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शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

श्रीरामकृष्ण परमहंस का जीवन और सन्देश

ध्यान और समाधि का मार्ग
गीता ४.११ में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ' उपासना के सारे रास्ते अन्ततोगत्वा मुझी में आकर मिल जाते हैं!' यह श्रीकृष्ण की बड़ी उदार वाणी है। यही उदार भाव सनातन धर्म की अपनी विशेषता है। सारे देवी-देवता (M/F) उसी एक नारायण के ही विभन्न स्वरुप हैं, इस लिये उन सबकी अर्चना प्रकारान्तर से नारायण की ही अर्चना है।सारतत्व यह है कि साधक अपने मनोनुकूल चाहे जिस रास्ते से भी क्यों न चलें, अन्ततोगत्वा वह उसी एक भगवान (ब्रह्म-अल्ला-गॉड) के पास पहुँच जाता है! (अर्थात उनके साथ अन्तरङ्गता स्थापित कर लेता है।) कहा भी गया है- 

 'आकाशात पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम्।
सर्व देव नमस्कारः केशवं प्रति गच्छति॥
आकाश से गिरा हुआ पानी जैसे समुद्र में जाता है, उसी प्रकार किसी भी देवता को किया गया नमस्कार श्रीहरि को ही जाता है। (केशव =ब्रह्मा,विष्णु और महेश को 'केश' कहा जाता है, और इनका जो प्रशासक है वह परमात्मा ही केशव है,आधुनिक युग में विवेकानन्द के गुरु ब्रह्म के अवतार भगवान श्रीरामकृष्ण परमहंस देव ही केशव हैं,उनको ही जाता है।) इस बार श्रीहरि ने श्रीरामकृष्ण के रूप में अवतरित होकर इसी सिद्धान्त को अपने जीवन में जीया। उन्होंने इस्लाम और ईसाई धर्म सहित विश्व के सभी प्रमुख धर्मों के माध्यम से, ईश्वर को पाने की साधना की और अपनी साधनाओं में सफल भी रहे। उन्होंने प्रत्यक्ष अनुभव किया कि सारे धर्म, मत और सम्प्रदाय उसी एक ईश्वर के पास जाने के अलग-अलग रास्ते हैं। और अपनी इसी अनुभूति को वाणी देते हुए कहा - 'जितने मत उतने पथ।' श्रीरामकृष्ण का जीवन 'एकं सद-विप्राः बहुधा वदन्ति' की व्याख्या स्वरूप था। इस मंत्र का अर्थ है -'सत्य एक है, ज्ञानीजन उसी एक सत्य को अलग-अलग नाम से पुकारते हैं। '
 इसीलिये मैक्समूलर ने लिखा है-’यदि श्रीरामकृष्ण न आते तो वेद-शास्त्र आदि अप्रमाणित रह जाते।’  अतः हम कह सकते हैं कि श्रीरामकृष्ण परमहंस देव का जीवन धर्म की एक प्रयोगशाला है। उन्होंने बिल्कुल एक वैज्ञानिक जैसी मानसिकता के साथ भारत में प्रचलित समस्त सारे धर्म, मत और सम्प्रदाय में निर्दिष्ट विभिन्न साधना पद्धतियों का अभ्यास करके देखा था। और इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि विभिन्न धर्मों की साधना पद्धतियाँ तो भिन्न-भिन्न हैं, किन्तु सभी धर्मों के भीतर एक ही ईश्वर का वर्णन है, तथा सभी धर्मों का उद्देश्य और गन्तव्य स्थान एक ही है। "जिस प्रकार एक ही जल को कोई 'वारि' कहता है और कोई 'पानी', कोई 'वाटर' कहता है, तो कोई 'ऐक्वा', उसी प्रकार एक ही सच्चिदानन्द को देशभेद के अनुसार कोई 'श्रीहरि' कहता है, तो कोई 'अल्लाह', कोई 'गॉड' कहता है, तो कोई ब्रह्म। "      
प्रश्न -यदि सभी धर्मों के भीतर एक ही ईश्वर का वर्णन है, तो फिर हर एक धर्म के कथनानुसार ईश्वर अलग अलग क्यों प्रतीत होता है ? 
उत्तर -ईश्वर एक हैं किन्तु भाव विविध हैं। जिस प्रकार घर का प्रमुख व्यक्ति (अभिभावक या मार्गदर्शक नेता) एक ही होता है, परन्तु वह किसी के लिये पिता, किसी का भाई, तो किसी का पति लगता है; उसी प्रकार भाव भिन्न भिन्न होते हुए भी ईश्वर एक है।" 
" जिस प्रकार माँ अपने बच्चों के स्वास्थ्य और अभिरुचि के अनुसार किसी के लिये दाल-भात, किसी के लिये आलू-पराठा तो किसी के लिये साबूदाने की व्यवस्था करती है, उसी प्रकार भगवान ने भी प्रत्येक मनुष्य के लिये उसके स्वभाव और अभिरुचि के अनुसार उपयुक्त साधन-पद्धति की व्यवस्था कर रखी है।" 
किसी ने पूछा - तन्त्रमार्ग के लोग 'पंचमकार की साधना' करते हैं, तो कुछ लोग उच्च कोटि के साधक
होकर भी 'परकीया नायिका ग्रहण' कर के साधना करते हैं, देख कर किसी व्यक्ति ने जब घृणाबुद्धि से प्रेरित होकर श्री रामकृष्ण से इन पंथों की शिकायत की और कहा कि ये तो बड़ी अनुचित बात है।'
तब श्री रामकृष्ण ने कहा -" अरे, तुम उस सब के प्रति द्वेषबुद्धि क्यों रखते हो ? यह ज्ञान रखो कि यह भी एक मार्ग है, किन्तु अशुद्ध मार्ग है।.... इसमें उन लोगों का कोई दोष नहीं। उन्हें सोलह आना विश्वास था कि ईश्वर-प्राप्ति का यही मार्ग है। ' इससे ईश्वरलाभ होगा ' - ऐसा दृढ़ आंतरिक विश्वास लेकर जो व्यक्ति जिस साधन-प्रणाली का अनुष्ठान यदि करता हो, तो उसे दोषयुक्त कहकर उसकी निन्दा नहीं करनी चाहिये। किसी के भाव को नष्ट नहीं करना चाहिये। क्योंकि किसी भी भाव का ठीक-ठीक अवलम्बन कर आगे बढ़ने से सर्व-भावमय भगवान की प्राप्ति अवश्य होती है। अपने अपने स्वाभाविक अभिरुचि के अनुसार भगवान को पुकारते रहो। किसी के भाव की (साधना-पद्धति की) निन्दा न करो और न दूसरे की भाव को अपना समझकर ग्रहण करने का प्रयत्न ही करो। " 
" वेदान्तदर्शन (ब्रह्मसूत्र) की व्याख्या जिस प्रकार शंकराचार्य ने अद्वैत-मतानुसार की है वह भी सत्य है, तथा रामानुज ने जो विशिष्टाद्वैत-मतानुसार व्याख्या की है वह भी सत्य है।" (उसी प्रकार चैतन्य महाप्रभु ने वेदान्त दर्शन की व्याख्या अचिन्त्य-भेदाभेदवाद के रूप में की है, वह भी सत्य है।)             
उन्नसवीं शताब्दी के प्रसिद्द योग साधक, दार्शनिक और मानवजाति के मार्गदर्शक नेता जगतगुरु श्रीरामकृष्ण का जन्म १८ फरवरी १८३६ (फाल्गुन शुक्ल द्वितीया) को पश्चिम बंगाल के एक गरीब वैष्णव ब्राह्मण के परिवार में हुआ था। बचपन में लोग उन्हें गदाई (गदाधर) के नाम से जानते थे। गदाधर अपने ग्रामवासियों के बीच बड़े लोकप्रिय बालक थे। चित्रांकन और मिट्टी की प्रतिमा गढ़ने में उन्हें जन्मजात रूप से महारत हासिल थी।  
तथापि पारम्परिक रूप प्रचलित शिक्षा को ग्रहण करने में उन्हें थोड़ी भी रूचि नहीं थी। उस युग के ब्राह्मण समाज में प्रचलित संस्कृत शिक्षा का उपहास करते हुए, उन्होंने उसे ' चावल-केला बाँधने वाली विद्या' (अर्थात पुरोहित-पुजारी व्यवसाय द्वारा आजीविका कमाने की शिक्षा) कहा, और उसे ग्रहण करने से इंकार कर दिया। (इस प्रकार श्री रामकृष्ण प्रथम छात्रनेता बने). किन्तु किसी भी नये विषय को सीखने के प्रति उनकी अभिरुचि की कोई सीमा न थी। संगीत-कला, गायन और धार्मिक कथाओं पर आधारित नाटकों में अभिनय करने में बड़े सिद्धस्त कलाकार थे ! तीर्थयात्री संन्यासियों के मुख से तथा गाँव में आये साधु-सन्तों द्वारा शास्त्र-पुराणों पर दिए प्रवचनों को सुन-सुन कर, बहुत कम उम्र में ही गदाधर ने रामायण, महाभारत और भागवत के मर्म को समझकर उसका विश्लेषण करने में निपुण हो गए थे।               
श्री रामकृष्ण के संस्मरणों से ज्ञात होता है कि, ६-७ साल की आयु में ही वे ईश्वर-चिंतन करते हुए समाधी में डूब जाया करते थे ! उनके पिता का शरीर छूट  जाने के बाद उनके बड़े भाई रामकुमार ने परिवार के भरण-पोषण का अपने कंधों पर उठाया, तथा पुजारी-पुरोहित के व्यवसाय को अपनी आजीविका का साधन बनाया। अपने बड़े भाई को पुजारी के कार्य में सहायता करने के उद्देश्य से गदाधर ने कोलकाता (तात्कालीन भारतवर्ष की राजधानी) में पदार्पण किया।  
१८५५ ई० में कोलकाता के एक निम्नवर्ण के मल्लाह समाज के एक धनी जमीन्दार की स्त्री रानी रासमणि ने दक्षिणेश्वर में 'माँ भवतारिणी काली मन्दिर' की स्थापना की थी। श्री रामकुमार जी ने उसी मन्दिर के मुख्य पुजारी का पद ग्रहण किया था। और श्री रामकृष्ण वेशकार थे -इतने सुन्दर तरीके से माँ की साज-सज्जा करते थे कि मन्दिर जाग्रत हो जाता था। १८५६ ई ० में जब रामकुमार का निधन हो गया, तब श्रीरामकृष्ण उनके स्थान पर मुख्य पुजारी नियुक्त हुए। उनके रहने के लिये मन्दिर परिसर के उत्तर-पश्चिम प्रांगण में एक छोटा सा कमरा दिया गया। इसी कमरे में उन्होंने अपना शेष जीवन व्यतीत किया।  
रामकुमार जी की मृत्यु के बाद श्री रामकृष्ण का मन ईश्वर चिंतन में अधिक तल्लीन रहने लगा। अपने १२ वर्ष के साधक जीवन में उन्होंने दो गुरुओं से दीक्षा प्राप्त की। एक थीं भैरवी ब्राह्मणी और दूसरे थे श्री तोता पूरी।भैरवी ब्राह्मणी ने उनको तान्त्रिक-साधना के विषय में प्रशिक्षण दिया, एवं तोता पूरी ने वेदान्तिक साधना का प्रशिक्षण दिया। दीक्षा प्राप्त करने के बाद उनका नाम हुआ श्री रामकृष्ण परमहंस। इसी समय श्री रामकृष्ण ने वैष्णव साधना में भी सिद्धि प्राप्त कर ली थी। 
वे पारम्परिक संन्यासियों के समान एकांगी साधना के पक्षधर नहीं थे, या उनके जैसे वस्त्र भी नहीं पहनते थे।ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के जातीय-भेदभाव को मन से दूर करने के लिये वे निम्नवर्ण में जन्मे लोगों के हाथों से भोजन ग्रहण करते थे, तथा अछूत कहे जाने वाले पेरिया (झाड़ूदार-मेहतर) लोगों की सेवा करते थे।अपने हाथों से उनके टॉयलेट्स को भी साफ कर देते थे।     
एक लोकशिक्षक (सम्पूर्ण मानव-जाति के मार्गदर्शक नेता) के रूप में रामकृष्ण परमहंस समकालीन विद्वत समाज में अत्यन्त लोकप्रिय थे। बंगाल के ग्रामीण अंचल में प्रचलित छोटी छोटी कथा-कहानियों के माध्यम से दिये गए उनके उपदेशों का प्रबुद्ध जनमानस पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था। वे कहते थे कि 'ईश्वर उपलब्धि  करना ही मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य है। ' उनके मतानुसार 'कामिनी -कांचन' (धर्मरहित अर्थ और काम) ही मनुष्य को ईश्वर उपलब्धि (सत्योपलब्धि) के मार्ग से विचलित कर देता है। अतएव श्रीरामकृष्ण के मतानुसार 'कामिनी-कांचन' (लस्ट और लूकर  कामुकता और धन का त्याग) के प्रति आसक्ति का त्याग ही ईश्वरोपलब्धि का मार्ग है। जगत को उन्होंने 'माया' कहा है। उनके मतानुसार जगत की तमोगुणी शक्ति 'अविद्या माया' (अर्थात काम-क्रोध-लोभ आदि षड रिपु) मनुष्य को बन्धन में डाल देती है; एवं 'विद्या माया' अर्थात 'प्रभु के नाम' का जप और उनके आध्यात्मिक गुणों का बार बार चिंतन (ऑटोसजेशन) मनुष्य को उसके सर्वोच्च स्तर (मोक्ष या भ्रममुक्ति) तक ले जाती है। श्री कृष्ण चैतन्य देव ने इसी आदर्श का प्रचार किया था- 
                 "नामे रूचि जीवे दया वैष्णव सेवन; इहा छाड़ा कली युगे नाइ धर्म सनातन
                    हाते कर गृह कर्म मुख्य बल हरि, अनयाशे दिबे यदि भव सिन्धु पारी।" 
'नामे रूचि' (नादब्रह्म ॐ कार के अवतार वरिष्ठ भगवान श्रीरामकृष्ण के गुरुप्रदत्त नाम और कीर्तन में आग्रह अर्थात उनके आध्यात्मिक गुण  जैसे ज्ञान, दया, पवित्रता, प्रेम, भक्ति आदि २४ चारित्रिक गुणों का बार बार अनुचिंतन ऑटोसजेशन स्वपरामर्श में रूचि ; 'जीवे दया' (मनुष्य तथा दूसरे प्राणियों -जैसे मच्छर आदि के प्रति दया व्यक्त करना), एवं 'वैष्णव-सेवा' (विष्णु-भक्त या श्रीरामकृष्ण से प्रेम करने वाले व्यक्ति की   सम्मान पूर्वक सेवा),या ठाकुर की भक्ति द्वारा ईश्वर-प्राप्ति होती है, मनुष्य अनायास ही भवसागर से तर जाता है।)
 किन्तु श्री रामकृष्ण परमहंस ने उसमें तुरंत सुधार करते हुए कहा था -'जीवे दया नय, शिवज्ञाने जीवसेवा'! और श्री रामकृष्ण का यह उपदेश ही स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रतिपादित कर्मयोग (Be and Make) का आधार बना था। "रामकृष्ण-विवेकानन्द 'अचिन्त्य-भेदाभेद वेदान्त' शिक्षक प्रशिक्षण परम्परा" के अनुसार, सम्पूर्ण विश्व में-मनुष्य 'बनने और बनाने' का प्रशिक्षण देने में समर्थ भावी लोक-शिक्षकों या वुड बी लीडर्स का निर्माण करने के लिये स्वामी विवेकानन्द के नेतृत्व में युवा अनुयायिओं के एक दल का गठन किया था। १८८६ ई ० में श्री रामकृष्ण द्वारा नश्वर शरीर का त्याग कर देने के बाद, सभी युवा भक्तों ने संन्यास ग्रहण किया और श्री रामकृष्ण के मीशन को आगे बढ़ाने के कार्य में जुट गए।            
विवेकानन्द ने वर्ष १८९३ में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महा सम्मेलन में  रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त भावधारा को पाश्चात्य जगत के समक्ष प्रस्तुत किया। स्वामी विवेकानन्द ने जिस 'यूनिवर्सल ह्यूमनिज्म' या विश्व मानवता का सन्देश दिया था, उसे सर्वत्र प्रशंसा प्राप्त हुई एवं उन्हें भी सभी समाजों से भरपूर समर्थन भी मिला। सनातन धर्म में समाहित 'यूनिवर्सल ह्यूमेनिज्म' या 'वसुधैव कुटुंबकम' आदि सार्वभौमिक सत्यों का प्रचार करने के उद्देश्य से स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका में 'वेदान्ता सोसाईटी' की स्थापना की। तथा भारत में संन्यासी लोकशिक्षकों के निर्माण के लिये 'रामकृष्ण मठ एवं मीशन', एवं संन्यासिनी लोक-शिक्षिकाओं का निर्माण करने के लिये 'सारदा मठ' की स्थापना की।  
श्री रामकृष्ण ने कहा है कि ईश्वर-भक्ति या ध्यान के माध्यम से समाधी (आत्मानुभूति) प्राप्त करने की चेष्टा करनी चाहिये। उन्होंने यह भी कहा है कि जब तक  हम अपने मन को इन्द्रिय भोगों के लालच, और कामना-वासना से मुक्त नहीं कर लेते, तब तक केवल आँखों को मूँदकर बैठे रहने से ही मन को एकाग्र नहीं किया जा सकता है। हमें पुनः पुनः यम-नियम का अभ्यास करके उन आध्यात्मिक गुणों को अपनी आदत में ढालकर उन्हें अपनी सहज प्रवणता या प्रवृत्ति बना लेना होगा। फिर उन्होंने यह भी कहा है कि 'खालीपेट धर्म नहीं होता !' केवल मात्र आँखों को मूँद कर और नाक दबाकर ध्यान करने से ही ईश्वरोपलब्धि नहीं होती।   
स्वामी विवेकानन्द ने जब यह इच्छा व्यक्त की वे हिमालय पहाड़ की कन्दराओं में बैठकर ध्यान करते हुए अपने शरीर का त्याग कर देना अधिक पसन्द करेंगे । यह सुनकर श्री रामकृष्ण ने उन्हें धिक्कारते हुए कहा था- 'छी छी नरेन तूँ केवल अपनी मुक्ति चाहता है; ऐसा सोचना भी घोर स्वार्थपरता है ! दीन-दुःखियों की सेवा करने से ही ध्यान में सहायता प्राप्त होती है।'  
विवेकानन्द ने जिस प्रकार 'अपनी मुक्ति एवं जगत का कल्याण' के जुड़वाँ आदर्श को कार्यरूप में परिणत करने के लिये ही  रामकृष्ण मीशन की स्थापना की थी । ठीक उसी प्रकार जो लोग ब्रह्मचर्य आश्रम के बाद सीधा संन्यास आश्रम में प्रवेश पाने के अधिकारी नहीं हैं, उन गृही स्त्री-पुरुषों के लिये उन्होंने जुड़वाँ आदर्श दिया है - 'Be and Make." उन्हीं की अपरोक्ष प्रेरणा से '3H' विकास के ५ दैनन्दिन अभ्यासों (प्राथना,
मनःसंयोग, व्यायाम, स्वाध्याय और विवेक-प्रयोग)  के माध्यम से 'मनुष्य निर्माण एवं चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा' का प्रचार करने में सक्षम गृही पुरुष लोकशिक्षकों के निर्माण के उद्देश्य से १९६७ में 'अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल' की स्थापना हुई, तथा गृहस्थ स्त्री लोकशिक्षिकाओं का निर्माण करने के उद्देश्य से १९... में 'सारदा नारी संगठन ' की स्थापना हुई।    
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हमलोग 'श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग' में पढ़ते हैं कि साधना के प्रारम्भ में ही, श्रीरामकृष्णदेव ने श्रीजगन्माता से यह प्रार्थना की थी - " माँ,  मुझे क्या करना चाहिये यह मैं कुछ नहीं जानता हूँ; तू मुझे जो सिखायेगी, मैं वही सीखूँगा। " इस प्रकार श्रीजगदम्बा के बालक श्रीरामकृष्णदेव, तब उनपर पूर्णतया निर्भर होकर उनकी ओर दृष्टि आबद्ध किये अपने दिन बिता रहे थे, तथा वे जहाँ, जैसे उनको घुमा-फिरा रहीं थी, परमानन्दित हो कर वे भी उनका अनुसरण कर रहे थे। 
" एक दिन वे विष्णु-मन्दिर के बरामदे में बैठकर श्रीमद्भागवत की कथा सुन रहे थे। सुनते सुनते भावाविष्ट हो उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के जीवन्त रूप का दर्शन हुआ। तदन्तर उस मूर्ति के चरणों से रस्सी की तरह एक ज्योति निकली, जिसने पहले श्रीमद्भागवत को स्पर्श किया, उसके बाद उनके वक्षस्थल में संलग्न होकर तीनों वस्तुओं को कुछ देर के लिये बाँधे रखा। 
श्री रामकृष्णदेव कहते थे कि इस प्रकार के दर्शन से उनके मन यह दृढ़ धारणा हुई थी कि 'भागवत, भक्त और भगवान ' -तीनों भिन्न रूप से प्रकट रहते हुए भी एक ही हैं, अथवा एक ही वस्तु के तीन रूप हैं! भागवत (शास्त्र), भक्त और भगवान -तीनों एक हैं तथा एक ही तीन हैं !' 
[लीला०प्र० १/३५६ शास्त्र -जीवन नदी के हर मोड़ पर, बी.के.,अवतार-एनदा, तीनों एक हैं, तथा एक ही तीन हैं.] 
इस-प्रकार भावसाधना की पराकाष्ठा में भावराज्य की चरमभूमि 'एक ही वस्तु के तीन रूप हैं ' -  में पहुँच जाने के बाद, श्रीरामकृष्ण देव का मन स्वाभाविक रूप से भावातीत अद्वैत भूमि की ओर आकृष्ट होने लगा। क्योंकि भाव तथा भावातीत (इन्द्रियगोचर- इन्द्रियातीत) राज्य ये दोनों सदा परस्पर कार्य-कारण सम्बन्ध से बन्धे हुए हैं ! इन्द्रियातीत अद्वैत राज्य का भूमानन्द (परमानन्द) ही सीमाबद्ध होकर भावराज्य (मानवरूप में) दर्शन-स्पर्शन आदि सम्भोगानन्द के रूप में अभिव्यक्त होकर हमारी बुद्धि को भ्रमित करता रहता है! १/३६४
ठीक इसी समय माँ जगदम्बा की इच्छा से, श्री ठाकुर को वेदान्त श्रवण कराने के लिये ब्रह्मज्ञ श्री तोतापुरी जी दक्षिणेश्वर पधारते हैं। वे श्रीरामकृष्ण का निरीक्षण करने के बाद उनसे पूछते हैं -" तुम उत्तम अधिकारी प्रतीत हो रहे हो, क्या तुम वेदान्त साधना करना चाहते हो ?" 
श्रीठाकुर - "करने न करने के बारे में मैं कुछ नहीं जानता -मेरी माँ सब कुछ जानती हैं, उनका आदेश मिलने पर कर सकता हूँ !"
श्री तोतापुरी - " तो फिर जाओ, अपनी माँ से पूछकर जवाब दो; क्योंकि दीर्घकाल तक मैं यहाँ नहीं ठहरूँगा।" 
श्री ठाकुर श्रीजगदम्बा के मन्दिर में उपस्थित हुए और भावाविष्ट अवस्था में माँ को बोलते सुना - " जाओ सीखो, तुम्हें सिखाने के लिये ही इस संन्यासी का आगमन यहाँ हुआ है।" हर्षोत्फुल्ल होकर श्री ठाकुर श्री तोतापुरी जी के समीप पहुँचे तथा माँ की अनुमति मिलने की बात कही।
 श्रीरामकृष्णदेव मन्दिर में प्रतिष्ठित देवी को ही प्रेम वश माँ कह रहे हैं, इस सरलता पर वे मोहित तो हुए किन्तु सोचे उनका यह आचरण अज्ञता और कुसंस्कार जन्य है ! क्योंकि श्री तोतापुरी जी की तीक्ष्ण बुद्धि वेदान्त-प्रतिपादित कर्मफल-प्रदाता ईश्वर (अल्लाह या ब्रह्म) के अतिरिक्त अन्य किसी देव-देवी के सम्मुख सिर नहीं झुकाती थी। तथा त्रिगुणात्मिका ब्रह्म-शक्ति माया तो केवल भ्रम मात्र है, ऐसी धारणा रखने वाले श्री तोतापुरी जी उनके व्यक्तिगत अस्तित्व में विश्वास करना और उनकी उपासना करना वे अनावश्यक समझते थे। एवं लोग भ्रान्त संस्कारवश ही ऐसा किया करते होंगे, ऐसा उनका मत था।
बहरहाल, विरजाहोम आदि संस्कार के बाद ब्रह्मज्ञ तोतापुरी जी ने श्रीरामकृष्णदेव को (नादब्रह्म ॐ कार
'श्रीरामकृष्ण') नाम ? प्रदान किया। और वेदान्त प्रतिपादित 'नेति नेति ' उपाय का अवलंबन कर, उन्हें अपने ब्रह्मस्वरूप में अवस्थित होने के लिए प्रोत्साहित करते हुए कहा -" नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव, देश-काल (शरीर-मन या नाम-रूप) आदि द्वारा सर्वदा अपरिच्छिन्न एकमात्र ब्रह्मवस्तु (ॐ आत्मा 3rd'H) ही सदा सत्य (अपरिवर्तनशील-निरपेक्ष सत्य) है ! अघटन-घटन-पटियसी माया अपने प्रभाव से उनको नाम-रूप के द्वारा खण्डितवत् प्रतीत कराने पर भी वे (आत्मा) कभी उस प्रकार नहीं हैं ; क्योंकि समाधि-अवस्था में मायाजनित देश-काल या नाम-रूप की  किँचिन्मात्र भी उपलब्धि नहीं होती है। 
अतः नाम-रूप की सीमा के भीतर जो कुछ अवस्थित है, वह कभी नित्य नहीं हो सकता, उसको दूर से त्याग दो। नाम-रूप से बने लोहे के पिंजड़े को 'सिंह-विक्रम' से भेदकर बाहर निकल आओ ! अपने हृदय में अवस्थित आत्मतत्व के अन्वेषण में डूब जाओ ! समाधि के सहारे उसमें अवस्थित रहो; ऐसा करने पर देखोगे कि उस समय यह 'नामरूपात्मक-जगत' न जाने कहाँ विलुप्त हो चुका है। उस तुच्छ अहं-बोध (करन अहं और कर्ता अहं दोनों) न जाने कहाँ विलुप्त हो चूका है।  उस समय तुच्छ अहं-ज्ञान बिराट (आत्मा या ब्रह्म) में लीन व स्तब्ध हो जायेगा, तथा अखण्ड सच्चिदानन्द को अपना स्वरूप साक्षात् रूप से प्रत्यक्ष कर सकोगे ! " (वही १/३७०) 
फिर (छान्दोग्य उप.७-२३,२४) को सुनाते हुए कहा - "यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं। " जिस ज्ञान का अवलंबन करके एक व्यक्ति दूसरे को (जटिला-कुटिला को) देखता है, जानता है, या दूसरों की बातों को सुनता है, वह 'अल्प' है या तुच्छ है ! अर्थात उसमें परमानन्द नहीं है; किन्तु जिस ज्ञान में अवस्थित होकर एक व्यक्ति दूसरे को (मधु-कैटभ को) नहीं देखता है, नहीं जानता है, या दूसरों की वाणी को (कटु-मधुर वचनों को) इन्द्रियगोचर नहीं करता है, -वही 'भूमा' या महान है, उसके सहारे परमानन्द की अवस्थिति होती है। जो सदा सबके भीतर 'विज्ञाता' (जानने वाला) के रूप में विराजमान हैं, उनको किस मन-बुद्धि के द्वारा जाना जा सकता है ? " 
[" अहंकार का अर्थ है, अपने को अस्तित्व से पृथक जानना। और परमात्मा के अनुभव का अर्थ है अपने को अस्तित्व (परमसत्य या खतरनाक-सत्य) के साथ—एकाकार हो जाना। जहाँ भूमा है वहाँ 'द्वैत' का भाव नहीं है, क्योंकि द्वैत का भाव तो नाम-रूप से आच्छन्न 'अहं' ही हो सकता है। इसीलिये जहाँ द्वैत का अभाव है, जहाँ 'अहं' नहीं है, 'आमी यंत्र तुमि यंत्री'  का भाव है -  वहीं भक्ति का अद्वैत है!]
उपरोक्त वेदान्त- सिद्धान्तों की सहायता से श्री तोतापुरी ने श्रीरामकृष्णदेव को समाधिस्त करने का प्रयास किया, किन्तु प्रयत्न करने पर भी वे अपने मन को निर्विकल्प न कर सके, यानि नाम-रूप की सीमा से मुक्त न कर सके। तब उन्होंने कहा -"मुझसे ये सम्भव नहीं है, मन को पूर्णतया निर्विकल्प करके आत्मचिंतन करने में असमर्थ हूँ। " तब न्यांगटा (तोतापुरी जी) उत्तेजित होकर तीव्र तिरस्कार करते हुए बोले -" क्यों नहीं होगा ? एक काँच के टुकड़े के नुकीले भाग को उनके भौहों के बीच गड़ाकर बोले -" इस बिन्दु में अपने मन को समेट लो !" 
पुनः जब श्री रामकृष्णदेव दृढ़संकल्प लेकर ध्यान करने बैठे तथा पहले की भाँति श्रीजगदम्बा की मूर्ति मन में उदित हुई, वैसे उन्होंने ज्ञान को खड़क रूप में कल्पना कर (विवेक-प्रयोग द्वारा) मन को दो टुकड़े कर डाला। फिर मन में कोई विकल्प न रहा; तीव्र गति से उनका मन नाम-रूप के इन्द्रियगोचर जगत के परे चला गया, इन्द्रियातीत भूमि में चला गया और वे समाधि में निमग्न हो गए। तीन दिनों तक वे उसी अवस्था में रहे। यह देखकर श्री तोतापुरी सोचने लगे -" यह कैसी दैवी माया है ? जो अवस्था ४० वर्ष की कठोर साधना से मुझे मिली, उसे इस महापुरुष ने एक ही दिन के भीतर कैसे अपने अधिकार में ले लिया ? " फिर समाधि से व्युत्थान -मंत्र सुनाकर लगातार ११ महीने तक दक्षिणेश्वर में रहते हुए, माँ जगदम्बा के शक्ति-स्वरूप को स्वीकार करने के बाद ही विदा हो सके। 
शास्त्रों का कथन है कि अद्वैतभाव की सहायता से अपने " ज्ञानस्वरूप" में पूर्णरूप से अवस्थित होने से पूर्व साधकों को पूर्वजन्म  घटनाओं का स्मरण होता है। या किसी किसी व्यक्ति को अद्वैत भाव की परिपक्व अवस्था में पहुँच जाने के बाद, इस जन्म के पूर्व जहाँ, जिस रूप में और जितनी बार शरीर धारण कर उन लोगों ने जो भी सुकर्म-दुष्कर्म का अनुष्ठान किया था, उन सारी बातों का उन्हें स्मरण होने लगता है। (१/३७८) 
  संस्कार-साक्षात्कार करणात् पूर्वजाति ज्ञानम् ।।
(विभूतिपाद -३.१८)
मन क्या है ? तत्त्वदर्शियों ने मन के दो भेद बताये हैं। एक समष्टिगत मन और दूसरा व्यष्टिगत मन। ब्रह्म का मन समष्टिगत है और समस्त प्राणियों का मन व्यष्टिगत। सृष्टि की उत्पत्ति भी ब्रह्म की इच्छा से हुई। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त (१०/१२९) में कहा गया है- कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्।जब सृष्टि बनने लगी तो सबसे पहले काम  इच्छा की उत्पत्ति हुई। यह काम (इच्छा ) ही मन का रेतस् अर्थात् वीर्य है।
'लस्ट ऐंड लूकर' की इच्छा ही  मन का बीज या अंकुर है । 'लस्ट और लूकर' के पीछे दौड़ने से बारम्बार एक ही भोगी रूप में जन्म लेने से कई जीवन व्यर्थ हुए होंगे ? इस सच्चाई को जान लेने के बाद संसार में फँसाने वाली तीनों प्रकार की एषणाओं (लोक-पुत्र-वित्त) के पीछे दौड़ने और  बार-बार एक ही तरह जन्म लेने और मरने की विफलता अच्छी तरह से समझ में आ जाती है। फलतः  उन लोगों के मन में भोग की इच्छाओं के प्रति तीव्र वैराग्य का उदय होता है। और उस वैराग्य के सहारे उनका हृदय सब तरह की वासना से एकदम मुक्त हो जाता है। इसके फलस्वरूप ऐसे योगियों में सर्वप्रकार की विभूतियों और सिद्धियों का स्वतः ही उदय होता है।
समाधिपाद के ५० वें सूत्र में कहा गया है -तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कार प्रतिबन्धी।। ५०। [तज्जः – उससे जनित/उत्पन्न, संस्कार – संस्कार, अन्यसंस्कारप्रतिबन्धी – दूसरे संस्कारों का बाध करने (हटाने) वाला होता है। ] यह समाधिजात संस्कार दूसरे सब संस्कारों का प्रतिबन्धी होता है, अर्थात दूसरे संस्कारों को फिर से आने नहीं देता।
हमलोगों ने उपरोक्त सूत्र में देखा कि उस अतिचेतन भूमि पर जाने का एकमात्र उपाय है-एकाग्रता! हमने श्री ठाकुर के जीवन में यह भी देखा है कि, पूर्व संस्कार ही उस प्रकार की एकाग्रता (नाम-रूप की सीमा मुक्त एकाग्रता) पाने में हमारे प्रतिबन्धक हैं। तुम सबों ने गौर किया होगा कि ज्यों ही तुमलोग मन को एकाग्र करने का प्रयत्न करते हो, त्यों ही तुम्हारे अन्दर नाना प्रकार के विचार उमड़ने लगते हैं। ज्यों ही ईश्वर-चिंतन करने की चेष्टा करते हो, ठीक उसी समय ये सब संस्कार जाग उठते हैं। दूसरे समय उतने कार्यशील नहीं रहते; किन्तु ज्यों ही तुम उन्हें भगाने की कोशिश करते हो, वे अवश्यमेव आ जाते हैं, और तुम्हारे मन को बिल्कुल आच्छादित कर देने का भरसक प्रयत्न करते हैं।
इसका कारण क्या है ? इस एकाग्रता के अभ्यास के समय ही वे इतने प्रबल क्यों हो उठते हैं ? इसका कारण यही है कि जब तुम उनको दबाने की चेष्टा करते हो,वे पुराने संस्कार भी अपने सारे बल से प्रतिक्रिया करते हैं। अन्य समय में वे इस प्रकार अपनी ताकत नहीं लगाते। इन सब पूर्व संस्कारों की संख्या भी कितनी अधिक है !
चित्त के किसी स्थान में वे चुपचाप बैठे रहते हैं, और बाघ के समान झपटकर आक्रमण करने के लिये मानो हमेशा घात में रहते हैं। उन सबको रोकना होगा, ताकि हम जिस भाव को मन में रखना चाहें, वही आये और पहले के सारे भाव चले जाएँ। पर ऐसा न होकर वे सब तो उसी समय आने के लिए संघर्ष करते हैं। मन की एकाग्रता में बाधा देनेवाली ये ही संस्कारों की विविध शक्तियाँ हैं। अतः समाधि-जन्य जो संस्कार हैं, उन्हें प्राप्त करने का अभ्यास करते रहना ही सबसे उत्तम है; क्योंकि वह पूर्व जन्मों के संस्कारों को रोकने में समर्थ है।[ सृष्टि के २ अरब वर्ष हुए हैं, मानलो किसी को ४२ वर्ष की उम्र में निर्विकल्प की समाधि हुई, तो इसके पूर्व जन्मों के जो संस्कार संचित थे वे सभी आने लगते हैं।]  इस समाधि के अभ्यास से जो संस्कार उत्पन्न होगा, वह सत्य को देखने के कारण इतना शक्तिमान होगा कि वह अन्य सब संस्कारों का कार्य रोक कर उन्हें वशीभूत करके रखेगा।  
अद्भुत सिद्धियों को प्राप्त करने पर भी उनके हृदय में लेशमात्र वासना न रहने के कारण वे कभी उन सिद्धियों का प्रयोग नहीं करते। लोककल्याण के निमित्त माँ कृपा करके पुनः शरीर में लौटा देती है, वे पूर्णतया श्री ठाकुर के इच्छाधीन रहकर 'बहुजन-हिताय' ही कभी कभी उन शक्तियों का प्रयोग किया करते हैं। उनकी संसार में स्थिति “लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाSम्भसा।। गीता ५/१० ” जल में कमल की भाँति होती है। मन पर उनका पूरा नियन्त्रण होता है वे मन को स्थूल जगत में लिप्त होने का अवसर ही नहीं देते। बाह्य प्रभाव उनके मन पर अंकित नहीं हो पाते। अतः अब वह योगी अंतर्जगत या अचेतन मन की गहराई में प्रवेश करता और मनःसमुद्र से ऐसे अमूल्य रत्न खोज लाता है कि सामान्य बुद्धि जिस पर आश्चर्य किये बिना नहीं रहती।
अब हमलोग यह समझ सकते हैं, कि सब कुछ भगवच्चरणों में समर्पण कर देने के फलस्वरूप सब प्रकार की वासनाओं से मुक्त होने के कारण ही, इतने अल्प समय में श्रीरामकृष्णदेव के लिये 'ब्रह्मज्ञान की निर्विकल्प भूमि' (अद्वैत) में आरूढ़ और दृढ़-प्रतिष्ठित होना सम्भव हुआ था। साथ ही अपने पूर्वजन्म के वृत्तान्तों को जानकर उन्होंने स्पष्ट रूप से अनुभव किया था कि पूर्व पूर्व युगों में 'श्रीराम' तथा 'श्रीकृष्ण' के रूप में आविर्भूत होकर जिन्होंने लोक-कल्याण साधन किया था, वे ही वर्तमान युग में पुनः शरीर धारण कर 'श्रीरामकृष्ण' के रूप में अवतरित हुए हैं।
तब पूर्व जन्म की घटनाओं का स्मरण कर समझ गए कि, वे 'नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-स्वभाववान' आत्मा (ब्रह्म) के अवतार हैं, तथा वर्तमान युग की धर्मग्लानि दूर कर, लोक-कल्याण साधन के निमित्त (भारत के युवाओं की खोई हुई श्रद्धा या आस्तिकता को लौटा देने के निमित्त) ही श्रीजगदम्बा ने उनको भारत की तात्कालीन राजधानी कोलकाता के दक्षिणेश्वर मन्दिर का निरक्षर-पुजारी बनाया है, और वहाँ के सर्वोच्च शिक्षित लोगों को उनका शिष्य बनाया है।
अद्वैतभावभूमि में आरूढ़ होकर उन्होंने और एक सत्य को हृदयंगम किया था कि अद्वैत भाव में सुप्रतिष्ठित होना ही समस्त साधनों का चरम लक्ष्य है। क्योंकि अद्वैत-भावभूमि में अवस्थित होने के बाद उन्होंने भारत में प्रचलित समस्त मुख्य धर्म-सम्प्रदायों (शाक्त-शैव-वैष्णव-इस्लाम-ईसाई आदि) के मतानुसार साधना करके यही अनुभव किया था कि प्रत्येक धर्मपंथ उसी अद्वैत-भूमि की ओर साधक को अग्रसर करता रहता है। क्योंकि संसार के सभी प्रचलित धर्म प्रेम-दया और क्षमा की शिक्षा देते हैं !
" निर्विकल्प भूमि में प्रतिष्ठित रहने के फलस्वरूप द्वैत-भूमि की सीमा में अवस्थित कुछ घटनाओं और व्यक्तियों को देखकर अक्सर श्री ठाकुरदेव की "अद्वैत-स्मृति " जाग्रत हो उठती थी, और वे तुरीयभाव में लीन हो जाते थे !
१.वृद्ध घसियारा : मंदिर-प्रांगण से बिना मूल्य घास लेने की अनुमति मिलने पर दिनभर घास काटता रहा, शाम को जब गट्ठर बाँधकर बेचने के लिये बाजार जाने को तैयार हुआ। श्री रामकृष्ण ने देखा लोभ के वशीभूत होकर उस वृद्ध ने इतनी घास काट ली थी कि उस वृद्ध के लिये गट्ठर उठाना भी सम्भव न था। फिर भी बार बार उसको उस बोझ को रखने का प्रयास तो कर रहा था, पर वजन इतना था कि उठा नहीं पा रहा था ! किन्तु वजन की तरफ गरीब घसियारे का कोई ध्यान न था।  यह देखकर श्रीरामकृष्णदेव - यह सोचते हुए भावाविष्ट हो गए, कि " भीतर पूर्ण ज्ञानस्वरूप आत्मा रहने पर भी, बाहर ऐसी निर्बुद्धिता, इतना अज्ञान! हे राम , तुम्हारी कितनी विचित्र लीला है ! " पंचभूते फाँदे ब्रह्म पड़े कांदे !" --और इस प्रकार कहते हुए समाधिस्त हो गए !!
२. नये दूर्वादल पर चलने का दर्द अपने हृदय में
३. दो मल्लाहों का झगड़ा
४. देवघर में अकाल-पीड़ितों को कपड़ा -तेल देने की ज़िद
५. घायल पतिंगा
जब भारत में चरित्र-निर्माण, मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा व्यवस्था के बदले "बाबु -निर्माणकारी शिक्षा व्यवस्था" लागु हो गयी, तब यथार्थ शिक्षा या धर्म को पुनः स्थापित करने के लिये भगवान विष्णु (नेता) को पुनः विवेकानन्द के गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस के रूप में अवतार लेना पड़ा। उन्होंने अपने अंतिम समय में विवेकानन्द (तबके नरेन्द्रनाथ) के समक्ष स्वयं अपने मुख से कहा था - " ओ नरेन्, तुम्हें अब भी विश्वास नहीं हुआ ? जो राम जो कृष्ण, वही रामकृष्ण -इस बार दोनों एक साथ; किन्तु तेरे वेदान्त  दृष्टि से नहीं ! एकदम साक्षात्!"    
इसीलिये अद्वैत भाव के विषय में पूछने पर वे बारम्बार यही कहते थे -" वह तो अन्तिम बात है रे, अन्तिम बात, ईश्वरप्रेम की चरम परिणति में स्वतः ही एक दिन 'वह' भाव -(तत्त्वमसि का प्रयोगगत यथार्थ का अनुभव), साधक के जीवन में आकर उपस्थित होता है। उन समस्त मतों के अनुसार 'अद्वैत या तत्त्वमसि' का अनुभव हो जाना अन्तिम बात है, एवं -'जितने मत हैं, उतने ही पथ हैं !"  (सभी मत अद्वैत तक पहुँचने के ही पथ हैं !)
इस प्रकार से अद्वैत भाव की उपलब्धि कर लेने के बाद,श्रीरामकृष्णदेव के हृदय में अपूर्व उदारता और सहानुभूति का उदय हुआ। जो कोई धर्म-सम्प्रदाय -" ईश्वरप्राप्ति को ही मानवजीवन का चरम लक्ष्य" मानकर शिक्षा प्रदान करते हैं, उन सभी सम्प्रदायों के प्रति उनमें अपूर्व सहानुभूति का उदय हुआ था। किसी को धर्म के विषय पक्षपात करते देख कर उन्हें महान कष्ट होता था, तथा उस हीनबुद्धि को दूर करने के लिये वे हमेशा सचेष्ट रहते थे।
'अल्ला-प्रेमी गोविन्दराय' इस्लाम धर्म के सूफी सम्प्रदाय को अपनाकर, दरवेशों की भाँति कुरानपाठ तथा साधना करने में लीन रहते थे। उनसे धर्म-चर्चा होने के बाद श्रीरामकृष्णदेव का मन इस्लाम धर्म की ओर झुकने लगा और वे सोचने लगे -" यह भी तो ईश्वर प्राप्ति का (या अद्वैत तक पहुँचने का) एक मार्ग है, अनन्तलीलामयी माँ जगदम्बा -इस मार्ग के द्वारा कितने ही साधकों या अपने आश्रितों को किस प्रकार कृतार्थ करती हैं ?  मुझे भी यह देखना चाहिये। गोविन्दराय पहले जाति से क्षत्रिय थे, श्रीठाकुर उन्हीं से सूफिज़्म की दीक्षा लेकर, विधिवत इस्लाम धर्म की साधना में प्रवृत्त हुए।
श्रीरामकृष्णदेव कहते थे तब मैं 'अल्ला' मन्त्र का जप किया करता था, त्रिसन्ध्या नमाज पढ़ता था, लांग खोलकर धोती पहनता था। उस समय हिन्दू देव-देवियों को प्रणाम करने की बात तो दूर रही, उनका दर्शन करने की इच्छा भी नहीं होती थी। इस साधना के समय वे कालीमन्दिर के बाहर मथुरामोहन जी की कोठी में रहते थे। तीन दिनों तक सूफ़ी मत से साधना करने के बाद उन्हें सर्वप्रथम लम्बी दाढ़ीयुक्त एक ज्योतिर्मय महापुरुष (पैगम्बर ?) का दिव्यदर्शन प्राप्त हुआ था। इस सगुण विराट ब्रह्म की उपलब्धि के बाद उनका मन "तुरीय निर्गुण ब्रह्म" में लीन हो गया था।
भारत इस्लाम का केंद्र बन रहा है और इसका मुख्य भाव सूफ़ीवाद है।  इसने भारत की अलग इस्लामिक विरासत बनाने में मदद की है।  इस्लाम का अर्थ वास्तव में शांति होता है। सूफ़ियों के लिए भगवान की सेवा का अर्थ है इंसान की सेवा। अल्लाह ही रहमान और रहीम है। अल्लाह के ९९ नाम हैं जिनमें से कोई भी हिंसा का प्रतीक नहीं है। एक मात्र वेदान्त-विज्ञान (४ महावाक्य) पर निर्भरशील होकर ही भारत के हिन्दू तथा मुसलमान परस्पर सहानुभूति-सम्पन्न होकर भाईचारगी से रह सकते हैं। युगावतार श्रीरामकृष्णदेव की इस्लाम के सूफिज़्म मत की साधना करना, शायद निकट भविष्य में ही टेरेरिज्म को दूर करने का कारगर उपाय सिद्ध होगा?
अपने जीवन को धर्म की प्रयोगशाला बनाकर श्रीरामकृष्ण ने सिद्ध किया कि कैसे एक हिन्दू सही रूप में हिन्दू, एक ईसाई सच्चा ईसाई और एक मुसलमान सही अर्थ में मुसलमान बन सकता है। सभी धर्मों से ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है। इसलिए न तो कोई धर्म अच्छा है और न कोई बुरा। धर्म केवल साधन मात्र है, वह साध्य कदापि नहीं हो सकता। अतः एक धर्म के अनुयायी का दूसरे से द्वेष करना या बलपूर्वक धर्म का प्रचार करना निरर्थक है।
 उनका स्पष्ट एवं निश्चित मत था कि ‘सब मार्गों से उन्हें प्राप्त किया जा सकता है। सभी धर्म सत्य हैं।’ वे कहते हैं-’राम एक ही हैं, परन्तु उनके हजारों नाम हैं। ईसाई उन्हें गॉड कहते हैं, हिन्दु उन्हें राम, कृष्ण और ईश्वर कहकर पुकारते हैं। तालाब के बहुत से घाट हैं। हिन्दू एक घाट से पानी पीते हैं, कहते हैं-जल। ईसाई दूसरे घाट से पानी पीते हैं, कहते हैं-वाटर। मुसलमान तीसरे घाट से पानी पीते हैं, कहते हैं-पानी। इसी प्रकार जो ईसाइयों का गॉड है, वही मुसलमानों का अल्लाह है।’ इस प्रकार ‘एकं सद्विप्राः बहुधा वदन्ति’ का वेद वाक्य उनके जीवन से चरितार्थ होता है। और एक सार्वभौम धर्म की सशक्त आधारशिला वे तैयार करते हैं।

आज के वैज्ञानिक युग में जब सारा विश्व एक परिवार का रूप ले रहा है, श्रीरामकृष्ण का धर्म-समन्वय का उपदेश विशिष्ट महत्त्व रखता है। आज जब धर्म एवं सम्प्रदाय के नाम पर समूचा समाज, राष्ट्र एवं विश्व घृणा, विद्वेष एवं आतंक के दावानल में धधक रहा है, उनका सर्वधर्म-समन्वय का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। 
श्री रामकृष्ण परमहंस देव के बताये इसी मार्ग पर भारत की सनातन संस्कृति की गौरव-गरिमा पुनः प्रतिष्ठित होनी है और पूरे विश्व के एक साँस्कृतिक सूत्र में बँधते हुए एक विश्व-राष्ट्र की एवं वसुधैव कुटुम्बकम् की परिकल्पना चरितार्थ होनी है। इसीलिये नवगोपाल घोष के नवनिर्मित गृह में श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव की (अमेरिका से लाये गये) छवि को आसान पर बैठा कर पूजा करते समय,स्वामी विवेकानन्द उनके लिये ' स्वतःस्फूर्त प्रणाम-मन्त्र ' की रचना करते हुए कहते हैं :
ॐ स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्मस्वरूपिणे। 
   अवतारवरिष्ठाय   रामकृष्णाय ते  नमः।। 
अर्थ : सर्वधरर्मों मे मुर्तस्वरुप, लोक जीवन मे धर्म की पुन: स्थापना करनेवाले अवतारों में वरिष्ठ श्रीरामकृष्ण परमहंस को नमन है ।
परमहंसदेव के लिये स्वामीजी के द्वारा दिये गये इस विशेषण 'अवतारवरिष्ठ' को सुनने से मन में कुछ प्रश्न उठने शुरू हो जाते हैं, जो बिल्कुल स्वाभाविक हैं. क्योंकि पहले हमने तो स्वयं ठाकुर (परमहंसदेव जी) के मुख से (वचनामृत में) सुना है कि सारे धर्म समान हैं,आदि आदि ! सभी धर्मों के अनुयायी ' अवतार ' के रूप में किसी न किसी व्यक्ति के आविर्भूत होने का दावा करते हैं. अब यदि उन सबों के बीच श्रीरामकृष्ण को यदि 'अवतारवरिष्ठ '- कहा जाय, तो अन्य सभी धर्म के अनुयायियों के मन कई प्रकार के प्रश्न, सन्देह, तर्क आदि का उठना बिल्कुल स्वाभाविक है। किन्तु इस प्रश्न का समाधान है- गीता ४/७ में जहाँ भगवान के श्रीकृष्ण ने कह रहे हैं -
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |
    अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम || 
--हे भारत (अर्जुन), जब जब धर्म की कमी और अधर्म की वृद्धि होती है तब तब मैं शरीर धारण कर अवतीर्ण होता हूँ.  (अन्य सभी लोग जहाँ भले-बुरे कर्म के अनुसार जन्म ग्रहण करते हैं, किन्तु मैं कर्म के वश में नहीं हूँ. केवल संसार के कल्याण का संकल्प लेकर अपनी त्रिगुणात्मिका माया की सहायता से 'तदा आत्मानं सृजामि अहं ' मैं अपने को सृष्टि करता हूँ ' अर्थात मनुष्य-देह धारण कर संसार में आविर्भूत होता हूँ!) 
सर्वशक्तिमान भगवान का जीव-जगत के कल्याण के लिये मनुष्यदेह धारण कर आविर्भूत होना संसार के आध्यात्मिक इतिहास में एक बहुत बड़ी घटना है. काल के प्रभाव से जब संसार पाप के भार से आक्रान्त होता है, तब वे मानो अपने कर्तव्य पालन के उद्देश्य से धर्म की ग्लानि दूर करने संसार में अवतीर्ण होते हैं.धर्म के प्रसार में जो विघ्न सामने आते हैं वे उन्हें विभिन्न प्रकार से दूर करके धर्म के प्रवाह को बाधा-रहित कर देते हैं. प्रत्येक युग में ऐसा ही होता आया है. किन्तु हमे ऐसा नहीं मान लेना चाहिये कि प्रत्येक युग में धर्म-संस्थापन का कार्य केवल (राक्षसों य़ा) पापियों का वध कर के ही करना पड़ता है. 
किस उपाय से धर्म को संस्थापित करना होगा- इसे श्रीभगवान अच्छी तरह जानते हैं. ...प्रत्येक अवतार के धर्मसंस्थापन की पद्धति विभिन्न प्रकार की होती है -- देश,काल और प्रयोजन के अनुसार कार्य-प्रणाली बदल जाति है. वर्तमान युग में भगवान श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव ने अपनी साधना और आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा पृथ्वी पर विद्यमान सभी धर्मों की ग्लानि को दूर किया है.
 साथ ही धर्म के संस्थापन के लिये अत्यन्त करुणा करके इसबार उन्होंने अनेक पापियों का पाप-भार अपने ऊपर ले कर उनको भी धर्मात्मा बनने का मौका दिया है, और अपनी भूल को सुधार कर साधु यथार्थ मनुष्य बनने की शिक्षा दी है; उसी प्रकार साधु पुरुषों के साधन-मार्ग के विघ्न को दूर कर उन्हें साधु बनाया है. 
" स यत प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते " 
 --अर्थात वे अपने जीवन द्वारा जिसे प्रमाणित करते हैं लोग उसी का अनुसरण करते हैं. केवल धर्मग्रन्थ से काम नहीं चलता. आदर्श जीवन कैसा होता है- उसे जी कर भी दिखाना होता है. उनके जीवनादर्श से शिक्षा पाकर लोग धर्ममार्ग का अनुसरण करते हैं. (गीता ४: ७ के) उपरोक्त श्लोक का उच्चारण यदि हमलोग इस प्रकार करें --
यदा ही सर्वधर्मानाम ग्लानिर्वभूव भारत |
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं ससर्ज सः ||
-- हे भारतवासी, जब पृथ्वी के समस्त धर्म अधोपतित हो गये थे एवं उसके साथ 'अभ्युत्थानमधर्मस्य '  अधर्म का भी अभ्युत्थान हो गया था; तब उस विकट परिस्थिति में ' उन्होंने '(अद्वैत ब्रह्म परमहंसदेव ने) स्वयं को सृष्ट किया था !
अर्थात जब एक एक (अलग अलग)  देश का धर्म पतित हुआ था, तब उस उस देश के धर्मों को  उठाने के लिये एक एक अवतार आये थे। किन्तु जब सम्पूर्ण पृथ्वी के धर्म अधोपतित हो गये एवं समग्र पृथ्वी में- ' अधर्म का अभ्युत्थान ' हो गया तब ' धर्म-वस्तु ' का ही नवोत्थान करने के लिये उन्होंने (परमहंसदेवजी) स्वयं की सृष्टि की थी।  इसीलिये श्रीरामकृष्ण अवतार वरिष्ठ हैं !
 " अवतारवरिष्ठस्तत रामकृष्णो हि केवलः।
          इतिहासपुराणेषू समः कोअपि न विद्यते।।"   
जब से सृष्टि बनी है, तब से लेकर आज तक मानव इतिहास में "परमहंसदेव" (ठाकुर) के जैसा (त्यागी) दूसरा कोई नहीं हुआ है. किसी भी देश य़ा किसी भी धर्म का पुराण क्यों न हो - किसी भी देश के पुराण में, " श्रीरामोकृष्णो " के जैसा और दूसरा कोई नहीं हुआ। 
ऐसा कहना - किसी को छोटा करना य़ा बड़ा करना नहीं है, किसी के साथ तर्क-कुतर्क य़ा झगड़े में पड़ने की कोई जरुरत नहीं है।  स्वामीजी ने उस दिन क्या सोंच कर ठाकुर को (परमहंसदेवजी को)'अवतारवरिष्ठ' कहा होगा- यह तो केवल स्वामीजी जानते होंगे। किन्तु ठंढे दिमाग से (पूर्वाग्रह से रहित होकर) यदि हम चिन्तन-मनन करें तो हमलोग इस विशेषण " अवतारवरिष्ठ " को - अत्यन्त आनन्द के साथ ग्रहन कर सकते हैं। एवं यह घोषणा भी कर सकते हैं कि, सम्पूर्ण जगत के मानव-समाज के परित्राण के लिये वर्तमान युग में उपाय - एकमात्र श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव से ही प्राप्त किया जा सकता है।  एवं उनके उपदेश- स्वामी विवेकानन्द के जीवन में जिस प्रकार उक्त, व्यक्त, और प्रचारित तथा आचरित हुए हैं, उनका थोड़ा भी अनुसरण करने से अपने जीवन में भी उतार सकते हैं। 
लार्ड मेकाले ने भारत के जिस शिक्षा तन्त्र को (गुरु-शिष्य परम्परा में नेतृत्व प्रशिक्षण पद्धति को) तोड़ने का प्रयास किया था, श्री रामकृष्ण देव जी ने उसी गीता -उपनिषद पर आधारित अचिन्त्य-भेदाभेद वेदान्त" शिक्षा तंत्र " या लीडरशिप ट्रेनिंग परम्परा को पुन: स्थापित किया।
भगवान श्री रामकृष्ण को अवतारवरिष्ठ इसीलिए कहा जाता है कि उन्होंने सभी धर्मों की साधनाएं की हैं।मनुष्य—जाति के इतिहास में वे अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने सभी धर्मों के मार्ग से सत्य तक जाने की चेष्टा की। आमतौर पर जब कोई व्यक्ति किसी एक योगमार्ग से लक्ष्य तक पहुंच जाता है- 'ब्रह्म' को जान लेता है या आत्मसाक्षात्कार कर लेता है; तब फिर वह दूसरे योग-मार्गों की साधना करना आवश्यक नहीं समझता!
जैसे कोई व्यक्ति सीमेन्ट की सीढ़ियों से चढ़ कर पहाड़ की चोटी पर पहुंच जाये; तो फिर दूसरी पगडंडियों से भी चोटी पर चढ़ा जा सकता है, या नहीं ? इस बात की फ़िक्र कौन फिक्र करता है— पहुंच ही गये। जो पक्की सीढ़ी चोटी तक ले आई, ले आई; बाकी लाती हों न लाती हों, प्रयोजन किसे है!
लेकिन श्री रामकृष्ण ऐसे साधक थे जो विभिन्न योग-मार्गों के सहारे बार—बार पहाड़ की चोटी पर पहुंचे, फिर—फिर नीचे उतर आये। फिर दूसरे मार्ग से चढ़े। फिर तीसरे मार्ग से चढ़े। वे पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने सभी धर्मों की साधना की और सभी धर्मों से उसी शिखर को पा लिया। सर्वधर्म समन्वय की बात बहुत से लोग कहते थे, किन्तु श्री रामकृष्ण ने ही सर्व-प्रथम धर्म-समन्वय का विज्ञान निर्मित किया।
बहुत से लोगों ने कहा था, सभी धर्म सच हैं; लेकिन वह केवल मुख से कहने की बात थी—उनका अपना अनुभव नहीं था। रामकृष्ण ने उस मार्ग को तथ्य बनाया; उस मार्ग की साधना के अनुभव पर बल दिया; अपने जीवन से प्रमाणित किया। जब वे इस्लाम की साधना करते थे तो वे ठीक मुसलमान फकीर हो गये। वे काली -काली कहना भूल गये; नमाज पढ़ने लगे, अल्लाह के ९९ नामों का जप  करन लगे; कुरान की आयतें सुनने लगे। एक मस्जिद के द्वार पर ही पड़े रहते थे। मंदिर के पास से निकल जाते, उधर आंख भी न उठाते।
छह महीने तक उन्होंने सखी—संप्रदाय के राधा भाव की साधना की थी। तीन महीने के बाद उनके स्तन उभर आये; उनकी आवाज बदल गई; वे स्त्रियों जैसे चलने लगे, स्त्रियों जैसी उनकी मधुर वाणी हो गई। स्तन उभर आये, स्त्रियों जैसे स्तन हो गये ! शरीर का पुरुष—ढांचा बदलने लगा। एक मान्यता कि मैं स्त्री हूं—यह मान्यता इतनी प्रगाढ़ता से की गई, यह भाव इतने गहरे तक गुंजाया गया, यह रोएं—रोएं में, कण—कण में शरीर के गुंजने लगा कि मैं स्त्री हूं! इसका विपरीत भाव न रहा। पुरुष की बात ही भूल गई। तो घटना घट गई। छह महीने पूरे होते—होते उनको मासिक—धर्म शुरू हो गया। तब चमत्कार की बात थी!  ऐसा तो कभी किसी पुरुष को न हुआ था।
प्रसिद्ध विद्वान रोमाँ रोलाँ श्रीरामकृष्णदेव को ईसामसीह का कनिष्ठ भ्राता कहकर बड़ा सम्मान देते हैं। प्रख्यात् इतिहासकार आर्नोल्ड टायनवी मानते हैं कि श्रीरामकृष्ण का आविर्भाव ठीक उस स्थान और समय पर हुआ, जब उनके संदेश की आवश्यकता थी। उनके अनुभूत धर्म को वे मानवता की रक्षा करने वाली अद्वितीय शक्ति बताते हैं। क्रिस्टाँफर ईशरवूड की अनुभूति तो और भी गहरी है। श्री ठाकुर से अविभूत होकर वे कहते हैं-’मैं तो श्रीरामकृष्ण का उपासक हूँ और जैसा कि उनके शिष्य मानते हैं, वे पृथ्वी पर ईश्वर के वरिष्टतम अवतार थे।’रूसी विद्वान् निकोलस रोरिक के शब्दों में-’विश्व के सभी भागों में श्रीरामकृष्ण का नाम आदर से लिया जाता है।’ टॉलस्टाय भी अपने जीवन के अंतिम दशक में श्रीरामकृष्ण एवं विवेकानन्द के विचारों से संपर्क में आये और उनसे गहरी आत्मीयता व्यक्त किये। 
महर्षि अरविन्द लिखते हैं-’जब नास्तिकता अपने चरम पर पहुँची, तब समय आ गया था कि आध्यात्मिकता आग्रहपूर्वक स्वयं को स्थापित करे। और यह सिद्ध करे कि जगत् का यथार्थ - और कुछ नहीं, आत्मा की ही अभिव्यक्ति है।
उन्हीं की प्रेरणा से बंगलादेश में भी 'यूनिवर्सल ह्यूमनिज्म' या 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना को समाज में स्थापित करने के उद्देश्य से 'क़्वांटम ध्यान और दूसरों के कल्याण' के जुड़वाँ आदर्श पर आधारित  कई समाज-सेवी संगठन कार्य कर रहे हैं। इसके साथ ही साथ 'क्वांटम' ने विभिन्न धर्मों के सन्देशों को सम्मिलित करके उनके सार- मर्म को अभिव्यक्त करने की जो पहलकदमी  की है, वह 'अन्तर्धार्मिक सद्भाव' (Interfaith harmony) को स्थापित करने की दिशा में एक अति उत्कृष्ट कदम हैं। इसके माध्यम से हमलोग यह समझ सकते हैं कि विविध धार्मिक सन्देशों में भाषागत अंतर रहने से भी, भावगत मतभेद
 बिल्कुल नहीं है। हम सभी लोगों का लक्ष्य है - 'सर्व दुखों से छुटकारा प्राप्त करते हुए परमानन्द की प्राप्ति!' इसके फलस्वरूप हमलोगों के बीच पारस्परिक सम्मान (Mutual Respect) एवं अपने आप में विश्वास और अधिक दृढ़ हो जाता है। 
बंगलादेश में  'क़्वांटम ध्यान और दूसरों के कल्याण' के उद्देश्य से जो संगठन स्थापित हुआ है, उसका नाम और पता है -Quantum Method : Science of Living for the Modern  People.
31/V, Shilpacharya Zainul Abedin Sarak, Shantinagar (1st floor), Dhaka–1217 (Beside Eastern Plus Market) +88 02 9341441, +88 02 8319377/
 Webmaster@quantummethod.org.bd 
রামকৃষ্ণ মিশনের স্বামী স্থিরাত্মানন্দ জী মহারাজ (ढाका रामकृष्ण मिशन के असिस्टेंट सेक्रेटरी स्वामी स्थिरात्मानन्द जी महाराज (निरंजन महाराज)  
क्वांटम मेथड : 'आधुनिक मनुष्यों के लिये जीवन जीने का विज्ञान' 31 / वी, शिल्पाचार्य जैनुल अब्दीन सड़क, शांतिनगर (1 ली मंजिल), ढाका -1217 (पूर्वी प्लस मार्केट के निकट)  
[साभार https://publication.quantummethod.org.bd/content/ ] 
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गुरुवार, 10 अगस्त 2017

‘सा विद्या या विमुक्तये’

बॉन्डेज ऐंड लिबरेशन: स्वामी विवेकानन्द ने प्रचलित शिक्षा को 'निषेधात्मक शिक्षा' की संज्ञा देते हुए कहा है कि " आप उस व्यक्ति को शिक्षित मानते हैं जिसने कुछ परीक्षाएं उत्तीर्ण कर ली हों तथा जो अच्छे भाषण दे सकता हो, पर वास्तविकता यह है कि जो शिक्षा जनसाधारण को जीवन संघर्ष के लिए तैयार नहीं करती, जो चरित्र निर्माण नहीं करती, जो समाज सेवा की भावना विकसित नहीं करती तथा जो सिंह जैसा साहस पैदा नहीं कर सकती, वह शिक्षा भी कोई शिक्षा है, ऐसी शिक्षा से क्या लाभ? उन्होंने कहा है कि 'हमें ऐसी शिक्षा चाहिए, जिससे चरित्र का गठन हो, मन का बल बढ़े, बुद्धि का विकास हो और व्यक्ति स्वावलम्बी बने।' 
स्वामी विवेकानन्द धर्म को शिक्षा का मेरुदण्ड कहते थे। उनका मानना था कि प्रत्येक व्यक्ति में 'ज्ञान' का वास होता है; और शिक्षा उसको प्रकाश में लाने का कार्य करती है। धर्म का मानव जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। धर्म अर्थात चरित्र से हीन मनुष्य पशु होता है। धर्म का अर्थ है- ' विवेक ' या मननशीलता। यह विवेक ही मनुष्य को 'सत-असत' का निर्णय करने में सक्षम-'निर्णायक बुद्धि ' प्रदान करता है। तभी तो विवेकी मनुष्य, क्या अच्छा है, और क्या बुराहै, समझ-बूझ कर इसका निर्णय कर सकता है। किन्तु साधारण अर्थों में जिसे अच्छा और बुरा (आंवला-इमली का अंतर) समझा जाता है, सदसत-विवेक का अर्थ भी ठीक उतना ही नहीं है। 'सत ' का अर्थ है-जो अविनाशी हो या चिरस्थायी हो (सत्य-वस्तु)। 'असत' का अर्थ है क्षणभंगुर या नश्वर (मिथ्या-वस्तु)। कौन सी वस्तु सत (अविनाशी) है, और कौन सी वस्तु असत (नश्वर) है- जो प्राणी चिन्तन करके इस बात को जान सकता है, उसी को मननशील जीव कहा जाता है। वैदिक निरुक्तकार यास्क-मुनि मनुष्य को परिभाषित करते हुए कहते हैं- " जो व्यक्ति कुछ भी सोचने-बोलने-करने के पहले थोड़ा रुककर, 'विवेक-प्रयोग' करने के बाद ही कोई कार्य करता है, उसको ही मनुष्य कहा जाता है।"
[स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [17] ' स्वामी विवेकानन्द तथा आज के हमलोग '(स्वामी विवेकानन्द और युवा समाज)] 
संस्कृत में नीतिकार कहते हैं-‘धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः।’ अर्थात् मनुष्यों और पशुओं में आहार, निद्रा, मैथुन तथा भयभीत होना, ये सब समान होते हैं परन्तु धर्माचरण अर्थात सुन्दर चरित्र ही मनुष्य में विशेष गुण है जिसके कारण वह पशुओं से भिन्न होता है। 
येषां न विद्या न तपो न दानं , ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ।
 ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः , मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥
जिसके पास न विद्या है, न तप है, न दान है , न ज्ञान है , न शील है , न गुण है और न धर्म है ; वे मृत्युलोक पृथ्वी पर भार होते है और मनुष्य रूप तो हैं पर पशु की तरह चरते हैं (जीवन व्यतीत करते हैं )।चरित्र ही मनुष्‍य के जीवन को शोभा (रौनक) प्रदान करता है। मनुष्य के लिये चरित्र एक ऐसी दौलत है जिसे अपने पास रखने वाला व्यक्ति कैसी ही हालत में क्यों न हो, वह समाज के बीच गौरव और प्रतिष्‍ठा पाता ही है। चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना किसी महान सभ्‍यता का प्रधान अंग है। किसी भी राष्ट्र की सच्‍ची उन्नति तभी होगी जब उस देश का हर एक आदमी अपने को चरित्र संपन्‍न और भलमनसाहत की कसौटी में कसे हुए मनुष्य के रूप में प्रगट कर सकते हों।
निरूक्तकार आचार्य यास्क मुनि अपने निरुक्त में पशु की परिभाषा देते हुए कहते है-" पश्यति इति पशुः"  अर्थात जो देखता है वो पशु है। और सभी देखते हैं, इसलिये क्या सभी पशु हैं ? तो फिर मनुष्य और पशु में अन्तर कहाँ है ? यास्क मुनि - 'मनुष्यः कस्मात्' अर्थात मनुष्य कौन है ? के उत्तर में कहते है-  'मत्वा (कर्माणि) सिव्यति इति मनुष्यः’ (३/८/२) अर्थात् मनुष्य तभी मनुष्य है जब वह किसी भी कर्म को चिन्तन तथा मनन पूर्वक करता है। मनुष्य विचारपूर्वक देखता है तथा करता है-मत्वा कर्माणि सीव्यति’ क्योंकि मनुष्य एक चिन्तनशील प्राणी है। पशु केवल नेत्रों से देखता है- वह विचार नहीं कर सकता। 'मनसा सीव्यति इति मनुष्यः' - अर्थात मन से जो सी ले, सम्बन्ध जोड़ ले वह मनुष्य होता है।' अतः मनुष्य वही है जो अपने समस्त कर्त्वय कर्मों को 'विवेक-प्रयोग ' करने के बाद ही करे। इतना सारा समय इन्द्रियजगत में, मन की कल्पनाओं को देखने (पश्यति पशुः) में चला जाये तो मनुष्य जीवन का अनर्थ हुआ। मनुष्य को एकाग्रता के अभ्यास के साथ-साथ निरंतर विवेक-प्रयोग भी करते रहना चाहिये।
मनुष्य व पशु शब्दों की व्याख्या करते हुए कहा जाता है कि ‘मनुते इति मनुष्यः’ अर्थात मनन करके कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले व्यक्ति को मनुष्य कहा जाता है। "मोक्तुम इच्छा मुमुक्षा " मुमुक्षा अर्थात मोक्ष की इच्छा छूटने की इच्छा यह "मोक्षेच्छा जिस मनुष्य मे रहती हैं उसका नाम है "मुमुक्षा।" मनुष्य दो हाथ, दो पैर व वाणी वाला व्यक्तित्त्व है। उसमें चिंतनशीलता है।  बार-बार मनन यानी सोच-विचार करते हैं वे ही वास्तव में मनुष्य होते हैं। यह, 'अहं ब्रह्मासि'  आदि वेदान्त के महावाक्यों पर 'श्रवण-मनन -निदिध्यासन ' की प्रवृत्ति ही मनुष्यता की परिचायक है। यही मनुष्य होने का लक्षण है। अन्यथा मनुष्य भी उस पशु के समान ही है जो केवल देखता है और बिना चिन्तन मनन के विषय में प्रवृत्त हो जाता है।
पशु परम् सत्य या ईश्वर की खोज नहीं कर सकता, परन्तु मनुष्य किसी भी वस्तु की सत्यता को खोजने या आविष्कृत करने की चेष्टा करता है। और जब कोई मनुष्य देश-काल -निमित्त से परे इन्द्रियातीत परमसत्य या ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है तब वह 'ऋषि' (अध्यात्म -वैज्ञानिक) बन जाता है।  यास्क मुनि के निरुक्त मे ऋषि का निर्वचन इस प्रकार है-‘ऋषिः दर्शनात् !' (निरुक्त 2/11) इस निरुक्त से ॠषि का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है- दर्शन करने वाला, तत्वों की साक्षात अपरोक्ष अनुभूति रखने वाला विशिष्ट पुरुष। ऋषिगण त्रिकालज्ञ माने गये हैं। 'ऋषि दर्शनात्', जो साधक भूत और भविष्य को भी वर्तमान के समान ही देख सके । ‘साक्षात्कृतधर्माणः ऋषयो बभूवुः’ किसी मन्त्र विशेष की सहायता से किये जाने पर किसी कर्म से किस प्रकार का फल परिणत होता है, ॠषि को इस तथ्य का पूर्ण ज्ञान होता है। इस विवेचन से यह स्पष्ट है कि वैदिक मन्त्रों के द्रष्टा (कर्ता नहीं) ऋषि कहे गये हैं। सप्तर्षि- सात ऋषियों में मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ की गणना होती है। आकाश में सात तारों के एक समूह विशेष को भी सप्तर्षि कहा जाता है।
यहां दर्शन का अर्थ दिव्य दृष्टि ही है, सामान्य देखना नहीं, सामान्य रूप में तो सभी देखते हैं। दिव्य दृष्टि केवल ऋषि में होती है। ऋषि बिना नेत्रों के ही अन्तः प्रज्ञा से देखता है। ब्रह्म वा अजः ।-(शतपथ० ६/४/४/१५) ब्रह्म ही अजन्मा है। 
अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ।।-(श्वेता० २/१५)
 अजन्मा,ध्रुव,सारे तत्त्वों से अलग परमात्मदेव को ब्रह्मतत्त्वदर्शी जानकर पाशों से छूट जाते हैं।
 ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है! श्रुति कहती है! तुलसीदास जी भी कहते हैं कि " सोइ जानै जेहि देहु जनाई! जानत तुमहि तुमही होइ जाई!! " तुमको जाननेवाला तुम्ही हो जाता है ! स्वामी विवेकानन्द भी कहते हैं कि मानवमात्र के अंदर अनन्त ज्ञान, अनन्त शक्ति अन्तर्निहित है, केवल जीवन मे उसके प्राकट्य की आवश्यकता है ! पारलौकिक दृष्टि से उन्होंने कहा है कि 'शिक्षा मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है।'
भारतीय संस्कृति बौद्धिक है।  बुद्धि के ऊपर निर्भर है। जहां बुद्धि नहीं, वहा मुक्ति नहीं, वहां भारतीय संस्कृति नहीं, वहां धर्म नहीं।  बृहस्पति स्मृति में कहा गया है -
केवलं शास्त्रमाश्रित्य न कर्तव्यो विनिर्णयः।
युक्तिहीन विचारे तु धर्महानिः प्रजायते।
केवल किताबों का, जिनको शास्त्र कहते हैं, सहारा लेकर धर्म तत्त्व का निर्णय नहीं हुआ करता। जहां बुद्धि नहीं है, युक्ति नहीं हैं, ऐसे विचार से धर्म की हानी होती है। चाहे वे हिंदू हों, चाहे मुसलमान हों, चाहे ईसाई हो, धर्म युक्ति पर आधारित नहीं है, वह धर्म कहलाने योग्य नहीं है। भारतीय धर्म बौद्धिक है और युक्ति पर निर्भर है। 
हमारा देश ऋषि-मुनियों का देश है , इसीलिये यह देश अपने आतंरिक तल में बौद्धिक रहा है, बुद्ध का पुजारी रहा है।  बुद्धि के ऊपर उसने किसी किताब को नहीं रखा है- ‘यो बुद्धेः परतस्तु सः.’ बुद्धि के ऊपर केवल ईश्वर को माना है।  ईश्वर के बाद संसार में बुद्धि ही तत्त्व है। कोई भी बुद्धिवादी व्यक्ति, बुद्धि के ऊपर सब पुस्तकों को, ट्रेडिशंस को, नापने-तोलने के लिए तैयार रहता है, यही हमारे यहां प्राचीनों का क्रम था। ऋषि लोग ही भारतीय समाज के पथ प्रदर्शक रहे हैं। जब तक मानव का चरित्र सही नहीं होता तब तक उसे आर्दशवान् नही कहा जा सकता है, एवं सभ्य समाज की कल्पना नहीं का जा सकती है। ऋषि और वैज्ञानिक में अन्तर क्या है? ऋषि सत्य के द्रष्टा हैं। उन्हे अनुमान नही करना है ।  जबकि वैज्ञानिको का ज्ञान निरीक्षण, परीक्षण और निष्कर्ष पर आधारित होता है। यही कारण है कि वैज्ञानिकों का ज्ञान अधूरा रहता है और समय समय पर ये अपनी ही उपस्थापनाओं को बदलते रहते हैं। 
वेदों के ऋषि किसी एक जाति या वर्ण के नही है वरन् समाज के प्रत्येक जाति और वर्ण से हैं। वेद के बहुत से मन्त्रों की ऋषि स्त्रियाँ भी हैं। ऋषि शब्द का अर्थ है-  मन्त्रद्रष्टा, एक अन्तः सफूर्त कवि या मुनि। अर्थात् मन्त्रों का द्रष्टा उनके रहस्यों को समझकर प्रचार करने वाला ऋषि होता है। 
कथा है, जब यास्क मुनि के शरीर छोड़ने का समय आया, तब उनके चेलों ने उनसे पूछा- ‘महाराज, आप जाते हैं, अब वेदों का अर्थ कौन करेगा?’ ध्यान रखिए वेदों का. यास्क मुनि निरुक्त के कर्ता हैं. निरुक्त वह शास्त्र है, जो वेदों के शब्दों को सामने रखता है और उनका अर्थ निकालता है। चेलों ने पूछा- ‘अब आप जा रहे हैं, तब वेदों का अर्थ कौन करेगा? अब हम लोग किस ऋषि के पास जायें?’ 
यास्क ने जवाब दिया- ‘तर्को वै ऋषिरुक्तः।’ इसका क्या अर्थ है? वेदों का अर्थ करने के लिए अब तर्क, लाजिक, सिलोजिज्म- यही ऋषि है। यह वाक्य था कि तर्क ही ऋषि है। तर्क का मतलब बुद्धि, क्योंकि तर्क का सहारा तो बुद्धि के बिना बढ़ता नहीं।  बुद्धि को ही ऋषि बनाना- यह वाक्य हमारे देश की पुरानी परिपाटी को बताता है।  " मैंने तुझे नौका दी थी नदी पार करने के लिए न कि पार होने के बाद सिर पर ढोने के लिए।" बुद्ध की इस उक्ति से उनके तर्क-संगत दर्शन की साफ झलक मिल जाती है। उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण शिक्षा यह थी कि 'सत्य' को पहले तर्क की कसौटी पर परखो, फिर उसमें विश्वास करो। इसे उन्होंने अपनी शिक्षाओं पर भी लागू किया। उन्होंने साफ कहा कि मेरी बात इसलिए नहीं मानो कि मैं स्वयं (बुद्ध) कह रहा हूं, बल्कि 'सत्य हो` तभी मानो। 
श्रीविष्णुपुराण (१-१९-४१) में कहा गया है- ‘सा विद्या या विमुक्तये’ अर्थात ज्ञान वह है जो मुक्त कर दे! 
तत्कर्म यन्न बन्धाय, सा विद्या या विमुक्तये।
 आयासायापरं कर्म, विद्यऽन्या शिल्पनैपुणम्॥ 
कर्म वही है, जो बन्धन में  न डाले (कर्मफल में आसक्त न करे), ज्ञान वह है, जो हमें बन्धनों से मुक्त कर दे (जन्म-मृत्यु के बन्धन या देहाध्यास से भ्रममुक्त कर दे)।  अन्य कर्म 'आयास' (अर्थात व्यर्थ का प्रयास)
श्रम मात्र है, और अन्य विद्याऐं शिल्पकौशल (रोजगारोन्मुख-निपुणता, skill-craftsmanship) मात्र ही हैं।
[सच्चा कर्म वह है जो हमें बन्धन में न डाले, सच्ची विद्या वही है जो  विमुक्त कर दे - कर दे । इस से परे जो कर्म है वह व्यर्थ का श्रम कहलाता है; और इसके परे जो विद्या है वह तो बस 'अथकड़ि विद्या', (रोटी-कपड़ा-मकान कमाने की शिक्षा-craftsmanship)  कारीगरी (आई.टी.आई.) की शिक्षा है।]
 but What is that KNOWLEDGE which Liberates one from bondage ? and where it is taught ? Is it the ‘Brahm-Vidhya’ as per my own belief or something else ?
 स्वामी विवेकानन्द ने अपने गुरुदेव श्रीरामकृष्ण परमहंस से वेदान्त परम्परा में उसे प्राप्त करने की विधि ‘निर्विकल्प समाधि’ की शिक्षा ग्रहण की थी। शिष्य को गुरु का घनिष्ठ सान्निध्य लगभग पाँच वर्ष मिल पाया था। गुरु ने अपने इस प्रिय शिष्य से कहा था, ‘‘तुम्हें तो विशाल वट वृक्ष की तरह होना पड़ेगा जिसकी छाया में समस्त पृथ्वी के मनुष्य शांति लाभ करेंगे।’’  इसीलिये श्रीरामकृष्ण ने योग्य शिष्य को पाकर अपना सारा ज्ञान और तेज उनके हृदय में संचारित कर दिया था। किन्तु वह विद्या या वह 'ज्ञान' है क्या -जो स्वयं को मात्र साढ़े-तीन हाँथ का शरीर मानने के देहाध्यास या भ्रम से विमुक्त कर देता है ?  
वह 'ब्रह्म-ज्ञान' [विवेकज-ज्ञान या विवेक-प्रयोग से उत्पन्न ज्ञान] है क्या - जो मानवमात्र को मन की गुलामी से, जन्म-मृत्यु के बन्धनों से आजाद करने में सक्षम है? इसे समझने के लिये पहले हमें यह समझना होगा कि 'बन्धन' क्या है ? ऐंड व्हाट इज दैट पॉवर ऑफ़ बॉन्डेज व्हिच बाइंडस ईवन ऑल माइटी ब्रह्म ? किन्तु वह बन्धन-कारी शक्ति (अविद्या-माया) क्या है जो सर्व-शक्तिमान ब्रह्म को भी बन्धन में डाल देती है ?  तथा वह 'ब्रह्म-विद्या' (विवेक-प्रयोग के लिये मनःसंयोग का प्रशिक्षण) सिखाई कहाँ जाती है, -- जो किसी 'सिंह-शावक' को भेंड़त्व के मिथ्या 'मैं-पन' से डीहिप्नोटाइज्डकरके सदा के लिये "भ्रममुक्त" कर देता है ? बट व्हाट इज दैट दैट नॉलेज व्हिच लिब्रेट्स वन फ्रॉम बॉन्डेज ! 
चरित्रवान मनुष्य बनने के लिये,जीवन की सफलता के लिए, प्रत्येक कर्म अत्यन्त सावधान होकर  करना पड़ता है, यथा – मैं क्या देखूॅं, क्या न देखूॅं, क्या सुनॅूं, क्या न सुनूॅं, क्या जानूँ, क्या न जानूॅं, क्या करुॅं अथवा क्या न करूॅं। 'लस्ट और लूकर ' या वासना और धन में आसक्त (कामातुर) मनुष्य का मन उसके वश में नहीं रहता। उसकी विवेक-प्रयोग शक्ति नष्ट-भ्रष्ट हो जाती है। पशु-मानव भी श्रेय-प्रेय, सत-असत, उचित -अनुचित का भेदभाव नहीं कर सकते। राष्ट्र की सम्पत्ति और अपनी ईमानदारी से कमाई हुई सम्पत्ति में भेदभाव नहीं करते, इसी कारण उन्हें पशु (समान पश्यति इति पशु) कहते हैं। और दोनों को समान समझ कर, सरकारी पद का दुरूपयोग करते हुए भ्रष्टाचारी बन जाते हैं। और अन्त में जेल जाना पड़ता ही है। 
राजा पश्यति चाराभ्यां बुद्धया पश्यन्ति पण्डिता:।
पशु: पश्यति गन्धेन हृदा पश्यन्ति साधव:॥
राजा गुप्तचरों की नज़रों से देखता है। पंडित लोग बुद्धि से देखते हैं। पशु गंध से देख लेता है और साधु-महात्मा हृदय की दृष्टि से देखते हैं।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। 
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥ गीता ६/३० 
‘‘जो योगी पुरुष (यः) मुझ परमेश्वर को (मां) सभी ओर (सर्वत्र) देखते हैं (पश्यति), समस्त भूतों को (सर्वं) मुझ में ही (च मयि) देखते हैं (पश्यति), मैं- परमेश्वर (अहं) उनके लिए (तस्य) अदृश्य नहीं होता (न प्रणश्यति) और वह भी (स च) मेरे लिये (मे) अदृश्य नहीं होते (न प्रणश्यति)।’’ 
भावार्थ फिर से एक बार- ‘‘जो योगी संपूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ श्री कृष्ण (जो राम जो कृष्ण वही श्रीरामकृष्ण परमहंस देव, वेदान्त की दृष्टि से नहीं -साक्षात् !) - परमात्मा को ही संव्याप्त देखता है और संपूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अन्तर्गत ही देखता है (अध्याय ९ श्लोक ६) उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता और न ही वह मेरे लिए अदृश्य होता है।’’ 
ऐसी ब्राह्मी स्थिति में पहुँचने के बाद योगी का जीवन के प्रति दृष्टिकोण आमूलचूल बदल जाता है। अब उसे दिव्य ब्रह्म के सिवाय और कुछ दिखाई नहीं देता। पशु- पक्षी जगत- प्रकृति के अंग- अवयव सभी सिवाय मेरे अर्थात परमात्मा के ही अंश दिखाई देते हैं (डीप इकॉलाजी की मूल अवधारणा)। यह अनुभूति क्षणमात्र के लिए नहीं होती- यह तो एकात्मता वाली स्थिति है। फिर ऐसा साधक भगवान से कभी विलग नहीं होता (तस्याहं न प्रणश्यामि) और न परमात्मा ही उससे कभी पृथक होता है (स च मे न प्रणश्यति)। यह एक प्रकार से ज्ञानी का- कर्मयोगी का- भक्तियोगी साधक का नया जन्म है- अपने आपके बारे में नूतन जागृति है और विकास का एक नया आयाम खुल चुका है जा उसे पूर्णत्व की ओर ले जा रहा है।   
वेदाहमेतमजरं पुराणं सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात् । 
जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनो प्रवदन्ति नित्यम् ।।-(श्वेता० ३/२१) 
मैं उस ब्रह्म को जानता हूं जो पुराना है और अजर है। सबका आत्मा और विभु होने से सर्वगत है। ब्रह्मवादी जिसके जन्म का अभाव बतलाते हैं क्योंकि वह नित्य है।
(मनुष्य )शब्द का अर्थ है "मनु की संतान "मनु की पत्नी थी" श्रध्दा "जो श्रध्दा और मनन दोनो को लेकर सृष्टि में अवतीर्ण हुआ है वह मनुष्य है । दूसरी ओर चौपाया पशु है उसका नाम ही पशु इसलिये है कि ‘पश्यते प्रतिक्रियते इति पशुः’ देखने पर प्रतिक्रिया करने वाला चौपाया पशु है इसलिये मनुष्य की मनन करने की क्षमता का आदर कीजिये उसे मनुवाद (वर्णाश्रम व्यवस्था) की काल्पनिक शत्रुता का आधार मत बनाइये। 
हम लोग जब कहते हैं - यह चद्दर हमारी... यह लोटा -थाली हमारी... यह पैन्ट हमारी.... यह टाई हमारी....। उस समय विवेक पूर्वक हमें यह देखना चाहिये यदि मेरा यथार्थ स्वरूप चेतन आत्मा है, जड़ शरीर नहीं है, तो आत्मा के लिए अपना कहने योग्य परमात्मा (श्रीरामकृष्ण देव) के अतिरिक्त और कौन हो सकता है ? जब शरीर से जुडी वस्तुओं को हम अपना कह सकते हैं तो उस परमात्मा (ठाकुर-माँ-स्वामीजी) को अपना बनाने में हमारा क्या जाता है? वास्तव में परमात्मा के सिवाय और कुछ हमारा है ही नहीं। लेकिन शाश्वत चैतन्य से उत्पन्न होने के कारण मन में ऐसा कुछ चमत्कार है कि वह जैसा सोचता है वैसा सत्य ही भासता है। सत्यस्वरूप आत्मा की शक्ति से ही मन फुरता है। हमलोग जैसा सोचते हैं वैसा सत्य भासने लगता है। भोग की नज़र से देखेंगे तो जगत भोगने के लिए है ऐसा लगेगा। लेकिन संसार के स्वामी को पहचानने के लिए विचित्र परिस्थितियों से पसार होकर अंतिम लक्ष्य तक पहुँचाने की पाठशाला की नजर से संसार को देखेंगे तो उसमें हमलोग उत्तीर्ण होते जायेंगे। हमलोग जब सोचें कि जगत में दुःख है, पीड़ा है, मुसीबत है तो जगत बिल्कुल ऐसा ही लगेगा। हमसे यदि कोई ऊँचा दिखता है तो हमें अपने को सिकोड़ कर नीचा नहीं बना लेना चाहिये। वैसे ही यदि कोई हमसे ज्ञान में, समझ में छोटा दिखता है तो अकड़ नहीं जाना चाहिये। वह छोटा दर्जे का विद्यार्थी है। ऐसा समझना चाहिये, पढ़ते-पढ़ते, ठोकर खाते-खाते वह भी एक दिन पास हो जायेगा। जो मनुष्य जैसे ऊँचे तक, ब्रह्म तक पहुँचा हुआ है वहाँ एक दिन मैं भी पहुँच जाऊँगा। बड़े को देखकर ईर्ष्या और छोटे को देखकर घृणा नहीं होना चाहिए। जो बड़े में है वही का छोटे में छुपा है और मुझमें भी वही का वही है।
अणोरणीयान् महतोमहीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् ।
                    तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमात्मनः ।।-(कठ० 2/20)
अर्थ:-ब्रह्म सूक्ष्म से भी अत्यन्त सूक्ष्म है,बड़े से भी बड़ा है। वह प्राणी के ह्रदयाकाश में स्थित है।उसकी महिमा को बुद्धि के निर्मल होने से निष्काम शोक रहित प्राणी देखता है। 
                                   अशरीरं शरीरेषु अनवस्थेष्ववस्थितम् ।
                                 महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ।।-(कठोप० १/२/२२)
वह परमात्मा लोगों के शरीर में रहते हुए भी स्वयं शरीर-रहित है। बदलने वाली वस्तुओं में एकरस (न बदलने वाला) है। उस महान् विभु आत्मा को जानकर धीर पुरुष शोकमुक्त (भ्रममुक्त) हो जाता है। 
श्रुति कहती है - सभी प्राणियों में मनुष्य ही सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि वह अपने बनाने वाले ब्रह्म को भी जान सकता है। 'ब्रह्मविद ब्रह्मैव भवति!' ब्रह्म जिसे जानकर या; जिसे प्राप्त कर के 'सिंह-शावक' भेंड़त्व के भ्रम से मुक्त हो जाता है ? यह अध्यास क्या है ? यह अध्यास अविद्या का कार्य है। अविद्या से स्वत: कोई नुकसान नही है। नुकसान तो वस्तुत: अध्यास से है। विद्या से अविद्या हट जाती है और फलस्वरूप अध्यास भी। अविद्या के नष्ट होने के बाद भी, नाम रूपात्मक जगत् रहता ही है क्योंकि यह सत् है। अंतर बस इतना है कि मुक्त जीव इसमें नानात्व नहीं देखता। वह इसमें अब्रह्मत्व या असर्वात्मत्व नहीं देखता। वह जगत् और अपने में कोई भेद नहीं देखता। वह जीव, जगत और ब्रह्म को एक ही वस्तु देखता है। 
कार्य दृष्टि से देखा गया जगत् अविद्या कल्पित और भ्रम है जैसे कि रज्जु में सर्प या शुक्तिका में रजत। रज्जु-सर्प, शुक्तिका-रजत, द्वि-चंद्र आदि दृष्टांतों का उद्देश्य कार्य कारणत्व बताना नहीं है बल्कि नामरूपात्मक जगत के अब्रह्मप्रत्ययत्व को हटाना है।  वही जगत् कारण दृष्टि से देखने पर ब्रह्म है। इस प्रकार दोष दृष्टि में है, जगत् में नहीं। जगत् काल्पनिक नहीं है। जगत् का अब्रह्मत्व और असर्वात्मत्व काल्पनिक और अविद्याकल्पित है। इस प्रकार, अविद्याकल्पित का वास्तविक अर्थ यह है कि वस्तु ब्रह्म से भिन्न जान पड़ती है। 
यह अब्रह्मप्रत्यय रज्जु में सर्प के समान है। ‘जिसमें जो नहीं है, उसमें वह है’ ऐसी बुद्धि अध्यास है।  रस्सी ही सर्प के समान, शुक्ति ही रजत के समान अवभासित होती है तथा एक चंद्रमा ही दूसरे के साथ मालूम पड़ता है । अध्यास को ही पंडित अविद्या मानते हैं, और विवेक करके वस्तुस्वरूप के निर्धारण को विद्या कहते हैं । आत्मा मे देह के धर्मों का अध्यास करके कहता है- ‘मैं मोटा हूँ’ ‘मैं पतला हूँ’ ‘मैं गोरा हूँ’ ‘मैं खड़ा हूँ’ ‘मैं जाता हूँ’ ‘मैं लांघता हूँ’। इसी प्रकार इंद्रियों के धर्मों का अध्यास करके कहता है कि ‘मैं गूंगा हूँ’ ‘मैं काना हूँ’ ‘मैं नपुंसक हूँ’ ‘मैं बहरा हूँ’ ‘मैं अंधा हूँ’। इसी प्रकार काम, संकल्प, संशय, निश्चय आदि अंत:करण के धर्मों का आत्मा में अध्यास करते हैं। इस अध्यास का समूल नाश करने के लिए अर्थात् आत्मैकत्व विद्या कि प्राप्ति के लिए सभी वेदान्त प्रारम्भ किए जाते हैं।
[जहाँ-जहाँ जीवन है वहाँ-वहाँ विवेकयुक्त जीवन (जाग्रत Soul) भी हो यह ज़रूरी नहीं। जन्म-वृद्धि-जरा-मृत्यु,  ह्रास -विकास अहंयुक्त जीवन (Life) के लक्षण हैं, शाश्वत आत्मजीवन के नहीं। आत्मा एक ब्रह्माण्डीय अस्तित्व (Cosmic Existence) है जबकि जीवन एक व्यक्तिगत अस्तित्व (Individual Existence) है। आत्मा वहीं है जहाँ कर्म भोग है और कर्म भोग वही हैं जहाँ विवेक (Wisdom) है। पशु आदि में विवेक नहीं है, अतः वहां जाग्रत आत्मा नहीं है। आत्मा नहीं है तो कर्म फल भोग भी नहीं है। पशु और वनस्पतियों में कोई व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं होता। अतः उसकी हत्या को जीव हत्या नहीं कहा जा सकता। जब पशु आदि में जीव (Soul) ही नहीं है, तो जीव-हत्या कैसी ? पशु आदि में सिर्फ और सिर्फ जीवन है, जीव नहीं। अतः पशु-पक्षी आदि के प्रयोजन हेतु उपयोग को हिंसा नहीं कहा जा सकता।]
यास्क मुनि पदार्थों के छ: विकारों (षड् भाव-विकारों) का उल्लेख करते हुए कहते हैं - ( रेतो रक्त प्रसूतम्) माता पिता के शुक्र शोणित रूप धातुओं से उत्पन्न (जड़म्) स्वभाव से ही जड़ तथा (अशनेन चितम्) अन्नादिकों के भक्षण से वृद्ध अर्थात् बढ़ने वाला- छः विकारों वाला (षड् विकारम्) उत्पत्ति आदि छः विकारों (त्वक् अस्थि स्नायु क्रव्य अन्त्र मज्जा) के सहित ‘जायतेऽस्ति वर्द्धते विपरिणमते पचीयते विनश्यतिच' ....जायते अस्ति वर्द्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, विनश्यति। जो उत्पन्न होता है, स्थित है, बढ़ता है, बदलता है, क्षीण होता है और नाश हो जाता है, वह तू नहीं है।’ ये छः बातें अनुभव में नहीं होती हैं। अनुभव अपने आत्मा का ही स्वरूप है और एकरस है। चाहे कितना भी परिवर्तन हो, शरीर बदल जायगा, मन बदल जायगा, पाप-पुण्य बदल जायगा, राग-द्वेष बदल जायगा, हृास-विकास होता रहेगा। और ये जो आत्मदेव हैं- सर्वदा एकरस, सन्मात्र, चिन्मात्र, आनन्दमात्र रहते हैं।
जन्म है, बीमारी है, बुढ़ापा है, मृत्यु है—सभी देह के हैं। देह के साथ तादात्म है तो देह की सारी पीड़ाओं के साथ भी तादात्‍म्‍य है। जब देह जराजीर्ण होती है तो हम सोचते हैं, मैं जराजीर्ण हो गया। जब देह बीमार होती है तो हम सोचते हैं, मैं बीमार हो गया। जब देह मरण के निकट पहुंचती है तो हम घबड़ाते हैं कि मैं मरा। मान्यता—सिर्फ मान्यता! ऋषि अष्टावक्र जी कहते हैं - 
देहाभिमानपाशेन चिरं बद्धोऽसि पुत्रक । 
          बोधोऽहं ज्ञानखंगेन तन्निष्कृत्य सुखी भव । 1-14.
अष्टावक्र ने कहा, ‘हे पुत्र! तू बहुत काल से देहाभिमान के पाश में बंधा हुआ है। उस पाश को मैं बोध हूं, इस ज्ञान की तलवार से काट कर तू सुखी हो!’
 मैं देह हूं ! मैं देह हूं !! मैं देह हूं !!! ...... ऐसा जन्मों—जन्मों तक पुनः पुनः दोहराया है; दोहराने के कारण हम देह हो गये हैं। देह हम हैं नहीं; यह हमारा अभ्यास है, हमारी आदत परिपक्व होकर प्रवृत्ति बन गयी है। हमने इतनी प्रगाढ़ता से माना है कि हम हो गये हैं। मैं शरीर हूं, यह जन्मों—जन्मों से मानी हुई बात है; मान ली तो हम शरीर हो गये। मान ली तो हम क्षुद्र हो गये। मान ली तो हम सीमित हो गये। यह हमारा अभ्यास है, और यही अविद्या माया या 'आत्मसम्मोहन' है, सिंहशावक का हिप्नोटाइज्ड हो जाना है, 'आटोहिप्नोसिस' है। 
तुम शरीर हो नहीं गये हो, तुम शरीर हो नहीं सकते हो। इसका कोई उपाय ही नहीं है। जो तुम नहीं हो, वह कैसे हो सकते हो? जो तुम हो, तुम अभी भी वही हो। सिर्फ झूठी मान्यता को काट डालना है। 'ज्ञानखंगेन तत् निष्कृत्य त्वं सुखी भव!' उस पाश को, मैं बोध हूं, इस ज्ञान की तलवार से काटकर तू अभी सुखी हो जा।’   
आमतौर पर जब कोई व्यक्ति किसी एक योगमार्ग से लक्ष्य तक पहुंच जाता है- 'ब्रह्म' को जान लेता है या आत्मसाक्षात्कार कर लेता है; तब फिर वह दूसरे योग-मार्गों की साधना करना आवश्यक नहीं समझता! जैसे कोई व्यक्ति सीमेन्ट की सीढ़ियों से चढ़ कर पहाड़ की चोटी पर पहुंच जाये; तो फिर दूसरी पगडंडियों से भी चोटी पर चढ़ा जा सकता है, या नहीं ? इस बात की फ़िक्र कौन फिक्र करता है— पहुंच ही गये। जो पक्की सीढ़ी चोटी तक ले आई, ले आई; बाकी लाती हों न लाती हों, प्रयोजन किसे है! लेकिन भगवान श्री रामकृष्ण देव ऐसे साधक थे जो विभिन्न योग-मार्गों के सहारे बार—बार पहाड़ की चोटी पर पहुंचे, फिर—फिर नीचे उतर आये। फिर दूसरे मार्ग से चढ़े। फिर तीसरे मार्ग से चढ़े। 
वे पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने सभी धर्मों की साधना की और सभी धर्मों से उसी शिखर को पा लिया। सर्वधर्म समन्वय की बात बहुत से लोग कहते थे, किन्तु श्री रामकृष्ण ने ही सर्व-प्रथम धर्म-समन्वय का विज्ञान निर्मित किया। बहुत से लोगों ने कहा था, सभी धर्म सच हैं; लेकिन वह केवल मुख से कहने की बात थी—उनका अपना अनुभव नहीं था। रामकृष्ण ने उस मार्ग को तथ्य बनाया; उस मार्ग की साधना के अनुभव पर बल दिया; अपने जीवन से प्रमाणित किया। जब वे इस्लाम की साधना करते थे तो वे ठीक मुसलमान फकीर हो गये। वे काली -काली कहना भूल गये; नमाज पढ़ने लगे, अल्लाह के ९९ नामों का जप  करन लगे; कुरान की आयतें सुनने लगे। एक मस्जिद के द्वार पर ही पड़े रहते थे। मंदिर के पास से निकल जाते, उधर आंख भी न उठाते। 
छह महीने तक उन्होंने सखी—संप्रदाय के राधा भाव की साधना की थी। तीन महीने के बाद उनके स्तन उभर आये; उनकी आवाज बदल गई; वे स्त्रियों जैसे चलने लगे, स्त्रियों जैसी उनकी मधुर वाणी हो गई। स्तन उभर आये, स्त्रियों जैसे स्तन हो गये ! शरीर का पुरुष—ढांचा बदलने लगा। एक मान्यता कि मैं स्त्री हूं—यह मान्यता इतनी प्रगाढ़ता से की गई, यह भाव इतने गहरे तक गुंजाया गया, यह रोएं—रोएं में, कण—कण में शरीर के गुंजने लगा कि मैं स्त्री हूं! इसका विपरीत भाव न रहा। पुरुष की बात ही भूल गई। तो घटना घट गई। छह महीने पूरे होते—होते उनको मासिक—धर्म शुरू हो गया। तब चमत्कार की बात थी!  ऐसा तो कभी किसी पुरुष को न हुआ था।भगवान श्री रामकृष्ण को अवतारवरिष्ठ इसीलिए कहा जाता है कि उन्होंने सभी धर्मों की साधनाएं की हैं। मनुष्य—जाति के इतिहास में वे अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने सभी धर्मों के मार्ग से सत्य तक जाने की चेष्टा की। 
अष्टावक्र कह रहे हैं : हम देह नहीं हैं; हमने जब मन से यह मान लिया कि हमतो मरणधर्मा शरीर मात्र हैं, तो हम देह हो गये हैं। हमने जो मान लिया, हम वही हो गये हैं। अनु पश्चाद् भवनं-अनुभवः। ‘अनु’ माने पीछे ‘भव’ माने होना-‘भवनं भवः।’ जो सबसे पीछे रहकर सबको प्रकाशित करे उसका नाम अनुभव। ज्ञान की पराकाष्ठा। संसार हमारी मान्यता है। और मान्यता छोड़ दी तो हम तत्क्षण रूपांतरित हो सकते हैं। छोड़ने के लिए किसी यथार्थ को बदलना नहीं है; सिर्फ एक धारणा को छोड़ देना है। हम वस्तुत: अगर शरीर होते बदलाहट बड़ी मुश्किल थी। हम वस्तुत: शरीर नहीं हैं। हम वस्तुत: तो शरीर के भीतर छिपा जो चैतन्य है, वही हैं—वह साक्षी, द्रष्टा है। व्यक्ति की मनःस्थिति का प्रभाव उसके जीवन पर प्रत्यक्ष देखने में आता है।
 यत्र यत्र मनो देही धारयेत्सकलं धिया ।
        स्नेहात् द्वेषात् भयाद्वापि याति तत्तत्सरूपताम् ॥ श्रीमद्भागवत्
अर्थ- देहधारी जीव स्नेह से , अथवा भय से जिस किसी में भी सम्पूर्ण रूप से अपने चित्त को लगा देता है , अन्त मे वह तद्रूप हो जाता है । 
'लस्ट और लूकर ' अर्थात वासना और धन ' में  अत्यधिक आसक्ति  हमारे मन को किसी मदिरोन्मत्त  बन्दर के समान चंचल बना देता है। और  धर्म महावत के सामान हमारे हाथी के समान उन्मत्त मन की पाशविक वृत्तियों पर अंकुश रखता है, अतः धर्म हमारे चंचल मन का नियन्ता है। हमारा शत्रु बाहर नहीं है, मन में बैठे काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और ईर्ष्या रूपी षडरिपु ही हमारे वास्तविक शत्रु हैं। ये षडरिपु मानव को पतन की ओर अग्रसर करते हैं। इन पतनोन्मुख प्रवृत्तियों को रोकने के लिए परमावश्यक होता है विवेकशील होना और विवेक को जागृत करने के लिए अच्छे पुरुषों की संगति तथा अच्छे ग्रन्थों का स्वाध्याय परमावश्यक है।
देहाभिमानगलिते ज्ञानेन परमात्मनः।
 यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः॥
अर्थात देहाभिमान ( जड़ शरीर और मन के साथ मैं-पन का तादात्म्य)  सर्वथा मिट जाने पर जब परमात्मतत्त्व का बोध हो जाता है, तब जहाँ-जहाँ मन जाता है, वहाँ-वहाँ परमात्मतत्त्व का अनुभव होता है अर्थात उसकी अखंड समाधि (सहज समाधि रहती है)। जीव को ब्रह्म होने मे उतनी ही देर लगती है जितनी देर ब्राह्मण को मनुष्य होने मे लगती है । ब्राह्मण मनुष्य ही है केवल ब्राह्मणत्व का अभिमान हटाना है इसी प्रकार देहाभिमान हटा देने पर जीव वस्तुतः ब्रह्म ही है
" किन्तु बिना चरित्र के अगर कोई मनुष्य होगा तो वह पशु के सामान होगा।" इसीलिये सबसे पहले चरित्रवान मनुष्यों का निर्माण करना ये महामण्डल का उपाय है। और हमारे आदर्श हैं स्वामी विवेकानन्द। वे भारत के राष्ट्रीय युवा आदर्श हैं। १९८४ में ही भारत सरकार ने स्वामी विवेकानन्द को युवा आदर्श घोषित किया है। चरित्र-गठन के लिये एक साँचा की आवश्यकता होती है। युवाओं के रोल-मॉडल हैं, हमारे आदर्श हैं विवेकानन्द, उनके साँचे में अपने जीवन को हमलोगों को गढ़ना है। 
महमामण्डल का प्रतीक-चिन्ह: (एम्ब्लेम) में जो वृत्त (गोलाई) है, वह पृथ्वी का प्रतीक है, पृथ्वी के भीतर कन्याकुमारी से प्रारम्भ होता हुआ भारतवर्ष का मानचित्र है। भारतवर्ष के भीतर युवा महामण्डल के आदर्श परिब्राजक स्वामी विवेकानन्द खड़े हैं ! उस गोलाई के नीचे हमारा आदर्श वाक्य (मोटो) लिखा है ' Be and Make ';यह महावक्य भी स्वामी जी का दिया हुआ निर्देश है। इसका साधारण अर्थ है - स्वयं मनुष्य बनो और दूसरों को मनुष्य बनने में सहायता करो! किन्तु स्वामी विवेकानन्द द्वारा कथित यह महावाक्य भी वेदों में कथित चार महावाक्यों के समान ही अत्यन्त सारगर्भित है! जैसे वेदान्त के चार महावाक्य -"अहंब्रह्मास्मि", "तत्त्वमसि" इत्यादि के बड़े गहरे अर्थ होते हैं, ठीक वैसे ही स्वामी विवेकानन्द द्वारा कथित इस महावाक्य "बनो और बनाओ" का भी बहुत गहरा अर्थ है। 
"BE AND MAKE " का गहरा महत्व यह है कि हमलोग केवल साढ़े-तीन हाथ के शरीर मात्र ही नहीं हैं।जैसे हमलोग केवल सॉलिड को देख पाते हैं,स्थूल देख पाते हैं; लेकिन सूक्ष्म को नहीं देख पाते हैं। हमलोगों ने फिजिक्स में पढ़ा है कि पदार्थ की तीन अवस्थायें होती हैं -ठोस,तरल और गैस। बर्फ को हमलोग देख सकते हैं, मुट्ठी में पकड़ सकते हैं। पानी को भी देख सकते हैं, किन्तु मुट्ठी में नहीं पकड़ सकते। किन्तु गैस या वायु  को न तो हमलोग देख सकते हैं और न मुट्ठी में पकड़ ही सकते हैं।  फिर भी कोई यह नहीं कह सकता कि हवा नहीं होती है ? 
विवेकानन्द के गुरु भगवान श्रीरामकृष्णदेव कहते थे, " जिस प्रकार पानी जमकर बर्फ बन जाता है, उसी प्रकार निराकार, अखण्ड, सच्चिदानन्द 'ब्रह्म' ही साकार रूप धारण कर लेता है। जैसे बर्फ पानी से ही पैदा होती है, पानी में ही रहती है, और पानी में ही मिल जाती है; वैसे ही ईश्वर का साकार रूप भी निराकार ब्रह्म से ही उत्पन्न होता है, उसी में अवस्थित रहता है तथा उसी में विलीन हो जाता है।" (अमृतवाणी/साकार और निराकार/२३०) 
उसी प्रकार हमारे तीन कम्पोनेंट्स हैं - शरीर, मन और हृदय। शरीर स्थूल होता है, इसलिये हमलोग उसको देख पाते हैं, मन अत्यन्त सूक्ष्म वस्तु है इसलिये उसको देख नहीं पाते, किन्तु अनुभव करते हैं कि मेरा मन है। और हृदय, हार्ट (Heart) हम लोग बोलते हैं; यह उससे भी सूक्ष्म वस्तु है- वास्तव में वो आत्मा है। लेकिन अभी हमलोग उसको समझ नहीं पायेंगे; इसीलिये स्वामी जी उसको हार्ट बोले। क्योंकि आत्मस्वरूप को अनुभव करने या फील करने की शक्ति हृदय में होती है। अतः हृदय को विकसित करने की शिक्षा प्राप्त करने से आत्मविश्वास आता है। और आत्मविश्वास से अंतर्निहित ब्रह्मभाव जागृत हो जाता है! शिक्षा से श्रद्धा और विश्वबंधुत्व बढ़ता है। 
अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल युवाओं के अन्दर आत्मविश्वास पैदा करने का कार्य करता है। उसको अपने अन्दर की शक्ति को पहचानने की एक दिशा देता है, कैसे वह अपने अन्दर की शक्ति को पहचान सकता है। उसके अन्दर जो अनन्त शक्ति छिपी हुई है,स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाओं के आधार पर उन्हें यह बताया जाता है कि तुम्हारे अन्दर एक दिव्यत्व भरा हुआ है, एक आध्यात्मिक शक्ति भरी हुई है। जिसके माध्यम से तुम अपना जीवन बना सकते हो, अपने जीवन की सारी  समस्याओं का समाधान कर सकते हो। अपने रोजगार के साधन के साथ-साथ परिवार, समाज और देश के कल्याण के लिये भी अपने जीवन को आगे बढ़ा सकते हो (देश की सेवा में अपने जीवन को समर्पित कर सकते हो)!"और यह तभी सम्भव है, जब शिक्षा हमें मन को (हृदय में विद्यमान सूक्ष्म वस्तु को) देखने की प्रक्रिया की सम्यक जानकारी प्रदान करे।
सभी लोग नवयुवकों को उपदेश देते हैं कि मन लगा कर पढ़ो ! किन्तु कोई यह नहीं सिखलाता कि मन क्या है, अर्थात उसकी बनावट कैसी है ? तथा किसी इच्छित विषय में मन को लगाया कैसे जाता है ?  अतः शिक्षा (युवा-प्रशिक्षण) का प्रथम कार्य यह है कि वह प्रत्येक नवयुवक को उसके मन की बनावट और मन को एकाग्र करने की पद्धति से उसका परिचय करा सके।  स्वामीजी मन की एकाग्रता की प्रक्रिया को (मनःसंयोग को) शिक्षा के केन्द्र में लाना चाहते थे। उनका कहना था, ‘‘मैं तो मन की एकाग्रता को ही शिक्षा का यथार्थ सार समझता हूँ, ज्ञातव्य विषयों के संग्रह को नहीं। यदि एक बार मुझे फिर शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिले, तो मैं विषयों का अध्ययन नहीं करूँगा। मैं तो एकाग्रता को तथा मन को विषय से अलग कर लेने की शक्ति को बढ़ाऊँगा और तब साधन अथवा मंत्र की पूर्णता प्राप्त हो जाने पर इच्छानुसार विषयों का संग्रह करूँगा।’’
शिक्षा की वास्तविक उपलब्धि के लिए मन की एकाग्रता आवश्यक है। विद्यार्थी जितने अधिक एकाग्रचित्त होते जाते हैं, उनकी विद्या ग्रहण करने की शक्ति उतनी ही अधिक बढ़ती जाती है।"एकाग्रता की विशिष्टता" के अनुसार ही कोई व्यक्ति किसी "विषय-विशेष" का अथवा अनेक विषयों का ज्ञाता हो जाता है। भारत वासियों के द्वारा "गुरु-शिष्य वेदान्त शिक्षक प्रशिक्षण परम्परा" में अन्तर्जगत पर,आत्मा के अदृष्ट प्रदेश पर (हृदय में विद्यमान भगवान श्रीरामकृष्ण देव पर) अपने मन को एकाग्र किए जाने से भारतवर्ष में योग-शास्त्र का विशेष उत्थान हुआ। जबकि यूरोप के लोगों ने बाह्य जगत पर मन को एकाग्र कर भौतिक उपलब्धियों में शिखरों का स्पर्श कर लिया है। विश्व का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जिस के बारे में मन को एकाग्र किया जाए और उपलब्धि न प्राप्त हो। 
अतः मनुष्य-निर्माण की प्रक्रिया को सरल करते हुए स्वामी जी ने कहा - 3'H';  हैण्ड -हेड एण्ड हार्ट् का डेवलपमेन्ट करो - मनुष्य विकसित हो जायेगा, मनुष्य निकलेगा, मनुष्य प्रगट हो जायेगा। वह 'मनुष्य' जो 'ब्रह्म' को-अर्थात अपने बनाने वाले को भी जान सकता है ! 
आधुनिक युग में 'ब्रह्म' के अवतार, जगतगुरु भगवान श्रीरामकृष्णदेव कहते थे - " वह मनुष्य धन्य है जिसका शरीर, मन और हृदय (3'H') तीनों ही समान रूप से विकसित हुए हैं। सभी परिस्थितियों में वह सरलता के साथ उत्तीर्ण हो जाता है। उसके हृदय में भगवान के प्रति सरल विश्वास और दृढ़ श्रद्धा-भक्ति होती है; साथ ही उसके आचार-व्यवहार में भी कहीं कोई कमी नहीं होती। माता-पिता और गुरुजनों के सम्मुख वह वह विनयी और आज्ञाकारी होता है। पड़ोसियों के प्रति वह दया और सहानुभूति रखता है। आत्मीय-स्वजन और मित्रों को वह अतिशय प्रिय प्रतीत होता है, क्योंकि उसके हाथ (Hand) सदैव मदद करने को तैयार रहते हैं। सांसारिक व्यवहार के समय वह पूरा-पूरा व्यवसायी होता है, विद्वान् पण्डितों की सभा में वह सर्वश्रेष्ठ विद्वान् सिद्ध होता है। वाद-विवाद में अकाट्य युक्तियों द्वारा वह अपनी तीक्ष्ण बुद्धि (Head) का परिचय देता है।  पत्नी के सामने वह मानो साक्षात् मदन-देवता होता है। इस तरह का मनुष्य वास्तव में सर्वगुण-सम्पन्न (ऑल अराउन्डर) होता है ! " अमृतवाणी /८०]
और महामण्डल इसी प्रकार के सर्वगुण-सम्पन्न (ऑल अराउन्डर) मनुष्यों का निर्माण करने हेतु चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने वाला संगठन है। " इसलिये महामण्डल का उद्देश्य है - भारत का कल्याण (ऑब्जेक्ट ऑफ़ महामण्डल इज -वेलफ़ेयर ऑफ़ इंडिया), उपाय है - चरित्रनिर्माण (महामण्डल्स स्किम फॉर द वेलफ़ेयर ऑफ़ इंडिया इज -मैन्यूफैक्तचरिंग मैन ऑफ़  आदर्श हैं -स्वामी विवेकानन्द, आदर्श वाक्य है -"BE AND MAKE" और हमारा अभियान मन्त्र है - " चरैवेति चरैवेति !" अर्थात 'आगे बढ़ो आगे बढ़ो !' ये ऐक्चुअली ऐतरेय ब्राह्मण का एक मंत्र है। जिसमें कहा गया है, कि जो युग परिवर्तन
होता है वह व्यक्ति के विचारों में (विचार जगत में) होता है।   
कलिः शयानो भवति, संजिहानस्तु द्वापरः ।
 उत्तिष्ठँस्त्रेताभवति, कृतं संपद्यते चरन् ।
चरैवेति चरैवेति॥
जो मनुष्य सोया रहता है, (या आलसी मनुष्य है) और पुरुषार्थ (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) नहीं करता- उस मनुष्य का भाग्य भी सोया रहता है, जो पुरुषार्थ करने के लिये उठकर खड़ा हो जाता है, उसका भाग्य भी खड़ा हो जाता है, जो अपने लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ता जाता है, उसका भाग्य भी आगे बढ़ता जाता है। इसलिये हे मनुष्यों - 'चरैवेति चरैवेति ', आगे बढ़ो, आगे बढ़ो ! 
जो मनुष्य सोया हुआ है (पंचभूतों के फंदे में फंसा हुआ है), वह अभी कलिकाल में वास कर रहा है, (स्वामी जी के आह्वान को सुनने से-सिंहशावक) जिसकी मोहनिद्रा भंग हो गयी है, वह द्वापर युग में वास कर रहा है। जो मनुष्य पुरुषार्थ करने के लिये कमर कसकर उठ खड़ा होता है, वह त्रेता युग में वास कर रहा है। कृतं संपद्यते चरन्- जो व्यक्ति अपने आस-पास रहने वाले कुछ भाइयों को एकत्र करके महामण्डल  निर्देशित ५ अभ्यासों का स्वयं अनुसरण करते हुए दूसरों को भी उसकी शिक्षा देने के कार्य में लग जाता है, उसके जीवन में सत्ययुग का प्रारम्भ हो जाता है। मनु महाराज जी कहते हैं कि :
कृतं त्रेतायुगं चैव द्वापरं कलिरेव च।
    राज्ञो वृत्तानि सर्वाणि राजाहि युगमुच्यते॥301॥
कलि: प्रसुप्तो भवति स जाग्रद्द्वापरं युगम्।
    कर्मस्वभ्युद्यतस्त्रेता विचरंस्तु कृतं युगम्॥302॥
'सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग ये चारों राजा ही के आचरण हैं, क्योंकि राजा ही को युग कहते हैं। राजा जिस समय अकर्मण्य होकर विषय सुख में लीन तथा अपने कर्तव्य ज्ञान से रहित होता है उस समय कलियुग समझना चाहिए; जिस समय अपने कर्तव्य को सिर्फ समझने लगता है उस समय द्वापर; जब उस समझ के अनुसार काम करने का विचार करता या उसके लिए तत्पर होता है तब त्रेता और जब पूर्ण रीति से अपना कर्तव्य पालन करता रहता है तब सत्ययुग समझना चाहिए' (मनु. 301, 302)। 
 इसका आशय यही है कि मनुष्य अपने से ही कलियुग और सत्ययुग बना सकता है। जब सभी लोग आलसी और 'दैव-दैव आलसी पुकारा' वाले हो जाएँ तभी घोर कलियुग एवं जब कर्मपरायण, कर्तव्य पालन में तत्पर, पूर्ण कर्मयोगी हो जाएँ, तो सत्ययुग ही समझा जाता है। बस यही युगव्यवस्था कर्म करने के लिए माननीय है। इसके अतिरिक्‍त और कोई नहीं।
इसलिये गोलाई के ऊपर  लिखा हुआ है- 'चरैवेति चरैवेति'  हमारे चरित्र-निर्माण और मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा के प्रचार-प्रसार रूपी कर्म-योग आन्दोलन का अभियान-मंत्र का जयघोष है -  'चरैवेति चरैवेति हुँकारों स्माकम!' स्वामी जी सभी युवाओं से आह्वान कर रहे हैं - 'चरैवेति चरैवेति' -सत्ययुग को धरती पर उतारने के लिये आगे बढ़ो आगे बढ़ो ! साथ ही साथ ' Be and Make ' पूर्णतः निःस्वार्थी मनुष्य, भ्रममुक्त मनुष्य, थंडरबोल्ट जैसा अप्रतिरोध्य (irresistible-जो रुक न सके, अत्यन्त सम्मोहक) बनने और बनाने के लिये परमपुरुषार्थ करने का  निर्देश भी दे रहे हैं। 
इसलिये गोलाई के किनारे बने छोटे-छोटे वज्र के निशान वैसे अनेकों भावी लोकशिक्षकों (वुड बी लीडर्स) के प्रतीक हैं, जो " पूर्णतः निःस्वार्थी मनुष्य (भ्रममुक्त मनुष्य) थंडरबोल्ट के जैसा मनुष्य बन चुके हैं! 
इस ' श्रीरामकृष्ण -विवेकानन्द वेदान्त लीडरशिप ट्रेनिंग परम्परा' की विशेषता ही यह है कि यह एक पूर्णतया निःस्वार्थपर " थंडरबोल्ट" की तरह इरिज़िस्टबल-अप्रतिरोध्य महामण्डल नेता (पैगम्बर) बनने और बनाने"  की 'सेल्फ-मैन-मेकिंग-स्कीम' - या योजना है। इस 'सेल्फ मैन मेकिंग ट्रेनिंग' की पद्धति का तात्पर्य यह है कि वास्तव में मैं कौन हूँ, मेरा सच्चा स्वरुप क्या है; तथा उस स्वरुप में अवस्थित होने के लिये क्या और कैसे करना होगा ? इन प्रश्नों का उत्तर हमें स्वयं ढूँढ़ना होगा। कोई दूसरा व्यक्ति हमलोगों को पशु-मानव (१००% घोर स्वार्थी या सम्मोहित मनुष्य) से मनुष्य (५० % स्वार्थी या विवेकशील मनुष्य) में और फिर क्रमशः मनुष्य से देव-मानव (क्रमशः १०० % निःस्वार्थी या भ्रममुक्त मनुष्य) में रूपान्तरित नहीं कर सकता है ! 
" काम से राम तक पहुँचने की यात्रा हमें स्वयं तय करनी होगी! " पंचभूतों के फन्दों से मुक्त हो जाने, या ब्रह्म को जानकर ब्रह्मविद मनुष्य, भ्रममुक्त-मनुष्य, पूर्णतः निःस्वार्थी थंडरबोल्ट जैसा अप्रतिरोध्य मनुष्य या माँ श्री सरदादेवी की कृपा से वैष्णव-जन के लिये हमलोगों में एथेंस का सत्यार्थी जैसा प्रचण्ड साहस और उत्साह', नचिकेता के जैसी आत्मश्रद्धा, प्रह्लाद जैसी प्रबल आस्तिकता स्वयं उत्पन्न करनी होगी। वास्तव में यह "Be and Make" वेदान्त परम्परा स्वयं मनुष्य बनने और दूसरों को मनुष्य बनने में सहायता करते करते स्वयं 'भ्रममुक्त मनुष्य' (पूर्णतः निःस्वार्थी मनुष्य, वैष्णव -जन जो पीर पराई को जानता है) बन जाने वाली सनातन प्रशिक्षण -परम्परा है।] “मेरा विश्वास नवयुवकों पर है। इन्ही में से मेरे कार्यकर्ता निकलेंगे, जो अपने पराक्रम से विश्व को बदल देंगे।"   
 यह स्वामी विवेकानन्द के उपरोक्त सजीव संदेशों का प्रभाव है, कि जो भी नवयुवक स्वामी जी की शिक्षाओं को समझकर, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उनका अनुसरण करेगा, जीवन ही बदल जायेगा। उसके जीवन में सत्ययुग आ जायेगा ! इसीलिए स्वामी जी कहते हैं- " आओ, हम सब आज से - इसी क्षण से धर्म को सहज बनाने की चेष्टा करें और उस सत्ययुग को धरती पर उतारने में सहायता करें, अर्थात जब प्रत्येक मनुष्य एक उपासक (वर्शिपर) होगा और प्रत्येक मनुष्य में अन्तर्निहित सत्यता (दी रियलिटी इन एव्री मैन) ही उसकी उपासना का विषय (ऑबजेक्ट ऑफ़ वर्शिप) होगा।" (८/६३)
'श्रीरामकृष्ण पताका': - नवयुवकों के प्रति भगवान श्रीरामकृष्ण के उस 'प्रेम और विश्वास' (नरेन् शिक्षा देगा के भरोसे) का प्रतिक है, कि मनुष्यों में आध्यात्मिक जागृति लाने (भ्रममुक्त मनुष्य बनने) की शिक्षा केवल रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा के लीडरशिप ट्रेनिंग में प्रशिक्षित-नवयुवक वृन्द ही दे सकते हैं। श्री रामकृष्ण ने अपने उसी प्रेम और भरोसे को 'वज्रांकित महामण्डल ध्वज के रूप में सभी नवयुवकों को हस्तान्तरित कर दिया गया है! ताकि भविष्य में महामण्डल द्वारा आयोजित युवा-प्रशिक्षण शिविर के माध्यम से 'मनुष्य बनने और बनाने' में समर्थ हजारों पूर्णतः निःस्वार्थी 'थंडरबोल्ट' जैसे अप्रतिरोध्य (irresistible) वुड बी लीडर्स का निर्माण हो सम्भव हो जाये! 
[जीवन नदी के हर मोड़ पर (पृष्ठ १५३)] 
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