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गुरुवार, 10 अगस्त 2017

राष्ट्रनिर्माण में ब्राह्मणों की भूमिका:

क्रांतिधर्मी चेतना के नायक कामरेड चे ग्वेरा ( १९२८-१९६७) का कहना था, कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। ‘नया मनुष्य’ नहीं बनेगा, तो फिर समाज का कोई लाभ नहीं होगा। ‘‘मनुष्य को खिलाना और पहनाना यदि असल समस्या है, तो कोई भी पूँजीवादी सरकार इसे आराम से कर सकती है। पर असल समस्या है-‘नया मनुष्य बनाना’। ‘नया मनुष्य’ नहीं बनेगा, तो फिर समाज का कोई लाभ नहीं होगा।" 
मार्च १९६५ के अपने लेख ‘सोश्यिलिज्म एंड मेन इन क्यूबा’ में चे ग्वेरा ने नए नागरिक (चरित्रवान मनुष्य) गढ़ने पर जोर दिया था। वह मानता था कि व्यक्तिगत लालसाएं इस लक्ष्य को दुर्गम बना सकती हैं।  चूंकि घृणा, द्वैष, स्वार्थपरता मानव-व्यक्तित्व का हिस्सा हैं, इसलिए समानता, सद्भाव और सहअस्तित्व के लिए निजी लालसाओं एवं अहंता पर नियंत्रण भी आवश्यक है। इसके लिए नागरिकों को आत्मानुशासन में ढलना होगा। किन्तु इसको हम क्रांति की विडंबना कहें अथवा साम्यवादी राजनीति का लक्ष्य से अकसर भटक जाने वाला स्वभाव—प्रतिहिंसा साम्यवादी क्रांति की अवश्यंभावी घटना रही है। इस संभावना से केवल मार्क्स ही नहीं, बल्कि प्लेटो भी परिचित था। इसलिए मार्क्स ने जहां वर्गहीन समाज की अभिकल्पना प्रस्तुत की थी, वहीं उससे लगभग इकीस सौ वर्ष पहले प्लेटो ने भी कुछ ऐसा ही डर दिखाते हुए दार्शनिक मंडल (सत्यद्रष्टा-भ्रममुक्त ऋषिओं की मंडली) को सत्ता सौंपे जाने का सुझाव दिया था। 
कार्ल मार्क्स का कहना था कि सत्ता प्रतिष्ठानों, उद्योगों पर अधिकार प्राप्त कर लेने के उपरांत सर्वहारा वर्ग को वर्ग-व्यवस्था के उन्मूलन की कार्रवाही आरंभ कर देनी चाहिए। उसने इसको साम्यवादी क्रांति का अनिवार्य और महत्त्वपूर्ण चरण माना है।  किन्तु वर्ग-उन्मूलन के लिए किसी भी प्रकार की हिंसक कार्रवाही का समर्थन मार्क्स नहीं करता था। प्लेटो का मानना था स्वभाव से उदार और विद्वत दार्शनिक मंडल को, राज्य के भीतर, अपने कार्यों के लिए हिंसा की आवश्यकता ही नहीं है। 
चे ग्वेरा एक आदर्श क्रांतिकारी था। चे क्यूबा को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उसको आर्थिक मोर्चे पर सफल बनाना चाहता था। वह बिना पलक झपकाए घंटों तक निरंतर कार्य कर सकता था। आवश्यक मीटिंगें अक्सर आधी रात को बुलाता तथा भोजन करने का काम चलते-चलते निपटाता था। इसका अनुकूल प्रभाव दूसरे श्रमिकों-कामगारों पर भी पड़ता था। क्यूबा के नवनिर्माण में जुटा प्रत्येक श्रमिक अपने हिस्से का काम करने के बाद ही विश्राम के लिए जाता था। यह संबोधन "चे " अत्यंत घनिष्टता और आत्मीयता से भरा है। जिस तरह से हमारे यहां अपनापन जताने के लिए—‘हमारा’,'अन्ना', हमारा अपना, आदि कहा जाता है। वैसे ही क्यूबा में भाई, ब्रो, ड्यूड के लिये "चे" बोला जाता है। अपने साथियों में चे इसी नाम से ख्यात था। यही कारण है कि उसको प्रसिद्धि फिदेल कास्त्रो से कहीं अधिक मिली। इसीलिये प्रसिद्ध ‘टाइम’ पत्रिका द्वारा चे को बीसवीं शताब्दी की दुनिया-भर की पचीस सबसे लोकप्रिय प्रतिभाओं में सम्मिलित किया गया है। बाकी प्रतिभाओं में अब्राहम लिंकन, महात्मा गांधी, नेलसन मंडेला आदि अनेक नेता सम्मिलित हैं। 
चे ने पूंजीवाद को ‘भेड़ियों की लड़ाई’ के संज्ञा दी थी, जिसमें एक की जीत दूसरों के पराभव पर निर्भर करती है। उसका संघर्ष किसी एक देश के लिए न होकर समूची मनुष्यता के हित में था। उसका मानना था कि पूंजीवाद को टक्कर देने के लिए समाजवाद जरूरी है। लेकिन वह लोगों की वर्तमान धनलोलुपता के चलते संभव नहीं है।  हालांकि उसको यह देखकर बहुत क्षोभ होता था कि देश-भर में लोग नैतिकता को ताक पर रखकर (चरित्रनिर्माण किये बिना) भी धनार्जन को उत्सुक हैं। हर कोई पूंजी की शरण में जाना चाहता है। 
“एकात्मता यानी निजता का विसर्जन —यही समाजवाद का लक्ष्य है। समाजवाद के आलोचकों को जवाब देते हुए चे ने कहा था कि—‘हास्यास्पद दिखने का खतरा उठाते हुए भी मैं यह कहूंगा कि एक सच्चा क्रांतिकारी 'प्रेम' की पवित्र भावना द्वारा निर्देशित होता है। बिना मानवप्रेम के प्रतिबद्ध क्रांतिकारी बन पाना संभव ही नहीं है।’ ‘हमें हर दिन संघर्ष करना चाहिए, उस समय तक संघर्ष करना चाहिए जब तक मनुष्यता के प्रति हमारा प्रेम हकीकत में न बदल जाए।’ इसीलिए उसे वयस्कों और युवाओं में समान लोकप्रियता प्राप्त है। 
'चे' को डायरी लिखने का शौक था। चे ग्वेरा ने लिखा था -‘क्रांति यदि सच्ची है तो उसमें एक ही चीज प्राप्त हो सकती है—जीत या फिर मौत!’  ‘सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रतिबद्ध युवाशक्ति ही हमारी आशा का एकमात्र केंद्र हैं। यही वह मिट्टी है जिससे हमें अपनी अपेक्षाओं की दुनिया का निर्माण करना है।  हमें अपनी उम्मीदें युवाशक्ति के मन में बिठा देनी होंगी तथा उसको अपने साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के लिए तैयार करना होगा।  उसको यह अच्छी तरह से समझा देना होगा कि क्रांतिपथ पर आगे बढ़ने का अभिप्राय है—जिंदगी अथवा मौत !"  ‘मौत जब भी हमें गले लगाए, उसका स्वागत खुले मन से हो। बशर्ते, हमारा समरघोष - [चरैवेति चरैवेति ] उन कानों तक पहुंचे जिन तक हम पहुंचाना चाहते हैं।' वह मसीही मौत मरा है,  मृत्युशिला पर लेटे चे की चेहरा ईसामसीह की तरह नजर आ रहा था। चे ने अपनी डायरी में लिखा था कि,मौत तो एक छोटा-सा पड़ाव है;  वह, ‘फिर जन्म लेगा’ तथा अपने संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए नए सिरे से प्रयत्नरत होगा।] 
 चे को मृत्युदंड दिए जाने की सूचना जैसे ही क्यूबा पहुंची वहां शोक की लहर व्याप गई। राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो (१९२६- २०१६) ने तीन दिन के शोक की घोषणा कर दी। लाखों की भीड़ को संबोधित करते हुए कास्त्रो ने कहा था— चे नई पीढ़ी का ‘आइकन’ है, विद्रोह का प्रतीक है। यदि कोई हमसे प्रश्न करे कि हमारे लिए भविष्य के मनुष्य का मा॓डल क्या हो? तब मैं अपने दिल की गहराइयों से कहना चाहूंगा कि वह एकमात्र आदर्श पुरुष चे है, जिसके न तो चरित्र पर कोई दाग-धब्बा है, न ही कर्म पर। 
फिडेल कास्त्रो  ने कहा था - “इतने सालों बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं : जो गलतियां हमने की, उन सब में सबसे बड़ी गलती थी कि हम यह मान रहे थे कि कोई सच में जानता है कि समाजवाद की स्थापता कैसे करनी है। जब भी वे कहते… यही फॉर्मूला है, तो हम सोचते कि उसे पता है। जैसे कि वह कोई डॉक्टर हो।"  
किन्तु मार्क्स के चक्कर में पड़कर फिदेल कास्त्रो ने विवेकानन्द को नहीं पढ़ा, वरना उसे नया मनुष्य निर्माण कर के वेदान्तिक समाजवाद और साम्यवाद स्थापित करने का सटीक फॉर्मूला, महामण्डल की तरह उसे भी प्राप्त हो गया होता। ‘नया मनुष्य’ बनाने का सटीक फॉर्मूला स्वामी विवेकानन्द ने दिया है-'BE AND MAKE'  अर्थात तुम स्वयं एक चरित्रवान मनुष्य बनो और दूसरों को भी चरित्रवान मनुष्य बनने में सहायता करो! जब तक धरती पर रामराज्य या वेदान्तिक साम्यवाद अथवा सत्ययुग स्थापित करने की कामना रखने वाला लोकशिक्षक, या नेता रामकृष्ण -विवेकानन्द वेदान्त शिक्षक -प्रशिक्षण परम्परा में 'ब्राह्मण' नहीं बनेगा, तब तक समाज का कोई लाभ नहीं होगा। क्योंकि स्वामी जी ने कहा था - हाईएस्ट ट्रुथ आर वेरी सिम्पल ! अर्थात राम के जैसा चरित्र निर्माण किये बिना धरती पर रामराज्य कैसे स्थापित होगा ?
 आधुनिक युग में महात्मा गांधी भारत में अकेले राजनेता थे जिन्होंने ऊर्ध्वबाहु होकर घोषणा की कि वे वर्णाश्रम व्यवस्था पर आस्था रखते हैं। महात्मा गांधी मानते थे कि ब्राह्मण धर्मावलंबी व्यक्ति ही भारत के गरीब समुदाय को स्वयं गरीबी ओढ़ कर गरीबी और दरिद्रता के अभिशाप से छुटकारा दिलाने वाला अगुआ (लोकशिक्षक या नेता) बन सकता है।
मनुष्यनिर्माण और चरित्रनिर्माण में ब्राह्मणों की भूमिका: स्वामी विवेकानन्द की चाह थी कि प्रत्येक भारतवासी समुन्नत और संस्कृति तथा संस्कार से सम्पन्न हो। इसीलिए उन्होंने कहा था, ‘‘भारत के पास जो भी सांस्कृतिक कोष है, उसे जन-साधारण के अधिकार में जाने दो।’’ इस हेतु उन्होंने ब्राह्मणों की भूमिका को स्वीकार करते हुए कहा था, ‘‘युगों से ‘ब्राह्मण’ भारतीय संस्कृति का थातीदार रहा है। अब उसे इस संस्कृति को सबके पास विकीर्ण कर देना चाहिए।’’
स्वामीजी कहते हैं - " भारत में किसी प्रकार का सुधार या उन्नति की चेष्टा करने के पहले धर्म-प्रचार आवश्यक है। सर्वप्रथम, हमारे उपनिषदों, पुराणों और अन्य सब शास्त्रों में जो महान सत्य छिपे हुए हैं, उन्हें सब  ग्रन्थों के पन्नों से बाहर निकालकर, मठों की चहारदीवारियाँ भेदकर, वनों-आश्रमों से बाहर  निकालकर, कुछ सम्प्रदाय-विशेषों के हाथों से छीनकर देश में सर्वत्र बिखेर देना होगा। ताकि ये सत्य दावानल के समान सारे देश को चारों ओर से लपेट लें -उत्तर से दक्षिण और पूर्व  पश्चिम तक सब जगह फ़ैल जायें -हिमालय से कन्याकुमारी और सिन्धु से ब्रह्मपुत्र तक सर्वत्र वे धधक उठें । 
उपनिषद के चार महावाक्य- 'अहं ब्रह्मास्मि', 'तत त्वम् असि', 'सर्वं खलु इदं ब्रह्म' -संम्पूर्ण मानव जाति को पुनरुज्जीवित करने के लिए रामबाण दवा  या संजीवनी बूटी के समान हैं, जिन्हें हृदयंगम कर लेने पर प्रत्येक मनुष्य आत्मस्थ हो सकता है, और मृत्यु के भय को सदा के लिए समाप्त कर सकता है! सबसे पहले हमें यही करना होगा-" पहले इसे सुनना होगा, फिर मनन करना होगा और उसके बाद निदिध्यासन। " 
" और जो भी व्यक्ति अपने शास्त्रों के महान सत्यों को -(चार महावाक्यों को) दूसरों को सुनाने में सहायता पहुँचायेगा -वह आज एक ऐसा कर्म करेगा, जिसके समान कोई दूसरा कर्म ही नहीं है। महर्षि व्यास ने कहा है, " इस कलियुग में मनुष्यों के एक ही कर्म शेष रह गया है। आजकल यज्ञ और कठोर तपस्याओं का कोई फल नहीं होता। इस समय दान ही एकमात्र कर्म है। और दानों में धर्मदान, अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान का दान ही सर्वश्रेष्ठ है।"५/११६ 
" आजकल मूर्ति-पूजा को गलत बताने की प्रथा सी चल पड़ी है, और सब लोग बिना किसी आपत्ति के उसमें विश्वास भी करने लग गये हैं। यदि मूर्ति-पूजा के द्वारा श्रीरामकृष्ण परमहंस जैसे महापुरुष का निर्माण हो सकता है,तो और हजारों मूर्तियों की पूजा करो। जिस किसी भी उपाय से हो सके, लाखों की संख्या में इसी प्रकार के मनुष्यों का निर्माण करो ! "  
"मनुष्य को सदैव दुर्बलता की याद कराते रहना उसकी दुर्बलता का प्रतिकार नहीं है- बल्कि उसे अपने बल का (अंतर्निहित ब्रह्मत्व का) स्मरण करा देना ही उसके प्रतिकार का उपाय है। उनमें जो बल पहले से ही विद्यमान है - उसका उन्हें स्मरण करा दो! "
" एक शब्द में वेदान्त का आदर्श है, 'मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप में जानना,' और उसका सन्देश यह है कि - यदि तुम अपने भाई मनुष्य की, व्यक्त ईश्वर की उपासना नहीं कर सकते तो उस ईश्वर की कल्पना कैसे कर सकोगे, जो अव्यक्त है ? "... यदि तुम ईश्वर-साक्षात्कार करना चाहते हो तो मनुष्य की सेवा करो।’’
जिन दिनों ब्राह्मण हिंदू समाज के सच्चे नेता, तथा उपदेशक थे उन दिनों भारत सभी तरह से धन-धान्य, मान-प्रतिष्ठादि से संपन्न था। और जगत का गुरु बनने का दावा गर्व के साथ करता था। उन्हीं दिनों का न कि आजकल की परम पतित अवस्था का स्मरण कर के, भगवान मनु को यह कहने का साहस हुआ था कि :
एतद्‍देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:।
    स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन पृथिव्यां सर्वमानवा:॥
'ब्रह्मावर्त्त, ब्रह्मर्षि आदि देशों में उत्पन्न ब्राह्मणों से ही पृथ्वी के सभी मनुष्य अपने-अपने चरित्र की शिक्षा ग्रहण करें' (अ. 2/20)। इससे बढ़ कर और प्रतिष्ठा क्या हो सकती है कि समूचे संसार के मस्तक पर रख दिया?अस्तु, ब्राह्मणों के चरित्र पर प्रथम बहुत अधिक ध्यान दिया जाता था।
भूतानां प्राणिन: श्रेष्ठा: प्राणिनां बुद्धिजीविन:।
    बुद्धिमत्सु नरा: श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणा: स्मृता:॥96॥
ब्राह्मणेषु च विद्वांसो विद्वत्सु कृतबुंद्धय:।
    कृतबुद्धिषु कर्तार: कर्तृषु ब्रह्मवेदिन:॥97॥

'स्थावर जंगम पदार्थों प्राणधारी श्रेष्ठ हैं, प्राणधारियों में भी बुद्धि से काम लेनेवाले, बुद्धि वालों में भी मनुष्य, मनुष्यों में भी ब्राह्मण, ब्राह्मणों में भी विद्वान, विद्वानों में भी उत्तम कार्यों में कर्तव्य बुद्धिवाले, कर्तव्यबुद्धिवालों में भी उत्तम कार्यों के कर डालनेवाले, और उत्तम कार्यकर्ताओं में भी ब्रह्मवेत्ता अर्थात अपने ही आत्मा को सभी में ओत-प्रोत देखनेवाले।' (अ. 1, 96-97)।
ब्राह्मणेनाकारणो धर्म: षडंगो वेदोऽधययो ज्ञेयश्‍च। 'यह न विचार कर कि वेदवेदांग के पढ़ने से हमें क्या मिलेगा किंतु अपना धर्म या कर्तव्य समझ कर - यह समझ कर कि ब्राह्मण होने के नाते ही हम उनके पढ़ने को बाध्य हैं -ब्राह्मण लोग छहों अंगों के सहित वेदों को पढ़ें और उनका अर्थ जानें'। संपूर्ण संसार का गुरु बनना, मानवजाति का मार्गदर्शक नेता अथवा लोकशिक्षक बनना और बनाना कोई मामूली बात नहीं है कि चाहे जो कोई ऐरा-गैरा चाहे वही ब्राह्मण बन जाये। व्यव्हार अर्थात  चरित्र  या आचरण से ही नाम व प्रतिष्ठा होती है, न कि केवल बातों से। महान या बड़ा बनने के लिए कुछ परिश्रम करना पड़ता है।
प्रथम ब्राह्मणमात्र का निवास स्थान केवल कान्यकुब्ज देश अथवा ब्रह्मावर्त्त और ब्रह्मर्षि देश था, जैसा कि मनुस्मृति (अ. 2 श्‍लोक-17-20) से स्पष्ट है। इससे यह मतलब नहीं निकाला जा सकता कि आधुनिक कान्यकुब्ज ब्राह्मण इतर ब्राह्मणों से इसीलिए श्रेष्ठ हैं कि प्रथम के सभी ब्राह्मण उन्हीं के देशवासी हैं।  हम अमुक हैं इसलिए बड़े हैं और तुम छोटे, हम कुलीन हैं, और तुम नहीं, फिर समानता कैसी? हमारी मर्यादा बीस विस्वा है, तुम्हारी उन्नीस ही, फिर हमारा तुम्हारे साथ खान-पान कैसा? इत्यादि बातें ही दृष्टिगोचर हो रही हैं? सारांश 'हमारे दादा ने घी खाया था, हमारा हाथ सूँघ लो' वाली कहावत ही अक्षरश: चरितार्थ हो रही है। हिंदू समाज में तो यह नियम है कि जिस किसी को कुछ दिया जावे उसको पूजन तथा प्रणामपूर्वक ही दिया जावे। इसीलिए कन्यादान के समय दामाद की भी पूजा की जाती है, एवं शय्यादान के समय महापात्र की।
ब्राह्मण : यास्क मुनि की निरुक्त के अनुसार - "ब्रह्म जानाति ब्राह्मण:" - ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म (इन्द्रियातीत सत्य, अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान) को जानता है। आत्मा सत्-चित और आनंद स्वरुप तथा अद्वितीय है। इस प्रकार ब्रह्मभाव से संपन्न मनुष्यों को ही ब्राह्मण माना जा सकता है। अतः ब्राह्मण का अर्थ है-"ईश्वर (परम सत्य) का ज्ञाता ",अर्थात जन्मना नहीं ब्रह्म को जानने वाला ही ब्राहमण कहलाता है।  जो आत्मा के द्वैत भाव से युक्त ना हो; आत्मा का करतल आमलकवत परोक्ष का भी साक्षात्कार करने वाला,दंभ, अहंकार आदि दोषों से चित्त को सर्वथा अलग रखने वाला हो, वही ब्राह्मण है। 
पूर्वकाल में ब्राह्मण होने के लिए मनुष्य को शिक्षा, दीक्षा और कठिन तप करना होता था। इसके बाद ही उस मनुष्य को ब्राह्मण कहा जाता था। आजकल के तथाकथित ब्राह्मण लोग शराब पीकर, तामसिक आहार खा कर और असत्य वचन बोलकर भी खुद को ब्राह्मण समझते हैं। जिन लोगों ने ब्राह्मणत्व अपने प्रयासों से हासिल किया था उनके कुल में जन्मे लोग भी खुद को ब्राह्मण समझने लगे।
कर्म से किसी भी जाति और धर्म में पैदा हुआ कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण बन सकता है।  ब्राह्मण होने का अधिकार सभी को है चाहे वह किसी भी जाति, प्रांत या संप्रदाय से हो। लेकिन ब्राह्मण होने के लिए कुछ नियमों का पालन करना होता है।  किन्तु किसी वेदपाठी परम्परा में यदि कोई बालक-बालिका जन्म ले, तो उसके “ब्राह्मणत्व को प्राप्त होने की सम्भावना” बढ़ जाती हैं। लेकिन इसका इसका ये मतलब नहीं नहीं हैं कि ऐसा बालक-बालिका “ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण” हो ही जाए “निरुक्त शास्त्र” के प्रणेता यास्क मुनि इसीलिए कहते हैं -
                                  जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात्‌ भवेत द्विजः।
                                     वेद पाठात्‌ भवेत्‌ विप्रःब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः।।

अर्थात – व्यक्ति जन्मतः शूद्र है। संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। किंतु जो ब्रह्म को जान ले, वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधिकारी है। ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे। परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की। ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है। सत्यकाम जाबाल दासी के पुत्र थे, परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए।  क्षत्रिय कुल में जन्में शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया। [विष्णु पुराण ४.८.१] मातंग चांडाल पुत्र से ब्राह्मण बने। विदुर दासी पुत्र थे, तथापि वे ब्राह्मण हुए और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया।
अर्जित ज्ञान (५ दैनन्दिन अभ्यासों) का क्रियान्वयन: मनुष्य को मात्र पुस्तकीय ज्ञान नहीं अर्जित करना चाहिए बल्कि उसका प्रैक्टिकल भी करना चाहिए। कवि ने कहा है - 'ज्ञानं भार: क्रियां विना' अर्थात वह ज्ञान भार यानि बोझ बन जाता है जिसका क्रियान्वयन न किया जाए। यास्क मुनि कहते हैं शृगं शृणातेः अर्थात ज्ञान और कर्म ही साधक के शृंग हैं। भाव है कि हम ज्ञानयुक्त कर्म नहीं करेंगे तो तोते की तरह राम-राम कहने से कुछ नहीं होगा अपितु जीवन नष्ट ही होकर रहेगा। 
जो व्यक्ति बिना अर्थ समझे तोते की तरह केवल रटने का कार्य करता है, उसकी स्थिति भी भारवाहक गधे की भाँति होती है।
पुस्तकस्था तु या विद्या, परहस्तगतं धनं।
कार्यकाले समुत्पन्ने, न सा विद्या न तद् धनं॥

ज्ञान यदि पुस्तक में ही रहे (अर्थात् उसे आचार-व्यवहार में  न लाया जाए) और स्वयं का धन यदि किसी अन्य के हाथों में हो, तो आवश्यकता पड़ने पर उस 'ज्ञान' और 'धन' का उपयोग नहीं नहीं किया जा सकता। 
व्यायामात् लभते स्वास्थ्यं, दीर्घायुष्यं बलं सुखं।
आरोग्यं परमं भाग्यं ,स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम्॥
व्यायाम से स्वास्थ्य, लम्बी आयु, बल और सुख की प्राप्ति होती है। निरोगी होना परम भाग्य है और स्वास्थ्य से अन्य सभी कार्य सिद्ध होते हैं॥
यथा हि एकेन चक्रेण, न रथस्य गतिर्भवेत्।
एवं पुरूषकारेण विना ,दैवं न सिध्यति॥
जिस प्रकार एक पहिये वाले रथ की गति संभव नहीं है, उसी प्रकार पुरुषार्थ के बिना केवल भाग्य से कार्य सिद्ध नहीं होते हैं।] 
 काकचेष्टा वकोध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च | 
अल्पाहारी गृह्त्यागी विद्यार्थी पंचलक्षणम् ।।
कौवे जैसा प्रयत्न, बगुले जैसा ध्यान और कुत्ते जैसी नींद, कम खाने वाला, घर छोडने वाला, ये पांच विद्यार्थी के लक्षण हैं ।
‘ज्ञान’ की इस महान् उपयोगिता एवं अनिवार्य आवश्यकता को देखते हुए शास्त्रकारों ने ज्ञान की महत्ता के सम्बन्ध में कहा है -
नास्ति विद्या समं चक्षु, नास्ति सत्य समं तप:।
नास्ति राग समं दुखं ,नास्ति त्याग समं सुखं॥ महाभारत 

विद्या के समान आँख नहीं है, सत्य के समान तपस्या नहीं है, आसक्ति के समान दुःख नहीं है और त्याग के समान सुख नहीं है॥ 
आचार्य: कस्मात्? (आचार्य किसे कहा जाता है) उत्तर -
 आचारं सदाचारं गुणाचारं ग्राहयति इति आचार्य:
अपि च शिष्याणां छात्राणां बुद्धिषु सद् अर्थान् आचिनोति।

अर्थात वह आचार्य है जो सदाचार, सद्गुणाचार को छात्रों को ग्रहण कराता है और उनकी बुद्धि में सत्य-अर्थों को धारण करवा देता है ताकि छात्रों को पढ़ाए हुए पाठ कभी भी न भूलें। इस प्रकार परिभाषा के अनुसार आचार्य स्वयं भी सजन्न-सदाचारी सद् विद्वान होता है। वह अपने सद् आचरण से सत्य वैदिक धर्म पर स्थित रह कर छात्रों को सद् शास्त्रों का यथावत् उपदेश करने वाला पुरुष होता है। वह निस्पृहतापूर्वक अपने विद्यार्थियों को सदैव अपने सदाचरण से सद्गुणों से अपनी तरफ आकर्षित करता है और सर्वदा छात्रों का कल्याण चाहने वाला होता है। 
ऐसे सोच-विचार करके हानि-लाभ पर भी विचार करके जिससे अन्य जनों का भी अहित न हो, इस प्रकार का आचरण ही सदाचार कहा जाता है। शिष्टाचार में भी सद् आचरण का ही मुख्य स्थान होता है। श्रेष्ठ सदाचारी व्यक्तियों का आचरण मन-वाणी-कर्म में एक-सा होता है। मानव-जीवन में मन, वचन और कर्म की बड़ी प्रतिष्ठा है। इनके संयोग और संतुलन में ही मनुष्य का पूरा परिचय छिपा है। शास्त्र कहते हैं- मन, वचन और कर्म में एका होना महात्मा का और इनका भिन्न होना दुरात्मा का लक्षण है।हम दर्पण देखकर अपनी प्रतिच्छवि को अपना स्वरूप मानकर संतुष्ट हो जाते हैं। अपना रूप किसे रुचिकर नहीं लगता? अपने दोष को देखना हिम्मत का काम है। दुरात्मा कौन है? वह, जिसे अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं होता, जो नहीं जानता कि हाड़-मांस के इस शरीर में एक ब्रह्मांड समाहित है। अपने स्वरूप के उद्घाटन में ही जीवन की सार्थकता है। कहा भी है- 
                                        मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्।
                                   मनस्यन्यत् वचस्यन्यत् कर्मण्यन्यत् दुरात्मनाम्।

महापुरुषों के मन, वचन और कर्म में समानता पाई जाती है पर दुष्ट व्यक्ति सोचते कुछ और हैं, बोलते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं॥

इसलिए प्रत्येक लोकशिक्षक या नेता (लोक-प्रतिनिधि) को  सदाचार की शिक्षा सर्वजन हितकारी सत्य उपदेश करने वाले मानव मात्र और प्राणी मात्र का उपकार करने वाले आचार्यों से जीवन उपयोगी सदाचार को समझ कर अपनों तथा दूसरों के प्रति सदाचारपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।    
सज्जन पुरुषों का आचरण दूसरों के अपनाने योग्य होता है। सज्जन बनने के लिए गुरु या आचार्य की चरण-शरण में जाना पड़ता है। वे गुरुओं की छत्रछाया में रह कर अनुशासनपूर्वक सदाचार का पाठ पढ़ते हैं, उस पर आचरण करके सद् विद्या ग्रहण करते हैं। जीवन का उद्देश्य जानने की विद्या या ज्ञान आवश्यक होता है।‘‘सा विद्या या विमुक्तये’’विद्या उसे कहते हैं जिसके जानने और पढऩे से सभी प्रकार का अज्ञान व अंधेरा दूर होकर मनुष्य जीवन का कल्याण होता है और जन्म मृत्यु के चक्र से छुटकारा मिल जाता है। कहा भी है-
आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।
अर्थात अपनी आत्मा के प्रतिकूल-विपरीत व्यवहार कभी भी किसी के साथ न करें।
आज हमारी युवा पीढ़ी धर्म के अभाव में पतन की ओर अग्रसरित होती चली जा रही है, ऐसे में लोगों की चिन्तन क्षमता समाप्त हो गयी है। नित्य नये-नये मानवीय ह्रासता के कृत्य दिखायी देते हैं, ऐसा क्यों है? क्या हमने कभी विचार व चिन्तन किया है? आज हमारी सोचने की क्षमता इतनी कम क्यों हो गयी है, क्योंकि हम धर्म को समझ ही नहीं पा रहे हैं। हम धर्म को मात्र एक कर्मकाण्ड के  रूप में स्वीकार करते हैं। किन्तु अब हमें धर्म को स्वयं के अन्दर धारण करना होगा।  
किन्तु "न लिंग धर्मकारणम्" -संसार में विभिन्न मतवालों ने अपने-अपने धर्म के नाम पर विभिन्न चिन्ह बना रखे हैं। जैसे कोई केश बढ़ा रहा है, कोई लम्बी दाढ़ी बढ़ाये हुए है, कोई केश व दाढ़ी दोनों बढ़ाये हुए है, कोई पांच शिखाएं रखे है, कोई मूंछ कटाकर दाढ़ी बढ़ा रहा है और कोई चन्दन का तिलक लगा रहा है, कोई माथे को अनेक रेखाओं से अंकित किये हुए है और हाथादि पर भी चिन्ह बनाये हुए है, किन्तु ये सभी धर्म से कुछ भी सम्बन्ध नहीं रखते हैं। अतएव केवल गेरुआ वस्त्र और मुण्डित मस्तक जैसे बाह्यचिन्हों को धर्म नहीं माना गया है। धर्म का अर्थ, दाढ़ी-टोपी धारण या ललाट पर तिलक लगाना, फूल-बेलपत्ता, रामनामी चादर ओढ़ना नहीं है। 
स्वामी जी कहते हैं - " और धर्म का मुख्य सिद्धांत ही है -क्रमविकासवाद !  नाना प्रकार की अवस्थाओं (द्वैत-विशिष्टाद्वैत-अद्वैत) में से होकर आत्मा उच्चतम लक्ष्य तक पहुँचती है। धर्म एक ऐसी वस्तु है जो, ' पशु-मानव को मनुष्य में और मनुष्य को परमात्मा में उन्नत कर देता है! " 


धर्म और मजहब में अंतर: धर्म और मजहब को एक समझना भारी भूल है। धर्म सबका साझा है क्योंकि ईश्वर की देंन है। मजहब अपना अपना है सब का समान नहीं। धर्म में सत्य,सरलता,संतोष, स्नेह , सदाचार और चरित्र आवश्यक हैं, मजहब इन गुणों की उपेक्षा कर वाह्य चिन्हों को महत्व देता है यथा तिलक लगाना, स्लेब लगाना,दाढी केस रखना आदि। 
धर्म ईश्वर प्रदत्त है इसलिए एक है इसमें हिन्दू,मुसलमान, सिख, ईसाई,यहूदी,पारसी किसी भी सम्प्रदाय, मजहब या पंथ के लिए कोई भेद भाव नहीं है। इसके विपरित मजहब, मत-मतान्तर, सम्प्रदाय या पंथ 
अनेक मनुष्यों के बनाये होने के कारण अनेक हैं और अपने अनुयायियों के प्रति पक्षपात से भरे पडे हैं। इसलिए मुहम्मद अली जिन्ना ने सन् १९२४ में कहा था कि बुरे से बुरा मुसलमान गान्धी जी से अच्छा है क्योंकि वह पैगम्बर पर ईमान लाया है,गान्धी जी ईमान नहीं लाये इसलिए स्वर्ग का दरवाजा उनके लिए बन्द है। 
महाभारत के भीष्मपर्व में कहा गया है - " यतो धर्मस्ततो जयः" - इस श्लोक से इस बात की पुष्टि होती है कि धर्म की सदा विजय होती है। इतिहास की घटनाओं से इस बात की पुष्टि होती है। धर्म की अर्थात् न्याय की सदा विजय होती है। चाहे अधर्मी कितना बलवान् हो उसकी हार अवश्य होती है। इसीलिये सुप्रीम कोर्ट का ध्येयवाक्य यही है। लोक में भी यह देखा जाता है कि अधर्मी की हार का कारण अधर्म ही बन जाता है। मनुस्मृति में भी सत्य ही कहा है- 
अधर्मेणैधते तावत् ततो भद्राणि पश्यति। 
ततो सपत्नान् जयति समूलस्तु विनश्यति।। 
अर्थात् अधर्माचरण करने से व्यक्ति धन-सम्पदा बढ़ने से बढ़ता हुआ दिखाई देता है, तत्पश्चात् भद्र भी देखता है अर्थात् भौतिक साधनों की समृद्धि होने से बड़े-बड़े महल, कोठियां बना लेता है, अपने विरोधियों पर जैसे-तैसे विजय प्राप्त कर लेता है। किन्तु अन्त में उसका (लालू का ) सर्वनाश हो जाता है। इसलिए हमें इस शाश्वत सत्य पर अवश्य दृढ़ विश्वास करना चाहिये-
यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः।।
वैशेषिक दर्शन के कवि ने धर्म की परिभाषा करते हुए कहा है कि जिसके आचरण से सांसारिक उन्नति और पारलौकिक उन्नति होती है वह धर्म है अर्थात् शारीरिक, बौद्धिक, मानसिक, आत्मिक तथा सामाजिक उन्नति करना सांसारिक उन्नति है और यह सब मनुष्य धर्म के कारण करता है। 
 धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। 
अर्थात् जो व्यक्ति धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है और जो धर्म को नष्ट करता है, धर्म उसको नष्ट कर देता है अर्थात् म्त्युपाशों से भी धर्म ही रक्षा करता है। जीवन में हताशा और किंकर्तव्यमूढ़ता धार्मिक पक्ष के निर्बल होने पर ही आती है। जीवन में अधर्म की वृद्धि ही व्यक्ति को निराश तथा दुर्बल बना देती है। अतः धर्म की वृद्धि करके व्यक्ति को सबल व सशक्त रहना चाहिये जिससे अधर्म के कारण क्षीणता न आ सके। धर्म से परस्पर प्रीति व सहानुभूति के भावों की वृद्धि होती है और मित्रता आदि गुणों की वृद्धि होती है। आचार्य चाणक्य ने लिखा है-
‘‘सुखस्य मूलं धर्मः। धर्मस्य मूलमिन्द्रियजयः।” 
अर्थात् सुख का मूल धर्म है और धर्म का मूल है-इन्द्रियों को संयम में रखना। संसार में प्रत्येक मनुष्य की इच्छा होती है कि मैं सुखी रहूं और सुख की प्राप्ति धर्म के बिना नहीं हो सकती। अतः धर्म का आचरण अवश्य ही करना चाहिये। बिना धर्म को अपनाये कोई भी मनुष्य सुखी नहीं हो सकता है। शास्त्रकार कहते हैं-‘धर्म एकोऽनुगच्छति’ अर्थात् एक धर्म ही मरणोत्तर जीवन में मनुष्य के साथ जाता है।
धनानि भूमौ, पशवश्च गोष्ठे, नारी गृहे बान्धवाः श्मशाने। 
देहश्चितायां परलोकमार्गे, धर्मानुगो गच्छति जीव एकः।।
अर्थात् भौतिक समस्त धन भूमि में ही गड़़ा रह जाता है अथवा आजकल बैंकों में या तिजोरियों में ही धरा रह जाता है। और गाय आदि पशु गोशाला में ही बन्धे रह जाते हैं। पत्नी घर के द्वार तक ही साथ जाती है और परिवार के भाई-बन्धु व मित्र-जन श्मशान तक ही साथ देते हैं। एक मनुष्य का शुभाशुभ कर्म (धर्म) ही परलोक में मनुष्य का साथ देता है। अर्थात् धर्म के अनुसार ही मनुष्य को परलोक में अच्छी-बुरी योनियों में जाना पड़ता है। इस प्रकार धर्म का ज्ञान और उस का आचरण मनुष्य के लिए परमावश्यक है, यह हमारी उन्नति व सुख का आधार है।
वेद और धर्म : धर्म को जानने के लिए एकमात्र स्वतंत्र प्रमाण वेद है। वेद किसे कहते हैं ? अनादि अनन्त अपौरुषेय नियतानुपर्वी वह शब्दराशि जिससे धर्म - अर्थ - काम - मोक्ष पुरुषार्थ चतुष्टय जाने जाते हैं , उसे वेद कहते हैं । वेद चार हैं - ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद । इनकी परम्परा सृष्टि के आरम्भ काल से बराबर चली आ रही है । गुरुओं के मुख से सुने जाने के कारण इसे श्रुति भी कहते हैँ । श्रुति किसे कहते हैं? गुरु मुख से जिसका श्रवण किया हो, जिसका कोई कर्त्ता न हो उसे श्रुति कहते हैं, "श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो। " 
स्मृति किसे कहते हैं? जिसमें समाज के लिये आचार, विचार, व्यवहार की व्यवस्था, तथा समाज के शासन निमित्र निति और सदाचार सम्बन्धी नियम स्पष्टता पूर्वक हो उसे स्मृति कहते हैं, इसी को धर्मशास्त्र भी कहते हैं। धर्म शास्त्र किसे कहते हैं? जिसमें धर्माधर्म का निर्णय मिले उसे धर्मशास्त्र कहते हैं, इसे स्मृति भी कहते हैँ। 
उपनिषद या वेदान्त किसे कहते हैं? वेद के अन्तिम भाग अर्थात् आखिरी ब्रह्मविद्या विषय वेदान्त उपनिषद कहते हैं, जिसमें ब्रह्मविद्या का निरुपण हो।धर्म का ज्ञान प्रत्यक्ष और अनुमान से नहीं हो सकता। वेदों का वेदत्व इस तथ्य पर निर्भर करता है कि प्रत्यक्ष और अनुमान से जिस विषय का ज्ञान नहीं हो सकता उसका ज्ञान वेद कराते हैं। भगवत गीता में कहा गया है कि कर्त्तव्य और अकर्तव्य का ज्ञान शास्त्र से प्राप्त करके कर्म करना चाहिए। जो मनुष्य शास्त्र- विधान को छोड़कर अपने मन से कोई  कर्म करता है उसे उस कर्म से सद्गति प्राप्त नहीं होती। शास्त्र विरुद्ध कर्म करने से अधर्म होता है। वेद से धर्म और अधर्म, स्वर्ग और नर्क, अपूर्व और अदृष्ट, योग और मोक्ष आदि विषयों का ज्ञान होता है। वेद सनातन शास्त्र है। वेद अनन्त है – अनन्ता वे वेदाः। ऋषियों को उनका दर्शन प्राप्त होता है। 

वेद: स्मृति सदाचार: स्वस्य च प्रियमात्मन:।
एतत् चतुर्विध प्राहु: साक्षात् धर्मस्य लक्षणम्।।
धर्म अनुभूति की वस्तु है। वह मुख की बात मतवाद अथवा युक्तिमूलक कल्पना मात्र नहीं है। आत्मा की ब्रह्मस्वरूपता को जान लेना, तद्रुप हो जाना- उसका साक्षात्कार करना, यही धर्म है- वह केवल सुनने या मान लेने की चीज नहीं है। समस्त मन-प्राण का विश्वास की वस्तु के साथ एक हो जाना - यही धर्म है।"
महर्षि मनु द्वारा निरुपित धर्म के लक्षण स्मरण करें-चरित्र-संपन्न लोगों के चले हुए मार्ग या ढंग पर चलने ही का नाम कानून, व्‍यवस्‍था या मोरालिटी है। भगवान श्री कृष्ण भगवान गीता ३/२१ में कहते है-
यद्यदाचरित श्रेष्‍ठस्‍तत्तदेवेतरोजना:।
स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्‍तदनुवर्त्तते।
हे अर्जुन! श्रेष्ठ पुरुष जो-जो करता है, वही और लोग भी करते हैं। श्रेष्ठ जिसे उत्तम समझता है और लोग भी उसे ही उत्तम समझते हैं।
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्नब्रूयात् सत्यमप्रियम् ।
प्रियं च नानृतं बृयादेष धर्मः सनातनः ॥-मनु
अर्थ- सत्य बोले , प्रिय बोले ; ऐसा सत्य न बोले जो अप्रिय हो , ऐसा प्रिय भी न बोलो जो असत्य हो - यहीं सनातन धर्म है ।
संक्षेपात्कथ्यते धर्मो जनाः किं विस्तरेण वा ।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥
- वेदव्यास
अर्थ- हे मनुष्यों ! अधिक कहने से क्या लाभ ! हम संक्षेप में तुम्हें धर्म का तत्व बता देते हैं । परोपकार करना पुण्यकर्म है और दूसरों को पीड़ा देना पाप है ।
श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम् ।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥
- वेदव्यास
अर्थ- धर्म के सार को सुनों और सुनकर हृदयंगम करो । वह यह है कि जो अपनी आत्मा के प्रतिकूल हो , वैसा आचरण दूसरों के साथ न करें ।
सर्वेषां यः सुहृनित्यं सर्वेषां च हिते रताः ।
कर्मणा मनसा वाचा स धर्म वेद जाजले ॥
- महाभारत
अर्थ- हे जाजले ! उसी ने धर्म को जाना कि जो कर्म से , मन से और वाणी से सबका हित करने में लगा हुआ है और सभी का नित्य स्नेही है ।
श्रुतिर्विभिन्ना स्मृतयो विभिन्नाः,नैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम् ।
              धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां , महाजनो येन गतः सः पन्थाः ॥ - महाभारत
अर्थ- वेद और धर्मशास्त्र अनेक प्रकार के हैं । कोई एक ऐसा मुनि नहीं है जिसका वचन प्रमाण माना जाय । अर्थात् श्रुतियों,स्मृतियों, और मुनियों के मत भिन्न-भिन्न हैं । धर्म का तत्व अत्यंत गूढ है- वह साधारण मनुष्यों की समझ में नही आ सकता । ऐसी दशा में , महापुरूषों ने - अथवा अधिकतर लोगों ने - जिस मार्ग का अनुकरण किया हो , वहीं धर्म का मार्ग है, उसी को अपनाना चाहिए ।
ब्लूम व्हेयर यू आर प्लान्टेड: वर्णाश्रम-धर्म व्यवस्था भारतीय मनोवैज्ञानिकों की तीव्र बुद्धि कौशल की सूचक है।  मनुष्य जीवन मोक्ष साधनार्थ है !  मनुष्य के परम लक्ष्य पुरुषार्थ-चतुष्टय " धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष" की सिद्धि में धर्म का प्रथम स्थान है, क्योंकि मनुष्य बनने (भ्रम-मुक्त) और माँ सारदा देवी की 'भक्ति' प्राप्त करने में धर्म (विवेक-प्रयोग द्वारा निर्मित चरित्र) ही परम सहायक है। प्रत्येक विवेकी मनुष्य के पद-पद पर धर्म सहायक बना है। वेदेां की शिक्षाओं के अनुरूप धर्म वर्तमान व परजन्म में मनुष्य का सबसे बड़ा हितकारी मित्र के समान होता है और अधर्म दोनों जन्मों में शत्रु की भूमिका निभाता है। इसीलिए कहा गया है- धारणाद् धर्म इत्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः।। (महाभारत) 
और धर्म का ज्ञान वेद से मिलता है- धर्मशास्त्रकार कहता है, " जो अनुभव इन्द्रियजन्य नहीं हैं उसी ज्ञान के लिए वेद प्रमाण हैं "- 
धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः।। 
जो व्यक्ति धर्म को जानना चाहते हैं, उन्हें यथार्थ ज्ञान वेद के चार महावाक्यों का 'श्रवण -मनन -निदिध्यासन' करने से प्राप्त हो सकता है। क्योंकि वेद के चार महावाक्य ज्ञान ईश्वरीय ज्ञान है, और ईश्वर सर्वज्ञ होने से उसके ज्ञान में भ्रान्ति अथवा अधूरापन नहीं है। वेद से भिन्न जो मतवालों के ग्रन्थ हैं, वे बहुत बाद के हैं और वे मनुष्यकृत हैं। उनमें परस्पर विरोधी, सृष्टिक्रम से विरुद्ध (बातें हैं) तथा वे मानवीय घटनाओं से ओत-प्रेत हैं। 
 धर्मविषयक किसी भी प्रकार की जिज्ञासा होने पर श्रुति ही सर्वोत्कृष्ट प्रमाण माना जाता है, श्रुति अर्थात् वेदों के उपरान्त ही स्मृतिग्रन्थों अर्थात् गीताजी आदि का स्थान आता है। उसके उपरान्त शिष्टाचार अर्थात् शिष्ट जनों के आचरण को तीसरा प्रमाण माना गया है। हिन्दू यानी वेदों को सर्वोपरि मानने वाला......स्वयं ईश्वर भी आकर कुछ वेद-विरुद्ध बोलें, (राजनीति में भाग लेने के लिये स्वयं विवेकानन्द भी दुबारा आकर कहें?) तो हम उन्हें पूजते हैं, लेकिन उनकी बात नहीं मानते.... इसलिये हम हिन्दु भगवान् बुद्ध को अवतार मानते हैं, उन्हें पूजते भी हैं, लेकिन जितने अंश में उनका विरोध वेदों से हैं, उतने अंश में हम उन्हें अस्वीकार करते हैं। 
इन्द्रियों के अनुभव से आने वाला ज्ञान जो भी हो वह मिथ्या ही हे। एसी स्थिति में जो मिथ्या नहीं हे ऐसा ज्ञान वेद हमें देता हे। उदहारण देखे तो 'अर्थ और काम' से मन को तृप्ति होती हे और आनंद मिलता हे। लेकिन वेद कहता हे इससे भी बड़ा आनंद, भूमानन्द, ब्रह्मानंद. परमानंद इत्यादि हे !इसलिए सर्वप्रथम जीवन व्यवस्थित करने लिये चार आश्रम या पड़ाव (आश्रम कभी पर्मानेन्ट नहीँ होता है इसलिए जीवन के किसी भी पड़ाव में निर्धारित समय से अधिक रुकना नहीँ चाहिए) ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास। इस जीवनचर्या से काम, क्रोध, मोह व माया आदि समयानुसार स्वयं समाप्त हो जाते हैं। 
वर्ण और आश्रम। वर्ण का आधार मनुष्य की प्रकृति अथवा उसकी मूल प्रवृत्तियाँ हैं, जिसके अनुसार वह जीवन में अपने प्रयत्नों और कर्तव्यों का चुनाव करता है। आश्रम का आधार संस्कृति अथवा व्यक्तिजत जीवन का संस्कार करना है। मनुष्य जन्मना अनगढ़ और असंस्कृत होता है; क्रमश: संस्कार से वह प्रबुद्ध और सुसंस्कृत बन जाता है। सम्पूर्ण जीवन को सौ वर्षों का मान कर २५- २५ वर्षों के चार भाग बना दिये हैं। प्रथम पच्चीस वर्ष 3H के विकास के लिये - अर्थात शरीर (Hand), मन (Head), और हृदय (Heart) के विकास के लिए रखे गये हैं। इस आश्रम का नाम ब्रह्मचर्य है। इन वर्षों में युवक या युवती को संयमित जीवन बिताकर आने वाले सांसारिक जीवन के उपयुक्त शक्ति- संचय करना चाहिये। विद्यार्थी जीवन में ही शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों को सुसमन्वित ढंग से विकसित करके वह पूरी तरह चरित्रवान्, संयमी दृढ़ निश्चयी न बने, तब तक उसे गृहस्थ -जीवन में प्रविष्ठ नहीं होना चाहिए। व्यवसायिक दक्षता प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य पूरे परिश्रम और लगन से २५ वर्ष तक विद्या प्राप्त करके तप जाये। 
                                   सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः सुखम्। 
                                   सुखार्थी वा त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत्सुखम्।।
सुख भोगने की इच्छा करने वाले को विद्या कहां?  और विद्या पढ़ने वाले को सुख कहां?  क्योंकि विषयसुखार्थी विद्या को और विद्यार्थी विषयसुख को छोड़ दे।

युवावस्था में ही चरित्र-निर्माण और विवेक-प्रयोग आदि (५ अभ्यास) की पद्धति सीख लेने से  मनुष्य आगे आने वाले जीवन के लिए मजबूत बन जाता है। वह  श्रेय-प्रेय या अच्छाइयों, बुराइयों या सत्य-असत्य और मिथ्या में विवेक-प्रयोग करना सीखकर,अपने परिवार,समाज और देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने योग्य बन जाता है।
युगपरिवर्तन मनुष्य के विचार-जगत में होता है : 
ब्रह्मचर्य: मन की एकाग्रता के लिए स्वामीजी ब्रह्मचर्य की साधना आवश्यक मानते थे। वे प्राचीन भारतीय गुरुकुल प्रणाली के पक्षधर थे जिस में शिक्षा को मूल्य लेकर बेचा नहीं जाता था। विद्यार्थी गुरुगृह में निःशुल्क निवास करते थे। मोक्ष, भ्रम-मुक्ति,डीहिप्नोटाइज्ड मनुष्य, निर्झर का स्वप्न भंग,निर्वाण, परमानन्द, प्रभू-साक्षात्कार के लिये ब्रह्मचर्य (वीर्यरक्षण-स्वाध्याय (सद्ग्रंथों का अध्ययन)- ईश्वरप्रणिधान (आधुनिक युग में ब्रह्म के अवतार श्रीरामकृष्ण पर एकाग्रता का अभ्यास) अनिवार्य शर्त है। 
ब्रह्मचर्य वर्णाश्रम का पहला आश्रम भी है, जिसके अनुसार ये 0-25 वर्ष तक की आयु का होता है और जिस आश्रम का पालन करते हुए विद्यार्थियों को भावी जीवन के लिये शिक्षा ग्रहण करनी होती है। जैसा कि ऊपर बताया गया है कि ब्रहम का अर्थ ज्ञान भी है, अतः ब्रह्मचारी को ब्रह्मचर्य , अर्थात ज्ञान प्राप्ति के लिए जीवन बिताना चाहिये। विद्यार्थी के लिये ज्ञान ही ब्रह्म तुल्य है, पूर्ण तन्मयता से ज्ञान की प्राप्ति करना ही उसका मुख्य उद्देश्य होता है। उसे ब्रह्म चिंतन के साथ पूर्ण लगन से अपने ज्ञान का अर्जन करना होता है। ब्रह्मचर्य का पालन करने से उसकी बुद्धि तीव्र होती है, उसकी स्मरण शक्ति तीव्र होती है, चहेरे पर ओज, तेज होता है। यदि यज्ञ वेदों के कर्मकाण्ड का आधार है ता निश्चित रूप से ब्रह्मचर्य, ज्ञानकाण्ड का आधार है। संस्कृत का शब्द ब्रह्मचारी है जो कि कामजित् शब्द का पर्याय है (वह जिसका उसके कामवेग पर पूरा नियन्त्रण है)। जीवन का हमारा लक्ष्य मोक्ष है वह ब्रह्मचर्य या पूर्ण संयम के बिना कैसे पाया जा सकता है?
ब्रह्मचर्य विषय पर स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा है कि ईश्वर को पाने के एकमात्र लक्ष्य के साथ, मैंने स्वयं बारह वर्ष तक अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन किया है। उससे मानो कि एक पर्दा सा मेरे मस्तिष्क से हट गया है। इसलिए मुझे अब दर्शन जैसे सूक्ष्म विषय पर भाषण देने के लिए भी ज्यादा तैयारी करना या सोचना नहीं पड़ता। मान लो कि मुझे कल व्याख्यान देना है, जो भी मुझे बोलना होगा वह मेरी आँखों के सामने कई चित्रों की तरह आज रात को गुजर जाता है और अगले दिन मैं वही सब, जो मैंने देखा था, शब्दों में व्यक्त कर देता हूँ। जो कोई भी बारह वर्ष के लिए अखंड ब्रह्मचर्य का पालन करेगा, वह निश्चित रूप से इस शक्ति को पायेगा।
एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका का सैट देखकर उनके शिष्य ने कहा, इन सारी किताबों को एक जीवन में पढ़ना लगभग असंभव है। स्वामीजी पहले ही दस खण्ड समाप्त कर चुके थे, अतः स्वामीजी ने कहा इन दस खण्डों में से जो चाहो पूछ लो, और मैं तुम्हें सबका उत्तर दूँगा। स्वामीजी ने न सिर्फ भाव को यथावत् बताया, बल्कि हर खण्ड से चुने गये कठिन विषयों की मूल भाषा तक कई स्थानों पर दुहरा दी। शिष्य स्तब्ध हो गया, उसने किताबें एक तरफ रख दीं, यह कहते हुए कि, यह मनुष्य की शक्ति के अन्दर नहीं है!
 ब्रह्मचर्य से सारी लक्षणहीनताएँ (यानी व्याधियाँ, विकार तथा कमियाँ) नष्ट हो जाती हैँ। ब्रह्मचर्य के ऐसे महान् अभ्यास को कम कैसे आँक सकते हैं। यह तो दो-तीन दिन में ही अपनी महिमा चेहरे पे प्रकट करने लगता है, इस संयम के जाते ही तो तत्काल मन खुद को दुत्कारने लगता है, दरअसल हम सभी ब्रह्मचर्य में ही जीना चाहते हैं, लेकिन हम अपने हारमोनों से हारे रहते हैं और उस अच्छी अवस्था को बचाकर नहीं रख पाते जिसमें हममें उत्तम उत्साह था।
 श्रीमद् भागवत पुराण में ब्रह्मचर्य का बड़ा स्पष्ट प्रतिपादन है, उसके 11 वाँ स्कन्ध, 17 वें अध्याय में 25 वाँ श्लोक आता है- रेतो नावकिरेज्जातु ब्रह्मव्रतधरः स्वयं। अवकीर्णेऽवगाह्याप्सु यतासुस्त्रिपदां जपेत् ॥ अर्थ - ब्रह्मचर्य व्रत धारे हुए व्यक्ति को चाहिये कि अपना वीर्य (रेतस) स्वयं कभी भी न गँवाए। और यदि वीर्य कभी (अपने आप) बाहर आ ही जाये तो ब्रह्मचर्य व्रतधारी को चाहिये कि वह पानी में अवगाहन करे (यानी नहाये) और थोड़ा प्राणायाम करके गायत्री मन्त्र का जाप करे।
 जैसा कि विवेकानन्द जी ने कहा है कि केवल 12 वर्ष तक अखण्ड ब्रह्मचर्य से अद्भूत शक्ति प्राप्त होती है। ब्रह्मचारी को स्त्रीयों के रूप लावण्य का ध्यान नहीं करना चाहिये तथा उसके गुण, स्वरूप और सुख का भी वर्णन नहीं करना चाहिये, उनसे दूर रहना चाहिये उनके साथ कोई खेल आदि नहीं खेलना चाहिये उनकी और काम-दृष्टि से बार-बार नहीं देखना चाहिये, नजर जाये तो हटा लेनी चाहिये, एकान्त में किसी स्त्री के साथ नहीं रहना चाहिये, उनके मोह-जाल से दूर रहना चाहिये। एक शब्द में यही है कि अपने उद्देश्य परमानन्द की प्राप्ति को पल-पल ध्यान में रखते हुए विषय-विकार से दूर रहने के अभ्यास को प्रगाढ़ करना चाहिये।ब्रह्मचर्य से ही ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने की योग्यता प्राप्त होती है। - पिप्पलाद ब्रह्मचर्य और अहिंसा शारीरिक तप है - योगिराज कृष्ण ब्रह्मचर्य के पालन से आत्मबल प्राप्त होता है - पतंजलि ब्रह्मचर्य व्रत धारण करने वालों को मोक्ष मिलता है- सनत्सुजातमुनि जो मनुष्य ब्रह्मचारी नहीं उसको कभी सिद्धि नहीं होती ।अकाल मृत्यु से बचने के लिये ब्रह्मचर्य पालन आवश्यक है।तेषामेवैष स्वर्गलोको येषां तपो ब्रहचर्य येषु सत्यं प्रतिष्ठिम्। - प्रश्नोपनिषद उन्हीं जनों को स्वर्ग-सुख मिलता है, जिन्होंने ब्रह्मचर्य तप का पालन किया है और जिनके हृदय में ब्रह्मचर्य रूपी सत्य विराजमान है।शंकाराचार्य जीने कहा है कि जो विषयों में लिप्त है वह बंधा हुआ है तथा जो विषयों से अलिप्त है वह मुक्त है।
जो विषय-विकार में लिप्त है वह ब्रह्मचारी हो ही नहीं सकता। क्योंकि जिस समय वह विषय-विकार से ग्रस्त होगा उस समय वह ब्रह्म से दूर होगा या उसे भूला होगा। ब्रह्मचर्य दो शब्दों ब्रह्म व चर्य के योग से बना है।  ब्रह्म के भिन्न-भिन्न स्थानों पर अनेक अर्थ होते हैं जैसे ईश्वर, वेद, वीर्य, मोक्ष, धर्म, गुरू, सुख, सत्य, ज्ञान। और चर्य का अर्थ है - चिन्तन, अध्ययन, रक्षण, विवेचन, सेवा, ध्येय, साधना और कार्य आदि। ब्रह्मचर्य की महिमा 'ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां, वीर्य लाभो भवत्यपि, सुरत्वं मानवो याति, चान्ते याति परां गतिम्। भावार्थः ब्रह्मचर्य का पालन करने से वीर्य का लाभ होता है, ब्रह्मचर्य की रक्षा करने वाले मनुष्य को दिव्यता प्राप्त होती है और साधना पूरी होने पर परमगति (मोक्ष) भी उसे मिलती है। विषय-विकार (इन्द्रियों के भोग व काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह आदि) मिटाओ पाप हरो देवा। अर्थात् मुक्ति/मोक्ष/निर्वाण के लिये विषय-विकार से मुक्त होना व निष्पाप होना अनिवार्य शर्त है। ब्रहर्मचर्य सच्चरित्रता का प्राण-स्वरूप है, इसका पालन करता हुआ मनुष्य, सुपूजित लोगो में भी पूजा जाता है। प्रश्नोपनिषद में एक कथा है कि कबन्धी और कात्यायन ब्रह्मज्ञान की शिक्षा के लिये ऋषिवर पिप्पलाद के आश्रम में गये और उनसे ब्रह्मज्ञान देने के लिये निवेदन किया। पिप्पलाद ने कहा कि आप दोनों एक वर्ष तक नियमानुसार ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए हमारे पास रहें, उसके पश्चात् जो प्रश्न चाहोगे पूछ लेना हम भी यथाशक्ति तुम लोगो को समझायेंगे। अर्थात गुरू से आत्म/ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति के लिये ब्रह्मचर्य आवश्यक है। अथर्ववेद में कहा गया है किः - आचार्या ब्रह्मचर्येण, ब्रह्मचारिणमिच्छते। अर्थात् जो ब्रह्मचर्य का पालन करता है ऐसा गुरू ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले शिष्यों का हित कर सकता है कामी गुरू नहीं। जैसा कि रामकृष्ण परमहंस जी ने कहा है जहां काम है वहां राम नहीं। अर्थात् ब्रह्चर्य का पालन करने अथवा पालन करने का अभ्यास करने वाले शिष्यों को ही मंजिल प्राप्त हो सकती है अन्यों को नहीं। भगवान शंकर का वचन - न तपस्तप इन्याहुर्बह्मचर्य तपोत्तमम्। उर्ध्वरेता भवेद्यस्तु से देवो न तु मानुषः।। तप कुछ भी नहीं है, ब्रहचर्य ही उत्तम तप है, जिसने अपने वीर्य को वश में कर लिया है वह देव स्वरूप है, मनुष्य नहीं।शंकाराचार्य जी ने कहा है कि ऋत ज्ञानान्न मुक्तिः, अर्थात् ब्रह्मज्ञान के बिना किसी की मुक्ति नहीं हो सकती शंकाराचार्य जीने कहा है कि जो विषयों में लिप्त है वह बंधा हुआ है तथा जो विषयों से अलिप्त है वह मुक्त है। पत्नी के लिये पति ही ब्रह्म है, उस के साथ नियमानुकूल आचरण करना ही ब्रह्मचर्य है। सती सुकन्या ने वन में तपस्या कर महर्षि च्यवन की भ्रमवश उनकी दोनों आंखें फोड़ दी थी, अतः उनके पिता ने इसके प्रायश्चित स्वरूप सुकन्या को च्यवन की सेवा के लिये समर्पित कर दिया। सुकन्या महर्षि च्यवन की पूर्ण लग्न से सेवा करती रही। अश्विनी कुमार ने उसे अपने वश में करने के लिये बहुत से प्रलोभन दिये लेकिन सुकन्या का मन ब्रह्मचर्य से जरा भी नहीं डिगा। अतः में अश्विनी कुमार ने प्रसन्न होकर च्यवन को अपने औषधापचार से अत्यन्त सुन्दर युवक बना दिया।
शंकराचार्यजी ने कुमारिल भट्ट से अवैदिक धर्म का खंडन और सनातन धर्म के मण्डन की दक्षिणा मांगी थी, जिसे उन्होंने जीवन भर पालन कर दिखलाया, जिसकी संक्षेप में कथा इस तरह से हैः- कुमारिल भट्ट जी ने गृहस्थ होते हुए भी अपना पूरा जीवन ब्रह्मचर्य में ही व्यतीत कर दिया, ऐसी महान विभूतियों को उनकी पत्नि भी ब्रह्चारिणी स्वरूप ही मिलती है। विवाहोपरान्त उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि प्रिय हम अभी गृहस्थ जीवन जीना नहीं चाहते हैं, हम पहले वेदों का भाष्य पूरा करना चाहते हैं, उसक पश्चात् ही हम इस बारे में सोच सकते हैं। उनकी पत्नी भी महान थी, उसने पति आज्ञा को दिल से स्वीकारा। भाष्य पूरा करते करते ही उनके कुछ बाल सफेद हो गये, तब उन्होंने अपनी पत्नि से किया हुआ वादा पूरा करने के लिये कहा, तब उनकी पत्नी ने कहा कि है स्वामी जब हम इतने समय तक ब्रह्मचर्य में रहें हैं तो अब क्यों अपना ब्रह्मचर्य के नियम को तोड़ें। इस पर दोनों ही ने प्रसन्न थे तथा कुमारिल भट्ट जी ने अपना शेष जीवन धर्म प्रचार में ही लगाया। उपरोक्त से स्पष्ट है कि गृहस्थ में रहते हुए भी ब्रह्मचर्य का पालन किया जा सकता है, यदि पति-पत्नि दोनों ही धार्मिक हों, अन्यथा दोनों में से कोई भी एक भ्रष्ट होगा तो ब्रह्मचर्य का पालन गृहस्थ में संभव नहीं है।
 ब्रह्मचर्य का अर्थ है शुद्धता । यह यौन गतिविधियों में भोग को नियंत्रित करने के लिए इंद्रियों पर नियंत्रण का अभ्यास के लिए है । जो अविवाहित हैं, उन जैन श्रावको के लिए, विवाह से पहले यौनाचार से दूर रहना अनिवार्य है । सारांश ब्रह्मचर्य के पालन से अपूर्व बल, बुद्धि, स्मृति, तेज, ओज व शक्ति आदि की प्राप्ति होती है। बौद्ध धर्म व जैन धर्म की दृष्टि से शुद्ध व पवित्र जीवन ही ब्रह्मचर्य है, जैसा कि दोनों महापुरूषों के जीवन में काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह का एक भी लक्षण नहीं था, दोनों ही अत्यंत पवित्र थे। इनके अनुसार अनासक्त पवित्र जीवन ही ब्रह्मचर्य है। इसी प्रकार बहुत से अन्य धर्मों/मतों में प्रभू का ध्यान करते हुए, उसे हर पल याद रखते हुए सत्मार्ग पर चलना, विषय-विकार से मुक्त होकर निष्पाप जीवन व्यतीत करना या ऐसा जीवन व्यतीत करने का दृढ़ता से अभ्यास करना ही ब्रह्मचर्य है, क्योंकि जिस समय कोई बुरा कर्म करता है, उस समय वह प्रभू को भूला हुआ रहता है। ब्रह्मचर्य के बिना भ्रम -मुक्ति/मोक्ष अथवा प्रभू साक्षात्कार सम्भव नहीं है। 
ब्रह्मचर्य से गृहस्थ-आश्रम में परिवर्तन का तात्पर्य उसके मन में धीरे- धीरे आने वाला मानसिक परिवर्तन भी है। धीरे- धीरे मानसिक परिपक्वता आती है और अगला आश्रम आसान बनता जाता है। चुनाव और सोचने के लिए भी पर्याप्त अवकाश प्राप्त हो जाता है।  धर्माचरण द्वारा गृहस्थ जीवन के सुख प्राप्त कर सकते हैं,  धर्म, अर्थ, काम मोक्ष, आदि चारों का सुख भोग करने का विधान है। उम्र ढलने पर सांसारिक कार्यों से हटना चाहिए। लेकिन इस पृथकता में समय लगता है। धीरे- धीरे भौतिक जीवन की लालच को कम करना होता है,आवश्यकताएँ कमी करनी होती है। अतः ५० से ७५ वर्ष तक की आयु से गृहस्थ भार से मुक्त होकर जन- सेवा या लोकशिक्षक बनने और बनाने का विधान है। इसे वानप्रस्थ कहा गया है। गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों से मुक्ति पाना मनुष्य का मानसिक स्थिति के लिए परम उपयोगी है। पारमार्थिक जीवन के लिए पर्याप्त समय निकल आता है। वानप्रस्थ का अर्थ यह भी है कि घर पर रहते हुए ही मनुष्य ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करे, संयम का अभ्यास करे, बच्चों को विद्या पढ़ायें, फिर धीरे- धीरे अपनी जिम्मेदारी अपने बच्चों पर डालकर बाहर निकल जाये। 
  ऐसा भी हो सकता है कि कुछ देश-प्रेमी और उपकारी व्यक्तियों में समाज का मार्गदर्शन करने के लिये गृहस्थ आश्रम में न जाकर, ब्रह्मचर्य से सीधा वानप्रस्थ में जाकर संन्यास लेने की पात्रता रखते हों। धर्म- प्रचार और ध्यान-समाधि द्वारा ईश्वरोपलब्धि के लिये पथ- प्रदर्शन का कार्य जगतगुरु श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त शिक्षक -प्रशिक्षण परम्परा' में प्रशिक्षित, पूर्ण परिपक्व, पूर्णताप्राप्त, ब्रह्मवेत्ता योग्यतम संन्यासियों के हाथों में ही रहता है। रामकृष्ण मिशन के संन्यासी गण, इसके साथ साथ जनता के हित के लिए शिक्षा, चिकित्सा, अनाथालय, बाढ़-आकाल में राहत पहुँचाने जैसे  कई प्रकार के सार्वजनिक कार्य करते हैं। जिससे समाज उन्नति की दिशा में आगे बढ़ता है।
लीडरशिप ट्रेनिंग : द्वैत से अद्वैत की ओर : नेता का जन्म हो : और उसकी निन्दा न कर, यह कह सके - ' हे स्वप्रकाशक, ज्योतिर्मय, (अरे शम्भुआ!, ओ रामप्रसाद!), उठो ! अपने आत्मस्वरूप को प्रकाशित करो। तुम जिन क्षुद्र भावों में आबद्ध पड़े हो, (अपने को साढ़े तीन हाथ का स्त्री-पुरुष शरीर मात्र समझ रहे हो, वे तुम्हें नहीं सोहते। अतएव यदि हम अद्वैतवादी हैं, तो हमें यह मानना होगा कि हमारा 'मैं-पन' (मिथ्या व्यक्तित्व-क्षुद्र अहं) इसी क्षण से मृत है। फिर मैं स्त्री हूँ या पुरुष हूँ , अमुक अमुक हूँ. यह सब भाव नहीं रह जाता। ये अन्धविश्वास मात्र थे, और शेष रहता है वही नित्यशुद्ध, नित्य ओजस्वरूप, सर्वशक्तिमान सर्वज्ञ-स्वरुप, और तब हमारा सारा भय चला जाता है। ( नेता वही हो सकता है जो अकाम है, इसीलिये वह अभय और ओजस्वरूप बन जाता है, क्योंकि कामना और स्वार्थ से ही भय की उत्पत्ति होती है।) कौन इस 'सर्वव्यापी-मैं-पन' का अनिष्ट कर सकता है ? इस प्रकार हमारी सम्पूर्ण दुर्बलता चली जाती है।   
तब दूसरों में भी उसी शक्ति (आध्यात्मिक शक्ति) को उद्दीप्त करना हमारा (लोकशिक्षक या वैष्णव-जन या नेता का) एकमात्र कार्य (कर्तव्य या धर्म) हो जाता है। हम देखते हैं (नहीं दर्शन करते हैं ?) कि वे भी यही आत्मस्वरूप हैं ! किन्तु वे इस बात को नहीं जानते। अतएव उनके इस आत्मस्वरूप के प्रकाशनार्थ, हमें उनकी सहायता करनी होगी, उन्हें मनुष्य बनने और बनाने की शिक्षा (मैन मेकिंग एण्ड कैरेक्टर बिल्डिंग एजुकेशन) देनी होगी ! मैं देखता हूँ कि जगत में इसी मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा के प्रचार-प्रसार की सबसे अधिक आवश्यकता है। ऋषियों के द्वारा आविष्कृत सभी सत्य (वेदों के चार महावाक्य) सनातन हैं। सत्य ही सब आत्माओं का यथार्थ स्वरुप है। किसी व्यक्तिविशेष का उस पर विशेष अधिकार नहीं है। किन्तु हमें उसे व्यावहारिक और सरल बनाना होगा। क्योंकि 'हाइएस्ट ट्रुथ्स आर वेरी सिम्पल' - उच्चतम सत्य 'प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है' समझने में अत्यन्त सहज और सरल होते हैं। जिससे यह आत्मश्रद्धा का भाव समाज के हर रंध्र में व्याप्त हो जाय, उच्चतम मस्तिष्क से लेकर अत्यन्त साधारण मन द्वारा भी (नचिकेता की कहानी, डकैत द्वारा जहाँ बावन वहीँ तिरपन की कथा के माध्यम से) समझा जा सके। तथा अबाल-वृद्ध-वनिता सभी उसे जान सकें। 
न्याय-शास्त्र के ये कूट विचार, दार्शनिक मीमांसायें, ये सब मतवाद और क्रिया-काण्ड -इन सब ने किसी समय भले ही उपकार किया हो, किन्तु आओ, हम सब आज से -इसी क्षण से धर्म को (अर्थात चरित्रनिर्माण और मनुष्य निर्माणकारी शिक्षा को), सहज-सुलभ बनाने की चेष्टा करें। और इस चरित्र-निर्माणकारी आंदोलन 'BE AND MAKE ' के द्वारा उस सत्ययुग को पुनर्स्थापित करने में सहायता करें - 'जब प्रत्येक मनुष्य एक उपासक (वर्शिपर) होगा और उसमें अन्तर्निहित सत्यता ही उसकी उपासना का विषय (ऑब्जेक्ट ऑफ़ वर्शिप) होगा। " व्यव० जी० में वेदान्त-८/ ६० -६३]        श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त प्रशिक्षण परम्परा में हजारों की संख्या में ब्रह्मविद मनुष्य (क्षात्रवीर्य और ब्रह्मतेज से समन्वित, भ्रम-मुक्त, डीहिप्नोटाइज्ड मनुष्य) बनने और बनाने वाले आन्दोलन -'BE AND MAKE' को ही महामण्डल में "लीडरशिप ट्रेनिंग" कहा जाता है !
जैसे ही योगी को अपने अंदर की परमात्मसत्ता की अनुभूति हुई- अपने आसपास के संपूर्ण संसार के लिए महान प्रेम का सागर उसके अंदर से उमड़ने लगता है। वह उस दिव्य सामंजस्य की अनुभूति करने लगता है, जिसमें अब द्वैत नहीं रहा- अद्वैत स्थापित हो जाता है। साधक- सविता एक- भक्त एक- एकत्व दोनों का- यह हमारी गुरुसत्ता का ध्यान का निर्देश सार्थक होने लगता है। अपना अहं भूल गया, राग- द्वेष से मुक्त हो गया, ऐसा साधक सार्वभौमिक दृष्टि पाकर दिव्यकर्मी बन जाता है- सच्चा ध्यानयोगी बन जाता है। वह जब आत्मा को बाहर देखता है, तो वह केवल सर्वव्यापी परमात्मा के ही दर्शन करता है एवं अहं द्वारा अनुभूति में आनेवाला यह सारा संसार सिमटकर उसकी आत्मसत्ता- अर्थात परमसत्ता में विलीन हो जाता है (सर्वं च मयि पश्यति)। एक अनन्त विराट रूपी परमात्मा की उसे समग्र- संपूर्ण अनुभूति होने लगती है। और उसमें लोकशिक्षक या मानवजाति का मार्गदर्शक नेता अर्थात वैष्णव-जन बनने और बनाने का प्रशिक्षण देने की पात्रता प्राप्त हो जाती है। 
" आह ! कितना शान्तिपूर्ण  हो जाता है, उस व्यक्ति का कर्म जो मनुष्य की ईश्वरता से सचमुच अवगत हो जाता है। ऐसे व्यक्ति के लिये कुछ भी करना शेष नहीं रह जाता, सिवाय इसके कि वह लोगों की आँख खोलता रहे। शेष सब अपने आप हो जाता है।  उनको (मानवजाति के सच्चे मार्गदर्शक नेता भगवान श्रीरामकृष्ण परमहंस देव को) वह महान जीवन (नेता का जीवन) जीने मात्र में ही सन्तोष था। अवतार वरिष्ठ द्वारा प्राचीन गुरु-शिष्य वेदान्त प्रशिक्षण परम्परा में लीडरशिप ट्रेनिंग पद्धति की व्याख्या का कार्य उन्होंने दूसरों पर (भावी लोकशिक्षकों ....स्वामी विवेकानन्द, नवनी दा....... पर) छोड़ दिया था। ८/१२७  
" संघर्ष (साम्प्रदायिक हिंसा आदि) को विकास की चिन्ह मानना तुम्हारी भारी भूल है। बात ऐसी कदापि नहीं है। आत्मसात्करण ही उसका चिन्ह है। हिन्दु धर्म आत्मसात्करण की प्रतिभा का ही नाम है। हमने संघर्ष की चिन्ता कभी नहीं की। निश्चय ही हम कभी कभी अपनी घर की रक्षा के लिये प्रहार भी कर सकते थे; (पानीपत में तीन लड़ाइयाँ लड़ कर हार जाने और गुलाम बन जाने के बदले लाहौर में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक पहले भी कर सकते थे।) वैसा करना ठीक भी होता। पर हमने कभी भी संघर्ष के लिये संघर्ष की ओर ध्यान नहीं दिया। प्रत्येक को (हिन्दू-मुस्लिम दोनों को) यह पाठ सीखना पड़ा। अतः ये नवागन्तुक जातियाँ (कश्मीरी टेरेरिस्ट) चक्कर काटती रहें ! अन्त में वे सब हिन्दू धर्म में समाहित हो जायेंगी। " ८/१३१] 
" मैं उन सभी (कट्टरपन्थी सम्प्रदायों )से असहमत हूँ, जो अपने ही अन्धविश्वासों को हमारी जनता के ऊपर लाद रहे हैं। जिस प्रकार मिस्र के आर्कियॉलॉजिस्ट को मिस्रदेश के ममी -पिरामिड के सम्बन्ध में रूचि रहती है, उसी प्रकार भारत के सम्बन्ध में भी नितान्त स्वार्थपूर्ण रूचि रखना सरल है। कोई भी अपनी पुस्तकों का, अपने अध्यन का अथवा अपने स्वप्नों का भारत पुनः देखने की आकांक्षा रख सकता है। किन्तु मेरी आकांक्षा, इस युग के सबल पक्षों द्वारा परिपुष्ट उस भारत के सबल पक्षों को केवल एक स्वाभाविक रूप में देखने की है। नए उत्थान को भीतर से ही विकसित होना चाहिये। 
इसलिये मैं केवल उपनिषदों की शिक्षा देता हूँ। ... उपनिषदों से भी केवल बल का आदर्श। वेद और वेदान्त का समस्त सार तथा अन्य सबकुछ इस एक शब्द में ही निहित है। बुद्ध ने अप्रतिरोध और अहिंसा की शिक्षा दी। (पूज्य नवनी दा ने अविरोध की !) लेकिन मेरे विचार से यह उसी बात की अधिक श्रेयस्कर ढंग की शिक्षा है। कारण यह है की (कायरों की) अहिंसा के पीछे एक भयंकर दुर्बलता (द्वैत) रहती है। इसी दुर्बलता से प्रतिरोध का विचार जन्म लेता है। मैं सागर के उत्ताल तरंगों की एक बूँद को भी न तो दण्ड देने की बात सोंचता हूँ और न उससे पलायन करने की। यह मेरे लिये कुछ नहीं है। किन्तु मच्छर के लिये वह बूँद एक गंभीर विषय होगा। अब मैं समस्त हिंसा को उसी प्रकार बना दूंगा। बल और अभय ! मेरा आदर्श तो वह सन्त है जो विद्रोह में मारा गया, और जब उसके हृदय में छुरा भोंका गया, तब उसने केवल यह कहने के लिए अपना मौन भंग किया -'और तू भी 'वही' है ! 
किन्तु तुम पूछ सकते हो,  इस योजना में (वैष्णवजन बनो और बनाओ योजना में) भगवान श्रीरामकृष्ण परमहंस देव का क्या स्थान है ? ' वे तो स्वयं एक प्रणाली हैं -आश्चर्यजनक अज्ञात प्रणाली ! किन्तु स्वयं इस बात से अनभिज्ञ। वे दूसरों से पूछते थे मुझमें अहं है या नहीं ? उन्होंने अपने को अवतार जानते हुए भी कभी उसका गर्व नहीं किया। उन्होंने इंग्लैण्ड या अंग्रेजों के विषय में कुछ नहीं जाना, सिवा इसके कि अंग्रेज समुद्र पार के विचित्र लोग हैं। किन्तु उन्होंने एक महान जीवन जिया और मैंने उसका अर्थ समझा। किसीके लिये कभी निन्दा का एक शब्द भी नहीं ! एक बार मैं अपने यहाँ के एक पैशाचिक संप्रदाय की निन्दा कर रहा था। मैं तीन घण्टे तक बड़बड़ाता रहा, और वे चुपचाप सुनते रहे। जब मैंने कहना समाप्त कर लिया, तब उन्होंने कहा , " अच्छा ठीक है। पर शायद प्रत्येक घर में एक पिछला दरवाजा भी होता है। कौन जाने?" ८/१३२ 
 स्वामी विवेकानन्द कहते हैं (मननशील मनुष्य बनने के विषय में) " वेदान्ती कहते हैं, इस समस्त प्रतीयमान अशुभ का कारण है-असीम (प्रेम-हृदय) का सीमाबद्ध हो जाना। (अर्थात आत्मा होकर भी अपने को बॉडी-माइंड कम्प्लेक्स या भेंड़ समझने लगना।) जो असीम प्रेम सीमाबद्ध होकर क्षुद्रभावपन्न जाता है (अर्थात अपने को मात्र क्षुद्र साढ़े तीन हाथ का मरणधर्मा शरीर समझने लगता है), तथा अशुभ प्रतीत होता है; वही प्रेम फिर अपनी चरमावस्था (अनन्त विस्तार की अवस्था) में स्वयं को ईश्वर के रूप में प्रकाशित करता है।" (3H) का विकास शरीर, मन और हृदय का विकास हमें स्वयं करना पड़ता, चरित्रवान मनुष्य के रूप में विकसित होने की प्रक्रिया-एक सेल्फ-डेवलपमेंट स्किम है। 
"वेदान्त कहता है, दूसरे की सहायता से हमारा कुछ नहीं हो सकता। हम रेशम के कीड़े के समान हैं। अपने ही शरीर से स्वयं जाला बुनकर उसीमें आबद्ध हो गए हैं। किन्तु यह बद्ध भाव चिरकाल के लिये नहीं है। हमलोग इस ककून से तितली के सामान बाहर निकलकर मुक्त हो जायेंगे। हम लोग स्वयं अपने चारों ओर इस कर्मजाल को लगा लेते हैं, और अज्ञानवश सोचने लगते हैं कि हम बद्ध हैं (भेंड़ हैं), और सहायता के लिये रोते चिल्लाते हैं। किन्तु बाहर से कोई सहायता नहीं मिलती, सहायता मिलती है भीतर (आत्मा) से। भ्रान्तिवश (हिप्नोटाइज्ड अवस्था में) इतने दिनों तक जो अनेक प्रकार के कार्य करता रहा, उस भ्रान्ति को मुझे ही दूर करना पड़ा। यही एकमात्र उपाय है। " 
" यदि हजारों साल से इस कमरे में अँधेरा रहे और तुम कमरे में आकर ' हाय ! बड़ा अँधेरा है ! बड़ा अँधेरा है' कहकर रोते रहो, तो क्या अँधेरा चला जायेगा ? कभी नहीं। एक दियासलाई जलाते ही कमरा प्रकाशित हो उठेगा। अतएव 'मैंने जीवन भर बहुत दोष किये हैं, मैंने बहुत अन्याय किया है' यही सोचते रहने से क्या तुम्हारा कुछ भी उपकार हो सकेगा ? हममें बहुत से दोष है, यह किसी को बतलाना नहीं पड़ता। ज्ञानाग्नि प्रज्वलित करो, एक क्षण में सब अशुभ चला जायेगा। अपने यथार्थ स्वरुप को पहचानो, यथार्थ 'मैं' को - उसी ज्योतिस्वरूप उज्ज्वल, नित्यशुद्ध 'मैं ' को, प्रकाशित करो-प्रत्येक व्यक्ति में उसी आत्मा को जगाओ। मैं चाहता हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति ऐसी दशा में आ जाये कि अति क्रूर पशु मानव को देखकर भी वह उसकी बाह्य दुर्बलताओं की ओर दृष्टिपात न करे, बल्कि उसके हृदय में रहने वाले भगवान (श्रीरामकृष्ण बनने की सम्भावना) को 'देख' सके-नहीं 'दर्शन' कर सके ! 
आज इस वर्णाश्रम धर्म-व्यवस्था और प्राचीन गुरु-शिष्य वेदान्त प्रशिक्षण परम्परा में गड़बड़ी आ गई थी। इस कारण तपे हुए लोकशिक्षक के रूप में अनुभवी गृहस्थ कार्यकर्त्ता समाज को नहीं मिल रहे थे।कुछ तथाकथित टी०वी० उपदेशकों, और प्रचारकों में भी कामिनी-कांचन के प्रति आसक्ति, अर्थ-काम का मोह या प्रसिद्धि का मोह बना हुआ दिखाई देता था। यह आश्रमों की परम्परा जब तक हमारे देश में जीवित रही तब तक यश, श्री और सौभाग्य में यह राष्ट्र सर्व शिरोमणि बना रहा । श्रेय और प्रेय का इतना सुन्दर सामंजस्य किसी अन्य जाति या धर्म में मिलना कठिन है। हमारी कल्पना है कि मनुष्य आनंद में जन्म लेता है। आनंद से जीवित रहता और अन्त में आनंद में ही विलीन हो जाता है। मनुष्य का लक्ष्य भी यही है। इन आवश्यकता की पूर्ति आश्रम व्यवस्था में ही सन्निहित है। 
 कुमारिल के अनुसार मनुष्य दो प्रकार से समाज के योग्य-उपयुक्त चरित्रवान  बनता है : (१). पूर्व जन्म के कर्म के दोषों को दूर करने से और (२). इस जन्म में नए सत्  गुणों के विकास से। संस्कारों के द्वारा मनुष्य अपनी सहज प्रवृतियों का पूर्ण विकास करके अपना और समाज दोनों का कल्याण होता है। संस्कार केवल वर्तमान ही नहीं अपितु अगले जन्मों-पारलौकिक जीवन को भी पवित्र बनाते हैं। 

महामण्डल अपने 'BE AND MAKE' आन्दोलन के द्वारा 'रामकृष्ण -विवेकानन्द वेदान्त लीडरशिप प्रशिक्षण परम्परा' में प्रशिक्षित, चरित्रनिर्माण और मनुष्य-निर्माण का प्रशिक्षण देने में समर्थ लोकशिक्षकों का निर्माण करने के कार्य में विगत ५० वर्षों से लगा हुआ है। यह महामण्डल आन्दोलन 'श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त प्रशिक्षण-परम्परा (tradition) में भावी लोकशिक्षकों, वुड बी लीडर्स या वैष्णव-जन *४/ का निर्माण करने वाला आन्दोलन है। वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीर पराई जाणे रे । अर्थात सही मायने में विष्णु-भक्त, लोकशिक्षक या नेता वही है - जो अपने और किसी अनजाने-मनुष्य की, दोनों की 'हिप्नोटाइज्ड अवस्था' में रहने की पीड़ा को अपने हृदय में केवल एक बार नहीं महसूस करे, बल्कि जो निरन्तर महसूस करता रहता हो; और उसे तह दिल से दूर करने की कोशिश करता हो। ३२ वर्षों तक (१९८५-२०१७) महामण्डल आन्दोलन से जुड़े रहने के बाद "अब ये समझ में जफर के आया, जो कुछ है सो तू ही है !
दूषितोऽपि चरेद् धर्मं यत्र तत्राऽऽश्रमे रतः।
समः सर्वेषु भूतेषु न लिङ्गं धर्मकारणम्।। 
किसी लोकशिक्षक को चाहे वह किसी भी आश्रम में क्यों न रखा गया हो, उसे लोगों के द्वारा दोषारोपण किए जाने पर भी, (सौ-सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज करने ' - जैसे व्यंग्यबाणों को सुनकर भी ?) धर्म को पुनर्रस्थपित करने स्थापित करने के कार्य में लगे रहना चाहिये। अर्थात 'मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा' या 'BE AND MAKE' के प्रचार-प्रसार कार्य में लगे रहना चाहिये। और 'समः सर्वेषु भूतेषु ' सब प्राणियों पर समभाव रखे। अर्थात अपने गृहस्थ-आश्रम के लोकशिक्षकों (नेता या वैष्णव-जन) के नियमों का पालन करते हुए यह ध्यान रखे कि, 'दण्ड कमण्डलु गेरुए वस्त्र' या 'दाढ़ी-टोपी' ,पगड़ी, जनेऊ,या हाथों में बंधा लाला कलेवा,आदि चिह्न ही धार्मिक या चरित्रवान मनुष्य होने प्रमाण नहीं हैं।
दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
सत्यपूतां वदेद्वाचं मनःपूतं समाचरेत्।।१।।
जब कोई लोकशिक्षक या मानवजाति का मार्गदर्शक नेता मार्ग में चले तब इधर-उधर न देख कर नीचे पृथिवी पर दृष्टि रख के चले। सदा वस्त्र से छान कर जल पीये, निरन्तर सत्य ही बोले, सर्वदा मन से विचार के सत्य का ग्रहण कर असत्य को छोड़ देवे। महाभारत के -उद्योगपर्व-विदुरनीति में कहा है -
पुरुषा बहवो राजन् सततं प्रियवादिनः।
अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः।। 
हे धृतराष्ट्र ! इस संसार में दूसरे को निरन्तर प्रसन्न करने के लिये प्रिय बोलने वाले प्रशंसक (चाटुकार) लोग बहुत हैं। परन्तु सुनने में भले अप्रिय लगता हो किन्तु वह कल्याण करनेवाला वचन हो - ऐसे वचनों को कहने और सुननेवाला पुरुष दुर्लभ है। इसलिये जबतक कोई सत्पुरुष दूसरों के मुख से अपने दोष नहीं सुनता वा कहने वाला नहीं कहता, तब तक मनुष्य दोषों से छूटकर गुणी नहीं हो सकता। इसलिये किसी के चरित्र में कुछ दोष हों, तो उसके सामने कहें, ताकि वह उसे सुधार ले।  किन्तु पीठपीछे किसी की निन्दा न करें न सुने। 
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।
 सब काम पुरुषार्थ से ही सिद्ध होते हैं, केवल मनोरथ से नहीं। जैसे सोए हुए सिंह के मुख में हिरण अपने आप प्रविष्ट नहीं हो जाता।
वज्रादपि कठोरापि मृदूनि कुसुमादपि ।
लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विज्ञातुमर्हति ॥
- भवभूति
 द्वै विद्ये वेदितब्ये :  'अर्थात मनुष्य को जानने योग्य दो विद्याएं हैं-परा और अपरा। उनमें चारों वेदों के शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष- ये सब 'अपरा' विद्या हैं तथा जिससे वह अविनाशी परब्रह्म तत्व से जाना जाता है, वही 'परा' विद्या है।' वेदाङ्ग किसको कहते हैं ? उत्तर: शिक्षा , कल्प , व्याकरण , निरुक्त , ज्योतिष तथा छन्द ये वेद के छः अङ्ग हैं । छन्द को वेदों का पाद, कल्प को हाथ, ज्योतिष को नेत्र, निरुक्त को कान, शिक्षा को नाक और व्याकरण को मुख कहा गया है। वेद मन्त्रों के उच्चारण के लिये प्रयुक्त होने वाले उदात्त - अनुदात्त - स्वरित स्वरों के नियमों का वर्णन जिसमें हो उसे 'शिक्षा' कहते हैं । जिसमें वैदिक मंत्रों के ऋषि देवता छन्दों के साथ साथ यज्ञादिक एवं संस्कारों की विधि तथा प्रयोगों का निर्देशन हो उसे 'कल्प' कहते हैं । साध्य , साधन , कर्त्ता , कर्म , क्रिया , समासादि का निरुपण एवं शब्द के व्युत्पादन तथा भाषा के नियमों का वर्णन जिसमें हो उसे 'व्याकरण' कहते हैं । पद निर्वाचन अर्थात् शब्दों के अर्थ करने को प्रणाली का वर्णन जिसमें हो उसे 'निरुक्त' कहते हैं। जिसमें ग्रह , नक्षत्र उनकी गति एवं काल गणना का वर्णन है वह 'ज्योतिष' है । लौकिक वैदिक पदों के यति विराम आदि को व्यवस्थित करने का वर्णन जिसमें हो उसे 'छन्द' कहते हैं । छन्द दो प्रकार के होते हैं । लौकिक तथा वैदिक , मात्रा छन्द व वर्ण छन्द । वेद के अन्तिम भाग अर्थात् आखिरी ब्रह्मविद्या विषय वेदान्त 'उपनिषद' कहते हैं । जिसमें ब्रह्मविद्या का निरुपण हो । वैदिक विधि वाक्यों द्वारा जिनकी कर्तव्यता का ज्ञान हो, जिसमें अभ्युदय तथा श्रेयस सिद्धि हो - उसे 'धर्म' कहते हैं। 
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‘सा विद्या या विमुक्तये’

बॉन्डेज ऐंड लिबरेशन: स्वामी विवेकानन्द ने प्रचलित शिक्षा को 'निषेधात्मक शिक्षा' की संज्ञा देते हुए कहा है कि " आप उस व्यक्ति को शिक्षित मानते हैं जिसने कुछ परीक्षाएं उत्तीर्ण कर ली हों तथा जो अच्छे भाषण दे सकता हो, पर वास्तविकता यह है कि जो शिक्षा जनसाधारण को जीवन संघर्ष के लिए तैयार नहीं करती, जो चरित्र निर्माण नहीं करती, जो समाज सेवा की भावना विकसित नहीं करती तथा जो सिंह जैसा साहस पैदा नहीं कर सकती, वह शिक्षा भी कोई शिक्षा है, ऐसी शिक्षा से क्या लाभ? उन्होंने कहा है कि 'हमें ऐसी शिक्षा चाहिए, जिससे चरित्र का गठन हो, मन का बल बढ़े, बुद्धि का विकास हो और व्यक्ति स्वावलम्बी बने।' 
स्वामी विवेकानन्द धर्म को शिक्षा का मेरुदण्ड कहते थे। उनका मानना था कि प्रत्येक व्यक्ति में 'ज्ञान' का वास होता है; और शिक्षा उसको प्रकाश में लाने का कार्य करती है। धर्म का मानव जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। धर्म अर्थात चरित्र से हीन मनुष्य पशु होता है। धर्म का अर्थ है- ' विवेक ' या मननशीलता। यह विवेक ही मनुष्य को 'सत-असत' का निर्णय करने में सक्षम-'निर्णायक बुद्धि ' प्रदान करता है। तभी तो विवेकी मनुष्य, क्या अच्छा है, और क्या बुराहै, समझ-बूझ कर इसका निर्णय कर सकता है। किन्तु साधारण अर्थों में जिसे अच्छा और बुरा (आंवला-इमली का अंतर) समझा जाता है, सदसत-विवेक का अर्थ भी ठीक उतना ही नहीं है। 'सत ' का अर्थ है-जो अविनाशी हो या चिरस्थायी हो (सत्य-वस्तु)। 'असत' का अर्थ है क्षणभंगुर या नश्वर (मिथ्या-वस्तु)। कौन सी वस्तु सत (अविनाशी) है, और कौन सी वस्तु असत (नश्वर) है- जो प्राणी चिन्तन करके इस बात को जान सकता है, उसी को मननशील जीव कहा जाता है। वैदिक निरुक्तकार यास्क-मुनि मनुष्य को परिभाषित करते हुए कहते हैं- " जो व्यक्ति कुछ भी सोचने-बोलने-करने के पहले थोड़ा रुककर, 'विवेक-प्रयोग' करने के बाद ही कोई कार्य करता है, उसको ही मनुष्य कहा जाता है।"
[स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [17] ' स्वामी विवेकानन्द तथा आज के हमलोग '(स्वामी विवेकानन्द और युवा समाज)] 
संस्कृत में नीतिकार कहते हैं-‘धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः।’ अर्थात् मनुष्यों और पशुओं में आहार, निद्रा, मैथुन तथा भयभीत होना, ये सब समान होते हैं परन्तु धर्माचरण अर्थात सुन्दर चरित्र ही मनुष्य में विशेष गुण है जिसके कारण वह पशुओं से भिन्न होता है। 
येषां न विद्या न तपो न दानं , ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ।
 ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः , मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥
जिसके पास न विद्या है, न तप है, न दान है , न ज्ञान है , न शील है , न गुण है और न धर्म है ; वे मृत्युलोक पृथ्वी पर भार होते है और मनुष्य रूप तो हैं पर पशु की तरह चरते हैं (जीवन व्यतीत करते हैं )।चरित्र ही मनुष्‍य के जीवन को शोभा (रौनक) प्रदान करता है। मनुष्य के लिये चरित्र एक ऐसी दौलत है जिसे अपने पास रखने वाला व्यक्ति कैसी ही हालत में क्यों न हो, वह समाज के बीच गौरव और प्रतिष्‍ठा पाता ही है। चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना किसी महान सभ्‍यता का प्रधान अंग है। किसी भी राष्ट्र की सच्‍ची उन्नति तभी होगी जब उस देश का हर एक आदमी अपने को चरित्र संपन्‍न और भलमनसाहत की कसौटी में कसे हुए मनुष्य के रूप में प्रगट कर सकते हों।
निरूक्तकार आचार्य यास्क मुनि अपने निरुक्त में पशु की परिभाषा देते हुए कहते है-" पश्यति इति पशुः"  अर्थात जो देखता है वो पशु है। और सभी देखते हैं, इसलिये क्या सभी पशु हैं ? तो फिर मनुष्य और पशु में अन्तर कहाँ है ? यास्क मुनि - 'मनुष्यः कस्मात्' अर्थात मनुष्य कौन है ? के उत्तर में कहते है-  'मत्वा (कर्माणि) सिव्यति इति मनुष्यः’ (३/८/२) अर्थात् मनुष्य तभी मनुष्य है जब वह किसी भी कर्म को चिन्तन तथा मनन पूर्वक करता है। मनुष्य विचारपूर्वक देखता है तथा करता है-मत्वा कर्माणि सीव्यति’ क्योंकि मनुष्य एक चिन्तनशील प्राणी है। पशु केवल नेत्रों से देखता है- वह विचार नहीं कर सकता। 'मनसा सीव्यति इति मनुष्यः' - अर्थात मन से जो सी ले, सम्बन्ध जोड़ ले वह मनुष्य होता है।' अतः मनुष्य वही है जो अपने समस्त कर्त्वय कर्मों को 'विवेक-प्रयोग ' करने के बाद ही करे। इतना सारा समय इन्द्रियजगत में, मन की कल्पनाओं को देखने (पश्यति पशुः) में चला जाये तो मनुष्य जीवन का अनर्थ हुआ। मनुष्य को एकाग्रता के अभ्यास के साथ-साथ निरंतर विवेक-प्रयोग भी करते रहना चाहिये।
मनुष्य व पशु शब्दों की व्याख्या करते हुए कहा जाता है कि ‘मनुते इति मनुष्यः’ अर्थात मनन करके कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले व्यक्ति को मनुष्य कहा जाता है। "मोक्तुम इच्छा मुमुक्षा " मुमुक्षा अर्थात मोक्ष की इच्छा छूटने की इच्छा यह "मोक्षेच्छा जिस मनुष्य मे रहती हैं उसका नाम है "मुमुक्षा।" मनुष्य दो हाथ, दो पैर व वाणी वाला व्यक्तित्त्व है। उसमें चिंतनशीलता है।  बार-बार मनन यानी सोच-विचार करते हैं वे ही वास्तव में मनुष्य होते हैं। यह, 'अहं ब्रह्मासि'  आदि वेदान्त के महावाक्यों पर 'श्रवण-मनन -निदिध्यासन ' की प्रवृत्ति ही मनुष्यता की परिचायक है। यही मनुष्य होने का लक्षण है। अन्यथा मनुष्य भी उस पशु के समान ही है जो केवल देखता है और बिना चिन्तन मनन के विषय में प्रवृत्त हो जाता है।
पशु परम् सत्य या ईश्वर की खोज नहीं कर सकता, परन्तु मनुष्य किसी भी वस्तु की सत्यता को खोजने या आविष्कृत करने की चेष्टा करता है। और जब कोई मनुष्य देश-काल -निमित्त से परे इन्द्रियातीत परमसत्य या ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है तब वह 'ऋषि' (अध्यात्म -वैज्ञानिक) बन जाता है।  यास्क मुनि के निरुक्त मे ऋषि का निर्वचन इस प्रकार है-‘ऋषिः दर्शनात् !' (निरुक्त 2/11) इस निरुक्त से ॠषि का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है- दर्शन करने वाला, तत्वों की साक्षात अपरोक्ष अनुभूति रखने वाला विशिष्ट पुरुष। ऋषिगण त्रिकालज्ञ माने गये हैं। 'ऋषि दर्शनात्', जो साधक भूत और भविष्य को भी वर्तमान के समान ही देख सके । ‘साक्षात्कृतधर्माणः ऋषयो बभूवुः’ किसी मन्त्र विशेष की सहायता से किये जाने पर किसी कर्म से किस प्रकार का फल परिणत होता है, ॠषि को इस तथ्य का पूर्ण ज्ञान होता है। इस विवेचन से यह स्पष्ट है कि वैदिक मन्त्रों के द्रष्टा (कर्ता नहीं) ऋषि कहे गये हैं। सप्तर्षि- सात ऋषियों में मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ की गणना होती है। आकाश में सात तारों के एक समूह विशेष को भी सप्तर्षि कहा जाता है।
यहां दर्शन का अर्थ दिव्य दृष्टि ही है, सामान्य देखना नहीं, सामान्य रूप में तो सभी देखते हैं। दिव्य दृष्टि केवल ऋषि में होती है। ऋषि बिना नेत्रों के ही अन्तः प्रज्ञा से देखता है। ब्रह्म वा अजः ।-(शतपथ० ६/४/४/१५) ब्रह्म ही अजन्मा है। 
अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ।।-(श्वेता० २/१५)
 अजन्मा,ध्रुव,सारे तत्त्वों से अलग परमात्मदेव को ब्रह्मतत्त्वदर्शी जानकर पाशों से छूट जाते हैं।
 ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है! श्रुति कहती है! तुलसीदास जी भी कहते हैं कि " सोइ जानै जेहि देहु जनाई! जानत तुमहि तुमही होइ जाई!! " तुमको जाननेवाला तुम्ही हो जाता है ! स्वामी विवेकानन्द भी कहते हैं कि मानवमात्र के अंदर अनन्त ज्ञान, अनन्त शक्ति अन्तर्निहित है, केवल जीवन मे उसके प्राकट्य की आवश्यकता है ! पारलौकिक दृष्टि से उन्होंने कहा है कि 'शिक्षा मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है।'
भारतीय संस्कृति बौद्धिक है।  बुद्धि के ऊपर निर्भर है। जहां बुद्धि नहीं, वहा मुक्ति नहीं, वहां भारतीय संस्कृति नहीं, वहां धर्म नहीं।  बृहस्पति स्मृति में कहा गया है -
केवलं शास्त्रमाश्रित्य न कर्तव्यो विनिर्णयः।
युक्तिहीन विचारे तु धर्महानिः प्रजायते।
केवल किताबों का, जिनको शास्त्र कहते हैं, सहारा लेकर धर्म तत्त्व का निर्णय नहीं हुआ करता। जहां बुद्धि नहीं है, युक्ति नहीं हैं, ऐसे विचार से धर्म की हानी होती है। चाहे वे हिंदू हों, चाहे मुसलमान हों, चाहे ईसाई हो, धर्म युक्ति पर आधारित नहीं है, वह धर्म कहलाने योग्य नहीं है। भारतीय धर्म बौद्धिक है और युक्ति पर निर्भर है। 
हमारा देश ऋषि-मुनियों का देश है , इसीलिये यह देश अपने आतंरिक तल में बौद्धिक रहा है, बुद्ध का पुजारी रहा है।  बुद्धि के ऊपर उसने किसी किताब को नहीं रखा है- ‘यो बुद्धेः परतस्तु सः.’ बुद्धि के ऊपर केवल ईश्वर को माना है।  ईश्वर के बाद संसार में बुद्धि ही तत्त्व है। कोई भी बुद्धिवादी व्यक्ति, बुद्धि के ऊपर सब पुस्तकों को, ट्रेडिशंस को, नापने-तोलने के लिए तैयार रहता है, यही हमारे यहां प्राचीनों का क्रम था। ऋषि लोग ही भारतीय समाज के पथ प्रदर्शक रहे हैं। जब तक मानव का चरित्र सही नहीं होता तब तक उसे आर्दशवान् नही कहा जा सकता है, एवं सभ्य समाज की कल्पना नहीं का जा सकती है। ऋषि और वैज्ञानिक में अन्तर क्या है? ऋषि सत्य के द्रष्टा हैं। उन्हे अनुमान नही करना है ।  जबकि वैज्ञानिको का ज्ञान निरीक्षण, परीक्षण और निष्कर्ष पर आधारित होता है। यही कारण है कि वैज्ञानिकों का ज्ञान अधूरा रहता है और समय समय पर ये अपनी ही उपस्थापनाओं को बदलते रहते हैं। 
वेदों के ऋषि किसी एक जाति या वर्ण के नही है वरन् समाज के प्रत्येक जाति और वर्ण से हैं। वेद के बहुत से मन्त्रों की ऋषि स्त्रियाँ भी हैं। ऋषि शब्द का अर्थ है-  मन्त्रद्रष्टा, एक अन्तः सफूर्त कवि या मुनि। अर्थात् मन्त्रों का द्रष्टा उनके रहस्यों को समझकर प्रचार करने वाला ऋषि होता है। 
कथा है, जब यास्क मुनि के शरीर छोड़ने का समय आया, तब उनके चेलों ने उनसे पूछा- ‘महाराज, आप जाते हैं, अब वेदों का अर्थ कौन करेगा?’ ध्यान रखिए वेदों का. यास्क मुनि निरुक्त के कर्ता हैं. निरुक्त वह शास्त्र है, जो वेदों के शब्दों को सामने रखता है और उनका अर्थ निकालता है। चेलों ने पूछा- ‘अब आप जा रहे हैं, तब वेदों का अर्थ कौन करेगा? अब हम लोग किस ऋषि के पास जायें?’ 
यास्क ने जवाब दिया- ‘तर्को वै ऋषिरुक्तः।’ इसका क्या अर्थ है? वेदों का अर्थ करने के लिए अब तर्क, लाजिक, सिलोजिज्म- यही ऋषि है। यह वाक्य था कि तर्क ही ऋषि है। तर्क का मतलब बुद्धि, क्योंकि तर्क का सहारा तो बुद्धि के बिना बढ़ता नहीं।  बुद्धि को ही ऋषि बनाना- यह वाक्य हमारे देश की पुरानी परिपाटी को बताता है।  " मैंने तुझे नौका दी थी नदी पार करने के लिए न कि पार होने के बाद सिर पर ढोने के लिए।" बुद्ध की इस उक्ति से उनके तर्क-संगत दर्शन की साफ झलक मिल जाती है। उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण शिक्षा यह थी कि 'सत्य' को पहले तर्क की कसौटी पर परखो, फिर उसमें विश्वास करो। इसे उन्होंने अपनी शिक्षाओं पर भी लागू किया। उन्होंने साफ कहा कि मेरी बात इसलिए नहीं मानो कि मैं स्वयं (बुद्ध) कह रहा हूं, बल्कि 'सत्य हो` तभी मानो। 
श्रीविष्णुपुराण (१-१९-४१) में कहा गया है- ‘सा विद्या या विमुक्तये’ अर्थात ज्ञान वह है जो मुक्त कर दे! 
तत्कर्म यन्न बन्धाय, सा विद्या या विमुक्तये।
 आयासायापरं कर्म, विद्यऽन्या शिल्पनैपुणम्॥ 
कर्म वही है, जो बन्धन में  न डाले (कर्मफल में आसक्त न करे), ज्ञान वह है, जो हमें बन्धनों से मुक्त कर दे (जन्म-मृत्यु के बन्धन या देहाध्यास से भ्रममुक्त कर दे)।  अन्य कर्म 'आयास' (अर्थात व्यर्थ का प्रयास)
श्रम मात्र है, और अन्य विद्याऐं शिल्पकौशल (रोजगारोन्मुख-निपुणता, skill-craftsmanship) मात्र ही हैं।
[सच्चा कर्म वह है जो हमें बन्धन में न डाले, सच्ची विद्या वही है जो  विमुक्त कर दे - कर दे । इस से परे जो कर्म है वह व्यर्थ का श्रम कहलाता है; और इसके परे जो विद्या है वह तो बस 'अथकड़ि विद्या', (रोटी-कपड़ा-मकान कमाने की शिक्षा-craftsmanship)  कारीगरी (आई.टी.आई.) की शिक्षा है।]
 but What is that KNOWLEDGE which Liberates one from bondage ? and where it is taught ? Is it the ‘Brahm-Vidhya’ as per my own belief or something else ?
 स्वामी विवेकानन्द ने अपने गुरुदेव श्रीरामकृष्ण परमहंस से वेदान्त परम्परा में उसे प्राप्त करने की विधि ‘निर्विकल्प समाधि’ की शिक्षा ग्रहण की थी। शिष्य को गुरु का घनिष्ठ सान्निध्य लगभग पाँच वर्ष मिल पाया था। गुरु ने अपने इस प्रिय शिष्य से कहा था, ‘‘तुम्हें तो विशाल वट वृक्ष की तरह होना पड़ेगा जिसकी छाया में समस्त पृथ्वी के मनुष्य शांति लाभ करेंगे।’’  इसीलिये श्रीरामकृष्ण ने योग्य शिष्य को पाकर अपना सारा ज्ञान और तेज उनके हृदय में संचारित कर दिया था। किन्तु वह विद्या या वह 'ज्ञान' है क्या -जो स्वयं को मात्र साढ़े-तीन हाँथ का शरीर मानने के देहाध्यास या भ्रम से विमुक्त कर देता है ?  
वह 'ब्रह्म-ज्ञान' [विवेकज-ज्ञान या विवेक-प्रयोग से उत्पन्न ज्ञान] है क्या - जो मानवमात्र को मन की गुलामी से, जन्म-मृत्यु के बन्धनों से आजाद करने में सक्षम है? इसे समझने के लिये पहले हमें यह समझना होगा कि 'बन्धन' क्या है ? ऐंड व्हाट इज दैट पॉवर ऑफ़ बॉन्डेज व्हिच बाइंडस ईवन ऑल माइटी ब्रह्म ? किन्तु वह बन्धन-कारी शक्ति (अविद्या-माया) क्या है जो सर्व-शक्तिमान ब्रह्म को भी बन्धन में डाल देती है ?  तथा वह 'ब्रह्म-विद्या' (विवेक-प्रयोग के लिये मनःसंयोग का प्रशिक्षण) सिखाई कहाँ जाती है, -- जो किसी 'सिंह-शावक' को भेंड़त्व के मिथ्या 'मैं-पन' से डीहिप्नोटाइज्डकरके सदा के लिये "भ्रममुक्त" कर देता है ? बट व्हाट इज दैट दैट नॉलेज व्हिच लिब्रेट्स वन फ्रॉम बॉन्डेज ! 
चरित्रवान मनुष्य बनने के लिये,जीवन की सफलता के लिए, प्रत्येक कर्म अत्यन्त सावधान होकर  करना पड़ता है, यथा – मैं क्या देखूॅं, क्या न देखूॅं, क्या सुनॅूं, क्या न सुनूॅं, क्या जानूँ, क्या न जानूॅं, क्या करुॅं अथवा क्या न करूॅं। 'लस्ट और लूकर ' या वासना और धन में आसक्त (कामातुर) मनुष्य का मन उसके वश में नहीं रहता। उसकी विवेक-प्रयोग शक्ति नष्ट-भ्रष्ट हो जाती है। पशु-मानव भी श्रेय-प्रेय, सत-असत, उचित -अनुचित का भेदभाव नहीं कर सकते। राष्ट्र की सम्पत्ति और अपनी ईमानदारी से कमाई हुई सम्पत्ति में भेदभाव नहीं करते, इसी कारण उन्हें पशु (समान पश्यति इति पशु) कहते हैं। और दोनों को समान समझ कर, सरकारी पद का दुरूपयोग करते हुए भ्रष्टाचारी बन जाते हैं। और अन्त में जेल जाना पड़ता ही है। 
राजा पश्यति चाराभ्यां बुद्धया पश्यन्ति पण्डिता:।
पशु: पश्यति गन्धेन हृदा पश्यन्ति साधव:॥
राजा गुप्तचरों की नज़रों से देखता है। पंडित लोग बुद्धि से देखते हैं। पशु गंध से देख लेता है और साधु-महात्मा हृदय की दृष्टि से देखते हैं।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। 
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥ गीता ६/३० 
‘‘जो योगी पुरुष (यः) मुझ परमेश्वर को (मां) सभी ओर (सर्वत्र) देखते हैं (पश्यति), समस्त भूतों को (सर्वं) मुझ में ही (च मयि) देखते हैं (पश्यति), मैं- परमेश्वर (अहं) उनके लिए (तस्य) अदृश्य नहीं होता (न प्रणश्यति) और वह भी (स च) मेरे लिये (मे) अदृश्य नहीं होते (न प्रणश्यति)।’’ 
भावार्थ फिर से एक बार- ‘‘जो योगी संपूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ श्री कृष्ण (जो राम जो कृष्ण वही श्रीरामकृष्ण परमहंस देव, वेदान्त की दृष्टि से नहीं -साक्षात् !) - परमात्मा को ही संव्याप्त देखता है और संपूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अन्तर्गत ही देखता है (अध्याय ९ श्लोक ६) उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता और न ही वह मेरे लिए अदृश्य होता है।’’ 
ऐसी ब्राह्मी स्थिति में पहुँचने के बाद योगी का जीवन के प्रति दृष्टिकोण आमूलचूल बदल जाता है। अब उसे दिव्य ब्रह्म के सिवाय और कुछ दिखाई नहीं देता। पशु- पक्षी जगत- प्रकृति के अंग- अवयव सभी सिवाय मेरे अर्थात परमात्मा के ही अंश दिखाई देते हैं (डीप इकॉलाजी की मूल अवधारणा)। यह अनुभूति क्षणमात्र के लिए नहीं होती- यह तो एकात्मता वाली स्थिति है। फिर ऐसा साधक भगवान से कभी विलग नहीं होता (तस्याहं न प्रणश्यामि) और न परमात्मा ही उससे कभी पृथक होता है (स च मे न प्रणश्यति)। यह एक प्रकार से ज्ञानी का- कर्मयोगी का- भक्तियोगी साधक का नया जन्म है- अपने आपके बारे में नूतन जागृति है और विकास का एक नया आयाम खुल चुका है जा उसे पूर्णत्व की ओर ले जा रहा है।   
वेदाहमेतमजरं पुराणं सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात् । 
जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनो प्रवदन्ति नित्यम् ।।-(श्वेता० ३/२१) 
मैं उस ब्रह्म को जानता हूं जो पुराना है और अजर है। सबका आत्मा और विभु होने से सर्वगत है। ब्रह्मवादी जिसके जन्म का अभाव बतलाते हैं क्योंकि वह नित्य है।
(मनुष्य )शब्द का अर्थ है "मनु की संतान "मनु की पत्नी थी" श्रध्दा "जो श्रध्दा और मनन दोनो को लेकर सृष्टि में अवतीर्ण हुआ है वह मनुष्य है । दूसरी ओर चौपाया पशु है उसका नाम ही पशु इसलिये है कि ‘पश्यते प्रतिक्रियते इति पशुः’ देखने पर प्रतिक्रिया करने वाला चौपाया पशु है इसलिये मनुष्य की मनन करने की क्षमता का आदर कीजिये उसे मनुवाद (वर्णाश्रम व्यवस्था) की काल्पनिक शत्रुता का आधार मत बनाइये। 
हम लोग जब कहते हैं - यह चद्दर हमारी... यह लोटा -थाली हमारी... यह पैन्ट हमारी.... यह टाई हमारी....। उस समय विवेक पूर्वक हमें यह देखना चाहिये यदि मेरा यथार्थ स्वरूप चेतन आत्मा है, जड़ शरीर नहीं है, तो आत्मा के लिए अपना कहने योग्य परमात्मा (श्रीरामकृष्ण देव) के अतिरिक्त और कौन हो सकता है ? जब शरीर से जुडी वस्तुओं को हम अपना कह सकते हैं तो उस परमात्मा (ठाकुर-माँ-स्वामीजी) को अपना बनाने में हमारा क्या जाता है? वास्तव में परमात्मा के सिवाय और कुछ हमारा है ही नहीं। लेकिन शाश्वत चैतन्य से उत्पन्न होने के कारण मन में ऐसा कुछ चमत्कार है कि वह जैसा सोचता है वैसा सत्य ही भासता है। सत्यस्वरूप आत्मा की शक्ति से ही मन फुरता है। हमलोग जैसा सोचते हैं वैसा सत्य भासने लगता है। भोग की नज़र से देखेंगे तो जगत भोगने के लिए है ऐसा लगेगा। लेकिन संसार के स्वामी को पहचानने के लिए विचित्र परिस्थितियों से पसार होकर अंतिम लक्ष्य तक पहुँचाने की पाठशाला की नजर से संसार को देखेंगे तो उसमें हमलोग उत्तीर्ण होते जायेंगे। हमलोग जब सोचें कि जगत में दुःख है, पीड़ा है, मुसीबत है तो जगत बिल्कुल ऐसा ही लगेगा। हमसे यदि कोई ऊँचा दिखता है तो हमें अपने को सिकोड़ कर नीचा नहीं बना लेना चाहिये। वैसे ही यदि कोई हमसे ज्ञान में, समझ में छोटा दिखता है तो अकड़ नहीं जाना चाहिये। वह छोटा दर्जे का विद्यार्थी है। ऐसा समझना चाहिये, पढ़ते-पढ़ते, ठोकर खाते-खाते वह भी एक दिन पास हो जायेगा। जो मनुष्य जैसे ऊँचे तक, ब्रह्म तक पहुँचा हुआ है वहाँ एक दिन मैं भी पहुँच जाऊँगा। बड़े को देखकर ईर्ष्या और छोटे को देखकर घृणा नहीं होना चाहिए। जो बड़े में है वही का छोटे में छुपा है और मुझमें भी वही का वही है।
अणोरणीयान् महतोमहीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् ।
                    तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमात्मनः ।।-(कठ० 2/20)
अर्थ:-ब्रह्म सूक्ष्म से भी अत्यन्त सूक्ष्म है,बड़े से भी बड़ा है। वह प्राणी के ह्रदयाकाश में स्थित है।उसकी महिमा को बुद्धि के निर्मल होने से निष्काम शोक रहित प्राणी देखता है। 
                                   अशरीरं शरीरेषु अनवस्थेष्ववस्थितम् ।
                                 महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ।।-(कठोप० १/२/२२)
वह परमात्मा लोगों के शरीर में रहते हुए भी स्वयं शरीर-रहित है। बदलने वाली वस्तुओं में एकरस (न बदलने वाला) है। उस महान् विभु आत्मा को जानकर धीर पुरुष शोकमुक्त (भ्रममुक्त) हो जाता है। 
श्रुति कहती है - सभी प्राणियों में मनुष्य ही सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि वह अपने बनाने वाले ब्रह्म को भी जान सकता है। 'ब्रह्मविद ब्रह्मैव भवति!' ब्रह्म जिसे जानकर या; जिसे प्राप्त कर के 'सिंह-शावक' भेंड़त्व के भ्रम से मुक्त हो जाता है ? यह अध्यास क्या है ? यह अध्यास अविद्या का कार्य है। अविद्या से स्वत: कोई नुकसान नही है। नुकसान तो वस्तुत: अध्यास से है। विद्या से अविद्या हट जाती है और फलस्वरूप अध्यास भी। अविद्या के नष्ट होने के बाद भी, नाम रूपात्मक जगत् रहता ही है क्योंकि यह सत् है। अंतर बस इतना है कि मुक्त जीव इसमें नानात्व नहीं देखता। वह इसमें अब्रह्मत्व या असर्वात्मत्व नहीं देखता। वह जगत् और अपने में कोई भेद नहीं देखता। वह जीव, जगत और ब्रह्म को एक ही वस्तु देखता है। 
कार्य दृष्टि से देखा गया जगत् अविद्या कल्पित और भ्रम है जैसे कि रज्जु में सर्प या शुक्तिका में रजत। रज्जु-सर्प, शुक्तिका-रजत, द्वि-चंद्र आदि दृष्टांतों का उद्देश्य कार्य कारणत्व बताना नहीं है बल्कि नामरूपात्मक जगत के अब्रह्मप्रत्ययत्व को हटाना है।  वही जगत् कारण दृष्टि से देखने पर ब्रह्म है। इस प्रकार दोष दृष्टि में है, जगत् में नहीं। जगत् काल्पनिक नहीं है। जगत् का अब्रह्मत्व और असर्वात्मत्व काल्पनिक और अविद्याकल्पित है। इस प्रकार, अविद्याकल्पित का वास्तविक अर्थ यह है कि वस्तु ब्रह्म से भिन्न जान पड़ती है। 
यह अब्रह्मप्रत्यय रज्जु में सर्प के समान है। ‘जिसमें जो नहीं है, उसमें वह है’ ऐसी बुद्धि अध्यास है।  रस्सी ही सर्प के समान, शुक्ति ही रजत के समान अवभासित होती है तथा एक चंद्रमा ही दूसरे के साथ मालूम पड़ता है । अध्यास को ही पंडित अविद्या मानते हैं, और विवेक करके वस्तुस्वरूप के निर्धारण को विद्या कहते हैं । आत्मा मे देह के धर्मों का अध्यास करके कहता है- ‘मैं मोटा हूँ’ ‘मैं पतला हूँ’ ‘मैं गोरा हूँ’ ‘मैं खड़ा हूँ’ ‘मैं जाता हूँ’ ‘मैं लांघता हूँ’। इसी प्रकार इंद्रियों के धर्मों का अध्यास करके कहता है कि ‘मैं गूंगा हूँ’ ‘मैं काना हूँ’ ‘मैं नपुंसक हूँ’ ‘मैं बहरा हूँ’ ‘मैं अंधा हूँ’। इसी प्रकार काम, संकल्प, संशय, निश्चय आदि अंत:करण के धर्मों का आत्मा में अध्यास करते हैं। इस अध्यास का समूल नाश करने के लिए अर्थात् आत्मैकत्व विद्या कि प्राप्ति के लिए सभी वेदान्त प्रारम्भ किए जाते हैं।
[जहाँ-जहाँ जीवन है वहाँ-वहाँ विवेकयुक्त जीवन (जाग्रत Soul) भी हो यह ज़रूरी नहीं। जन्म-वृद्धि-जरा-मृत्यु,  ह्रास -विकास अहंयुक्त जीवन (Life) के लक्षण हैं, शाश्वत आत्मजीवन के नहीं। आत्मा एक ब्रह्माण्डीय अस्तित्व (Cosmic Existence) है जबकि जीवन एक व्यक्तिगत अस्तित्व (Individual Existence) है। आत्मा वहीं है जहाँ कर्म भोग है और कर्म भोग वही हैं जहाँ विवेक (Wisdom) है। पशु आदि में विवेक नहीं है, अतः वहां जाग्रत आत्मा नहीं है। आत्मा नहीं है तो कर्म फल भोग भी नहीं है। पशु और वनस्पतियों में कोई व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं होता। अतः उसकी हत्या को जीव हत्या नहीं कहा जा सकता। जब पशु आदि में जीव (Soul) ही नहीं है, तो जीव-हत्या कैसी ? पशु आदि में सिर्फ और सिर्फ जीवन है, जीव नहीं। अतः पशु-पक्षी आदि के प्रयोजन हेतु उपयोग को हिंसा नहीं कहा जा सकता।]
यास्क मुनि पदार्थों के छ: विकारों (षड् भाव-विकारों) का उल्लेख करते हुए कहते हैं - ( रेतो रक्त प्रसूतम्) माता पिता के शुक्र शोणित रूप धातुओं से उत्पन्न (जड़म्) स्वभाव से ही जड़ तथा (अशनेन चितम्) अन्नादिकों के भक्षण से वृद्ध अर्थात् बढ़ने वाला- छः विकारों वाला (षड् विकारम्) उत्पत्ति आदि छः विकारों (त्वक् अस्थि स्नायु क्रव्य अन्त्र मज्जा) के सहित ‘जायतेऽस्ति वर्द्धते विपरिणमते पचीयते विनश्यतिच' ....जायते अस्ति वर्द्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, विनश्यति। जो उत्पन्न होता है, स्थित है, बढ़ता है, बदलता है, क्षीण होता है और नाश हो जाता है, वह तू नहीं है।’ ये छः बातें अनुभव में नहीं होती हैं। अनुभव अपने आत्मा का ही स्वरूप है और एकरस है। चाहे कितना भी परिवर्तन हो, शरीर बदल जायगा, मन बदल जायगा, पाप-पुण्य बदल जायगा, राग-द्वेष बदल जायगा, हृास-विकास होता रहेगा। और ये जो आत्मदेव हैं- सर्वदा एकरस, सन्मात्र, चिन्मात्र, आनन्दमात्र रहते हैं।
जन्म है, बीमारी है, बुढ़ापा है, मृत्यु है—सभी देह के हैं। देह के साथ तादात्म है तो देह की सारी पीड़ाओं के साथ भी तादात्‍म्‍य है। जब देह जराजीर्ण होती है तो हम सोचते हैं, मैं जराजीर्ण हो गया। जब देह बीमार होती है तो हम सोचते हैं, मैं बीमार हो गया। जब देह मरण के निकट पहुंचती है तो हम घबड़ाते हैं कि मैं मरा। मान्यता—सिर्फ मान्यता! ऋषि अष्टावक्र जी कहते हैं - 
देहाभिमानपाशेन चिरं बद्धोऽसि पुत्रक । 
          बोधोऽहं ज्ञानखंगेन तन्निष्कृत्य सुखी भव । 1-14.
अष्टावक्र ने कहा, ‘हे पुत्र! तू बहुत काल से देहाभिमान के पाश में बंधा हुआ है। उस पाश को मैं बोध हूं, इस ज्ञान की तलवार से काट कर तू सुखी हो!’
 मैं देह हूं ! मैं देह हूं !! मैं देह हूं !!! ...... ऐसा जन्मों—जन्मों तक पुनः पुनः दोहराया है; दोहराने के कारण हम देह हो गये हैं। देह हम हैं नहीं; यह हमारा अभ्यास है, हमारी आदत परिपक्व होकर प्रवृत्ति बन गयी है। हमने इतनी प्रगाढ़ता से माना है कि हम हो गये हैं। मैं शरीर हूं, यह जन्मों—जन्मों से मानी हुई बात है; मान ली तो हम शरीर हो गये। मान ली तो हम क्षुद्र हो गये। मान ली तो हम सीमित हो गये। यह हमारा अभ्यास है, और यही अविद्या माया या 'आत्मसम्मोहन' है, सिंहशावक का हिप्नोटाइज्ड हो जाना है, 'आटोहिप्नोसिस' है। 
तुम शरीर हो नहीं गये हो, तुम शरीर हो नहीं सकते हो। इसका कोई उपाय ही नहीं है। जो तुम नहीं हो, वह कैसे हो सकते हो? जो तुम हो, तुम अभी भी वही हो। सिर्फ झूठी मान्यता को काट डालना है। 'ज्ञानखंगेन तत् निष्कृत्य त्वं सुखी भव!' उस पाश को, मैं बोध हूं, इस ज्ञान की तलवार से काटकर तू अभी सुखी हो जा।’   
आमतौर पर जब कोई व्यक्ति किसी एक योगमार्ग से लक्ष्य तक पहुंच जाता है- 'ब्रह्म' को जान लेता है या आत्मसाक्षात्कार कर लेता है; तब फिर वह दूसरे योग-मार्गों की साधना करना आवश्यक नहीं समझता! जैसे कोई व्यक्ति सीमेन्ट की सीढ़ियों से चढ़ कर पहाड़ की चोटी पर पहुंच जाये; तो फिर दूसरी पगडंडियों से भी चोटी पर चढ़ा जा सकता है, या नहीं ? इस बात की फ़िक्र कौन फिक्र करता है— पहुंच ही गये। जो पक्की सीढ़ी चोटी तक ले आई, ले आई; बाकी लाती हों न लाती हों, प्रयोजन किसे है! लेकिन भगवान श्री रामकृष्ण देव ऐसे साधक थे जो विभिन्न योग-मार्गों के सहारे बार—बार पहाड़ की चोटी पर पहुंचे, फिर—फिर नीचे उतर आये। फिर दूसरे मार्ग से चढ़े। फिर तीसरे मार्ग से चढ़े। 
वे पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने सभी धर्मों की साधना की और सभी धर्मों से उसी शिखर को पा लिया। सर्वधर्म समन्वय की बात बहुत से लोग कहते थे, किन्तु श्री रामकृष्ण ने ही सर्व-प्रथम धर्म-समन्वय का विज्ञान निर्मित किया। बहुत से लोगों ने कहा था, सभी धर्म सच हैं; लेकिन वह केवल मुख से कहने की बात थी—उनका अपना अनुभव नहीं था। रामकृष्ण ने उस मार्ग को तथ्य बनाया; उस मार्ग की साधना के अनुभव पर बल दिया; अपने जीवन से प्रमाणित किया। जब वे इस्लाम की साधना करते थे तो वे ठीक मुसलमान फकीर हो गये। वे काली -काली कहना भूल गये; नमाज पढ़ने लगे, अल्लाह के ९९ नामों का जप  करन लगे; कुरान की आयतें सुनने लगे। एक मस्जिद के द्वार पर ही पड़े रहते थे। मंदिर के पास से निकल जाते, उधर आंख भी न उठाते। 
छह महीने तक उन्होंने सखी—संप्रदाय के राधा भाव की साधना की थी। तीन महीने के बाद उनके स्तन उभर आये; उनकी आवाज बदल गई; वे स्त्रियों जैसे चलने लगे, स्त्रियों जैसी उनकी मधुर वाणी हो गई। स्तन उभर आये, स्त्रियों जैसे स्तन हो गये ! शरीर का पुरुष—ढांचा बदलने लगा। एक मान्यता कि मैं स्त्री हूं—यह मान्यता इतनी प्रगाढ़ता से की गई, यह भाव इतने गहरे तक गुंजाया गया, यह रोएं—रोएं में, कण—कण में शरीर के गुंजने लगा कि मैं स्त्री हूं! इसका विपरीत भाव न रहा। पुरुष की बात ही भूल गई। तो घटना घट गई। छह महीने पूरे होते—होते उनको मासिक—धर्म शुरू हो गया। तब चमत्कार की बात थी!  ऐसा तो कभी किसी पुरुष को न हुआ था।भगवान श्री रामकृष्ण को अवतारवरिष्ठ इसीलिए कहा जाता है कि उन्होंने सभी धर्मों की साधनाएं की हैं। मनुष्य—जाति के इतिहास में वे अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने सभी धर्मों के मार्ग से सत्य तक जाने की चेष्टा की। 
अष्टावक्र कह रहे हैं : हम देह नहीं हैं; हमने जब मन से यह मान लिया कि हमतो मरणधर्मा शरीर मात्र हैं, तो हम देह हो गये हैं। हमने जो मान लिया, हम वही हो गये हैं। अनु पश्चाद् भवनं-अनुभवः। ‘अनु’ माने पीछे ‘भव’ माने होना-‘भवनं भवः।’ जो सबसे पीछे रहकर सबको प्रकाशित करे उसका नाम अनुभव। ज्ञान की पराकाष्ठा। संसार हमारी मान्यता है। और मान्यता छोड़ दी तो हम तत्क्षण रूपांतरित हो सकते हैं। छोड़ने के लिए किसी यथार्थ को बदलना नहीं है; सिर्फ एक धारणा को छोड़ देना है। हम वस्तुत: अगर शरीर होते बदलाहट बड़ी मुश्किल थी। हम वस्तुत: शरीर नहीं हैं। हम वस्तुत: तो शरीर के भीतर छिपा जो चैतन्य है, वही हैं—वह साक्षी, द्रष्टा है। व्यक्ति की मनःस्थिति का प्रभाव उसके जीवन पर प्रत्यक्ष देखने में आता है।
 यत्र यत्र मनो देही धारयेत्सकलं धिया ।
        स्नेहात् द्वेषात् भयाद्वापि याति तत्तत्सरूपताम् ॥ श्रीमद्भागवत्
अर्थ- देहधारी जीव स्नेह से , अथवा भय से जिस किसी में भी सम्पूर्ण रूप से अपने चित्त को लगा देता है , अन्त मे वह तद्रूप हो जाता है । 
'लस्ट और लूकर ' अर्थात वासना और धन ' में  अत्यधिक आसक्ति  हमारे मन को किसी मदिरोन्मत्त  बन्दर के समान चंचल बना देता है। और  धर्म महावत के सामान हमारे हाथी के समान उन्मत्त मन की पाशविक वृत्तियों पर अंकुश रखता है, अतः धर्म हमारे चंचल मन का नियन्ता है। हमारा शत्रु बाहर नहीं है, मन में बैठे काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और ईर्ष्या रूपी षडरिपु ही हमारे वास्तविक शत्रु हैं। ये षडरिपु मानव को पतन की ओर अग्रसर करते हैं। इन पतनोन्मुख प्रवृत्तियों को रोकने के लिए परमावश्यक होता है विवेकशील होना और विवेक को जागृत करने के लिए अच्छे पुरुषों की संगति तथा अच्छे ग्रन्थों का स्वाध्याय परमावश्यक है।
देहाभिमानगलिते ज्ञानेन परमात्मनः।
 यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः॥
अर्थात देहाभिमान ( जड़ शरीर और मन के साथ मैं-पन का तादात्म्य)  सर्वथा मिट जाने पर जब परमात्मतत्त्व का बोध हो जाता है, तब जहाँ-जहाँ मन जाता है, वहाँ-वहाँ परमात्मतत्त्व का अनुभव होता है अर्थात उसकी अखंड समाधि (सहज समाधि रहती है)। जीव को ब्रह्म होने मे उतनी ही देर लगती है जितनी देर ब्राह्मण को मनुष्य होने मे लगती है । ब्राह्मण मनुष्य ही है केवल ब्राह्मणत्व का अभिमान हटाना है इसी प्रकार देहाभिमान हटा देने पर जीव वस्तुतः ब्रह्म ही है
" किन्तु बिना चरित्र के अगर कोई मनुष्य होगा तो वह पशु के सामान होगा।" इसीलिये सबसे पहले चरित्रवान मनुष्यों का निर्माण करना ये महामण्डल का उपाय है। और हमारे आदर्श हैं स्वामी विवेकानन्द। वे भारत के राष्ट्रीय युवा आदर्श हैं। १९८४ में ही भारत सरकार ने स्वामी विवेकानन्द को युवा आदर्श घोषित किया है। चरित्र-गठन के लिये एक साँचा की आवश्यकता होती है। युवाओं के रोल-मॉडल हैं, हमारे आदर्श हैं विवेकानन्द, उनके साँचे में अपने जीवन को हमलोगों को गढ़ना है। 
महमामण्डल का प्रतीक-चिन्ह: (एम्ब्लेम) में जो वृत्त (गोलाई) है, वह पृथ्वी का प्रतीक है, पृथ्वी के भीतर कन्याकुमारी से प्रारम्भ होता हुआ भारतवर्ष का मानचित्र है। भारतवर्ष के भीतर युवा महामण्डल के आदर्श परिब्राजक स्वामी विवेकानन्द खड़े हैं ! उस गोलाई के नीचे हमारा आदर्श वाक्य (मोटो) लिखा है ' Be and Make ';यह महावक्य भी स्वामी जी का दिया हुआ निर्देश है। इसका साधारण अर्थ है - स्वयं मनुष्य बनो और दूसरों को मनुष्य बनने में सहायता करो! किन्तु स्वामी विवेकानन्द द्वारा कथित यह महावाक्य भी वेदों में कथित चार महावाक्यों के समान ही अत्यन्त सारगर्भित है! जैसे वेदान्त के चार महावाक्य -"अहंब्रह्मास्मि", "तत्त्वमसि" इत्यादि के बड़े गहरे अर्थ होते हैं, ठीक वैसे ही स्वामी विवेकानन्द द्वारा कथित इस महावाक्य "बनो और बनाओ" का भी बहुत गहरा अर्थ है। 
"BE AND MAKE " का गहरा महत्व यह है कि हमलोग केवल साढ़े-तीन हाथ के शरीर मात्र ही नहीं हैं।जैसे हमलोग केवल सॉलिड को देख पाते हैं,स्थूल देख पाते हैं; लेकिन सूक्ष्म को नहीं देख पाते हैं। हमलोगों ने फिजिक्स में पढ़ा है कि पदार्थ की तीन अवस्थायें होती हैं -ठोस,तरल और गैस। बर्फ को हमलोग देख सकते हैं, मुट्ठी में पकड़ सकते हैं। पानी को भी देख सकते हैं, किन्तु मुट्ठी में नहीं पकड़ सकते। किन्तु गैस या वायु  को न तो हमलोग देख सकते हैं और न मुट्ठी में पकड़ ही सकते हैं।  फिर भी कोई यह नहीं कह सकता कि हवा नहीं होती है ? 
विवेकानन्द के गुरु भगवान श्रीरामकृष्णदेव कहते थे, " जिस प्रकार पानी जमकर बर्फ बन जाता है, उसी प्रकार निराकार, अखण्ड, सच्चिदानन्द 'ब्रह्म' ही साकार रूप धारण कर लेता है। जैसे बर्फ पानी से ही पैदा होती है, पानी में ही रहती है, और पानी में ही मिल जाती है; वैसे ही ईश्वर का साकार रूप भी निराकार ब्रह्म से ही उत्पन्न होता है, उसी में अवस्थित रहता है तथा उसी में विलीन हो जाता है।" (अमृतवाणी/साकार और निराकार/२३०) 
उसी प्रकार हमारे तीन कम्पोनेंट्स हैं - शरीर, मन और हृदय। शरीर स्थूल होता है, इसलिये हमलोग उसको देख पाते हैं, मन अत्यन्त सूक्ष्म वस्तु है इसलिये उसको देख नहीं पाते, किन्तु अनुभव करते हैं कि मेरा मन है। और हृदय, हार्ट (Heart) हम लोग बोलते हैं; यह उससे भी सूक्ष्म वस्तु है- वास्तव में वो आत्मा है। लेकिन अभी हमलोग उसको समझ नहीं पायेंगे; इसीलिये स्वामी जी उसको हार्ट बोले। क्योंकि आत्मस्वरूप को अनुभव करने या फील करने की शक्ति हृदय में होती है। अतः हृदय को विकसित करने की शिक्षा प्राप्त करने से आत्मविश्वास आता है। और आत्मविश्वास से अंतर्निहित ब्रह्मभाव जागृत हो जाता है! शिक्षा से श्रद्धा और विश्वबंधुत्व बढ़ता है। 
अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल युवाओं के अन्दर आत्मविश्वास पैदा करने का कार्य करता है। उसको अपने अन्दर की शक्ति को पहचानने की एक दिशा देता है, कैसे वह अपने अन्दर की शक्ति को पहचान सकता है। उसके अन्दर जो अनन्त शक्ति छिपी हुई है,स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाओं के आधार पर उन्हें यह बताया जाता है कि तुम्हारे अन्दर एक दिव्यत्व भरा हुआ है, एक आध्यात्मिक शक्ति भरी हुई है। जिसके माध्यम से तुम अपना जीवन बना सकते हो, अपने जीवन की सारी  समस्याओं का समाधान कर सकते हो। अपने रोजगार के साधन के साथ-साथ परिवार, समाज और देश के कल्याण के लिये भी अपने जीवन को आगे बढ़ा सकते हो (देश की सेवा में अपने जीवन को समर्पित कर सकते हो)!"और यह तभी सम्भव है, जब शिक्षा हमें मन को (हृदय में विद्यमान सूक्ष्म वस्तु को) देखने की प्रक्रिया की सम्यक जानकारी प्रदान करे।
सभी लोग नवयुवकों को उपदेश देते हैं कि मन लगा कर पढ़ो ! किन्तु कोई यह नहीं सिखलाता कि मन क्या है, अर्थात उसकी बनावट कैसी है ? तथा किसी इच्छित विषय में मन को लगाया कैसे जाता है ?  अतः शिक्षा (युवा-प्रशिक्षण) का प्रथम कार्य यह है कि वह प्रत्येक नवयुवक को उसके मन की बनावट और मन को एकाग्र करने की पद्धति से उसका परिचय करा सके।  स्वामीजी मन की एकाग्रता की प्रक्रिया को (मनःसंयोग को) शिक्षा के केन्द्र में लाना चाहते थे। उनका कहना था, ‘‘मैं तो मन की एकाग्रता को ही शिक्षा का यथार्थ सार समझता हूँ, ज्ञातव्य विषयों के संग्रह को नहीं। यदि एक बार मुझे फिर शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिले, तो मैं विषयों का अध्ययन नहीं करूँगा। मैं तो एकाग्रता को तथा मन को विषय से अलग कर लेने की शक्ति को बढ़ाऊँगा और तब साधन अथवा मंत्र की पूर्णता प्राप्त हो जाने पर इच्छानुसार विषयों का संग्रह करूँगा।’’
शिक्षा की वास्तविक उपलब्धि के लिए मन की एकाग्रता आवश्यक है। विद्यार्थी जितने अधिक एकाग्रचित्त होते जाते हैं, उनकी विद्या ग्रहण करने की शक्ति उतनी ही अधिक बढ़ती जाती है।"एकाग्रता की विशिष्टता" के अनुसार ही कोई व्यक्ति किसी "विषय-विशेष" का अथवा अनेक विषयों का ज्ञाता हो जाता है। भारत वासियों के द्वारा "गुरु-शिष्य वेदान्त शिक्षक प्रशिक्षण परम्परा" में अन्तर्जगत पर,आत्मा के अदृष्ट प्रदेश पर (हृदय में विद्यमान भगवान श्रीरामकृष्ण देव पर) अपने मन को एकाग्र किए जाने से भारतवर्ष में योग-शास्त्र का विशेष उत्थान हुआ। जबकि यूरोप के लोगों ने बाह्य जगत पर मन को एकाग्र कर भौतिक उपलब्धियों में शिखरों का स्पर्श कर लिया है। विश्व का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जिस के बारे में मन को एकाग्र किया जाए और उपलब्धि न प्राप्त हो। 
अतः मनुष्य-निर्माण की प्रक्रिया को सरल करते हुए स्वामी जी ने कहा - 3'H';  हैण्ड -हेड एण्ड हार्ट् का डेवलपमेन्ट करो - मनुष्य विकसित हो जायेगा, मनुष्य निकलेगा, मनुष्य प्रगट हो जायेगा। वह 'मनुष्य' जो 'ब्रह्म' को-अर्थात अपने बनाने वाले को भी जान सकता है ! 
आधुनिक युग में 'ब्रह्म' के अवतार, जगतगुरु भगवान श्रीरामकृष्णदेव कहते थे - " वह मनुष्य धन्य है जिसका शरीर, मन और हृदय (3'H') तीनों ही समान रूप से विकसित हुए हैं। सभी परिस्थितियों में वह सरलता के साथ उत्तीर्ण हो जाता है। उसके हृदय में भगवान के प्रति सरल विश्वास और दृढ़ श्रद्धा-भक्ति होती है; साथ ही उसके आचार-व्यवहार में भी कहीं कोई कमी नहीं होती। माता-पिता और गुरुजनों के सम्मुख वह वह विनयी और आज्ञाकारी होता है। पड़ोसियों के प्रति वह दया और सहानुभूति रखता है। आत्मीय-स्वजन और मित्रों को वह अतिशय प्रिय प्रतीत होता है, क्योंकि उसके हाथ (Hand) सदैव मदद करने को तैयार रहते हैं। सांसारिक व्यवहार के समय वह पूरा-पूरा व्यवसायी होता है, विद्वान् पण्डितों की सभा में वह सर्वश्रेष्ठ विद्वान् सिद्ध होता है। वाद-विवाद में अकाट्य युक्तियों द्वारा वह अपनी तीक्ष्ण बुद्धि (Head) का परिचय देता है।  पत्नी के सामने वह मानो साक्षात् मदन-देवता होता है। इस तरह का मनुष्य वास्तव में सर्वगुण-सम्पन्न (ऑल अराउन्डर) होता है ! " अमृतवाणी /८०]
और महामण्डल इसी प्रकार के सर्वगुण-सम्पन्न (ऑल अराउन्डर) मनुष्यों का निर्माण करने हेतु चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने वाला संगठन है। " इसलिये महामण्डल का उद्देश्य है - भारत का कल्याण (ऑब्जेक्ट ऑफ़ महामण्डल इज -वेलफ़ेयर ऑफ़ इंडिया), उपाय है - चरित्रनिर्माण (महामण्डल्स स्किम फॉर द वेलफ़ेयर ऑफ़ इंडिया इज -मैन्यूफैक्तचरिंग मैन ऑफ़  आदर्श हैं -स्वामी विवेकानन्द, आदर्श वाक्य है -"BE AND MAKE" और हमारा अभियान मन्त्र है - " चरैवेति चरैवेति !" अर्थात 'आगे बढ़ो आगे बढ़ो !' ये ऐक्चुअली ऐतरेय ब्राह्मण का एक मंत्र है। जिसमें कहा गया है, कि जो युग परिवर्तन
होता है वह व्यक्ति के विचारों में (विचार जगत में) होता है।   
कलिः शयानो भवति, संजिहानस्तु द्वापरः ।
 उत्तिष्ठँस्त्रेताभवति, कृतं संपद्यते चरन् ।
चरैवेति चरैवेति॥
जो मनुष्य सोया रहता है, (या आलसी मनुष्य है) और पुरुषार्थ (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) नहीं करता- उस मनुष्य का भाग्य भी सोया रहता है, जो पुरुषार्थ करने के लिये उठकर खड़ा हो जाता है, उसका भाग्य भी खड़ा हो जाता है, जो अपने लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ता जाता है, उसका भाग्य भी आगे बढ़ता जाता है। इसलिये हे मनुष्यों - 'चरैवेति चरैवेति ', आगे बढ़ो, आगे बढ़ो ! 
जो मनुष्य सोया हुआ है (पंचभूतों के फंदे में फंसा हुआ है), वह अभी कलिकाल में वास कर रहा है, (स्वामी जी के आह्वान को सुनने से-सिंहशावक) जिसकी मोहनिद्रा भंग हो गयी है, वह द्वापर युग में वास कर रहा है। जो मनुष्य पुरुषार्थ करने के लिये कमर कसकर उठ खड़ा होता है, वह त्रेता युग में वास कर रहा है। कृतं संपद्यते चरन्- जो व्यक्ति अपने आस-पास रहने वाले कुछ भाइयों को एकत्र करके महामण्डल  निर्देशित ५ अभ्यासों का स्वयं अनुसरण करते हुए दूसरों को भी उसकी शिक्षा देने के कार्य में लग जाता है, उसके जीवन में सत्ययुग का प्रारम्भ हो जाता है। मनु महाराज जी कहते हैं कि :
कृतं त्रेतायुगं चैव द्वापरं कलिरेव च।
    राज्ञो वृत्तानि सर्वाणि राजाहि युगमुच्यते॥301॥
कलि: प्रसुप्तो भवति स जाग्रद्द्वापरं युगम्।
    कर्मस्वभ्युद्यतस्त्रेता विचरंस्तु कृतं युगम्॥302॥
'सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग ये चारों राजा ही के आचरण हैं, क्योंकि राजा ही को युग कहते हैं। राजा जिस समय अकर्मण्य होकर विषय सुख में लीन तथा अपने कर्तव्य ज्ञान से रहित होता है उस समय कलियुग समझना चाहिए; जिस समय अपने कर्तव्य को सिर्फ समझने लगता है उस समय द्वापर; जब उस समझ के अनुसार काम करने का विचार करता या उसके लिए तत्पर होता है तब त्रेता और जब पूर्ण रीति से अपना कर्तव्य पालन करता रहता है तब सत्ययुग समझना चाहिए' (मनु. 301, 302)। 
 इसका आशय यही है कि मनुष्य अपने से ही कलियुग और सत्ययुग बना सकता है। जब सभी लोग आलसी और 'दैव-दैव आलसी पुकारा' वाले हो जाएँ तभी घोर कलियुग एवं जब कर्मपरायण, कर्तव्य पालन में तत्पर, पूर्ण कर्मयोगी हो जाएँ, तो सत्ययुग ही समझा जाता है। बस यही युगव्यवस्था कर्म करने के लिए माननीय है। इसके अतिरिक्‍त और कोई नहीं।
इसलिये गोलाई के ऊपर  लिखा हुआ है- 'चरैवेति चरैवेति'  हमारे चरित्र-निर्माण और मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा के प्रचार-प्रसार रूपी कर्म-योग आन्दोलन का अभियान-मंत्र का जयघोष है -  'चरैवेति चरैवेति हुँकारों स्माकम!' स्वामी जी सभी युवाओं से आह्वान कर रहे हैं - 'चरैवेति चरैवेति' -सत्ययुग को धरती पर उतारने के लिये आगे बढ़ो आगे बढ़ो ! साथ ही साथ ' Be and Make ' पूर्णतः निःस्वार्थी मनुष्य, भ्रममुक्त मनुष्य, थंडरबोल्ट जैसा अप्रतिरोध्य (irresistible-जो रुक न सके, अत्यन्त सम्मोहक) बनने और बनाने के लिये परमपुरुषार्थ करने का  निर्देश भी दे रहे हैं। 
इसलिये गोलाई के किनारे बने छोटे-छोटे वज्र के निशान वैसे अनेकों भावी लोकशिक्षकों (वुड बी लीडर्स) के प्रतीक हैं, जो " पूर्णतः निःस्वार्थी मनुष्य (भ्रममुक्त मनुष्य) थंडरबोल्ट के जैसा मनुष्य बन चुके हैं! 
इस ' श्रीरामकृष्ण -विवेकानन्द वेदान्त लीडरशिप ट्रेनिंग परम्परा' की विशेषता ही यह है कि यह एक पूर्णतया निःस्वार्थपर " थंडरबोल्ट" की तरह इरिज़िस्टबल-अप्रतिरोध्य महामण्डल नेता (पैगम्बर) बनने और बनाने"  की 'सेल्फ-मैन-मेकिंग-स्कीम' - या योजना है। इस 'सेल्फ मैन मेकिंग ट्रेनिंग' की पद्धति का तात्पर्य यह है कि वास्तव में मैं कौन हूँ, मेरा सच्चा स्वरुप क्या है; तथा उस स्वरुप में अवस्थित होने के लिये क्या और कैसे करना होगा ? इन प्रश्नों का उत्तर हमें स्वयं ढूँढ़ना होगा। कोई दूसरा व्यक्ति हमलोगों को पशु-मानव (१००% घोर स्वार्थी या सम्मोहित मनुष्य) से मनुष्य (५० % स्वार्थी या विवेकशील मनुष्य) में और फिर क्रमशः मनुष्य से देव-मानव (क्रमशः १०० % निःस्वार्थी या भ्रममुक्त मनुष्य) में रूपान्तरित नहीं कर सकता है ! 
" काम से राम तक पहुँचने की यात्रा हमें स्वयं तय करनी होगी! " पंचभूतों के फन्दों से मुक्त हो जाने, या ब्रह्म को जानकर ब्रह्मविद मनुष्य, भ्रममुक्त-मनुष्य, पूर्णतः निःस्वार्थी थंडरबोल्ट जैसा अप्रतिरोध्य मनुष्य या माँ श्री सरदादेवी की कृपा से वैष्णव-जन के लिये हमलोगों में एथेंस का सत्यार्थी जैसा प्रचण्ड साहस और उत्साह', नचिकेता के जैसी आत्मश्रद्धा, प्रह्लाद जैसी प्रबल आस्तिकता स्वयं उत्पन्न करनी होगी। वास्तव में यह "Be and Make" वेदान्त परम्परा स्वयं मनुष्य बनने और दूसरों को मनुष्य बनने में सहायता करते करते स्वयं 'भ्रममुक्त मनुष्य' (पूर्णतः निःस्वार्थी मनुष्य, वैष्णव -जन जो पीर पराई को जानता है) बन जाने वाली सनातन प्रशिक्षण -परम्परा है।] “मेरा विश्वास नवयुवकों पर है। इन्ही में से मेरे कार्यकर्ता निकलेंगे, जो अपने पराक्रम से विश्व को बदल देंगे।"   
 यह स्वामी विवेकानन्द के उपरोक्त सजीव संदेशों का प्रभाव है, कि जो भी नवयुवक स्वामी जी की शिक्षाओं को समझकर, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उनका अनुसरण करेगा, जीवन ही बदल जायेगा। उसके जीवन में सत्ययुग आ जायेगा ! इसीलिए स्वामी जी कहते हैं- " आओ, हम सब आज से - इसी क्षण से धर्म को सहज बनाने की चेष्टा करें और उस सत्ययुग को धरती पर उतारने में सहायता करें, अर्थात जब प्रत्येक मनुष्य एक उपासक (वर्शिपर) होगा और प्रत्येक मनुष्य में अन्तर्निहित सत्यता (दी रियलिटी इन एव्री मैन) ही उसकी उपासना का विषय (ऑबजेक्ट ऑफ़ वर्शिप) होगा।" (८/६३)
'श्रीरामकृष्ण पताका': - नवयुवकों के प्रति भगवान श्रीरामकृष्ण के उस 'प्रेम और विश्वास' (नरेन् शिक्षा देगा के भरोसे) का प्रतिक है, कि मनुष्यों में आध्यात्मिक जागृति लाने (भ्रममुक्त मनुष्य बनने) की शिक्षा केवल रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा के लीडरशिप ट्रेनिंग में प्रशिक्षित-नवयुवक वृन्द ही दे सकते हैं। श्री रामकृष्ण ने अपने उसी प्रेम और भरोसे को 'वज्रांकित महामण्डल ध्वज के रूप में सभी नवयुवकों को हस्तान्तरित कर दिया गया है! ताकि भविष्य में महामण्डल द्वारा आयोजित युवा-प्रशिक्षण शिविर के माध्यम से 'मनुष्य बनने और बनाने' में समर्थ हजारों पूर्णतः निःस्वार्थी 'थंडरबोल्ट' जैसे अप्रतिरोध्य (irresistible) वुड बी लीडर्स का निर्माण हो सम्भव हो जाये! 
[जीवन नदी के हर मोड़ पर (पृष्ठ १५३)] 
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