैं तब मुझे इस प्रार्थना के सही अर्थ का बोध होने लगता है। "(२:३३३) 
.." पैगम्बर धर्म का प्रचार करते हैं, किंतु ईसा, बुद्ध, श्री रामकृष्ण आदि के समान अवतार पुरूष धर्म प्रदान करते हैं। उनका मात्र एक स्पर्श, या एक दृष्टि-पात ही पर्याप्त होता है। इसाई धर्म में इसी को - पवित्र आत्मा की शक्ति (Power of holy ghost) को दूसरो में संचारित करना (by the lying of hands) कहते हैं। प्रभु ईसा ने अपने शिष्यों के भीतर सचमुच शक्ति का संचार किया था। इसी को गुरु-परम्परा गत शक्ति कहते हैं। यही यथार्थ 'Baptism' दीक्षा है और अनादी काल से चली आ रही है। "(७:१४)....
" श्री रामकृष्ण देव जैसे पुरुषोत्तम ने इससे पहले जगत में और कभी जन्म नहीं लिया। संसार के घोर अंधकार में अब यही महापुरुष ज्योतिस्वरूप हैं। इनकी ही ज्योति से मनुष्य संसार-समुद्र के पार चले जायेंगे।"(६:४७,४९)
" श्रीरामकृष्ण के जीवन का पूर्वार्ध धर्मोपार्जन में लगा रहा तथा उत्तरार्ध उसके वितरण में।....दूसरों के प्रति उनमे अगाध प्रेम था।" (७:२६५)......" श्री रामकृष्ण का संदेश है-' प्रथम स्वयं धार्मिक बनो और सत्य की उपलब्धी करो। उनका सिद्धांत था कि, मनुष्य को प्रथम चरित्रवान होना चाहिए तथा आत्मज्ञान प्राप्त करना चाहिए, जब तुम्हारा चरित्र रूपी कमल पूरी तरह खिल जायगा ,तब देखोगे कि सारे फल तुम्हे अपने-आप प्राप्त हो रहे हैं."(७:२५८) 
" आधुनिक संसार के लिए श्री रामकृष्ण का संदेश यही है---' मतवादों,आचारों, पंथों, तथा गिरजाघरों एवं मन्दिरों की चिंता न करो। प्रत्येक मनुष्य के भीतर जो सार वस्तु ; अर्थात आत्म-तत्व विद्यमान है, इसकी तुलना में ये सब तुच्छ हैं, और मनुष्य के अंदर यह भाव जितना ही अधिक अभिव्यक्त होता है, वह उतना ही जगत् कल्याण के लिए सामर्थ्यवान हो जाता है। प्रथम इसी धर्म-धन का उपार्जन करो, किसी में दोष मत खोजो, क्योंकि; ' सभी मत , सभी पथ ' अच्छे हैं। अपने जीवन द्वारा यह दिखा दो कि धर्म का अर्थ न तो शब्द होता है, न नाम और न सम्प्रदाय , वरन इसका अर्थ होता है-'आध्यात्मिक-अनुभूति।' जिन्हें अनुभव हुआ है, वे ही इसे समझ सकते हैं। जिन्होंने धर्मलाभ कर लिया है, वे ही दूसरों में धर्मभाव संचारित कर सकते हैं, वे ही मनुष्य जाती के श्रेष्ठ आचार्य हो सकते हैं-- केवल वे ही ज्योति की शक्ति हैं।" (७:२६७)
"श्री रामकृष्ण ने अपने पूजा-पाठ का प्रचार करने का उपदेश मुझे कभी नहीं दिया। वे साधना पद्धति, ध्यान-धारणा तथा अन्य ऊँचे धर्म भावों के सम्बन्ध में जो सब उपदेश दिए हैं, उन्हें पहले अपने में अनुभव कर के, फ़िर सर्व-साधारण को उन्हें सिखाना होगा। 'मत अनंत हैं; पथ भी अनंत हैं '। सम्प्रदायों से भरे जगत में और एक नवीन सम्प्रदाय पैदा कर देने के लिए मेरा जन्म नहीं हुआ। "
" यह ख्याल रखना कि इन सारे कार्यों की देख-भाल तुमको ही करनी होगी, पर 'नेता' बन कर नहीं 'सेवक' बन कर।"(२:३९४)...
" मेरा सिद्धांत है कि प्रत्येक अपनी सहायता आप करता है। नारी या पुरूष एक दूसरे पर शासन क्यों करें ? प्रत्येक स्वतंत्र है। यदि कोई बंधन है, तो वह प्रेम का। नारियाँ स्वयं अपने भाग्य का विधान कर लेंगी, पुरुषों का स्त्रियों के भाग्य का विधान अपने हाँथ में रखना- नारियों कि अवमानना है। ....मैं ऐसी गलती के साथ प्रारम्भ नहीं करना चाहता, क्योंकि यही गलती फ़िर समय के साथ बडी होती जायगी , इतनी बडी कि अन्ततोगत्वा उसके अनुपात को सम्भालना असम्भव हो जाएगा ।अतः यदि स्त्रियों के कार्य में पुरुषों को लगाने की भूल मैंने की , तो स्त्रियाँ कभी भी मुक्त न हो सकेंगी - वह एक खानापूर्ति जैसा कार्य होगा। माँ (श्रीसारदा देवी) हमारी 'संघ-नेत्री' हैं, पर वे कभी हम पर शासन नहीं करतीं। "(१० :२०)
" स्त्रीयों में जो ईश्वरत्व वास करता है, उसे हम कभी ठग नहीं सकते।...वह सदैव ही अचूक रूप से बेईमानी तथा ढोंग को पहचान लेता है।...पश्चिम में स्त्रियों की पूजा प्रायः उनके तारुण्य तथा लावण्य के कारण होता है। किंतु पथ-प्रदर्शकों (यथार्थ नेताओं) के लिए प्रत्येक स्त्री का मुखार्विन्द , उस आनन्दमयी माँ का ही मुखार्विन्द है."(७:२५७)
" श्री रामकृष्ण माँ सारदा से कहते हैं - ' जगन्माता ने मुझे यह समझा दिया है कि, वह प्रत्येक स्त्री में निवास करती है, और इसीलिए मैं हर स्त्री को माँ रूप में देखता हूँ। यही एक दृष्टि है, जिससे मैं तुम्हे भी देख सकूंगा, परन्तु यदि तुम्हारी इच्छा मुझे संसाररूपी मायाजाल में खींचने की हो, क्योंकि मेरा तुमसे विवाह हो चुका है, तो मैं तुम्हारी सेवा में उपस्थित हूँ।' माँ बोली -' आपको सांसारिक जीवन में घसीटने कि मेरी इच्छा कदापि नहीं है, बस, इतना ही चाहती हूँ कि मैं आपके समीप रहूँ,आपकी सेवा करूं तथा आपसे शिक्षा ग्रहण करूं।' (७:२५४) 
" ह्रदय सरोवर में एक अष्टदल रक्त-वर्ण कमल है, धर्म उसका मूल देश है, ज्ञान उसकी नाल है, योगी कि अष्ट-सिद्धियाँ उस कमल के आठ दलों के समान हैं, और वैराग्य उसके अंदर की कर्णिका है। जो योगी अष्ट सिद्धियाँ आने पर भी उनको छोड़ सकते हैं, वे ही मुक्त हो सकते हैं। इसीलिए अष्ट-सिद्धियों को बाहर के आठ दलों के रूप में, तथा अंदर कि कर्णिका को 'परम वैराग्य' - अर्थात अष्ट सिद्धियाँ आने पर भी, उनके प्रति वैराग्य के रूप में वर्णन किया है। विषय की लालसा, भय और क्रोध छोड़ कर जो प्रभु के शरणागत हुए है,उन्हीं में तन्मय हो गए हैं, जिनका ह्रदय पवित्र हो गया है, वे भगवान के पास जो कुछ चाहते हैं, भगवान उसी समय उसकी पूर्ति करते हैं। अतः तुम उनसे कहो, हे प्रभु -तुम मुझे ,भक्ति दो, विवेक दो , वैराग्य दो ,ज्ञान दो। "(१:१०४)
" तमेवैकं जानथ आत्मानम् अन्या वाचो विमुंचथ "- (मुण्डक उ ० २। २। ५ ) अर्थात- उसका, केवल उसका ध्यान करो अन्य सब बातों को त्याग दो।" जो लोग केवल उन्ही की चर्चा करते हैं, वे भक्त को मित्र के समान प्रतीत होते हैं। और जो लोग अन्य विषयों की चर्चा करते हैं , वे उसको शत्रु के समान लगते हैं। उस प्रियतम का चिन्तन हृदय में सदैव बने रहने के कारण ही उसे जीवन इतना मधुर प्रतीत होता है। ...इसको 'तद अर्थप्राणसंस्थान ' कहा है। तदियता तब आती है जब, साधक श्री भगवान् के चरण-कमलों को स्पर्श कर लेता है, तब उसकी प्रकृति विशुद्ध हो जाती है, सम्पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाती है। "(४:५५)
[ 'BE AND MAKE ' का अर्थ है , गुरु-शिष्य वेदाध्यापक प्रशिक्षण परम्परा में स्वयं एक वेदाध्यापक (पैगम्बर, नेता, लोक-शिक्षक)  बनो और दूसरों को भी वेदाध्यापक बनने में सहायता करो ! ]  ..." अंगूर कि लता पर जिस प्रकार गुच्छों में अंगूर फलते हैं, उसी प्रकार भविष्य में सैंकडो ईसाओं का आविर्भाव होगा."(७:१२)
" जिस देश में ऐसे मनुष्य जितनी अधिक संख्या में पैदा होंगे, वह देश उतनी ही उन्नत अवस्था को पहुँच जायगा।....वे चाहते थे कि तुम अपने भाई-स्वरूप समग्र मानवजाति के कल्याण के लिए सर्वस्व त्याग दो। 'universal brotherhood' पर सेमीनार नहीं करो,अपने शब्दों को सिद्ध करके दिखा दो। त्याग तथा प्रत्यक्ष अनुभूति का समय आ गया है, और इनसे ही तुम जगत के सभी धर्मों में सामंजस्य देख पाओगे।"(७:२६८) 
इस प्रकार हमलोग यह समझ सकते हैं कि सांख्य शास्त्र का उद्देश्य तत्वज्ञान के द्वारा मोक्ष प्राप्त करना या डीहिप्नोटाइज्ड होना है ! (अर्थात अपने -पराये के भ्रम से मुक्त होना है।) कपिलवस्तु, जहाँ बुद्ध पैदा हुए थे, कपिल के नाम पर बसा नगर था। इससे कम-से-कम इतना तो अवश्य कह सकते हैं कि बुद्ध के पहले कपिल का नाम फैल चुका था।
निस्संदेह भगवान कपिल ही दर्शन शास्त्र के पितामह हैं ! जो हमें सृष्टि के 'देश-काल -निमित्त' टाइम-स्पेस एण्ड कॉज़ैशन में कॉज़ैशन (the act of causing something to happen) या 'अल्टीमेट सोर्स ऑफ़ क्रिएशन' सृष्टि के महान आधार भूत कारण 'महत तत्व' को सांख्य की दृष्टि से समझने में सहायता करते हैं !
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