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मंगलवार, 31 मार्च 2026

⚜️️🔱श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय -15 ⚜️️🔱अध्याय-पन्द्रह: पुरुषोत्तम योग⚜️️🔱 केवल एक शास्त्रज्ञ और ब्रह्मज्ञानी सदगुरुदेव के उपदेश से ही परमात्मज्ञान हो सकता है। ⚜️️🔱 भगवत्-तत्वज्ञान हमें शरीरजनित दुखों, मनजनित विक्षेपों और बुद्धिजनित अशान्तियों के बन्धनों से सदा के लिये मुक्त कर देता है⚜️️🔱जो भक्त इस पुरुषोत्तम के साथ पूर्ण तादात्म्य कर लेता है वह भी सर्ववित् कहलाता है ⚜️️🔱 (सांसरिक किसी देह से नहीं केवल ठाकुर, माँ स्वामी जी) अधिक प्रेम होने पर अधिक तादात्म्य होता है ⚜️️🔱अनात्मा के तादात्म्य को त्यागकर जिसने मुझ परमात्मा के साथ पूर्ण तादात्म्य स्थापित कर लिया है, वही परम भक्त है ⚜️️🔱असम्मूढः अर्थात् संमोहरहित पुरुष (शुद्धबुद्धि) है⚜️️🔱साधकों को कर्मयोग (Be and Make) और भक्तियोग के द्वारा चित्तशुद्धि प्राप्त कर नित्य-अनित्य विवेक करना चाहिये।⚜️️🔱विवेक -वैराग्य आदि साधन-चतुष्टय से सम्पन्न साधक जब (सद्गुरुवाक्य , महावाक्य वेदान्त प्रमाण के द्वारा) आत्मविचार करता है तब उस विचार से प्राप्त आत्मबोध ही ज्ञानचक्षु है⚜️️🔱केवल शुद्धबुद्धि (पुरुष) ही नाम और रूपों के विस्तार से विरक्त होकर इस आत्मा को (गुरुदेव के मार्गदर्शन में इष्टदेव को) पहचानते हैं और स्वयं अपने दैनन्दिन जीवन के व्यवहार में आत्मस्वरूप बनकर जीते हैं। ⚜️️🔱 मूढ़बुद्धि की उपाधि से युक्त चैतन्य ही विषयों का भोक्ता जीव (M/F)है। इसका कारण अज्ञान है⚜️️🔱 मनबुद्धि रूप सूक्ष्म शरीर (M/F मूढ़ बुद्धि) में व्यक्त चैतन्य जीव कहलाता है ⚜️️🔱साधक को अपने व्यक्तिगत राग और द्वेष को सर्वथा समाप्त कर देना चाहिये ⚜️️🔱हमें विवेक- पूर्वक जगत् के मिथ्यात्व का निश्चय करना चाहिये ⚜️️🔱 अध्यात्मनित्या- (सतत आत्मनुसन्धान) ⚜️️🔱मनुष्य बनने का व्यावहारिक उपाय है- प्रार्थना, "मैं उस आदि पुरुष की शरण हूँ, जिससे यह पुरातन प्रवृत्ति प्रसृत हुई है" ⚜️️🔱सृष्ट (नश्वर जीव -जगत) और सृष्टिकर्ता (अनश्वर ईश्वर) इन सबको तत्त्वत 'एक ' जानते हैं, तभी हमारा ज्ञान पूर्ण कहलाता है⚜️️🔱आत्मा के अपरोक्ष ज्ञान से यह समूल नष्ट हो जाता है⚜️️🔱 इस संसार वृक्ष को काटने का एकमात्र शस्त्र है असंग अर्थात् वैराग्य।⚜️️🔱M/F स्थूल शरीर से तादात्म्य निवृत्ति को ही वैराग्य कहते हैं। ⚜️️🔱'उस पद का अन्वेषण ' करना चाहिये जिसे प्राप्त हुये पुरुष पुनः लौटते नहीं हैं⚜️️🔱व्यावहारिक उपाय है- प्रार्थना : -तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये'- कि मैं उस आदि पुरुष (इष्टदेव -गुरुदेव) की शरण हूँ जहाँ से यह पुरातन प्रवृत्ति प्रसृत हुई है⚜️️🔱मानी व्यक्ति (arrogant-घमण्डी,हेकड़, अहंकारी व्यक्ति) अपने ऊपर मान को बनाये रखने का अनावश्यक भार या उत्तरदायित्व ले लेता है।⚜️️🔱⚜️️🔱

 श्री भगवानुवाच

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।

छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।15.1।।

।।15.1।। श्री भगवान् ने कहा -- (ज्ञानी पुरुष इस संसार वृक्ष को) ऊर्ध्वमूल और अध:शाखा वाला अश्वत्थ और अव्यय कहते हैं; जिसके पर्ण छन्द अर्थात् वेद हैं, ऐसे (संसार वृक्ष) को जो जानता है, वह वेदवित् है।।



अनित्य संसार का नित्य परमात्मा के साथ जो संबंध है उसको भी इस वर्णन में दर्शाया गया है। यदि परमात्मा एकमेव अद्वितीय सत्य है तो उससे परिच्छिन्न जड़ जगत् कैसे उत्पन्न हुआ ? उत्पन्न होने के पश्चात् कौन इसका धारण पोषण करता है सृष्टिकर्ता अनन्त ईश्वर और सृष्ट सान्त जगत् के मध्य वस्तुत क्या संबंध है ? 
जीवन के विषय में गंभीरता से विचार करना प्रारंभ करते ही मन में इस प्रकार के प्रश्न उठने लगते हैं। वनस्पति शास्त्र में अश्वत्थ वृक्ष का नाम फाइकस रिलिजिओसा है जो लोक में पीपल के वृक्ष के नाम से प्रसिद्ध है। 
अश्वत्थ का अर्थ इस प्रकार है श्व का अर्थ आगामी कल है,  त्थ का अर्थ है स्थित रहने वाला अत अश्वत्थ का अर्थ है वह जो कल अर्थात् अगले क्षण पूर्ववत् स्थित नहीं रहने वाला है।  तात्पर्य यह हुआ कि अश्वत्थ शब्द से इस सम्पूर्ण अनित्य और परिवर्तनशील दृश्यमान जगत् की ओर इंगित किया गया है। 
इस श्लोक में कहा गया है कि इस अश्वत्थ का मूल ऊर्ध्व में अर्थात् ऊपर है। शंकराचार्यजी ने ही उपनिषद् के भाष्य में यह लिखा है कि संसार को वृक्ष कहने का कारण यह है कि उसको काटा जा सकता है 'व्रश्चनात् वृक्ष' !
वैराग्य के द्वारा हम अपने उन समस्त दुखों को समाप्त कर सकते हैं जो इस संसार में हमें अनुभव होते हैं। जो संसारवृक्ष परमात्मा से अंकुरित होकर व्यक्त हुआ प्रतीत होता है उसे हम अपना ध्यान परमात्मा में (ठाकुर, माँ , स्वामीजी का नाम बताने वाले सद्गुरु देव में) केन्द्रित करके काट सकते हैं। 
इतिहास के विद्यार्थियों को अनेक राजवंशों की परम्पराओं का स्मरण रखना होता है। उसमें जो परम्परा दर्शायी जाती है वह इस ऊर्ध्वमूल वृक्ष के समान ही होती है।  एक मूल पुरुष से ही उस वंश का विस्तार होता है। इसी प्रकार  इस संसार वृक्ष का मूल ऊर्ध्व कहा है, जो सच्चिदानन्द ब्रह्म है। 
वृक्ष को आधार तथा पोषण अपने ही मूल से ही प्राप्त होता है इसी प्रकार भोक्ता जीव और भोग्य जगत् दोनों अपना आधार और पोषण शुद्ध अनन्तस्वरूप ब्रह्म से ही प्राप्त करते हैं। उच्च शब्द से तात्पर्य रेखागणितीय उच्चता से नहीं है वरन् श्रेष्ठ आदर्श अथवा मूल्य से है। भावनाओं की दृष्टि से भी स्वभावत मनुष्य सूक्ष्म और दिव्य तत्त्व को उच्चस्थान प्रदान करता है और स्थूल व आसुरी तत्त्व को अधस्थान।
 देश काल और कारण (तीनों गुणों)  के परे होने पर भी परमात्मा को यहाँ ऊर्ध्व कहा गया है। वह जड़ प्रकृति को चेतनता प्रदान करने वाला स्वयंप्रकाश स्वरूप तत्त्व है। स्वाभाविक है कि यहाँ रूपक की भाषा में दर्शाया गया है कि यह संसार वृक्ष ऊर्ध्वमूल वाला है।
इस परिवर्तनशील जगत् (अश्वस्थ) को अव्यय अर्थात् अविनाशी माना गया है। परन्तु केवल आपेक्षिक दृष्टि से ही उसे अव्यय कहा गया है। किसी ग्राम में स्थित पीपल का वृक्ष अनेक पीढ़ियों को देखता है।  जो उसकी छाया में खेलती और बड़ी होती हैं।
इस प्रकार मनुष्य की औसत आयु की अपेक्षा वह वृक्ष अव्यय या नित्य कहा जा सकता है। इसी प्रकार इन अनेक पीढ़ियों की तुलना में जो विकसित होती हैं।  कल्पनाएं और योजनाएं बनाती हैं  प्रयत्न करके लक्ष्य प्राप्त कर नष्ट हो जाती हैं; उस दृष्टि से यह जगत् अव्यय कहा जा सकता है।

छन्द अर्थात् वेद इस वृक्ष के पर्ण हैं। वेद का अर्थ है ज्ञान (इन्द्रियातीत) । ज्ञान की वृद्धि से मनुष्य के जीवन में अवश्य ही गति आ जाती है। आधुनिक जगत् की भौतिक उन्नति विज्ञान की प्रगति, औद्योगिक क्षेत्र की उपलब्धि और अतिमानवीय स्फूर्ति की तुलना में प्राचीन पीढ़ी को जीवित भी नहीं कहा जा सकता।
  वेद अर्थात् ज्ञान की तुलना वृक्ष के पर्णों के साथ करना अनुपयुक्त नहीं है। वृक्ष के पर्ण वे स्थान हैं जहाँ से जल वाष्प बनकर उड़ जाता है जिससे वृक्ष की जड़ों में एक दबाव उत्पन्न होता है। इस दबाव के कारण जड़ों को पृथ्वी से अधिक जल और पोषक तत्त्व एकत्र करने में सुविधा होती है। अत यदि वृक्ष के पत्तों को काट दिया जाये तो वृक्ष का विकास तत्काल अवरुद्ध हो जायेगा। पत्तों की संख्या जितनी अधिक होगी वृक्ष का परिमाण और विकास उतना ही अधिक होगा। 
    जो पुरुष न केवल अश्वत्थ वृक्ष को ही जानता है वरन् उसके पारमार्थिक सत्यस्वरूप ऊर्ध्वमूल  को भी पहचानता है वही पुरुष वास्तव में वेदवित् अर्थात् वेदार्थवित् है। उसका वेदाध्ययन का प्रयोजन सिद्ध हो गया है। वेदों का प्रयोजन सम्पूर्ण विश्व के आदि स्रोत एकमेव अद्वितीय परमात्मा का बोध कराना है। (कुर्थौल ब्रह्मथानी)
 'सत्य' (परम सत्य ,इन्द्रियातीत) का पूर्णज्ञान न केवल शुद्धज्ञान (भौतिक विज्ञान-अपरा विद्या) से और न केवल भक्ति (परा विद्या) से ही प्राप्त हो सकता है। यह गीता का निष्कर्ष है। जब हम इहलोक (इन्द्रियगोचर सत्य -भौतिक विज्ञान) और परलोक (इन्द्रियातीत सत्य-वेद ), सान्त (संकीर्ण ह्रदय-कच्चा मैं )  और अनन्त (विस्तृत ह्रदय-पक्का मैं), सृष्ट (जीव  -जगत)  और सृष्टिकर्ता (ईश्वर) इन सबको तत्त्वत 'एक ' जानते हैं, तभी हमारा ज्ञान पूर्ण कहलाता है। 
'तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥'
 इस एकत्व ज्ञान को अपने ववहार से (अविरोध से ) भी सभी की यथायोग्य सेवा द्वारा उसे सार्वभौमिक प्रेम को अभिव्यक्त करते हैं) तभी हमारा ज्ञान पूर्ण कहलाता है। ज्ञान की अन्य शाखाएं  कितनी ही दर्शनीय क्यों न हों वे सम्पूर्ण सत्य के किसी पक्ष विशेष (भैतिक या आध्यात्मिक) को ही दर्शाती हैं। वेदों के अनुसार पूर्ण ज्ञानी पुरुष वह है जो इस नश्वर संसारवृक्ष तथा इसके अनश्वर ऊर्ध्वमूल (परमात्मा) को भी जानता है। भगवान् श्रीकृष्ण उसे यहाँ वेदवित् कहते हैं। 
संसार वृक्ष के अन्य अवयवों का रूपकीय वर्णन अगले श्लोक में किया गया है

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके।।15.2।।

।।15.2।। उस वृक्ष की शाखाएं तीन प्रकार की गुणों से प्रवृद्ध हुईं नीचे और ऊपर फैली हुईं हैं; (पंच) विषय इसके अंकुर हैं; मनुष्य लोक में कर्मों का अनुसरण करने वाली इसकी अन्य जड़ें नीचे फैली हुईं हैं।।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस वृक्ष की शाखाएं ऊपर और नीचे फैली हुईं हैं। इनसे तात्पर्य देवता, मनुष्य, पशु इत्यादि योनियों से है। केवल विवेकी मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन तथा जगत् के विकास की दिशा कभी उर्ध्व की ओर होती है , किन्तु अधिकांश अविवेकी मनुष्यों की गति पशु जीवन के निम्न स्तर की ओर रहती है। अधः (पशु अस्तर घोर स्वार्थी) और ऊर्ध्व (देवता -पूर्ण निःस्वार्थी)  इन दो शब्दों से इन्हीं दो दिशाओं अथवा प्रवृत्तियों की ओर निर्देश किया गया है। 
 गुणों से प्रवृद्ध हुई जीवों की ऊर्ध्व या अधोगामी प्रवृत्तियों का धारण पोषण प्रकृति (शक्ति) के सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों के द्वारा किया जाता है। इन गुणों का विस्तृत विवेचन पूर्व अध्याय में किया जा चुका है। 
किसी भी वृक्ष की शाखाओं पर हम अंकुर या कोपलें देख सकते हैं जहाँ से अवसर पाकर नई-नई शाखाएं फूटकर निकलती हैं। प्रस्तुत रूपक में इन्द्रियों के शब्दस्पर्शादि विषयों को प्रवाल अर्थात् अंकुर कहा गया है। यह सुविदित तथ्य है कि विषयों की उपस्थिति में हम अपने उच्च आदर्शों को विस्मृत कर विषयाभिमुख हो जाते हैं। तत्पश्चात् उन भोगों की पूर्ति के लिये उन्मत्त होकर नये-नये कर्म करते हैं। 
मनुष्य देह में (M/F शरीर में )  यह जीव असंख्य प्रकार के कर्म और कर्मफल का भोग करता है जिसके  फलस्वरूप उसके मन में (चित्त में) नये संस्कार या वासनाएं अंकित होती जाती हैंये वासनाएं (आसक्ति) ही अन्य जड़ें हैं जो मनुष्य को अपनी अभिव्यक्ति के लिये कर्मों में प्रेरित करती रहती हैं। ये संस्कार (अविद्या जनित आदत , प्रवृत्ति या चरित्र) शुभाशुभ कर्म और कर्मफल को उत्पन्न कर मनुष्य को इस लोक के राग और द्वेष, लाभ और हानि, आय और व्यय आदि प्रवृत्तियों के साथ बाँध देते हैं। 
अगले दो श्लोकों में इसका वर्णन किया गया है कि किस प्रकार हम इस संसार वृक्ष को काटकर इसके ऊर्ध्वमूल परमात्मा का अपने आत्मस्वरूप से अनुभव कर सकते हैं
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल
मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा।।15.3।।
।।15.3।। इस (संसार वृक्ष) का स्वरूप जैसा कहा गया है वैसा यहाँ उपलब्ध नहीं होता है, क्योंकि इसका न आदि है और न अंत और न प्रतिष्ठा ही है। इस अति दृढ़ मूल वाले अश्वत्थ वृक्ष को दृढ़ असङ्ग शस्त्र से काटकर ...৷৷
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम्
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी।।15.4।।
।।15.4।। (तदुपरान्त) उस पद का अन्वेषण करना चाहिए जिसको प्राप्त हुए पुरुष पुन: संसार में नहीं लौटते हैं"मैं उस आदि पुरुष की शरण हूँ, जिससे यह पुरातन प्रवृत्ति प्रसृत हुई है"।।
 गीताचार्य भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि जैसा वर्णन किया गया है वैसा वृक्ष यहाँ उपलब्ध नहीं होता। पूर्व श्लोक में वर्णित अश्वत्थ वृक्ष इस व्यक्त हुए सम्पूर्ण जगत् का प्रतीक है। सूक्ष्म चैतन्य आत्मा विविध रूपों और विभिन्न स्तरों पर विविधत व्यक्त होता है जैसे शरीर, मन और बुद्धि में क्रमश विषय भावनाओं और विचारों के प्रकाशक के रूप में और कारण शरीर में वह अज्ञान को प्रकाशित करता है। 
आत्मअज्ञान (अविद्या-जनित) या वासनाओं (latent desires, कामिनी , कांचन और कीर्ति में आसक्ति) को ही कारण शरीर कहते हैं। ये समस्त उपाधियाँ तथा उनके अनुभव अपनी सम्पूर्णता में अश्वत्थवृक्ष के द्वारा निर्देशित किये गये हैं। 
कोई भी पुरुष इस संसार वृक्ष का आदि या अन्त या प्रतिष्ठा नहीं देख सकता। यह वृक्ष परम सत्य के अज्ञान से उत्पन्न होता है। जब तक वासनाओं का प्रभाव बना रहता है तब तक इसका अस्तित्व भी रहता है, किन्तु आत्मा के अपरोक्ष ज्ञान से यह समूल नष्ट हो जाता है। इस संसार वृक्ष को काटने का एकमात्र शस्त्र है असंग अर्थात् वैराग्य। M/F स्थूल शरीर से तादात्म्य निवृत्ति को ही वैराग्य कहते हैं। 
    भौतिक जगत् नश्वर जड़ अचेतन है। इसके द्वारा जो अनुभव (मान -अपमान, सुख-दुःख) प्राप्त किया जाता है वह चैतन्य के सम्बन्ध के कारण ही संभव होता है। जब तक कार के चक्रों का सम्बन्ध मशीन से बना रहता है तब तक उनमें गति रहती है। यदि प्रवाहित होने वाली शक्ति को रोक दिया जाये तो वे चक्र स्वत ही गतिशून्य स्थिति में आ जायेंगे।  इसी प्रकार यदि हम अपना ध्यान शरीर, (M/F शरीर) मन और मूढ़बुद्धि से निवृत्त करें तो तादात्म्य के अभाव में विषय भावनाओं तथा विचारों का ग्रहण स्वत अवरुद्ध हो जायेगा देह से तादात्म्य  की निवृत्ति को ही वैराग्य कहते हैं। यहाँ उसे असंग शस्त्र कहा गया है। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि उसको इस असंग-शस्त्र के द्वारा संसारवृक्ष को काटना चाहिये। 

हमारी वर्तमान स्थिति की दृष्टि से उपर्युक्त अवस्था का अर्थ है शून्य जहाँ न कोई विषय हैं और न भावनाएं हैं न कोई विचार ही हैं। अत हम ऐसे उपदेश को सहसा स्वीकार नहीं करेंगे। भगवान् हमारी मनोदशा को समझते हुये उसी क्रम में कहते हैं -  तत्पश्चात् 'उस पद का अन्वेषण ' करना चाहिये जिसे प्राप्त हुये पुरुष पुनः लौटते नहीं हैं
उपर्युक्त सम्पूर्ण विवेचन का निष्कर्ष यह निकलता है कि निदिध्यासन के अभ्यास के शान्त क्षणों में साधक को अपना ध्यान जगत् एवं उपाधियों से निवृत्त कर उस ऊर्ध्वमूल परमात्मा (इष्टदेव) के चिन्तन में लगाना चाहिये जहाँ से इस संसार की पुरातन प्रवृत्ति प्रसृत हुई है।

 मनुष्य बनने का व्यावहारिक उपाय है- प्रार्थना> यदि इस उपदेश को केवल यहीं तक छोड़ दिया गया होता तो अधिक से अधिक वह एक सुन्दर काव्यात्मक कल्पना ही बन कर रह जाता। आध्यात्मिक मूल्यों को अपने व्यावहारिक जीवन में जीने की कला सिखाने वाली निर्देशिका के रूप में।  गीता को यह भी बताना आवश्यक था कि किस प्रकार एक साधक इस उपदेश का पालन कर सकता है ? इनका एक व्यावहारिक उपाय है- प्रार्थना। जिसका निर्देश इस श्लोक के अन्त में इन शब्दों में किया है,-तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये'- कि मैं उस आदि पुरुष (इष्टदेव -गुरुदेव) की शरण हूँ जहाँ से यह पुरातन प्रवृत्ति प्रसृत हुई है। 
यह श्लोक दर्शाता है कि जब हमारी बहिर्मुखी प्रवृत्ति बहुत कुछ मात्रा में क्षीण हो जाती है तब हमें अपनी शुद्ध बुद्धि को सजगतापूर्वक संसार के आदिस्रोत सच्चिदानन्द परमात्मा (इष्टदेव -गुरुदेव) में भक्ति और समर्पण के भाव के साथ समाहित करने का प्रयत्न करना चाहिये। 
इस आदि पुरुष (इष्टदेव) का स्वरूप तथा उसके अनुभव के उपाय को बताना इस अध्याय का विषय है। 
किन गुणों से सम्पन्न साधक उस पद को प्राप्त होते हैं सुनो

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै
गच्छन्ति अमूढाः पदमव्ययं तत्।।15.5।।

।।15.5।। जिनका मान और मोह निवृत्त हो गया है, जिन्होंने संगदोष को जीत लिया है, जो अध्यात्म में स्थित हैं जिनकी कामनाएं निवृत्त हो चुकी हैं और जो सुख-दु:ख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त हो गये हैं, ऐसे सम्मोह रहित ज्ञानीजन उस अव्यय पद को प्राप्त होते हैं।।
        किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए कुछ आवश्यक योग्यताएं होती हैं जिनके बिना मनुष्य उस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता है। अत आत्मज्ञान भी कुछ विशिष्ट गुणों के से सम्पन्न अधिकारी को ही पूर्णत्व प्राप्त हो सकता है। उन गुणों का निर्देश इस श्लोक में किया गया है। उत्साही और साहसी साधकों को इन गुणों का सम्पादन करना चाहिये। भगवान् श्रीकृष्ण आश्वासन देते हैं कि साधन सम्पन्न साधकों को अव्यय पद की प्राप्ति अवश्य होगी। 
निर्मान-मोहा > वही कृत्कृत्यता और वही परम पुरुषार्थ है। जो मान और मोह से रहित है मान का अर्थ है स्वयं को पूजनीय व्यक्ति मानना। अपने महत्व का त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन मान अथवा गर्व कहलाता है। ऐसा मानी व्यक्ति (arrogant-अहंकारी व्यक्ति) अपने ऊपर मान को बनाये रखने का अनावश्यक भार या उत्तरदायित्व ले लेता है। तत्पश्चात् उसके पास कभी समय ही नहीं होता कि वह वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सके और अपने अवगुणों का त्याग कर सुसंस्कृत 'मनुष्य' बन सके। 
इसी प्रकार मोह का अर्थ है अविवेक। (विवेक की परिभाषा नहीं जानना और अहंकारी बने रहना) बाह्य जगत् की वस्तुओं, व्यक्तियों, घटनाओं आदि को यथार्थत,(ब्रह्ममय जगत) न समझ पाना मोह है। इसके कारण हम वास्तविक जीवन की तात्कालिक समस्याओं का सामना करने के स्थान पर अपने ही काल्पनिक जगत् में विचरण करते रहते हैं। अत आत्मज्ञान के जिज्ञासुओं को इन अवगुणों (मान और मोह अहंकार और अविवेक) का सर्वथा त्याग करना चाहिये।

 जितसङ्गदोषा >जिन्होंने संग दोष को जीत लिया है;  देह (M/F शरीर) के साथ तादात्म्य कर केवल इन्द्रियों के विषयोपभोग में रमने का अर्थ स्वयं को जीवन की श्रेष्ठतर संभावनाओं से वंचित रखकर अपनी ही प्रवंचना करना है। ऐसा मूढ़बुद्धि व्यक्ति अत्यन्त विषयासक्त होता है। यह आसक्ति जितनी अधिक होगी उतनी ही अधिक उसकी अनियंत्रित विषयाभिमुख प्रवृत्ति भी होगी। वह विषयों का दास बनकर उनके परिवर्तनों और विनाश की लय पर नृत्य करता हुआ अपनी शक्तियों का अपव्यय करता रहता है।  फिर उसे आत्मानुभव की प्राप्ति कैसे हो सकती है इसलिये जिन्होंने इस संग नामक दोष- देह से तादात्म्य  को जीत लिया है वे ही पुरुष मोक्ष के अधिकारी होते हैं।

अध्यात्मनित्या- (सतत आत्मनुसन्धान) > मन का स्वभाव है किसी न किसी वस्तु में आसक्त रहना। अत मन को बाह्य जगत् से विरत करने के लिये उसे श्रेष्ठ और दिव्य आत्मस्वरूप में स्थित करने का प्रयत्न करना चाहिये।  मनुष्य का मन विधेयात्मक उपदेश का पालन कर सकता है,  परन्तु शून्य में नहीं रह सकता। सरल शब्दों मे तात्पर्य यह है कि उसे कुछ करने को कहा जा सकता है परन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि कुछ मत करो। उदाहरणार्थ यदि किसी व्यक्ति से कहा जाये कि प्रातकाल जागने के साथ उसे अण्डे का स्मरण नहीं करना चाहिये तो दूसरे दिन सर्वप्रथम उसे अण्डे का स्मरण होगा।  परन्तु इसके स्थान पर मन को भगवान् नारायण   का स्मरण करने को कहा जाये तो अण्डे का स्मरण होने का अवसर ही नहीं रह जाता। इसी प्रकार विषयासक्ति को जीतने के लिये सतत आत्मानुसंधान करते रहना चाहिये।
विनिवृत्तकामाः > जिनकी कामनाएं पूर्णत निवृत्त हो चुकी हैं जब तक बाह्य जगत् के सम्बन्ध में यह धारणा बनी रहेगी कि वह सत्य है और उसमें सुख है तब तक कामनाओं का त्याग होना संभव ही नहीं है। अत हमें विवेक- पूर्वक जगत् के मिथ्यात्व का निश्चय करना चाहिये और यह भी जानना चाहिये कि सुख तो आत्मा का स्वरूप है विषयों का धर्म नहीं। ऐसे दृढ़ निश्चय से कामनायें निवृत्त हो सकती हैं। इच्छाओं के अभाव में मन स्वतः शान्त हो जाता है।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः > जो पुरुष सुख-दुख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त हो गये हैं,  मनुष्य कभी भी जगत् का वस्तुनिष्ठ दर्शन नहीं करता है। वह जगत् की वस्तुओं को प्रिय और अप्रिय दो भागों में विभाजित कर देता है। इस द्वन्द्व से उत्पन्न होती है प्रिय की ओर प्रवृत्ति और अप्रिय से निवृत्ति। तत्पश्चात् यदि प्रिय की प्राप्ति हो तो सुख अन्यथा दुख होता है। दुर्भाग्य से मनुष्य के राग और द्वेष भी सदैव परिवर्तित होते रहते हैं। इस कारण कल जिस वस्तु को वह सुख का साधन समझता था आज उसी वस्तु को वह दुखदायी समझता है। इस प्रकार मन की तरंगों में जो व्यक्ति फँसा रहता है,  वह इन द्वन्द्वों से कभी मुक्त नहीं हो सकता। इसलिये साधक को अपने व्यक्तिगत राग और द्वेष को सर्वथा समाप्त कर देना चाहिये। 
गच्छन्ति अमूढाः > इस श्लोक के अन्त में भगवान् श्रीकृष्ण की यह निश्चयात्मक और आशावादी घोषणा है कि ऐसे सम्मोहरहित योग्य अधिकारी साधक अव्यय पद को प्राप्त होते हैं। इस घोषणा की शैली में एक आदेश की दृढ़ता है। उपाधियों से (स्वयं को देह-मन-बुद्धि समझने वाला मूढ़बुद्धि मनुष्य) अवच्छिन्न आत्मा यह संसारी दुर्भाग्यशाली मनुष्य है और उपाधिविवर्जित मनुष्य ही सच्चिदानन्दस्वरूप आत्मा है। यही अपरोक्षानुभूति है।
उस अव्यय पद की ही विशेषता अगले श्लोक में वर्णित है।
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।15.6।।
।।15.6।। उसे न सूर्य प्रकाशित कर सकता है और न चन्द्रमा और न अग्नि। जिसे प्राप्त कर मनुष्य पुन: (संसार को) नहीं लौटते हैं, वह मेरा परम धाम है।।
        आध्यात्मिक जीवन का लक्ष्य है संसार में अपुनरावृत्ति। इसे विशेष बल देकर पूर्व के श्लोकों में प्रतिपादित किया गया था और इस श्लोक में पुन उसे दोहराया जा रहा है। परन्तु आत्मज्ञान का क्षेत्र इन्द्रिय अगोचर होने से प्रारम्भ में केवल आचार्य का ही वहाँ प्रवेश होता है शिष्यों का नहीं। अत अज्ञात अनन्तस्वरूप के अनुभव के सम्बन्ध में शिष्यों को विश्वास कराने का एकमात्र उपाय पुनरुक्ति ही है? यद्यपि यह स्थिति मन और वाणी के परे हैं तथापि उसे इंगित करने का यहाँ समुचित प्रयत्न किया गया है। सूर्य,  चन्द्र और अग्नि उसे प्रकाशित नहीं कर सकते हैं। 

यहाँ प्रकाश के उन स्रोतों का उल्लेख किया गया है जिनके प्रकाश में हमारे चर्मचक्षु दृश्य वस्तु को देख पाते हैं। वस्तु को देखने का अर्थ उसे जानना है और किसी वस्तु को देखने के लिए वस्तु का नेत्रों के समक्ष होना तथा उसका प्रकाशित होना भी आवश्यक है। प्रकाश के माध्यम में ही नेत्र रूप और रंग को देख सकते हैं। इसी प्रकार हम अन्य इन्द्रियों के द्वारा शब्द, स्पर्श, रस और गन्ध को तथा मन और बुद्धि के द्वारा क्रमश भावनाओं और विचारों को भी जानते हैं। 
   जिस प्रकाश से हमें इन सबका भान होकर बोध होता है वह चैतन्य का प्रकाश है।यह चैतन्य का प्रकाश भौतिक जगत् के प्रकाश के स्रोतोंसूर्य चन्द्र और अग्निके द्वारा प्रकाशित नहीं किया जा सकता। वस्तुत ये सभी प्रकाश के स्रोत चैतन्य के दृश्य विषय है। 
 यह नियम है कि दृश्य अपने द्रष्टा को प्रकाशित नहीं कर सकता तथा कभी भी और किसी भी स्थान पर द्रष्टा और दृश्य एक नहीं हो सकते। जिस चैतन्य के द्वारा हम अपने जीवन के सुख-दुखादि अनुभवों को जानते हैं वह चैतन्य ही सनातन आत्मा है और इसे ही भगवान् अपना परम धाम कहते हैं।  यही जीवन का परम लक्ष्य है।
वह मेरा परम धाम है यहाँ धाम शब्द से तात्पर्य स्वरूप से है न कि किसी स्थान विशेष से। पूर्व श्लोक में वर्णित गुणों से सम्पन्न साधक ध्यानाभ्यास के द्वारा मन और बुद्धि के विक्षेपों से परे परमात्मा के धाम में पहुँचकर सत्य से साक्षात्कार का समय निश्चित कर अनन्तस्वरूप ब्रह्म से भेंट कर सकता है। 
हम सब लोग उपयोगितावादी है। अत हम पहले ही जानना चाहते हैं कि क्या सत्य का अनुभव इतने अधिक परिश्रम के योग्य है क्या उसे प्राप्त कर लेने के पश्चात् पुन इस दुखपूर्ण संसार में लौटने की आशंका या संभावना नहीं है ? यह भय निर्मूल है। भगवान् श्रीकृष्ण पुन तीसरी बार हमें आश्वासन देते हैं? मेरा परम धाम वह है जहाँ पहुँचने पर साधक पुन लौटता नहीं है। 
तो एक पूर्ण ज्ञानी पुरुष / का पुन अज्ञानजनित भ्रान्तियों को लौटना कितना असंभव होगा विश्व के आध्यात्मिक साहित्य का यह एक अत्यन्त विरल श्लोक है जिसमें इतनी सरल शैली में निरुपाधिक शुद्ध परमात्मा का इतना स्पष्ट निर्देश किया गया है। 
हिन्दू धर्म में पुनर्जन्म के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है। इस सिद्धान्त के अनुसार जीव एक देह का त्याग करने के पश्चात् अपने कर्मों के अनुसार पुन नवीन देह धारण करता है। ये शरीर देवता, मनुष्य,  पशु आदि के हो सकते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि एक देह को त्यागने पर जीव का मोक्ष न होकर वह पुन संसार को ही प्राप्त होता है। परन्तु इस श्लोक में तो यह कहा गया है जहाँ पहुँचकर जीव पुन लौटता नहीं,  वह मेरा परम धाम है। अत यहाँ इन दोनों सिद्धान्तों में विरोध प्रतीत होता है। 
इस विरोध का परिहार करने के लिये भगवान् श्रीकृष्ण अगले श्लोकों में जीव के स्वरूप पर प्रकाश डालते हैं
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।15.7।।
।।15.7।। इस जीव लोक में मेरा ही एक सनातन अंश जीव बना है। वह प्रकृति (तीन गुण बंधा) में स्थित हुआ (देहत्याग के समय) पाँचो इन्द्रियों तथा मन को अपनी ओर खींच लेता है अर्थात् उन्हें एकत्रित कर लेता है।।
           अनन्तवस्तु (आत्मा , ब्रह्म, ईश्वर -)  वयव रहित होने के कारण अखण्ड और अविभाज्य है। तथापि उपाधियों के सम्बन्ध से उसमें खण्ड और विभाग होने का आभास निर्माण हो सकता है। जिस प्रकार सर्वगत आकाश का कोई आकार नहीं है तथापि घट उपाधि से अवच्छिन्न होकर बना घटाकाश बाह्य महाकाश से भिन्न प्रतीत होता है। 
मनबुद्धि रूप सूक्ष्म शरीर (M/F मूढ़ बुद्धि)  में व्यक्त चैतन्य जीव कहलाता है। अन्तकरण की वृत्तियों के अनुसार यह जीव स्वयं को सुखी-दुखी संसारी अनुभव करता है।  किन्तु उसका शुद्ध चैतन्य स्वरूप (आत्मा इष्टदेव)  सदा अविकारी ही रहता है जो सनातन कहा गया है। 
उपर्युक्त विवेचन का तात्पर्य यह है कि आत्मा को प्राप्त हुआ जीवत्व अज्ञान के कारण है। अत वह जीवत्व आभासिक है।  अज्ञान (अविद्या-अस्मिता -राग -द्वेष -अभिनिवेश) का नाश हो जाने पर जीव स्वत आत्मस्वरूप बन जाता है। तत्पश्चात् ज्ञान की उपस्थिति में अज्ञान पुन नहीं लौटता तब जीव का संसार में पुनरागमन होने का कारण ही नहीं रह जाता है।
 इसलिए पूर्व श्लोक में कहा गया था कि भगवान् के परम धाम को प्राप्त हुये जीव पुन संसार को नहीं लौटते हैं। इसका पूर्व जन्म के सिद्धान्त से कोई विरोध नहीं है क्योंकि जब तक अज्ञान बना रहता है तब तक जीव का भी अस्तित्व बने रहने के कारण उसका पुनर्जन्म हो सकता है
       यह स्थूल पंचभौतिक शरीर जड़ है और इसमें चैतन्य को व्यक्त करने की सार्मथ्य नहीं है। ज्ञानेन्द्रियाँ और अन्तकरण (मन और बुद्धि) सूक्ष्म शरीर कहलाते हैं। यद्यपि यह सूक्ष्म शरीर भी जड़ है किन्तु इसमें चैतन्य व्यक्त हो सकता है। यह चेतन सूक्ष्म शरीर ही जीव है जो किसी देह (M/F) को धारण कर उसे चेतनता प्रदान करता है। 
इस श्लोक की दूसरी पंक्ति का सम्बन्ध अगले श्लोक से है। इसमें देहत्याग के समय जीव का कार्य बताया गया है। यह जीव प्रकृतिस्थ इन्द्रियाँ तथा मन अर्थात् अन्तकरण को एकत्र कर लेता है। यहाँ प्रकृति का अर्थ है स्थूल शरीर में स्थित नेत्र,  श्रोत्र आदि इन्द्रिय गोलक। यही कारण कि मृत देह में यह गोलक तो रह जाते हैं परन्तु उनमें विषय ग्रहण की कोई सार्मथ्य नहीं होती। 

किस समय यह जीव इन इन्द्रियादि को अपने में समेट लेता है भगवान् कहते हैं
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्।।15.8।।
।।15.8।। जब (देहादि का) ईश्वर (जीव) (एक शरीर से) उत्क्रमण करता है, तब इन (इन्द्रियों और मन) को ग्रहण कर अन्य शरीर में इस प्रकार ले जाता है, जैसे गन्ध के आश्रय (फूलादि) से गन्ध को वायु ले जाता है।।
देहेन्द्रियादि का ईश्वर अर्थात् स्वामी है जीव (मूढ़बुद्धि युक्त आत्मा?) । जब तक वह किसी एक देह मे रहता है तब तक सूक्ष्म शरीर (इन्द्रियाँ और अन्तकरण) को धारण किये रहता है और असंख्य प्रकार के कर्म करता है। अपनी वासनाओं के अनुसार वह कर्म करता है और फिर कर्मो के नियमानुसार विविध फलों को भोगने के लिये उसे अन्यान्य शरीर ग्रहण करने पड़ते हैं। तब एक शरीर का त्याग करते समय वह सूक्ष्म शरीर को समेट लेता है और अन्य शरीर में जा कर पुन उसके द्वारा पूर्ववत् व्यवहार करता है। 
सूक्ष्म शरीर का स्थूल शरीर से सदा के लिये वियोग स्थूल शरीर के लिये मृत्यु है। मृत देह का आकार पूर्ववत् दिखाई देता है  ,किन्तु विषय ग्रहण अनुभव तथा विचार ग्रहण करने की क्षमता उसमे नहीं होती क्योंकि ये समस्त कार्य सूक्ष्म शरीर के होते हैं। जीव की उपस्थिति से ही देह को एक व्यक्ति के रूप में स्थान प्राप्त होता है।जिस प्रकार प्रवाहित किया हुआ वायु पुष्प, चन्दन,  इत्र आदि सुगन्धित वस्तुओं की सुगन्ध को एक स्थान से अन्य स्थान बहा कर ले जाता है उसी प्रकार जीव समस्त इन्द्रियादि को लेकर जाता है। 
वायु और सुगन्ध दृष्टिगोचर नहीं होते उसी प्रकार देह को त्यागते हुये सूक्ष्म जीव को भी नेत्रों से नहीं देखा जा सकता है। जीव की समस्त वासनाएं भी उसी के साथ रहती हैं।इस श्लोक में जीव को देहादि गुच्छा का ईश्वर (आत्मा)  कहने का अभिप्राय केवल इतना ही है कि उसी की उपस्थिति में विषय ग्रहण विचार आदि का व्यवहार सुचारु रूप से चलता रहता है। वह इन उपाधियों का शासक और नियामक है। 
 वेदान्त मे शरीर को भोगायतन कहते हैं। उपर्युक्त श्लोक वस्तुत उपनिषदों के ही सिद्धान्तों का ही सारांश है।
वे इन्द्रियाँ कौन सी हैं सुनो
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते।।15.9।।
।।15.9।। (यह जीव) श्रोत्र, चक्षु, स्पर्शेन्द्रिय, रसना और घ्राण (नाक) इन इन्द्रियों तथा मन को आश्रय करके अर्थात् इनके द्वारा विषयों का सेवन करता है।।
 शुद्ध चैतन्य स्वरूप स्वत किसी वस्तु को प्रकाशित नहीं करता है, क्योंकि उसमें विषयों का सर्वथा अभाव रहता है। परन्तु यही चैतन्य बुद्धि में परावर्तित होकर वस्तुओं को प्रकाशित करता है। यही बुद्धि का प्रकाश कहलाता है जो इन्द्रियों के माध्यम से वस्तुओं को प्रकाशित करता है। मन सभी इन्द्रियों के साथ युक्त होता है जिसके कारण बाह्य वस्तुओं का सम्पूर्ण ज्ञान संभव होता है।
मूढ़बुद्धि की उपाधि से युक्त चैतन्य ही विषयों का भोक्ता जीव (M/F) है। 
       यदि यह चैतन्य आत्मा सर्वत्र विद्यमान है और हमारा स्वरूप ही है जिसके द्वारा हम सम्पूर्ण जगत् का अनुभव कर रहे हैं तो क्या कारण है कि हम उसे पहचानते नहीं हैं इसका कारण अज्ञान है। 
भगवान् कहते हैं
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः।।15.10।।

।।15.10।। शरीर को त्यागते हुये, उसमें स्थित हुये अथवा (विषयों को) भोगते हुये, त्रिगुणों से फँसे आत्मा को विमूढ़ लोग नहीं देखते हैं; (परन्तु) ज्ञानचक्षु (शुद्धबुद्धि) वाले पुरुष उसे देखते हैं।।
यह एक सर्वत्र अनुभव सत्य है कि सामान्य बुद्धि का पुरुष यद्यपि वस्तु को देखता है? तथापि उसे पूर्ण तथा यथार्थ रूप से समझ नहीं पाता है।इसी चैतन्य आत्मा की उपस्थिति से ही हम विषय भावनाओं और विचारों का अनुभव करते हैं परन्तु केवल आत्मज्ञानी पुरुष ही इसे पहचानते हैं और स्वयं आत्मस्वरूप बनकर जीते हैं।
आत्मा तो नित्य विद्यमान है। इसका अभाव कभी नहीं होता। देहत्याग के समय सूक्ष्म शरीर को चेतनता प्रदान करने वाला आत्मा ही होता है। एक देहविशेष के जीवन काल में आत्मा ही समस्त अनुभवों को प्रकाशित करता है। सुखदुखात्मक मानसिक अनुभवों तथा बुद्धि के निर्णयों का प्रकाशक भी आत्मा ही है। इसी प्रकार क्षण-क्षण परिवर्तनशील हमारे मन के सात्त्विक (शांति), राजसिक (विक्षेप) और तामसिक (मोहादि) भावों का ज्ञान भी चैतन्य के कारण ही संभव होता है फिर भी अविवेकी जन (मूढ़बुद्धि) उसे पहचान नहीं पाते जिसकी उपस्थिति से ही कोई अनुभव संभव हो सकता है। 
सामान्य जन अपने अनुभवों तथा उनके विषयों के प्रति ही इतने अधिक आसक्त और व्यस्त हो जाते हैं कि उनका सम्पूर्ण ध्यान बाह्य विषयों और सुन्दर संरचनाओं की सुन्दरता में ही आकृष्ट आसक्त रहता है। वे उस आत्मा की उपेक्षा करते हैं तथा उसे पहचान नहीं पाते जिसकी उपस्थिति से ही कोई अनुभव संभव हो सकता है। इनके सर्वथा विपरीत वे ज्ञानीजन हैं जो नाम और रूपों के विस्तार से विरक्त होकर इस विस्तार के सार तत्त्व उस ब्रह्म को देखते हैं जो उनके हृदय में आत्मरूप से स्थित सभी को प्रकाशित करता है।
 इस आत्मतत्त्व का दर्शन वे 'ज्ञानचक्षु' से करते हैं। ज्ञानचक्षु कोई अन्तरिन्द्रिय नहीं हैं। विवेक -वैराग्य आदि गुणों से सम्पन्न साधक जब वेदान्त प्रमाण के द्वारा आत्मविचार करता है तब उस विचार से प्राप्त आत्मबोध ही ज्ञानचक्षु है। 
आत्मदर्शन करने में अज्ञानी की विफलता और ज्ञानी की सफलता का कारण अगले श्लोक में वर्णन करते हैं
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः।।15.11।।
।।15.11।। योगीजन प्रयत्न करते हुये ही अपने हृदय में स्थित आत्मा को देखते हैं, जब कि अशुद्ध अन्त:करण वाले (अकृतात्मान:) और अविवेकी (अचेतस: मूढ़बुद्धि) लोग यत्न करते हुये भी इसे नहीं देखते हैं।।
अनेक ऐसे साधक हैं जिन्हें इस बात का दुख होता है कि वर्षों की उनकी नियमित साधना के होते हुये भी उनकी इच्छित प्रगति नहीं हुई है। इसका क्या कारण हो सकता है ?  इस विवादास्पद प्रश्न का अत्यन्त युक्तियुक्त उत्तर देते हुये भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं यद्यपि वे यत्न करते हैं किन्तु अशुद्ध अन्तकरण वाले अविवेकी लोग आत्मा को नहीं देखते हैं।
 ध्यान के फल (समाधि)  की प्राप्ति के लिये दो आवश्यक गुण हैं (क) चित्तशुद्धि अर्थात् अहंकार और स्वार्थजनित विक्षेपों का अभाव तथा? (ख) वेदान्त प्रमाण के द्वारा - नित्य-अनित्य विवेक या आत्मानात्मविवेक।  जिसके द्वारा अज्ञान आवरण (देहाभिमान)  नष्ट हो जाता है। इन दोनों के अभाव में आत्मज्ञान होना सर्वथा असंभव है। अत साधकों को कर्मयोग (Be and Make) और भक्तियोग के द्वारा चित्तशुद्धि प्राप्त कर नित्य-अनित्य विवेक करना चाहिये।
अब तक के विवेचन में आत्मा को इंगित करते हुये कहा गया था कि? (1) उसे भौतिक प्रकाश के स्रोतों सूर्य ,चन्द्रमा और अग्नि के द्वारा प्रकाशित नहीं किया जा सकता (2) जिसे प्राप्त होने पर संसार में पुनरावृत्ति नहीं होती और? (3) समस्त जीव मानो उसके अंश हैं। 
      इसके पश्चात् अगले चार श्लोकों में परमात्मा के स्वरूप तथा उसकी व्यापकता का वर्णन किया गया है, कि वह (क) सर्वप्रकाशक चैतन्य का प्रकाश है (ख) सर्वपोषक जीवन तत्त्व है (ग) समस्त जीवित प्राणियों के शरीर में जीवन की उष्णता है और (घ) सभी के हृदय में वह आत्मस्वरूप से स्थित है। भगवान् कहते हैं
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्।।15.12।।
।।15.12।। जो तेज सूर्य में स्थित होकर सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और अग्नि में है, उस तेज को तुम मेरा ही जानो।।
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः।।15.13।।
।।15.13।। मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपने ओज से भूतमात्र को धारण करता हूँ और रसस्वरूप चन्द्रमा बनकर समस्त औषधियों का अर्थात् वनस्पतियों का पोषण करता हूँ।।
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्।।15.14।।
।।15.14।। मैं ही समस्त प्राणियों के देह में स्थित वैश्वानर अग्निरूप होकर प्राण और अपान से युक्त चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।।
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।15.15।।
।।15.15।। मैं ही समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (उनका अभाव) होता है। समस्त वेदों के द्वारा मैं ही वेद्य (जानने योग्य) वस्तु हूँ तथा वेदान्त का और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूँ।।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते।।15.16।।
।।15.16।। इस लोक में क्षर (नश्वर) और अक्षर (अनश्वर) ये दो पुरुष हैं, समस्त भूत क्षर हैं और 'कूटस्थ' अक्षर कहलाता है।।
।।15.16।। इस अध्याय के अब तक किये गये विवेचन से सिद्ध हो जाता है कि पूर्व के त्रयोदश अध्याय (28-29) में जिसे क्षेत्र कहा गया था वह वस्तुत परमात्मा से भिन्न वस्तु नहीं है।जब वह परमात्मा सूर्य का प्रकाश और ताप, चन्द्रमा का शीतल प्रकाश, पृथ्वी की उर्वरा शक्ति, मनुष्य में ज्ञान, समृति और विस्मृति की क्षमता आदि के रूप में व्यक्त होता है वस्तुत तब ये सब परमात्म-स्वरूप ही सिद्ध होते हैं। परन्तु इस प्रकार अभिव्यक्त होने में अन्तर केवल इतना होता है कि परमात्मा क्षेत्र के रूप में ऐसा प्रतीत होता है मानो वह विकारी और विनाशी है। 
उदाहरणार्थ स्वर्ण से बने सभी आभूषण स्वर्ण रूप ही होते हैं परन्तु आभूषणों के रूप में वह स्वर्ण परिच्छिन्न और परिवर्तनशील प्रतीत होता है। इस प्रकार सम्पूर्ण क्षेत्र को इस श्लोक में क्षर पुरुष कहा गया है।
क्षेत्र को जानने वाले क्षेत्रज्ञ आत्मा को यहाँ अक्षर पुरुष कहा गया है। उसका अक्षरत्व इस चर जगत् की अपेक्षा से ही है। जैसे कोई व्यक्ति अपनी पत्नी की दृष्टि से पति और पुत्र की दृष्टि से पिता कहलाता है। इसी प्रकार शरीर, मन और बुद्धि की परिवर्तनशील क्षर उपाधियों की अपेक्षा से इन सब के ज्ञाता आत्मा को अक्षर पुरुष कहते हैं। 
क्षेत्र को जानने वाले क्षेत्रज्ञ आत्मा को यहाँ अक्षर पुरुष कहा गया है। उसका अक्षरत्व इस चर जगत् की अपेक्षा से ही है। जैसे कोई व्यक्ति अपनी पत्नी की दृष्टि से पति और पुत्र की दृष्टि से पिता कहलाता है। इसी प्रकार शरीर, मन और बुद्धि की परिवर्तनशील क्षर उपाधियों की अपेक्षा से इन सब के ज्ञाता आत्मा को अक्षर पुरुष कहते हैं।  पुरुष शब्द का अर्थ है पूर्ण । केवल निरुपाधिक परमात्मा ही पूर्ण है। उपर्युक्त क्षर और अक्षर तत्त्व उसी पूर्ण पुरुष  के ही दो व्यक्त रूप होने के कारण उन्हें भी पुरुष (पूर्ण -शुद्धबुद्धि) की संज्ञा दी गयी है।
इस अव्यय और अक्षर आत्मा को वेदान्त में कूटस्थ कहते हैं। कूट का अर्थ है निहाई जिसके ऊपर स्वर्ण को रखकर एक स्वर्णकार नवीन आकार प्रदान करता है। इस प्रक्रिया में स्वर्ण तो परिवर्तित होता है परन्तु निहाई अविकारी ही रहती है। 
इसी प्रकार उपाधियों के समस्त विकारों में यह आत्मा (इष्टदेव) अविकारी ही रहता है इसलिये उसे कूटस्थ कहते है। पूर्ण पुरुष (शुद्ध बुद्धि)  इन क्षर और अक्षर पुरुषों से भिन्न तथा इनके दोषों से असंस्पृष्ट नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव का है। 
भगवान् कहते है-
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः।।15.17।।
।।15.17।। परन्तु उत्तम पुरुष अन्य ही है, जो परमात्मा  कहलाता है और जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण करने वाला अव्यय ईश्वर (मायाधीश) है।।
संस्कृत में लोक शब्द का अर्थ है वह वस्तु जो देखी या अनुभव की जाती है। इस दृष्टि से यहाँ लोक शब्द का अर्थ स्वर्गादि लोक हो सकता है और हमारी परिचित अनुभवों की तीन अवस्थाएं जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति भी हो सकती हैं। 
एक ही संवित् (चैतन्य) इन तीनों को प्रकाशित करता है।  यहाँ विशेष ध्यान देने की बाता यह है कि इन तीनों पुरुषों को भिन्नभिन्न नहीं समझना चाहिये। केवल उत्तम पुरुष ही पारमार्थिक सत्य है जो दो विभिन्न उपाधियों की दृष्टि से क्षर और अक्षर के रूप में प्रतीत हो रहा है। उपाधियों के अभाव में वह केवल अपने नित्यशुद्ध निरुपाधिक स्वरूप में रह जाता है। 
उदाहरणार्थ एक ही सर्वगत आकाश घट और मठ इन दो उपाधियों से अवच्छिन्न होकर घटाकाश और मठाकाश के रूप में प्रतीत होता है। यहाँ यह स्पष्ट है कि यह कोई तीन आकाश घटाकाश मठाकाश और महाकाश नहीं बन गये हैं। घट और मठ की उपाधियों से ध्यान दूर कर लें तो ज्ञात होता कि वस्तुत आकाश एक ही है। इसी प्रकार उत्तम पुरुष ही दृश्य और दृष्टा के रूप में क्षर और अक्षर पुरुष कहलाता है। परन्तु उपाधियों से विवर्जित हुआ वह परमात्मा ही है। 
अगले श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम शब्द की व्युत्पत्ति दर्शाकर यह बताते हैं कि वे किस प्रकार परम ब्रह्म स्वरूप हैं
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः।।15.18।।
।।15.18।। क्योंकि मैं क्षर से अतीत हूँ और अक्षर से भी उत्तम हूँ, इसलिये लोक में और वेद में भी पुरुषोत्तम के नाम से प्रसिद्ध हूँ।।
 जैसा कि पूर्व के दो श्लोकों के विवेचन में कहा गया है कि एक परमात्मा ही परिवर्तनशील जगत् के रूप में क्षर और उस जगत् के अपरिवर्तनशील ज्ञाता के रूप में अक्षर कहलाता है। यह सर्वविदित है कि एक अपरिवर्तनशील वस्तु के बिना अन्य परिवर्तनों का ज्ञान होना संभव नहीं होता है। अत यदि शरीर, मन,  बुद्धि और बाह्य जगत् के विकारों का हमें बोध होता है तो उससे ही इस अक्षर का अस्तित्व सिद्ध हो जाता है,  जो स्वयं कूटस्थ रहकर अन्य विचारों को प्रकाशित करता है। 
यह भी स्पष्ट हो जाता है कि केवल क्षर की दृष्टि से ही परमात्मा को अक्षर का विशेषण प्राप्त हो जाता है अन्यथा वह स्वयं निर्विशेष ही है।  इसलिये यहाँ भगवान् कहते हैं क्षर और अक्षर से अतीत होने के कारण लोक में और वेद में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ। अर्थात् भगवान् पूर्ण होने से पुरुष है तथा क्षर और अक्षर से अतीत होने से उत्तम भी है इसलिये वेदों में तथा लोक में भी कवियों और लेखकों ने उन्हें पुरुषोत्तम नाम से भी संबोधित और निर्देशित किया है।
अब परमात्मा के ज्ञान का फल बताते हुये कहते है
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत।।15.19।।
।।15.19।। हे भारत ! इस प्रकार, जो, संमोहरहित, पुरुष (शुद्धबुद्धि) मुझ पुरुषोत्तम को जानता है, वह सर्वज्ञ होकर सम्पूर्ण भाव से अर्थात् पूर्ण हृदय से मेरी भक्ति करता है।।
 जिस पुरुष ने अपने शरीर, मन और बुद्धि (M/F शरीर) तथा उनके द्वारा अनुभव किये जाने वाले इन्द्रिय विषयों भावनाओं एवं विचारों के साथ मिथ्या तादात्म्य को सर्वथा त्याग दिया है वही असम्मूढः अर्थात् संमोहरहित पुरुष (शुद्धबुद्धि) है। 
इस प्रकार मुझे पुरुषोत्तम जानता है यहाँ जानने का अर्थ बौद्धिक स्तर का ज्ञान नहीं वरन् आत्मा (इष्टदेव-सच्चिदानन्द तत्व) का साक्षात् अपरोक्ष अनुभव है। स्वयं को परमात्मस्वरूप से जानना ही वास्तविक बोध है।अनात्मा के तादात्म्य को त्यागकर जिसने मुझ परमात्मा के साथ पूर्ण तादात्म्य स्थापित कर लिया है, वही परम भक्त है। 
 जो मुझे पूर्ण हृदय से भजता है। सर्वत्र प्रेम का मापदण्ड प्रिय से तादात्म्य ही माना जाता है। (सांसरिक किसी देह से नहीं केवल ठाकुर, माँ स्वामी जी) अधिक प्रेम होने पर अधिक तादात्म्य होता है।  इसलिये अंकगणित की दृष्टि से भी पूर्ण तादात्म्य का अर्थ होगा पूर्ण प्रेम अर्थात् पराभक्ति।
        यह पुरुषोत्तम ही चैतन्य स्वरूप से तीनों काल में समस्त घटनाओं एवं प्राणियों की अन्तर्वृत्तियों को प्रकाशित करता है। इसलिये वह सर्वज्ञ कहलाता है। जो भक्त इस पुरुषोत्तम के साथ पूर्ण तादात्म्य कर लेता है  वह भी सर्ववित् कहलाता है।
इस पन्द्रहवें अध्याय की विषयवस्तु भगवत्तत्त्वज्ञान है। अब भगवान् श्रीकृष्ण इस ज्ञान सर्थात -भगवत्-तत्वज्ञान की प्रशंसा करते हैं जो ज्ञान हमें शरीरजनित दुखों,  मनजनित विक्षेपों और बुद्धिजनित अशान्तियों के बन्धनों से सदा के लिये मुक्त कर देता है
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत।।15.20।।

।।15.20।। हे निष्पाप भारत ! इस प्रकार यह गुह्यतम शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया, इसको जानकर मनुष्य बुद्धिमान और कृतकृत्य हो जाता है।।
प्रस्तुत अध्याय के इस अन्तिम श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन्होंने अर्जुन को गुह्यतम ज्ञान का उपदेश दिया है। इस ज्ञान को गुह्य या रहस्य इस दृष्टि से नहीं कहा गया है कि इसका उपदेश किसी को नहीं देना चाहिये अभिप्राय यह है कि परमात्मा इन्द्रिय अगोचर होने के कारण कोई भी व्यक्ति प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणों के द्वारा उसे अपनी बुद्धि से नहीं जान सकता है। अत वह उसके लिये रहस्य ही बना रहेगा। केवल एक शास्त्रज्ञ और ब्रह्मज्ञानी सदगुरुदेव के उपदेश से ही परमात्मज्ञान हो सकता है। अपने पुरुषोत्तम स्वरूप को जानने वाला पुरुष बुद्धिमान् (शुद्धबुद्धि) बन जाता है। 
परमात्मा के ज्ञान का फल है कृतकृत्यता। मन में पूर्ण सन्तोष का वह भाव जो जीवन के लक्ष्य (इष्टदेव गुरुदेव भक्ति) को प्राप्त कर लेने पर उदय होता है,  कृतकृत्यता कहलाता है। तत्पश्चात् उस व्यक्ति के लिये न कोई प्राप्तव्य शेष रहता है और न कोई कर्तव्य
यह श्लोक उत्तम अधिकारियों को आत्मज्ञान के इस श्रेष्ठ फल का आश्वासन देता है।
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सोमवार, 30 मार्च 2026

⚜️️🔱श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय -14 ⚜️️🔱अध्याय चौदह: गुण त्रय विभाग योग

 अध्याय चौदह: गुण त्रय विभाग योग

[अध्याय 14 का सारांश ]

   पिछले अध्याय में आत्मा और शरीर के बीच के अन्तर को विस्तार से समझाया गया था। इस अध्याय में माया शक्ति का वर्णन किया गया है जो शरीर और उसके तत्त्वों का स्रोत है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि माया सत्त्व, रजस, और तमस तीन गुणों से निर्मित है। शरीर, मन और बुद्धि जो प्राकृत शक्ति से बने हैं उनमें भी तीनों गुण विद्यमान होते हैं और हम में इन गुणों का अनुपात हमारे व्यक्तित्व का निर्धारण करता है। 

     सत्त्व गुण शांत स्वभाव, सद्गुण और शुद्धता को इंगित करता है तथा रजो गुण कामनाओं और को बढ़ाता है एवं तमो गुण भ्रम, आलस्य, और निद्रा का कारण है। जब तक आत्मा मुक्त नहीं होती तब तक उसे माया शक्ति की प्रबल शक्तियों से निपटना पड़ता है। मुक्ति इन तीन गुणों से परे है। 

आगे श्रीकृष्ण इन बंधनों को काटने का एक सरल उपाय बताते हैं। परम शक्तिशाली भगवान इन तीनों गुणों से परे अर्थात् गुणातीत हैं। यदि हम मन को उनमें अनुरक्त करते हैं तब हमारा मन भी दिव्यता की ओर बढ़ता है। 

इस बिन्दु पर अर्जुन तीन गुणों से परे होने की अवस्था प्राप्त व्यक्तियों के गुण-विशेषताओं के संबंध में पूछता है तब श्रीकृष्ण सहानुभूतिपूर्वक ऐसी प्रबुद्ध आत्माओं के लक्षणों का निरूपण करते हैं।

 वे बताते हैं कि महापुरुष सदैव संतुलित रहते हैं और वे संसार में तीन गुणों के कार्यान्वयन को देखकर व्यक्तियों, पदार्थों तथा परिस्थितियों में प्रकट होने वाले उनके प्रभाव से विचलित नहीं होतेवे सभी पदार्थों को भगवान की शक्ति की अभिव्यक्ति के रूप में देखते हैं जो अंततः उनके नियंत्रण में होती है।

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श्री भगवानुवाच

परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।

यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः।।14.1।।

।।14.1।। श्री भगवान् ने कहा -- समस्त ज्ञानों में उत्तम परम ज्ञान को मैं पुन: कहूंगा, जिसको जानकर सभी मुनिजन इस (लोक) से जाकर (इस जीवनोपरान्त) परम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं।।

अनेक उपनिषदों के अनुसार यहाँ भी परम सिद्धि की प्राप्ति मरणोपरान्त कही गयी है।  श्री शंकराचार्य अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से प्रामाणिक तर्कों के द्वारा इस मत का खण्डन करके जीवन्मुक्ति के सिद्धांत का मण्डन करते हैं। उनका मत है कि साधन-चतुष्टय सम्पन्न जिज्ञासु साधक को यहाँ और अभी इसी जीवन में मोक्ष प्राप्त हो सकता है। इस जीवन के पश्चात् का अर्थ देह के मरण से नहीं वरन् अविद्याजनित अहंकार (देहाभिमान) केन्द्रित जीवन के नाश से है। 

लौकिक जीवन में भी हम देखते हैं कि गृहस्थ बनने के लिए अविवाहित पुरुष का मरण आवश्यक है , और माँ बनने के लिए कुमारी का। इन उदाहरणों में व्यक्ति का मरण नहीं होता किन्तु ब्रह्मचर्य और कौमार्य का ही अन्त होता है। जिससे कि उन्हें पतित्व और मातृत्व प्राप्त हो सके। इस प्रकार व्यक्ति तो वही रहता है परन्तु उसकी सामाजिक स्थिति में परिवर्तन आ जाता है। 

युक्तियुक्त मनन ('ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव न अपरः' का मनन) और यथार्थ ज्ञान के द्वारा हमारे असत् जीवन मूल्यों का अन्त हो जाता है (सद्गुरुदेव-ठाकुर, माँ , स्वामीजी की कृपा से एक दिन हमारे असत् जीवन मूल्यों का अन्त हो जाता है) और इस प्रकार नवार्जित ज्ञान के प्रकाश में (अविद्या-मरीचिका रहित ज्ञान के प्रकाश में) हम श्रेष्ठतर आनन्दमय जीवन जी सकते हैं। इस नवजीवन का साधन है। स्वस्वरूप का निदिध्यासन। [अर्थात 'मैं शरीर, मन, मूढ़-बुद्धि अदि हूँ '- जैसी अनात्म भावनाओं को दूर कर (शुद्धबुद्धि) द्वारा आत्मा-ब्रह्म की एकता में प्रतिष्ठित होना निदिध्यासन है।]

अब भगवान् इस ज्ञान के निश्चित फल को बताते हैं

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।

सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च।।14.2।।

।।14.2।। इस ज्ञानका आश्रय लेकर जो मनुष्य मेरी सधर्मता (सार्धम्यम्) को प्राप्त हो गये हैं, वे  सृष्टि के आदि में जन्म नहीं लेते और महाप्रलय में भी व्यथित नहीं होते।

 इस अध्याय का विषय उन तीन गुणों की क्रीड़ा का अध्ययन करना है जो हमें उपाधियों (देह, इन्द्रिय , मन , बुद्धि ) ओर अहंभाव के साथ बांध देते हैं। यदि एक बार हम उनसे मुक्त होकर अपने मन पर होने वाले उनके प्रभाव को समाप्त कर दें,  तो तत्क्षण ही जीव भाव से मुक्त होकर हम अपने पारमार्थिक स्वरूप का अनुभव कर सकते हैं।

स्वप्नद्रष्टा को स्वप्नावस्था में सत्य प्रतीत होने वाले दुःख जाग्रत् अवस्था में असत् हो जाते हैं। अतः आत्म अज्ञान की अवस्था (अविद्या की अवस्था) का उपाधि तादात्म्य तथा तज्जनित संसार का बन्धन जीव को ही सत्य प्रतीत होता है आत्मज्ञानी पुरुष को नहीं। ज्ञानी पुरुष (शुद्धबुद्धि) अपने उस सर्वत्र व्याप्त , सर्वगत सत्यस्वरूप को पहचानता है जिसकी न उत्पत्ति है और न प्रलय।  

इसे यहाँ एक वाक्य से इंगित किया गया है वे सृष्टि के आदि में जन्म नहीं लेते हैं।  सृष्टि मन का एक खेल है। जब हम मन से तादात्म्य नहीं करेंगे तब हम उससे अविच्छिन्न भी नहीं होंगे और इस प्रकार हमें सृष्टि का कोई अनुभव भी नहीं होगा। 

उदाहरणार्थ जब कोई व्यक्ति क्रोधावेश में आ जाता है तब वह एक क्रोधी व्यक्ति के रूप में व्यवहार करता है परन्तु क्रोध से निवृत्त होने और मन के शान्त हो जाने पर वह वैसा व्यवहार नहीं कर सकता। मन का स्वभाव यह है कि वह विचारों के द्वारा एक सृष्टि की कल्पना करता है और फिर उसी के साथ तादात्म्य कर स्वयं को इस प्रकार बन्धन में अनुभव करता है मानो उससे मुक्ति पाना कदापि संभव ही न हो। जब तक हम मन में ही डूबे रहेंगे (अपने नाम-रूप को ही सत्य मानते रहेंगे) तब तक उसके क्षोभ से उद्वेलित भी होते रहेंगे। मन से अतीत अर्थात् मन की चहारदीवारी को लाँघ जायेंगे - देश-कल मुक्त होने पर शुद्ध आत्मा में कोई सृष्टि नहीं है। 

परन्तु अपने मन पर विजय पाने के लिये साधक को मन की उन युक्तियों (योजनाओं) का पूर्ण ज्ञान होना आवश्यक है जिनके द्वारा यह प्राय उसे छलता रहता है। शत्रु पर आक्रमण करने के पूर्व उसकी रणनीति का ज्ञान प्राप्त करना अपरिहार्य होता है। इस दृष्टि से भगवान् का यह कथन भी समीचीन है कि इन तीन गुणों का सम्पूर्ण ज्ञान साधक को अपने मन पर विजय प्राप्त कराने में सहायक होगा।  और इस प्रकार वह अपनी समस्त प्रकार की अपूर्णताओं से मुक्ति प्राप्त कर सकेगा। 

अब भगवान् कहते हैं कि किस प्रकार जड़ और चेतन के सम्बन्ध में इस दुखपूर्ण संसार की उत्पत्ति होती है

मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्। 

संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत।।14.3।।

।।14.3।। हे भारत ! मेरी महद् ब्रह्मरूप प्रकृति, (प्राणियों की) योनि है, जिसमें मैं गर्भाधान करता हूँ; इससे समस्त प्राणिओं की उत्पत्ति होती है।।

यहाँ महद् ब्रह्म यह शब्द जगत् की अव्यक्त अवस्था अर्थात् जड़ प्रकृति को इंगित करता है। वह अपने स्थूल और सूक्ष्म कार्यरूप विकारों की अपेक्षा बड़ी  व्यापक होने से महत् है तथा स्व -विकारों का भरण पोषण करने के कारण ब्रह्म कहलाती है। 

यह महद्ब्रह्मरूप प्रकृति स्वयं जड़ होने के कारण स्वत स्वतन्त्ररूप से सृष्टि नहीं कर सकती है। इसमें शुद्ध चैतन्यस्वरूप परमात्मा जब प्रतिबिम्बित होता है तब यह चेतनयुक्त होकर सृष्टिकार्य में प्रवृत्त होती है। परमात्मा का इसमें चैतन्यरूप से व्यक्त हो जाना ही गर्भाधान की क्रिया है। 

इसके फलस्वरूप सर्वप्रथम समष्टि मन को धारण करने वाले ईश्वर जिसे इस अवस्था में वेदान्त के अनुसार हिरण्यगर्भ कहते हैं व्यक्त होता है और तत्पश्चात् असंख्य जीव और नाम-रूपमय सृष्टि उत्पन्न होती है। 

जैसे व्यष्टि की सृष्टि है वैसे ही समष्टि सृष्टि को भी समझना चाहिये। समष्टि वासनाओं विचारों भावनाओं एवं कर्मों के संगठित रूप को प्रकृति कहते हैं , जो सत्व- रज और तमो- गुणात्मिका होने से इन गुणों से नियन्त्रित होती है। इसी प्रकृति को यहाँ महद् ब्रह्म  कहा गया है जिसे वेदान्त में माया शक्ति शब्द से भी सूचित किया जाता है। माया के व्यष्टि रूप को ही अविद्या (पंचक्लेश) कहते हैं। जीव ओर ईश्वर में भेद यह है कि जीव अविद्या के अधीन रहता है - जीवमायाधीन है ; जबकि ईश्वर (इष्टदेव) मायाधीश है , माया को अपने वश में रखता है। भगवान् आगे कहते हैं

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।

तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता।।14.4।।

।।14.4।। हे कौन्तेय ! समस्त योनियों में जितनी मूर्तियाँ (शरीर) उत्पन्न होती हैं, उन सबकी योनि अर्थात् गर्भ है महद्ब्रह्म और मैं बीज की स्थापना करने वाला पिता हूँ।।

यहाँ त्रिगुणात्मिका जड़ प्रकृति ही महद्ब्रह्म शब्द से इंगित की गई है। भगवान् श्रीकृष्ण अपने सच्चिदानन्दस्वरूप के साथ तादात्म्य करके कहते हैं, इस प्रकृति रूप योनि में बीज की स्थापना करने वाला पिता मैं हूँ। 

 एक अविवाहित पुरुष में प्रजनन की क्षमता होने मात्र से ही वह किसी का पिता नहीं कहलाया जा सकता। इसके लिये विवाहोपरान्त उसे गर्भ में अपना बीज स्थापित करना होता है। इसी प्रकार प्रकृति (देह-मन) के बिना केवल आत्मा (इष्टदेव) स्वयं को व्यक्त नहीं कर सकते। इसी सिद्धान्त को भगवान् यहाँ सारांश में बताते हैं कि वे (अवतार वरिष्ठ) सम्पूर्ण विश्व के सनातन पिता हैं  जो विश्व मञ्च पर जीवन-नाटक के मंचन की व्यवस्था करते हैं। 

इस अध्याय के मुख्य विषय का प्रारम्भ करते हुये भगवान् श्रीकृष्ण बताते हैं कि प्रकृति के वे गुण कौन से हैं और वे किस प्रकार आत्मा को अनात्मा के साथ बांध देते हैं ?

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।

निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्।।14.5।।

।।14.5।। हे महाबाहो ! सत्त्व, रज और तम ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण देही आत्मा को देह के साथ बांध देते हैं।।

आध्यात्मिक साहित्य में सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों को क्रमश श्वेत,  रक्त और कृष्ण वर्ण के द्वारा सूचित किया जाता है। संस्कृत में गुण शब्द का अर्थ रज्जु अर्थात् रस्सी भी होता है। तात्पर्य यह हुआ कि प्रकृति के ये तीन गुण रज्जु के समान हैं, जो सच्चित्स्वरूप आत्मतत्त्व को असत् और जड़ अनात्मतत्त्व के साथ बांध देते हैं। 

ये गुण प्रकृति से उत्पन्न हुये हैं। वे आत्मा को देह के साथ मानो बांध देते हैं जिसके कारण वह जीव भाव को प्राप्त होकर जन्म और मरण के दुखों में फँस जाता है।

आत्मा और अनात्मा का यह संबंध मिथ्या है वास्तविक नहीं। देश-काल-निमित्त के सीमाओं से मुक्त आत्मा को इन देह (M/F), इन्द्रिय, मन , मूढ़बुद्धि आदि जड़ उपाधियों के साथ कभी नहीं बांधा जा सकता।

 जैसे जाग्रत् पुरुष स्वप्न द्रष्टा के अपराधों से वस्तुत अलिप्त ही रहता है। इसी प्रकार जब तक त्रिगुण जनित बन्धन बना रहता है तब तक ऐसा प्रतीत होता है  मानो आत्मा इन अनात्म उपाधियों के जीव भाव (M/F) भाव को प्राप्त हुआ है।  परन्तु यथार्थत वह नित्यमुक्त ही रहता है।

उपर्युक्त विवेचन से अब यह स्पष्ट हो जाता है कि किस प्रकार इन गुणों के स्वरूप तथा उनसे उत्पन्न बन्धन की प्रक्रिया का स्पष्ट ज्ञान हमें मुक्ति का अधिकार पत्र प्रदान कर सकता है।

अब भगवान् श्रीकृष्ण सर्वप्रथम सत्त्वगुण का लक्षण बताते हैं 

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।

सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ।।14.6।।

।।14.6।। हे निष्पाप अर्जुन ! इन (तीनों) में, सत्त्वगुण निर्मल होने से प्रकाशक और अनामय (healthy या निरोग) है; (वह जीव को) सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से बांध देता है।

 आत्मस्वरूप का अज्ञान (अविद्या) तथा उससे उत्पन्न अहंकार और स्वार्थ ही मूल दोष हैं जिनसे अन्य अनर्थों की उत्पत्ति होती है। ये दोष रजोगुण और तमोगुण से ही उत्प्न्न होते हैं। इसलिये यहाँ कहा गया है कि सत्त्वगुण स्वत इन दोषों से रहित है। यद्यपि सत्त्वगुण निर्मल है तथापि वह भी बन्धनकारक होता है। उससे उत्पन्न होने वाले बंधनों का निर्देश यहाँ किया गया है। सत्त्वगुण सुख और ज्ञान की आसक्ति से जीव को बांधता है अपने आनन्दस्वरूप को न जानकर/? जीव सदैव विषयों में ही सुख की खोज करता रहता है। 

यह अज्ञान तमोगुण का लक्षण है तथा विषयों में सुख की कल्पना और विक्षेप रजोगुण का लक्षण है। प्रयत्नों के फलस्वरूप जब कभी इष्ट विषय की प्राप्ति होती है? तब क्षणभर के लिये विक्षेपों की शान्ति हो जाती है। उस शान्त स्थिति में आत्मा का आनन्द अभिव्यक्त होता है। परन्तु जीव यही समझता है कि वह सुख उसे विषय से प्राप्त हुआ है और मन की उस सुख वृत्ति के साथ तादात्म्य करके कहता है मैं सुखी हूँ। इस प्रकार विषयोपभोग से उत्पन्न यह सुखवृत्ति क्षेत्र का (देह-मन)का  धर्म होने पर भी उसे अपना धर्म समझ कर उसमें आसक्त होना ही सत्त्वगुण से उत्पन्न हुआ बंधन है।

 बुद्धि के इस प्रकाश से प्रकाशित होकर विषय के ज्ञान की वृत्ति अन्तकरण में उदित होती है मनुष्य इसी मूढ़बुद्धि वृत्ति के साथ तादात्म्य करके अभिमानपूर्वक कहता है मैं इस वस्तु का ज्ञाता हूँ। यहाँ भी क्षेत्र के धर्म के साथ तादात्म्य है और यही ज्ञान से आसक्ति का बन्धन है। 

इन दोनों का सरल अर्थ यह भी है कि जब मनुष्य को सूक्ष्मतर सुख या (विवेकज) ज्ञान का अनुभव हो जाता है तब उसका मन उसी में इतना अधिक आसक्त होकर रमता है कि उसका ध्यान सूक्ष्मतम वस्तु आत्मा (इष्टदेव) की ओर सहसा आकर्षित ही नहीं होता। 

यह सत्त्वगुण का बन्धन है। यह स्वर्ण की जंजीर है परन्तु है तो जंजीर ही भगवान् कहते हैं कि सत्त्वगुण सुख संग और ज्ञान के साथ आसक्ति से बांध देता है। एक बार जब कोई व्यक्ति रचनात्मक चिन्तन तथा सदाचार और ज्ञान के अनुप्राणित जीवन के सात्त्विक आनन्द का अनुभव कर लेता है तब उसमें वह इतना आसक्त हो जाता है कि फिर उसके लिये वह अपने सर्वस्व का भी त्याग करने के लिये तत्पर रहता है। 

भावों और शब्दों के ही आनन्द में निमग्न एक कवि  देश निष्कासन का जीवन जीने वाले राजनीतिज्ञ मृत्यु का आलिंगन करने वाले पर्वतारोही ये सब उदाहरण ऐसे पुरुषों के हैं जिन्हें सात्त्विक आनन्द का अनुभव होता है और जो उसी में आसक्त हो जाते हैं जैसे स्थूल बुद्धि के लोग धन तथा अन्य भौतिक वस्तुओं के परिग्रह में आसक्त रहते हैं

रजोगुण का बन्धन निम्न प्रकार से होता है

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।

तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्।।14.7।।

।।14.7।। हे कौन्तेय ! रजोगुण को रागस्वरूप जानो, जिससे तृष्णा और आसक्ति उत्पन्न होती है। वह देही आत्मा को कर्मों की आसक्ति से बांधता है।।

अपने मन पर विजय प्राप्त करने के इच्छुक साधक को मन की उन समस्त सूक्ष्म प्रवृत्तियों एवं रुचियों का ज्ञान होना चाहिये जिनके द्वारा वह बारम्बार उन्मत्त के समान विषयों की ओर भागता हैइस प्रकार यह मन साधक के आन्तरिक व्यक्तित्व को (स्वरुप ज्ञान को)  नष्ट करने के षड्यन्त्र में ही लगा रहता है। 

रजोगुण को रागस्वरूप जानो जब अन्तकरण में रजोगुण के प्रभावों का घातक आक्रमण होता है तब वह मनुष्य के मन को असंख्य पीड़ादायक उद्वेगों से चूरचूर कर देता है। मन के स्तर पर उठने वाले ये उद्वेग ही रजोगुण के मुख्य लक्षण हैं। तथापि इन सबका समावेश केवल (3K) कामिनी-कांचन -कीर्ति के तृष्णा और संग अर्थात् आसक्ति। 

अप्राप्त वस्तु को पाने की कामना तृष्णा कहलाती है और प्राप्त वस्तु से आसक्ति को संग कहते हैं। विषयों के प्रति मन में उत्पन्न होने वाली तृष्णा और संग ही मनुष्य के कामुक जीवन में असंख्य वस्तुओं को अर्जित करने उन पर अधिकार जमाने और उन्हें सुरक्षित रखने के लिये संघर्ष और कलह को जन्म देते हैं। यह रजोगुण मनुष्य को कर्मासक्ति से बांधता है रजोगुण के वशीभूत पुरुष के मन में विभिन्न इच्छाएं उत्पन्न होती हैं जिन्हें पूर्ण करने के लिये स्वाभाविक है कि वह दिनरात कर्म में ही व्यस्त और आसक्त हो जाता है। उसका सम्पूर्ण जीवन धन के आय और व्यय वस्तुओं के अर्जन और रक्षण करने में ही व्यतीत होता है। 

इस प्रक्रिया में उसका शरीर तो वृद्ध होता जाता है परन्तु उसकी तृष्णा नवयौवन को प्राप्त होती जाती है अधिकाधिक भोग को प्राप्त करने की व्याकुलता और प्राप्त वस्तु के नष्ट होने के भय के कारण वह एक कर्म से दूसरे कर्म में प्रवृत्त रहता है। इस प्रकार अपने ही कर्मों से उत्पन्न हुए सुख दुख रूप फलों को भोगने के लिए यह जीव देह से बंधा रहता है। 

यदि सत्त्वगुण के बन्धन में मनुष्य को यह अभिमान होता है कि मैं सुखी हूँ और मैं जानने वाला हूँ तो रजोगुण में मैं कर्ता हूँ इस प्रकार कर्तृत्व का अभिमान होता है। इस तथ्य का हमें स्मरण रहे कि इन गुणों से उत्पन्न ये बन्धन मायावी (illusory-अवास्तविक) ही हैं वास्तविक नहीं।

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।

प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत।।14.8।।

।।14.8।। और हे भारत ! तमोगुण को अज्ञान से (अविद्या से)  उत्पन्न जानो; जो समस्त देहधारियों (जीवों) को मोहित करने वाला है। वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा जीव को बांधता है।।

तमोगुण अज्ञानजनित है तमोगुण के प्रभाव से सत्य (नित्य)  और असत्य (अनित्य) का विवेक करने की मनुष्य की बौद्धित क्षमता आच्छादित हो जाती है और फिर वह किसी संभ्रमित या मूर्ख व्यक्ति के समान व्यवहार करने लगता है। 

अब तक भगवान् श्रीकृष्ण ने क्रमवार सत्त्व, रज और तमोगुण के उन लक्षणों का वर्णन किया है जो हमारे मानसिक जीवन में देखे जाते हैं। ये हमारे मन की शान्ति को भंग कर देने वाले होते हैं। इन तीनों गुणों के कारण विभिन्न व्यक्तियों में दिव्यता की अभिव्यक्ति में भी तारतम्य होता है और ये गुण नित्य अनन्तस्वरूप आत्मा को मानो अनित्य और परिच्छिन्न बना देते हैं। संक्षेप में 

सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत।

ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत।।14.9।।

।।14.9।। हे भारत ! सत्त्वगुण सुख में आसक्त कर देता है और रजोगुण कर्म में, किन्तु तमोगुण ज्ञान को आवृत्त करके जीव को प्रमाद (unconsciousness बेहोशी) से युक्त कर देता है।।

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।

रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा।।14.10।।

।।14.10।। हे भारत ! कभी रज और तम को अभिभूत (दबा) करके सत्त्वगुण की वृद्धि होती है, कभी रज और सत्त्व को दबाकर तमोगुण की वृद्धि होती है, तो कभी तम और सत्त्व को अभिभूत कर रजोगुण की वृद्धि होती है।।

 जब हम कहते हैं कि कोई पुरुष सत्त्वगुण के प्रभाव में है तब उसका अर्थ यह होता है कि उस समय उसमें रजोगुण और तमोगुण इतने अधिक प्रबल नहीं होते कि वे अपने प्रभाव को व्यक्त कर सकें। यही बात अन्य गुणों के विषय में भी समझनी चाहिये।

वर्धमान गुण के लक्षण को हम किस प्रकार पहचान सकते हैं भगवान् बताते हैं

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।

ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत।।14.11।।

।।14.11।। जब इस देह के द्वारों अर्थात् समस्त इन्द्रियों में ज्ञानरूप प्रकाश उत्पन्न होता है, तब सत्त्वगुण को प्रवृद्ध हुआ जानो।

 सर्वप्रथम सत्त्वगुण की प्रवृद्धि होने पर उत्पन्न होने वाले लक्षणों का बोध यहाँ कराया गया है। इसके अगले दो श्लोकों में क्रमश रज और तम की विवृद्ध स्थिति का वर्णन किया गया है।

जब इस देह के समस्त द्वारों मे प्रकाश उत्पन्न होता है हमें बाह्य जगत् का ज्ञान पंच ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा होता है। स्थूल शरीर में इन इन्द्रियों के निवास स्थानों को गोलक कहते हैं। इन इन्द्रियों के माध्यम से चैतन्य का प्रकाश मानों बाहर जाकर जगत् की विविध वस्तुओं को प्रकाशित करता है। 

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।

रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ।।14.12।।

।।14.12।। हे भरत-श्रेष्ठ ! रजोगुण के प्रवृद्ध होने पर लोभ, प्रवृत्ति (सामान्य चेष्टा) कर्मों का आरम्भ, शम का अभाव तथा स्पृहा, ये सब उत्पन्न होते हैं।।

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।

तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन।।14.13।।

।।14.13।। हे कुरुनन्दन ! तमोगुण के प्रवृद्ध होने पर अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह ये सब उत्पन्न होते हैं।।

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्।

तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते।।14.14।।

।।14.14।। जब यह जीव (देहभृत्) सत्त्वगुण की प्रवृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल अर्थात् स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है।।

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते।

तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते।।14.15।।

।।14.15।। रजोगुण के प्रवृद्ध काल में मृत्यु को प्राप्त होकर कर्मासक्ति वाले (मनुष्य) लोक में वह जन्म लेता है तथा तमोगुण के प्रवृद्धकाल में (मरण होने पर) मूढ़योनि में जन्म लेता है।।

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।

रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्।।14.16।।

।।14.16।। शुभ कर्म का फल सात्विक और निर्मल कहा गया है; रजोगुण का फल दु;ख और तमोगुण का फल अज्ञान है।।

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।

प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च।।14.17।।

।।14.17।। सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है। रजोगुण से लोभ तथा तमोगुण से प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न होता है।।

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।

जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः।।14.18।।

।।14.18।। सत्त्वगुण में स्थित पुरुष उच्च (लोकों को) जाते हैं; राजस पुरुष मध्य (मनुष्य लोक) में रहते हैं और तमोगुण की अत्यन्त हीन प्रवृत्तियों में स्थित तामस लोग अधोगति को प्राप्त होते हैं।।

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।

गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति।।14.19।।

।।14.19।। जब द्रष्टा (साधक) पुरुष तीनों गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य को कर्ता नहीं देखता, अर्थात् नहीं समझता है और तीनों गुणों से परे मेरे तत्व को जानता है, तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।।

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्।

जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते।।14.20।।

।।14.20।। यह देही पुरुष शरीर की उत्पत्ति के कारणरूप तीनों गुणों से अतीत होकर जन्म, मृत्यु, जरा और दु:खों से विमुक्त हुआ अमृतत्व को प्राप्त होता है।।

अर्जुन उवाच

कैर्लिंगैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो।

किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते।।14.21।।

।।14.21।। अर्जुन ने कहा -- हे प्रभो ! इन तीनो गुणों से अतीत हुआ पुरुष किन लक्षणों से युक्त होता है ? वह किस प्रकार के आचरण वाला होता है ? और, वह किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है।।

श्री भगवानुवाच

प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।

न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति।।14.22।।

।।14.22।। श्रीभगवान् ने कहा -- हे पाण्डव ! (ज्ञानी पुरुष) प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह के प्रवृत्त होने पर भी उनका द्वेष नहीं करता तथा निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा नहीं करता है।।

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।

गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते।।14.23।।

।।14.23।। जो उदासीन के समान आसीन होकर गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता और "गुण ही व्यवहार करते हैं" ऐसा जानकर स्थित रहता है और उस स्थिति से विचलित नहीं होता।।

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।

तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः।।14.24।।

।।14.24।। जो स्वस्थ (स्वरूप में स्थित), सुख-दु:ख में समान रहता है तथा मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समदृष्टि रखता है; ऐसा वीर पुरुष प्रिय और अप्रिय को तथा निन्दा और आत्मस्तुति को तुल्य समझता है।।

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।

सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते।।14.25।।

।।14.25।। जो मान और अपमान में सम है; शत्रु और मित्र के पक्ष में भी सम है, ऐसा सर्वारम्भ परित्यागी पुरुष गुणातीत कहा जाता है।।

मां च योऽव्यभिचारेण भक्ितयोगेन सेवते।

स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते।।14.26।।

।।14.26।। जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरी सेवा अर्थात् उपासना करता है, वह इन तीनों गुणों के अतीत होकर ब्रह्म बनने के लिये योग्य हो जाता है।।

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च।

शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च।।14.27।।

।।14.27।। क्योंकि मैं अमृत, अव्यय, ब्रह्म, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक अर्थात् पारमार्थिक सुख की प्रतिष्ठा हूँ।।

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रविवार, 29 मार्च 2026

⚜️️🔱श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय -13⚜️️🔱अध्याय तेरह: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग ⚜️️🔱स्वामी जी के अनुसार -में कृष्ण के उपदेश के सारस्वरूप दो श्लोक (गीता अध्याय 13-28, 29) ⚜️️🔱क्या 'मन' आत्मा से बढ़कर है ?⚜️️🔱13.22।।साधक को पहले विवेकज ज्ञान के द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त करना चाहिए और फिर वैराग्य के द्वारा मिथ्या आसक्ति का त्याग कर देना चाहिए। ⚜️️🔱 ।।13.17।।शक्ति (काली ) को मानने से ही जगत मिथ्या हो जाता है। समाधिस्थ हुए बिना शक्ति की सीमा लाँघने का उपाय नहीं है।⚜️️🔱गीता अध्याय 13 :(8.9,10, 11, 12 ) में चरित्र के इन बीस गुणों को ही ज्ञान कहा गया है⚜️️🔱6-7: अविद्या दशा : शिक्षा व्यवस्था में -शुद्ध आत्मस्वरूप का बोध कराने के लिए सर्वप्रथम जड़ और चेतन का विवेक कराना आवश्यक है।⚜️️🔱"तत्कर्म यन्न बंधाय सा विद्या या विमुक्तये"विद्या (विवेकज-ज्ञान) वह ज्ञान है जो मुक्ति का कारण है।⚜️️🔱 पूर्णत्व का अनुभव आत्मरूप से होता है न कि दृश्य रूप से।⚜️️🔱क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विवेक-जनित ज्ञान (विवेकज-ज्ञान) ही वास्तविक ज्ञान है⚜️️🔱आत्मा या ब्रह्म ही उपाधि भेद से क्षेत्र (Hand and Head) और क्षेत्रज्ञ (Heart-3H)रूप में प्रगट हुए हैं⚜️️🔱

⚜️️🔱अध्याय तेरह: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग ⚜️️🔱

[अध्याय 13 का सारांश]

     भगवद्गीता में कुल अठारह अध्याय हैं। इनका तीन खण्डों में विभाजन किया जा सकता है। प्रथम खण्ड के छः अध्यायों में कर्मयोग का वर्णन किया गया है। दूसरे खण्ड में भक्ति की महिमा और भक्ति को पोषित करने का की विधि वर्णन हुआ है। इसमें भगवान के ऐश्वर्यों का भी वर्णन किया गया है। तीसरे खण्ड के छः अध्यायों में तत्त्वज्ञान पर चर्चा की गयी है।

आचार्य शंकर ने कहा है कि इस अध्याय के अंतिम श्लोक में पूरे अध्याय का सारमर्म बतलाया गया है। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ अर्थात शरीर और आत्मा का भेद-दर्शन ही मुक्ति है। देहात्मबोध अर्थात इस नश्वर देह में आत्मज्ञान ही अज्ञान (अविद्या) तथा सारे बन्धनों का (पंचक्लेश का) कारण है। देहात्म-विवेक अर्थात आत्मा देह से पृथक है - इस ज्ञान से ही निर्वाण मुक्ति है।

कथामृत ग्रंथ में मिलता है - " देह और आत्मा। देह पैदा हुई है, फिर चली जाएगी। आत्मा की मृत्यु भी नहीं है , जन्म भी नहीं है। ..उनका दर्शन करने से (विवेक-दर्शन का अभ्यास करने से) उन्हें प्राप्त करने से देह-बुद्धि चली जाती है। उस समय देह पृथक और आत्मा पृथक -ऐसा बोध होता है। 

" जब तक देहबुद्धि है , तभी तक सुख-दुःख , जन्म-मृत्यु , रोग-शोक हैं। ये सब देह के ही हैं , आत्मा के नहीं। आत्मज्ञान होने से सुख-दुःख , जन्म-मृत्यु आदि स्वप्न की तरह मिथ्या प्रतीत होते हैं। जड़ देह , इन्द्रिय , मन , बुद्धि सभी सगुण, सभी नश्वर हैं। अतः वे अविनाशी आत्मा नहीं हो सकते। आत्मा (इष्टदेव) निर्गुण है। 

     इसके संबन्ध ने श्रीरामकृष्णदेव ने कहा था - " जो शुद्ध आत्मा है , वह निर्लिप्त है। उसमें माया या अविद्या है। इस माया (अविद्या) के भीतर ही तीन गुण हैं -सत्त्व, रजः , तमः। जो शुद्ध आत्मा है (शुद्धबुद्धि ) है उसमें ये तीन गुण मिले हुए हैं , किन्तु आत्मा निर्लिप्त है। यदि कहो कि दुःख , पाप, अशान्ति ये सब क्या हैं ? तो उत्तर है कि यह सब जीवों के लिए है। ब्रह्म निर्लिप्त है , आत्मा सभी अवस्थाओं में निर्लिप्त है। शरीर में रहकर भी देह-मन से निर्लिप्त है। शुद्ध आत्मा निर्लिप्त है। उसके भीतर विद्या और अविद्या दोनों हैं , तो भी वह निर्लिप्त है। जैसे वायु में कभी सुंगध कभी दुर्गंध मिलती है, किन्तु वायु निर्लिप्त है। श्रीरामकृष्ण ने एक दिन हाजरा महाशय से कहा था - " तुम शुद्ध आत्मा (ब्रह्म) को ईश्वर क्यों कहते हो ? शुद्ध आत्मा निष्क्रिय है , तीन अवस्थाओं में वह साक्षी -स्वरुप है। 

श्रीठाकुर ने अन्यत्र कहा है -" जो शुद्ध आत्मा है वह महाकारण, कारण का भी कारण हैं। पंचभूत स्थूल है , मन, बुद्धि, अहंकार सूक्ष्म है। प्रकृति या आद्यशक्ति इन सबकी कारण हैं , ब्रह्म या शुद्ध आत्मा कारण के भी कारण हैं। 

वेदान्ती कहते हैं कि आत्मा निर्लिप्त है। सुख -दुःख , पाप-पुण्य आदि आत्मा को कोई हानि नहीं पहुँचा सकते, किन्तु देहाभिमानी मनुष्यों को कष्ट दे सकते हैं। धुआँ दीवाल (स्थूल) को मलीन कर सकता है , किन्तु आकाश का कुछ भी नहीं कर सकता। " 

देह में आत्मबोध अज्ञान है , देहात्म-विवेक देह और आत्मा का पृथक ज्ञान ही बोध है। -जिसे ऐसा ब्रह्मज्ञान हुआ है, वह जीवन मुक्त है। वह ठीक समझ सकता है कि आत्मा पृथक और देह पृथक है। भगवान का दर्शन कर लेने पर देहात्मबुद्धि नहीं रहती। 

गीता का यह अतिशय उज्ज्वल अध्याय है  जो हमें अपने नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्त आत्म स्वरूप के ध्यान करने के साक्षात् साधन का उपदेश देता है।  जिसके अभ्यास से हम अपरोक्षनुभूति प्राप्त कर सकते हैं।

 स्वप्न से जाग जाने का अर्थ स्वप्नावस्था के सब दुःखों का अन्त हो जाना है। जाग्रत् ,  स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं के मध्य यातायात की कोई निश्चित सीमा नहीं निर्धारित की गयी है अर्थात् अवस्थान्तर के लिए हमें कोई परिश्रम नहीं करना पड़ता है। 

इसी प्रकार हमारा संसार -दुःख  प्रकृति के साथ हमारे अविद्याजनित मिथ्या तादात्म्य के कारण ही है। (लेकिन समाधि के बाद शरीर में रहने तक प्रारब्ध को भोग कर ही क्षय करना पड़ता है।) अतः  क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विवेक के द्वारा प्राप्त आत्मबोध से संसार की निवृत्ति हो जाती है। यही एकमात्र ज्ञेय वस्तु है। सम्पूर्ण गीता में  परमात्मा का इससे अधिक स्पष्ट और साक्षात् निर्देशन हमें किसी अन्य अध्याय में नहीं मिलता है।

इस अध्याय में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का भेद विशेष रूप से दिखाया है। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का यह भेद ज्ञान ही यथार्थ ज्ञान है। वही परमेश्वर का ज्ञान या ब्रह्मज्ञान है। 

इस ज्ञान में प्रतिष्ठित होने के लिए कुछ साधनों की आवश्यकता है। और विभिन्न साधन मार्गों से उस तत्त्वज्ञान या ब्रह्मज्ञान में प्रतिष्ठा मिल सकती है। अष्टांग योग के धारणा, ध्यान और समाधि के द्वारा जिस प्रकार आत्मदर्शन सम्भव है , उसी प्रकार नेति नेति ज्ञान मार्ग से भी आत्मज्ञानरूपी मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। फिर कर्म और भक्तिमार्ग से भी आत्मा लभ्य है। 

 उस अन्तिम अवस्था को ही आत्मदर्शन , ब्रह्मस्वरूपता की प्राप्ति , देहात्मविवेक -मोक्ष आदि विविध नामों से का गया है। 

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अर्जुन उवाच

प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च।

एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव।।13.1।।

।।13.1।। अर्जुन ने कहा -- हे केशव ! मैं, प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान और ज्ञेय ये सब जानना चाहता हूँ।।  

[अनेक ग्रंथों में  यह श्लोक नहीं है? आचार्य शंकरने भी अपने टीका और भाष्य में इस श्लोक को नहीं लिया है, हमने गीता के श्लोक की संख्या पूर्ण करने के लिए (700 ) इस श्लोक को ग्रहण किया है। ]  

इस अध्याय में ज्ञान शब्द से तात्पर्य उस शुद्धान्तकरण (शुद्धबुद्धि -विवेकी बुद्धि) से हैं जिसके द्वारा ही आत्मतत्त्व का अनुभव किया जा सकता है। यह आत्मा ही ज्ञेय अर्थात् जानने योग्य वस्तु है।  अर्जुन की इस जिज्ञासा के उत्तर को जानना सभी साधकों को लाभदायक होगा।

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।

एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः।।13.2।।

।।13.2।। श्रीभगवान् ने कहा -- हे कौन्तेय ! यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसे तत्त्वज्ञ जन, क्षेत्रज्ञ कहते हैं।।

 पूर्णत्व का अनुभव आत्मरूप से होता है न कि दृश्य रूप से। ऋषियों का इस विषय में एकमत है कि अन्तर्मुखी होकर आत्मविचार करना ही आत्मबोध तथा उसके साक्षात् अनुभव का साधन मार्ग है। 

जाग्रत पुरुष ही अपनी किसी एक विशेष मनस्थिति से स्वप्नद्रष्टा बन जाता है और जब तक स्वप्न बना रहता है तब तक उस स्वप्नद्रष्टा के लिये वह अत्यन्त सत्य प्रतीत होता है। परन्तु जाग जाने पर उस स्वप्न का अभाव हो जाता है और जाग्रत् पुरुष यह जानता है कि वह स्वप्न उसके ही मन का मरीचिका मात्र था।  इसी प्रकार आत्मानुभूति की वास्तविक जागृति में इस दृश्य प्रपंच का अभाव होता है। 

इस प्रकार वेदान्त दर्शन के अनुसार विचार करने पर ज्ञात होता है कि समस्त प्राणी दो तत्त्वों से बने हैं। एक तत्त्व है परिवर्तनशील देह और मन जड़-अचेतन और दूसरा है अपरिवर्तनीय अविनाशी चेतन तत्त्व।

 संपूर्ण जड़ जगत् क्षेत्र है, और चैतन्य स्वरूप आत्मा क्षेत्रज्ञ कहा जाता है। 

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम।।13.3।।

।।13.3।। हे भारत ! तुम समस्त क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे ही जानो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही (वास्तव में) ज्ञान है , ऐसा मेरा मत है।।

 क्षेत्रज्ञ मैं हूँ ! क्योंकि सभी साधकों को यह इसी रूप में अनुभव करना है कि वह मैं हूँ (सोऽहम्)। भगवान् श्रीकृष्ण गीता का उपदेश योगारूढ़ की स्थिति के विरले क्षणों में कर रहे हैं। वे सर्वव्यापी आत्मस्वरूप से तादात्म्य किये हुये हैं।

इस सम्पूर्ण विविध नाम-रूपमय सृष्टि के पीछे विद्यमान एकमेव सत्य (चैतन्य आत्मा) का निर्देश करने के पश्चात् भगवान् अपना मत बताते हुये कहते हैं कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विवेक-जनित ज्ञान (विवेकज-ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान कहलाने योग्य है। क्योंकि यही ज्ञान हमें अपने सांसारिक बन्धनों से मुक्त कराने में समर्थ है। 

"तत्कर्म यन्न बंधाय सा विद्या या विमुक्तये" (विष्णुपुराण १.१९.४१) का अर्थ है- कर्म वही है जो बंधन का कारण नहीं होता, और विद्या (विवेकज-ज्ञान) वह ज्ञान है जो मुक्ति का कारण हैआत्मानुभूति के अतिरिक्त अन्य ज्ञान व्यर्थ का पाण्डित्य मात्र है। आत्मा या ब्रह्म ही उपाधि भेद से क्षेत्र (Hand and Head) और क्षेत्रज्ञ (Heart-3H) रूप में प्रगट हुए हैं।

ज्ञानमार्ग के निष्ठावान् साधकों के लिए यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का ज्ञान उपयोगी और आवश्यक होने के कारण उन्हें उसका विस्तृत अध्ययन करना होगा।

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत्।

स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु।।13.4।।

।।13.4।। वह क्षेत्र जो है, जैसा है, जिन विकारों वाला है और जिससे जो पैदा हुआ है; तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो है और जिस प्रभाव वाला है, वह सब संक्षेप में मेरेसे सुन।

हमारे आसपास का यह जगत् जिसे हमने ही प्रेक्षित किया है तथा वे ही प्रक्रियायें जिनके द्वारा हम कार्य करते हुये असंख्य विषयों भावनाओं और विचारों की विविधता को देखते हैं ,इन सबका हमें सूक्ष्म निरीक्षण तथा अध्ययन करना चाहिये। 

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्।

ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितै:।।13.5।।

।।13.5।। (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के विषय में) ऋषियों द्वारा विभिन्न और विविध छन्दों में बहुत प्रकार से गाया गया है, तथा सम्यक् प्रकार से निश्चित किये हुये युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा (अर्थात् ब्रह्म के सूचक शब्दों द्वारा) भी (वैसे ही कहा गया है)।।

यहाँ भगवान् स्वयं ही स्पष्ट कहते हैं कि ऋषियों द्वारा अनुभूत और प्रतिपादित सत्य की ही वे पुनर्घोषणा कर रहे हैं। संक्षेप में उपनिषदों के प्रतिपाद्य ब्रह्मतत्त्व का ही निरूपण इस अध्याय का विषय है। 

महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।

इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः।।13.6।।

।।13.6।। पंच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त (प्रकृति), दस इन्द्रियाँ, एक मन, इन्द्रियों के पाँच विषय।।

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः।

एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्।।13.7।।

।।13.7।। इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघात (स्थूलदेह), चेतना (अन्त:करण की चेतन वृत्ति) तथा धृति -  इस प्रकार यह क्षेत्र विकारों के सहित संक्षेप में कहा गया है।।

अहंकार-  चैतन्य (आत्मा)  का उपाधियों के साथ तादात्म्य होने पर अहंभाव या अहंकार की उत्पत्ति होती है। यही उपाधियों द्वारा कर्मों का कर्ता और फलों का भोक्ता बनता है। संसार के सुखदुखादिक इसी के लिए होते हैं।

बुद्धि - सांख्यदर्शन में महत्तत्त्व कहते हैं , समष्टि की दृष्टि से यहाँ बुद्धि शब्द प्रयुक्त है जिसे । अन्तकरण की निश्चयात्मिका वृत्ति बुद्धि कहलाती है। जीवन में वस्तु की यथार्थता अनुभवों का शुभ और अशुभ रूप में निर्धारण करना ही बुद्धि का कार्य है।अव्यक्त मनुष्य के मन और बुद्धि जिससे प्रेरित होते हैं  वह अव्यक्त वासनाएं हैं। जगत् में हम जो कर्म करते हैं तथा फल भोगते हैं उनसे हमारे मन में संस्कार उत्पन्न होते हैं।  जो हमारे भावी कर्म, विचार एवं भावनाओं को दिशा प्रदान करते हैं। 

एक व्यष्टि जीव के समस्त कर्मों का स्रोत उसकी वासनाएं होती हैं।  इसी समष्टि वासना को सांख्यदर्शन में मूलप्रकृति कहा गया है, तो वेदान्त ने इसे माया कहा हैमाया या मूलप्रकृति की उपाधि से विशिष्ट परमात्मा ही सृष्टिकर्ता मायाधीश ईश्वर है और वही परमात्मा व्यष्टि वासना की उपाधि (अविद्या) से विशिष्ट मायाधीन जीव बनता है

इस विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि अव्यक्त ही वह अदृष्ट कारण है जिससे यह दृश्य जगत् कार्यरूप में व्यक्त हुआ है। दस इन्द्रियाँ पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ ही वे कारण हैं जिनके द्वारा प्रत्येक मनुष्य क्रमश विषय ग्रहण करके अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त करता है। 

क्षेत्र के तत्त्वों को बताने के पश्चात् भगवान् उसके विकारों को बताते हैं। वे विकार हैं इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, स्थूल देह, अन्तकरण वृत्ति तथा धृति अर्थात् धैर्य। संक्षेपत केवल शरीर इन्द्रियाँ मन और बुद्धि ही क्षेत्र नहीं है वरन् उसमें इन उपाधियों द्वारा अनुभूत विषय भावनाएं और विचार भी समाविष्ट हैं। 

द्रष्टा से भिन्न जो कुछ भी है वह सब दृश्य है क्षेत्र है। इस द्रष्टा आत्मचैतन्य की दृष्टि से जो कुछ भी दृश्य, ज्ञात तथा अनुभूत वस्तु है वह सब क्षेत्र है। इसे गीता में अत्यन्त संक्षिप्त वाक्य यह शरीर के द्वारा दर्शाया गया है। इस सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करने वाला चैतन्यस्वरूप आत्मा क्षेत्रज्ञ कहलाता है। 

अविद्या दशा : होश सँभालते ही भ्रमित होकर स्वयं को M/F शरीर को (अविद्या , अस्मिता, राग-द्वेष-अभिनिवेश)   में यह जीव, शरीर आदि क्षेत्र को ही अपना स्वरूप अर्थात् क्षेत्रज्ञ समझता है।  इस कारण उसे अपने शुद्ध आत्मस्वरूप का बोध कराने के लिए सर्वप्रथम जड़ और चेतन का विवेक कराना आवश्यक है।  इसीलिए यहाँ 'क्षेत्र' को इतने विस्तार पूर्वक-दो श्लोकों में (13/6-7 में) बताया गया है

(प्राथमिक शिक्षा से ही या उच्चतर शिक्षा व्यवस्था में आचार्य शंकर द्वारा कही गयी विवेक की परिभाषा बताना आवश्यक/अनिवार्य है। अतएव पहले विवेक-बुद्धि सम्पन्न शिक्षकों , नेताओं का निर्माण का आवश्यक है।)  

अब अगले पाँच श्लोकीय प्रकरण में ज्ञान को बताया गया है , यहाँ ज्ञान शब्द से तात्पर्य उस अन्तकरण से है जो आत्मज्ञान के लिए आवश्यक गुणों से सम्पन्न हो।  क्योंकि शुद्ध अन्तकरण (शुद्ध बुद्धि )  के द्वारा ही आत्मा का अनुभव सम्भव होता है। अत अब प्रस्तुत प्रकरण में भगवान् श्रीकृष्ण चरित्र के बीस गुणों को बताते हैं जो सदाचार और नैतिक नियम हैं।

 वे गुण हैं- 

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।

आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः।।13.8।।

।।13.8।। मानित्व-(अपनेमें श्रेष्ठताके भाव-) का न होना, दम्भित्व-(दिखावटीपन-) का न होना, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरुकी सेवा, बाहर-भीतरकी शुद्धि, स्थिरता और मनका वशमें होना।

।।13.8।। नम्रताः अमानित्व -  जब हमें अपने क्षेत्र अर्थात् शरीर के गुणों जैसे सौंदर्य, बुद्धि, प्रतिभा, सामर्थ्य आदि पर अहंकार हो जाता है, तब हम यह भूल जाते हैं कि ये सब गुण हमें भगवान ने ही कृपापूर्वक प्रदान किए हैं। अहंकार के परिणामस्वरूप हमारी चेतना हमें भगवान से विमुख कर देती है। यह आत्मज्ञान के मार्ग में एक बड़ी बाधा है क्योंकि अहंकार मन और बुद्धि को प्रभावित करके पूरे क्षेत्र को दूषित कर देता है। 

अमानित्व स्वयं को पूजनीय व्यक्ति समझना मान कहलाता है। उसका अभाव अमानित्व है। अदम्भित्व अपनी श्रेष्ठता का प्रदर्शन न करने का स्वभाव। अहिंसा शरीर मन और वाणी से किसी को पीड़ा न पहुँचाना

 क्षान्ति -अर्थात सहनशक्ति  किसी के अपराध किये जाने पर भी मन में विकार का न होना क्षान्ति अर्थात् सहनशक्ति हैआर्जव हृदय का सरल भाव अकुटिलता।  

आचार्योपासना गुरु की केवल शारीरिक सेवा ही नहीं,  वरन् उनके हृदय की पवित्रता और बुद्धि के तत्त्वनिश्चय के साथ तादात्म्य करने का प्रयत्न ही वास्तविक आचार्योपासना है। 

शौचम् शरीर, वस्त्र, बाह्य वातावरण तथा मन की भावनाओं, विचारों, उद्देश्यों तथा अन्य वृत्तियों की शुद्धि भी इस शब्द से अभिप्रेत है। 

स्थिरता जीवन के सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दृढ़ निश्चय और एकनिष्ठ प्रयत्न। आत्मसंयम जगत् के साथ व्यवहार करते समय इन्द्रियों तथा मन पर संयम होना

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।

जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्।।13.9।।

।।13.9।। इन्द्रियों के विषय के प्रति वैराग्य, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धवस्था, व्याधि और दुःख में दोष दर्शन...৷৷

 इन्द्रियों के विषयों के प्रति वैराग्य : इसका अर्थ जगत् से पलायन करना नहीं है। विषयों के साथ रहते हुए भी मन से उनका चिन्तन न करना तथा उनमें आसक्त न होना  यह वैराग्य का अर्थ है। जो व्यक्ति विषयों से दूर भागकर कहीं जंगलों में बैठकर उनका चिन्तन करता रहता है वह तो अपनी वासनाओं का केवल दमन कर रहा होता है।  ऐसे पुरुष को भगवान् ने मिथ्याचारी कहा है। (दादा कहते थे चरित्र जंगल में बैठकर पकाने की वस्तु नहीं है -समाज में रहकर ही यम-नियम का पालन 24X 7 करना है।)  

अहंकार का अभाव : व्यष्टिगत जीवभाव का उदय (M/F शरीर होने का भाव )  केवल तभी होता है जब हम शरीरादि उपाधियों के साथ तथा उनके अनुभवों के साथ तादात्म्य करते हैं। अपने शुद्ध आत्मस्वरूप में स्थित होने के लिए आवश्यक पूर्व गुण यह है कि हम इस मिथ्या तादात्म्य को विवेक- विचार के द्वारा नष्ट कर दें। यह प्रक्रिया भूमि जोतने के पूर्व घासपात को दूर करने के तुल्य ही है।  

जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि दुख-दोषानुदर्शनम् : वर्तमान अविद्या दशा से असन्तुष्टि ही हमें नवीन श्रेष्ठतर और सुखद स्थिति को प्राप्त करने के लिए प्रेरित कर सकती है। जब तक किसी राष्ट्र या समाज के लोगों में इस बात की जागरूकता नहीं आती है कि उनकी वर्तमान दशा (अविद्या दशा में स्वयं को मात्र देह M/F समझना) अत्यन्त घृणित और दुखपूर्ण है तब तक वे अपने दुखों को भूलकर अपने आप को ही उस अविद्या दशा में जीने के अनुकूल बना लेते हैं। यही कारण है कि प्रत्येक नेता या समाज सेवक सर्वप्रथम लोगों को उनकी पतित और दरिद्रता की दशा (पशु दशा) का बोध कराता है। जब लोगों में इस बात की जागरूकता आ जाती है, तब वे उत्साह के साथ श्रेष्ठतर आनन्द और समृद्ध जीवन जीने का प्रयत्न करने को तत्पर हो जाते हैं।

यही पद्धति शैक्षणिक Be and Make ' और आध्यात्मिक क्षेत्रों में भी प्रयोज्य है। जब तक साधक को अपने आन्तरिक व्यक्तित्व के बन्धनों का पूर्णतया भान  नहीं होता है (जब तक अविनाशी आत्मा होते हुए भी नश्वर देह समझने की मूढ़ बुद्धि रहती है)तब तक वह स्वनिर्मित दुख के गर्त में पड़ा रहता है, और उससे बाहर आने के लिए कदापि प्रयत्न नहीं करता है। 

मानव शरीर और मन में अपने आप को परिस्थिति के अनुकूल बना लेने की अद्भुत् क्षमता है। वे अत्यन्त घृणित अवस्था (पाशविक अवस्था) को भी स्वीकार कर लेते हैं यहाँ तक कि उसी में सुख भी अनुभव करने लगते हैं। इसलिए यहाँ साधक को अपनी वर्तमान दशा (अविद्या दशा) के दोषों को विवेक-विचार पूर्वक देखने का उपदेश दिया गया है।

एक बार जब वह विवेकी मनुष्य  अपनी बद्धावस्था को (देहाभिनि अवस्था की मूर्खता को) पूर्णतया समझ लेगा तब उसमें आवश्यक आध्यात्मिक जिज्ञासा, बौद्धिक सार्मथ्य,  मानसिक उत्साह और शारीरिक साहस आदि समस्त गुण आ जायेंगे जिनके द्वारा वह आध्यात्मिक पूर्णता की उपलब्धि सरलता से कर सकेगा। 

जन्ममृत्युजराव्याधि में दोष का दर्शन प्रत्येक शरीर को ये विकार प्राप्त होते हैं। इनमें से प्रत्येक विकार नयेनये दुखों का स्रोत है। इन समस्त विकारों से प्राप्त होने वाले दुखों के प्रति जागरूकता आ जाने पर वह पुरुष उनसे मुक्ति पाने के लिए अधीर हो जाता है। दुख के विरुद्ध विद्रोह का यह भाव ही वह प्रेरक तत्त्व है जो साधकों को पूर्णत्व के शिखर तक शीघ्रता से पहुँचने के लिए प्रेरित करता है। 

असक्तिरनभिष्वङ्ग: पुत्रदारगृहादिषु।  

नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु।।13.10।

।।13.10।। आसक्ति तथा पुत्र, पत्नी, गृह आदि में अनभिष्वङ्ग (तादात्म्य का अभाव); और इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में समचित्तता।।

 हमें जो दुख होता है वह विषयों के कारण नहीं हमारे उसके साथ के मानसिक संग के कारण होता है। जैसै अग्नि स्वयं किसी को नहीं जला सकती जब तक कि कोई उसे स्पर्श न करे। 

पुत्र, भार्या और गृहादिक में अनभिष्वंग अति स्नेह को अभिष्वंग कहते हैं। अत उसका अभाव ही अनभिष्वंग कहलाता है। जब किसी व्यक्ति के प्रति सामान्य प्रीति बढ़कर आसक्ति का रूप ले लेती है, तब उसे अभिष्वंग कहते हैं। इस आसक्ति का लक्षण है यह है कि मनुष्य को अपनी प्रिय वस्तु या व्यक्ति के साथ इतना तादात्म्य हो जाता है कि उनके सुखदुख उसे अपने ही अनुभव होते हैं। इसका स्पष्ट उदाहरण है पुत्र के प्रति माता -पिता की आसक्ति काइस प्रकार की आसक्ति के कारण व्यक्ति के मन में सदा विक्षेप बना रहता है और वह कार्य करने में भी अकुशल हो जाता है। 

हमें अपने आन्तरिक व्यक्तित्व के चारों ओर नित्य -अनित्य विवेक की ऐसी दीवार खड़ी करनी चाहिये कि ये सभी विक्षेप हमसे दूर रहें और मन का सन्तुलन सदा बना रहे।  जिसके बिना किसी प्रकार की प्रगति या समृद्धि कदापि संभव नहीं होती। 

प्रिय और अप्रिय परिस्थितियों में चित्त की समता को सतत अभ्यास करते रहने से प्राप्त किया जा सकता है। यदि मनुष्य अपनी मूढ़ बुद्धि की प्रीति और आसक्ति के बन्धनों से मुक्त हो जाये तो उसे अपने में ही अतिरिक्त शक्ति का भण्डार प्राप्त होता है। 

 जिसका उसे सही दिशा में सदुपयोग करना चाहिये अन्यथा वही शक्ति आत्मघातक सिद्ध हो सकती है।वह सही दिशा क्या है इसे अगले श्लोक में बताते हैं

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। 

विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि।।13.11।।

।।13.11।। अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि।।

यह श्लोक बताता है कि किस प्रकार इस अतिरिक्त शक्ति का वह सही दिशा में सदुपयोग करे जिससे कि आत्मविकास में उसका लाभ मिल सके। अनन्ययोग से मुझ में अव्यभिचारिणी भक्ति अनन्यता का अर्थ है मन का ध्येय विषय में एकाग्र हो जाना। इसके लिये विजातीय वृत्तियों का सर्वथा त्याग करके ध्येयविषयक वृत्ति को ही बनाये रखने का अभ्यास आवश्यक होता है। ध्यान या भक्ति में इस स्थिरता के नष्ट होने के लिए दो कारण हो सकते हैं या तो साधक के मन की अस्थिरता या फिर ध्येय का ही निश्चित नहीं होना। 

यदि हमारी भक्ति एक मूर्ति से अन्य मूर्ति में परिवर्तित होती रहती है तो एकाग्रता कैसे सम्भव हो सकती है इसलिये यहाँ कहा गया है कि योग में प्रगति और विकास के लिए अनन्य योग से परमात्मा की भक्ति आवश्यक है। 

अविभाजित ध्यान तथा मन में उत्साह के होने पर पर भक्ति में एकाग्रता आना सरल कार्य हो जाता है। यहाँ अव्यभिचारी शब्द से साधक को यह चेतावनी दी जाती है कि उसका ध्यान अनेक देवीदेवताओं अथवा विचारों में न भटके वरन् चुने हुये ध्येय के साथ एकनिष्ठ रहे। फिर एक ही लक्ष्य दिखाई देता है और इन्हें लौकिक बातों में कोई रुचि नहीं रह जाती।यहाँ जिस समुदाय में अरुचि रखने को कहा गया है वह असंस्कृत असभ्य भोगों में आसक्त जनों के समुदाय के सम्बन्ध में कहा गया है न कि 'सन्त पुरुषों के संग' से।

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।

एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा।।13.12।।

।।13.12।। अध्यात्मज्ञान में नित्यत्व अर्थात् स्थिरता तथा तत्त्वज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा का दर्शन, यह सब तो ज्ञान कहा गया है, और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है।।

ज्ञान को दर्शाने वाले इस प्रकरण के इस अन्तिम श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण दो और गुणों को बताते हैं आत्मज्ञान में प्रतिष्ठित रहना तथा तत्त्वज्ञानार्थ का दर्शन। - मोक्ष, विवेकज-ज्ञान से प्राप्त होने वाले तत्वज्ञान का अनुसन्धान - या आत्मानुसंधान। 

श्री रामकृष्ण देव ने कहा है - " आत्मा के द्वारा ही आत्मा को जाना जा सकता है। शुद्धमन , शुद्ध बुद्धि, शुद्ध आत्मा एक ही है। "  (स्वयं को देह समझने वाली जड़ अहंबुद्धि के द्वारा, अविनाशी चैतन्य आत्मा को नहीं जाना जा सकता।) 

आत्मज्ञान में प्रतिष्ठित होना : आत्मज्ञान जीवन में अनुभव करके जीने का विषय है केवल बुद्धि से सीखने का नहीं।  यदि आत्मा ही एक सर्वव्यापी पारमार्थिक सत्य है तब साधक को अपने व्यक्तित्व के सभी स्तरों पर आत्मदृष्टि से रहने का - बहुत सतर्कता के साथ प्रयत्न करना चाहिये। 

स्वयं को आत्मा जानकर उसी बोध में स्थित होकर साधक को अपने जीवन के समस्त व्यवहार करने चाहिये। इसके लिये सतत अभ्यास की आवश्यकता होती है

तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् अमानित्वादि गुणों का विकास जिसके निमित्त करने को कहा गया है, वह है तत्त्वज्ञान और उस तत्त्वज्ञान के अर्थ का जो लक्ष्य है  उसका दर्शन करना। संसार बन्धनों की उपरामता अर्थात् मोक्ष ही वह लक्ष्य है। लक्ष्य का सतत स्मरण करते रहने से साधनाभ्यास में प्रवृत्ति और उत्साह बना रहता है  जो लक्ष्यप्राप्ति में साहाय्यकारी सिद्ध होता है। 

इस प्रकरण में उपर्युक्त पाँच श्लोकों (गीता अध्याय 13 :8.9,10, 11, 12 ) में  चरित्र के इन बीस गुणों को ही ज्ञान कहा गया है क्योंकि ये समस्त गुण आत्मसाक्षात्कार के लिए अनुकूल हैं। ये गुण, प्रवृत्तियों, व्यवहार और मनोवृत्तियों का वर्णन करते हैं जो हमारे जीवन को शुद्ध करते हैं और उसे ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करते हैं। 

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते।

अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते।।13.13।।

।।13.13।। मैं उस ज्ञेय वस्तु को स्पष्ट कहूंगा जिसे जानकर मनुष्य अमृतत्व को प्राप्त करता है। वह ज्ञेय है - अनादि, परम ब्रह्म, जो न सत् और न असत् ही कहा जा सकता है।।

जिसे जानकर साधक अमृत्व को प्राप्त होता है जड़ पदार्थ का धर्म है मरण। इन जड़ उपाधियों के साथ तादात्म्य के कारण अमरणधर्मा (अविनाशी) आत्मा इनसे अवच्छिन्न हुआ व्यर्थ ही मिथ्या परिच्छिन्नता और मरण का अनुभव करता है। आत्मानात्मविवेक के द्वारा अपने आत्मस्वरूप को पहचान कर उसमें दृढ़ स्थिति प्राप्त करने से मरण का यह मिथ्या भय समाप्त हो जाता है और अमृतस्वरूप आत्मा के परमानन्द का अनुभव होता है।

जो परमात्मा काल का भी अधिष्ठान है उसकी उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती। ब्रह्म को न सत् कहा जा सकता है और न असत्। सामान्य दृष्टि से जो वस्तु इन्द्रियगोचर होती है, उसे ही हम सत् (सत्य) कहते हैं। परन्तु जो चैतन्य द्रष्टा है वह कभी भी इन्द्रिय मन और बुद्धि का ज्ञेय नहीं हो सकता।  इसलिए कहा गया है कि वह सत् (सत्य) नहीं है। चैतन्य तत्त्व समस्त वस्तुओं का प्रकाशक होते हुए स्वयं समस्त अनुभवों के अतीत है

यदि वह सत् (सत्य) नहीं है तो हम उसे असत् (असत्य)  समझ लेगें।  इसलिए यहाँ उसका भी निषेध किया गया है। अत्यन्त अभावरूप वस्तु को असत् कहते हैं जैसे - खरहे का सिंघ,  आकाश पुष्प, बन्ध्यापुत्र इत्यादि। ब्रह्म को असत् नहीं कह सकते. क्योंकि वह सम्पूर्ण जगत् का कारण है। उसका ही अभाव होने पर जगत् की सिद्धि कैसे हो सकती है इसलिए उपनिषदों में उसे "नेति, नेति " (यह नहीं) की भाषा में निर्देशित किया गया है।

शंकराचार्य जी कहते हैं- इन्द्रियातीत होने अर्थात जाति और गुण से रहित होने के कारण ब्रह्म को सत् नहीं कहा जा सकता और समस्त शरीरों में चैतन्य रूप में व्यक्त होने के कारण असत् भी नहीं कहा जा सकता है। 

उपर्युक्त कथन से कोई व्यक्ति उसे शून्य न समझ ले इसलिए समस्त प्राणियों की उपाधियों के द्वारा ब्रह्म के अस्तित्व का बोध कराते हुए भगवान् कहते हैं

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।

सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति।।13.14।।

।।13.14।। वह सब ओर हाथ-पैर वाला है और सब ओर से नेत्र, शिर और मुखवाला तथा सब ओर से श्रोत्रवाला है; वह जगत् में सबको व्याप्त करके स्थित है।।

यद्यपि प्रणियों के हाथ और पैर जड़ तत्त्व के बने हैं तथापि वे चेतन और कार्यक्षम प्रतीत हो रहे हैं। इन सबके पीछे इन्हें चेतनता प्रदान करने वाला आत्मतत्त्व सर्वत्र एक ही है। इसीलिए यहाँ कहा गया है कि ब्रह्म समस्त हाथ और पैरों को धारण करने वाला है।

वह परम सत्य सबको व्याप्त करके स्थित है। यह श्लोक वैदिक साहित्य से परिचित विद्यार्थियों को ऋग्वेद के प्रसिद्ध पुरुषसूक्तम् का स्मरण कराता है।भगवान् आगे कहते हैं

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।

असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च।।13.15।।

।।13.15।। वह समस्त इन्द्रियों के गुणो (कार्यों) के द्वारा प्रकाशित होने वाला, परन्तु (वस्तुत:) समस्त इन्द्रियों से रहित है; आसक्ति रहित तथा गुण रहित होते हुए भी सबको धारणपोषण करने वाला और गुणों का भोक्ता है।।

यह श्लोक उपनिषद् से लिया गया है। आत्मचैतन्य के सम्बन्ध से ही समस्त इन्द्रियाँ अपनाअपना व्यापार करती हैं। परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि उनसे अवच्छिन्न आत्मा ही कार्य करता है तथा वह इन इन्द्रियों से युक्त है। किन्तु विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि इन्द्रियाँ भौतिक पदार्थ हैं और नाशवान भी हैं।  जबकि उनमें व्यक्त होकर उन्हें चेतनता प्रदान करने वाला आत्मा सनातन और अविकारी है।  संक्षेप में उपाधियों की दृष्टि से आत्मा उनका धारक प्रतीत होता है किन्तु स्वस्वरूप से वह सर्वेन्द्रिय विवर्जित है। 

 कोई भी तरंग सम्पूर्ण समुद्र नहीं है समस्त तरंगे सम्मिलित रूप में भी समुद्र नहीं है। हम यह नहीं कह सकते हैं कि समुद्र उन तरंगों में आसक्त है , क्योंकि वह तो उन सबका स्वरूप ही है। असक्त होते हुए भी उन सबको धारण करने वाला समुद्र के अतिरिक्त और कोई नहीं होता। 

वह आत्मा निर्गुण किन्तु गुणों का भोक्ता है , मनुष्य का मन सदैव सत्त्व,  रज और तम इन तीन गुणों के प्रभाव में कार्य करता है। इन तीनों गुणों के प्रभावों को आत्मा सदा प्रकाशित करता रहता है। प्रकाशक- प्रकाश्य के धर्मों से मुक्त होने के कारण आत्मा गुणरहित है। किन्तु एक चेतन मन ही इन गुणों का अनुभव कर सकता है इसलिए यहाँ कहा गया है कि आत्मा स्वयं निर्गुण होते हुए भी मन की उपाधियों के द्वारा गुणों का भोक्ता भी है।इस प्रकार इस श्लोक में आत्मा का सोपाधिक (उपाधि सहित) और निरुपाधिक (उपाधि रहित) इन दोनों दृष्टिकोणों से निर्देश किया गया है ।

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।

सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्।।13.16।।

।।13.16।। (वह ब्रह्म) भूत मात्र के अन्तर्बाह्य स्थित है; वह चर है और अचर भी। सूक्ष्म होने से वह अविज्ञेय है; वह सुदूर और अत्यन्त समीपस्थ भी है।।

वह भूतमात्र के अन्तर्बाह्य है सभी व्यष्टि उपाधियों में व्यक्त चेतन तत्त्व सर्वव्यापी है। अन्तर्बाह्य से तात्पर्य है कि जहाँ शरीरादि उपाधियाँ हैं वहाँ तो वह विशेष रूप से व्यक्त हुआ विद्यमान रहता ही है परन्तु जहाँ कोई उपाधि नहीं है वहाँ भी वह केवल सत्य रूप से स्थित रहता है। 

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।

भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च।।13.17।।

।।13.17।। और वह अविभक्त है, तथापि वह भूतों में विभक्त के समान स्थित है। वह ज्ञेय ब्रह्म भूतमात्र का भर्ता, संहारकर्ता और उत्पत्ति कर्ता है।।

ग्रसिष्णु-संहारक, प्रभविष्णु-स्रष्टा : आचार्य शंकर ने कहा है -वह आत्मा स्थिति काल में सब प्राणियों को धारण करता है , प्रलय काल में संहार करता है, और सृष्टिकाल में सबको पुनः उत्पन्न करता है। 

जिस प्रकार रस्सी में सर्प का भ्रम के समय रस्सी उस सर्प की उत्पत्ति , स्थिति और प्रलय का कारण है , उसी प्रकार आत्मा ही इस जगत्प्रपंच की उत्पत्ति , स्थिति , प्रलय का कारण है। श्रीरामकृष्ण देव ने कहा है -"  वेद ने उन्हें सगुण भी कहा है , और निर्गुण भी कहा है। पुराणों में सगुण ब्रह्म को काली या आद्यशक्ति कहा गया है। जो सगुण ब्रह्म है , वही निर्गुण ब्रह्म भी है। जो शक्ति (काली ) है , वही ब्रह्म (अवतार-वरिष्ठ) है। पूर्ण ज्ञान के बाद अभेद है। अग्नि को छोड़कर जलाने शक्ति भी नहीं सोची जा सकती। इसी तरह ब्रह्म को छोड़कर शक्ति को अलग नहीं सोचा जा सकता। नित्य (काली) को छोड़कर लीला (अवतार) , और लीला (अवतार वरिष्ठ) को छोड़कर नित्य (काली) नहीं सोचा जा सकता। 

" ब्रह्म ही आद्या शक्ति है। पुरुष और प्रकृति। जो पुरुष है वही प्रकृति है। आनन्दमय और आनन्दमयी। जिसे पुरुष का ज्ञान है , उसे प्रकृति का भी ज्ञान है। जिसे बाप का ज्ञान है , उसे माँ का ज्ञान भी है। जिसे सुख का ज्ञान है , उसे दुःख का भी ज्ञान है। ब्रह्म शक्ति है , और शक्ति ब्रह्म है। दोनों अभिन्न हैं। सच्चिदानन्दमय और सच्चिदानन्दमयी  " 

श्रीरामकृष्ण कथामृत ग्रंथ में है - " श्रीकृष्ण पुरुष और राधा प्रकृति , चितशक्ति, आद्याशक्ति है। राधा प्रकृति, त्रिगुणमयी है। इनके भीतर सत्व, रज, तमः ये तीन गुण हैं। यह चितशक्ति और वेदांत के ब्रह्म (पुरुष) अभिन्न हैं। जैसे जल और उसकी हिमशक्ति। जल की हिम शक्ति के विषय में सोचने से ही जल का ज्ञान अपनेआप हो जाता है। फिर जल के विषय में सोचने से ही जल की हिमशक्ति का विचार अपनेआप आ जाता है। " 

" ब्रह्म और शक्ति अभिन्न है। शक्ति को मानने से ही जगत मिथ्या हो जाता है। मैं , तुम , मकान , परिवार सभी मिथ्या हैं। आद्याशक्ति के रहने से ही यह संसार खड़ा है। 

" हजारों विचार क्यों न करो समाधिस्थ हुए बिना शक्ति की सीमा लाँघने का उपाय नहीं है। मैं ध्यान करता हूँ , मैं मनन करता हूँ - ये सब शक्ति की सीमा के भीतर है , शक्ति के ऐश्वर्य के भीतर है।  

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।

ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।।13.18।।

।।13.18।। (वह ब्रह्म) ज्योतियों की भी ज्योति और (अज्ञान) अन्धकार से परे कहा जाता है। वह ज्ञान (चैतन्यस्वरूप) ज्ञेय और ज्ञान के द्वारा जानने योग्य (ज्ञानगम्य) है। वह सभी के हृदय में स्थित है।।  

केवल हमारे नेत्र के समक्ष होने से ही बाह्य वस्तुओं का हमें दर्शन नहीं हो सकता वरन् किसी बाह्य प्रकाश से उनका प्रकाशित होना भी आवश्यक होता है। इस लौकिक अनुभव को दृष्टान्त स्वरूप मानें तो यह भी स्वीकार करना होगा कि हमारी आन्तरिक भावनाओं और विचारों को भी प्रकाशित करने वाला कोई अन्तर्प्रकाश होना चाहिए  अन्यथा इन वृत्तियों का हमें बोध ही नहीं हो सकता था। अन्तकरण की वृत्तियों  के इस प्रकाशक को ही स्वयं प्रकाश आत्मा या आत्मज्योति (इष्टदेव की ज्योति) कहा जाता है। 

वेदान्त अध्ययन के प्रारम्भिक काल में शास्त्रीय भाषा से अनभिज्ञ होने के कारण जिज्ञासु साधकगण प्रकाश शब्द से लौकिक प्रकाश ही समझते हैं। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि गुरु इस आत्मप्रकाश या आत्मज्योति जैसे शब्दों का वास्तविक तात्पर्य स्पष्ट करें। 

वह अनन्त परमात्मा सबके हृदय में ही स्थित है।दार्शनिक दृष्टि से  हृदय शब्द का अर्थ शुद्ध मन से होता है जो समस्त आदर्श और पवित्र भावनाओं का उदय स्थान माना जाता है। आन्तरिक शुद्धि के इस वातावरण में जब पवित्र मन या शुद्ध बुद्धि उस पारमार्थिक आत्मतत्त्व का ध्यान करती है जो सर्वातीत होते हुए सर्वव्यापक भी है तब वह शुद्बुद्धि स्वयं ही आत्मस्वरूप बन जाती है यही आत्मानुभूति है। 

इसीलिए हृदय को आत्मा का निवास स्थान माना गया है। स्वहृदय में स्थित आत्मा (इष्टदेव) का अनुभव ही अनन्त ब्रह्म का अनुभव है क्योंकि आत्मा ही ब्रह्म है। 

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।

मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते।।13.19।।

।।13.19।। इस प्रकार, (मेरे द्वारा) क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय को संक्षेपत: कहा गया। इसे तत्त्व से जानकर (विज्ञाय) मेरा भक्त मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।।

अब प्रश्न यह है कि इस ज्ञान का उत्तम अधिकारी कौन है भगवान् कहते हैं- जो मेरा भक्त है वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है। परन्तु यह भक्ति केवल भावुकतापूर्ण प्रेम ही नहीं है।

 जिसने क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विवेक द्वारा [विवेकज ज्ञान के द्वारा] यह स्वानुभव प्राप्त किया है कि एक वासुदेव (अवतार वरिष्ठ) ही प्राणी मात्र में क्षेत्रज्ञ के रूप में विराजमान हैं  वही साधक उत्तम भक्त है जो मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है। 

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का ही वर्णन अगले श्लोक में प्रकृति और पुरुष के रूप में किया जा रहा है

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।

विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्।।13.20।।

।।13.20।। प्रकृति और पुरुष इन दोनों को ही तुम अनादि जानो। और तुम यह भी जानो कि सभी विकार और गुण प्रकृति से ही उत्पन्न हुए हैं।।

इसके पूर्व सातवें अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी दो प्रकृतियों अपरा और परा का वर्णन करते हुए कहा था कि ये दोनों प्रकृतियाँ ही सृष्टि की कारण हैं। इन दोनों का ही निर्देश यहाँ क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के रूप में किया गया है।

उक्त विचार को ही दूसरी शब्दावली में बताते हुए भगवान् कहते हैं कि प्रकृति (क्षेत्र) और पुरुष (क्षेत्रज्ञ) दोनों ही अनादि हैं। ये दोनों ही परमात्मा के ही दो रूप हैं। परमेश्वर नित्य है इसलिए उसके इन दो रूपों का भी अनादि होना उचित ही है।

कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।

पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते।।13.21।।

।।13.21।। कार्य और कारण के उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और पुरुष सुख-दु:ख के भोक्तृत्व में हेतु कहा जाता है।।

यह जो दृष्टिगोचर संसार है , इसका स्वरुप क्या है ? सुख-दुःख का भोग ही तो संसार है तथा इन दोनों का भोग करना हो पुरुष का (आत्मा का) संसार -बंधन में फँसना है। 

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।

कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु।।13.22।।

।।13.22।। प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है। इन गुणों का संग ही इस पुरुष (जीव) के शुभ और अशुभ योनियों में जन्म लेने का कारण है।।  

 यद्यपि पूर्ण पुरुष आत्मा (परमात्मा) का कोई संसार नहीं है तथापि यही प्रकृतिस्थ पुरुष -आत्मा प्रकृति से बंध गयी है। शीत-उष्ण, राग-द्वेष, सुख-दुख आदि गुण जड़ प्रकृति (क्षेत्र) के धर्म हैं किन्तु उपाधियों के साथ अहंभाव से (M/F देहाभिमान) तादात्म्य होने के कारण यह पुरुष (आत्मा) उसे अपने ही धर्म मानकर व्यर्थ ही दुखों को भोगता है। 

इससे यह स्पष्ट होता है कि पुरुष का दुख प्रकृति (देह-मन) के कारण नहीं वरन् उसके साथ हुए तादात्म्य के कारण है। प्रकृति के गुणों के साथ अत्याधिक आसक्ति हो जाने के कारण यह पुरुष असंख्य शुभ और अशुभ उत्तम और अधम योनियों में जन्म लेता रहता है।

इस प्रकार पारमार्थिक दृष्टि से सच्चिदानन्द स्वरूप होते हुए भी अविद्यावशात् यह पुरुष कर्ता, भोक्ता, सुखी, दुखी,  इहलोक परलोक गामी संसारी जीव बन जाता है। 

 आत्म अज्ञान और प्रकृतिजनित गुणों से आसक्ति ही पुरुष के सांसारिक दुख का कारण है। अत संसार की आत्यन्तिक निवृत्ति के लिए जो ज्ञानमार्ग है उसके दो अंग हैं विवेक और वैराग्य। साधक को चाहिए कि वह विवेक के द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त करे और वैराग्य के द्वारा मिथ्या आसक्ति का त्याग करे। [साधक को पहले विवेक जनित ज्ञान (विवेकज -ज्ञान) के द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त करना चाहिए और फिर वैराग्य के द्वारा, कामिनी-कांचन और कीर्ति  (3K) में मिथ्या आसक्ति का त्याग कर देना चाहि

उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।

परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः।।13.23।।

।।13.23।। इस शरीर में देह से भिन्न परम पुरुष विद्यमान है। वही स्वतंत्र पुरुष इस देह में उपद्रष्टा (साक्षी) , अनुमन्ता (अनुमति देने वाला) ,भर्ता, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा कहा जाता है।।

आत्मस्वरूप के विषय में पूर्ण अज्ञानी तथा राग-द्वेषादि वृत्तियों से पूर्ण मन वाले व्यक्ति में आत्मा मानो केवल उपद्रष्टा बनकर रहता है। परन्तु जब उस व्यक्ति का चित्त कुछ मात्रा में शुद्ध होता है और वह सत्कर्म में प्रवृत्त हौता है तब परमात्मा मानो अनुमन्ता बनता है अर्थात् उसके सत्कर्मों को अपनी अनुमति प्रदान करता है। 

अन्तकरण के और अधिक शुद्ध होने पर वह व्यक्ति जब अपने दिव्य स्वरूप के प्रति जागरूक हो जाता है तब ईश्वर उसके कर्मों को पूर्ण करने वाला भर्ता बन जाता है। अर्पण की भावना से किये गये कर्मों में ईश्वर की कृपा से सफलता ही प्राप्त होती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो ईश्वर उस साधक के अल्प प्रयत्नों को भी पूर्णता प्रदान करता है। 

जब वह साधक अपने अहंकार को भुलाकर पूर्णतया योगयुक्त हो जाता है तब ऐसे व्यक्ति के हृदय में आत्मा ही भोक्ता बनी प्रतीत होती है।  इस श्लोक की समाप्ति इस कथन के साथ होती है कि आत्मा ही महेश्वर है। वही इस देह में परम पुरुष है।

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह।

सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते।।13.24।।

।।13.24।। इस प्रकार पुरुष और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य जानता है, वह सब प्रकार से रहता हुआ (व्यवहार करता हुआ) भी पुन: नहीं जन्मता है।।

इस अनन्तस्वरूप ब्रह्म को अपने आत्मस्वरूप से जानने का अर्थ ही अविद्या को नष्ट करना है। ऐसे पूर्ण ज्ञानी पुरुष का पुनः प्रकृति के साथ मिथ्या तादात्म्य होने के लिए कोई कारण ही नहीं रह जाता है। इसलिए यहाँ भगवान् कहते हैं कि सब प्रकार से रहते हुए भी उसका पुनः जन्म नहीं होता है। 

इसका अभिप्राय यह है कि ज्ञानी पुरुष जगत् में कर्म करता हुआ भी सामान्य मनुष्यों के समान नईनई वासनाओं को उत्पन्न करके उनके बन्धन में नहीं आता है क्योंकि उसका अहंकार सर्वथा नष्ट हो चुका होता हैब्रह्मवित् ब्रह्म ही बन जाता है और उसके समस्त कर्म नष्ट हो जाते हैं यह सभी उपनिषदों के द्वारा प्रतिपादित सत्य है।

वेदों में लिखा है - " ब्रह्मज्ञानी के कर्म क्षय को प्राप्त हो जाते हैं। जो ब्रह्म को जानता है , वह ब्रह्म ही बन जाता है। जैसे अग्नि के स्पर्श से रुई का ढेर जल जाता है। उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान के प्रभाव से सब प्रकार के कर्म भष्म हो जाते हैं। जैसे बीज आग पर भुन जाने पर अंकुर उतप्न्न नहीं कर सकता उसी प्रकार - 'अविद्या आदि पंचक्लेश' एक बार ज्ञान के द्वारा दग्ध हो जाये तो फिर वे जीव के जन्म के कारण नहीं हो सकते। 

अतः पुरुष और प्रकृति के सम्बन्ध में इस प्रकार के ज्ञान प्राप्त होने पर , वे विद्वान् पुनः संसार में जन्म ग्रहण नहीं करते। ज्ञानलाभ -ईश्वरलाभ होने पर अविद्या आदि पंचक्लेश एक दम नष्ट हो जाते हैं। श्रीरामकृष्ण देव ने सच में कहा हैं - " हजारों वर्षों का अंधकार एक दियासलाई जलाने पर क्षणभर में लुप्त हो जाता है।"   

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।

अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे।।13.25।।

।।13.25।। कोई पुरुष ध्यान के अभ्यास से आत्मा को आत्मा (हृदय) में आत्मा (शुद्ध बुद्धि) के द्वारा देखते हैं; अन्य लोग सांख्य योग के द्वारा तथा कोई साधक कर्मयोग से (आत्मा को देखते हैं)।।

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते।

तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः।।13.26।।

।।13.26।। परन्तु, अन्य लोग जो स्वयं इस प्रकार न जानते हुए, दूसरों से (आचार्यों से) सुनकर ही उपासना करते हैं, वे श्रुतिपरायण (अर्थात् श्रवण ही जिनके लिए परम साधन है) लोग भी मृत्यु को नि:सन्देह तर जाते हैं।

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्।

क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ।।13.27।।

।।13.27।। हे भरत श्रेष्ठ ! यावन्मात्र जो कुछ भी स्थावर जंगम (चराचर) वस्तु उत्पन्न होती है, उस सबको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न हुई जानो।।

सभी प्राणियों में एक ब्रह्म ही विराजमान हैं , इस प्रकार की अनुभूति में जो प्रतिष्ठित हो गए हैं -वे दूसरे प्राणी की हिंसा नहीं करते। क्योंकि उनमें अपना -पराया भाव नहीं है। वह जानता है कि वह स्वयं आत्मस्वरूप में सर्वत्र विद्यमान

स्वामी विवेकानन्द अपने 'वेदान्त का उद्देश्य' विषय पर दिए भाषण में कहते हैं - 

" तुम अपने को और प्रत्येक व्यक्ति को अपने सच्चे स्वरुप की शिक्षा दो ! और घोरतम मोहनिद्रा में पड़ी हुई जीवात्मा को इस नींद से जगा दो। जब तुम्हारी आत्मा प्रबुद्ध होकर सक्रीय हो उठेगी, तब तुम आप ही शक्ति का अनुभव करोगे , महिमा और महत्ता पाओगे , साधुता आएगी , पवित्रता भी आप ही चली आएगी -मतलब यह कि जो कुछ अच्छे गुण हैं , वे सभी तुम्हारे पास आ पहुँचेंगे। गीता में यदि कोई ऐसी बात है , जिसे मैं पसंद करता हूँ,तो दो श्लोक हैं। कृष्ण के उपदेश के सारस्वरूप इन श्लोकों से बड़ा भारी बल प्राप्त होता है -     

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।

विनश्यत्सु-अविनश्यन्तम् यः पश्यति सः पश्यति।।13.28।।

समम्- पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितम् ईश्वरम्। 

न हिनस्ति आत्मना आत्मानम् ततो याति पराम् गतिम्।। 13.29।।

 जो लोग समस्त नश्वर शरीरों में अविनाशी परमात्मा को स्थित देखते हैं, यथार्थ में उन्हीं का देखना सार्थक है क्योंकि ईश्वर को सर्वत्र सामान भाव से देखकर वे आत्मा (इष्टदेव) के द्वारा आत्मा की हिंसा नहीं करते, इसलिए वे परम गति (highest goal) को प्राप्त होते हैं।

इस प्रकार इस देश में  और अन्यान्य देशों में कल्याण कार्य की दृष्टि से वेदान्त के प्रचार और प्रसार के लिए विस्तृत क्षेत्र है। (वि०सा० 5/90)   

[ Let us proclaim to every soul: उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत — Arise, awake, and stop not till the goal is reached. Arise, awake! Awake from this hypnotism of weakness. None is really weak; the soul is infinite, omnipotent, and omniscient. Stand up, assert yourself, proclaim the God within you, do not deny Him! Too much of inactivity, too much of weakness, too much of hypnotism has been and is upon our race. 

O ye modern Hindus, de-hypnotise yourselves. The way to do that is found in your own sacred books. Teach yourselves, teach every one his real nature, call upon the sleeping soul and see how it awakes. Power will come, glory will come, goodness will come, purity will come, and everything that is excellent will come when this sleeping soul is roused to self-conscious activity.

     Ay, if there is anything in the Gita that I like, it is these two verses, coming out strong as the very gist, the very essence, of Krishna's teaching — "He who sees the Supreme Lord dwelling alike in all beings, the Imperishable in things that perish, he sees indeed. For seeing the Lord as the same, everywhere present, he does not destroy the Self by the Self, and thus he goes to the highest goal." Thus there is a great opening for the Vedanta to do beneficent work both here and elsewhere.

{THE MISSION OF THE VEDANTA :On the occasion of his visit to Kumbakonam}

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।

यः पश्यति तथाऽऽत्मानमकर्तारं स पश्यति।।13.30।।

।।13.30।। जो पुरुष समस्त कर्मों को सर्वश: प्रकृति (शरीर-मन-वाणी) द्वारा ही किये गये देखता है तथा आत्मा को अकर्ता देखता है, वही (वास्तव में) देखता है।। सब कर्म आत्मा की केवल उपस्थिति में प्रकृति से उत्पन्न उपाधियों के - देह, इन्द्रिय , मन , बुद्धि द्वारा ही किये जाते हैं। 

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।

तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा।।13.31।।

।।13.31।। यह पुरुष जब प्राणियों के पृथक् भावों को एक (परमात्मा) में स्थित देखता है तथा उस (परमात्मा) से ही यह विस्तार हुआ जानता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।।

 समस्त नाम और रूपों के पीछे एक आत्मतत्त्व ही सत्य है यह जानना मात्र आंशिक ज्ञान है। ज्ञान की पूर्णता तो इसमें होगी कि जब हम यह भी जानेंगे कि इस एक आत्मा से अनेक नाम-रूपों की यह सृष्टि किस प्रकार प्रकट हुई है। 

जिस प्रकार समुद्र को जानने वाला पुरुष असंख्य और विविध तरंगों का अस्तित्व एक समुद्र में ही देखता है।  इसी प्रकार आत्मज्ञानी पुरुष भी प्राणियों के पृथक्पृथक् भाव को एक परमात्मा में ही स्थित देखता है। समस्त तरंगें समुद्र का ही विस्तार होती हैंज्ञानी पुरुष का भी यही अनुभव होता है कि एक आत्मा से ही इस सृष्टि का विस्तार हुआ है

 स्वस्वरूपानुभूति के इन पवित्र क्षणों में ज्ञानी पुरुष स्वयं ब्रह्म बनकर यह अनुभव करता है कि एक ही आत्मतत्त्व अन्तर्बाह्य सबको व्याप्त और आलिंगन किए है सबका पोषण करते हुए स्थित है न केवल गहनगम्भीर और असीमअनन्त में वह स्थित है वरन् सभी सतही नाम और रूपों में भी वह व्याप्त है। 

'आत्मैव इदं सर्वं ', ब्रह्मैव इदं सर्वं ,'नेह नानास्ति किंचन ' इस अनुभूति में प्रतिष्ठित होता है। तथा यह समझता है कि सारे जगत्प्रपंच की उत्पत्ति ब्रह्म से हुई है। अर्थात आत्मा , ईश्वर या ब्रह्म (इष्टदेव) के अतिरिक्त पृथक सत्ता इस संसार की नहीं है, तब वह साधक ब्रह्मस्वरूपता प्राप्त करता है अर्थात मोक्ष प्राप्त करने में समर्थ होता है।  

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।

शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।।13.32।।

।।13.32।। हे कौन्तेय ! अनादि और निर्गुण होने से यह परमात्मा अव्यय है। शरीर में स्थित हुआ आत्मा (इष्टदेव या परमात्मा) भी, वस्तुत:, वह न (कर्म) करता है और न (फलों से) लिप्त होता है।।  

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।

सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते।।13.33।।

।।13.33।। जिस प्रकार सर्वगत आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सर्वत्र देह में स्थित आत्मा लिप्त नहीं होता।।

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः।

क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत।।13.34।।

।।13.34।। हे भारत ! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही क्षेत्री (क्षेत्रज्ञ) सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।।

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।

भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्।।13.35।।

।।13.35।। इस प्रकार, जो लोग क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा अविद्या रूपी प्रकृति के मिथ्यात्व को ज्ञानचक्षु के द्वारा दर्शन करते हैं वे परम् पद अर्थात निर्वाण मुक्ति को प्राप्त करते हैं। 

अब तक श्रीकृष्ण ने जो कुछ कहा उसका उपसंहार करते हुए वे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विषय का समापन करते हैं। प्रकृति अर्थात् क्षेत्र (कर्म क्षेत्र) और आत्मा अर्थात् क्षेत्रज्ञ (क्षेत्र का ज्ञाता) के अंतर को जानना ही वास्तविक ज्ञान है। जो इस विवेकज ज्ञान से सम्पन्न हो जाते हैं, वे स्वयं को केवल  भौतिक शरीर ( M/F) के रूप में नहीं देखते। 

इसी विषय पर स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " तुम्हारे पास तीन चीजें हैं - शरीर (Hand), मन (Head) और आत्मा (Heart)| आत्मा इन्द्रियातीत है। मन जन्म और मृत्यु का पात्र है , और वही दशा शरीर की है तुम वास्तव में आत्मा ही हो , पर बहुधा तुम सोचते हो कि तुम शरीर हो। जब मनुष्य कहता है 'मैं यहाँ हूँ ' , वह शरीर की बात सोचता है। फिर एक दूसरा क्षण आता है , जब तुम उच्चतम भूमिका में होते हो, तब तुम यह नहीं कहते -'मैं यहाँ हूँ। ' किन्तु जब कोई तुम्हें गाली देता है, या शाप देता है और तुम रोष प्रकट नहीं करते , तब तुम आत्मा हो। 

देहबुद्ध्या तु दासोऽहं, जीवबुद्ध्या त्वदंशकः।

आत्मबुद्ध्या त्वमेवाहम्, इति मे निश्चिता मतिः॥

जब मैं अपने को देह (शरीर) भाव से देखता हूँ, तो मैं तुम्हारा दास (सेवक) हूँ। जब मैं सोचता हूँ कि मैं मन हूँ (जीव हूँ), तब मैं उस अनन्त अग्नि की एक स्फुलिंग हूँ, जो तुम हो। जब मैं यह अनुभव करता हूँ कि मैं आत्मा हूँ, तुम और मैं एक (अद्वैत) हूँ ! यही मेरी निश्चित धारणा (मति) है।-यह एक प्रभु के भक्त का कथन है। क्या 'मन' आत्मा से  बढ़कर है ? " (10/40) 

केवल अविद्या वशात् ही प्रकृति की प्रतीति होती है वास्तव में केवल ब्रह्म ही एक पारमार्थिक सत्य है। जीव जब तक देह में है -(M/F शरीर का देहाभिमान-रहता ही है) इसलिए जो जीव देह में रहते हुए भी अपने आप को प्रभु का यंत्र नहीं स्वतंत्र समझ लेता है - वह पंचक्लेशों में बंध जाता है! 

अविद्या -अस्मिता- राग- द्वेषा अभिनिवेशाः पंच क्लेशाः। 

 (साधनपाद , अध्याय 2, श्लोक 3) 

-- 'अविद्या (अज्ञान) , अस्मिता (अहंकार) , राग (देहासक्ति) , द्वैष  (Malice- कटुता या नफरत) अभिनिवेश (जीवन के प्रति ममता)- ये पांचों क्लेश हैं।

ये ही पंचक्लेश हैं, ये पाँच बन्धनों के समान हमें इस संसार चक्र में बाँध रखते हैं। अविद्या ही कारण और शेष चार क्लेश इसके कार्य हैं। यह अविद्या  ही हमारे दुःखों का एकमात्र कारण है।भला और किसकी शक्ति है , जो हमें इस प्रकार दुःख में रख सके ? आत्मा तो नित्य आनन्द स्वरुप है। उसे अज्ञान -भ्रम (मरीचिका) - माया के सिवा और कौन दुःखी कर सकता है ? आत्मा के समस्त दुःख केवल भ्रम मात्र हैं।" (१/१५३)

[आत्मा के समस्त दुःख अज्ञान वश - नश्वर देह (M/F- Apparent 'I') या 'व्यावहारिक मैं' को ही 'यथार्थ मैं' (अविनाशी आत्मा) समझने (या मगरमच्छ को ही नाव समझने के कारण)  भ्रम के कारण है। जीवात्मा जब अपने आप को प्रभु का यंत्र (आत्मा या इष्टदेव-माँ का पुत्र) नहीं स्वतंत्र समझ लेता है, 'अविद्या, अस्मिता, राग, द्वैष व अभिनिवेश' आदि पंच क्लेशों में बन्ध जाता है जब वही जीव सदगुरुदेव के कृपा से आत्मा (ठाकुर-माँ स्वामीजी) का दासत्व स्वीकार कर लेता है, वह भव प्रवाह से मुक्त हो जाता है !

श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभागयोग नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त होता है।

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