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मंगलवार, 17 जुलाई 2018

6. महामण्डल आन्दोलन से 'अद्वैत आश्रम', मायावती, हिमालय, का सम्बन्ध क्या है ?क्या श्री रामकृष्णदेव को अवतार वरिष्ठ कहना उचित है?

क्या श्री रामकृष्णदेव को अवतार वरिष्ठ कहना उचित है?
विवेकानन्दजी के संग में:  स्थान  -  श्रीयुत् नवगोपाल घोष का भवन, रामकृष्णपुर, हावड़ा; वर्ष  -  1897 ईसवी  ( जनवरी,  फरवरी।    श्रीरामकृष्ण के प्रेमी भक्त श्रीयुत् नवगोपाल घोष ने भागीरथी के पश्चिम तट पर हावड़े के अन्तर्गत रामकृष्णपुर में एक नयी हवेली बनवाई है ।  इसके लिए जमीन मोल लेते समय इस स्थान का नाम रामकृष्णपुर सुनकर वे विषेश आनन्दित हुए थे, क्योंकि इस गाँव के नाम की उनके इष्टदेव के नाम के साथ एकता थी ।  मकान बनाने के थोड़े ही दिन पश्चात् स्वामीजी प्रथम बार विलायत से कलकत्ते को लौटकर आये थे ।  घोषजी और उनकी स्त्री की बड़ी इच्छा थी कि अपने मकान में स्वामीजी से श्रीरामकृष्णमूर्ति की स्थापना कराएँ । 
 कुछ दिन पहले, घोषजी ने मठ में जाकर स्वामीजी से अपनी इच्छा प्रकट की थी और स्वामीजी ने स्वीकार भी कर लिया था ।  इसी कारण आज नवगोपाल बाबू के गृह में उत्सव है ।  मठ के संन्यासी और श्रीरामकृष्ण के गृहस्थ भक्त सब आज सादर निमंत्रित हुए हैं ।  मकान भी आज ध्वजा और पताकाओं से सुशोभित है ।  सामने में फाटक पर पूर्ण घट रखा गया है, कदली स्तम्भ रोपे गये हैं, देवदार के पत्तों के तोरण बनाये गये हैं और आम के पत्ते और पुष्पमाला की बन्दनवार बाँधी गयी है ।  
रामकृष्णपुर आज   'जय रामकृष्ण'  की ध्वनि से गूँज रहा है ।   मठ के संन्यासी और बालब्रह्मचारीगण स्वामीजी को साथ लेकर तीन नावों को किराये पर लेकर रामकृष्णपुर के घाट पर उपस्थित हुए ।  स्वामीजी के शरीर पर एक गेरूआ वस्त्र था, सिर पर पगड़ी थी और पाँव नंगे थे ।  रामकृष्णपुर घाट से जिस मार्ग से होकर स्वामीजी नवगोपाल बाबू के घर जाने वाले थे, उसके दोनों ओर हजारों लोग उनके दर्शन के निमित्त खड़े हो गये ।  नाव से घाट पर उतरते ही स्वामीजी एक भजन गाने लगे जिसका आशय यह था  -  "वह कौन है जो दरिद्री ब्राह्मणी की गोद में चारों ओर उजाला करके सो रहा है ?  वह दिगम्बर कौन है, जिसने झोपड़ी में जन्म लिया है "  इत्यादि ।  इस प्रकार गान करते और स्वयं मृदंग बजाते हुए वे आगे बढ़ने लगे ।  इसी अवसर पर दो तीन मृदंग और बजने लगे ।  साथ-साथ सब भक्तजन एक ही स्वर से भजन गाते हुए उनके पीछे पीछे चलने लगे ।  उनके उद्याम नृत्य और मृदंग की ध्वनि से पथ और घाट सब गूँज उठे ।  जाते समय यह मण्डली कुछ देर डाक्टर रामलाल बाबू के मकान के सामने  खड़ी हुई ।  डाक्टर महाशय भी जल्दी से बाहर निकल आये और मण्डली के साथ चलने लगे । 
 सब लोगों का यह विचार था कि स्वामीजी बड़ी सजधज और आडम्बर से आयेंगे  -  परन्तु मठ के अन्यान्य साधुओं के समान वस्त्र धारण किये हुए और नंगे पैर मृदंग बजाते हुए उनको जाते देखकर बहुत से लोग उनको पहचान ही न सके।  जब औरों से पूछकर स्वामीजी का परिचय पाया तब वे कहने लगे,   "क्या, यही विश्वविजयी स्वामी विवेकानन्दजी हैं ?"  स्वामीजी की इस नम्रता को देखकर सब एक स्वर से प्रशंसा करने और   'जय रामकृष्ण'  की ध्वनि से मार्ग को गुँजाने लगे ।
 आदर्श गृहस्थ नवगोपाल बाबू का मन आनन्द से परिपूर्ण है और वे श्रीरामकृष्ण की सांगोपांग सेवा के लिए बड़ी सामग्री इकट्ठा कर चारों ओर दौड़धूप कर रहे हैं ।  कभी-कभी प्रेमानन्द में मग्न होकर   'जयराम  जयराम'  शब्द का उच्चारण कर रहे हैं ।  मण्डली के उनके द्वार पर पहुँचते ही भीतर से शंखध्वनि होने लगी तथा घड़ियाल बजने लगे ।  स्वामीजी ने मृदंग को उतारकर बैठक में थोड़ा विश्राम किया ।  तत्पश्चात ठाकुरघर देखने के लिए ऊपर दुमंजिले पर गये  ।  
यह ठाकुरघर श्वेतसंगमर्मर का था ।  बीच में सिंहासन के ऊपर श्रीरामकृष्ण की पोरसिलेन  ( चिनी )  की बनी हुई मूर्ति विराजमान थी । हिन्दुओं में देव-देवी के पूजन के लिए जिन सामग्रियों की आवश्यकता होती है, उनके उपार्जन करने में कोई त्रुटि नहीं थी ।  स्वामीजी यह सब देखकर बड़े प्रसन्न हुए। नवगोपाल बाबू की स्त्री ने अन्य स्त्रियों के साथ स्वामीजी को साष्टांग प्रणाम किया और पंखा झलने लगीं ।  स्वामीजी 
से सब सामग्री की प्रशंसा सुनकर गृहस्वामिनी उनसे बोलीं,  "हमारी क्या शक्ति है कि गुरूदेव की सेवा का अधिकार हमको प्राप्त हो ?  गृह छोटा और धन सामान्य है ।  आप कृपा करके आज श्रीगुरूदेव की प्रतिष्ठा कर हमको कृतार्थ किजिये ।"
 स्वामीजी ने इसके उत्तर में हास्यभाव से कहा,  "तुम्हारे गुरूदेव तो किसी काल में भी ऐसे श्वेत-पत्थर के मन्दिर में चौदह पीढ़ी से नहीं बसे !  उन्होंने तो गाँव के फूस की झोपड़ी में जन्म लिया था और येनकेन-प्रकारेण अपने दिन व्यतीत किये ।  ऐसे उत्तम सेवा पर प्रसन्न होकर यदि यहाँ न बसेंगे तो फिर कहाँ ?"  स्वामीजी की बात पर सब हँसने लगे ।  अब विभूति-भूषित स्वामीजी साक्षात् महादेवजी के समान पूजक के आसन पर बैठकर, श्रीरामकृष्ण का आह्वान करने लगे । स्वामी प्रकाशानन्दजी स्वामीजी के निकट बैठकर मन्त्रादि उच्चारण करने लगे ।  क्रमशः पूजा सर्वांग सम्पूर्ण हुई और आरती का शंख, घण्टा बजा ।  स्वामी प्रकाशानन्दजी ने ही इसका सम्पादन किया। नवगोपाल घोष के नवनिर्मित भवन में श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव की (अमेरिका से लाये गये) छवि को आसान पर बैठा कर पूजा करते समय,आरती होने पर स्वामीजी ने उस पूजा-स्थान में बैठकर ही श्रीरामकृष्णदेव के लिए एक ' स्वतःस्फूर्त प्रणाम-मन्त्र ' की मौखिक रचना रचना करते हुए कहते हैं : 
ॐ स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्मस्वरूपिणे। 
अवतारवरिष्ठाय   रामकृष्णाय ते  नमः।।   
अर्थ : सर्व-धर्मों के मुर्तस्वरुप, लोक जीवन मे धर्म की पुन: स्थापना करनेवाले अवतारों में वरिष्ठ श्रीरामकृष्ण परमहंस को नमन है ।
श्री रामकृष्ण परमहंस देव के लिये स्वामीजी के द्वारा दिये गये इस विशेषण (Adjective) 'अवतारवरिष्ठ' को सुनने से मन में कुछ प्रश्न उठने शुरू हो जाते हैं, जो बिल्कुल स्वाभाविक हैं। क्योंकि हमने तो पहले स्वयं ठाकुर (परमहंसदेव जी) के मुख से (वचनामृत में) सुना है कि सारे धर्म समान हैं,जितने मत हैं, उतने पथ हैं- आदि आदि !  सभी धर्मों के अनुयायी, अपने धर्मसंस्थापक या अपने इष्टदेव के रूप में ईश्वर के किसी विशेष दूत या ' अवतार ' के रूप में किसी न किसी विशेष व्यक्ति के आविर्भूत होने का दावा करते हैं। अब यदि उन सबों के बीच केवल श्रीरामकृष्ण परमहंस देव को ही 'अवतारवरिष्ठ '- कहा जाय, तो यह स्वाभाविक है कि हिन्दू-मुस्लिम-सिख -इसाई सभी धर्म के अनुयायियों के मन कई प्रकार के प्रश्न,सन्देह, तर्क आदि अवश्य उठ खड़े होंगे। यह बिल्कुल स्वाभाविक है। किन्तु इस प्रश्न का समाधान देते हुए  गीता ४/७ में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं -यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम।।--हे भारत (अर्जुन), जब जब धर्म की कमी और अधर्म की वृद्धि होती है तब तब मैं शरीर धारण कर अवतीर्ण होता हूँ. (अन्य सभी लोग भले-बुरे कर्म के अनुसार जन्म ग्रहण करते हैं, किन्तु मैं कर्म के वश में नहीं हूँ. केवल संसार के कल्याण का संकल्प लेकर अपनी त्रिगुणात्मिका माया की सहायता से 'तदा आत्मानं सृजामि अहं ' मैं अपने को सृष्टि करता हूँ ' अर्थात मनुष्य-देह धारण कर संसार में आविर्भूत होता हूँ !) 
सर्वशक्तिमान भगवान का जीव-जगत के कल्याण के लिये मनुष्यदेह धारण कर आविर्भूत होना संसार के आध्यात्मिक इतिहास में एक बहुत बड़ी घटना है। काल के प्रभाव से जब संसार पाप के भार से आक्रान्त होता है, तब वे मानो अपने कर्तव्य पालन के उद्देश्य से धर्म की ग्लानि दूर करने संसार में अवतीर्ण होते हैं।
 धर्म के प्रसार में जो विघ्न सामने आते हैं वे उन्हें विभिन्न प्रकार से दूर करके धर्म के प्रवाह को बाधा-रहित कर देते हैं। और प्रत्येक युग में ऐसा ही होता आया है ! किन्तु, हमे ऐसा नहीं मान लेना चाहिये कि प्रत्येक युग में धर्म-संस्थापन का कार्य केवल (रावण या कंस जैसे राक्षसों) पापियों का वध कर के ही करना पड़ता है। धर्म को संस्थापित करने का कार्य किस  युग में किस उपाय से करना होगा, इस बात श्रीभगवान या अवतार (मत्स्यावतार से लेकर नरसिंह अवतार तक) ...अच्छी तरह जानते हैं। प्रत्येक अवतार के धर्म-संस्थापन की पद्धति या सत्ययुग को पुनर्स्थापित करने की कार्य-प्रणाली देश,काल और प्रयोजन के अनुसार, भिन्न-भिन्न विभिन्न प्रकार की होती है,और प्रत्येक अवतार के साथ परिवर्तित होती रहती है। 
वर्तमान युग में भगवान श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव ने अपनी साधना और आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा सम्पूर्ण विश्व में विद्यमान सभी धर्मों की ग्लानि को दूर कर दिया है ! अर्थात मनुष्य बनने और बनाने की प्रशिक्षण-पद्धति या प्रणाली को 'रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त शिक्षक-प्रशिक्षण मॉडल' के रूप में विश्व के सम्मुख रख दिया है। साथ ही साथ अत्यन्त करुणा करके इस बार उन्होंने अनेक पापियों का पाप-भार अपने ऊपर ले कर उनको भी धर्मात्मा बनने का मौका दिया है। और धर्म के संस्थापन के लिये अपनी भूल को सुधार कर (प्रवृत्ति से निवृत्ति में आकर) चरित्रवान मनुष्य या यथार्थ मनुष्य बनने की शिक्षा दी है। उसी प्रकार अनेकों साधु पुरुषों के साधन-मार्ग के विघ्न को दूर कर उन्हें (निवृत्तिमार्गी) साधु बनाया है। गीता ३/२१ में श्री भगवान कहते हैं - 
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।3.21।।
 श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है अन्य लोग भी वैसा ही अनुकरण करते हैं वह पुरुष जो कुछ प्रमाण कर देता है लोग भी उसका अनुसरण करते हैं। श्री भगवान यहाँ 'चाइल्ड-साइकोलॉजी' या बाल मनोविज्ञान 
(चाइल्ड साइकोलॉजी के अनुसार बच्चे अथवा  मुस्टैच बेबी भी बड़ों की बात नहीं सुनते, वे उनका अनुकरण करते हैं। child psychology - children don't listen they imitate !) को स्पष्ट रूप से समझाते हुए कहते हैं, कि वुड बी लीडर्स या भावी लोक-शिक्षकों को लोक-संग्रह का कार्य क्यों और किस प्रकार 
करना चाहिये। केवल धर्मग्रन्थ से काम नहीं चलता; आदर्श जीवन कैसा होता है- उसे जी कर भी दिखाना होता है।  उनके जीवनादर्श से शिक्षा पाकर लोग धर्ममार्ग का अनुसरण करते हैं.(टीका- स्वामी अपूर्वानन्द)} क्योंकि श्रेष्ठ पुरुष जो जो कर्म करता है अर्थात् प्रधान मनुष्य जिस जिस कर्म में बर्तता है, दूसरे लोग उसके अनुयायी होकर उस उस कर्म का ही आचरण किया करते हैं। तथा वह श्रेष्ठ पुरुष जिस जिस लौकिक या वैदिक सिद्धांत को प्रामाणिक मानता है लोग उसीके अनुसार चलते हैं अर्थात् उसी को प्रमाण मानते हैं।अर्थात वे (मानवजाति के मार्गदर्शक नेता या आध्यात्मिक शिक्षक) अपने जीवन के द्वारा जिसे प्रमाणित करते हैं लोग उसी का अनुसरण करते हैं। 
 (गीता ४: ७ के) उपरोक्त श्लोक का उच्चारण यदि हमलोग इस प्रकार करें --
यदा ही सर्वधर्मानाम ग्लानिर्वभूव भारत। 
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं ससर्ज सः।-- 
हे भारतवासी, जब पृथ्वी के समस्त धर्म (प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों धर्म ) अधोपतित हो गये थे एवं उसके साथ जब 'अभ्युत्थानमधर्मस्य '  अधर्म का भी अभ्युत्थान हो गया था; तब उस विकट परिस्थिति में ' उन्होंने '(अद्वैत ब्रह्म परमहंसदेव ने) स्वयं को सृष्ट किया था ! जब एक एक (अलग अलग)  देश का धर्म पतित हुआ था, तब उसको उठाने के लिये एक एक अवतार आये थे। किन्तु जब सम्पूर्ण पृथ्वी के धर्म अधोपतित हो गये एवं समग्र पृथ्वी में- ' अधर्म का अभ्युत्थान ' हो गया तब ' धर्म-वस्तु ' का ही नवोत्थान करने के लिये उन्होंने (परमहंसदेवजी) स्वयं की सृष्टि की थी। इसीलिये श्रीरामकृष्ण अवतार वरिष्ठ हैं ! 
" अवतारवरिष्ठस्तत रामकृष्णो हि केवलः। 
इतिहासपुराणेषू समः कोअपि न विद्यते।।" 
जब से सृष्टि बनी है, तब से लेकर आज तक मानव इतिहास में "परमहंसदेव" (ठाकुर) के जैसा (त्यागी) दूसरा कोई नहीं हुआ है।  किसी भी देश य़ा किसी भी धर्म का पुराण क्यों न हो - किसी भी पुराण में, " श्रीरामोकृष्णो " के जैसा और कोई नहीं हुआ। 
अतः स्वामी जी के द्वारा अपने गुरुदेव श्रीरामकृष्ण को 'अवतार -वरिष्ठ ' कहकर सम्बोधित करना - किसी अन्य अवतार को छोटा करना य़ा बड़ा करना नहीं है; और इसके लिए किसी के साथ तर्क-कुतर्क य़ा झगड़े में पड़ने की कोई जरुरत नहीं है।  स्वामीजी ने उस दिन क्या सोंच कर श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव को'अवतारवरिष्ठ' कहा होगा- यह तो केवल स्वामीजी जानते होंगे। किन्तु ठंढे दिमाग से (पूर्वाग्रह से रहित होकर) यदि हम चिन्तन-मनन करें तो हमलोग इस विशेषण " अवतारवरिष्ठ " को - अत्यन्त आनन्द के साथ ग्रहन कर सकते हैं। एवं यह घोषणा भी कर सकते हैं कि, सम्पूर्ण जगत के मानव-समाज के परित्राण के लिये वर्तमान युग में उपाय - एकमात्र श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव से ही प्राप्त किया जा सकता है।  एवं उनके उपदेश- स्वामी विवेकानन्द के जीवन में जिस प्रकार उक्त, व्यक्त,  और प्रचारित तथा आचरित हुए हैं, उनका थोड़ा भी अनुसरण करने से अपने जीवन में भी उतारा जा सकता है।    
जिस तरह से किसी खिले हुए फूल के चारो तरफ़ मधुमक्खियाँ आकर्षित होकर चली आतीं हैं ठीक उसी तरह श्री रामकृष्ण को मिलने के लिए उनके भक्त आते रहते थे। उन्होंने अपने भक्तों को दो श्रेणियों में विभाजित किया था। उनके कुछ भक्त प्रवृत्ति मार्गी थे अर्थात घर-गृहस्ती सँभालने वाले थे। उन्हें वह सिखाते थे की परिवार की जिम्मेदारी सँभालने के साथ साथ, किस तरह से (अंत में प्रवृत्ति से निवृत्ति में आकर) भगवान की अनुभूति की जा सकती है। उनके भक्तों का जो दूसरा सबसे अहम वर्ग था वह मध्यम वर्ग से आये कुछ चुने हुए अंग्रेजी शिक्षा में पले -बढ़े युवा का था। उन्हें वे निवृत्ति मार्गी संन्यासी बनाने की पूरी शिक्षा देते थे, और उनके माध्यम से अपना सन्देश समाज और विश्व के हर कोने में पहुचाना चाहते थे। उन संन्यासी शिष्यों में सबसे प्रमुख शिष्य थे नरेन्द्रनाथ दत्त ! जिन्हें आज सभी स्वामी विवेकानन्द नाम से जानते है।स्वामी विवेकानंद ने ही वेदांत का सन्देश पूरी दुनिया में पहुचाया, उन्होंने ही एक बार फिर से हिन्दू धर्म की जाग्रति की, भारत के सभी लोगो को फिर से नींद से जगाने का काम किया। उन्होंने ही रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी और अपने गुरु का कार्य जारी रखने का कार्य किया था।
54. प्रश्न : स्वामीजी की जीवनी में पढ़ा हूँ, ठाकुर कह रहे हैं-" अभी तक तुम्हें संदेह है ? जो राम, जो कृष्ण वही वर्तमान समय में रामकृष्ण हैं,  किन्तु तुम्हारे वेदांत की दृष्टि से नहीं। " - इस कथन का मर्म क्या है?उत्तर : संक्षेप में कहने से हमलोग राम, कृष्ण आदि को भगवान का अवतार मानते हैं। ' तुम्हे अभी तक संदेह है ? ' का अर्थ है - उनके गुरु ' ठाकुर ' भी अवतार हैं, इस विषय में स्वामीजी के मन में अंतिम समय तक, संदेह रह गया है, उसे स्वामीजी अपने मुख से बोल नहीं रहे हैं,  किन्तु ठाकुर अपनी बोध-शक्ति से अनुभव कर लिए हैं। उनकी उसी शंका के विषय में अपनी बोध-शक्ति के द्वारा जानकर पूछते हैं-  'तुम्हें अभी तक संदेह है ? 'जो राम हुए थे, जो कृष्ण हुए थे, वे ही अभी एक आधार में रामकृष्ण हुए हैं। वे अभी इस शरीर में हैं-अर्थात  वे लोग जिस प्रकार अवतार थे, वे भी उसी प्रकार अवतार हैं, ठाकुर अपने ही बारे में बता रहे हैं।किन्तु इसके साथ थोडा जोड़ दे रहे हैं- ' किन्तु तेरे वेदांत की दृष्टि से नहीं।' क्योंकि वेदांत के मतानुसार प्रत्येक  मनुष्य ही ब्रह्म है।  शंकराचार्य के अनुसार वेदांत का संदेश, एक ही श्लोक में सिमटा हुआ है।" ब्रह्म सत्यम जगन मिथ्या,जिवो ब्रम्हैव ना परः "  उसके आधार पर तुम्हारे राम जो हैं, कृष्ण भी वे ही हैं, इतना ही क्यों समस्त अवतार भी वे ही हैं। समस्त मनुष्य भी वे ही हैं। अवतार का अर्थ है- भगवान मनुष्य का रूप धारण कर स्वयं अवतार लिए हैं। नर रूप  धारण करके अवतरित हुए हैं। प्रत्येक मनुष्य भगवान का ही रूप है इसमें कोई संदेह नहीं है। किन्तु मनुष्य में वे भगवान या ब्रह्म परिपूर्ण रूप से प्रकशित नहीं हैं।  ठाकुर के कथन ' वेदांत की दृष्टि से नहीं .' का अर्थ है- जिस अर्थ में राम को अवतार कहा जाता है, कृष्ण को  अवतार कहा जाता है, जिस अर्थ में अवतार को अवतार कहकर स्वीकृत किया जाता है, उसी अर्थ में किसी मंगरा-बुधना-शुक्रा को भी अवतार नहीं कहा जाता,- वे उसी अर्थ में अवतार हैं ! वेदांत के मतानुसार जो कहा गया कि सबों के भीतर ब्रह्म हैं- उस अर्थ में नहीं।जिस अर्थ में श्रीराम और श्रीकृष्ण को अवतार कहा जाता है, श्रीरामकृष्ण भी उसी अर्थ में अवतार है। 
अवतार/नेता सबको  आश्रय देते  हैं:  
मणि शान्त होकर विचार कर रहे है, - श्रीरामकृष्ण ने जो 'उदय के समय का सूर्य, 'अनचीन्हापेड़' आदि बातें कहीं, क्या यही अवतार के लक्षण है? क्या इसी का नाम नरलीला है? क्या श्रीरामकृष्ण अवतार है? क्या इसीलिए वे पार्षदों को देखने के लिए व्याकुल ...
* जब लकड़ी का बड़ा भारी कुन्दा पानी पर बहता है तब उसपर चढ़कर कितने ही लोग आगे निकल जाते हैं, उनके वज़न से वह डूबता नहीं ।  किन्तु सड़ियल लकड़ी पर एक कौआ भी भी बैठे तो वह डूब जाती है ।  इसी प्रकार जिस समय अवतार - महापुरुष आते हैं उस समय उनका आश्रय ग्रहण कर कितने लोग तर जाते हैं, किन्तु सिद्ध पुरुष काफी श्रम करके किसी तरह स्वयं तरता है । सच्चिदानन्द का घनीभूत समुद्र क्या धरती पर अवतरित हो सकता है? इसीलिये स्वामी विवेकानन्द ने श्रीरामकृष्ण को अवतार-वरिष्ठ कहा है। 
*      रेल का इन्जन स्वयं आगे बढ़ते हुए अपने साथ आसानी से कितने ही माल से भरे डब्बों को खींच ले जाता है ।  इसी तरह, ईश्वर के विश्वासी भक्त, सिर पर संसार के दुःख-कष्टों का बोझ होते हुए भी ईश्वर पर दृढ़ विश्वास और भक्ति रखकर भवसागर से आसानी से पार हो जाते हैं ।  इतना ही नहीं, वे अपने साथ और भी अनेकों को ईश्वर की ओर ले जाते हैं ।
महर्षि अरविन्द लिखते हैं-" जब नास्तिकता  (atheism, godlessness,disbelief-a lack of belief in the existence of God or gods, अर्थात अनीश्वरवाद) अपने चरम पर पहुँची, तब समय आ गया था, कि [भारत के जुड़वाँ राष्ट्रीय आदर्श] आध्यात्मिकता (और सेवा) आग्रहपूर्वक स्वयं को स्थापित करे। और यह सिद्ध करे कि जगत् का यथार्थ - और कुछ नहीं, आत्मा की ही अभिव्यक्ति है।"  
जब पाश्चात्य शिक्षा के दुष्प्रभाव से 'विवेकज -ज्ञान' जन्य भारत के जुड़वाँ राष्ट्रीय आदर्श 'त्याग और सेवा', के द्वारा 'यूनिवर्सल ह्यूमनिज्म' की भावना अर्थात 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना को समाज में स्थापित करने वाली भारत की प्राचीन 'गुरु-शिष्य वेदान्त शिक्षक-प्रशिक्षण परम्परा' में आधारित 'मनुष्य-निर्माण' (ब्रह्मवेत्ता मनुष्यों का निर्माण) तथा चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा प्रणाली (Man Making and Character building Education Methods) बिल्कुल समाप्त होने के कागार पर आ पहुँची;  और उसके स्थान पर सर्वत्र 
" Money Making and Career building Education Methods" अर्थात " पैसे बनाने वाले यंत्र-मानवों का निर्माण (professional robot निर्माण) और 'आजीविका कौशल 'professional skill' पर बल देने वाली शिक्षापद्धति का बोलबाला (वर्चस्व domination) हो गया था , तब  भगवान श्री रामकृष्ण देव एवं श्री श्री माँ सारदा देवी के आशीर्वाद तथा स्वामी विवेकानन्द की प्रेरणा से- 'Be and Make'-वेदान्त शिक्षक प्रशिक्षण परम्परा' में मनःसंयोग (क़्वांटम एकाग्रता प्रशिक्षण प्रणाली) और जगत कल्याण" के जुड़वाँ आदर्श के प्रशिक्षण पद्धति में आधारित संगठन, अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल को 1967 ई ० पश्चिम बंगाल में आविर्भूत होना पड़ा। महामण्डल के चरित्र-निर्माण आंदोलन को कार्य रूप देने के लिए विगत 51 वर्षों से भारत के 12 राज्यों में कई समाज-सेवी संगठन (लगभग 315 केंद्र) कार्य कर रहे हैं। इसके साथ ही साथ महामण्डल द्वारा निर्देशित " 3H विकास के लिये 5 अभ्यास में आधारित क्वांटम-शिक्षापद्धति" [ अर्थात मनःसंयोग (क़्वांटम ध्यान प्रणाली) और जगत कल्याण" ने अपने प्रशिक्षण शिविर में विभिन्न धर्मों के सन्देशों को सम्मिलित करके उनके सार- मर्म को अभिव्यक्त करने की जो पहलकदमी  की है, वह 'अन्तर्धार्मिक सद्भाव' (Interfaith harmony) को स्थापित करने की दिशा में एक अति उत्कृष्ट कदम हैं।इसके माध्यम से हमलोग यह समझ सकते हैं कि विविध धार्मिक सन्देशों में भाषागत अंतर रहने से भी, भावगत मतभेद  बिल्कुल नहीं है। हम सभी लोगों का एक ही लक्ष्य है, और वह है - 'सर्व दुखों से छुटकारा प्राप्त करते हुए परमानन्द की प्राप्ति!' इसके फलस्वरूप हमलोगों के बीच पारस्परिक सम्मान (Mutual Respect) एवं अपने आप में विश्वास और अधिक दृढ़ हो जाता है। बंगलादेश में  'क़्वांटम ध्यान और दूसरों के कल्याण' के उद्देश्य से जो संगठन स्थापित हुआ है, उसका नाम और पता है -Quantum Method : Science of Living for the Modern  People.क्वांटम मेथड : 'आधुनिक मनुष्यों के लिये जीवन जीने का विज्ञान' 31 / वी, शिल्पाचार्य जैनुल अब्दीन सड़क, शांतिनगर (1 ली मंजिल), ढाका -1217 (पूर्वी प्लस मार्केट के निकट) ]
{श्री रामकृष्ण परमहंस, बचपन में गदाधर चट्टोपाध्याय नाम से जाने जाते थे।पिता : खुदीराम चट्टोपाध्याय।माता : चंद्रमणि देवी।गुरु : भैरवी ब्राह्मणी और तोता पूरी।जन्म : १८, फरवरी १८३६, कामारपुकुर नमक गाँव, हुगली जिला, पश्चिम बंगाल, भारत, के एक गरीब वैष्णव ब्राह्मण परिवार में। विवाह : सरदामणि मुखोपाध्याय, २३ साल की आयु में विवाह।मृत्यु या महा समाधि : १६, अगस्त १८८६, कोलकाता शहर, गले में कैंसर के कारण। इन्होंने अपना पूरा जीवन माँ काली, जिन्हें वे भव तारिणी (भव सागर से तारने वाली) कहते थे, की सेव-साधना में व्यतीत किया। शक्ति संप्रदाय में तांत्रिक पद्धति के विपरीत, भक्ति भाव को अधिक श्रेष्ठ माना तथा यह सिद्ध भी किया। कोलकाता की महारानी रासमणि का मंदिर जो आज दक्षिणेश्वर नाम से प्रसिद्ध हैं, गादाइ या गदाधर वहाँ के पुजारी हुए।शिष्य ( गृहस्थ वर्ग से ) : गिरीश चन्द्र घोष (नाटक या थिएटर के निर्देशक), महेन्द्रनाथ गुप्ता (शिक्षक तथा प्रधानाचार्य), महेंद्र नाथ सरकार (एलोपैथी से होमियोपैथी में परिवर्तित चिकित्सक, समाज सेवक), अक्षय कुमार सेन (लेखक) इत्यादि।संन्यासी शिष्य : स्वामी विवेकानंद या नरेंद्र नाथ दत्त (आध्यात्मिक गुरु, समाज सेवी), रामकृष्ण मिशन के संस्थापक; राखल चन्द्र घोष (स्वामी ब्रह्मानंद), कालीप्रसाद चन्द्र (स्वामी अभेदानन्द), तारकनाथ घोषाल (स्वामी शिवानंद), सशिभूषण चक्रवर्ती (स्वामी रामकृष्णानन्द), सरतचन्द्र चक्रवर्ती (स्वामी सरदानन्द), तुलसी चरण दत्त (स्वामी निर्मलानंदा), गंगाधर घटक (स्वामी अखंडानंद), हरी प्रसन्न (स्वामी विज्ञानानंद) इत्यादि।
बचपन से ही गदाधर ईश्वर पर अडिग आस्था रखते थे, ईश्वर के अस्तित्व को समस्त तत्वों में मानते थे तथा ईश्वर के प्राप्ति हेतु इन्होंने कठोर साधना भी की, ईश्वर प्राप्ति को ही सबसे बड़ा धन मानते थे। अंततः इन्होंने सभी धर्मों को एक माना तथा ईश्वर प्राप्ति हेतु केवल अलग-अलग मार्ग सिद्ध किया। अपने विचारों से सर्वदा, सभी धर्मों के मेल या भिन्न-भिन्न धर्मों को मानने वालों की एकता में इन्होंने अपना अहम योगदान दिया। गदाधर, माँ काली के परम भक्त थे, अपने दो गुरुओं! १. योगेश्वरी भैरवी ब्राह्मणी तथा २. तोता पूरी के सान्निध्य में इन्होंने सिद्धि प्राप्त की या ईश्वर के साक्षात् दर्शन हेतु कठिन तप किया एवं सफल हुए। इन्होंने मुस्लिम तथा ईसाई धर्म की भी साधनाएँ की और सभी में एक ही ईश्वर को देखा।
पारिवारिक परिचय तथा कोलकाता, दक्षिणेश्वर में आगमन: 
इनका वास्तविक नाम गदाधर चट्टोपाध्याय था; इन्होंने सभी धर्मों और जातियों की एकता तथा समानता हेतु जीवन भर कार्य किया, परिणामस्वरूप इन्हें राम-कृष्ण नाम सर्वसाधारण लोगों द्वारा दिया गया एवं इनके उदार विचार जो सभी के प्रति सम भाव रखते थे, के कारण परमहंस की उपाधि प्राप्त हुई।इनका जन्म १८ फ़रवरी १८३६, बंगाल प्रांत, हुगली जिले के कामारपुकुर ग्राम में हुआ था। इनके पिताजी का नाम खुदीराम चट्टोपाध्याय तथा माता का नाम चंद्रमणि देवी था। गदाधर के जन्म के पहले से ही, इनके माता-पिता को कुछ ऐसी अलौकिक लक्षणों का अनुभव होने लगा था, जिसके अनुसार वे यह समझ गए थे की कुछ शुभ होने वाला हैं। इनके पिता ने सपने में भगवान विष्णु को अपने घर में जन्म लेते हुए देखा तथा माता को शिव मंदिर में ऐसा प्रतीत हुआ कि! एक तीव्र प्रकाश इन के गर्व में प्रवेश कर रहा हैं। बाल्य काल, यानी ७ वर्ष की अल्पायु में इनके पिता का देहांत हो गया तथा परिवार के सनमुख आर्थिक संकट प्रकट हुआ, परन्तु इन्होंने कभी हार नहीं मानी।
इनके बड़े भाई रामकुमार चट्टोपाध्याय, जो कोलकाता में एक पाठशाला का सञ्चालन करते थे, इन्हें अपने साथ कोलकाता लेकर आये; परन्तु बहुत प्रयासों के पश्चात भी इनका मन अध्यापन में नहीं लगा। कोलकाता की रानी रासमणि देवी ने, इनके बड़े भाई रामकुमार को अपने काली मंदिर के प्रधान पुजारी के पद पर नियुक्त किया। साथ ही गदाधर भी अपने बड़े भाई के साथ, मंदिर के कार्यों में सहायता करते थे। मंदिर में अवस्थित काली प्रतिमा को गदाधर सजाने संवारने का कार्य करते थे। १८५६ में इनके बड़े भाई रामकुमार के मृत्यु के पश्चात, गदाधर काली मंदिर के पुरोहित के पद पर नियुक्त किये गए। इस काल तक वे सर्वदा ध्यान मग्न रहते थे तथा मंदिर में उपस्थित काली की प्रतिमा को संपूर्ण ब्रह्माण्ड कि जननी या माता के रूप में देखते थे।
देवी शारदामणि से गदाधर का विवाह: मंदिर में सर्वदा ध्यान मग्न रहने के कारण, कुछ लोगों ने यह भ्रम फैला दिया कि! गदाधर पागल हो गए या उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया हैं। परिणामस्वरूप, इनकी माता तथा बड़े भाई ने इनका विवाह करने का निश्चय किया, उनकी धारणा यह थी कि विवाह पश्चात के कर्तव्य के पालन हेतु इनका मानसिक संतुलन ठीक हो जायेगा। सन १८५९, २३ वर्ष की आयु में ५ वर्ष की आयु वाली कन्या सारदामणि मुखोपाध्याय से गदाधर का विवाह सम्पन्न हुआ, जो पास ही ३ मिल दूरी पर स्थित ग्राम जयरामबाटी की थी। विवाह के पश्चात सारदामणि अपने मायके में ही रहती थी, तथा १८ वर्ष की आयु पूर्ण होने के पश्चात अपने पिता के साथ वे कोलकाता अपने पति गदाधर के पास आई तथा रहने लगी; परन्तु वे दोनों ही संन्यासी जीवन व्यतीत करते थे। मायके से कोलकाता आने के पश्चात सारदा देवी ने अपने पति गदाधर से पूछा! आप की कोई संतान नहीं होगी क्या? गदाधर ने उत्तर दिया इस संसार के सभी प्राणी तुम्हारे और मेरे संतान हैं, तुम तो अनगिनत संतानों की माता हो।
वैराग्य भाव, आध्यात्मिक साधना तथा विचार: अपने बड़े भाई की मृत्यु पश्चात गदाधर बड़े उद्विग्न रहने लगे, इस घटना से वे अत्यंत व्यथित हुए तथा उनके मन में वैराग्य का उदय हुआ एवं बढ़ता ही गया; परिणामस्वरूप वे पंचवटी के वन में सर्वदा ही ध्यान मग्न रहने लगे। सर्वदा ही वे ऐसा कार्य करते थे जिससे उन्हें देवी माँ के दर्शन प्राप्त हो सकें, काली माँ के दर्शन पाने हेतु वे लगभग पागल के समान हो गए। एक दिन योगेश्वरी भैरवी ब्राह्मणी नाम की साधिका का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ तथा उन्होंने उनसे तंत्र की दीक्षा ली, उन्हीं के सान्निध्य में वे तांत्रिक साधना करने लगे तथा ईश्वर साक्षात्कार में सफल हो सके। इसके अलावा उन्होंने तोतापूरी नाम के संन्यासी से अद्वैत वेदांत की दीक्षा भी ली तथा जीवनमुक्त अवस्था को प्राप्त किया, भेद-भाव रहित रहकर समाज के प्रत्येक वर्ग के साथ चले।
गदाधर, माँ काली के परम भक्त थे तथा दक्षिणेश्वर के मंदिर में विद्यमान काली-प्रतिमा या विग्रह में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देखते थे; वे योग तथा तंत्र पद्धति में पारंगत साधक तो थे ही, साथ ही उन्होंने श्रद्धा भाव-भक्ति युक्त साधना, भक्ति पर विशेष बल दिया तथा प्रचार भी किया। वे देवी काली को अपने हाथों से खिलाते थे, जो किसी भी प्रकार के मंत्र से उत्सर्ग नहीं होता था; केवल पवित्र मन तथा भक्ति भाव विभोर होकर वे देवी माँ को अंतर-आत्मा से पुकारते थे तथा माँ उनके समक्ष  साक्षात् प्रकट होकर उनके हाथों से भोजन ग्रहण करती थी। रामकृष्ण परमहंस ने अपना ज्यादातर जीवन एक परम भक्त की तरह बिताया। वह काली के भक्त थे। उनके लिए काली कोई देवी नहीं थीं, वह एक जीवित हकीकत थी। काली उनके सामने नाचती थीं, उनके हाथों से खाती थीं, उनके बुलाने पर आती थीं और उन्हें आनंदविभोर छोड़ जाती थीं। यह वास्तव में होता था, यह घटना वाकई होती थी। उन्हें कोई मतिभ्रम नहीं था, वह वाकई काली को खाना खिलाते थे। 
रामकृष्ण की चेतना, इच्छाशक्ति या संकल्पशक्ति इतनी प्रबल थी कि वे ईश्वर को जिस रूप में देखने की इच्छा करते थे, वह उनके लिए एक हकीकत बन जाती थी। इस स्थिति में होना किसी भी इंसान के लिए बहुत ही सुखद होता है। हालांकि रामकृष्ण का शरीर, मन और भावनाएं परमानंद से सराबोर थे, मगर उनका अस्तित्व इस परमानंद से परे जाने के लिए बेकरार था। उनके अंदर कहीं न कहीं एक जागरूकता थी कि ऐसा परमानंद भी अपने आप में एक बंधन है।
एक दिन, रामकृष्ण हुगली नदी के तट पर बैठे थे, जब एक महान और दुर्लभ योगी तोतापुरी उसी रास्ते से निकले। तोतापुरी जैसे योगी हमारे देश में बहुत कम हुए हैं। तोतापुरी ने देखा कि रामकृष्ण में इतनी तीव्रता और संभावना है कि वे 'परम ज्ञान' - अर्थात ब्रह्म के साथ अपने अद्वैत भाव की अनुभूति भी प्राप्त कर सकते हैं। मगर समस्या यह थी कि वह सिर्फ अपनी भक्ति में डूबे हुए थे।तोतापुरी रामकृष्ण के पास आए और उन्हें समझाने की कोशिश की, ‘आप क्यों सिर्फ अपनी भक्ति में ही इतने लीन हैं? आपके अंदर इतनी क्षमता है कि चरम को छू सकते हैं।’ रामकृष्ण बोले, ‘मैं सिर्फ काली को चाहता हूं, बस।’ वह एक बच्चे की तरह थे जो सिर्फ अपनी मां को चाहता था। इससे बहस करना संभव नहीं था। यह बिल्कुल भिन्न अवस्था होती है। रामकृष्ण काली को समर्पित थे और उनकी दिलचस्पी सिर्फ काली में थी। जब वह उनके भीतर प्रबल होतीं, तो वह आनंदविभोर हो जाते और नाचना-गाना शुरू कर देते। जब वह थोड़े मंद होते और काली से उनका संपर्क टूट जाता, तो वह किसी शिशु की तरह रोना शुरू कर देते। वह ऐसे ही थे। इसलिए तोतापुरी जिस परमज्ञान की बात कर रहे थे, उन सब में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। तोतापुरी ने कई तरीके से उन्हें समझाने की कोशिश की मगर रामकृष्ण समझने के लिए तैयार नहीं थे। साथ ही, वह तोतापुरी के सामने बैठना भी चाहते थे क्योंकि तोतापुरी की मौजूदगी ही कुछ ऐसी थी।
तोतापुरी ने देखा कि रामकृष्ण इसी तरह अपनी भक्ति में लगे हुए हैं। फिर वह बोले, ‘मन को सर्वव्यापी विराट ब्रह्म में एकाग्र करना, बहुत कठिन नहीं, यह तो बहुत आसान है। इस समय तुम अपनी कल्पनाशक्ति या इच्छाशक्ति को शक्तिशाली बना रहे हो, अपने शरीर को समर्थ बना रहे हो, अपने भीतर की रासायनिक श्राव को शक्तिशाली बना रहे हो। लेकिन तुम अपनी सतत जागरूकता (awareness) को साक्षी -भाव, या डबल प्रेजेंस ऑफ़ माइंड की क्षमता को तीव्र नहीं बना रहे हो, अपनी एकग्रता शक्ति को प्रबल नहीं बना रहे हो। तुम्हारे पास इसके लिए जैसी  ऊर्जा होनी चाहिए, वैसी ऊर्जा है और इसके लिए तुम्हें सिर्फ अपनी जागरूकता को सक्षम बनाना है।’रामकृष्ण मान गए और बोले, ‘ठीक है, मैं अपनी जागरूकता को और शक्तिशाली बनाउंगा और अपनी पूरी जागरूकता में बैठूंगा।’मगर जिस पल उन्हें काली के दर्शन होते, वह फिर से प्रेम और परमानंद की बेकाबू अवस्था में पहुंच जाते। वह चाहे कितनी भी बार बैठते, काली को देखते ही उड़ने लगते।फिर तोतापुरी बोले, ‘अगली बार जब भी काली दिखें, आपको एक तलवार लेकर उनके टुकड़े करने हैं।’ रामकृष्ण ने पूछा, ‘मुझे तलवार कहां से मिलेगी?’ तोतापुरी ने जवाब दिया, ‘वहीं से, जहां से आप काली को लाते हैं।अगर आप एक पूरी काली बनाने में समर्थ हैं, तो आप तलवार क्यों नहीं बना सकते? आप ऐसा कर सकते हैं। अगर आप एक देवी बना सकते हैं, तो उसे काटने के लिए एक तलवार क्यों नहीं बना सकते? तैयार हो जाइए।’रामकृष्ण बैठे। मगर जैसे ही काली आईं, वह परमानंद में डूब गए और तलवार, जागरूकता के बारे में सब कुछ भूल गए।फिर तोतापुरी ने उनसे कहा, ‘इस बार जैसे ही काली आएंगी...’ उन्होंने शीशे का एक टुकड़ा उठाते हुए कहा, ‘शीशे के इस टुकड़े से मैं आपको वहां पर काटूंगा, जहां पर आप फंसे हुए हैं।
 जब मैं उस जगह को काटूंगा, तब आप तलवार तैयार करके काली को काट दीजिएगा।’रामकृष्ण फिर से बैठे और ठीक जिस समय रामकृष्ण परमानंद में डूबने ही वाले थे, जब उन्हें काली के दर्शन हुए, उसी समय तोतापुरी ने शीशे के उस टुकड़े से रामकृष्ण के माथे पर एक गहरा चीरा लगा दिया।उसी समय, रामकृष्ण ने अपनी कल्पना में तलवार बनाई और काली के टुकड़े कर दिए, इस तरह वह मां और मां से मिलने वाले परमानंद से मुक्त हो गए। अब वह वास्तव में एक परमहंस और पूर्ण ज्ञानी बन गए। उस समय तक वह एक प्रेमी थे, भक्त थे, उस देवी मां के बालक थे, जिन्हें उन्होंने खुद उत्पन्न किया था।
माता काली की उत्तपति धर्म की रक्षा हेतु हुई व पापियों के सर्वनाश के करने के लिए हुई है।काली माता 10 महाविद्याओ में से एक है। उन्हें देवी दुर्गा की महामाया (maa kali) कहा गया है।
माँ काली ऐसी देवी है जो अपने कूर रूप के बावजूद अपने भक्तो से एक प्यार का सम्बद्ध बनाये रखती है।  माँ काली के भक्त पर किसी तरह का संकट नहीं आता। माँ काली अपने भक्तो सभी तरह के परेशानी से बचाती है।* लम्बे समय से चली आ रही बिमारी माता के आशीर्वाद से सही हो जाती है.* माता काली के भक्तो पर जादू टोना एवं टोटके आदि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।* माता काली की पूजा में इतनी ताकत होती है की इसके प्रभाव से सही न होने वाली बिमारी भी दूर हो जाती है।
इस सम्बन्ध में भक्त एक बेटे का रूप ले लेता है और माँ काली एक देखभाल करने वाली का माँ का रूप लेती है। कभी कभी माँ काली मौत की देवी भी मानी जाती है। पर दूसरे शब्दों में माँ काली बुराइयों और अहंकार की मौत लाती है। हिंदू शास्त्रों में , सनातन धर्म में बताया है की कलयुग में सबसे ज्यादा जगृत देवी माँ काली होगी। माँ कालिका की पूजा बंगाल एवं असम में बहुत ही भव्यता एवं धूमधाम के साथ मनाई जाती है। माता काली के दरबार में जब कोई उनका भक्त एक बार चला जाता है तो हमेशा के लिए वहां उसका नाम एवं पता दर्ज हो जाता है। जो एकनिष्ठ, सत्यावादी तथा अपने वचन का पका होगा माता उसकी मनोकामना भी अवश्य पूर्ण करती है।
वह केवल अभिमानी राक्षसों को मारने के लिए जानी जाती है , लेकिन काली भी माँ का एक रूप मानी जाती है जो अपने बच्चो को सताने वाली बुराईयों का अंत करने वाली है | माँ काली कुछ देवी में से एक है जो अपने भक्त बेटों को ब्रह्मचर्य और त्याग का पाठ कराती है। देवो के देव महाकाल की काली (maa kali), काली से अभिप्राय समय अथवा काल से है। काल वह होता है जो सब कुछ अपने में निगल जाता है।  काली भयानक एवं विकराल रूप वाले श्मशान की देवी। वेदो में बताया गया है की समय ही आत्मा होती है। आत्मा को ही समय कहा जाता है।
इनके परम गृही शिष्य गिरीश चन्द्र घोष जो की नाटक कंपनी (थियेटर) के निर्देशक थे, परमहंस जी के विचारों से प्रेरित नाटकों का मंचन करते थे। समाज को एक नई दिशा की ओर ले जाना, जिसमें सभी समान हो तथा सभी का समग्र विकास हो, यही उनके नाटकों का मुख्य उद्देश्य होता था। गिरीश चन्द्र के प्रति परमहंस जी का अटूट  स्नेह भी था; कहा जाता हैं! इन्हीं के गले के कर्क रोग को परमहंस जी ने अपने शरीर में ले लिया था, जिससे उनकी मृत्यु हुई। परमहंस जी इस सम्पूर्ण चराचर जगत को माया रूप में देखते थे और यह माया अविद्या से ही जन्म ग्रहण करती है, ऐसा वे मानते थे। काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया इत्यादि मानव चेतना या विवेक को निम्न स्तर की ओर अग्रसर करता हैं तथा यह ही अविद्या का मूल कारण हैं, अंधकार हैं; ज्ञान रूपी प्रकाश से माया सम्बंधित दोषों या अन्धकार से दूर रहा जा सकता हैं। निःस्वार्थ सेवा या कर्म, उच्च आदर्श, आध्यात्मिक उन्नति हेतु भक्ति भाव, प्रेम, पवित्रता इत्यादि मनुष्य विवेक के सर्वोत्तम लक्षण हैं तथा मनुष्यों को सर्वदा ही उत्तम नियमों का पालन करना चाहिए।
शिष्य, विचार तथा महासमाधि: सिद्धि प्राप्ति के पश्चात्, गदाधर की ख्याति दूर-दूर तक फैली तथा बहुत से बुद्धिजीवी, संन्यासी एवं सामान्य वर्ग के लोग उनके संसर्ग हेतु दक्षिणेश्वर काली मंदिर आने लगे। सभी के प्रति उनका स्वभाव बड़ा ही कोमल था, सभी वर्गों तथा धर्मों के लोगों को वे एक सामान ही समझते थे। वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं होता था जो परमहंस जी नहीं जान पाते थे, माँ काली की कृपा से वे त्रिकाल दर्शी महा-पुरुष बन गए थे। रूढ़ि वादी परम्पराओं का त्याग कर, उन्होंने समाज सुधर में अपना अमूल्य योगदान दिया, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, विजयकृष्ण गोस्वामी, केशवचन्द्र सेन जैसे बंगाल के शीर्ष विचारक उनसे प्रेरणा प्राप्त करते थे। निवृत्ति मार्ग की  श्रेणी में स्वामी विवेकानन्द उनके प्रमुख अनुयाई थे, उनके विचारों तथा भावनाओं का स्वामी जी ने सम्पूर्ण विश्व में प्रचार किया तथा हिन्दू सभ्यता तथा संस्कृति की अतुलनीय परम्परा को प्रस्तुत किया। स्वामी जी ने परमहंस जी के मृत्यु के पश्चात रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जो सम्पूर्ण विश्व में समाज सेवा, शिक्षा, योग, हिन्दू दर्शन पर आधारित कार्यों में संलग्न रहती हैं तथा प्रचार करती हैं, इनका मुख्यालय बेलूर, पश्चिम बंगाल में हैं। रामकृष्ण परमहंस, ठाकुर नाम से जाने जाने लगे थे, बंगाली में ठाकुर शब्द का अभिप्राय ईश्वर होता हैं, सभी उन्हें इसी नाम से पुकारने लगे थे।
इनके अन्य अनुयाइयों या शिष्यों में नाटकों के निर्देशक गिरीश चन्द्र घोष थे, ठाकुर का उनके प्रति आघात स्नेह था। एक बार एक नाटक को देखने हेतु, उन्होंने अपना सर्वस्व उन्हें दे दिया था तथा गिरीश का सब कुछ अपने ऊपर ले लिया था। परिणामस्वरूप इनके गले में कर्क रोग हुआ तथा इसी रोग से इनकी मृत्यु हुई। रोग होने के पश्चात भी इन्होंने रोग पर कभी ध्यान नहीं दिया तथा अंत काल में वे अधिकतर समाधिस्थ रहने लगे थे, यहाँ तक की वे अपनी चिकित्सा भी नहीं करना कहते थे, स्वामी विवेकानंद चिकित्सा काराते रहे परन्तु किसी भी प्रकार की चिकित्सा का उनके रोग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अंततः १६ अगस्त १८८६ भोर होने से पहले ब्रह्म-मुहूर्त में इन्होंने महा-समाधि ली या कहे तो पञ्च तत्व के इस शरीर का त्याग कर ब्रह्म में विलीन हो गए।
ठाकुर के विचार : श्री रामकृष्ण परमहंस देव की विचारधारा साधारण गुरुओं की अपेक्षा अत्यन्त भिन्न प्रकार की हुआ करती थी, एक बार स्वामी विवेकानंद को हिमालय पर जाकर तपस्या करने की बड़ी इच्छा हुई। वैसे भी हिन्दू दर्शन के अनुसार, हिमालय जा एकांत में तपस्या करने का विशेष महत्व हैं और आदि काल से ही ऐसे परम्परा चली आ रही हैं। इसके निमित्त जब विवेकानंद, गुरु आज्ञा हेतु ठाकुर से आज्ञा लेने गए तो उन्होंने कहा! हमारे आस पास बहुत से लोग भूख, बीमारी इत्यादि से तड़प रहे हैं, चारों ओर अज्ञान का अंधकार फैला हुआ हैं। यहाँ लोगों की अवस्था बहुत ही दुःख-कष्ट से परिपूर्ण हैं, (कलकत्ते के लोग नाली के कीड़े के जैसे जीवन व्यतीत कर रहे हैं,)  हिमालय की किसी गुफा में समाधि के आनंद को तुम्हारी आत्मा स्वीकार करेंगी?  
एक  ही  की  नौकरी  करो:  जिसका काम कर रहे हो, उसी का करते रहो ।  एक ही आदमी की नौकरी से जी ऊब जाता है, फिर पाँच आदमियों की नौकरी ? एक स्त्री किसी मुसलमान को देखकर मुग्ध हो गई थी, उसने उसे मिलने के लिए बुलाया ।  मुसलमान आदमी अच्छा था, प्रकृति का साधु था ।  उसने कहा  -  "मैं करूँगा, अपनी हण्डी ले आऊँ ।" उस स्त्री नेकहा,  "हण्डी तुम्हें यहीं मिल जायेगी, मैं दूँगी तुम्हें हण्डी ।"  उसने कहा   -  "ना, सो बात नहीं होगी !  जिस हण्डी के पास मैनें एक बार शर्म खोई, इस्तेमाल तो मैं उसी का करूँगा  -  नयी हण्डी के पास दोबारा बेईमान न हो सकूँगा ।"  यह कहकर वह चला गया । औरत की भी अक्ल दुरूस्त हो गयी; हण्डी का मतलब वह समझ गयी । 
ईश्वरेच्छा और पुरूषार्थ:
मानव में स्वतंत्र इच्छा का अस्तित्व कुछ विद्यमान है या नहींं, बहुत देर वाद - विवाद करने के पश्चात्, उसकी यथार्थ मीमांसा के लिए हम श्रीरामकृष्णदेव के समीप उपस्थित हुए ।  बालकों के विवाद: को कुछ देर तक वे कौतूहल से सुनते रहे, तदनन्तर गम्भीर होकर बोले,  "अरे, कोई स्वाधीन इच्छा भी किसी के अन्दर कुछ विद्यमान है क्या ?  ईश्वरेच्छा से ही सर्वदा सब कुछ हो रहा है और होता रहेगा ।  अन्त मेंं मनुष्य को इस बात का पता चलता है ।  फिर भी यह बात है कि मानो किसी गाय को एक लम्बी रस्सी के द्वारा खूँटे से बाँध दिया गया है  ---  वह गाय खूँटे से एक हाथ दूरी पर खड़ी हो सकती है और यदि चाहे तो रस्सी जितनी लम्बी है, वहाँ तक जाकर भी खड़ी हो सकती है  ---  मानव की स्वाधीन इच्छा भी इसी प्रकार की है ।  वह गाय उस दायरे में चाहे जहाँ बैठे, खड़ी हो अथवा घूमती रहे  ---  इसीलिए मनुष्य उसे इसी प्रकार से बाँधता है ।  ठीक उसी प्रकार ईश्वर ने भी मानव को कुछ शक्ति देकर तदनुसार वह जैसे एवँ जितना चाहे उसका प्रयोग कर सकता है, इस प्रकार की स्वतंत्रता देकर उसे छोड़ दिया गया है ।  इसीलिए मनुष्य अपने को स्वतंत्र समझता है ।  किन्तु रस्सी खूँटे से बँधी हुई है ।  बात यह है कि उनसे आर्त होकर प्रार्थना करने पर वे उसे ढीला कर बाँध सकते हैंं, उस रस्सी को और भी लम्बी कर सकते हैं और चाहें तो गले के बन्धन को एकदम खोल भी सकते  हैंं।"  इन बातों को सुनकर हमने पूछा,  "मान्यवर, तब तो साधन - भजन करने में मनुष्य का कोई हाथ नहींं है ?  हर एक फिर यह कह सकता है कि --- मैं जो कुछ कर रहा हूँ, सब उनकी इच्छा से ही कर रहा हूँ  ?"    श्रीरामकृष्ण -  अरे, केवल कहने से क्या होगा ?  कील - काँटे नहींं हैं --- केवल इस प्रकार कहने से ही क्या काम चल जाता है ?  काँटे पर हाथ पड़ते ही उसके चुभ जाने से मनुष्य  'ऊः' करके चिल्ला उठता है !  साधन - भजन करना यदि मनुष्य के हाथ में होता, तब तो सभी लोग उसका अनुष्ठान कर सकते --- किन्तु मनुष्य फिर क्यों नहींं कर पाते हैंं ? बात यह है कि उन्होंने तुमको जितनी शक्ति दी है, यदि तुम उसका उचित प्रयोग न करो तो वे उससे अधिक और नहीं देंगे ।  इसलिए पुरूषार्थ या उद्यम की आवश्यकता है ।  देखो न, सभी को कुछ न कुछ उद्यम करके ही ईश्वर - कृपा का अधिकारी बनना पड़ता है ।  ऐसा करने पर उनकी कृपा से दस जन्म के भोग एक ही जन्म में समाप्त हो जाते हैंं ।  किन्तु  ( उन पर निर्भरशील होकर ) कुछ न कुछ उद्यम करना ही पड़ता है ।  इस प्रसंग में एक कहानी सुनो -   गोलोक - विहारी विष्णु ने एक बार किसी कारणवश नारदजी को अभिशाप दिया कि उन्हें नरक भोगना पड़ेगा ।  नारदजी चिन्तातुर हो उठे ।  नाना प्रकार के स्तव - स्तुतियों द्वारा उन्हें सन्तुष्ट कर वे बोले,  "अच्छा प्रभो, नरक कहाँ है, वह कैसा है तथा कितने प्रकार का है, मेरी यह जानने की इच्छा हो रही है, मुझे कृपा कर बताइये ?"  स्वर्ग, नरक तथा पृथ्वी, जो जहाँ पर अवस्थित है, उनको खड़िया से धरती पर अंकित कर दिखाते हुए विष्णु बोले,  "यहाँ पर स्वर्ग तथा यहाँ नरक है ।"  नारदजी ने कहा,  "अच्छा, तो फिर यही मेरा नरकभोग हो गया "  ---  यह कहकर उस अंकित नरक के उपर लोट लगाने के पश्चात् नारदजी ने उन्हेंं प्रणाम किया ।  विष्णु हँसते हुए बोले,  "यह क्या ?  तुम्हारा नरकभोग कैसे हुआ ?"  नारदजी ने कहा,  "क्यों प्रभो, स्वर्ग तथा नरक का सृजन आप ही ने तो किया है ? आप उसे अंकित कर मुझे दिखाते हुए जब यह बोले कि -  'यह नरक है'  -  तब वह स्थान वास्तव में नरक ही हो गया ।  और उसपर लोट लगा लेने से मेरा भी नरकभोग क्यों नहींं पूरा हो गया ?"  नारदजी ने यह बात अपने हार्दिक विश्वास से कही थी न !  इसलिए विष्णु ने भी  'तथास्तु'  कहा। 
ठाकुर के ऐसे ही विचारों ने उन्हें, महान योगी, उत्कृष्ट साधक तथा समाज सुधारक बनाया। अंततः स्वामी जी यही रहें तथा दरिद्र को नारायण मानकर उनकी सेवा करने लगे एवं सेवा पथ को ही उन्होंने उपासना, साधना समझा।
मेरे गुरुदेव: अपनी दूसरी इंग्लैंण्ड यात्रा के समय 28 मई, 1896 को स्वामी विवेकानंद की जर्मन विद्वान मैक्समूलर से भेंट हुई। मैक्समूलर ने "सच्चा महात्मा" शीर्षक से एक लेख श्री रामकृष्ण देव के बारे में लिखा, जो इंग्लैंण्ड की प्रतिष्ठित बौद्धिक पत्रिका "नाईंन्टींथ सेन्चुरी" (उन्नीसवीं शताब्दी) के अगस्त, 1896 के अंक में प्रकाशित हुआ। इससे पश्चिमी देशों में रामकृष्ण देव के बारे मं अधिक जानने की भूख जगी। इसी भूख की तृप्ति के लिए स्वामी जी का न्यूयार्क में "मेरे गुरुदेव" विषय पर एक लम्बा भाषण हुआ। इस भाषण में स्वामी जी ने बताया कि एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में जन्मे रामकृष्ण को पूर्वजन्म का संस्मरण जन्म से ही था तथा वह इस बात को भली-भांति जानते थे कि इस संसार में उन्होंने किस उद्देश्य से जन्म लिया है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ही उन्होंने अपनी पूरी शक्ति लगा दी। बाल्यकाल में ही पितृछाया से वंचित होकर उन्हें पढ़ने के लिए एक नि:शुल्क संस्कृत पाठशाला में भेजा गया। वहां एक दिन अपने गुरुजनों को दक्षिणा में वस्त्रों की अच्छी जोड़ी पाने के लिए तर्कशास्त्र और ज्योतिष आदि विषयों पर लड़ते-झगड़ते और बहस करते देखा। उन्हें वितृष्णा हुई और उन्होंने तय किया कि अब मैं पाठशाला बिल्कुल नहीं जाऊंगा। यही उनके पाठशाला जीवन का अंत था। जीविकोपार्जन के लिए उन्हें दक्षिणेश्वर मंदिर में मां की पूजा का काम मिला जिससे उनके मन में प्रश्न पैदा हुआ- क्या इस मूर्ति में किसी का वास है? क्या यह सत्य है कि इस विश्व का सारा व्यवहार आनंदमयी जगन्माता चलाती है? ये प्रश्न उनके मन-मस्तिष्क में समा गये और उन्होंने अपनी सारी जीवन शक्ति इसका उत्तर पाने पर केन्द्रित कर दी। "क्या ईश्वर देखा जा सकता है ?", यह प्रश्न उनके मन में इतना प्रबल हो गया कि बहुधा वे जगन्माता की मूर्ति के सामने नैवेद्य रखना भी भूल जाते थे और कभी- कभी घंटों तक आरती ही उतारा करते थे। मैक्समूलर ने अपने लेख में माना कि किसी विश्वविद्यालय के सम्पर्क में न रहने के कारण ही वे ऐसा कर सके।अंत में उस बालक (रामकृष्ण देव) के लिए उस मंदिर में काम करना असंभव हो गया। उन्होंने वह मंदिर छोड़ दिया। समीपवर्ती एक छोटे से जंगल में चले गए और वहीं रहने लगे। अपने जीवन की इस अवस्था के संबंध में मेरे गुरुदेव ने मुझसे कई बार चर्चा की थी। कुछ महीनों बाद उन्होंने अपनी थोड़ी-बहुत सम्पत्ति को भी त्याग दिया और कभी धन न छूने का प्रण कर लिया। निद्रावस्था में भी मैं उनके शरीर को किसी सिक्के से छू लेता था तो उनका हाथ टेढ़ा हो जाता था और उनके शरीर को ऐसा लगता था कि लकवा मार गया हो। उन्होंने सोचा कि 'कामिनी और कांचन' (दादा कहते थे -लस्ट ऐंड लूकर) ही ऐसे दो कारण हैं जो जगन्माता के दर्शन नहीं होने देते। इस प्रकार सत्य लाभ के लिए श्री रामकृष्ण को छटपटाते अनेक दिन, सप्ताह और महीने बीत गए।तब प्रत्यक्ष जगन्माता ही एक विदुषी व सुंदर स्त्री 'भैरवी ब्राह्मणी ' का रूप लेकर उनके पास आ पहुंची। वह कई वर्षों तक उनके पास रहीं और उस माता ने रामकृष्ण को भारत के विभिन्न धर्म प्रणालियों के साधन सिखाये, अनेक प्रकार के योग साधनों की शिक्षा दी। कुछ दिनों बाद वहां एक असाधारण तत्वज्ञानी संन्यासी श्री तोतापुरी जी आये। उन्होंने उस बालक (श्रीरामकृष्ण) को वेदान्त (ब्रह्म के साथ अपनी आत्मा के अद्वैत की अनुभूति करना) सिखाया। वे कई मास उनके साथ रहे और उन्हें संन्यास मार्ग की दीक्षा देकर चले गए। इससे घबराकर उनके घरवालों ने उनका विवाह कर दिया। किंतु उन्होंने उस स्त्री में (श्री श्री माँ सारदा देवी में) भी जगन्माता को प्रत्यक्ष देखा ! वह स्त्री भी तेजस्वी थीं। वे स्वयं ही अपने पति के सम्मुख आकर खड़ी हो गयीं। वे अपनी स्त्री के चरणों पर गिर पड़े और उसे अपनी माता के रूप में स्वीकार कर लिया।
हमलोग 'श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग' में पढ़ते हैं कि साधना के प्रारम्भ में ही, श्रीरामकृष्णदेव ने श्रीजगन्माता से यह प्रार्थना की थी - " माँ,  मुझे क्या करना चाहिये यह मैं कुछ नहीं जानता हूँ; तू मुझे जो सिखायेगी, मैं वही सीखूँगा। " इस प्रकार श्रीजगदम्बा के बालक श्रीरामकृष्णदेव, तब उनपर पूर्णतया निर्भर होकर उनकी ओर दृष्टि आबद्ध किये अपने दिन बिता रहे थे, तथा वे जहाँ, जैसे उनको घुमा-फिरा रहीं थी, परमानन्दित हो कर वे भी उनका अनुसरण कर रहे थे। " एक दिन वे विष्णु-मन्दिर के बरामदे में बैठकर श्रीमद्भागवत की कथा सुन रहे थे। सुनते सुनते भावाविष्ट हो उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के जीवन्त रूप का दर्शन हुआ। तदन्तर उस मूर्ति के चरणों से रस्सी की तरह एक ज्योति निकली, जिसने पहले श्रीमद्भागवत को स्पर्श किया, उसके बाद उनके वक्षस्थल में संलग्न होकर तीनों वस्तुओं को कुछ देर के लिये बाँधे रखा। श्री रामकृष्णदेव कहते थे कि इस प्रकार के दर्शन से उनके मन यह दृढ़ धारणा हुई थी कि 'भागवत, भक्त और भगवान ' -तीनों भिन्न रूप से प्रकट रहते हुए भी एक ही हैं, अथवा एक ही वस्तु के तीन रूप हैं! भागवत (शास्त्र), भक्त और भगवान -तीनों एक हैं तथा एक ही तीन हैं !' [लीला०प्र० १/३५६ शास्त्र -जीवन नदी के हर मोड़ पर, बी.के.,अवतार-एनदा, तीनों एक हैं, तथा एक ही तीन हैं.] 
इस प्रकार भावसाधना की पराकाष्ठा में भावराज्य की चरमभूमि 'एक ही वस्तु (ईश्वर,आत्मा या ब्रह्म)  के तीन रूप हैं -भागवत,भक्त और भगवान "  में पहुँच जाने के बाद, श्रीरामकृष्ण देव का मन स्वाभाविक रूप से भावातीत अद्वैत भूमि की ओर आकृष्ट होने लगा। क्योंकि भाव तथा भावातीत (इन्द्रियगोचर- इन्द्रियातीत) राज्य ये दोनों सदा परस्पर कार्य-कारण सम्बन्ध से बन्धे हुए हैं ! इन्द्रियातीत अद्वैत राज्य का भूमानन्द (परमानन्द) ही सीमाबद्ध होकर भावराज्य (मानवरूप में) दर्शन-स्पर्शन आदि सम्भोगानन्द के रूप में अभिव्यक्त होकर हमारी बुद्धि को भ्रमित करता रहता है! १/३६४
ठीक इसी समय माँ जगदम्बा की इच्छा से, श्री ठाकुर को वेदान्त श्रवण कराने के लिये ब्रह्मज्ञ श्री तोतापुरी जी दक्षिणेश्वर पधारते हैं। वे श्रीरामकृष्ण का निरीक्षण करने के बाद उनसे पूछते हैं -" तुम उत्तम अधिकारी प्रतीत हो रहे हो, क्या तुम वेदान्त साधना करना चाहते हो ?" श्रीठाकुर - "करने न करने के बारे में मैं कुछ नहीं जानता -मेरी माँ सब कुछ जानती हैं, उनका आदेश मिलने पर कर सकता हूँ !"श्री तोतापुरी - " तो फिर जाओ, अपनी माँ से पूछकर जवाब दो; क्योंकि दीर्घकाल तक मैं यहाँ नहीं ठहरूँगा।" श्री ठाकुर श्रीजगदम्बा के मन्दिर में उपस्थित हुए और भावाविष्ट अवस्था में माँ को बोलते सुना - " जाओ सीखो, तुम्हें सिखाने के लिये ही इस संन्यासी का आगमन यहाँ हुआ है।" हर्षोत्फुल्ल होकर श्री ठाकुर श्री तोतापुरी जी के समीप पहुँचे तथा माँ की अनुमति मिलने की बात कही।
एक लोकशिक्षक (सम्पूर्ण मानव-जाति के मार्गदर्शक नेता) के रूप में रामकृष्ण परमहंस समकालीन विद्वत समाज में अत्यन्त लोकप्रिय थे। बंगाल के ग्रामीण अंचल में प्रचलित छोटी छोटी कथा-कहानियों के माध्यम से दिये गए उनके उपदेशों का प्रबुद्ध जनमानस पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था। वे कहते थे कि 'ईश्वर उपलब्धि  करना ही मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य है। ' उनके मतानुसार 'कामिनी -कांचन' (धर्मरहित अर्थ और काम) ही मनुष्य को ईश्वर उपलब्धि (सत्योपलब्धि) के मार्ग से विचलित कर देता है। अतएव श्रीरामकृष्ण के मतानुसार 'कामिनी-कांचन' (लस्ट और लूकर) या कामुकता और धन के प्रति आसक्ति का त्याग ही ईश्वरोपलब्धि का मार्ग है। जगत को उन्होंने 'माया' कहा है। उनके मतानुसार जगत की तमोगुणी शक्ति 'अविद्या माया' (अर्थात काम-क्रोध-लोभ आदि षड रिपु) मनुष्य को बन्धन में डाल देती है; एवं 'विद्या माया' अर्थात 'प्रभु के नाम' का जप और उनके आध्यात्मिक गुणों का बार बार चिंतन (ऑटोसजेशन) मनुष्य को उसके सर्वोच्च स्तर (मोक्ष या भ्रममुक्ति) तक ले जाती है। श्री कृष्ण चैतन्य देव ने भी इसी आदर्श का प्रचार किया था-
"नामे रूचि जीवे दया वैष्णव सेवन; इहा छाड़ा कली युगे नाइ धर्म सनातन। 
हाते कर गृह कर्म मुख्य बल हरि, अनयाशे दिबे यदि भव सिन्धु पारी।"
 'नामे रूचि' (नादब्रह्म ॐ कार के अवतार वरिष्ठ भगवान श्रीरामकृष्ण के गुरुप्रदत्त नाम और कीर्तन में आग्रह अर्थात उनके आध्यात्मिक गुण  जैसे ज्ञान, दया, पवित्रता, प्रेम, भक्ति आदि २४ चारित्रिक गुणों अपने दैनंदिन जीवन में अभिव्यक्त करने की संकल्पशक्ति या दृढ़ इच्छाशक्ति को बढ़ाने के लिए 'अनुचिंतन ऑटोसजेशन स्वपरामर्श में रूचि ; 'जीवे दया' (मनुष्य तथा दूसरे प्राणियों -जैसे मच्छर आदि के प्रति दया व्यक्त करना), एवं 'वैष्णव-सेवा' (विष्णु-भक्त या श्रीरामकृष्ण से प्रेम करने वाले व्यक्ति की   सम्मान पूर्वक सेवा),या ठाकुर की भक्ति द्वारा ईश्वर-प्राप्ति होती है, मनुष्य अनायास ही भवसागर से तर जाता है।) किन्तु श्री रामकृष्ण परमहंस ने उसमें तुरंत सुधार करते हुए कहा था -'जीवे दया नय, शिवज्ञाने जीवसेवा'! और श्री रामकृष्ण का यह उपदेश ही स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रतिपादित कर्मयोग (Be and Make) का आधार बना था।  
अब हमलोग यह समझ सकते हैं, कि सब कुछ भगवच्चरणों में समर्पण कर देने के फलस्वरूप सब प्रकार की वासनाओं से मुक्त होने के कारण ही, इतने अल्प समय में श्रीरामकृष्णदेव के लिये 'ब्रह्मज्ञान की निर्विकल्प भूमि' (अद्वैत) में आरूढ़ और दृढ़-प्रतिष्ठित होना सम्भव हुआ था। साथ ही अपने पूर्वजन्म के वृत्तान्तों को जानकर उन्होंने स्पष्ट रूप से अनुभव किया था कि पूर्व पूर्व युगों में 'श्रीराम' तथा 'श्रीकृष्ण' के रूप में आविर्भूत होकर जिन्होंने लोक-कल्याण साधन किया था, वे ही वर्तमान युग में पुनः शरीर धारण कर 'श्रीरामकृष्ण' के रूप में अवतरित हुए हैं।" निर्विकल्प भूमि में प्रतिष्ठित रहने के फलस्वरूप द्वैत-भूमि की सीमा में अवस्थित कुछ घटनाओं और व्यक्तियों को देखकर अक्सर श्री ठाकुरदेव की "अद्वैत-स्मृति " जाग्रत हो उठती थी, और वे तुरीयभाव में लीन हो जाते थे !
जड़-चेतन से एकात्मता : इसके बाद उन्होंने विभिन्न मत-पंथों के सत्य स्वरूप को जानने की इच्छा से इस्लाम, ईसाई, शैव, शाक्त, वैष्णव आदि विभिन्न मार्गों से साधना करके साक्षात्कार किया कि सब धर्म एक ही सत्य की शिक्षा देते हैं। अंतर केवल उनकी साधना पद्धति और भाषा में रहता हे। फिर वे परम अहंशून्यता की साधना में संलग्न हो गए। उसी स्थान के निकट एक चाण्डाल जाति का कुटुम्ब रहता था। मेरे गुरुदेव ने ब्राह्मण होते हुए भी चाण्डाल के घर में दास कर्म करने की आज्ञा मांगी। चाण्डाल ने उन्हें वह काम नहीं करने दिया परंतु आधी रात को जब चाण्डाल के घर के सब लोग सोते रहते थे, तब श्री रामकृष्ण उसके घर में घुस जाते थे और अपने बड़े-बड़े बालों से ही वे उसका घर झाड़ डालते थे। यद्यपि मेरे गुरुदेव ने पुरुष शरीर में जन्म लिया था फिर भी वे सभी बातों में स्त्री भाव लाने की चेष्टा करने लगे। वे यह सोचने लगे कि वे स्वयं पुरुष नहीं, बल्कि स्त्री हैं। स्त्रियों जैसे कपड़े पहनने लगे, उन्हीं के जैसा बोलने लगे। वे वेश्याओं के चरणों पर भी गिर जाते थे। इस प्रकार उन्होंने स्त्री-पुरुष भेद मिटाया।  
१.वृद्ध घसियारा : मंदिर-प्रांगण से बिना मूल्य घास लेने की अनुमति मिलने पर दिनभर घास काटता रहा, शाम को जब गट्ठर बाँधकर बेचने के लिये बाजार जाने को तैयार हुआ। श्री रामकृष्ण ने देखा लोभ के वशीभूत होकर उस वृद्ध ने इतनी घास काट ली थी कि उस वृद्ध के लिये गट्ठर उठाना भी सम्भव न था। फिर भी बार बार उसको उस बोझ को रखने का प्रयास तो कर रहा था, पर वजन इतना था कि उठा नहीं पा रहा था ! किन्तु वजन की तरफ गरीब घसियारे का कोई ध्यान न था।  यह देखकर श्रीरामकृष्णदेव - यह सोचते हुए भावाविष्ट हो गए, कि " भीतर पूर्ण ज्ञानस्वरूप आत्मा रहने पर भी, बाहर ऐसी निर्बुद्धिता, इतना अज्ञान! हे राम , तुम्हारी कितनी विचित्र लीला है ! " पंचभूते फाँदे ब्रह्म पड़े कांदे !" --और इस प्रकार कहते हुए समाधिस्त हो गए !!
माँझी के शरीर पर थप्पड़ के प्रहार के निशान अपने शरीर पर दिखाकर और  नये दूर्वादल को अर्थात रौंदी जाती हुई घास के घाव अपनी छाती पर दिखाकर,४. देवघर में अकाल-पीड़ितों को कपड़ा -तेल देने की ज़िद, घायल पतिंगा का दर्द, की Empathy -  उन्होंने जड़-चेतन की एकता का साक्षात्कार किया। उन्होंने सिद्ध कर दिया है कि ब्रह्म कहीं बाहर नहीं, इसी जड़-चेतन सृष्टि में व्याप्त है। वेदान्त-ज्ञान या अद्वैत-दर्शन  के लिए किसी अमूर्त की उपासना करने की बजाय आंखों से दिखायी देने वाले समाज देवता की पूजा करना - अर्थात ' शिवज्ञान से जीवसेवा करना ' ही पर्याप्त है। इस प्रकार अपने तीन चतुर्थांश जीवन में अनेक विध साधनाएं करके उन्होंने आध्यात्मिक शक्ति अर्जित की, जिसके तेज से आकर्षित होकर उनके जीवन के अंतिम 7-8 वर्षों में अनेक पढ़े- लिखे युवक और झुंड के झुंड नर-नारी उनके पास आने लगे। वे अपनी सादी-सरल भाषा में दिन-रात उन्हें अध्यात्म बताने लगे। रोकने पर भी नहीं रुके, अनवरत बोलने से उन्हें गले की बीमारी हो गयी, जिसने 16 अगस्त, 1886 को उन्हें महासमाधि में खींच लिया। इन्हीं आठ वर्षों में वह शिष्य मंडली उन्हें प्राप्त हुई जिसने विवेकानंद के नेतृत्व में उनका नाम पूरे विश्व में पहुंचा दिया। उन्होंने श्री रामकृष्ण के उपदेश 'शिवज्ञान से जीवसेवा ' को व्यावहारिक रूप देने के लिये  "दरिद्र देवो भव, मूर्ख देवोभव" की पूजा-अर्चना आधुनिक युग में कैसे की जा सकती है, इसे स्पष्ट के लिए भारत पुनर्निर्माण का एक साधना मंत्र प्रदान किया- Be and Make! "रामकृष्ण-विवेकानन्द 'अचिन्त्य-भेदाभेद वेदान्त' शिक्षक प्रशिक्षण परम्परा" के अनुसार, सम्पूर्ण विश्व में-मनुष्य 'बनने और बनाने' का प्रशिक्षण देने में समर्थ भावी लोक-शिक्षकों या वुड बी लीडर्स का निर्माण करने के लिये स्वामी विवेकानन्द के नेतृत्व में युवा अनुयायिओं के एक दल का गठन किया था। १८८६ ई ० में श्री रामकृष्ण द्वारा नश्वर शरीर का त्याग कर देने के बाद, सभी युवा भक्तों ने संन्यास ग्रहण किया और श्री रामकृष्ण के मीशन को आगे बढ़ाने के कार्य में जुट गए।            
नरेन्द्र नाथ से विवेकानन्द :
12 जनवरी, 1863 को जन्मे नरेन्द्र नाथ दत्त उन्नीस वर्ष की आयु तक ऐसे गुरु की खोज में भटकते रहे जो दावा कर सके कि ईश्वर को मैंने प्रत्यक्ष देखा है, जो साक्षात्कारी हो। 1881-82 में स्वामी रामकृष्ण परमहंस के सम्पर्क में आये, चार वर्ष तक उनकी तरह-तरह से परीक्षा लेकर उन्होंने काली मां को स्वीकार किया। 16 अगस्त, 1886 को अपनी महासमाधि के कुछ समय पूर्व मार्च, 1886 में स्वामी रामकृष्ण ने नरेन्द्र को कुछ क्षणों के लिए निर्विकल्प समाधि में भेजकर वापस बुला लिया और महासमाधि के पूर्व उन्हें अपनी शिष्य मंडली की देखभाल करने का दायित्व सौंप दिया। 
तभी से नरेन्द्र नाथ दत्त स्वामी रामकृष्ण की शिष्य मंडली को एक मठ में संगठित करने और उनके बौद्धिक आध्यात्मिक विकास की साधना में जुट गये। जनवरी, 1887 में विराज होम करके सब गुरू भाईयों ने संन्यास का व्रत लेकर संन्यासी नाम धारण कर लिये और वे सभी परिव्राजक बनकर भारत की यात्रा पर अलग-अलग दिशाओं में निकल पड़े। इसी क्रम में नरेन्द्र ने पहले सच्चिदानंद और फिर विविदिशानन्द  नाम धारण कर पूरे भारत का भ्रमण किया, जगह-जगह शिष्य मंडली खड़ी की। दिसंबर, 1992 में कन्याकुमारी में समुद्र की शिला पर बैठकर भारत माता का संदेश सुना, मद्रास के शिष्यों के आग्रह पर अमरीका यात्रा का निश्चय किया और खेतड़ी नरेश अजीत सिंह की प्रार्थना पर विवेकानन्द नाम धारण कर उनकी आर्थिक सहायता से 31 मई, 1893 को बम्बई बंदरगाह से चीन, हांगकांग और जापान होते हुए पूर्वी मार्ग से अमरीका पहुंच गये। सितम्बर, 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन के पूर्व उनके गुरु भाईयों एवं छोटी-सी शिष्य मंडली के बाहर मुट्ठीभर लोग भी उनका नाम नहीं जानते थे। विवेकानंद ने स्वयं पदे-पदे स्वीकार किया है कि यदि नियति ने उन्हें अमरीका नहीं भेजा होता तो वे अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस का कार्य कदापि पूरा नहीं कर पाते।
मैं यंत्र मात्र!:
3 मार्च, 1890 को वाराणसी के एक बड़े विद्वान श्री प्रमदा दास मित्र को लिखा, "मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि रामकृष्ण के बराबर दूसरा कोई नहीं है। वैसी अपूर्व सिद्धि, वैसी अपूर्व अकारण दया, जन्म-मरण से जकड़े हुए जीव के लिए वैसी प्रगाढ़ सहानुभूति इस संसार में और कहां?...इस अद्भुत महापुरुष, अवतार या जो कुछ भी समझिये, ने अपने अन्तर्यामित्व गुण से मेरी सारी वेदनाओं को जानकर स्वयं आग्रहपूर्वक बुलाकर उन सबका निराकरण किया।" उसी वर्ष 26 मई को प्रमदा बाबू को वे लिखते हैं, "मैं श्री रामकृष्ण के चरणों में आत्मसमर्पण करके उनका गुलाम हो गया हूं। मैं उनकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता...मेरे लिए उनकी आज्ञा थी कि उनके द्वारा स्थापित त्यागी मंडली की मैं सेवा करूं। इस कार्य में मुझे निरन्तर लगे रहना होगा, चाहे जो हो-स्वर्ग, नरक, मुक्ति या और कुछ-सब मुझे स्वीकार करना होगा। उनका आदेश था कि उनकी सब त्यागी मंडली एकत्रित हो और उसका भार मुझे सौंपा गया था। अतएव उनकी आज्ञा के अनुसार उनकी संन्यासी मंडली वराहनगर के एक जीर्ण-शीर्ण मकान में एकत्रित हुई है...यदि आप कहें कि "आप संन्यासी हैं, आपको ये सब वासनायें क्यों?"- तो मैं कहूंगा कि मैं श्रीरामकृष्ण का सेवक हूं और उनके नाम को उनके जन्म और साधना की भूमि में चिर प्रतिष्ठित रखने के लिए और उनके शिष्यों को उनके आदर्श की रक्षा में सहायता पहुंचाने के लिए मुझे चोरी और डकैती भी करना पड़े तो उसके लिए भी मैं तैयार हूं। कितने दु:ख की बात है कि जिन महापुरुष के जन्म से हमारी बंग जाति एवं बंग भूमि पवित्र हुई है, पृथ्वी पर जिनका जन्म हम भारतवासियों को पश्चिमी सभ्यता की चमक-दमक से बचाने के लिए हुआ, इसीलिए जिन्होंने अपनी त्यागी मंडली में अधिकांश विश्वविद्यालयों के छात्रों को लिया, उनका इस बंग देश में, उनकी साधना भूमि के सन्निकट कोई स्मरण चिन्ह स्थापित न हो सका।"
अमरीका पहुंचने के बाद 29 जनवरी, 1894 को शिकागो से एक पूर्व दीवान श्री हरिदास बिहारीदास देसाई को स्वामी जी लिखते हैं, "यदि मैं संसार त्याग न करता तो जिस महान आदर्श का मेरे गुरुदेव श्री रामकृष्ण परमहंस उपदेश करने आये थे, उसका प्रकाश न होता और वे नवयुवक कहां होते जो आजकल के भौतिकतावाद और भोग विलास की उत्ताल तरंगों को दीवार बनकर रोक रहे हैं? उन्होंने भारत का बहुत कल्याण किया है, विशेषत: बंगाल का। अभी तो काम आरंभ हुआ है, परमात्मा की कृपा से ये लोग ऐसा काम करेंगे जिससे जगत युग-युग तक इन्हें आशीर्वाद देगा।..दर्शन, विज्ञान या अन्य किसी भी विधा की थोड़ी भी सहायता न लेकर इस महापुरुष ने विश्व इतिहास में पहली बार इस सत्य की घोषणा की कि सभी धर्म मार्ग सत्य हैं।" अंग्रेजी शिक्षा के अभिमान में डूबे लोगों को फटकारते हुए स्वामी जी ने कहा, "ऐ पढ़े लिखे मूर्खो! अपनी बुद्धि पर वृथा गर्व न करो। कभी मैं भी करता था, किन्तु विधाता ने मुझे ऐसे व्यक्ति के चरणों में अपना जीवन मंत्र पाने को बाध्य किया जो निरक्षर महाचार्य, घोर मूर्तिपूजक और दीखने में पागल जैसा था।"
स्वामी विवेकानंद अपनी युवावस्था में अत्यधिक तर्कवादी थे। उन्हें अपनी तर्कशक्ति पर बहुत अभिमान था। इसलिए वे स्वयं को नास्तिक कहने लग गये थे। ऐसे तर्कवादी, नास्तिक व्यक्ति ने रामकृष्ण परमहंस जैसे अशिक्षित, घोर मूर्तिपूजक और कोरे तर्कवाद से विपरीत मत रखने वाले व्यक्ति को अपना गुरु ही नहीं , अवतार वरिष्ठ क्यों माना? क्यों अपनी पूर्ण श्रद्धा और कर्तृत्व समर्पित करके उनका उपकरण बनने में ही अपने जीवन को सार्थक माना? श्री रामकृष्णदेव के प्रति स्वामी विवेकानन्द की आंतरिक भावनाओं की जानकारी हमें उनके सार्वजनिक भाषणों एवं चर्चाओं से अधिक उनके व्यक्तिगत पत्राचार में मिलती है।
स्वामी जी अपने गुरुभाईयों, शिष्यों एवं प्रशंसकों के नाम अपने पत्रों में श्री रामकृष्णदेव की अवतारी भूमिका का प्रतिपादन करते हैं, साथ ही यह आग्रह भी करते हैं कि अपने मन में उन्हें अवतार स्वीकार करते हुए भी उनके चारों ओर कर्मकांडी पूजा का आडम्बर न खड़ा करें और अन्यों पर उनके अवतारवाद को थोपने का दुराग्रह भी न करें।
शिकागो के धर्म सम्मेलन के बाद स्वामी जी को अमरीका में मिली अपार लोकप्रियता से घबराकर ईसाई मिशनरियों ने उनके विरोध में कुप्रचार प्रारंभ किया तो स्वामी जी ने अपने गुरुभाई स्वामी ब्रह्मानंद को 19 मार्च, 1894 को पत्र लिखा कि "जब तक गुरुदेव मेरे साथ हैं तब तक ईसाई लोग मेरा क्या कर सकते हैं। यदि मेरे उद्देश्य की सफलता के लिए तुममें से कोई मेरी सहायता करे तो उत्तम ही है, नहीं तो श्री गुरुदेव मुझे पथ दिखाएंगे ही। अमरीका में सामान्यतया लिखित भाषण देने का प्रचलन है, पर स्वामी जी को यह आदत नहीं थी। स्वामी ब्रह्मानन्द को वे लिखते हैं, "व्याख्यान आदि लिखकर नहीं देता। एक व्याख्यान पढ़ा था, वही तुमने छपाया है। बाकी सब जगह खड़ा हुआ और कह चला। स्वयंस्फूर्त भाषण। गुरुदेव मेरे पीछे हैं। कागज- पत्र के साथ कोई संबंध नहीं है। एक बार डेट्रियाट में तीन घंटे लगातार व्याख्यान दिया। कभी-कभी मुझे भी आश्चर्य होता है कि अच्छा बेटा। तेरे पेट में भी इतनी विद्या थी।" अन्यत्र स्वामी जी ने स्वीकार किया कि उनके मुख से श्री रामकृष्ण और मां बोलती हैं। 
श्री रामकृष्ण  ईश्वर के अवतार थे : स्वामी ब्रह्मानंद को उपरोक्त पत्र में स्वामी जी ने भारत में अपनी कार्य योजना की एक रूपरेखा भी प्रस्तुत की। साथ ही निर्देश दिया कि यह पत्र प्रकाशित न करना, "मैं अनुभव कर रहा हूं कि कोई मेरा हाथ पकड़कर लिखवा रहा है, जो-जो मेरा यह पत्र पढ़ेंगे उन सबमें मेरा भाव भर जाएगा, विश्वास करें।" श्रीरामकृष्ण के प्रति अपने समर्पण का पुनरुच्चार करते हुए उन्होंने उसी पत्र में लिखा है, "लोग उनका नाम लें या न लें इसकी मुझे जरा भी परवाह नहीं। केवल उनके उपदेश, जीवन और शिक्षाएं जिस उपाय से संसार में प्रचारित हों, उसी के लिए प्राणों का होम करके भी प्रयत्न करता रहूंगा।"
एक अन्य गुरुभाई शिवानन्द को 1894 में अमरीका से वे लिखते हैं, "मेरे प्यारे भाई। श्रीरामकृष्ण ईश्वर के अवतार थे, इसमें मुझे तनिक भी संदेह नहीं है। परंतु वे कहते थे-लोगों को स्वयं देखने दो। जबरदस्ती क्या कोई किसी को दिखा सकता है। मेरी आपत्ति भी यही है। लोगों को अपना मन बनाने दो। हमें इसमें आपत्ति क्यों हो? ... श्री रामकृष्ण देव का अध्ययन किये बिना वेद-वेदांत भागवत और अन्य पुराणों का महत्व समझना असंभव है। श्री रामकृष्ण का जीवन भारत की समूची आध्यात्मिक विचारधारा को आलोकित करने वाला, असीम शक्ति वाला प्रकाश स्तंभ है। वेदों और उनके वास्तविक उद्देश्य के वे जीवित भाष्य हैं। अपने एक जीवन में ही उन्होंने भारत की राष्ट्रीय चिंतन धारा के अनेक कल्पों को जीकर दिखा दिया। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था या नहीं, यह मुझे मालूम नहीं है। पर श्रीरामकृष्ण, जिन्हें हमने देखा है और जो पूर्णतम हैं, ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, उदारता और लोकहितैषी भावना आदि सब गुणों के मूत्र्त रूप हैं। उनका एक शब्द भी मेरे लिए वेद-वेदांत से अधिक मूल्यवान है। वे अपने जीवन में ही पूजे गये, उसी उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में। विश्वविद्यालय के असाधारण योग्यता रखने वाले विद्वानों ने भी उन्हें ईश्वर का अवतार माना।"
[मेरे प्यारे भाई, श्री रामकृष्ण परमहंस ईश्वर के अवतार थे, इसमें मुझे तनिक भी संदेह नहीं है। परंतु उनकी शिक्षाओं की सत्यता लोगों को स्वयं देखने दो- ये चीजें तुम उन पर थोप नहीं सकते। लोगों को अपना मत प्रकट करने दो। हम इसमें क्यों आपत्ति करें? श्री रामकृष्ण का अध्ययन किए बिना वेद-वेदांत, भागवत और अन्य पुराणों का महत्व समझना असंभव है। उनका जीवन भारतीय धार्मिक विचार-समूह के लिए एक अनंत शक्तिसंपन्न सर्चलाइट है। वेदों के और उनके ध्येय के वे जीवित भाष्य हैं। भारत के जातीय धार्मिक जीवन का एक समग्र कल्प उन्होंने एक जीवन में पूरा कर दिया था। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कभी हुआ था या नहीं, यह मुझे नहीं मालूम, और बुद्ध, चैतन्य आदि अवतार एकदेशीय हैं; पर श्री रामकृष्ण परमहंस सबकी अपेक्षा आधुनिक और सबसे पूर्ण हैं- ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, उदारता और लोकहित के मूर्तिमान स्वरूप हैं। किसी दूसरे के साथ क्या उनकी तुलना हो सकती है? जो उनके गुणों का आदर नहीं कर सकता, उसका जीवन व्यर्थ है। मैं परम भाग्यशाली हूं कि मैं जन्म-जन्मांतर से उनका दास रहा हूं। उनका एक शब्द भी मेरे लिए वेद-वेदांत से अधिक मूल्यवान है। ‘तस्य दासदासदासोहम’- अरे, मैं तो उनके दासों के दासों का दास हूं। किंतु क्षुद्र संकीर्णता उनके सिद्धांतों के विरुद्ध है, उसी से मुझे दुख होता है। उनका नाम चाहे विस्मरण हो जाए, परंतु उनकी शिक्षा फलप्रद हो! नहीं तो, क्या वे नाम के दास थे?
अपने एक मद्रासी शिष्य "किडी" को शिकागो से 3 मार्च, 1894 को वे लिखते हैं, "श्री रामकृष्ण का जीवन ज्ञान और भक्ति मार्ग का समन्वय पूर्ण था। ऐसे महापुरुष जगत में बहुत कम आते हैं। हम उनके जीवन और उपदेशों को आदर्श के रूप में सामने रखकर आगे बढ़ सकते हैं। श्री रामकृष्ण के जैसा पूर्ण चरित्र कभी किसी महापुरुष का नहीं हुआ। इसलिए हमें चाहिए कि हम उन्हीं को केन्द्र बनाकर उन पर डटे रहें। हर एक व्यक्ति उनको अपने-अपने ढंग से ग्रहण करे। इसमें कोई रुकावट नहीं डालनी चाहिए। चाहे कोई उन्हें ईश्वर माने या परित्राता या आचार्य अथवा महापुरुष। जो जैसा चाहे वह उन्हें उसी तरह समझे। तुम्हारा एकमात्र उद्देश्य होगा- उनकी शिक्षाओं को जगत में फैलाना और वह जीवनी उसके ही उदाहरण प्रस्तुत करेगी। अयोग्य होने पर भी मेरे ऊपर एक विशेष दायित्व था कि उन्होंने जो रत्न की पेटी मुझे सौंपी थी, उसे मद्रास लाकर तुम्हारे हाथों में दे दूं। वह हो गया, अब मुझे छोड़ दो, मुझे भूल जाओ,केवल श्रीरामकृष्ण का प्रचार करो, उनके उपदेशों और जीवन को जन-जन तक पहुंचाओ।"
मुझसे कुछ आशा मत करना, किंतु जैसा कि मैं तुमको पहले ही लिख चुका हूं और तुमसे पहले ही कह चुका हूं कि मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि स्वयं भारतीयों द्वारा ही भारत की उन्नति होगी। इसलिए कहता हूं कि हे स्वदेशवासी युवकों, क्या तुममें से कुछ लोग भी इस नये आदर्श के कट्टर अनुयायी बन सकते हो? अनुशीलन करो, सामग्री इकट्ठा कर श्री रामकृष्ण की एक छोटी-सी जीवनी लिखो। सचेत रहना कि उसमें कोई सिद्धाई की चर्चा न घुसने पाए अर्थात् वह जीवनी इस ढंग से लिखी जाए कि वह उनके उपदेशों का एक उदाहरण बन जाए। केवल उनकी ही बातें उसमें रहें। खबरदार, मुझको या किसी और जीवित व्यक्ति को उसमें मत लाना। तुम्हारा मुख्य उद्देश्य होगा उनकी शिक्षाओं को जगत में फैलाना। वह जीवनी उसी का उदाहरण होगी।
मद्रासी शिष्यमंडली के एक अन्य सदस्य डा.नान्जुदाराव को 30 नवम्बर को अमरीका से वे लिखते हैं, "श्रीरामकृष्ण के चरणों में बैठकर ही भारत का उत्थान हो सकता है। उनकी जीवनी एवं उनकी शिक्षाओं को चारों ओर फैलाना होगा-हिन्दू समाज के अंग-अंग और रोम-रोम में उन्हें भरना होगा? यह कौन करेगा? है कोई जो श्रीरामकृष्ण की पताका हाथ में लेकर संसार की मुक्ति के लिए विचरण करे?" 
उसी दिन एक अन्य मद्रासी शिष्य आलासिंगा को चेतावनी देते हैं कि, "आध्यात्मिक क्षेत्र में हमारा प्रयत्न होना चाहिए कि सम्प्रदाय न बनने पाएं। श्रीरामकृष्ण का जीवन एक असाधारण ज्योतिर्मय दीपक है, जिसके प्रकाश से हिन्दू धर्म के विभिन्न अंग और अर्थ समझ में आ सकते हैं। शास्त्रों में जो ज्ञान सिद्धांत रूप में वर्णित हैं उसका वे प्रत्यक्ष उदाहरण रूप थे। ऋषि और अवतार हमें जो वास्तविक शिक्षा देना चाहते थे, उसे उन्होंने अपने जीवन द्वारा दिखा दिया है। शास्त्र यदि शब्द मंत्र है तो श्रीरामकृष्ण उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति। 
उन्होंने 51 वर्ष में पांच हजार वर्ष का आध्यात्मिक जीवन जीकर दिखाया और इस प्रकार वे भावी पीढ़ियों के लिए स्वयं को जीवंत उदाहरण बना गये।"
जूनागढ़ के पूर्व दीवान श्री हरिदास बिहारीदास देसाई को नवम्बर, 1894 में शिकागो से स्वामी जी लिखते हैं, "मुझे श्री रामकृष्ण के आशीर्वाद से वह अन्तर्दृष्टि प्राप्त हुई है जिसे लेकर मैं अपनी छोटी-सी मंडली के साथ काम करने का प्रयत्न कर रहा हूं। वे तो मेरे समान निर्धन भिक्षुक हैं। आपने उन्हें देखा है। दैवीय कार्य सदैव गरीब व दीन मनुष्यों के द्वारा ही हुआ है।" अपने गुरुभाई स्वामी रामकृष्णानन्द को अमरीका से 1895 में वे लिखते हैं, "जब तक मैं पृथ्वी पर हूं श्री रामकृष्ण मेरे द्वारा काम कर रहे हैं। जब तक तुम इस पर विश्वास रखते हो, तुम्हें किसी प्रकार का भय नहीं हो सकता। रामकृष्ण अवतार में "स्त्री गुरू" को स्वीकार किया गया है। वे कभी-कभी स्त्रियों जैसे वस्त्र भी पहनते थे। मेरा पहला प्रयत्न स्त्रियों का मठ स्थापित करना है। इस मठ से गार्गी और मैत्रेयी और उनसे भी अधिक योग्यता रखने वाली स्त्रियों की उत्पत्ति होगी।"
आगे लिखते हैं "वेद वेदांत तथा अन्य अवतारों ने जो भूतकाल में किया, श्रीरामकृष्ण ने उसकी साधना एक ही जन्म में कर डाली। उनके जन्म की तिथि से ही सत्ययुग आरंभ हुआ है।...इसलिए सब प्रकार के भेदों का अंत अवश्यंभावी है-पुरुष और स्त्री, धनी और गरीब, शिक्षित और अशिक्षित, ब्राह्मण और चण्डाल, इन सब भेद भावों को मूल से नष्ट करने के लिए ही उनका जन्म हुआ था। वे शांति के दूत थे। कभी-कभी उनकी भविष्य दृष्टि चमत्कारिक लगती है।" 
मैं रामकृष्ण का दास : 
9 जुलाई, 1897 को अल्मोड़ा से अमरीका की कुमारी मेरी हेल को वे लिखते हैं, "मैं जानता हूं कि मेरा कार्य समाप्त हो चुका है। अधिक से अधिक तीन या चार वर्ष आयु के और बचे हैं।" वे एक क्षण के लिए भी नहीं भूले कि, "मैं रामकृष्ण देव का दास हूं। मैं एक साधारण-सा यंत्र मात्र हूं।"
जीवन के अंतिम दिनों में 28 मार्च, 1900 को सेन फ्रांसिस्को की भगिनी निवेदिता को अपने कार्य की समाप्ति की सूचना देते हुए स्वामी जी कहते हैं, "मैं श्री रामकृष्ण देव का दास हूं। मैं एक साधारण यंत्र मात्र हूं। और मैं कुछ नहीं जानता, जानने की मेरी कोई इच्छा भी नहीं है।" उन्हीं दिनों श्रीमती ओलिबुल को लिखते हैं, "आप ही मेरी एक मित्र हैं जिन्होंने श्री रामकृष्ण देव को अपने जीवन में ध्रुवतारे की तरह ग्रहण किया है। मैं जो आपका इतना अधिक विश्वास करता हूं, "उसका मूल रहस्य यही है। अन्य लोग मुझे व्यक्तिगत रूप से चाहते हैं। किंतु वे यह बिल्कुल नहीं जानते कि श्री रामकृष्ण के लिए ही वे मुझे चाहते हैं। उन्हें छोड़ देने पर तो मैं कुछेक निरर्थक और स्वार्थी भावनाओं का बोझ मात्र हूं।" 
 18 अप्रैल 1900 को कैलीफोर्निया से वे अपनी शिष्या जोसेफाईन मैकलाऊड  को लिखते हैं, "मैंने अपनी गठरी बना ली है और महामुक्तिदाता की बाट जोह रहा हूं।...मैं वही बालक हूं जो निमग्न और विस्मृत भाव से दक्षिणेश्वर में पंचवटी के नीचे बैठकर श्री रामकृष्ण के अद्भुत वचनों को सुनता था। यही मेरा सच्चा स्वभाव है। अब मैं फिर उनकी मधुरवाणी को सुन रहा हूं, वही चिर-परिचित कंठस्वर जो मेरे अंत:करण को रोमांचित कर देता था। बंधन टूट रहे हैं, प्रेम का दीपक बुझ रहा है, कर्म रसहीन हो रहा है। जीवन के प्रति आकर्षण भी मन से दूर हो गया है। अब केवल प्रभु की गंभीर मधुर आवाज सुनाई दे रही है। "मैं आया। प्रभु मैं आया, वे कह रहे हैं, "मृत को स्वयं ही दफनाने दो और तुम मेरे पीछे चले आओ। "मैं आता हूं, मेरे प्राण वल्लभ। मैं आता हूं..." "वह पहला मनुष्य चला गया, सदा के लिए चला गया और कभी वापस नहीं आएगा। शिक्षा दाता, गुरू, नेता, आचार्य विवेकानंद चला गया है, केवल वही बालक, प्रभु का चिर शिष्य, चिर पदाश्रित दास।" अगस्त, 1900 में अपने गुरुभाई स्वामी तुरीयानंद को लिखते हैं, "मेरा शरीर एवं मन मग्न हो चुके हैं, विश्राम की आवश्यकता है..मेरा कार्य मैं समाप्त कर चुका हूं। बस गुरु महाराज का मैं ऋणी था। प्राणों की बाजी लगाकर मैंने उस ऋण को चुकाया है।"       
श्री रामकृष्ण परमहंस के उपदेश: 
"जावत बाँची, तावत सीखी"  अर्थात  जब  तक  मैं  जीवित  हूँ , तब  तक  मैं  सीखता  हूँ !  वह  व्यक्ति  या  वह  समाज  जिसके  पास  सीखने  को  कुछ  नहीं  है  वह  पहले  से  ही  मौत  के  जबड़े  में  है। 
जो हीन बुद्धि हैं, वे ही सिद्धाई चाहते हैं। बीमारी को अच्छा करना, मुकदमा जिता देना, जल के ऊपर से चलना-ये सब (सिद्धाई हैं)। जो भगवान् के भक्त हैं, वे ईश्वर के पादपद्मों को छोड़ कर और कुछ भी नहीं चाहते हैं। जिनकी थोड़ी बहुत सिद्धाई हो, उनकी प्रतिष्ठा-लोकमान्य होती है।
व्याकुल होकर भगवान् से प्रार्थना करो। विवेक के लिए प्रार्थना करो। ईश्वर ही नित्य है, और सब अनित्य है, इसी का नाम विवेक है। जल-छादन (जल छानने के महीन कपड़े) से जल छान लेना होता है। मेला-कूड़ा कर्कट एक तरफ रहता है, और अच्छा जल दूसरे तरफ पड़ता है। तुम उनको (ईश्वर को) जान कर संसार को छोड़ो इसी का नाम विद्या का संसार है।
नाना मत हैं। ‘जतो मत ततो पथ’ अर्थात् जितने मत हैं उतने ही पन्थ हैं। किन्तु सभी मानते हैं कि-‘मेरा मत ही ठीक है - मेरी ही घड़ी ठीक चल रही है।’
सत्य कथा - सत्य बोलना कलि की तपस्या है। कलियुग में अन्य तपस्या कठिन है। सत्य मार्ग पर रहने से भगवान् पाया जाता है।
अवतार या अवतार के अंश को ईश्वर-कोटि कहते हैं, और साधारण लोगों का जीवन या जीव-कोटि। जो जीव कोटी के हैं, वे साधनाएं कर ईश्वर का लाभ कर सकते हैं। वे (निर्विकल्प) समाधि से फिर लौटते नहीं हैं।जो ईश्वर कोटी हैं, वे मानो राजा के बेटे हैं, और मानों सात मंजिल वाले मकान की चाबी उनके हाथ में है। वे सातों मंजिलों तक चढ़ जाते हैं, फिर इच्छानुसार उतर भी आ सकते हैं। जीव कोटी मानो छोटे कर्मचारी (नौकर) हैं वे सात मंजिल के कुछ दूर तक पहुँच सकते हैं।
जनक ज्ञानी थे। साधनाएं कर उन्होंने ज्ञान लाभ किया था। शुकदेव थे ज्ञान की मूर्ति। शुकदेव का साधनाएं कर ज्ञान लाभ करना नहीं हुआ था। नारद में भी शुकदेव के जैसा ब्रह्मज्ञान था। किन्तु वह भक्ति लेकर था। लोकशिक्षा के लिए प्रहलाद कभी ‘सोऽहं’ भाव में रहते, फिर कभी दास भाव में और कभी सन्तान भाव में रहते थे। हनुमान की भी वैसी अवस्था थी।
भगवान् को लाभ करना हो तो संसार से तीव्र-वैराग्य चाहिये। जो कुछ ईश्वर के मार्ग के विरोधी मालूम हो, उसे तत्क्षण त्यागना चाहिये। पीछे होगा यह सोच कर छोड़ रखना ठीक नहीं है। काम-काँचन ईश्वर-मार्ग के विरोधी हैं। उनसे मन हटा लेना चाहिये। भगवान् को लाभ करना हो तो संसार से तीव्र-वैराग्य चाहिये। जो कुछ ईश्वर के मार्ग के विरोधी मालूम हो, उसे तत्क्षण त्यागना चाहिये। पीछे होगा यह सोच कर छोड़ रखना ठीक नहीं है। कामिनी-काँचन ईश्वर-मार्ग के विरोधी हैं। उनसे मन हटा लेना चाहिये।
प्रवृत्तिमार्ग की नश्वरता को भोग कर -मनु महाराज का यह सूत्र -'निवृत्ति अस्तु महाफला !' यह समझ लेने के बाद कि इसमें कुछ नहीं रखा; दीर्घसूत्री होने से, या बाद में कामिनी -कांचन से अपना मन हटा लूंगा, ऐसा सोचते रहने से परमार्थ का लाभ नहीं होगा। कोई व्यक्ति एक अंगोछा लेकर स्नान करने को जा रहा था। उसकी औरत ने उससे कहा कि- तुम किसी भी काम के नहीं हो, उम्र बढ़ रही है, अब भी यह सब (व्यवहार) छोड़ नहीं सके। मुझको छोड़कर तुम एक दिन भी नहीं रह सकते। किन्तु देखो, वह रामदेव कैसा त्यागी है। पति ने कहा-क्यों उसने क्या किया? औरत ने कहा-उसकी सोलह औरतें हैं। वह एक-एक करके उनको त्याग रहा है। पर तुम कभी त्याग कर नहीं सकोगे। तब उसने अपनी औरत से मुस्कुरा कर कहा - पगली, तू नहीं समझती है जो सचमुच त्याग करता है वह क्या थोड़ा-थोड़ा करके त्याग करता है? त्याग करना उसका काम नहीं है। अर्थात् उसके कहने से त्याग नहीं होगा, मैं ही त्याग कर सकूँगा। शास्त्रों में कहा है- 'अलं मोहेन, वानप्रस्थी भव.! ' ( मोह मत कर, वानप्रस्थ धारण कर..!)  यह देख, मैं चल देता हूँ।’ इसी का नाम तीव्र वैराग्य है। उस आदमी को ज्यों वैराग्य आ गया त्यों−ही उसने त्याग किया। अंगोछा कन्धे में ही रहा कि वह चल दिया। वह संसार का कुछ ठीक-ठाक नहीं कर पाया। घर की ओर एक बार पीछे लौट कर देखा भी नहीं। जो त्याग करेगा उसको प्रबल इच्छाशक्ति या दृढ़ मनोबल चाहिए। लुटेरों का भाव ! लूटने से पहले जैसे डाकू लोग कहते हैं, ऐ मारो ! लूटो ! काटो ! अर्थात् पीछे क्या होगा, इसका ख्याल न कर खूब मनोबल के साथ आगे बढ़ना चाहिये।
तुम और क्या करोगे? उनके (ईश्वर के) प्रति भक्ति और प्रेम लाभ कर दिन बिताना है। श्रीकृष्ण के अदर्शन से यशोदा पगली जैसी बनकर श्रीमती (राधा) के पास गई। श्रीमती ने उनका शोक देखकर आद्या शक्ति के रूप से उनको दर्शन दिया और उनसे कहा-तुम वर माँगो ! यशोदा ने कहा - ‘माँ’ वर फिर क्या लूँ? तो इतना ही कहा कि-मैं तन, मन, वचन से कृष्ण की ही सेवा कर सकूँ, इन्हीं आँखों से उनके भक्तों का दर्शन हो। जहाँ-जहाँ उनकी लीलाएं हों इन पैरों से वहीं जा सकूँ। इन हाथों से उनके ही प्रेमी भक्तों की सेवा करूं। सब इन्द्रियाँ उन्हीं के दर्शन श्रवणादि में लगें।
इधर का (ईश्वरीय) आनन्द नहीं मिलने से उसको (वैषयिक) आनन्द अच्छा लगता है। ईश्वरी आनन्द लाभ करने से संसार का सुख बिना नमक का (शाक जैसा) निःरस भान होता है। शाल मिलने से फिर वनात अच्छा नहीं लगता है।

जो यह कहते हैं कि घर-संसार के धर्म को छोड़े बिना (प्रवृत्तिमार्ग की नश्वरता को अपने अनुभव से जान लेने के बाद भी 'कामिनी-कांचन' में आसक्ति का त्याग किये बिना) इन्द्रियभोगों में रह कर ही धर्माचरण करना ठीक है, वे यदि एक बार भगवान् का आनन्द पावें तो उनको फिर और कुछ अच्छा नहीं लगता। कर्म के लिए आसक्ति (कामिनी-कांचन में आसक्ति) कम होती जाती है। क्रमशः ज्यों-ज्यों आनन्द बढ़ता जाता है त्यों-त्यों फिर कर्म भी कर नहीं सकते हैं, वे केवल उसी आनन्द को ढूंढ़ते फिरते हैं। ईश्वरीय आनन्द के पास फिर विषयानन्द और रमणानन्द तुच्छ हो जाते हैं, एक बार स्वरूपानन्द का स्वाद तुच्छ कर उसी आनन्द के लिए व्याकुल होकर फिरते है, तब संसार गृहस्थी रहे चाहे न रहे ! उसके लिए कोई परवाह नहीं रहती है।

संसारी लोग कहते हैं कि-दोनों तरफ (काम और राम, रवि-रजनी) रहेंगे! दो आने का शराब पीने से मनुष्य दोनों ओर ठीक रहना चाहते हैं। किन्तु अधिक शराब पीने से क्या फिर दोनों तरफ नजर रखी जा सकती है? ईश्वरीय आनन्द मिलने से फिर कुछ साँसारिक कार्य अच्छा नहीं लगता है। तब कामिनी- काँचन की बातें सुनने से मानो हृदय में चोट सी लगती हैं। बाहरी बातें अच्छी नहीं लगती हैं। तब मनुष्य ईश्वर के लिए पागल होता है। रुपये पैसे कुछ भी अच्छे नहीं लगते हैं।

ईश्वर लाभ के बाद भी कोई घर-संसार में रहता है, तो वह होता है-विद्या का संसार। उसमें कामिनी-काँचन का प्रभाव नहीं रहता है, उसमें रहते हैं, केवल भक्ति, भक्त और भगवान्।
[ तिनके के समान हलका बनने से, वृक्ष के समान सहिष्णु बनने से, मान छाड़ कर दूसरों को मान देने से, इष्ट की महिमा समझने से तथा अभिमान का त्याग करने से साधना शीघ्र सफल होती है। इस प्रकार योग्यता प्राप्त करने के लिये सत्संग, धर्मग्रन्थ, और भक्त चरित्र का अभ्यास, गुरु आशा का पालन तथा माता-पिता आदि गुरुजनों की तथा भक्तों की सेवा-पूजा करना बहुत आवश्यक है।-विजयकृष्ण गोस्वामी ।
संसार में रहनेवाले साधक का आदर्श:
[https://plus.google.com/collection/guaQh/Spiritual Awakening/]
*      पतंगें लाखों में एक-दो ही कटती हैं ।  इसी तरह सैकड़ों साधक साधना करते हैं, पर उनमें से एक या दो ही भवबन्धन से मुक्त (डीहिप्नोटाइज्ड-भ्रममुक्त) हो पाते हैं ।
*      पौधों में साधारणतः पहले फूल आते हैं, बाद में फल, परन्तु लौकी, कुम्हड़े आदि की बेल में पहले फल और उसके बाद फूल होते हैं ।  इसी तरह साधारण साधकों को तो साधना करने के बाद ईश्वर लाभ होता है किन्तु जो नित्यसिद्ध होते हैं उन्हें पहले ही ईश्वर का लाभ हो जाता है, साधना पीछे से होती है ।*      'होमा'  नामक चिड़िया बहुत ऊँचे आसमान में रहती है, धरती पर कभी नहीं उतरती ।  वह आसमान में ही अण्डा देती है ।  अण्डा नीचे गिरते हुए शून्य में ही फूट जाता है ।  और उसमें से बच्चा निकलकर नीचे गिरने लगता है ।  वह समझ लेता है कि वह नीचे गिर रहा है और झट उपर की ओर अपनी माँ के पास उड़ने लगता है ।  शुकदेव, नारद, ईसा, शंकराचार्य जैसे महापुरुष होमा पक्षी की तरह होते हैं ।  बाल अवस्था में ही ये संसार के सभी बन्धनों से मुक्त हो सर्वोच्च ईश्वरीय ज्ञान के दिव्य ज्योतिर्मय राज्य में जा पहुँचते हैं ।
*      जैसे कच्चे बाँस को आसानी से झुकाया जा सकता है पर पक्का बाँस जबरदस्ती झुकाए जाने पर टूट जाता है, वैसे ही युवकों का मन सरलता से ईश्वर की ओर ले जाया जा सकता है, परन्तु बड़े-बूढ़ों के मन को उस ओर झुकाने की कोशिश करने पर वे भाग खड़े होते हैं ।
*      तोते के गले में कण्ठी निकल आने पर उसे नहीं पढ़ाया जा सकता, जब तक वह बच्चा रहता है तभी तक आसानी से पढ़ना सीखता है ।  इसी तरह मनुष्य के बूढ़ा हो जाने पर उसका मन सहज में ईश्वर में स्थिर नहीं होता, बचपन में मन थोड़े ही प्रयत्न से आसानी से स्थिर हो सकता है ।
*      पका हुआ साबूत आम भगवान् के भोग में और अन्य सभी कामों में आ सकता है; पर अगर वह कौवे के द्वारा ठुनका हुआ हो तो किसी काम में नहीं आता ।  ऐसा दागी-फल न तो देवता के भोग में चढ़ता है, न ब्राह्मण को दान दिया जा सकता है और न स्वयं के खाने के काम में लिया जा सकता है ।  इसलिए पवित्रहृदय बालकों और युवकों को धर्ममार्ग पर ले जाने का प्रयत्न किया जाना चाहिए, उन्हें भगवान् की सेवा में लगाना चाहिए, क्योंकि उनके मन में विषयवासना की कालिमा नहीं लगी होती ।  अगर मन में एक बार विषयबुद्धि प्रवेश कर जाए या विषयभोग रुपी विकट राक्षस की विकराल छाया पड़ जाए, तो फिर उसे परमार्थपथ पर ले जाना अत्यन्त दूभर हो जाता है ।
*      बालक का मन सोलहो आना अपने वश में रहता है ( उम्र बढ़ने पर धीरे-धीरे मन कई भागों में विभक्त हो जाता है । ) विवाह होते ही उसका आठ आना हिस्सा पत्नी के वश में चला जाता है, फिर सन्तान होने पर चार आना उसमें बँट जाता है ।  बचा हुआ चार आना मन माँ-बाप, मान-सम्मान, वेश-भूषा, ठाठ-बाट आदि में लगा रहता है, भगवान् में लगाने के लिए कुछ बचता ही नहीं ।  इसलिए छोटी अवस्था में ही मन को भगवान् की ओर लगाया जाए तो सहज में भगवान् की प्राप्ति हो सकती है, परन्तु उम्र बढ़ जाने के बाद यह अत्यन्त कठिन हो जाता है ।
*      लावे भूनते समय जो एक-दो लावे छिटककर तसले के बाहर जा गिरते हैं वे ही सबसे सुन्दर होते हैं, उनमें कोई दाग नहीं होता ।  और जो बाकी लावे तसले में रहते हैं, उनपर कहीं न कहीं दाग लग ही जाता है ।  साधना करते हुए जो साधक संसार का सम्पूर्ण रूप से त्यागकर बाहर चले जाते हैं वे ही पूर्ण बेदाग सिद्ध बन पाते हैं; जो संसार में रहकर सिद्ध बनते हैं उनमें कुछ न कुछ दाग रह ही जाता है ।
*      सूरज उगने से पहले दही को मथने पर जितना अच्छा मक्खन निकलता है, दिन चढ़ने पर वैसा नहीं निकलता ।  अपने अन्तरंग भक्तों को सम्बोधित करते हुए श्रीरामकृष्णदेव कहा करते,  "तुमलोग सूर्योदय से पहले निकाले गये मक्खन की तरह हो; और गृहस्थ भक्त दिन चढ़ जाने पर निकाले गये मक्खन की तरह हैं ।"
 नावरितो   दुश्चरित्रान्नाशान्तो नासमाहितः | नाशान्तमानसो  वापि   प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्  ।।  कठ. १ | २ | २४   -   जो पापकर्मों से विरत नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ शान्त नहीं हुईं हैं, जो समाहित-चित्त नहीं है, जिसका मन अशान्त है, वह पुरुष इस आत्मा को प्रज्ञा के द्वारा प्राप्त नहीं कर सकता ।
*      बद्ध जीव मगर की तरह होते हैं ।  मगर की देह पर शस्त्र द्वारा वार करने पर शस्त्र छिटककर गिर पड़ता है, मगर को कुछ नहीं होता; सिर्फ पेट पर वार करने पर ही वह मरता है ।  इसी तरह, बद्ध जीव को कितना भी उपदेश दो, कितनी भी ज्ञान-वैराग्य की बातें सुनाओ, उसके हृदय पर तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता ।  इसके लिए तो उसकी आसक्ति के विषयों पर ही प्रहार करना पड़ेगा ।
*      अगर किसी पर भूत का आवेश हो जाए तो सरसों के दाने पर मन्त्र पढ़कर उससे भूत उतारा जाता है, परन्तु जिन सरसों के दाने के द्वारा भूत उतारना है, उन्हीं के भीतर यदि भूत घुस जाए तो उनके द्वारा भला भूत कैसे उतरे !  जिस मन के द्वारा ध्यान-भजन, भगवच्चिन्तन करना है वही यदि विषय-चिन्ता में लिप्त हो, तो उसके द्वारा भला साधन-भजन कैसे सम्भव होगा ?
*गीली दिया सलाई को तुम कितना भी घिसो, वह नहीं जलती, पर सूखी दियासलाई एक बार घिसते ही तुरन्त जल जाती है ।  सच्चे भक्त का मन सूखी दियासलाई के समान होता है, थोड़ा ईश्वर का नाम सुनते ही उसमें प्रेम-भक्ति की ज्योति जल उठती है; परन्तु संसारी व्यक्ति का मन गीली दियासलाई की भाँति काम-कांचन की आसक्ति में भीगा होता है, उसे ईश्वर की महिमा कितनी भी सुनाई जाए, उसमें भगवद्भक्ति की वह्यि नहीं सुलगाई जा सकती ।
*      दूध में अगर उससे दुगना पानी मिला हुआ हो तो उसकी खीर बनाने में बहुत  समय और अत्यधिक श्रम लगता है ।  विषयी लोगों के मन में मलिन विषय-वासना और कुविचारों का अत्यधिक मिलावट होने के कारण उसे शुद्ध और पवित्र बनाने के लिए दीर्घ समय तक कठिन परिश्रम करना पड़ता है।
*      प्रश्न  -  संसारी जीव सब कुछ त्यागकर भगवान् को क्यों नहीं भज सकता है  ?  उत्तर  -  क्या कोई नट रंगमंच पर उतरते ही अपना मुखौटा उतार देता है ?  संसारियों को पहले नाटक में अपना काम पूरा कर लेने दो, उसके बाद ठीक समय पर वे अपना बनावटी साज उतारेंगे ।
  * संसारी व्यक्ति में ज्ञानी पुरुषों के समान ज्ञान और बुद्धि हो सकती है, वह योगियों की तरह कष्ट-क्लेश सह सकता है, और तपस्वियों की भाँति त्याग कर सकता है; परन्तु उसके ये सारे श्रम व्यर्थ ही होते हैं, क्योंकि उसकी सारी शक्तियाँ गलत दिशा में प्रवाहित होती है, वह अपनी सारी शक्ति नाम-यश और धन कमाने में ही लगाता है  -  भगवान् के लिए नहीं ।
*  यदि तुम पूछो कि संसाराश्रम (प्रवृत्तिमार्ग) के ज्ञानी और सन्यासाश्रम (निवृत्तिमार्ग) के ज्ञानी में कोई अन्तर है या नहीं, तो मैं यही कहूँगा कि दोनों एक ही हैं  -  दोनों में एक ही ज्ञान विद्यमान है ।  केवल बात इतनी है कि संसार में रहनेवाले ज्ञानी के लिए थोड़ा भय रहता है ।  कामिनी और कांचन के भीतर रहने से कुछ न कुछ पतन का भय रहता ही है ।  तुम कितने भी बुद्धिमान होओ, कितने भी सावधान रहो, पर काजल की कोठरी में रहने से तुम्हारे शरीर पर थोड़ा सा काला दाग लग ही जाएगा। 
 * जब भगवान् ने ही तुम्हें संसार में रखा है तो तुम क्या करोगे ?  उनकी शरण लो,  उन्हें सब कुछ सौंप दो,  उनके चरणों में आत्मसमर्पण करो,  ऐसा करने से फिर कोई कष्ट नहीं रह जाएगा ।  तब तुम देखोगे कि सब कुछ उन्हीं की इच्छा से हो रहा है ।
* नाव पानी  में रहे तो हर्ज नहीं, पर नाव के अन्दर पानी न रहे, वरना नाव डूब जाएगी । साधक संसार में रहे तो कोई हर्ज नहीं, परन्तु साधक के भीतर संसार न रहे। 
* तुम संसार में रह कर गृहस्थी चला रहे हो इसमें हानि नहीं; परन्तु तुम्हें अपना मन ईश्वर की ओर रखना चाहिए ।  एक हाथ से कर्म करो, और दूसरे हाथो से भगवान् के चरणों को पकड़े रहो ।  जब संसार के कर्मों का अन्त हो जाएगा तब दोनों हाथों से ईश्वर के चरणों को पकड़ना।
*      एक गृहस्थ भक्त  -  महाराज !  क्या मुझे ज्यादा पैसा पाने के लिए कोशिश करनी चाहिए? श्रीरामकृष्ण  -  हाँ,  यदि तुम विवेक-विचार के साथ संसारधर्म का पालन करो तो ऐसे संसार के लिए आवश्यक धन कमा सकते हो,  पर ख्याल रहे कि तुम्हारी कमाई ईमानदारी की हो, क्योंकि तुम्हारा उद्देश्य धन कमाना नहीं है, ईश्वर की सेवा करना ही तुम्हारा उद्देश्य है; ईश्वर की सेवा करने के लिए धन कमाने में कोई दोष नहीं ।
 * संसार में धन की जरूरत है तो सही,  परन्तु उसके लिए ज्यादा सोचना नहीं ।  यदृच्छालाभसन्तुष्ट रहना  -  अपने आप जो मिल जाए उसी में सन्तोष करना  -  सबसे अच्छा भाव है ।  संचय के लिए ज्यादा सोच मत करो ।  जिन्होंने अपना मन-प्राण प्रभु को सौंप दिया है, जो उनके भक्त हैं,  शरणागत हैं, वे लोग सब इतना नहीं सोचा करते ।  उनके पास जैसी आय, वैसा ही व्यय ।  रूपया एक ओर से आता है, दूसरी ओर से खर्च हो जाता है ।
*      श्रीरामकृष्ण ( गृहस्थ भक्तों के प्रति  ) -  "तुम्हें रूपये की ओर इस दृष्टि से देखना चाहिए कि उससे दाल-रोटी मिलती है,  पहनने के लिए कपड़ा और रहने के लिए मकान मिलता है,  ठाकुरजी की पूजा और साधु-भक्तों की सेवा होती है ।  परन्तु धनसंचय करना व्यर्थ है ।  मधुमक्खियाँ कितनी मेहनत से छत्ता तैयार करती हैं, पर कोई दूसरा आदमी आकर उसे तोड़ ले जाता है ।  स्त्री का पूरी तरह त्याग तुमलोगों के लिए नहीं है ।  परन्तु लड़के-बच्चे हो जाने पर पति-पत्नी को भाई-बहन की तरह रहना चाहिए ।
* तान्त्रिक शवसाधना में साधक को शव की छाती पर बैठकर साधना करनी होती है ।  उक्त शवसाधना करने पर साधक को पास ही में चना-चबैना और मदिरा लेकर बैठना पड़ता है। साधना के समय बीच में यदि शव जागकर मुँह फाड़े तो उस समय उसके मुँह में कुछ चना और मदिरा देना पड़ता है ।  ऐसा करने से वह फिर स्थिर हो जाता है, अन्यथा वह साधक को डराकर साधना में विघ्न उत्पन्न करता है ।  इसी तरह तुम्हें संसार में रहकर साधना करनी हो तो पहले संसार की जरूरी माँगों की पूर्ति कर लो, अन्यथा संसाररूपी शव तुम्हारी साधना में विघ्न डालेगा ।
*  कामिनी-कांचन का पूर्ण त्याग संन्यासी के लिए है । संन्यासी को स्त्रियों का चित्र तक नहीं देखना चाहिए ।  अचार या इमली की याद आते ही मुँह में पानी आ जाता है, देखने और छूने की तो बात ही क्या !  पर तुम जैसे गृहस्थों के लिए इतना कठिन नियम नहीं है, यह केवल संन्यासियों के लिए है ।  तुम ईश्वर की ओर मन रखकर, अनासक्त भाव से स्त्री के साथ रह सकते हो ।  पर मन को ईश्वर में लगाने और अनासक्त बनाने के लिए बीच-बीच में निर्जन वास करना चाहिए ऐसे निर्जन स्थान में जाकर तीन दिन, या यदि सम्भव न हो तो एक ही दिन अकेले रहते हुए व्याकुल होकर ईश्वर को पुकारना चाहिए । 
 * एक या दो सन्तान हो जाने के बाद पति-पत्नी को भाई-बहन की तरह रहते हुए सतत् भगवान् से प्रार्थना करनी चाहिए कि  'हे प्रभो, हमें शक्ति दो ताकि हम संयम और पवित्रतापूर्ण जीवन बिता सकें ।'  संसार में रहो पर संसारी मत बनो ।  जैसी कि कहावत है,  'साँप के मुँह में मेढ़क को नचाओ, पर साँप उसे निगल न पाए ।'
   *निर्लिप्त होकर संसार में रहना कैसा है,  जानते हो ?  जैसे कमल की पँखुड़ियाँ या कीचड़ में रहनेवाली  'पाँकाल मछली' ।  जल में रहते हुए भी कमल की पँखुड़ियों में जल नहीं लगता,  कीचड़ में रहते हुए भी "पाँकाल"  मछली के अंग में कीचड़ नहीं लगता। 
*      गृहस्थाश्रम में रहकर भी ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं ।  जैसे राजर्षि जनक को हुए थे ।  परन्तु कहने मात्र से कोई राजा जनक नहीं हो सकता ।  जनक राजा ने पहले निर्जन में जाकर कितने वर्षों तक उग्र तपस्या की थी ।  गृहस्थों को बीच-बीच में,  कम से कम तीन ही दिन के लिए,  निर्जन में जाकर ईश्वरदर्शन के लिए प्रार्थना करनी चाहिए -- इससे अतयन्त लाभ होता है । 
  * संसारी लोग हमेशा राजा जनक का उदाहरण देते हुए कहते हैं,  'जनक राजा ने संसार में रहते हुए ज्ञान प्राप्त किया था !'  परन्तु समूची मानवजाति के इतिहास में जनक राजा जैसा दुसरा एक भी उदाहरण नहीं मिलता ।  जनक राजा की बात अपवादात्मक है ।  साधारण नियम तो यही है कि कामिनी-कांचन का त्याग किये बिना ज्ञानलाभ नहीं होता । स्वयं को जनक राजा मत समझ बैठो ।  कितनी शताब्दियाँ बीत गयीं पर जगत् में दूसरा जनक राजा नहीं हुआ । 
एक बार कुछ ब्राह्मसमाज वालों ने मुझसे कहा था,  'हम राजर्षि जनक का आदर्श मानते हैं ।  हमलोग उन्हीं की तरह निर्लिप्त रहकर संसार करेंगे।" मैंने उनसे कहा  --  राजा जनक का उदाहरण देना आसान है पर स्वयं राजा जनक के समान बनना इतनी सरल बात नहीं ।  संसार में रहकर निर्लिप्त रहना बड़ा कठिन है ।  परन्तु साधना करनी ही होगी, निर्जनवास करना ही होगा ।  निर्जन में ज्ञान-भक्ति प्राप्त करके फिर संसार में प्रवेश कर सकते हो । दही एकान्त में ही अच्छा जमता है, हिलाने-डुलाने से नहीं जमता । जनक निर्लिप्त थे, इसलिए उनका नाम  'विदेह'  था   --   विदेह यानि देहबोधरहित ।  वे संसार में रहते हुए भी जीवनमुक्त थे ।  परन्तु देहबोध का नष्ट होना बहुत कठिन है ।  इसके लिए बहुत साधना चाहिए ।राजा जनक बड़े वीर थे ।  वे एक ही साथ दो तलवारें चलाते थे  --  एक ज्ञान की, दूसरे कर्म की ।
     तुम यदि संसार में निर्लिप्त भाव से रहना चाहो तो तुम्हें पहले निर्जन में रहकर साधना करनी चाहिए ।  निर्जन में जाना जरूरी है  --  एक साल के लिए, छः महीने के लिए,  एक महीने के लिए या कम से कम बारह दिनों के लिए ही सही !(अथवा छः दिनों के लिए महामण्डल के वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर में ही सही ।) एकान्त में रहते हुए ईश्वर का आन्तरिकता के साथ ध्यान-चिन्तन करना चाहिए, ज्ञान-भक्ति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए ।  मन ही मन विचार करना चाहिए  --  'इस संसार में मेरा कोई नहीं है ।  जिन्हें मैं अपना समझता हूँ वे दो दिन के लिए हैं  --  सब चले जाने वाले हैं ।  भगवान् ही मेरे आत्मीयजन हैं ।  वे मेरे सर्वस्व हैं ।  हाय, उन्हें मैं कैसे पाऊँ ?  यही सब चिन्तन चिन्तन करते रहना चाहिए ।
*      जहाज में कम्पास का काँटा सदा उत्तर की ओर रहता है, इसलिए जहाज की दिशा में भूल नहीं होती ।  इसी प्रकार,  यदि मनुष्य का मन भी सदा ईश्वर की ओर रहे तो उसे संसारसागर में दिशा चूकने का भय नहीं रहता ।
*      तुम संसार में रहो भी तो इसमें कोई विषेश हानि नहीं ।  मन को सदा ईश्वर में लगाये रखकर निर्लिप्त हो संसार के कर्मों को किए जाओ।  जैसे,  अगर किसी की पीठ में घाव हो जाए तो वह लोगों से बातचीत या दूसरा व्यवहार आदि तो करता है,  पर उसका मन सब समय उस घाव के दर्द की ओर ही पड़ा रहता है। यदि किसी में विवेक,  वैराग्य और ईश्वर के प्रति तीव्र अनुराग रहे तो संसार में रहते हुए भी उसे कोई हानि नहीं होती। 
*   जो सब की दृष्टि से दूर एकान्त में भी  'भगवान देख रहे हैं '  इस भय से कोई अधर्म - आचरण नहीं करता, वही यथार्थ धार्मिक है । निर्जन वन में सुन्दर नवयुवती को अकेली देखकर भी जो धर्म के भय से भीत होकर उस पर कुदृष्टि नहीं डालता, वही यथार्थ धार्मिक है ।  जो वीरान में, किसी उजड़े घर में मुहरों से भरी थैली देखकर भी उसे उठाने के मोह को रोक सकता है, वही ठीक-ठीक धार्मिक है ।  जो केवल दिखावे भर के लिए या  'लोग क्या कहेंगे'  इस भय से सिर्फ लोगों के सामने धर्म का अनुष्ठान करता है, उसे ठीक-ठीक धार्मिक नहीं कहा जा सकता ।  निर्जन, नीरव में अनुष्ठित होनेवाला धर्म ही यथार्थ धर्म है, भीड़-भाड़ और कोलाहल में अनुष्ठित होनेवाला धर्म धर्म नहीं ।
  *  विषयसुखों के प्रति आकर्षण कब नष्ट होता है ?  जब मनुष्य समस्त सुखों के समष्टिस्वरूप, अखण्ड सच्चिदानन्द को प्राप्त कर लेता है, तब ।  जो उस आनन्दस्वरूप का उपभोग करते हैं, उन्हें संसार के तुच्छ विषयभोगों के प्रति आकर्षण नहीं होता । 
*      जिसने एक बार असल मिश्री का स्वाद चखा है, उसे क्या सस्ते गुड़ का स्वाद भाएगा ?  जो एक बार ऊँची अटारी में सो चुका है, क्या उसे फिर गन्दी झोपड़ी में सोना अच्छा लगेगा ?  इसी तरह, जिसने एक बार ब्रह्मानन्द का स्वाद चखा है, वह क्या कभी तुच्छ विसयानन्द में रसमाण हो सकेगा ?
*      जो राजा की प्रेयसी होती है वह क्या किसी भिखमंगे से प्रेमयाचना करेगी ?  जिसने भगवान् की कृपादृष्टि पाई है वह क्या कभी संसार के विषयों पर आसक्त होगा ?
*  यदि साधक को कोई दुष्ट स्त्री अपने मोहजाल में फँसा ले तो क्या होगा ? जिस प्रकार पके आम को दबाने पर गुठली और गूदा फट से निकलकर दूर जा छिटक जाता है, हाथ में केवल छिलका ही रह जाता है, उसी प्रकार, ऐसी स्त्री के हाथ पड़ते ही साधक का मन झट ईश्वर में चला जाता है, देह भर पड़ी रह जाती है ।
*   अगर शक्कर और बालू मिली हुई हो तो चींटी उसमें से बालू को छोड़ शक्कर को ही ग्रहण करती है ।  इसी तरह परमहंस और सत्पुरूषगण अच्छे और बुरे के मिश्रण में से अच्छे को ही ग्रहण करते हैं। 
*  सूप का स्वभाव है थोथे और असार को फेंककर सारवान् वस्तु को रख लेना ।  सत्पुरुषों का स्वभाव भी ऐसा ही होता है ।
*      एक बार भगवान् का नाम सुनते ही जिसके शरीर में रोमांच उत्पन्न होता है और आँखों में प्रेमाश्रु की धार बहने लग जाती है, उसका यह निश्चित ही आखिरी जन्म है । 
चाहे हम अपने अन्तःजगत को, अपने 'स्व' को , मैं कौन हूँ को -  गहराई से  जानने की चेष्टा करते हैं, (मतलब अपने हृदय में विद्यमान आत्मा पर मन को एकाग्र करके 'विवेक-दर्शन' का अभ्यास करते हैं), अथवा  बाह्यजगत को, तो दोनों अवस्थाओं में हमें उसी अनन्त-असीम (लिमिटलैस) का आह्वान सुनाई देता है। बाह्यजगत और अंतःजगत दोनों अथाह (fathomless) हैं, अतः इनकी गहराई को मापा नहीं जा सकता। तब कानों में एक कोई मंद ध्वनि सुनाई देती है - 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी !' 
 इसीलिये हम उस प्रत्येक बाधा को तोड़ देना चाहते हैं, जो हमें अपने इस मिथ्या व्यक्तित्व या नाम-रूप की सीमा में आबद्ध करना चाहती है। हमें ऐसा महसूस होता है कि स्वयं को विश्व के अन्य मनुष्य के सुख-दुःख से काट कर एकाकी (isolated) बना लेना एक पाप है। इसीलिये हम स्वयं को दूसरों के कल्याण में खो देना चाहते हैं। और इस प्रक्रिया में हम अपने साथ दूसरे लोगों को जोड़ते चले जाते हैं, पहले अपने माता-पिता, बन्धु-बान्धव, जो हमारे अपने स्वजन सगे-संबंधियों में स्वयं को प्रसारित करने की चेष्टा करते हैं। फिर विवाह होने के बाद जो नये नाते-रिश्ते बनते हैं, उनके कल्याण में, अपने देशवासियों के कल्याण में अपने को खो देना चाहते हैं। 
इसी क्रम में महामण्डल आन्दोलन के साथ ('BE AND MAKE ' के 5 अभ्यास के साथ) जुड़ जाने के सौभाग्य प्राप्त होने के बाद क्रमशः हमें यह बोध होता है, कि हमारी सबसे बड़ी विजय तो अपने मन को जीत लेने में है। शरीर और मन तो जड़ हैं, हमारे यंत्र हैं, हम उनके गुलाम नहीं हैं, क्योंकि जिस किसी वस्तु का नामरूप है, वह सब एक नामरूप हीन सत्ता आत्मा के अधीन है !विवेकज-ज्ञान के द्वारा अपने अनुभव से यह जान लेने के बाद  हमलोग 'भोग और परिवेश' (लस्ट ऐंड लूकर) के गुलाम  नहीं रह जाते।  साम्यभाव में (या भावमुख अवस्था ?) अवस्थित हो जाते हैं। 
आध्यात्म क्या है ?  मनुष्य के तीन प्रमुख अवयव हैं (3H )-शरीर, मन और हृदय। शरीर और मनोयंत्र के कुशल संचालन के लिए एक मात्र आत्मा ही अधिकृत सत्ता है। शरीर और मन के ऊपर आत्मा के आधिपत्य को स्वीकार कर लेना -अध्यात्म है !अध्यात्म शब्द आत्‍म में अधि‍ उपसर्ग लगा कर दो शब्दों से बना है,अधि + आत्म = अध्यात्म। अधीन+आत्‍मा= अध्यात्म ! 'अधि +आत्म' अर्थात् आत्मा का आधिपत्य! इसलिए अध्यात्म ब्रह्म को जानने का विज्ञान है।
 देहध्यास के कारण नश्वर और परिवर्तनशील शरीर के साथ तादात्म्य कर लेना केवल आटो-हिप्नोटिक है। बचपन से हम सोच रहे हैं, 'मैं यह शरीर ही हूँ'- बस। ऐसा सोचना सिर्फ सम्मोहन है।यह कंडीशंड है, सीखी हुई बात है, इसका प्रशिक्षण हुआ है। यह है नहीं। इस हैबिट को बदल देना होगा। मरणधर्मा शरीरादिक में आसक्ति या मोह का कारण अज्ञान ही है।
एक आदमी से पूछें, आप कौन हैं? वह कहता है कि  मैं दुकानदार हूं। क्या इस संसार में कोई दुकानदार  हो सकता है? दुकानदारी कर्म है, होना नहीं है। वह आदमी यह कह रहा है कि मैं दुकानदारी करता हूं। उसको कहना यह चाहिए कि मैं दुकानदारी करता हूं। पर वह कहता है, मैं दुकानदार हूं। हर आदमी अपने कर्म से ही अपना परिचय देता है। किसी से भी पूछो, तुम कौन हो? वह फौरन बताता है कि मेरा कर्म क्या है।
 मैं कितना ही तेजी से दौडूं, मेरे भीतर तो कोई बिंदु ऐसा ही होना चाहिए जो बिलकुल अदौड़ा है, दौड़ा ही नहीं है। मैं कितना ही भोजन करूं, मेरे भीतर तो कोई होना चाहिए, जिसने भोजन कभी किया ही नहीं। वह है। सिर्फ उसका स्मरण हमें नहीं है। मैं बाएं जाऊं कि दाएं, मैं ऊपर जाऊं कि नीचे, मेरे भीतर तो कोई होना चाहिए जो सदा थिर है और कहीं आया नहीं, गया नहीं। इस प्रतिष्ठा का नाम अध्यात्म; और इस प्रतिष्ठा से चूकने का नाम कर्म है।आदमी का जो स्वभाव है, वह उसका बीइंग है। और आदमी का जो स्वभाव नहीं है; वह उसका कर्म है, वह उसका डूइंग है।
संत तुलसी दासजी कहते हैं, 'जौं सपनें सिर काटै कोई, बिनु जागें दुख दूरि न होई। ' -जिस तरह स्वप्न में कोई सिर काट ले तो बिना जागे वह दुःख दूर नहीं होता। अपने को मरणधर्मा शरीर समझने वाला ये जो सोया हुआ जीव है, या जो जीव हिप्नोटाइज्ड अवस्था में रहता है, वह हर समय मृत्यु के भय से डरता रहता है, और नाना प्रकार के दु:खों से परेशान रहता है। जैसे ही उसको आत्म-साक्षात्कार हो जाता है, और नींद टूट जाती है, वह डीहिप्नोटाइज्ड हो जाता है। तब उसका स्वप्न भी भंग हो जाता है, और वह आध्यात्मिक मनुष्य सदा के लिए सुखी हो जाता है। 
"जब भ्रम का नाश होता है , तो उसमें कितना समय लगता है ? पलक झपकने में जितनी देर लगती है, उतनी। जब मैं सत्य को अपने अनुभव से जान लेता हूँ , तो इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं होता कि असत्य पूरी तरह से गायब हो चुका होता है। मैंने रस्सी को साँप समझा था और अब मैं जानता हूँ कि वह रस्सी है।प्रश्न केवल आधे सेकंड का है। और सब कुछ हो जाता है ! तू 'वह' -है ! तू वास्तविकता है (तू स्वरूपतः इन्द्रियातीत सत्य ब्रह्म है !)  इसे जानने में कितना समय लगता है ? इसका पता लगने में युग नहीं लगना चाहिए कि हम सदा से क्या रहे हैं, और अब क्या हैं ? ३/१९० 
" केवल आध्यात्मिक ज्ञान ही ऐसा है, जो हमारे दुःखों को सदा के लिए नष्ट कर दे सकता है। अन्य किसी प्रकार के ज्ञान से आवश्यकताओं की पूर्ति केवल अल्प समय के लिए ही होती है। केवल आध्यात्मिक ज्ञान के द्वारा ही हमारे दैन्य क्लेशों का सदा के लिए अंत हो सकता है। अतएव किसी मनुष्य की आध्यात्मिक सहायता करना ही उसकी सबसे बड़ी सहायता करना है। जो मनुष्य को परमार्थिक ज्ञान (इन्द्रियातीत सत्य का ज्ञान) दे सकता है, वही मानव-समाज का सबसे बड़ा हितैषी है। अतएव जो सहायता (समाजसेवा) हमें आध्यात्मिक बल देती है, वह सर्वश्रेष्ठ समाज-सेवा है ,उसके नीचे है बौद्धिक सहायता; और उसके बाद है शारीरिक सहायता। " कर्म का रहस्य ३/२८ 5000 वर्ड्स]
किन्तु महामण्डल के वुड बी लीडर/शिक्षक को अपने 'स्व' को जान लेने के लिये, 'अर्थात मैं वास्तव में कौन हूँ ? इसे जान लेने के लिये आत्मा या इन्द्रियातीत सत्य तक केवल ऊपर आरोहण ही नहीं करना है, अपितु साक्षात्कार करने के बाद, या साम्यभाव प्राप्त हो जाने के बाद पुनः जगत शरीर और मन (सापेक्षिक सत्य) के धरातल तक नीचे भी उतरना है। और जगत को ब्रह्ममय देखते हुए इसकी सेवा में ही अपने जीवन को न्योछावर करके, मनुष्य जीवन को सार्थक कर लेना है; दृष्टि ज्ञानमयीं कृत्वा पश्येद्ब्रह्ममयं जगत् ।
2. नेता/ब्रह्मविद शिक्षक की विशेषता : उन्हें अपना ईश्वरत्व कभी भूलता नहीं है ! 
"ऐसे लोकशिक्षक ही संसार के महान विचारक एवं मनीषी होते हैं, ये ही मानवजाति के मार्गदर्शक नेता, पैगम्बर वेदान्त दर्शन के सन्देश-वाहक ऋषि और ईश्वर के अवतार (माँ जगदम्बा से चपरास-प्राप्त पुत्र) कहलाते हैं।  'हममें में अधिकांश जन्मतः सगुण धर्म, अवतारवाद में श्रद्धा रखते हैं। अपनी मानसिक चहारदीवारी को स्वयं कौन पार कर सकता है ? काश ! ईश्वरेच्छा से हम सब इतने उन्नत होते कि हमें तत्वविशेष की धारणा करने में दृष्टान्तों एवं आदर्श पुरुषों की आवश्यकता न पड़ती।  किन्तु हम उतने उन्नत नहीं हैं, तथ्यों की उपेक्षा नहीं की जा सकती; और इसलिये व्यक्ति-विशेष कीअर्चना करने के लिये हम विवश हैं, तथा यह हितकारी भी है। ७/१७७-१८०] 
स्वामी जी कहते हैं - "आचार्य, शिक्षक या नेता होने की अपेक्षा जीवन्मुक्त होना सरल है। क्योंकि जीवन्मुक्त संसार को स्वप्नवत मानता है और उससे कोई वास्ता नहीं रखता। किन्तु आचार्य को यह ज्ञान होने पर भी कि जगत स्वप्नवत है, उसमें रहना और कार्य करना पड़ता है। आचार्य को मानो स्वप्न और जाग्रत, इन दोनों अवस्थाओं के बीच खड़ा होना पड़ता है। उसे यह ज्ञान रखना ही पड़ता है कि जगत सत्य है, अन्यथा वह शिक्षा क्योंकर देगा ? फिर, यदि उसे स्वयं ही यह अनुभूति न हुई हो कि जगत स्वप्नवत है ; तो उसमे और एक साधारण आदमी में अन्तर ही क्या -और वह शिक्षा भी क्या दे सकेगा ? " ३/२६१ 
"हमारे देश में सबसे अधिक आदर और सम्मान एक शिक्षक को मिलता है,तथा हमारी ऐसी श्रद्धा रहती है कि शिक्षक मानो साक्षात् ईश्वर ही हैं ! जितनी श्रद्धा हमें अपने शिक्षकों के प्रति रहती है; उतनी श्रद्धा हमें अपने माता-पिता के लिए भी नहीं होती। माता-पिता हमें केवल जन्म देते हैं, किन्तु शिक्षक (नेता) हमें अपने जीवन में वेदान्त का अभ्यास करके मोक्ष का मार्ग (भ्रममुक्त बनने और बनाने का मार्ग) दिखाते हैं।
" हम किसी सूक्ष्म तत्व (वेदान्त के महावाक्यों) की धारणा करने में तभी समर्थ होते हैं, जब वह किसी व्यक्तिविशेष के रूप में साकार रूप धारण कर लेता है। केवल अपने जीवन से दृष्टान्त प्रस्तुत करने वाले शिक्षकों के माध्यम से ही हम वेदान्त को अर्थात वेद के गहरे रहस्यों को, उनके उपदेशों को समझ पाते हैं।' उनमें परम् सत्य (इन्द्रियातीत सत्य) का दर्शन करने की क्षमता है -और इसके साथ ही साथ उस सत्य को दूसरों को दिखाने का सामर्थ्य भी होता है। उनमें प्रचण्ड आत्मविश्वास भरा होता है, स्वयं अपने में श्रद्धा अटल होती है। विश्व के कल्याण के लिए जितने भी अवतार (महान शिक्षक या नेता) हुए हैं, उनका जीवन-कार्य प्रारम्भ से ही निश्चित रहा है।
 वे अन्धकार में नहीं टटोलते, उनके उपदेशों में (उस परम्-सत्य के) प्रत्यक्ष-दर्शन का बल होता है ! जब वे बोलते हैं, तो एक एक शब्द सीधे हृदय में प्रवेश करता है, वह बम के समान फूट पड़ता है और सुननेवाले पर अपना असीम प्रभाव जमा लेता है। साम्यभाव में प्रतिष्ठित आध्यात्मिक शिक्षकों/ नेताओं  के मुख से निकली बातों में बहुत बल होता है। क्योंकि वे लोग स्वयं जो देखते हैं, उपलब्धी कर चुके होते हैं; वही बात कहते हैं। केवल अनुमान के आधार पर, या दूसरों से सुनकर, या पुस्तकों को पढ़ कर वे कुछ नहीं कहते हैं। इसीलिए उनकी बातों में इतनी शक्ति आ जाती है। उनकी बातें सीधा श्रोताओं के हृदय को स्पर्श करती हैं, और वहाँ अपनी एक छाप छोड़ जाती हैं। 
स्वामी जी ने कहा है ,"संसार के धर्म प्राणहीन उपहास की वस्तु बन गये हैं। आज संसार जो चाहता है वह है चरित्र। आज ऐसे लोग (आध्यात्मिक शिक्षक /नेता)  चाहिए जिनका जीवन स्वार्थहीन ज्वलंत प्रेम का उदाहरण हो। उस प्रेम से कहा गया हर शब्द वज्रवत् प्रभावी होगा। "
समर्थ नेता माता मदालसा : 'मृत्यु के बाद दुबारा उसी शरीर में वापस लौट आने के कारण रानी मदालसा के मन का अज्ञान मिट चुका था।' जीवन का सार तत्व, इसका चरम तत्व, उनको ज्ञात हो चुका था। [वे (रानी मदालसा) अपने अनुभव से यह जान चुकी थीं -कि आत्मा कभी मरती नहीं है, मृत्यु तो नश्वर शरीर और मन की होती है; आत्मा तो अजर, अमर अविनाशी है !]  किन्तु इस बात को वे किसी के सामने प्रकट नहीं करती थीं। जैसे साधारण लोग जीवन यापन करते हैं, उसी प्रकार वे भी अपना जीवन यापन करती थीं। किन्तु ज्ञान की बात केवल अपने पुत्रों को ही सुनाती थीं। माता मदालसा के तीन पुत्र हुए। ऋतुध्वज ने उनके नाम विक्रांत, सुबाहु और अरिमर्दन रखे। मदालसा इन नामों को सुनकर हंसती थी और ऋतुध्वज से कहती थी कि आवश्यक नहीं कि नाम के गुण व्यक्ति में आए ही। भला इस तरह के नाम रखकर आप इन्हें सांसारिक क्यों बनाना चाहते हैं? अपने लड़के को पालने में रख कर, झुलाते झुलाते यह लोरी गा कर सुनाती थीं- ' तुम हो मेरे लाल, निरंजन! अति पावन निष्पाप ! अमित है तेरा प्रताप ! त्वं रोदिषि कस्य हेतो: ॥
हे तात! तू तो शुद्ध आत्मा है, तेरा कोई नाम नहीं है। यह कल्पित नाम तो तुझे अभी मिला है। वह शरीर भी पाँच भूतों का बना हुआ है। न यह तेरा है, न तू इसका है। फिर किसलिये रो रहा है? यह कल्पित नाम ' विक्रान्त,सुबाहु,अरिमर्दन आदि ' नाम तो तुझे अभी मिले हैं ।  तुम्हारा (आत्मा का)  न तो जन्म है, न मृत्यु। तुम भय, शोक, आदि दुःख से परे हो। शरीर के भीतर तुम हो, किन्तु तुम शरीर नहीं हो। महारानी मदालसा ने अपने तीनों पुत्रों को बचपन से ही (ब्रह्म) ज्ञान और वैराग्य का उपदेश देकर  निवृत्तिमार्गी संन्यासी बना दिया। इसीलिये जब चतुर्थ बालक ने जन्म लिया तब महारानी उसे भी बचपन से ही जब निवृत्तिमार्ग की शिक्षा देने लगी। 
उस समय महाराज ऋतुध्वज ने मदालसा से विनती की कि-देवि! पितृ-पितामह के समय से चले आये मेरे इस राज्य को चलाने के लिये तो एक बालक को राजा बनना ही चाहिये, अतः इसको विरक्त मत बनाइये। मदालसाने महाराजकी बात मान ली, लेकिन मदालसा ने कहा कि उसका नाम मैं रखूंगी। उसने इस पुत्र का नाम "अलर्क" रखा। और अपने चौथे पुत्र को प्रवृत्तिमार्ग की शिक्षा दी। मदालसा स्वयं ब्रह्मज्ञानी थीं, इसीलिए अपने बच्चों को भी ज्ञान प्राप्ति का अधिकारी बना दी थीं। उनकी बातो को सुनने से उनको चैतन्य हो गया था। माता-पिता  स्वयं अपने जीवन में यदि उच्च आदर्श को रूपायित कर सकें, तो उनके उपदेश को सुनने से, उनके बच्चे  भी योग्य मनुष्य बन जाते हैं। यदि आध्यात्मिक शिक्षक का अपना जीवन सुंदर रूप से गठित नहीं हो, तो केवल खोखले उपदेशों से ज्यादा लाभ नहीं होता।
समर्थ नेता स्वामी विवेकानन्द : " एक सिंहनी, जिसका प्रसव-काल निकट था, एक बार अपने शिकार के खोज में बाहर निकली। उसने पहाड़ी-टिल्हे पर खड़े होकर, नीचे एक भेंड़ों के एक झुण्ड को चरते देख, उन पर आक्रमण करने के लिए ज्यों ही छलांग मारी, त्योंही उसके प्राणपखेरु उड़ गए और एक मातृहीन सिंह-शावक ने जन्म लिया। ...... भेंड़ -सिंह बोल उठा , " क्या कह रहे हो ? मैं तो भेंड़ हूँ, सिंह कैसे हो सकता हूँ? " उसे किसी प्रकार विश्वास नहीं हुआ कि वह सिंह है, और वह भेंड़ों की तरह मिमियाने लगा। तब सिंह उसे उठाकर एक एक सरोवर के किनारे ले गया और बोला, " यह देख,अपना प्रतिबिम्ब, और यह देख, मेरा प्रतिबिम्ब। " और तब वह दोनों परछाइयों की तुलना करने लगा। वह एक बार सिंह की ओर एक बार अपने प्रतिबिम्ब की ओर एकाग्रतापूर्वक देखने लगा। तब क्षण भर में ही वह जान गया कि 'सचमुच, मैं तो सिंह ही हूँ !' तब वह सिंह गर्जना करने लगा, और उसका भेड़ों का सा मिमियाना न जाने कहाँ चला गया ! इसी प्रकार तुम सब सिंह हो-तुम आत्मा हो, शुद्ध, अनन्त और पूर्ण। "
किन्तु वर्तमान लीडर्स या आध्यात्मिक शिक्षकों की व्यावहारिक बुद्धि (common sense) पर चर्चा करते हुए स्वामी जी कहते हैं -" एक क्षण मैं सोचता हूँ कि 'अहं ब्रह्मास्मि'- मेरा अस्तित्व है और कुछ भी मुझे नष्ट नहीं कर सकता। किन्तु दूसरे ही क्षण मृत्यु-भय से मैं काँपने लगता हूँ। कभी सोचते हैं कि हम दूसरों की अपेक्षा बहुत धार्मिक और पवित्र हैं, किन्तु दूसरे ही क्षण एक धक्का लगता है और हम चारों खाने चित हो जाते हैं। इसका कारण ? कारण यही है कि हमारा आत्मविश्वास मर गया है, और हमारी 'नैतिकता की रीढ़' टूट गयी है।" (७/१८०)
3. नेता या शिक्षक बनने के लिए प्रारंभिक आवश्यकता / पूर्व शर्त क्या है? 
[What is the preliminary requirement/precondition  for becoming a leader or teacher?]
किन्तु दूसरों को उपदेश देने के पहले अपने जीवन में सच्चरित्रता का पालन करना एक अनिवार्य शर्त है ! अपने 'पास्ट बैड हैबिट्स' को पूर्णतया त्याग देना अनिवार्य है। क्योंकि स्वयं भोगों में आसक्त रहते हुए, दूसरों को त्याग का उपदेश नहीं दिया जा सकता।  हमलोग हजारों बार क्यों न कहते रहें 'वयं ब्रह्म स्मः' - अहं ब्रह्मस्मि ! मैं सर्वव्यापी आत्मा हूँ। या मुझ से हजारों बार गुरु ने कहा हो - 'तत्त्वमसि'- तुम वही ब्रह्म हो, किन्तु इससे कोई लाभ नहीं होता, फिर भी देह का साथ हमारा तादात्म्य बना ही रहता है। हमलोग अपने दिल ही दिल में जानते रहते हैं, कि मेरा देहाध्यास तो बना हुआ है। ऐसा क्यों है? क्योंकि हमलोग हिप्नोटाइज्ड अवस्था में हैं ! 
हमारी जीवनचर्या दूसरे प्रकार से अनुकूलित है।  (conditioned, यम-नियम का अभ्यास नहीं सीखा था इसलिये) । इसीलिये हमारे मन में अपने विषय में  (स्वरुप -मैं कौन हूँ ? के विषय में) जो भ्रम या सम्मोहन बैठा हुआ है उससे हमारा छुटकारा नहीं होता!तो हमें  क्या करना चाहिये ?  साम्यभाव में स्थित लीडर या भावी आध्यात्मिक शिक्षक बनने की पूर्व शर्त है-निषिद्ध कर्म या शास्त्र-विरोधी कर्म करने से पहले सौ बार सोंचो,  रेड लाईट या लाल सिग्नल्स  देखते ही रुक जाओ, और विवेक-प्रयोग करो ! कठोपनिषद में कहा गया है - 
 ' ना विरतो दुश्चरितात् , ना शान्तो ना समाहितः।
 ना शान्त मानसो वापि, प्रज्ञानेन एनं  आप्नुयात्। 
[न अ-विरतो दुस्-चरितात्, न अ-शान्तः, न अ-समाहितः, न अ-शान्त-मानसः वा अपि – एनं प्रज्ञानेन आप्नुयात्॥ ] 
-जो मनुष्य दुराचार से निवृत्त नहीं हुआ है, या निषिद्ध कर्मों से विरत नहीं है, जिसने अपनी इन्द्रियों को जीता नहीं है, जिसका मन एकाग्र नहीं है, जिसका चित्त शान्त नहीं हुआ है-जो असंयमी व्यक्ति है, वैसा मनुष्य आत्मज्ञान प्राप्त करने का अधिकारी नहीं होता।  [वह अपने यथार्थ स्वरूप को जानकर साम्यभाव में या भावमुख अवस्था में प्रतिष्ठित नहीं रह सकता। ]
(One who has not desisted from bad conduct, whose senses are not under control, whose mind is not concentrated, whose mind is not free from anxiety (about the result of concentration), cannot attain this Self through knowledge.) 
एकाग्रता के अभ्यास या प्रखर व्यावहारिक बुद्धि के द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त हो जाने के बाद भी यदि कोई व्यक्ति निषिद्ध कर्मों को करता रहता है, दुष्कर्मों में ही रत रहता है, तो  वह कभी साम्यभाव में प्रतिष्ठित शिक्षक या नेता नहीं बन सकता।  
'आचारहीनं न पुनन्ति वेदा:' आचारहीन को वेद भी पवित्र नहीं कर सकते। क्योंकि उसका मन अनेक प्रकार के विकारों, दोषों तथा चिन्ताओं से ग्रस्त रहता है और उसमें शान्ति एवं एकाग्रता नहीं होते। वह अन्तर्मुखी नहीं होता। दुष्कर्म में प्रवृत्त, अशान्त मनुष्य परमात्मा को कदापि प्राप्त नहीं कर सकता।  अशान्त मनुष्य ब्रह्मज्ञान का अधिकारी नहीं होता। 
अतः वुड बी लीडर या शिक्षक को विवेक-दर्शन के अभ्यास द्वारा अपनी उभयतोवहिनी चीत्त-नदी के निम्नगामी प्रवाह को उर्ध्वमुखी बनाकर अपने विवेक-स्रोत को उद्घाटित कर लेना चाहिए। अपने मन को दिशा बदलकर, जो निषिद्ध कर्म उसे साम्यभाव में स्थित रहने से विचलित कर देते हैं, घोर अशांति और अवसाद उत्पन्न कर देते हों,  पूरी दृढता के साथ  उन सभी दुष्कर्मों का त्याग कर देना चाहिए।  साधारण अशान्ति तो मानव-स्वभाव का अंग है तथा केवल योगी ही सदा शान्त रहते हैं, किन्तु दुष्कर्म में रत मनुष्य अत्यधिक अशान्त अथवा उद्विग्न रहते हैं। 
 सामान्य रूप से ही चंचल रहना तो मन का स्वभाव है , किन्तु जिन षड्रिपुओं के कारण वह अतिरिक्त चंचल बनकर, निष्द्धि कर्मों या दुष्कर्मों में प्रवृत्त होना चाहे तो उसपर विवेक का अंकुश लगाना अनिवार्य है।  दुष्कर्म को त्यागकर परमात्मा की शरण में जाने पर मनुष्य परम शान्त हो जाता है। अविचल शांति में स्थित होकर मनुष्य सत्य का संदर्शन करता है। अतः वेदान्त का अध्यन करने के लिये पहले हमें नियमित रूप से एकाग्रता का अभ्यास करके अपने मन को ठीक तरह से साधना होगा।
 हमारा मन ही वह उपकरण जिसकी सहायता से हम परम् सत्य को समझ सकते हैं। अतः मन को सभी प्रकार के पूर्वाग्रहों या (preconceived notions) झुकाव या प्रवृत्तियों से मुक्त (free from all biases) बनाना होगा। महामण्डल आंदोलन के सभी सदस्य में भावी शिक्षक/ नेता बनने की सम्भावना है, किन्तु निषिद्ध कर्मों या दुष्कर्मों का पूर्ण रूप से त्याग कर निरंतर साम्यभाव में प्रतिष्ठित रहना इसकी पूर्वशर्त है। 
इसके बाद महामण्डल आंदोलन की लीडरशिप ट्रेनिंग को समझने की प्रक्रिया बहुत सरल है। मानवजाति के महान मार्गदर्शक नेता, आध्यात्मिक शिक्षक आचार्य शंकर आचार्य शंकर ने लीडर/आध्यात्मिक शिक्षक निर्माण की पद्धति को एक सूत्र (Formula या नुस्खा) के रूप में बहुत सुन्दर ढंग से कहा है -
 दुर्जन: सज्जनो भूयात, सज्जन: शांतिमाप्नुयात्। 
शान्तो मुच्येत बंधेम्यो मुक्त: चान्यान् विमोच्येत्॥
 दूर्जन लोग पहले सज्जन बन जाएँ, क्योंकि जो सज्जन हैं, वे ही शान्ति प्राप्त कर सकते हैं। फिर जो शान्त हो चुके हैं वे समस्त बन्धनों से मुक्त हो जायेंगे। जो स्वयं मुक्त हो चुके हों, वे दूसरों को मुक्त करने की चेष्टा करते हैं। 
मनुष्य दो प्रकार के होते हैं- सज्जन और दुर्जन। जन का अर्थ होता है-मनुष्य। सज्जन माने जो मनुष्य दूर्जन नहीं है। बोलचाल की भाषा में ' सज्जनता ' कहने से हमलोग भद्रता समझते हैं। किन्तु यथार्थ भद्रता तभी आती है, जब मनुष्य वास्तव में अच्छा (शाश्वत, ब्रह्म) को जानकर स्वयं अच्छा (ब्रह्मविद) बन जाता है, उसे ही सूजन,सज्जन या चरित्रवान मनुष्य कहा जाता है।
 जिनके परोपकारी व्यवहार से 'सू-जन' होने का परिचय मिलता है उसी को सज्जन कहते हैं। जबकि दूर्जन लोग कभी किसी का उपकार नहीं करना चाहते, फिर भी भावी नेता/आध्यात्मिक शिक्षक के लिये दूर्जनों से भी घृणा करना ठीक नहीं है। हमें उसके अज्ञान की गाँठ (Knot of Ignorance) काट देने की विद्या (५ अभ्यास) सीखनी होगी, उसके बुद्धि के भ्रम को मिटाकर (डीहिप्नोटाइज्ड) करके उसके बुद्धि का बन्धन (देहाध्यास, नाम-रूप, शरीर-मन के साथ तादात्म्य) खोल देना होगा तब वह भी सज्जन बन जायेगा। 
      अतः महामण्डल आंदोलन के प्रत्येक भावी नेता/शिक्षक को गीता में वर्णित इस साम्यभाव को स्वयं प्राप्त करनी चाहिए, तथा वेदांत के इस महान उपदेश को समस्त युवाओं के द्वार द्वार तक पहुँचा देने की चेष्टा करनी चाहिये। यही महामण्डल आंदोलन का उद्देश्य और कार्य है। महामण्डल आंदोलन वह आध्यात्मिक आंदोलन है जो किसी भी प्रकार की साम्प्रदायिकता (हिन्दू,मुसलमान, सिख, ईसाई आदि मतवाद -Denominational Religion) से पूरी तरह मुक्त है। 'it is a way of life' यह मनुष्य-जीवन यापन करने की एक पद्धति है। 
तथा यह उस 'आत्मसाक्षात्कार' या परम् सत्य की अनुभूति  पर आधारित है, जिसे किसी भी जाति या धर्म में जन्मा कोई भी मनुष्य दीर्घ काल तक 'BE AND MAKE' का अभ्यास करके अर्जित कर सकता है। वेदांत या अहं ब्रह्मास्मि! आदि चार महावाक्यों की केवल बौद्धिक समझ (intellectual understanding) ही यथेष्ट नहीं है। बल्कि इन्हें सुनने और समझने के बाद,  महामण्डल द्वारा निर्देशित 5 अभ्यासों को अपने 'way of life'- में चरित्रगत कर लेना, अर्थात अपनी दिनचर्या में शामिल कर लेना अत्यन्त आवश्यक है।
4.चरित्रनिर्माण के दो मार्ग हैं -प्रवृत्ति और निवृत्ति: स्वामीजी कहते हैं - " मन इन्द्रियों की ओर मानो चक्रवत् अग्रसर हो रहा है,....  'सर्कलिंग फॉरवर्ड ' उसे फिर पीछे लौटाना होगा। प्रवृत्ति-मार्ग का त्याग कर उसे फिर निवृत्ति-मार्ग का आश्रय ग्रहण करना होगा। यही भारतीय आदर्श है। किन्तु कुछ भोग भोगे बिना इस आदर्श तक मनुष्य नहीं पहुँच सकता। बच्चों को त्याग की शिक्षा नहीं दी जा सकती। संसार की असारता समझने के लिये उन्हें पहले कुछ भोग भोगना पड़ेगा, तभी वे वैराग्य धारण करने में समर्थ होंगे। हमारे शास्त्रों में इन लोगों के लिये यथेष्ट व्यवस्था है। दुःख का विषय है कि परवर्ती काल में समाज के प्रत्येक मनुष्य को संन्यासी के नियमों में आबद्ध करने की चेष्टा की गयी-यह एक भारी भूल हुई। भारत में जो दुःख और दरिद्रता दिखाई पड़ती है, उनमें से बहुतों का कारण यही भूल है। गरीब लोगों के जीवन को इतने कड़े धार्मिक एवं नैतिक बन्धनों में जकड़ दिया गया है जिनसे उनका कोई लाभ नहीं है। हैन्ड्स ऑफ ! उन्हें भी संसार का थोड़ा आनन्द लेने दीजिये। आप देखेंगे कि वे क्रमशः उन्नत होते जाते हैं और बिना किसी विशेष प्रयत्न के उनके हृदय में आप ही आप त्याग का उद्रेक होगा।"(५/४६)
श्री शंकराचार्य स्वयं निवृत्ति-मार्गी या संन्यासी थे; किन्तु उन्होंने अपने गीता भाष्य के आरंभ में ही कहा है कि वेदों में दो प्रकार के धर्मों का उल्लेख है, एक है प्रवृत्ति का धर्म और दूसरा है निवृत्ति का धर्म।
वैदिक धर्म के अनुसार चरित्र-निर्माण के दो मार्ग –  'प्रवृत्ति लक्ष्णो योगः , ज्ञानं सन्यासलक्षणम्। 'अर्थात योग का अर्थ प्रवृत्ति–मार्ग और ज्ञान का अर्थ सन्यास या निवृत्ति–मार्ग है। 
स्वयं को  (अपने सच्चे स्वरूप को)  और ईश्वर को  (इन्द्रियातीत सत्य को) जानने या पहचान लेने के ये ही दो धर्म -प्रवृत्ति और निवृत्ति हैं ! ये दोनों ही धर्म अपने अपने स्थान में महत्वपूर्ण तथा गौरवशाली हैं।  साथ ही यह भी ठीक है कि यदि प्राच्य को भौतिक-समृद्धि लाने के लिए मशीन बनाने के सम्बन्ध में सीखना हो,तो वह पाश्चात्य के पास ही बैठकर सीखे। परन्तु यदि पाश्चत्य को मानसिक शांति पाने के लिए ईश्वर, आत्मा तथा वेदान्त के रहस्यों को जानने की आवश्यकता हो तो उसे प्राच्य के पास बैठकर सीखना होगा। वर्तमान सामंजस्य इन दोनों आदर्शों का समन्वय तथा मिश्रण रूप होगा।
एक किनारे पर भोग है, तो दूसरे किनारे पर त्याग है। केन्द्रापसारी बल (Centrifugal force) और केंद्राभिसरि बल (centripetal force)| दो प्रकार के बलों के प्रभाव से यह विश्व, समाज स्थितावस्था में बना रहता है, या यथापूर्व स्थिति (status quo) बनाये रखता है। ये दोनों हैं, इसीलिये मनुष्यों का समाज अपना संतुलन (Equilibrium) बनाये रखता है। जैसे हवाई जहाज अपने दोनों पंखों पर भारसंतुलन बना कर उड़ान भरता रहता है। उसी प्रकार धर्म के भी दो पक्ष हैं- 'भोग और त्याग ', इन दोनों की सहायता से मानव-समाज साम्यावस्था में रहता है।
जब कभी इस सामंजस्य में असन्तुलन आने के कारण  धर्म लुप्त होने लगता है और अधर्म का अभ्युत्थान होता है, धर्म अर्थात चरित्र का पतन हो जाने के कारण मानव समाज और देश को भयंकर परिणाम भुगतना पड़ता है। देश की सामाजिक व्यव्स्थाएँ अस्तव्यस्त हो जाती हैं, जिसके फलस्वरूप देश में हिंसा,चोरी, लूट-पाट, कत्ल, झूट, छल, कपट आदि का आतंक छा जाता है। जिससे मानव जीवन अशान्त और दुखमय हो जाता है, तब उसके निवारण हेतु माँ जगदम्बा की इच्छा से, श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध, ईसा, मोहम्मद, आधुनिक युग में श्रीरामकृष्ण, स्वामी विवेकानन्द, जैसे अवतारों (या लोकशिक्षकों) का आविर्भाव होता है।
 स्वामी विवेकानन्द कहते हैं -" अन्याय मत करो, अत्याचार मत करो, यथासाध्य परोपकार करो। किन्तु गृहस्थ के लिये अन्याय सहना पाप है, उसी समय उसका बदला चुकाने की चेष्टा करनी होगी। बड़े उत्साह के साथ अर्थोपार्जन कर स्त्री तथा परिवार के दस प्राणियों का पालन करना होगा, दस जन-हितकारी कार्यों में योगदान करना होगा। ऐसा न कर सकने पर तुम मनुष्य किस बात के ? जब तुम सही गृहस्थ ही न बन सके, फिर तो मोक्ष की बात ही क्या ? " (१०/५१-५२ )
 इसीलिए हमारे श्रुति और शास्त्र प्रवृत्तिमार्ग से होते हुए भी, क्रमशः 'निवृत्ति अस्तु महाफला ' का स्वयं अनुभव करते हुए आध्यात्मिक शिक्षक/लीडर बनने और बनाने में बाधा नहीं देते। उपनिषदों में ' द्वासुपर्णा सयुजा शखाया ' की कथा से जो उदहारण दिया गया वह राजकुमार सिद्धार्थ गौतम के प्रवृत्ति से होते हुए निवृत्ति मार्ग के महान आध्यात्मिक शिक्षक 'गौतम बुद्ध' बन जाने को सिद्ध करती है। मनु महाराज तो यहाँ तक कहते हैं -  
न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने । 
               प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ।। (मनुस्मृतिः५.५६)
अर्थात भोग की प्रवृत्ति केवल मनुष्य के लिए ही नहीं, किन्तु प्राणीमात्र के लिए स्वाभाविक हैं – 'प्रवृत्तिरेषा भूतानाम्। ' मनुष्यों में यह गुण (धर्म या भूत वैशिष्ट) प्रकृति प्रदत्त हैं, विवाह करो, थोड़ा खा पहन लो; किन्तु यह सदा स्मरण रहे कि -इनसे निवृत्ति लेना अधिक श्रेष्ठ है, क्योंकि निवृत्ति ही सबसे बड़ा फल है- निवृत्तिस्तु महाफला। अर्थात मनुष्यों के लिये निवृत्ति(भ्रममुक्त,डीहिप्नोटाइज्ड,मोक्ष) ही सबसे बड़ा और अंतिम पुरुषार्थ है। 
[पाप पुण्य: It is not a sin to eat non-veg food, not a sin to drink alcohol and not a sin to make love. These are only natural to all beings. If one can abstain from all these, then one can achieve great results. ] 
अपने -अपने धर्म अर्थात भूतवैशिष्ट्य रुझान या प्रवृत्ति के अनुसार, मर्यादित रूप से क्रमशः चार पुरुषार्थ करने के प्रारंभिक अवस्था में  मांसभक्षण, मद्यपान और गृहस्थ धर्म का पालन करने के लिए मैथुन में भी पाप नहीं है। 
क्योंकि महामण्डल द्वारा निर्देशित 5 अभ्यास (प्रार्थना,मनःसंयोग,व्यायाम, स्वाध्याय और विवेक-प्रयोग) के बल पर निषिद्ध कर्म या शस्त्रविरोधी कर्म करने से दूर रह सकता हो, तो उसे भी एक  दिन 'निवृत्ति अस्तु महाफला' की अनुभूति हो जाएगी।  इसीलिये श्रीरामकृष्णदेव  जिस व्यक्ति में भोग-वासना अधिक देखते थे, उन्हें थोड़ा भोग कर लेने के लिये कहते थे, किन्तु अन्त में यह भी जोड़ देते थे -" लेकिन यह जान लेना कि इसमें कुछ रखा नहीं है ! "
किन्तु कुछ तथाकथित अल्ट्रामॉडर्न एजुकेटेड लोग जो,अपने ' पास्ट बैड हैबिट्स' का त्याग करने में असमर्थ हो जाते हैं, और अपने चरित्र का गठन एक शिक्षक/नेता के रूप नहीं कर पाते हैं, वे एक वॉट्सऐप-ग्रुप बना कर व्यर्थ की चर्चा में अपना और दूसरों का समय बर्बाद करते हैं। तथा ऐसा सोंचते हैं कि मन को जीतने के लिए या साम्यभाव में स्थित रहने के लिए प्रत्येक वुड बी लीडर/ शिक्षक के लिये संन्यासियों जैसा गेरुआ वस्त्र धारण कर लेना, मुँह लटकाये रखना अनिवार्य है। किन्तु केवल बाहरी भेष धारण कर लेने या शरीर पर राख मल लेने से ही भीतर की तृष्णा समाप्त नहीं हो जाती। (जिसका उदहारण हमलोग आये दिन न्यूज में पढ़ते, टीवी में देखते  रहते हैं।  इसी बात से सावधान करते हुए जीवन्मुक्त (भ्रममुक्त) आचार्य अष्टावक्र जी महाराज कहते हैं- 
निवृत्तिरपि मूढस्य प्रवृत्तिः उपजायते। 
प्रवृत्तिरपि धीरस्य, निवृत्तिफलदायिनि॥ " 
मूढ़मती लोगों के लिये अर्थात जिनकी बुद्धि मोहनिद्रा में सोयी हुई है, और जो स्वयं को केवल शरीर समझते हैं, उनके लिये निवृत्ति भी प्रवृत्ति को ही उत्पन्न करने वाली होती है। तथा उसी प्रकार ज्ञानी, धीमान या बुद्दिमानों के लिये कर्म (प्रवृत्ति-आध्यात्मिक शिक्षक का कर्म) ही उन्हें निवृत्ति का फल प्रदान करता है। 'दादा कहते थे -यदि तुम निःस्वार्थभाव से महामण्डल आंदोलन में जुड़े रहो, तो अन्य कोई साधना नहीं करनी पड़ेगी, मनुष्य बनने और बनाने का प्रयास करते करते तुम स्वयं मुक्त हो जाओगे !'
 हितोपदेश में कहा गया है - निवृत्तरागस्य गृहं तपोवनम् || - 'आत्माराम की मंजूषा'  की कृपा से जिस सद गृहस्थ के हृदय से सांसारिक भोगों की लालसा, राग, आसक्ति समाप्त हो जाती है, उनका घर ही तपोवन बन जाता है। श्रीरामकृष्ण कहते थे - 
जनक राजा महातेजा तार किसे छीलो त्रुटि। 
एदिक्-ओदिक् दू-दिक् रेखे खेये छीलो दुधेर बाटी।  
 श्रीरामकृष्ण द्वारा 'वेदान्त लीडरशिप-ट्रेनिंग ट्रेडिशन' में प्रशिक्षित युवा-नेता नरेन्द्रनाथ ने वुड बी लीडर्स या भावी आध्यात्मिक शिक्षकों को विश्व-कल्याण के उसी ईश्वरीय विधान 'त्याग और आध्यात्मिकता' (व्यष्टि अहं को आध्यात्मिक अहं' में रूपान्तरित करने के कानून) का का उपदेश दिया है। 
क्यों कि कोई नेता/शिक्षक यदि स्वयं निषिद्ध-कर्मों (इन्द्रिय-भोगों) में रत है तो वह दूसरों को त्याग और आध्यात्मिकता का उपदेश नहीं दे सकता है। स्वयं इन्द्रिय-भोगों में रत रहते हुए जगत का कल्याण नहीं किया जा सकता है। 
5.वेदान्त केसरी लीडरशिप ट्रेनिंग : महामण्डल आन्दोलन प्रवृत्तिमार्ग के अधिकारी युवाओं को भी 'BE AND MAKE  वेदान्त शिक्षक-प्रशिक्षण परम्परा' के निवृत्ति अस्तु महाफला में प्रशिक्षित करके साम्यभाव में अवस्थित 'वेदान्त केसरी' लीडर्स/ आध्यात्मिक शिक्षक में रूपांतरित करना चाहता है।  इसीलिये स्वामी विवेकानन्द ने कहा  था, " अतीतकाल में त्याग ही नियम था; और हाय! (अफ़सोस!) भविष्य काल में भी त्याग ही नियम रहेगा ! " 'हाय'  (अफ़सोस) -क्यों कहते हैं ? इसीलिये कहते हैं- जो लोग ऐसा सोचते हैं,यह नियम (कम से कम उनके लिये) बदल जायेगा, और वे इन्द्रिय भोगों त्याग किये बिना भी जगत का कल्याण कर सकेंगे, तो वे निश्चित रूप से असफल हो जायेंगे। इसीलिये 'अफ़सोस' कहते हैं !
अंग्रेजी के प्रसिद्द कवि रॉबर्ट ब्राउनिंग ने कहा था -- " Progress, man’s distinctive mark alone, Not God’s, and not the beasts’: God is, they areMan partly is and wholly hopes to be." -अर्थात आत्मविकास या उत्थान केवल मनुष्य की विशिष्ट पहचान है, ईश्वर पूर्ण है, पशु पूर्ण हैं;  मनुष्य आंशिक रूप से ईश्वरत्व में विकसित हुआ है, और पूर्ण रूप से ईश्वर बन जाने की आशा करता है। 
इसीलिये स्वामी जी महामण्डल आंदोलन के भावी नेताओं / शिक्षकों का आह्वान करते हुए कहते हैं - " तुम लोग निषिद्ध कर्मों का त्याग करके (5 अभ्यास द्वारा) पूर्णतः निःस्वार्थी मनुष्य बनकर घोषणा कर दो , अब हमलोग पशु नहीं हैं, 'हम पूर्ण हैं और ईश्वर पूर्ण हैं !' 'We are' and "God is" ! केवल अहंब्रह्मस्मि कहने से नहीं होगा, कहो  -"We are God" वयं ब्रह्म स्मः!' और ' शिवोहं, शिवोहं !' कहते हुए 'चरैवेति, चरैवेति' आगे बढ़ो, आगे बढ़ो। क्योंकि स्वरूपतः  हमलोग नश्वर शरीर नहीं, अविनाशी आत्मा हैं। क्योंकि हम शरीर और मन के गुलाम नहीं हैं, हमारा शरीर और मन, हमारा व्यष्टि 'नाम-रूप' तो एक सर्वव्यापी विराट नामरूप-हीन सत्ता आत्मा, ब्रह्म (माँ जगदम्बा) के अधीन है। (हम लोगों के  'शिक्षक' होने का व्यावहारिक 'अहं' केवल दिखाने के लिए है, वास्तव में वह माँ जगदम्बा के हाथों का यंत्र है।) इसी सनातन सत्य की शिक्षा वेदान्त के चार महावाक्यों में दी गयी है। 
आत्मा की शक्ति (५ अभ्यास द्वारा साम्यभाव में प्रतिष्ठित रहने की शक्ति) का विकास करो, और उस प्रशिक्षण पद्धति को भारतवर्ष  के प्रत्येक राज्य में पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक प्रसारित कर दो! और जिस स्थिति की आवश्यकता है , वह आप ही आप प्राप्त हो जाएगी। अपनी अन्तर्निहित दिव्यता को प्रकट करो (ब्रह्मत्व की शक्ति को साम्यभाव को प्रकट करो) और बाकी सब कुछ इसके चारों ओर सुसंगत रूप से व्यवस्थित हो जायेगा। यदि किसी कमरे में 1000 वर्षों से अँधेरा हो, तो उसके जाने में हजार वर्ष नहीं लगते, दीपक (आत्मज्ञान का दीपक) जला दो, अंधकार आप ही आप नष्ट हो जायेगा। 
आत्मा की इस अनन्त शक्ति का प्रयोग जड़ वस्तु पर होने से भौतिक उन्नति होती है, विचार पर होने से बुद्धि का विकास होता है, और अपने पर ही होने से मनुष्य का ईश्वर बन जाता है,(ब्रह्मविद ब्रह्मैव भवति - ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है, अर्थात ईश्वर में उन्नत हो जाता है)। पहले हमें ईश्वर बन लेने दो। तत्पश्चात दूसरों को ईश्वर बनाने में सहायता देंगे। First, let us be Gods, and then help others to be Gods. "Be and make." Let this be our motto."बनो और बनाओ " -यही हमारा मूल मंत्र रहे!" ९/३७९ 
वेदान्त-केसरी गर्जना करे, सियार अपने बिलों में छिप जायेंगे। 
Let the lion of Vedanta roar; the foxes will fly to their holes. 
अर्थात उच्च भावों को सब ओर बिखेर दो, वहुत बड़ी संख्या में 'राजा-जनक' बनो और बनाओ !और फल अपने आप होता रहेगा। भिन्न भिन्न रासायनिक द्रव्यों को एक साथ डाल दो , (अर्थात 3H विकास के ५ अभ्यासों का प्रशिक्षण देने में समर्थ शिक्षकों का निर्माण करो); रवाकरण (crystallization) अर्थात चरित्र-निर्माण और मनुष्यनिर्माणकारी शिक्षा का प्रचार-प्रसार आप ही आप होता रहेगा।  
वेदों में बताये हुए (छान्दोग्य उपनिषद***) इन्द्र और विरोचन के उदाहरण को स्मरण रखो। दोनों को अपने ब्रह्मत्व का बोध कराया गया था, परन्तु असुर विरोचन अपनी देह को ही ब्रह्म मान बैठा। इन्द्र तो देवता थे, वे समझ गए कि वास्तव में आत्मा ही ब्रह्म है। तुम तो इन्द्र की सन्तान हो देवताओं के वंशज हो। जड़ पदार्थ तुम्हारा ईश्वर कदापि नहीं हो सकता; शरीर तुम्हारा ईश्वर कभी नहीं हो सकता। " ३/३८० 
[महामण्डल के नेता/आदर्श शिक्षक  -श्री नवनीहरन मुखोपाध्याय के चरणों के दैवी स्पर्श से जिनका रूपान्तरण (यथार्थ मनुष्य में?) हुआ, उन मुठ्ठी भर नवयुवकों की ओर देखो। उन्होंने उनके  "Be and Make - वेदान्त शिक्षक-प्रशिक्षण परम्परा"  में प्रतिपादित 5 अभ्यास द्वारा '3H' विकास द्वारा मनुष्य-निर्माकारी प्रशिक्षण पद्धति का प्रचार-प्रसार बंगाल से गुजरात तक और अद्वैत आश्रम, मायावती, हिमालय से विशाखापट्ट्नम तक कर डाला।  जब कभी प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्ग में आध्यात्मिक सामंजस्य की आवश्यकता होती है, तो उस समंजस्य का प्रशिक्षण देने के लिए 'विवेकानन्द-कैप्टन सेवियर वेदान्त शिक्षक-प्रशिक्षण परम्परा- BE AND MAKE-के अनुरूप  प्रवृत्ति से होकर निवृत्ति में पहुँचने वाले 'निवृत्ति अस्तु महाफला' में  प्रशिक्षित (आध्यात्मिक) शिक्षकों /नेताओं  का निर्माण करने के लिए 'महामण्डल' जैसे किसी युवा-संगठन को नवनीदा के नेतृत्व में आविर्भूत होना अनिवार्य हो जाता है।] 
6. महामण्डल आन्दोलन से 'अद्वैत आश्रम', मायावती, हिमालय, का सम्बन्ध क्या है ?
' विवेकानन्द -कैप्टन सेवियर वेदान्त लीडरशिप ट्रेनिंग ट्रेडिशन' में आधारित महामण्डल आंदोलन को समझने के लिए  महामण्डल एवं 'अद्वैत आश्रम', मायावती, हिमालय, के बीच क्या संबंध है, इसको भी समझना होगा।
 श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग में कहा गया है कि 'Be and Make' वेदान्त शिक्षक-प्रशिक्षण परम्परा' में भावी शिक्षकों या 'वुड बी लीडर्स' का निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने में सहायता करने के लिए, प्रथम महान शिक्षक श्री रामकृष्णदेव ने निवृत्तिमार्ग के सप्तऋषियों में से एक स्वामी विवेकानन्द को अपने साथ लेकर अवतरित हुए थे। किन्तु यदि किसी समाज में सभी लोग संन्यासी हो जाएँ, या सभी लोग गृहस्थ हो जाएँ तो भी वह समाज एकपक्षीय हो जायेगा। क्योंकि प्रवृत्तिमार्गी या घरगृहस्ती में रहने वाले सामान्य युवाओं को मन को एकाग्र करने का प्रशिक्षण भी यदि गृहत्यागी संन्यासी लोग देने लगेंगे, तो प्रवृत्ति-मार्गी गृहस्थ लोग  कन्फ्यूज्ड होकर सोचने लगेंगे कि,चरित्रवान मनुष्य बनने या  मन को एकाग्र करने का प्रशिक्षण लेने के लिये भी हमें पहले संन्यास लेना होगा। जबकि जगत में  प्रवृत्ति मार्ग के अधिकारी साधारण मनुष्यों की संख्या सर्वाधिक है। 
अतः कुछ ऐसे लीडर्स या आध्यात्मिक शिक्षकों का निर्माण करना अनिवार्य हो गया था जो गृहस्थ-आश्रम में रहते हुए भी  'Be and Make' वेदान्त शिक्षक-प्रशिक्षण परम्परा', या 'निवृत्ति अस्तु महाफला लीडरशिप ट्रेनिंग' में प्रशिक्षित हो कर, स्वयं साम्यभाव में स्थित शिक्षक बनें तथा 3'H' विकास के 5 अभ्यास का प्रशिक्षण देकर वुड बी लीडर बनने के लिए अनुप्रेरित करें। तथा अरण्यों  में अध्यन किये जाने वाले अद्वैत वेदान्त को घर-घर तक पहुँचा कर चरित्रवान मनुष्यों का निर्माण करने वाले एक युवा-संगठन को स्थापित करें। और इसी कार्य को सम्पादित करने के लिये स्वामी विवेकानन्द ने 'सेवियर दम्पत्ति' को भारत में अद्वैत-आश्रम स्थापित करने के लिए अनुप्रेरित किया था।
स्वामी विवेकानन्द हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में जब वेदान्त-दर्शन विषय पर भाषण दे रहे थे, तो उन्होंने कहा था,
कि भारतीय सभ्यता पश्चिम-सभ्यता की तुलना में काफी प्राचीन है। इसीलिए पूर्वी  सभ्यता में 'मनुष्य' मात्र को ही सभी प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है; क्योंकि वह अपने बनाने वाले को, 'ब्रह्म' को भी जान सकता है। भागवत में कहा गया है, ' ब्रह्मवलोकधिषणं पुरुषं विधाय मुदमाप देवा ! ' और उन्होंने सभी फ़रिश्तों को बुलाकर कहा कि मनुष्य के सामने सिर झुकाओ ! जो मनुष्य मात्र के सामने आपने सिर को नहीं झुकाता वह शैतान -इब्लीस बन जाता है। पाश्चात्य देश अपने धनदौलत की शक्ति के मद से चूर आक्रामकता के कारण पूर्वी सभ्यता के " निष्कपटता की संस्कृति" (culture of sincerity) साथ तालमेल बनाकर नहीं चल सकते। इसीलिए मनुष्योचित -व्यव्हार करने (या मानवाधिकार का हनन करने) के मामले में पाश्चात्य सभ्यता, पूर्वी सभ्यता की अपेक्षा अधिक क्रूर है। पूर्व और पश्चिम के लोगों की मानसिकता के विभिन्न पहलुओं पर भी प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा था कि, पश्चिम में बहुत थोड़े से लोग ही अपने मन को नियंत्रित या वशीभूत करने का सामर्थ्य रखते हैं।  इसीलिए, पाश्चात्य देशों को सच्चा "अद्वैतवादी विनम्र और सुसंस्कृत मनुष्य " बनने में अभी बहुत समय लगेगा।  'Westerners will take a lot of time to be  polite and cultured Man .'  इस विख्यात भाषण के बाद, विश्वविद्यालय के अधिकारी विवेकानन्द को अपने यूनिवर्सिटी में प्राच्य  दर्शन के चेयर-परसन (विभाग -अध्यक्ष) का पद देना चाहते थे। किन्तु उन्होंने इस प्रस्ताव को विनम्रता पूर्वक ठुकरा दिया था। 
       स्वामी विवेकानन्द जब 'वेदान्त दर्शन' पर व्याख्यान दे रहे थे, उस सभाकक्ष में सेवियर दम्पत्ति भी उपस्थित थे। 'सेवीयर दम्पति' सच्चे सत्यान्वेषक थे -वे  इस दृष्टिगोचर परिवर्तनशील जगत (सापेक्षिक सत्य)  के पीछे स्थित अपरिवर्तनशील शाश्वत सत्य (निरपेक्ष सत्य) का साक्षात्कार करने के परम् आग्रही थे। किन्तु केवल चर्च जाना एवं कुछ रिचुअल्स का पालन करने (चर्चिनिटी) तक सीमित चर्च के धर्म-प्रचारक उन दोनों के सत्यानुसन्धान की आकांक्षा को शांत नहीं कर पा रहे थे। 
कैप्टन सेवियर ब्रिटिश इंडियन आर्मी में 5 वर्षों तक अफसर भी रह चुके थे।  जब उन्होंने स्वामीजी को सुना तब उन्हें अनुभव हुआ कि अद्वैत दर्शन की इतनी सुंदर और प्रांजल व्याख्या उन्होंने पहली बार सुनी है, सुनते ही उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो अब तक वे इसी सत्य की खोज में भटक रहे थे।
 स्वामीजी द्वारा प्रस्तुत किए गए अद्वैत-दर्शन के विचार ने उन्हें विशेष रूप से आकर्षित किया। स्वामीजी ने सेवियर दंपत्ति को भारत आकर स्वयं सत्य का साक्षात्कार करने का निमंत्रण दिया। सेवियर दंपत्ति ऐसा अवसर खोना नहीं चाहते थे। उन्होंने स्वामीजी का शिष्यत्व स्वीकार किया और समर्पित भाव से उनके साथ भारत चले आए।  और भारत आने पर स्वामीजी ने सेवियर दंपत्ति को  हिमालय में अद्वैत-साधना के लिए एक आश्रम स्थापित करने का अति महत्त्वपूर्ण कार्य सौंप दिया। इस कार्य में उनकी सहायता के लिए, स्वामी जी के २५ वर्षीय युवा शिष्य 'अजय हरि बनर्जी' (स्वामी स्वरूपानन्द 1871- 1906,३४ वर्ष की आयु में देहांत हो गया था) आगे आये।
 सेवियर दंपत्ति और स्वामी स्वरूपानन्द ने आश्रम के लिए उपयुक्त जगह का चुनाव करने के लिए अथक दौड़-भाग की। इसी खोज में वे अल्मोड़ा से 50 मील पूर्व की ओर स्थित मायावती टी एस्टेट जा पहुंचे। हिममंडित हिमालय के दृश्य, यहाँ के घने जंगल,  हिमालय का अद्भुत नजारा प्रस्तुत करता है।  यह सब ठीक वैसा ही था जैसा स्वामीजी ने अद्वैत आश्रम के लिए कल्पना की थी। इसी जगह का चुनाव हो गया और सेवियर दंपत्ति ने यह विशाल पहाड़ी भू-भाग खरीद लिया। मायावती में आज जहाँ अद्वैत आश्रम है, वह स्थान पहले चाय का बगान था। 
‘प्रबुद्ध भारत’ का कार्यालय भी अल्मोड़ा से यहीं ले आया गया।अद्वैत आश्रम की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि यह रामकृष्ण मिशन के एक प्रमुख प्रकाशन केंद्र के रूप में विकसित हुआ है।  यहाँ पर पुस्तकों का सम्पादन किया जाता है और कलकत्ता स्थित अद्वैत आश्रम का प्रकाशन केंद्र इन्हें प्रकाशित करता है।आश्रम से 2.5  किमी की दूरी पर घने जंगलों में स्थित एक कुटिया है जिसका नाम धर्मघर है, जिसमें बैठकर इस निर्जन में ध्यान किया जा सकता है।
 इस अद्वैत-आश्रम का शुभारंभ 1899 में श्री रामकृष्णदेव  जन्मदिवस पर हुआ है। इस अवसर पर  स्वामी विवेकानन्द ने स्वामी स्वरूपानन्द को अद्वैत आश्रम का 'प्रोस्पेक्ट्स' छपवाने के लिये एक पत्र लिखा था, जिसमें अद्वैत-दर्शन के सिद्धांतों को बिन्दुवार ढंग से समझाया गया है। महामण्डल का प्रोस्पेक्ट्स भी उसी के अनुरूप बनाया गया है। इसीलिए उस पत्र के कुछ पंक्तियों का उल्लेख करना यहाँ आवश्यक जान पड़ता है।      
 " [जन्मादि यस्य यतः In Whom is the Universe, Who is in the Universe, Who is the Universe; in Whom is the Soul, Who is in the Soul,] " ..... सम्पूर्ण ब्रह्मांड जिसके (माँ जगदम्बा के)  उदर में है, जो स्वयं ब्रह्मांड में जीव-जगत रूप से व्यक्त है, जो स्वयं विश्वरूप है; जिसके भीतर आत्मा का निवास है, जो स्वयं आत्मा के भीतर है,अर्थात जो प्रत्येक मनुष्य की आत्मा हैं, उसे जान लेने से ; तथा उसके माध्यम से सम्पूर्ण जगत को ही - अपनी आत्मा के रूप में जान लेने से; हमारे सारे भय सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं, समस्त दुखों का अंत हो जाता है! और वह अनुभूति ही हमें अनन्त स्वतंत्रता अर्थात 'आत्मनिर्भरता' (डीहिप्नोटाइज्ड अवस्था) की ओर अग्रसर करा देती है।"
 " अद्वैत ही एकमात्र साधन-प्रणाली है जो मनुष्य को सम्पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर बना देती है!  जो मनुष्य को स्वयं पर  पूर्ण अधिकार प्रदान करती है। उसकी समस्त पराधीनता और इससे संबंधित मिथ्या-भ्रम (कुसंस्कार,सुपरस्टीशंस) को दूर करती है, और इस प्रकार हमें निर्भीकता के साथ-'Brave to Suffer'- अर्थात दुःख-कष्ट झेलने में समर्थ बना देती है। और अन्ततोगत्वा हमें 'Absolute Freedom.' परम मुक्त अवस्था में प्रतिष्ठित करा देती है! 
 " इस अद्वैत दर्शन (आध्यत्मिकता) को समस्त प्रकार की द्वैतवादी दुर्बलताओं से मुक्त कर देने में असफल रहने के कारण ही,  इस महान सत्य  (Noble Truth) - का प्रचार-प्रसार करना 'Hitherto' अभी तक सम्भव नहीं हो सका है। हमारा यह दृढ निश्चय है कि यही वह एकमात्र कारण है, जिसके चलते यह 'गुरु-शिष्य अद्वैत शिक्षक- प्रशिक्षण प्रणाली' सम्पूर्ण मानवजाति के लिये जितना अधिक कार्यकारी और उपयोगी होनी चाहिए थी, उतनी नहीं हो सकी है।
 " यह आशा की जाती है कि यहाँ का अद्वैत भाव समस्त प्रकार के पूर्वाग्रह से ( जाति, धर्म, भाषा,स्त्री-पुरुष, अथवा प्रवृत्ति या निवृत्ति मार्ग के योग्य साधकों के प्रति prejudice-पक्षपात से ) एवं आत्मश्रद्धा को मलीन करने वाले निषिद्ध कर्मों से या संदूषित क्रियाकलापों से मुक्त रहेगा।        
" अन्य समस्त मतवादों तथा अन्य अवतारों के प्रति पूर्ण सहानुभूति तथा आदर का भाव रखते हुए, यहाँ [केवल 'स्वयं अद्वैत-स्वरूप' अवतार-वरिष्ठ भगवान श्रीरामकृष्णदेव द्वारा प्रदत्त]  यहाँ केवल  शुद्ध और सरल 'अनेकता में एकता' ( Doctrine of Unity) के सिद्धांत का ही अभ्यास किया जायेगा तथा प्रशिक्षण दिया जायेगा। इसके अतिरिक्त (3H निर्माण के 5 अभ्यासों के अतिरिक्त) यहाँ और न कुछ सिखाया जायेगा, न व्यवहार में लाया जायेगा। क्योंकि मायावती स्थित यह आश्रम, एकमात्र अद्वैत और केवल अद्वैत-सिद्धान्त को ही समर्पित है !  
किन्तु स्वामीजी के अद्वैत आश्रम के स्वप्न को साकार करने में अथक परिश्रम करने के कारण कैप्टन जेम्स हेनरी सेवियर आश्रम की स्थापना के बाद अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सके। 28 अक्तूबर, 1900 को उनका देहावसान हो गया। उनकी इच्छानुसार उनका दाहसंस्कार बिल्कुल शुद्ध-ब्राह्मण परम्परा में किया गया था। उनकी अर्थी को फूल मालाओं से ढँक दिया गया था, तथा केवल ब्राह्मण लोग ही उनकी अर्थी को कन्धा पर उठाकर ले जा रहे थे। और साथ में ब्राह्मण कुमार लोग वेदों का पाठ करते हुए चल रहे थे।
उनकी अर्थी को आश्रम से 2.5 की.मी. दूर जंगल के बीच से होकर गुजरती हुई जिस पगडंडी से होकर ले जाया जा रहा था, उसके दोनों ओर तरह-तरह के फूलों और फलों के पेड़ हैं। वहाँ की मिट्टी, आकाश, अदभुत-अदभुत पेड़ के पत्ते हैं, जिन पर रंग-बिरंगे फूल, सुंदर-सुन्दर फल लगे रहते हैं! एक छोटी सी पहाड़ी पर चढ़ने के बाद, धीरे-धीरे पगडण्डी नीचे घाटी की ओर चली जाती है। नीचे घाटी का वन भी सघन और सुंदर है। आश्रम से नीचे की ओर घाटी में जाने पर सारदा नदी है। मायावती में नदी के किनारे, जिस स्थान पर उनका अंतिम संस्कार पूर्ण हिन्दू परम्परा में किया गया,वहाँ के समाधि -स्थल पर कैप्टन सेवियर की 'स्मृतिफलक' लगी हुई है। 
 कैप्टन सेवियर की मृत्यु के समय स्वामी विवेकानन्द अपने दूसरे विदेश प्रवास पर थे। किन्तु उनको अपने समर्पित शिष्य कैप्टन सेवियर के गुजर जाने का पूर्वाभास (प्रिमोनीशन premonition) हो गया। स्वामीजी अपने विदेश-प्रवास को समय से पहले समाप्त कर,श्रीमती सेवियर को सांत्वना देने के लिए  अद्वैत आश्रम आए। सन 1901 ई. के प्रारम्भ में 3 जनवरी से 18 जनवरी तक वे यहाँ रहे। यह स्वामीजी की अद्वैत आश्रम की पहली और अंतिम यात्रा थी।
अद्वैत आश्रम, मायावती, हिमालय के प्रोस्पेक्ट्स को पढ़ने तथा कैप्टन सेवियर का दाह-संस्कार जिस नदी के किनारे हुआ था, वहां जाने की पगडंडी का विवरण पढ़ने के बाद, बरबस यह स्मरण हो आता है कि नवनीदा ने अपने पुनर्जन्म में  कैप्टन सेवियर होने का उल्लेख "জীবন নদীর বাঁকে বাঁকে-পৃষ্ঠ,২৯-৩০" में दो स्थानों पर किया है।
 [ हिन्दी 'जीवन-नदी के हर मोड़ पर' नामक पुस्तक के संस्मरणात्मक निबंध पृष्ठ ४० पर , लेख १८-दर्शन बनाम फिलॉसफी' तथा 'लेख ५६-अल्मोड़ा यात्रा' में] "....." যাই হোক, I had small pox ডিসেম্বরের শেষের দিকে। ১লা জানুয়ারী আমি আর উঠতে পারছি না। दिसम्बर के अन्त में -'I had small pox' मुझे स्माल पॉक्स हो ही गया। मैं 1 जनवरी (वर्ष) को ही अचेत हो गया। उसके बाद क्या हुआ, कितने दिनों तक अचेत-अवस्था (या समाधि ?) में था- कुछ पता नहीं। हठात ऐसा लगा मानो मेरे कानों में जो ध्वनी आ रही है, वह मेरी जानी-पहचानी है, ऐसा लगा कि आज नेताजी का जन्मदिन (23 जनवरी?) है और उसी उपलक्ष्य में कोई शोभायात्रा जा रही है। मैं उन नारों को  (..... नेताजी अमर रहें जैसी ?) जानता हूँ। मैं भी अपने गले से आवाज निकालने की चेष्टा करता हूँ -'नेताजी अमर रहें' कहना चाहता हूँ; किन्तु कह नहीं पा रहा हूँ। अरे अरे, यह क्या हुआ, क्या हुआ?  मुझे ऐसा लग रहा था ... मानो मैं हाथ उठाकर कह रहा हूँ -'मैं जिन्दा हूँ अभी!' किन्तु, गले से आवाज नहीं निकल पा रही थी - और इस तरह २३ दिन बीत गये थे! 
इस बीच जो समय बीता था वह स्वप्न के समान अनुभव हो रहा था।  .... इसी क्रम में मैंने एक बार देखा कि मैं मर गया हूँ, और मुझे सजा-धजा कर बहुत से लोग ले जा रहे हैं। सभी बहुत उदास हैं, मैं भी सब कुछ देख पा रहा हूँ। ... कितनी दूर ले जा रहे हैं ये लोग ! वहाँ की धरती,आकाश, पेड़-पौधे, अदभुत-अदभुत पेड़ के पत्ते हैं, जिन पर रंग-बिरंगे फूल, सुंदर-सुन्दर फल लगे हुए हैं! ऊँची चढ़ाई -वृक्ष सुंदर फूल जिन्हें मैं पहचानता भी नहीं। एक छोटी सी पहाड़ी पर चढ़ने के बाद, मुझे धीरे-धीरे नीचे ले जा रहे हैं। बहुत दूर... बहुत दूर। उस छोटी सी पहाड़ी को पार करने के बाद मुझे धीरे से नीचे रख दिया गया। चिता सजाई गयी। उसके ऊपर शरीर को रख दिया गया, चिता में अग्नि प्रदान की गयी, मेरा शरीर जलकर राख में परिणत हो गया। 
कई वर्षों बाद जब मैं अद्वैत आश्रम, मायावती गया हुआ था।  तब उस स्वप्न में देखे गए ठीक उसी दृश्य के समान वहाँ का  दृश्य भी दिखाई दिया ! मायावती में जहाँ पर कैप्टन सेवियर की समाधि -स्थल पर स्मृति फलक लगी हुई है, वहाँ जिस प्रकार के वृक्ष, पत्ते, फल-फूल लगे हुए हैं तथा थोड़ी सी चढ़ाई चढ़ने के बाद नीचे समतल भूमि है -ऐसा लगा उस दिन स्वप्न में मैंने ठीक इसी जगह को देखा था !
 (निर्विकल्प समाधि में ? ठाकुरदेव कहते थे जीवकोटि का मनुष्य 21 दिनों तक निर्विकल्प समाधि में रह सकता है, उसके बाद उसका शरीर सूखे पत्ते की तरह झड़ जाता है; पूज्य दादा 22 वें दिन पुनः अपने शरीर में लौट आये ! तो क्या दादा ईश्वर कोटि के मनुष्य नहीं थे ? ) इन्द्रियातीत सत्य का साक्षात्कार करने के बाद समाधि से पुनः शरीर में लौटा हुआ ईश्वर कोटि का मनुष्य ही महामण्डल आंदोलन का वुड बी लीडर/ भावी आध्यात्मिक शिक्षक बन सकता है।
छान्दोग्य उपनिषद्  में भी बड़े सुन्दर ढंग से कहा गया है --[ तेन उभौ कुरुतो यश्च एतद् एवं वेद यश् च न वेद । ]  कोई कह सकता है कि ॐ  के रहस्य को जाने वाला  और दूसरा ॐ  के रहस्य को नहीं जानने वाला अगर यज्ञ करे तो उसमे समान फल मिलेंगे।  लेकिन नहीं, ऐसा नहीं है। [ॐ के] ज्ञान होने से और ज्ञान नहीं होने से फल भिन्न होते हैं। कोई व्यक्ति यदि ॐ  के ज्ञान और  श्रधा के साथ अपने को संलग्न करके साधना करता है, तो उसका बहुत अधिक उत्तम फल प्राप्त होते हैं। यही ॐ की विस्तृत व्याख्या है। " अर्थात वही कार्य अधिक फलोत्पादक (efficient या प्रभावशाली) होता है, या उसी कार्य में सफलता मिलने की सम्भावना अधिक होती है, जिस कार्य को इस जगत के विषय में पर्याप्त समझ, तथा रिक्वायर्ड नो-हाउ, (दृष्टि को ज्ञानमयी बनाकर जगत को 'ब्रह्ममय' अनुभव करने की तकनीकी जानकारी) के साथ प्रारम्भ किया जाता है।" 
7.महामण्डल प्रतीक चिन्ह में स्वामी विवेकानन्द के logic:  
'रामकृष्ण अवतार की जन्मतिथि से सत्य युग का प्रारम्भ हुआ है ' को दर्शाया गया है ?
 स्वामी विवेकानन्द ने कहा था -[ FROM THE DATE THE RAMAKRISHNA INCARNATION WAS BORN, HAS SPRUNG THE SATYA-YUGA (Golden Age.!) 'रामकृष्णवतारेर जन्मदिन होइतेइ सत्ययुगोत्पत्ति होइयाछे !'
 ..... महामण्डल आंदोलन की गहराई को समझने के लिए हमें स्वामी जी के इस logic या तर्क-संगत कथन के तात्पर्य को भी समझना होगा?' 
'सत्ययुग का प्रारम्भ हुआ है ' - कहने से क्या हमलोगों को यह समझना चाहिए कि - श्री रामकृष्ण आये, और समाज में जतने भी निषिद्ध ,न्यायविरोधी,गलत कार्य हो रहे थे वे सभी समाप्त हो गये ? सब कुछ सुन्दर हो गया और जगत के सारे मनुष्य सत्य के पुजारी बन गये ? नहीं, हमारे शास्त्र कहते हैं कि "सतयुग" का प्रारम्भ (या युग-परिवर्तन) तो मनुष्य के विचार जगत में होता है। 'एतेरेय ब्राह्मण' में कहा गया है -
कलिः शयानो भवति, संजिहानस्तु द्वापरः । 
उत्तिष्ठँस्त्रेताभवति, कृतं संपद्यते चरन् । चरैवेति चरैवेति॥
आदर्श,उद्देश्य उपाय: नवनी दा अपनी पुस्तक 'जीवन नदी के हर मोड़ पर' में कहते हैं - " महामण्डल के आविर्भूत हो जाने बाद, सोंच-विचार कर के सर्वप्रथम इसका एक " प्रतीक-चिन्ह " निर्धारित किया गया।उसमे जो गोलाई है, वह पृथ्वी है; और सुदूर दक्षिणी भाग में स्थित कन्याकुमारी के ऊपर से शुरू होता हुआ भारतवर्ष का मानचित्र है। जिसके भीतर  एक परिव्राजक संन्यासी, ( रमता योगी) के रूप में स्वामी विवेकानन्द को दर्शाया गया है।
जिस प्रकार किसी शिल्पकार को मूर्ति को गढ़ने के लिये एक साँचे की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार युवाओं को भी एक वुड बी लीडर या भावी आध्यात्मिक शिक्षक के रूप में अपना जीवन-गठन करने के लिये, एक प्रेरणास्रोत (Role Model) जीवन्त और ज्वलन्त आदर्श को अपने सामने रखना आवश्यक है। महामण्डल के आदर्श हैं विश्वगुरु स्वामी विवेकानन्द। क्योंकि उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था। जैसा उनका ध्यान सिद्ध था, वैसा कर्म भी था। उनका सम्पूर्ण जीवन एक आदर्श आध्यात्मिक शिक्षक का  ('सत्यंवद-धर्मंचर' का) जीवन्त रूप था। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " निःस्वार्थपरता ही ईश्वर है ! " तथा - "विश्व का कल्याण करना ही भारत की नियति है !"
 भगिनी निवेदिता कहती हैं - 'दी सेल्फलेस मैन बिकम्स ऐज अ थंडरबोल्ट'। निःस्वार्थी मनुष्य (डीहिप्नोटाइज्ड मनुष्य) भी वैसा ही थंडरबोल्ट या वज्र जैसा  'ब्रह्मतेज और क्षात्रवीर्य' से सम्पन्न अप्रतिरोध्य मनुष्य बन जाता है, जिसके विषय में नहीं कहा जा सकता कि मैटर या एनर्जी ?इसीलिए  महामण्डल के प्रतीक चिन्ह में गोल-घेरे के चारों ओर छोटे-छोटे वज्र के निशान अंकित किये गए हैं। वज्र के निशान वास्तव में 'BE  AND MAKE' लीडरशिप ट्रेनिंग परम्परा में ५ अभ्यासों द्वारा साम्यभाव में अवस्थित वुड बी लीडर्स /नेताओ या "पूर्णतया निःस्वार्थी मनुष्यों" के प्रतिक हैं। जो भाषा-जाति-धर्म के आधार पर अपने-पराये का भेदभाव छोड़ कर, धरती पर सत्यतुग या आस्तिकता (श्रद्धा) को प्रतिस्थापित करने के लिए सम्पूर्ण भारतवर्ष में द्वार-द्वार तक विचरण करेंगे। 
इसीलिये महामण्डल का जय-घोष है : " निवेदिता वज्र हो अक्षय! " 
स्वामी जी इसी सर्वश्रेष्ठ समाज-सेवा को, "शिवज्ञान से जीव सेवा" कहते हैं। महामण्डल के प्रतीकचिन्ह या मोनोग्राम में स्वामी विवेकानन्द का जो दो आह्वान -' चरैवेति चरैवेति ' तथा ' Be and Make ' जो गुथा हुआ है - हमलोगों के व्यक्तिगत  और राष्ट्रीय जीवन को पुनरुज्जीवित करने में (प्रत्येक युवा को ही 'ऐतरेय'  बना देने में) समर्थ है! 
ऐतरेय का अर्थ होता है  ज्ञान-यज्ञ करानेवाला पुरोहित। अर्थात 'BE AND MAKE  लीडरशिप - ट्रेनिंग ट्रेडिशन' में प्रशिक्षित 'चपरास-प्राप्त' 'वुड बी लीडर' भावी आध्यात्मिक शिक्षक या 'ऋत्विज'! दादा कहते थे जो महामण्डल आंदोलन से जुड़ा रहेगा, उसका मृत्यु-भय तथा असार-वासनाये बिल्कुल समाप्त हो जाएँगी, अन्य कोई साधना किये बिना ही वह भ्रममुक्त या डीहिप्नोटाइज्ड हो जायेगा । 
महामण्डल के छोटे से प्रतिक चिन्ह में ये सारी बातें समाहित हैं -
जो वुड बी लीडर या भावी आध्यात्मिक शिक्षक 'बाह्य प्रकृति और अन्तःप्रकृति' को वशीभूत करके पूर्णतः निःस्वार्थी होकर साम्यभाव में स्थित हो जाता है; वह 
8. महामण्डल वेदान्त आंदोलन- 'BE AND MAKE' का पहला भाग 'BE' थोड़ा कठिन क्यों है ? 
इसका कारण बतलाते हुए संत तुलसी दास विनयपत्रिका में कहते हैं,
मोहजनित मल लाग बिबिध बिधि कोटिहु जतन न जाई।
जनम जनम अभ्यास-निरत चित, अधिक अधिक लपटाई ॥ १ ॥ 
 जन्मजन्मांतर के अभ्यास (देहाध्यास=देह को ही आत्मा समझने का भ्रम)  के कारण, हमलोग  शायद खुद के द्वारा ही हिप्नोटाइज्ड कर दिए गए हैं। और हिप्नोटाइज्ड अवस्था में  रहने के कारण हम सोचते हैं कि आत्मा का भी जन्म होता है, उसकी मृत्यु होती है, अर्थात आत्मा भी आते-जाते रहती है। क्योंकि यह सब तो शरीर के सन्दर्भ में कहा जाता है। शरीर (में अहं भाव ही) जन्म लेता और मरता है, क्योंकि आना-जाना तो शरीर के सन्दर्भ में कहा जाता है। उसी तरह आत्मा प्रसन्न है या अप्रसन्न है, आत्मा सुखी-दुखी है,यह सब भी मन के संदर्भ में कहा जाता है, आत्मा तो आनंदस्वरूप है। 
अति सरलीकरण (oversimplification) के रूप में भले नश्वर नामरूप को भी आत्मा कह दिया जाता हो, किन्तु यह एक अकाट्य सत्य है कि हम मरणधर्मा शरीर नहीं बल्कि अजर,अमर, अविनाशी आत्मा हैं! अतः शरीर और मन (नाम-रूप) के परिवर्तन से मेरे ऊपर कोई प्रभाव क्यों पड़ना चाहिए ? चित्त (बुद्धि) की गहराई तक प्रविष्ट, यह कुसंस्कार (superstition-गहरी लकीर) ही सबसे बड़ा मतिभ्रम (hallucination) है। अज्ञान के अंधकार में रस्सी को सर्प समझ लेना जैसा है। इसलिए अब स्वयं ही, अपने आप को इस आत्मसम्मोहन से डीहिप्नोटाइज्ड करना होगा ! महामण्डल द्वारा निर्देशित 5 अभ्यास हमें स्वयं ही करने होंगे, महामण्डल केवल मार्ग में आने वाली बाधाओं को हटाने में हमारी सहायता कर सकता है।
 इस सम्मोहन से मुक्त होने के प्रशिक्षण को ही 'BE AND MAKE निवृत्ति अस्तु महाफला वेदान्त लीडरशिप ट्रेनिंग' या महामण्डल आंदोलन कहते हैं। किन्तु दिसंबर के महीने में छह दिनों का यह प्रशिक्षण भी मिल्ट्री-ट्रेनिंग के जैसा एक कठिन-प्रशिक्षण है। यह प्रशिक्षण कठिन इसीलिये प्रतीत होता है, कि हम अपनी  पुरानी बुरी आदतों से-  'past bad habits' से छुटकारा पाना भी चाहें, तो भी वे आदतें हमें संकल्प में अटल नहीं रहने देतीं। 'कहावत है कंबल ही मुझे नहीं छोड़ रहा है' - इसीलिए महामण्डल के वार्षिक शिविर में फिल्ड ऑफिसर्स में सुबह की सिटी, दादा का मॉर्निंग चैंटिंग सुनकर भी, कई लोगों को  उठने में देर हो जाती है।
अतः इस मतिभ्रम की अवस्था से बाहर निकलने के लिए, डीहिप्नोटाइज्ड होने के लिए, (सर्प नहीं रज्जु है-जगत ब्रह्ममय है यह समझने के लिए) हमे  महामण्डल द्वारा निर्देशित '5 अभ्यासों' को अपना 'way of life' बना लेना होगा। किन्तु उन 5 अभ्यासों को चरित्रगत कर लेने या 'way of life'   के लिये जितना कठोर परिश्रम करना आवश्यक है, उतना परिश्रम हम करना नहीं चाहते हैं। इसीलिए  निषिद्ध कर्मों या दुष्कर्मों को त्याग देने का संकल्प-ग्रहण (ऑटो-सजेशन) के नियम का पालन हमलोग दृढ़ता पूर्वक नहीं करते हैं। इसीलिए इतना सब कुछ जानने और समझने के बाद भी हमारा  आत्मसम्मोहन (auto hypnosis) हमें सिंह-शावक बनने नहीं देता, और हम स्वयं को भेंड़-शिशु ही समझते रहते हैं। महामण्डल आंदोलन के एक शिक्षक/नेता को निरंतर साम्यभाव में स्थित रहने के लिए, हमें स्वयं को  डीहिप्नोटाइज्ड करना ही होगा - कैसे?
कठोपनिषद में कही गयी उस अनिवार्य प्रक्रिया को अपनाना ही होगा जो ऊपर में पहले कहा गया था - उसी को मैं पुनः कहता हूँ - 
' ना विरतो दुश्चरितात् , ना शान्तो ना समाहितः। 
ना शान्त मानसो वापि प्रज्ञानेन एनं  आप्नुयात्। 
दुष्कर्म (अनैतिक, या निषिद्ध कर्म) मनुष्य के मन में अपराध-बोध उत्पन्न कर देते हैं तथा मनुष्य अपने भीतर से अशान्त और दु:खी रहने लगता है। उसे जीवन भारमय एवं दुःखमय प्रतीत होने लगता है। चारित्रिक गुणों  से ही रहित हो जाने पर अन्य सब उपलब्धियाँ  विषमय अर्थात् अशान्तिप्रद ही  सिद्ध होते हैं। चारित्रिक गुणों (नैतिक मूल्यों) की कीमत पर महान् सफलता अथवा उपलब्धि भी सच्चा सुख नहीं दे सकती।
 हमें चरित्रवान मनुष्य बनना ही पड़ेगा।  रेत की बुनियाद पर निर्मित अट्टालिका  कदापि स्थिर नहीं रहती।इसीलिए स्वामी जी के गुरुभाई स्वामी प्रेमानन्द जी ने एक बार कहा था - 'Before becoming a Monk, one should become a gentleman' -अर्थात नेता या आध्यात्मिक शिक्षक के पहले किसी व्यक्ति को साम्यभाव में स्थित एक सज्जन मनुष्य (gentleman) बनना चाहिये इस अवस्था को प्राप्त करने का उपाय बतलाते हुए कहा गया है - हर समय अपने को सुनाते रहें - 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्य: श्रोतव्य: मन्तव्य: निदिध्यासितव्य:'  अर्थात आत्मा ही दर्शनीय ,श्रवणीय,मनंनीय एवं ध्यान करने योग्य है, ताकि वही हमारा  स्वभाव बन जाये।
" जब कोई मनुष्य अपने मन का विश्लेषण करते करते ऐसी एक वस्तु (ब्रह्म) के साक्षात् दर्शन कर लेता है,  जिसका किसी काल में नाश नहीं, जो अजर-अमर-अविनाशी है, जो स्वरूपतः सच्चिदानन्द है ! तब उसको फिर दुःख नहीं रह जाता, उसका सारा विषाद न जाने कहाँ गायब हो जाता है। पूर्वोक्त अवस्था के प्राप्त होने पर मनुष्य समझ जाता है कि -उसकी मृत्यु किसी काल में नहीं है, तब उसे फिर 'मृत्यु-भय' नहीं रह जाता। 'भय और अपूर्ण वासना' ही समस्त दुःखों का मूल है। अपने को पूर्ण समझ लेने-अनुभव करलेने के बाद असार वासनायें फिर नहीं रहतीं। पूर्वोक्त कारण द्वय - " मृत्यु-भय तथा भोगों में आसक्ति' का अभाव हो जाने पर फिर कोई दुःख नहीं रह जाता।  इसी जगह इसी देह में परमानन्द की प्राप्ति हो जाती है!इस ज्ञान की प्राप्ति के लिए एकमात्र उपाय है एकाग्रता !"
 इसके आगे और कुछ कहने की जरूरत नहीं क्योंकि- 'या मतिः सा गतिर्भवेत' यह सब कुछ हमारे अपने विचारों, अपनी मान्यताओं  पर निर्भर करता है। स्वयं आत्मसाक्षत्कार करने से जो दृढ़ विश्वास आता है,वह प्रवचन सुनने या शास्त्रों का अध्यन करते रहने से भी नहीं आता ! अतः हमें सर्वप्रथम हर प्रकार के निषिद्ध कर्मों से, मन को विचलित कर देने वाले दृश्यों को देखने सुनने से मुक्त होना होगा। केवल लक्ष्य पर दृष्टि रखकर सीधा आगे बढ़ो ! वेदान्त पर आधारित महामण्डल आंदोलन कहता है 'लक्ष्य प्राप्त किये बिना विश्राम मत लो ! 
' BE AND MAKE ' महामण्डल आंदोलन यही शिक्षा देता है।  प्रणाम -धन्यवाद !
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[चाणक्य नीति में कहा गया है -
 'अन्तःसारविहीनानामुपदेशो न जायते। 
मलयाचलसंसर्गात् न वेणुश्चन्दनायते।
 यदि शिष्य के हृदय में ही सार ना हो (आत्मश्रद्धा और विवेक न हो) तो उपदेश से कुछ नहीं बनता, जैसे मलय-गिरी (malaya mountain) के संसर्ग में रहने से भी खोखला बांस चंदन नहीं बन जाता।
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शिक्षण बिन्दु :
 " एक क्षण मैं सोचता हूँ कि 'अहं ब्रह्मास्मि'- मेरा अस्तित्व है और कुछ भी मुझे नष्ट नहीं कर सकता। किन्तु दूसरे ही क्षण मृत्यु-भय से मैं काँपने लगता हूँ। कभी सोचते हैं कि हम दूसरों की अपेक्षा बहुत धार्मिक और पवित्र हैं, किन्तु दूसरे ही क्षण एक धक्का लगता है और हम चारों खाने चित हो जाते हैं। इसका कारण? कारण यही है कि हमारा आत्मविश्वास मर गया है, और हमारी 'नैतिकता की रीढ़' टूट गयी है।" (७/१८०)

[50 minutes:  8.30 pm to 9.20 pm. Saturday, July 21, 2018] (45 minutes) 
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साम्यभाव : संसार की सारी वस्तुओं (3H) में शरीर हमारे सबसे निकट है, और मन उससे भी निकटतर है। जो प्राण (Energy) संसार में सर्वत्र व्याप्त है, उसका जो अंश इस शरीर और मन (अहंबोध ?) में कार्यशील है, वही अंश हमारे सबसे निकट है। प्रत्येक साधनार्थी को, उसके सबसे समीप जो कुछ है, उसीसे साधना शुरू करनी चाहिये। उस पर विजय पाने की चेष्टा करनी चाहिये। जिन्होंने प्राण को जीत लिया है, उन्होंने अपने मन को ही नहीं, वरन सबके मन को भी जीत लिया है। क्योंकि प्राण ही सारी शक्तियों (समस्त ऊर्जा) की सामान्यीकृत अभिव्यक्ति है। सम्मोहन विद्याविद (hypnotist), मनःशक्ति से आरोग्य करने वाले (mind-healers), विश्वास से आरोग्य करने वाले (faith-healers) सभी मतों की मूल में एक ही बात है। उन्होंने जाने-अनजाने मन की एक शक्ति शक्ति प्राणायाम का आविष्कार कर डाला है, परन्तु उस शक्ति के स्वरूप (माँ जगदम्बा के सर्वव्यापी विराट अहं -बोध) के संबन्ध में बिल्कुल अज्ञ हैं।  योगी जिस शक्ति का उपयोग समझ-बूझ के साथ करते हैं, वे भी बिना जाने-बुझे उसीका उपयोग कर रहे हैं। वह प्राण की शक्ति ही है। यह प्राण ही समस्त प्राणियों के भीतर जीवनी-शक्ति (vital forceके रूप में विद्यमान है। मन की विचारण-क्षमता (Thought ) इसकी सूक्ष्तम और उच्चतम अभिव्यक्ति है। जन्मजात प्रवृत्ति (instinct) इसका निम्नतम कार्यक्षेत्र है।इसको ही ज्ञानरहित चित्त वृत्ति अथवा मन की अचेतन (या अवचेतन, सुषुप्ति और स्वप्न की भूमि) भूमि (unconscious plane कहते हैं। विचारणा का इससे उन्नत स्तर है जिसे मन की चेतन भूमि (conscious plane ) कहते हैं। यहाँ हम युक्ति-तर्क (reason) करते हैं,निर्णय लेते हैं; लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है। (The causes of the phenomena intruding themselves in this small limit are outside of this limit.) बहुत से बाहरी तथ्य हमारी युक्ति-तर्क की सीमा से बाहर होने पर भी सहसा इसके भीतर आ जाते हैं। (अचानक एक वैज्ञानिक फॉर्मूला आविष्कृत जाता है!) 
योगियों का कहना है कि यह चेतन भूमि ही हमारे ज्ञान की चरम सीमा नहीं है। मन इन दोनों भूमियों से भी उच्चतर भूमि पर विचरण कर सकता है। उस भूमि को हम अतिचेतन भूमि (superconscious) या परम् चैतन्य की भूमि कहते हैं; और वही समाधि (Samâdhi) नामक पूर्ण एकाग्र अवस्था (perfect concentration, superconsciousness) है। जब मन उस परम् चैतन्य की भूमि में पहुँच जाता है, तब वह युक्ति-तर्क की सीमा के परे चला जाता है। और ऐसे तथ्यों का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करता है, जो जन्मजात प्रवृत्ति और युक्ति-तर्क के द्वारा कभी प्राप्त नहीं है। इस विश्व में अस्तित्व के प्रत्येक स्तर पर एक अखण्ड वस्तुराशि (one continuous substance) दिख पड़ती है। भौतिक संसार की ओर दृष्टिपात करने पर दीखता है कि एक अखण्ड वस्तु ही मानों नाना 'नाम -रूपों' में विराजमान है। [१/ ६१-६२]  
अहंभाव>साम्यभाव :विशेषाविशेष-लिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ॥साधनपाद २/१९॥
यह प्रकृति तीन प्रकार के उपादानों से निर्मित है-सत्व, रज और तम। सृष्टि के पूर्व प्रकृति जिस अवस्था में रहती है, उसे अव्यक्त, अविशेष (तन्मात्रा,अस्मिता) या अविभक्त कहते हैं। इस अवस्था में नाम-रूप का कोई भेद नहीं रहता, इस अवस्था में ये तीनों उपादान पूर्ण साम्यभाव से रहते हैं। जब साम्यावस्था नष्ट होती है, ये तीनों उपादान अलग अलग रूप से परस्पर मिश्रित होते रहते हैं। सांख्य के अनुसार, त्रिगुणमयी प्रकृति का सर्वोच्च प्रकाश है महत या बुद्धितत्व उसे सर्वव्यापी विराट माँ जगदम्बा के मातृहृदय का 'अहं'-बोध ( universal intelligence) कहते हैं। जिसका प्रत्येक व्यष्टि अहं -बोध (मानव-बुद्धि) एक अंश है। सांख्य मनोविज्ञान के अनुसार मनस ( Manas, the mind function) और बुद्धि ( and the function of the Buddhi, intellect. ) के कार्यों में विशेष भेद है। मन का काम है केवल संशय करना, ५ विषयों के आघात से चित्त पर पड़ने वाली इम्प्रेशन्स को इकट्ठा करना और उन्हें बुद्धि (individual Mahat) तक पहुँचा देना। बुद्धि उन सब विषयों का निश्चय करती है। महत से 'अहं' -बोध (egoism या अहंभाव) और 'अहंभाव' से सूक्ष्म भूतों ( fine materials) की उत्पत्ति होती है। ये सूक्ष्म भूत पुनः परस्पर मिलकर बाह्य स्थूल भूतों में परिणत होते हैं, उसीसे बाह्य जगत की उत्पत्ति होती है। सांख्य दर्शन का मत है कि बुद्धि से लेकर पत्थर के एक टुकड़े तक (beginning with the intellect down to a block of stone) सभी एक ही पदार्थ (मनवस्तु -चित्त) से उत्पन्न हुए हैं। उनमें जो भेद है, वह केवल उनको सूक्ष्मता और स्थूलता में है। सूक्ष्म कारण (cause) है और स्थूल कार्य (effect) है। सांख्य दर्शन के अनुसार समग्र प्रकृति के परे पुरुष है, वह जड़ (परिवर्तनशील, नाशवान) नहीं है। यह पुरुष, बुद्धि, मन , तन्मात्रा या स्थूल भूत, इनमें से किसी के सदृश नहीं है। यह सर्वथा अलग है, उसका स्वभाव सम्पूर्णतः भिन्न है। पुरुष को अवश्य मृत्युरहित (immortal), अजर,अमर, अविनाशी होना चाहिये, क्योंकि वह किसी प्रकार के संघात (combination, संयोजन) का परिणाम (result ) नहीं है। और जो किसी प्रकार के संयोजन का परिणाम नहीं है, उसका कभी नाश नहीं हो सकता। ये पुरुष और आत्मा असंख्य है।
अब हम इस सूत्र (विशेषाविशेष-लिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ॥१९॥) में कहे गए त्रिगुणों की विशेष (भूतेन्द्रिय), अविशेष (तन्मात्रा,अस्मिता), केवल चिन्हमात्र (महत) और चिन्हशून्य (प्रकृति) -इन चारो अवस्थाओं को समझ सकेंगे। [पदार्थ की तीन अवस्था -ठोस, तरल और गैस; चौथा प्लाज्मा।] 'विशेष' (defined-परिभाषित) शब्द उन ठोस या स्थूल पदार्थों को लक्ष्य करता है, जिसकी उपलब्धि हम पंचेन्द्रियों के माध्यम से कर सकते हैं।  
'अविशेष' (undefined -अपरिभाषित) का अर्थ है सूक्ष्मभूत -तन्मात्रा (very fine materials); इन तन्मात्राओं की उपलब्धि साधारण मनुष्य नहीं कर सकते। किन्तु पतंजलि कहते हैं, "यदि तुम योग (मनःसंयोग) का अभ्यास करो, तो कुछ दिनों में तुम्हारी अनुभव शक्ति इतनी सूक्ष्म हो जाएगी कि तुम तन्मात्राओं को भी देख सकने में समर्थ हो जाओगे। " तुमने शायद सुना होगा कि प्रत्येक मनुष्य के चारों ओर एक प्रकार की अपनी ज्योति (aura-प्रभामण्डल,दिव्यज्योति) होती है। प्रत्येक प्राणी से एक प्रकार का प्रकाश बाहर निकलता है। जिसे देखने में केवल योगी ही समर्थ होते हैं, हममें से सभी उसे देख नहीं सकते।जिस प्रकार फूल में से सदैव फूल की सूक्ष्मातिसूक्ष्म परमाणु स्वरूप तन्मात्राएँ (fine particles) लगातार बाहर निकलती रहती हैं, जिसके द्वारा हम उसकी गन्ध ले सकते हैं। उसी प्रकार हमारे शरीर से भी शुभ या अशुभ किसी न किसी प्रकार की शक्ति राशि बाहर निकलती रहती है। अतएव हम जहाँ कहीं भी जायेंगे, वहाँ का वातावरण इन तन्मात्राओं से परिपूर्ण हो जायेगा। और इसीलिए मन्दिर, मस्जिद, गिरजा आदि बनाने का भाव आया है। भगवान की उपासना तो कहीं भी की जा सकती थी ? उनको भजने के लिए मन्दिर बनाने की क्या आवश्यकता थी ? जहाँ लोग ईश्वर,(अल्ला, गॉड) की उपासना करते हैं, वह स्थान पवित्र तन्मात्राओं से परिपूर्ण हो जाता है। किसी मनुष्य के मन में उतना सत्वगुण नहीं हो, फिर भी यदि वह उपासनागृह में जायेगा, तो वह स्थान उसपर भी अपना असर डालेगा और उसके अन्दर सत्वगुण का उद्रेक कर देगा।अब हम समझ सकते हैं कि मंदिर और तीर्थ आदि इतने पवित्र क्यों माने जाते हैं। पहले मनुष्य ही उस स्थान को पवित्र करते हैं, उसके बाद उस स्थान की पवित्रता (दक्षिणेश्वर में ठाकुर का कमरा ,कोन्नगर की पवित्रता) स्वयं कारण बन जाती है और मनुष्यों को पवित्र बनाती रहती है। ईमारत के गुण से नहीं, वरन मनुष्य के गुण से ही मंदिर पवित्र माना जाता है, पर इस रहस्य को हम सदा भूल जाते हैं। और गाड़ी को बैल के आगे जोतना चाहते हैं। इसीलिये अधिक सत्वगुण-सम्पन्न आध्यात्मिक शिक्षक/नेता (साधु -सन्त) चारों ओर यह सत्वगुण (आध्यात्मिकता) बिखेरते हुए अपने परिवेश पर रातदिन प्रभाव डाल सकते हैं। कोई शिक्षक यहाँ तक पवित्र (आध्यात्मिक) हो सकता है कि उसकी पवित्रता बिल्कुल मूर्त रूप धारण कर लेती है  (जैसे नवनी दा !!!) कि जो कोई व्यक्ति उस शिक्षक के संस्पर्श में आता है, वही पवित्र हो जाता है। अब देखें 'चिन्ह मात्र ' ( "the indicated only" केवल संकेत मात्र means the Buddhi, the intellect. ) का अर्थ क्या है ? 'चिन्ह मात्र कहने से बुद्धि (महत या सर्वव्यापी विराट माँ जगदम्बा का अहं बोध) का बोध होता है। वह प्रकृति की पहली अभिव्यक्ति है, उसीसे दूसरी सब वस्तुएं अभिव्यक्त हुई हैं। 
                          त्रि -गुणों की अंतिम अवस्था का नाम है 'अलिंग' या चिन्ह-शून्य (the signless)। इसी बिन्दु पर आधुनिक विज्ञान और समस्त धर्मों के बीच एक भारी अन्तर देखा जाता है। प्रत्येक धर्म का मानना है कि यह सम्पूर्ण जगत (universe) बुद्धि या चैतन्य शक्ति (intelligence) से उत्पन्न हुआ है।ईश्वर हमलोगों के समान कोई व्यक्ति-विशेष हैं (पुरुष हैं या माँ जगदम्बा हैं ?या नहीं, इस विचार को छोड़कर; केवल मनोविज्ञान (psychological science,डार्विन का क्रमविकासवाद) की दृष्टि से ईश्वरवाद (theism, आस्तिकता) यह है कि चैतन्य-शक्ति (intelligence, या Energy?) ही सृष्टि की आदि वस्तु है। उसी से इन समस्त स्थूल पदार्थों की अभिव्यक्ति हुई है। किन्तु आधुनिक दार्शनिकगण कहते हैं, चैतन्य (शाश्वत-स्पंदन,Consciousness या intelligence) तो सृष्टि की आखरी वस्तु है। अर्थात उनका मत यह है कि अचेतन जड़ वस्तुएँ (unintelligent things) ही धीरे धीरे पशु के रूप में परिणत हुई हैं, और फिर पशु से उन्नत होते होते क्रमशः मनुष्यरूप धारण कर लेते हैं। वे यह दावा करते हैं कि चैतन्य से जगत की सब वस्तुएं प्रसूत नहीं हुई हैं, बल्कि चैतन्य [कृत्रिम चैतन्य, artificial intelligence] ही सृष्टि की आखिरी वस्तु है (intelligence itself is the last to come.)। 
यद्यपि धार्मिक (religious) और वैज्ञानिक (scientific) दोनों वक्तव्य ऊपर से एक दूसरे के विरोधी प्रतीत होते हैं; तथापि इन दोनों सिद्धांतों को ही सत्य कहा जा सकता है। एक अनन्त श्रृंखला ( infinite series) को लें जैसे, 'A—B—A—B—A—B, etc.' अब प्रश्न यह है कि इसमें 'A' पहले है या 'B'? यदि तुम इस श्रृंखला को  A—B क्रम से लोगे तो 'A' (Energy) को ही प्रथम कहना पड़ेगा। पर यदि तुम इसे B-A क्रम से लोगे तो 'B' को (Matter को) आदि या प्रथम मानना होगा। अतः हम इस जगत को (3H) को जिस दृष्टि से देखेंगे, वह उसी प्रकार का प्रतीत होगा ! [या मतिः सा गतिर्भवेत] चैतन्य (Consciousness या intelligence) ही रूप-परिवर्तन (modification) के अनुलोम-परिणाम को प्राप्त होकर स्थूल पदार्थ (gross matter)बन जाता है, और स्थूल पदार्थ फिर रूप-परिवर्तन के विलोम-परिणाम को प्राप्त होकर चैतन्य-रूप (intelligence) में लीन (merge) हो जाता है, और इस प्रकार क्रम चलता रहता है। 
सांख्य और अन्य सब धर्मों के आचार्यगण (साम्यभाव में अवस्थित शिक्षक/नेता) चैतन्य (Energy , 'A' को, Consciousness,या intelligence, माँ जगदम्बा) को ही प्रथम स्थान देते हैं। और उनके अनुसार श्रृंखला इस प्रकार रूप धारण करती है, पहले चैतन्य (Consciousness या Energy) और बाद में जड़ पदार्थ (Matter)| किन्तु (मोटी बुद्धि वाले) वैज्ञानिक सत्य को टटोलते हुए पहले 'B' (Matter) को पकड़ते हैं, और कहते हैं पहले पदार्थ (Matter) बाद में 'intelligence' या चैतन्य (Consciousness,
Energy) पर ये दोनों ही उसी एक श्रृंखला  'A—B—A—B—A—B, etc.' की बात कहते हैं। किन्तु भारतीय वेदान्त दर्शन स्थूल पदार्थ (Matter) और चैतन्य (Energy, या intelligence) दोनों के परे जाकर उस पुरुष या आत्मा का साक्षात्कार करता है, जो ज्ञान (Consciousness या intelligence) के भी अतीत है। यह 'intelligence' (व्यष्टि अहंबोध) तो उस ज्ञानस्वरूप आत्मा (माँ जगदम्बा) से उधार लिए हुए आलोक के समान है। 
THE REAL AND THE APPARENT MAN: वास्तविक और प्रतिभाषिक मनुष्य: 
सब प्रकार की शक्तियाँ (Energy) प्राण की और सब प्रकार के भौतिक पदार्थ (Matter) आकाश की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। अब आकाश और प्राण को उनके मूल तत्व में समाधित (resolved) करना होगा। उन्हें 'मन' नामक एक उच्चतर सत्ता में समाधित किया जा सकता है। मन अर्थात महत-तत्व या सार्वभौमिक विचार शक्ति (the universally existing thought-power, माँ जगदम्बा का सर्वव्यापी विराट 'अहं'-बोध) से प्राण और आकाश दोनों की उत्पत्ति होती है। प्राण और आकाश की अपेक्षा 'विचार' 'अस्तित्व' (being) की और अधिक सूक्ष्मतर अभिव्यक्ति है। विचार स्वयं इन दोनों में विभक्त हो जाता है। प्रारम्भ में यह सर्वव्यापी मन ही था और इसने स्वयं व्यक्त, परिवर्तित और विकसित (manifested, changed, evolved) होकर आकाश और प्राण ये दो रूप धारण किये, और इन दोनों के सम्मिश्रण से सारा जगत बना। 
हमारे इस परिवर्तनशील शरीर और मन के पीछे एक स्थिर और अपरिणामी सत्ता (हृदय -आत्मा) है। किन्तु हममें से बहुत कम लोगों ने ही अपने पीछे स्थित उस स्थिर समुद्र का थोड़ा सा आभास पाया होगा। हमारे जैसे साधारण लोगों के लिए तो वह समुद्र सदैव तरंगों से आलोड़ित रहता है और जगत हमें तरंगों (नाम-रूप ) की चंचल राशि मात्र प्रतीत होता है। 3H - आत्मा,मन और शरीर, ये तीनों पृथक पृथक वस्तुएं नहीं हैं। बल्कि वे एक ही हैं, क्योंकि इन तीनों से बना हुआ मनुष्य वस्तुतः एक ही है। एक ही वस्तु कभी शरीर, कभी मन, और कभी शरीर और मन से अतीत आत्मा के रूप में प्रतीत होती है। किन्तु वह एक ही समय में यह तीनों नहीं होती। जो शरीर को देखते हैं, मन को नहीं देख पाते, जो मन को देखते हैं आत्मा को नहीं देख पाते , और जो आत्मा को देख लेते हैं, उनके लिए शरीर और मन दोनों न जाने कहाँ चले जाते हैं। जो केवल गति देखते हैं, वे सम्पूर्ण शांत भाव ( absolute calm को नहीं देख पाते, और जो इस सम्पूर्ण शांत भाव को देख लेते हैं, उनके लिए गति न जाने कहाँ चली जाती है। रस्सी में सर्प का भ्रम हुआ। जो व्यक्ति रस्सी में सर्प ही देख रहा होता है, उसके लिए रस्सी उस समय न जाने कहाँ चली जाती है। और जब भ्रान्ति दूर होने पर वह व्यक्ति रस्सी देख लेता है, तो उसके लिए फिर सर्प नहीं रह जाता। जब 'विवेकज ज्ञान' का उदय होता है, तब मनुष्य देखता है कि वास्तव में 'मैं' और 'तुम' कुछ नहीं है, सब एक ही है। 'मैं ही यह परिवर्तनशील जगत हूँ, और मैं ही अपरिणामी, निर्गुण, नित्य पूर्ण, नित्यानन्दमय हूँ !'चाहे कह लो -'सभी मैं हूँ ', या कह लो 'सभी तुम हो। ' यह द्वैत ज्ञान (बिरेन-रनेन आदी सभी तुम हो!) बिल्कुल मिथ्या है , और सारा जगत इसी द्वैत ज्ञान का फल है। [जियो तो ऐसे जिओ जैसे सब तुम्हारा है, मरो तो ऐसे मरो जैसे तुम्हारा कुछ भी नहीं !]   
" यह सम्पूर्ण विश्व कभी ब्रह्म में ही था। ब्रह्म से मानो यह निकल आया है, और तबसे सतत भ्रमण करता हुआ यह पुनः अपने उद्गम स्थान पर वापस जाना चाहता है। २/२२० ] 'सहस्रों लोगों में से कुछ ही लोग यह जानते हैं, कि वे मुक्त हो जायेंगे। संसार के असंख्य लोग अपने भौतिक कार्य-कलापों (आहार-निद्रा -भय -मैथुन) से ही संतुष्ट हैं। पर कुछ शिक्षक/नेता ऐसे भी अवश्य मिलेंगे, जो जाग्रत (डीहिप्नोटाइज्ड) हो चुके हैं; और जो संसार-चक्र से ऊब कर भ्रमरहित हो गए हैं। वे अपनी मौलिक साम्य -अवस्था में पहुँचना चाहते हैं। ऐसे विशिष्ट लोग जानबूझकर मुक्ति के लिए प्रयत्न करते (लीला करते) हैं ! जबकि आम लोग उसमें रत रहते हैं। २/२२१ ]  
THE IDEAL OF KARMA-YOGA
पूर्ण साम्यावस्था ( Perfect equilibrium) की प्राप्ति अथवा ईसाई जिसे  'परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से बिलकुल परे है' कहते हैं', उसकी प्राप्ति इस जगत में नहीं हो सकती, और न स्वर्ग में अथवा न किसी ऐसे स्थान में जहाँ हमारे मन और विचार जा सकते हैं। क्योंकि यह जगत देश, काल और निमित्त (space, time, and causation.) के बन्धनों में जकड़ा हुआ है। अतएव हमें इस (नाम-रूपात्मक) विश्व के परे जाना होगा। ३/७१] 
जब तक हम जीवन (स्त्री/पुरुष शरीर) के प्रति तृष्णा को नहीं छोड़ते, इन क्षणभंगुर इन्द्रिय-विषयों के प्रति, जन्मजन्मांतर के भोग -अभ्यास से सीखी हुई जीवन के प्रति अपनी प्रबल आसक्ति (our transient conditioned existence) का त्याग नहीं करते, तब-तक इस जगत से अतीत उस असीम मुक्ति (डीहिप्नोटाइज्ड अवस्था ) की एक झलक भी पाने की आशा करना व्यर्थ है। 
किन्तु इस संसार (नाम-रूपात्मक जगत) के प्रति घोर आसक्ति का त्याग करना बड़ा कठिन है। बहुत थोड़े लोग ही ऐसा कर पाते हैं। हमारे शास्त्रों में इसके लिये दो मार्ग बताये गए हैं -निवृत्ति और प्रवृत्ति। पहला मार्ग निवृत्ति का है, जिसमें 'नेति','नेति' ["Neti, Neti" (not this, not this)] (यह नहीं, यह नहीं) करते हुए सर्वस्व का त्याग करना पड़ता है। और दूसरा मार्ग प्रवृत्ति का है-जिसमें 'इति','इति' करते हुए सब वस्तुओं का भोग करके फिर उनका त्याग किया जाता है। ३/७१ ] 
निवृत्ति मार्ग (negative way) बहुत कठिन है, यह मार्ग केवल 'प्रबल इच्छा-शक्तिसम्पन्न' तथा विशेष उन्नत महापुरुषों ( very highest, exceptional minds and gigantic wills /ईश्वर-कोटि ?) के लिये ही साध्य है। उनके कहने भर की देर है - "No, I will not have this," नहीं, मुझे यह नहीं चाहिये' , कि बस उनका शरीर और मन तुरन्त उनकी आज्ञा का पालन करता है। और वे संसार के बाहर चले जाते हैं -(अर्थात नाम-रूपात्मक संसार में आसक्ति के परे चले जाते हैं !) परन्तु ऐसे लोग बहुत ही दुर्लभ हैं। (इसीलिए ठाकुर निवृत्ति मार्ग के सप्त-ऋषियों में से एक नरेन्द्रनाथ को अपने साथ लाये थे ?) यही कारण है कि अधिकांश लोग प्रवृत्ति -मार्ग (positive way) ही ग्रहण करने की पात्रता रखते हैं। इस मार्ग में उन्हें बन्धनों को तोड़ने के लिये बन्धनों की ही सहायता लेनी पड़ती है। 
विवाह आदि भोग करना भी एक प्रकार का त्याग ही है-अन्तर इतना ही है कि यह धीरे धीरे, क्रमशः सब नश्वर भोग-पदार्थों को जानकर, उनका भोग करके उसकी असारता को अपने अनुभव से जानकर, उन भोग पदार्थों में अपनी घोर आसक्ति को त्याग देना पड़ता है। और इस प्रकार क्रमशः वह गृहस्थ साधक भी आसक्ति-शून्य शिक्षक/ नेता बनने में समर्थ हो जाता है। प्रथम मार्ग को ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द) और दूसरे को कर्मयोग (स्वामी ब्रह्मानन्द) कहते हैं। ३/७२ ]  
" अब हमलोग 'समानता के विचार' (idea of equality) पर चर्चा करेंगे। स्वर्णयुग स्थापित करने सम्बन्धी ये धारणायें तथाकथित 'समाज-सेवा' की प्रेरक-शक्ति (motive power) रही हैं। बहुत से धर्म अपने एक अंग के रूप में इस सिद्धान्त (समानता के विचार या idea of equality) का प्रचार भी किया करते हैं। इनकी धारणा है कि 'परमपिता परमेश्वर' इस जगत का शासन करने के लिये स्वयं आ रहे हैं, और उनके आने पर लोगों में लोगों में किसी प्रकार का 'अवस्था भेद' नहीं रह जायेगा। जिन ईसाईयों ने इस भाव का प्रथम प्रचार किया, वे अज्ञानी धर्मान्ध व्यक्ति थे। परन्तु उनका विश्वास निष्कपट था। आजकल स्वर्णयुग की इसी भावना ने समानता (equality) का - स्वाधीनता, साम्य और मैत्री ( liberty, equality, and fraternity.) का रूप धारण कर लिया है। यह भी एक धर्मान्धता (fanaticism) है। 
सच्ची समानता (साम्यवाद या True equality) न तो कभी संसार में हुई थी, और न कभी भविष्य में होने की आशा है। सृष्ट जगत में सभी मनुष्य एक समान हो जायें -ऐसा होना असम्भव है। इस प्रकार के थोपी गयी असम्भव साम्य (राजनितिक साम्यवाद - This impossible kind of equality) का परिणाम तो मृत्यु ही होगा। सृष्टि का अर्थ ही विषमता है। विविधता ही सृष्टि का आधार है। जगत विविधता से परिपूर्ण क्यों है ? त्रिगुणों के नष्ट संतुलन (Lost balance) के कारण ही जगत बना है। आद्यावस्था (primal state) में, (सृष्टि से पहले की अवस्था में) -जिसे प्रलय कहा जाता -में ही पूर्ण संतुलन (perfect balance) होना सम्भव है। 
तब फिर इन सब सृष्टि निर्माणात्मक शक्तियों ( formative forces) का उद्भव किस प्रकार होता है ? -विरोध, प्रतियोगिता एवं प्रतिद्वन्द्विता ( struggling, competition, conflict.) के द्वारा ही। मानलो संसार के सब भौतिक परमाणु (इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन आदि) सम्पूर्ण साम्यावस्था (equilibrium) में स्थित हो जाएँ -तो फिर क्या सृष्टि की प्रक्रिया हो सकेगी ? विज्ञान हमें सिखाता है कि यह असम्भव है। विषमता (असमानता,ऊँच-नीच, Inequality) सृष्टि की नींव है। असामनता सृजन का आधार है। परन्तु साथ ही साथ खोये हुए साम्यभाव (equality) को पुनर्स्थापित करने की चेष्टा [ विद्याशक्ति, गुरु-शिष्य वेदान्त शिक्षक -प्रशिक्षण परम्परा या ('BE AND MAKE '- Leadership Training) भी]  उतनी ही आवश्यक है, जितनी कि वे शक्तियाँ (अविद्या शक्ति,असमानता,ऊँच-नीच, Inequality की शक्तियाँ) जो उस साम्यावस्था को नष्ट करने का प्रयत्न करती है। 
वह कौन सी चीज है जो मनुष्य मनुष्य में भेद स्थापित करती है ? वह है -'difference in the brain' 
मस्तिष्क की भिन्नता। (मन को एकाग्र करने की क्षमता में अन्तर ही एक मनुष्य को दूसरे से भिन्न बना देती है !) आधुनिक युग में एक पागल (lunatic) के अतिरिक्त कोई यह नहीं कह सकता कि हम सब मस्तिष्क की समान शक्ति (एक समान मन को एकाग्र करने की क्षमता) लेकर ही उत्पन्न हुए हैं। हम सब इस संसार में विभिन्न और असमान प्रतिभा (unequal endowments) लेकर के उत्पन्न ही हुए हैं। कोई व्यक्ति प्रतिभा में बड़ा धनी तो कोई छोटा रूप में उत्पन्न ही होता है। और 'जन्म से पूर्व निर्धारित' (prenatally determined) इस प्रतिबंधक (condition) से मुक्त होने का कोई मार्ग नहीं है। (नहीं तो आदिवासियों ने रॉकेट का निर्माण क्यों नहीं किया ?) सभी मनुष्य पूर्वजन्मों में अर्जित किये गए, अलग अलग प्रकार के  संस्कारों (आदतों और दृढ़ हो चुकी प्रवृत्तियों, या संस्कार समष्टि) की गठरी 'different bundles of past impressions' को साथ लेकर उत्पन्न होते हैं, और उसे विकसित करके अभिव्यक्त करते हैं। 'Absolute non-differentiation is death.' - अर्थात आत्यंतिक विभेद-राहित्य ही मृत्यु है। जब तक यह संसार है , तब तक विभेद भी रहने वाला है ! तथा स्वर्णयुग की पूर्ण समता (millennium of perfect equality) तभी आएगी जब कल्प का (cycle of creation) का अन्त हो जायेगा। उसके पहले समानता (equality) नहीं आ सकती। 
परन्तु फिर भी स्वर्णयुग को लाने की कल्पना कर्म करने (समाज-सेवा करने) की प्रबल प्रेरक -शक्ति (motive power) है। जिस प्रकार सृष्टि के लिए विषमता (inequality ऊँच-नीच प्रतिभा) आवश्यक है, उसी प्रकार उसे सीमित करने की चेष्टा -  'the struggle to limit it' (BE AND MAKE VEDANTA LEADERSHIP TRAINING) भी नितान्त आवश्यक है।   "If there were no struggle to become free and get back to God, there would be no creation either." यदि मुक्ति (भ्रममुक्ति डीहिप्नोटाइज्ड) और ईश्वर (माँ जगदम्बा) के पास लौट जाने की चेष्टा (मनःसंयोग सिखलाने वाला आध्यात्मिक शिक्षक /नेता ) न हों तो सृष्टि भी कायम नहीं रह सकती। इन दोनों शक्तियों -प्रवृत्ति और निवृत्ति के अन्तर से ही, प्रत्येक मनुष्य के भीतर जो कर्म करने की प्रेरणा का हेतु होता है, उसका निर्धारण किया जा सकता है। कर्म के प्रति प्रबल प्रेरक-शक्तियाँ (विद्या -अविद्याmotives to work) सदा विद्यमान रहेंगी, कुछ (सकाम प्रेरणाएं) बन्धन की ओर ले जाएँगी और कुछ (निष्काम प्रेरणाएं) मुक्ति की ओर। 
[दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है।
                   मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो सोना है। निदा फ़ाज़ली]
संसार का यह 'चक्र के भीतर चक्र' (wheel within wheel) एक भीषण (terrible) यंत्र-रचना है ! इस संसार-यंत्र के भीतर एक बार हाथ पड़ा नहीं, कि हम फंसे नहीं और फंसे नहीं कि गए नहीं !(एक बार प्रवृत्ति मार्ग में गए नहीं कि निवृत्ति में आना असम्भव लगने लगता है। चलती चाकी देख के दिया कबीरा रोये, दो पाटन के बीच में बाकी बचा न  कोए ! ) संसार का यह प्रचण्ड शक्तिशाली, जटिल यंत्र हम सभी को खींचे ले जा रहा है। हम सभी सोचते हैं कि अमुक कर्तव्य (certain duty) पूरा होते ही हमें छुट्टी मिल जाएगी, और हम चैन की साँस लेंगे; पर उस कर्तव्य का मुश्किल से एक अंश भी समाप्त नहीं हो पाता कि दूसरा कर्तव्य सिर पर आ खड़ा होता है। 
इस संसार यंत्र से बाहर निकलने के केवल दो ही उपाय हैं। एक तो यह कि इस यंत्र से सारा नाता ही तोड़ दिया जाय (निवृत्ति मार्ग) -यह यंत्र केवल चलता रहे, हम इससे अलग हटकर खड़े हो जाएँ और अपनी समस्त वासनाओं का एक झटके में त्याग कर दें। ऐसा कह देना तो अवश्य बड़ा सरल है ,परन्तु इसे अमल में लाना असम्भव जैसा प्रतीत होता है। मैं नहीं कह सकता की बीस लाख (twenty millions) मनुष्यों में से एक भी ऐसा कर सकेगा। दूसरा उपाय है -हम इस संसार क्षेत्र में कूद पड़ें और कर्म का रहस्य (secret of work-BE AND MAKE वेदान्त लीडरशिप ट्रेनिंग) जान लें। इसीको कर्मयोग कहते हैं। इस संसार यंत्र से दूर न भागो, वरन इसके अंदर ही खड़े होकर (नाम-रूपों के प्रति अनासक्त और भ्रममुक्त होकर साम्यभाव में अवस्थित रहते हुए निःस्वार्थ भाव से) कर्म करने का रहस्य सीख लो। कर्मयोगी का कथन है कि जो व्यक्ति नाम-यश प्राप्त करने या स्वर्ग प्राप्त करने की इच्छा से भी सत-कर्म करता है,वह भी अपने को बन्धन में डाल लेता है। किसी कार्य में यदि थोड़ी सी भी स्वार्थपरता रहे, तो वह कर्म हमें मुक्त करने के बदले हमारे पैरों में और एक बेड़ी डाल देता है। गृहस्थ जीवन के भीतर रहकर भी कौशल से कर्म करके (माँ जगदम्बा का पुत्र -भक्त -हीरो बनके) बाहर निकल आना सम्भव है। इस यंत्र से होकर ही बाहर निकलने का मार्ग (महामण्डल आंदोलन) है। [प्रवृत्ति से होकर निवृत्ति में आने में हमारे शास्त्र बाधा नहीं देते।]  
एकमात्र गौतम बुद्ध ही ऐसे शिक्षक /नेता थे जो 'निःस्वार्थ कर्म-प्रवृत्ति निवृत्ति अस्तु महाफला' के अनुसार प्रवृत्ति मार्ग से होते हुए निवृत्ति में आ खड़े हुए थे। भगवान बुद्ध को छोड़कर मानवजाति के अन्य सभी मार्गदर्शक नेताओं (पैगंबरों) की निःस्वार्थ कर्म-प्रवृत्ति (unselfish action) के पीछे कोई न कोई बाह्य उद्देश्य (external motives) अवश्य था। एकमात्र बुद्ध को छोड़कर संसार के अन्य सभी पैगंबरों को दो श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है। एक तो वे जो अपने को संसार में अवतीर्ण भगवान का अवतार (incarnations of God come down on earth) कहते थे, और दूसरे वे जो अपने को केवल ईश्वर का दूत (messengers from God, माँ जगदम्बा का पुत्र ?) मानते थे। वे कहते थे 'भला करो और भला बनो' -बस यही तुम्हें निर्वाण की ओर (भ्रममुक्ति की ओर) या जो कुछ सत्य (इन्द्रियातीत सत्य है) उसकी ओर ले जायेगा।  Do good and be good. And this will take you to freedom and to whatever truth there is."
केवल वही व्यक्ति जो साम्यभाव में अवस्थित हो चुका हो, सबकी अपेक्षा उत्तम शिक्षक/नेता के रूप से कार्य करता है, जो पूर्णतया निःस्वार्थी है, जिसे न तो लस्ट और लूकर में आसक्ति हो न नाम-यश पाने की न किसी अन्य वस्तु की। और मनुष्य जब ऐसा करने में समर्थ हो जायेगा, तब वह भी एक बुद्ध (शिक्षक/नेता) बन जायेगा। और उसके भीतर से एक ऐसी आध्यात्मिक शक्ति प्रकट होगी, जो दूसरों के मानसिक जगत में युगपरिवर्तन लाकर,उन्हें भी सत्ययुग में प्रतिष्ठित कर देगी। महामण्डल आंदोलन का वैसा शिक्षक/नेता  कर्मयोग के चरम आदर्श का प्रतिक है। This man (Navni da) represents the very highest ideal of Karma-Yoga.३/८६-९० ]
THE IDEAL OF A UNIVERSAL RELIGION : 
कौन कहता है, हम सब समान हैं ? केवल पागल। क्या हम बल, बुद्धि, शरीर में समान हैं ? एक व्यक्ति दूसरे की अपेक्षा बलवान है, तो किसी की प्रतिभा दूसरे से अधिक है। फिर भी समता का सिद्धान्त ही हमारे हृदय को स्पर्श करता है। 'विविधता में एकता' सृष्टि का विधान है। (Unity in variety is the plan of the universe.) हम सब लोग मनुष्य होते हुए भी परस्पर पृथक हैं। पुरुष होने के नाते तुम स्त्री से भिन्न हो, किन्तु मनुष्य होने के नाते स्त्री और पुरुष एक ही हैं। ऐसा समय कभी नहीं आएगा , जब सब लोगों का मुँह एक रंग का हो जाय। समस्त संसार में कभी भी एक प्रकार की अनुष्ठान-पद्धति (universal ritual) प्रचलित नहीं हो सकती। ऐसा किसी समय नहीं हो सकता, अगर कभी हो भी जाय, तो सृष्टि लुप्त हो जाएगी। क्योंकि विविधता (variety) ही जीवन की मूल भित्ति है। हमें आकारयुक्त किसने बनाया है ? वैषम्य (Differentiation) ने। सम्पूर्ण साम्यभाव (Perfect balance) होने से हमारा विनाश अवश्यम्भावी है। ३/१४५ 
सांख्य दर्शन के अनुसार सत्व, रज और तम -जिनकी साम्यावस्था अव्यक्त प्रकृति है और जिनकी वैषम्यावस्था से यह जगत उत्पन्न होता है। इन्हीं गुणों और उपादानों समस्त मानवदेह बनी है। सत्व पदार्थ की प्रधानता ही आध्यात्मिक उन्नति के लिए सबसे आवश्यक है। ४/३८ ] सांख्य दर्शन के अनुसार तमस निम्नतम
 शक्ति है जो आकर्षण स्वरूप है, रजस उसकी अपेक्षा उच्तर है -जो विकर्षण स्वरुप है,तथा जो सर्वोच्च शक्ति इन दोनों का सन्तुलस्वरूप है, वही सत्व गुण है। जब प्रकति के तीनों गुण पूर्ण साम्यावस्था में रहते हैं, तब सृष्टि का अस्तित्व नहीं होता। किन्तु ज्योंही यह साम्यावस्था नष्ट होती है, त्योंही उनका संतुलन भंग हो जाता है, और उनमें से एक शक्ति दूसरी शक्तियों की अपेक्षा प्रबलतर हो उठती है, त्यों ही गति का आरम्भ होता है और सृष्टि होने लगती है। साथ ही हर वस्तु में उसी आद्य साम्यावस्था में फिर से लौट जाने की प्रवृत्ति होती है। और ऐसा समय आता है, जब कुछ व्यक्त भावापन्न हुआ था, उसका सम्पूर्ण विनाश हो जाता है।४/१९३ ब्रह्माण्डविज्ञान /Cosmology] अनादिवातं का अर्थ है 'बिना स्पंदन के अस्तित्ववान था। ' 
"ये तीनों गुण नहीं हैं, जगत के उपादान हैं, जिनसे समग्र विश्व विकसित हुआ है। प्रथम विकास महत (अर्थात सर्वव्यापी विराट बुद्धि) और उससे अहंकार (माँ जगदम्बा के सर्वव्यापी विराट मातृहृदय का अहं -बोध) की उत्पत्ति होती है। अहंकार को सांख्य एक तत्व मानता है, उस अहंकार से ही पंच कर्मेन्द्रियाँ और पंच ज्ञानेन्द्रियों तथा पांच विषयों रूप,रस, गंध, शब्द स्पर्श आदि के सूक्ष्म परमाणुओं की उपत्ति होती है। उन्हीं तन्मात्राओं से स्थूल पंचभूतों की उत्पत्ति होती है। बुद्धि, अहंकार और मन, इन तीनों के माध्यम से कार्य करने वाला चित्त है, जो पंच-प्राण नामक शक्तियों की सृष्टि करके उन्हें परिचालित कर रहा है।४/२११] 
"हमारे पास वेदान्त मत है, लेकिन उसे कार्यरूप में परिणत करने की क्षमता नहीं है। हमारे ग्रंथों में सार्वभौम साम्यवाद का सिद्धान्त है, किन्तु व्यवहार में महा भेदबुद्धि है। मैंने अपने जैसे क्षुद्र जीवन में यह अनुभव कर लिया है कि महान उद्देश्य, निष्कपटता और अनन्त प्रेम से विश्वविजय की जा सकती है। [सर्वदा साम्यभाव में अवस्थित रहने वाला-] वीर (हीरो) तो वही है जो भ्रम-प्रमाद तथा दुःखपूर्ण संसार-तरंगों के आघात से अविचल रहकर एक हाथ से आँसू पोछता है और दूसरे अकम्पित हाथ से दूसरों के उद्धार का मार्ग प्रदर्शित करता है ! ऐसे गुणों से संपन्न एक भी मनुष्य (वेदान्त केसरी) करोड़ों पाखण्डी एवं निर्दयी मनुष्यों (सियारों) की दुर्बुद्धि को नष्ट कर सकता है। ६/३०७ 
Cyclic Rest And Change. कल्प -विराम एवं परिवर्तन : 

यह समस्त विश्व खोये हुए संतुलन का एक दृष्टान्त है - 'This whole universe is a case of lost balance.' समस्त प्रकार की गतियाँ विक्षुब्ध,अशांत (disturbed) विश्व द्वारा अपनी खोई हुई साम्यावस्था (equilibrium) को पुनः प्राप्त कर लेने के निमित्त संघर्ष है, क्योंकि साम्यावस्था में गति हो ही नहीं सकती।अतः अन्तःजगत (internal world) के क्षेत्र में साम्यावस्था विचार (मन) के परे होगी। क्योंकि विचार स्वयं ही एक गति है। बाह्यजगत और अन्तःजगत के सारे लक्षण (indication या संकेत) प्रसारण (expansion) के द्वारा पूर्ण साम्यावस्था (perfect equilibrium ) प्राप्त कर लेने के पक्ष में है, और समग्र विश्व उसी की ओर धावमान है। अतः हमें यह कहने का कोई अधिकार नहीं कि वह अवस्था (प्रवृत्ति से होकर निवृत्ति में जाने की अवस्था) कभी प्राप्त ही नहीं की जा सकती। फिर यह भी एक तथ्य है कि उस साम्यावस्था में किसी भी प्रकार की विविधता (variety) का होना असम्भव है। साम्यावस्था में एकरूपता (homogeneous) होना अनिवार्य शर्त है; क्योंकि जब तक दो परमाणु भी शेष रहेंगे, वे एक दूसरे को आकृष्ट (attract) और विकृष्ट (repel) करते हुए, उस संतुलन को भंग करने की चेष्टा करते रहेंगे। अतएव यह साम्यावस्था (state of equilibrium) -एकत्व (unity),विराम(rest), और सदृशता (homogeneity) की है। हृदय की भाषा में कहा जाय (In the language of the internal) तो वह साम्यावस्था (समाधि) न विचार है, न शरीर न वह कुछ जिसे हम गुण (attribute) कहते हैं। यदि इस देश-काल -निमत्त से परे की अवस्था (इन्द्रियातीत अवस्था) को कोई नाम देना ही हो तो उस साम्यावस्था को हम 'सच्चिदानन्द' सत (existence)-चित (आत्म-चेतना,आत्मज्ञान self-consciousness) -आनन्द (blissfulness परमानन्द) का नाम दे सकते हैं। 
इस प्रकार इस अखण्ड साम्यावस्था में खण्ड (द्वैत का भाव, मैं -तुम -यह -वह) नहीं हो सकता। अनिवार्य रूप से इस अवस्था को अखण्ड ही होना होना चाहिये, और यहाँ पहुँचकर मैं-तू -यह -वह- ( I, thou, etc.)का समस्त काल्पनिक भेद, स्त्री-पुरुष, ऊँच-नीच, हिन्दू मुसलमान आदि विभिन्नतायें (variations) विलुप्त हो जानी चाहिये। क्योंकि यह भेद-सृष्टि तो भ्रमित या हिप्नोटाइज्ड अवस्था या माया ग्रस्त अवस्था में
परिवर्तशील या मिथ्या नाम-रूप (सापेक्षिक सत्य) को ही परम् सत्य (इन्द्रियातीत सत्य) समझते रहने की अवस्था है। यह कहा जा सकता है कि परिवर्तन की यह अवस्था (state of change-अविनाशी आत्मा होकर भी अपने को नश्वर समझने की हिप्नोटाइज्ड अवस्था। ) आत्मा को अब (साम्यावस्था से पुनः शरीर में लौट जाने के बाद, या जन्म ग्रहण करने के बाद या शरीर में आने के बाद) प्राप्त हुई है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि इसके पूर्व उसकी अवस्था विराम और मुक्ति (संसार-चक्र के विराम या चित्त-वृत्तियों के निरोध के बाद की भ्रममुक्त  (state of rest and liberty) की थी। किन्तु अब, इस समय शरीर में लौट आने के बाद विभेदीकरण की अवस्था (state of differentiation-मैं , तुम , यह, वह विभेद देखने की अवस्था) ही एकमात्र सच्ची अवस्था (real state) है। तथा परमसत्य के साथ एकरूपता प्राप्त अवस्था (state of homogeneity) तो आदिम अपरिष्कृत (primitive crudeness,स्टोन युग की आदिम 
असभ्यता) अवस्था है। जिससे विकसित होकर यह परिवर्तनशील अवस्था ( changeful state) निर्मित हुई है। (जब मनुष्य चन्द्रमा और मंगल ग्रह में बसने की बात सोच रहा है, सभ्यता की यह कितनी उन्नत अवस्था है !) तथा उस विभेदरहित अवस्था (state of undifferentiation) में पुनः लौट जाना तो मानव-सभ्यता की अधोगति मानी जाएगी। 
इस कुतर्क में तभी कोई वजन हो सकता था, जब यह सिद्ध करना सम्भव होता कि एकरूपता और विविधता (homogeneity and heterogeneity) सम्पूर्ण कालखण्ड में केवल एक बार घटित होने वाली दो अवस्थाएं हैं। किन्तु हम देखते हैं कि जो एक बार घटित होता है, वह बारबार घटित होता है !  [ (गुरु-शिष्य वेदान्त शिक्षक-प्रशिक्षण परम्परा में साम्यावस्था बार बार घटित होती है।) इसीलिए कहा जाता है कि इतिहास अपने को बार बार दोहराता है, तथा यह भी सही है कि आप एक ही नदी में दो बार स्नान नहीं कर सकते, ये दोनों लोकोक्तियाँ विरोधाभाषी प्रतीत होती हैं।] ' Rest is followed by change -- the universe.' विराम का अनुगमन परिवर्तन -विश्व करता है। उस विराम के पूर्व (preceded by)अन्य परिवर्तन हुए होंगे, और इस परिवर्तन के बाद (succeeded by) विराम की अन्य अवस्थाएं घटित होंगी। यह सोचना बेतुका या हास्यास्पद (ridiculous) होगा कि कभी एक पूर्ण विराम की अवधि (period of rest) थी, जिसके बाद यह परिवर्तन आया, और जो अब सदैव चलता ही रहेगा। बाह्यजगत का प्रत्येक कण यह दिखलाता है कि वह बारम्बार नियतकालिक या मीयादी (periodic) विराम (=अस्ति-भाति-प्रिय) और परिवर्तन (=नाम-रूप) को प्राप्त होता रहता है।  
विराम की दो समय-अवधियों के बीच के कालान्तर को एक कल्प कहते हैं ! किन्तु यह कल्पीय-विराम (Kalpic rest, प्रलय) ब्रह्म के साथ पूर्ण एकरूपता (perfect homogeneity) का नहीं हो सकता, क्योंकि वैसा होने से भविष्य में किसी अभिव्यक्ति (सृष्टि,नाम-रूप) का होना ही समाप्त हो जायेगा। यह कहना बिल्कुल असंगत (absurdहै कि परिवर्तन (सृष्टि-नामरूप, मुखड़ा क्या देखे दर्पण में ? तेरे दया-धर्म नहीं मन में।) की वर्तमान अवस्था विराम (अस्ति-भाति-प्रिय) की पूर्वगामी अवस्था (preceding state of rest) की तुलना में अधिक श्रेष्ठ है। क्योंकि तबतो प्रलय या विराम की आने वाली अवधि अधिक सुदूरवर्ती होने के कारण (सच्चिदानन्द) से भी अधिक पूर्ण होगी ! 
प्रकृति (2H -शरीर और मन) में कोई उन्नति या अवनति नहीं होती। वह बारम्बार उन्हीं रूपाकारों (नाम-रूपों) को व्यक्त करती रहती है। वस्तुतः 'Law' नियम शब्द का अर्थ ही यह है।  'But there is a progression with regard to souls.' किन्तु आत्माओं (3rd H हृदय) को लेकर एक उन्नति अवश्य होती है। अर्थात आत्मायें अपने स्वरुप के निकटतर आती है, और प्रत्येक कल्प में वे बड़ी संख्या में इस प्रकार चक्कर काटते काटते मुक्ति प्राप्त करते हैं। (भ्रममुक्त होते जाते हैं !) 
ऐसा कहा जा सकता है कि जीवात्मायें ( individual soul या नामरूप से सम्मोहित बुद्धि या अहं भाव)
स्वयं प्रकृति और जगत का अंश हैं, और बारम्बार वापस आती रहती हैं। किन्तु आत्मा (ब्रह्म) के लिये मुक्ति का प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि उस दशा में सृष्टि को भी विनष्ट करना आवश्यक हो जायेगा। इस विरोधाभास (paradox) का उत्तर यह है कि जीवात्मायें माया के माध्यम से (देश-काल-निमित्त के माध्यम से, माँ जगदम्बा के राज्य में) देखी जाने वाली एक मिथ्या (Assumption या कल्पित) वस्तु हैं। और स्वयं प्रकृति (सापेक्षिक सत्य) से अधिक सत्य नहीं हैं। वस्तुतः यह जीवात्मा भी (नाम-रूप छोड़ देने के बाद) निरुपाधिक निरपेक्ष (पर) ब्रह्म ही है। ('ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर:।। अर्थात् ... ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है तथा जीव ब्रह्म ही है, कोई अन्य नहीं।)  
प्रकृति में जो कुछ सत्य है वह ब्रह्म है। केवल वह माया (नामरूप) के अध्यास (superimposition of Maya) से इस विविधता (variety) या प्रकृति के रूप में भासित होता है।  Maya being illusion cannot be said to be real, yet it is producing the phenomena. भ्रम होने के कारण माया (नामरूपों की विविधता) को सत्य नहीं कहा जा सकता; फिर भी यह गोचर प्रपंच की सृष्टि कर देती है। (और पंचभूतेर फांदे ब्रह्म पड़े कांदे) यदि पूछा जाय कि स्वयं भ्रम होते हुए भी माया यह सब किस प्रकार उत्पन्न कर सकती है ? तो हमारा उत्तर यह है कि निर्मितवस्तु (जगत produced ) अविद्या (ignorance) होने के कारण निर्माता (producer) भी अविद्या ही होनी चाहिए। 
किन्तु प्रश्न उठेगा कि क्या ज्ञान के द्वारा अज्ञान की उत्पत्ति कभी हो सकती है ? How can ignorance be produced by knowledge? इसका उत्तर यह है कि यह माया (माँ जगदम्बा ही)  विद्या (निरपेक्ष ज्ञान) और अविद्या (सापेक्ष ज्ञान) इन दो रूपों में कार्य करती है। और यह विद्या (उमा-हैमवती) कृपा करके अविद्या या अज्ञान को नष्ट करने उपरान्त स्वयं अन्तर्धान हो जाती है ! (जीव और ब्रह्म के बीच से हट जाती है।) यह माया अपने को स्वयं नष्ट कर डालती है, और जो निःशेष बच रहता है -वह है ब्रह्म ! सत का सार तत्व,अस्तित्व - ज्ञान और आनन्द -सच्चिदानन्द
अतः प्रकृति में जो भी वास्तविकता है वह यह ब्रह्म (Absolute) है, और हमें प्रकृति तीन रूपों में प्राप्त होती है - ईश्वर (माँ जगदम्बा God), चेतन (conscious), अचेतन (unconscious)| अर्थात ईश्वर (माँ जगदम्बा,God), व्यक्तित्व-युक्त आत्मायें (personal souls-माँ जगदम्बा के अवतार या भ्रममुक्त आत्माएं - ठाकुर, माँ और स्वामीजी) और अचेतन प्राणी (unconscious beings. या भविष्य में भ्रममुक्त होने की संभावना से युक्त मुनष्य!)| इन सबकी वास्तविकता ब्रह्म ही है, तथापि माया के कारण वह विविध प्रतीत होता है। किन्तु ईश्वर का दर्शन (नामरूप रहित श्रीरामकृष्ण देव का दर्शन ? vision of God) वास्तविकता के निकटतम और उच्चतम है। व्यक्तित्व-युक्त सगुण ईश्वर (श्रीरामकृष्णदेव) की धारणा मनुष्य के लिए सर्वोच्च सम्भव विचार है। (The idea of a Personal God is the highest idea which man can have.) ईश्वर में आरोपित सभी गुण उसी अर्थ में सत्य हैं, जिस अर्थ में प्रकृति के गुण सत्य हैं। फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सगुण ईश्वर (नवनीदा) माया (नामरूप) के माध्यम से देखा जाने वाला ब्रह्म ही हैं ! ७/ ३२६-२८] 
" प्यार एहसास है उसे रूह से महसूस करो, प्यार को प्यार ही रहने दो; कोई नाम न दो ! " काम प्रेम की मृत्यु है, अहं प्रेम की मृत्यु है, प्रेम व्यष्टि से समष्टि की ओर , मूर्त से अमूर्त की ओर, अपने व्यष्टि अहं-बोध को सर्वव्यापी विराट माँ जगदम्बा के समष्टि अहं-बोध में रूपांतरित कर लेने में है। प्रत्येक परमाणु अपने पूरक परमाणु के खोज में रत है, जब उसे पा जाता है, शांत हो जाता है। मानवात्मा की प्रकृति और अभीप्सा का एक मात्र पूरक ईश्वर (माँ जगदम्बा) ही है। अपना पूरक, अपनी स्थायी साम्यावस्था - अपनी अनन्त शान्ति की प्राप्ति के लिए मानवात्मा का संघर्ष ही प्रेम है ! ९/३०६-८]  

Letter dated 25th September, 1894: ''We must work among the English educated young men. "त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः— Through renunciation alone some (rare ones) attained immortality." Renunciation!—Renunciation!—you must preach this above everything else. There will be no spiritual strength unless one renounces the world....
 " श्रेयांसि बहुविघ्नानि'  " सत्यमेत्र जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः—Truth alone triumphs, not falsehood. Through Truth lies Devayâna, the path of gods" (Mundaka, III. i. 6). Everything will come about by degrees.कांक्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः। क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥—"Longing for success in action, in this world, (men) worship the deities. For success is quickly attained through action in this world of Man." (Gita, IV.12)
"न लिङ्गम् धर्मकारणं, समता सर्वभूतेषु एतन्मुक्तस्य लक्षणम्—जीव मात्र में समभाव -यही मुक्तात्मा का लक्षण है ! यही भ्रममुक्त या डीहिप्नोटाइज्ड मनुष्य की पहचान है। ९/२०८  The external badge does not confer spirituality. It is same-sightedness to all beings which is the test of a liberated soul." "अस्ति अस्ति" (It is, It is), "सोऽहं सोऽहं", "चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं"—"I am He!", "I am Shiva, of the essence of Knowledge and Bliss!" " निर्गच्छति जगज्जालात् पिञ्जरादिव केशरी—He frees himself from the meshes of this world as a lion from its cage!" "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः— This Atman is not accessible to the weak". . . . Hurl yourselves on the world like an avalanche—let the world crack in twain under your weight! Hara! Hara! Mahâdeva! उद्धरेदात्मनात्मानम्—One must save the self by one's own self"—by personal prowess.This has been taking place through eternity, that one (Navni-da) builds a bridge by laying down his own body and thousands of others cross the river through its help. "एवमस्तु, एवमस्तु, शिवोऽहं शिवोऽहं— Be it so! Be it so! I am Shiva! I am Shiva!" It is welcome news that Madras (Vaizag) is in a stir.
 They say, "Have faith in this fellow or that fellow", but I say, "Have faith in yourself first", that's the way. Have faith in yourself—all power is in you—be conscious and bring it out. Say, "I can do everything." "Even the poison of a snake is powerless if you can firmly deny it." Beware! No saying "nay", no negative thoughts! Say, "Yea, Yea," "So'ham, So'ham"—"I am He! I am He!
"किन्नाम रोदिषि सखे त्वयि सर्वशक्तिरामन्त्रयस्व भगवन् भगदं स्वरूपम्। त्रैलोक्यमेतदखिलं तव पादमूले आत्मैव हि प्रभवते न जडः कदाचित्।।—"What makes you weep, my friend? In you is all power. Summon up your all-powerful nature, O mighty one, and this whole universe will lie at your feet. It is the Self alone that predominates, and not matter."To work, with undaunted energy! What fear! Who is powerful enough to thwart you!"कुर्मस्तारकचर्वणं त्रिभुवनमुत्पाटयामो बलात् , किं भो न विजानास्यस्मान् रामकृष्णदासा वयम्— We shall crush the stars to atoms, and unhinge the universe. Don't you know who we are? We are the servants of Shri Ramakrishna." Fear?

 I am the child of the Infinite, the all-powerful Divine Mother.What means disease, or fear, or want to me? Stamp out the negative spirit as if it were a pestilence, and it will conduce to your welfare in every way. No negative, all positive, affirmative. I am, God is, everything is in me. I will manifest health, purity, knowledge, whatever I want. Well, these foreign people could grasp my teachings, and you are suffering from illness owing to your negative spirit! Who says you are ill—what is disease to you? Brush it aside!वीर्यमसि वीर्य मयि धेहि, बलमसि बलं मयि धेहि, ओजोऽसि ओजो मयि धेहि, सहोऽसि सही मयि धेहि—Thou art Energy, impart energy unto me. Thou art Strength, impart strength unto me. Thou art Spirituality, impart spirituality unto me. Thou art Fortitude, impart fortitude unto me!" 
दिव्य प्रज्ञा का सन्देश : ९/३१५ माँ जगदम्बा की इच्छा ही एकमात्र नियम है और, क्योंकि उससे कभी चूक हो नहीं सकती, अतः प्रकृति के नियम -उसकी इच्छा -कभी बदली नहीं जा सकती। कर्म-विधान अथवा कारण विधान का प्राण वही है। प्रत्येक कर्म को फलप्रद बनाने वाली वही है। उसीके निर्देशन में हम अपने कर्मों द्वारा अपने अपने जीवनों का निर्माण कर रहे हैं। मुक्ति ही इस विश्व की प्रेरक है, और मुक्ति ही इसका लक्ष्य है।  प्रकृति के नियम ऐसी पद्धतियां हैं, जिनके द्वारा हम माँ जगदम्बा के निर्देशन में उस मुक्ति (साम्यावस्था)  तक पहुँचने का संघर्ष करते हैं। वह मुक्ति (साम्यावस्था) तीन प्रकार से प्राप्त होती है- 
(१.) कर्म -दूसरों की सहायता करने और दूसरों से प्रेम करने का सतत अविरत प्रयत्न -'BE AND MAKE' आध्यात्मिक शिक्षक बनना और बनाना ही सर्वश्रेष्ठ समाजसेवा है। 
(२.) उपासना -प्रार्थना -वन्दना, गुणगान और ध्यान। 
(३.) ब्रह्मज्ञान - जो एकाग्रता का अभ्यास सीखने के बाद खुली आँखों से ध्यान करने से उत्पन्न होता है। ९/३१५] 
कृष्ण ने गीता ५/१९ में कहा था -" जिसका मन साम्यभाव में अवस्थित है, उसने जीवित अवस्था में ही संसार पर विजय प्राप्त कर लिया है। जब तक मानव इस साम्य-ज्ञान को प्राप्त नहीं करता तब तक वह मुक्त नहीं हो सकता। आप राजपूत लोग ही प्राचीन भारत के गौरव स्वरुप रहे हैं ! वास्तव में तो सर्वत्र एक ही वस्तु विद्यमान है।  'श्वेताश्वतर उपनिषद' में ऋषि परमात्मा की स्तुति करते हुये कहते हैं, “त्वं स्त्री त्वं पुमान् असि, त्वं कुमार उत वा कुमारी” अर्थात, 'हे परमेश्वर, तुम्हीं स्त्री हो, तुम्हीं पुरुष का रूप धारण करती हो और तुम्हीं कुमार या कुमारी हो। ' बहुत से लोग कहेंगे, 'इस प्रकार सोचना तो निवृत्ति मार्गी संन्यासी को ही शोभा देता है, उनके लिए ही यह ठीक है, किन्तु हम सब तो प्रवृत्ति मार्गी गृहस्थ हैं। ' ठीक है कि गृहस्थों को दूसरे अनेक कर्तव्यों का पालन करना पड़ता हे, अतः वे साम्यभावमें इतना स्थित नहीं रह सकता। परन्तु जो लोग महामण्डल आंदोलन के वुड बी लीडर्स हैं - भावी शिक्षक हैं, उनका आदर्श यही होना उचित है।   
९/३५७-८]
योगी के अतिरिक्त अन्य सभी लोग हिप्नोटाइज्ड हैं अर्थात गुलाम हैं, खाने-पीने के गुलाम, अपनी स्त्री के गुलाम, अपने लड़के -बच्चों के गुलाम, रूपये-पैसे के गुलाम, नाम-यश के गुलाम, स्वदेशवासियों के गुलाम, जलवायु के गुलाम, इस संसार के हजारों विषयों के गुलाम! जो मनुष्य इन बंधनों में से किसी में आसक्त नहीं है, वे ही यथार्थ योगी हैं, उन्हीं का मन साम्यावस्था में सदैव रहता है। गीता ५/१९ में कहा गया है - जिनका मन साम्यभाव में अवस्थित है, उन्होंने जन्म-मृत्यु पर इस शरीर में रहते हुए ही विजय प्राप्त कर लिया है। इस सम्मोहित भाव को दूर करना होगा de-hypnotaised होना होगा। 
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं, तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ 
[ भाति (shines) न चन्द्रतारकम् - and the moon has no splendour and the stars are blind | इमाः विद्युतः - there these lightnings  न भान्ति (flash not) कुतः - how then? | अयम् अग्निः - this earthly fire shall burn | तम् भान्तम् एव - when he shines | सर्वम् अनुभाति - all that is shines after that | तस्य भासा - with his light | इदम् सर्वम् - all this universe | विभाति - is effulgent |] 
वहां न सूर्य प्रकाशित होता है और चन्द्र आभाहीन हो जाता है तथा तारे बुझ जाते हैं; वहां ये विद्युत् भी नहीं चमकतीं, तब यह पार्थिव अग्नि भी कैसे जल पायेगी? जो कुछ भी चमकता है, वह उसकी आभा से अनुभासित होता है, यह सम्पूर्ण विश्व उसी के प्रकाश से प्रकाशित एवं भासित हो रहा है।
इस आत्मसाक्षात्कार को सम्मोहन (hypnotism) नहीं कह सकते। यह तो अपसम्मोहन (de-hypnotisation) है| प्रत्येक धर्म जो इस जगत प्रपंच को भोग करने की शिक्षा देता हो, वह एक प्रकार से सम्मोहन का प्रयोग कर रहा है। एकमात्र अद्वैतवाद ही यह कहता है कि द्वैतवाद से सम्मोहन या मोह उत्पन्न होता है। इसीलिए अद्वैतवादी कहते हैं, ' वेदों को भी अपरा विद्या समझकर उनके अतीत हो जाओ। सगुण ईश्वर से भी परे चले जाओ, सारे विश्वब्रह्माण्ड को भी दूर फेंक दो। इतना ही नहीं अपने शरीर -मन से भी परे चले जाओ, किसी भी नामरूप में आसक्ति नहीं रहनी चाहिये , तभी तुम सम्पूर्ण रूप से भ्रममुक्त डीहिप्नोटाइज्ड हो जाओगे। 
'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। 
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्‌ न बिभेति कदाचन।' 
-मन के सहित वाणी जिसे न पाकर जहाँ से लौट आती है, उस ब्रह्म के आनन्द को जानने पर फिर किसी प्रकार का भय नहीं रह जाता। यही है डीहिप्नोटाइज्ड अवस्था -अपसम्मोहन। १०/३८८  
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['the Peace that passeth all understanding' तब परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरिक्षत रखेगी॥ फिलिप्पियों4/7]
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