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रविवार, 1 फ़रवरी 2026

गीता ध्यान : [गीता के सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द ने 28 मई 1900 को सैनफ्रांसिस्को में भाषण] "जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति क्या है ?""चींटी के पग नूपुर बाजे सो भी साहब सुनता है।"

गीता ध्यान

 [Gita Dhyan]  

सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपाल नन्दन:।
पार्थो वत्स: सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्।।

अर्थात सभी उपनिषदें मानो गाय के समान हैं , श्रीकृष्ण उनका दोहन करने वाले हैं। अर्जुन बछड़े के समान है। और गीता के अमृतरूप उपदेश उत्तम दूध के समान है , "सुधीर्भोक्ता" अर्थात केवल "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः" बोध से सम्पन्न विवेकी लोग ही उस दूध के पीने वाले हैं !  
गीता के सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द ने 28 मई 1900 को सैनफ्रांसिस्को में भाषण करते हुए कहा था - " जब तक विषय का भोगसुख नहीं छूटता, तब तक आध्यात्मिक जीवन का आरम्भ नहीं होता। इन्द्रिय-सम्भोग में भला सुख कहाँ ? इन्द्रियाँ तो हमारी बुद्धि को भ्रमित कर देती हैं। 

इन्द्रियाणि  पराणि आहुः,  इन्द्रियेभ्यः परम् मनः। 
 मनसः तु परा बुद्धिः य बुद्धेः परतः तु सः।।

 (3.42) 

अर्थात सूक्ष्म या अधिक बलशाली होने के कारण स्थूल शरीर से (Apparent I M/F शरीर से) इन्द्रियाँ पर (श्रेष्ठ) कही जाती हैं।  इन्द्रियों से परे मन है और मन से परे बुद्धि है, और जो बुद्धि से भी परे है, वह है आत्मा (गुरुदेव, इष्टदेव, ब्रह्म, सच्चिदानन्द)!
जो व्यक्ति आसक्ति -रहित होकर कर्म कर सकता है , उसके लिए कर्म की सफलता हो या विफलता हो , दोनों समान है। 'तेरी इच्छा पूर्ण हो' इस आस्था वाले व्यक्ति का यदि जीवन भर के कर्म क्षणभर में जलकर राख हो जाएँ तो भी ऐसे व्यक्ति का ह्रदय आशंका से एक बार भी नहीं धड़कता।  
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।

जन्मबन्ध-विनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्ति अनामयम्।।

(2.51)

बुद्धियुक्ता मनीषी लोग कर्मजन्य फलों को त्यागकर जन्मरूप बन्धन से मुक्त हुये अनामय अर्थात् निर्दोष पद को प्राप्त होते हैं।।
बुद्धियुक्त मनीषी का अर्थ है वह विवेकी मनुष्य जो - 'जीवो ब्रह्मैव नापरः' को जानकर 'हाथी नारायण और महावत नारायण का विवेक' रखते हुए जीने की कला को सीख लेता है वह फल की चिन्ताओं से मुक्त होकर मन के पूर्ण सन्तुलन को बनाये हुये सभी कर्म करता है। वह विवेकी व्यक्ति उस समय यह देखता है कि सभी प्रकार की आसक्ति मिथ्या है। (अपने को M/F शरीर समझने से उत्पन्न राग-द्वेष मिथ्या है।)
    आत्मा (इष्टदेव) कभी (3K में) आसक्त हो नहीं सकते। यह समझ लेने के बाद वह आत्मनिष्ठ बुद्धि से युक्त योगी सुख-दुःख से परे की अवस्था में पहुँच जाता है। तब अर्जुन पूछता है  स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कौन हैं ? 
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।

 आत्मनि एव आत्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञः उच्यते।।।

(2.55) 

श्री भगवान् ने कहा -- हे पार्थ , जिस समय पुरुष बुद्धि में स्थित सब कामनाओं को त्याग देता है जो सभी वासनाओं को छोड़ चुके हैं , किसी की भी आकांक्षा नहीं करते। और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है; उस समय वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है। 

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।

वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।

(2.56)

।।2.56।। दुःख में जिसकी बुद्धि उद्विग्न नहीं होती और भोग-सुख प्राप्ति  की तीव्र इच्छा जिस बुद्धि निवृत्त हो गयी है। (स्वयं M/F) देह नहीं आत्मा समझ लेने के फलस्वरूप जिस व्यक्ति की बुद्धि से राग-द्वेष नष्ट हो गये हैं-  वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2.58।।

।।2.58।। जिस तरह कछुआ अपने अङ्गों को सब ओर से समेट लेता है, वैसे ही यह पुरुष जब सब ओर से अपनी इन्द्रियों को इन्द्रियों के विषयों से समेट लेता (हटा लेता) है, तब उसकी बुद्धि आत्मनिष्ठ हो जाती है, अर्थात उसकी बुद्धि आत्मा (इष्टदेव) में प्रतिष्ठित हो जाती है।

 संसार का कोई भी प्रलोभन उनकी इन्द्रियों को बलपूर्वक खींचकर बाहर नहीं ला सकता। संसार का कोई भी प्रलोभन- 'कामिनी -कांचन या नाम-यश' उनकी बुद्धि को प्रलोभित नहीं कर सकता। समूचे विश्व-ब्रह्माण्ड के चूर-चूर हो जाने पर भी उनके मन में एक भी तरंग नहीं उठती। आगे बढ़ते चलो , कर्म करते जाओ , केवल यह ध्यान रखना/ सचेत रहना कि बुद्धि कहीं फिर से देह-इन्द्रियों में आसक्त न हो जाये। जो व्यक्ति M/ F देहजन्य राग-द्वेष से अनासक्त होने की कला  नहीं जानता या उसकी साधना नहीं करता, उसकी प्रज्ञा (अर्थात विवेकसम्पन्न बुद्धि) कभी आत्मनिष्ठ नहीं हो पाती। 
आपूर्यमाणम् अचल-प्रतिष्ठम्

समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।

तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे

स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।

(2.70) 

जैसे पृथ्वी भर की नदियाँ निरंतर अपनी जलराशि लाकर समुद्र में उड़ेलती रहती हैं , पर उससे समुद्र अचल ही रहता है। उसी प्रकार पाँचो इन्द्रियों के द्वारा एक साथ प्रकृति की विभिन्न संवेदनायें लाये जाने पर भी आत्मज्ञानी के ह्रदय में किसी प्रकार का विक्षेप या भय नहीं उत्पन्न हो पाता।   

[आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'भज गोविंदम' के अनुसार, "निश्चलतत्त्वे जीवनमुक्तिः"यदि कोई व्यक्ति अपनी बुद्धि और संकल्प को अडिग (निश्चल) रखकर एक ही दिशा में (आत्मा या इष्टदेव की दिशा में) एकाग्र करे, तो उसे जीवित रहते हुए ही मोक्ष या परम मुक्ति प्राप्त हो सकती है।] 
'हजार स्रोतों से दुःख आवे, सैकड़ों स्रोतों से सुख आवे , मैं न तो दुःख के अधीन हूँ और न सुख का क्रीतदास ही हूँ।" - स्वामी विवेकानन्द।

ज्यायसी चेत् कर्मणः ते मता बुद्धिः जनार्दन। 

 तत् किम् कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।।

(3.1) 

अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा - " आप मुझे कर्म का उपदेश दे रहे हैं , और आत्मब्रह्म-ऐक्य ज्ञान को जीवन की उच्चतम अवस्था कहकर उसकी प्रशंसा कर रहे हैं। हे कृष्ण यदि आप ज्ञान को कर्म की अपेक्षा श्रेष्ठ समझते हैं , तो मुझे कर्म का उपदेश क्यों दे रहे हैं ? 
इसका उत्तर में भगवान कहते हैं - अतिप्राचीन काल से ही दो साधनमार्ग प्रचलित हैं। दार्शनिकों के लिए ज्ञानयोग और निष्काम कर्मियों के लिए कर्मयोग। किन्तु कर्मों का त्याग करके कोई भी शांति नहीं पा सकता। कोई भी मनुष्य कर्म किये बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता। अन्तःकरण में स्थित प्रकृति के तीन गुण मनुष्य को कर्म करने के लिए बाध्य करते हैं। जो मनुष्य बाहर से कर्मों को रोक कर मन ही मन विषयों का चिंतन करते रहते हैं - उसे कुछ भी प्राप्त नहीं होता , वह मिथ्याचारी हो जाता है। किन्तु जो व्यक्ति बुद्धि की शक्ति द्वारा इन्द्रियों को धीरे धीरे वशीभूत करके उन्हें कर्म में लगाए लगाए रखता है , वह पूर्वोक्त व्यक्तियों से श्रेष्ठ है। (गीता 3 /2-8)
        यदि तुमने इस रहस्य को समझ लिया हो तो तुम्हारे लिए कोई कर्तव्य-कर्म बाकी नहीं है , तुम मुक्त हो। फिर भी दूसरों के कल्याण के लिए तुम्हें कर्म करना होगा। क्योंकि श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करते हैं , साधारण मनुष्य उसी का अनुकरण करते हैं। (गीता -3. 20 -21) 

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि।।3.22।।

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।3.23।।

' परा शान्ति के अधिकारी मुक्त पुरुष यदि कर्मों का त्याग कर दें तो जो लोग उस आत्मज्ञान और शान्ति को अभी नहीं प्राप्त कर सके हैं , वे उन महापुरुषों का अनुकरण करने की चेष्टा करेंगे , फलस्वरूप समाज में विशृंखलता उत्पन्न होगी। 
 हे पार्थ , त्रिभुवन में मेरे लिए कुछ भी अप्राप्त नहीं है , तो भी मैं सदा कर्म करता हूँ। यदि मैं क्षणभर के लिए कर्म न करूँ तो विश्व ब्रह्माण्ड नष्ट हो जायेगा। 

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।

जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्।।

(3.26)

अज्ञानी मनुष्य फलाकांक्षी होकर जिस उत्साह और लगन से कर्म करता है , आत्मज्ञानी भी अनासक्त भाव से , किसी फल की आकांक्षा न करते हुए लेकिन उसी तीव्रता से कर्म करते हैं।

 गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं -जो लोग भक्तिपूर्वक अन्य देवताओं की पूजा करते हैं , वे भी वास्तव में मेरी ही पूजा करते हैं। (गीता ३/३३) ये मनुष्य साक्षात भगवान की ही पूजा करते हैं , भगवान को भिन्न नामों से पुकारने पर क्या वे क्रोधित हो जायेंगे ? 

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।

अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते।।

(3.27)

हे अर्जुन ! हमारे शरीर और अन्तःकरण के माध्यम से प्रकृति के तीन गुण ही प्रकृति के नियमानुसार काम कर रहे हैं। हमलोग अपरिवर्तनशील , अविनाशी आत्मा होकर भी परिवर्तनशील प्रकृति के साथ - अर्थात नश्वर M/F देह, इन्द्रिय, मन , में सम्मोहित बुद्धि के साथ अपना तादात्म्य करके - परिवर्तनीय प्रकृति के साथ अपने को अभिन्न मानकर कहते हैं - मैं ही इन कर्मों का कर्ता हूँ।  सम्पूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं, M/F बुद्धि के अहंकार से मोहित हुआ पुरुष,  "मैं कर्ता/ करती हूँ"  ऐसा मान लेता हैऔर इस प्रकार आत्मा -नित्यमुक्त होकर भी प्रकृति के पंजे में फँस जाती है। 
आत्मज्ञानी भी प्रकृति के द्वारा चालित होकर कर्म करता है। सभी लोग प्रकृति के तीनों गुणों के  अनुसार कर्म करते हैं। जब तक शरीर में है , तब तक कोई भी प्रकृति को नहीं लाँघ सकता। 

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।

प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति।।

(3.33) 

 ज्ञानवान् पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। सभी प्राणी अपनी प्रकृति पर ही जाते हैं, फिर इनमें (किसी का) हठ /निग्रह क्या करेगा।।  यह अन्तिम वाक्य भगवान् के उपदेश में निराशा का उद्गार नहीं किन्तु उनकी परिपूर्ण दृष्टि का परिचायक है। वे वस्तु स्थिति से परिचित हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जीवन के उच्च मार्ग पर चलने की क्षमता नहीं रखता। विकास के सोपान की सबसे निचली सीढ़ी पर खड़े असंख्य मनुष्यों के लिये इस मार्ग का अनुसरण कदापि सम्भव नहीं। क्योंकि विषयों में आसक्ति तथा पाशविक प्रवृत्तियों से वे इस प्रकार बंधे होते हैं कि उन सबका एकाएक त्याग करना उन सबके लिये सम्भव नहीं होता जिस मनुष्य में कर्म के प्रति उत्साह, आत्मश्रद्धा , आत्मविश्वास , आत्मनिर्भरता ,तथा जीवन में कुछ पाने की महत्त्वाकांक्षा है केवल वही व्यक्ति इस कर्मयोग का आचरण करके स्वयं को कृतार्थ कर सकता है। भगवान् का यह कथन उनकी विशाल हृदयता एवं सहिष्णुता का परिचायक है।

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।

महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।।3.37।।

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।

कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च।।3.39।।

।।3.39।। और हे कुन्तीनन्दन ! इस अग्निके समान कभी तृप्त न होनेवाले और विवेकि मनुष्यों (ब्रह्मसत्य जगत मिथ्या) विवेक का नित्य वैरी इस काम 'desire' के द्वारा मनुष्य का विवेक ढका हुआ है।

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।

एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्।।3.40।।

" अर्जुन ! सावधान, काम ही क्रोध है, यह मनुष्य का परम शत्रु है, इसे संयत रखना चाहिए। यह आत्मज्ञानी व्यक्ति के विवेक को भी ढँक देता है। इस काम की अग्नि सर्वग्रासी है। इन्द्रियों, मन तथा सम्मोहित बुद्धि/मूढ़बुद्धि में इसका अधिष्ठान हैआत्मा तो किसी पदार्थ की कामना ही नहीं करता। 
इसलिए काम रूपी शत्रु से यदि बचना चाहते हो तो शुद्ध बुद्धि/मति को निरंतर आत्मा (इष्टदेव) से जोड़े रहो। क्योंकि -बुद्धिनाशात् प्रणश्यति

क्रोधात् भवति संमोहः, संमोहात् स्मृतिविभ्रमः।

 स्मृति भ्रंशात्  बुद्धिनाशः,  बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।।2.63।। 

     विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध से उत्पन्न होता है मोह और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति के भ्रमित होने पर विवेकी -बुद्धि का नाश होता है और विवेकयुक्त बुद्धि के नाश होने से वह मनुष्य नष्ट हो जाता है।।
यदि बुद्धि में तुम कर्ता हो गए - तो हो गए ! उसी तरह बुद्धि में तुम अकर्ता हो गए , अकर्ता हो गए !  जो कुछ होना है बुद्धि में होना है। बुद्धि में मुक्त हो गए तो मुक्त हो गए। आत्मा तो सदा मुक्त है; पर क्या तुम्हारी बुद्धि मुक्त है ? तुम्हारी बुद्धि में ऐसा लगता है कि  - हम मुक्त हैं ! - (बुद्धि से ऐसा लगता है कि मैं कौन हूँ ? दहोहं कि शिवो अहं ?) - हम मुक्त हैं !  इसी तरह से एक और वाक्य है - जिसकी जैसी मति; उसकी वैसी गति। अब ये बात तो समझ में आ गई। अब मति/बुद्धि  कल्पना नहीं है। मति इमेजिनेशन नहीं है। 'जिसकी जैसी मति , उसकी वैसी गति'। 
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।

विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।।

(4.1)

।।4.1।। श्रीभगवान् बोले - मैंने बुद्धि का सम्बन्ध M/F देह-इन्द्रिय से नहीं निरन्तर आत्मा से जोड़े रहने या 'आत्मनिष्ठा बनाये रखने के अविनाशी योग' को प्राचीन काल में मैंने सूर्य को सिखाया था। सूर्य ने अपने पुत्र मनु को सिखाया, और मनुने (अपने पुत्र) राजा इक्ष्वाकु को सिखाया। इस प्रकार मनःसंयोग के अभ्यास द्वारा (3H विकास के 5 अभ्यास द्वारा) इस बुद्धि की आत्मनिष्ठा के  अविनाशी योग का ज्ञान एक राजा से दूसरे राजा के पास तथा उनसे अन्य राजाओं के पास पहुँचा। किन्तु समय / काल के प्रवाह में सब कुछ नष्ट हो जाता है , तो 'कालय तस्मै नमः।' कालवश इस योग की महान शिक्षा नष्ट हो गयी थी उसी को आज में पुनः तुम्हें सीखा रहा हूँ। 
 तब अर्जुन ने कहा -
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।।

(4.4) 
।।4.4।। अर्जुन ने कहा -- आपका जन्म अपर अर्थात् पश्चात का है और विवस्वान् का जन्म (आपके) पूर्व का है, इसलिये यह मैं कैसे जानूँ कि (सृष्टि के) आदि में आपने (इस योग को) कहा था?
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।4.5।।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।4.8।।

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।4.11।।

      उत्तर में श्री कृष्ण ने कहा -हे अर्जुन ! मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म व्यतीत हो चुके है , उन्हें तुम नहीं जानते , मैं जानता हूँ। मैं जन्मरहित और मायाधीश हूँ और सभी मायाधीन मनुष्यों का अधीश्वर हूँ। अपनी प्रकृति (दैवी माया) की सहायता से मैं शरीर धारण करता हूँ।
जब धर्म की ग्लानि और अधर्म का अभ्युत्थान होता है, तब मैं मनुष्यों को सहायता देने के लिए संसार में आविर्भूत होता हूँ। साधुओं के परित्राण , पापियों के विनाश तथा धर्मसंस्थापन के लिए मैं प्रत्येक युग में अवतीर्ण होता हूँ। जो जिस भाव से मुझे चाहता है , मैं उसी भाव से उसके पास जाता हूँ। किन्तु हे पार्थ जान लो कोई भी मेरे मार्ग से विच्युत नहीं हो सकता। 
 
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।।4.14।।

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्।।4.15।। 

कोई भी कर्म मुझे छू नहीं सकता। कर्मफल में मेरी आकांक्षा नहीं है। जो मुझे इस प्रकार जानता है , वह कर्म करने के कौशल को जान लेता है , और कर्म के द्वारा वह कभी आबद्ध नहीं होता। 
प्राचीन काल के राजर्षि लोग इस निष्काम कर्म के तत्त्व को जानते थे , इस कारण वे निश्चिन्त चित्त से कर्म में नियुक्त होते थे।  हे अर्जुन ! तुम भी उसी पद्धति (Be and Make की पद्धति) से कर्म किये जाओ।   
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।
स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्।।4.18।।
जो घोर कर्म के बीच गम्भीर शान्त भाव रख सकते हैं और गंभीर शान्त भाव में प्रबल कर्म का दर्शन करते हैं , वे ही यथार्थ ज्ञानी हैं। 
अब प्रश्न यह उठता है कि प्रत्येक इन्द्रिय और प्रत्येक स्नायु के कर्म-परायण होने के बावजूद आपके मन में गहरी शान्ति है क्या ? कोई पदार्थ /कोई घटना आपके मन -बुद्धि को -निश्चल तत्त्व में प्रतिष्ठित रहने से  विचलित तो नहीं करता ? यदि आप में शान्ति है और आपका मन चंचल नहीं होता तो आप योगी और मुक्त हैं- जीवनमुक्त हैं ? अन्यथा नहीं।  

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।।4.19।।  
।।4.19।। जिसकी प्रत्येक कर्मचेष्टा -कामना और फल पाने की आकांक्षा से रहित और पूर्णतः निःस्वार्थ होते हैं , उसीको सत्यदर्शी लोग ज्ञानी (विवेकी) कहते हैं। बिना कर्म किये हम क्षणभर भी नहीं रह सकते। काम तो करना ही होगा। 
जिनकी सारी कर्मचेष्टायें फलतृष्णा और स्वार्थबुद्धि से रहित हैं , उन्होंने ज्ञानाग्नि के द्वारा समस्त कर्मों के बन्धन को दग्ध कर लिया है और वे ही ज्ञानी हैं।  भविष्य में विषयोपभोग के द्वारा सुख पाने की बुद्धि की योजना को कामना (desire) कहते हैं । कामना करने का अर्थ है कि परिस्थितियों को अपने अनुकूल होने का आग्रह करना। इस प्रकार वर्तमान परिस्थितियों से सदा असन्तुष्ट रहते हुये भविष्य में उन्हें अनुकूल बनाने के प्रयत्न में , हम अपने आप को भ्रमित करके अनेक विघ्नों का सामना करते रहते हैं। इसका आशय इतना ही है कि ज्ञानी भक्त कर्म करते समय काल्पनिक भय चिन्ता आदि में अपने मन की शक्ति विनष्ट नहीं करता। वेदान्त मनुष्य की बुद्धि की उपेक्षा नहीं करता है, वह उसे आत्मा (इष्टदेव)  में प्रतिष्ठित रखता है।  

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।

कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः।।4.20।।

।।4.20।। जो पुरुष,  कर्मफलासक्ति को त्यागकर,  नित्यतृप्त और सब आश्रयों से रहित है वह कर्म में प्रवृत्त होते हुए भी (वास्तव में) कुछ भी नहीं करता" है।। 
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।6.5।।
।।6.5।। तुम स्वयं अपना बन्धु तथा स्वयं ही अपने शत्रु हो। आत्मा (अविशिभूत बुद्धि) के अतिरिक्त अन्य कोई शत्रु नहीं है। 
यही गीता का अन्तिम और श्रेष्ठ उपदेश है।  - स्वामी विवेकानन्द। 
महाभारत के भीष्मपर्व के अन्तर्गत भगवद्गीता आती है। गीता में कुल 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं।

 गीता सार्वजनिक धर्मग्रंथ है। श्रीरामकृष्ण का जीवन गीता-तत्त्व का जीवंत भाष्य है। " मनुष्य जिस किसी भाव से मेरी आराधना करता है, उसी भाव से मैं उस पर कृपा करता हूँ। गीता में उपदिष्ट चारो योग -ज्ञान , कर्म , भक्ति और राजयोग में से प्रत्येक मुक्ति का मार्ग है। 

गीता की अन्तिम बात और सबसे गोपनीय रहस्य है - श्री भगवान की अनन्य शरणागति के द्वारा भागवत जीवन की प्राप्ति -
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।।18.65।।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।18.66।।

अर्थात , तुम अपनी बुद्धि को मुझमें समाहित करो , मेरे भक्त बनो , मेरे पूजनशील होओ , मुझे नमस्कार करो। इस प्रकार मेरी कृपा से लब्ध ज्ञान की सहायता तुम मुझे ही प्राप्त होंगे। मैं निश्चयपूर्वक तुमसे कहता हूँ , क्योंकि तुम मेरे अत्यन्त प्रिय हो ! 
तुम सभी धर्मों और अधर्मों का परित्याग कर केवल मुझि में भक्ति रखो , इसी से सबकुछ होगा - इस दृढ़ विश्वास में प्रतिष्ठित होकर केवल मेरे शरणागत हो जाओ ! इससे मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक न करो। यही गीता का श्रेष्ठतम उपदेश है। 

1.अर्जुन विषाद योग :

 युद्ध के परिणाम पर शोक प्रकट करना

2.सांख्य योग : 

विश्लेषणात्मक ज्ञान का योग

3.कर्मयोग : 

कर्म का विज्ञान

4. ज्ञान कर्म संन्यास योग : 

ज्ञान का योग और कर्म करने का विज्ञान

5.कर्म संन्यास योग : 

वैराग्य का योग

6.ध्यानयोग : 

ध्यान का योग

7. ज्ञान विज्ञान योग :

 दिव्य ज्ञान की अनुभूति द्वारा प्राप्त योग

8.अक्षर ब्रह्म योग :

 अविनाशी भगवान का योग

9.राज विद्या योग : 

राज विद्या द्वारा योग

10.  विभूति योग :

 भगवान के अनन्त वैभवों की स्तुति द्वारा प्राप्त योग

11. विश्वरूप दर्शन योग :

 भगवान के विराट रूप के दर्शन का योग

12. भक्ति योग :

 भक्ति का विज्ञान

13. क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ विभाग योग :

 योग द्वारा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विभेद को जानना

14. गुण- त्रय विभाग योग : 

त्रिगुणों के ज्ञान का योग

15. पुरुषोत्तम योग :

 सर्वोच्च दिव्य स्वरूप योग

16. दैवासुर सम्पद् विभाग योग :

 दैवीय और आसुरी प्रकृति में भेद का योग

17. श्रद्धा- त्रय विभाग योग : 

श्रद्धा के तीन विभागों के ज्ञान का योग

18. मोक्ष-संन्यास योग :

 संन्यास में पूर्णता और शरणागति का योग
    
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"चींटी के पग नूपुर बाजे सो भी साहब सुनता है।" 


जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति क्या है ? 

[।। Yug-Purush ।। What is Jeevan Mukti and Videha Mukti ?] 

शरीर के रहते जो ज्ञान को उपलब्ध हो गए वो मुक्त हो गए। विदेहमुक्ति का अर्थ है जो जीतेजी मुक्त है , उसका देह न रहना। जीवनमुक्त है उसका देह छूटना अभी बाकी है। मानसिक तौर से तो वो मुक्त हो गया, पर शरीर का अभी जेल से बाहर आना बाकी है। जीवनमुक्त होकर भी अभी शरीर में रहना पड़ेगा। शंकराचार्यजी जैसे जितने भी ज्ञानी हो गए हैं , वे सभी जीवनमुक्त हैं , पर अभी शरीर में रहना पड़ेगा। 
यदि आपका जो मैं (Real I -आत्मा) है वो ब्रह्म के साथ चला गया , अब मार्गदर्शक गुरु नहीं चाहिए। पर एक दिन देह ही नहीं रहेगा। देह नहीं रहने के बाद जो नहीं लौटते उसे विदेह कहते हैं। (10:41) जो आते हैं , वो मुक्त नहीं हैं वासना वाले हैं। हमारे अन्तःकरण में तीन गुण हैं , जो शरीर रहने तक काम करते हैं। शरीर रहने तक आपको इन गुणों के अधीन रहना पड़ेगा। बूढ़ा होना नहीं चाहते हो , पर बूढ़ा होना प्रकृति का नियम है , तुम्हारी इच्छा से क्या होगा ? फिर कर्म का सिद्धान्त है -जो करोगे सो भरोगे। इसलिए आगे हमेशा पवित्र कर्म ही करो , इसके लिए सावधान रहना होगा। (18:24) 

न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।

बहुत कर्मों से , बहुत सन्तानों से मोक्ष नहीं होता। बल्कि मुक्ति केवल आत्मज्ञान से होती है। (मिथ्या मैं के त्याग से होती है।) भोग चाहिए तो अच्छे कर्म करो। कई लोगों को इस जन्म में मिला हुआ है , पहले जन्म में अच्छा किया होगा। हर व्यक्ति को पहले कर्म करने में धर्मात्मा होना चाहिए। अच्छा है दुःख -अपमान मिला तो जो प्रारब्ध था वो कट गया। एक गलत काम से यदि दुःख हुआ तो हमको प्रेरणा मिली कि आगे से कोई गलत काम नहीं करूँगा। जिसका बछड़ा उसी गाय की तरफ जाता है। पुराना किया हुआ कर्मफल आत्मज्ञानी को भी भोगना पड़ेगा। (26:08) ज्ञान इसलिए प्राप्त नहीं करते कि हमें माफ़ किया जाए , बल्कि इसीलिए कि हमें अगला जन्म -हो तो पिवत्र-त्रयी के साथ ही हो। जीव का जन्म प्रारब्ध भोगने के लिए होता है , अवतार वरिष्ठ या पवित्र -त्रयी का जन्म लोकहित के लिए होता है। या नेता को कथा सुनाने का काम मिलता है। शरीर का जो होना है , होगा। हमें जो करना चाहिए वो पवित्र कर्म करते चलो। परिवार जैसा मिला है , वो मिला है। कर्म से मिला है। अच्छे कर्म करो या ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके आवागमन से मुक्त हो जाओ। इसलिए हम फिर लेना पसंद ही न करें। हम ही परमात्मा में समा जाएँ -ब्रह्मलीन हो जाएँ। पवित्र -त्रयी से अलग मेरा फिर कभी कोई अस्तित्व ही न हो। (32:21) श्रद्धा के साथ जप करें। तो इसका परिणाम भी अच्छा आएगा। पवित्र त्रयी के सिवा कुछ न चाहो। जो होना है होगा -सब छोड़ दिया भगवान पर। प्रकृति पर छोड़ दिया , परमात्मा पर छोड़ दिया , ग्रहों पर छोड़ दिया, प्रारब्ध पर छोड़ दिया। जो होना है हो जायेगा , फिर तुम्हें क्या करना है ? जप यज्ञ करते रहो। जपात सिद्धिः - जप से सिद्धि प्राप्त होगी। प्रभु का स्मरण , जब तक शरीर है हमें श्रद्धा पूर्वक स्वामीजी का काम करना है Be and Make में लगे रहना है।
   दो तरह के भगवान - एक जो भक्त को दीखते हैं , दूसरे जो भक्त को देखते हैं। भगवान तुम्हें इस समय देख रहे हैं। (37:28) भगवान तुम्हारे जप के साक्षी हैं। गवाही हैं। वो तुम्हें देख रहे हैं , तुम्हें नहीं दिख रहे हैं।  "चींटी के पग नूपुर बाजे सो भी साहब सुनता है।" साहेब से कुछ छिपा नहीं है। जो जाप को देख रहा है , उस परमात्मा में तुम लीन हो जाओ। जो सदा निराकार , निर्विकार हमारे मन का सदा साक्षी है ,सदा अन्तर्यामी है वो हमारे मन में ही है।  
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