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बुधवार, 31 दिसंबर 2025

1.⚜️️🔱बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ⚜️️🔱2 . जाग्रत अवस्था (मानवदेह) :अपने को ब्रह्म समझने का अवसर है !⚜️️🔱3.इंद्र भी तुम्हें गरीब लगना चाहिए। ⚜️️🔱⚜️4. समाधि (जागरूकता की उच्चतम अवस्था) ⚜️️🔱⚜️

⚜️️🔱 अपनी बुद्धि से क्या आप 'मनुष्य' (विवेकी) हो ?⚜️️🔱 

[जैसी 'मति' वैसी 'गति' ! या मति सा गतिर्भवेत !]

 [मति के अनुसार ही भव चक्र चलता है ! #paramvani /

 संसार नहीं बाँधता, देह मति बाँधती है !]   

बुद्धिनाशात् प्रणश्यति। (0:11सेकंडयदि आपकी ' विवेक सम्पन्न बुद्धि' का नाश हो गया -तो आपका हो गया। अर्थात आपने इस धोखेबाज बुद्धि के हार को अपनी हार समझ लिया - तो आप फिर नश्वर 'देहो अहं' के भाव को ही सच मानने लगोगे। अर्थात बंधन स्वकल्पित है। अपने नश्वर प्रातिभासिक मैं (Apparent I- आदम या हव्वा) को ही अविनाशी सच (Real I -आत्मा , ब्रह्म, ईश्वर, भगवान) समझने लगोगे। 

क्रोधात् भवति संमोहः, संमोहात् स्मृतिविभ्रमः।

 स्मृति भ्रंशात्  बुद्धिनाशः,  बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।।2.63।।

जब कोई व्यक्ति किसी भी इद्रिय विषय-भोग को सुन्दर और सुख का साधन समझकर उसका निरन्तर चिन्तन करता रहता है, तब उस विषय या वस्तु (कामिनी-कांचन और कीर्ति) के प्रति आसक्ति पैदा हो जाती है। उस आसक्ति के अत्यधिक बढ़ जाने पर, उस वस्तु-विशेष के प्रति उसकी घोर आसक्ति (Love or Infatuation?) उसको पाने की उत्कट इच्छा या कामना (ऐषणा) का रूप ले लेती है ; जिसको पूर्ण किये बिना मनुष्य शान्ति से नहीं बैठ सकता। यदि कामना पूर्ति के मार्ग में कोई विघ्न आता है, या कोई व्यक्ति/वस्तु उस कामना -पूर्ति के मार्ग में विघ्न बनता है , तो उस व्यक्ति-विशेष को विघ्न का कारण समझकर, उसके प्रति मन (बुद्धि)  ओर होने वाली प्रतिक्रिया को कहते हैं क्रोध। क्रोध से उत्पन्न होता है मोह ; और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति (remembrance) के भ्रमित होने पर 'बुद्धि' का नाश हो जाता है। बुद्धि का नाश होने से उस व्यक्ति का पतन हो जाता है। 

मोह का अर्थ है अविवेक। मोह ही स्मृति (remembrance याद) के नाश का कारण है। कौन सी स्मृति ? अर्थात 'जीवो ब्रह्मैव न अपरः' -इस सच्चाई को मनुष्य भूल जाता है।  ब्रह्मैव इदं सर्वं !- आत्मैव इदं सर्वं ! इस रहस्य को वह भ्रमित बुद्धि भूल जाती है। और 'विवेकज ज्ञान' से सम्पन्न बुद्धि -या जगत को ब्रह्ममय देखने में समर्थ ज्ञानमयी दृष्टि भी अपने सत्यस्वरूप को भूलकर या [महावाक्य "अहं ब्रह्मास्मि , तत्त्वमसि " को भूलकर (Real I अविनाशीआत्मा भूलकर)] पुनः (नश्वर) जगत (M/F देह या Apparent I) के साथ अपना रिश्ता जोड़ लेती है। क्रोध के आवेश में मनुष्य सभी सम्बन्ध भूलकर चाहें जैसा व्यवहार कर सकता है। श्रीशंकराचार्य लिखतें हैं कि क्रोधावेश में मनुष्य अपने पूज्य गुरु एवं मातापिता के ऋण को भूलकर उनका भी तिरस्कार करता है।

इस प्रकार स्वयं देह (M/F) समझकर मन में उठने वाले असद् विचारों से प्रारम्भ होकर आसक्ति (संग) इच्छा क्रोध, मोह और स्मृति के नाश तक जब मनुष्य का पतन हुआ तो अगली सीढ़ी है बुद्धि का नाश। बुद्धि में विवेक ही वह सार्मथ्य है जिससे हम शाश्वत-नश्वर , अच्छे-बुरे, धर्म-अधर्म का निर्णय कर सकते हैं। निषिद्ध कर्मों को करते समय विवेक-सम्पन्न बुद्धि ही हमें उससे परावृत्त करने का प्रयत्न करती है। यदि यह विवेक-सम्पन्न बुद्धि नष्ट हो जाये (ब्रह्मसत्यं जगतमिथ्या समझने वाली बुद्धि ही नष्ट हो जाय) तो मनुष्य का मनुष्यत्व (आत्मश्रद्धा , आत्मविश्वास , आत्मनिर्भरता ,निःस्वार्थपरता आदि चारित्रिक गुण) ही नष्ट हुआ समझना चाहिये। और बुद्धिनाश के बाद तो वह व्यक्ति पशु (घोर स्वार्थी) से भी हीन व्यवहार करता है और फिर कभी मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य , या श्रेष्ठ और उच्च ध्येय -'प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है ' को न समझ सकता है और न अपने सत्यस्वरूप को प्राप्त कर सकता है। यहाँ मनुष्य के पतन /ऩाश से तात्पर्य यह है कि अपने शुद्ध स्वरूप (Real I अविनाशी आत्मा ) को पहचान कर वह मनुष्य जीवन का परमपुरुषार्थ मोक्ष (जीवनमुक्ति) को प्राप्त करने योग्य नहीं रह जाता।

[विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध से उत्पन्न होता है मोह और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति (महावाक्य जनित आत्मज्ञान -आदम और हव्वा देह तो चैतन्य का विवर्त है-देह रहने तक -) के भ्रमित होने पर बुद्धि (विवेक-सम्पन्न बुद्धि) का नाश होता है। और उस अन्तःकरणकी ( विवेक-शक्तिरूप ) बुद्धि का नाश होने से वह व्यक्ति पुरुषार्थ (जीवनमुक्ति या मोक्ष) के अयोग्य हो जाता है।  [अपने चेतन आत्मा (अविनाशी) होकर भी अपने को जड़ (नश्वर) देह समझने वाला नित्य-अनित्य विवेक-सम्पन्न बुद्धि नष्ट होने से व्यक्ति (चेतन आत्मा से जड़ आदम हो या हव्वा शरीर हो जाता ) पुरुषार्थ करने के अयोग्य हो जाता है। अतएव गृहस्थ नेता को अपने आचरण को हमेशा पवित्र रखना होगा -चिपकना सख्त मना है। ]

यदि बुद्धि में तुम कर्ता हो गए - तो हो गए ! उसी तरह बुद्धि में तुम अकर्ता हो गए , अकर्ता हो गए ! (0:21 सेकंडजो कुछ होना है बुद्धि में होना है। बुद्धि में मुक्त हो गए तो मुक्त हो गए। आत्मा तो कहते  हैं सदा मुक्त है; पर क्या तुम्हारी बुद्धि मुक्त है ? तुम्हारी बुद्धि में ऐसा लगता है कि  - हम मुक्त हैं ! - (बुद्धि से ऐसा लगता है कि मैं कौन हूँ ? दहोहं कि शिवो अहं ?) - हम मुक्त हैं !  इसी तरह से एक और वाक्य है - जिसकी जैसी मति -उसकी ? बोलो ! अर्थात ' जिसकी जैसी मति , उसकी वैसी गति। अब ये बात तो समझ में आ गई। अब मति/बुद्धि  कल्पना नहीं है। मति इमेजिनेशन नहीं है। 'जिसकी जैसी मति , उसकी वैसी गति'। 'अब आप पैदा हुए हो !' यह कोई 'आप' कोई कल्पना कर रहे हो क्या ? अपनेआप हो रही है। (1:12 मिनट) अभी तक आप अपनी मति में , अर्थात अपनी बुद्धि के अनुसार पैदा हुए हो। अपनी मति कर्ता हो। अपनी मति में अधूरे हो ? (1:20) अपनी मति में मुक्त नहीं हो। आप मुक्त नहीं हो,  यह आपकी मति (दृष्टि) है , या मेरी ? और जब तुम मुक्त हों जाओगे , तब क्या तुम गुरु की मति से मुक्त होओगे ? मेरी दृष्टि में , या मेरी मति में तो तुम अभी मुक्त हो। अपनी मति बताओ। मेरी मति में तुम पहले से मुक्त हो। (गुरुदेव की दृष्टि में या गुरु मति के अनुसार दीक्षा-मंत्र लेने के पहले ही से तुम केवल जीव -M/F, मरण धर्म जड़ शरीर नहीं हो , नित्य-मुक्त , शुद्ध-बुद्ध अविनाशी चेतन आत्मा हो।) भगवान की मति में अर्जुन ब्रह्म ही है। (1:51)  लेकिन अर्जुन अभी ब्रह्म नहीं है। अर्जुन अपनी मति में आज भी अर्जुन है; आदमी है, जीव है , कर्ता है ! अपनी मति में अर्जुन अभी मुक्त नहीं है।[अपनी दृष्टि में अर्जुन अभी ब्रह्म नहीं है। अपनी मति में अर्थात अपनी बुद्धि में अर्जुन आदमी है, जीव है -कर्ता है। अपनी मति में अर्जुन अभी -ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र है ? या अपनी मति में अर्जुन आत्मा (ईश्वर , भगवान या ब्रह्म) है ? अपनी मति में अर्जुन अभी अधूरा है, यानि अपनी आदम है या हव्वा है ? अर्जुन जीव है , कर्ता है !  विवाह-कर्म करके अधूरा से पूरा होने वाला है मनुष्य M/F है। क्योंकि जब आप पैदा हुए हो ऐसा मान चुके हो ? परिवार जनों से ,माँ से सुनी हुई बातों के अनुसार आपकी बुद्धि तो हमेशा यही कह रही है कि, आप दो बहनों के पैदा होने के बाद- अमुक तिथि में पैदा हुए थे। आप अमुक जाति के हो , या बंगाली -बिहारी -हिन्दू -मुसलमान सिख, जैन या बौद्ध  हो ? आपकी बुद्धि यही कह रही है। अब यही देह के पैदा होने की बात को आपकी बुद्धि में जब यह बात बैठ गयी कि 'मैं पैदा' हुआ था ? तो बुद्धि को भी परिवर्तनशील 'देह' का पैदा होना ही मेरा, अपना अविनाशी 'आत्मा' का पैदा होना लग रहा है ? इसलिए जब भगवान अर्जुन को गीता के 18 अध्याय सुना देंगे , क्या अर्जुन तब वह मुक्त होगा? या पहले से आत्मा है -पर अभी उधर दृष्टि ही नहीं है ? या शुकदेव जी से हफ्ताभर भागवत सुनने के बाद परीक्षित मुक्त होगा ?](2:04         

   अथवा इतने दिनों तक जब हम आपको लेक्चर सुनायेंगे तो, आपको - मतलब 'बद्ध मति' को, 'मूढ़ मति' को 'अमूढ़ मति ', 'बद्ध' मति को 'मुक्त' मति ,"मूढ़ मति को विवेक-संपन्न मती", 'देहो हम' मति को 'शिवो हम' मति , मति (या विवेक-दृष्टि) के आलावा गुरु और क्या दे सकता है ? गुरु (भगवान) के पास और क्या है ? और आप जानते हो केवल मति (यानि विवेक-दृष्टि, या विवेक-सम्पन्न दृष्टि)  यदि मिल जाये , तो फिर कुछ पाना बाकी ही नहीं रह जाता। पर अभी तुम गुरु की मति पाने आये हो। गुरु की मति की बातें सुनते हो। आप अपनी मति (बुद्धि) से गुरु की मति (बुद्धि) को तौलते हो और जितना अनुकूल लगी उतनी ले लेते हो। बाकी गुरु की मति को कहते हो - 'अपने पास रखो'।   [अपने को अनंत समुद्र (पानी-शाश्वत चैतन्य) नहीं समझकर उस पर पैदा होने और नष्ट होने  वाला, तरंग या लहर तुल्य नश्वर ससीम M/F शरीर समझने वाली मूढ़ मति को अमूढ़ मति , 'बद्ध' मति को 'मुक्त' मति (लहर को पानी होने की बुद्धि), विवेक-मति , नित्य-अनित्य विवेक-सम्पन्न बुद्धि हम देंगे ? 'देहो हम मति को शिवो हम मति ' हम देंगे ? गुरु के पास और क्या है ? और आप जानते हो केवल यदि विवेक-मति  मिल जाये , तो फिर कुछ पाना बाकी ही नहीं रह जाता। (और जब नाश मनुज पर छाता है - पहले विवेक मर जाता है !) पर अभी तुम गुरु की मति पाने आये हो। गुरु की मति की बातें सुनते हो। आप अपनी मति से गुरु की मति को तौलते हो और जितना अनुकूल लगी उतनी ले लेते हो। बाकी गुरु की मति कहते -अपने पास रखो।] (3:07)      

 मति (बुद्धि) कहो , कि दृष्टि कहो। दृष्टि क्या है ? 'देह'-दृष्टि। 'देह मति ?  दृष्टि माने ये दो चक्षुओं के गोलक नहीं। हमारे यहाँ - भारत में 'किसी' भी प्रकार के बोध का नाम दृष्टि है। खट्टा-मीठा, गर्मी-सर्दी, जिस प्रकार का भी 'बोध' या अनुभव हो रहा हो - उसका नाम दृष्टि है।  इसी तरह से दृष्टि है - देह दृष्टि , माने देह मति। मैं देह (M/F  आदम हूँ या हव्वा ) हूँ -यह दृष्टि ! मैं देह हूँ , ये मति। मति-दृष्टि से देह हूँ !! मैं देह हूँ, यहाँ बैठा हूँ। यह भी आपकी मति ही है न ? अब जब देह बैठा हो उसी समय देखो, (आप उस मति को देखो) उस मति को गुरु की वाणी के द्वारा, उपनिषदों की वाणी के द्वारा (महावाक्य -अयं आत्मा ब्रह्म, जीव ब्रह्मैव न अपरः के द्वारा) अपनी मति (विवेकसम्पन्न बुद्धि) से पूछो कि तुम 'बैठे हो' या 'चेतन हो' ? चेतन नहीं हो तो तुम देह हो क्या? चेतन हुए बिना क्या तुम्हारी मति में- 'मैं देह हूँ' ऐसा विचार उठ सकता है ?[Without consciousness, what is the body? (4:19)  

'एक अर्थ में' तुम जब चेतन थे , उस समय यह मति आई - देह हूँ बैठा हूँ ! लेकिन जब सचमुच चेतन थे , तब तुम्हें -देह हूँ ' ये मति आई तो चेतन हूँ ये मति क्यों नहीं आई ? चेतन हुए बिना देह हूँ - ये मति आ नहीं सकती। किसी सोए आदमी को देह की मति,  देह बुद्धि नहीं हो सकती। इसका मतलब तुम चेतन हो और बुद्धि है। लेकिन दुर्भाग्य से तुम चेतन हो - तुम्हारी बुद्धि ने यह निर्णय नहीं किया। इसलिए तुमने यह नहीं सोचा कि मैं चेतन हूँ। तुम्हारी बुद्धि ने तुम्हें धोखा दिया। (तुम्हारी बुद्धि विवेक-सम्पन्न नहीं है ? इसलिए -ठाकुर की तरह 'सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके' मंत्र नहीं पढ़ा ?'अविवेकी बुद्धि' ने तुम्हें धोखा दिया।)  जबकि बुद्धि तुम्हारी है। कई बार अपने ही लोग अपनी खिलाफ पार्टी से मिल जाते हैं। चुनाव में तो अक्सर होता है। तुम्हारी मति तुम्हारे पक्ष में रहते हुए भी तुम्हारा कल्याण नहीं कर रही। तुम्हारा उद्धार नहीं कर रही। तुम्हें तरने नहीं दे रही है। तुम्हें (आत्मज्ञानी को ?) देह बुद्धि कराकर तुम्हें मृत्यु का दर्शन करा रही है। (5:33)

इसलिए  'देहो अहम'- मैं देह हूँ - 'देहो अहम इति में बुद्धि पूर्व असि मधुसूदने', मैं देह हूँ, मैं दास हूँ, मैं गोपियाँ हूँ, मैं व्यक्ति हूँ (मैं M/F शरीर हूँ), ये (ठाकुर देव) मेरे भगवान हैं- मैं देह हूँ। ये मेरे स्वामी हैं। 'इति में बुद्धि ' ऐसी ही बुद्धि - 'पूर्व असि' मेरी भी पहले थी। गोपियों ने उद्धव जी से कहा -पहले हमारे अंदर 'देहो अहम इति में बुद्धि पूर्व असि मधुसूदने' - हमारी भी पहले देहबुद्धि थी। तब क्या सोचती थी ? ये मेरे स्वामी हैं - ऐसा सोचती थी। अद्वैत बुद्धि नहीं थी; तब इन्होंने क्या किया ? 'मैं देह हूँ'  मेरी बुद्धि भी श्री कृष्ण से मिलने से पहले ऐसी थी ! मैं देह हूँ, मैं दास हूँ, मैं गोपियाँ हूँ, मैं व्यक्ति (आदम या हव्वा शरीर) हूँ, ये (ठाकुर देव) मेरे भगवान हैं- मैं देह हूँ। ये मेरे स्वामी हैं। ऐसी ही बुद्धि मेरी पहले थी। गोपियों ने उद्धव जी से कहा 'देहो अहम इति में बुद्धि पूर्व असि मधुसूदने' - हमारी भी पहले देहबुद्धि थी। तब क्या सोचती थी ? ये मेरे स्वामी हैं - ऐसा सोचती थी। अद्वैत बुद्धि नहीं थी; तब इन्होंने क्या किया ? (6:27'द' आकारा -दासो अहं, दासो अहं बुद्धि , 'दासो अहं- देहो अहं इति में बुद्धि' पहले थी। 'पुर्वासि' - शुरू में थी जैसी आपकी अभी है । तो भगवान ने क्या किया ? ' दकारा अपहृतेन' उन्होंने 'दा' चुरा लिया। दासो अहं इति मे बुद्धि चुरा लिया। तब 'सो अहं' भावेन पूज्य। अब हम सोहम भाव में स्थित हो गए। देहो अहं -दासो अहं इति मे बुद्धि ' - ऐसी बुद्धि मेरी थी। इस 'देहो अहं' बुद्धि (दृष्टि) में 'शिवो अहं' बुद्धि कौन देगा ? 'मैं देह हूँ' इस बुद्धि में 'मैं शिव हूँ ' हूँ (आत्मा , ईश्वर या ब्रह्म हूँ) यह बुद्धि ! मेरी 'देहोंहम की दृष्टि' में 'शिवोहं की दृष्टि' कौन जाग्रत करेगा? (7:10

[यह प्रसंग भक्त या जिज्ञासु की उस अवस्था को दर्शाती है जहाँ कृष्ण की कृपा से या आत्म-ज्ञान के प्रकाश से, 'मैं शरीर हूँ' वाला पुराना भ्रम (बुद्धि) नष्ट हो गया है और अब वह 'मैं शरीर नहीं, बल्कि आत्मा या ब्रह्म हूँ' के निश्चित ज्ञान (निश्चयात्मिका दृष्टि / बुद्धि) को प्राप्त कर चुका है। यह स्थिति भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में वर्णित स्थितप्रज्ञ के लक्षणों के समान है, जहाँ व्यक्ति देह और आत्मा के अंतर को समझकर परम शांति प्राप्त करता है।]  

    और क्या तुम अभी के अभी 'देहो अहं' बुद्धि को छोड़कर , 'शिवो अहं' ये बुद्धि लोगे ? ये 'शिवो अहं' वाली बुद्धि लेनी है कि नहीं लेनी है - इसका निर्णय भी आप अपनी ही बुद्धि से करते हो। तो इस समय आपकी बुद्धि तो 'देहो अहं' की है। तो जब तुम्हारे पास पहले से ही 'देहो अहं' [आदम या हव्वा अहं] वाली बुद्धि पहले से है , और आप मानते हो कि आप पैदा हुए हो (दो बहनों के बाद एक लड़का या लड़की पैदा हुए थे), इसलिए आपकी बुद्धि 100 % सही है। लेकिन जब गुरु (या शास्त्र) कहेंगे , तुम देह नहीं हो ; तो गुरु की बुद्धि कैसे लोगे आप ? आपकी बुद्धि (यदि आत्मश्रद्धा या मनो, बुद्धि , हंकार , चित्तानि नाहं में प्रतिष्ठित न हो तो।) आपकी बुद्धि बाधा बनेगी। स्वप्न देखते समय तुम मर रहे हो ; स्वप्न में कोई कहे भी कि ये तो स्वप्न है-तुम मर थोड़े रहे हो ? कोई स्वप्न में मानेगा ? आपकी ही 'देहो अहं बुद्धि' , 'दासो अहं बुद्धि ', 'अहंकर्ता बुद्धि- या कर्ता अहं बुद्धि' , 'जीवो अहं बुद्धि ' [आदम या हव्वा M/F शरीर में अहं बुद्धि], अब "जीवो अहं बुद्धि' त्याग कर 'शिवो अहं बुद्धि' में प्रतिष्ठित हो जाने के बाद परिवर्तन किसमें आएगा ? बुद्धि को बदलने या दृष्टि को बदलने से कौन बदलेगा ? देह बदलेगा क्या ? (8:16)  देह नहीं बदलेगा , 'देहो अहं' ये समझ बदलेगी (या दृष्टि बदलेगी)। 'शिवो अहं' यह समझ आएगी। देह को कौन बदलेगा ? वह तो वैसे ही बदलता है। बदलेगा जब बदलेगा। लोग सोचते हैं कि बुद्धि के आलावा कोई और करामात है। जितने करामाती देह को बदलना चाह रहे हैं , सब हार गए। इसलिए सन्त (आत्मज्ञानी या ब्रह्मविद) तो पहले कहते हैं , संत , महात्मा , ज्ञानी महात्मा , 'गुरु' क्या करते हैं ? गुरु तुम्हारे देह को नहीं बदलते तुम्हारी दृष्टि को बदलते हैं , सोच को बदलते हैं "दृष्टिं ज्ञानमयीं कृत्वा पश्येद् ब्रह्ममयं जगत् " ज्ञानमय दृष्टि से संसार को ब्रह्ममय देखना चाहिए

देहबुद्धया तु दासोऽहं जीवबुद्धया त्वदंशक
आत्मबुद्धया त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः ॥
देहबुद्धिसे तो मैं दास हूँ, जीवबुद्धिसे आपका अंश ही हूँ और आत्मबुद्धिसे में वही हूँ जो आप हैं, यही मेरी निश्चित मति है॥! (9:07)
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⚜️️🔱जाग्रत अवस्था (मानवदेह) :अपने को ब्रह्म (आत्मा) समझने का अवसर है !⚜️️🔱


मैं ही सर्व का प्रकाशक हूं, कैसे जानें ?/YugPurush/
"साक्षी: अनुभव नहीं, अनुभवकर्ता है" 
(अद्वैत तक पहुँचने के लिए ?) पहले यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि क्या 'मैं' सर्व का प्रकाशक हूँ ? हमें तो यही लगता है कि मैं इस देह (M/F देह) का प्रकाशक, इन्द्रियों का प्रकाशक , स्वप्न अवस्था और जाग्रत अवस्था का प्रकाशक हूँ ! सभी अवस्थाओं का- सर्व का प्रकाशक लगता ही नहीं हूँ। [अब जैसे एक ही पदार्थ की तीन अवस्थाएं -बर्फ, पानी , गैस। या    ठोस, तरल और गैस, या 3'H' को उलट कर देखो। देह-मन और आत्मा। या स्थूल शरीर (Hand) -सूक्ष्म शरीर (मन -Head) और अतिसूक्ष्म , कारण शरीर (Heart -आत्मा) को उलटे क्रम आत्मा , मन और देह की दृष्टि से देखो। और अब अपने को स्थूल शरीर की दृष्टि से मैं कौन हूँ ? स्वयं को स्त्री-पुरुष (M/F) समझे बिना - पहले स्वयं को पूछता हूँ - " कौन सा मैं सर्व का प्रकाशक है ? यह जो जाग्रत अवस्था है , जाग्रत अवस्था वाला मैं - इन्द्रियों का प्रकाशक है। और जाग्रत अवस्था में अपनी इन नेत्र, कर्ण आदि 5 इन्द्रियों के द्वारा आप जगत को देखते हो। और जब जाग्रत अवस्था नहीं रहती , तब स्वप्नावस्था में जिन शरीरों और वस्तुओं को देखते हो , उन्हें तुम ही तो प्रकाशते हो। मन, इन्द्रियों और देह का प्रकाशक तुम (कारण शरीर आत्मा) से आलावा कोई और दूसरा नहीं है। अभी हमलोग जाग्रत अवस्था में हैं , यह कहने मतलब है -इन आँखों से जगत को देख रहे हैं। इन कानों से सुन रहे या, इस शरीर इन्द्रियों से जो कुछ देखते हो , करते हो , तब यह जाग्रत अवस्था है। जब यह देह और मन सोया पड़ा है। ये शरीर मरा जैसा पड़ा है। जब जो तुम शरीर -इन्द्रियाँ बनाकर देखते , सुनते करते हो ? उसको स्वप्नावस्था कहते हैं , स्वप्न के प्रकाशक भी तुम हो। (1:24) क्या तुमने कल रात को जो स्वप्न देखा - जिसमें कोई जैसे तुमको झकझोर कर उठा रहा था ? तो उसके प्रकाशक तुम तो नहीं ही थे ? थे तुम्हीं ? तो जाग्रत अवस्था में, इस जगत के प्रकाशक तुम। स्वप्नवस्था में जिस स्वप्न को तुम देख रहे थे , उस स्वप्न के , मन के दुःख और सुखों के क्रियाओं के प्रकाशक तुम। और सुषुप्ति में ज्ञान न रहने (होश -न रहने) के - अज्ञान के प्रकाशक (मैं अच्छी नींद में सोया पड़ा के प्रकाशक) भी तुम ही हो। ज्ञान न रहने के - अज्ञान (जागरूकता का आभाव) के प्रकाशक भी तुम। अज्ञान  - असल में यदि लाईट है , तो आपको लाईट के साथ जगत भी दीखता है। यदि एकदम लाईट चली जाये - तो जगत नहीं दीखता। जैसे अमावस्या की रात में तारे नहीं दीखते। पर तारे तो रहते ही हैं ! तब आपको और कुछ नहीं दीखता केवल अँधेरा दीखता है। एक अवस्था है -जिसमें लाईट और लाईट में वस्तुयें दिखती हैं। जैसे चाँदनीरात में तारे दीखते हैं। और जब लाईट चली गयी -अमावस्या आ गयी। तब वस्तुएं नहीं दिखतीं। तारे नहीं दीखते पर अँधेरा तो दीखता है कि नहीं ? अन्धे को क्या अँधेरा दीखता होगा ? अँधा किसे कहते हैं ? जिसे अँधेरा न दिखे। (Who is called blind? Someone who cannot see the darkness.) यदि मुझे अँधेरा-उजाला  दीखता है , (यदि मुझे इंजोरिया रात और अंधरिया रात का पता चलता है)  तो आप मुझे क्या सकते हो कि मैं अँधा हूँ ? मुझे कुछ नहीं दीखता है। (2:57) इस शब्द की गहराई पकड़ो। अंधे को अँधेरा दीखता है क्या ? यानि अंधे को अंधरिया -इंजोरिया रात का पता चलता है क्या ? तो जिसे अँधेरा दीखता हो , उसे अँधा कहा जा सकता है क्या ? पर दो चीजें हैं पदार्थ नहीं दीखता , अँधेरा दीखता है। अमावस्या की रात्रि में मुझे तारे नहीं दीखते , अँधेरा दीखता है। (3:19 तो जागृत वृत्ति में और स्वप्न वृत्ति में - वृत्ति के होने से जगत दीखता है। तो जागृत वृत्ति में और स्वप्न वृत्ति में - वृत्ति (सहजवृत्ति) के होने से जगत दीखता है।] जब वृत्ति अँधेरे में या जड़ता में चली जाती है। माने उस समय वृत्तिज्ञान (instinctive knowledg) नहीं रहता। तो उस वृत्ति-ज्ञान के न रहने में उस अज्ञान को कौन जानता है ? यदि 'साक्षी मैं' न रहता, तो अज्ञानता का साक्षी कौन होता ? (3:45) इसलिए मैं सर्व का प्रकाशक हूँ , कहने का पहला अर्थ है , अन्य तीन अवस्थाओं (जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति) के अलावा (मृत्यु भी तीसरी अवस्था -नींद या सुषुप्ति में समाहित है।) तो तीन के अलावा और क्या है, जिसको देखा जा सकता हो ? सर्व में -जाग्रत , स्वप्न , सुषुप्ति आगयी , इसके अलावा ? तीन लोकों के अलावा -चौथा कोई लोक नहीं है ? यदि उसके बारे में कहना चाहो , तो तीन लोकों के बाद एक चौथा लोक है , उसको परलोक कहो। या अलोक कहो ? और सब लोक हैं परन्तु वो लोकातीत/ इन्द्रियातीत ?है। इसलिए सर्व लोकों का जो प्रकाशक है 'स्वयं' (Real I-साक्षी) कोई लोक नहीं है। (4 :40) वो परलोक भी नहीं है
        पर जो जो इस लोक में रहने वाले हैं , वो जब उसका अनुभव करते हैं -तो उन्हें (तुरीय) परलोक लगता है। असल में परलोक का मतलब है -जाग्रत लोक को उसी ने प्रकाशा है। स्वप्नलोक को उसी ने प्रकाशित किया। सुषुप्तिलोक को उसीने प्रकाशा। 'साक्षी' (आत्मा) कोई लोक नहीं है। साक्षी सर्व लोकों का आश्रय है - लोकातीत है (5:14इन तीन लोकों का (जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति का) आभाव और भाव होता रहता है। इसीलिए कोई उसे तुरीय कहते हैं। लेकिन 'मैं साक्षी हूँ' (मैं 'Apparent I' का भी साक्षी हूँ !) जाग्रत के प्रकाशक तुम हो , स्वप्न के प्रकाशक तुम हो , नींद के भी तुम प्रकाशक हूँ, क्या यह बात आप गाढ़ी नींद में या सुषुप्ति में सोंच सकते हो ? मैं तीनों का प्रकाशक हूँ, जाग्रत का भी स्वप्न का भी और सुषुप्ति का भी। यह बात तुम कब सोंच पाओगे? यह बात तुम जाग्रत में सोचोगे कि सुषुप्ति में ? सुषुप्ति में तुम सोच पाओगे कि मैं स्वप्न और जाग्रत का प्रकाशक हूँ 
     इसका मतलब 'साक्षी मैं' हूँ , सर्व  लोकों का प्रकाशक हूँ। इसको समझने के लिए भी जागृत अवस्था जरुरी है। (6:19) समझने के बाद - सुषुप्ति में भी मैं रहता हूँ , क्या जरुरी है कि वहाँ मैं याद रखूं , तभी रहता हूँ ? सुषुप्ति में भी मैं रहता हूँ , ये जाग्रत में मैंने समझ लिया -बस। तो मृत्यु में भी 'मैं (साक्षी) रहता हूँ' -यह समझ लिया। बस ! और ; यही नहीं, सर्वत्र मैं रहता हूँ , यह समझ लिया। सर्वत्र रहने का अनुभव क्या दीवाल को हो सकता है ? दीवाल में भी मैं हूँ , सर्व में मैं हूँ, इस अनुभव के लिए भी  'जागृत मनुष्य देह' चाहिए। (चारो अवस्थाओं मैं रहता हूँ -यह समझ लिया। सर्वत्र रहने का अनुभव कहाँ करोगे ? यह समझने के लिए भी 'जागृत मनुष्य देह' चाहिए।) (6 :55)  जैसे तुम सर्वदा रहते हो , यह बात तुम सुषुप्ति में नहीं सोच सकते।  
    वैसे ही मनुष्य शरीर के आलावा अन्य सब देहो और वस्तुओं में तुम ब्रह्म (आत्मा) हो -ये नहीं सोच सकते। अन्य सब शरीरों में भी तुम ब्रह्म (आत्मा) तो हो, पर सोच नहीं सकते।(7 :09) पर मनुष्य शरीर की विशेष योग्यता -मन -बुद्धि, 'नित्य-अनित्य विवेक' , अन्य शरीरों में यह विवेक नहीं रहने के कारण, 'मैं ब्रह्म (आत्मा) हूँ' ऐसा सोच नहीं सकते। मानवदेह प्राप्त होना ही देवदुर्लभ है। मानव-शरीर, देव शरीर से भी दुर्लभ है।  सीलिए मैं ब्रह्म (आत्मा, ईश्वर) से भी ज्यादा आपका (विवेकी-मनुष्य का)  महत्व समझता हूँ। इसलिए ब्रह्म (आत्मा या देवशरीर ) से भी ज्यादा 'विवेकी मनुष्य' का महत्व है। यदि 'मनुष्य' के पास जाग्रत अवस्था और मनुष्य देह नहीं होता , तो 'अहं ब्रह्मास्मि' - मैं ब्रह्म हूँ , यह ब्रह्म भी नहीं समझ सकता। (7:23दीवाल में ब्रह्म नहीं है? पर क्या दीवाल क्या यह समझ सकेगा-मैं ब्रह्म हूँ ? सुषुप्ति में भी तो ब्रह्म है , पर क्या सुषुप्ति में यह बोध हो सकता है ?? सुशुप्ति में भी तुम हो , ये कब समझते हो ? अच्छा स्वप्न में जब तुम थे , तो इस समय जाग्रत में तुम नहीं हो ? जागृत में ही तो तुमने सोंचा कि तुम स्वप्न में भी थे। अर्थात जागृत अवस्था -मानवदेह अपने को ब्रह्म (आत्मा , ईश्वर) समझने का अवसर है। (8:01) अपने को समझने का ( Real I') को समझने का अवसर है , इस मानवशरीर के आलावा और किसी शरीर में यह अवसर (श्रवण-मनन-निदिध्यासन करने का अवसर) नहीं है। (8:09)
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3 . 
⚜️️🔱इंद्र भी तुम्हें गरीब लगना चाहिए⚜️️🔱 
शरीर जीवन नहीं है, जीवन समझने का अवसर है।/
Yugpurush/शरीर एक साधन है, उद्देश्य नहीं: 

तुम अपनी महिमा को समझो ! तुम हो कौन इंद्र भी तुम्हें गरीब लगना चाहिए। (0:13) ब्रह्मा, विष्णु , महेश भी यदि वे आत्मनिष्ठ नहीं हैं , तो एक बहुत संसारी जीव-जन्तु हैं। ये बात समझ में आती ही नहीं है। कथा में ये विषय छूट जाते हैं। ब्रह्मा भी क्या है ? ज्यादा उम्र का है। तो उससे क्या हो जायेगा ? ये तो प्रकृति से किसी की आयु कम , किसी की ज्यादा होती है। जैसे कुत्ते-बिल्ली की 20 वर्ष , गाय -भैंस की 20 वर्ष। जन्म से ही आप (मनुष्य) ज्यादा आयु (100) लेकर आये हो ! पशु-पक्षियों की तुलना में मनुष्य की आयु , ज्यादा है। ऐसे भी कई जीव हैं जो 1000 साल की आयु लेकर आये हैं। तो आयु ज्यादा -कम होना - यह बड़ी बात नहीं है। क्योंकि वो तो मृत्यु से ग्रस्त है। ऐसे ही किसीको यदि सुख-सुविधा ज्यादा हैं , तो इसका क्या बड़ा महत्व है ? क्योंकि उनके भी दुःख का अन्त तो नहीं हुआ ? Inferiority (हीन-भावना), Superiority- बड़ा होने का घमंड यदि नहीं गया ? धन ज्यादा हो गया ? अकड़ गया ? धन कम हो गया -हीन भावना आ गयी ? (1:26) बस सुख-दुःख के झूले में झूलते रहते हो ? ये सुख-दुःख सम कैसे होंगे ? हानि-लाभ बराबर कैसे होंगे ? जीवन और मृत्यु समान कैसे होंगे ? एक दीर्घायु है - लम्बी उम्र का है। और एक उस अवस्था में प्रतिष्ठित है , जहाँ जन्म -मृत्यु दोनों उसके लिए सपना हो गया है। (1:43) दोनों में फर्क समझ लीजिये। दीर्घायु होना पसंद करोगे कि जन्म-मृत्यु की समझ से पार जाना चाहोगे ? तो ब्रह्मा भी यदि ज्ञानी नहीं है , तो मरेगा ! और एक आदमी देहदृष्टि यदि  कम आयु का है , लेकिन यदि ब्रह्मज्ञ है - तो वह अमर है ! (2:04) इन दोनों का मौलिक भेद है। आपको किसी भौतिक वस्तु से सुख नहीं मिलेगा -ये मैं नहीं कहता। सुख तो खाने-पीने से मिलता है। लकिन वो टिकने वाला नहीं है। 
 एक देह (M/F) रहने के कारण मैं जी रहा हूँ , ये अनुभव आपको हो रहा है कि हम जिन्दा हैं। आप सब अभी जीवित (जिन्दा) ही हो न ? या यहाँ कोई मरा हुआ भी आया है ? सब जिन्दा हो। और जिसदिन शरीर नहीं रहने का समय आता है , उस दिन तुम्हें लगता है कि मरेंगे। अर्थात देह ही तुम्हारा जीवन है। इसका न होना तुम्हारी मृत्यु है। संसार की वस्तुएं सुख हैं। इनका आभाव दुःख है। पर ज्ञानी कहता है , शरीर जीवन नहीं है। (3:01) शरीर सिर्फ जीवन समझने का अवसर है। और अवसर गँवा दोगे , तो मरोगे। अवसर का उपयोग करोगे , तो मरने से बच जाओगे। इसी तरह विषय तुम्हें सुख के अनुभव का एक अवसर था , कि सुख चाहिए। गहरी नींद में तुम्हें सुख चाहिए ही नहीं था - वैसे ही तुम मुक्त थे। तो सुख का अनुभव , फिर सुख को रखने की इच्छा देता है। जब सुख को रखने की इच्छा हुई , पर जब सुख टिका नहीं तब , फिर आत्मानुसंधान किया ? अयं आत्मा ब्रह्म ? का अनुसन्धान। तत्व का अनुसन्धान , सत्य का अनुसन्धान , आत्मा का अनुसन्धान। ब्रह्म की खोज। नित्य-जीवन , नित्यानन्द। नित्य जीवन -जिस जीवन में मृत्यु है ही नहीं। जिस जीवन में दुःख नहीं है। जिस जीवन में मृत्यु नहीं है। जिस जीवन में दुःख नहीं है। जिस जीबन में चिंता नहीं है। ऐसा शाश्वत जीवन केवल मनुष्य ही खोज सकेगा। इसलिए ये सृष्टि क्यों हुई है ? इसके महत्व को भी समझो। (4:16) पेड़ में कोई दुःख नहीं , कीड़े -मकोड़ों में है , पशु -पक्षी में है। इसी तरह मनुष्य में है। परन्तु प्रभु सभी योनियाँ धीरे धीरे क्यों आगे क्यों ले जा रहे हैं ? प्रभु ले जा रहे हैं। यह सृष्टि प्रभु ने बनाई। तो क्यों बनाई ? प्रभु ने स्वयं अपने को ही सब जीवों में प्रकट किया। किन्तु प्रकट होने के बाद जीव हो गए। प्रभु प्रकट होके , जीव होके , मरने वाला हो गया। इसलिए जब उसने पहली बार अपने को जाना , तब वह ब्रह्म हुआ। जब वो ब्रह्म हुआ (आत्मा , ईश्वर हुआ) तो वो सबकुछ हो गया। उसने अपने को ब्रह्म जाना, और वो सबकुछ हो गया। इसी तरह , उनके बाद इस ज्ञान को (अहं ब्रह्मास्मि ? को) पहले देवताओं ने अपने अनुभव से जाना। कि हम ब्रह्म हैं , तो सब दुःख से मुक्त हो गए। सब कुछ हो गए। कुछ होना या खोना बाकि नहीं रह गया। पूर्ण हो गए। फिर उसी ज्ञान को मुनियों ने , ऋषियों ने जाना। फिर युग बदलते -बदलते उसी सत्य को 'मनुष्य ' (गुरु-शिष्य परम्परा में विवेकी मनुष्य ) जानने के योग्य हो गया। और आप वो मनुष्य हो , जो उस परमसत्य को जान सकते हो !(5:32)                                                               
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4.  
'समाधि'  
⚜️️🔱⚜️(जागरूकता की उच्चतम अवस्था)⚜️️🔱⚜️
 में 
आप देखोगे कि 
'इन्द्रियों के बिना मैं मौजूद हूँ ! '
[In a state of heightened awareness,
 you will see that I exist without the senses.] 


साक्ष्य बाहर है, साक्षी भीतर है ! /YUGPURUSH/ "साक्ष्य माया है, साक्षी आत्मा है!"

जैसे स्वप्नों में शरीर भी होता है , लड़ाई भी होती है , प्यार भी होता है। शादियाँ भी होती हैं , बच्चे भी होते हैं। सुखानुभव भी होता है , और मरने तक की नौबत आ जाती है। स्वप्न में वो सब होता है - जो बाहर घटित हो रहा है। इसी तरह ध्यान में तुम्हें रंग दिखेगा , गुरुदेव , माँ , ठकुर , स्वामीजी भी दिख जायेंगे। आँख बंद होने पर दीखता है। हमें तो राम भगवान दिखे , सिद्ध पुरुष दिखे। दीखता है। जैसे तुम अभी दीखते हो , वैसे ही वो दीखते हैं। अच्छा स्वप्न में जब कोई किसी को देखता है , तो इससे अलग तरह का देखता है ? इसीतरह से ध्यान में भी गुरु, भगवान , रंग की रौशनी दिखती है। ध्वनियाँ सुनाई देती हैं , सुगंध मिलता है। और रस आने लगता है -स्वाद आता है। लेकिन ये सब इस आत्मा के और जगत में जाने की बीच की अवस्था है। और आगे जाओगे तो सुगंध भी चली जाएगी , गुरु भी चले जायेंगे, सूर्य-चंद्र -पृथ्वी सब चले जायेंगे । फिर वहाँ तुम चेतन अकेले रह जाओगे। (1:35)   
उस अकेले चैतन्य को ही 'pure consciousness' शुद्ध चेतना कहते हैं। केवल चैतन्य - जिसमें न कोई इन्द्रियाँ हैं , न इन्द्रियों के विषय है। न स्थूल विषय हैं , न स्थूल इन्द्रियाँ हैं। न शुक्ष्म विषय या सूक्ष्म इन्द्रियां -मन और बुद्धि है। समाधि में केवल -चैतन्यता है, आत्मबोध है। आत्मानन्द है। समाधि में अन्य कोई सांसारिक विषय का सुख नहीं होगा कि मेरे धन का सुख है। पद का सुख है। रौशनी दिखी उसका आनंद नहीं रहेगा। चमत्कार दिखना बीच की अवस्था है। इसीलिए साधनपाद अलग है , सिद्धिपाद अलग है। वहाँ सिर्फ चैतन्यता होगी। (3:00) और तब तुम देखोगे बिना इन्द्रियों के मैं मौजूद हूँ ! मैं स्वयं एक प्रकाश हूँ। जिससे शब्द प्रकशित हुए हैं। जिससे और सब विषय प्रकट हुए। मन और इन्द्रियाँ प्रकट हुईं। वो अकेला चैतन्य मैं हूँ -जिससे सब उपजे हैं। आत्मा दिखेगी नहीं। पर बिना इन्द्रियों की आत्मा बचेगी , और तुम्हें लगेगा कि हाँ - मैं हूँ ! बिना मन का मैं हूँ ! बिना दिमाग का मैं हूँ। बिना 'दृश्य बने' ही 'मैं' हूँ ! अभी हमारा नाम-रूप दृश्य है। हम अपने को इस नाम-रूप वाला दृश्य कहते हैं। और सब जगत तो दृश्य है - और सब तो दिख रहे हैं। पर हम मनुष्य होकर भी कहते हैं - हम भी एक दृश्य ही हैं ? मोटे -दुबले ये सब कुछ नहीं रहेगा। सारे दृश्य बने रहें पर तुम इन से असंग हो जाओ(4:23) सांख्य दर्शन कहता है - जड़ को जड़ समझकर इससे असंग हो जाओ। आत्मा का देह-मन से नजदीक होना ही एक होना नहीं है। (जैसे घड़ी और कपड़ा) एक जड़ है एक चेतन है। मन इस तरह तुमसे अलग नहीं होता जिस तरह कपड़ा और घड़ी है। लेकिन एक प्रकार से अलग अवश्य है - कि जैसे मिट्टी और घड़ा। घड़ा नहीं रहता , मिट्टी रहती है। घड़ा मिट्टी से अलग दीखता है , खत्म होता है। पर मिट्टी बनी रहती है। तो जो खत्म हो गया , नाम-रूप (घड़ा) , वो उपाधि है। जो नहीं खत्म हुआ वो सत्य है(6:06) इसी तरह से स्वप्न खत्म हो जाता है। तुम्हारा जागना खत्म होता है। जिस जगने पर आप शरीर देखने लगते हो , ये जगना थोड़ी देर बाद सो जायेगा। फिर स्वप्ना खो जायेगा। नींद भी हमेशा नहीं बनी रहेगी। तो जो हमेशा न रहे , त्रिकाल में न रहे (M/F नाम-रूप) - वो अवस्था है , उपाधि है। इसलिए उपाधि या दृश्य (नाम-रूप) ये उपाधि हैं , अनित्य हैं - क्षणभंगुर हैं। साक्षी आत्मा नित्य है। 
ये उपाधि -temporary है अस्थाई है। आत्मा नित्य है। दृश्य परिवर्तनशील हैं , वो अपरिवर्तनीय है। दृश्य , अवस्था , उपाधि , नाम-रूप ये साक्ष्य हैं। वो साक्षी है। ये जड़ है , वो चेतन है। ये जाने जाते हैं , वो जानता है। इसलिए द्रष्टा साक्षी और दृश्य एक नहीं हैं। पर बिना जाने इन होने वाले मिथ्या पहचान को मैं अपना सत्य स्वरुप मान लेता हूँ। जैसे बुद्धि-भ्रम की अवस्था में लगेगा कि मैं तो M/F हो गया। और ये दीखता है। दिखेगा ऐसा ही। जैसे कभी बड़े लम्बे-लम्बे  पुलों को आपने पार किया होगा। तो जहाँ से आप पुल में घुस रहे होते हैं - वहाँ वो चौड़ा दीखता है। और दूसरी छोर पर कम चौड़ा हो जाता है ? नहीं , पर दिखाई तो देता है। जो नहीं जानते उन्हें , भ्रम और धोखा भी होगा। बच्चे सोंचेंगे - कि उस तरफ बैलगाड़ी कैसे निकलेगी

      दिखने का नियम नहीं बदला , समझ (बुद्धि या दृष्टि) बदल गया। इसी तरह चिड़ियाँ आईने में परछाई देखकर मुंह मारती है। हम नहीं मारते। शीशा वही , ऑंखें वही दीखता भी वैसा ही , पर समझदार समझता है , नासमझ नहीं समझता है। कोई दुनिया बदल जाएगी ? ऐसा सोचना भी मूर्खता है। ज्ञान (समाधि या आत्मज्ञान) होने से क्या जगने-सोने के नियम बदल जायेंगे? नहीं (तुरीय -चतुर्थ अवस्था) ज्ञान होने के बाद भी तीनों अवस्थाएं - जाग्रत , स्वप्न , सुषुप्ति वैसे ही होगी। पर तब इसको हम सच्चा मानकर परेशान थे। अब जाग्रत के जगत को भी सपना समझकर अब परेशान नहीं होते। और कोई परिवर्तन नहीं होता है।  पर बोध सच्चा हो - तो चिड़ियाँ चोंच मारेगी , हम नहीं मारेंगे। वो झाँकती हैं , फिर चोंच मारती हैं। मनुष्य तो आईना फोड़ के उसके पीछे नहीं देखता ? क्यों नहीं देखते ? आईना बदल गया क्या ? समझ बदल गयी हैं। समझ बदल गयी , तो सब बदल गया। तो गुरु और शास्त्र दृष्टि बदल देते हैं , समझ बदल देते हैं। और सब कुछ भगवान और प्रकृति परमेश शक्ति माया देती है। गुरु थोड़ी सी समझ देते हैं। इसलिए समझ , बुद्धि या दृष्टि का महत्व भगवान से भी ज्यादा है। उनका दिया हुआ तुम्हें चैन नहीं देता , पर गुरु जो समझ देते हैं , इष्टदेव का नाम-मंत्र  देते हैं - उससे चैन आ जाता है। इसलिए गुरु न तजूँ हरि को तजि डारूँ
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5. 

सूक्ष्म अंतर्जगत ही स्थूल बाह्यजगत बन गया है ! 

(The physical world is but the gross manifestation of the fine world.)
 

("बुद्धि का तप ही ब्रह्म की प्राप्ति का साधन"/
Param Vani/“जो सबको जानता है, वह कौन है?”)

जो बुद्धि अपने सत्यस्वरूप को जानने के लिए तप करती है , (Real I, आत्मा या ब्रह्म को जानने के लिए तप करती है।) जो बुद्धि आत्मा के साथ (ईश्वर या ब्रह्म के साथ) अपना रिश्ता मजबूत करने के लिए माता पार्वती की तरह तप करती है -बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥ -क्या है ? 

जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु ,न त रहउँ कुआरी॥
तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू॥3॥
भावार्थ-
मेरा तो करोड़ जन्मों तक यही हठ रहेगा कि या तो शिवजी को वरूँगी, नहीं तो कुमारी ही रहूँगी। स्वयं शिवजी सौ बार कहें, तो भी नारदजी के उपदेश को न छोड़ूँगी॥3॥ (बालकाण्ड )
अर्थात किसी विवेकी मनुष्य की बुद्धि जब यह निश्चित कर लेती है - मैं देह के साथ रिश्ता नहीं करुँगी ! मैं इन्द्रियों से रिश्ता नहीं करुँगी ; करुँगी तो आत्मा (ब्रह्म या ईश्वर) से ही करुँगी ! ऐसे विवेक-सम्पन्न बुद्धि वाले मनुष्य को ही शिव (आत्मा) की प्राप्ति होती है। परन्तु इस समय के युवाओं की बुद्धि - 'Relationship ' बनाने या सम्बन्ध बनाने के बारे में क्या समझती हैं ? शरीर का सम्बन्ध इन्द्रियों से है, इन्द्रियों का सम्बन्ध जगत से है, अर्थात इन्द्रियों का सम्बन्ध मन से है (5 विषयों से है), और बुद्धि का सम्बन्ध मन से है ! अब साक्षी भाव से मन को ही देखो , हम उसकी परीक्षा भी ले सकते हैं , या वह हमें बरगला भी सकता है ? कई बार Love के चक्कर में लड़के-लड़कियाँ पड़ जाती हैं , उनको माता-पिता समझाते हैं - छोड़ो ये Love ! भलाई किसमें है -बुद्धि को सोचने दो। 
उसी तरह हम सत्यार्थीयों का या आत्मान्वेषियों का (आत्मान्वेषियों की बुद्धि का ?) भी LOVE तो है, देह से ? इन्द्रियों से , विषय-सुखों से ? ये देह के साथ बुद्धि का यह Love Marriage है , इन्द्रिय विषयों के साथ , बुद्धि का यह प्रेम-विवाह है? और आज नहीं कल ये Love Marriage तुम्हें नरक में (दुःख-कष्ट में) ले जाएगी। इसलिए विवाह करो - पर Love Marriage' नहीं करो।
Marriage करना अलग है। (1:25 मिनट) और Love से Marriage करना अलग है। तुम जिससे प्यार करते हो, उससे शादी कर लेते हो , अपना बना लेते हो। गुरु और शास्त्र कहते हैं जो अपना बनाने लायक है , उससे प्यार करो। जो अपना बना लेने के योग्य है उससे प्यार करो। और जब तुम (ठाकुर -माँ स्वामीजी की कृपा से) यह समझ चुके हो कि-ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर:।" तो ब्रह्म (आत्मा) के सिवा अपना बनाने लायक और कोई है क्या ? शिव (आत्मा) के अतिरिक्त जिसको अपना बनाओगे , देह और इन्द्रियों को अपना बनाओगे , तो इसके साथ तुम नहीं मरोगे ? (अविनाशी आत्मा होकर नश्वर) देह को अपना बनाओगे तो देह के साथ तुम मरो। जब देह-मन इन्द्रियाँ सुखी-दुःखी होंगी , तुमको भी सुखी-दुखी होना होगा। हममें से अधिकांश युवा Marriage करने के बाद ही स्वामी विवेकानन्द की मनुष्य-निर्माणऔर चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा को ग्रहण करने के योग्य बन सकते हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम से सीधा संन्यास आश्रम में प्रवेश करने की पात्रता बहुत इने-गिने व्यक्तियों में होती है। (बाकि लोगों को श्रीरामकृष्ण- स्वामी विवेकानन्द अद्वैत-वेदांत शिक्षक-प्रशिक्षण में प्रशिक्षित गुरु से मंत्र ग्रहण करने की चेष्टा करनी चाहिए। या महामण्डल द्वारा प्रकाशित पुस्तकों का अध्यन करना चाहिए। ) जन्म-जन्मांतर से हमारा अभिमान देह से  (Apparent I या आदम और हव्वा शरीर) से जुड़ा रहा है। (2:12) अब अगर गुरु का दिया इष्टमंत्र का कोई जादू चले , और आप उसके अनुसार साधना करें , और जन्म-जन्म का रिश्ता तोड़कर गुरु जिससे रिश्ता करायें उससे (ठाकुर-माँ स्वामीजी से) सम्बन्ध बना लो। तो मनुष्य जीवन के चरम लक्ष्य तक पहुँच सकते हो। पर विवेक-सम्पन्न नहीं रहने के कारण, तुम्हारी बुद्धि जन्म-जन्म से भ्रमित होकर हर जन्म में मानवदेह प्राप्त करके भी -इस जन्म में भी नश्वर देह से रिश्ता तोडना नहीं चाहती। जरा सी नाराजगी हुई तो सास से न कहकर अपनी माँ को फोन करो ? सास तुम्हारी नहीं बनीं ? ससुर तुम्हारा नहीं बना ? जो तुम्हारी बुद्धि को परमात्मा की तरफ मोड़ने वाले हैं , उनपर तुम्हारा विश्वास नहीं हुआ ? बुद्धि जिसको अपना समझ लेती है - (देह,मन इन्द्रियों को) , बस उसीकी बात सुनती है। सारा लगाव रिश्ता नैहर से है ? गुरु से वैसा लगाव है ? लड़की का रिश्ता अपने से श्रेष्ठ वर से किया जाता है। देह से सूक्ष्म इन्द्रिय है , इन्द्रिय से श्रेष्ठ मन है , मन से सूक्ष्म इसलिए श्रेष्ठ बुद्धि है , और बुद्धि से सूक्ष्म और श्रेष्ठ आत्मा है।   अब देखो जिन्होंने पार्वती/नचिकेता (बुद्धि) की परीक्षा  ली थी , वो उसको भटकाना नहीं चाहते थे। वे यह परखना चाहते थे कि इसकी बुद्धि अभी 3K से अनासक्त हुई है कि नहीं ? कहीं ये भी वैसा ही तो नहीं है ? इसकी बुद्धि (पार्वती)  शिव की भक्त (या आत्मा की भक्त) बनेगी, शिव से ही शादी करेगी , कि कहीं सुन्दर से तो नहीं कर लेगी, या वैभव से कर लेगी? (3:32) इसलिए ऋषियों ने एक तरफ सारी अच्छाइयाँ दिखा दीं। क्या -बढ़ियाँ बढ़िया चीजें हैं। किसी से भी शादी कर ले देवलोक में विष्णु , शिव कोई कम नहीं हैं। पर यहाँ तुमको -धन और वैभव जिससे लगाओ है। इसीलिए नचिकेता के प्रसंग में यमराज ने कहा - तुम चाहो जितनी उम्र माँग लो। चाहे जितना धन मांगलो। जो लोगों को इस जन्म में नहीं मिलता है , किसीको धन नहीं मिलता , किसी को पद नहीं मिलता। किसको प्रतिष्ठा नहीं मिलती। किसीको अनुकूल पतिपरिवार नहीं मिलता। एक न एक कमी रह ही जाती है। आपको भी अभी कोई न कोई कमी तो है न ? इसलिए गुरु के यहाँ या मंदिर में जाकर क्या माँगते हैं ? जिसका पति ठीक नहीं , पति। जिसको है नहीं , उसको मिल जाये। स्वास्थ्य ठीक नहीं , तो वो मिल जाये। इसलिए नचिकेता को यमराज ने पहले ही कहा - जो वस्तु जिनके पास बहुत है , वो माँगलो ! और तुम्हें ऐसा लगता है कि जिसके पास कोई चीज नहीं है , जिसकी उसको कमी है , वो भी तुम माँगलो। जो मनुष्यों को प्राप्त हो सकता हो, वो सब मैं तुम्हें दूँगा। परन्तु मृत्यु के बाद आत्मा रहती है , कि नहीं रहती ? इस बात को मत पूछो। (5:13) नचिकेता कहता है , मैं तो यही पूछूँगा। 
      इस कथा का अभिप्राय है , जब आपके जैसे नचिकेता पाठचक्र में आते हैं , तो जो कोई कमी है वो यहाँ पूछते हैं। आत्मा की कमी तो किसी को महसूस ही नहीं होती। आत्मनिष्ठा- आत्मनिर्भरता -आत्मविश्वास की कमी का तो ख्याल ही नहीं आता। कुछ लोग जरूर हैं - जो गुरुदेव के निर्देशानुसार मनुष्य जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त करने के मार्ग पर चले हैं। वे कहते हैं -हम सुनते हैं , फिरभी आत्मनिष्ठा नहीं बनती। 3K में अनासक्त, अलिप्त , detached होना चाह रहे हैं। कामिनी-कांचन से निर्लिप्त नहीं हो पा रहे हैं। हम आत्मा को जानना चाह रहे हैं , फिरभी स्पष्ट नहीं हो रही है। कुछ जिज्ञासु नचिकेता की तरह भी हैं। ऋषि भी विष्णु की महिमा गाते हैं। लेकिन पार्वती (बुद्धि) ने कहा - बरउँ  संभु ,न त रहउँ कुआरी॥ मैं निर्धन रहना पसन्द करूँगा , मैं असुंदर रहना पसन्द करूँगा। मैं कोई भी पद पाए बिना रहने को तैयार हूँ पर मुझे आत्मा चाहिए ही चाहिए। मुझे आत्मा के रहस्य को समझना ही है। ऐसी दृढ़ जिज्ञासा हो , दृढ़ इच्छा हो, उसके बाद श्रवण किया जाये। बाकि जबतक बुद्धि है, मन है , इन्द्रियां हैं , तो जागते ही मन आ जायेगा , इन्द्रियाँ आ जायेंगी। जगत दिखने लग जायेगा। फिर भी बुद्धि को यदि एक बार यह समझ आ गयी - कि यह मेरा वर (आत्मा) नहीं है ! इनको मुझे बरना ही नहीं है। हैं बहुत अच्छे। (7:15) ये मेरे नहीं हो सकते। इनको मैं -'मेरा' बनाऊँगी ही नहीं। इनके साथ मेरा रिश्ता टिकेगा ही नहीं। लेकिन जिसकी बुद्धि ऐसी 'स्थित-प्रज्ञ ' नहीं हो सकी हो , क्या वे अपनी बुद्धि को 3K में टिकी रहकर उन्हें प्राप्त करके तृप्त हो जाएगी। करके देख लो। पहले ही मालूम हो जाये कि इसके साथ मेरा रिश्ता ही नहीं टिकेगा। पहले ही मालूम हो जाये की ये लड़का या लड़की मंगली है। लड़की मंगली है तो लड़का गया। लड़का मंगला है , तो लड़की गयी। तो इनसे रिश्ता करने वाला ठीक-ठीक रहेगा न ? मीरा ने कहा -

"ऐसे वर को क्या वरु, जो जन्मे और मर जाये ।
वरीये गिरिधर लाल को, चूड़लो अमर हो जाये ॥"

मीरा का पति खराब था ? ससुर खराब था ? सुख-सुविधा नहीं थी ? "ऐसे वर को क्या वरु, जो जन्मे और मर जाये । ऐसे वर को वरूँगी -जा से चूड़लो अमर हो जाये ॥" ऐसे को अपना वर बनाऊँगी जिसके मरने का दुःख मुझे न हो। अर्थात वर के मरने का दुःख - चूड़लो अमर हो जाये ॥" का मतलब क्या ? क्या कोई स्त्री धन जाने से विधवा हो जाती है ? पद जाने से कोई विधवा होती है ? विधवा होती है -पति के जाने से। जिसके जाने से तू विधवा हो जाओ -बिना मालिक के हो जाओ। अभी लगता है कि शरीर मर जायेगा - तो हम मर जायेंगे (8:59) लेकिन यदि आपको आत्मा का पता नहीं है , तो आप मर जाओगे। न मरें , तो भी मरेंगे। बिना मौत मरेंगे।  हमारे यहाँ जब कोई बहुत नाराज हो कर अभिशाप दे देता है। मौत से तो सब मर जाते हैं। और जितने भी अज्ञानी (अपने को देह समझने वाले) मर रहे हैं , सब बिना मौत ही मर रहे हैं। मौत-आदि है नहीं , बिना मौत मरते हैं। यदि श्राप कहीं है -तो अज्ञानी को ही लगता है , वो बिना मौत मरता है। मृत्यु कहाँ है ? जो मर जाओगे ? तुम मौत से नहीं मरते , अज्ञान (अविद्या) से मरते हो(9:46) अज्ञानी आत्महत्यारा है। अज्ञानी आत्महत्या कर लेता है। कोई नहीं मारता , अज्ञानी अपने को मार लेता है। मनुष्य मरता है , तो आत्मा के अज्ञान से। तो पहले बुद्धि की सहायता लो। जिस बुद्धि के द्वारा , या जिस अज्ञानी बुद्धि के द्वारा - बुद्धि तो है पर उसे आत्मा का तो पता ही नहीं चला ? क्योंकि वो बुद्धि मन के साथ थी , इन्द्रियों के साथ थी , देह के साथ थी , संसार के साथ थी। तो उसे इन सबका पता चला। और जबतक हम पशु-पक्षी की योनियों में थे तब ये विवेकी बुद्धि नहीं थी। तब तक मन और यही सब चलता रहा। मनुष्य बुद्धि आई तो पहले इन्हीं लोगों के साथ रही थी , तो इन्हीं के साथ गयी। जैसे स्वामीजी एक कथा में कहते थे - एक शेर के बच्चे को गड़ेरिये ने पाल लिया। (10:50) छोटी उम्र में मिल गया। तो जब वो भेंड़ो को डण्डा मारे , तो वो शेर भी भागने लगे। बच्चा था। धीरे -धीरे वो बड़ा हो गया , आदत वही रही। तो हमलोगों की बुद्धि भी अभी लगभग उसी तरह की है। वो जिसके साथ रही डण्डे खाती रही। जैसे शेर भेंड़ बन बैठो भय मानत सिंघन से। सिंघों से डरता है , गड़ररिया से डरता है। जैसे भेंडे डरती हैं।              
विचार करके देखो प्यारे, जगत बना है मन से।  
जैसे शेर भेंड़ बन बैठो, भय मानत सिंघन से।। 

ऐसे ही यह मन, देह बन बैठो, डरता फिरे यमन से ! (11:39) यमराज से डरता है ! मन (बुद्धि) ही देह बन गया है। यम से डरता रहता है। ये बुद्धि बहुत दिनों से मन -इन्द्रियों के साथ रही। उनकी आदत इस बुद्धि में आ गयी। उसी तरह से सोंचती है। इन्द्रिय विषयों के द्वारा मिले दुःखों -सुखों से बुद्धि सम्मोहित (deluded) है। बुद्धि देह से , इन्द्रियों से , मन से इन्द्रियों के द्वारा मिले सुख-दुःखों से सम्मोहित-बुद्धि, प्रभावित बुद्धि। वही सोच पाती है कि ये सब भोग की वस्तुएं 3K ही जीवन का सार है। उसमें सुख -दुःख भोगने वाली मैं -बुद्धि है। उसको कभी आत्मा के आनंद का स्वाद नहीं मिला है। प्रभावित है। कभी आत्मा के आनन्द को नहीं जानती। इसलिए बुद्धि -इन्द्रिय -मन में एक बार फूट डालना पड़ेगा। कई लोग लड़के -लड़कियों के सर से इश्क का भूत उतारने के लिए तरह तरह के उपाय करते हैं। कि कैसे इनका love खत्म हो जाये। पर 
लड़कियाँ -लड़के love में पागल हो जाते हैं। जादू-टोने भी फेल हो जाते हैं। तब कई मातापिता गुरु के पास जाते हैं , कि क्या करें ? जब स्वाभाविक रूप से दुर्दशा होगी , जब इस जन्म में तुम भी अपने घर में नहीं रखोगे। तब इनको अक्ल आएगी। जब सारा सपना धराशाई होगा तब अक्ल आएगी। या अगले जन्म में सतसङ्ग और गुरु करोगे , तब होश आएगा। तब क्या लाभ ? इसलिए अभी इसी जन्म में तुम यह जान लो कि - वास्तव में तुम कौन हो ? "तुम्हारी बुद्धि " क्या कहती है? क्योंकि गीता (3.42) में भगवान ने कहा है - 

इन्द्रियाणि  पराणि आहुः,  इन्द्रियेभ्यः परम् मनः। 

 मनसः तु परा बुद्धिः य बुद्धेः परतः तु सः।। (3.42) 

अर्थात सूक्ष्म (या अधिक बलशाली) होने के कारण स्थूल शरीर से (Apparent I M/F आदि स्थूल शरीर से) इन्द्रियाँ पर (श्रेष्ठ) कही जाती हैं। इन्द्रियों से परे मन है और मन से परे बुद्धि है, और जो बुद्धि से भी परे है, वह है आत्मा।।बाह्य जगत् की वस्तुओं (स्त्री-पुरुष शरीर) की तुलना में  इन्द्रियाँ अधिक महत्त्व की होती हैं। कर्मेन्द्रियों की अपेक्षा ज्ञानेन्द्रियाँ अधिक श्रेष्ठ और सूक्ष्म हैं। और उनसे भी सूक्ष्म है हमारा मन जो हमारे 10 इन्द्रियों को  नियन्त्रित करता है। और मन से भी सूक्ष्म है बुद्धि , इसलिए वह मन से परे है। और बुद्धिवृत्तियों को प्रकाशित करने वाला चैतन्य बुद्धि से भी सूक्ष्म होना ही चाहिये, बुद्धि से भी सूक्ष्म या परे तत्त्व है उसे ही अपरिवर्तनीय (अविनाशी) आत्मा कहते हैं। उपनिषदों में कहा गया है कि इस चैतन्यस्वरूप आत्मा के परे और कुछ नहीं है। (शरीर रथ है , इन्द्रियाँ घोड़े हैं, मन लगाम है , बुद्धि सारथि है और आत्मा "Real I " रथी है !)

 एवम् बुद्धेः परम् बुद्ध्वा संस्तभ्य आत्मानम् आत्मना। 
 जहि शत्रुम् महाबाहो कामरूपम् दुरासदम्।। (3.43)

।।3.43।। इस प्रकार हे महाबाहु!  बुद्धि से परे आत्मा को जानकर आत्मा (शुद्ध बुद्धि) के द्वारा आत्मा (इस मूढ़ बुद्धि को स्थूल शरीर को ही मैं समझने वाली बुद्धि को ) को वश में करके, हे महाबाहो ! तुम इस दुर्जेय (दुरासदम्-hard to corner) कामरूप शत्रु को मारो।।

एवम्-इस प्रकार आत्मा बुद्धेः-बुद्धि से भी परम है, श्रेष्ठ (superior) है ऐसा जानकर (बुद्ध्वा)
 -जानकर  संस्तभ्य-(restrain) उस बुद्धि को आत्मा के वश में या नियंत्रण में रखते हुए,  
आत्मानम्-निम्न आत्मा (इन्द्रिय, मन और में विषयों में आसक्त मूढ़ बुद्धि) को ; आत्मना- सत्यनिष्ठ या आत्मनिष्ठ बुद्धि, या शुद्ध बुद्धि द्वारा; मूढ़बुद्धि को जहि-वध करदो यानि समाप्त कर दो। शत्रुम्-शत्रु का; महाबाहो-महाबलशाली; कामरूपम् (कामिनी-कांचन the form of desire) कामना रूपी; दुरासदम् (hard to corner- काम से विमुख मोड़ना दुर्जेय।

इस श्लोक के साथ न केवल यह अध्याय समाप्त होता है किन्तु अर्जुन द्वारा मांगी गयी निश्चित सलाह भी इसमें दी गई है। कि केवल आत्मानुभव रूप ज्ञान के द्वारा ही हम आत्मअज्ञान (अविद्या)  को नष्ट कर सकते हैं। इसलिए निष्कर्ष के रूप में श्रीकृष्ण इस पर बल देकर कहते हैं कि हमें आत्मज्ञान द्वारा काम-रूपी शत्रु का संहार करना चाहिए। 
[क्योंकि एक आत्मा (ईश्वर , भगवान, ब्रह्म) ही अनेक जीव-जगत के रूप में भास रहा है। जो परमेश (ब्रह्म की) अव्यक्त माया शक्ति है। इसलिए  संसार के सभी पदार्थ भौतिक हैं। ये भौतिक पदार्थ (कामिनी-कांचन विषय-भोग आसक्ति) में  आत्मा की स्वाभाविक उत्कंठा को कभी तृप्त नहीं कर सकते , या पूरा नहीं कर सकते।  इसलिए इन ऐषणाओं को प्राप्त करने की कामना करना मूढ़बुद्धि का काम है , इसलिए व्यर्थ ही है। इसलिए परिश्रम करते हुए हमें मूढ़ बुद्धि को प्रकृति के साथ नहीं जुड़कर , आत्मा के साथ जुड़े रहने का प्रशिक्षण (मनःसंयोग का प्रशिक्षण) देना चाहिए।  और फिर मन और इन्द्रियों को नियंत्रित रखने के लिए इस शुद्ध बुद्धि या सत्यनिष्ठ बुद्धि प्रयोग (विवेक-प्रयोग) करना चाहिए। 
 अज्ञान (अविद्या ) का ही परिणाम है इच्छा (ऐषणा) जिसके निवास स्थान हैं इन्द्रियाँ मन और बुद्धि। ध्यान के अभ्यास से जब हम अपना ध्यान बाह्य विषय शरीर मन और बुद्धि से विलग करके स्वस्वरूप में स्थिर करते हैं तब इच्छा की जननी मूढ़ बुद्धि ही समाप्त हो जाती है।
स्थूल शरीर मन (M/F आदम और हव्वा ) आदि उपाधियों के साथ जब तक हमारा तादात्म्य बना रहता है तब तक हम अपने शुद्ध दिव्य स्वरूप को पहचान ही नहीं पाते। इतना ही नहीं बल्कि सदैव दुखी बद्ध परिच्छिन्न अहंकार को ही अपना स्वरूप समझते हैं। स्वस्वरूप के वैभव का साक्षात् अनुभव कर लेने पर हम अपने मन को पूर्णतया वश में रख सकेंगे। गौतम बुद्ध के समान ज्ञानी पुरुष (सच्चिदानन्द के बाद  विवेकानन्द )  का मन किसी भी प्रकार उसके अन्तकरण में क्षोभ उत्पन्न नहीं कर सकता क्योंकि वह मन ज्ञानी पुरुष के पूर्ण नियन्त्रण में रहता है। यहाँ ध्यान देने की बात है कि गीता में प्रतिपादित तत्त्वज्ञान जीवन की विधेयात्मक संरचना करने की शिक्षा देता है न कि जीवन की सम्भावनाओं की उपेक्षा अथवा उनका नाश कामना एक पीड़ादायक घाव है जिसको ठीक करने के लिए ज्ञानरूपी लेप का उपचार यहाँ बताया गया है। इस ज्ञान के उपयोग से सभी अन्तरबाह्य परिस्थितियों के स्वामी बनकर हम रह सकते हैं। जो इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है वही साधक ईश्वरीय पुरुष, नेता, ऋषि या पैगम्बर कहलाता है।
कठोपनिषद् में रथ के सादृश्य से इसे अति विशद ढंग से समझाया गया है:
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। 
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।। 
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयां स्तेषु गोचरान्।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः।। 
(कठोपनिषद्-1.3.3-4) 
यह उपनिषद् अवगत कराती है कि एक रथ है जिसे पांच घोड़े हाँक रहे हैं। उन घोड़ों के मुख में लगाम पड़ी है। यह लगाम रथ के सारथी के हाथ में है और रथ के पीछे आसन पर यात्री बैठा हुआ है। यात्री को चाहिए कि वह सारथी को उचित निर्देश दे जो लगाम को नियंत्रित कर घोड़ों को उचित दिशा की ओर जाने में मार्गदर्शन दे सके। यदि यात्री सो जाता है तब घोड़े निरंकुश हो जाते हैं। 
इस सादृश्य में रथ मनुष्य का शरीर है, घोड़े पाँच इन्द्रियाँ हैं और घोड़ों के मुख में पड़ी लगाम मन है और सारथी बुद्धि है और रथ में बैठा यात्री शरीर में वास करने वाली आत्मा है। इन्द्रियाँ (घोड़े) अपनी पसंद के पदार्थों की कामना करती हैं। मन (लगाम) इन्द्रियों को मनमानी करने से नहीं रोक पाती। बुद्धि (सारथी) मन (लगाम) के समक्ष आत्मसमर्पण कर देती है। इस प्रकार मायाबद्ध आत्मा बुद्धि को उचित दिशा में चलने का निर्देश नहीं देती। इसलिए रथ को किस दिशा की ओर ले जाना है, इसका निर्धारण इन्द्रियाँ अपनी मनमानी के अनुसार करती हैं। आत्मा इन्द्रियों के सुखों का अनुभव परोक्ष रूप में करती है किन्तु ये इन्द्रियाँ उसे तृप्त नहीं कर पाती। इसी कारण से रथ के आसन पर बैठी आत्मा (यात्री) इस भौतिक संसार में अनन्त काल से चक्कर लगा रही है। यदि आत्मा अपनी दिव्यता के बोध से जागृत हो जाती है और अपनी सक्रिय भूमिका का निर्वहन करने का निश्चय करती है तब वह बुद्धि को उचित दिशा की ओर ले जा सकती है। तब फिर बुद्धि अपने से निम्न मन और इन्द्रियों द्वारा शासित नहीं होगी और रथ आत्मिक उत्थान की दिशा में दौड़ने लगेगा। अतः आत्मा द्वारा इन्द्रियों, मन और बुद्धि को नियंत्रित करने का प्रयास करना चाहिए। 

 इसलिए बुद्धि को मन और इन्द्रिय रूपी घोड़ों से सम्बन्ध न बनाकर , आत्मा से सम्बन्ध जोड़ना चाहिए। और आत्मा, ब्रह्म 'शिवोहं' की अनुभूति करने के लिए, 'विवेकानन्द की बुद्धि'- (व्यक्ति नरेन्द्र Apparent I की बुद्धि नहीं सच्चिदानन्द अवस्था "Real I " की बुद्धि) को भी माता पार्वती की तरह (कन्याकुमारी में) तप करके शुद्ध-बुद्धि (आत्मनिष्ठ बुद्धि-सत्यनिष्ठ बुद्धि ?) बनना पड़ता है-
 
जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥
तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू॥3॥
भावार्थ-
मेरा तो करोड़ जन्मों तक यही हठ रहेगा कि या तो शिवजी को वरूँगी, नहीं तो कुमारी ही रहूँगीस्वयं शिवजी (इष्टदेव) सौ बार कहें, तो भी नारदजी (गुरुदेव) के उपदेश को न छोड़ूँगी॥3॥

जैसे नचिकेता ने यमराज से कहा था - "मैं निर्धन रहना पसन्द करूँगा , मैं असुंदर रहना पसन्द करूँगा। मैं कोई भी पद पाए बिना रहने को तैयार हूँ पर मुझे आत्मा चाहिए ही चाहिए। मुझे आत्मा के रहस्य को समझना ही है।"  ऐसी दृढ़ जिज्ञासा हो , दृढ़ इच्छा हो, उसके बाद श्रवण किया जाये। 
      किन्तु जब तक स्थूल देह-बुद्धि (M/F शरीर) है, मन है , इन्द्रियां हैं , तो जागते ही मन आ जायेगा , इन्द्रियाँ आ जायेंगी। जगत दिखने लग जायेगा। फिर भी यदि एक बार बुद्धि को यह समझ आ गयी - कि यह मेरा वर (आत्मा) नहीं है ! इनको मुझे बरना ही नहीं है। हैं बहुत अच्छे। परन्तु ये मेरे नहीं हो सकते। इनको मैं -'मेरा' बनाऊँगी ही नहीं। इनके साथ मेरा रिश्ता टिकेगा ही नहीं। पहले ही मालूम हो जाये की ये लड़का या लड़की मंगली है। पहले ही मालूम हो जाये कि इसके साथ मेरा रिश्ता ही नहीं टिकेगा।  लड़की मंगली है तो लड़का गया। लड़का मंगला है , तो लड़की गयी। तो इनसे रिश्ता करने वाला ठीक-ठीक रहेगा न? लेकिन जिसकी बुद्धि ऐसी 'स्थित-प्रज्ञ ' नहीं हो सकी हो , फिरभी वे आजीवन अपनी बुद्धि को तीनों ऐषणाओं 3K में आसक्ति लगाए रखें , तो क्या वह 'मूढ़ बुद्धि' (इन्द्रिय विषयों में आसक्त बुद्धि) कामिनी-कांचन के  भोग से कभी तृप्त हो सकेगी ? यदि विश्वास नहीं हो तो -करके देख लो। इसीलिए मीरा ने कहा -
"ऐसे वर को क्या वरु, जो जन्मे और मर जाये ।
वरीये गिरिधर लाल को, चूड़लो अमर हो जाये ॥" 

आओ मेरी सखियो मुझे मेहँदी लगा दो ।
मेहँदी लगा दो, मुझे सुन्दर सजा दो ।
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ॥
सत्संग मे मेरी बात चलायी,
सतगुरु ने मेरी किन्ही रे सगाई 
उनको बुला के हथलेवा तो करा दो,
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ॥1॥

ऐसी पहनी चूड़ी जो कबहू ना टूटे 
ऐसा वरु दूल्हा जो कबहू ना छूटे 
अटल सुहाग की बिंदिया लगा दो,
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ॥2॥

भक्ति का सुरमा मैं आँख मे लगाउंगी 
दुनिया से नाता तोड़ मैं उनकी हो जाऊंगी 
सतगुरु को बुला के फेरे तो करवा दो,
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ॥3॥

बाँध के घुंगरु मै उनको रिझाऊँगी
ले के इकतारा मै श्याम श्याम गाऊँगी 
सतगुरु को बुला के बिदा तो करा दो,
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ॥4॥
   
( "मूढ़ बुद्धि और शुद्ध बुद्धि" :  इन्द्रिय विषयों में आसक्त बुद्धि को मूढ़ बुद्धि कहते हैं और बुद्धि से परे सिर्फ आत्मा में आसक्त बुद्धि ,यानि आत्मनिष्ठ बुद्धि या सत्यनिष्ठ बुद्धि को ही शुद्ध बुद्धि कह सकते हैं। Apparent I को मैं M/F समझने वाली, या स्वयं को देह समझने वाली -'देहोहं' (M/F आदम और हव्वा) समझने वाली बुद्धि नहीं !यानि वह अविवेकी बुद्धि नहीं , जो अभीतक सद्गुरु और शास्त्र (वचनामृत -गीता -उपनिषद आदि) से प्रेरित बुद्धि न बनकर स्वयं को (M/F आदम और हव्वा समझकर) 'सेव खाना' श्रेय है ? कि प्रेय है? इसीका निर्णय करने में समर्थ नहीं हो सकी है, वह बुद्धि नहीं -  सद्गुरु से मंत्र-प्रेरित होने के बाद ("Real I "-अवतार वरिष्ठ के श्रीचरणों में प्रतिष्ठित) "तुम्हारी शुद्ध बुद्धि" क्या कहती है ?  -कि तुम देहमन नहीं ब्रह्म हो ? आत्मा हो ? क्या हो ?  अर्थात सद्गुरु से प्रेरित होने के बाद ("Real I "-अवतार वरिष्ठ के श्रीचरणों में प्रतिष्ठित) "तुम्हारी बुद्धि" क्या कहती है ?  -कि तुम देहमन नहीं ब्रह्म हो ? आत्मा हो ? क्या हो ?  
[#नारद मुनि-  हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक माने गये हैं। ये भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक माने जाते है। ये स्वयं वैष्णव हैं और वैष्णवों के परमाचार्य तथा मार्गदर्शक हैं। ये प्रत्येक युग में भगवान की भक्ति और उनकी महिमा का विस्तार करते हुए लोक-कल्याण के लिए सर्वदा सर्वत्र विचरण किया करते हैं। भक्ति तथा संकीर्तन के ये आद्य-आचार्य हैं। इनकी वीणा भगवन जप 'महती' के नाम से विख्यात है। उससे 'नारायण-नारायण' की ध्वनि निकलती रहती है। इनकी गति अव्याहत (त्रिकाल अबाधित) है। ये ब्रह्म-मुहूर्त में सभी जीवों के मन और बुद्धि की गति देखते हैं और अजर-अमर हैं भगवद-भक्ति की स्थापना तथा प्रचार के लिए ही इनका आविर्भाव हुआ है। उन्होंने कठिन तपस्या से ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया है। देवर्षि नारद धर्म के प्रचार तथा लोक-कल्याण हेतु सदैव प्रयत्नशील रहते हैं। इसी कारण सभी युगों में, सब लोकों में, समस्त विद्याओं में, समाज के सभी वर्गो में नारद जी का सदा से प्रवेश रहा है। मात्र देवताओं ने ही नहीं, वरन् दानवों ने भी उन्हें सदैव आदर दिया है। समय-समय पर सभी ने उनसे परामर्श लिया है।]
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6."जीते जी मुक्ति " का रहस्य ! / #paramvani / भक्ति, ज्ञान और कर्म का सिद्धांत ! 
7. जगत में ब्रह्मज्ञानी का व्यवहार : #paramvani / संसार में रहते हुए भी मुक्त कैसे ?
8. संसार में रहकर मुक्त रहना ही सच्ची साधना है ! #paramvani / मुक्ति कहीं जाने में नहीं, जानने में है !
9. अविद्या ही देहाभिमान की जड़ है ! #paramvani / खुद को देह मानने की भूल...
10. How do we know we have reached enlightenment? —Swami Sarvadevananda
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इसलिए बुद्धि -इन्द्रिय -मन में फूट डालना पड़ेगा। लड़कियाँ -लड़के love में पागल हो जाते हैं। जब सारा सपना धराशाई होगा तब अक्ल आएगी। अगले जन्म में सतसङ्ग और गुरु करोगे, तब होश आएगा ? अभी - वास्तव में तुम कौन हो ? "तुम्हारी बुद्धि " क्या कहती है? क्योंकि गीता (3.42) में भगवान ने कहा है

इन्द्रियाणि  पराणि आहुः इन्द्रियेभ्यः परम् मनः। 

                 मनसः तु परा बुद्धिः य बुद्धेः परतः तु सः।। (3.42) 

(M/F स्थूल शरीर से) पर (श्रेष्ठ) इन्द्रियाँ कही जाती हैं;  इन्द्रियों से परे मन है और मन से परे बुद्धि है, और जो बुद्धि से भी परे है, वह है आत्मा।।

बाह्य जगत् की वस्तुओं (स्त्री-पुरुष शरीर) की तुलना में हमारे लिए अपनी इन्द्रियाँ अधिक महत्त्व की होती हैं। कर्मेन्द्रियों की अपेक्षा ज्ञानेन्द्रियाँ अधिक श्रेष्ठ और सूक्ष्म हैं। और उनसे भी सूक्ष्म है हमारा मन जो हमारे 10 इन्द्रियों को  नियन्त्रित करता है। और मन से भी सूक्ष्म है बुद्धि , इसलिए वह मन से परे है। और बुद्धिवृत्तियों को प्रकाशित करने वाला चैतन्य बुद्धि से भी सूक्ष्म होना ही चाहिये, बुद्धि से भी सूक्ष्म या परे तत्त्व है उसे ही अपरिवर्तनीय (अविनाशी) आत्मा कहते हैं। उपनिषदों में कहा गया है कि इस चैतन्यस्वरूप आत्मा "Real I " के परे और कुछ नहीं है

(शरीर रथ है , इन्द्रियाँ घोड़े हैं, मन लगाम है , बुद्धि सारथि है और आत्मा "Real I " रथी है !)

 एवम् बुद्धेः परम् बुद्ध्वा संस्तभ्य आत्मानम् आत्मना। 
 जहि शत्रुम् महाबाहो कामरूपम् दुरासदम्।। 

(गीता 3.43)

।।3.43।। इस प्रकार बुद्धि से परे आत्मा को जानकर आत्मा (शुद्ध बुद्धि) के द्वारा आत्मा (इस मूढ़ बुद्धि को स्थूल शरीर को ही मैं समझने वाली बुद्धि को ) को वश में करके, हे महाबाहो ! तुम इस दुर्जेय (दुरासदम्-hard to corner) कामरूप शत्रु को (ऐषणाओं को) मारो।।

इस श्लोक के साथ न केवल यह अध्याय समाप्त होता है किन्तु अर्जुन द्वारा मांगी गयी निश्चित सलाह भी इसमें दी गई है। कि केवल आत्मसाक्षात्कार के द्वारा ही हम आत्म-अज्ञान (अविद्या)  को नष्ट कर सकते हैं। इसलिए निष्कर्ष के रूप में श्रीकृष्ण इस पर बल देकर कहते हैं कि हमें आत्मज्ञान द्वारा काम-रूपी शत्रु का (3K में लिप्त मूढ़बुद्धि-सम्मोहित बुद्धि का) संहार करना चाहिए। जो व्यक्ति इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है वही नेता, ऋषि या पैगम्बर (ईश्वरीय पुरुष) कहलाता है। कठोपनिषद् में रथ और रथी के उदहारण से इसे अति सुंदर ढंग से समझाया गया है:

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। 

बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।। 

इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयां स्तेषु गोचरान्।

आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः।।
 
(कठोपनिषद्-1.3.3-4) 

आत्मा को रथी समझो और शरीर को रथ यानी रथरूपी शरीर में आत्मारूपी रथी विराजमान है। बुद्धि उस रथ की सारथी है और मन उसके लगाम हैं।  यानी बुद्धिरूपी सारथी मनरूपी लगाम से रथ को हांकता है। 
इन्द्रियाँ (ऑंख, कान, नाक, जिह्वा, त्वक् आदि) उस रथ के घोड़े हैं और इन इन्द्रियों के विषय (रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श आदि) उसके मार्ग हैं। शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धि से युक्त आत्मा रथी ( भोक्ता ) है। 
वैसे तो अपने सच्चिदानन्द स्वरूप में रथी (Real I) साक्षी आत्मा न कर्ता है न भोक्ता है, किन्तु M/F शरीर, (Apparent I) को ही वास्तविक मैं समझकर मूढ़बुद्धि या सम्मोहित मति के साथ अपना सम्बन्ध बना लेता है , और देह , मन-इन्द्रिय की लगाम उसी सम्मोहित मति के हाथ में थमा देता है।  (तो क्या होगा ? जैसी मति वैसी गति !) 
यदि नित्यानित्य -विवेक सम्पन्न बुद्धि रूपी सारथी द्वारा मनरूपी लगाम से इन्द्रिय रूपी घोड़ों को नियंत्रित न किया जाए और मन रूपी लगाम को ढीला छोड़ दिया जाए , तो घोड़े अपने-अपने विषयों की ओर अनियंत्रित दौड़ते रहेंगे और रथी कभी भी अपने लक्ष्य गंतव्य तक नहीं पहुंच सकेगा।  इसलिए शुद्ध-बुद्धि रूपी सारथी द्वारा मनरूपी लगाम को कसकर इन्द्रियरूपी घोड़ों को नियंत्रित किया जाता है।
यह उपनिषद् अवगत कराती है कि एक रथ है जिसे पांच घोड़े हाँक रहे हैं। उन घोड़ों के मुख में लगाम पड़ी है। यह लगाम रथ के सारथी के हाथ में है और रथ के पीछे आसन पर रथी (आत्मा) बैठा हुआ है। अब रथी को चाहिए कि वह सारथी को उचित निर्देश दे, जो लगाम को नियंत्रित कर घोड़ों को उचित दिशा की ओर जाने में मार्गदर्शन दे सके। यदि रथी सो जाता है ,अपने सत्य स्वरुप के प्रति जाग्रत नहीं रहता ? और मूढ़मति  या सम्मोहित बुद्धि के साथ अपना सम्बन्ध बना लेता है, तब घोड़े निरंकुश हो जाते हैं। 
 इस प्रकार आत्मा जब अविवेकी बुद्धि , मूढ़बुद्धि को उचित दिशा में चलने का निर्देश नहीं दे पाती। तब रथ को किस दिशा की ओर ले जाना है, इसका निर्धारण इन्द्रियाँ अपनी मनमानी के अनुसार करती हैं। आत्मा इन्द्रियों के सुखों का अनुभव (3K भोग द्वारा) परोक्ष रूप में करती है किन्तु ये इन्द्रियाँ उसे तृप्त नहीं कर पाती। इसी कारण से रथ के आसन पर बैठी आत्मा (रथी) इस भौतिक संसार में अनन्त काल से चक्कर लगा रही है।
    यदि आत्मा अपनी अंतर्निहित दिव्यता के बोध से जागृत हो जाती है और मूढ़बुद्धि से सम्बन्ध विच्छेद करके नित्यानित्य विवेक सम्पन्न बुद्धि के साथ अपना स्थायी सम्बन्ध बना लेने का निश्चय कर लेती है, तब वह सारथि रूपी शुद्ध बुद्धि देह रूपी रथ को उचित दिशा की ओर ले जा सकती है। तब फिर शुद्धबुद्धि अपने से निम्न मन और इन्द्रियों द्वारा शासित नहीं होगी और रथ आत्मिक उत्थान की दिशा में दौड़ने लगेगा। अतः आत्मा द्वारा इन्द्रियों, मन और बुद्धि को नियंत्रित करने का प्रयास करना चाहिए। 
 इसलिए बुद्धि को मन और इन्द्रिय रूपी घोड़ों से सम्बन्ध न बनाकर , आत्मा से सम्बन्ध जोड़ना चाहिए। और आत्मा, ब्रह्म 'शिवोहं' की अनुभूति करने के लिए, 'विवेकानन्द की बुद्धि'- (व्यक्ति नरेन्द्र Apparent I की बुद्धि नहीं सच्चिदानन्द अवस्था "Real I " की बुद्धि) को भी माता पार्वती की तरह (कन्याकुमारी में) तप करके शुद्ध-बुद्धि (आत्मनिष्ठ बुद्धि-सत्यनिष्ठ बुद्धि ?) बनना पड़ता है-

जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥
तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू॥3॥
भावार्थ-
मेरा तो करोड़ जन्मों तक यही हठ रहेगा कि या तो शिवजी को वरूँगी, नहीं तो कुमारी ही रहूँगी। स्वयं शिवजी (इष्टदेव) सौ बार कहें, तो भी नारदजी (गुरुदेव) के उपदेश को न छोड़ूँगी॥3॥

जैसे नचिकेता ने यमराज से कहा था - "मैं निर्धन रहना पसन्द करूँगा , मैं असुंदर रहना पसन्द करूँगा। मैं कोई भी पद पाए बिना रहने को तैयार हूँ पर मुझे आत्मा चाहिए ही चाहिए। मुझे आत्मा के रहस्य को समझना ही है।"  ऐसी दृढ़ जिज्ञासा हो , दृढ़ इच्छा हो, उसके बाद श्रवण किया जाये। 
      किन्तु जब तक स्थूल देह है, मन है , इन्द्रियां हैं , तो जागते ही फिर से मन आ जायेगा, इन्द्रियाँ आ जायेंगी। यह जगत दिखने लग जायेगा। फिर भी यदि एक बार विवेक-जाग्रत हो गया और 'बुद्धि' को यह बात समझ में आ गयी-"कि नश्वर देह (M/F शरीर, इन्द्रिय) कभी मेरा 'वर' नहीं हो सकते। मेरा वर तो अविनाशी आत्मा है !" इनको मुझे बरना ही नहीं है। ये हैं बहुत अच्छे। परन्तु ये मेरे नहीं हो सकते। इनको मैं -'मेरा' बनाऊँगी ही नहीं। इनके साथ मेरा रिश्ता टिकेगा ही नहीं। पहले ही मालूम हो जाये की ये लड़का या लड़की मंगली है। पहले ही मालूम हो जाये कि इसके साथ मेरा रिश्ता ही नहीं टिकेगा।  लड़की मंगली है तो लड़का गया। लड़का मंगला है , तो लड़की गयी। तो इनसे रिश्ता करने वाला ठीक-ठीक रहेगा न?
    लेकिन जिसका नित्यानित्य -विवेक इसी जीवन में एक बार जाग्रत नहीं हुआ , फलस्वरूप जिसकी बुद्धि ऐसी 'स्थित-प्रज्ञ ' नहीं हो सकी हो , और वे आजीवन अपनी बुद्धि को तीनों ऐषणाओं 3K विषय-भोगों में लगाए रखें , तो क्या वह 'मूढ़ बुद्धि' (देह-इन्द्रिय से सम्मोहितबुद्धि) कामिनी-कांचन के  भोग से कभी तृप्त हो सकेगी ? यदि विश्वास नहीं हो तो -करके देख लो। 

बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
सतसंगत मुद मंगल मूला। सोई फल सिधि सब साधन फूला॥
भावार्थ-
सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और श्री रामजी की कृपा के बिना वह सत्संग सहज में मिलता नहीं। सत्संगति ही आनंद (विवेकज-ज्ञान) और कल्याण की जड़ है। सत्संग की सिद्धि (नवनीदा का निकट-सनिध्य प्राप्ति) ही फल है और सब साधन तो फूल है॥बालकाण्ड॥  इसीलिए मीरा ने भी कहा था -'किसी भी परिवर्तनशील नश्वर देह को मैं अपना वर नहीं बनाऊँगी!'

ऐसे वर को क्या वरु,
जो जनमे और मर जाये,
वरीये गिरिधर लाल को,
चुड़लो अमर हो जाये ॥

आओ मेरी सखियो मुझे मेहँदी लगा दो,
मेहँदी लगा दो, मुझे सुन्दर सजा दो,
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ॥

सतसंग मे मेरी बात चलायी,
सतगुरु ने मेरी किनी सगाई,
उनको बोला के हथलेवा तो करा दो,
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ॥


ऐसी पहनी चूड़ी जो कबहू ना टूटे,
ऐसा वरु दूल्हा जो कबहू ना छूटे,
अटल सुहाग की बिंदिया लगा दो,
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ॥

भक्ति का सुरमा मैं आख मे लगाउंगी,
दुनिया से नाता तोड़ मैं उनकी हो जाउंगी,
सतगुरु को बुला के फेरे तो पडवा दो,
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ॥

बाँध के घुंघरू मै उनको रीझाऊंगी,
ले के इकतारा मै श्याम-श्याम गाऊँगी,
सतगुरु को बुला के बिदा तो करा दो,
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ॥

आओ मेरी सखियों मुझे मेहँदी लगा दो,
मेहँदी लगा दो, मुझे सुन्दर सजा दो,
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ॥

“ पुरुष माने (M/F नहीं) अपरिवर्तनीय, शाश्वत, अविनाशी आत्मा (Real I) एक अलग चेतन (conscious) अस्तित्त्व है और प्रकृति (Apparent I,M/F का नश्वर शरीर) एक पृथक जड़ (inert) अस्तित्व है । अज्ञान, (अविद्या, अस्मिता पंचक्लेश) के कारण दोनों विपरीत स्वभाव का संयोग हो जाता है ।
इस संयोग के कारण जो नित्य शुद्ध-बुद्ध और मुक्त स्वभाव का आत्मा, 'मन" के साथ (चित्त में उठने वाली वृत्तियों के साथ) मूढ़बुद्धि , सम्मोहित बुद्धि के साथ एकाकार होकर सुख-दुःख अनुभव करने लग जाता है।  और साथ ही अहंकार के कारण स्वयं को कर्ता और भोक्ता मानने लग जाता है । क्रोध, लोभ, काम और मोह की लहरें- (मूढ़ बुद्धि में नहीं)  मुझमें ही उठ रही हैं ऐसा दृढ़ता से मानने लग जाता है । यह सब कुछ विकार रहित आत्मा और विकारों से युक्त मूढ़बुद्धि प्रकृति के संयोग से हो रहा है । यदि इस संयोग का उच्छेदन करना हो तो उसका एक ही उपाय है – आत्मज्ञान की प्राप्ति ।
 आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए क्या उपाय किया जाये । इसी प्रश्न के उत्तर में महर्षि बताते हैं कि- जब यह ज्ञान कि प्रकृति (Apparent I,M/F का नश्वर शरीर) और पुरुष (Real I, अविनाशी आत्मा) दोनों अलग अलग हैं एकदम निश्चित हो जाता है। और आत्मा इस ज्ञान की प्रतीति को एक क्षण के लिए भी भूलता नहीं है अपितु इसमें ही उसकी बुद्धि बिना हिले डुले लगी रहती है तब यह ज्ञान दृढ हो जाता है । बुद्धि की ऐसी परिपक्व अवस्था को महर्षि पतंजलि ने “ विवेक ख्याति ” नाम दिया है । विवेक ख्याति (अर्थात आत्मज्ञान) को प्राप्त करना ही हान प्राप्ति का उपाय है ।

इसलिए स्वामी विवेकानन्द आत्मा के अज्ञान (अविद्या) के नाश का उपाय (हान) बताते हुए, 'साधनपाद- 26' की व्याख्या करते हुए कहते हैं -

विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥२६॥

 [पदच्छेद: विवेकख्याति: , अविप्लवा , हान , उपायः ॥

26. The means of destruction of ignorance is unbroken practice of discrimination.
This is the real goal of practice — discrimination between the real and the unreal, knowing that the Purusha is not nature, that it is neither matter nor mind, and that because it is not nature, it cannot possibly change. It is only nature which changes, combining and re-combining, dissolving continually. When through constant practice we begin to discriminate, ignorance will vanish, and the Purusha will begin to shine in its real nature — omniscient, omnipotent, omnipresent.
    निरन्तर विवेक का अभ्यास करते रहना ही अज्ञान (अविद्या) नाश का अविप्लवा (दोष रहित और निश्चित) उपाय है। 

⚜️️🔱सारे साधन का यथार्थ लक्ष्य है यह - 'नित्यानित्य विवेक', यह जानना कि पुरुष प्रकृति से भिन्न है। 
 This is the real goal of practice — discrimination between the real and the unreal, knowing that the Purusha is not nature,
नित्य-अनित्य विवेक : अर्थात यह जानना कि हमारे दो पहचान हैं , 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर:।हमारा जो वास्तविक मैं (Real I, सत्य-स्वरुप आत्मा , ब्रह्म) अविनाशी है, और प्रातिभासिक मैं (Apparent I M/F देह ) परिवर्तनशील, नश्वर होने से मिथ्या है , और जीव भी ब्रह्म ही है, दूसरा नहीं ! 
⚜️️🔱 विशेष रूप से यह जानना कि पुरुष पदार्थ और मन भी नहीं, और चूँकि वह प्रकृति भी नहीं है, इसलये उसका किसी प्रकार का परिणाम असम्भव है। 
 that it is neither matter nor mind, and that because it is not nature, it cannot possibly change.         
यह विशेष रूप से जानना कि आत्मा (Real I) पदार्थ (पंचभूत से बना नश्वर स्थूलदेह) भी नहीं है और मन (सूक्ष्मशरीर) भी नहीं, और चूँकि वह प्रकृति भी नहीं है (सम्मोहित बुद्धि से भी परे है), इसलिए उसका किसी प्रकार का परिणाम असम्भव है। (इसलिए यह जगत भी दूध से दही बन जाने जैसा आत्मा का परिणाम नहीं है -विवर्त है। मृगमरीचिका या रज्जु-सर्प भ्रम है।)  अतएव जो कुछ भी दिख रहा है - 'जिव, जगत और ईश्वर', तीनों एकमेवाद्वितीय आत्मा या ब्रह्म ही है !अर्थात ब्रह्मैव इदं सर्वं ! आत्मैव इदं सर्वं !
⚜️️🔱 परिवर्तन सदा केवल प्रकृति में ही हो रहा है, उसीका सदैव संश्लेषण-विश्लेषण हो रहा है।
It is only nature which changes, combining and re-combining, dissolving continually.
अर्थात परिवर्तन सदा केवल प्रकृति में हो रहा है , अतएव सृष्टि-स्थिति - प्रलय भी उसीका (M/F नश्वर शरीर में, नाम-रूप या लहर का) ही लगातार होता रहता है। (आत्मा बिना इन्द्रियों का ही  साक्षी बना रहता है !)
⚜️️🔱 जब निरंतर अभ्यास के द्वारा हम विवेक-लाभ करेंगे, तब अज्ञान चला जाएगा और पुरुष अपने स्वरुप में अर्थात सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी रूप में प्रतिष्ठित हो जायेगा।   
When through constant practice we begin to discriminate, ignorance will vanish, and the Purusha will begin to shine in its real nature — omniscient, omnipotent, omnipresent.  

अर्थात परिवर्तनीय 'Apparent I' and अपरिवर्तनीय साक्षी 'Real I', या नश्वर देह-मन और अविनाशी आत्मा में निरन्तर विवेक-प्रयोग का अभ्यास करते रहना,  '3H विकास के 5 अभ्यास ' करते रहनाही अविद्या को (3K में आसक्ति को) नष्ट करने का उपाय है। इसलिए महामण्डल आदर्शवाक्य -Be and Make ' विवेकी मनुष्य बनना और बनाना ही है। जब निरन्तर नित्य-अनित्य विवेक -प्रयोग के अभ्यास के द्वारा (साधनचतुष्टय के द्वारा) हम जब विवेकज ज्ञान लाभ करेंगे तब अज्ञान (अविद्या) चला जाएगा और आत्मा अपने 'सत्य- स्वरुप' में अर्थात सर्वज्ञ , सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी रूप ('Real I' विवेकानन्द अवस्था) में प्रतिष्ठित हो जायेगा।
 (पातंजल योगसूत्र : साधनपाद-25, 26 : राज-योग: वि.सा. खंड-१, पृष्ठ:१७३-१७४) 

तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥२७॥

27. His knowledge is of the sevenfold highest ground.

When this knowledge comes; it will come, as it were, in seven grades, one after the other; and when one of these begins, we know that we are getting knowledge. 

The first to appear will be that we have known what is to be known. The mind will cease to be dissatisfied. While we are aware of thirsting after knowledge, we begin to seek here and there, wherever we think we can get some truth, and failing to find it we become dissatisfied and seek in a fresh direction. All search is vain, until we begin to perceive that knowledge is within ourselves, that no one can help us, that we must help ourselves. 

When we begin to practise the power of discrimination, the first sign that we are getting near truth will be that that dissatisfied state will vanish. We shall feel quite sure that we have found the truth, and that it cannot be anything else but the truth. Then we may know that the sun is rising, that the morning is breaking for us, and taking courage, we must persevere until the goal is reached. 

The second grade will be the absence of all pains. It will be impossible for anything in the universe, external or internal, to give us pain.

 The third will be the attainment of full knowledge. Omniscience will be ours. 

The fourth will be the attainment of the end of all duty through discrimination. Next will come what is called freedom of the Chitta. We shall realise that all difficulties and struggles, all vacillations of the mind, have fallen down, just as a stone rolls from the mountain top into the valley and never comes up again. 
The next will be that the Chitta itself will realise that it melts away into its causes whenever we so desire. 

Lastly we shall find that we are established in our Self, that we have been alone throughout the universe, neither body nor mind was ever related, much less joined, to us. They were working their own way, and we, through ignorance, joined ourselves to them. But we have been alone, omnipotent, omnipresent, ever blessed; our own Self was so pure and perfect that we required none else. We required none else to make us happy, for we are happiness itself. We shall find that this knowledge does not depend on anything else; throughout the universe there can be nothing that will not become effulgent before our knowledge. This will be the last state, and the Yogi will become peaceful and calm, never to feel any more pain, never to be again deluded, never to be touched by misery. He will know he is ever blessed, ever perfect, almighty.

तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥२७॥

>उनके (आत्मज्ञानी के) विवेकज-ज्ञान के सात उच्चतम सोपान हैं।
[तस्य - उस (निर्मल विवेकख्याति वाले योगी) की, सप्तधा - सात प्रकार की, प्रान्तभूमि: - अन्तिम स्थिति वाली, प्रज्ञा - बुद्धि (होती है) ।] 
27. His knowledge is of the sevenfold highest ground.
 ⚜️️🔱 जब इस ज्ञान की प्राप्ति होती है, तब मानो वह एक के बाद एक करके सात स्तरों में आती है। और जब उनमें से एक अवस्था आरम्भ हो जाती है , तब हम निश्चित रूप से जान सकते हैं कि हमें अब (Oneness, ब्रह्म और शक्ति में अद्वैत है -ईश्वर ही जीव जगत बन गया है ?) ज्ञान की प्राप्ति हो रही है।
When this knowledge comes; it will come, as it were, in seven grades, one after the other; and when one of these begins, we know that we are getting knowledge. 
 ⚜️️🔱पहली अवस्था आने पर मन में ऐसा लगने लगेगा कि जो कुछ जानने का है , जान लिया। (we have known what is to be known.)  मन में तब किसी प्रकार का असन्तोष (Dissatisfaction) नहीं रह जायेगा।  जब तक हमारी ज्ञान-पिपासा बनी रहती है , तब तक हम इधर-उधर ज्ञान की खोज में लगे रहते हैं। जहाँ से भी कुछ सत्य मिलने की सम्भावना रहती है , झट वहीँ दौड़ जाते हैं। जब वहाँ उसकी प्राप्ति नहीं होती , तब मन अशांत हो जाता है। फिर अन्य दिशा में हम सत्य की खोज में भटकते फिरते हैं। जब तक हम यह अनुभव नहीं कर लेते कि समस्त ज्ञान हमारे अंदर है , जब तक यह दृढ़ धारणा नहीं हो जाती कि कोई हमें सत्य प्राप्ति करने में सहायता नहीं पहुँचा सकता , हमें स्वयं ही अपनेआप की सहायता करनी होगी, तबतक सारा सत्यान्वेषण (आत्मनुसन्धान-अयं आत्मा ब्रह्म !) की खोज ही व्यर्थ है
The first to appear will be that we have known what is to be known. The mind will cease to be dissatisfied. While we are aware of thirsting after knowledge, we begin to seek here and there, wherever we think we can get some truth, and failing to find it we become dissatisfied and seek in a fresh direction. All search is vainuntil we begin to perceive that knowledge is within ourselves, that no one can help us, that we must help ourselves

⚜️️🔱जब हम विवेक का अभ्यास आरम्भ करेंगे , (ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर: का ब्रह्मैव सर्वं इदं, आत्मवै सर्वं इदं देखने का अभ्यास आरम्भ करेंगे) तो हमारे सत्य (आत्मा-ईश्वर -भगवान) के नजदीक आ जाने का पहला चिन्ह यह प्रकाशित होगा कि वह पूर्वोक्त असन्तोष की अवस्था चली जाएगी। हमारी यह निश्चित धारणा हो जाएगी कि हमने सत्य को पा लिया है - और वह सत्य के सिवा (सच्चिदानन्द -विवेकानन्द के सिवा) और कुछ नहीं हो सकता। तब हम यह जान लेते हैं कि सत्यस्वरुप सूर्य (Real I) उदित हो रहा है , हमारी अज्ञान-रजनी पर प्रभात की लाली छा रही है। और तब, ह्रदय में आशा भरकर , जब तक लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता , तब तक हमें अध्यवसाय के साथ (अमृत मिलने तक) लगे रहना होगा
When we begin to practise the power of discrimination, the first sign that we are getting near truth will be that that dissatisfied state will vanish. We shall feel quite sure that we have found the truth, and that it cannot be anything else but the truth. Then we may know that the sun is rising, that the morning is breaking for us, and taking courage, we must persevere until the goal is reached. 

⚜️️🔱 दूसरी अवस्था में सारे दुःख चले जायेंगे। तब जगत का कोई बाहरी या भीतरी विषय हमें दुःख नहीं पहुँचा सकेगा।
The second grade will be the absence of all pains. It will be impossible for anything in the universe, external or internal, to give us pain.

⚜️️🔱 तीसरी अवस्था में हमें पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हो जाएगी। अर्थात हम सर्वज्ञ (Omniscient) हो जायेंगे। 
 The third will be the attainment of full knowledge. Omniscience will be ours. 
⚜️️🔱चौथी अवस्था में विवेक की सहायता से सारे कर्तव्यों का अंत हो जायेगा। उसके बाद चित्त-विमुक्ति की अवस्था (freedom of the Chitta) आएगी। तब हम समझ सकेंगे कि हमारी सारी विघ्न-बाधाएँ चली गयी हैं। जिस प्रकार किसी पर्वत के शिखर से एक चट्टान को नीचे लुढ़का देने पर वह फिर ऊपर नहीं जा सकता , उसी प्रकार , मन की चंचलता , मनःसंयम की असमर्थता  आदि सभी गिर जायेंगे, अर्थात नष्ट हो जायेंगे। 
The fourth will be the attainment of the end of all duty through discrimination. Next will come what is called freedom of the Chitta. We shall realise that all difficulties and struggles, all vacillations of the mind, have fallen down, just as a stone rolls from the mountain top into the valley and never comes up again. 

⚜️️🔱छठी अवस्था में चित्त समझ लेगा कि इच्छा मात्र से वह अपने कारण (शरीर ईश्वर या आत्मा) में लीन हो जा रहा है। 
(The next will be that the Chitta itself will realise that it melts away into its causes whenever we so desire. ) 
⚜️️🔱 अंत में हम देख पाएंगे कि हम अपने स्वस्वरूप में (Real I) में प्रतिष्ठित हैं , और इतने दिनों तक जगत में एकमात्र हमीं अवस्थित थे। मन या शरीर के साथ हमारा कोई सम्बन्ध नहीं था - उनके साथ युक्त होने की बात तो दूर ही रहे। वे अपना अपना काम कर रहे थे। और हमने अज्ञानवश अपनेआपको उनसे युक्त कर रखा था !!!??? 
पर हम तो सदा से अकेले ही रहे हैं। इस संसार में केवल हमीं सर्वशक्तिमान , सर्वव्यापी और सदानन्द -स्वरुप हैं।  हमारी अपनी आत्मा इतनी पवित्र और पूर्ण है कि हमें और किसी की आवश्यकता नहीं थी। हमें सुखी करने के लिए और कुछ भी आवश्यक नहीं था , क्योंकि हमीं सुखस्वरूप हैं। (We required none else to make us happy, for we are happiness itself. ) हम देख लेंगे कि ज्ञान किसीके ऊपर निर्भर नहीं रहता। जगत में ऐसा कुछ भी नहीं है , जो हमारे ज्ञानलोक से प्रकाशित न हो। यही योगी की अंतिम अवस्था है। तब योगी धीर और शांत हो जाते हैं , वे और कोई कष्ट अनुभव नहीं करते , वे फिर कभी अज्ञान-मोह से भ्रान्त नहीं होते , दुःख उन्हें छू नहीं सकता। वे जान लेते हैं कि मैं -' नित्यानन्दस्वरुप , नित्यपूर्णस्वरूप  और सर्वशक्तिमान हूँ !'
Lastly we shall find that we are established in our Self, that we have been alone throughout the universe, neither body nor mind was ever related, much less joined, to us. They were working their own way, and we, through ignorance, joined ourselves to them. But we have been alone, omnipotent, omnipresent, ever blessed; our own Self was so pure and perfect that we required none else. We required none else to make us happy, for we are happiness itself. We shall find that this knowledge does not depend on anything else; throughout the universe there can be nothing that will not become effulgent before our knowledge. This will be the last state, and the Yogi will become peaceful and calm, never to feel any more pain, never to be again deluded, never to be touched by misery. He will know he is ever blessed, ever perfect, almighty.

योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः ॥२८॥

28. By the practice of the different parts of Yoga the impurities being destroyed, knowledge becomes effulgent up to discrimination.

Now comes the practical knowledge. What we have just been speaking about is much higher. It is away above our heads, but it is the ideal. It is first necessary to obtain physical and mental control. Then the realization will become steady in that ideal. The ideal being known, what remains is to practice the method of reaching it.

योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः ॥२८॥

[पदच्छेद: योग , अङ्ग , अनुष्ठानात् , अशुद्धि: , क्षये , ज्ञान , दीप्ति: , आविवेकख्यातेः ॥
 योग (के), अङ्ग - (विभिन्न) अंगों का, अनुष्ठानात् - अनुष्ठान से, अशुद्धि: - अपवित्रता (के), क्षये - नाश होने पर, ज्ञान - ज्ञान (का), दीप्ति: - प्रकाश, अविवेकख्याते: - विवेकख्याति-पर्यन्त हो जाता है । 
अर्थात अष्टांग योग के विभिन्न अंगों का अनुष्ठान (गुरु-शिष्य वेदान्त शिक्षक-प्रशिक्षण परम्परा में प्रशिक्षित होकर यम-नियम का अभ्यास 24 X 7 और आसन-प्रत्याहार दो बार) करते रहने से जब मूढ़ बुद्धि या सम्मोहित बुद्धि अनित्य देह से सम्बन्ध तोड़ कर 'अशुद्धिः क्षये' अज्ञान (अविद्या) से मुक्त होकर, शुद्ध बुद्धि हो जाती है और अपना सम्बन्ध नित्य आत्मा (ईश्वर, ब्रह्म या भगवान) से जोड़ लेती है, तब वह शुद्धबुद्धि विवेकज-ज्ञान से प्रकशित होकर विवेकख्याति (ब्रह्मैव इदं सर्वं बोध) में प्रतिष्ठित हो जाती है।]       
 
योग के विभिन्न अंगों का अनुष्ठान करते करते जब अपवित्रता का नाश हो जाता है (देहभाव दहोहं का नाश हो जाता है), तब ज्ञान (शिवोहं) प्रदीप्त हो उठता है ; उसकी अंतिम सीमा है विवेक-ख्याति। 
अब साधन की बात कही जा रही है। अभी तक जो कुछ कहा गया , वह अपेक्षाकृत उच्चतर है। वह अवस्था अभी हमसे बहुत दूर है ; किन्तु वही हमारा आदर्श है , हमारा एकमात्र लक्ष्य है। उस लक्ष्य स्थल पर पहुँचने के लिए पहले शरीर और मन को संयत करना आवश्यक है। तभी उस आदर्श में हमारी अनुभूति स्थायी हो सकेगी। हमारा लक्ष्य क्या है , यह हमने जान लिया है, अब उसे प्राप्त करने के लिए साधन आवश्यक है। 
It is away above our heads, but it is the ideal. It is first necessary to obtain physical and mental control. Then the realization will become steady in that ideal. The ideal being known, what remains is to practice the method of reaching it.

यम-नियमासन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा-ध्यान-समाधयोऽष्टावङ्गानि ॥२९॥
29.  यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि; ये आठ योग के अंग हैं ।
Yama, Niyama, Âsana, Prânâyâama, Pratyâhâra, Dhâranâ, Dhyâna, and Samâdhi are the eight limbs of Yoga.

अहिंसा-सत्यास्तेय-ब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥३०॥
30. Non-killing, truthfulness, non-stealing, continence, and nor-receiving are called Yamas.
एते जाति-देश-काल-समयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ॥३१॥
31. These, unbroken by time, place, purpose, and caste-rules, are (universal) great vows.
उक्त यम जाति, देश, काल और विशेष नियम की सीमा से रहित और सब अवस्थाओं में पालन करने योग्य महाव्रत कहलाते हैं ।
कैसी भी स्थिति या परिस्थिति हो साधक को इन पांच यमों को नहीं छोड़ना चाहिए । अन्य सभी अनुष्ठान तो व्रत हैं लेकिन ये अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह तो सार्वभौम महाव्रत हैं अर्थात कभी भी छोड़ने योग्य नहीं है ।
These practices — non-killing, truthfulness, non-stealing, chastity, and non-receiving — are to be practised by every man, woman, and child; by every soul, irrespective of nation, country, or position.

शौच-सन्तोष-तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥३२॥
32. Internal and external purification, contentment, mortification, study, and worship of God are the Niyamas.
वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ॥३३॥
33. To obstruct thoughts which are inimical to Yoga, contrary thoughts should be brought.
वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ॥३४॥
34. The obstructions to Yoga are killing, falsehood, etc., whether committed, caused, or approved; either through avarice, or anger, or ignorance; whether slight, middling, or great; and they result in infinite ignorance and misery. This is (the method of) thinking the contrary.
अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥३५॥
35. Non-killing being established, in his presence all enmities cease (in others).
सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ॥३६॥
36. By the establishment of truthfulness the Yogi gets the power of attaining for himself and others the fruits of work without the works.
अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ॥३७॥
37. By the establishment of non-stealing all wealth comes to the Yogi.
ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ॥३८॥
38. By the establishment of continence energy is gained.
अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः ॥३९॥
39. When he is fixed in non-receiving, he gets the memory of past life.
शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥४०॥
40. Internal and external cleanliness being established, there arises disgust for one's own body, and non-intercourse with others.
सत्त्वशुद्धि-सौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शन-योग्यत्वानि च ॥४१॥
41. There also arises purification of the Sattva, cheerfulness of the mind, concentration, conquest of the organs, and fitness for the realisation of the Self.
सन्तोषादनुत्तमः सुखलाभः ॥४२॥
42. From contentment comes superlative happiness.
कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ॥४३॥
43. The result of mortification is bringing powers to the organs and the body, by destroying the impurity.
स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः ॥४४॥
44. By the repetition of the Mantra comes the realisation of the intended deity.
समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥४५॥
45. By sacrificing all to Ishvara comes Samadhi.
स्थिरसुखमासनम् ॥४६॥
46. Posture is that which is firm and pleasant.
प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥४७॥
47. By lessening the natural tendency (for restlessness) and meditating on the unlimited, posture becomes firm and pleasant.
ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥४८॥
48. Seat being conquered, the dualities do not obstruct.
तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥४९॥
49. Controlling the motion of the exhalation and the inhalation follows after this.
बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिः देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्षमः ॥५०॥
50. Its modifications are either external or internal, or motionless, regulated by place, time, and number, either long or short.
बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥५१॥
51. The fourth is restraining the Prana by reflecting on external or internal object.
ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥५२॥
52. From that, the covering to the light of the Chitta is attenuated.
धारणासु च योग्यता मनसः ॥५३॥
53. The mind becomes fit for Dharana.
स्वस्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ॥५४॥
54. The drawing in of the organs is by their giving up their own objects and taking the form of the mind-stuff, as it were.
ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ॥५५॥
55. Thence arises supreme control of the organs.
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⚜️️🔱 धर्म और परमेश्वर के प्रति उत्कट श्रद्धा रहनी चाहिए⚜️️🔱 

   हमारे उपनिषदों का 'आत्म -अनुसन्धान महावाक्य' है- 'अयं आत्मा ब्रह्म !' उसीको अंग्रेजी में अनुवाद करके स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - 
आत्मा अविद्या के कारण (त्रिगुणात्मिका माया नामक परमेश शक्ति =अविद्या , अस्मिता , राग-द्वेष, अभिनिवेश -पंचक्लेश के साथ) संयुक्त हो गयी है। अतएव इस प्रकृति (मोह, आसक्ति, स्वार्थपरता) के पंजे से छुटकारा पाना ही हमारा (नित्य-अनित्य विवेकी मनुष्य के जीवन का) उद्देश्य है। यही सारे धर्मों /या शिक्षा का एकमात्र लक्ष्य है।
प्राचीन युग के सर्वश्रेष्ठ अद्वैताचार्य  आदिगुरु शंकराचार्यजी ने भी  आधुनिक युग के सर्वश्रेष्ठ अद्वैताचार्य स्वामी विवेकानन्द की तरह समस्त वैदिक ग्रंथों , शास्त्रों , उपनिषदों में वर्णित उपदेशों का निचोड़ देते हुए कहा था -  
श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रंथ कोटिभ: ।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर: ।
अर्थात जो अनेक ग्रंथों में लिखा है । उसे मैं आधे श्लोक में यहां कह रहा हूं - ब्रह्म सत्य है । जगत मिथ्या है । तथा जीव ब्रह्म ही है । कोई अन्य नहीं । "
 इस इन्द्रियगोचर या दृश्यमान जगत में सत्य क्या है ? मिथ्या क्या है ? तथा जीव (M/F) और ब्रह्म ( आत्मा , ईश्वर, भगवान) में परस्पर गूढ़ संबंध है । इस सम्पूर्ण सृष्टि में ब्रह्म (आत्मा, ईश्वर या भगवान) अनुस्यूत है। इसलिए हमलोग कहते हैं, 'कण-कण में भगवान। ' या कंकड़-कंकड़ में शंकर' ! क्योंकि हमारे उपनिषदों के ऋषियों ने सृष्टि के (M/F नाम-रूप के )  अधिष्ठान को ही आत्मा (ईश्वर, ब्रह्म या भगवान) कहा है। इसीलिए सृष्टि का अधिष्ठान ही ब्रह्म नाम से श्रुतियों द्वारा प्रतिपादित है । जो था । जो है । और जो सदैव रहेगा । वही तो - ब्रह्म है । " सत्य नाम " (अपरिवर्तनीय -अविनाशी) से ऋषियों मनीषियों द्वारा वही कहा जाता है । यहां मिथ्या शब्द " असत " से भिन्न है ! मिथ्या शब्द यहां प्रतीति होने वाली वस्तु सत्य सी लगती है । जबकि वह प्रतीति क्षण में नहीं । यही मिथ्यात्व है। इसमें संस्कारों तथा उसके परिणाम स्वरूप स्मृति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है । संसार के अस्तित्व को स्वीकार करने पर ही जीव है । संसार की संसार के नाम-रूप में प्रतीति के नष्ट होते ही " जीव " का अस्तित्व समाप्त हो जाता है । यह ऐसे ही है । जैसे जागने पर " स्वप्नकाल के द्रष्टा " और " दृश्य " का को लोप हो जाता है । वस्तुत: अन्तर्निहित दिव्यता के साथ यह 'एकत्व और अद्वैत ' ही परमार्थ है । सत्य का अर्थ है, त्रिकाल -अबाधित ! जिसका तीनों कालों में 'बाध' नहीं होता । अर्थात जो था । जो है । और जो रहेगा । इस दृष्टि से जगत ब्रह्म-सापेक्ष है । ब्रह्म को जगत के होने या न होने से कोई अंतर नहीं पड़ता । जिस प्रकार आभूषण के न रहने पर भी स्वर्ण की सत्ता निरपेक्ष भाव से रहती है । या 'घड़े' के न रहने से भी मिट्टी की सत्ता निरपेक्ष भाव से रहती है। उसी प्रकार सृष्टि से पूर्व भी 'सत्य' (आत्मा, ब्रह्म, ईश्वर या भगवान)  था । दूसरे शब्दों में ब्रह्म का अस्तित्व सदैव रहता है । श्रुति का वचन है - सदेव सोम्येदग्रमासीत, अर्थात - हे सौम्य ! सृष्टि से पूर्व सत्य ही था । सृष्टि का उपादान कारण और निमित्त कारण ब्रह्म या ईश्वर ही है। आदिगुरु शंकराचार्यजी द्वारा प्रतिपादित अद्वैत वेदान्त के अनुसार इस संपूर्ण जगत में जो कुछ भी इंद्रियों द्वारा गृहीत है । अर्थात जो कुछ भी दिखाई, सुनाई, सुंघाई या स्पर्श आदि में आता है । वह सब मात्र ब्रह्म (आत्मा, ईश्वर , भगवान, परमात्मा) ही है । इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं । जिस प्रकार मिट्टी से निर्मित पात्रों का अलग अलग  नाम रूप होने के पश्चात भी मूल रूप मिट्टी ही होती है । इसी प्रकार जो भी जड़ अथवा चेतन तत्व विभिन्न नाम-रूप से ज्ञात होते हैं । वे मूल रूप से ब्रह्म (परमेश शक्ति E=Mc2) ही हैं ।

"अद्वैतवाद का प्रचार साधारण लोगों में कभी होने नहीं दिया गया। संन्यासी लोग ही अरण्य (जंगलों) में उसकी साधना करते थे , इसी कारण वेदान्त का एक नाम 'आरण्यक' ("Forest Philosophy") भी हो गया। अन्त में भगवान की कृपा से बुद्धदेव ने आकर जब सर्वसाधारण के बीच इसका प्रचार किया , तब सारा देश बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गया। फिर बहुत समय बाद नास्तिकों (atheists-ईश्वर को न मानने वाले) और अज्ञेयवादियों (agnostics) ने जब सारे देश को ध्वंश करने की चेष्टा की, तब उस भौतिकवाद से भारत की रक्षा करने में पुनः एक बार अद्वैतवाद ही एकमात्र उपाय सिद्ध हुआ। इस प्रकार अद्वैत ने  दो बार भौतिवाद से भारत की रक्षाकी है।"  - स्वामी विवेकानन्द  ('ब्रह्म एवं जगत' : वि ० सा० /खंड-२./पृष्ठ- ९३)

  " This Advaita was never allowed to come to the people. At first some monks got hold of it and took it to the forests, and so it came to be called the "Forest Philosophy". By the mercy of the Lord, the Buddha came and preached it to the masses, and the whole nation became Buddhists. Long after that, when atheists and agnostics had destroyed the nation again, it was found out that Advaita was the only way to save India from materialism. Thus has Advaita twice saved India from materialism ! " -Swami Vivekananda : (The Absolute and Manifestation/ Volume-2/Jnana-Yoga/page -138)  

[अद्वैत #स्वामी विवेकानन्द जर्मिनी की कील शहर के यूनिवर्सिटी के संस्कृत प्रोफेसर पॉल डॉयसन के निमंत्रण पर सेवियर दम्पति के साथ नाश्ते के लिए उनके घर गए थे। प्रोफेसर ने अद्वैत वेदान्त पर स्वरचित एक ग्रन्थ- से कुछ अंश पढ़कर स्वामी जी को सुनाने लगे। प्रोफेसर ने कहा - " अद्वैत वेदान्त की मधुर मोहिनी -शक्ति क्षणभर में ही बाह्य जगत को भुला देती है। उसका अध्यन प्रारम्भ करते ही मन एक उच्चतम आध्यात्मिक भवराज्य में चला जाता है।  मनुष्य के मस्तिष्क ने सत्य (परम् सत्य) की खोज में रत होकर जिन सब विषयों का आविष्कार किया है , उसमें अद्वैत दर्शन और शांकरभाष्य सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। मेरी राय में अद्वैत (वेदान्त) केवल सूक्ष्म दर्शन ही नहीं है, बल्कि यह पूर्णतः नैतिक जीवन व्यतीत करने का प्रेरणाश्रोत है। " And so the Vedanta in its unfalsified form is the strongest support of pure morality, is the greatest consolation in the suffering of life and death. Indians ! Keep to it .और इसलिए अद्वैत वेदान्त अपने अविकृत रूप में , उच्चतम नैतिकता (pure morality) की सुदृढ़ नींव है, और जीवन में आने वाली  दुःख-कष्टों का (उतार-चढ़ाव का) साहस से सामना करने और मृत्यु-भय से मुक्ति के लिए सबसे बड़ा आश्वासन है ! हे भारतवासियो! इसे कभी न छोड़ना ! [ विवेकानन्द चरित:5 /आचार्य विवेकानन्द/174 -175) 

["युवा समस्या और स्वामी विवेकानन्द का मार्गदर्शन " (যুব সমস্যা ও স্বামী বিবেকানন্দ) 'ओजस ही मनुष्य का सच्चा मनुष्यत्व है !' [ SVHS- 3.4 स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना : खण्ड 3 -स्वामी विवेकानन्द और युवा समाज ]#युवाओं द्वारा पैदा की गई समस्या:  "Problems created by youth एवं  C-IN-C दादा का उपदेश ": सबको बताओ धर्म क्या है ? श्रद्धा क्या है ? नित्य-अनित्य विवेक-और बुद्धि में क्या अन्तर है ? पशुता से मनुष्यत्व , और मनुष्यत्व से देवत्व में कैसे उन्नत हुआ जाता है ? दादा (नवनी दा) युवाओं द्वारा पैदा की गई समस्याओं की ओर, यथा सीटी बजाना, हल्ला करना, तोड़फोड़ करना, रेल-बस का सीट फाड़ना, कुर्ता-फाड़ होली में भांग खाना आदि पर दृष्टिपात करने की जरुरत भी नहीं समझते थे। ]

>>>प्रश्न - आपने जिस अद्वैत-अवस्था के बारे में कहा है, वह क्या केवल आदर्श है, अथवा उसे लोग प्राप्त भी करते है ?

' यदि वह केवल थोथी बात हो, तब तो उसका कुछ भी मूल्य नहीं।  हम जानते हैं कि यह अवस्था ऋषि-मुनियों को उपलब्ध हुई थी, और उसी पद्धति से अनुसरण करने वाले सत्यार्थी को आज भी होती है। उस इन्द्रियातीत सत्य कि उपलब्धी करने के लिये वेदों में तीन उपाय बतलाये गये है- श्रवण, मनन और निदिध्यासन।  इस आत्म-तत्व के विषय में पहले श्रवण करना होगा।  श्रवण करने के बाद इस विषय पर विचार करना होगा- आँखें मूंदकर विश्वास न कर, अच्छी तरह तर्क की कसौटी पर कस कर, समझ-बूझकर उस पर विश्वास करना होगा।  इस प्रकार आपने सत्य-स्वरुप पर विचार करके उसके निरन्तर ध्यान में नियुक्त होना होगा, तब ( मृत्यु का सामना करते ही ) उसका साक्षात्कार होगा।  यह प्रत्यक्षानुभूति ही यथार्थ धर्म है।  केवल किसी मतवाद को स्वीकार कर लेना धर्म नहीं है।  हम तो कहते हैं यह समाधी या ज्ञानातीत अवस्था ही धर्म है ! ' (10 /387)

प्रश्न- उस इन्द्रियातीत सत्य को जानने की विशेष शिक्षा पद्धति कौन सी है?
 हमारे शास्त्रों में दो प्रणालियाँ कही गयी है- एक अस्ति-भाव द्योतक या प्रवृत्ति मार्ग है और दूसरी नास्ति-भाव द्योतक या निवृत्ति मार्ग है। प्रथमोक्त मार्ग से सारा विश्व चलता है- गृहस्थ लोग इसी पथ से प्रेम के द्वारा उस पूर्ण वस्तु को पाने का प्रयत्न कर रहे हैं, यदि इस प्रेम की परिधि को अनन्त गुनी बढ़ा ड़ी जाय, हम उसी विश्व-प्रेम में पहुँच जायेंगे। दुसरे पथ में 'नेति', 'नेति' अर्थात 'यह नहीं, यह नहीं' इस प्रकार की साधना करनी पडती है। इस साधना में चित्त की जो कोई तरंग (गाली या अपमान सूचक शब्द) मन को बहिर्मुखी बनाने की चेष्टा करती है, उसका निवारण करना पड़ता है। अंत में मन 
ही मानो मर जाता है, (अर्थात व्यष्टि अहम सर्वगत अहं में रूपांतरित हो जाता है), तब सत्य स्वयं प्रकाशित हो जाता है। हम इसी को आत्मसाक्षात्कार, समाधि या इन्द्रियातीत अवस्था या पूर्ण ज्ञानावस्था कहते हैं। यह अवस्था विषय (ज्ञेय-ठाकुर ) को विषयी (ज्ञाता -अहम) में लीन कर देने से प्राप्त होती है। वास्तव में यह जगत विलीन हो जाता है, केवल ' मैं ' रह जाता है- एकमात्र ' मैं ' ही वर्तमान रहता है. ' (10/384 ) 

श्रीमद्भगवत गीता में वर्णित अपने उस सत्य स्वरूप (Real I) आत्मा (ईश्वर, भगवान या ब्रह्म) को जानने के इन दोनों मार्गों का वर्णन करते हुए आदिगुरु शंकराचार्यजी अपने गीता भाष्य के प्रारम्भ में (श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्यम् ॥ उपोद्घातः ॥) ही कहते हैं -     

नारायणः परोऽव्यक्तात् अण्डमव्यक्तसम्भवम् ।

अण्डस्यान्तस्त्विमे लोकाः सप्तद्वीपा च मेदिनी ॥

अव्यक्त से अर्थात माया से श्री नारायण या आदिपुरुष सर्वथा अतीत है , (इन्द्रियतीत सत्य-अस्पष्ट) है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अव्यक्त प्रकृति से उत्पन्न हुआ है। ये भूः , भुवः , स्वः आदि सभी लोक और सात द्वीपों वाली पृथ्वी ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत ही है।  

सः भगवान् सृष्ट्वा-इदं जगत्, तस्य च स्थितिं चिकीर्षुः,

मरीचि-आदीन्-अग्रे सृष्ट्वा प्रजापतीन्, प्रवृत्ति-लक्षणं धर्मं

ग्राहयामास वेद-उक्तम् । 

इस जगत को रचकर इसका पालन करने की इच्छा वाले उस भगवान ने पहले मरीचि आदि प्रजापतियों को रचकर उसको वेदोक्त प्रवृत्ति रूप धर्म (कर्मयोग) ग्रहण करवाया।  

                         ततः अन्याण् च सनक-सनन्दन-आदीन् उत्पाद्य,

निवृत्ति-लक्षणं धर्मं ज्ञान-वैराग्य-लक्षणं ग्राहयामास । 

फिर उनसे अलग सनक , सनन्दन , सनातन आदि ऋषियों को उत्पन्न करके उनको ज्ञान और वैराग्य जिसके लक्षण हैं , ऐसे निवृत्ति रूप धर्म (ज्ञानयोग) ग्रहण करवाए।  

द्विविधः हि वेदोक्तः धर्मः, प्रवृत्ति-लक्षणः निवृत्ति-लक्षणः च ।

इस प्रकार वेदोक्त धर्म दो प्रकार का है - एक प्रवृत्ति रूप है, दूसरा निवृत्ति रूप है।  

 जगतः स्थिति-कारणं , प्राणिनां साक्षात्-अभ्युदय-निःश्रेयस-हेतुः

यः सः धर्मः ब्राह्मणाद्यैः वर्णिभिः आश्रमिभिः च श्रेयोर्थिभिः

अनुष्ठीयमानः ।

जो जगत की स्थिति का कारण , तथा प्राणियों की उन्नति का और मोक्ष का साक्षात् हेतु है। एवं कल्याणकामी ब्राह्मण आदि वर्णाश्रम अवलम्बियों द्वारा जिसका अनुष्ठान किया जाता है उसका नाम धर्म है। 

[द्विविधः हि वेदोक्तः धर्मः, प्रवृत्ति-लक्षणः निवृत्ति-लक्षणः च  जगतः स्थिति-कारणं , प्राणिनां साक्षात्-अभ्युदय-निःश्रेयस-हेतुः यः सः धर्मः ब्राह्मणाद्यैः वर्णिभिः आश्रमिभिः च श्रेयोर्थिभिः -अनुष्ठीयमानः। https://sanskritdocuments.org/doc_giitaa/gItAshAMkarabhAShya.html)]

>> 'मृत्युंजयी- श्रद्धा '   स्वामी जी 'मृत्युंजयी- श्रद्धा '  का अद्भुत उदाहरण, 'कमल और सूर्य'-से प्रस्तुत करते हुए कहते हैं - 'मृत्यु की समस्या का ही समाधान' -सर्वप्रथम भारत के ऋषि -मुनियों ने ही  आविष्कृत कर दिखाया था। प्राचीन युग के हमारे पूर्वज ऋषियों के मन में विचार उठा - वे जिन्होंने मेरे बचपन में मुझे पाल-पोस कर बड़ा किया, जिन्होंने  जीवनभर केवल मेरे लिये सबकुछ किया- मेरे माता-पिता; वे भी चले गये- कहाँ ? हर कोई, हर चीज चली गयी, जा रही है, और चली जायेगी। वे कहाँ चले जाते हैं ? प्रातः कालीन सूर्य जगत के लिये प्रकाश, ताप और हर्ष लाता है। वह मन्द गति से यात्रा करता है, शाम को नीचे गहराई में विलुप्त हो जाता है।  किन्तु कमल के अद्भुत पुष्प की श्रद्धा को देखो ! उसे दृढ़ -विश्वास है, उसमें आस्तिक्य-बुद्धि है कि यही सूर्य अगले दीन पुनः प्रकट होगा !  उतना ही गरिमामय, और सुन्दर ! और दूसरे दिन सुबह, जब सूर्य की किरणें उसकी बन्द पंखुड़ीयों को स्पर्श करती हैं, तो वह प्रस्फुटित हो जाता है, खुल जाता है और सूर्य ढलने पर पुनः बन्द हो जाता है। तात्पर्य  यह निकला गया कि जो लोग आते, और चले जाते हैं उनका पुनर्जन्म होता है यह पहला समाधान था। और इसीलिए सूर्य तथा कमल धर्म के प्रथम प्रतीक हुए। 'मृत्युंजयी- श्रद्धा '  का अद्भुत उदाहरण है - 'कमल और सूर्य'! 
         श्रद्धावान मनुष्य (हमारे पूर्वज ऋषियों) के मन में पुनः प्रश्न उठा - 'रात्री में भी चाँद-तारे अपना प्रकाश फैलाते रहते हैं, तब वे जिनसे मैं स्नेह करता हूँ, कहाँ चले जाते हैं? निश्चय ही नीचे तमसाच्छन्न स्थान को नहीं, वरन ऊपर, शाश्वत प्रकाश के राज्य में। ' यहाँ श्रद्धा के नये प्रतीक अग्नि हैंजो अपनी ज्वालाओं की अद्भुत भास्वर जिह्वाओं से युक्त है- पूरे वन को अल्प समय में खा सकते हैं, भोजन पकाने वाली, गर्मी देने वाली, और वन्य पशुओं को दूर भगा देने वाली अग्नि की ज्वाला- यह प्राण दायक, प्राणरक्षक अग्नि और उसकी लपटें - जो सब की सब ऊपर जाती हैं, नीचे कभी नहीं। यह अग्नि ही है जो उन्हें ज्योति के स्थलों में ऊपर ले जाने वाली है।
    आपके (मने युवाओं के) सामने है जनसमुदाय को उसका अधिकार देने की समस्या। आपके पास संसार का महानतम धर्म (चार महावाक्य) है, और आप जनसमुदाय को (गीता, उपनिषद)  सुनाने के बजाय सारहीन और निरर्थक बातों पर पालते हैं। आपके पास वेद-उपनिषद का चिरन्तन बहता हुआ स्रोत है, और आप उन्हें गन्दी नाली का पानी पिलाते हैं। विश्वास कीजिये की आत्मा अमर है, अनंत है और सर्वशक्तिमान है। मैं शिक्षा को गुरु (परमहंस) के साथ सम्पर्क -'गुरुगृह वास'- (कैम्प का प्रशिक्षण) समझता हूँ। गुरु  के व्यक्तिगत जीवन के अभाव में शिक्षा नहीं हो सकती। अपने विश्वविद्यालयों को लीजिये। उन्होंने एक भी मौलिक व्यक्ति पैदा नहीं किया। वे केवल परीक्षा लेने की संस्थायें हैं। सबके कल्याण के लिये अपने जीवन को न्योछावर कर देने की भावना का अभी हमारे राष्ट्र में विकास नहीं हुआ है।(4/261-62)]

"जिनके पास आँखें हैं, वे जानते हैं कि हमारा इतिहास कितना उज्जवल है, और वह देश को किस प्रकार जीवित रख रहा है...पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव से हमारे युवकों की बदली हुई विचारधारा और डगमग आत्मविश्वास को ध्यान में रख कर, आज उस गौरवमय  इतिहास को फिर से लिखना होगा, जिससे पाश्चात्य सभ्यता से चकित और चकाचौंध में भ्रमित हमारे युवक अपने अतीत पर गर्व करना सीखें ...हमें गुरुगृह-वास और उस जैसी अन्य शिक्षा प्रणालियों ( ३ दिवसीय, ६ दिवसीय युवा प्रशिक्षण शिविर ) को पुनः जीवित करना होगा. आज हमें आवश्यकता है वेदान्त युक्त पाश्चात्य विज्ञान की, ब्रहचर्य के आदर्श, और ' श्रद्धा '-जन्य अद्भुत आत्मविश्वास की. ..वेदान्त का सिद्धान्त है कि मनुष्य के ह्रदय में ज्ञान का समस्त भण्डार निहित है- एक अबोध शिशु में भी- केवल उसको जाग्रत कर देने की आवश्यकता है, और यही आचार्य का कार्य है.' 
आचार्यों में यह सामर्थ्य रहना चाहिए कि वह अपने शिष्यों को देश-कालातीत सत्य के बारे में इस प्रकार कह सके -  " मन और बाह्य प्रकृति की प्रत्येक वस्तु ( नाम-रूप ) देश-काल में हैं और कार्य-कारण के नियम से बँधे हैं. आत्मा सब देश, सब काल, सब कार्य-कारणों से परे है. जो बँधी है, वह प्रकृति है, आत्मा नहीं| ..तुम आत्मा हो, मुक्त और शाश्वत, चिर मुक्त, चिर पवित्र. केवल पर्याप्त श्रद्धा रखो और क्षण भर में तुम मुक्त हो जाओगे. इसलिए अपनी मुक्ति घोषित करो और जो हो, वह बनो !! - सदा मुक्त, सदा पवित्र !. देश, काल, कार्य-कारण को हम माया कहते हैं '. ( 10/25-26) 
[आज इस प्रकार की शिक्षा देने में समर्थ योग्य शिक्षकों (लीडर्स ) को प्रशिक्षित करना सबसे बड़ी चुनौती है, जिससे हजारो सिंगी जैसे गृहस्थ युवाओं को प्रशिक्षित किया जा सके। 
 यौवन ऊर्जा को राष्ट्रीय चरित्र-निर्माण में नियोजित करने से मनुष्य जीवन सार्थक होता है।  युवा-समस्या का समाधान वैक्तिक प्रचेष्टा (3H विकास के 5 अभ्यास ) पर निर्भर है ! [भावी नेता में इस निबन्ध के सार को उन्मेषित करना ही नेता-वरिष्ठ (C-IN-C) सिंह-द्वय का धर्म है ! It is the duty of  "C-IN-C " (नवनीदा Be and Make लीडरशिप ट्रेनिंग में प्रशिक्षित to teach the essence of this essay (5 practices of 3H development! ) to the would-be leader]"Human life becomes meaningful by employing youthful energy in national character building. The solution to youth problems depends on individual efforts .) "
 তারুণ্যের শক্তিকে জাতীয় চরিত্র গঠনে কাজে লাগিয়ে মানব জীবন সার্থক হয়। যুবকদের সমস্যার সমাধান ব্যক্তিগত প্রচেষ্টার  (3H বিকাশের 5 অনুশীলন!) উপর নির্ভর করে। ]  

स्वामीजी कहते थे ' थोड़ी धूम-धाम हुए बिना भगवान श्रीरामकृष्ण के नाम से लोग परिचित कैसे होंगे ? और उनसे प्रेरित कैसे होंगे ? ..अब लोग उन्हें क्रमशः जानेंगे, तभी तो देश का मंगल होगा। जो देश के मंगल के लिये ही, आविर्भूत हुए हैं, उनको जाने बिना देश का कल्याण किस प्रकार होगा ? उनको (श्रीरामकृष्ण को)   ठीक ठीक जान लेने से - ' मनुष्य ' तैयार होंगे. और ' मनुष्य ' यदि तैयार हो गये, तो दुर्भिक्ष आदि को दूर करना फिर कितनी देर की बात है ? ' ( ८/२५१)] 
     " जिस प्रकार लडकों को 30 वर्ष की उम्र तक ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर सत्य को जानने के विज्ञान की तकनीक या कौशल सीखना होगा, उसी तरह लड़कियों को भी यह तकनीक  सीखनी होगी। किन्तु प्रश्नकर्ता  ने फिर पुछा- ' पर आज की विश्वविद्यालय की शिक्षा में क्या दोष है? ' वेदान्त - ' वेद ' शब्द से बना है, और वेद का अर्थ है ज्ञान। समस्त ज्ञान वेद है और ईश्वर की भाँति अनन्त है। कोई व्यक्ति ज्ञान की कभी सृष्टि नहीं करता। क्या तुमने कभी ज्ञान का सृजन होते देखा है ? ज्ञान का अन्वेषण मात्र होता है- आवृत (सत्य) का अनावरण (उद्घाटन ) होता है। ज्ञान सदा यहीं सामने है, क्योंकि वह स्वयं ईश्वर है. अतीत, वर्तमान, अनागत इन तीनों का ज्ञान हम सब में विद्यमान है। हम उसका अनुसन्धान मात्र करते हैं और कुछ नहीं। ' (9/90)]
सत्य (आत्मा) का ज्ञान पहले स्वयं को होना चाहिये, और उसके बाद उसे तुम अनेक को सिखा सकते हो, बल्कि वे लोग स्वयं उसे सीखने आयेंगे।.... मैंने यह प्रत्यक्ष अनुभव कर लिया कि धर्म भी दूसरे को 'दिया' जा सकता है, केवल एक ही स्पर्श तथा एक ही दृष्टि में -(त्वं प्रत्यक्षम ब्रह्माSसि कहते हुए) सारा जीवन बदला जा सकता है। " (मेरे गुरुदेव 7 /258 -60)] 
[इसीलिए स्वामीजी का विचार था कि "..बाल्यावस्था से ही जाज्वल्यमान, उज्ज्वल चरित्र युक्त किसी तपस्वी महापुरुष (नवनीदा) के सहवास में रहना चाहिए, जिससे उच्चतम ज्ञान का जीवन्त आदर्श सदा दृष्टि के समक्ष रहे। ' झूठ बोलना पाप है '- केवल पढ़ भर लेने से क्या होगा ? हर एक छात्र को पूर्ण ब्रह्मचर्य पालन करने का व्रत लेना चाहिए, तभी ह्रदय में श्रद्धा और भक्ति का उदय होगा, नहीं तो, जिसमें श्रद्धा और भक्ति नहीं, वह झूठ क्यों नहीं बोलेगा?" (8/228 -32) 

 ' लोग बचपन से ही शिक्षा पाते हैं कि वे दुर्बल हैं, पापी हैं।  उनको सिखाओ कि वे सब उसी अमृत की सन्तान हैं- साहसी बनो, सत्य को जानो और उसे जीवन में परिणत करो।  चरम लक्ष्य भले ही बहुत दूर हो, पर उठो, जागो, जब तक ध्येय तक न पहुँचो, तब तक मत रुको।  ' (2/20)
" मनुष्य के (युवाओं के) मन में ही समस्त समस्याओं का समाधान मिल सकता है। कोई कानून किसी व्यक्ति से वह कार्य नहीं करा सकता जिसे वह करना नहीं चाहता है। अगर मनुष्य स्वयं अच्छा बनना चाहेगा, तभी वह अच्छा बन पायेगा। पूरा संविधान और संविधान के पण्डित मिलकर भी उसे अच्छा नहीं बना सकते। हम सब अच्छे बनें, यही समस्या का हल है। पूर्णत्व तभी सम्भव है,जब मनुष्य स्वेच्छा से मन को परिवर्तित कर सके, पर इसमें कठिनाई यह है कि वह मन के साथ जबरदस्ती नहीं कर सकता। शिक्षा का आदर्श है -मनरूपी उपकरण को (साधन) को योग्य बनाना और अपने मन पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करना।" (4/157) 
[" It is our privilege to be allowed to be charitable, For only so can we grow. The poor man suffers that we may be helped; let the giver kneel down and give thanks, let the receiver stand up and permit.  "
"हमलोग जो दूसरों के प्रति (ट्रेनी, प्रशिक्षणार्थी या शिष्य के प्रति) करुणा का भाव प्रकाशित कर पाते हैं,  यह हमारा एक विशेष सौभाग्य है-क्योंकि इस प्रकार के कार्यों द्वारा ही हमारी आत्मोन्नति होती है। दीन जन मानो इसीलिए कष्ट पाते हैं कि हमारा कल्याण हो ! अतएव दान करते समय दाता ग्रहीता के सामने घुटने टेके और धन्यवाद दे; ग्रहीता दाता के सम्मुख खड़ा हो जाय और अनुमति दे सभी प्राणियों में विद्यमान प्रभु श्रीरामकृष्ण (आत्मा, ईश्वर , ब्रह्म) का दर्शन करते हुए, उन्हीं को दान दो। जब हम कुछ भी बुराई नहीं देख पाएंगे तब हमारे लिए जगत्प्रपंच भी नहीं रहेगा, क्योंकि प्रकृति का उद्देश्य ही है -हमें इस भ्रम से मुक्त करना। [अर्थात प्रकृति का उद्देश्य ही है हमें स्वयं को 'Apparent I' समझने भ्रम से (स्वयं को  M/F शरीर , आदम और हव्वा समझने के देहाध्यास से मुक्त करके (डी-हिप्नोटाइज्ड करके) "Real I" (आत्मा , ईश्वर, ब्रह्म) में प्रतिष्ठित करा देना।]" 7/82

(वार्ता एवं संलाप /खंड-६/ ३४/पेज-१७९/ १९०१) 

स्वामी जी - " ........ कोई धन की चिन्ता करते करते धनकुबेर बन जाता है, और कोई शास्त्र -चिंतन करते करते विद्वान्। पर दोनों ही बन्धन हैं। पराविद्या प्राप्त करके विद्या और अविद्या दोनों से परे चला जा। 

(Some perhaps thinking of money have become millionaires, whereas you have become a Pundit by thinking of scriptures. But both are bondages. Attain the supreme knowledge and go beyond Vidya and Avidya, relative knowledge and ignorance.)    

शिष्य -महाराज , आपकी कृपा से मैं सब समझता हूँ ; परन्तु कर्म के चक्कर में पड़कर धारणा नहीं कर सकता। 

(Disciple: Sir, through your grace I understand it all, but my past Karma does not allow me to assimilate these teachings.) 

स्वामी जी - कर्म-फर्म छोड़ दे। तूने ही पूर्व जन्म में कर्म करके इस देह को (आदम और हव्वा देह को) प्राप्त किया है , यह बात यदि सत्य है तो कर्म के द्वारा कर्म को काटकर, तू फिर इसी देह में जीवन्मुक्त बनने का प्रयत्न क्यों नहीं करता ? निश्चित रूप से समझ लो कि आत्मज्ञान और मुक्ति तुम्हारे अपने ही हाथ में है। ज्ञान में कर्म का लवलेश भी नहीं है। परन्तु जीवन्मुक्त होते हुए भी जो लोग कर्म करते हैं , समझ लेना, वे दूसरों के हित के लिए ही कर्म करते हैं। वे भले-बुरे परिणाम की ओर नहीं देखते। किसी भी वासना का बीज उनके मन में नहीं रहता। गृहस्थाश्रम में रहते हुए इस प्रकार यथार्थ परहित के लिए कर्म करना - लगभग असम्भव जैसा है ! (ईश्वरकोटि छोड़कर???)

Throw aside your Karma and all such stuff. If it is a truth that by your own past action you have got this body; then, nullifying the effects of evil works by good works, why should you not be a Jivanmukta in this very body? Know that freedom or Self - knowledge is in your own hands. In real knowledge there is no touch of work. But those who work after being Jivanmuktas do so for the good of others. They do not look to the results of works. No seed of desire finds any room in their mind. And strictly speaking it is almost impossible to work like that for the good of the world from the householder's position 

शिष्य - आप ऐसी कृपा कीजिये जिससे आत्मानुभूति की प्राप्ति इसी शरीर में हो जाये।

(Disciple: Please bless me that I may attain Self - realisation in this very life.) 

स्वामीजी - भय क्या है ? मन में अनन्यता रहने पर -इसी जन्म में आत्मनुभूति हो जाएगी। परन्तु पुरुषकार चाहिए। पुरुषकार क्या है , जानता है ? आत्मज्ञान प्राप्त करके ही रहूँगा , इसमें जो बाधा -विपत्ति सामने आएगी , उस पर अवश्य ही विजय प्राप्त करूँगा - इस प्रकार के दृढ़ संकल्प का नाम है पुरुषकार ! माँ , बाप , भाई , मित्र , स्त्री , पुत्र मरते हैं तो मरें। यह देह रहे तो रहे , न रहे तो न सही। मैं किसी भी तरह पीछे नहीं देखूँगा। जब तक आत्मसाक्षात्कार नहीं होता , तब तक इस प्रकार के सभी विषयों की उपेक्षा करके , एक मन-प्राण से अपने उद्देश्य की ओर अग्रसर होने की चेष्टा करने का नाम है -पुरुषकार ; नहीं तो दूसरे पुरुषकार तो पशु-पक्षी भी कर रहे हैं। मनुष्य ने इस शरीर को प्राप्त किया है केवल उसी आत्मज्ञान को प्राप्त करने के लिए। संसार में सब लोग जिस रास्ते से जा रहे हैं , क्या तू भी उसी स्रोत में बहकर चला जायेगा ? तो फिर तेरे पुरुषकार का मूल्य क्या ? सब लोग तो मरने बैठे हैं , पर तू तो मृत्यु को जीतने आया है। महावीर की तरह अग्रसर हो जा। किसी की परवाह न कर। कितने दिनों के लिए है यह शरीर ? कितने दिनों के लिए हैं ये सुख-दुःख ? यदि मानव-शरीर को प्राप्त कर ही लिया है , तो भीतर की आत्मा को जगा और बोल - 'मैंने अभयपद प्राप्त कर लिया है।  बोल - मैं वही आत्मा हूँ।  जिसमें मेरा क्षुद्र 'अहंकर्ता -भाव ' डूब गया है। इसी तरह सिद्ध बन जा। उसके बाद जितने दिन यह देह रहे , उतने दिन दूसरों को यह महा बलप्रद अभय वाणी सुना - " तत्वमसि! उत्तिष्ठत ! जाग्रत ! प्राप्य वरान्निबोधत ! (तू वही है ', 'उठो , जागो और लक्ष्य प्राप्त करने तक रुको नहीं !) यह होने पर तब जानूँगा कि तू वास्तव में एक सच्चा 'पूर्वी बंगाली' है। "  

Swamiji: What fear? If there is sincerity of spirit, I tell you, for a certainty, you will attain it in this very life. But manly endeavour is wanted. Do you know what it is? "I shall certainly attain Self - knowledge. Whatever obstacles may come, I shall certainly overcome them"-- a firm determination like this is Purushakara. 

"Whether my mother, father, friends, brothers, wife, and children live or die, whether this body remains or goes, I shall never turn back till I attain to the vision of the Atman"-- this resolute endeavour to advance towards one's goal, setting at naught all other considerations, is termed manly endeavour. Otherwise, endeavour for creature comforts even beasts and birds show. Man has got this body simply to realise Self - knowledge. If you follow the common run of people in the world and float with the general current, where then is your manliness? Well, the common people are going to the jaws of death! But you have come to conquer it! Advance like a hero. Don't be thwarted by anything. How many days will this body last, with its happiness and misery? 

" When you have got the human body, then rouse the Atman within and say — I have reached the state of fearlessness! Say — I am the Atman in which my lower ego has become merged for ever. Be perfect in this idea; and then as long as the body endures, speak unto others this message of fearlessness: “Thou art That”, “Arise, awake, and stop not till the goal is reached!”

 (The Complete Works of Swami Vivekananda/Volume 7/Conversations And Dialogues/XVII/1901)

>>>"महान यौन ऊर्जा या काम-शक्ति जब पशुसुलभ क्रिया से ऊपर उठकर मानव-प्रणाली के महान डाइनेमो (dynamo) मस्तिष्क (सहस्रार?) तक पहुँचती है, वहाँ संचित होने पर वह ओजस अर्थात महान आध्यात्मिक शक्ति बन जाती है। यह ओजस ही मनुष्य का सच्चा मनुष्यत्व है, और केवल मनुष्य शरीर में ही इस ओज -शक्ति का संग्रह सम्भव है। जिसकी समस्त पशुसुलभ काम-शक्ति ओजस में परिणत हो गयी है, वही देवता है। उसकी वाणी में शक्ति होती है और उसके वचन जगत को पुनरुज्जीवित करते हैं।  (४/८९)               
>>>No force can be created; it can only be directed. : 
"कोई भी शक्ति उत्पन्न नहीं की जा सकती; उसे केवल एक दिशा में परिचालित किया जा सकता है। अतः हमें चाहिए कि हम अपनी कामशक्ति को अपने वश में करना सीखें और अपनी इच्छा-शक्ति से उन्हें पशुवत रखने (निम्नकेन्द्रों) के बजाय (उर्ध्वमुखी) आध्यात्मिक बना दें।   
" जब तक मनुष्य अपनी सर्वोच्च शक्ति -' कामशक्ति ' को ओज में परिणत नहीं कर लेता, कोई भी स्त्री या पुरुष, वास्तविक रूप में अध्यात्मिक  (शिक्षक) नहीं हो सकता। अतः हमें चाहिये कि हम अपनी महती शक्तियों को अपने वश में करना सीखें और अपनी ' अदम्य इच्छाशक्ति ' के बल पर उन्हें पशुवत रखने के बजाय आध्यात्मिक बना दें। अतः यह स्पष्ट है कि पवित्रता ही समस्त धर्म और नीति की आधारशिला है ! 
[शिक्षा /https://estudantedavedanta.net/My-Idea-of-Education.pdf]

 " लेक्चर से इस देश में कुछ भी न होगा, भाईलोग सुनेंगे, वाह-वाह करेंगे, ताली पीटेंगे, बस और उसके बाद घर जा कर भात के साथ सब हजम कर जायेंगे।  पुराने जंग खाए लोहे को ...पहले आग में लाल करना करना होगा, तब कहीं हथौड़ी से पीट कर कोई वस्तु ( मनुष्य) बनाई जा सकेगी। इस देश में ज्वलन्त जीवन्त से उदाहरण दिखाये बिना कुछ भी न होगा। अनेक लडकों की आवश्यकता है, जो सारे इन्द्रिय भोगों को छोड़-छाड़ कर देश के लिये जिवनोत्सर्ग करें। पहले उनका जीवन-गठन (चरित्र - निर्माण) करना होगा, तब कहीं काम होगा। ' 8/252)]

'जागो, उठो और लक्ष पर पहुँचे बिना विश्राम मत लो।

  "सभी प्राणियों में अवस्थित यह आत्मा स्वयं को चक्षु या किसी अन्य इन्द्रिय के समक्ष स्वयं को प्रकट नहीं करता अपितु जिनका मन  शुद्ध और परिष्कृत (शुद्ध -चिद्रूप बुद्धि) हो गया है, वे ही उसे अनुभव (realize) करते हैं। जो पॉँचो इन्द्रियों- शब्द, स्पर्श, रूप,रस, और गंध से अतीत है (इन्द्रियातीत है), अपरिवर्तनीय है, जिसका आदि-अंत नहीं है, जो सिनेमा के पर्दे जैसा अपरिणामी है,  उसको जो प्राप्त करते हैं, वे मृत्यु मुख से मुक्त हो जाते हैं। "he who realises Him, frees himself from the jaws of death." किन्तु उसे पाना बहुत कठिन है; यह मार्ग तेज छुरी की धार पर चलने के समान अत्यन्त दुर्गम है। यह मार्ग बहुत लम्बा और जोखिम का है, किन्तु निराश मत होओ, ढृढ़तापूर्वक बढ़े चलो, Awake, arise, and stop not till the goal is reached. 'जागो, उठो और लक्ष पर पहुँचे बिना विश्राम मत लो। 
 (2/172)    
      "I will read to you from one of the Upanishads. It is called the Katha Upanishad. This book psychologically takes up that suggestion, questioning into the internal nature of man. It was first asked who created the external world, and how it came into being. Now the question is: What is that in man; which makes him live and move, and what becomes of that when he dies? (REALISATION/Volume 2, Jnana-Yoga)
" क्या यह कभी सम्भव है कि सृष्टि आदि काल से जिस देश की सन्तान अखिल विश्व को शिक्षा देती आ रही है, केवल इसीलिए मूर्ख बन जायगी कि ( भारत के तत्कालीन वाइसराय लार्ड कर्जन  उच्च शिक्षा को इतना महँगा कर देना चाहते थे मध्यम वर्ग उस शिक्षा से वंचित रह जाये ) लार्ड कर्जन उच्च शिक्षा बन्द कर रहे हैं ? क्या उच्च शिक्षा का अर्थ केवल भौतिक शास्त्रों का अध्यन, और दैनिक उपयोग की वस्तुओं का उत्पादन कर लेना भर है?  उच्च शिक्षा का उद्देश्य है - जीवन की समस्याओं को सुलझा लेने में समर्थ व्यक्ति बन जाना। और आज के तथाकथित सभ्य देश आज भी जिन समस्याओं में उलझा हुआ है (माया ,जीव-जगत और ईश्वरउन्ही पर गहन चिन्तन कर रहा है, किन्तु हमारे देश में सहस्रों वर्ष पूर्व (यम-नचिकेता कठोपनिषद युग में) ही ये गुत्थियाँ सुलझा ली गयीं हैं। ' ईश्वर रूप में सबकी उपासना करो- सारे आकार उसके मन्दिर हैं।  बाकी सब कुछ भ्रम है। बाकी सब कुछ भ्रम है। ' अन्तर्भेदी-दृष्टि प्राप्त कर लो '- हमेशा भीतर की ओर देखो, बाहर (शरीर) की ओर कदापि नहीं। '(9/89 ) 

२३ दिसंबर १९०० को श्रीमती मृणालिनी बसु को लिखित एक पत्र में कहते हैं -" विशालकाय रेल के इंजन को दूर से आते देखकर, नन्हा सा कीड़ा अपने जीवन की रक्षा के लिये रेल की पटरी से हट गया- क्योंकि वह बुद्धिमान है ? मशीन में इच्छाशक्ति का कोई प्रकाश नहीं है। यन्त्र कभी नियम को उल्लंघन करने की कोई इच्छा नहीं रखता। कीड़ा नियम का विरोध करना चाहता (स्वयं को डी -हिप्नोटाइज्ड करना चाहता है), और नियम के विरुद्ध जाता है, चाहे उस प्रयत्न में वह सिद्धि लाभ करे या असिद्धि; इसलिए वह बुद्धिमान है। जिस परिमाण में इच्छाशक्ति के प्रकट होने में सफलता होती है, उसी अंश में सुख अधिक होता है और जीव उतना ही ऊँचा होता है। परमात्मा की इच्छाशक्ति पूर्ण रूप से सफल होती है इसलिए वह उच्चतम है।  जिस संयम के द्वारा इच्छाशक्ति का प्रवाह और विकास वश में लाया जाता है और वह फलदायक होता है, वह शिक्षा कहलाती है। " २९ अक्टूबर १८९६ को लन्दन में अपरोक्षानुभूति (कठोपनिषद) पर व्याख्यान देते हुए कहते हैं -यदि मुझे फिर से अपनी शिक्षा आरम्भ करनी हो और इसमें मेरा वश चले, तो मैं तथ्यों का अध्ययन कदापि न करूँ। मैं मन की एकाग्रता और अनासक्ति का सामर्थ्य बढ़ाता और उपकरण के तैयार होने पर इच्छानुसार तथ्यों का संकलन करता। " (4.108) 

" अब उपाय है -शिक्षा का प्रसार। पहले आत्मज्ञान। ...जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य संसार-बंधन तक से छुटकारा पा जाता है, उससे क्या तुच्छ भौतिक उन्नति नहीं हो सकेगी ? अवश्य ही हो सकेगी। प्रत्येक जीवात्मा में अनंत शक्ति अव्यक्त भाव से निहित है।  वह (अविनाशी) आत्मा चींटी से लेकर ऊँचे से ऊँचे सिद्ध पुरुष तक सभी में  विराजमान है , अन्तर केवल उसके प्रकटीकरण के भेद में हैं। वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्। किसान जैसे खेतों की मेंड़ तोड़ देता है और एक खेत का पानी दूसरे खेत में चला जाता है, वैसे ही आवरण टूटते ही (मिथ्या अहं का आवरण टूटते ही) आत्मा भी प्रकट हो जाती है। इस शक्ति को सर्वत्र जा जा कर जगाना होगा। (कैवल्य पाद-४.३) (24 अप्रैल, 1897 को सरला घोषाल को लिखा पत्र 6/312)
> मनुष्य और ईसा (अवतार) में अन्तर : अभिव्यक्त प्राणियों में बहुत अन्तर होता है। अभिव्यक्त प्राणी के रूप में तुम ईसा कभी नहीं हो सकते। मिट्टी से एक मिट्टी का हाथी बना लो , उसी मिट्टी से एक मिट्टी का चूहा बना लो। उन्हें पानी में डालदो - वे एक बन जाते हैं। मिट्टी के रूप में वे निरंतर एक हैं , गढ़ी हुई वस्तुओं के रूप में निरंतर भिन्न हैं। ब्रह्म ही ईश्वर (भगवान-अवतार वरिष्ठ) तथा मनुष्य दोनों का उपादान है। पूर्ण सर्वव्यापी सत्ता के रूप में हम सब एक हैं, परन्तु वैयक्तिक प्राणियों के रूप में ईश्वर (भगवान) शाश्वत स्वामी हैं और हम शाश्वत सेवक हैं।
    "तुम्हारे पास तीन चीजें '3H'  हैं- 1. शरीर, 2. मन 3. आत्मा! आत्मा इन्द्रियातीत है मन (मिथ्या अहं) जन्म और मृत्यु का पात्र है और वही दशा शरीर की है। तुम वही (अजर-अमर-अविनाशी) आत्मा हो, पर बहुधा तुम सोचते हो की तुम (नश्वर) शरीर हो। जब मनुष्य कहता है- 'मैं यहाँ हूँ',  तो उस समय वह शरीर की बात सोचता है। फिर एक दूसरा क्षण आता है , जब तुम उच्चतम भूमिका में होते हो, तब तुम यह नहीं कहते - " मैं यहाँ हूँ ! (अभी मजा चखाता हूँ!)" किन्तु जब कोई तुम्हें गाली देता है, या तुम्हारा अपमान करता है, और तुम भीतर से क्रोधित नहीं हो जाते, तब तुम आत्मा हो "(खंड 10. पृष्ठ 40)
 
दृष्टिं ज्ञानमयीं  कृत्वा पश्येद्  ब्रह्ममयं जगत्।  
देहबुद्धया तु दासोऽहं  जीवबुद्धया त्वदंशक। 
आत्मबुद्धया  त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः ॥

  ज्ञानमय दृष्टि से संसार को ब्रह्ममय देखना चाहिए।  देहबुद्धि से तो मैं आपका दास हूँ, बताइये आपके लिए क्या कर सकता हूँ ?  जीवबुद्धि से आपका अंश ही हूँ और  आत्मबुद्धि से में वही हूँ जो आप हैं, यही मेरी निश्चित मति है॥ 
"जब मैं सोचता हूँ कि मैं शरीर (M/F) हूँ, तब उस देहबुद्धि से मैं आपका दास (भक्त) हूँ, बताइये आपके लिए मैं क्या कर सकता हूँ ? जब मैं सोचता हूँ कि मैं मन (अहं)हूँ, उस जीव बुध्दि से आपका अंश हूँ, या मैं उस अनंत अग्नि की एक स्फुलिंग हूँ , जो तुम हो। जब मैं यह अनुभव करता हूँ कि मैं हूँ , तुम और मैं एक हूँ - यह प्रभु के एक शाश्वत भक्त (हनुमान) का कथन है। क्या मन (जीवभाव) आत्मा से बढ़कर है ?         
[१०/४० ]

" हरि ॐ तत्सत् ,हरि ॐ तत्सत्, हरि ॐ तत्सत् !" 

महामंत्र है तू जपा कर इसी को, महामंत्र है तू जपा कर इसी को॥ 

>>>स्वामी विवेकानन्द कहते थे - " यदि मेरी कोई संतान होती तो मैं उसे जन्म से ही सुनाता- 'तत्वमसि निरंजनः।' तुमने अवश्य ही पुराणों में रानी मदालसा की वह सुन्दर कहानी पढ़ी होगी। उसके संतान होते ही वह उसको अपने हाथ से झूले पर रखकर उसको लोरी सुनाते हुए गाती थी- 'तुम हो मेरे लाल निरंजन अतिपावन निष्पाप, तुम हो सर्व-शक्तिमान, तेरा है अमित प्रताप।' इस कहानी में एक महान सत्य छिपा हुआ है- 'अपने को बचपन से ही महान समझो और तुम सचमुच महान हो जाओगे!" (५/१३८) 
        दादा यह कहानी अवश्य सुनाया करते थे कि भारत की मातायें प्राचीन काल अपनी सन्तानों को बचपन से ही आत्मश्रद्धा जागृत करने की कथायें सुनकर उन्हें, आत्मवेत्ता या  ब्रह्मविद मनुष्य बनने की शिक्षा देती थीं। इतिहास में इसका एकमात्र उदाहरण है- रानी मदालसा। इन्होंने अपने पुत्रों को परम ज्ञान का उपदेश देकर जीवन जीने की दिशा दिखाई थी। पुत्र से मां का मोह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन रानी मदालसा ने इस मोह से हटकर अपने चारों पुत्रों को ऎसी शिक्षा दी जिससे उनके कर्म के आधार पर उनकी पहचान हो। 
          वे मानतीं थी कि संसार में नाम की महिमा कुछ नहीं है। व्यक्ति को उसके नाम से नहीं बल्कि उसके कर्मो से पहचाना जाता है। जब राजा ऋतध्वज अपने पुत्रों का नामकरण करते थे तो मदालसा को हंसी आती थी। पहले तीन पुत्रों के जन्म के बाद राजा ने उनका नामकरण किया तो वे हर बार हंसी।
      अपने तीनों पुत्रों को मदालसा ने यही सिखाया। उन्हें नश्वर शरीर व भौतिक सुखों से मोह नहीं करने की शिक्षा दी। उन्होंने बताया कि विद्वान वही है जो सुखों को भी दुख समझकर जीवनयापन करें। उनके तीन पुत्र हुए। बड़े का नाम विक्रांत, दूसरे का नाम सुबाहु और तीसरे का नाम शत्रुमर्दन था। मदालसा ने उन्हें ब्रह्मज्ञान [आत्म-अनुसन्धान] की शिक्षा दी। अपने लड़के को पालने में रख कर, झुलाते झुलाते यह लोरी गा कर सुनाती थीं-

शुद्धोsसि रे तात न तेsस्ति नाम,

  कृतं हि ते कल्पनयाधुनैव ।

पंचात्मकम देहमिदं न तेsस्ति,

 नैवास्य त्वं रोदिषि कस्य हेतो: ॥

 हे तात! तू तो शुद्ध आत्मा है, तेरा कोई नाम नहीं है। यह कल्पित नाम तो तुझे अभी मिला है। वह शरीर भी पाँच भूतों का बना हुआ है। न यह तेरा है, न तू इसका है। फिर किसलिये रो रहा है? 
बचपन से ही वेदान्त सुनकर तीनों पुत्रों को वैराग्य हो गया और वे जंगल में तपस्या करने चले गए। तब मदालसा का चौथा पुत्र हुआ। तब राजा ने मदालसा से कहा कि कम से कम इस पुत्र को तो सांसारिक-ज्ञान की शिक्षा दो जिससे हमारा राजपाट चल सके।  
       रानी मदालसा ने अपने चौथे पुत्र नाम अलर्क (पगला कुत्ता ) रखा।  मदालसा की शिक्षा से वह बहुत ही शूरवीर, पराक्रमी राजा हुआ।  कुछ समय बाद राजा ऋतुध्वज अपनी पत्नी मदालसा के साथ अलर्क को राज्य सौंपकर जंगल में तपस्या करने चले गए। हालांकि राजा के कहने पर चौथे पुत्र को धर्म, अर्थ और काम शास्त्रों की भी शिक्षा दी। लेकिन तपस्या के लिए वन में जाते समय उसे भी यही उपदेश दिया कि आत्मा निराकार है। अंतत: मां की दी हुई यही शिक्षा पाकर चौथे पुत्र को भी आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई कि तू शुद्ध आत्मा है, तेरा कोई नाम नहीं है। इस प्रकार यह रानी मदालसा की ही शिक्षा थी कि जिससे सुबाहु, विक्रांत और शत्रुमर्दन जैसे ब्रह्मज्ञानी और अलर्क जैसे प्रतापी राजा हुए। मदालसा भारत की एक गौरवमयी माँ थीं।
माँ बनो तो आदर्श माता मदालसा जैसी
मदालसा देवी कहती हैं- "एक बार जो मेरे उदर से गुजरा वह यदि दूसरी स्त्री के उदर में जाय, मुक्त न होकर दूसरा जन्म ले,  तो मेरे गर्भधारण को धिक्कार है !वे जब अपने पुत्रों को पालने में सुलाती थीं, तब उनको आध्यात्मिक ज्ञान की लोरियाँ सुनाती थीं। जैसेः

शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरंजनोऽसि, संसारमायापरिवर्जितोऽसि ।

संसार-स्वपनं त्यज मोहनिद्रां,  मदालसा वाक्यमुवाच पुत्रम् ।।

'हे पुत्र, तू शुद्ध है, बुद्ध है, निरंजन है, तूँ तो संसार की माया से रहित है। यह संसार स्वपनमात्र है। उठ, जाग, मोहनिद्रा का त्याग कर ! तू सच्चिदानंद स्वरुप आत्मा है।' इन आर्य महिला ने, आदर्श माता ने अपने सभी पुत्रों को आत्मज्ञान से सम्पन्न बनाकर संसार-सागर से पार करा दिया।
माँ (महिला) बनो तो ऐसी बनो। बच्चों को आत्मज्ञान की लोरियाँ सुनाओ। घर में भी आत्मज्ञान की चर्चा करो। सुख-दुःख आये तो आत्मज्ञान की निगाहों से निहारो। इस संसार से कभी प्रभावित मत होओ। अपने परमात्मा की मस्ती में मस्त रहो। 

राजकुमारी मदालसा एक पौराणिक चरित्र है, जिसका उल्लेख पुराणों में मिलता है। वह गन्धर्वराज विश्वावसु की पुत्री थी। कालांतर में उसका विवाह राजकुमार ऋतुध्वज के साथ हुआ।
राजा ऋतुध्वज एक बार असुरों से युद्ध करने गए। इनकी सेना असुर पक्ष पर भारी पड़ रही थी। ऋतुध्वज की सेना का मनोबल टूट जाये इसलिये मायावी असुरों ने ये अफवाह फैला दी कि ऋतुध्वज मारे गये। यह सूचना रानी मदालसा तक पहुँची तो वह इस गम को सह नहीं कर सकी और उसने अपने प्राण त्याग दिए।
असुरों पर विजय प्राप्तकर जब ऋतुध्वज राजमहल लौटे तो वहां मदालसा को नहीं पाया। मदालसा के वियोग से राजा को बड़ा सदमा लगा और वे राज-काज छोड़कर विक्षिप्तों की तरह व्यवहार करने लगे।
मदालसा का पुनर्जीवन
ऋतुध्वज के प्रिय मित्र नागराज से अपने मित्र की ये अवस्था देखी न गई और वे हिमालय में तपस्या करने चले गए ताकि भगवान शिव को प्रसन्न कर सके। शिव प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा तो नागराज ने उनसे अपने लिए कुछ न मांगकर मित्र ऋतुध्वज के लिये मदालसा को पुनर्जीवित करने की मांग रख दी। शिवजी के वरदान से मदालसा अपनी उसी आयु के साथ मानव-जीवन में लौट आई और पुनः ऋतुध्वज को प्राप्त हुई।
मृत्यु के पश्चात मिले पुनर्जीवन ने मदालसा को मानव शरीर की नश्वरता और जीवन के सार-तत्व का ज्ञान करा दिया। अब वह पहले वाली मदालसा नहीं रही। विषय-भोग में उसकी रूचि समाप्त हो गई और वह आध्यात्मिक चिंतन में मग्न में रहने लगी। पति ने जब संतान प्राप्ति की इच्छा प्रकट की तो मदालसा ने कहा कि मैं संतान नहीं चाहती हूं। पति ने जब इसका कारण पूछा तो मदालसा बोली कि यदि संतान कुसंस्कारी या कुल का कलंक निकल जाए तो मैं उसे नहीं झेल सकती। पति ने कहा--"मैं और तुम दोनों ही धर्म के रास्ते पर चलनेवाले हैं तो हमारी संतान कुसंस्कारी क्यों होगी?" मदालसा ने उत्तर दिया--"कभी-कभी अच्छे मां-बाप की संतान भी बुरी हो जाती है और बुरे मां-बाप की संतान भी अच्छी हो जाती है। यह आवश्यक नहीं है कि अच्छे मां-बाप की संतान अच्छी ही हो।"
संतान प्राप्ति
बड़ी मुश्किल से मदालसा ने संतान उत्पन्न करना स्वीकार किया। पर, पति से वचन ले लिया कि होने वाली संतानों के लालन-पालन का दायित्व उसके ऊपर होगा और पति उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगें।
मदालसा गर्भवती हुई तो वह उपासना में अधिक समय देने लगी। समय पाकर संस्कारी पुत्र हुआ, जिसका पवित्रता के साथ वह लालन-पालन करने लगी। शिशु जब रोता था तो उसे वेदांत ज्ञान से पूर्ण लोरी सुनाते हुए कहती थी-- तू शुद्ध है तू बुद्ध है, तू है निरंजन सर्वदा। संसार माया से रहित, तू स्वरूप स्थित सर्वदा।।
पुत्रों का वैराग्य
समय बीतता गया, एक के बाद एक तीन पुत्र हुए-- विक्रांत, सुबाहू और शत्रुमर्दन। तीनों पुत्र मदालसा से संस्कारित थे। मदालसा ने उन्हें माया से निर्लिप्त निवृतिमार्ग का साधक बनाया था, इसलिये सबने राजमहल का त्यागकर संन्यास ले लिया। पिता ऋतुध्वज यह सोचकर दु:खी रहने लगे कि हमारा वंश कैसे चलेगा।
एक बार किसी सहेली ने रानी मदालसा से पूछा कि तुम कैसी मां हो, क्या तेरे अंदर ममता नहीं है? तुम कैसे अपने छोटे-छोटे बच्चे को संन्यासी बनाकर जंगल भेज देती हो? मदालसा ने उत्तर दिया--"जो जीव एक बार मेरी कोख में आ गया अगर दोबारा वह किसी दूसरी स्त्री के गंदे कोख में जाए तो यह मेरे जीवन के लिए धिक्कार है। मैं अपनी संतानों को जन्म-मरण रूपी महादुख में नहीं जाने देना चाहती।"
मदालसा फिर से गर्भवती हुई तो पति ने अनुरोध किया कि हमारी सभी संतानें अगर निवृतिमार्ग की पथिक बन गई तो ये विराट राज-पाट को कौन संभालेगा। इसलिये कम से कम इस पुत्र को तो राजकाज की शिक्षा दो। मदालसा ने पति की आज्ञा मान ली। जब चौथा पुत्र पैदा हुआ तो मदालसा ने उसका नाम अलर्क रखा और उसे राजधर्म और क्षत्रियधर्म की शिक्षा दी।
प्रतापी राजा अलर्क
अलर्क माता के दिव्य ज्ञान से संस्कारित होकर सर्वगुणसंपन्न हो गया। उसकी गिनती श्रेष्ठ राजाओं में होने लगी। उन्हें राजकाज की शिक्षा के साथ माँ ने न्याय, करुणा, दान इन सबकी भी शिक्षा दी थी। वाल्मीकि रामायण में आख्यान मिलता है कि एक नेत्रहीन ब्राह्मण राजा अलर्क के पास आया और अलर्क ने उसे अपने दोनों नेत्र दान कर दिये। इस तरह अलर्क विश्व के पहले नेत्रदानी हुए। इस अद्भुत त्याग की शिक्षा अलर्क को माँ मदालसा के संस्कारों से ही मिली थी।
माना जाता है कि बालक क्षत्रिय कुल में जन्मा हो तो ब्रह्मज्ञानी की जगह रणकौशल से युक्त होगा। नाम शूरवीरों जैसे होंगें तो उसी के अनुरूप आचरण करेगा। इन सब स्थापित मान्यताओं को मदालसा ने एक साथ ध्वस्त करते हुए दिखा दिया कि माँ अगर चाहे तो अपने बालक को शूरवीर और शत्रुंजय बना दे और वो अगर चाहे तो उसे धीर-गंभीर, महात्मा, ब्रह्मज्ञानी और तपस्वी बना दे। अपने पुत्र को एक साथ साधक और शासक दोनों गुणों से युक्त करने का दुर्लभ काम केवल माँ का संस्कार कर सकता है।
स्वामी विवेकानंद ने मदालसा के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर कहा था, "अगर मेरी कोई संतान होती तो मैं जन्म से ही उसे मदालसा की तरह लोरी सुनाते हुए कहता-- शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरंजनोऽसि। संसार माया परिवर्जितोऽसि। संसार स्वप्नं त्यज मोहनिद्रां।।"

" इच्छाशक्ति ही जगत में अमोघ शक्ति है। प्रबल इच्छाशक्ति का अधिकारी मनुष्य एक ऐसी ज्योतिर्मयी प्रभा अपने चारों ओर फैला देते हैं कि दूसरे लोग स्वतः उस प्रभा से प्रभावित होकर उसके भाव में भावित हो जाते हैं। " ५/१९१ 
" हम श्र्द्धा खो बैठे हैं, इसीलिये तुम्हारा रक्त पानी जैसा हो गया है, मस्तिष्क मुर्दार ओर शरीर दुर्बल! इस शरीर को बदलना होगा। शारीरिक दुर्बलता ही सब अनिष्टों की जड़ है और कुछ नहीं। तुम्हारा शरीर दुर्बल है, मन दुर्बल है, और अपने पर आत्मश्र्द्धा भी बिल्कुल नहीं है। ...जब काम करने का समय आता है तब तुम्हारा पता ही नहीं मिलता।
"मनुष्य में धर्म और परमेश्वर के प्रति उत्कट श्रद्धा रहनी चाहिये ..एक कमरे में चोर घुस आया और उसे पता लग गया कि दूसरे कमरे में सोने का ढेर रखा है, और वह उस ढेर तक पहुँच भी सकता है, तो क्या वह वहां पहुँचने के लिये पागल न हो जायेगा ? (अन्तर्निहित दिव्यता आत्मा या) 'ईश्वर में अटूट विश्वास और फलस्वरूप उसे पाने की तीव्र उत्सुकता का ही नाम है 'श्रद्धा।' (आत्मानुभूति के सोपान - ३/१०१)  
" मैं तुम लोगों से फिर एक बार कहना चाहता हूँ कि यह श्रद्धा ही मानव जाति के जीवन का और संसार के सब धर्मों का महत्वपूर्ण अंग है। सबसे पहले अपने आप पर विश्वास करने का अभ्यास करो। ऐ गरीब बंगालियों उठो और काम में लग जाओ, तुम लोगों के द्वारा ही भारत का उद्धार होनेवाला है!"५/३३५
  
" इन सब मूर्ति-पूजा जप, ध्यान  आदि की जड़ कहाँ है ?  [22 जनवरी 2024 को अयोध्या में राम लला की प्राण-प्रतिष्ठा, जप, ध्यान  आदि की जड़ कहाँ है ?] यह जड़ है श्रद्धा। संस्कृत भाषा के श्रद्धा शब्द को समझाने योग्य कोई शब्द हमारी भाषा में नहीं है। मेरे मत से संस्कृत शब्द श्रद्धा का निकटतम अर्थ 'एकाग्र-निष्ठा' शब्द द्वारा व्यक्त हो सकता है। "६/१३७

    " तुम लोग सोचते हो , मेरे बाद शायद और कोई विवेकानन्द नहीं होगा।  अरे ये जो नशाखोर लोग आकर कन्सर्ट (गाना-बजाना) करके चले गये, जिनसे तुम लोग इतनी घृणा करते हो , जिन्हें तुम लोग अत्यन्त तुच्छ समझते हो, ठाकुर की इच्छा होने पर उनमें से हर एक व्यक्ति विवेकानन्द हो सकता है। आवश्यकता होने पर विवेकानन्द का आभाव न रहेगा। कहाँ से कोटि कोटि विवेकानन्द आकर उपस्थित हो जायेंगे, यह कौन जनता है ? यह  विवेकानन्द का काम नहीं है रे; यह तो उनका काम है-ठाकुर का स्वयं प्रभु का। एक गवर्नर जनरल के जाने के बाद उसके स्थान पर दूसरा आएगा ही! तुम लोग चाहे कितने भी तमोगुणी क्यों न रहो, मन और वाणी को एक करके उनकी (ठाकुरदेव की) शरण में जाने पर सभी अन्धकार (तमोगुण) दूर हो जायेगा। अभी उस रोग को हटाने वाले वैद्यराज जो आये हैं ! उनका नाम लेकर कार्य में लग जाने पर वे स्वयं ही सबकुछ कर लेंगे। तब यही तमोगुण सत्त्वगुण में परिवर्तित हो जायेगा।" (श्री प्रियनाथ सिन्हा द्वारा आलिखित वार्ता एवं संलाप -२ :खंड ८/२५५-५६) [अवतार वरिष्ठ श्रीरामकृष्ण देव की इच्छा, माँ श्री सारदा देवी की आशीर्वादऔर स्वामी विवेकानन्दजी की प्रेरणा से अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल, सारदा नारी संगठन या विवेकानन्द ज्ञान मंदिर जैसे जन-कल्याकारी युवा संगठन जानी बिगहा में युवाओं के द्वारा स्थापित होते हैं।] 

      "मेरी इच्छा है -तुम लोगों के भीतर भी इसी श्रद्धा का आविर्भाव हो, तुममें से हर एक आदमी खड़ा होकर इशारे से संसार को हिला देनेवाला प्रतिभा सम्पन्न महापुरुष हो, हर प्रकार से अनन्त ईश्वरतुल्य हो। मैं तुम लोगों को ऐसा ही देखना चाहता हूँ। उपनिषदों से तुमको ऐसी ही शक्ति प्राप्त होगी। और वहीं से तुमको ऐसा विश्वास प्राप्त होगा। गृही मनुष्य भी उपनिषदों का अध्यन कर सकते हैं,इससे उनका कल्याण ही होगा, कोई अनिष्ट न होगा। वेदान्त के इन सब महान तत्वों का प्रचार अवश्यक है, ये केवल अरण्य मे अथवा गिरि-गुहाओं मे आबद्ध नहीं रहेंगे। कीलों और न्यायधीशों मे, प्रार्थना-मंदिरों मे, दरिद्रों की कुटियों में, मछुओं के घरों में, छत्रों के अध्यन स्थानों में -सर्वत्र ही इन तत्वों की चर्चा होगी और ये काम मे लाये जायेंगे।" 
कठोपनिषद का आरंभ कितने मनोहर रीति से किया गया है ! उस छोटे से बालक नचिकेता के हृदय में श्रद्धा का अविर्भाव, उसकी यमदर्शन की अभिलाषा और और सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो यह है कि यम स्वयं उसे जीवन और मृत्यु का महान पाठ पढ़ा रहे हैं। और वह बालक उनसे क्या जानना चाहता है ? -मृत्यु का रहस्य। " ५/२२४
" ऐसा दृढ़ संकल्प हरेक भारतीय बालक को करना चाहिए।  मैं चाहता हूँ कि तूँ कठोपनिषद को कंठस्थ कर ले ! उपनिषदों में ऐसा सुन्दर ग्रन्थ और कोई नहीं है। नचिकेता के समान श्रद्धा, साहस, विवेक और वैराग्य अपने जीवन में लाने की चेष्टा कर, केवल पढ़ने से क्या होगा ? "६/१५
 " इस जीवात्मा में अनन्त शक्ति अव्यक्त भाव से निहित है; चींटी से लेकर ऊँचे से ऊँचे सिद्ध पुरुष तक, सभी में वह आत्मा विराजमान है, अंतर केवल उसके प्रत्यक्षीकरण के भेद में  है। वरण भेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत -(कैवल्य पाद)-किसान जैसे खेतों की मेंड़ तोड़ देता है और एक खेत का पानी दुसरे खेत में चला जाता है। वैसे ही आत्मा भी आवरण टूटते ही प्रकट हो जाती है। 
परन्तु चाहे विकसित हुई हो या नहीं, वह शक्ति प्रत्येक जीव -ब्रह्मा से लेकर घास तक में -विद्द्यमान है। इसीलिये आत्मानुभूति करने का एक अवसर सभी को मिलता है, सभी ब्रह्म जो हैं।  इस शक्ति को सर्वत्र जा जाकर जगाना होगा। " ६/३१२  
स्वामीजी कहते हैं --  "क्षीणाः स्म दीनाः सकरुणा जल्पन्ति मूढ़ा जना (जो हिप्नोटाइज्ड स्टेट ऑफ़ माइंड में हैं) -जो लोग देह को ही आत्मा मानते हैं, वे ही मिमियाते हुए करुण कण्ठ से कहते हैं --हम क्षीण हैं, हम दीन हैं, और यही नास्तिकता है! प्राप्ता:स्म वीरा गतभया अभयं प्रतिष्ठां यदा--जब हमलोग अभयपद (डी-हिप्नोटाइज्ड स्टेट ऑफ़ माइंड) को प्राप्त हो चुके हों; तब हमलोग अभिः (भयरहित) और वीर (क्षात्रवीर्य और ब्रह्मतेज से सम्पन्न) क्यों न हों?--रामकृष्णदासा वयम्-यही आस्तिकता है ! त्यागी हुए बिना (५ अभ्यास किये बिना) तेजस्विता नहीं आने की ! कार्य आरम्भ कर दो। "त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः — एकमात्र त्याग के द्वारा ही कुछ चुने हुए लोग  -'रेयर वन्स'- अमृतत्व की प्राप्ति कर लेते हैं! [ 'रेयर वन्स'- जो नियमित रूप से  महामण्डल द्वारा निर्देशित ५ अभ्यास करते हुए इस 'BE AND MAKE' आन्दोलन से जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त किये  हैं, वे ) अमृतत्व प्राप्त कर लेते हैं । थ्रू रिनन्सीऐशन अलोन सम (रेयर वन्स) अटेंड इमॉर्टैलिटी.] बुजदिली करोगे, तो हमेशा पिसते रहोगे ! आत्मा में भी कहीं लिंग भेद है ? स्त्री और पुरुष का भाव दूर करो, सब आत्मा हैं। शरीराभिमान छोड़ कर खड़े हो जाओ। छाती पर हाथ रखकर कहो --इट इज, इट इज -"अस्ति अस्ति",नास्ति नास्ति करके तो देश गया१! "सोऽहं सोऽहं,"चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं"।  हर एक आत्मा में अनन्त शक्ति है। अरे, नहीं नहीं करके क्या तुम क्या कुत्ता-बिल्ली हो जाओगे? नहीं है ? क्या नहीं है ? किसके भीतर नहीं है ? नहीं नहीं सुनने पर मेरे सिर पर वज्रपात होता है। यह जो दीन -हीन भाव है, यह एक बीमारी है -क्या यही दीनता है ?-यह झूठी विनयशीलता है, गुप्त अहंकार है।"न लिङ्गम् धर्मकारणं, समता सर्वभूतेषु एतन्मुक्तस्य लक्षणम्—'बाहरी चिन्ह धारण कर लेना धार्मिक होना नहीं है । सभी के प्रति साम्यभाव रखना ही मुक्त पुरुषों का लक्षण है।" निर्गच्छति जगज्जालात् पिञ्जरादिव केशरी—He frees himself from the meshes of this world as a lion from its cage!"  "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः" दुर्बल मनुष्य इस आत्मा को प्राप्त नहीं कर सकता। उद्धरेदात्मनात्मानम्- अपने ही सहारे अपना उद्धार करना पड़ेगा। कुर्मस्तारकचर्वणं- हम तारों को अपने दाँतों से पीस सकते हैं,त्रिभुवनमुत्पाटयामो बलात्,-तीनों लोकों को बलपूर्वक उखाड़ सकते हैं! किं भो न विजानास्यस्मान् रामकृष्णदासा वयम्— हमें नहीं जानते ? हम आधुनिक युग में ब्रह्म के अवतार परमहंस श्रीरामकृष्ण के दास के दास के दास हैं ।   (पत्रावली/२५ सितंबर/ १८९४)]

June 26, 1895.

" Our best work is done, our greatest influence is exerted, when we are without thought of self. All great geniuses know this. Let us open ourselves to the one Divine Actor, and let Him act, and do nothing ourselves."

" जब हमारा 'अहंकर्ता -भाव ' (Apparent I-काचा आमि, तुच्छ अहं -आदम और हव्वा जैसा तादात्म्य) नहीं रहता, तभी हम अपना सर्वोत्तम कार्य कर सकते हैं, दूसरों को सर्वाधिक प्रभावित कर पाते हैं। सभी महान विवेकी (प्रतिभाशाली -genius) व्यक्ति इस बात को जानते हैं। ह्रदय में पहले से विद्यमान उस 'दिव्य-कर्ता ' (Real I-Divine Actor-पुरुषोत्तम) के प्रति अपना ह्रदय खोल दो, तुम स्वयं कुछ भी करने मत जाओ।" 

["O Arjuna! I have no duty in the whole world", says Krishna. Be perfectly resigned, perfectly unconcerned; then alone can you do any true work. No eyes can see the real forces, we can only see the results. Put out self, lose it, forget it; just let God work, it is His business. We have nothing to do but stand aside and let God work. The more we go away, the more God comes in. Get rid of the little "I", and let only the great "I" live. " (Volume 7, Inspired Talks/page-14) 

 श्री कृष्ण गीता में कहते हैं - 'हे अर्जुन , त्रिलोक में मेरे लिए कर्तव्य नामक कुछ भी नहीं है। ' उनके ऊपर सम्पूर्णतया निर्भर रहो, सम्पूर्ण रूप से अनासक्त होओ, ऐसा होने पर ही तुम्हारे द्वारा कुछ यथार्थ कार्य हो सकता है। जिस शक्ति के द्वारा ये सभी कार्य होते हैं, उसे हम देख नहीं पाते, हम केवल उसका फलमात्र देख पाते हैं। 'अहंकर्ता -भाव' को निकाल डालो, उसे भूल जाओ; अपने द्वारा ईश्वर (आत्मा , भगवान, ब्रह्म) को कार्य करने दो - यह उन्हींका कार्य है, उन्हें करने दो।]

 हमें और कुछ नहीं करना होगा -केवल स्वयं हटकर उन्हें काम करने देना होगा। हम जितना दूर हटते जायेंगे , ईश्वर उतना ही हमारे भीतर से अभिव्यक्त होगा। 'व्यावहारिक अहं ' (Apparent I-काचा आमि, तुच्छ अहं) से ऊपर उठ जाओ -केवल 'वास्तविक अहं' (Real I-पाका आमि,आत्मा, प्रबुद्ध -विवेकी विवेकानन्द ,सच्चिदानन्द, प्रबुद्ध-'महत अहं') को रहने दो। हम अभी जो कुछ हैं, वह सब अपने चिंतन का ही फल है। इसलिए तुम क्या चिंतन करते हो , इस विषय में विशेष ध्यान रखो। [('जीव' अपने मित्र -शत्रु को ब्रह्ममैव इदं सर्वं, आत्मवै इदं सर्वं ? अपने और मेरे- बारे -जगत और ईश्वर में अद्वैत -अभेद देखते हो या नहीं इस पर ध्यान रखो !हम जो कुछ चिंतन करते हैं , उसमें हमारे चरित्र की छाप लग जाती है। [जगत को अद्वैत दृष्टि या ज्ञानमयी दृष्टि से देखकर M/F के प्रति सियाराम मय व्यवहार है या नहीं ,हमारे व्यवहार पर हमारे चरित्र की छाप लग जाती है।

[The begging monks (or A Householder Leader of a social service -organization) who carry religion to every man's door; If they should eat of the tree of knowledge, they would become egoists, and all the good they do would fly awayThey are all principle, no personality.

  गृहत्यागी संन्यासी हों या किसी वानप्रस्थी सामाजिक सेवा संगठन के गृहस्थ नेता हों जो कोई भी व्यक्ति 'प्रबुद्ध भारत अभियान' के वैसे कर्मी [C-IN-C /शिक्षक] होंगे जो द्वार -द्वार पर धर्म (मनुष्य -निर्माणकारी शिक्षा) का सन्देश लेकर जाते हैं, यदि वे यदि ऐहिक (आदम और हव्वा जैसा) ज्ञानरूपी वृक्ष का फल खायेंगे तो उनमें भी दैहिक 'अहंकर्ता-भाव' चला आएगा, फिर वे जो कुछ भी लोक-कल्याण करेंगे -सब नष्ट हो जायेगा। जब हम 'मैं मैं' कहते हैं, तब हम मूर्ख से बन जाते हैं। पहले अपने को जीत लो (3K से अनासक्त हो जाओ), फिर सम्पूर्ण जगत तुम्हारे पैरों के नीचे आ जायेगा। (देववाणी -26 जून , 1895/ खंड ७/२२-२३) 

They never say "me" and "mine"; they are only blessed in being instruments. Such men are the makers of Christs and Buddhas, ever living fully identified with God, ideal existences, asking nothing, and not consciously doing anything. They are the real movers, the Jivanmuktas, (Literally, free even while living.) absolutely selfless, the little personality entirely blown away, ambition non-existent. They are all principle, no personality.

मानवजाति के मार्गदर्शक नेता कभी भी 'मैं , मेरा ' नहीं कहते। वे अपने को ईश्वर का यंत्र समझकर ही अपने को धन्य मानते हैं। ऐसे व्यक्ति ईसा और बुद्ध आदि के निर्माता हैं। वे सदैव ईश्वर (आत्मा) के साथ सम्पूर्ण भाव से तादाम्य लाभ करके एक आदर्श जगत में निवास करते हैं। वे कुछ नहीं चाहते और अहंकर्ता -भाव से कुछ भी नहीं करते। वे ही वस्तुतः प्रेरकस्वरूप हैं - वे जीवनमुक्त एवं बिल्कुल अहंशून्य हैं। उनका क्षुद्र अहंकार पूर्ण रूप से नष्ट हो गया है , उन्हें महत्वाकांक्षा बिल्कुल नहीं है। उनका व्यक्तित्व पूर्ण रूप से लुप्त हो गया है , वे निराकार तत्वस्वरूप हैं। (देववाणी ७/२४)  

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अर्थात योगशास्त्र के मतानुसार 'प्रत्येक आत्मा (जीव) अव्यक्त ब्रह्म है'![अर्थात आत्मा (Heart अपरिवर्तनीय ,अविनाशी चेतना) अज्ञान के कारण (परमेश शक्ति माया -अविद्या -अस्मिता पंचक्लेश के कारण) प्रकृति के साथ (अर्थात परिवर्तनशील नश्वर -देह 'Hand' और 'Head' के साथ) संयुक्त हो गयी है। ]  

अर्थात योगशास्त्र के मतानुसार 'प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है'! अर्थात 'दिव्यता' मनुष्य मात्र में छिपी हुई है, अन्तर्निहित है। जीवमात्र में विशेष रूप 'मनुष्य' (विवेकी) में 'दिव्यता' Divinity छिपी हुई है, अन्तर्निहित है।  किन्तु 'अज्ञान' के कारण (यानि अविद्या >अस्मिता,राग -द्वेष , अभिनिवेश पंचक्लेश के कारण) प्रत्येक जीव M/F 'आदम और हव्वा' प्रवृत्ति (Bundle Of habits) के सेव खायें कि नहीं ? 'Adam and Eve Syndrome : Should I eat an apple or not?' व्याधि लक्षण से  ग्रस्त हो गया है! इसलिए गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताये गए चार योगमार्ग - कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान, इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर उस  'M/F भाव, 'आदम और हव्वा मनोभाव' से छुटकारा पाना तथा  अपनी अंतर्निहित दिव्यता या -उस "Inherent Divinity" को अपने चरित्र में अभिव्यक्त करना ही मनुष्य-जीवन का चरम लक्ष्य है। यानि 'मैं', 'तुम' और 'वह'  या जीव (M/F), जगत और ईश्वर में (3H में) अद्वैत का (Oneness) का अनुभव करना - यही यही सारे धर्मों का /(शिक्षा का) एकमात्र लक्ष्य है।]

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इसीलिए भगवान गीता (2.63) में कहते हैं - 

क्रोधात् भवति संमोहः, संमोहात् स्मृतिविभ्रमः।

 स्मृति भ्रंशात्  बुद्धिनाशः,  बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।।2.63।।

जब कोई व्यक्ति किसी भी इद्रिय विषय-भोग को सुन्दर और सुख का साधन समझकर उसका निरन्तर चिन्तन करता रहता है, तब उस विषय या वस्तु (कामिनी-कांचन और कीर्ति) के प्रति आसक्ति पैदा हो जाती है। उस आसक्ति के अत्यधिक बढ़ जाने पर, उस वस्तु-विशेष के प्रति उसकी घोर आसक्ति (Love or Infatuation?) उसको पाने की उत्कट इच्छा या कामना (ऐषणा) का रूप ले लेती है ; जिसको पूर्ण किये बिना मनुष्य शान्ति से नहीं बैठ सकता। यदि कामना पूर्ति के मार्ग में कोई विघ्न आता है, या कोई व्यक्ति/वस्तु उस कामना -पूर्ति के मार्ग में विघ्न बनता है , तो उस व्यक्ति-विशेष को विघ्न का कारण समझकर, उसके प्रति मन (बुद्धि)  ओर होने वाली प्रतिक्रिया को कहते हैं क्रोध। क्रोध से उत्पन्न होता है मोह ; और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति (remembrance) के भ्रमित होने पर 'बुद्धि' का नाश हो जाता है। बुद्धि का नाश होने से उस व्यक्ति का पतन हो जाता है। 

बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।  यदि आपकी ' विवेक सम्पन्न बुद्धि' का नाश हो गया -तो आप अपने सत्य-स्वरूप के साथ शाश्वत रिश्ता को (Real I) भूलकर पुनः नश्वर शरीर (M/F), इन्द्रिय , मन के साथ (Apparent I) के साथ रिश्ता जोड़कर यमराज के डर से भागते फिरेंगे। अर्थात यदि आपने इस धोखेबाज बुद्धि के हार को अपनी हार (आत्मा Real I हार समझ लिया, और शेर होकर भेंड़ बन गए) तो आप फिर नश्वर 'देहो अहं' के भाव को ही सच मानने लगोगे-सद्गुरु के साथ और इष्टदेव के साथ ही रिश्ता रखने से डरने लगोगे। अर्थात बंधन स्वकल्पित है।  संसार नहीं बाँधता, देह मति बाँधती है ! (स्वयं को M/F देह समझने वाली ही बुद्धि-ही अविवेक के कारण मनुष्य को संसार चक्र में बाँध देती है।)      

यदि यह बुद्धि ही नष्ट हो जाय तो मनुष्य का मनुष्यत्व ही नष्ट हुआ समझना चाहिये। बुद्धिनाश के बाद तो वह पशु से भी हीन व्यवहार करता है और फिर कभी जीवन में श्रेष्ठ और उच्च ध्येय को न समझ सकता है और न प्राप्त कर सकता है। यहाँ मनुष्य के ऩाश से तात्पर्य यह है कि अपने शुद्ध स्वरूप को पहचान कर वह मनुष्य जीवन के परमपुरुषार्थ मोक्ष को प्राप्त करने योग्य नहीं रह जाता।विषयों के चिन्तन को यहाँ सभी अनर्थों का कारण बताया है। अब मोक्ष प्राप्ति का साधन बताते हैं अपने नश्वर प्रातिभासिक मैं (Apparent I- आदम या हव्वा) को ही अविनाशी सच (Real I -आत्मा , ब्रह्म, ईश्वर, भगवान) समझने लगोगे। और विवेकी -बुद्धि का नाश होने से उस मनुष्य का पतन हो जाता है। यदि यह बुद्धि ही नष्ट हो जाय तो मनुष्य का मनुष्यत्व ही नष्ट हुआ समझना चाहिये। बुद्धिनाश के बाद तो वह पशु से भी हीन व्यवहार करता है और फिर कभी जीवन का चरम लक्ष्य, गौण लक्ष्य से भी श्रेष्ठ और उच्चतम ध्येय - प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है ! को न समझ सकता है और न प्राप्त कर सकता है। यहाँ मनुष्य के ऩाश से तात्पर्य यह है कि अपने शुद्ध स्वरूप को पहचान कर वह मनुष्य जीवन के परमपुरुषार्थ मोक्ष (जीवनमुक्ति) को प्राप्त करने योग्य नहीं रह जाता। विषयों के चिन्तन करने में फंसी अशुद्ध बुद्धि को यहाँ सभी अनर्थों का कारण बताया है। अब मोक्ष प्राप्ति (इसी जीवन में मन की गुलामी से मुक्त हो जाने का)  साधन बताते हैं- 

रागद्वेषवियुक्तैः तु विषयान् इन्द्रियैः चरन्। 

आत्मवश्यैः विधेयात्मा प्रसादम् अधिगच्छति।। (2.64)

।।2.64।। नित्य-अनित्य विवेक के निरंतर अभ्यास द्वारा अज्ञान से रहित साधक (अर्थात अविद्या, अस्मिता , राग-द्वेष, अभिनिवेश पंचक्लेश से रहित साधक) विषयों का सेवन करता हुआ भी बहुत जल्दी चित्तवृत्तियों  के शांत होने से आनन्द स्वरुप आत्मा (सच्चिदानन्द ब्रह्म ) में प्रतिष्ठित हो जाता है। 

(3K में) आसक्ति और (उस आसक्ति को दूर करने का जो गुरु-शास्त्र -इष्टदेव उपदेश देते हों उनके प्रति) द्वेष को रागद्वेष कहते हैं इन दोनों को लेकर ही इन्द्रियों की स्वाभाविक प्रवृत्ति हुआ करती है। परंतु जो मुमुक्षु होता है वह स्वाधीन अन्तःकरण वाला अर्थात् जिसका अन्तःकरण इच्छानुसार वश में है ऐसा पुरुष रोग-द्वेष से रहित और अपने वशमें की हुई इन्द्रियों द्वारा अनिवार्य विषयों को ग्रहण करता हुआ भी प्रसाद को प्राप्त होता है। प्रसन्नता और स्वास्थ्य को प्रसाद कहते हैं। पूजन विधि के अन्त में प्रसाद वितरण की क्रिया इस सिद्धान्त की ही द्योतक है।  अद्वैतवादी वेदान्ती चित्तशुद्धि को (चित्त-वृत्तियों के निरोध को)  प्रसाद समझते हैं। प्रसाद को प्राप्त करने पर क्या होगा सुनो

प्रसादे  सर्वदुःखानाम् हानिः अस्य उपजायते। 

 प्रसन्नचेतसः हि आशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।। 

।।2.65।। प्रसाद के होने पर सम्पूर्ण दुखों का अन्त हो जाता है (आध्यात्मिकादि तीनों प्रकारके समस्त दुःखोंका नाश हो जाता है), और प्रसन्नचित्त पुरुष की बुद्धि ही शीघ्र ही आत्मा में स्थिर हो जाती है।।

 " आधिदैविक आधिभौतिक और आध्यात्मिक त्रिविध ताप एवं अनेक कष्ट, पाप-संताप की निवृत्ति केवल भगवन्नाम स्मरण में है। अतः जीवन में अखण्ड-प्रचण्ड पुरुषार्थ और अविच्छिन्न ईश्वरीय स्मृति (Real I-आत्मा) बनी रहे !"  इस वाक्य का अभिप्राय यह है कि इस प्रकार प्रसन्नचित्त और आत्मा में स्थिर-बुद्धि वाले पुरुष को कृत-कृत्यता मिलती है। 

अभिप्राय यह कि तृष्णा (3K में आसक्ति) के रहते हुए तो सुख की गन्धमात्र भी नहीं मिलती।

इन्द्रियाणाम् हि चरताम् यत् मनः अनुविधीयते। 

 तत् अस्य हरति प्रज्ञाम् वायुः नावम् इव अम्भसि।। (2.67) 

।।2.67।। अपने-अपने विषयों में विचरती हुई 5 इन्द्रियों में से एक ही इन्द्रिय जिस जीव के मन को (अली-मृग-मीन -पतंग-गज को ) अपना अनुगामी बना लेती है, वह अकेला मन जल में नौका को वायु की तरह इसकी प्रज्ञा (जीव ब्रह्मैव न अपरः में प्रतिष्ठित बुद्धि या नित्य-अनित्य विवेक प्रयोग शक्ति को) हर लेता है। (जैसे नाव के नाविक की मृत्यु हो गयी हो और उसके पाल खुले हों तब वह नाव पूरी तरह उन्मत्त तूफानों और उद्दाम तरंगों की दया पर आश्रित होगी। तरंगों के भयंकर थपेड़ों से इधरउधर भटकती हुई वह लक्ष्य को प्राप्त किये बिना बीच में ही नष्ट हो जायेगी।) 

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं

समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।

तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे

स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।2.70।।

।।2.70।। जैसे सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में (अनेक नदियों के) जल (उसे विचलित किये बिना) समा जाते हैं। वैसे ही जिस पुरुष की विवेकी-बुद्धि में कामनाओं (3K के ऐषणाओं)  के विषय उसमें (विकार उत्पन्न किये बिना) समा जाते हैं; वह पुरुष शान्ति प्राप्त करता है।  न कि भोगों की कामना करने वाला पुरुष।।

विषयों के बीच रहता हुआ इन्द्रियों के द्वारा समस्त व्यवहार करता हुआ भी जो पुरुष स्वस्वरूप की स्थिति से विचलित नहीं होता वही ज्ञानी (आत्मज्ञानी)  है सन्त है। भगवान् स्पष्ट कहते हैं कि ऐसा पुरुष ही वास्तविक शान्ति और आनन्द प्राप्त करता है। इतना कहने मात्र से मानो उन्हें सन्तोष नहीं होता और आगे वे कहते हैं भोगों की कामना करने वाले (3K में आसक्त) पुरुषों को कभी शान्ति नहीं मिलती

विहाय  कामान् यः सर्वान् पुमान् चरति निःस्पृहः। 

निर्ममः निरहंकारः सः शान्तिम् अधिगच्छति।। (2.71)

परम शान्ति को प्राप्त पुरुष के मन-बुद्धि की स्थिति कैसी होती है ?  वह पुरुष 3K  कामनाओं का तथा विषयों के प्रति स्पृहा लालसा आसक्ति का सर्वथा त्याग कर देता है। उस पुरुष में अहंकार - (Apparent I  M/F नाम-रूप देहभाव ) का अभाव होता है और ममत्व का पूर्ण अभाव होता है। जिस अवस्था में 'अहंकार' नहीं होता, जैसे सुषुप्ति में -ऐषणा , इच्छा, आसक्ति आदि का अनुभव भी नहीं होता। जीवन में हमारे समस्त दुखों का कारण अहंकार "मैं" (Apparent I  M/F नाम-रूप देहभाव, आदम और हव्वा शरीर मानना) और उससे उत्पन्न ममभाव स्वार्थ और असंख्य कामनायें हैं। 

संन्यास का अर्थ है त्याग अतः अहंकार और स्वार्थ को पूर्णरूप से परित्याग करके वैराग्य का जीवन जीना वास्तविक संन्यास है।जिससे वह साधक सतत अपने पूर्ण दिव्य स्वरूप (Real I) की अनुभूति में रह सकता है। जीवन से पलायन करने , फ़टे-पुराने वस्त्र पहनने अथवा केवल गेरुये वस्त्र धारण करने को संन्यास समझने की जो गलत धारणा समाज में फैल गई है,उसनेे उपनिषदों के महान् तत्त्वज्ञान (महावाक्यों) को थोड़ा समझने में कठिन जैसा कर दिया है।  वास्तव में हिन्दू वैदिक सनातन धर्म केवल उसी को संन्यासी स्वीकार करता है,  जिसने विवेक द्वारा अहंकार (Apparent I  M/F नाम-रूप देहभाव, आदम और हव्वा शरीर मानना) और स्वार्थ को त्याग कर स्फूर्तिमय जीवन जीना सीखा है।

एक सच्चे संन्यासी का अत्यन्त सुन्दर वर्णन श्री शंकराचार्यजी  अपने भाष्य में इस प्रकार करते हैं वह पुरुष जो सब कामनाओं को (3K में ऐषणाओं आसक्ति को ) त्यागकर जीवन में सन्तोषपूर्वक रहता हुआ शरीर धारणमात्र के उपयोग की किसी भी वस्तुओं में ममत्व भाव नहीं रखता न ज्ञान का अभिमान करता है, ऐसा ब्रह्मवित् स्थितप्रज्ञ पुरुष निर्वाण (शान्ति) को प्राप्त करता है जहाँ संसार के सब दुखों की आत्यन्तिक निवृत्ति होती है। संक्षेप में ब्रह्मवित् ज्ञानी पुरुष ब्रह्म ही बन जाता है

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ न एनाम् प्राप्य विमुह्यति। 

 स्थित्वा अस्याम् अन्तकाले अपि ब्रह्मनिर्वाणम् ऋच्छति।।

।।2.72।। हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है।।

 सब इच्छाओं के त्याग का अर्थ है 'मिथ्या अहंकार' का त्याग।  अहंकार रहित अवस्था निष्क्रिय अर्थहीन शून्य नहीं है। जहाँ भ्रान्तिजनित अहंकार समाप्त हुआ (जैसे ही Apparent I  M/F नाम-रूप देहभाव, आदम और हव्वा शरीर को 'मैं' समझने वाली बुद्धि/दृष्टि में परिवर्तन हुआ) वहीं पर पूर्ण ज्ञानस्वरूप आत्मा प्रकाशित होता है। अपने हृदय में स्थित आत्मा को पहचानने का ही अर्थ है उसी समय सर्वत्र व्याप्त नित्य ब्रह्म (Real I) को पहचानना।  अहंकार के नष्ट होने पर अपने नित्य चैतन्य आत्मा का अनुभव उससे भिन्न रहकर नहीं होता वरन् उसके साथ एकत्व का अनुभव (अद्वैत का अनुभव) ही होता है। अतः इस साक्षात्कार को ब्राह्मी स्थिति कहा गया है

यहाँ एक शंका उठ सकती है कि क्या आत्मानुभव के पश्चात् भी हमें (प्रारब्ध के कारण)  पुन मोहित होकर अहंकार से उत्पन्न दुखों का भोग हो सकता है ?  ऐसे किसी स्थायी पुनर्मोह का यहाँ निषेध करके भगवान् हमारे भय को दूर कर देते हैं। और भी एक बात है कि आत्म-साक्षात्कार का युवावस्था में ही होना आवश्यक नहीं हैं वृद्धावस्था अथवा जीवन के अन्तिम क्षणों में भी यदि मनुष्य अपने स्वयंसिद्ध नित्य स्वरूप (Real I) को पहचान लेता है तब भी वह अनुभव ब्राह्मी स्थिति के लिए पर्याप्त है

मिथ्या (जगत) का निषेध और सत्य (ब्रह्म-ब्रह्मैव इदं सर्वं !) का प्रतिपादन यही वह मार्ग है जिसका उपनिषदों में आत्मप्राप्ति के लिए उपदेश है। कर्मयोग उस ज्ञान का व्यावहारिक स्वरूप है जिसका निरूपण व्यासजी ने गीता में अपनी मौलिक शैली में किया है। अनासक्त भाव से सिद्धि और असिद्धि में समान रहते हुए कर्म करने का अर्थ है अहंकार के अधिकार (M/F देहअहं)  को ही समाप्त करना और इस प्रकार अनजाने ही वहाँ उच्चतर सत्य (जीवो ब्रह्मैव न अपरः) की स्थापना करना। 

अस्तु अद्वैत वेदान्त के निदिध्यासन से गीता में वर्णित कर्मयोग की साधना भिन्न नहीं है। परन्तु अर्जुन भगवान् के केवल वाच्यार्थ को ही ग्रहण करता है और उसके मन में एक सन्देह उत्पन्न होता है जिसे वह तृतीय अध्याय के प्रारम्भ में व्यक्त करता है।

अतः अगले अध्याय (गीता-तीसरे अध्याय ) में भगवान् श्रीकृष्ण कर्मयोग का विस्तारपूर्वक विवेचन करते हैं। conclusion : ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषस्तु ब्रह्मविद्यायां, योगाशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगोनाम द्वितीयोऽध्याय।।

इस प्रकार श्रीकृष्णार्जुन संवाद के रूप में ब्रह्मविद्या और योगशास्त्र स्वरूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का सांख्ययोग नामक दूसरा अध्याय समाप्त होता है।

कपिल मुनि जी के सांख्य दर्शन के अर्थ में इस अध्याय का नाम सांख्ययोग नहीं है। यहाँ सांख्य शब्द का प्रयोग उसकी व्युत्पत्ति के आधार पर किया गया है जिसके अनुसार सांख्य का अर्थ हैं किसी विषय का युक्तियुक्त वह विवेचन जिसमें अनेक तर्क प्रस्तुत करने के पश्चात् किसी विवेकपूर्ण निष्कर्ष पर हम पहुँचते हैं। इस अर्थ में तत्त्वज्ञान से पूर्ण इस अध्याय को संकल्प वाक्य में सांख्ययोग कहा गया है।

यह सत्य है कि मूल महाभारत में गीता के अध्यायों के अन्त में यह संकल्प वाक्य नहीं मिलते। किसी एक व्यक्ति को इनकी रचना का श्रेय देने के विषय में व्याख्याकारों में मतभेद है। तथापि यह स्वीकार किया जाता है कि एक अथवा अनेक विद्वानों ने प्रत्येक अध्याय के विषय का अध्ययन कर उसका उचित नामकरण किया है। गीता के सभी विद्यार्थियों के लिए वास्तव में ये नाम उपयोगी हैं। श्री शंकराचार्य जी ने इस विषय पर भाष्य नहीं लिखा है।]

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स्वामी विवेकानन्द ने 21 जनवरी, 1894 ई. को 'तरुण यहूदी संघ सभागार ' (Young Men's Hebrew Association Hall) में 'तुलनात्मक धर्म-विज्ञान' [Comparative Theology] विषय पर एक भाषण दिया था। अब तक विवेकानन्द किसी न किसी दानार्थी संस्था द्वारा निर्धारित विषय पर व्याख्यान देते रहे हैं और यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि स्वामी विवेकानन्द के भाषण से उन संगठनों को आर्थिक सहायता प्राप्त हुई होगी। लेकिन 21 जनवरी, 1894 की रात को स्वामी विवेकानन्द ने जो भाषण दिया , उन्होंने वह भाषण सिर्फ अपने उद्देश्य को लाभ पहुँचाने के लिए दिया था । यह भाषण श्री ब्रिंकले ( Mr. Hu L. Brinkley) नामक उनके एक घनिष्ट मित्र और बहुत अच्छे प्रशंसक द्वारा आयोजित किया गया था, जिसका पूरा खर्च उन्होंने ही वहन किया था। भारत से आये सुविख्यात वक्ता को सुनने , इस नगर में अन्तिम बार करीब 200 लोग उपस्थित हुए थे। 

वक्ता के भाषण प्रथम बिंदु यह स्पष्ट करने का था कि - " विभिन्न सम्प्रदायों की जैसी मान्यता या मत है और धर्मों के जो सिद्धान्त (सनातन महावाक्य हैं) उनमें क्या वैसा कोई अन्तर है ?" (Can there be such a distinction between religions as their creeds would imply?)  उन्होंने कहा कि अब कोई अन्तर नहीं है ,  और वे सब धर्मों द्वारा की हुई प्रगति का सिंहावलोकन करके  उनकी सतही वस्तुस्थिति पर पुनः आ गए। उन्होंने उदाहरण पेश करते हुए कहा कि  'primitive man' आदि-मानव (आदिवासी मनुष्यों) में भी परमेश्वर की कल्पना के विषय में ऐसे मतभेद अवश्य रहे होंगे। परन्तु ज्यों ज्यों संसार की नैतिक, चारित्रिक और बौद्धिक प्रगति क्रमशः होती गयी , भेद अधिकाधिक असपष्ट (indistinct) होते गए। यहाँ तक कि अंत में वह पूरी तरह मिट गए , और अब एक ही सर्वव्यापी सनातन सिद्धान्त बच रहा, और वह है- निरपेक्ष सत्त्ता (absolute existence.परम अस्तित्व, निर्गुण-निराकार आत्मा, ब्रह्म, अल्ला , ईश्वर) । (until finally it had faded away entirely, and now there was one all - prevalent doctrine -- that of an absolute existence.) 

  उन्होंने कहा , " कोई जंगली -गँवार आदमी भी ऐसा नहीं मिलता, जो किसी न किसी प्रकार के ईश्वर में विश्वास न करता हो। " ("No savage", said the speaker, "can be found who does not believe in some kind of a god.) 

" आधुनिक विज्ञान (Modern science) यह नहीं कहता कि वह इसे ज्ञान का प्रकटन मानता है या नहीं। जंगली-गँवार  जातियों में प्रेम अधिक नहीं होता। वे डर (terror-आतंक) में जीते हैं।इनकी अंधविश्वासी कल्पना (superstitious imaginations) में किसी 'प्राणघातक-आत्मा' (malignant spirit) का चित्र रहता है , जिसके सामने वे डर और आतंक से काँपते रहते हैं। जो चीज उस आदिवासी को प्रिय है , वही (5 घैला दारू-5 मुर्गा) उस दुष्ट शक्ति को भी प्रसन्न करेगी , ऐसा वह मानता है। (Whatever he likes he thinks will please the evil spirit.) जो कुछ उसे सन्तुष्ट करता है, वही उस घातक -आत्मा के कोप को भी शांत करता होगा। (What will pacify him he thinks will appease the wrath of the spirit.)  इसी उद्देश्य से वह अपने साथी वनवासी के विरुद्ध भी काम करता है। (To this end he labours even against his fellow - savage.")

वक्ता ने ऐतिहासिक तथ्यों से यह दिखाया कि जंगली आदमी पूर्वजों की पूजा से हाथियों की पूजा करने लगा, और बाद में देवताओं की पूजा करने लगा, जैसे कि बिजली गरज (Thunder) और तूफ़ान (Storms) के देवता। तब संसार का धर्म बहुदेववाद (polytheism) था। "सूर्योदय का सौन्दर्य , सूर्यास्त की गरिमा , तारों जड़ित रात्रि का रहस्यमय रूप और बिजली की कड़क और वज्र की गरज की बिचित्रता ने इस आदिम मनुष्य को इतना अधिक प्रभावित किया कि वह उसे समझ नहीं सका , और उसने एक अन्य उच्चतर और अधिक शक्तिशाली व्यक्ति की कल्पना की, जो उसकी नजरों से दिखने वाली अनंत घटनाओं को संचालित और नियंत्रित कर रही थी। " -विवेकानन्द ने आगे कहा -  " बाद में एक और युग आया -- एकेश्वरवाद (monotheism ) का युग। सभी (इंद्र-वरुण आदि) देवता मानो एक (ब्रह्म) में समाकर खो गए, और उसे ईश्वरों का ईश्वर, इस विश्व-ब्रह्माण्ड की संचालिका-शक्ति (काली?) माना गया।" बाद में वक्ता ने आर्यजाति का इतिहास बताया , जहाँ उन्होंने कहा था , " हम परमेश्वर में जीते और चलते हैं। वही हमारी गति है। 

 " Then there came another period known to metaphysics as the "period of Pantheism". This race rejected Polytheism and Monotheism, and the idea that God was the universe, and said "the soul of my soul is the only true existence. My nature is my existence and will expand to me." इसके बाद एक और युग आया , जिसे हमारे अध्यात्मविज्ञान (metaphysics' या तत्वमीमांसा) में "सर्वेश्वरवाद का युग" (period of Pantheism) कहा जाता है। इस जाति ने बहुदेववाद (Polytheism)  और एकेश्वरवाद (Monotheism) को भी नकार दिया, और इस कल्पना को भी नहीं माना कि ईश्वर ही विश्व-ब्रह्माण्ड बन गया है। और कहा "मेरी प्रकृति (अन्तर्निहित ब्रह्मत्व ही 'वास्तविक पहचान') ही मेरा अस्तित्व है और वह भीतर से अभिव्यक्त होगी। (और कहा कि 'मेरी आत्मा की आत्मा ही वास्तविक सत है। मेरा स्व-स्वरुप ही मेरा अस्तित्व है और वह मुझपर अभिव्यक्त होगी।)  

विवेकानन्द ने बाद में बौद्ध धर्म की चर्चा करते हुए कहा कि , " बौद्ध न तो ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार ही करते हैं , न अस्वीकार।  इस विषय में जब बुद्ध से राय माँगी गयी , तो उन्होंने केवल यही कहा - " तुम दुःख देखते हो। तो उसे कम करने का यत्न करो। " (You see misery. Then try to lessen it. ईश्वर तो दीखते नहीं ? इसलिए To a Buddhist misery is ever present, and society measures the scope of his existence.  बौद्ध के लिए दुःख सदा उपस्थित है , और समाज उसके अस्तित्व की मर्यादा निश्चित करता है। उन्होंने कि मुसलमान भी यहूदियों के प्राचीन व्यवस्थान (Old Testament)  और ईसाईयों के नव व्यवस्थान ( New Testament) को मानते हैं। वे ईसाईयों को पसंद नहीं करते , क्योंकि वे विधर्मी (heretics- स्वधर्म भ्रष्ट) हैं , और मनुष्य रूपी ईश्वर की पूजा (व्यक्ति-पूजा man - worship, पैगम्बर, नेता की पूजा) की शिक्षा देते हैं। (Mohammed ever forbade his followers having a picture of himself.)  जबकि मुहम्मद सदा अपने अनुययियों से कहते थे कि मेरी एक तस्वीर भी अपने पास न रखो। (१०/३६)       

उन्होंने कहा, "अगला सवाल यह उठता है कि क्या ये धर्म सच्चे हैं या उनमें से कुछ सच्चे हैं और कुछ झूठे? वे सभी एक ही नतीजे पर पहुँचे हैं, जो एक पूर्ण और अनंत अस्तित्व है। एकता ही धर्म का मकसद है।" (They have all reached one conclusion, that of an absolute and infinite existence. Unity is the object of religion.) सभी धर्म एक ही निष्कर्ष पर पहुँचे कि - एक ही निर्गुण निराकार, निरुपाधिक या परम और अनंत अस्तित्व है, जो समय -समय पर सगुण -साकार रूप में अवतार लेता रहता है। अनेकता में एकता को दिखा देना ही धर्म का उद्देश्य है। "The multiple of phenomena that is seen at every hand is only the infinite variety of unity." इस दृश्य जगत में नानत्व जो सब और दिखाई देता है , इसी एकता की अनंत विविधता है। (अनेकता में एकता को स्वयं देखना और दूसरों को भी दिखा देना , यही भारतीय संस्कृति की विशेषता है।)  धर्म /शिक्षा के विश्लेषण से पता चलता है कि मनुष्य मिथ्या (fallacy-भ्रान्ति) से सत्य की ओर नहीं जाता , परन्तु निम्नतर सत्य से उच्चतर सत्य की ओर जाता है। (an analysis of religion shows that man does not travel from fallacy to truth, but from a lower truth to a higher truth. (देह, इन्द्रिय, मन , बुद्धि से श्रेष्ठ आत्मा तक पहुँचता है।)

" एक आदमी बहुत से आदमियों के पास एक ही कोट लेकर जाता है। कुछ कहते हैं, यह उनके शरीर पर फिट नहीं बैठता। अच्छा तो तुम हट जाओ , तुम इस कोट को पहनने योग्य ही नहीं हो। किसी भी ईसाई पादरी से पूछो कि उसके सिद्धांत से और मतों से न मिलने-जुलने वाले अन्य पंथों को क्या हो गया है , क्यों वे तुम्हारे सिद्धांत और मतों के विरुद्ध हैं ? तो वह पादरी उत्तर में यही कहेगा कि , " ओह , वे ईसाई नहीं हैं। "

परन्तु हमारे सनातन धर्म में इससे श्रेष्ठ शिक्षा दी जाती है। हमारा अपना स्वभाव , प्रेम और विज्ञान की कसौटी - हमें अधिक श्रेष्ठ शिक्षा देते हैं। (But we have better instruction than these. Our own natures, love, and science -- they teach us better.) नदी या समुद्र में उठने वाले लहरों को हटा दो , तो क्या होगा ? पानी रुककर सड़ने लगेगा। मतभेदों को नष्ट कर डालो और विचार मर जायेंगे।  (Like the eddies to a river, take them away and stagnation follows. Kill the difference in opinions, and it is the death of thought.) गति आवश्यक है। विचार मन की गति है , और जब वे रुक जाते हैं , तो मृत्यु शुरू हो जाती है। "          

"यदि किसी पानी के गिलास की तली में हवा का एक साधारण अणु (molecule) भी रख दो, तो वह ऊपर के अनन्त वायु-मण्डल ( infinite atmosphere)  से मिलने के लिए कितना संघर्ष करता है ? आत्मा की भी वही दशा है। ("If you put a simple molecule of air in the bottom of a glass of water it at once begins a struggle to join the infinite atmosphere above. So it is with the soul.) वह भी छटपटा रही है , अपने शुद्धस्वरूप को प्राप्त करने के लिए और अपने भौतिक शरीर से मुक्त होने के लिए। वह अपना अनन्त विस्तार (infinite expansion) पुनः प्राप्त करना चाहती है।  (It is struggling to regain its pure nature and to free itself from this material body. It wants to regain its own infinite expansion. This is everywhere the same. Among Christians, Buddhists, Mohammedans, agnostic, or priest, the soul is struggling.) सभी जगह यही होता है। ईसाईयों , बौद्धों , मुसलमानों , अज्ञेयवादियों , और पण्डितों (priest) में आत्मा अपने अन्तर्निहित ब्रह्मत्व को अभिव्यक्त करने के लिए निरन्तर छटपटाती  रहती है।  

 एक नदी घुमावदार पहाड़ से होकर हजारों मील नीचे बहती है, तब जाकर समुद्र को मिलती है, और एक आदमी वहाँ खड़ा होकर कहता है कि ' ओ नदी, तुम वापस जाओ और नए सिरे से शुरू करो , कोई और सीधा रास्ता अपनाओ ! " ऐसा आदमी मूर्ख ही होगा। (You are a river that flows from the heights of Zion.) तुम वह नदी हो जो - Mount Zion (इज़राइल यहूदी) की पहाड़ी से बहती है। जैसे मैं (हिन्दू) हिमालय की ऊँची चोटियों से बहता हूँ। मैं तुमसे यह नहीं कहता कि वापस जाओ और मेरी तरह नीचे आओ, तुम गलत हो। ऐसा कहना गलत दिशा में बहने से भी ज्यादा बड़ी मूर्खता होगी।  (जितने मत हैं , उतने पथ हैं ! इसलिए) तुम अपने ही विश्वासों पर टिके रहो 

(That is more wrong than foolish. Stick to your beliefs. The truth is never lost. Books may perish, nations may go down in a crash, but the truth is preserved and is taken up by some man and handed back to society, which proves a grand and continuous revelation of God."'सत्य' कभी नष्ट नहीं होता , पुस्तकें चाहे नष्ट हो जाएँ, राष्ट्र चकनाचूर हो जाये, लेकिन सत्य सुरक्षित रहता है , जिसे कुछ लोग पुनः उठाते हैं , और समाज को देते हैं , और वह परमेश्वर का महान अविच्छिन्न साक्षात्कार सिद्ध होता है। १० /पृष्ठ ३७) 

The Hindoo Monk - (Appeal-Avalanche, January 16, 1894)

Swami Vive Kananda, the Hindoo monk, who is to lecture at the Auditorium [Memphis] tonight, is one of the most eloquent men who has ever appeared on the religious or lecture platform in this country. His matchless oratory, deep penetration into things occult, his cleverness in debate, and great earnestness captured the closest attention of the world’s thinking men at the World’s Fair Parliament of Religion, and the admiration of thousands of people who have since heard him during his lecture tour through many of the states of the Union.


In conversation he is a most pleasant gentleman; his choice of words are the gems of the English language, and his general bearing ranks him with the most cultured people of Western etiquette and custom. As a companion he is a most charming man, and as a conversationalist he is, perhaps, not surpassed in the drawing-rooms of any city in the Western World. He speaks English not only distinctly, but fluently, and his ideas, as new as sparkling, drop from his tongue in a perfectly bewildering overflow of ornamental language.


Swami Vive Kananda, by his inherited religion or early teachings, grew up a Brahmin, but becoming converted to the Hindoo religion he sacrificed his rank and became a Hindoo priest, or as known in the country of oriental ideality, a sanyasin. He had always been a close student of the wonderful and mysterious works of nature as drawn from God’s high conception, and with years spent as both a student and teacher in the higher colleges of that eastern country, he acquired a knowledge that has given him a worldwide reputation as one of the most thoughtful scholars of the age.


His wonderful first address before the members of the World’s Fair Parliament stamped him at once as a leader in that great body of religious thinkers. During the session he was frequently heard in defence of his religion, and some of the most beautiful and philosophical gems that grace the English language rolled from his lips there in picturing the higher duties that man owed to man and to his Creator. He is an artist in thought, an idealist in belief and a dramatist on the platform.


Since his arrival in Memphis he has been guest of Mr. Hu L. Brinkley, where he has received calls day and evening from many in Memphis who desired to pay their respects to him. He is also an informal guest at the Tennessee Club and was a guest at the reception given by Mrs. S. R. Shepherd, Saturday evening. Col. R. B. Snowden gave a dinner at his home at Annesdale in honor of the distinguished visitor on Sunday, where he met Assistant Bishop Thomas F. Gailor, Rev. Dr. George Patterson and a number of other clergymen.


Yesterday afternoon he lectured before a large and fashionable audience composed of the members of the Nineteenth Century Club in the rooms of the club in the Randolph Building. Tonight he will be heard at the Auditorium on “Hindooism”.

---VivekaVani/https://vivekavani.com/

1.5 IN A SOUTHERN CITY

https://englishbooks.rkmm.org/s/lsv/m/swami-vivekananda-in-the-west-new-discoveries/a/1-5-in-a-southern-city

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 >>> द्वैत के कारण ही भय होता है  तैत्तिरीयोपनिषद २/७/१ में कहा गया है है - " उदरम् अन्तरम् कुरुते अथ तस्य भयम् भवति ।" अर्थात जो व्यक्ति ब्रह्म और अपने अथवा दूसरों में -' उदरम् ' थोड़ा-सा भी, अन्तरम् कुरुते - अन्तर समझता है, उसको भय होता है।'


यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः।

प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ।।8.23।।

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन !   जिस काल में (मार्ग में) शरीर त्याग कर गये हुए योगीजन अपुनरावृत्ति को, और (या) पुनरावृत्ति को प्राप्त होते हैं, वह काल (मार्ग) मैं तुम्हें बताऊँगा।।

       वैशेषिक दर्शन के संस्थापक महर्षि कणाद ने धर्म को परिभाषित करते हुए कहा है - "यतोऽभ्युदय-निःश्रेयस सिद्धिः स धर्मः। "  अर्थात जिससे 'अभ्युदय और निःश्रेयस'  दोनों प्राप्त होते हैं उसी को धर्म कहते हैं !  ये वे दो लक्ष्य हैं जिन्हें प्राप्त करने के लिए मनुष्य अपने जीवन में प्रयत्न (पुरुषार्थ) करते हैं। 
      अभ्युदय का अर्थ है लौकिक सम्पदा और भौतिक उन्नति के माध्यम से अधिकाधिक विषयों के उपभोग के द्वारा सुख प्राप्त करना। यह वास्तव में सुख का आभास मात्र है क्योंकि प्रत्येक उपभोग के गर्भ में दुःख छिपा रहता है।
     निःश्रेयस का अर्थ है अनात्मबंध से मोक्ष। ( निःश्रेयस का अर्थ हुआ नश्वर देह-मन को मैं समझने से मुक्ति या सिंह शावक का भेंड़त्व से विसम्मोहित हो जाने का परमानन्द !) इसमें मनुष्य आत्मस्वरूप का ज्ञान प्राप्त करता है जो सम्पूर्ण जगत् का अधिष्ठान (सिनेमा का पर्दा) है। इस स्वरूपानुभूति में संसारी जीव की समाप्ति और परमानन्द की प्राप्ति होती है। ये दोनों लक्ष्य परस्पर विपरीत धर्मों वाले हैं। भोग अनित्य है और मोक्ष नित्य एक में संसार का पुनरावर्तन है तो अन्य में अपुनरावृत्ति। अभ्युदय में जीवभाव बना रहता है जबकि ज्ञान में आत्मभाव दृढ़ बनता है। आत्मानुभवी पुरुष अपने आनन्दस्वरूप का अखण्ड अनुभव करता है। यदि लक्ष्य परस्पर भिन्नभिन्न हैं तो उन दोनों की प्राप्ति के मार्ग भी भिन्नभिन्न होने चाहिए। भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ भरतश्रेष्ठ अर्जुन को वचन देते हैं कि वे उन दो आवृत्ति और अनावृत्ति मार्गों का वर्णन करेंगे। 
यहाँ काल शब्द का द्वयर्थक प्रयोग किया गया है। 
काल का अर्थ है प्रयाण काल और उसी प्रकार प्रस्तुत सन्दर्भ में उसका दूसरा अर्थ है मार्ग जिससे साधकगण देहत्याग के उपरान्त अपने लक्ष्य तक पहुँचते हैं। प्रथम अपुनरावृत्ति का मार्ग बताते हैं।]   
>>>ब्रह्म ही माया के आवरण से  (ताना और भरनी से)  ढँका हुआ है, उस ब्रह्म को नहीं देख पाना ही मानवजीवन की मूल समस्या है।  

झीनी-झीनी रे बीनी चदरिया ॥

काहे कै ताना काहे कै भरनी, कौन तार से बीनी चदरिया ॥ १॥

इड़ा पिङ्गला ताना भरनी, सुखमन तार से बीनी चदरिया ॥ २॥


आठ कँवल दल चरखा डोलै, पाँच तत्त्व गुन तीनी चदरिया ॥ ३॥

साईं को सियत मास दस लागे, ठोंक ठोंक कै बीनी चदरिया ॥ ४॥


सो चादर सुर नर मुनि ओढी, ओढि कै मैली कीनी चदरिया ॥ ५॥

दास कबीर जतन करि ओढी, ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया ॥ ६॥

इस पद्द में कबीर दास जी बड़ी कीमती बातें कही हैं, जिसका हर एक शब्द समझने योग्य है ।
झीनी-झीनी बिनी चदरिया का अर्थ है कि बनाने वाले ने बड़े जतन और बड़े होश से इस शरीर को बनाया है।
     इस लिए इसको तुम जितना जाग कर जीयोगे, उतने ही बारीक और सूक्ष्म जीवन का अनुभव कर पाओगे। जितना सूक्ष्म अनुभव करोगे, देवदुर्लभ मनुष्य शरीर के प्रति उतना ही ज्यादा जागोगे। इस जीवन की चादर बड़ी झीनी है और जितना तुम झीनापन देख पाओगे, उसकी बनावट की बारीकी उतने समझोगे।
काहे कै ताना काहे कै भरनी, कौन तार से बीनी चदरिया
इडा पिङ्गला ताना भरनी, सुखमन तार से बीनी चदरिया

इस शरीर को बनाने के लिए किस ताना, भरनी और तार का इस्तेमाल किया गया है। ताना, भरनी और तार कपड़ा बुनने में इस्तेमाल किया जाता है। यह तुम्हारा दिखाई पड़ने वाला शरीर,मन न दिखाई पड़ने वाले (आत्मा) को छिपाये हुए है। यह चदरिया यानि हमारा शरीर, इंगला-पिंगला ताना भरनी, और सुषमन तार से बुना गया है। अगर इसको समझना चाहते हो तो स्वर शास्त्र की कुछ जानकारी होना जरूरी है।
स्वर शास्त्र के अनुसार इस शरीर में 7200 नाड़ी हैं। जिसमें 10  नाड़ी को प्रमुख मानते हैं। और इनमें भी तीन ईड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी बहुत ही महत्व पूर्ण है जो मेरुदण्ड से जुड़े हैं। ईड़ा को चन्द्र नाड़ी और पिंगला को सूर्य नाड़ी कहा जाता है। सुषुम्ना नाड़ी मूलाधार से आरंभ हो कर सिर के सहस्रार तक अवस्थित है और सभी चक्र सुषुम्ना में ही विद्यमान हैं। अतः यहाँ पर कबीर साहेब इन 3 प्रमुख नाड़ी की बात कर रहे है जिससे ये शरीर रूपी चादर बिनी गयी है।

आठ कँवल दल चरखा डोलै, पाँच तत्त्व गुन तीनी चदरिया

    हमारे संत, महात्मा, ऋषि और मुनि ने शरीर को ही ब्रम्हाण्ड का सूक्ष्म मॉडल बताया है। इसमें 8 चक्र, 5 तत्व और तीन गुण हैं। ये आठ चक्र (मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा, मनश्चक्र (बिन्दु या ललना चक्र), और सहस्त्रार), हमारे शरीर से संबंधित तो हैं लेकिन इन्हें अपनी भैतिक इन्द्रियों द्वारा महसूस नहीं कर सकते हैं। परंतु इनसे निकलने वाली उर्जा ही शरीर को जीवन शक्ति देती है। पंचतत्व या पंच महाभूत माने आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी से सम्पूर्ण सृष्टि का प्रत्येक पदार्थ बना है। प्रकृति के तीन गुण (सत्, रजस् और तमस्) बताए गए हैं।  ये तीनों गुण सभी सजीव-निर्जीव, स्थूल-सूक्ष्म वस्तुओं में विद्यमान रहते हैं। इन तीन गुणों के न्यूनाधिक प्रभाव के कारण ही किसी व्यक्ति का चरित्र निर्धारित होता है

कबीर दास जी कहते हैं कि आठ कंवल, जिनको हम चक्र कहते हैं, उनको अगर ठीक से समझें तो यहाँ कंवल कहने का कारण है। यह तो सिर्फ प्रतीकात्मक है। यदि आपने कभी नदी में कोई भंवर पड़ते देखा है, तो वहां चक्र में पानी घूमता प्रतीत होता है! वैसे ही ऊर्जा आपके शरीर में बने चक्र में घूमती है और उन भंवरों का जो रूप है वह कमल से काफी मिलता -जुलता है मानो जैसे कमल घूम रहा हो।
इन आठ चक्र का द्वार है दस इंद्रियां (पांच कर्म-इंद्रियां, और पांच ज्ञान इंद्रियां) का चरखा है। जब व्यक्ति अज्ञानी होता है, तो कमल नीचे की तरफ झुका मुरझाया हुआ होता है। जैसे-जैसे ऊर्जा ऊपर की तरफ बहनी शुरू होती है, कमल की डंडी सीधी होने लगती है, और कमल सीधा हो जाता है। पूरे कमल के खिल जाने में परम सत्य को पा लिया जाता है। इन्हे ही वेद ने उर्ध्वरेतस् कहा है। जब आप उर्ध्वरेतस् बनोगे तो तुम्हारी ऊर्जा ऊपर की तरफ जाएगी, सब कमल ऊपर की तरफ उठ जाएंगे। जहाँ तक चक्र गिनने की बात करे तो कुछ एक लोग सात कंवल, कुछ आठ कंवल, कोई नौ कंवल और कोई ग्यारह कंवल गिनता है।

साईं को सियत मास दस लागे, ठोंक ठोंक कै बीनी चदरिया

सोई चादर सुर नर मुनि ओढी, ओढि कै मैली कीनी चदरिया

यह शरीर पिंड, स्थूल और सूक्ष्म शरीर से बना है जिसको बुनने (सियत का मतलब होता है सिलना या बुनना) में परमात्मा को दस महीने लग जाते हैं। और जिसको प्रकृति ने बड़े बारिकी से, ध्यान दे कर बनाया है। परमात्मा ने पूरा अस्तित्व बनाने में दस महीने तुम पर खर्च करता है लेकिन तुम इसका कोई मूल्य ही नहीं समझते
कबीर साहेब जी कहते हैं कि प्रकृति द्वारा बनाए गए इस शरीर को सुर (स्वर्ग में रहनेवाला देवता), नर (साधारण मनुष्य), और मुनि (त्यागी जन), सबने ओढ़ी, और इन तीनों ने मैली कर दी। देवता भोग के कारण मैला कर देता है, मुनि त्याग के कारण मैला कर देते हैं। और बीच में जो मनुष्य है, वह खिचड़ी जैसा है। सुबह त्यागी, दोपहर भोगी; शाम त्यागी, रात भोगी। वह चौबीस घंटे में कई दफा बदलता है। भोगी का अर्थ है, वासनाओं के साथ जिसने अपने को इतना जोड़ लिया कि कोई फासला न रहा। देवता, भोगने के शुद्ध प्रतीक हैं। वे सिर्फ भोगते हैं। भोग से चादर मैली हो जाती है। भोगी और त्यागी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उनकी कामना एक ही है। एक को मिल गया है; दूसरे मिल जाए, इसकी आशा में जी तोड़ कर लेगा हुआ है। इसलिए त्यागी भी सपने तो भोग के ही देखता है। कबीर साहेब जी कहते हैं, त्यागी, भोगी दोनों नष्ट कर देते हैं चदरिया को।
दास कबीर जतन करि ओढी, ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया

इस लिए कबीर साहेब जी कहते हैं मैने जतन से ओढ़ी, बड़े सम्हाल कर ओढ़ी, और होश से ओढ़ी और ज्यों की त्यों परमात्मा को वापस कर दी। यहीं मोक्ष है, यहीं मुक्ति की अवस्था है।
अब प्रश्न उठता है कैसे इस चादर को निर्दोष रखें?

कबीर साहेब जी कहते इस चदरिया को बचा लेने की कला है: होश, विवेक और जाग्रत चेतना। करो, जो कर रहे हो, जो करना पड़ रहा है। जो नियति है, पूरा करो क्योंकि भागने से कुछ प्रयोजन नहीं। लेकिन करते समय न करता बनो न भोक्ता । सिर्फ साक्षी रहो, यहीं सम्हाल कर ओढ़ने की कुंजी है।  साभार /https://managelifesolution.co.in/(आध्यात्मिक ज्ञान चर्चा(एक कदम मुक्ति के मार्ग पर)

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>>>"केवलाघो भवति केवलादी" - मनुष्य-निर्माण की आन्तरिक इंजीनियरिंग :     

मोघमन्नं विन्दते अप्रचेता: सत्यं ब्रवीमि वध इत्स तस्य।
नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवित केवलादी।
 (ऋग्वेद,10/117/6) 

[अन्वय :-  मोघं अन्नं विन्दते  अप्रचेता:। स तस्य वध इत्। स आर्यमरणं न पुष्यति। न स सखायां पुष्यति। केवलादी केवलाघ: भवति। इति अहं  सत्यं ब्रवीमि। ।।]
अर्थ- (अप्रचेता:) बुद्धि शून्य अर्थात् मूर्ख आदमी मुफ्त का भोजन, बिना कमाया हुआ भोजन (विन्दते) पाने का यत्न करता है अर्थात् अपने भोजन के लिए कुछ करना नहीं चाहता। स तस्य वध इत् (स) उसका ऐसा व्यापार (तस्य) उसके (वधइत्) नाश का ही कारण है। (केवलादी) जो अकेला खाने वाला है वह (केवलाघ:) केवल पाप का भागी (भवति) होता है। (सत्यं ब्रवीमि) मैं सत्य कहता हूं अर्थात् इस कथन के सच होने में किंचन मात्र भी सन्देह नहीं है। अर्थात - वह व्यक्ति पापी है, जो न तो देवों को भोजन देता है एवं न अपने मित्रों को। केवल अपना ही पेट भरता है  

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व्याख्या :- जीवन के दो बड़े विभाग हैं। एक भोग और दूसरा कर्म। (प्रवृत्ति और निवृत्ति =निष्काम कर्म)   प्रश्न यह है कि क्या इन दोनों का महत्व समान है,  अथवा एक गौण है और दूसरा मुख्य ? यदि ऐसा है तो मुख्य कौन है और गौण कौन है? तुलसीदास जी का कहना है कि-

कर्म प्रधान विश्व करि राखा।
जो जस करै सो तस फल चाखा।।
 
   अर्थात् कर्म मुख्य (प्रधान) है और भोग गौण। अब तनिक अपनी प्रवृत्तियों पर विचार कीजिये। इस सिद्धान्त के विरुद्ध एक बात कही जा सकती है। प्रायः संसार में लोग भोग के लिए ही कर्म करते हैं। यदि भोग की आशा नहीं होती तो नहीं करते। एक चिकित्सक इसलिए चिकित्सा नहीं करता कि उसे चिकित्सा का ज्ञान या सामर्थ्य है अपितु इसलिए कि उससे आर्थिक लाभ होगा। एक वकील इसलिए वकालत नहीं करता कि वह वकालत के काम में दक्ष है अपितु इसलिए कि उसे पैसा मिलता है। इसलिए लोगों ने 'अर्थ' (कामिनी-कांचन भोग?)  को ही सर्वोपरि माना है। लेकिन हर व्यक्ति को अपने अच्छे एवं बुरे कर्म का फल पाना ही होता है। स्वयं भगवान राम को बाली वध की सजा द्वापर युग में जरा नाम के बहेलिए ने उनके पैर पर तीर मारकर किया था। नारायण के पैर में तीर मारने के बाद बहेलिए ने अपनी गलती स्वीकार भी किया था। मगर नारायण रूपी भगवान कृष्ण ने बहेलिए से कहा था कि यह उनके पूर्व के कर्मों का फल है। द्रौपदी ने एक बार अपने आंचल से एक महात्मा की लाज को बचाई थी। जिसके फल द्रौपदी को त्रेता युग में महाभारत के चिर हरण कांड के दौरान प्राप्त हुआ। उन्हें बचाने के लिए [गज-ग्राह के अहंकार >को मारने ?] सीधे नारायण को आना पड़ा था।  वही 10 हजार हाथी के बल वाला दुशासन अपनी मंशा में सफल नहीं हो पाया था।
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