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गुरुवार, 23 नवंबर 2017

' राष्ट्रीय एकता और स्वामी विवेकानन्द'

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में लिखा है- ‘इंडिया दैट इज़ भारत।’ इसका मतलब यह हुआ है कि देश के दो नाम हैं। सरकारी तौर पर ‘गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया’ भी कहते हैं और ‘भारत सरकार’ भी कहते हैं। बच्चे पूछते हैं कि जापान का एक नाम है, चीन का एक नाम है लेकिन अपने देश के दो नाम क्यूं हैं ? भूटान को अंग्रेजी में भी Bhutan ही कहते हैं,श्रीलंका को भी अंग्रेजी में Sri Lanka ही कहते हैं , भारत को ही अंग्रेजी में India क्यों कहते हैं? ऑक्सफोर्ड डिक्सनरी के पृष्ठ ७८९ पर लिखा है -Indian, जिसका मतलब ये बताया है old-fashioned & criminal peoples अर्थात् पिछडे और घिसे-पिटे विचारों वाले अपराधी लोग। भारत माता तथा भारतीयों का अपमान करने के लिए अंग्रेजों ने यह नाम रखा है। हमलोग 'कलकत्ता' का नाम बदलकर कोलकाता कर सकते हैं, 'बम्बई' का नाम बदलकर मुम्बई कर सकते हैं, 'मद्रास' का नाम बदल कर चेन्नई कर सकते हैं तो भारत को भी अंग्रेजी में India न कहकर अंग्रेजी में भी BHARAT क्यों नहीं कह सकते? या अपने देशवासियों को हिन्दी में भारतीय और अंग्रेजी में Indian न कहकर भारतीयन क्यों नहीं कह सकते ? अब हाल ही में  सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एच.एल दत्तू और जस्टिस अरुण मिश्रा की खंडपीठ ने देश का नाम भारत करने को लेकर दायर (यह याचिका महाराष्ट्र के सामाजिक कार्यकर्ता निरंजन भटवाल ने दायर की थी, यह प्रश्न भी उठता है कि हम हिन्दुस्तानी हैं या भारतीय ?) जनहित याचिका पर संज्ञान लेते हुए केंद्र व राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वह सभी सरकारी और गैर-सरकारी कार्यों के लिए भारत का इस्तेमाल करें। इस पर कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से जवाब भी मांगा है। 
उसी 'ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी' के अनुसार " Nation" (राष्ट्र) की परिभाषा इस प्रकार दी गयी है- ‘एक विशाल भूभाग पर रहने वाला व्यक्ति–समूह, जिसकी भाषिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परम्पराएं एक हों, तथा जो एक सरकार के अधीन हो, ‘राष्ट्र’ के अंतर्गत आता है।’'ऑक्सफोर्ड डिक्सनरी' में ही 'National' (राष्ट्रीय) शब्द को परिभाषित करते हुए कहा गया है- " किसी राष्ट्र या कौम से सम्बद्ध कोई 'विशेषता' जो किसी एक पूरे देश या जाति के हित में सामान्य रूप अपनाई जाती हो।" जैसे हम कहते हैं - 'अनेकता में एकता भारत की विशेषता।'  उदहारण के लिये - राष्ट्रिय विदेश नीति, राष्ट्रिय वेश-भूषा (नेशनल ड्रेस), राष्ट्रिय सम्पत्ति, राष्ट्रिय ध्वज, राष्ट्र-गान, राष्ट्रिय चरित्र आदि; इस दृष्टि से National का पर्यायवाची शब्द है- कौमी, जातीय, राष्ट्रीय, सर्व साधारण का या  सारे देश का।
१५ अगस्त १९४७ को जो भारतवर्ष को तीन टुकड़ों में बाँट कर जो राष्ट्र गठित हुआ था, उसके पहले क्या भारत का अस्तित्व नहीं था ? नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है ! -एक लंबी अवधि तक भारत एक राष्ट्र न होकर बहुत से राज्यों के रूप में था। सम्राट भरत ने कश्मीर से कन्याकुमारी और सिंधु नदी से ब्रह्मपुत्र नदी तक के प्रदेश में एकछत्र राज्य किया । उनके इस पराक्रमकी स्मृतिमें यह प्रदेश ‘भारत’ अथवा ‘भारतवर्ष’के नामसे पहचाना जाने लगा ।  भारत एक प्राचीन राष्ट्र है और इसकी राष्ट्रीयता का आधार है संस्कृति। भारतीय वाङ्मय में सम्पूर्ण भारत की कल्पना एक ऐसे राष्ट्र के रूप में की गयी है, जिसका भू–खंड भारत और इसमें रहने वाली प्रजा भारतीय है–

उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। 
वर्ष तद्भारतं नाम भारती यत्र संततिः। 
अर्थात समुद्र के उत्तर में और हिमाचल के दक्षिण में जो वर्ष (भूमि) है उसका नाम भारत है और वहां रहने वाले लोग 'भारती' हैं। 
 वैदिक कालीन भारतवर्ष की सभ्यता, संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था बहुत उन्नत अवस्था में थी। यहाँ गणतन्त्र भी प्रतिष्ठित था। कृषि, विज्ञान, गणित, चिकित्सा, शिल्प हर क्षेत्र में भारतवर्ष एक उन्नत राष्ट्र था। आदिकाव्य ‘रामायण’ में भारत के भौगोलिक और सांस्कृतिक स्वरूप को ‘राष्ट्र’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है. भारत पहला देश है, जिसे ‘मातृभूमि’के नामसे जाना गया । श्रीराम के मुख से आदिकवि वाल्मीकि की पंक्तियां हैं–
नेयं स्वर्णपुरी लंका रोचते मम् लक्ष्मणः।
जननी–जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। 
प्रभु श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं, ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।।’ अर्थात ‘माता एवं मातृभूमि स्वर्गसे भी श्रेष्ठ हैं !’ ‘राष्ट्र’ एक ऐसा जनसमूह है, जिसकी भाषा, धर्म अथवा पंथ, परंपरा, भूप्रदेश और इतिहास एक होता है; तथापि, राष्ट्रीयता निर्माण होनेके लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बात होती है उस समाज के एक ‘राष्ट्र’ होने की दृढ इच्छाशक्ति । अतः इस संबंधमें पश्चिमी विचारक रेनन कहता है, ‘राष्ट्रकी अवधारणाका मूल आधार हृदयोंमें जागृत होनेवाली एकताकी तीव्र इच्छा और उसकी प्रेरणा’ है । यह आंतरिक चेतना और प्रेरणा ही राष्ट्रकी आत्मा होती है । 
भारतीय राष्ट्रीय चेतना के सम्यक् स्वरूप के साक्षात्कार हेतु ‘अथर्ववेद’ के ‘भूमिसूक्त’ का अध्ययन–अनुशीलन भी सहायक है। 'भूमिसूक्त’ में भारत–भूमि की विशालता और उसके नानाविध प्राकृतिक वैभव का विराट गौरवान्वयन है। इसमें हमारी मातृभूमि की गरिमा का अभिज्ञापन है। राष्ट्रीय चेतना के आधारभूत तत्त्व–देशप्रेम और जन्मभूमि के प्रति रागात्मक संवेदन का बड़े उदात्त शब्दों में प्रकटीकरण है।  इसी ‘भूमि सूक्त’ के आधार पर डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी ने ‘दि फंडामेंटल यूनिटी ऑफ इंडिया’ नामक पुस्तक में भारत की राष्ट्रीय चेतना को पश्चिम से आयातित मानने की अवधारणा को सतर्क खंडित किया है। भारत-भूमि को ‘मातृभूमि’ मानना भारत की राष्ट्रीयता है ! इस भूमि-सूक्त के एक मंत्र में  कहा गया है –
‘सानो भूमिर्विसृजतां माता पुत्राय मे पयः। ’ 
अर्थात यह भूमि हमारी माता है, हम इसके पुत्र–जो जन इस सम्बंध का अनुभव करता है, उसी के लिए माता दूध (कल्याण) का विसर्जन करती है।  (सा नः भूमिः मे पयः विसृजताम् माता पुत्राय। ) शिकागो (अमेरिका)से लौटते समय भारतीय तट निकट आने पर स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ‘‘इस क्षण मेरी प्रिय  मातृभूमि से आनेवाली पवन ही नहीं; धूलि भी मुझे बहुत प्रिय लग रही है ।"
इसी आधार पर भारतीय विद्वानों ने भी ‘राष्ट्र’ शब्द को परिभाषित किया है। डॉ. सुधींद्र के अनुसार, ‘भूमि, भूमिवासी जन और जन–संस्कृति; इन तीनों के सम्मिलन से राष्ट्र का स्वरूप बनता है। ’‘भूमि’- अर्थात भौगोलिक एकता, ‘जन’- अर्थात जनगण की राजनीतिक एकता, ‘जन–संस्कृति’ अर्थात सांस्कृतिक एकता–तीनों के समुच्चय का नाम ‘राष्ट्र’ है। आगे वे पुनः लिखते हैं– ‘भूमि उसका (राष्ट्र का) कलेवर है, जन उसका प्राण है और संस्कृति उसका मानस है। ’ 
श्री वासुदेव शरण अग्रवाल ने ‘राष्ट्र’ शब्द को अर्थित करते हुए लिखा है– ‘राष्ट्र का सम्मिलित अर्थ पृथ्वी, उस पर रहनेवाली जनता और उस जनता की संस्कृति है.’ राष्ट्र को परिभाषित करते हुए रविन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था - " वैसे लोगों के समूह को राष्ट्र कहते हैं, जो विभिन्न प्रकार के रंग-रूप, भाषा, और वेश-भूषा में रहते हुए भी आपसी समानता और भाईचारा के बुनियाद पर एक एक साथ सुख-शांति पूर्वक निवास करते हैं। " सारतः ‘राष्ट्र’ शब्द का सम्मिलित अर्थ है- पृथ्वी, उस पर बसनेवाली जनता और जन-संस्कृति. जब ये तीनों स्वर एकमेक होते हैं, तब ‘राष्ट्र’ का जन्म होता है। 
भौतिक से रूप से उन्नत होने के साथ साथ भारतीय लोगों की आध्यात्मिक जिज्ञाषा भी जाग्रत हुई थी। क्या इस परिवर्तनशील जगत के पीछे क्या कोई अपरिवर्तनशील सत्ता भी है ? मनुष्य जीवन का उद्देश्य क्या है ? जिस प्रकार आज के पाश्चात्य वैज्ञानिक वाह्य जगत में ब्रह्माण्ड की रचना के रहस्यों को खोजने में लगे हुए हैं, उसी प्रकार भारत ने भी इन प्रश्नों के उत्तर वाह्य जगत में ही खोजने की चेष्टा की थी। किन्तु कुछ धीर मनुष्यों (ऋषियों) ने नेत्रों को अंतर्मुखी बना कर अपने ही अन्तर्जगत में स्थित शाश्वत चैतन्य सत्ता का आविष्कार किया और सिद्धान्त दिया कि '“यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे” अर्थात जिन पंचमहाभूतों से पूर्ण ब्रह्मांड संरचित है उन्हीं तत्वों से हमारा शरीर निर्मित है।  तथा जो सत्ता हमारे शरीर को चला रही है, वही चैतन्य सत्ता वाह्य जगत के पीछे रहकर उसे भी चला रही है ! सबसे पहले यह सत्य भारत में ही आविष्कृत हुआ था कि-' एकम सत विप्राः बहुधा वदन्ति!'
 एक ही ब्रह्म इस विश्व-ब्रह्माण्ड के पीछे अवस्थित हैं। इसलिये अनासक्ति के साथ इसका उपभोग करो, किसी दूसरे के धन की आकांक्षा मत करो।  तुम केवल मरण धर्म शरीर ही नहीं हो. तुम तो अमृत के पुत्र हो, तुम मृत्यु को भी जीत सकते हो। 
भारत का यही ज्ञान हजारों वर्षों से राष्ट्रीय एकता को अखण्ड बनाये हुए थी. बहु-भाषीय, बहु-जातीय, बहु-धर्मीय व्यवस्था के बावजूद भारत -ऋग्वेद के ऋषियों के द्वारा आविष्कृत सत्य  - ' एकम सत विप्राः बहुधा वदन्ति!' हमारी राष्ट्रिय अखण्डता को अक्षुण बनाये हुए थी.  इसी सिद्धान्त- ' सत्य तो एक ही है ! बुद्धिमान लोग उसका वर्णन अनेक प्रकार से करते हैं' को आधार मान कर भारत के लोग आपस में मिल-जुल कर रहते आ रहे थे. किन्तु बाद में पुरोहितों ने अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिये साधारण जनता को आध्यात्मिकता या तात्विक-दर्शन से वंचित करने के लिये केवल कर्म-काण्ड द्वारा पूजा अनुष्ठान को ही धर्म कहकर प्रचारित कर दिया। धर्म के दुर्बल हो जाने से ही राष्ट्रीय एकता खण्डित हो गयी और मुट्ठीभर विदेशी आक्रमण कारियों से पराजित होकर भारत पराधीन हो गया। 
ऐसे भी समय आये जब इस उपमहाद्वीप का बहुत बड़ा भाग एक साम्राज्य के अधीन रहा; इस बार अनेक बार विदेशियों ने हमले किये। उनमें से कुछ यहाँ बस गये और भारतीय हो गये; और राजा या सम्राट के रूप में शासन किया। कुछ ने देश को लूटा-खसोटा और धन संपत्ति बटोर कर वापस चले गये। महान उपलब्धियों के भी वक्त आये और देश को जड़ता और दुख के भी अनेक दौरों से गुजरना पड़ा। और जब हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम की बात करते हैं तब हमारा तात्पर्य भारतीय इतिहास के उस दौर से होता है जिसमें भारत पर अंग्रेजों का शासन था और यहां के लोग विदेशी आधिपत्य को समाप्त करके स्वाधीन हो जाना चाहते थे। 
अंग्रेजों ने कभी भी युद्ध करके भारत में किसी राज्य को नहीं जीता था वो हमेशा छल और साजिस से ये काम करते थे। अंग्रेजों को भारत में व्यापार करने का अधिकार जहाँगीर ने 1618 में दिया था और 1618 से लेकर 1750 तक भारत के अधिकांश रजवाड़ों को अंग्रेजों ने छल से कब्जे में ले लिया था। बंगाल उनसे उस समय तक अछूता था। और उस समय बंगाल का नवाब था सिराजुदौला (१७३७-१७५७ ) । बहुत ही अच्छा शासक था, बहुत संस्कारवान था । उसने अंग्रेजों को व्यापार की इज़ाज़त कभी नहीं दी । अंग्रेजों ने कई बार बंगाल पर हमला किया लेकिन हमेशा हारे। 
भारत में ब्रितानी राज का प्रारंभ सन् 1757 से माना जा सकता है जब ब्रितानी ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को पलासी- युद्ध में पराजित कर दिया था। अंग्रेजों के पास प्लासी के युद्ध के समय मात्र ३०० सैनिक थे और सिराजुदौला के पास १८ हजार सैनिक थे। अंग्रेजी सेना का सेनापति था रोबर्ट क्लाइव और सिराजुदौला का सेनापति था मीरजाफर । रोबर्ट क्लाइव ये जानता था की आमने सामने का युद्ध हुआ तो एक घंटा भी नहीं लगेगा और हम युद्ध हार जायेंगे। रोबर्ट क्लाइव ने तब अपने दो जासूस लगाये और उनसे कहा की जा के पता लगाओ की सिराजुदौला के फ़ौज में कोई ऐसा आदमी है जिसे हम रिश्वत दे लालच दे और रिश्वत के लालच में अपने देश से गद्दारी कर सके । उसके जासूसों ने ये पता लगा के बताया की हाँ उसकी सेना का सेनापति ही ऐसा आदमी है जो रिश्वत के नाम पर बंगाल को बेच सकता है और अगर आप उसे कुर्सी का लालच दे तो वो बंगाल के सात पुश्तों को भी बेच सकता है। और वो आदमी था मीरजाफर, वह प्लासी के युद्ध में रोबर्ट क्लाइव के साथ मिल गया क्योकि रोबर्ट क्लाइव ने मीर जाफ़र को बंगाल का नवाब बनाने का लालच दे दिया था। आगे चलकर मीर जाफ़र का नाम भारतीय उपमहाद्वीप में 'देशद्रोही' व 'ग़द्दार' का पर्रयायवाची बन गया।  इस प्रकार जितने भूभाग पर ब्रिटिस राज स्थापित था उतने ही भूभाग को हमलोग भारत कहते हैं। सन् 1757 में  हिन्दू-मुस्लिम सैनिकों ने मिलकर लार्ड क्लाइव से पलासी युद्ध किया था, तब से हम हिन्दू-मुसलमान लोग अपने को भारतीय कौम और अंग्रेजों को विदेशी समझते हैं
स्वामीजी ने ऋग्वेद के दसवें मण्डल का अंतिम सूक्त को उद्धरित करते हुए कहा था " एकचित्त हो जाना ही समाज गठन का रहस्य है।" भारत के भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिये राष्ट्रीय एकता आवश्यक है।  स्वतंत्र सामाजिक चेतना ही राष्ट्रीयता में परिणत हो जाती है।  राष्ट्र के समस्त नागरिकों की भाषागत, वंशगत,धर्मगत एकात्मकता ही राष्ट्रीय एकता के प्रमुख अवयव हैं। महामण्डल का संघगीत वास्तव में मनुष्य के तीनों प्रमुख अवयव,शरीर-मन-हृदय-3'H' के विकास की प्रेरणा देता है -
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। 
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते ||  
ऋग्वेद के दसवें मण्डल का अंतिम सूक्त है यह संगठन सूक्त। यह मंत्र उस सूक्त का एक भाग है। निश्चित रूप से अंत में कही गई बात पूरी बात का सार होती है। यहाँ ईश्वर हमें उपदेश दे रहे हैं कि जीवन में मिल कर रहना, और संगठित होकर काम करना ही हमारे जीवन का लक्ष्य है। हम मिलकर चलें, एक सी ही बात कहें और हमारे सोचने विचारने में समानता हो, तभी हमारा काम ठीक होता है, काम में सफलता मिलती है अन्यथा हम लक्ष्य से कोसो दूर अपनी अपनी डफली अपना अपना राग अलापते रह जाते हैं। हम अपना स्वार्थ साधते रहते हैं और लड़ाइयां होती रहती हैं। यह समय की पुकार है कि हम मिल कर रहें। मिलकर चलें, मिलकर बोलें और समानरूप से सोचे।
इस मंत्र में बहुत मनोवैज्ञानिक ढंग से उपदेश दिया गया है। हमारा चलना दिखाई देता है, बोलना सुनाई देता है – पर इन सब का आधार मन ही है ! मन सूक्ष्म है,वह दिखाई नही देता किन्तु, एक साथ अनुशासन बद्ध होकर बोलने और कदम से कदम मिलाकर चलने की प्रेरणा देने वाला तो मन ही है ! वशीभूत मन ही इस पर नियंत्रण रखता है कि हम साथ चलें और एक सा बोलें। सैनिको के कदम-ताल चलने में क्यों अधिक बल रहता है क्योंकि अभ्यास कराते समय बोलते भी हैं दाएं-बाएं या लेफ्ट-राईट-लेफ्ट-राईट-लेफ्ट। अनपढ़ को भी सिखाते हैं - बायाँ हाथ में घाँस-दायाँ में माटी, बोलो 'घाँस-माटी-घाँस-माटी-घाँस।  तो परेड करते समय इस तरह पैरो को एक साथ उठाना (शारीरिक विकास) , मुख से प्रेमपूर्वक अनुशासन के शब्द 
बोलना (हृदय का विकास) और मन की प्रेरणा से एकचित्त होकर एक ही उद्देश्य के लिए काम करना (मानसिक विकास) हैं। इसलिए बचपन से ही परेड करने का प्रशिक्षण देने से मनुष्य के तीनों प्रमुख अवयव, 'शरीर-मन-हृदय' (हैण्ड-हेड-हार्ट्= 3H) की अन्तर्निहित शक्तियों को अभिव्यक्त करने का प्रतिक बन जाता है। इसीलिये महामण्डल के शिशु-विभाग और नारी-संगठन में भी शारीरिक व्यायाम के प्रशिक्षण को सबसे अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।  
इस मंत्र में ईश्वर (मार्गदर्शक नेता या सद्गुरु) हमे उपदेश दे रहे हैं -समानता से एक दूसरे के साथ संबंध जोड़ो, समता भाव से मिल जाओ। तुम्हारे मन समान संस्कारों से युक्त हों। कभी एक दूसरे के प्रति हीनता का भाव न रखो। किसी को अपने से तुच्छ या छोटा न समझो, क्योंकि प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है ! जैसे अपने प्राचीन श्रेष्ठ युग (सत्ययुग) के समय ज्ञानी लोग वर्णाश्रम धर्म के अनुसार अपना-अपना कर्तव्य पालन करते रहे, वैसे तुम भी अपना कर्तव्य पूरा करो। 
किन्तु समानता (वेदान्तिक साम्यभाव ) की अवधारणा होना कठिन है। इसका अर्थ यह नहीं है कि शारीरिक या बौद्धिक क्षमता की दृष्टि से कोई छोटा और बड़ा नहीं होता, सब बराबर हैं। कोई भी कर्म छोटा नहीं है, किन्तु कर्म करने की पीछे की भावना - के अनुसार  छोटे और बड़े फल तो अपने कर्मों के अनुसार (कर्मयोग के अनुसार) ही प्राप्त होते हैं। इसलिए समानता का अर्थ है कि नेता (लोकशिक्षक या गुरु) बिना  पक्षपात के, सब के साथ उनकी‌ क्षमता, योग्यता तथा उनकी आवश्यकताओं के अनुसार व्यवहार करता है। तुम समान ज्ञान प्राप्त करो, अर्थात शिक्षापद्धति में कोई भेदभाव न हो, क्योंकि शिक्षार्थी ज्ञान तो अपनी योग्यता  तथा क्षमता के अनुसार अलग अलग प्राप्त करेंगे। 
आज समाज की, अर्थात समाजसेवी संगठनों की स्थिति, या देश की स्थिति इससे विपरीत चल रही है। हमें पता है कि संगठन में शक्ति है – ' संघे शक्ति कलौयुगे'। परंतु आज नेतृत्व (लीडरशिप) ऐसे लोगो के पास है जो जनता (या संगठन) को धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, भाषा के नाम पर प्रांत के नाम पर बांट रहे हैं। 'नेताओ का चुनाव' भी उनकी योग्यता के आधार पर नही होता जाति या घर्म के नाम पर होता है। अपने मानव समाज और उसकी व्यवस्था को या किसी समाजसेवी संगठन को एक मशीन की तरह मानें तो जैसे मशीन के हर पुर्ज़े का महत्व है, हर पुर्ज़े का अपना काम है। सब पुर्ज़े ठीक से अपना अपना काम कर रहे हैं तो मशीन ठीक से चलती रहती है यदि कोई एक छोटा सा पुर्ज़ा भी काम न करे तो मशीन रुक जाती है। 
इसी तरह मानव समाज या  संगठन ठीक से चलता रहे , मिलकर काम करें इसके लिए ईश्वर का आदेश है (मानवजाति के भावी मार्गदर्शक नेताओं या वुड बी लीडर्स को -अवतार वरिष्ठ श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदाध्यापक प्रशिक्षण परम्परा में प्रशिक्षित नेता पूज्य नवनीदा का आदेश है) है मिलकर चलो , मिलकर बोलो और एक ही तरह सोचो ताकि लक्ष्य (भारत का कल्याण) की प्राप्ति हो सके। एक ही उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए इस मिलकर चलने की प्रक्रिया में (चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया में) मनुष्य (भावी नेता) को अपना स्वार्थ छोड़ना होगा, पद का लालच और पद का घमण्ड भी छोड़ना होगा। क्योंकि, ये विरोधी विचार हैं, जो नकारात्मक चिंतन को उपजाते हैं। 
हम सभी दीवार के 'कंगूरे' नही बन सकते हैं किसी को 'नींव का पत्थर' भी बनना है। और यह भी सत्य है, कि नींव के पत्थर की मज़बूती पर ही भवन की मज़बूती निर्भर करती है। आप जो इस महामण्डल रूपी चमकीली, सुंदर, सुघड़ इमारत - को आप देख रहे हैं; वह किस पर टिकी है ? इसके कंगूरों (शिखर) को आप देखा करते हैं, क्या आपने कभी इसकी नींव की ओर ध्यान दिया है?  दुनिया चकमक देखती है, ऊपर का आवरण देखती है, आवरण के नीचे जो ठोस सत्य है, उस पर कितने लोगों का ध्यान जाता है ? 
कंगूरा और नींव की ईंट के महत्व पर प्रकाश डालते हुए श्री रामवृक्ष बेनीपुरी जी ने कहा है -  " इन्द्रियातीत सत्य, परम सत्य या ठोस 'सत्य' सदा  'शिवम्' होता ही है, किंतु वह हमेशा 'सुंदरम्' भी हो यह आवश्यक नहीं है। सत्य कठोर (अपरिवर्तनशील) होता है, कठोरता और भद्दापन साथ-साथ जन्मा करते हैं, जिया करते हैं। हम कठोरता से भागते हैं, भद्देपन से मुख मोड़ते हैं - इसीलिए सत्य से भी भागते हैं। नहीं तो इमारत के गीत हम नींव के गीत से ही प्रारंभ करते। 
वह ईंट (किसी समाजसेवी संगठन के अध्यक्ष-सचिव का पद) महान है, जो कट-छँटकर कंगूरे पर चढ़ती है और बरबस लोक-लोचनों को आकृष्ट करती है। किंतु, धन्य है वह ईंट, जो  ज़मीन के सात हाथ नीचे जाकर गड़ गई और इमारत की पहली ईंट (नवनीदा) बनी! क्योंकि उसी पहली ईंट पर, उसकी मज़बूती और पुख़्तेपन पर- सारी इमारत की अस्ति-नास्ति निर्भर करती है। उस ईंट को हिला दीजिए, कंगूरा बेतहाशा ज़मीन पर आ गिरेगा। कंगूरे के गीत गानेवाले हम, आइए, अब नींव के (महामण्डल शिविर में डी.सी.सी.
फिल्ड 'सुभाष राय और अनूप पांजा' के) गीत गाएँ। महामण्डल के संघगीत का अर्थ समझे और उन्मुक्त कंठ से गायें ! 
वह ईंट जो ज़मीन में इसलिए गड़ गई कि दुनिया को इमारत मिले, महामण्डल संगठन रूपी कंगूरा मिले! वह ईंट (पूज्य नवनीहरन मुखोपाध्याय) जो सब ईंटों से ज़्यादा पक्की थी, जो ऊपर लगी होती तो कंगूरे की शोभा सौ गुनी कर देती! किंतु जिस ईंट ने यह समझ लिया कि इमारत की पायदारी (टिकाऊपन) उसकी नींव पर मुनहसिर (निर्भर) होती है, इसलिए उसने अपने को नींव में अर्पित किया। 
वह ईंट जिसने अपने को सात हाथ ज़मीन के अंदर इसलिए गाड़ दिया कि इमारत सौ हाथ ऊपर तक जा सके। वह ईंट जिसने अपने लिए अंधकूप इसलिए कबूल किया कि ऊपर के उसके साथियों को स्वच्छ हवा मिलती रहे, सुनहली रोशनी मिलती रहे। वह ईंट जिसने अपना अस्तित्व इसलिये विलीन कर दिया कि संसार एक सुंदर सृष्टि देखे। 
सुंदर भारत का निर्माण! सुंदर सृष्टि (संगठन) हमेशा से ही बलिदान खोजती है, बलिदान ईंट का हो या व्यक्ति का। हमारा समाज (या संगठन) सुंदर बने, इसलिए कुछ तपे-तपाए लोगों को 'मौन-मूक शहादत का लाल सेहरा' पहनना ही पड़ता है। शहादत भी (मार्टर्डम, स्वधर्मार्थ प्राण त्याग) वही सच्ची है जो और मौन-मूक हो ! (जैसे नवनीदा ने खड़दह से कोननगर में आकर दी थी। और कोननगर से खड़दह तक की शवयात्रा में, विभिन्न राज्यों से आये महामण्डल के हजारों अनुशासित कर्मी 'मौन-मूक' होकर चल रहे थे, किसी भी अख़बार ने उनकी शहादत की खबर नहीं छापी ! पर वे अमर हैं ! )  जिस शहादत (गाँधी) को शोहरत मिलती है, जिस बलिदान को प्रसिद्धि प्राप्त होती है, उसको ही इमारत का कंगूरा, या मंदिर का कलश कहते हैं। हाँ, सच्ची शहादत तो वही है, जो मौन और मूक होती है! (जैसे नेताजी, नवनीदा जैसी शहादत) ऐसी शहादत ही सुन्दर समाज (या सुन्दर संगठन) की आधारशिला यही होती है। 
कुछ लोग सोचते हैं कि ईसा की शहादत ने ईसाई धर्म को अमर बना दिया ; वे कहते हों तो कहें। किंतु मेरी समझ से ईसाई धर्म को अमर बनाया उन लोगों ने, जिन्होंने उस धर्म के प्रचार में अपने को अनाम उत्सर्ग (कुर्बान) कर दिया। उनमें से कितने ज़िंदा जलाए गए, कितने सूली पर चढ़ाए गए, कितने वन-वन की ख़ाक छानते हुए जंगली जानवरों का शिकार हुए, कितने उससे भी भयानक भूख-प्यास के शिकार हुए। उनके नाम शायद ही कहीं लिखे गए हों - उनकी चर्चा शायद ही कहीं होती हो। किंतु ईसाई धर्म उन्हीं के पुण्य प्रताप से फल-फूल रहा है। वे नींव की ईंट थे, गिरजाघर के कलश उन्हीं की शहादत से चमकते हैं।यदि आज हमारा देश आज़ाद हुआ है, तो सिर्फ़ उन लोगों के बलिदानों के कारण नहीं, जिन्होंने इतिहास में स्थान पा लिया है। देश का शायद ही कोई ऐसा कोना हो, जहाँ कुछ ऐसे दधीचि नहीं हुए हों, जिनकी हड्डियों के दान ने ही विदेशी वृत्रासुर का नाश किया। 
हमारा कर्तव्य है,अर्थात धर्म है, ऐसी नींव की ईटों की ओर ध्यान देना। सदियों के बाद हमने नई समाज की सृष्टि की ओर कदम बढ़ाया है। इस नए समाज (सुन्दर संगठन) के निर्माण के लिये भी हमें नींव की ईंट चाहिए।अफ़सोस कंगूरा बनने के लिए चारों ओर होड़ा-होड़ी मची है, नींव की ईंट बनने की कामना लुप्त हो रही है। सात लाख़ गाँवों का नव-निर्माण! हज़ारों शहरों और कारखानों का नव-निर्माण! कोई एक शासक इसे संभव नहीं कर सकता। ज़रूरत है ऐसे नौजवानों की, जो इस काम में अपने को चुपचाप खपा दें। जो एक नई प्रेरणा से अनुप्राणित हों, एक नई चेतना से अभीभूत, जो शाबाशियों से दूर हों, दलबंदियों से अलग।जिनमें कंगूरा बनने की कामना न हो, कलश कहलाने की जिनमें वासना न हो। सभी कामनाओं से दूर - सभी वासनाओं से दूर। उदय के लिये आतुर हमारा समाज चिल्ला रहा है। हमारी नींव की ईंटें किधर हैं? देश के नौजवानों को यह चुनौती है!--रामवृक्ष बेनीपुरी***। 
(रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म सन 1902 में बिहार के मुज़फ़्फरपुर जनपद के अंतर्गत बेनीपुर गाँव में हुआ था।प्रारंभिक शिक्षा गाँव में हि हुई, किंतु मैट्रिक पास करने से पहले ही वह गाँधी जी के असहयोग आंदोलन में कूद पड़े और कई बार उन्हें जेल जाना पड़ा।  छोटी उम्र से ही वे अख़बारों में लिखने लग गए थे।उन्होंने 'तरुण भारत','किसान-मित्र','बालक','युवक','कर्मवीर','हिमालय' और 'नई धारा' जैसी पत्रिकाओं का संपादन भी किया। )
जब तक मनुष्य भ्रम में रहता है, अज्ञान या हिप्नोटाइज्ड अवस्था में रहता है, वह पंचेन्द्रियग्राह्य जगत को ही सत्य समझता है। हमलोग बचपन में यही देखते और समझते थे कि सूर्य घूमता है, और पृथ्वी स्थिर है। और हम यह मान बैठे थे कि जिसे हम देख नहीं सकें वह सत्य नहीं है, किन्तु बड़े होने पर पता चलता है कि यह तो हमारी भ्रान्त धारणा थी ! बुद्धि की मूढ़ धारणा थी ! सत्य (अविनाशी आत्मा या ईश्वर या 3rd 'H') तो ढूँढ़ने से ही प्राप्त होता है। या यूँ कहें की कोई विरला 'एथेन्स का सत्यार्थी' सत्य की खोज करता है, और एक दिन उस सत्य को अपने भीतर ही आविष्कृत कर लेता है ! वह सत्यार्थी 'अन्तःप्रकृति पर विजय प्राप्त करके अपने ब्रह्मभाव को व्यक्त करता है,और मुक्त (डीहिप्नोटाइज्ड) हो जाता है'। स्वामी जी कहते हैं -" बस, यही धर्म का सर्वस्व है। मतवाद (डॉक्ट्रिन्स), अनुष्ठान-पद्धति, शास्त्र, मन्दिर या मूर्तियाँ (forms) तो उसके गौण ब्योरे मात्र हैं!"  
हरिवंशराय बच्चन द्वारा लिखित एक कविता 'कलश और नींव का पत्‍थर'  निम्नलिखित व्याख्या के साथ सन १९६१ में आकाशवाणी केन्द्र, नई दिल्ली से प्रसारित की गयी थी।  
अभी कल ही पंचमहले पर कलश था,
और चौमहले,तिमहले,दुमहले से खिसकता-
 अब हो गया हूँ नींव का पत्थर !
काल ने धोखा दिया,या फिर दिशा ने,या कि दोनों में विपर्यय;
एक ने ऊपर चढ़ाया,दूसरे ने खींच नीचे को गिराया,
अवस्था तो बढ़ी, लेकिन व्यवस्थित हूँ कहाँ घटकर !
आज के साथी सभी मेरे कलश थे, 
आज के सब कलश कल साथी बनेंगे। 
हम इमारत,जो कि ऊपर से उठा करती बराबर और नीचे को धँसी जाती निरंतर। 
 "यहाँ कलश किसी भवन के ऊँचे भाग का प्रतीक है--हालाँकि आधुनिक भवन निर्माण कला में कलश नहीं रक्खा जाता पर प्रतीक अपना अर्थ त्यागने को तैयार नहीं। नींव का पत्थर ईमारत का सबसे निचला भाग हुआ। जीवन के किसी भी क्षेत्र की उपलब्धि को इमारत का रूपक दिया जा सकता है। 
हर क्षेत्र में कुछ चीजें नींव के पत्थर की जगह होती हैं। उन्हीं के ऊपर सारी इमारत का दामोदर होता है, पर वे दिखाई नहीं देतीं। कलश भले ही ऊपर दिखाई दे, भवन का श्रृंगार हो, पर उसपर निर्भर नहीं रहा जा सकता; वही सारी इमारत पर निर्भर रहता है।
पर गतिमान जीवन की कोई उपलब्धि स्थिर नहीं। जो कलश बनकर ऊपर ऊपर रहता है, उसे समय पा कर बल संचित करना, और ऊपर के कलशों को संभालना पड़ता है। यह विचित्र है कि अधिक बल पाकर, अधिक महत्वपूर्ण बनकर उसे नीचे जाना पड़ता है। और, दिखावटी और निर्बल ऊपर आते जाते हैं।  किसी स्थिति पर नींव की ओर जाने वाले को असन्तोष भी हो सकता है - जो हल्के और दिखावटी हैंवे तो ऊपर हैं; जो भारी और ठोस हैं, वे नीचे ! इस कविता में इस असन्तोष को समझा और दूर किया गया है। ]  

किसी एक ही उद्देश्य के लिए समर्पित समाज या संगठन के कार्यकर्ताओं को सौंपा गया कोई भी काम छोटा या कोई बड़ा नहीं है। इसके लिए ज़रुरी है कि सब अपना काम सुव्यवस्थित ढंग से करते रहें। एक दूसरे की सहायता करते हुए आगे बढ़ते रहें। अंधे और लंगड़े का सहयोग भी अच्छा उदाहरण है। अंधा देख नहीं पाता, चल सकता है और लगड़ा देख पाता है चल नहीं सकता। अंधे ने लगड़े को अपने कंधे पर बैठाया । अंधा चल रहा था और लंगड़ा मार्ग दिखा रहा था। दोनों ही लक्ष्य तक पहुँच गए। ये कहानियां तो केवल उदाहरण है। सत्य तो यही है कि एक दूसरे की सहायता करते हुए मिलकर चलो। सारे सांसारिक सुख व सम्पत्तियाँ तुम्हारे लिए है।

समानो मन्त्र: समिति: समानी समानं मन: सहचित्तमेषाम्।
 समानं मन्त्रमभिमन्त्रये व: समानेन वो हविषा जुहोमि || 
ईश्वर (विष्णु-अवतार या नेता) सत्ययुग स्थापित करने या सनातन धर्म को पुनरस्थापित करने में लगे हुए भावी नेताओं को आगे आदेश देते हैं - ' तुम्हारे आदर्श और विचार (दया नहीं शिव ज्ञान से जीव सेवा)
समान हों, तुम्हारे लक्ष्य एक हों तथा उनके प्राप्त करने के लिये उपाय भी एक समान हों। तुम्हारी सभा सबके लिए समान हो, अर्थात सभा में किसी के साथ पक्षपात न हो और सबको यथा योग्य सम्मान प्राप्त हो। तुम सबका संकल्प (मैं एक चरित्रवान मनुष्य बनूँगा !) एक समान हो। तुम सबका चित्त एक समान-भाव से भरा हो। एक विचार होकर किसी भी कार्य में एक मन से लगो। इसीलिए तुम सबको समान छवि या मौलिक शक्ति मिली है। 

समानी व आकूति: समाना हृदयानि व:|
समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति || 
(आकूति का अर्थ होता है - इच्छा, उद्देश्य, प्रयोजन, उत्साह, सदाचार, स्वायंभुव मनु की एक कन्या जो रुचि नामक प्रजापति को ब्याही गयी थी।)
मानवजाति के मार्गदर्शक नेता (अवतार या ईश्वर) अब आदेश दे रहे हैं - 'तुम सब के जीवन का उद्देश्य  
(सर्वोच्च को प्राप्त करना -या भारत का कल्याण)  एक जैसा हो। तुम्हारा हृदय सामान हों (अर्थात सबके ह्रदय विशाल हों -वहाँ अहं नहीं ठाकुर देव बैठे हों), तुम्हारा मन समान हो (अन्तःप्रकृति पर विजय मिले) । तुममें परस्पर मतभेद न हो। तुम्हारे मन के विचार भी समता युक्त हों। यदि तुमने इस प्रकार अपनी एकता और संगठन स्थापित की तो तुम यहां उत्तम रीति से आनंदपूर्वक रह सकते हो और कोई शत्रु तुम्हारे राष्ट्र को हानि नही पहुंचा सकता है।
किन्तु ब्रिटिश शासन काल में पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के चका-चौन्ध या आडम्बरी जीवन को देखकर भारत चकित हो गया, और भारत का पढ़ा-लिखा अभिजात्य वर्ग अंग्रेजी सभ्यता का अन्धानुकरण करने लगा. और अंग्रेजों के कथनानुसार वेदों-उपनिषदों के ज्ञान को गड़ेड़ीयों का गीत समझकर अंग्रेजी शिक्षापद्धति में पले-बढ़े आधुनिक भारत ने अपनी आत्मश्रद्धा को ही खो दिया। सनातन धर्म को भूलकर ये लोग शराब, क्लब, नाच को ही सभ्यता समझ बैठे। भोगवादी सभ्यता को अपना लेने से आजाद भारत में प्रतियोगिता और प्रतिस्पर्धा का बोलबाला हो गया.
आजाद भारत के नेताओं ने स्वामीजी के परामर्श -'पहले मनुष्य बनो और बनाओ ' पर कभी ध्यान नही दिया जिसके फलस्वरूप स्वामीजी का नया भारत गढ़ने का स्वप्न पूरा नहीं हुआ. भारत चावल-गेहूँ के उत्पादन में विश्व का दूसरा बड़ा राष्ट्र है।  दुग्ध-उत्पादन में भारत विश्व में प्रथम स्थान रखता है। अन्तरिक्ष में उपग्रह को भेजने वाले क्रायोजेनिक इंजन का स्वदेश में निर्माण कर लिया गया है।  फिर भी क्या कारण है कि आज भी भारत की ६० % आबादी गरीबी रेखा के नीचे अपना जीवन बिताने को मजबूर है ? शिक्षा का दर पुरुषों में ६० % और स्त्रियों में २७ % ही क्यों है ? एक ओर धनियों के लिये जहाँ बड़े बड़े महल हैं वहीं दरिद्रों की टूटी फूटी झोपड़ियाँ भी हैं. शिशु को पौष्टिक आहार नहीं मिलता है, एक ओर पाँचतारा सुविधा से युक्त हॉस्पिटल हैं, वहीँ बीमार होने पर  गरीबों को उचित उपचार की सुविधा भी नहीं है. 
इन्हीं  विरोधाभासों के कारण भारत की राष्ट्रीय एकता में बाधा पहुँचती है. भारत को छोटे छोटे टुकड़ों में बाँटने की साजिशें चलती रहती है. हमलोग मानवाधिकार को लेकर तो बहुत व्यस्त रहते हैं, किन्तु मनष्यों का कुछ कर्तव्य भी होता है, जिसका पालन करने से ही उसके अधिकार सुरक्षित रह सकते हैं. उन कर्तव्यों को सूचीबद्ध करने की ओर किसी का ध्यान क्यों नहीं जाता ? कुछ स्वार्थी लोग अधिक भोग के लालच में सत्ता की कुर्सी पाने के लिये जिन राज्यों को बाँट कर उनकी संख्या में वृद्धि तो कर रहे हैं, किन्तु झारखण्ड आदि राज्यों में केवल कुर्सी-कुर्सी का खेल चल रहा है, आम जनता की  स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. 
जबकि स्वामीजी ने बहुत पहले ही कहा था -" जनसाधारण की उपेक्षा ही राष्ट्रीय-महापाप है ! उन्हें कौन प्रकाश देगा, कौन उन्हें शिक्षित बनाने के लिये द्वारा द्वार तक घूमेगा? उसी को मैं महात्मा कहता हूँ, जिसका हृदय गरीबों के लिये रोता है, अन्यथा वह तो दुरात्मा है. जब तक करोड़ो देश-वासी भूखे और अशिक्षित रहेंगे, तब तक मैं प्रत्येक उस आदमी को विश्वासघातक समझूँगा, जो उनके खर्च पर शिक्षित हुआ, परन्तु सत्ता की कुर्सी या सरकारी नौकरी मिल जाने के बाद उन पर तनिक भी ध्यान नहीं देता।"
स्वामी विवेकानन्द ने अग्रेजों के अत्याचारों से त्रस्त और हताशा में डूबे भारतवर्ष में स्वतंत्रता की चाह उपजायी। गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारतीय समाज को स्वतंत्रता का मंत्र देते हुए उन्होंने कहा, “आगामी पचास वर्ष के लिए यह जननी जन्मभूमि भारतमाता ही मानो आराध्य देवी बन जाए। तब तक के लिए हमारे मस्तिष्क से व्यर्थ के देवी- देवताओं के हट जाने में कुछ भी हानि नहीं है। अपना सारा ध्यान इसी एक ईश्वर पर लगाओ, हमारा देश ही हमारा जाग्रत देवता है। सर्वत्र् उसके हाथ हैं, सर्वत्र् उसके पैर हैं और सर्वत्र उसके कान हैं। समझ लो कि दूसरे देवी-देवता सो रहे हैं। जिन व्यर्थ के देवी-देवताओं को हम देख नहीं पाते, उनके पीछे तो हम बेकार दौडें और जिस विराट् देवता को हम अपने चारों ओर देख रहे हैं, उसकी पूजा ही न करें? जब हम इस प्रत्यक्ष देवता की पूजा कर लेंगे, तभी हम दूसरे देव-देवियों की पूजा करने योग्य होंगे, अन्यथा नहीं।”
" याद रखो की राष्ट्र झोपड़ी में बसा है; परन्तु हाय! उन लोगों लिये कभी किसी ने कुछ किया नहीं। हमारे आधुनिक सुधारक विधवाओं के पुनर्विवाह कराने में बड़े व्यस्त हैं. निश्चय ही मुझे प्रत्येक सुधार से सहानभूति है; परन्तु राष्ट्र की भावी उन्नति उसकी विधवाओं को मिले पतियों की संख्या पर नहीं, बल्कि ' आम जनता की हालत ' पर निर्भर है।  क्या तुम जनता की उन्नति कर सकते हो ? उनकी स्वाभाविक आध्यात्मिक वृत्ति (पूजा और नमाज की पद्धति) को बनाये रखते हुए, क्या तुम उनके खोये हुए व्यक्तित्व (individuality या आत्मश्रद्धा) उन्हें वापस दे सकते हो ? क्या समता, स्वतंत्रता; कार्य-कौशल तथा पौरुष में तुम पाश्चात्यों के भी गुरु बन सकते हो ? क्या तुम उसी के साथ साथ स्वाभाविक आध्यात्मिक अन्तःप्रेरणा तथा आध्यात्म-साधनाओं में कट्टर सनातनी हिन्दू भी हो सकते हो ? यह काम हमें करना है, और हम इसे करेंगे ही !  (" Yes, We Can ! We Will Do !) तुम सबने इसीके लिये जन्म लिया है."
केवल स्वामीजी द्वारा निर्देशित 'चरित्र-निर्माण और मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा ' के बल पर ही भारत एक उन्नत राष्ट्र बन सकता है, तथा राष्ट्रिय एकता भी अखण्ड रह सकती है. स्वामीजी ने कहा था " धर्म के दो पक्ष हैं, एक उसका आनुष्ठानिक पक्ष है- जैसे पूजा और नमाज; दूसरा उसका अध्यात्मिक पक्ष है-'एक नूर से सब जग उपजा' इस सत्य को समझकर पृथ्वी के सभी संप्रदाय के लोगों से प्रेम और क्षमा का व्यवहार रखना। 
स्वामीजी का मानना था कि विश्व के सभी धर्म एक ही बात कहते हैं- " To do good and to be good ! this is whole of Religion. " धर्म वह वस्तु है, जो पशु-मानव  को मनुष्य में तथा मनुष्य को देवता में उन्नत करा देता है " धार्मिक मनुष्य का अर्थ है चरित्रवान, पवित्र जीवन और प्रेमपूर्ण ह्रदय वाला मनुष्य। विभिन्न जाति-संप्रदाय के मनुष्यों की पूजा या नमाज की पद्धतियों, बाहरी वेश-भूषा, आचार-अनुष्ठान में अंतर रहना बहुत स्वाभाविक है. यदि बगीचे में एक ही रंग के फूल खिले हों, तो शोभा नहीं होती, रंग-बिरंगे फूलों से ही बगीचे की शोभा बढती है। किसी शायर ने कहा है - चमन की शोभा फूलों के विविध रंग और खुशबू के मेल-जोल से बढ़ती है:  
चमन में इख़्तिलात-ए-रंग-ओ-बू से बात बनती है।
 हम ही हम हैं तो क्या हम हैं,  तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो।  
(चमन = बगीचा), (इख़्तिलात = मेल-जोल),(इख़्तिलात-ए -रंग-ओ-बू = रंग और ख़ुशबू का मेल-जोल) पहले तो हम सभी भारतवासी इस बात पर सहमत थे कि - “ तुम ‘हम’ हैं और  हम ‘तुम’! अब हमें ये  क्या हो गया कि तुम ‘तुम’ हो गए और हम ‘हम’?” निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि -  ‘मैं’ और ‘तू’  का द्वैत या अपने -पराये का भ्रम ही समस्त समस्याओं का उत्स है। और वेदान्त परम्परा में चरित्रवान मनुष्य बनने का प्रशिक्षण प्राप्त कर,स्वयं के 'ब्रह्मभाव को व्यक्त करते हुए अपने -पराये के भ्रम से मुक्त हो जाना' ही समस्त समस्याओं का निदान है। 
यदि  इस उक्ति  को आध्यात्मिक-दार्शनिक अर्थों में न लेकर,  केवल व्यवहारिक अर्थ में भी देखें, तो भी घृणा और नफरत घाटे का सौदा है। नकारात्मक विचार ही हमें मनुष्य से पशु में परिवर्तित कर देते हैं। और हिन्दू-मुसलमानों को अपना वोट बैंक मानने वाली, क्षद्म-धर्मनिरपेक्षता का सहारा लेकर  जाति और धर्म के नाम पर भारतीय प्रजा  में झगड़ा कराने वाली, राजनितिक पार्टीयां  किसी न किसी जाति-विशेष या  संप्रदाय-विशेष को चुनाव के समय अपना वोट-बैंक बनाने के लिये 'मानव-पशुओं' के बीच दंगे करवाती रहती हैं।  
इसीलिये श्रीरामकृष्ण ने ' सर्वधर्म समन्वय ' को स्थापित करते हुए कहा था -जितने मत उतने पथ ! जिस  किसी भी साधन-पद्धति (पूजा- नमाज ) को अपनाकर मनुष्य निःस्वार्थी बन जाता हो, वही धर्म है!क्योंकि स्वार्थी मनुष्य ही अशिक्षित और गरीब लोगों का शोषण करते हैं. इसीलिये चाहे हम किसी भी संप्रदाय में जन्म ग्रहण किये हों, निःस्वार्थी मनुष्य बनना ही हमारा प्रथम कर्तव्य है. स्वामीजी कहते थे, विभिन्न लेबल या ब्राण्ड से चिपके तथाकथित धार्मिक लोग जी ' त्रिपुण्ड और टोपी ' धारण करने को ही धर्म समझते हैं,और वैज्ञानिक तर्क की कसौटी पर खरे नहीं उतरते वैसे ही क्षद्म-धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाले राजनितिक पार्टियाँ सत्ता की कुर्सी पाने के लिये धर्मों के बीच भाईचारे और सौहार्द को नष्ट कर देते हैं. जब मनुष्य " मेरा धर्म बड़ा है, नहीं तेरा धर्म नहीं- मेरा धर्म बड़ा है !"  कहकर आपस में झगड़ा करने लगता है तो वह निःस्वार्थी बनने के बजाये - राक्षस जैसा बन जाता है और शैतान की तरह उन्मादी आचरण करने लगता है, अगर क्षद्म-धर्मनिरपेक्षता की प्रतिमूर्ति दिगविजय सिंह के शब्दों में कहें तो - ' आदरणीय हफ़िज सईदजी ' जो २६/११ का मास्टर माइण्ड था,- जैसा बन जाता है।  
इसीलिये स्वामीजी ने कहा था, सम्पूर्ण भारत को आध्यात्मिकता या रूहानियत से प्लावित कर दिया जायेगा; जब सभी धर्म के लोग एक दुसरे की अनुष्ठानिक पद्धति पूजा-नमाज पर न झगड़ कर; समस्त धर्मों की सार बात निःस्वार्थपरता और प्रेम को जीवन में धारण कर लेंगे तो यह राष्ट्रिय एकता ही विश्व-शान्ति या वसुधैव कुटुम्बकम का रूप धारण कर लेगी।'
स्वामीजी कहते हैं - " अद्वैत-वेदान्त के सागर में विश्व के समस्त धर्म -'हिन्दू-मुसलमान-पारसी-सिख-ईसाई' एक हो जाते हैं, वेदान्त की भूमि पर खड़े होकर देखने से वेद-कुरान और बाइबिल में कोई विरोध नजर नहीं आता है। उनहोंने कहा था कि सर्व-धर्म समन्वय की बुनियाद पर जो नया भारत बनेगा-उसका ह्रदय आध्यात्मिकता या रूहानियत जन्य प्रेम से परिपूर्ण होगा, उसका शरीर इस्लामिक भाईचारे द्वारा गठित और मस्तिष्क वेदान्त द्वारा गठित होगा। वेदान्तिक मस्तिष्क और इस्लामिक शरीर के साथ हृदय की रूहानियत या प्रेम को मिला देने से जब विभिन्न मतावलंबियों में अभेद भाव स्थापित हो जायेगा, तो राष्ट्रीय एकता भी स्थापित हो जाएगी। क्योंकि ह्रदय का प्रेम ही एकता का वह सूत्र है, जिसमे राष्ट्रीय एकता की भावना को पिरोया जा सकता है. 
वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के अनुसार - ‘किसी भी सरकार का एक ही धर्मग्रंथ होता है और वह है हमारा संविधान। एक ही प्रार्थना होती है वह है भारत भक्ति। सरकार की एक ही शक्ति है वह है उसके 125 करोड़ भारतवासी और जाति-धर्म के नाम पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होनी चाहिए।'  यजुर्वेद 36.10.18  में हमारे ऋषि कहते हैं - 
                    ’मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे। मित्रस्य समीक्षामहे।। 
सब व्यक्ति मुझे मित्र की दृष्टि से देखें। मैं भी सभी व्यक्तियों को मित्र (भगवती-भगवान) की दृष्टि से देखूं। सभी परस्पर मित्र की दृष्टि से देखा करें। हे दृढ़ता के देव ! आप हमें चरित्र की वही दृढ़ता दीजिये। ]
[यह लेख जलपाईगुड़ी महामण्डल के भाई समीर दासगुप्ता, सचिव; उत्तर बंगाल विवेकानन्द युवा महामण्डल द्वारा २००५ के सरिसा में आयोजित कैम्प के बंगला भाषण पर धारित है। ] 
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[ राष्ट्रीय एकता और स्वामी विवेकानन्द ( জাতীয় সংহতি ও স্বামী বিবেকানন্দ " হিংদী  অনুবাদ स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना)]
हाल के दिनों से  ' राष्ट्रीय-एकता ' शब्द का व्यवहार होने लगा है। पहले बहुधा ' राष्ट्रीय-अखण्डता ' या  ' राष्ट्र निर्माण ' की बात होती थी। किन्तु राष्ट्र की साधारण जनता के बीच अनेको विभिन्नतायें रहने पर भी उनमें एकत्व का अनुसन्धान करना अथवा देश की सामान्य जनता में राष्ट्रीय एकता की चेतना को जाग्रत करना ही ' राष्ट्र-निर्माण ' का भी मूल उद्देश्य था।
स्वामी विवेकानन्द ने कहा था - " साधारण जनता ( जो अपने को ' We the people of India ' समझती है ) सारी शक्ति का आधार रहने पर भी उसने आपस में इतना भेद कर रखा है कि वह अपने सब अधिकारों से वंचित है, और जब तक ऐसा भाव रहेगा तब तक उसकी यही दशा रहेगी।" (९/२२२)
इसी आपसी मतभेद को कम करने के लिए इन दिनों राष्ट्रीय अखंडता ' National Unity 'या  ' Nation Building ' कहने के बदले ' National Integration 'या ' राष्ट्रीय एकता ' कहा जाने लगा है। पुराने शब्दों के बदले इस नये शब्द का व्यवहार करने के पीछे लगता है कुछ तात्पर्य है. हो सकता है कि ' विविधता में एकता ' का बोध हमेशा बहुत कार्यकारी नहीं रही हो. किन्तु हाल के दिनों में पृथकता (विभिन्नता) को आधार बना कर ' राष्ट्र की एकता ' को कमजोर करने के लिये कुछ  'Centrifugal Forces  ' केन्द्रापसारी शक्तियों  को भारत में कार्यरत देखा जा रहा है। यह केन्द्रापसारी शक्ति राष्ट्र में विघटन (Disintegration) लाने का कार्य करती है इसीलिए जो शक्ति इस विघटन को रोकने का प्रयास करती है, उसे Integrating Force या एकीकरण की शक्ति कह कर इसका वर्णन करना जरुरी हो जाता है. वर्तमान समय में यह विषय और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है.
पहले यह समझने की चेष्टा की जाये कि भारतवर्ष में जाति या राष्ट्रीयता कहने से क्या समझा जाता है. छोटी छोटी जातियाँ आसानी से जाति-राज्य  (Nation -State) के रूप में स्थापित हो सकतीं हैं. किन्तु भारतवर्ष की भौगोलिक सीमारेखा के भीतर किसी एक ही जाति (Race) का निवासस्थान कभी नहीं रहा था।
यहाँ बहुत प्राचीन जाति के लोग पीढ़ीयों से रहते थे, आर्य लोग थे, आर्यों के समाज में भी बहुत सी उपजातियाँ भी थीं, फिर बाहर के देशों से भी कई जातियों ने यहाँ शरण लिया और यहीं के हो कर रह गये. तथापि इस उप-महादेश में, इसके उत्तर-दिशा में उत्तुंग  हिमालय और बाकी तीन दिशाओं में समुद्र से घिरे इस भूखण्ड में बाह्यजगत के साथ अपर्याप्त सम्पर्क के बीच समस्त जातियों  में अनेक भाषा, अनेक अनुभाग, अनेको प्रकार का रहन-सहन, शारीरिक गठन में अनेकों विविधता रहने के वावजूद एक प्रकार का एक्य प्रतिष्ठित हुआ था।
आखिर एकीकरण का वह रसायन क्या था ? इतनी विविधताओं के रहने पर भी, आखिर एकत्व का वह वास्तविक सूत्र क्या था, जिसने इतनी विविधताओं के रहने पर भी भारितीय जनसाधारण  को विभिन्न फूलों की माला के समान बाँधे रखा था ? वह सूत्र, वह पारद-रंजन रसायन था- इस देश का योग-वेदान्त -धर्म ! " अति प्राचीन युग में एक महापुरुष - एक वैदिक ऋषि प्रकट हुए, और उन्होंने घोषित किया- ' एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति ' अर्थात वास्तव में संसार में एक ही वस्तु (ईश्वर) है; ज्ञानी लोग उसी एक वस्तु का नाना रूपों में वर्णन करते हैं...ऐसा महान सत्य इसके पहले कभी आविष्कृत नहीं हुआ था! और यही महान सत्य हमारे हिन्दू राष्ट्र के राष्ट्रिय जीवन का मेरुदण्ड-स्वरुप हो गया है।
सैकड़ों सदियों तक इस तत्व-  ' एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति ' का हमारे यहाँ प्रचार होते होते हमारा राष्ट्रिय जीवन उससे ओतप्रोत हो गया है. यह सत्य सिद्धान्त हमारे खून के साथ मिल गया है, हमलोग इस महान सत्य को बहुत पसन्द करते हैं, इसीसे हमारा देश धर्मसहिष्णुता का एक उज्जवल दृष्टान्त बन गया है !
..समग्र संसार हमसे इस धर्मसहिष्णुता की शिक्षा ग्रहण करने के इन्तजार में बैठा हुआ है,आधुनिक सभ्यता के अन्दर यह भाव प्रवेश करने पर उसका विशेष कल्याण होगा. वास्तव में उस भाव का समावेश हुए बिना कोई भी सभ्यता स्थायी नहीं हो सकती।
जब तक धर्मोन्माद, खून-खराबी और पाशविक अत्याचारों का अन्त नहीं होता तब तक किसी सभ्यता का विकास ही नहीं हो सकता. जब तक हम लोग एक दूसरे के साथ सद्भाव रखना नहीं सीखते, तब तक कोई भी सभ्यता सिर नहीं उठा सकती !..हमारे धार्मिक भावों तथा विश्वासों में चाहे जितना ही अन्तर क्यों न हो, हमें परस्पर एक दूसरे की सहायता करनी होगी।
हमलोग भारतवर्ष में यही किया करते हैं, इसी भारतवर्ष में हिन्दुओं ने ईसाईयों के लिए गिर्जे और मुसलमानों के लिए मस्जिदें बनवायी हैं और अब भी बनवा रहे हैं...हम तब तक यह काम न बन्द करें ..जब तक हम संसार के सम्मुख यह प्रमाणित न कर दें कि घृणा और विद्वेष की अपेक्षा प्रेम के द्वारा ही राष्ट्रिय जीवन (एकता) स्थायी हो सकता है. केवल पशुता और शारीरिक शक्ति विजय नहीं प्राप्त कर सकती, क्षमा और नम्रता (निरहंकारीता) ही संसार-संग्राम में विजय दिला सकती है। " (५/८३-84)
 हमारे वैदिक - धर्म के भी वाह्य रूपों में अनेकों प्रकार की विविधताएँ  थीं, किन्तु उसके अन्तस्तल में एक महाऐक्य का महीन स्वर सदैव ध्वनित होता रहता था. इसीने हजारों-हजार वर्षों से भारतवर्ष को एकता के सूत्र में बाँधे रखा था. अन्य कोई भी वस्तु ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं थी. क्योंकि उस युग में,इस विराट देश में सामाजिक, राजनैतिक या राष्ट्रिय एकत्व की भावना को सर्वजन स्वीकृत होने का अवसर किसी भी समय प्राप्त नहीं हुआ था. धर्म के अलावा अन्य सभी दृष्टिकोण (भाषा,रंग-रूप, आचार-व्यवहार आदि की दृष्टि ) से यह देश अनेकों प्रकार से विभक्त था।
किन्तु समय के प्रवाह में, भिन्न भिन्न धर्म बाहरी देशों से आकर इस देश में अपना प्रचार और प्रभाव बढ़ाने में जुट गये, जिसके कारण प्राचीन धर्म के प्रभाव से जो राष्ट्रिय एकता गठित हुई थी, वह बंधन सूत्र धीरे धीरे ढीला पड़ने लगा। और जैसा कि सदैव होता आया है, किसी भी शक्तिहीन, ऐक्यहीन राष्ट्र को दूसरे किसी ऐक्य-बद्ध राष्ट्र के कदमों में झुक जाना पड़ता है। किन्तु भारतवर्ष में अपनी खोई हुई शक्ति को पुनः प्राप्त करने की ईच्छा से, संभाव्य एकीकरण को पुनः प्रतिष्ठित करने के लिये, कई प्रकार की कोशिशें होने लगीं।
इस शक्तिहीनता और एकत्व के आभाव का सारा दोष प्रचलित-धर्म (सनातन धर्म ) के मत्थे मढ़ कर, नूतन धर्म संस्थापन का आन्दोलन के साथ-साथ धर्म-रहित पन्थों का अनुसन्धान भी चलने लगा। अपनी प्राचीन जीवन्त धर्म-वृक्ष में  नये नये शाखा-पल्लव-मंजरी खिलाने के कार्य की उपेक्षा करके,यहाँ वहाँ से प्राणहीन धार्मिक भाव समूह को संकलन करने की चेष्टा में शुष्क- विदेशी फूलों की डालियों को रोपने की चेष्टा होने लगी। 
 विदेशी 'क्षद्म-धर्मनिरपेक्षता ' के आधार पर हमारी राष्ट्रिय-एकता को पुनर्स्थापित करने का प्रयास जैसे-जैसे  किया जाने लगा, तो उन तथाकथित समाज-सुधार आंदोलनों से आहत होकर, हमने अपने प्राचीन जीवन्त धर्म की बुनियाद- 'विविधता में एकता ' को देखने की दृष्टि को ही दिया। और जब मनुष्य एक धर्म-भाव रहित 'क्षद्म-धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति'   बन जाता है, वह केवल एक 'सामाजिक-आर्थिक जन्तु ' मात्र बन कर रह जाता है। इसीलिये दीर्घ काल तक ऐसी बुद्धि से युक्त राजनैतिक राष्ट्रिय संगठनों द्वारा चलाये जाने वाले तथाकथित समाज-सुधार आन्दोलनों का अनुसरण करने पर भी राष्ट्रिय एकता को ठोस आधार नहीं प्राप्त हो सका है।
हमलोगों का प्रस्ताव यह है कि 'राष्ट्रिय-एकता ' जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न  के समाधान के विषय में स्वामी विवेकानन्द का दृष्टि-कोण क्या था ?  उनके परामर्श पर ध्यान देने तथा उनका अनुसरण करने की थोड़ी चेष्टा करनी चाहिये। राष्ट्र, समाज या सभ्यता के विषय में स्वामी विवेकानन्द का मूल सूत्र इस प्रकार है- " মনে রাখিও, মানব সভ্যতার মূলে ধর্ম. ইহা যদি অক্ষত থাকে, তবে সমাজ দেহের সকল অঙ্গগুলিই সুস্থ ও শোভন থাকিবে." अर्थात - " स्मरण रखना, मानव-सभ्यता की नींव धर्म है. यह यदि अक्षत रहता है, तभी समाज-शरीर के समस्त अंग स्वस्थ और मर्यादित रहेंगे ! "
हमलोगों ने पहले ही देखा है, भारतीय जाति की राष्ट्रीय एकता का मूल धर्म था। इस ऐक्य का जन्म सामाजिक, राजनैतिक या राष्ट्रिय प्रयास के द्वारा (कड़े कानून बनाकर) नहीं हुआ था। किन्तु भारत में प्रशासनिक व्यवस्था के आधार पर बलपूर्वक या चालाकी द्वारा (धर्म-परिवर्तन कराकर) 'राष्ट्रिय-एकता ' को स्थापित करने का सूत्रपात मुग़ल काल या मुसलमानी सत्ता के दौरान हुआ था। किन्तु अंग्रेजों के शासन काल में राष्ट्रिय या 'प्रशासनिक-एकता' सुव्यवस्थित रूप धारण कर चुकी थी। और अंग्रेजों की ' फूट डालो और राज करो की नीति ' के अंतर्गत 'क्षद्म-धर्मनिरपेक्षता ' स्थापित हो चुकी थी।इसके फलस्वरूप भारतीय जातीय एकता का मूलाधार, धर्म नामक वस्तु थी, उसका क्रमशः पतन होने लगा. स्वामीजी ने कहा है- " মানুষের সততার উপর, ধর্মের উপর প্রতিষ্ঠিত না হইলে কোন প্রকার রাষ্ট্রীয় ব্যবস্থাই বেশি দিন টিকিয়া থাকিতে পারে না. "- अर्थात " मनुष्य की पवित्रता के उपर, धर्म के उपर प्रतिष्ठित नहीं होने से किसी भी तरह की राष्ट्रिय व्यवस्था अधिक दिनों तक टिकाऊ नहीं हो सकती।"
 अतः स्वामी विवेकानन्द का सुझाव था कि भारत में किसी प्रकार का सुधार (जन लोकपाल बिल आदि) या उन्नति की चेष्टा (मनरेगा आदि) की चेष्टा करने के पहले धर्म-प्रचार (वेदान्त-प्रचार ' एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति ' का प्रचार) करना आवश्यक है. भारत को समाजवादी अथवा राजनीतिक विचारों से प्लावित करने के पहले आवश्यक है कि उसमें आध्यात्मिक विचारों की बाढ़ ला दी जाय। 
" सर्वप्रथम, हमारे उपनिषदों, पुराणों और अन्य सब शास्त्रों में जो अपूर्व सत्य छिपे हुए हैं, उन्हें इन सब ग्रन्थों के पन्नों से बाहर निकाल कर, मठों की चहारदीवारियाँ भेदकर,  वनों की निर्जनता से खीँच कर, कुछ सम्प्रदाय-विशेषों के हाथों से छीनकर देश में सर्वत्र बिखेर देना होगा, ताकि ये सत्य दावानल के समान सारे देश को चारों ओर से लपेट लें- हिमालय से कन्याकुमारी और सिन्धु से ब्रह्मपुत्र तक सर्वत्र वे धधक उठें. " (५/११६)   
" इसीलिए स्वामी विवेकानन्द का स्पष्ट विचार है- " हमारे पास एकमात्र सम्मिलन भूमि है, हमारी पवित्र परम्परा, हमारा धर्म. एकमात्र सामान्य आधार वही है, अतः धर्म को ही आधार बना कर, धर्म की बुनियाद पर ही हमें भविष्य के भारत का पुनर्निर्माण करना होगा. यूरोप में राजनितिक विचार ही राष्ट्रिय एकता का कारण है. किन्तु एशिया में राष्ट्रिय ऐक्य का आधार धर्म ही है, अतः नया भारत गढ़ने की पहली शर्त के तौर पर उसी धार्मिक एकता की आवश्यकता है।
 सम्पूर्ण देश में एक ही 'धर्म' सबको स्वीकार करना होगा। एक ही धर्म - कहने से मेरा अभिप्राय क्या है ? 
 यह उस तरह का (हिन्दू-मुसलमान या ईसाई धर्म) लेबल वाला कोई एक ही धर्म (या साम्प्रदायिकता ) नहीं जिसका ईसाईयों, मुसलमानों या बौद्धों में प्रचार है। हम जानते हैं कि, भारत के विभिन्न सम्प्रदायों के सिद्धान्त तथा दावे- देखने में चाहे कितने भी अलग अलग क्यों न हों, हमारे धर्म में कुछ ऐसे सिद्धान्त ऐसे हैं जो सभी सम्प्रदायों द्वारा मान्य हैं...उनको स्वीकार करने पर हमारे ' राष्ट्रिय-धर्म ' में अद्भुत विविधता के लिए गुंजाइश हो जाति है, और साथ ही अपनी मान्यताओं को बनाये रखते हुए अपनी रूचि के अनुसार जीवन निर्वाह करने की हमें सम्पूर्ण स्वाधीनता भी प्राप्त हो जाति है। 
अपने धर्म के ये जीवनप्रद सामान्य तत्व हम सबके सामने लायें और देश के सभी स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध, उन्हें जानें-समझें तथा जीवन में उतारें- यही हमारे लिए आवश्यक है. सर्वप्रथम यही हमारा कार्य है...हम देखते हैं कि भारत में जाति, भाषा, समाज सम्बन्धी सभी बाधाएँ- धर्म की इस एकीकरण शक्ति- के सामने उड़  जाती हैं. हम जानते हैं कि भारतीय मन के लिए (इस) धार्मिक आदर्श से बड़ा और कुछ भी नहीं है...पहले उस पथ को सुदृढ़ किये बिना, दूसरे मार्ग (क्षद्म-धर्मनिरपेक्षता या तुष्टिकरण की राजनीती, संसद -भवन में सामूहिक ' वन्दे-मातरम ' गान के समय बसपा के मुस्लिम सांसद द्वारा अपमान को बर्दास्त करने या आर्थिक- उदारीकरण,धार्मिक और जातीय आरक्षण  आदि ) के आधार पर भारत के नवनिर्माण की चेष्टा का फल घातक होगा."
अतः भविष्य के भारत निर्माण का पहला कार्य, वह पहला सोपान, जिसे युगों के उस महाचल पर खोद कर बनाना होगा, भारत की यह धार्मिक एकता ही है. उसी मूल एकत्व की ओर लक्ष्य रख कर अपने एवं राष्ट्रिय कल्याण के लिये ( द्वैतवादी, विशिष्टाद्वैतवादी, अद्वैतवादी अथवा शैव, वैष्णव, पाशुपत आदि भिन्न भिन्न मतों के होते हुए भी आपस में सर्वजन हित की कामना कर सकते हैं. ) परस्पर सभी प्रकार के मतभेद और छोटे-मोटे झगड़ों को मिटा देने का समय आ गया है. अनेको दिशाओं में विकीर्ण आध्यात्मिक शक्ति समूह के सम्मिलन द्वारा ही भारत में राष्ट्रिय एकता को स्थापित करना होगा. " (५/१८०-८१) 
दूसरे जातियों की तुलना में भारतीय जाति का जो पार्थक्य है, उसकी ओर इशारा करते हुए स्वामीजी कहते हैं - " किसी भी दूसरे देश की अपेक्षा भारत की समस्याएँ अधिक जटिल और गुरुतर हैं. जाति, धर्म, भाषा, शासन-प्रणाली - ये ही एक साथ मिलकर किसी राष्ट्र का सृजन करते हैं. यदि एक जाति को लेकर हमारे राष्ट्र की तुलना की जाय तो हम देखेंगे कि जिन उपादानों से संसार के दूसरे राष्ट्र संगठित हुए हैं, वे संख्या में यहाँ के उपादानों से कम हैं. यहाँ आर्य हैं, द्रविड़ हैं, तातार हैं, तुर्क हैं, मुग़ल हैं, यूरोपीय हैं, - मानो संसार की सभी जातियाँ इस भूमि में अपना खून मिला रही हैं. भाषा का यहाँ एक विचित्र जमावड़ा है, आचार-व्यवहारों के सम्बन्ध में दो भारतीय जातियों में जितना अन्तर है, उतना पूर्वी और यूरोपीय जातियों में भी नहीं है." (५/१८०)  
इसी कारण इस जाति में एकत्व स्थापित करना ज्यादा कठिन है. कठिनतर होने के कारण ही इस एकत्व को स्थापित करने की चेष्टा की प्रणली दोष रहित होना आवश्यक है.एवं अनुकरण प्रिय यह जाति गम्भीरता से विचार किये बिना ही, अन्यान्य जातियों का दृष्टान्त अनुसरण करने से ही राष्ट्रिय एकता अनेकत्व की ओर ही बढ़ी है.
सभी को इन सब शास्त्रों में निहित उपदेश सुनाने होंगे, क्योंकि उपनिषदों में कहा है- ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो ' (बृहदारण्यक ४/५/६) " पहले इसे सुनना होगा, फिर मनन करना होगा और उसके बाद निदिध्यासन ". पहले लोग इन सत्यों को सुनें. और जो भी व्यक्ति अपने शास्त्र के इन महान सत्यों को दूसरों को सुनाने में सहायता पहुँचायेगा, वह आज एक ऐसा कर्म करेगा, जिसके समान कोई दूसरा कर्म है ही नहीं. महर्षि व्यास ने कहा है, ' इस कलियुग में मनुष्यों के लिए एक ही कर्म शेष रह गया है. आजकल यज्ञ और कठोर तपस्याओं से कोई फल नहीं होता. इस समय दान ही एकमात्र कर्म है.' और दानों में धर्मदान, अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान का दान ही सर्वश्रेष्ठ है. दूसरा दान है विद्यादान, तीसरा प्राणदान और चौथा अन्नदान.इस दानशील देश में हमें पहले प्रकार के दान के लिए अर्थात आध्यातिक ज्ञान विस्तार ( या चरित्र-निर्माण शिविर) के लिए साहसपूर्वक ( बंगाल से बिहार-झारखंड, यूपी, दिल्ली, पंजाब, कश्मीर, लाहौर तक) अग्रसर होना होगा. और यह ज्ञान-विस्तार (3H आधारित चरित्र-निर्माण कारी शिविर ) भारतवर्ष की सीमा में ही आबद्ध नहीं रहेगा, इसका विस्तार तो सारे संसार भर में करना होगा...मैं जो अमेरिका गया, वह मेरी या तुम्हारी इच्छा से नहीं हुआ, वरन भारत के भाग्य-विधाता भगवान (श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव) ने मुझे अमेरिका भेजा, और वे ही इसी भाँति सैकड़ों मनुष्यों को अन्य सब देशों में भेजेंगे. इसे दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती. अतएव तुमको भारत के बाहर ( जाने से पहले अब सम्पूर्ण भारत में मनुष्य-निर्माण कारी शिविर लगाने होंगे ) भी धर्म-प्रचार के लिए जाना होगा
...इसीलिए, मेरे मित्रो, मेरा विचार है कि मैं भारत में ऐसे कुछ शिक्षालय स्थापित करूँ, जहाँ हमारे नवयुवक अपने शास्त्रों के ज्ञान में शिक्षित ( महामण्डल के लीडरशिप ट्रेनिंग में प्रशिक्षित ) होकर  भारत में तथा भारत के बाहर अपने धर्म ( (वेदान्त-प्रचार ' एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति ' का प्रचार) का प्रचार कर सकें. मनुष्य, केवल मनुष्य भर चाहिए. बाकी सबकुछ अपने आप ही हो जायगा.आवश्यकता है वीर्यवान, तेजस्वी, श्रद्धा-सम्पन्न और दृढ़विश्वासी निष्कपट नवयुवकों की. ऐसे सौ मिल जायें, तो संसार का कायाकल्प हो जायेगा. " (५/११६-१८)           
अत्यन्त तात्पर्यपूर्ण इस मूल विषय के बारे में कही गयी इस उक्ति का गहरा अर्थ है " समाज के जड़ तक पहुँच कर वहाँ आग लगा देना होगा, और यह देखना होगा कि वह आग ऊपर के स्तरों को भेद करते हुए समस्त कूड़ा-करकट को भष्मीभूत करने में सक्षम हो. सुधार करने में हमें चीज के भीतर, उसकी जड़ तक पहुँचना होता है. इसीको मैं आमूल सुधार कहता हूँ. आग जड़ में लगाओ और उसे क्रमशः उपर उठने दो एवं एक अखंड भारतीय राष्ट्र संगठित करो. " (५/१११)  
पहले अनेकों भिन्नताएँ रहने पर भी राष्ट्रिय सांस्कृतिक एकता सुप्रतिष्ठित थी. राजनैतिक या राष्ट्रिय एकता का आभाव था. राष्ट्र के दुर्भाग्य और दूर्दशा के भीतर भी यह राजनैतिक या प्रशासनिक ऐक्य पर्याप्त रूप मेंमुसलमान और अंग्रेज शासन काल में सार्विक रूप से भारतियों ने प्राप्त किया था. समय के प्रवाह में धीरे धीरे विशाल भारत छोटा होने लगा, और अंग्रेजी शासन काल में ही राष्ट्र के रूप में यह देश जिस आकर में परिणत होकर स्वाधीनता प्राप्त करने के साथ ही साथ हिंसा, द्वेष, विरोध, कलह को आधार बना कर यह दो भागों में विभक्त हो गया. बाद में यह तीन टुकड़ों में बँट गया,परन्तु यह विघटनकारी शक्ति इस समय भी क्रियाशील है.इस समय भारत नाम से परिचित देश के जनसाधारण के भीतर भी हिंसा, कलह का अन्त नहीं हुआ है. धर्म को अनावश्यक मान कर राजनीती को प्रधानता प्रदान करके राष्ट्रिय एकता की स्थापना सम्भव नहीं हो सकी है, इस बात को सीद्ध करने के लिये किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है.
प्रजातंत्र के नाम पर राजनैतिक मतभेद या झगड़ा, दलगत स्वार्थ और व्यक्तिगत स्वार्थ ही धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का घटिया अभिदान या सहयोग बन कर खड़ा हो गया है. जिसके फलस्वरूप जनसाधारण या आमआदमी का दुःख-दूर्दशा दूर होना तो दूर की बात रही, इसमें बढ़ोत्तरी ही हुई है. इसीलिए इसके जड़ में आग लगाना अब अत्यंत आवश्यक हो गया है. इन समस्त कूड़ा-करकट को जला कर राख कर देना होगा. सभी प्रकार की विघटनकारी शक्तियों को भष्मीभूत कर देना होगा। एक ओर है धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का स्वार्थ, लोभ, अपहरण, शोषण, कलह, हिंसा, नाम-यश-प्रतिष्ठा पाने का मोह, नितिहिनता या भ्रष्टाचार और दूसरी ओर है, धर्म के नाम पर अंध-विश्वास, कूप्रथा, कूसंस्कार, सामाजिक अत्याचार, घृणा और समस्त भेदबुद्धि को जड़ से ही मिटा देना होगा. तभी यथार्थ राष्ट्रिय एकता को प्रतिष्ठित करना सम्भव होगा।
स्वामीजी कहते हैं- " यदि भारत को महान बनाना है, उसका भविष्य उज्जवल बनाना है, तो इसके लिए आवश्यकता है संगठन की, शक्ति-संग्रह की और बिखरी हुई इच्छाशक्ति को एकत्र कर उसमें समन्वय लाने की. अथर्ववेद संहिता की एक विलक्षण ऋचा याद आ गयी - ' संगच्छ्ध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम '
 जिसमें कहा गया है, तुम सब लोग एक मन हो जाओ, सब लोग एक ही विचार के बन जाओ, क्योंकि प्राचीन काल में एक मन होने के कारण ही देवताओं ने बली पायी है.देवता मनुष्य के द्वारा इसीलिए पूजे गये कि वे एकचित्त थे, एक मन हो जाना ही समाज गठन का रहस्य है. और यदि तुम ' बैकवर्ड ' और 'फारवर्ड ', हिन्दू-मुसलमान जैसे तुच्छ विषयों को लेकर ' तू तू मैं मैं ' करोगे, झगड़े और पारस्परिक विरोधभाव को बढाओगे- तो समझ लो कि तुम उस शक्ति-संग्रह से दूर हटते जाओगे, जिसके द्वारा भारत का भविष्य बनने जा रहा है. ..बस, इच्छा-शक्ति का संचय और और उनका समन्वय कर उन्हें एकमुखी करना ही वह सारा रहस्य है. " (५/१९२)  
एक अन्तःकरण विशिष्ट हो जाना, एकचित्त बन जाना, ईच्छाशक्ति समूह का एकत्र सम्मिलन राजनीती या लोकसभा में बिल पास करा देने से सीद्ध नहीं होता. हमलोग स्वाधीन देश बन जाने के बाद से धर्मनिरपेक्षता के नाम पर केवल यही प्रयास कर रहे हैं, इसीलिए राष्टीय एकता अभी तक हकीकत न बनकर केवल एक  वादविवाद का विषय बना हुआ है. एकमात्र धर्म के पथ से ही यह आतंरिक एकता स्थापित हो सकती है एवं यही एक मात्र उपाय है.स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- " भारत के पतन और दारिद्र्य-दुःख का प्रधान कारण यह है कि..उसने अपना कार्यक्षेत्र संकुचित कर लिया था तथा आर्येतर दूसरी मानव जातियों के लिए, जिन्हें सत्य की तृष्णा थी, अपने जीवनप्रद सत्य-रत्नों का भण्डार नहीं खोला था. हमारे पतन का एक और प्रधान कारण यह भी है कि हमलोगों ने बाहर जाकर दूसरे राष्ट्रों से अपनी तुलना नहीं की; और तुम लोग जानते हो, जिस दिन से राजा राममोहन राय ने संकीर्णता की वह दीवार तोड़ी, उसी दिन से भारत में थोड़ा सा जीवन दिखायी देने लगा, जिसे तुम आज देख रहे हो. " (५/२१०)  
राममोहन के समय में जिस नये भारत का विचार दिखाई दिया था, उस विचार के पुरोधाओं की दृष्टि केवल समाज के ऊपर के स्तर पर रहने वाले लोगों के लिये थी. ' राष्ट्र झोपड़ियों में बसता है '- यह बात सर्व प्रथम स्वामीजी के विचारों में ही प्राप्त होता है.
 [ " रामनाड़ के महाराज ! अपने धर्म और मातृभूमि के लिए पाश्चात्य देशों में इस नगण्य व्यक्ति के द्वारा यदि कोई कार्य हुआ है, अपने ही घर में अज्ञात किन्तु गुप्तरूप से परिरक्षित अमूल्य रत्नसमूह के प्रति अपने देशवासियों में कुछ कौतुहल और उन्हें प्राप्त करने का आग्रह यदि जाग्रत हुआ है, अज्ञानरुपी अन्धेपन के कारण प्यासे मरने अथवा दूसरी जगह के गन्दे गड्ढे का पानी पीने की अपेक्षा यदि अपने घर के निकट से बहनेवाले झरने के निर्मल जल को पीने के लिए यदि वे आकृष्ट हुए हैं,..मेरे इस दिशा में ओ कुछ कार्य सम्पन्न हुआ है, तो उसका सारा श्रेय आपको जाता है. क्योंकि आपने ही पहले मेरे ह्रदय में ये भाव भरे. "  (५/४३)
स्वामीजी क्षोभ प्रकट करते हुए कहते हैं- " यह जाति डूब रही है, लाखों प्राणियों का शाप हमारे सिर पर है, अमृत नदी (वेदान्त) के समीप रहने पर भी, प्यास लगने पर हमने जिन्हें गन्दे गड्ढे का पानी पीने (धर्म
परिवर्तन करके ईसाई,मुसलमान या बौद्ध बन जाने ) को मजबूर किया, उन अगणित लाखों मनुष्यों का, जिनके सामने भोजन का भण्डार रहते हुए भी जिन्हें हमने भूखों मार डाला, जिन्हें हमने अद्वैवाद का तत्व सुनाया और जिनसे हमने तीव्र घृणा की, जिनके विरोध में हमने लोकाचार का आविष्कार किया, जिनसे ज़बानी तो यह कहा कि सब बराबर हैं, सभी मनुष्य एक ही ब्रह्म का विकास हैं, परन्तु इस उक्ति को काम में लाने का तिल मात्र भी प्रयत्न नहीं किया..अपने चरित्र से यह दाग़ मिटा दो. उठो, जागो, और सम्पूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ. भारत में घोर कपट समा गया है. चाहिए चरित्र, चाहिए इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बल जिससे मनुष्य आजीवन दृढव्रत बन सके. 
निन्दन्तु नीतिनिपुणाः यदि वा स्तुवन्तु लक्ष्मिः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम |
अद्यैव वा मरणंस्तु युगान्तरे वा न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः ||
' नीतिनिपुण मनुष्य चाहे निन्दा करें चाहे स्तुति, लक्ष्मी आये या चली जाय, मृत्यु आज ही हो चाहे शताब्दी के पश्चात्, जो धीर हैं वे न्यायमार्ग से एक पग भी नहीं हिलते.' उठो, जागो, समय बीता जा रहा है और व्यर्थ के वितंडावाद में हमारी सम्पूर्ण शक्ति का क्षय होता जा रहा है. उठो, जागो, छोटे छोटे विषयों और मत-मतान्तरों को लेकर व्यर्थ का विवाद मत करो. तुम्हारे सामने सबसे महान कार्य पड़ा हुआ है- लाखों आदमी डूब रहे हैं, उनका उद्धार करो.
  इस बात पर अच्छी तरह ध्यान दो कि मुसलमान जब भारत में पहले पहल आये थे, तब भारत में कितने अधिक हिन्दू रहते थे. आज उनकी संख्या कितनी घट गयी है. इसका कोई प्रतिकार हुए बिना यह दिन दिन और घटती जायगी; अन्ततः वे पूर्ण विलुप्त हो जायेंगे...अब तक वे जिन जिन महान भावों के प्रतिनिधि स्वरुप हैं, वे भी लुप्त हो जायेंगे. और उनके लोप के साथ साथ सारे आध्यात्म ज्ञान का शिरोभूषण अपूर्व अद्वैत तत्व भी लुप्त हो जायेगा. 
अतएव उठो, जागो, संसार की आध्यात्मिकता की रक्षा के लिए हाथ बढाओ...हमारे दो दोष बड़े ही प्रबल हैं; पहला दोष हमारी दुर्बलता है, दूसरा है घृणा करना, हृदयहीनता. तुम लाखों मत-मतान्तरों की बात कह सकते हो, करोड़ों संप्रदाय संगठित कर सकते हो, परन्तु जब तक उनके दुःख का अपने ह्रदय में अनुभव नहीं करते, वैदिक उपदेशों (विशिष्टाद्वैत) के अनुसार जब तक स्वयं नहीं समझते कि वे तुम्हारे ही शरीर के अंश हैं, जब तक तुम और वे - धनी और दरिद्र, साधु और असाधु सभी उसी एक अनन्त पूर्ण के जिसे तुम ब्रह्म कहते हो, अंश नहीं हो जाते, तब तक कुछ न होगा. " (५/३२१-२२)
" ' नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ' (कठ१/२/२३) ' आत्मा ज्यादा बातें बनाने से प्राप्त नहीं होती, न वह अत्यन्त बुद्धिमत्ता से ही सुलभ होती है और न वह वेदों के पठन से ही मिल सकती है.' वेद स्वयं यह चेतावनी देते हैं. क्या तुम किसी अन्य शास्त्रों में इस प्रकार की निर्भीक वाणी पाते हो कि शास्त्र-पाठ द्वारा भी आत्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती?..तुम्हारे लिए हृदय को मुक्त करना आवश्यक है. धर्म का अर्थ न गिरजे में जाना है, न ललाट रंगना है, न विचित्र ढंग का भेष धारण करना है...धर्म वही है, जो हमें उस अक्षर पुरुष का साक्षात्कार कराता है, और हर एक के लिए धर्म यही है. जिसने इस इन्द्रियातीत सत्ता का साक्षात्कार कर लिया, जिसने आत्मसाक्षात्कार कर लिया, जिसने भगवान को प्रत्यक्ष देखा- फिर हर मनुष्य (वस्तु) में देखा, वही ऋषि हो गया.  और तब तक तुम्हारा जीवन धर्मजीवन नहीं, जब तक तुम ऋषि नहीं हो जाते. हमें इस ऋषित्व का लाभ करना होगा, मन्त्रद्रष्टा होना होगा, ईश्वर का साक्षात्कार करना होगा...प्राचीन भारत में सैकड़ों ऋषि थे, और अब हमारे बीच लाखों होंगे-निश्चय ही होंगे. इस बात पर तुममें से हर एक जितनी जल्दी विश्वास करेगा, भारत का और समग्र संसार का उतना ही अधिक हित होगा. तुम जो कुछ विश्वास करोगे, तुम वही हो जाओगे. " (५/१७६-७७) 
" आधुनिक विज्ञान के लोहे के मुद्गरों की चोट खाकर द्वैतात्मक धर्मों की मजबूत दीवार चूर चूर हो रही है...ये द्वैतवादी सम्प्रदाय आत्मरक्षा के लिए अँधेरे के किसी कोने में छिपने की चेष्टा कर रहे हैं; यूरोप और अमेरिका में तो यह प्रयत्न और भी ज्यादा है.पश्चिमी देशों में एक नया ढंग - पारस्परिक प्रतियोगिता और कांचन की पूजा के रूप में शैतान की पूजा प्रवर्तित हुई है. कोई भी राष्ट्र, ऐसी बुनियाद पर कभी टिक नहीं सकता...भारत में कांचन-पूजा की यह तरंग न आ सके, उसकी ओर पहले से ही नजर रखनी होगी. अतएव सबमें यह अद्वैतवाद प्रचारित करो, जिससे धर्म आधुनिक विज्ञान के प्रबल आघातों से भी अक्षत बना रहे...इसके लिए व्यवहारिक कार्य की आवश्यकता है; उसका प्रथम सोपान यह है कि घोर से घोरतम दारिद्र्य और अज्ञान-तिमिर में डूबे हुए साधारण लाखों भारतियों की उन्नति-साधना के लिए उनके समीप जाओ. और उनको अपने हाथ का सहारा दो." (५/३२३) 
 हम अज्ञान के ही कारण बँधे हुए हैं. ज्ञान से अज्ञान दूर होगा, यही ज्ञान हमें उस पार ले जायगा. तो इस ज्ञान-प्राप्ति का उपाय क्या है ? - प्रेम और भक्ति से, इश्वाराधन द्वारा और सर्वभूतों को परमात्मा का मन्दिर (देहो देवालय प्रोक्तः) समझ कर प्रेम करने से ज्ञान होता है...हमारे शास्त्रों में परमात्मा के दो रूप कहे गये हैं- सगुण और निर्गुण. सगुण ईश्वर के अर्थ से वह सर्वव्यापी है, संसार की सृष्टि, स्थिति और प्रलय का करता है, ..उसके साथ हमारा नित्य भेद है और मुक्ति का अर्थ - उसके सामीप्य और सालोक्य की प्राप्ति. सगुण ब्रह्म के ये सब विशेषण निर्गुण ब्रह्म के सम्बन्ध में अनावश्यक और अतार्किक मान कर त्याग दिए गये हैं...वेदों में उसके लिए ' सः ' शब्द का प्रयोग नहीं किया गया; ' सः ' शब्द के द्वारा निर्देश न करके निर्गुण भाव समझाने के लिए ' तत ' शब्द के द्वारा उसका निर्देश किया गया है. ' सः ' शब्द के कहे जाने से वह व्यक्तिविशेष ( राम, कृष्ण. बुद्ध, ईसा, मूसा ) हो जाता, इससे जिव-जगत के साथ उसका सम्पूर्ण पार्थक्य सूचित हो जाता है. इसीलिए निर्गुणवाचक ' तत ' शब्द का प्रयोग किया गया है और ' तत ' शब्द से निर्गुण ब्रह्म का प्रचार हुआ है. इसीको अद्वैतवाद कहते हैं.
इस निर्गुण पुरुष के साथ हमारा क्या सम्बन्ध है ? यह कि हम उससे अभिन्न हैं, वह और हम एक हैं. हर एक मनुष्य  उसी सब प्राणियों के मूल कारण रूप निर्गुण पुरुष (ब्रह्म -अल्ला या गौड )  की अलग अलग अभिव्यक्ति है. जब हम इस अनन्त और निर्गुण पुरुष से अपने को पृथक सोचते हैं तभी हमारे दुःख की उत्पत्ति होती है और इस अनिर्वचनीय (प्रेमस्वरूप ठाकुर) की निर्गुण सत्ता के साथ अभेद ज्ञान ही मुक्ति है.यहाँ यह कहना आवश्यक है कि निर्गुण ब्रह्मवाद की भावना के माध्यम से ही किसी प्रकार के आचरण-शास्त्र के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जा सकता है.अति प्राचीन काल से ही प्रत्येक धर्म में यह सत्य प्रचारित किया गया है कि  अपने सह-जीवों को अपने समान प्यार करो, सभी मनुष्यों को आत्मवत प्यार करना चाहिए...भारत में उपदेश दिया गया- 'आत्मवत सर्वभूतेषु ' सभी को आत्मवत प्यार करने का उपदेश दिया गया है, परन्तु अन्य प्राणियों को भी आत्मवत प्यार करने से क्यों कल्याण होगा, इसका कारण किसी ने नहीं बताया. 
एकमात्र निर्गुण ब्रह्मवाद (अद्वैतवाद) ही इसका कारण बतलाने में समर्थ है. यह तुम तभी समझोगे, जब तुम सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की एकात्मकता, विश्व की एकता और जीवन के अखण्डत्व का अनुभव करोगे- जब तुम समझोगे कि दूसरे को प्यार करना अपने ही को प्यार करना है- दूसरों को हानी पहुँचाना अपनी ही हानी करना है. तभी हम समझेंगे कि दूसरों का अहित करना (भ्रष्टाचार करना) क्यों अनुचित है. अतएव, यह निर्गुण ब्रह्मवाद ही आचरण-शास्त्र का मूल कारण मन जा सकता है...मैं अच्छी तरह समझता हूँ कि सगुण ब्रह्म पर विश्वास हो तो ह्रदय में कैसा अपूर्व प्रेम उमड़ता है..परन्तु हमारे देश में अब रोने का समय नहीं है, कुछ वीरता की आवश्यकता है.इस निर्गुण ब्रह्म पर विश्वास कर सब प्रकार के कुसंस्कारों से मुक्त हो ' मैं ही वह निर्गुण ब्रह्म हूँ '- इस ज्ञान के सहारे अपने ही पैरों पर खड़े होने से हृदय में कैसी अद्भुत शक्ति भर जाती है...मनुष्य तब अपनी उस आत्मा की महिमा में प्रतिष्ठित हो जाता है, जो असीम अनन्त है, अविनाशी है, जिसे कोई शस्त्र छेद नहीं सकता, आग जला नहीं सकती, पानी गीला नहीं कर सकता, वायु सुखा नहीं सकती.(गीता २/२३)
हमें इसी महामहिम आत्मा पर विश्वास करना होगा, इसी इच्छा से शक्ति प्राप्त होगी. तुम जो कुछ सोचोगे, तुम वही हो जाओगे;..यदि तुम अपने को अपवित्र सोचोगे तो तुम अपवित्र हो जाओगे; अपने को शुद्ध सोचोगे तो शुद्ध हो जाओगे...निर्गुण ब्रह्मवाद से हमें यही शिक्षा मिलती है. बिल्कुल बचपन से ही बच्चों को बलवान बनाओ- उन्हें दुर्बलता अथवा किसी बाहरी अनुष्ठान की शिक्षा न दी जाय. वे तेजस्वी हों, अपने ही पैरों पर खड़े हो सकें- साहसी, सर्वविजयी, सब कुछ सहने वाले हों; परन्तु सबसे पहले उन्हें आत्मा की महिमा शिक्षा मिलनी चाहिए. यह शिक्षा वेदान्त में -केवल वेदान्त में प्राप्त होगी. " (५/२८-३०)  
  " हमारे समाज सुधारक लोग खोज नहीं पा रहे हैं कि भूल कहाँ है. वे नहीं जानते कि जाति का भविष्य जनसाधारण की अवस्था के उपर निर्भर करता है. याद रहना चाहिए कि गरीबों की झोपड़ियों में ही हमारा राष्ट्रिय जीवन स्पंदित हो रहा है. झोपड़ियों में रहने वाले वे सच्ची जाति हैं, उनका व्यक्तित्व और मनुष्यत्व खो गया है. " इसीलिए स्वामीजी का प्रस्ताव है इस यथार्थ जाति के भीतर इनका खोया हुआ व्यक्तित्व और मनुष्यत्व  पुनः प्रतिष्ठित करा देना होगा." जातीय संस्कृति का वैशिष्ठ अक्षुण रखते हुए भारतीय समाज का पुष्टि साधन, क्रमोनत्ति और सम्प्रासन ही हमारा लक्ष्य है. ..इसीलिए मनुष्य को पहले अपना वर्तमान स्तर से संतर्पण में एक सोपान उन्नत करना प्रयोजनीय है. " साधारण व्यक्ति का व्यक्तित्व और मनुष्यत्व के साँचे में धर्म ही ढाल सकता है. स्वामीजी कहते हैं- धर्म का अर्थ है चरित्र. 
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- ' धर्म का अर्थ है अच्छा बनना और अच्छा करना.' साधारण मनुष्य जब तक चरित्रवान नहीं बन जाता, अच्छा नहीं बन जाता, अच्छा करने की क्षमता अर्जित नहीं कर लेता, जातीयता का बोध नहीं उत्पन्न हो सकता. सबों के भीतर राष्ट्रीयता का बोध उत्पन्न न होने से राष्ट्रिय एकता भी सम्भव नहीं है. धर्म के ताप से इस प्रकार के साँचे में ढला मनुष्य यह उपलब्धी कर सकता है और कह सकता है- " गर्व से बोलो कि मैं भारतवासी हूँ, और प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है...भारतवासी मेरे प्राण हैं, .. भारत की मिटटी मेरा स्वर्ग है, भारत के कल्याण में मेरा कल्याण है."
 इस उपलब्धी के द्वारा ही जनसमुदाय यथार्थ एकता बद्ध हो सकते हैं. समस्त जाति का व्यक्तित्व संयुक्त होकर एक जातीय सत्ता या व्यक्तित्व का रूप धारण करती है. इटली के क्रांतिकारी और विचारक-नेता मैजिनी (Mazzini, 1805-72 ) ने कहा था -  " Nationality is the personality of peoples. " स्वामीजी इस रूप में राष्ट्रिय व्यक्तित्व (Personality) में विश्वास करते थे. स्वामीजी की दृष्टि में यह व्यक्तित्व एक आध्यात्मिक सत्ता थी. इसीलिए वे सिंह नाद की वाणी में कहतेहैं- " मत भूलना कि तुम्हारा समाज उस विराट महामाया कि छाया (प्रतिबिम्ब) मात्र है. " उनकी वाणी और भी स्पष्ट हो उठती है, " आगामी पचास वर्ष के लिए यह जननी जन्मभूमि भारत माता ही मानो हमारी अराध्य देवी बन जाय. तब तक के लिए हमारे मस्तिष्क से व्यर्थ के देवी-देवताओं के हट जाने में कुछ भी हानी नहीं है. अपना सारा ध्यान इसी एक ईश्वर पर लगाओ, तुम्हारी स्वजाति (nation) -हमारा देश ही हमारा जाग्रत देवता है. सर्वत्र उसके हाथ हैं, सर्वत्र उसके पैर हैं और सर्वत्र उसके कान हैं. समझ लो कि दूसरे देवी-देवता सो रहे हैं, जिन व्यर्थ के देवी-देवताओं को हम देख नहीं पाते, उनके पीछे तो हम बेकार दौड़ें और जिस विराट देवता को हम अपने चारों ओर देख रहे हैं, उसकी पूजा (सेवा) ही न करें ? " (५/१९३) 
 " सबके समक्ष अपने धर्म (चरित्र-निर्माण और मनुष्य-निर्माण कारी शिक्षा ) के महान सत्यों (3H निर्माण ) का प्रचार करो, संसार इनकी प्रतीक्षा कर रहा है. संसार भर में सर्वत्र जनसाधारण को (हिप्नोटाइज किया गया है ), उनसे कहा गया है कि तुम लोग मनुष्य ही नहीं हो. शताब्दियों से इस प्रकार डराये जाने के कारण वे बेचारे सचमुच ही करीब करीब पशुत्व को प्राप्त हो गये हैं. उन्हें कभी आत्मतत्व के विषय में सुनने का मौका नहीं दिया गया. अब उनको आत्मतत्व सुनने दो, यह जान लेने दो कि उनमें से नीच से नीच (भ्रष्टाचारी, कालाधन विदेशों में जमा करने वालों या कसाब जैसे आतंकवादियों) में भी आत्मा विद्यमान है- वह आत्मा, जो न कभी मरती है, न जन्म लेती है, जिसे न तलवार काट सकती है न आग जला सकती है और न हवा सुखा सकती है, जो अमर है, अनादी और अनन्त है, जो शुद्धस्वरूप, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है. उन्हें अपने आप के ऊपर विश्वास करने दो. " (५/११८-१९)]  
जाति उनकी दृष्टि में क्या अपूर्व महनीय प्राणवन्त रूप धारण कर लेता है. एकमात्र यथार्थ धर्म के प्रभाव से आत्मविकास घटित होने पर ही जाति के व्यक्ति मनुष्य को जो आत्मरक्षा में व्यस्त हैं, स्वार्थ सिद्धि में मत्त प्रातियोगिता में व्यप्रित पृथक पृथक सत्ता के रूप में न देख कर, समग्र जाति को एक अखण्ड सत्ता, जिनके सहस्त्र शीर्ष, सहस्राक्ष हैं, सहस्रपत, सह्स्र्पनी, पुरुष के जैसा समस्त भूमि को व्यापे हुए हैं ऐसा कह कर देखा जा सकता है. जिस जाति में ऐसी दृष्टिसंपन्न मनुष्यों की संख्या धर्म बल से अधिकाधिक बढती जाति है, वहीँ पर यथार्थ राष्ट्रिय एकता संभव है, अन्यत्र या अन्य किसी प्रकार से यह कभी सम्भव नहीं है.स्वामीजी की राष्ट्रिय-एकता सम्बन्धी इस प्रस्ताव (या विचारधारा ) का एक वैशिष्ट यह भी है कि, जहाँ राष्ट्रिय एकता स्थापित करने के लिये, इसका प्रयोग करना सम्भव और प्रयोजनीय है, वहीँ विश्व-एकता स्थापित करने में भी पूरी तरह से सक्षम है. 
अन्तर्राष्ट्रीय कोई संगठन स्थापित करने या वैसी कोई अवधारणा के जन्म-लाभ होने के बहुत पहले ही स्वामीजी ने कहा है- " अन्तर्राष्ट्रीय संगठन, अन्तर्राष्ट्रीय संघ, अन्तर्राष्ट्रीय विधान, ये ही आजकल के मूल मन्त्रस्वरुप हैं." (५/१३६ ) उसी विश्व-एकत्व की प्राप्ति के लिये, उसके प्रथम सोपान के रूप में स्वामीजी की पहले राष्ट्रिय-एकता स्थापित करने का विचार या प्रस्ताव रखा है.अब प्रश्न यह है कि, किस प्रकार का धर्म इस राष्ट्रिय-एकता को स्थापित करने में सक्षम है ? जिस देश में विभिन्न सम्प्रदाय, विभिन्न धर्म बिल्कुल पास पास रहते हों, उस देश में किसी एक ही धर्म के उपर जोर देकर, उसी के आधार पर सबों को एकीकृत करने का प्रयास किया जाय तो वह कभी सफल नहीं हो सकेगा. स्वामीजी कहते हैं- " इसको हमलोग वेदान्त का नाम दें, या अन्य कोई नाम दें- मूल बात यह है कि, ' अद्वैतवाद ' ही धर्म का और चिन्तन का अन्तिम बात है, एवं केवल अद्वैत-भूमि पर आरूढ़ मनुष्य ही समस्त धर्म और सम्प्रदाय को प्रेम-पूर्ण दृष्टि से देख सकता है. मेरा अपना विश्वास तो यह है कि, यही भविष्य के शिक्षित मानव-समाज का धर्म होगा. हिन्दू लोग अन्यान्य जातियों की अपेक्षा शीघ्रातिशीघ्र इस तत्व में पहुँचने का गौरव प्राप्त कर सकते हैं. "वे कहते हैं - " हमलोग मनुष्य जाति को उस स्थान में ले जाना चाहते हैं- जहाँ वेद भी नहीं हो, बाइबिल भी नहीं हो, कुरान भी नहीं हो; तथापि वेद, बाइबिल और कुरान के बीच समन्वय लाने के द्वारा ही इसे करना होगा. मनुष्य को यह सिखाना होगा कि, समस्त धर्म ' एकत्व रूप उसी एक धर्म के ही विविध अभिव्यक्तियाँ हैं, इसीलिए जिसमें जितना भाग सर्वापेक्षा उपयोगी है, उतना ही चुन लेना होगा." 
इसी समन्वय का अर्थ यत्र तत्र वर्णित विभिन्न धर्मभाव-समूह की प्राणहीन संकलन भी नहीं है ( जिसकी व्यर्थता के उपर हमलोगों ने पूर्व में परिचर्चा की है, दूसरी ओर धर्मान्तरण करने का भी कोई गुप्त प्रस्ताव नहीं है. अन्यत्र अनेको बार स्वामीजी ने तो स्पष्ट घोषित किया है- राष्ट्रिय-एकता लाने के लिये हिन्दू को मुसलमान, ईसाई या बौद्ध को हिन्दू बना देने की कोई आवश्यकता नहीं है, केवल इतना ही नहीं, वह व्यक्ति और राष्ट्र के लिये भी हानिकारक होगी. " किन्तु समस्त धर्म - एकत्व रूपी उसी एक धर्म का ही विविध अभिव्यक्ति मात्र है. " - यह भाव मनुष्य को किस प्रकार सिखाया जा सकता है ? स्वामीजी अन्यत्र कहते हैं- " अहा, संसार के किसी भी देश में सार्वभौम  धर्म और विभिन्न सम्प्रदायों में भ्रातृत्व के उत्थापित और पर्यालोचित होने के बहुत पहले ही,  इस महानगर (कोलकाता) के पास एक ऐसे महापुरुष थे, जिनका सम्पूर्ण जीवन एक आदर्श धर्म-महासभा का स्वरुप था. " (५/२०८)
उस व्यक्ति का नाम था- श्रीरामकृष्ण परमहंस. स्वामीजी कहते है- " ईश्वर की इच्छा से यदि यदि सभी निर्गुण ब्रह्म को प्राप्त कर सकते, तब तो बात ही कुछ और थी, परन्तु चूँकि ऐसा नहीं हो सकता, इसीलिए सगुण आदर्श का रहना मनुष्य जाति के बहु-संख्यक वर्ग के लिए बहुत आवश्यक है. इस तरह के किसी महान आदर्श पुरुष पर हार्दिक अनुराग रखते हुए, उनकी पताका के नीचे आश्रय लिए बिना न कोई जाति उठ सकती है, न बढ़ सकती है, न कुछ कर सकती है. " (५/१३६)
इसलिए धर्मान्तरण करने में अपनी शक्ति को नष्ट और दूसरों का अनिष्ट किये बिना श्रीरामकृष्ण के जीवन को सभी के समक्ष उदाहरण स्वरुप प्रस्तुत करना होगा. उसीसे यह तत्व मनुष्य के ह्रदय में प्रविष्ट हो सकेगा, एवं धर्म और सम्प्रदाय के बीच टकराहट एक समय में दूर हो जाएगी.  स्वामीजी कहते हैं-" मुसलमान अच्छे अच्छे पीरों-फकीरों की पूजा करते हैं और नमाज के समय काबे की ओर मुँह करते हैं. यह सब देख कर जान पड़ता है कि प्रथमावस्था में मनुष्यों को कुछ बाह्य अवलम्बनों की आवश्यकता पड़ती है. जिस समय मन खूब शुद्ध हो जाता है, उस समय सूक्ष्म से सूक्ष्म विषयों में चित्त एकाग्र करना सम्भव हो सकता है.उत्तमो ब्रह्मसदभावो ध्यानभावस्तु मध्यमः |स्तुतिर्जपोअधमो भावो बाह्यपूजाअधमाधमा ||(महानिर्वाण तन्त्र १४/१२२) -' जब जीव ब्रह्म से एकत्व का प्रयत्न करता है, यह सर्वोत्तम है; जब ध्यान का अभ्यास किया जाता है, यह मध्यम कोटि है, जब नाम का जप किया जाता है, यह निम्न कोटि है और बाह्य पूजा निम्नातिनिम्न है.' किन्तु बाह्यपूजा के निम्नातिनिम्न होने पर भी उसमें कोई पाप नहीं है. जो व्यक्ति जैसी उपासना कर सकता है, उसके लिए वही ठीक है...इसलिए जो मूर्ति-पूजा करते हैं, उनकी निन्दा करना उचित नहीं है...ज्ञानी जनों को इन सब व्यक्तियों को अग्रसर होने में सहायता करने का प्रयत्न करना चाहिए; किन्तु उपासना-प्रणाली को लेकर झगड़ा करने की आवश्यकता नहीं है. " (५/२५३-५४)   
अद्वैतवाद को भविष्य का धर्म कहने से भी, उसको कर्म में परिणत करने में जो कठिनाई या आभाव है वह स्वामीजी की दृष्टि से छुपी नहीं थी. वे कहते हैं- " कर्म में परिणत वेदान्त - जो समग्र मानवजाति को अपनी ही आत्मा के रूप में देखता है, एवं उसी के अनुरूप व्यव्हार करता है- वह भाव अभी तक तो सार्वजनिक रूप वह हिन्दू लोगों में देखने को नहीं मिलता है.  ' दूसरे शब्दों में हमलोगों की अभिज्ञता तो यही है कि, यदि किसी धर्म के अनुयायियों के दैनंदिन व्यावहारिक जीवन में इस साम्य के आस-पास पहुंचा है तो वह एकमात्र इस्लाम धर्म के अनुयायी ही पहुँच सके हैं. इस प्रकार के आचरण का जो गम्भीर अर्थ है, एवं इसका बुनियाद रूपी जो समस्त तत्व विद्यमान है, उस सम्बन्ध में हिन्दुओं की धारणा स्पष्ट है, एवं मुसलमान लोग इस विषय में आम तौर से सचेतन नहीं हैं. "  " इसीलिए हमारी यह दृढ धारणा है कि, वेदान्त का मतवाद जितना भी सूक्ष्म और आश्चर्यजनक क्यों न हो, कर्म में परिणत इस्लाम धर्म की सहायता के बिना वह साधारण मनुष्यों में से अधिकांश के लिये निरर्थक ही होगा. " (गौरतलब है कि 'इस्लाम' शब्द अरबी भाषा के 'सलाम' शब्द से निकला है, जिसका मतलब है सलामती, अमन। ऐसी हालत में आखिर किस बिनाह पर कहा जा सकता है कि इस्लाम दहशतगर्दों को पनाह देता है।पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सल0 को संबोधित करते हुए कहा गया है कि  ''ऐ मुहम्मद! हमने तुम्हें दुनिया के लिए दयालुता ही बनाकर भेजा है।'' (क़ुरान 21:07)''बुराई को भलाई से दूर करो'' (क़ुरान 28 :54)''और "जो शख्स सब्र से काम ले और दूसरे के कसूर को माफ कर दे तो बेशक यह बड़ी हिम्मत का काम है।'' (क़ुरान 42 :43)'' " भलाई और बुराई बराबर नहीं है। अगर कोई बुराई करे तो उसका जवाब भलाई से दो। फिर तुम देखोगे कि तुम्हारा दुश्मन ही तुम्हारा गहरा दोस्त बन गया है। और यह गुण उन्हीं को मिलता है जो सब्र करने वाले हैं और जो बेहद खुशनसीबहैं। अगर इस बाबत शैतान के उकसाने से तुम्हारे अंदर कोई उकसाहट पैदा हो जाए तो अल्लाह की पनाह तलाश करो। बेशक वही सब कुछ सुनने वाला और जानने वाला है।'' (क़ुरान 41 : 34-36)मोहम्मद आरिफ कहते हैं-इस्लाम त़कवा का धर्म है, फतवा का नहीं| तक़वा का अर्थ है, ईश्वरीय चेतना और फतवा का अर्थ है, कानूनी फरमान ! जो लोग कहते है कि इस्लाम को तलवार के जोर पर दुनिया में फैलाना जायज है, वे कृपया कुरान शरीफ की इस आयत को पढ़ें – ‘तुझे तेरा धर्म मुबारक और मुझे मेरा’ (18.29).  इस्लाम को या धर्म को अरबी में ‘दीन’ कहते हैं| दीन का अर्थ है, जीवन-पद्घति | जीवन-पद्घति हमेशा एक-जैसी नहीं होती| विविधता ही उसकी प्राण है| इसीलिए कुरान यह कहीं नहीं कहती कि सारी दुनिया का ‘दीन’ एक ही होना चाहिए और उसके लिए दुनिया के लोगों को डंडे के जोर पर मजबूर किया जाना चाहिए| आम तौर से लोगों में यह धारणा है कि जो भी इस्लाम स्वीकार कर लेगा या मुसलमान बन जाएगा, उसे जन्नत जरूर नसीब होगी लेकिन अगर कुरान की आयत पढ़ें तो वह कहती है, ”न तो तुम्हारी मनोकामना और न ही पवित्र् ग्रंथ (कुरान) को माननेवालों की इच्छा बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के कर्म के अनुसार ही फैसला होगा|” (4.123)इस्लाम की सार्वभौमिकता और वैश्विकता इसी से सिद्घ होती है कि वह मनुष्यों के बीच ऊँच-नीच की श्रेणियॉं स्वीकार नहीं करता| मक्का के पतन पर पैगंबर ने दो-टूक शब्दों में कहा कि अब तुम लोग यह अच्छी तरह से जान लो कि सारी इंसानियत आदम की औलद है| कोई किसी से छोटा-बड़ा नहीं है| कोई अरब किसी गैर-अरब से बड़ा नहीं है और कोई गैर-अरब किसी अरब से बड़ा नहीं है| मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने इसे ही इस्लाम का मुश्तरक हक कहा है याने सत्य की व्यापकता !मोहम्मद साहब की वाणी को पेश करते हुए आरिफजी ने कहा कि  ”अल्लाह की इबादत 70 वर्ष तक करने की बजाय एक घंटे का आत्म-मंथन ज्यादा श्रेयस्कर है|” खुद पैगंबर ने कहा था कि ”पालने से कब्र तक ज्ञान की खोज में लगे रहो|” और ”ज्ञान की खोज में चीन भी जाना हो तो जाओ|”‘सर्वदेव नमस्कारं केशवं प्रति गच्छति’ अर्थात किसी भी देवता (अल्लाह, ईसा, मूसा, मार्क्स) को प्रणाम किया जाय, तो वह केवल केशव (विष्णु) को ही प्राप्त होगा, इनमेँ कोई अन्तर नहीँ।हिन्दू-मुस्लिम एकता पर लिखना चाहिए, क्योंकि प्रेम और शांति से बढ़कर विश्व में कोई भी विषय नहीं हो सकता है. मेरा भी यही मानना है, की सबसे पुराना धर्म सनातन धर्म ही है. यह धर्म आदम (अ.) के धरती पर पैदा होने के समय से चला आ रहा है. इस्लाम कोई नया धर्म नहीं अपितु वही पुराना सनातन धर्म ही है. स्वयं ईश्वर  ने कुरआन में फरमाया (अर्थ की व्याख्या): "ऐ रसूल-अल्लाह, फर्मा दीजिये, कि मैं कोई नया धर्म लेकर नहीं आया हूँ, बल्कि यह तो वही पुराना धर्म है, जो इस विश्व के आरम्भ से चाला आ रहा है." 
स्वामी विवेकानन्द धारणा, कर्म और सत्य कहने में समान रूप से निर्भीक हैं. १८९८ में मोहम्मद सरफराज हुसैन को एक पत्र में उपसंहार में स्वामीजी राष्ट्रिय एकता और उन्नति का उपाय के बारे में उपरोक्त परिचर्चा के परिपेक्ष्य में सूत्र देते हैं- " हमलोगों की अपनी मातृभूमि के लिये हिन्दू और इस्लाम धर्म रूप दो महान मतों का समन्वय ही उपाय है- वेदान्तिक मस्तिष्क और इस्लामिक शरीर. यही एक मात्र आशा है. " " मैं अपने मानस चक्षुओं से देख रहा हूँ, यह विवाद, विश्रीन्ख्ला भेद्पुर्व्क भविष्य में पूर्णांग भारत वेदान्तिक मस्तिष्क और इस्लामी शरीर लेकर महा महिमा में और अपराजेय शक्ति में जाग्रत हो उठा है. " यह वेदान्तिक मस्तिष्क और इस्लामी शरीर किसी हिन्दू या मुसलमान व्यक्ति विशेष का नहीं है. इस कथन का अर्थ है- १२० करोड़ भारत वासियों का एकीकृत जो विराट रूप हो, वह राष्ट्र पुरुष, उसका मस्तिष्क वेदान्त के अद्वैत या अभेद भाव से पूर्ण हो जाय. और उस विराट पुरुष का शरीर अर्थात राष्ट्रिय सामाजिक दैन्दिन व्यावहारिक जीवन में इस्लामिक सामाजिक साम्य का प्रयोग-कुशलता उसी वेदान्त के अभेद तत्व को कार्यकर करे. तभी राष्ट्रिय एकता कार्यकर हो सकती है. - अन्य कोई मार्ग नहीं है. राष्ट्रिय एकता के विषय में स्वामी विवेकानन्द की यही विचार है, और सिद्धांत है. जिसे आज भी प्रयोग करने से भारत का कल्याण तुरान्वित हो सकता है. 
" मैं आमूल परिवर्तन का पक्षपाती हो गया हूँ. प्राचीन संस्कारों को त्याग कर नये शीरे से प्रारम्भ करूंगा. बिल्कुल नया, सरल किन्तु सबल, तुरंत जन्में शिशु जैसा नवीन और सतेज. संग्राम, संग्राम - जब तक प्रकाश की किरन नजर नहीं आती, तबतक संग्राम करो. आगे बढो. बारूद को धीरे धीरे भरना ओता है. उसके बाद आग की एक चिंगारी ही सबक्छ कुछ उद्भाषित हो उठता है. यदि नंगी तलवार लेकर सम्पूर्ण जगत तुम्हारे विरुद्ध क्यों न खड़ा हो जाय, जिसको सत्य समझते हो, वही करते रह सकोगे क्या ? "
महामंडल का उद्देश्य है भारतीय संस्कृति अनुसारी मूल्यबोध को - जो स्वामी विवेकानन्द के ' मनुष्यत्व उन्मेषक और चरित्र गठन कारी आदर्श में ग्रथित हैं, - विशेष रूप से किशोर और युवाओं के भीतर संचारित कर देना, एवं युवा शक्ति को सुश्रीन्ख्ल रूप से निःस्वार्थ देश सेवा के माध्यम से राष्ट्र निर्माण के कार्य में नियोजित कर देना. महामण्डल का एक द्विभाषिक मासिक मुखपत्र है- ' विवेक-जीवन '; इस आदर्श और संस्था के सम्वाद आदि को प्रचार करने के लिये प्रकाशित करता रहता है.                            
 (जिहाद के नाम पर चल रहे आतंकवाद को लेखक ने बहुत ही रोचक और प्रामाणिक ढंग से इस्लाम-विरोधी सिद्घ किया है| इस पुस्तक को पढ़ने पर हर किसी पाठक को इस्लाम की ऊँचाइयों और गहराइयों का नया बोध होगा| × आरिफ मोहम्मद खान, ”कुरान एंड कंटेम्पररी चेलेंजेस : टेक्स्ट और कॉंटेक्स्ट” (रूपा, 2010) आरिफ मोहम्मद खान को इस देश में शाह बानो मामले के ‘हीरो’ के तौर पर जाना जाता है| मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए राजीव गांधी सरकार के जिस मंत्री ने सदन की चलती बहस के दौरान ही अपना इस्तीफा लिखकर भेज दिया, उस शख्स का नाम है, आरिफ मोहम्मद खान ) 
(सर्वजन हित की प्रार्थना  -ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनःसर्वे शन्तु निरामयाः ।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥|) 
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सोमवार, 13 नवंबर 2017

$$$ अन्तः प्रकृति का विजेता ही सच्चा हीरो (वीरपुरुष) होता है !

अन्तर्निहित ब्रह्मभाव को अभिव्यक्त करो, और मुक्त हो जाओ ! 
अन्तः प्रकति (Inherent nature,जन्मजात प्रकृति) पर विजय प्राप्त करने में सफल मनुष्य ही 'सच्चा हीरो-वीरपुरुष' होता है ! मानव-सभ्यता का इतिहास प्रकृति के विरुद्ध संग्राम करने वाले वीरों का इतिहास है। प्रकृति दो प्रकार की होती है- अन्तः प्रकृति (Internal Nature-काम-क्रोध-लोभ-मद-मोह आदि भीतरी स्वभाव) एवं बाह्य प्रकृति (External nature)। विश्व में जितनी भी प्रगति हुई है, मनुष्य जाति ने जो भी कीर्तिमान स्थापित किया है; वह सब प्रकृति के ऊपर विजय प्राप्त करने से ही हुई है। प्रकृति का अनुसरण करने वाला, अथवा मन की गुलामी करने वाला कोई भी मनुष्य कभी सेलेब्रिटी (ख्याति-प्राप्त व्यक्ति-Celebrity) नहीं बन सकता। 
इसीलिये स्वामी विवेकानन्द जी युवाओं को अन्तः प्रकृति और बाह्य प्रकृति के विरुद्ध संग्राम करने का 
आह्वान करते हुए कहते हैं- " प्रत्येक आत्मा अव्यक्त (संभावित) ब्रह्म है। बाह्य एवं अन्तःप्रकृति को वशीभूत करके इस ब्रह्मभाव को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है। कर्म, उपासना, मनःसंयम अथवा ज्ञान, इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर अपना ब्रह्मभाव व्यक्त करो -और मुक्त हो जाओ ! बस, यही धर्म का सर्वस्व है। मत (ism), अनुष्ठान-पद्धति, मन्दिर अथवा अन्य बाह्य क्रिया-कलाप तो उसके सेकेंडरी डिटेल्स मात्र हैं। " 
 'तुम दोनों प्रकृति पर विजय प्राप्त करो और हीरो (वीर) बनो; आज तुम्हारे देश को ऐसे ही वीरपुरुषों की आवश्यकता है।' किन्तु इस संग्राम का प्रारम्भ,हमें अपनी अन्तःप्रकति के ऊपर विजय प्राप्त करने के द्वारा 'Victory on Intra-type Nature ' द्वारा ही करना होगा। स्वामीजी के कहने का तात्पर्य यही है कि ईश्वर के अनुग्रह से अभी हमें केवल मनुष्य का शरीर भर ही प्राप्त हुआ है, किन्तु वास्तविक 'मनुष्य' तो बनना पड़ता है। अभी तो केवल हमारा ढांचा ही मनुष्य का है, भीतर में जन्मजात पाशविक प्रवृत्तियां भरी हुई हैं। हमारे शास्त्रों में कहा गया है -
येषां न विद्या, न तपो, न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः । 
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ।। 
जो व्यक्ति उस विद्या को प्राप्त करने के लिये, जो विद्या मनुष्यों को मुक्त कर देती, विनय प्रदान करती है, प्रयत्न नहीं करते। न तप करते हैं, न दान देते हैं, न ज्ञान के लिये यत्न करते हैं, न शील हैं और न ही जिनमें और कोई चारित्रिक-गुण हैं, न धर्म है (सही आचरण है), ऍसे लोग मृत्युलोक में इस धरती पर बोझ ही हैं, मनुष्य रुप में वे वास्तव में जानवर ही हैं । (विवेक-प्रयोग आदि ५ अभ्यासों के द्वारा)  अन्तः प्रकृति पर विजय प्राप्त करके स्वयं को एक 'यथार्थ मनुष्य',  वीर पुरुष या हीरो के रूप में प्रतिष्ठित कर लेने का जो वैशिष्ट्य  एकमात्र मनुष्य को ही वैशिष्ट्य प्राप्त है, उसी को 'धर्म' (मानवोचित वर्णाश्रम धर्म या कर्तव्य) कहते हैं।    
उसी मुक्त कर देने वाली विद्या (मोक्ष या डीहिप्नोटाइज्ड कर देने वाली विद्या) की तरफ संकेत करते हुए स्वामी जी कहते हैं, उपरोक्त चार प्रकार के उपायों द्वारा, सर्वपर्थम अपने अन्तः प्रकृति को जीत कर, अपने अन्तर्निहित ब्रह्मभाव को अभिव्यक्त करो, और मुक्त हो जाओ ! हमें ब्रह्मवेत्ता मनुष्य बनना होगा - क्योंकि ब्रह्मविद् मनुष्य ब्रह्म ही हो जाता है ! इसीको धर्म कहते हैं।  जीवन में पशु से मनुष्य और मनुष्य को ईश्वर में उन्नत कर देने वाले 'धर्म' का उपस्थित रहना भी परमावश्यक है। हमें अपने जीवन और आचरण से भी यह प्रमाणित करना पड़ेगा कि हम मनुष्य हैं-पशु नहीं हैं। हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है -  
आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् । 
धर्मो हि तेषामधिको विशेष: धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥
अर्थात आहार निद्रा भय और वंश-विस्तार की चेष्टा सभी प्राणियों मे समान रूप से पाये जाते हैं। मनुष्य शरीर में जन्म लेने का वैशिष्ट्य- धर्म का पालन करने में है। ' धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः' --यदि हमलोग धर्म का पालन न कर सकें, तो भले ही हमारा ढाँचा मनुष्य का हो, किन्तु ' मनुष्य' कहलाने के लायक नहीं होंगे। 

किन्तु धर्म क्या है ? एक बार (२००५ सरीसा आश्रम में) पूज्य नवनीदा ने कहा था, यदि एक लाख लोगों में से कोई एक व्यक्ति भी यह बता दे, कि धर्म क्या है -तो बहुत समझना होगा ! अँगरेज़ी में जो 'रिलीजन' है, वह हिन्दी में क्या है—धर्म कि पंथ? धर्म को ठीक प्रकार से समझने के लिये पहले हमें इस बात पर विचार करना होगा, कि क्या भारत एक पन्थ-निरपेक्ष राष्ट्र है या धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र हैं ? भारत में अब २६नवम्बर को भी २६जनवरी के जितना महत्वपूर्ण क्यों माना जा रहा है ?  किन्तु ऐतिहासिक रूप से भारत में 'सर्वधर्म-समन्वय' और वैचारिक एवं दार्शनिक स्वतन्त्रता तो अनादी काल से चली आ रही है। इसीलिये हमारे संविधान निर्माताओं ने भारतीय संविधान की मूल पूर्वपीठिका (preamble) में 'सेक्युलर' शब्द नहीं लिखा था। किन्तु सन १९७६ में इमरजेंसी लगाकर  ४२वें संविधान संसोधन किया गया और 'सेक्युलर' शब्द जोड़ दिया गया। इसका अर्थ होता है- 'पंथ-निरपेक्ष', 'धर्म-निरपेक्ष' नहीं।  क्योंकि धर्म के बिना या चरित्र के बिना तो मनुष्य केवल पशु ही नहीं राक्षस भी बन जाता है , इसका प्रमाण आयेदिन हम समाचार पत्रों में देख सकते हैं। हमारे शास्त्रों में कहा गया है -

श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चैव अनुवर्त्यताम् । 
आत्मनः प्रतिकूलानि , परेषां न समाचरेत् ॥ 
 - अर्थात धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो और सुनकर उस पर चलो ! उसको भली-भांति धारण करो। जो कुछ तुम्हें अपने लिए हितकर प्रतीत नहीं होता, उसका व्यवहार दूसरों पर न करो। 
अर्थात धर्म का सार एक ही है-प्रेम, इसीलिये कभी किसी के ऊपर अपनी मान्यता को बलपूर्वक न थोपो। कुछ नादान लोग " धर्म " का अर्थ Religion,या मतवाद या मजहब समझते हैं, इसीलिये वे इस धारणा को किसी भी प्रकार स्वीकार नहीं करते। उनकी धारणा के अनुसार उनकी जो मान्यता है वही सत्य है और जो उसके मत को स्वीकार नहीं करेंगे, वे उन्हें तलवार की धार से मौत की घाट उतार देंगे।  
मनुष्य और पशु में अन्तर क्या है ? पशु पराधीन रहता है, वह इन्द्रियों के वश में रहता है। स्वर्ग प्राप्ति की कामना, भोग वांछा की कामना, कल्प-वृक्ष पाने की कामना, या काम-धेनु को पाने की कामना भी पशु भाव है। भीतर की पशुता से मुक्त हो जाने, या अन्तः प्रकृति (Inherent Nature जन्मजात प्रवृत्ति) पर विजय प्राप्त करने की साधना, भ्रममुक्त या 'डीहिप्नोटाइज्ड' हो जाने की साधना का नाम ही पुरुषार्थ है। 
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चार पुरुषार्थ में पहला पुरुषार्थ है- " धर्म "!  धर्म उसे कहते हैं, जो अर्थ भी देता है, भोग भी देता है, अच्छा जीवन भी देता है। पद और यश भी देता है और अंत में दिव्य जीवन भी देता है, जिसको मोक्ष कहते हैं। मनुष्य को एक विशेष शक्ति, 'विवेकप्रयोग-शक्ति' प्राप्त है, जिसको धर्म कहा जाता है। ये ' धर्म ' जिसमें नहीं है, उसका ढाँचा तो मनुष्य का है, किन्तु आचरण में वह पशु के बराबर होता है, क्योंकि वह भी इन्द्रियों के वश में रहता है।
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, "  धर्म वह वस्तु है, जिससे पशु  मनुष्य तक और मनुष्य परमात्मा तक उठ सकता है। " हमारे शास्त्रों के अनुसार मानव , किसी भी लोक- लोकांतर में या किसी प्रकार के निर्जन स्थानों मै भी क्यों न चला जाये, वहाँ भी वर्णाश्रम-धर्म का पालन करना या मानवोचित कर्तव्य (विवेक-सम्मत कर्तव्य) को पालना करने का नाम धर्म है। क्या प्रतिमास घटने वाली नक्सली क्रान्तियां, राजनीतिक हत्याएं, गोली वर्षा अथवा राग, द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, अभिमान का प्रदर्शन कम हो गया है ? क्या इस सम्पूर्ण तकनीकी उन्नति से मानव मन को शान्ति प्राप्त हो रही है? शान्ति, सुख, निश्चिन्तता और निर्भयता तो दिखाई देती नहीं। यह क्यों ? महर्षि व्यास देव कहते हैं -
 ‘ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिद् शृणोति माम,
धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते।
- ‘मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार-पुकारकर कह रहा हूँ, पर मेरी बात कोई नहीं सुनता । धर्म से मोक्ष तो सिद्ध होता ही है अर्थ और काम भी सिद्ध होते हैं; तो भी लोग उस वर्णाश्रम-धर्म ये चार पुरुषार्थों का  सेवन क्यों नहीं करते?’ 
अर्थोपार्जन करना प्रत्येक मनुष्य का पवित्र कर्तव्य है। परन्तु उसके लिए धर्माचरण का ठोस आधार का होना भी अवश्यंभावी है। धर्म से विमुख हो कर अर्थोपार्जन में सलंग्न हम प्राकृतिक संपदा का विवेकहीन दोहन  करके संसार के पर्यावरण संतुलन को नष्ट करते हैं। काम को धर्म और अर्थ के बाद तीसरा स्थान दिया गया है। इसलिए काम को धर्म और अर्थ दोनों पर ही आश्रित होना चाहिए।  यदि मनुष्य में कोई कामना या इच्छा ही नहीं रहेगी तो वह मृतप्राय ही हो जाएगा। इसीलिये शास्त्रों में विवाह को धर्म-संस्कार माना गया है, और त्याग भाव से काम का उपभोग करने की शिक्षा दी गयी है। केवल अपने ही क्षुद्र स्वार्थों का को पूरा करने में न लग जाएँ, पहले स्वयं त्याग करें और  अन्य सभी का ध्यान रखे, फिर स्वयं उपभोग करें। दूसरों को खिलाकर तब स्वयं खाएं। माँ को इसीलिये देवी कहा जाता है, वे सबको खिला लेने के बाद जो बचाखुचा मिल जाता है, उसी को खाकर तृप्त हो जाती है।  मोक्ष का स्थान सबसे अन्त में आता है। अर्थात अपने-पराये के भ्रम से मुक्त हो जाने की अवस्था सवसे अंत में आती है ! यह अवस्था हमें तभी प्राप्त हो सकती है, जब हमारा अर्थ व, काम दोनों ही धर्म से संचालित होंगे। धर्म की जिस दुरवस्था पर वेदव्यास सरीखा क्रांतदर्शी कवि रो रहा है (‘विरौमि’ष्) वह धर्म क्या है?  धर्म कोई कर्मकाण्डी उपासना पद्धति नहीं है।  महाभारत में व्यास-मुनि कहते हैं- 

धारणात् धर्ममित्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः ।

 यश्च  धारण संयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ।।  
अर्थात्—‘जो हमारे मनुष्यत्व को धारण करता है, एकत्र करता है, अलगाव-वाद को दूर करता है, उसे ‘‘धर्म’’ कहते हैं। जिसके रहने से ही हमलोग मनुष्य कहलाने योग्य बनते हैं, ऐसा धर्म प्रजा को धारण करता है। जिसमें प्रजा को 'एकात्मबोध ' में बाँध देने की ताकत है, वह निश्चय ही धर्म है।’ विवेक-प्रयोग करके चरित्र के जिन गुणों (निःस्वार्थपरता आदि) को धारण करने से हमलोग पशुत्व से उपर उठकर मनुष्य बन सकें और, उससे उपर उठकर देवता बन सकते हों वही धर्म है। 
किसी विशेष परिस्थिति या चार-आश्रम में रहते समय मनुष्य का मानवोचित कर्तव्य होता है, उसी को उसका धर्म कहा जाता है। किसी विशेष अवसर के उपस्थित होने पर, जब हम किसी कार्य को,बुद्धि और हृदय द्वारा गहन चिंतन करके बिना किसी डर या दबाव के श्रेय-प्रेय,शाश्वत और नश्वर के बीच विवेक-प्रयोग करने के बाद,विचार-स्वातंत्र्य से केवल अपना मनुष्योचित कर्तव्य या अपना वर्णाश्रम-धर्म समझकर करने का निर्णय लेते हैं, उस समय वही हमारा धर्म होता है ! जैसे महर्षि दधिची ने जब  अस्थिदान का निर्णय लिया तब वह उनका धर्मं था, भगवान राम ने पिता का आदेश पालन करने हेतु वन जाने का निर्णय लिया - तब वही उनका धर्मं था, अर्जुन के लिये अपने गुरु-और पितमामह से भी युद्ध लड़ना धर्मं था।  
किन्तु अज्ञानवश प्रत्येक व्यक्ति अपने मन-मर्जी के अनुसार विचार करके, या कहीं से सुनकर धर्म के बारे में अपनी कोई न कोई अलग धारणा बना लेता है, और साम्प्रदायिक झगड़ों को धार्मिक -दंगा फसाद कहता है । 'धर्म' के बारे में जो सबसे महत्वपूर्ण बात है, जिसे समझना हर किसी के लिए जरूरी है, वह है- रिलिजन (Religion) या पंथ जो किसी व्यक्ति-विशेष के द्वारा स्थापित किया जाता है, तथा मानव-धर्म या निःस्वार्थपरता जैसे मानवीय गुणों और मानवीय-कर्तव्यों के अन्तर को समझना। रिलिजन या मजहब तथा 'पुरुषार्थ' या 'वर्णाश्रम धर्म' के बीच अन्तर को ठीक से न समझ सकने के कारण ही, हमलोग किसी मजहब या पंथ के अनुयायिओं या 'मतावलम्बीयों' को भी 'धर्मावलम्बी' कहकर सम्बोधित कर देते हैं।  दूसरी बात यह समझने की है कि 'धर्म' को किसी व्यक्ति-विशेष के द्वारा उद्धाटित और स्थापित नहीं किया जा सकता  है,वह तो सभी मनुष्यों के लिए होता है। जबकि कोई विशेष नाम वाला मत या मजहब (Religion) एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों के जरिए स्थापित और संचालित किया जाता है। भारत के जितने आयातित पन्थ हैं, वे अभी तक 'धर्म' और 'मजहब' (पंथ या संप्रदाय) के अन्तर को नहीं समझ सके हैं; इसीलिये वे अपने को भारतीय संस्कृति 'अनेकता में एकता-भारत की विशेषता' के अनुकूल अपने को ढाल नहीं सके हैं, और मजहबी-विवाद का सबसे बड़ा कारण भी यही है।  
टकराव वहां पैदा होता है जहां धर्म (चरित्र) का लोप हो जाता है। ब्रह्माण्ड के असंख्य स्थूल पिंडों की गमन-व्यवस्था कितनी आश्चर्यजनक है ! सभी ग्रहों के आकार भिन्न हैं, सबकी दिशाएँ भिन्न हैं, गतियाँ भिन्न हैं किन्तु कहीं पारस्परिक मुठभेड़ नहीं होता। भिन्नता के बाद भी टकराव क्यों नहीं होता ? इनमें से कोई भी एक दूसरे के कार्यों में बाधा उत्पन्न नहीं करता, कोई ग्रह यह नहीं कहता कि हमारी ही दिशा सही है, हमारी ही गति सही है, सब ग्रहों को हमारा ही अनुसरण करना होगा। क्योंकि उन भौतिक पिंडों को पता है,पता है कि सब एक दूसरे का अनुसरण करने लगेंगे तो आपस में मुठभेड़ हो जायेगी। सब का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।  इसलिए सब अपने-अपने रास्ते में अपनी-अपनी गति से गमनशील हैं, सब एक दूसरे का सम्मान करते हुए, उनकी परम्पराओं का सम्मान करते हुए, उनके सिद्धांतों का आदर करते हुए गतिमान हैं। तथापि कुछ नियम हैं जिनका पालन सबके लिए अनिवार्य है। जैसे गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांतों का धर्मपालन किये बिना, गति के सामान्य सिद्धांतों का धर्मपालन किये बिना उनका अस्तित्व संभव ही नहीं है। वस्तुतः भिन्नता के कारण ही टकराव नहीं होता है। एकरूपता होती तो सोचिये क्या होता? 
तथा 'मतावलम्बी' होने को 'धर्मावलम्बी' होने का पर्यायवाची मानकर आजीवन भ्रम में पड़े रहते हैं, तथा साम्प्रदायिक झगड़ों, या मजहबी टकराव को भी रिलीजियस राइट या धार्मिक-दंगा कह देते हैं।      भारतीय संस्कृति विविधताओं का सम्मान करती  है और 'अनेकता में एकता को ही भारत की विशेषता' मानती है !' हम केवल अपने ही पंथ या कबीले के हित की बात ही नहीं सोचते, हमलोग 'वसुधैव कुटुंबकम' मानकर, या सम्पूर्ण पृथ्वी को एक विशाल परिवार मानकर 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' की, जगत के सभी मनुष्यों
के कल्याण की कामना भी करते हैं। हमारी संस्कृति "बीती ताहि बिसारिए" में विश्वास रखती है ताकि आगे की सुध ली जा सके। हम वर्तमान में विश्वास रखते हैं, ताकि भविष्य की मजबूत बुनियाद खड़ी कर सकें,किसी भी पंथिक या जातिवादी अलगाववाद में हमारी आस्था नहीं है। 
यही उचित अवसर है जब हम अपनी सनातन संस्कृति की अमृत-धारा से टूटकर अलग हुए - कश्मीर के अलगाववादियों के साथ-साथ सभी समुदाय ले लोगों को सनातन भारतीय-संस्कृति के निकट लाएं और हमारे ये प्रयास तब तक जारी रहें जब तक कि हम उन्हें उसी अमृतधारा से नहीं जोड़ लेते। अगर राष्ट्र को ही हमलोग सर्वोपरि समझते हैं, तो संस्कृति की धारा में हमें एक साथ चलना होगा और वही सच्चे अर्थों में एकता होगी। सेक्युलरिज्म या पंथ-निरपेक्षता का भी तभी कोई अर्थ होगा। जब तक सभी पंथों की मजहबी मान्यताएं राष्ट्र की मूल सांस्कृतिक धारा के साथ जुड़ना नहीं सिखातीं तब तक यह 'वीर मनुष्य' बन जाने की चुनौती भारत के युवाओं के समक्ष शेष है। 
कल शाम को महामण्डल का आदर्श उद्देश्य एवं प्रतीक चिन्ह (Emblem ) तथा ध्वजा के बारे में सुना कि ' मनुष्य' बनना पड़ता है। अंग्रेजी के कवी ब्राउनिङ्ग की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं -
 " प्रोग्रेस इज मैन्स डिस्टिंक्टिव मार्क अलोन, नॉट गोड्स ऐंड नॉट द बिस्ट्स। 
गॉड इज (परफेक्ट) दे आर; मैन पार्टली इज ऐंड फुल्ली होप्स टू बी !" 
(Progress, man's distinctive mark alone,Not God's, and not the beasts: God is, they are;Man partly is, and wholly hopes to Be.)  
 -अर्थात उन्नति,आरोहण, डीहिप्नोटाइज्ड मनुष्य बन जाने की आवश्यकता, या संसार-सागर से पार-गमन (crossing) की चेष्टा करने की आवश्यकता ईश्वर को  नहीं है।  और पशुओं में तो इसकी क्षमता भी नहीं है,यह केवल मनुष्यों का ही वैशिष्ट्य है। ईश्वर तो पूर्णता में ही विराजमान रहते हैं, उनके आरोहण (ascension) का तो प्रश्न ही नहीं उठता। पशु की प्रजातियाँ (गाय-भैंसें,गधे आदि) ' सतयुग ' में जैसे थे, आज तक  वैसी ही हैं। किन्तु अपूर्ण होने पर भी मनुष्य पूर्णता में पहुँचने की आशा लेकर, या अपने-पराये के भ्रम से मुक्त हो जाने की आशा लेकर केवल मनुष्य ही उन्नति के लिये प्रयत्न करता है। और जीवन-मृत्यु से होता हुआ मनुष्य निरन्तर अंश से पूर्णता की दिशा में ही बढ़ता रहता है।
यही बुद्धत्व या पूर्णत्व पशु योनियों में भी क्रम-संकुचित अवस्था में रहता है, किन्तु पशुओं को पुरुषार्थ करने या सद्गुरु के पास जाकर अपने पूर्णत्व को अभिव्यक्त करने, या जो विद्या मनुष्य को मुक्त कर देती है, उसे सीखने का अवसर नहीं होता है। क्योंकि बड़े से बड़े पशु का अन्तःकरण भी मनुष्यों के जैसा उन्नत नहीं होता कि वे नश्वर-शाश्वत में विवेक-विचार करना सीख सकें। इसलिये वे जीवन भर पशु के जैसा-आहार,निद्रा, भय और मैथुन करते हुए ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। 

किन्तु मनुष्य योनि सर्व-श्रेष्ठ योनि है, वह भोग योनि नहीं है, मनुष्य भी पशु के जैसा आहार,निद्रा, भय और वंश-विस्तार करते हुए एक दिन बूढ़ा होकर मर जाने के लिये बाध्य नहीं है। मनुष्य अपने गुरु से विवेक-प्रयोग करने की विद्या सीखकर आंशिक मनुष्य और आंशिक पशु की मिली-जुली अवस्था से पूर्ण-मनुष्य में उन्नत हो सकता है। 

मनुष्य मात्र में प्रच्छन्न भाव से अंतर्निहित देवत्व को विकसित करने का उपाय क्या है ? विभिन्न युगों मे विभिन्न महापुरुषों ने कई प्रकार के मार्गों का आविष्कार किया है। इस युग मे श्रीरामकृष्ण के उपदेशों के अनुरूप स्वामी विवेकानन्द ने जो सहज मार्ग दिखलाया है, वह है - 'कर्म और उपासना' साथ साथ करना । श्रीरामकृष्ण देव कहते थे 'दया नहीं, शिव ज्ञान से जीव सेवा।' किन्तु स्वामीजी ने बाद मे कहा था, 'सेवा' कहने से मेरी भक्ति-भाव को संतुष्टि नहीं मिलती। इसलिये सेवा के समय मेरा अपना भाव रहता है - ' सेवा नहीं पूजा !'  'सेवा' करने के बदले यदि मन में 'पूजा' का भाव रखा जाय तभी- जीव मात्र को शिव जानकर उसकी सेवा की जा सकती है।
देव-प्रतिमा की पूजा किस प्रकार की जाती है उपासना शास्त्रों में कहा गया ‘‘रामो भूत्वा रामं यजेत्।’ यानी हम जिस किसी भी देवता की उपासना करतें है उनके जैसे विचार हैं, मंतव्य है, गुण हैं, वे सभी गुण हमें अपने भीतर आत्मसात करने चाहिए । तथा उसके लिये साधना करनी चाहिए । अपने उपास्य के (आदर्श या नेता के) गुणों को अपने भीतर धारण करने की साधना के बिना उपासना निरर्थक है। आगम वचन है- 'देहो देवालयो साक्षात्' तथा 'देवो भूत्वा देवं यजेत्' - कर्मकांड में देवता होकर देवता का यजन करना पड़ता है। उपासना में उपास्य जैसा बनना अभ्यास है । अर्थात मेरे इष्टदेव या आराध्य देव ने अपने जीवन काल में जिस प्रकार कुछ युवाओं को एकत्र कर, उन्हें 'रामकृष्ण -विवेकानन्द वेदाध्यापक प्रशिक्षण परम्परा ' में अपने ब्रह्मभाव को अभिव्यक्त कर मुक्त हो जाने का प्रशिक्षण दिया था, वही कार्य करना उनकी उपासना करना है। उस वैदिक-युग की भावना यह थी कि अपने इष्टदेव का जैसा रूप या बिम्ब भक्त या शिल्पी के मन में है, उसी का सदृश्य और प्रतिबिम्ब ही देवता का वास्तविक रूप है। पहले स्वयं देवता बनने की पूजा करनी होगी, फिर दूसरों को भी वुड बी लीडर्स या भावी देव (भावी ब्रह्मविद मनुष्य)  समझकर का पूजन करें तो उससे अमिट फल की प्राप्ति अवश्य होगी।' 
हमलोग अपने बेटे-बेटिओं को महान मनुष्य, सेलेब्रिटी, या प्रख्यात मनुष्य बनाना चाहते हैं। हमारे अभिभावक गण चाहते हैं कि  हमारे बच्चे बड़े होकर इतने महान बनें कि वे इस देश के भूखे-नंगे लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाने का सामर्थ्य प्राप्त कर सकें; और साधारण मनुष्य लोग भी उनको पूजनीय मनुष्य जैसा सम्मान दे सकें। महामण्डल अपने सदस्यों को इस प्रकार का मनुष्य बनाना चाहता है, जो जन-हृदय सम्राट बन सके।  यदि हमलोग इतिहास का विश्लेषण करें तो यही पायेंगे कि जगत वैसे ही लोगों की पूजा करता है, जो सम्पूर्ण रूप से निःस्वार्थपर बन गए थे, और जिन लोगों ने आत्मकेन्द्रित जीवन जीया, केवल अपने स्वार्थ का ख्याल रखा था, जगत में उनकी पूजा कभी नहीं हुई है। 
आइये हमलोग श्रीरामकृष्ण देव के जीवन को देखते हैं; बंगाल के एक अत्यन्त दूरदराज के एक छोटे से गाँव में ठाकुर (श्रीरामकृष्ण) ने जन्म ग्रहण किया था।  वे बिल्कुल अनपढ़ थे, लिखना-पढ़ना कुछ नहीं जानते थे; फिर भी आज ठाकुर देश-विदेश में पूजित हो रहे हैं। क्यों लोग उनकी पूजा करते हैं ? माँ सारदा देवी को देखिये, वे भी लिखना-पढ़ना नहीं जानती थीं, वे एम.ए पास नहीं थी, एम. टेक. भी नहीं की थी, क्यों लोग उनकी पूजा करते हैं? इसका कारण यही था कि वे लोग इतने निःस्वार्थी बन गए थे कि साधारण मनुष्यों की चिन्ता में स्वयं को भी भूल गए थे। इसीलिये आज जगत उनकी पूजा कर रहा है। 
उनकी शिक्षा से शिक्षित होकर स्वामी विवेकानन्द सम्पूर्ण विश्व को यही पूर्णतः निःस्वार्थपर मनुष्य बनने और बनाने की शिक्षा दे गए हैं। जब निर्विकल्पसमाधि के आनन्द में लीन होने की इच्छा उन्होंने व्यक्त की तब, 
स्वामीजी को ठाकुर ने सिखलाया था, जो व्यक्ति अपनी मुक्ति की बात सोचता है, वह भी स्वार्थपरता है।  ठाकुर ने कहा था, ' मैंने तो सोचा था की तुम विशाल बटवृक्ष की तरह बनेगा, स्वयं धुप सहकर लोगों को छाया देगा, तुम्हारी छाया में बैठने से कितने ही लोगों को शान्ति प्राप्त होगी। और तू केवल अपनी मुक्ति की बात सोचता है रे? छिः धिक्कार है तुझे !" ऐसा कहकर ठाकुर ने उनकी इस कमी को-ब्रह्मानन्द में लीन होकर रहने की स्वार्थपरता को भी दूर कर दिया था। वही विशाल बटवृक्ष, जिसके जन्म का १५० वर्ष से अधिक बीत चूका है, वे हमारे सामने एक आदर्श मनुष्य के रूप में उपस्थित हैं। अब यह हमारे उपर निर्भर करता है कि हम उन्हें अपने जीवन-आदर्श मानकर ग्रहण करते हैं या नहीं ? अर्थात हमलोग क्या स्वयं को पूजा के आसन पर बैठाना चाहते हैं या नहीं ? आप सभी लोग अपने देवत्व को विकसित करने के लिये आगे आइये। 
इसीलिये यदि हम अपने बेटे-बेटियों को भी यदि पूजनीय मनुष्य बनाना चाहते हों, या उनको पूजा के आसन पर देखना चाहते हों, तो उनको निःस्वार्थी बनने की शिक्षा देनी होगी। उनको देवत्व को विकसित करने की शिक्षा देनी होगी। तभी वे लोग देवता के आसन पर बैठने योग्य हो सकेंगे। हमलोग अपने बेटे-बेटियों को मैनेजमेन्ट पढ़ा रहे हैं, डाक्टरी पढ़ा रहे हैं, इन्जियरिंग पढ़ा रहे हैं -यह सब ठीक है। किन्तु क्या वे देवता के आसन पर बैठने के योग्य मनुष्य बन पा रहे हैं? क्या वे देशवासियों के ह्रदय के आसन पर बैठने योग्य बन पा रहे हैं ? 
हमलोग अत्यन्त स्वार्थपर जीवन बिता रहे हैं, बिल्कुल पशुओं के जैसा जीवन व्यतीत कर रहे हैं। स्वामीजी की शिक्षा से शिक्षित होकर हमलोग देव-तुल्य मनुष्य बनेंगे। जगत की पूजा प्राप्त करने योग्य बनेंगे। स्वामीजी ने कहा था -हमलोगों के हर कदम पर हमारे देवत्व की अभिव्यक्ति जब होने लगेगी तभी हम अपने को स्वामीजी की शिक्षा से शिक्षित मनुष्य कह सकेंगे। 
'कबीरा जब पैदा हुए जग हँसा हम रोये, ऐसी करनी कर चलो तुम हँसो- जग रोये !' जिस मनुष्य के जाने के बाद लोग उसको याद करके अश्रु बहते हैं उसी मनुष्य का मानव-शरीर में जन्म धारण करना सार्थक होता है। और अगर जाने के बाद कोई कहे कि चलो अच्छा हुआ, धरती का बोझ कम हो गया तो उस मनुष्य का अनमोल जीवन व्यर्थ माना जाता है। यदि जीवन को व्यर्थ के कामों -आहार,निद्रा,मैथुन में ही गँवा देना था, तो हमलोग मनुष्य क्यों बने पशु क्यों नहीं बने ? इसिलिये हमलोगों को मनुष्य के जैसा आचरण करके दिखलाना होगा कि हमलोग पशु नहीं हैं। 
इसी युवा अवस्था में हमें अपने जीवन के लक्ष्य को निश्चित कर लेना होगा। जो अभिभावक हैं उन्हें यह विचार करना चाहिये कि हमारा मनुष्य जीवन बीतता जा रहा है, हमलोग दिनोंदिन मृत्यु के निकट बढ़ते जा रहे हैं। हमलोग अपने बेटे-बेटियों को भी ऐसी स्वार्थपरता की शिक्षा तो नहीं दे रहे हैं ? हमें स्वामीजी के उसी जागरण मंत्र को गाँव गाँव तक पहुँचा देने के लिये कमर कस कर खड़े होना होगा। विवेकानन्द युवा महामण्डल अपने प्रत्येक पाठचक्र में आत्मा के जागरण का यही मंत्र उच्चारित करता आ रहा है। अपने ही प्रयोजन को पूर्ण करने के लिये महामण्डल पाठचक्र से जुड़िये। 
केवल यह कहने से कुछ नहीं होगा कि मैंने तो 'रामकृष्ण मिशन से दीक्षा ?' ली है (या अपने गुरुदेव से ?), और भाव-प्रचार भी करता रहता हूँ! हमलोग रामकृष्ण मिशन भी जाते हैं, और अमुक-अमुक महाराज का संग भी किया हूँ। किन्तु जब तक अपने जीवन की ओर नहीं देखते, आत्मसमीक्षा करके अपने अन्तःकरण को शुद्ध नहीं करते, तबतक इस तरह की बातों से कुछ होने वाला नहीं है। क्रमशः स्वामीजी की शिक्षाओं को अपने जीवन में प्रतिष्ठित करना होगा, आचरण से दिखाना होगा। हमलोग विवेकानन्द के साहित्य को बड़े ध्यान से अध्यन करेंगे, chew and digest -केवल स्वाध्याय-नियम की रक्षा के लिए नहीं बल्कि उन्हें आत्मसात करने के चबा चबा कर पचा लेने के लिए पढूंगा।
मैंने बहुत से छात्रों से पूछा है, क्या तुमलोग स्वामीजी की पुस्तकों को पढ़े हो ? अधिकांश छात्र कहते हैं, ' नहीं, मैंने नहीं पढ़ा है; स्कूल -कॉलेज में नहीं पढ़ाया जाता, क्योंकि पैसा कमाने का गुर उसमें नहीं है। इसीलिए हम वे सब नहीं पढ़ते।' किन्तु कुछ भी पढ़ने के लिये पहले मन को तैयार करना पड़ता है-मन लगाकर पढ़ने की सीख सभी देते हैं। किन्तु इच्छा-शक्ति का प्रयोग करके मन को किस प्रकार संयत किया जाता है-इसकी शिक्षा तो कोई नहीं देता ? इच्छा-शक्ति स्वयं ईश्वर से आती है, इच्छा-शक्ति के द्वारा ही हमलोग विवेक-प्रयोग करके अन्तः प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। तभी हमलोग ठीक ठीक मनुष्य बन सकते हैं। दिनों दिन हम बेहतर मनुष्य बन सकते हैं, अच्छा इंसान बन सकते हैं। यही शिक्षा स्वामीजी ने हमलोगों को दी है। रामकृष्ण मिशन और महामण्डल इसी शिक्षा पर चर्चा करता आ रहा है। 
हममें से कुछ लोग स्वामीजी के संदेशों को पढ़ते भी हैं; किन्तु कैसे पढ़ना चाहिये- यह हमलोग नहीं जानते। हमें स्वामी जी के संदेशों पर चर्चा करनी होगी, शास्त्रों में कहा गया है -श्रवण, मनन और निदिध्यासन। सबसे पहले ठाकुर, माँ, स्वामीजी की जीवनी के साथ साथ उनके संदेशों को पढ़ना चाहिये। उसके बाद उनपर मनन करना चाहिये। यही मुख्य बात है। उसके बाद निदिध्यासन करना होगा। स्वामीजी के उपर ध्यान करना होगा। फिर शास्त्रों के साथ मिलाकर देखना होगा -तभी ठीक ढंग से पढ़ना कहेंगे। किस प्रसंग में स्वामीजी यह कह रहे हैं, उसके ऊपर विवेचना करते हुए पढ़ना होगा। हमलोगों के दैनन्दिन जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान स्वामीजी के जीवन और सन्देश के माध्यम से करना होगा। तभी हम लाभ उठा सकेंगे। जिन लोगों ने भी पढ़ा है सभी को इससे फायदा हुआ है।  

गुरु स्वामी विवेकानन्द ने इसी अंश से पूर्ण मनुष्य बन जाने का आह्वान करते हुए युवाओं से कहा था-
" मनुष्य तीन प्रकार के गुणों से निर्मित है,पाशविक, मानवीय और दैवी। जो तुममें दैवी गुण बढ़ाता है वह पूण्य है और जो तुममें पशुता बढ़ाता है वह पाप है।  तुमको पाशविक वृत्ति को समाप्त कर 'मनुष्य ' बनना चाहिये -अर्थात प्रेममय तथा उदार होना चाहिये। इससे भी उपर उठकर तुम्हें शुद्ध आनन्द, सच्चिदानन्द, अदाहक अग्नि के समान, अद्भुत प्रेममय किन्तु मानवीय प्रेम की दुर्बलता से रहित, दुःख की भावना से रहित (डीहिप्नोटाइज्ड) बनना चाहिये।" 
यह ठीक है कि मनुष्य जन्म के समय अपूर्ण रहता है, किन्तु पूर्णता या बुद्धत्व उसके भीतर जन्म के समय से ही क्रम-संकुचित रहता है। स्वामीजी कहते हैं- " मनुष्य में जो स्वाभाविक बल (ब्रह्मत्व) है, उसको अभिव्यक्त करना ही धर्म है। असीम शक्ति का स्प्रिंग इस छोटी सी काया में कुण्डली मारे विद्यमान ( बीज में वृक्ष के जैसा-क्रमसंकुचित) है, और वह स्प्रिंग अपने को फैला रहा है। ...यही है मनुष्य का,धर्म का, सभ्यता या प्रगति का-इतिहास !"( Religion is the manifestation of the natural strength that is in man. A spring of infinite power is coiled up and is inside this little body, and that spring is spreading itself. ...This is the history of man, of religion, civilization, or progress.)    

युवाओं के प्रति उनका आह्वान था- Be and Make ! पहले Be होने अर्थात यथार्थ मनुष्य बनने को कहा फिर उसका उपाय बताते हुए कहा था- Make ! ' अपने भीतर के 'ब्रह्म-भाव' को अभिव्यक्त करने का सबसे सरल तरीका है, दूसरों को इस कार्य में सहायता करना। ' तुम स्वयं यथार्थ मनुष्य बनने और दूसरों को मनुष्य बनाने के प्रयत्न (पुरुषार्थ) में आगे बढ़ो! आगे बढ़ो! 'चरैवेति चरैवेति !' यही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। ऐतरेय ब्राह्मण के एक श्लोक में कहा गया है कि युग-परिवर्तन तो मनुष्य के विचार जगत में होता है -

" कलिः शयानो भवति, संजिहानस्तु द्वापरः । 
उत्तिष्ठँस्त्रेताभवति, कृतं संपद्यते चरन् ।
 चरैवेति चरैवेति॥  
- जो सो रहा है अर्थात जो अन्तः प्रकृति जन्मजात प्रकृति की पाशविक वृत्तियों को ही तुष्ट करने में लगा हुआ है, उसके लिए अभी कलि-काल चल रहा है। निद्रा से उठ बैठने वाला द्वापर में है, और वर्णाश्रम धर्म का पालन करने के लिए जो उठकर खड़ा हो जाता है, वह त्रेता-युग में है। किन्तु जो अपने साथ कुछ और साथियों को लेकर, अन्तः प्रकृति पर विजय प्राप्त करने में समर्थ मनुष्य बनने और बनाने के कार्य में जुट जाता है ( जो वीरभाव या सन्तान भाव का साधक है), वह कृतयुग, सतयुग और स्वर्णयुग (देवभाव का साधक) में निवास करने लगता है। इसलिए हे मनुष्यों - 'चलते रहो, चलते रहो। लक्ष्य के प्राप्त होने तक बिना विश्राम लिये चलना और चलते रहना ही जीवन का लक्षण है। 

 इसीलिये मात्र राजनीति के लिए ' सर्व-धर्म समभाव ' की लुभावनी बातें करना एक अलग बात है तथापि, दुर्भाग्य से विभिन्न नाम वाले  मजहबों; में सम-भाव बैठाना (जिन्हें "धर्म "या रूहानियत) कहना ही ठीक प्रतीत नहीं होता), एक टेढ़ी खीर है। इसीलिये श्रीरामकृष्ण देव (स्वामी विवेकानन्द के गुरु ) " सर्व-धर्म समन्वय " अर्थात विश्व में प्रचलित समस्त उपासना पद्धतियों में सामान्य (common) सार बात में समन्वय लाना आज के विश्व की प्रमुख आवश्यकता मानते थे। अपनी विशिष्ट साम्प्रदायिक-पहचान को सबसे पृथक रखना विभिन्न मतावलम्बियों (सम्प्रदायों) की एक बड़ी समस्या है। प्रश्न यह है कि- जीवन के लिए आवश्यक क्या है ? अपनी पृथक पहचान बनाये रखना या धर्मानुशीलन करना ? सच्चाई तो यह है कि धर्म आचरण में उतारने या धारण करने की चीज है न कि टकराव पैदा करने की। अतः किसी सम्प्रदाय विशेष की केवल पहचान ( प्रतीक-चिन्ह -त्रिपुण्ड,रामनामी चादर,चेक का तौलिया आदि ) धारण करके घूमना पाखण्ड है और धर्मानुशीलन या वर्णाश्रम-धर्म का पालन आचरण है।हमारे किसी भी शास्त्र में, वेदों या उपनिषदों में " हिन्दू-धर्म " कहकर किसी धर्म की चर्चा नहीं हुई है। अठारह पुराणों में नहीं है, महाभारत में नहीं है, रामायण में भी नहीं है। हमारे यहाँ किसी व्यक्ति के द्वारा स्थापित धर्म का पालन नहीं होता है, हमारा धर्म " सनातन-धर्म " है, या उसे वैदिक धर्म भी कह सकते हैं। यह तो विदेशी आक्रमणकारियों की भाषा में 'स' को 'ह' कहने की परम्परा थी, इसीलिये उनलोगों ने ' सिन्धु नदी ' के पूर्वी भाग में रहने वाली मानव-जाति को 'हिन्दू' के नाम से सम्बोधित किया था। 

स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, " जिस हिन्दू नाम से परिचित होना आजकल हम लोगों में प्रचलित है, इस समय उसकी कुछ सार्थकता नहीं है, क्योंकि उस शब्द का केवल यह अर्थ था- सिन्धुनद के पूर्वी छोर पर बसने वाले। प्राचीन फारसियों के गलत उच्चारण (स को ह कहने) से सिन्धु शब्द 'हिन्दू 'हो गया है। वे सिन्धु नदी के इस पार रहनेवाले सभी लोगों को हिन्दू कहते थे। 
इस प्रकार हिन्दू शब्द हमें मिला है। फिर मुसलमानों के शासनकाल में हमने अपने आप यह शब्द अपने लिए स्वीकार कर लिया था। इस शब्द के व्यवहार करने में कोई हानी न भी हो, (अब हिन्दुओं से कोई जजिया टैक्स नहीं ले सकता) पर मैं पहले ही कह चूका हूँ कि अब इसकी कोई सार्थकता नहीं रही; क्योंकि तुम लोगों को इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि वर्तमान समय में सिन्धु नदी के इस पारवाले (पूर्वी हिस्से में रहने वाले) सब लोग प्राचीनकाल की तरह एक ही धर्म को नहीं मानते। इसलिये उस शब्द से केवल हिन्दू मात्र का ही बोध नहीं होता, बल्कि मुसलमान, ईसाई, जैन तथा भारत में विदेशों से आकर बस गए सभी अन्यान्य अधिवासियों का भी होता है। अतः मैं हिन्दू शब्द का प्रयोग नहीं करूँगा। तो हम किस शब्द का प्रयोग करें ? हम वैदिक हैं (अर्थात वेद के माननेवाले हैं) अथवा वेदान्ती शब्द का प्रयोग अपने लिये कर सकते हैं, जो उससे भी अच्छा है।" (वि० सा० ख० ५ पृष्ठ १९)   
इसको ऐसे समझें कि जैसे किसी व्यक्ति का नाम ' पंचानन पाठक ' को बिगाड़ कर उसे कोई केवल अरे 'पाँचू' कहकर पुकारे तो क्या उससे उस व्यक्ति का गौरव बढ़ेगा ? उसे स्वयं को ' पाँचू ' (या हिन्दू) कहे जाने पर गर्व क्यों होना चाहिये ? बहुत से उपनिषद आधुनिक काल के वामपंथी इतिहासकारों और  के द्वारा भी लिखवाये गए थे। उन्हीं में से एक"अल्लोपनिषद" पढ़ने का मौका मिला था। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में और छन्दों में लिखा गया है, किन्तु उन छन्दों को पढ़ने से कोई अर्थ ही नहीं निकलता है। अंश से पूर्ण हो जाना,सिद्धार्थ से बुद्ध बन जाना, बिन्दू से सिन्धु (हिन्दू नहीं) बन जाना यही धर्म का सार है। 
हम चाहे हिन्दू हों या मुसलमान या अन्य किसी सम्प्रदाय मेँ जन्म ग्रहण क्यों न किये हों; बाहरी वेश-भूषा चाहे जैसी भी हो, हमारा चरित्र ही हमारे मनुष्यत्व को धारण किये रहता है। अपने जीवन मेँ प्रतिमुहूर्त हमलोग जिन अनुशासनों का पालन अथवा यम-नियम का अभ्यास करते हैं, चरित्र के वे अनिवार्य गुण हमें मनुष्यत्व की सीमा मेँ पकड़े रखते  है, हमें पशु या राक्षस बनने की सीमा मेँ जाने से रोकता है; उसी को धर्म कहते हैं। हमलोग अभी क्या हैं -मनुष्य हैं या पशु ? हमलोग अपने आप को किस श्रेणी में देखते हैं ? यदि मनुष्य हैं, तो क्या हमलोग अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हैं ?  क्या रामनवमी-मुहर्रम में डांडा भांजना या जन्माष्टमी के अवसर पर दही-हाण्डी फोड़ना युवाओं का धर्म है ? नहीं, धार्यते इति धर्म: अर्थात धर्म चरित्र के उन गुणों (निःस्वार्थपरता आदि चारित्रिक गुणों) को, या ५ अभ्यास को कहते हैं जिन्हें अपने जीवन धारण करने से हमें 'सिद्धार्थ से बुद्ध या भ्रममुक्त-मनुष्य कहलाने का अधिकार' प्राप्त होता है। हमलोग यदि धर्म (यम-नियम) का पालन करके अपने अंतःप्रकृति को जीतने का प्रयत्न नहीं करें, तो हमलोग पशु बन जायेंगे।
पशु प्रकृति का अनुकरण करता है, प्रकृति के विरुद्ध संग्राम नहीं करता। पशु अपने बायोलॉजिकल इंस्टिंक्ट (पाशविक-प्रवृत्ति) को कायम रखने के लिये जिस संग्राम को अवश्यक समझता है, उतना ही संग्राम करता है। किन्तु केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है, जो प्रकृति के विरुद्ध संग्राम करके मनुष्य अपने प्रच्छ्न्न आन्तरिक देवत्व को विकसित कर सकता है। जो मनुष्य प्रच्छन्न भाव से अन्तर्निहित अपने भीतरी देवत्व को विकसित नहीं कर सका-उस मनुष्य जीवन सार्थक नहीं होता- व्यर्थ हो जाता है। 
महामण्डल विगत ५० वर्षों से अपने एन्यूअल कैम्प या वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर के माध्यम से 'देवता जैसा मनुष्य' बनने और बनाने की पूजा का आयोजन करता चला आ रहा है। यह पूजा हम दूसरों को देवता जैसा मनुष्य बनने की प्रेरणा देकर और अपने व्यक्तिगत जीवन मेँ स्वयं देवता जैसा मनुष्य बनकर भी शुरू कर सकते हैं। स्वयं चरित्रवान मनुष्य बनने का प्रयास किये बिना दूसरों को चरित्रवान मनुष्य बनने का उपदेश देंगे तो क्या उसका कोई असर होगा ? क्यों हम यह पूजा करेंगे? देवता बनने और बनाने के लिये। अपने असली स्वार्थ को पूरा करने के लिये, हमें स्वयं को भी एक पूजनीय मनुष्य के रूप विकसित करना ही  होगा। दूसरों का कल्याण तो स्वतः हो जायेगा। 
पहले मैं अच्छा चरित्रवान मनुष्य बनूँगा। इसिलिये महामण्डल का आदर्श वाक्य है Be and Make में  Be स्वयं देवता बनना है,और Make है देवता की पूजा करना। जो पूजा कर रहा है, और जो पूजित हो रहे हैं- इससे दोनों की उन्नति होगी। श्रीरामकृष्ण कहते हैं, शालिग्राम शीला मेँ जब भगवान विष्णु की पूजा हो सकती है, तो जीवंत मानव-शरीर मेँ ईश्वर की पूजा क्यों नहीं हो सकती? इसी प्रत्यक्ष देवता की पूजा करो, अन्य देवता की पूजा बाद मेँ देखी जाएगी। इसलिए महामण्डल विगत ५० वर्षों से वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर आयोजित करता आ रहा है, जहा समस्त सम्प्रदाय एवं जाति के युवाओं को बिना किसी भेदभाव के एक स्थान में एकत्र होने का और विचार-मंथन करने का अवसर बार बार प्राप्त होता है। 
महामण्डल द्वारा आयोजित 'वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर' केवल स्वामी विवेकानन्द का गुणगान करने या उनके प्रति आस्था और  विश्वास व्यक्त करने का उत्सव नहीं है। यह एक ऐसी घड़ी है, जो विगत ५० वर्षों से सही समय बतला रही है, और प्रति  वर्ष २५ से ३० दिसम्बर तक आयोजित होती आ रही है। और यह छः दिवसीय प्रशिक्षण युवाओं को एक नए युग के द्वार पर (सत्ययुग के द्वार पर) छोड़ जाती है। यही वह घड़ी है जो सोने वालों को जगाने, जागे हुओं को उठ खड़े होने और जो उठ गए हैं, उन्हें चल पड़ने की सीख देती है। 
अब कोई कारण नहीं है कि भारत के एक सौ बीस करोड़ लोग निराशा के भाव में जीने को विवश हों।  और कोई कारण नजर नहीं आता कि स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रदत्त भारत-निर्माण सूत्र - ' Be and Make' को जीवन में उतार  लेने से भारत का उदय न हो! वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर जैसे आयोजन अगर जीवन में आगे बढ़ने और सत्ययुग को स्थापित करने के मार्ग पर चलते रहने का पाठ पढ़ाते हैं तो कहीं यह सीख भी देते हैं कि पल भर ठहरकर हम अवोकन कर लें, अपनी दिशाएं स्पष्ट कर लें और पीछे जो भूलें हुई हैं, उन्हें ठीक करते हुए आगे बढ़ चलें। यह शिविर युवाओं को प्रतिवर्ष विचार मंथन का अवसर प्रदान करता है। और वे यह प्रश्न लगभग प्रत्येक एन्यूअल कैम्प में पूछते हैं - 
 '[परिप्रश्ननेन - 5]  चरित्र-निर्माण के पाँच मौलिक अभ्यास : " यदि हम अपने जीवन को देवतुल्य आदर्श मनुष्य ' (मानवजाति के मार्गदर्शी नेता) या हीरो के रूप में  में गठित करना चाहें, तो हमारे जीवन-गठन की दैनन्दिन कार्यपद्धति कैसी होनी चाहिए ?

उत्तर: महामण्डल द्वारा प्रतिपादित मनुष्य बनने (जीवन-गठन, मनुष्य-निर्माण, या चरित्र-गठन ) की सम्पूर्ण कार्यपद्धति को एक लाइन में ही नहीं कहा जा सकता है। जिन कार्यों के करने से हमलोगों का जीवन सुंदर रूप में गठित हो जाता है, उन्हीं कार्यों को महामण्डल के प्रत्येक केन्द्रों में किया जा रहा है. युवा प्रशिक्षण शिविरों में जीवन-गठन की पद्धति को सिखाने का प्रयास किया जाता है. 

महामण्डल की पुस्तिकाओं एवं संवाद पत्रिका  " Vivek-Jivan " (विवेक-अंजन) में इन्हीं सबका विश्लेष्ण करके जीवन-गठन की व्यवहारिक कार्यप्रणाली को युवाओं के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है. तथा जो कोई भी व्यक्ति, एक योग्य जीवन गठित करने के जिन दैनिक-अभ्यासों को करना आवश्यक है, उन्हें कोई करता रहे तो निश्चित रूप से उसका फल प्राप्त होता है.
बहुत संक्षेप में कहा जाय तो, शरीर को स्वस्थ रखने के लिए प्रतिदिन थोड़ा व्यायाम या योगासन करना आवश्यक है. अत्यंत सामान्य व्यायाम, जिसे खाली हाथों ही किया जाता है. उसी तरह हमलोगों को प्रतिदिन थोड़ा मनःसंयोग का अभ्यास करना भी आवश्यक है. मनःसंयोग करने का अर्थ ध्यान करना नहीं है. बहुत से लोगों में इसको लेकर भिन्न भिन्न धारणाएं हैं. 'ध्यान' एक भिन्न वस्तु है, मनःसंयोग अलग वस्तु है. किन्तु छात्र-जीवन में मनःसंयोग का अभ्यास करने से हमारा मन हमारे वश में आने लगता है, हमलोग अपने मन की गुलामी करने की बाध्यता से मुक्त हो जाते हैं। इसीलिये मनःसंयोग की पद्धति को सीखना समस्त विद्यार्थियों के लिये अनिवार्य विषय होना चाहिए।  मनःसंयोग का प्रशिक्षण देकर महामण्डल अन्तः प्रकृति पर विजय प्राप्त करने में समर्थ मनुष्यों का निर्माण करना चाहता है। क्योंकि मनःसंयोग का अभ्यास किये बिना कोई भी व्यक्ति मन लगाकर पढने का कौशल नहीं सीख सकता। इतना ही नहीं वह परिवार, समाज या देश की सच्ची सेवा भी नहीं कर सकता.

 जब हम अपनी प्रयोजनीयता के अनुसार चयनित किसी एक ही विषय के उपर मन को एकाग्र रखने का अभ्यास करते हैं, तब हम मन की शक्ति (Will Power) को अर्जित करते हैं. मनःसंयोग का नियमित अभ्यास करते रहने से हमारी इच्छाशक्ति  अत्यंत बलवान हो जाती है, और वैसा हो जाने के बाद, हमारा मन हमारे वश में आ जाता है।तब हम अपनी इच्छाशक्ति को निर्देशित  करके अपने जीवन को सुंदर रूप में गठित कर सकते हैं। मन हमें अपना गुलाम बनाकर अपनी इच्छानुसार व्यर्थ के विषयों दौड़ाते रहने  में असमर्थ हो जाता है।  
आमतौर पर जो व्यक्ति मनःसंयोग का अभ्यास नहीं करता, उसका  जीवन कैसा होता है? मन हमें जिस ओर खींच कर ले जाना चाहता है, हमलोग उसी ओर जाने को बाध्य हो जाते हैं. हमलोग मन के गुलाम जैसा कार्य करते हैं. किन्तु यदि हम जीवन भर वैसे ही बने रहें, तो मन की अनन्त शक्ति का सदुपयोग करना संभव नहीं होता, और हमलोग  अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाते हैं। मैं यदि मन को तथा अपनी शक्ति को अपनी इच्छानुसार किसी चयनित कार्य में नियोजित करने में सक्षम रहूँगा, तभी मैं जीवन में सफलता प्राप्त कर सकता हूँ. किन्तु यदि मेरा मन ही मेरे वश में नहीं रहता हो, तो मैं अपने जीवन में कैसे सफल हो पाउँगा ? 
किन्तु मेरा मन मेरे वश में अनायास तो नहीं चला आयेगा ! इसके लिए दीर्घ दिनों तक नियमपूर्वक प्रयास करना आवश्यक है। जैसा बताया गया है, प्रतिदिन प्रातःकाल तथा संध्या के समय पाँच मिनट चुप-चाप सीधा होकर बैठने तथा मन को लगाने और हटाने का अभ्यास करने की आवश्यकता है. महामण्डल द्वारा हिन्दी में ' मनःसंयोग ' नामक पुस्तिका प्रकाशित हुई है जिसमें इस पद्धति को अत्यन्त सरल भाषा में समझाया गया है, जिसे कोई भी व्यक्ति बड़ी आसानी से समझ सकता है. 
मनःसंयोग का अभ्यास करने के साथ साथ एक अत्यंत छोटी, किन्तु अति मूल्यवान प्रक्रिया ' सर्वमंगल की प्रार्थना ' का अनुपालन करना भी अनिवार्य है. संसार के सभी मनुष्यों के मंगल की कामना करने के उपर अब पाश्चात्य के आधुनिक मनोवैज्ञानिक भी बहुत जोर देने लगे हैं। यह पद्धति हमारे देश में तो हमेशा से थी, किन्तु पाश्चात्य देशों के मनोवैज्ञानिक इसके महत्व को अभी समझ सके हैं. 
मनःसंयोग का अभ्यास शुरू करने से पहले, पूरी ईमानदारी तथा उत्साह के साथ पुरे मन से कहना चाहिए- ' हे प्रभु, संसार के सभी मनुष्य सुखी हों, सभी शान्ति और आनंद से रहें, सबों को ईश्वर की प्राप्ति हो ! सबो का कल्याण हो ! ' कोई भी मनुष्य इसका अपवाद नहीं होगा,किसी को बहिष्कृत नहीं मानना होगा. जिसको मैं अपना शत्रु समझता हूँ, जिसने अकारण ही मेरे चरित्र पर झूठा लांछन क्यों न लगाया हो, वह भी बहिष्कृत नहीं होगा.' जगत के प्रत्येक मनुष्य का भला हो '- इस बात को सदैव याद रख पाना ही अपने आप में एक बहुत बड़ी अध्यात्मिक उपलब्धी है ! इस उपलब्धी (अद्वैत निश्चय ) के समान मनुष्य के जीवन में कोई दूसरी बड़ी उपलब्धी नहीं है. 
जो व्यक्ति पूरे हृदय से जन-कल्याण या विश्व के सभी मनुष्यों का मंगल चाह सकता है, वह स्वतः अध्यात्मिक रूप से उन्नत हो जाता है. उसका हृदय बहुत विशाल हो जाता है. स्वामीजी कहते थे, जो व्यक्ति अध्यात्मिक जीवन का अधिकारी होता है, उसका हृदय स्वाभाविक रूप से बहुत विस्तृत हो जाता है.
आमतौर पर जैसे ही हम प्रार्थना करते हैं कि संसार के सभी मनुष्यों का भला हो, उसी समय उन एक-दो व्यक्तियों का विशेष रूप से हमारी आँखों के सामने कौंध जाता है, जिनको मैं थोड़ा नापसन्द करता हूँ, या जो लोग मेरे प्रति अकारण ही शत्रुता का भाव रखते हैं, मुझे बदनाम करते हैं या हानी पहुंचाते हैं, किन्तु ये भी बहिष्कृत नहीं होंगे. मुझे उनके कल्याण के लिए भी प्रार्थना करनी होगी- जो व्यक्ति ऐसा करने में समर्थ हो जाता है, उसकी शक्ति कितनी अधिक बढ़ जाती है, इस बात को वे कभी समझ ही नहीं सकते जो ऐसा कभी नहीं किये हैं. ऐसी सर्व-मंगल की प्रार्थना के लिए कोई आपकी खिल्ली भी उड़ा सकता है. किन्तु वैसा करके वे किसी बुद्धिमानी का परिचय नहीं देते. 
यदि किसी प्रक्रिया को अपनाने से उसकी प्रभावकारिता (effectiveness) स्पष्ट दिखाई देती हो, फिर भी अपने किसी पूर्वाग्रह के कारण उसे अस्वीकार कर देना- व्यक्ति के अवैज्ञानिक मनोभाव परिचायक है. किसी प्रक्रिया को अपनाने से यदि उसका अच्छा फल प्राप्त होता हो, उस प्रक्रिया से गुजरने वाले प्रत्येक व्यक्ति को निश्चित रूप से प्राप्त होता हो, तथा जितनी भी बार उस प्रक्रिया को दुहराया जाय उतनी बार एक जैसा ही फल प्राप्त होता हो, उस प्रक्रिया को जो व्यक्ति वैज्ञानिक सत्य के रूप में स्वीकार करता है, तो वैसा करके वह अपने वैज्ञानिक मनोभाव का परिचय देता है. इसीलिए व्यायाम, मनःसंयोग, तथा ' सर्व-मंगल की प्रार्थना ' की प्रभावकारिता (effectiveness ) को प्रयोग कर के तुम स्वयं भी देख सकते हो. इन तीनों प्रक्रियाओं को अपने दैनन्दिन अभ्यास में शामिल कर लेना बिल्कुल आसान भी है. 
इसके बाद प्रतिदिन कुछ अच्छी चीजों का अध्यन या स्वाध्याय भी करना चाहिए. अच्छी चीज-से तात्पर्य है, जिसमें जीवन-गठन करने में सहायक विचार प्राप्त होते हों, समय निकल कर उन्हें भी पढना. महामण्डल की पुस्तिकाओं तथा इसके मुखपत्र ' विवेक-अंजन ' एवं Vivek-Jivan में मनुष्य के शरीर, मन और ह्रदय (3H) को उन्नत करने की व्यवहारिक पद्धति एवं चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा के सार-तत्व के उपर लगातार चर्चा की जाती है. इन सबको तथा स्वामी विवेकानन्द की छोटी-बड़ी किसी भी जीवनी के कुछ अंश को नियमित रूप से प्रतिदिन पढ़ कर यह समझने की चेष्टा करनी चाहिए कि 'रामकृष्ण-विवेकानन्द योग-वेदान्त शिक्षक-प्रशिक्षण परम्परा' (लीडरशिप ट्रेनिंग) में स्वयं स्वामी विवेकानन्द का जीवन एक शिक्षक या वेदाध्यापक के रूप में कैसे गठित हो गया था ?
इसके साथ साथ हमलोगों को स्वामीजी के यथार्थ सन्देशों से भी परिचित होने की चेष्टा करनी चाहिए.क्योंकि स्वामीजी के जीवन तथा संदेश के संबन्ध में आज भी हमलोगों के मन में बहुत सारी काल्पनिक धारणायें (Utopian ideas) भरी हुई हैं. स्वामी विवेकानन्द के जन्म के 150 वर्षों बाद भी हमलोगों में से कई लोगों को (विशेष तौर से हिन्दी भाषी क्षेत्रों में ) विवेकानन्दजी के संबन्ध में कोई स्पष्ट धारणा नहीं है. इसीलिए आज भी हिन्दी-भाषी क्षेत्रों के अधिकांश (पढ़े-लिखे भी ) व्यक्ति यही मानते हैं कि स्वामी विवेकानन्द विदेशों में हिन्दू धर्म को स्थापित कर आये थे. कुछ लोगों को ऐसा प्रतीत होता है कि वे हिन्दू-धर्म का प्रचार करने के लिए ही विदेश गये थे. ये सब केवल मनगढ़ंत (cock and bull जैसी ) भ्रान्त धारणायें हैं. 
वास्तविकता यह है कि स्वामी विवेकानन्द के सन्देशों में हमलोगों के लिए स्वयं को उद्घाटित (Discover) करने का सूत्र (Be and Make) दिया गया है। हमलोग स्वामी विवेकानन्द के सन्देशों का अध्यन करके  अपने आत्मविश्वास को जाग्रत करने की पद्धति सीख सकते हैं, उन अभ्यासों को अपनाने से यथार्थ मनुष्य बन सकते हैं, तथा जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। स्वामी विवेकानन्द के सन्देशों में हमलोग अपने जीवन की अव्यक्त संभावनाओं (Latent potential) को प्रस्फुटित करने की विधि तथा आत्मश्रद्धा, इच्छाशक्ति में वृद्धि आदि शक्तिदायी विचारों को प्राप्त कर सकते हैं. 
किन्तु विवेकानन्दजी के सन्देशों को पढ़ने के लिए, कोई छात्र या युवा यदि प्रारम्भ में ही "विवेकानन्द साहित्य" या ' श्रीरामकृष्ण वचनामृत ' को प्रारंभ में ही नवागंतुक युवा भाइयों के बीच पाठचक्र में पढ़ना आरम्भ करेंगे तो, उन्हें समझने में थोड़ी कठिनाई हो सकती है. इसी बात को ध्यान में रख कर महामण्डल के हिन्दी मुखपत्र ' विवेक-अंजन ' तथा " VIVEK-ANJAN " में कुछ चुनिन्दा पुस्तकों की सूचि दी जाती है. स्वामीजी के सन्देशों को संकलित कर जो छोटी छोटी पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, पाठचक्र में उन्ही पुस्तकों को पढ़ना प्रारम्भ किया जाय तभी स्वामी विवेकानन्द के विचारों में जो कई विशेष पहलु हैं, उसके मर्म (drift) के साथ हमलोग धीरे धीरे परिचित हो सकते हैं.
इन सब पुस्तकों को पढ़ लेने के बाद यदि बड़े ग्रन्थों को पढ़ेंगे, तब हमलोग उसके मर्म को समझने में सक्षम हो जायेंगे, तथा स्वयं यह जान जायेंगे की समग्र ' विवेकानन्द -साहित्य ', उसके दसो खंड कितने व्यवहारिक एवं उपयोगी हैं ! स्वामीजी ने ऐसे एक भी तत्व की बात नहीं कही है, जो हमारे जीवन को सुंदर ढंग से गठित करने में सहायक न हो. स्वामीजी के समस्त संदेश मनुष्यों के लिए अत्यन्त उपयोगी, जो मनुष्य को उन्नति करने में सहायता करते हैं. यदि कोई अध्यात्मिक तात्विक-ज्ञान मनुष्य के विकास में सहायक नहीं हो, मनुष्य के दुखों को दूर करने में सहायता नहीं कर सकता हो- तो वैसे तत्व का कोई मूल्य नहीं है.  (विवेकानन्द साहित्य के १० खण्ड इंटरनेट पर अंग्रेजी-भाषा में उपलब्ध है, किन्तु अभी तक हिन्दी में क्यों नहीं है ? 
 किसी भी युवा प्रशिक्षण शिविर के उद्घाटन सत्र में (इनॉगरल सेसन) महामण्डल के आदर्श उद्देश्य, उसके अविर्भूत होने की अनिवार्यता, धर्म और मजहब के अंतर समझने के युवाओं की बुद्धि को अनुप्रेरित करना चाहिये। और अन्तः प्रकृति को वशीभूत करने की पद्धति  'मनःसंयोयग का प्रशिक्षण' देने सर्वोत्तम उपाय है -गुरुगृह वास करते हुए प्रातः काल में लड़कों और लड़कियों के लिये अलग अलग 'युवा प्रशिक्षण शिविर' को आयोजित करना। और मनःसंयम की प्रथम कक्षा अगले दिन प्रातः ६ बजे से शंतिमंत्र के साथ शुरुआत करते हुए दी जानी चाहिये।  प्रशिक्षणार्थीयोंको (दो दिवसीय-लोकल लेवल शाम ४ बजे से अगले दिन शाम ४ बजे तक एकाग्रता पर (४९+१)= ५० मिनट का एक क्लास): त्रिदिवसीय- स्टेट लेवल एकाग्रता↬ का दो क्लास, चारदिवसीय- इंटरस्टेट लेवल एकाग्रता पर तीन क्लास, छःदिवसीय - ऑल इंडिया लेवल एकाग्रता पर ५ क्लास) युवा प्रशिक्षण शिविर (स्ट्रिक्टली फॉर मेन ओनली) में प्रशिक्षण देना। प्रशिक्षणार्थियों न्यूनतम आयु १८ वर्ष या शैक्षणिक योग्यता  मिनिमम क्वालिफिकेशन होगा हाइ स्कूल।सेमिनार या वन डे/हाफ़ डे डिस्कशन विचारगोष्ठी-जहाँ कार्य-कर्ताओं का अभाव है, वहाँ एक दिवसीय ( प्रातः ९ बजे से शाम ४ बजे तक)/ अर्ध दिवसीय  (१० से २ बजे तक) स्पीच डे, व्याख्यान दिवस या  सेमिनार  आयोजित हो सकते हैं। उसमें सेमिनार के वक्ता मनःसंयोग के साथ ऑटोसजेशन पर विशेष जोर देंगे। एवं प्रश्नोत्तरी कक्षा में चर्चा के विषय,शिक्षार्थियों की न्यूनतम आयु एवं शैक्षणिक योग्यता पीएचडी, एम.ए,बी.एड, ग्रेजुएशन, हाई स्कूल,आदि 'महामण्डल के आदर्श-उद्देश्य और कार्यपद्धति के अनुरूप ही होने चाहिये,तथा उन्हें केंद्रीय कार्यालय से अनुमोदित करवा लेना उचित होगा। 
1.Tuesday, July 16, २०१३ का ब्लॉग। कैम्प नोट २००५ पूज्य नवनीदा द्वारा सरीसा आश्रम में  धर्म क्या है?  एक लाख लोगों में से कोई एक व्यक्ति भी समझ ले तो बहुत है ! पर दिया गया व्याख्यान पूज्य दादा ने कहा है कि २००५ का ऐन्युअल कैम्प का मनःसंयोग क्लास सबसे अच्छा हुआ था। उस कैम्प में आठ राज्यों से १०६६ कैम्पर्स आये थे। 
 2.स्वामी विवेकानन्द जयन्ती के अवसर पर १९ जनवरी २०१४ को आज़ाद हिन्द पार्क में आयोजित महामण्डल के एक युवा रैली में अद्वैत आश्रम, कोलकाता के कार्यकारी अध्यक्ष स्वामी आत्मलोकानन्द का भाषण। ]