This is one of the most often-asked questions about leadership. Research by psychologists has proved that, in the main, Leaders are ‘mostly made.' The best estimate offered by research is that leadership is about one-third born and two-thirds made.]
इस बार ठाकुरदेव और माँ सारदा के आशीर्वाद से और स्वामी जी की प्रेरणादायक कृपा से "स्वामी विवेकानन्द-कैप्टन सेवियर Be and Make' वेदान्त शिक्षक-प्रशिक्षण परम्परा" में प्रशिक्षित और C-IN-C का चपरास प्राप्त एक नेता नवनीदा के नेतृत्व में 1967 में एक तिहाई जन्मजात नेता के माध्यम से निर्मित संगठन के प्रशिक्षण से 7-7 अन्य (प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्गी वज्रतुल्य 100% निःस्वार्थी होने का चपरास प्राप्त) प्रशिक्षित नेताओं का निर्माण करने के उद्देश्य से 'अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल ' को आविर्भूत होना पड़ा है।
🔱>>>अवतार वरिष्ठ भगवान श्रीरामकृष्ण के आविर्भाव का मूल उद्देश्य क्या था ?
इसको समझने के लिए महामण्डल का उद्देश्य, आदर्श और कार्य-प्रणाली (मेथेडोलॉजी) को गहराई से समझना होगा। इस वर्ष 24-25 जुलाई 2016 को महामण्डल का 49 वाँ एजीएम होगा जिसके संगरक्षण में अक्टूबर 2016 से ऑक्टोबर 2017 तक गोल्डन जुबली वर्ष मनाया जायेगा।
ईश्वर का विधान है : स्वामी विवेकानन्द के नेतृत्व में ऐसे जीवनमुक्त (आध्यात्मिक) शिक्षकों, नेताओं, पैगम्बरों का जीवनगठन करके जगत से आध्यात्मिक (जीवन-मुक्त) शिक्षकों के अभाव को दूर कर देना ! जगत में सत्ययुग को स्थापित करने के लिये भारत का पुनरुत्थान, और भारत में रामराज्य लाने के लिये है माँ जगदम्बा का कानून है " महामण्डल के नेतृत्व और यम-नचिकेता वेदान्त डिण्डिम निवृत्ति अस्तु महाफला प्रशिक्षण परम्परा में " में निर्भीक मनुष्य (जीवनमुक्त शिक्षक) बनो और बनाओ आन्दोलन को सम्पूर्ण भारत में प्रसारित-प्रचारित के लिए महामण्डल को आविर्भूत होना पड़ा ! इसी ईश्वरीय-विधान को सीखा देने के लिये या यही शिक्षा देने के लिये ब्रह्म को स्वयं एक काली-उपासक श्रीरामकृष्ण देव के रूप में अवतरित होना पड़ा था !
देखता नहीं है, पूर्वाकाश में अरुणोदय हुआ है! - अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल क्या 1967 में या नक्सल आन्दोलन के बाद या साथ-साथ अवतरित हुआ था, या नक्सल आन्दोलन आरम्भ होने के पहले आविर्भूत हो चुका था ? महामण्डल का स्वर्णजयन्ती वर्ष -गोल्डन जुबली वर्ष या 50 वाँ वर्ष सितंबर 2016 से प्रारम्भ होगा। महामण्डल 1967 से अर्थात विगत 56 वर्षों से चरित्र-निर्माण एवं ब्रह्मविद् नेताओं के निर्माण में लगा हुआ है ! (झुमरीतिलैया विवेकानन्द ज्ञानमंदिर 14 जनवरी 1985 मकरसंक्रांति के दिन प्रारम्भ हुआ था उसका गोल्डन जुबली 14 जनवरी 2035 से शुरू होकर 14 जनवरी 2036 तक मनाया जायेगा!)
1947 -1967 एक एक करके २० वर्ष बीत गए किन्तु भारत में गरीबी और भुखमरी वैसी ही क्यों बनी हुई थी, जैसी अंग्रेजों के जमाने में थी। युवाओं में हताशा थी, आजादी के पहले उनका आक्रोश अंग्रेजों के खिलाफ था, वे मानते थे कि इन्होंने ही हमें दरिद्र बना दिया है, भारत की समस्त दुर्गति का कारण अंग्रेज हैं, इसको भगा देने से सारे दुःख-कष्ट दूर हो जायेंगे।इसी विक्षोभ में जनता उद्वेलित होती गई, संयुक्त मोर्चा, जनता-दल आया-गया होता रहा, जिसके कारण कुछ चतुर राजनीतिज्ञों ने युवा छात्रों की बेचैनी युवा अशांति को दिग्भ्रमित करके नक्सल-आंदोलन को जन्म दिया।
एक बार स्वामी विवेकानन्द से भी प्रश्न किया गया था कि आप भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में क्यों भाग नहीं लेते हैं ? स्वामीजी ने कहा था, " मैं केवल तीन दिनों में ही भारत को स्वतंत्रता दिला हूँ, किन्तु स्वाधीनता प्राप्त होने के बाद उसे सम्भाल कर रखने वाले (चरित्रवान) मनुष्य कहाँ हैं ? अभी गोरी चमड़ी वाले अंग्रेज भारत को लूट रहे हैं, आजादी के बाद भूरी चमड़ी के लोग लूटेंगे। इसलिये पहले मनुष्य का निर्माण करो।
" दीर्घ काल की पराधीनता से मुक्ति मिली १५ अगस्त १९४७ को, स्वाधीनता के बाद २० वर्षों तक प्रतीक्षा करने के बाद भी जब गरीबी-भुखमरी से मुक्ति नहीं मिली, तब स्वार्थी कम्युनिस्ट नेताओं ने खूनी-क्रांति द्वारा मजदूरों की सरकार बनाने का नारा दिया।
इस हताशा के परिणाम से नक्सली नेताओं का जन्म हुआ- चारु मजूमदार, कानू सान्याल, जंगल सरदार ने जमींदारों की हत्या करने का उपाय सुझाया। जब कानून को हाथ में लेकर सर्व-हारा वर्ग सत्ता में आएगा तो खेती की भूमि को राष्ट्रीयकृत करके भूमिहीनों में बाँट देने से भी उन्हें कुछ खोना नहीं पड़ेगा। यही विचार बंगाल के कॉलेज स्टूडेंट्स में प्रविष्ट हो गया। उस समय यादवपुर यूनिवर्सिटी के मेधावी छात्र भी लाईब्रेरी जलाने लगे, रेल जलाने लगे। उस समय किसी नेता ने यह नहीं सुझाया कि पुरानी मैकाले की शिक्षा पद्धति को परिवर्तित कर बेरोजगारी दूर करने वाली और चरित्रगठन करने वाली शिक्षा नीति बनानी होगी। स्वार्थी नेताओं ने सोंचा शिक्षा पद्धति में परिवर्तन क्यों करें या क्यों न पुस्तकों को ही जला दें ?
उन्हीं दिनों की विषम परिस्थितियों में एक दिन पूज्य नवनी दा, पूज्य स्वामी स्मरणानन्द और स्वामी वन्दनानन्द के साथ अद्वैत आश्रम से पार्क-सर्कस जो आधा किलोमीटर होगा, शाम को घूमने निकले थे। कुछ शिक्षित युवकों ने साधु लोगों के ऊपर शरारती रिमार्क पास किया। महाराज लोगों ने नवनी दा से कहा आप इन युवा लोगों के लिये कोई ऐसा संगठन क्यों नहीं बनाते जो -एक राष्ट्रनिर्माणकरी सकारात्मक युवा आंदोलन का रूप ले सके? सितम्बर 1967 के किसी दिन (? ) अद्वैत आश्रम में ही बहुत सी युवा संगठनों की एक बैठक आयोजित की गई जिसके कन्वेनर या संयोजक थे 'जयराम महाराज'। स्वामी अनन्यानन्द जी ने उस बैठक में सभापतित्व किया था।
उस दिन की बैठक में तय हुआ कि 25-26 अक्टूबर 1967 को अद्वैत आश्रम में ही एक बैठक आयोजित होगी जिसमें चरित्र-निर्माण और मनुष्य-निर्माणकारी युवा संगठन का प्रारम्भ किया जायेगा। उसी दिन महामण्डल का गठन हो गया। उसकी अगली बैठक में नवनी दा को सेक्रेटरी चुना गया। उस बैठक में बासु दा, बिरेश्वर दा न्यू बैरकपुर से 6-7 छात्र संगठन के लोग, नीलमणि दा, अमियो दा, आदि उपस्थित थे, उस समय की सारी घटना 'जीवन नदी के हर मोड़ पर ' पुस्तक में '' -शीर्षक लेख में विस्तार से दर्ज है।
स्वामी गम्भीरानन्द जी हमेशा कहते रहते थे कि जितने छात्र संगठन जो पहले से नाम से कार्यरत हों , उनको महामण्डल में विलय करना अनिवार्य होना चाहिए। इसके अलावा कितने नए केंद्र स्थापित हुए उनकी संख्या भी पूछते रहते थे। क्योंकि कुछ पुराने केन्द्र जो श्रीरामकृष्ण संघ या अन्य नामों से चल रहे थे, उनके कुछ बुजुर्ग सदस्यों ने प्रश्न उठाया कि महामण्डल में श्रीरामकृष्ण वचनामृत को छोड़कर BE AND MAKE क्यों पढ़ाया जाता है ? पुराने संगठनों के बुजुर्ग सदस्यों ने विद्रोह कर दिया कि जो लोग मठ-मिशन में दीक्षा प्राप्त कर लिए हों, उन्हें वे महामण्डल में जाने से रोक देंगे।
वीरेश्वर दा ने प्रभु-महाराज (स्वामी वीरेश्वरानन्द ) को पत्र लिखकर उनका मन्तव्य जानना चाहा। एक युवा दीक्षित भाई ने उन्हें पत्र लिखा कि वहाँ महामण्डल के पाठचक्र में श्री रामकृष्ण लीलाप्रसंग और वचनामृत नहीं पढ़ाया जाता है, क्या मुझे साप्ताहिक पाठचक्र में जाना चाहिये ? यदि आप यह कह देंगे कि तुम वहाँ मत जाओ तो मैं नहीं जाऊँगा। महामण्डल की सदस्यता को भी छोड़ दूँगा। प्रभु-महाराज और जयराम महाराज दोनों तमिल भाषी हैं, किन्तु चुकी आधुनिक युग की देवभाषा (होली ट्रायो की भाषा ) बंगला है, इसीलिये सभी साधु-ब्रह्मचारी कथामृत और लीलाप्रसंग को बंगला में ही पढ़ना चाहते हैं। उन्होंने बंगला भाषा में एक पोस्टकार्ड में उत्तर दिया, (उन्होंने महामण्डल पुस्तक 'स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना' को प्रकाशित करते समय आशीर्वचन भी लिखे हैं।) उन्होंने उस पत्र में लिखा कि श्री ठाकुर के सभी भक्त लोग इस पत्र के माध्यम से जान लें, कि महामण्डल का कार्य -'चरित्रवान मनुष्यों का निर्माण करना' या BE AND MAKE ' ही ठाकुर के आदेशों के अनुसार वास्तिक कार्य है। पाठचक्र में सभी दीक्षित युवा भक्तों को अवश्य जाना चाहिये ! तब से यह अनिवार्य बना दिया गया कि महामण्डल से पूर्व अन्य किसी भी नाम से मौजूदा इकाइयों को अपना पुराना नाम अवश्य छोड़ना होगा और महामण्डल के चरित्रनिर्माण आंदोलन के एक केन्द्र में रूपान्तरित हो जाना होगा।
विवेकानन्द-केन्द्र, संस्कृति-परिषद, विवेक-समीति, रामकृष्ण संघ हो या झुमरीतिलैया का 1985 में स्थापित 'विवेकानन्द ज्ञान मन्दिर' हो -सभी को अपना नाम बदलकर महामण्डल नाम लगाना होगा। 1988 में 'झुमरीतिलैया विवेकानन्द ज्ञान मन्दिर' का विलय महामण्डल में हो जाने के बाद,धनेश्वर पंडित, दयानन्द और उपेन्द्र ने इसी 'विवेकानन्द ज्ञान मन्दिर ' के नाम से जानिबिघा गया, बिहार में 1989 में एक स्कूल खोला जो विगत 34 वर्षों से जानिबिघा विवेकानन्द युवा महामण्डल के निर्देशानुसार कार्यरत है। जिन संगठनों ने अपना पुराना नाम परिवर्तित करने से इंकार किया, वे महामण्डल से अलग हो गए। महामण्डल गठित होने से पहले अस्तित्व में आ गई संस्था,'विवेक-समीति ' के प्राण पुरुष थे वीरेश्वर दा, किन्तु वे भी महामण्डल में विलय होने को तैयार हो गए।
विभन्न नाम वाले विषम संघों को संगठनात्मक अनुशासन में संघबद्ध करते हुए यह युवा चरित्र-निर्माणकारी आंदोलन क्रमशः पैगम्बर/नेता निर्माण आन्दोलन में परिणत हो गया है। प्रारम्भ में सन्यासी लोग भी क्लास लिया करते थे ? किस वर्ष से उनको केवल सायंकालीन सत्र में ही भाषण देने को कहना शुरू हुआ ? इसके 50 वर्षों का इतिहास लिखते समय इसका भी उल्लेख करना अच्छा होगा। [डॉक्टर राजर्षि को वीर सेनापति (रागबहार में) गीत गाने की इच्छा को रवींद्रसंगीत के उदाहरण से समझाया गया कि भगवान को सुनाने के लिये जैसे-तैसे गीत नहीं गया जा सकता।]
खड़गपुर यूनिट के दिलीप पात्रा ने युवा पाठचक्र की प्रयोजनीयता: विषय पर भाषण देते बताया कि वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर वर्ष भर में केवल एक बार ही आयोजित होती है। युवा लोग भारत-निर्माण के उद्देश्य से बहुत आशा लेकर महामण्डल के पाठचक्र में आते हैं। यह पुरे वर्ष चलता रहता है। यहाँ प्रत्येक सदस्य के 3H विकास पर अधिक ध्यान रखा जा सकता है। विवेक-जीवन के पुराने अंकों में या सितम्बर 2013 के अंक में "पाठचक्र कैसे करें' विषय पर निर्देश दिया गया है। मनुष्य बनने के लिए जो पाँच कार्य करने पड़ते हैं, उसके द्वारा इसके प्रत्येक सदस्य का सुंदर जीवन गठित हो रहा है या नहीं ? जीवनमुक्त शिक्षक, नेता, पैगम्बर या ऋषि बनने और बनाने की पद्धति मनःसंयोग, व्यायाम, प्रार्थना, स्वाध्याय और विवेक-प्रयोग के अनुसार वह नेता बनने के मार्ग पर अग्रसर हो रहा है या नहीं? इस पर साप्ताहिक चर्चा करना-आत्ममूल्यांकन तालिका पर दृष्टि रखना आवश्यक है।
यदि शाखा में पाठचक्र ठीक चल रहा है, नियमानुसार संगठन का एजीएम और कार्यकारिणी का 6 बैठक, आय-व्यय का वार्षिक अकाउंट-रिपोर्ट ठीक से चल रहा हो, तभी यह समझा जायेगा, कि महामण्डल का संचालन सही ढंग से हो रहा है। नए सदस्यों को पाठचक्र में बोलना आवश्यक होगा, नहीं तो वे मन लगाकर नहीं सुनेंगे। 5 करणीय अभ्यास क्या हैं इसपर पाठचक्र में नियमित चर्चा करवाते रहना , नए सदस्यों को इसी विषय पर बोलने के लिए कहना आवश्यक होगा। इसका उद्देश्य है मनुष्य बनने और बनाने की शिक्षा प्राप्त करना। केवल वैसे बैठकर खानापूर्ति करना पाठ चक्र नहीं है। पाठ के विषय को ठीक से समझा या नहीं ? पढ़ने का तरीका भी आना चाहिए।
पाठ्य-विषय पहले से निर्धारित रहेगा, फाइल में जो मिला उसी को पढ़ लेने से नहीं होगा। कौन पढ़ेगा उसका नाम भी पूर्वनिर्धारित करना अच्छा होगा। वरिष्ठ सदस्यों को यह ध्यान रखना होगा कि पाठचक्र में दीक्षा के महत्व पर चर्चा नहीं करेंगे। अपने व्यक्तिगत आध्यात्मिक उपलब्धियों का बखान या ऋषित्व प्राप्ति का दिखावा नहीं करेंगे। अपने गृहस्थ जीवन की परीक्षा में भी हमें उत्तीर्ण होना पड़ेगा, स्वामी विवेकानन्द बनने के पहले नरेन्द्रनाथ को भी जीवन-परीक्षा में उत्तीर्ण होना पड़ा था। पारिवारिक संघर्ष, पुश्तैनी मकान की रक्षा करने में हुए संघर्ष में सफल हुए थे। निर्विकल्प समाधी मुफ्त में प्राप्त नहीं हुई थी।
हम लोगों को भी स्वामीजी आशीर्वाद देंगे और हमलोग भी जीवन-संघर्ष में अपने अहंकार को उखाड़ फेंकने में सफल होंगे। डेढ़-से दो घंटे तक ही पाठचक्र होगा। नेता की प्राणशक्ति ही महामण्डल को आगे ले जाने वाली शक्ति है। उसे सोचना चाहिये कि महामण्डल पाठचक्र में जाना मन्दिर जाने जैसा है, वहाँ शिवज्ञान से जीवसेवा करने की पद्धति सीखने का मौका मिलता है, उस समय कोई दूसरा कार्य मुझे वहाँ जाने से नहीं रोक सकता।
>>>सोमनाथ बागची, सन्दीप सिंह :- महामण्डल का उद्देश्य है -भारत का कल्याण अर्थात उन्नततर मनुष्यों का निर्माण करके, उन्नततर समाज और श्रेष्ठ भारत का निर्माण। सुन्दरतर मनुष्यों से बने समाज को ही सुन्दरतर समाज कहा जा सकता है। उन्नततर मनुष्य किसे कहेंगे ? जिसने आई.ए.एस में कम्पीट कर लिया ? बिहार स्कूल बोर्ड में टॉपर हुआ? डॉक्टरेट का डिग्री ले लिया ? नही, साधारण मनुष्यों की अपेक्षा उन्नततर मनुष्य और श्रेष्ठ मनुष्य वे हैं-जो ब्रह्मज्ञ है,जो साम्यभाव में स्थित हैं, और जिनकी हमलोग पूजा करते हैं। आधुनकि युग के अवतार और स्वामी विवेकानन्द के गुरु श्रीरामकृष्ण देव केवल दूसरी कक्षा तक ही पढ़े थे, और समस्त सभ्य और विकसित कहे जाने वाले देशों में उनकी पूजा होती है। क्योंकि वे 'यथार्थ मनुष्य' थे (वे साम्यभाव में अवस्थित थे), अब हमें उसी रामकृष्ण-नरेन्द्रनाथ (भावी विवेकानन्द) वेदान्त लिडर्शिप-ट्रेनिंग परम्परा में बहुत बड़े पैमाने पर 'यथार्थ मनुष्यों' (ब्रह्मवेत्ता वेदान्ती लॉयन्स) का निर्माण' करना होगा! तभी भारत का और भारत के माध्यम से समस्त विश्व का - 'वसुधैव कुटुम्बकं का' कल्याण होगा।
महामण्डल की कार्यपद्धति या उपाय: है चरित्र-निर्माण ! या "3H निर्माण पद्धति" विवेक-प्रयोग करने की क्षमता न तो देवताओं में है, न पशुओं में है, यह क्षमता केवल मनुष्य में है; इसीलिये मनुष्य योनि को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है।आहार-निद्रा-भय-मैथुन पशु धर्म है, किन्तु आत्मज्ञान या निःस्वार्थपरता ही मनुष्य को मनुष्य बनाता है
महामण्डल के आदर्श: हैं -स्वामी विवेकानन्द ! क्योंकि स्वामी विवेकानन्द ने कन्याकुमारी शिला पर बैठकर तीन दिनों तक भारत माता का ध्यान किया था, और भारत की समस्त समस्याओं का गहन चिंतन करके मौलिक समाधान ढूँढ निकाला था - चरित्रनिर्माण, जीवनगठन और मनुष्य-निर्माण ! और "3H निर्माण पद्धति" द्वारा उन्नततर मनुष्य गढ़ने सूत्र दिया था- 'Be and Make'! और कहा था, मैन मेकिंग इज माई मिशन! इतना सटीक और सही उपाय बताने वाला, उनके जैसा पथ-प्रदर्शक या मानवजाति का युवा रोल-मॉडल, मार्ग-दर्शक नेता कोई दूसरा कोई और नहीं है, इसीलिए वे ही महामण्डल के एकमात्र आदर्श हैं।
चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया ( १५ मिनट) उद्देश्य है भारत का कल्याण अर्थात समस्त देशवासियों का कल्याण । उपाय है चरित्र-निर्माण !
स्वामी जी कहते हैं -स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " जिसमें आत्मविश्वास नहीं है वही नास्तिक है। प्राचीन धर्मों में कहा गया है, जो ईश्वर में विश्वास नहीं करता वह नास्तिक है। नूतन धर्म कहता है, जो आत्मविश्वास नहीं रखता वही नास्तिक है। विश्वास -विश्वास ! अपने आप पर विश्वास, परमात्मा के ऊपर विश्वास- यही उन्नति करने का एकमात्र उपाय है। यदि पुराणों में कहे गए तैंतीस करोड़ देवताओं के ऊपर और विदेशियों ने बीच बीच में जिन देवताओं (साईंबाबा आदि ?) को तुम्हारे बीच घुसा दिया है, उन सब पर भी तुम्हारा विश्वास हो और अपने आप पर विश्वास न हो, तो तुम कदापि मोक्ष के अधिकारी नहीं हो सकते।"
"Religions of the World Have Become Lifeless Mockeries. What the World Wants is Character.” संसार के धर्म प्राणहीन उपहास की वस्तु हो गये हैं। जगत को जिस वस्तु की आवश्यकता है, वह है चरित्र! हे महान, उठो ! उठो ! संसार दुःख से जल रहा है। क्या तुम सो सकते हो ? जगत दुःखे पूड़े खाक हये जाच्छे - 'तोमार' कि निद्रा साजे ? " Bold words and bolder deeds – are what we want! निर्भीक पैगम्बरों को वेदान्त डिण्डिम या वेदान्त केसरी की दहाड़- में कहना होगा - "ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या " !' तत्त्वमसि !' सुनाने में समर्थ ऋषियों या पैगंबरों की, और उससे अधिक 'निर्भीक' कर्मों (BE AND MAKE !) की हमें आवश्यकता है। - संसार महामण्डल के नेताओं में ऐसा चरित्र देखना चाहता है, जिनका अपना जीवन स्वार्थहीन ज्वलन्त प्रेम का उदाहरण हो। उनके मुख से निकला प्रेम-पूर्ण एक एक शब्द वज्र के समान प्रभावशाली होगा जो भावी नेताओं को ऋषि बनने और बनाने के लिये अनुप्रेरित करने में सक्षम होगा।
आत्मविश्वास की प्रेरणा हमें अपने आदर्श स्वामी विवेकानन्द से प्राप्त होती रहती है। वे कहते थे -'Each soul is potentially divine' सब जीवों में उसी ब्रह्म का दर्शन करना मनुष्य का आदर्श है। यदि सब वस्तुओं में उनको देखने में तुम सफल न होओ,तो कम से कम एक ऐसे व्यक्ति में, जिसे तुम सबसे अधिक प्रेम करते हो, उनको देखने का प्रयत्न करो, उसके बाद दूसरे व्यक्ति में दर्शन करने का प्रयत्न करो। इसी प्रकार तुम आगे बढ़ सकते हो। आत्मा के सामने तो अनन्त जीवन पड़ा हुआ है- अध्यवसाय के साथ लगे रहने पर तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी। "
>>>यह यथार्थ मनुष्य गढ़ने का कार्य: दो प्रकार से किया जा सकता है। पहला है - सेमिनारों में दूसरों को मनुष्य बनने के लिये आग्रहपूर्ण भाषण या लेक्चर देकर। और दूसरा है, स्वयं एक निःस्वार्थ आध्यात्मिक शिक्षक बनने का प्रयत्न करते हुए अन्य जो लोग मनुष्य बनने और बनाने की तीव्र इच्छा रखते हों, उनके साथ संघबद्ध होकर स्थानीय 'युवा पाठचक्र' की स्थापना द्वारा आगे बढ़ते हुए, महामण्डल द्वारा आयोजित वार्षिक सर्वभारतीय वार्षिक प्रशिक्षण शिविर में भाग लेकर।
मनुष्य बनने और बनाने के कार्य का मूलधन: किसी भी नये कार्य को प्रारम्भ करने में सीड कैपिटल या प्रारंभिक मूल धन लगाना पड़ता है। तो फिर किसी स्थान में 'विवेकानन्द युवा पाठचक्र' को स्थापित करने का मूलधन क्या होगा ? वह मूलधन है -आत्मविश्वास ! एक शब्द में इसका (वेदान्त का) उपदेश है 'तत्त्वमसि' -'तुम्हीं वह ब्रह्म हो! यह ब्रह्म (सार्वभौमिक आत्मा) एकमेव आद्वितीय है, यह पूर्ण और अविभाज्य है-अनन्त में अनन्त घटाओ तो अनन्त ही बचता है।
तुम्हारा प्रथम और प्रधान कर्तव्य है -सत्य को जान लेना, उसको प्रत्यक्ष कर लेना। जिस क्षण तुम कहते हो,- "आइ एम ए लिटिल मोर्टल बीइंग"; ' मैं तो एक तुच्छ मरण-धर्मा शरीर मात्र हूँ' - तुम झूठ बोलते हो, तुम मानो सम्मोहन के द्वारा अपने को दुर्बल और डरपोक (भेंड़) बना डालते हो। ऐसे आत्मविश्वास से आत्मविश्वास उसी प्रकार बढ़ता है -जैसे मनी बिगेट्स मनी! "अतएव पहले हमें यह आत्म-तत्व सुनना होगा, तब तक सुनना होगा जब तक वह हमारे रक्त में प्रवेश कर उसकी एक एक बूँद में घुल-मिल नहीं जाता।"
तुम तो ईश्वर की सन्तान हो, अमर आनन्दके सहभागी हो-पवित्र और पूर्ण आत्मा हो ! तुम इस मर्त्यभूमि पर दिव्य आत्मा हो-तुम भला पापी ? मनुष्य को पापी कहना ही पाप है, वह मानव-स्वरूप पर घोर लांछन है।तुम उठो ! हे सिंहो ! आओ, और इस मिथ्या भ्रम को झटककर दूर फेंक दो, कि तुम भेंड़ हो। तुम तो अजर-अमर-अविनाशी, आनंदमय और नित्य-मुक्त आत्मा हो!"
" हमने जीवन में ऐसे सैकड़ों कार्य किये हैं, जिनके बारे में हमें बाद में पता लगता है कि वे न किये जाते, तो अच्छा होता, पर तब भी इन सब कार्यों ने हमारे लिये महान शिक्षक का कार्य किया है।
" हमारे आचार्य शंकर आदि शक्तिशाली युग प्रवर्तक ही बड़े बड़े -वर्ण निर्माता बनते थे । ऋषि-मुनियों ने दल के दल धीवरों को लेकर क्षण भर में ब्राह्मण (ब्रह्म-वेत्ता मनुष्य में कन्वर्ट कर दिया) बना दिया। वे सब ऋषि मुनि थे, और हमें उनकी स्मृति के सामने सिर झुकाना होगा। तुम्हें भी ऋषि बनना होगा, मनुष्य जीवन को सार्थक करने का यही गूढ़ रहस्य है।
ऋषि का अर्थ है -पवित्र आत्मा। पहले पवित्र बनो, तभी तुम शक्ति पाओगे। 'मैं ऋषि हूँ ' कहने मात्र से न होगा, किन्तु जब तुम यथार्थ ऋषित्व लाभ करलोगे, तो देखोगे, दूसरे आप ही आप तुम्हारी आज्ञा मानते हैं। तुम्हारे भीतर से कुछ रहस्यमय वस्तु निःसृत होती है,जो दूसरों को तुम्हारा अनुसरण करने को बाध्य करती है, जिससे वे तुम्हारी आज्ञा का पालन करते हैं। यहाँ तक कि अपनी इच्छा के विरुद्ध अज्ञात भाव से वे तुम्हारी योजनाओं की कार्यसिद्धि में सहायक होते हैं। यही ऋषित्व है। ५/१८९
" हमारे शास्त्रों के अनुसार सब शक्तियाँ, सब प्रकार की महत्ता और पवित्रता आत्मा में ही विद्यमान हैं। योगी तुमसे कहेंगे कि अणिमा,लघिमा आदि सिद्धियाँ (चरित्र के २४ गुण ) जिन्हें वे प्राप्त करना चाहते हैं, वास्तवमें प्राप्त करने की नहीं, वे पहले से ही आत्मा में मौजूद हैं, सिर्फ उन्हें व्यक्त करने का उपाय सीखना होगा। पतंजलि के मत में तुम्हारे पैरों तले चलने वाले छोटे से छोटे कीड़े तक में योगी की अष्टसिद्धियाँ वर्तमान हैं, केवल उसका शरीर रूपी आधार उसे प्रकाशित करने के लिये अनुपयुक्त है, इसके ही कारण वे उसे व्यक्त नहीं कर पाते। जब उन्हें उत्कृष्टतर मनुष्य-शरीर प्राप्त हो जायेगा, वे शक्तियाँ अभिव्यक्त हो जाएँगी, परन्तु होती हैं वे पहले से ही विद्यमान। उन्होंने अपने योगसूत्र ४/३ में कहा है - ' निमित्तं प्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्॥"
-शुभाशुभ कर्म प्रकृति के परिणाम (परिवर्तन) के प्रत्यक्ष कारण नहीं हैं, वरन वे प्रकृति के विकास की बाधाओं को दूर करने वाले निमित्त कारण हैं। जैसे किसान को यदि अपने खेत में पानी लाना है तो सिर्फ खेत की मेंड़ काटकर पास के भरे तालाब से जल का योग कर देता है और पानी अपने स्वाभाविक प्रवाह से आकर खेत को भर देता है। वैसे ही जीवात्मा में सारी शक्ति, पूर्णता और पवित्रता पहले से भरी है, केवल माया (अहं) का परदा पड़ा हुआ है, जिससे वे प्रकट नहीं होने पातीं। एक बार आवरण को हटा देने से आत्मा अपनी स्वाभाविक पवित्रता प्राप्त कर लेती है, अर्थात सारी दिव्यता व्यक्त हो जाती है।" ५/२२६
" तत्त्वमसि" का आविष्कार हुआ कि आध्यात्मिक ज्ञान सम्पूर्ण हो गया। यह 'तत्त्वमसि' वेदों में ही है, अब इससे ऊँचे ज्ञान को आविष्कृत नहीं किया जा सकता। विभिन्न देश, काल, पात्र के अनुसार समय समय पर केवल लोक-शिक्षा देने का कार्य ही शेष रह गया। इस प्राचीन सनातन मार्ग में मनुष्यों (सम्पूर्ण विश्व के) का चलना ही शेष रह गया; इसीलिये समय समय पर विभिन्न महापुरुषों और आचार्यों का अभ्युदय होता रहता है। --हे भारत, जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब मैं धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिये समय समय पर अवतार ग्रहण करता हूँ। यही भारतीय धारणा है। गीता ४/७ " ये ऋषिगण कौन थे ? वात्सायन कहते हैं, जिसने यथा-विहित धर्म की प्रत्यक्ष अनुभूति की है, केवल वही ऋषि हो सकता है, चाहे वह जन्म से म्लेच्छ ही क्यों न हो। सच्ची बात यह है सत्य का साक्षात्कार हो जाने पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं रह जाता। ऋषियों के द्वारा आविष्कृत वेद ही एकमात्र प्रमाण हैं, और इस पर सबका अधिकार है।
यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः।
ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय॥
अर्थात् जैसे मैं इस कल्याणी वाणी को मनुष्यों के लिए बोलता हूं, वैसे ही ब्रााह्मणों, क्षत्रियों, शूद्रों, वैश्यों, स्त्रियों और अन्य जनों के लिए तुम भी बोलो, और इस प्रकार के विद्यादान से मैं देवताओं में प्रिय होऊं, मुझे परोक्ष सुख मिले तथा सब कामनाएं पूर्ण हों। " ५/३४५
[प्रसंग : स्वामी शिष्य संवाद -बेलूड़ मठ निर्माण के समय वर्ष १८९८ जो लोग मुझपर निर्भर हैं, उनका क्या होगा ?]
" यह सनातन धर्म का देश है। यह देश गिर अवश्य गया है, परन्तु निश्चय ही फिर से उठेगा! और ऐसा उठेगा कि दुनिया देखकर दंग रह जायगी। देखा नहीं है, नदी या समुद्र की लहरें जितनी नीचे उतरती हैं, उसके बाद उतनी ही जोर से उपर उठती हैं। देखता नहीं है, पूर्वाकाश में अरुणोदय हुआ है! - सूर्य उदित होने में अब अधिक विलम्ब नहीं है। यदि तू दूसरों के कल्याण के लिये ब्रह्मविद् मनुष्य बनो और बनाओ आन्दोलन का प्रचार-प्रसार में प्राण तक देने को तैयार हो जाता है, तो भगवान उनका (जो तुम पर आश्रित हैं) कोई न कोई उपाय करेंगे ही !
"न हि कल्याणकृत्कश्चित् दुर्गतिं तात गच्छति।"
जगदीश्वर को कभी धोखा नहीं दिया जा सकता। त्याग करो, स्वार्थ का बलिदान करो, दूसरा क्या उपाय है ? बन्धु कौन है ? जो घर से श्मसान तक नहीं छोड़े? इसीलिये पहले यथार्थ मनुष्य बनो - यथार्थ मनुष्य कैसे होते हैं ? वे जो मुख से जो बोलते हैं, वही करते हैं। (खाँटी लोग के ? जे मुखे जा बोले ताई करे) मोहम्मद पहाड़ के निकट जायेगा। विद्या गुरुमुखी -श्रवण करने से ही महान शिक्षायें प्राप्त होती हैं। नचिकेता के गुरु स्वयं यमाचार्य थे,और रानी मदालसा के शिशुओं को श्रेष्ठ-संस्कार अपनी माँ के मुख से और अपने कान में उसकी लोरी सुनने से ही प्राप्त हुई थी। अतः इस कार्य में भारतीय नारीयों को भी लग जाना होगा।
>>> महामण्डल में नेता का आदर्श : "जो महापुरुष (आध्यात्मिक शिक्षक) प्रचार-कार्य के लिये अपना जीवन समर्पित कर देते हैं, वे उन महापुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत अपूर्ण हैं, जो मौन रह कर पवित्र जीवन यापन करते हैं एवं श्रेष्ठ विचारों का चिन्तन करते हुए जगत की सहायता करते हैं। इन सभी महापुरुषों में एक के बाद दूसरे का आविर्भाव होता है-अंत में उनकी शक्ति का चरम फलस्वरूप ऐसा कोई शक्तिसम्पन्न पुरुष आविर्भूत होता है, जो जगत को शिक्षा प्रदान करता है। "७/९३
एक मात्र श्रद्धा के भेद से ही मनुष्य मनुष्य में अन्तर पाया जाता है। इसका और दूसरा कारण नहीं। यह श्रद्धा ही है, जो एक मनुष्य को बड़ा और दूसरे को कमजोर और छोटा बनाती है। दुर्भाग्यवश भारत से इसका प्रायः लोप हो गया है । इस श्रद्धा को तुम्हें पाना ही होगा । श्रीरामकृष्ण कहते थे, 'जो अपने को दुर्बल सोचता है, वह दुर्बल ही हो जाता है' - और यह बात बिल्कुल ठीक ही है। हमारे राष्ट्रिय खून में एक प्रकार के भयानक रोग का बीज समा रहा है, वह है प्रत्येक विषय को हँसकर उड़ा देना, गाम्भीर्य का अभाव, इस दोष का सम्पूर्ण रूप से त्याग करो। वीर बनो, श्रद्धा सम्पन्न होओ, और सब कुछ तो इसके बाद आ ही जायगा। किसी बात से मत डरो। तुम अद्भुत कार्य करोगे। जिस क्षण तुम डर जाओगे, उसी क्षण तुम बिल्कुल शक्तिहीन हो जाओगे। संसार में दुःख का मुख्य कारण भी ही है, यही सबसे बड़ा कुसंस्कार है, और यह निर्भीकता है जिससे क्षण भर में स्वर्ग प्राप्त होता है। अतएव उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
"सदाचार (चरित्र-निर्माण और मनःसंयोग) सम्बन्धी जिनकी उच्च अभिलाषा मर चुकी है, भविष्य की उन्नति के लिए जो बिल्कुल चेष्टा नहीं करते, और भलाई करने वालों को धर दबाने में जो हमेशा तत्पर हैं-ऐसे 'मृत-जड़पिण्डों ' के भीतर भी क्या तुम प्राण का संचार कर सकते हो ? क्या तुम "उस वैद्य" की जगह ले सकते हो, 'जो लातें मारते हुए उदण्ड बच्चे के गले में दवाई डालने की कोशिश करता है? भारत को उस नव-विद्युत की आवशयकता है, जो राष्ट्र की धमनियों में नविन चेतना का संचार कर सके। 'यह काम' हमेशा धीरे धीरे हुआ है, और होगा।" (३:३४४)
" सूर्य उदित होने में अब अधिक विलम्ब नहीं है। ब्रह्मविद् मनुष्य बनो और बनाओ आन्दोलन का प्रचार-प्रसार में यदि तू दूसरों के लिये प्राण देने को तैयार हो जाता है, तो भगवान उनका (जो तुम पर आश्रित हैं) कोई न कोई उपाय करेंगे ही !
तुम्हारे देश का जनसाधारण मानो एक सोया हुआ तिमिंगल (Leviathan) है। उठो, जागो, तुम्हारी मातृभूमि को इस महाबली (कच्चा मैं या 'अहं मुक्त' युवाओं) की आवश्यकता है। इस कार्य की सिद्धि युवकों से ही हो सकेगी। ह्रदय--केवल ह्रदय के भीतर से ही दैवी प्रेरणा का स्फुरण होता है, और उसकी अनुभव शक्ति से ही उच्चतम जटिल रहस्यों की मीमांसा होती है, और इसलिये 'भावुक' बंगालियों को ही यह काम करना होगा। वीर बनो, श्रद्धा सम्पन्न होओ, और सब कुछ तो इसके बाद आ ही जायगा। किसी बात से मत डरो। तुम अद्भुत कार्य करोगे। जिस क्षण तुम डर जाओगे, उसी क्षण तुम बिल्कुल शक्तिहीन हो जाओगे। संसार में दुःख का मुख्य कारण भी ही है, यही सबसे बड़ा कुसंस्कार है। और यह निर्भीकता है जिससे क्षण भर में स्वर्ग प्राप्त होता है।
(हजारों वर्ष तक गुलाम रहने के बाद) अब भी, कितनी ही शताब्दियों तक संसार को शिक्षा देने की सामग्री तुम्हारे पास यथेष्ट है। इस समय यही करना होगा। उत्साह की आग हमारे हृदय में जलनी चाहिये। मैं तुमसे कहना चाहूँगा कि निस्सन्देह बुद्धि का आसान ऊँचा है, परन्तु यह अपनी परिमित सीमा के बाहर नहीं बढ़ सकती। ह्रदय--केवल ह्रदय के भीतर से ही दैवी प्रेरणा का स्फुरण होता है, और उसकी अनुभव शक्ति से ही उच्चतम जटिल रहस्यों की मीमांसा होती है, और इसलिये 'भावुक' बंगालियों को ही यह काम करना होगा। उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । Arise, Awake and Stop Not Till the Desired End is Reached!' उठो, जागो, जब तक वांछित लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक निरंतर उसकी ओर बढ़ते जाओ।
" मेरा आदर्श अवश्य ही थोड़े से शब्दों में कहा जा सकता है, और वह है,'मनुष्य-जाति' को उसके दिव्य स्वरूप का उपदेश देना, तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे अभिव्यक्त करने का उपाय (कार्यपद्धति) बताना।
" जगत को प्रकाश कौन देगा ? बलिदान (आत्मोसर्ग) ही भूतकाल से नियम रहा है और हाय! युगों तक इसे रहना है। संसार के वीरों को और सर्वश्रेष्ठों को 'बहुजन हिताय,बहुजन सुखाय' अपना बलिदान करना होगा। असीम दया और प्रेम से परिपूर्ण सैकड़ों बुद्धों की आवश्यकता है।
संसार को ऐसे लोग चाहिये, जिनका जीवन स्वार्थहीन ज्वलन्त प्रेम का उदाहरण हो। वह प्रेम एक एक शब्द को वज्र के समान प्रभावशाली बना देगा।मेरी दृढ़ धारणा है कि तुममें (अविद्या-जन्य) कुसंस्कार नहीं है। तुममें वह शक्ति विद्यमान है, जो संसार को हिला सकती है, धीरे धीरे और भी अन्य लोग आयेंगे।
जो अत्याचार से दबे हुए हैं, चाहे वे पुरुष हों या स्त्री, मैं उन सबों के प्रति करुणा का भाव रखता हूँ, किन्तु जो अत्याचारी हैं, उनको मैं और अधिक करुणा का पात्र समझता हूँ। हम बार बार पुकारें, जब तक सोते हुए देवता न जाग उठें, जब तक अन्तर्यामी देव उस पुकार का उत्तर न दें। जीवन में और क्या है? इससे महान कर्म क्या है ?
बोल्ड वर्ड्स ऐंड बोल्डर डीड्स -आर व्हाट वी वांट ! निर्भीक वक्ताओं की अर्थात वेदान्त के शेर की दहाड़- 'तत्त्वमसि !' सुनाने में समर्थ ऋषियों या पैगंबरों की, और उससे अधिक 'निर्भीक' कर्मों (BE AND MAKE !) की हमें आवश्यकता है।
स्वामी विवेकानन्द जगत को प्रकाश देने में समर्थ भावी नेताओं (लोक-शिक्षकों) का आह्वान करते हुए कहते हैं- " हे नरनारीगण, एई भाब लईया दण्डायमान हउ, सत्ये बिश्वासी हईते साहसी हउ, सत्य अभ्यास करिते साहसी हउ। जगते कयेक शत साहसी नरनारी प्रयोजन। ""हे नर-नारियों ! उठो, आत्मा के सम्बन्ध में जाग्रत होओ, सत्य में विश्वास करने का साहस करो, सत्य के अभ्यास का साहस करो । संसार को केवल सौ साहसी नर-नारियों की आवश्यकता है। अपने में वह साहस लाओ, जो सत्य को जान सके, जो जीवन में निहित सत्य को दिखा सके, जो मृत्यु से न डरे, प्रत्युत उसका स्वागत करे, जो मनुष्य को यह ज्ञान करा दे कि वह आत्मा है और सारे जगत में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं, जो उसका विनाश कर सके। तब तुम (जो दूसरों को भेड़-सिंह की कहानी सुनाते रहे हों -वह) मुक्त हो जाओगे। तब तुम अपनी वास्तविक आत्मा को जान लोगे। 'इस आत्मा के सम्बन्ध में पहले श्रवण करना चाहिये, फिर मनन और तत्पश्चात निदिध्यासन। २/१८
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श्रीरामकृष्ण देव प्रथम युवा नेता थे जिनके जीवन में साम्य-भाव पूर्णतः प्रतिष्ठित हुआ था -अर्थात वे जो सोचते थे, वही बोलते थे, जो बोलते थे (दूसरों को जो उपदेश देते थे) वही करते थे! (टाका-माटी,माटी-टाका, 'लस्ट और लूकर ' में आसक्ति का त्याग अपने जीवन में उतार कर दिखा दिये थे!) वे कुछ चुने हुए हुए युवाओं को मन्दिर की छत पर चढ़कर पुकारे, उन सभी युवाओं को उन्होंने ५ अभ्यास के द्वारा साम्यभाव में स्थित होने, तथा 'त्याग और सेवा' का प्रशिक्षण दिया। और जब उन्होंने देखा कि जितना करने को था उतना कर दिया, तब उन्होंने अपने नश्वर शरीर का त्याग कर दिया।
उन युवाओं में से एक थे नरेन्द्रनाथ दत्त, जिन्होंने आधुनिक युग के अवतार श्रीरामकृष्ण से मानवजाति का मार्गदर्शक नेता बनने का प्रशिक्षण प्राप्त किया, और आगे चल कर स्वामी विवेकानन्द के नाम से विख्यात हुए। श्री रामकृष्ण ने उन्हीं के कंधों पर मानवजाति का मार्गदर्शक नेता बनने और बनाने का प्रशिक्षण देने का भार सौंपा था। उन्होंने अपने हाथों से उन्हें एक लिखित 'चपरास' सौंपा था -'नरेन शिक्षा देगा !'
भगवान श्रीरामकृष्ण ने 11 फरवरी 1886 की संध्या बेला में भावावेश में किन्तु पूर्ण-एकाग्रता के साथ, कागज के उपर लिखा था- "जय राधे प्रेममयी ! नरेन शिक्षे दिबे,जखन घरे बाहिरे हाँक दिबे! जय राधे !!"अर्थात- ' जगतजननी जगदम्बा की इच्छा से नरेन्द्रनाथ अपने भावी जीवन में मानव-जाति के एक मार्गदर्शक नेता (लोक-शिक्षक) के रूप में खड़े हो कर, घर (देश) में और बाहर (विदेश) में अनगणित मनुष्यों को मोह निद्रा (अविद्या) से जगाने के लिये उनका आह्वान करेंगे।' ऐसा प्रतीत होता है कि उस चपरास में श्रीरामकृष्ण मानो स्वयं प्रेममयी श्रीराधिका से अपने द्वारा निर्वाचित नरेन्द्रनाथ को लोक-शिक्षक बना देने की प्रार्थना कर रहे हैं। और वे केवल यह लिखित 'चपरास' देकर ही नहीं रुके। उसी क्षण सहज भावावेग में, उन्होंने अपने हाथों से बयान के नीचे उच्चतम भावनाओं की अभिव्यंजनाओं से परिपूर्ण एक अत्यन्त मनोरम एक गुह्य रेखा-चित्र भी उकेर दिया था। उस रेखा-चित्र में ठाकुर ने आवक्ष-मुखाकृति (सिर से गले तक के मानव-मुखड़े) को उकेरा था- उस मुखाकृति के विशाल नेत्रों की दृष्टि प्रशान्त थी, और एक 'लम्बी पूंछवाला धावमान मयूर' उस मुखाकृति का अनुगमन करता हुआ उसके पीछे-पीछे चल रहा है।
उस रेखाचित्र के माध्यम से स्वामी विवेकानन्द के गुरु, तथा चपरास प्रदानकर्ता युवा-नायक श्रीरामकृष्ण परमहंस मानो यही आश्वासन देना चाह रहे थे, कि 'माँ काली ' द्वारा निर्वाचित चपरास प्राप्त प्रत्येक भावी नेता के पीछे-पीछे सदा वे स्वयं विदयमान रहेंगे। तथा उसे यह प्रेरणा देते रहेंगे कि - " त्यागी हुए बिना, लोक-शिक्षा देने का अधिकार प्राप्त नहीं होता है, (अतः मन्त्र-दीक्षा प्रदान करने का अधिकार प्राप्त करने के लिए) निवृत्ति-मार्गी सन्यासियों का त्याग होगा, समग्र रूप से त्याग। मन ही मन त्याग करने से नहीं होगा। क्योंकि युवाओं को यथार्थ मनुष्य, समदर्शी मनुष्य या साम्यभाव में स्थित मनुष्य बनने और बनाने का उपदेश वही दे सकता है, जो अपने जीवन में स्वयं उनका पालन भी करता हो। नवनी दा के जैसा मनुष्य -जिसे देखकर पूजा करने का मन करता हो, सिद्धार्थ गौतम से 'गौतम बुद्ध' बनकर गाँव -गाँव घूमकर 'उत्तिष्ठत -जाग्रत' (देहाध्यास का स्वप्न अब और मत देखो) तथा 'महामण्डल की समर नीति -'चरैवेति-चरैवेति' का मन्त्र सुनाने का अधिकार (चपरास) प्राप्त महामण्डल आंदोलन का नेता केवल वही मनुष्य हो सकता है, जिसने 'लस्ट और लूकर ' में आसक्ति का त्याग समग्र-रूप से कर दिया हो ! तभी उसका जीवन भी आचार-व्यवहार में दूसरे सभी लोगों के लिये उदाहरण-स्वरूप होगा। तभी उनका नेतृत्व अविवादित रूप से स्वीकृत होगा।"
श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव कहते थे, " लोक-शिक्षा देना बहुत कठिन है। यदि ईश्वर का दर्शन हो, और वे आदेश दें, तभी कोई यह कार्य कर सकता है। फिर मन ही मन में यह सोच लेना कि मुझे आदेश मिल गया है, केवल ऐसा मान लेने से ही नहीं होगा। वे वास्तव मे दिखाई देते हैं, और बातचीत करते हैं। उस समय आदेश मिल सकता है। उस आदेश में कितनी शक्ति होती है। जिसको आदेश मिल जाता है, वह चाहे जितनी लोक-शिक्षा दे सकता है। माँ उसको पीछे से कितनी ज्ञान-राशि ठेलते रहती है। हे प्रचारक, क्या तुम्हें 'चपरास' मिला है ? जिस व्यक्ति को चपरास मिल जाता है, भले ही वह एक सामान्य अर्दली या चपरासी ही क्यों न हो, उसका कहना लोग भय और श्रद्धा के साथ सुनते हैं। वह व्यक्ति अपना राज-मोहर अंकित बैज दिखलाकर बड़ा दंगा भी रोक सकता है।
हे प्रचारक, तुम पहले भगवान का साक्षात्कार कर उनकी प्रेरणा से दूसरों को प्रेरित करने का आदेश प्राप्त कर लो, लीडरशिप का बैज प्राप्त कर लो। बिना बैज मिले यदि तुम सारे जीवन भी प्रचार करते रहो,तो उससे कुछ न होगा, तुम्हारा श्रम व्यर्थ होगा। पहले अपने ह्रदय मन्दिर से अहंकार को हटाकर, वहाँ भगवान को प्रतिष्ठित कर लो, उनके दर्शन कर लो, बाद में यदि उनका आदेश हो तो लेक्चर देना। संसार में आसक्ति - के रहते (अर्थात 'कामुकता और कमाई' में आसक्ति के रहते) तथा विवेक-वैराग्य के न रहते सिर्फ 'ब्रह्म ब्रह्म ' कहने से क्या होने वाला है? अपने ह्रदय-मंदिर में देवता तो हैं नहीं, व्यर्थ शंख फूँकने से क्या होगा?"
चिन्हित लोक-शिक्षकों को जगदंबा ही शक्ति-सामर्थ्य जूटा देती हैं। नरेन्द्रनाथ को चपरास दिये जाने के बाद, अपनी महासमाधि के दो दिन पहले श्रीरामकृष्ण ने नरेन्द्रनाथ के भीतर शक्ति-संचार किया था। और उसी शक्ति से उन्होने सम्पूर्ण विश्व में सफलता प्राप्त की थी।व्यापक-अर्थ में देखा जाय तो, श्रीरामकृष्ण और स्वामी विवेकानन्द दोनों ही जगतजननी माँ काली (श्रीराधा) से सर्वमान्य चपरास प्राप्त लोक-शिक्षक हैं। श्रीरामकृष्ण परमहंस सामाजिक कल्याण के लिए व्यक्ति के चित्तशुद्धि अर्थात उसकी मानसिकता को परिवर्तित करने के ऊपर अधिक ज़ोर देते थे। उधर विवेकानन्द राजयोग के द्वारा मनुष्य की मानसिकता को परिवर्तित कर, उसके चरित्र और व्यवहारिक आचरण में परिवर्तन लाकर, मनुष्य-निर्माण के माध्यम से सामाजिक-उन्नति और नये भारत का निर्माण करना चाहते हैं। इसके बाद जब श्रीरामकृष्ण ने अपना शरीर त्याग दिया तो, उनके युवा शिष्यों ने स्वामी विवेकानन्द के नेतृत्व में वेदान्त के निवृिति मार्गी सन्यासियों के लिये, श्रीरामकृष्ण मठ मिशन की स्थापना की।
ततपश्चात, १८९३ में शिकागो में आयोजित प्रथम विश्व धर्म महासभा में वैदिक धर्म जिसे हिन्दू धर्म कहा जाता है, के प्रतिनिधि के रूप में भाग लेने के लिए स्वामी विवेकानन्द अमेरिका गए थे। वहाँ वेदान्त के ऊपर दिये व्याख्यानों से लोग इतने प्रभावित हुए कि उन्हें कुछ और दिनों तक अमेरिका में ही रहने का अनुरोध किया गया। उन्होंने तीन वर्षों तक १८९३ से १८९६ तक अमेरिका के विभिन्न प्रान्तों का दौरा किया। १८९६ के दिसम्बर महीने में अमेरिका से रवाना हुए १५ जनवरी १८९७ को सिंघल-द्वीप (लंका) पहुँचे। वहाँ ट्रेन द्वारा फरवरी महीने में कोलकाता पहुँचे। फिर रामेश्वरम से लाहौर तक भारत को जाग्रत किया। पाश्चात्य-देशों को भारत से अलग ३-४ साल तक केवल निवृत्ति मार्ग का उपदेश दे रहे थे, तो अगले ३ वर्षों तक ९७-९८-९९ तक भारत को प्रवृत्ति मार्ग का उपदेश दिया। ताकि हजारों वर्षों से गुलाम भारतवासी भी थोड़ा 'लस्ट और लूकर ' का भोग करते हुए भी यदि ५ अभ्यासों का अनुपालन करते रहें, तो वे बहुत जल्दी इसकी निस्सारता को समझ लेंगे। और द्वासुपर्णा -के नाश्नन्न अन्यो अभिचाकशीति- जैसा अपने भीतर के बुद्ध को अभिव्यक्त कर लेगा।
>>>रहस्य-स्पृहा मानव-मस्तिष्क को दुर्बल बना देती है। (The desire for mystery makes the human brain weak.) स्वामीजी 1899 के अन्त में दुबारा विदेश गए थे - विशेष रूप से यह देखने के लिये कि वहाँ उनके द्वारा तीन वर्षों तक किये गए परिश्रम का परिणाम क्या हुआ है। इस बार लोग उनके गुरुदेव के बारे में जानने को इतने उत्सुक थे - कि नहीं चाहते हुए भी उनको " मेरे गुरुदेव " के नाम से एक विख्यात भाषण देना पड़ा। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं -"पाश्चात्य देशों में लोग ध्यान करने की पद्धति (पतञ्जलि योग सूत्र या 'राजयोग') को पूर्वी रहस्यविद्या (Eastern Mysticism) या गुप्त विद्या समझते थे। और जो लोग मनको एकाग्र करने का अभ्यास करते थे, उन पर अघोरी, डाइन, ऐंद्रजालिक आदि अपवाद लगाकर मार देते थे या उन्हें जला दिया अथवा जाता था। भारतवर्ष में भी प्राच्यमकाल में जिनके हाथ यह शास्त्र पड़ा, उन्होंने समस्त शक्तियाँ अपने अधिकार में रखने की इच्छा से इसको महा गोपनीय बना डाला और युक्तिरूपी सूर्य का प्रखर आलोक इस पर न पड़ने दिया। इन समस्त योग-प्रणालियों में कुछ गुह्य या रहस्यात्मक है, सब छोड़ देना पड़ेगा, जो तुमको दुर्बल बनाता हो, वह समूल त्याज्य है। रहस्य-स्पृहा मानव-मस्तिष्क को दुर्बल बना देती है। इसके कारण ही आज योग-शास्त्र नष्ट सा हो गया है। किन्तु वास्तव में यह एक महाविज्ञान है। अतः स्वामी जी ने पाश्चात्य देशों में निवृत्ति मार्ग का प्रशिक्षण देने के लिए सम्पूर्ण राजयोग (अष्टांग योग) का प्रचार किया था।
चार हजार वर्ष से भी पहले यह आविष्कृत हुआ था। मैं जो कुछ प्रचार कर रहा हूँ, उसमें गुह्य नामक कोई चीज नहीं है। अन्धविश्वास करना ठीक नहीं।अपनी विचार-शक्ति और युक्ति-तर्क काम में लेनी होगी। यह प्रत्यक्ष करके देखना होगा कि शास्त्र में जो कुछ लिखा है- वह सत्य है या नहीं ? भौतिक विज्ञान तुम जिस ढंग से सीखते हो, ठीक उसी प्रणाली से यह धर्म-विज्ञान भी सीखना होगा। इसमें गुप्त रखने की कोई बात भी नहीं, किसी विपत्ति की आशंका भी नहीं। इसमें जहाँ तक सत्य हो, उसका सबके समक्ष राजपथ पर प्रकट रूप से प्रचार करना आवश्यक है। कोई भी विज्ञान क्यों न सीखो, पहले अपने आप को उसके लिये तैयार करना होगा, फिर एक निर्दिष्ट प्रणाली का अनुसरण करना होगा, इसके आलावा उस विज्ञानं के सिद्धान्तों को समझने का और कोई दूसरा उपाय नहीं है। राजयोग के सम्बन्ध में भी ठीक ऐसा ही है। [१/४४]
किन्तु,जिन युवाओं या विद्यार्थियों की रूचि प्रवृत्ति मार्ग या कर्म-योग की ओर अधिक है, उन्हें भी -' BE AND MAKE' आंदोलन या चरित्र-निर्माण आंदोलन को लीडरशिप प्रदान करने योग्य प्रशिक्षक, या लीडर ट्रेनिंग देने सक्षम नेता - बनने और बनाने के उद्देश्य से, महामण्डल (पूज्य नवनीदा) के द्वारा सम्पूर्ण राजयोग (अष्टांग योग) को और सरल बनाकर,(प्राणायाम, ध्यान, समाधि को छोड़कर) 'मनःसंयोग' सहित केवल ५ दैनन्दिन अभ्यासों का प्रशिक्षण दिया जाता है। तथा सम्पूर्ण भारतवर्ष में मनुष्य-निर्माण और चरित्र- निर्माणकारी आंदोलन का प्रचार-प्रसार करने में समर्थ नेताओं (प्रवृत्ति मार्गि प्रशिक्षकों- पैगम्बरों का निर्माण) बहुत बड़े पैमाने पर करने के उद्देश्य से महामण्डल द्वारा आयोजित सर्व भारतीय वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर में 'लीडरशिप ट्रेनिग' भी विगत ५० वर्षों से दिया जा रहा है।
" नवता को - दो प्रकार की अतियों से बचना चाहिये -स्काइला और चेरीबाइर्डिस से, आज हमें एक तरफ वह घोर भौतिकवादी मनुष्य दिखाई देता है जो पाश्चात्य ज्ञान रूपी मदिरा-पान से मत्त होकर अपने को सर्वज्ञ समझता है,और प्राचीन ऋषियों की हँसी उड़ाया करता है। और दूसरा इसकी प्रतिक्रिया से पैदा हुए घोर कुसंस्कार वाला वह शिक्षित मनुष्य जिसपर हर छोटी बात का अलौकिक अर्थ निकालने की सनक सवार रहती है। यदि कोई व्यक्ति कुसंस्कारपूर्ण मुर्ख होने के बदले यदि घोर नास्तिक भी हो जाय तो मुझे पसन्द है, क्योंकि नास्तिकता तो जीवन्त है, तुम उसे किसी तरह परिवर्तित कर सकते हो। परन्तु यदि कुसंस्कार घुस जाएँ, तो मस्तिष्क बिगड़ जायेगा,कमजोर हो जायेगा और मनुष्य विनाश की ओर अग्रसर होने लगेगा। इन दो संकटों से बचो!" ५/१७२
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चरित्र क्या है ? विभिन्न समय पर विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न कार्य करने का अवसर प्राप्त होता रहता है। उन विशिष्ट परिस्थितियों में बिना सोच-विचार किये ही हमोलोग जो कार्य कर बैठते हैं, उसी कार्य और व्यवहार से हमारा चरित्र प्रकट हो जाता है। चरित्र बनता है आदत से, यदि हम प्रति-मुहूर्त अच्छा काम करने की आदत डाल देते हैं, तो हमारा चरित्र अच्छा बन गया है, इसीलिये हमसे केवल अच्छे कार्य ही होंगे। बुरे कार्य की आदत होगी तो चरित्र बुरा बन जायेगा। आज समाज में असत चरित्र वाले मनुष्यों की संख्या में वृद्धि हो गई है, जिसके कारण भ्रष्टाचार-नारी अपमान जैसी घटनायें आये दिन देखने को मिलती हैं। मनुष्य के निजी जीवन में उन्नति होने से समाज की उन्नति होती है, और समाज के उन्नत होने से देश उन्नत होता है। और किसी भी व्यक्ति का जीवन उसके अच्छे-बुरे चरित्र पर निर्भर करता है।
उसी प्रकार किसी राष्ट्र का उन्नत बनना इस बात पर निर्भर करता है कि उस देश के अधिकांश नागरिक किस प्रकार का जीवन जीते हैं ? किस प्रकार के कार्य करते हैं, देश को स्वच्छ रखने की आदत है, या गंदगी फ़ैलाने की आदत है ? किसी व्यक्ति का वास्तविक चरित्र कुछ दिनों तक उसके साथ रहने से ही प्रकट होता है। चरित्र समाज में रहते हुए ही गठित हो सकता है, जंगल जाने या अकेले रहने, या किसी विशिष्ट प्रकार का चोगा-पोशाक धारण कर लेने से, या ऊपर-ऊपर से देखने पर उसका वास्तविक चरित्र प्रकट नहीं होता। एकान्त में उसका व्यवहार कैसा है ; उसी से उसका चरित्र झलक जाता है। कपट धार्मिक बक: की कथा। पशु-मानव, देव-मानव का अन्तर उसके चरित्र से ही प्रकट होता है। अपने जीवन को सार्थक करने के लिये चरित्र निर्माण आवश्यक है। आज जो मेरा चरित्र है, वह मेरी पुरानी आदतों या प्रवृत्तियों का समाहार है। एक ही कार्य को बार बार करने से उसकी आदत पड़ जाती है, और उम्र बढ़ने के साथ साथ, आदतें पुरानी होकर हमारी प्रवृत्ति या प्रोपेन्सिटीज में परिणत हो जाती हैं।
>>>विवेक-प्रयोग : किन्तु कोई भी कार्य करने के पहले उसे करने के लिये मन में विचार उठता है। जैसा विचार उठेगा हम वैसे ही कार्य करेंगे। अतः मन में विवेक-प्रयोग करने की आदत डालनी पड़ेगी और सत-असत विचारों को उठते ही विवेक से पहचान कर डिस्क्रिमिनेट करके बुरे विचारों को उठते ही कुचल देना होगा -निपिंग इन दी बड। और केवल सुंदर विचारों को ही खिलने का मौका देने की आदत डालनी होगी। मन में जैसे विचार उठेंगे वही कार्य में परिणत हो जायेंगे।
स्वामी विवेकानन्द के शक्तिदाई विचार हमें, व्यष्टि-मनुष्य को शक्ति देंगे, मुझे निःस्वार्थ बनने की दिशा में विकसित करेंगे। 3H की शक्तियों को विकसित करने का अर्थ है निःस्वार्थपरता की दृष्टि से विकसित होना।और उससे जो भी कार्य होगा उससे समाज का ,समष्टि का या बृहत का कल्याण होगा। अतः निरंतर विवेक-प्रयोग और मन को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश करते हुए केवल सत्कर्म करने की आदत बना लें तो चरित्र अच्छा बनना उतना ही सत्य है जैसे 2+2 =4 होता है, अच्छे गुणों को बढ़ाते रहें तो अच्छा चरित्र बन जायेगा। यह चरित्र रेसिप्रोक्ल अनुपात से बढ़ता है।
>>>चरित्र के २४ गुणों की तालिका और १२ दुर्गुणों की तालिका से पाठ : करके ७-१५-३० दिनों के अन्तराल पर आत्ममूल्यांकन तालिका को भरना होगा। निजका-समाज का -देश की उन्नति चरित्र के गुणों में वृद्धि के ऊपर निर्भर करता है। देश के अधिकांश मनुष्य रोड-पुल-पुलिया-अस्प्ताल-स्कूल निर्माण में किस प्रकार से कार्य करते हैं ? देवता-मनुष्य-पशु की पहचान उसके चरित्र से होती है। अपनी उन्नति के लिये या उन्नततर मनुष्य बनने के लिए चरित्र-निर्माण करना अनिवार्य है। आज जो मेरा चरित्र है, वह मेरी पुरानी आदतों और प्रवृत्तियों का समाहार है। कार्य करने के पहले होता है, विवेक-विचार। विवेक-प्रयोग का अभ्यास सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। कुसंग का त्याग, सत्संग या पाठचक्र में जाना मंदिर जाने से भी अधिक आवश्यक है। शुभ-विचार-शुभकर्म-शुभचरित्र। हमारे जीवन में आगे और परिवर्तन होगा।
स्वच्छ-भारत के पहले विचारों का स्वच्छ होना अनिवार्य है। मन में शुद्ध या पवित्र विचार उठ रहे हैं या नहीं? मन में कैसे विचार उठ रहे हैं -वैसे ही कार्य होंगे। शक्तिदायि विचार निःस्वार्थपर विचार मुझे बृहत का कल्याण करने को प्रेरित करता रहेगा। विवेक को जाग्रत रखते हुए मन पर नियंत्रण रखने के लिये मनःसंयोग का अभ्यास करके अच्छी आदत से अच्छा चरित्र हो जायेगा। व्यक्तिगत तौर पर ही नहीं देशव्यापी तौर पर चरित्र-निर्माण का आंदोलन चलाना होगा।
>>>>>>Authentic history of emergence of Mahamandal : महामण्डल के आविर्भूत होने का प्रामाणिक इतिहास :
🔱>>> "The fundamental spirit of the Mahamandal that emerged in 1967 and the Authentic History of its origination.
🔱>>>"1967 में आविर्भूत 'अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल' (1985/1995 में आविर्भूत विवेकानन्द ज्ञान मन्दिर विद्यालय जानिबिघा) की मूल भावना तथा इसकी उत्पत्ति का प्रामाणिक इतिहास: >>> Vedanta Dindim 'C-IN-C' Rank Batch Leadership Training Tradition' of Mahamandal. (महामण्डल का नेतृत्व प्रशिक्षण परंपरा में प्रशिक्षित होने का वेदान्त डिण्डिम 'सी-इन-सी' रैंक बैच [नेता-वरिष्ठ पद (Leader-Senior Position)] वरीयता क्रम का उदाहरण - "स्वामी विवेकानन्द -कैप्टन सेवियर Be and Make ' वेदान्त शिक्षक-प्रशिक्षण" परम्परा में प्रशिक्षित और C-IN-C का चपरास प्राप्त जीवनमुक्त शिक्षक महामण्डल के विभिन्न विभाग के लिए नेताओं के विभिन्न पद और अलग-अलग Rank Batch बैच परम्परा को को अच्छी तरह से समझने के लिए "1967 में महामण्डल के आविर्भूत होने" के सम्पूर्ण वृतान्त # 3 से परिचित होना अनिवार्य है।
>>>Auto-suggestion and Self-introspection : महामण्डल का संकल्प-ग्रहण सूत्र : ["मनुष्य" बनने का स्व-परामर्श सूत्र और आत्ममूल्यांकन -तालिका : (ऑटो-सजेशन और सेल्फ-इंट्रोस्पेक्शन : "Self-counseling formula and self-evaluation - table to become a Unselfish human being") असीम कुमार पोड़िया :
देश की हालत देखो, राज्य-सभा सांसद विजय माल्या पार्लियामेन्ट से भाग गया, या उसे भागने में किसी के द्वारा मदत भी किया गया ? चरित्र ही बज्र जैसी प्रत्येक बाधाओं की प्राचीर को पार कर सकता है। भारतवर्ष में हमलोग पारम्परिक संस्कृति और सामयिक, चारित्रिक दृष्टि से पिछड़ गए हैं। सभी लोग पाश्चात्य भोगी जीवन के प्रति आकृष्ट हो गए हैं। आर्थिक दृष्टि से जो धनी हैं, वे धनी होते जा रहे हैं, दरिद्र और भी दरिद्र होते जा रहे हैं। देश की अवस्था देखने से दुःख होता है -पर भारत-कल्याण का उपाय क्या है ?
चरित्र-निर्माण के कार्य को केवल वैयक्तिक स्तर पर ही नहीं देशव्यापी स्तर पर फैला देना होगा। आचार-आचरण के समग्र प्रयास से चरित्र गठन होता है। कार्य करने से पहले विचार होता है-कोई मनुष्य सायकिल से गिर गया ; तीन व्यक्ति तीन विभिन्न प्रवृत्तियों की प्रेरणा से प्रेरित होकर कार्य करेंगे। पहले विचार- फिर शुभ-अशुभ इच्छाओं का चयन या विवेक-प्रयोग, फिर कर्म, बार बार एक ही प्रकार का कर्म करने से-आदत, आदत पुरानी होने से -प्रवृत्ति, और आदतों /प्रवृत्तियों का समूह है - हमरा चरित्र। अब तक का मेरा (अच्छा/बुरा?) अतीत ही मेरा चरित्र बन गया है।
मेरी प्रवणताओं या प्रोपेन्सिटीज ने ही मेरे वर्तमान 'मैं' को निर्मित किया है। देश-प्रेमी नेताओं का अभाव है, शासक-वर्ग का चरित्र कहाँ है ? मनुष्य यदि उन्नततर मनुष्य बनने की चेष्टा नहीं करेगा, तो वह कल पशु तो क्या राक्षस बन सकता है। मैं आज जैसा मनुष्य हूँ कल उससे अच्छा अर्थात अधिक निःस्वार्थपर/ और निर्भीक मनुष्य बन जाऊँगा। यह शपथ -ग्रहण प्रतिदिन करना है।
>>>मनःसंयोग : चारित्रिक उत्कर्षता प्राप्त होती है मनःसंयोग सीखने से। अर्थात पहले मिथ्या संसार के प्रति मन में वैराग्य (तीनों ऐषणाओं में अनासक्ति का भाव) रखते हुए - "विवेक-दर्शन " का अभ्यास ! उभयतोवहिनी चित्त-नदी पर वैराग्य का फाटक लगाकर, विवेक-विचार करके शुभ इच्छाओं का चयन, कर्म -आदत, प्रवृत्ति - से चरित्र ! ध्येय वाक्य 'BE AND MAKE' को सामने रखकर चरित्र निर्माण के माध्यम से समग्र भारत का कल्याण। चरित्र-निर्माण की पद्धति हुई असंख्य निःस्वार्थ-पूर्ण या सत-विचार-> सत-वाणी-> सत्कार्य ->आदत->प्रवृत्ति और असंख्य अच्छी आदतों से अच्छा चरित्र। अच्छा विचार या अच्छा कार्य किसे कहेंगे ? उसको पहचानेंगे कैसे ? जो विचार और कार्य मुझे निःस्वार्थपर बना देते हैं-उसी को अच्छा समझना होगा। कौन-कौन से कार्य हमारे चरित्र के गुणों को बढ़ा सकते हैं -इसके लिये चरित्र के 24 गुणों को अपनाने की एक पुस्तक भी है। किन्तु केवल इन गुणों को पढ़ने से ही चरित्र-निर्मित नहीं होगा हमें बुरी आदतों को अच्छी आदतों के नीचे दबा देने की पद्धति (ऑटो-सजेशन और सेल्फ-इंट्रोस्पेक्शन) सीखकर उसका भी नियमित अभ्यास करना होगा।
जीवन क्या है ? यह भ्रान्त धारणा है कि मनुष्य का जीवन जवान से बुड्ढा होकर एक दिन मर जाने के लिये मिला है ? यह मनुष्य का जीवन नहीं, पशुओं का जीवन के लिये कहा गया है। यदि हमलोग मनुष्य हैं ? तो हमलोग ब्रह्म को परमसत्य को या ईश्वर को अवश्य ही जानेंगे! ब्रह्म को जानना (पूर्णता-दिव्यता-अमरत्व-जीव ही ब्रह्म है इस परम् सत्य को जान लेना) ही 'ब्रह्म ' हो जाना है। सेल्फ-इंट्रोस्पेक्शन करके प्रत्येक सप्ताह आत्ममूल्यांकन तालिका में स्वयं अपने चरित्र के गुणों का मानांक बैठाना होगा। केवल छः महीने में ही हमारा चरित्र निर्मित हो जायेगा, यह उतना ही सत्य है जितना सूर्य का पूरब में उगना।
>>>चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया हाउ टु बिल्ड कैरेक्टर ? (अतनु मन्ना ) महामण्डल का उद्देश्य भारत का कल्याण करने की कामना से अपने चरित्र का निर्माण करना, तो क्या हमलोग अभी चरित्रहीन हैं ? पशु को पशु नहीं बनना पड़ता मनुष्य को मनुष्य बनना पड़ता है। डिगनिटी ऑफ़ मैन या मनुष्य की गरिमा -महिमा इसी बात में है कि वह चाह ले तो मन को नियंत्रण में रखना सीखकर मनुष्य से देवता बन सकता है, ब्रह्म को जानकर ब्रह्मवेत्ता मनुष्य बन सकता है। किन्तु विवेक-प्रयोग और मनःसंयोग करना छोड़ दे तो वह पशु ही नहीं राक्षस भी बन सकता है। आत्मज्ञान या ब्रह्म ज्ञान की शिक्षा नहीं मिलने के कारण नरपशुओं की संख्या में वृद्धि हो रही है। उन्नतचरित्र-उन्नत मनुष्य-उन्नत समाज। चरित्रवान मनुष्यों का अभाव ही भ्रष्टाचार का मुख्य कारण है। विभिन्न परिस्थितियों में मेरा व्यवहार कैसा होगा -उसमें चरित्र ही निर्णायक की भूमिका निभाता है। बुरे चरित्र का मूल कारण विवेक-प्रयोग का अभ्यास नहीं करना है,क्योंकि थॉट-ऐक्शन-हैबिट-प्रोपेन्सिटी =कैरेक्टर ! भावी नेताओं के सामने हमें यह सन्देश पहुँचा देना होगा कि कैसे हमारा जीवन अच्छा बन सकता है ! परिस्थिति और परिवेश के सापेक्ष चरित्र गठन होता है, अतः यह कार्य प्रातः उठने के समय से प्रारम्भ होकर रात्रि में सोने के समय तक चलता रहेगा। यह कार्य कभी बंद नहीं होगा।
>>>5 daily exercises: (५ दैनन्दिन अभ्यास) :
१. जगत-मंगल की प्रार्थना: नींद से उठते ही करनी होगी, 'उदारचरितानां तू वसुधैव कुटुंबकम' की आंतरिक भावना के साथ यह प्रार्थना करनी होगी। यह महान औषधि है, हमें यह ध्यान रखना होगा कि सारे दिन किसी एक भी मनुष्य का नाम लेकर उसकी बुराई नहीं करूँगा।
२. मनःसंयोग और आत्मसमीक्षा : के पाँच चरणों , यम-नियम का अभ्यास प्रति-मुहूर्त, और आसन-प्रत्याहार-धारणा का दो बार नियमित अभ्यास। शरीर रथ है, इन्द्रियाँ घोड़े हैं, मन लगाम है, बुद्धि सारथि है -आत्मा रथी है ! अतः दूसरा महत्वपूर्ण स्टेप है, चरित्र के २४ गुणों को व्यक्त करना, आत्मसमीक्षा करके आत्ममूल्यांकन तालिका को भरना और जो गुण घट रहे हों या कम अभिव्यक्त हो रहें हों, उन्हें अर्जित करके उसमें विद्धि करके सारे गुणों के मानांक को ए की श्रेणी तक ले जाना। ये २४ गुण इस प्रकार से श्रृंखला बद्ध हैं कि यदि एक गुण को भी अर्जित करने का भी प्रयत्न करना हो -जैसे सत्यनिष्ठा, तो अपने मन से कहना होगा, उसे आदेश देना होगा कि आज सारा दिन मैं केवल सत्य ही कहूँगा। जो कोई जिस क्षेत्र में भी कार्य करते हों, वहीँ पर आत्मनिरीक्षण करते रहना होगा कि बुद्धि हमारे मन रूपी लगाम द्वारा इन्द्रिय घोड़ों को नियंत्रण में रखने हेतु अहं या 'मैंपन' को विवेक-प्रयोग करने के लिये बाध्य कर रही है या नहीं ? शाम को या कम से कम सोने से पहले मन को देखने के लिये बैठना होगा, मनःसंयोग या आत्मसमीक्षा द्वारा दैनन्दिन कार्यकलापों का विश्लेषण करके देखना होगा, प्रतिदिन सेल्फ-मार्किंग करके देखना होगा कि कम नंबर मिला है तो कहाँ-कहाँ मिस्टेक हुआ ? और स्वयं को ही जवाब देना होगा। मन को आदेश देना होगा, १०० प्रतिशत सत्यनिष्ठा में अंक लाना होगा।
३. व्यायाम : शरीर को स्वस्थ सबल रखना पहला धर्म है
४. स्वाध्याय : स्वामी विवेकानन्द के सन्देशों का दैनिक अध्यन अनिवार्य है।
५. विवेक-प्रयोग : प्रार्थना प्रथम ही नहीं अंतिम कार्य भी यही होगा, भारत वासियों का देश का मंगल हो ठाकुर से प्रार्थना करने के बाद सोने जायेंगे। तो यह निष्काम -प्रार्थना करने की हैबिट द्वारा विवेक-प्रयोग करने में निश्चित रूप से दैवी सहायता प्राप्त होगी। And habit makes your character और वही है तुम्हारा फ्यूचर है !
पूर्व राष्ट्रपति डॉ अब्दुल कलाम ने भी कहा था,
“You Can't Change Your Future, You Can Change Your Habits, and Surely Your Habits Will Change Your Future.
"तुम अपने भविष्य को नहीं बदल सकते,किन्तु तुम अपनी आदतों को बदल सकते हो। और तुम्हारी आदतें निश्चित रूप से तुम्हारे भविष्य को बदल देंगी !"
" All Birds Find Shelter During a Rain. But the Eagle Avoids Rain by Flying Above the Clouds! Problems Are Common, But Attitude Makes the Difference!
"बारिश की दौरान सारे पक्षी आश्रय की खोज करते हैं, लेकिन बाज़ बादलों के ऊपर उडकर बारिश को ही अवॉयड कर देते है। समस्याएँ कॉमन है, लेकिन (अपने प्रति?) आपका एटीट्यूड इनमें डिफरेंस पैदा करता है।"
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बालक सत्यकाम
(सत्य का प्रेमी)
एक बालक सत्यकाम (सत्य का प्रेमी) को किस प्रकार सत्य-ज्ञान प्राप्त हुआ, इस सम्बन्ध में छान्दोग्य उपनिषद की एक सुंदर कथा है। सत्यकाम ने अपनी माता से कहा, " मां, मैं किसी योग्य गुरु के आश्रम में रहकर सत्य-ज्ञान (वेद-शिक्षा) पाने बालक के लिए जाना चाहता हूं। मेरे पिता का नाम और मेरा गोत्र (pedigree : खानदानी वंशावली) क्या है, बताओ।"
उसकी माँ वाहिता स्त्री नहीं थी, और हमारे देश में किसी अविवाहिता स्त्री की संतान को जाति वहिष्कृत (आउटकास्ट) माना जाता है। समाज उसे अंगीकार नहीं करता, और उसे वेदों के अध्यन का अधिकार नहीं होता। अतएव बेचारी माँ ने कहा, " मेरे बच्चे,मैंने अनेक व्यक्तियों की सेवा की है, उसी अवस्था में तुम्हारा जन्म हुआ था, मैं नहीं जानती कि तुम्हारा पिता कौन है,इतना ही जानती हूँ कि मैं जबाला हूं और तुम सत्यकाम हो, इसलिए तुम स्वयं को सत्यकाम जाबाल कहो। "
तब वह बालक उस समय के प्रसिद्द गुरु गौतम ऋषि आश्रम में गया और उनसे स्वयं को शिष्य की भांति स्वीकार किए जाने का अनुरोध किया। ऋषि ने पूछा, " वत्स, तुम्हारे पिता का नाम और तुम्हारा गोत्र क्या है? " सत्यकाम ने उत्तर दिया," मैंने अपनी मां से पूछा था कि मेरा गोत्र, पारिवारिक नाम क्या है? और उन्होंने उत्तर दिया : अपनी युवावस्था में जब मैं सेविका का कार्य करती थी तो मैंने अनेक व्यक्तियों की सेवा की है,उसी अवस्था में तुम्हारा जन्म हुआ, अतएव मैं नहीं जानती कि तुम्हारा पिता कौन है— मैं जाबाला हूं और तुम सत्यकाम हो, इसलिए तुम स्वयं को सत्यकाम जाबाल कहो, श्रीमन् अत: मैं सत्यकाम जाबाल हूं।"
यह सुनकर ऋषि ने तुरन्त ही कहा, " वत्स, एक बाह्मण, सत्य के सच्चे खोजी के सिवा और कोई अपने सम्बन्ध में ऐसा लांछनकारी सत्य नहीं कह सकता। तुम सत्य से विचलित नहीं हुए, तुम सच्चे ब्राह्मण हो, मैं तुम्हें उस परम ज्ञान की शिक्षा दूंगा।" गुरु ने सत्यकाम को चार सौ गायों को चराने के लिए जंगल भेज दिया, और कहा जब गायों की संख्या दुगुनी हो जाये, तब लौट कर चले आना! " गायें चराते चराते कई मास व्यतीत हो गये। गायों की संख्या भी दुगुनी हो गयी। तब सत्यकाम ने आश्रम लौट चलने का विचार किया।
मार्ग में एक बृषभ, अग्नि तथा कुछ अन्य प्राणियों ने सत्यकाम को ब्रह्मज्ञान का उपदेश दिया।
सत्यकाम ने सुना था कि उनकी हृदयस्थ सत्ता की वाणी उनसे कह रही है, ' तुम अनन्तस्वरूप हो, वही सर्वव्यापिनी सत्ता तुम्हारे भीतर विराजमान है। अपने मन को संयमित करो, और तुम अपनी यथार्थ आत्मा की वाणी सुनो। ']
जब शिष्य आश्रम में गुरु को प्रणाम करने पहुँचा, तो गुरु ने उसे देखते ही जान लिया कि उसने ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लिया है। " गुरु के पास होना ही सब कुछ है। लेकिन केवल शिष्य ही पास हो सकता है। कोई भी या हर कोई पास नहीं आ सकता। क्योंकि जुड़ाव का, पास आने का मतलब है एक प्रेम—भरा भरोसा।स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " इस कथा का सार यही है कि हमें बाल्यावस्था से ही जाज्वल्यमान, उज्ज्वल चरित्रयुक्त किसी तपस्वी महापुरुष के सानिध्य में, या गुरु के साथ रहना चाहिये; जिससे कि समाधि में उपलब्ध होने वाले ब्रह्मज्ञान का जीवंत आदर्श सदा दृष्टि के समक्ष रहे।"
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>>>ब्रिटिश राज: 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम (सिपाही विद्रोह नहीं) के बाद 1858 और 1947 के बीच भारतीय उपमहाद्वीप पर ब्रिटिश द्वारा शासन था। जो क्षेत्र सीधे ब्रिटेन के नियंत्रण में था जिसे आम तौर पर समकालीन उपयोग में "इंडिया" कहा जाता था । ब्रितानी राज गोवा और पुदुचेरी जैसे अपवादों को छोड़कर वर्तमान समय के लगभग सम्पूर्ण भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश तक विस्तृत था।
20वीं सदी के अंत में, ब्रिटिश भारत आठ प्रांतों से बना था। असम,बंगाल (बांग्लादेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड और ओडिशा), बंबई(सिंध और महाराष्ट्र, गुजरात एवं कर्नाटक के कुछ हिस्से),बर्मा, मध्य प्रांत (मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़), मद्रास (तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश, केरल एवं कर्नाटक के कुछ हिस्से), पंजाब (पंजाब प्रांत, इस्लामाबाद राजधानी क्षेत्र, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़ और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली),संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड), बंगाल विभाजन (1905-1911) के दौरान 1911 में पूर्वी बंगाल और बंगाल के एक होने के साथ असम, बंगाल, बिहार और उड़ीसा पूर्व में नए राज्य बनें।
मुगल तथा मराठा साम्राज्यों के पतन के परिणामस्वरूप भारतवर्ष बहुत से छोटे बड़े राज्यों में विभक्त हो गया। इनमें से सिन्ध, भावलपुर, दिल्ली, अवध, रुहेलखण्ड, बंगाल, कर्नाटक मैसूर, हैदराबाद, भोपाल, जूनागढ़ और सूरत में मुस्लिम शासक थे। पंजाब तथा सरहिन्द में अधिकांश सिक्खों के राज्य थे। आसाम, मनीपुर, कछार, त्रिपुरा, जयंतिया, तंजोर, कुर्ग, ट्रावनकोर, सतारा, कोल्हापुर, नागपुर, ग्वालियर, इंदौर, बड़ौदा तथा राजपूताना, बुंदेलखण्ड, बघेलखण्ड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, काठियावाड़, मध्य भारत और हिमांचल प्रदेश के राज्यों में हिन्दू शासक थे।
1947 में,नेताजी सुभाष और भगत सिंह से डर कर अंग्रेज भाग गए किन्तु हमें पढ़ाया गया किमहात्मा गांधी के नेतृत्व में एक लम्बे और मुख्य रूप से अहिंसक स्वतन्त्रता संग्राम के बाद भारत ने आज़ादी पाई ? 1950 में लागू हुए नये संविधान में इसे सार्वजनिक वयस्क मताधिकार के आधार पर स्थापित संवैधानिक लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया गया और युनाईटेड किंगडम की तर्ज़ पर वेस्टमिंस्टर शैली की संसदीय सरकार स्थापित की गयी। एक संघीय राष्ट्र, भारत को 29 राज्यों और 7 केन्द्र-शासित प्रदेशों में गठित किया गया है। इस समय भारत में कुल 29 राज्य हैं आंध्र प्रदेश,अरुणाचल प्रदेश,असम,बिहार,छत्तीसगढ़,गोवा,गुजरात, हरियाणा,हिमाचल प्रदेश,जम्मू और कश्मीर,झारखण्ड, कर्णाटक, केरल, मध्य-प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर,मेघालय,मिज़ोरम,नागालैण्ड,ओड़िशा, पंजाब, राजस्थान,सिक्किम,तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा,उत्तर प्रदेश,उत्तराखण्ड,पश्चिम बंगाल।
7 केन्द्र शासित प्रदेश:हैं-अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह,चण्डीगढ़,दादरा और नगर हवेली,दमन और दीव,लक्षद्वीप,राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली,पुदुच्चेरी।
आजादी के बाद से 1947 से 1967 तक लगातार 20 वर्षों तक पूरे भारत में एक मात्र राजनैतिक दल - सिंगल पॉलिटिकल पार्टी कॉंग्रेस का ही राज्य था। सिर्फ केरल में 1957 से 1959 तक गैर कांग्रेसी कम्युनिस्ट सरकार बनी थी, जो लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से चुनी हुई सरकार थी। परन्तु सत्ता के केंद्र में बैठी काँग्रेस सरकार को यह कतई मंज़ूर नहीं था कि कोई उसकी पार्टी के राष्ट्रीय वर्चस्व को चुनौती दे।
लिहाजा, उसने संविधान के अनुच्छेद ३५६ को लागू कर ईएमएस नंबूदिरीपाद के नेतृत्व वाली सरकार को बर्खास्त कर दिया। धर्मनिरपेक्षता को बढ़ाने के नाम पर अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण का काँग्रेस का इतिहास ‘प्रभावशाली’ रहा है और इसके ही कारण मुसलमान और ईसाई समुदाय बिना ईश्वर वाली कम्युनिस्ट पार्टी की बजाए, उससे जुड़े हैं। हिंदू समुदाय का एक वर्ग जो सीपीआई (एम) की ओर से वर्ग संघर्ष और कम्युनिस्ट विचारधारा की बातों से ऊब चुका है, वह यूडीएफ को चुनता है, जिसे वह दो बुरी चीजों में कम बुरा मानता है। इस प्रकार दोनों फ्रंटों के बीच वोटों का सीधा बँटवारा हो जाता है। इनमें से दोनों ने ही विकास की राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है। उस समय का पूरा बौध्दिक समाज वामपंथी था। लेकिन अब वैसा नहीं रहा।
26 दिसम्बर 1925 कानपुर नगर में एम एन राय ने भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी की स्थापना की थी। यह पार्टी शुरू से देशभक्त नहीं थी, यह सोवियत यूनियन के निर्देशों से अपनी पार्टी की रणनीतियों को तय किया करती थी। इसी कारण कई बार इसकी रणनीतियाँ उल्टी दिशा में आगे बढ़ीं। इसने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की आलोचना की और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की तीखी निंदा की। 1964 में भाकपा का विभाजन हो गया और एक नयी पार्टी माकपा का उभार हुआ। भाकपा के कई जुझारू नेता मसलन नम्बूदरीपाद, ज्योति बसु, हरकिशन सिंह सुरजीत आदि माकपा में शामिल हो गये। 2014 के संसदीय चुनाव में दल को मात्र १ सीट मिली।]
वाममोर्चा के सत्ता में रहने के दौरान स्थिति बदलती चली गई। 1967 में पश्चिम बंगाल में भी पीसी सेन की सरकार थी जो त्यागी थे, किन्तु चुनाव हार गए। कम्युनिस्टों की यह गति चिंताजनक है। इसका एक कारण यह है कि आज उनकी विचारधारा को मानने वाले बहुत कम रह गए हैं और उनकी अपील भी लगातार सीमित होती जा रही है। एक समय था, जब कहा जाता था कि वाम विचारधारा के लोग प्रत्येक घरों में देखे जा सकते हैं। कहा जाता था कि सभी घरों में कम से कम एक कामरेड जरूर है। सीपीएम का समर्थन आधार कम हो रहा है। उसका पतन हो रहा है। पर उसका तेवर पहले ही वाला है। उसका तेवर विल्कुल वैसा ही है, जो 1960-1967 में उसके उत्थान के समय में था। उस समय उनकी वामपंथी अक्रामकता उनके क्रांतिकारी स्वरूप (नक्सल आंदोलन) का दर्शन कराती थी, लेकिन आज उस प्रकार की अक्रामकता में लोग उनकी गुंडागर्दी देख रहे हैं। अब निकट भविष्य में अमेरिका-ब्रिटेन-फ़्रांस की भौतिकवादी नीति -पैसे को ही भगवान मानने की नीति के पतन के साथ विश्व भारत को महानतम आध्यात्मिक शक्ति के रूप में स्वीकार करेगा।
किन्तु इन्हीं तीन वर्षों में कम्युनिस्टों द्वारा पेश किए गए भूमि सुधार अध्यादेश और विवादित शिक्षा विधेयक जैसे अभूतपूर्व कदमों को जनता ने हाथों-हाथ लिया। भूमि सुधारों ने भी कम्युनिस्टों की लोकप्रियता में चार चाँद लगा दिए। केरल की धरती सोने उगलने वाली है। यहाँ भू-स्वामियों और कृषि श्रमिकों के बीच स्पष्ट विभाजन है। यहाँ का समाज भी देश के किसी अन्य राज्य के समान ही जाति और संप्रदाय के आधार पर बँटा हुआ है। हालाँकि, अन्य राज्यों की तुलना में केरल ने शिक्षा के महत्व को बहुत पहले समझ लिया था।
एक के बाद एक सत्ता में आने वाली सरकारों ने विकास के लिहाज से शिक्षा पर विशेष बल दिया। जिसने राज्य के लोगों के दिलों के तार को झंकृत कर दिया। उसकी झंकार आज भी ईश्वर के अपने देश में गूँज रही है। केरल के तमाम इलाकों में साम्यवाद के फलने-फूलने का एक बड़ा कारण केंद्र में कांग्रेस की सरकार की ओर से राज्य की पहली कम्युनिस्ट सरकार की विवादास्पद बर्खास्तगी थी। कांग्रेस ने यूडीएफ का गठन 1970 के दशक में किया था, जिसने राज्य में अल्पसंख्यक ईसाइयों और मुसलमानों के अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ ही बहुसंख्यक हिंदू समुदाय के कुछ वर्गों के समर्थन से अपनी मजबूत पकड़ बना रखी है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को छद्म धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने ‘सांप्रदायिक’ करार दे दिया और इस कारण ही इसे केरल के पूरी तरह से विभाजित समाज में अपनी पैठ बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा।
राजनीति में यूडीएफ और एलडीएफ बुरी तरह से हावी थे। अनेक वर्षों तक कठोर संघर्ष करने के बाद, यह धीरे-धीरे और निरंतर रूप से सामने आई, और अब राजनीतिक वर्चस्व के लिए इसे एक गंभीर दावेदार माना जा रहा है।
केरल को अपनी आर्थिक दुर्गति से बाहर लाने और विकास तथा प्रगति की मुख्य धारा की राजनीति में लाने के लिए साम्यवाद के कागजी शेरों और कमजोर पड़ चुके कांग्रेस के कुचक्र के तोड़ना होगा ? या पहले मनुष्य-निर्माण करना होगा ?
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