⚜️️🔱 अपनी बुद्धि से क्या आप 'मनुष्य' (विवेकी) हो ?⚜️️🔱
[जैसी 'मति' वैसी 'गति' ! या मति सा गतिर्भवेत !]
[मति के अनुसार ही भव चक्र चलता है ! #paramvani /
संसार नहीं बाँधता, देह मति बाँधती है !]
बुद्धिनाशात् प्रणश्यति। (0:11सेकंड) यदि आपकी ' विवेक सम्पन्न बुद्धि' का नाश हो गया -तो आपका हो गया। अर्थात आपने इस धोखेबाज बुद्धि के हार को अपनी हार समझ लिया - तो आप फिर नश्वर 'देहो अहं' के भाव को ही सच मानने लगोगे। अर्थात बंधन स्वकल्पित है। अपने नश्वर प्रातिभासिक मैं (Apparent I- आदम या हव्वा) को ही अविनाशी सच (Real I -आत्मा , ब्रह्म, ईश्वर, भगवान) समझने लगोगे।
क्रोधात् भवति संमोहः, संमोहात् स्मृतिविभ्रमः।
स्मृति भ्रंशात् बुद्धिनाशः, बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।।2.63।।
जब कोई व्यक्ति किसी भी इद्रिय विषय-भोग को सुन्दर और सुख का साधन समझकर उसका निरन्तर चिन्तन करता रहता है, तब उस विषय या वस्तु (कामिनी-कांचन और कीर्ति) के प्रति आसक्ति पैदा हो जाती है। उस आसक्ति के अत्यधिक बढ़ जाने पर, उस वस्तु-विशेष के प्रति उसकी घोर आसक्ति (Love or Infatuation?) उसको पाने की उत्कट इच्छा या कामना (ऐषणा) का रूप ले लेती है ; जिसको पूर्ण किये बिना मनुष्य शान्ति से नहीं बैठ सकता। यदि कामना पूर्ति के मार्ग में कोई विघ्न आता है, या कोई व्यक्ति/वस्तु उस कामना -पूर्ति के मार्ग में विघ्न बनता है , तो उस व्यक्ति-विशेष को विघ्न का कारण समझकर, उसके प्रति मन (बुद्धि) ओर होने वाली प्रतिक्रिया को कहते हैं क्रोध। क्रोध से उत्पन्न होता है मोह ; और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति (remembrance) के भ्रमित होने पर 'बुद्धि' का नाश हो जाता है। बुद्धि का नाश होने से उस व्यक्ति का पतन हो जाता है।
मोह का अर्थ है अविवेक। मोह ही स्मृति (remembrance याद) के नाश का कारण है। कौन सी स्मृति ? अर्थात 'जीवो ब्रह्मैव न अपरः' -इस सच्चाई को मनुष्य भूल जाता है। ब्रह्मैव इदं सर्वं !- आत्मैव इदं सर्वं ! इस रहस्य को वह भ्रमित बुद्धि भूल जाती है। और 'विवेकज ज्ञान' से सम्पन्न बुद्धि -या जगत को ब्रह्ममय देखने में समर्थ ज्ञानमयी दृष्टि भी अपने सत्यस्वरूप को भूलकर या [महावाक्य "अहं ब्रह्मास्मि , तत्त्वमसि " को भूलकर (Real I अविनाशीआत्मा भूलकर)] पुनः (नश्वर) जगत (M/F देह या Apparent I) के साथ अपना रिश्ता जोड़ लेती है। क्रोध के आवेश में मनुष्य सभी सम्बन्ध भूलकर चाहें जैसा व्यवहार कर सकता है। श्रीशंकराचार्य लिखतें हैं कि क्रोधावेश में मनुष्य अपने पूज्य गुरु एवं मातापिता के ऋण को भूलकर उनका भी तिरस्कार करता है।
इस प्रकार स्वयं देह (M/F) समझकर मन में उठने वाले असद् विचारों से प्रारम्भ होकर आसक्ति (संग) इच्छा क्रोध, मोह और स्मृति के नाश तक जब मनुष्य का पतन हुआ तो अगली सीढ़ी है बुद्धि का नाश। बुद्धि में विवेक ही वह सार्मथ्य है जिससे हम शाश्वत-नश्वर , अच्छे-बुरे, धर्म-अधर्म का निर्णय कर सकते हैं। निषिद्ध कर्मों को करते समय विवेक-सम्पन्न बुद्धि ही हमें उससे परावृत्त करने का प्रयत्न करती है। यदि यह विवेक-सम्पन्न बुद्धि नष्ट हो जाये (ब्रह्मसत्यं जगतमिथ्या समझने वाली बुद्धि ही नष्ट हो जाय) तो मनुष्य का मनुष्यत्व (आत्मश्रद्धा , आत्मविश्वास , आत्मनिर्भरता ,निःस्वार्थपरता आदि चारित्रिक गुण) ही नष्ट हुआ समझना चाहिये। और बुद्धिनाश के बाद तो वह व्यक्ति पशु (घोर स्वार्थी) से भी हीन व्यवहार करता है और फिर कभी मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य , या श्रेष्ठ और उच्च ध्येय -'प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है ' को न समझ सकता है और न अपने सत्यस्वरूप को प्राप्त कर सकता है। यहाँ मनुष्य के पतन /ऩाश से तात्पर्य यह है कि अपने शुद्ध स्वरूप (Real I अविनाशी आत्मा ) को पहचान कर वह मनुष्य जीवन का परमपुरुषार्थ मोक्ष (जीवनमुक्ति) को प्राप्त करने योग्य नहीं रह जाता।
[विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध से उत्पन्न होता है मोह और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति (महावाक्य जनित आत्मज्ञान -आदम और हव्वा देह तो चैतन्य का विवर्त है-देह रहने तक -) के भ्रमित होने पर बुद्धि (विवेक-सम्पन्न बुद्धि) का नाश होता है। और उस अन्तःकरणकी ( विवेक-शक्तिरूप ) बुद्धि का नाश होने से वह व्यक्ति पुरुषार्थ (जीवनमुक्ति या मोक्ष) के अयोग्य हो जाता है। [अपने चेतन आत्मा (अविनाशी) होकर भी अपने को जड़ (नश्वर) देह समझने वाला नित्य-अनित्य विवेक-सम्पन्न बुद्धि नष्ट होने से व्यक्ति (चेतन आत्मा से जड़ आदम हो या हव्वा शरीर हो जाता ) पुरुषार्थ करने के अयोग्य हो जाता है। अतएव गृहस्थ नेता को अपने आचरण को हमेशा पवित्र रखना होगा -चिपकना सख्त मना है। ]
यदि बुद्धि में तुम कर्ता हो गए - तो हो गए ! उसी तरह बुद्धि में तुम अकर्ता हो गए , अकर्ता हो गए ! (0:21 सेकंड) जो कुछ होना है बुद्धि में होना है। बुद्धि में मुक्त हो गए तो मुक्त हो गए। आत्मा तो कहते हैं सदा मुक्त है; पर क्या तुम्हारी बुद्धि मुक्त है ? तुम्हारी बुद्धि में ऐसा लगता है कि - हम मुक्त हैं ! - (बुद्धि से ऐसा लगता है कि मैं कौन हूँ ? दहोहं कि शिवो अहं ?) - हम मुक्त हैं ! इसी तरह से एक और वाक्य है - जिसकी जैसी मति -उसकी ? बोलो ! अर्थात ' जिसकी जैसी मति , उसकी वैसी गति। अब ये बात तो समझ में आ गई। अब मति/बुद्धि कल्पना नहीं है। मति इमेजिनेशन नहीं है। 'जिसकी जैसी मति , उसकी वैसी गति'। 'अब आप पैदा हुए हो !' यह कोई 'आप' कोई कल्पना कर रहे हो क्या ? अपनेआप हो रही है। (1:12 मिनट) अभी तक आप अपनी मति में , अर्थात अपनी बुद्धि के अनुसार पैदा हुए हो। अपनी मति कर्ता हो। अपनी मति में अधूरे हो ? (1:20) अपनी मति में मुक्त नहीं हो। आप मुक्त नहीं हो, यह आपकी मति (दृष्टि) है , या मेरी ? और जब तुम मुक्त हों जाओगे , तब क्या तुम गुरु की मति से मुक्त होओगे ? मेरी दृष्टि में , या मेरी मति में तो तुम अभी मुक्त हो। अपनी मति बताओ। मेरी मति में तुम पहले से मुक्त हो। (गुरुदेव की दृष्टि में या गुरु मति के अनुसार दीक्षा-मंत्र लेने के पहले ही से तुम केवल जीव -M/F, मरण धर्म जड़ शरीर नहीं हो , नित्य-मुक्त , शुद्ध-बुद्ध अविनाशी चेतन आत्मा हो।) भगवान की मति में अर्जुन ब्रह्म ही है। (1:51) लेकिन अर्जुन अभी ब्रह्म नहीं है। अर्जुन अपनी मति में आज भी अर्जुन है; आदमी है, जीव है , कर्ता है ! अपनी मति में अर्जुन अभी मुक्त नहीं है।[अपनी दृष्टि में अर्जुन अभी ब्रह्म नहीं है। अपनी मति में अर्थात अपनी बुद्धि में अर्जुन आदमी है, जीव है -कर्ता है। अपनी मति में अर्जुन अभी -ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र है ? या अपनी मति में अर्जुन आत्मा (ईश्वर , भगवान या ब्रह्म) है ? अपनी मति में अर्जुन अभी अधूरा है, यानि अपनी आदम है या हव्वा है ? अर्जुन जीव है , कर्ता है ! विवाह-कर्म करके अधूरा से पूरा होने वाला है मनुष्य M/F है। क्योंकि जब आप पैदा हुए हो ऐसा मान चुके हो ? परिवार जनों से ,माँ से सुनी हुई बातों के अनुसार आपकी बुद्धि तो हमेशा यही कह रही है कि, आप दो बहनों के पैदा होने के बाद- अमुक तिथि में पैदा हुए थे। आप अमुक जाति के हो , या बंगाली -बिहारी -हिन्दू -मुसलमान सिख, जैन या बौद्ध हो ? आपकी बुद्धि यही कह रही है। अब यही देह के पैदा होने की बात को आपकी बुद्धि में जब यह बात बैठ गयी कि 'मैं पैदा' हुआ था ? तो बुद्धि को भी परिवर्तनशील 'देह' का पैदा होना ही मेरा, अपना अविनाशी 'आत्मा' का पैदा होना लग रहा है ? इसलिए जब भगवान अर्जुन को गीता के 18 अध्याय सुना देंगे , क्या अर्जुन तब वह मुक्त होगा? या पहले से आत्मा है -पर अभी उधर दृष्टि ही नहीं है ? या शुकदेव जी से हफ्ताभर भागवत सुनने के बाद परीक्षित मुक्त होगा ?](2:04)
अथवा इतने दिनों तक जब हम आपको लेक्चर सुनायेंगे तो, आपको - मतलब 'बद्ध मति' को, 'मूढ़ मति' को 'अमूढ़ मति ', 'बद्ध' मति को 'मुक्त' मति ,"मूढ़ मति को विवेक-संपन्न मती", 'देहो हम' मति को 'शिवो हम' मति , मति (या विवेक-दृष्टि) के आलावा गुरु और क्या दे सकता है ? गुरु (भगवान) के पास और क्या है ? और आप जानते हो केवल मति (यानि विवेक-दृष्टि, या विवेक-सम्पन्न दृष्टि) यदि मिल जाये , तो फिर कुछ पाना बाकी ही नहीं रह जाता। पर अभी तुम गुरु की मति पाने आये हो। गुरु की मति की बातें सुनते हो। आप अपनी मति (बुद्धि) से गुरु की मति (बुद्धि) को तौलते हो और जितना अनुकूल लगी उतनी ले लेते हो। बाकी गुरु की मति को कहते हो - 'अपने पास रखो'। [अपने को अनंत समुद्र (पानी-शाश्वत चैतन्य) नहीं समझकर उस पर पैदा होने और नष्ट होने वाला, तरंग या लहर तुल्य नश्वर ससीम M/F शरीर समझने वाली मूढ़ मति को अमूढ़ मति , 'बद्ध' मति को 'मुक्त' मति (लहर को पानी होने की बुद्धि), विवेक-मति , नित्य-अनित्य विवेक-सम्पन्न बुद्धि हम देंगे ? 'देहो हम मति को शिवो हम मति ' हम देंगे ? गुरु के पास और क्या है ? और आप जानते हो केवल यदि विवेक-मति मिल जाये , तो फिर कुछ पाना बाकी ही नहीं रह जाता। (और जब नाश मनुज पर छाता है - पहले विवेक मर जाता है !) पर अभी तुम गुरु की मति पाने आये हो। गुरु की मति की बातें सुनते हो। आप अपनी मति से गुरु की मति को तौलते हो और जितना अनुकूल लगी उतनी ले लेते हो। बाकी गुरु की मति कहते -अपने पास रखो।] (3:07)
मति (बुद्धि) कहो , कि दृष्टि कहो। दृष्टि क्या है ? 'देह'-दृष्टि। 'देह मति ? दृष्टि माने ये दो चक्षुओं के गोलक नहीं। हमारे यहाँ - भारत में 'किसी' भी प्रकार के बोध का नाम दृष्टि है। खट्टा-मीठा, गर्मी-सर्दी, जिस प्रकार का भी 'बोध' या अनुभव हो रहा हो - उसका नाम दृष्टि है। इसी तरह से दृष्टि है - देह दृष्टि , माने देह मति। मैं देह (M/F आदम हूँ या हव्वा ) हूँ -यह दृष्टि ! मैं देह हूँ , ये मति। मति-दृष्टि से देह हूँ !! मैं देह हूँ, यहाँ बैठा हूँ। यह भी आपकी मति ही है न ? अब जब देह बैठा हो उसी समय देखो, (आप उस मति को देखो) उस मति को गुरु की वाणी के द्वारा, उपनिषदों की वाणी के द्वारा (महावाक्य -अयं आत्मा ब्रह्म, जीव ब्रह्मैव न अपरः के द्वारा) अपनी मति (विवेकसम्पन्न बुद्धि) से पूछो कि तुम 'बैठे हो' या 'चेतन हो' ? चेतन नहीं हो तो तुम देह हो क्या? चेतन हुए बिना क्या तुम्हारी मति में- 'मैं देह हूँ' ऐसा विचार उठ सकता है ?[Without consciousness, what is the body?] (4:19)
'एक अर्थ में' तुम जब चेतन थे , उस समय यह मति आई - देह हूँ बैठा हूँ ! लेकिन जब सचमुच चेतन थे , तब तुम्हें -देह हूँ ' ये मति आई तो चेतन हूँ ये मति क्यों नहीं आई ? चेतन हुए बिना देह हूँ - ये मति आ नहीं सकती। किसी सोए आदमी को देह की मति, देह बुद्धि नहीं हो सकती। इसका मतलब तुम चेतन हो और बुद्धि है। लेकिन दुर्भाग्य से तुम चेतन हो - तुम्हारी बुद्धि ने यह निर्णय नहीं किया। इसलिए तुमने यह नहीं सोचा कि मैं चेतन हूँ। तुम्हारी बुद्धि ने तुम्हें धोखा दिया। (तुम्हारी बुद्धि विवेक-सम्पन्न नहीं है ? इसलिए -ठाकुर की तरह 'सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके' मंत्र नहीं पढ़ा ?'अविवेकी बुद्धि' ने तुम्हें धोखा दिया।) जबकि बुद्धि तुम्हारी है। कई बार अपने ही लोग अपनी खिलाफ पार्टी से मिल जाते हैं। चुनाव में तो अक्सर होता है। तुम्हारी मति तुम्हारे पक्ष में रहते हुए भी तुम्हारा कल्याण नहीं कर रही। तुम्हारा उद्धार नहीं कर रही। तुम्हें तरने नहीं दे रही है। तुम्हें (आत्मज्ञानी को ?) देह बुद्धि कराकर तुम्हें मृत्यु का दर्शन करा रही है। (5:33)
इसलिए 'देहो अहम'- मैं देह हूँ - 'देहो अहम इति में बुद्धि पूर्व असि मधुसूदने', मैं देह हूँ, मैं दास हूँ, मैं गोपियाँ हूँ, मैं व्यक्ति हूँ (मैं M/F शरीर हूँ), ये (ठाकुर देव) मेरे भगवान हैं- मैं देह हूँ। ये मेरे स्वामी हैं। 'इति में बुद्धि ' ऐसी ही बुद्धि - 'पूर्व असि' मेरी भी पहले थी। गोपियों ने उद्धव जी से कहा -पहले हमारे अंदर 'देहो अहम इति में बुद्धि पूर्व असि मधुसूदने' - हमारी भी पहले देहबुद्धि थी। तब क्या सोचती थी ? ये मेरे स्वामी हैं - ऐसा सोचती थी। अद्वैत बुद्धि नहीं थी; तब इन्होंने क्या किया ? 'मैं देह हूँ' मेरी बुद्धि भी श्री कृष्ण से मिलने से पहले ऐसी थी ! मैं देह हूँ, मैं दास हूँ, मैं गोपियाँ हूँ, मैं व्यक्ति (आदम या हव्वा शरीर) हूँ, ये (ठाकुर देव) मेरे भगवान हैं- मैं देह हूँ। ये मेरे स्वामी हैं। ऐसी ही बुद्धि मेरी पहले थी। गोपियों ने उद्धव जी से कहा - 'देहो अहम इति में बुद्धि पूर्व असि मधुसूदने' - हमारी भी पहले देहबुद्धि थी। तब क्या सोचती थी ? ये मेरे स्वामी हैं - ऐसा सोचती थी। अद्वैत बुद्धि नहीं थी; तब इन्होंने क्या किया ? (6:27) 'द' आकारा -दासो अहं, दासो अहं बुद्धि , 'दासो अहं- देहो अहं इति में बुद्धि' पहले थी। 'पुर्वासि' - शुरू में थी जैसी आपकी अभी है । तो भगवान ने क्या किया ? ' दकारा अपहृतेन' उन्होंने 'दा' चुरा लिया। दासो अहं इति मे बुद्धि चुरा लिया। तब 'सो अहं' भावेन पूज्य। अब हम सोहम भाव में स्थित हो गए। देहो अहं -दासो अहं इति मे बुद्धि ' - ऐसी बुद्धि मेरी थी। इस 'देहो अहं' बुद्धि (दृष्टि) में 'शिवो अहं' बुद्धि कौन देगा ? 'मैं देह हूँ' इस बुद्धि में 'मैं शिव हूँ ' हूँ (आत्मा , ईश्वर या ब्रह्म हूँ) यह बुद्धि ! मेरी 'देहोंहम की दृष्टि' में 'शिवोहं की दृष्टि' कौन जाग्रत करेगा? (7:10)
[यह प्रसंग भक्त या जिज्ञासु की उस अवस्था को दर्शाती है जहाँ कृष्ण की कृपा से या आत्म-ज्ञान के प्रकाश से, 'मैं शरीर हूँ' वाला पुराना भ्रम (बुद्धि) नष्ट हो गया है और अब वह 'मैं शरीर नहीं, बल्कि आत्मा या ब्रह्म हूँ' के निश्चित ज्ञान (निश्चयात्मिका दृष्टि / बुद्धि) को प्राप्त कर चुका है। यह स्थिति भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में वर्णित स्थितप्रज्ञ के लक्षणों के समान है, जहाँ व्यक्ति देह और आत्मा के अंतर को समझकर परम शांति प्राप्त करता है।]
और क्या तुम अभी के अभी 'देहो अहं' बुद्धि को छोड़कर , 'शिवो अहं' ये बुद्धि लोगे ? ये 'शिवो अहं' वाली बुद्धि लेनी है कि नहीं लेनी है - इसका निर्णय भी आप अपनी ही बुद्धि से करते हो। तो इस समय आपकी बुद्धि तो 'देहो अहं' की है। तो जब तुम्हारे पास पहले से ही 'देहो अहं' [आदम या हव्वा अहं] वाली बुद्धि पहले से है , और आप मानते हो कि आप पैदा हुए हो (दो बहनों के बाद एक लड़का या लड़की पैदा हुए थे), इसलिए आपकी बुद्धि 100 % सही है। लेकिन जब गुरु (या शास्त्र) कहेंगे , तुम देह नहीं हो ; तो गुरु की बुद्धि कैसे लोगे आप ? आपकी बुद्धि (यदि आत्मश्रद्धा या मनो, बुद्धि , हंकार , चित्तानि नाहं में प्रतिष्ठित न हो तो।) आपकी बुद्धि बाधा बनेगी। स्वप्न देखते समय तुम मर रहे हो ; स्वप्न में कोई कहे भी कि ये तो स्वप्न है-तुम मर थोड़े रहे हो ? कोई स्वप्न में मानेगा ? आपकी ही 'देहो अहं बुद्धि' , 'दासो अहं बुद्धि ', 'अहंकर्ता बुद्धि- या कर्ता अहं बुद्धि' , 'जीवो अहं बुद्धि ' [आदम या हव्वा M/F शरीर में अहं बुद्धि], अब "जीवो अहं बुद्धि' त्याग कर 'शिवो अहं बुद्धि' में प्रतिष्ठित हो जाने के बाद परिवर्तन किसमें आएगा ? बुद्धि को बदलने या दृष्टि को बदलने से कौन बदलेगा ? देह बदलेगा क्या ? (8:16) देह नहीं बदलेगा , 'देहो अहं' ये समझ बदलेगी (या दृष्टि बदलेगी)। 'शिवो अहं' यह समझ आएगी। देह को कौन बदलेगा ? वह तो वैसे ही बदलता है। बदलेगा जब बदलेगा। लोग सोचते हैं कि बुद्धि के आलावा कोई और करामात है। जितने करामाती देह को बदलना चाह रहे हैं , सब हार गए। इसलिए सन्त (आत्मज्ञानी या ब्रह्मविद) तो पहले कहते हैं , संत , महात्मा , ज्ञानी महात्मा , 'गुरु' क्या करते हैं ? गुरु तुम्हारे देह को नहीं बदलते तुम्हारी दृष्टि को बदलते हैं , सोच को बदलते हैं ! "दृष्टिं ज्ञानमयीं कृत्वा पश्येद् ब्रह्ममयं जगत् " ज्ञानमय दृष्टि से संसार को ब्रह्ममय देखना चाहिए
इन्द्रियाणि पराणि आहुः, इन्द्रियेभ्यः परम् मनः।
मनसः तु परा बुद्धिः य बुद्धेः परतः तु सः।। (3.42)
इसलिए बुद्धि -इन्द्रिय -मन में फूट डालना पड़ेगा। लड़कियाँ -लड़के love में पागल हो जाते हैं। जब सारा सपना धराशाई होगा तब अक्ल आएगी। अगले जन्म में सतसङ्ग और गुरु करोगे, तब होश आएगा ? अभी - वास्तव में तुम कौन हो ? "तुम्हारी बुद्धि " क्या कहती है? क्योंकि गीता (3.42) में भगवान ने कहा है
इन्द्रियाणि पराणि आहुः इन्द्रियेभ्यः परम् मनः।
मनसः तु परा बुद्धिः य बुद्धेः परतः तु सः।। (3.42)
(M/F स्थूल शरीर से) पर (श्रेष्ठ) इन्द्रियाँ कही जाती हैं; इन्द्रियों से परे मन है और मन से परे बुद्धि है, और जो बुद्धि से भी परे है, वह है आत्मा।।
बाह्य जगत् की वस्तुओं (स्त्री-पुरुष शरीर) की तुलना में हमारे लिए अपनी इन्द्रियाँ अधिक महत्त्व की होती हैं। कर्मेन्द्रियों की अपेक्षा ज्ञानेन्द्रियाँ अधिक श्रेष्ठ और सूक्ष्म हैं। और उनसे भी सूक्ष्म है हमारा मन जो हमारे 10 इन्द्रियों को नियन्त्रित करता है। और मन से भी सूक्ष्म है बुद्धि , इसलिए वह मन से परे है। और बुद्धिवृत्तियों को प्रकाशित करने वाला चैतन्य बुद्धि से भी सूक्ष्म होना ही चाहिये, बुद्धि से भी सूक्ष्म या परे तत्त्व है उसे ही अपरिवर्तनीय (अविनाशी) आत्मा कहते हैं। उपनिषदों में कहा गया है कि इस चैतन्यस्वरूप आत्मा "Real I " के परे और कुछ नहीं है।
"अद्वैतवाद का प्रचार साधारण लोगों में कभी होने नहीं दिया गया। संन्यासी लोग ही अरण्य (जंगलों) में उसकी साधना करते थे , इसी कारण वेदान्त का एक नाम 'आरण्यक' ("Forest Philosophy") भी हो गया। अन्त में भगवान की कृपा से बुद्धदेव ने आकर जब सर्वसाधारण के बीच इसका प्रचार किया , तब सारा देश बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गया। फिर बहुत समय बाद नास्तिकों (atheists-ईश्वर को न मानने वाले) और अज्ञेयवादियों (agnostics) ने जब सारे देश को ध्वंश करने की चेष्टा की, तब उस भौतिकवाद से भारत की रक्षा करने में पुनः एक बार अद्वैतवाद ही एकमात्र उपाय सिद्ध हुआ। इस प्रकार अद्वैत ने दो बार भौतिवाद से भारत की रक्षाकी है।" - स्वामी विवेकानन्द ('ब्रह्म एवं जगत' : वि ० सा० /खंड-२./पृष्ठ- ९३)
" This Advaita was never allowed to come to the people. At first some monks got hold of it and took it to the forests, and so it came to be called the "Forest Philosophy". By the mercy of the Lord, the Buddha came and preached it to the masses, and the whole nation became Buddhists. Long after that, when atheists and agnostics had destroyed the nation again, it was found out that Advaita was the only way to save India from materialism. Thus has Advaita twice saved India from materialism ! " -Swami Vivekananda : (The Absolute and Manifestation/ Volume-2/Jnana-Yoga/page -138)
[अद्वैत #स्वामी विवेकानन्द जर्मिनी की कील शहर के यूनिवर्सिटी के संस्कृत प्रोफेसर पॉल डॉयसन के निमंत्रण पर सेवियर दम्पति के साथ नाश्ते के लिए उनके घर गए थे। प्रोफेसर ने अद्वैत वेदान्त पर स्वरचित एक ग्रन्थ- से कुछ अंश पढ़कर स्वामी जी को सुनाने लगे। प्रोफेसर ने कहा - " अद्वैत वेदान्त की मधुर मोहिनी -शक्ति क्षणभर में ही बाह्य जगत को भुला देती है। उसका अध्यन प्रारम्भ करते ही मन एक उच्चतम आध्यात्मिक भवराज्य में चला जाता है। मनुष्य के मस्तिष्क ने सत्य (परम् सत्य) की खोज में रत होकर जिन सब विषयों का आविष्कार किया है , उसमें अद्वैत दर्शन और शांकरभाष्य सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। मेरी राय में अद्वैत (वेदान्त) केवल सूक्ष्म दर्शन ही नहीं है, बल्कि यह पूर्णतः नैतिक जीवन व्यतीत करने का प्रेरणाश्रोत है। " And so the Vedanta in its unfalsified form is the strongest support of pure morality, is the greatest consolation in the suffering of life and death. Indians ! Keep to it ." और इसलिए अद्वैत वेदान्त अपने अविकृत रूप में , उच्चतम नैतिकता (pure morality) की सुदृढ़ नींव है, और जीवन में आने वाली दुःख-कष्टों का (उतार-चढ़ाव का) साहस से सामना करने और मृत्यु-भय से मुक्ति के लिए सबसे बड़ा आश्वासन है ! हे भारतवासियो! इसे कभी न छोड़ना ! " [ विवेकानन्द चरित:5 /आचार्य विवेकानन्द/174 -175)]
["युवा समस्या और स्वामी विवेकानन्द का मार्गदर्शन " (যুব সমস্যা ও স্বামী বিবেকানন্দ) 'ओजस ही मनुष्य का सच्चा मनुष्यत्व है !' [ SVHS- 3.4 स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना : खण्ड 3 -स्वामी विवेकानन्द और युवा समाज ]#युवाओं द्वारा पैदा की गई समस्या: "Problems created by youth एवं C-IN-C दादा का उपदेश ": सबको बताओ धर्म क्या है ? श्रद्धा क्या है ? नित्य-अनित्य विवेक-और बुद्धि में क्या अन्तर है ? पशुता से मनुष्यत्व , और मनुष्यत्व से देवत्व में कैसे उन्नत हुआ जाता है ? दादा (नवनी दा) युवाओं द्वारा पैदा की गई समस्याओं की ओर, यथा सीटी बजाना, हल्ला करना, तोड़फोड़ करना, रेल-बस का सीट फाड़ना, कुर्ता-फाड़ होली में भांग खाना आदि पर दृष्टिपात करने की जरुरत भी नहीं समझते थे। ]
' यदि वह केवल थोथी बात हो, तब तो उसका कुछ भी मूल्य नहीं। हम जानते हैं कि यह अवस्था ऋषि-मुनियों को उपलब्ध हुई थी, और उसी पद्धति से अनुसरण करने वाले सत्यार्थी को आज भी होती है। उस इन्द्रियातीत सत्य कि उपलब्धी करने के लिये वेदों में तीन उपाय बतलाये गये है- श्रवण, मनन और निदिध्यासन। इस आत्म-तत्व के विषय में पहले श्रवण करना होगा। श्रवण करने के बाद इस विषय पर विचार करना होगा- आँखें मूंदकर विश्वास न कर, अच्छी तरह तर्क की कसौटी पर कस कर, समझ-बूझकर उस पर विश्वास करना होगा। इस प्रकार आपने सत्य-स्वरुप पर विचार करके उसके निरन्तर ध्यान में नियुक्त होना होगा, तब ( मृत्यु का सामना करते ही ) उसका साक्षात्कार होगा। यह प्रत्यक्षानुभूति ही यथार्थ धर्म है। केवल किसी मतवाद को स्वीकार कर लेना धर्म नहीं है। हम तो कहते हैं यह समाधी या ज्ञानातीत अवस्था ही धर्म है ! ' (10 /387)
नारायणः परोऽव्यक्तात् अण्डमव्यक्तसम्भवम् ।
अण्डस्यान्तस्त्विमे लोकाः सप्तद्वीपा च मेदिनी ॥
अव्यक्त से अर्थात माया से श्री नारायण या आदिपुरुष सर्वथा अतीत है , (इन्द्रियतीत सत्य-अस्पष्ट) है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अव्यक्त प्रकृति से उत्पन्न हुआ है। ये भूः , भुवः , स्वः आदि सभी लोक और सात द्वीपों वाली पृथ्वी ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत ही है।
सः भगवान् सृष्ट्वा-इदं जगत्, तस्य च स्थितिं चिकीर्षुः,
मरीचि-आदीन्-अग्रे सृष्ट्वा प्रजापतीन्, प्रवृत्ति-लक्षणं धर्मं
ग्राहयामास वेद-उक्तम् ।
इस जगत को रचकर इसका पालन करने की इच्छा वाले उस भगवान ने पहले मरीचि आदि प्रजापतियों को रचकर उसको वेदोक्त प्रवृत्ति रूप धर्म (कर्मयोग) ग्रहण करवाया।
ततः अन्याण् च सनक-सनन्दन-आदीन् उत्पाद्य,
निवृत्ति-लक्षणं धर्मं ज्ञान-वैराग्य-लक्षणं ग्राहयामास ।
फिर उनसे अलग सनक , सनन्दन , सनातन आदि ऋषियों को उत्पन्न करके उनको ज्ञान और वैराग्य जिसके लक्षण हैं , ऐसे निवृत्ति रूप धर्म (ज्ञानयोग) ग्रहण करवाए।
द्विविधः हि वेदोक्तः धर्मः, प्रवृत्ति-लक्षणः निवृत्ति-लक्षणः च ।
इस प्रकार वेदोक्त धर्म दो प्रकार का है - एक प्रवृत्ति रूप है, दूसरा निवृत्ति रूप है।
जगतः स्थिति-कारणं , प्राणिनां साक्षात्-अभ्युदय-निःश्रेयस-हेतुः
यः सः धर्मः ब्राह्मणाद्यैः वर्णिभिः आश्रमिभिः च श्रेयोर्थिभिः
अनुष्ठीयमानः ।
जो जगत की स्थिति का कारण , तथा प्राणियों की उन्नति का और मोक्ष का साक्षात् हेतु है। एवं कल्याणकामी ब्राह्मण आदि वर्णाश्रम अवलम्बियों द्वारा जिसका अनुष्ठान किया जाता है उसका नाम धर्म है।
[द्विविधः हि वेदोक्तः धर्मः, प्रवृत्ति-लक्षणः निवृत्ति-लक्षणः च । जगतः स्थिति-कारणं , प्राणिनां साक्षात्-अभ्युदय-निःश्रेयस-हेतुः यः सः धर्मः ब्राह्मणाद्यैः वर्णिभिः आश्रमिभिः च श्रेयोर्थिभिः -अनुष्ठीयमानः। ॥https://sanskritdocuments.org/doc_giitaa/gItAshAMkarabhAShya.html)]
(वार्ता एवं संलाप /खंड-६/ ३४/पेज-१७९/ १९०१)
स्वामी जी - " ........ कोई धन की चिन्ता करते करते धनकुबेर बन जाता है, और कोई शास्त्र -चिंतन करते करते विद्वान्। पर दोनों ही बन्धन हैं। पराविद्या प्राप्त करके विद्या और अविद्या दोनों से परे चला जा।
(Some perhaps thinking of money have become millionaires, whereas you have become a Pundit by thinking of scriptures. But both are bondages. Attain the supreme knowledge and go beyond Vidya and Avidya, relative knowledge and ignorance.)
शिष्य -महाराज , आपकी कृपा से मैं सब समझता हूँ ; परन्तु कर्म के चक्कर में पड़कर धारणा नहीं कर सकता।
(Disciple: Sir, through your grace I understand it all, but my past Karma does not allow me to assimilate these teachings.)
स्वामी जी - कर्म-फर्म छोड़ दे। तूने ही पूर्व जन्म में कर्म करके इस देह को (आदम और हव्वा देह को) प्राप्त किया है , यह बात यदि सत्य है तो कर्म के द्वारा कर्म को काटकर, तू फिर इसी देह में जीवन्मुक्त बनने का प्रयत्न क्यों नहीं करता ? निश्चित रूप से समझ लो कि आत्मज्ञान और मुक्ति तुम्हारे अपने ही हाथ में है। ज्ञान में कर्म का लवलेश भी नहीं है। परन्तु जीवन्मुक्त होते हुए भी जो लोग कर्म करते हैं , समझ लेना, वे दूसरों के हित के लिए ही कर्म करते हैं। वे भले-बुरे परिणाम की ओर नहीं देखते। किसी भी वासना का बीज उनके मन में नहीं रहता। गृहस्थाश्रम में रहते हुए इस प्रकार यथार्थ परहित के लिए कर्म करना - लगभग असम्भव जैसा है ! (ईश्वरकोटि छोड़कर???)
Throw aside your Karma and all such stuff. If it is a truth that by your own past action you have got this body; then, nullifying the effects of evil works by good works, why should you not be a Jivanmukta in this very body? Know that freedom or Self - knowledge is in your own hands. In real knowledge there is no touch of work. But those who work after being Jivanmuktas do so for the good of others. They do not look to the results of works. No seed of desire finds any room in their mind. And strictly speaking it is almost impossible to work like that for the good of the world from the householder's position.
शिष्य - आप ऐसी कृपा कीजिये जिससे आत्मानुभूति की प्राप्ति इसी शरीर में हो जाये।
(Disciple: Please bless me that I may attain Self - realisation in this very life.)
स्वामीजी - भय क्या है ? मन में अनन्यता रहने पर -इसी जन्म में आत्मनुभूति हो जाएगी। परन्तु पुरुषकार चाहिए। पुरुषकार क्या है , जानता है ? आत्मज्ञान प्राप्त करके ही रहूँगा , इसमें जो बाधा -विपत्ति सामने आएगी , उस पर अवश्य ही विजय प्राप्त करूँगा - इस प्रकार के दृढ़ संकल्प का नाम है पुरुषकार ! माँ , बाप , भाई , मित्र , स्त्री , पुत्र मरते हैं तो मरें। यह देह रहे तो रहे , न रहे तो न सही। मैं किसी भी तरह पीछे नहीं देखूँगा। जब तक आत्मसाक्षात्कार नहीं होता , तब तक इस प्रकार के सभी विषयों की उपेक्षा करके , एक मन-प्राण से अपने उद्देश्य की ओर अग्रसर होने की चेष्टा करने का नाम है -पुरुषकार ; नहीं तो दूसरे पुरुषकार तो पशु-पक्षी भी कर रहे हैं। मनुष्य ने इस शरीर को प्राप्त किया है केवल उसी आत्मज्ञान को प्राप्त करने के लिए। संसार में सब लोग जिस रास्ते से जा रहे हैं , क्या तू भी उसी स्रोत में बहकर चला जायेगा ? तो फिर तेरे पुरुषकार का मूल्य क्या ? सब लोग तो मरने बैठे हैं , पर तू तो मृत्यु को जीतने आया है। महावीर की तरह अग्रसर हो जा। किसी की परवाह न कर। कितने दिनों के लिए है यह शरीर ? कितने दिनों के लिए हैं ये सुख-दुःख ? यदि मानव-शरीर को प्राप्त कर ही लिया है , तो भीतर की आत्मा को जगा और बोल - 'मैंने अभयपद प्राप्त कर लिया है। बोल - मैं वही आत्मा हूँ। जिसमें मेरा क्षुद्र 'अहंकर्ता -भाव ' डूब गया है। इसी तरह सिद्ध बन जा। उसके बाद जितने दिन यह देह रहे , उतने दिन दूसरों को यह महा बलप्रद अभय वाणी सुना - " तत्वमसि! उत्तिष्ठत ! जाग्रत ! प्राप्य वरान्निबोधत ! (तू वही है ', 'उठो , जागो और लक्ष्य प्राप्त करने तक रुको नहीं !) यह होने पर तब जानूँगा कि तू वास्तव में एक सच्चा 'पूर्वी बंगाली' है। "
Swamiji: What fear? If there is sincerity of spirit, I tell you, for a certainty, you will attain it in this very life. But manly endeavour is wanted. Do you know what it is? "I shall certainly attain Self - knowledge. Whatever obstacles may come, I shall certainly overcome them"-- a firm determination like this is Purushakara.
"Whether my mother, father, friends, brothers, wife, and children live or die, whether this body remains or goes, I shall never turn back till I attain to the vision of the Atman"-- this resolute endeavour to advance towards one's goal, setting at naught all other considerations, is termed manly endeavour. Otherwise, endeavour for creature comforts even beasts and birds show. Man has got this body simply to realise Self - knowledge. If you follow the common run of people in the world and float with the general current, where then is your manliness? Well, the common people are going to the jaws of death! But you have come to conquer it! Advance like a hero. Don't be thwarted by anything. How many days will this body last, with its happiness and misery?
" When you have got the human body, then rouse the Atman within and say — I have reached the state of fearlessness! Say — I am the Atman in which my lower ego has become merged for ever. Be perfect in this idea; and then as long as the body endures, speak unto others this message of fearlessness: “Thou art That”, “Arise, awake, and stop not till the goal is reached!”
(The Complete Works of Swami Vivekananda/Volume 7/Conversations And Dialogues/XVII/1901)
२३ दिसंबर १९०० को श्रीमती मृणालिनी बसु को लिखित एक पत्र में कहते हैं -" विशालकाय रेल के इंजन को दूर से आते देखकर, नन्हा सा कीड़ा अपने जीवन की रक्षा के लिये रेल की पटरी से हट गया- क्योंकि वह बुद्धिमान है ? मशीन में इच्छाशक्ति का कोई प्रकाश नहीं है। यन्त्र कभी नियम को उल्लंघन करने की कोई इच्छा नहीं रखता। कीड़ा नियम का विरोध करना चाहता (स्वयं को डी -हिप्नोटाइज्ड करना चाहता है), और नियम के विरुद्ध जाता है, चाहे उस प्रयत्न में वह सिद्धि लाभ करे या असिद्धि; इसलिए वह बुद्धिमान है। जिस परिमाण में इच्छाशक्ति के प्रकट होने में सफलता होती है, उसी अंश में सुख अधिक होता है और जीव उतना ही ऊँचा होता है। परमात्मा की इच्छाशक्ति पूर्ण रूप से सफल होती है इसलिए वह उच्चतम है। जिस संयम के द्वारा इच्छाशक्ति का प्रवाह और विकास वश में लाया जाता है और वह फलदायक होता है, वह शिक्षा कहलाती है। " २९ अक्टूबर १८९६ को लन्दन में अपरोक्षानुभूति (कठोपनिषद) पर व्याख्यान देते हुए कहते हैं -यदि मुझे फिर से अपनी शिक्षा आरम्भ करनी हो और इसमें मेरा वश चले, तो मैं तथ्यों का अध्ययन कदापि न करूँ। मैं मन की एकाग्रता और अनासक्ति का सामर्थ्य बढ़ाता और उपकरण के तैयार होने पर इच्छानुसार तथ्यों का संकलन करता। " (4.108)
" हरि ॐ तत्सत् ,हरि ॐ तत्सत्, हरि ॐ तत्सत् !"
महामंत्र है तू जपा कर इसी को, महामंत्र है तू जपा कर इसी को॥
अपने तीनों पुत्रों को मदालसा ने यही सिखाया। उन्हें नश्वर शरीर व भौतिक सुखों से मोह नहीं करने की शिक्षा दी। उन्होंने बताया कि विद्वान वही है जो सुखों को भी दुख समझकर जीवनयापन करें। उनके तीन पुत्र हुए। बड़े का नाम विक्रांत, दूसरे का नाम सुबाहु और तीसरे का नाम शत्रुमर्दन था। मदालसा ने उन्हें ब्रह्मज्ञान [आत्म-अनुसन्धान] की शिक्षा दी। अपने लड़के को पालने में रख कर, झुलाते झुलाते यह लोरी गा कर सुनाती थीं-
पंचात्मकम देहमिदं न तेsस्ति,
रानी मदालसा ने अपने चौथे पुत्र नाम अलर्क (पगला कुत्ता ) रखा। मदालसा की शिक्षा से वह बहुत ही शूरवीर, पराक्रमी राजा हुआ। कुछ समय बाद राजा ऋतुध्वज अपनी पत्नी मदालसा के साथ अलर्क को राज्य सौंपकर जंगल में तपस्या करने चले गए। हालांकि राजा के कहने पर चौथे पुत्र को धर्म, अर्थ और काम शास्त्रों की भी शिक्षा दी। लेकिन तपस्या के लिए वन में जाते समय उसे भी यही उपदेश दिया कि आत्मा निराकार है। अंतत: मां की दी हुई यही शिक्षा पाकर चौथे पुत्र को भी आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई कि तू शुद्ध आत्मा है, तेरा कोई नाम नहीं है। इस प्रकार यह रानी मदालसा की ही शिक्षा थी कि जिससे सुबाहु, विक्रांत और शत्रुमर्दन जैसे ब्रह्मज्ञानी और अलर्क जैसे प्रतापी राजा हुए। मदालसा भारत की एक गौरवमयी माँ थीं।
" Our best work is done, our greatest influence is exerted, when we are without thought of self. All great geniuses know this. Let us open ourselves to the one Divine Actor, and let Him act, and do nothing ourselves."
" जब हमारा 'अहंकर्ता -भाव ' (Apparent I-काचा आमि, तुच्छ अहं -आदम और हव्वा जैसा तादात्म्य) नहीं रहता, तभी हम अपना सर्वोत्तम कार्य कर सकते हैं, दूसरों को सर्वाधिक प्रभावित कर पाते हैं। सभी महान विवेकी (प्रतिभाशाली -genius) व्यक्ति इस बात को जानते हैं। ह्रदय में पहले से विद्यमान उस 'दिव्य-कर्ता ' (Real I-Divine Actor-पुरुषोत्तम) के प्रति अपना ह्रदय खोल दो, तुम स्वयं कुछ भी करने मत जाओ।"
["O Arjuna! I have no duty in the whole world", says Krishna. Be perfectly resigned, perfectly unconcerned; then alone can you do any true work. No eyes can see the real forces, we can only see the results. Put out self, lose it, forget it; just let God work, it is His business. We have nothing to do but stand aside and let God work. The more we go away, the more God comes in. Get rid of the little "I", and let only the great "I" live. " (Volume 7, Inspired Talks/page-14)
श्री कृष्ण गीता में कहते हैं - 'हे अर्जुन , त्रिलोक में मेरे लिए कर्तव्य नामक कुछ भी नहीं है। ' उनके ऊपर सम्पूर्णतया निर्भर रहो, सम्पूर्ण रूप से अनासक्त होओ, ऐसा होने पर ही तुम्हारे द्वारा कुछ यथार्थ कार्य हो सकता है। जिस शक्ति के द्वारा ये सभी कार्य होते हैं, उसे हम देख नहीं पाते, हम केवल उसका फलमात्र देख पाते हैं। 'अहंकर्ता -भाव' को निकाल डालो, उसे भूल जाओ; अपने द्वारा ईश्वर (आत्मा , भगवान, ब्रह्म) को कार्य करने दो - यह उन्हींका कार्य है, उन्हें करने दो।]
हमें और कुछ नहीं करना होगा -केवल स्वयं हटकर उन्हें काम करने देना होगा। हम जितना दूर हटते जायेंगे , ईश्वर उतना ही हमारे भीतर से अभिव्यक्त होगा। 'व्यावहारिक अहं ' (Apparent I-काचा आमि, तुच्छ अहं) से ऊपर उठ जाओ -केवल 'वास्तविक अहं' (Real I-पाका आमि,आत्मा, प्रबुद्ध -विवेकी विवेकानन्द ,सच्चिदानन्द, प्रबुद्ध-'महत अहं') को रहने दो। हम अभी जो कुछ हैं, वह सब अपने चिंतन का ही फल है। इसलिए तुम क्या चिंतन करते हो , इस विषय में विशेष ध्यान रखो। [('जीव' अपने मित्र -शत्रु को ब्रह्ममैव इदं सर्वं, आत्मवै इदं सर्वं ? अपने और मेरे- बारे -जगत और ईश्वर में अद्वैत -अभेद देखते हो या नहीं इस पर ध्यान रखो !) हम जो कुछ चिंतन करते हैं , उसमें हमारे चरित्र की छाप लग जाती है। [जगत को अद्वैत दृष्टि या ज्ञानमयी दृष्टि से देखकर M/F के प्रति सियाराम मय व्यवहार है या नहीं ,हमारे व्यवहार पर हमारे चरित्र की छाप लग जाती है।
[The begging monks (or A Householder Leader of a social service -organization) who carry religion to every man's door; If they should eat of the tree of knowledge, they would become egoists, and all the good they do would fly away. They are all principle, no personality.
गृहत्यागी संन्यासी हों या किसी वानप्रस्थी सामाजिक सेवा संगठन के गृहस्थ नेता हों जो कोई भी व्यक्ति 'प्रबुद्ध भारत अभियान' के वैसे कर्मी [C-IN-C /शिक्षक] होंगे जो द्वार -द्वार पर धर्म (मनुष्य -निर्माणकारी शिक्षा) का सन्देश लेकर जाते हैं, यदि वे यदि ऐहिक (आदम और हव्वा जैसा) ज्ञानरूपी वृक्ष का फल खायेंगे तो उनमें भी दैहिक 'अहंकर्ता-भाव' चला आएगा, फिर वे जो कुछ भी लोक-कल्याण करेंगे -सब नष्ट हो जायेगा। जब हम 'मैं मैं' कहते हैं, तब हम मूर्ख से बन जाते हैं। पहले अपने को जीत लो (3K से अनासक्त हो जाओ), फिर सम्पूर्ण जगत तुम्हारे पैरों के नीचे आ जायेगा। (देववाणी -26 जून , 1895/ खंड ७/२२-२३)
They never say "me" and "mine"; they are only blessed in being instruments. Such men are the makers of Christs and Buddhas, ever living fully identified with God, ideal existences, asking nothing, and not consciously doing anything. They are the real movers, the Jivanmuktas, (Literally, free even while living.) absolutely selfless, the little personality entirely blown away, ambition non-existent. They are all principle, no personality.
मानवजाति के मार्गदर्शक नेता कभी भी 'मैं , मेरा ' नहीं कहते। वे अपने को ईश्वर का यंत्र समझकर ही अपने को धन्य मानते हैं। ऐसे व्यक्ति ईसा और बुद्ध आदि के निर्माता हैं। वे सदैव ईश्वर (आत्मा) के साथ सम्पूर्ण भाव से तादाम्य लाभ करके एक आदर्श जगत में निवास करते हैं। वे कुछ नहीं चाहते और अहंकर्ता -भाव से कुछ भी नहीं करते। वे ही वस्तुतः प्रेरकस्वरूप हैं - वे जीवनमुक्त एवं बिल्कुल अहंशून्य हैं। उनका क्षुद्र अहंकार पूर्ण रूप से नष्ट हो गया है , उन्हें महत्वाकांक्षा बिल्कुल नहीं है। उनका व्यक्तित्व पूर्ण रूप से लुप्त हो गया है , वे निराकार तत्वस्वरूप हैं। (देववाणी ७/२४)
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अर्थात योगशास्त्र के मतानुसार 'प्रत्येक आत्मा (जीव) अव्यक्त ब्रह्म है'![अर्थात आत्मा (Heart अपरिवर्तनीय ,अविनाशी चेतना) अज्ञान के कारण (परमेश शक्ति माया -अविद्या -अस्मिता पंचक्लेश के कारण) प्रकृति के साथ (अर्थात परिवर्तनशील नश्वर -देह 'Hand' और 'Head' के साथ) संयुक्त हो गयी है। ]
अर्थात योगशास्त्र के मतानुसार 'प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है'! अर्थात 'दिव्यता' मनुष्य मात्र में छिपी हुई है, अन्तर्निहित है। जीवमात्र में विशेष रूप 'मनुष्य' (विवेकी) में 'दिव्यता' Divinity छिपी हुई है, अन्तर्निहित है। किन्तु 'अज्ञान' के कारण (यानि अविद्या >अस्मिता,राग -द्वेष , अभिनिवेश पंचक्लेश के कारण) प्रत्येक जीव M/F 'आदम और हव्वा' प्रवृत्ति (Bundle Of habits) के सेव खायें कि नहीं ? 'Adam and Eve Syndrome : Should I eat an apple or not?' व्याधि लक्षण से ग्रस्त हो गया है! इसलिए गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताये गए चार योगमार्ग - कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान, इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर उस 'M/F भाव, 'आदम और हव्वा मनोभाव' से छुटकारा पाना तथा अपनी अंतर्निहित दिव्यता या -उस "Inherent Divinity" को अपने चरित्र में अभिव्यक्त करना ही मनुष्य-जीवन का चरम लक्ष्य है। यानि 'मैं', 'तुम' और 'वह' या जीव (M/F), जगत और ईश्वर में (3H में) अद्वैत का (Oneness) का अनुभव करना - यही यही सारे धर्मों का /(शिक्षा का) एकमात्र लक्ष्य है।]
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इसीलिए भगवान गीता (2.63) में कहते हैं -
क्रोधात् भवति संमोहः, संमोहात् स्मृतिविभ्रमः।
स्मृति भ्रंशात् बुद्धिनाशः, बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।।2.63।।
जब कोई व्यक्ति किसी भी इद्रिय विषय-भोग को सुन्दर और सुख का साधन समझकर उसका निरन्तर चिन्तन करता रहता है, तब उस विषय या वस्तु (कामिनी-कांचन और कीर्ति) के प्रति आसक्ति पैदा हो जाती है। उस आसक्ति के अत्यधिक बढ़ जाने पर, उस वस्तु-विशेष के प्रति उसकी घोर आसक्ति (Love or Infatuation?) उसको पाने की उत्कट इच्छा या कामना (ऐषणा) का रूप ले लेती है ; जिसको पूर्ण किये बिना मनुष्य शान्ति से नहीं बैठ सकता। यदि कामना पूर्ति के मार्ग में कोई विघ्न आता है, या कोई व्यक्ति/वस्तु उस कामना -पूर्ति के मार्ग में विघ्न बनता है , तो उस व्यक्ति-विशेष को विघ्न का कारण समझकर, उसके प्रति मन (बुद्धि) ओर होने वाली प्रतिक्रिया को कहते हैं क्रोध। क्रोध से उत्पन्न होता है मोह ; और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति (remembrance) के भ्रमित होने पर 'बुद्धि' का नाश हो जाता है। बुद्धि का नाश होने से उस व्यक्ति का पतन हो जाता है।
बुद्धिनाशात् प्रणश्यति। यदि आपकी ' विवेक सम्पन्न बुद्धि' का नाश हो गया -तो आप अपने सत्य-स्वरूप के साथ शाश्वत रिश्ता को (Real I) भूलकर पुनः नश्वर शरीर (M/F), इन्द्रिय , मन के साथ (Apparent I) के साथ रिश्ता जोड़कर यमराज के डर से भागते फिरेंगे। अर्थात यदि आपने इस धोखेबाज बुद्धि के हार को अपनी हार (आत्मा Real I हार समझ लिया, और शेर होकर भेंड़ बन गए) तो आप फिर नश्वर 'देहो अहं' के भाव को ही सच मानने लगोगे-सद्गुरु के साथ और इष्टदेव के साथ ही रिश्ता रखने से डरने लगोगे। अर्थात बंधन स्वकल्पित है। संसार नहीं बाँधता, देह मति बाँधती है ! (स्वयं को M/F देह समझने वाली ही बुद्धि-ही अविवेक के कारण मनुष्य को संसार चक्र में बाँध देती है।)
यदि यह बुद्धि ही नष्ट हो जाय तो मनुष्य का मनुष्यत्व ही नष्ट हुआ समझना चाहिये। बुद्धिनाश के बाद तो वह पशु से भी हीन व्यवहार करता है और फिर कभी जीवन में श्रेष्ठ और उच्च ध्येय को न समझ सकता है और न प्राप्त कर सकता है। यहाँ मनुष्य के ऩाश से तात्पर्य यह है कि अपने शुद्ध स्वरूप को पहचान कर वह मनुष्य जीवन के परमपुरुषार्थ मोक्ष को प्राप्त करने योग्य नहीं रह जाता।विषयों के चिन्तन को यहाँ सभी अनर्थों का कारण बताया है। अब मोक्ष प्राप्ति का साधन बताते हैं अपने नश्वर प्रातिभासिक मैं (Apparent I- आदम या हव्वा) को ही अविनाशी सच (Real I -आत्मा , ब्रह्म, ईश्वर, भगवान) समझने लगोगे। और विवेकी -बुद्धि का नाश होने से उस मनुष्य का पतन हो जाता है। यदि यह बुद्धि ही नष्ट हो जाय तो मनुष्य का मनुष्यत्व ही नष्ट हुआ समझना चाहिये। बुद्धिनाश के बाद तो वह पशु से भी हीन व्यवहार करता है और फिर कभी जीवन का चरम लक्ष्य, गौण लक्ष्य से भी श्रेष्ठ और उच्चतम ध्येय - प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है ! को न समझ सकता है और न प्राप्त कर सकता है। यहाँ मनुष्य के ऩाश से तात्पर्य यह है कि अपने शुद्ध स्वरूप को पहचान कर वह मनुष्य जीवन के परमपुरुषार्थ मोक्ष (जीवनमुक्ति) को प्राप्त करने योग्य नहीं रह जाता। विषयों के चिन्तन करने में फंसी अशुद्ध बुद्धि को यहाँ सभी अनर्थों का कारण बताया है। अब मोक्ष प्राप्ति (इसी जीवन में मन की गुलामी से मुक्त हो जाने का) साधन बताते हैं-
रागद्वेषवियुक्तैः तु विषयान् इन्द्रियैः चरन्।
आत्मवश्यैः विधेयात्मा प्रसादम् अधिगच्छति।। (2.64)
।।2.64।। नित्य-अनित्य विवेक के निरंतर अभ्यास द्वारा अज्ञान से रहित साधक (अर्थात अविद्या, अस्मिता , राग-द्वेष, अभिनिवेश पंचक्लेश से रहित साधक) विषयों का सेवन करता हुआ भी बहुत जल्दी चित्तवृत्तियों के शांत होने से आनन्द स्वरुप आत्मा (सच्चिदानन्द ब्रह्म ) में प्रतिष्ठित हो जाता है।
(3K में) आसक्ति और (उस आसक्ति को दूर करने का जो गुरु-शास्त्र -इष्टदेव उपदेश देते हों उनके प्रति) द्वेष को रागद्वेष कहते हैं इन दोनों को लेकर ही इन्द्रियों की स्वाभाविक प्रवृत्ति हुआ करती है। परंतु जो मुमुक्षु होता है वह स्वाधीन अन्तःकरण वाला अर्थात् जिसका अन्तःकरण इच्छानुसार वश में है ऐसा पुरुष रोग-द्वेष से रहित और अपने वशमें की हुई इन्द्रियों द्वारा अनिवार्य विषयों को ग्रहण करता हुआ भी प्रसाद को प्राप्त होता है। प्रसन्नता और स्वास्थ्य को प्रसाद कहते हैं। पूजन विधि के अन्त में प्रसाद वितरण की क्रिया इस सिद्धान्त की ही द्योतक है। अद्वैतवादी वेदान्ती चित्तशुद्धि को (चित्त-वृत्तियों के निरोध को) प्रसाद समझते हैं। प्रसाद को प्राप्त करने पर क्या होगा सुनो
प्रसादे सर्वदुःखानाम् हानिः अस्य उपजायते।
प्रसन्नचेतसः हि आशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।।
।।2.65।। प्रसाद के होने पर सम्पूर्ण दुखों का अन्त हो जाता है (आध्यात्मिकादि तीनों प्रकारके समस्त दुःखोंका नाश हो जाता है), और प्रसन्नचित्त पुरुष की बुद्धि ही शीघ्र ही आत्मा में स्थिर हो जाती है।।
" आधिदैविक आधिभौतिक और आध्यात्मिक त्रिविध ताप एवं अनेक कष्ट, पाप-संताप की निवृत्ति केवल भगवन्नाम स्मरण में है। अतः जीवन में अखण्ड-प्रचण्ड पुरुषार्थ और अविच्छिन्न ईश्वरीय स्मृति (Real I-आत्मा) बनी रहे !" इस वाक्य का अभिप्राय यह है कि इस प्रकार प्रसन्नचित्त और आत्मा में स्थिर-बुद्धि वाले पुरुष को कृत-कृत्यता मिलती है।
अभिप्राय यह कि तृष्णा (3K में आसक्ति) के रहते हुए तो सुख की गन्धमात्र भी नहीं मिलती।
इन्द्रियाणाम् हि चरताम् यत् मनः अनुविधीयते।
तत् अस्य हरति प्रज्ञाम् वायुः नावम् इव अम्भसि।। (2.67)
।।2.67।। अपने-अपने विषयों में विचरती हुई 5 इन्द्रियों में से एक ही इन्द्रिय जिस जीव के मन को (अली-मृग-मीन -पतंग-गज को ) अपना अनुगामी बना लेती है, वह अकेला मन जल में नौका को वायु की तरह इसकी प्रज्ञा (जीव ब्रह्मैव न अपरः में प्रतिष्ठित बुद्धि या नित्य-अनित्य विवेक प्रयोग शक्ति को) हर लेता है। (जैसे नाव के नाविक की मृत्यु हो गयी हो और उसके पाल खुले हों तब वह नाव पूरी तरह उन्मत्त तूफानों और उद्दाम तरंगों की दया पर आश्रित होगी। तरंगों के भयंकर थपेड़ों से इधरउधर भटकती हुई वह लक्ष्य को प्राप्त किये बिना बीच में ही नष्ट हो जायेगी।)
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।2.70।।
।।2.70।। जैसे सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में (अनेक नदियों के) जल (उसे विचलित किये बिना) समा जाते हैं। वैसे ही जिस पुरुष की विवेकी-बुद्धि में कामनाओं (3K के ऐषणाओं) के विषय उसमें (विकार उत्पन्न किये बिना) समा जाते हैं; वह पुरुष शान्ति प्राप्त करता है। न कि भोगों की कामना करने वाला पुरुष।।
विषयों के बीच रहता हुआ इन्द्रियों के द्वारा समस्त व्यवहार करता हुआ भी जो पुरुष स्वस्वरूप की स्थिति से विचलित नहीं होता वही ज्ञानी (आत्मज्ञानी) है सन्त है। भगवान् स्पष्ट कहते हैं कि ऐसा पुरुष ही वास्तविक शान्ति और आनन्द प्राप्त करता है। इतना कहने मात्र से मानो उन्हें सन्तोष नहीं होता और आगे वे कहते हैं भोगों की कामना करने वाले (3K में आसक्त) पुरुषों को कभी शान्ति नहीं मिलती।
विहाय कामान् यः सर्वान् पुमान् चरति निःस्पृहः।
निर्ममः निरहंकारः सः शान्तिम् अधिगच्छति।। (2.71)
परम शान्ति को प्राप्त पुरुष के मन-बुद्धि की स्थिति कैसी होती है ? वह पुरुष 3K कामनाओं का तथा विषयों के प्रति स्पृहा लालसा आसक्ति का सर्वथा त्याग कर देता है। उस पुरुष में अहंकार - (Apparent I M/F नाम-रूप देहभाव ) का अभाव होता है और ममत्व का पूर्ण अभाव होता है। जिस अवस्था में 'अहंकार' नहीं होता, जैसे सुषुप्ति में -ऐषणा , इच्छा, आसक्ति आदि का अनुभव भी नहीं होता। जीवन में हमारे समस्त दुखों का कारण अहंकार "मैं" (Apparent I M/F नाम-रूप देहभाव, आदम और हव्वा शरीर मानना) और उससे उत्पन्न ममभाव स्वार्थ और असंख्य कामनायें हैं।
संन्यास का अर्थ है त्याग अतः अहंकार और स्वार्थ को पूर्णरूप से परित्याग करके वैराग्य का जीवन जीना वास्तविक संन्यास है।जिससे वह साधक सतत अपने पूर्ण दिव्य स्वरूप (Real I) की अनुभूति में रह सकता है। जीवन से पलायन करने , फ़टे-पुराने वस्त्र पहनने अथवा केवल गेरुये वस्त्र धारण करने को संन्यास समझने की जो गलत धारणा समाज में फैल गई है,उसनेे उपनिषदों के महान् तत्त्वज्ञान (महावाक्यों) को थोड़ा समझने में कठिन जैसा कर दिया है। वास्तव में हिन्दू वैदिक सनातन धर्म केवल उसी को संन्यासी स्वीकार करता है, जिसने विवेक द्वारा अहंकार (Apparent I M/F नाम-रूप देहभाव, आदम और हव्वा शरीर मानना) और स्वार्थ को त्याग कर स्फूर्तिमय जीवन जीना सीखा है।
एक सच्चे संन्यासी का अत्यन्त सुन्दर वर्णन श्री शंकराचार्यजी अपने भाष्य में इस प्रकार करते हैं वह पुरुष जो सब कामनाओं को (3K में ऐषणाओं आसक्ति को ) त्यागकर जीवन में सन्तोषपूर्वक रहता हुआ शरीर धारणमात्र के उपयोग की किसी भी वस्तुओं में ममत्व भाव नहीं रखता न ज्ञान का अभिमान करता है, ऐसा ब्रह्मवित् स्थितप्रज्ञ पुरुष निर्वाण (शान्ति) को प्राप्त करता है जहाँ संसार के सब दुखों की आत्यन्तिक निवृत्ति होती है। संक्षेप में ब्रह्मवित् ज्ञानी पुरुष ब्रह्म ही बन जाता है।
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ न एनाम् प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वा अस्याम् अन्तकाले अपि ब्रह्मनिर्वाणम् ऋच्छति।।
।।2.72।। हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है।।
सब इच्छाओं के त्याग का अर्थ है 'मिथ्या अहंकार' का त्याग। अहंकार रहित अवस्था निष्क्रिय अर्थहीन शून्य नहीं है। जहाँ भ्रान्तिजनित अहंकार समाप्त हुआ (जैसे ही Apparent I M/F नाम-रूप देहभाव, आदम और हव्वा शरीर को 'मैं' समझने वाली बुद्धि/दृष्टि में परिवर्तन हुआ) वहीं पर पूर्ण ज्ञानस्वरूप आत्मा प्रकाशित होता है। अपने हृदय में स्थित आत्मा को पहचानने का ही अर्थ है उसी समय सर्वत्र व्याप्त नित्य ब्रह्म (Real I) को पहचानना। अहंकार के नष्ट होने पर अपने नित्य चैतन्य आत्मा का अनुभव उससे भिन्न रहकर नहीं होता वरन् उसके साथ एकत्व का अनुभव (अद्वैत का अनुभव) ही होता है। अतः इस साक्षात्कार को ब्राह्मी स्थिति कहा गया है।
यहाँ एक शंका उठ सकती है कि क्या आत्मानुभव के पश्चात् भी हमें (प्रारब्ध के कारण) पुन मोहित होकर अहंकार से उत्पन्न दुखों का भोग हो सकता है ? ऐसे किसी स्थायी पुनर्मोह का यहाँ निषेध करके भगवान् हमारे भय को दूर कर देते हैं। और भी एक बात है कि आत्म-साक्षात्कार का युवावस्था में ही होना आवश्यक नहीं हैं। वृद्धावस्था अथवा जीवन के अन्तिम क्षणों में भी यदि मनुष्य अपने स्वयंसिद्ध नित्य स्वरूप (Real I) को पहचान लेता है तब भी वह अनुभव ब्राह्मी स्थिति के लिए पर्याप्त है।
मिथ्या (जगत) का निषेध और सत्य (ब्रह्म-ब्रह्मैव इदं सर्वं !) का प्रतिपादन यही वह मार्ग है जिसका उपनिषदों में आत्मप्राप्ति के लिए उपदेश है। कर्मयोग उस ज्ञान का व्यावहारिक स्वरूप है जिसका निरूपण व्यासजी ने गीता में अपनी मौलिक शैली में किया है। अनासक्त भाव से सिद्धि और असिद्धि में समान रहते हुए कर्म करने का अर्थ है अहंकार के अधिकार (M/F देहअहं) को ही समाप्त करना और इस प्रकार अनजाने ही वहाँ उच्चतर सत्य (जीवो ब्रह्मैव न अपरः) की स्थापना करना।
अस्तु अद्वैत वेदान्त के निदिध्यासन से गीता में वर्णित कर्मयोग की साधना भिन्न नहीं है। परन्तु अर्जुन भगवान् के केवल वाच्यार्थ को ही ग्रहण करता है और उसके मन में एक सन्देह उत्पन्न होता है जिसे वह तृतीय अध्याय के प्रारम्भ में व्यक्त करता है।
अतः अगले अध्याय (गीता-तीसरे अध्याय ) में भगवान् श्रीकृष्ण कर्मयोग का विस्तारपूर्वक विवेचन करते हैं। conclusion : ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषस्तु ब्रह्मविद्यायां, योगाशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगोनाम द्वितीयोऽध्याय।।
इस प्रकार श्रीकृष्णार्जुन संवाद के रूप में ब्रह्मविद्या और योगशास्त्र स्वरूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का सांख्ययोग नामक दूसरा अध्याय समाप्त होता है।
कपिल मुनि जी के सांख्य दर्शन के अर्थ में इस अध्याय का नाम सांख्ययोग नहीं है। यहाँ सांख्य शब्द का प्रयोग उसकी व्युत्पत्ति के आधार पर किया गया है जिसके अनुसार सांख्य का अर्थ हैं किसी विषय का युक्तियुक्त वह विवेचन जिसमें अनेक तर्क प्रस्तुत करने के पश्चात् किसी विवेकपूर्ण निष्कर्ष पर हम पहुँचते हैं। इस अर्थ में तत्त्वज्ञान से पूर्ण इस अध्याय को संकल्प वाक्य में सांख्ययोग कहा गया है।
यह सत्य है कि मूल महाभारत में गीता के अध्यायों के अन्त में यह संकल्प वाक्य नहीं मिलते। किसी एक व्यक्ति को इनकी रचना का श्रेय देने के विषय में व्याख्याकारों में मतभेद है। तथापि यह स्वीकार किया जाता है कि एक अथवा अनेक विद्वानों ने प्रत्येक अध्याय के विषय का अध्ययन कर उसका उचित नामकरण किया है। गीता के सभी विद्यार्थियों के लिए वास्तव में ये नाम उपयोगी हैं। श्री शंकराचार्य जी ने इस विषय पर भाष्य नहीं लिखा है।]
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स्वामी विवेकानन्द ने 21 जनवरी, 1894 ई. को 'तरुण यहूदी संघ सभागार ' (Young Men's Hebrew Association Hall) में 'तुलनात्मक धर्म-विज्ञान' [Comparative Theology] विषय पर एक भाषण दिया था। अब तक विवेकानन्द किसी न किसी दानार्थी संस्था द्वारा निर्धारित विषय पर व्याख्यान देते रहे हैं और यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि स्वामी विवेकानन्द के भाषण से उन संगठनों को आर्थिक सहायता प्राप्त हुई होगी। लेकिन 21 जनवरी, 1894 की रात को स्वामी विवेकानन्द ने जो भाषण दिया , उन्होंने वह भाषण सिर्फ अपने उद्देश्य को लाभ पहुँचाने के लिए दिया था । यह भाषण श्री ब्रिंकले ( Mr. Hu L. Brinkley) नामक उनके एक घनिष्ट मित्र और बहुत अच्छे प्रशंसक द्वारा आयोजित किया गया था, जिसका पूरा खर्च उन्होंने ही वहन किया था। भारत से आये सुविख्यात वक्ता को सुनने , इस नगर में अन्तिम बार करीब 200 लोग उपस्थित हुए थे।
वक्ता के भाषण प्रथम बिंदु यह स्पष्ट करने का था कि - " विभिन्न सम्प्रदायों की जैसी मान्यता या मत है और धर्मों के जो सिद्धान्त (सनातन महावाक्य हैं) उनमें क्या वैसा कोई अन्तर है ?" (Can there be such a distinction between religions as their creeds would imply?) उन्होंने कहा कि अब कोई अन्तर नहीं है , और वे सब धर्मों द्वारा की हुई प्रगति का सिंहावलोकन करके उनकी सतही वस्तुस्थिति पर पुनः आ गए। उन्होंने उदाहरण पेश करते हुए कहा कि 'primitive man' आदि-मानव (आदिवासी मनुष्यों) में भी परमेश्वर की कल्पना के विषय में ऐसे मतभेद अवश्य रहे होंगे। परन्तु ज्यों ज्यों संसार की नैतिक, चारित्रिक और बौद्धिक प्रगति क्रमशः होती गयी , भेद अधिकाधिक असपष्ट (indistinct) होते गए। यहाँ तक कि अंत में वह पूरी तरह मिट गए , और अब एक ही सर्वव्यापी सनातन सिद्धान्त बच रहा, और वह है- निरपेक्ष सत्त्ता (absolute existence.परम अस्तित्व, निर्गुण-निराकार आत्मा, ब्रह्म, अल्ला , ईश्वर) । (until finally it had faded away entirely, and now there was one all - prevalent doctrine -- that of an absolute existence.)
उन्होंने कहा , " कोई जंगली -गँवार आदमी भी ऐसा नहीं मिलता, जो किसी न किसी प्रकार के ईश्वर में विश्वास न करता हो। " ("No savage", said the speaker, "can be found who does not believe in some kind of a god.)
" आधुनिक विज्ञान (Modern science) यह नहीं कहता कि वह इसे ज्ञान का प्रकटन मानता है या नहीं। जंगली-गँवार जातियों में प्रेम अधिक नहीं होता। वे डर (terror-आतंक) में जीते हैं।इनकी अंधविश्वासी कल्पना (superstitious imaginations) में किसी 'प्राणघातक-आत्मा' (malignant spirit) का चित्र रहता है , जिसके सामने वे डर और आतंक से काँपते रहते हैं। जो चीज उस आदिवासी को प्रिय है , वही (5 घैला दारू-5 मुर्गा) उस दुष्ट शक्ति को भी प्रसन्न करेगी , ऐसा वह मानता है। (Whatever he likes he thinks will please the evil spirit.) जो कुछ उसे सन्तुष्ट करता है, वही उस घातक -आत्मा के कोप को भी शांत करता होगा। (What will pacify him he thinks will appease the wrath of the spirit.) इसी उद्देश्य से वह अपने साथी वनवासी के विरुद्ध भी काम करता है। (To this end he labours even against his fellow - savage.")
" वक्ता ने ऐतिहासिक तथ्यों से यह दिखाया कि जंगली आदमी पूर्वजों की पूजा से हाथियों की पूजा करने लगा, और बाद में देवताओं की पूजा करने लगा, जैसे कि बिजली गरज (Thunder) और तूफ़ान (Storms) के देवता। तब संसार का धर्म बहुदेववाद (polytheism) था। "सूर्योदय का सौन्दर्य , सूर्यास्त की गरिमा , तारों जड़ित रात्रि का रहस्यमय रूप और बिजली की कड़क और वज्र की गरज की बिचित्रता ने इस आदिम मनुष्य को इतना अधिक प्रभावित किया कि वह उसे समझ नहीं सका , और उसने एक अन्य उच्चतर और अधिक शक्तिशाली व्यक्ति की कल्पना की, जो उसकी नजरों से दिखने वाली अनंत घटनाओं को संचालित और नियंत्रित कर रही थी। " -विवेकानन्द ने आगे कहा - " बाद में एक और युग आया -- एकेश्वरवाद (monotheism ) का युग। सभी (इंद्र-वरुण आदि) देवता मानो एक (ब्रह्म) में समाकर खो गए, और उसे ईश्वरों का ईश्वर, इस विश्व-ब्रह्माण्ड की संचालिका-शक्ति (काली?) माना गया।" बाद में वक्ता ने आर्यजाति का इतिहास बताया , जहाँ उन्होंने कहा था , " हम परमेश्वर में जीते और चलते हैं। वही हमारी गति है।
" Then there came another period known to metaphysics as the "period of Pantheism". This race rejected Polytheism and Monotheism, and the idea that God was the universe, and said "the soul of my soul is the only true existence. My nature is my existence and will expand to me." इसके बाद एक और युग आया , जिसे हमारे अध्यात्मविज्ञान (metaphysics' या तत्वमीमांसा) में "सर्वेश्वरवाद का युग" (period of Pantheism) कहा जाता है। इस जाति ने बहुदेववाद (Polytheism) और एकेश्वरवाद (Monotheism) को भी नकार दिया, और इस कल्पना को भी नहीं माना कि ईश्वर ही विश्व-ब्रह्माण्ड बन गया है। और कहा "मेरी प्रकृति (अन्तर्निहित ब्रह्मत्व ही 'वास्तविक पहचान') ही मेरा अस्तित्व है और वह भीतर से अभिव्यक्त होगी। (और कहा कि 'मेरी आत्मा की आत्मा ही वास्तविक सत है। मेरा स्व-स्वरुप ही मेरा अस्तित्व है और वह मुझपर अभिव्यक्त होगी।)
विवेकानन्द ने बाद में बौद्ध धर्म की चर्चा करते हुए कहा कि , " बौद्ध न तो ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार ही करते हैं , न अस्वीकार। इस विषय में जब बुद्ध से राय माँगी गयी , तो उन्होंने केवल यही कहा - " तुम दुःख देखते हो। तो उसे कम करने का यत्न करो। " (You see misery. Then try to lessen it. ईश्वर तो दीखते नहीं ? इसलिए To a Buddhist misery is ever present, and society measures the scope of his existence. ) बौद्ध के लिए दुःख सदा उपस्थित है , और समाज उसके अस्तित्व की मर्यादा निश्चित करता है। उन्होंने कि मुसलमान भी यहूदियों के प्राचीन व्यवस्थान (Old Testament) और ईसाईयों के नव व्यवस्थान ( New Testament) को मानते हैं। वे ईसाईयों को पसंद नहीं करते , क्योंकि वे विधर्मी (heretics- स्वधर्म भ्रष्ट) हैं , और मनुष्य रूपी ईश्वर की पूजा (व्यक्ति-पूजा man - worship, पैगम्बर, नेता की पूजा) की शिक्षा देते हैं। (Mohammed ever forbade his followers having a picture of himself.) जबकि मुहम्मद सदा अपने अनुययियों से कहते थे कि मेरी एक तस्वीर भी अपने पास न रखो। (१०/३६)
उन्होंने कहा, "अगला सवाल यह उठता है कि क्या ये धर्म सच्चे हैं या उनमें से कुछ सच्चे हैं और कुछ झूठे? वे सभी एक ही नतीजे पर पहुँचे हैं, जो एक पूर्ण और अनंत अस्तित्व है। एकता ही धर्म का मकसद है।" (They have all reached one conclusion, that of an absolute and infinite existence. Unity is the object of religion.) सभी धर्म एक ही निष्कर्ष पर पहुँचे कि - एक ही निर्गुण निराकार, निरुपाधिक या परम और अनंत अस्तित्व है, जो समय -समय पर सगुण -साकार रूप में अवतार लेता रहता है। अनेकता में एकता को दिखा देना ही धर्म का उद्देश्य है। "The multiple of phenomena that is seen at every hand is only the infinite variety of unity." इस दृश्य जगत में नानत्व जो सब और दिखाई देता है , इसी एकता की अनंत विविधता है। (अनेकता में एकता को स्वयं देखना और दूसरों को भी दिखा देना , यही भारतीय संस्कृति की विशेषता है।) धर्म /शिक्षा के विश्लेषण से पता चलता है कि मनुष्य मिथ्या (fallacy-भ्रान्ति) से सत्य की ओर नहीं जाता , परन्तु निम्नतर सत्य से उच्चतर सत्य की ओर जाता है। (an analysis of religion shows that man does not travel from fallacy to truth, but from a lower truth to a higher truth. (देह, इन्द्रिय, मन , बुद्धि से श्रेष्ठ आत्मा तक पहुँचता है।)
" एक आदमी बहुत से आदमियों के पास एक ही कोट लेकर जाता है। कुछ कहते हैं, यह उनके शरीर पर फिट नहीं बैठता। अच्छा तो तुम हट जाओ , तुम इस कोट को पहनने योग्य ही नहीं हो। किसी भी ईसाई पादरी से पूछो कि उसके सिद्धांत से और मतों से न मिलने-जुलने वाले अन्य पंथों को क्या हो गया है , क्यों वे तुम्हारे सिद्धांत और मतों के विरुद्ध हैं ? तो वह पादरी उत्तर में यही कहेगा कि , " ओह , वे ईसाई नहीं हैं। "
परन्तु हमारे सनातन धर्म में इससे श्रेष्ठ शिक्षा दी जाती है। हमारा अपना स्वभाव , प्रेम और विज्ञान की कसौटी - हमें अधिक श्रेष्ठ शिक्षा देते हैं। (But we have better instruction than these. Our own natures, love, and science -- they teach us better.) नदी या समुद्र में उठने वाले लहरों को हटा दो , तो क्या होगा ? पानी रुककर सड़ने लगेगा। मतभेदों को नष्ट कर डालो और विचार मर जायेंगे। (Like the eddies to a river, take them away and stagnation follows. Kill the difference in opinions, and it is the death of thought.) गति आवश्यक है। विचार मन की गति है , और जब वे रुक जाते हैं , तो मृत्यु शुरू हो जाती है। "
"यदि किसी पानी के गिलास की तली में हवा का एक साधारण अणु (molecule) भी रख दो, तो वह ऊपर के अनन्त वायु-मण्डल ( infinite atmosphere) से मिलने के लिए कितना संघर्ष करता है ? आत्मा की भी वही दशा है। ("If you put a simple molecule of air in the bottom of a glass of water it at once begins a struggle to join the infinite atmosphere above. So it is with the soul.) वह भी छटपटा रही है , अपने शुद्धस्वरूप को प्राप्त करने के लिए और अपने भौतिक शरीर से मुक्त होने के लिए। वह अपना अनन्त विस्तार (infinite expansion) पुनः प्राप्त करना चाहती है। (It is struggling to regain its pure nature and to free itself from this material body. It wants to regain its own infinite expansion. This is everywhere the same. Among Christians, Buddhists, Mohammedans, agnostic, or priest, the soul is struggling.) सभी जगह यही होता है। ईसाईयों , बौद्धों , मुसलमानों , अज्ञेयवादियों , और पण्डितों (priest) में आत्मा अपने अन्तर्निहित ब्रह्मत्व को अभिव्यक्त करने के लिए निरन्तर छटपटाती रहती है।
एक नदी घुमावदार पहाड़ से होकर हजारों मील नीचे बहती है, तब जाकर समुद्र को मिलती है, और एक आदमी वहाँ खड़ा होकर कहता है कि ' ओ नदी, तुम वापस जाओ और नए सिरे से शुरू करो , कोई और सीधा रास्ता अपनाओ ! " ऐसा आदमी मूर्ख ही होगा। (You are a river that flows from the heights of Zion.) तुम वह नदी हो जो - Mount Zion (इज़राइल यहूदी) की पहाड़ी से बहती है। जैसे मैं (हिन्दू) हिमालय की ऊँची चोटियों से बहता हूँ। मैं तुमसे यह नहीं कहता कि वापस जाओ और मेरी तरह नीचे आओ, तुम गलत हो। ऐसा कहना गलत दिशा में बहने से भी ज्यादा बड़ी मूर्खता होगी। (जितने मत हैं , उतने पथ हैं ! इसलिए) तुम अपने ही विश्वासों पर टिके रहो।
(That is more wrong than foolish. Stick to your beliefs. The truth is never lost. Books may perish, nations may go down in a crash, but the truth is preserved and is taken up by some man and handed back to society, which proves a grand and continuous revelation of God.") 'सत्य' कभी नष्ट नहीं होता , पुस्तकें चाहे नष्ट हो जाएँ, राष्ट्र चकनाचूर हो जाये, लेकिन सत्य सुरक्षित रहता है , जिसे कुछ लोग पुनः उठाते हैं , और समाज को देते हैं , और वह परमेश्वर का महान अविच्छिन्न साक्षात्कार सिद्ध होता है। १० /पृष्ठ ३७)
The Hindoo Monk - (Appeal-Avalanche, January 16, 1894)
Swami Vive Kananda, the Hindoo monk, who is to lecture at the Auditorium [Memphis] tonight, is one of the most eloquent men who has ever appeared on the religious or lecture platform in this country. His matchless oratory, deep penetration into things occult, his cleverness in debate, and great earnestness captured the closest attention of the world’s thinking men at the World’s Fair Parliament of Religion, and the admiration of thousands of people who have since heard him during his lecture tour through many of the states of the Union.
In conversation he is a most pleasant gentleman; his choice of words are the gems of the English language, and his general bearing ranks him with the most cultured people of Western etiquette and custom. As a companion he is a most charming man, and as a conversationalist he is, perhaps, not surpassed in the drawing-rooms of any city in the Western World. He speaks English not only distinctly, but fluently, and his ideas, as new as sparkling, drop from his tongue in a perfectly bewildering overflow of ornamental language.
Swami Vive Kananda, by his inherited religion or early teachings, grew up a Brahmin, but becoming converted to the Hindoo religion he sacrificed his rank and became a Hindoo priest, or as known in the country of oriental ideality, a sanyasin. He had always been a close student of the wonderful and mysterious works of nature as drawn from God’s high conception, and with years spent as both a student and teacher in the higher colleges of that eastern country, he acquired a knowledge that has given him a worldwide reputation as one of the most thoughtful scholars of the age.
His wonderful first address before the members of the World’s Fair Parliament stamped him at once as a leader in that great body of religious thinkers. During the session he was frequently heard in defence of his religion, and some of the most beautiful and philosophical gems that grace the English language rolled from his lips there in picturing the higher duties that man owed to man and to his Creator. He is an artist in thought, an idealist in belief and a dramatist on the platform.
Since his arrival in Memphis he has been guest of Mr. Hu L. Brinkley, where he has received calls day and evening from many in Memphis who desired to pay their respects to him. He is also an informal guest at the Tennessee Club and was a guest at the reception given by Mrs. S. R. Shepherd, Saturday evening. Col. R. B. Snowden gave a dinner at his home at Annesdale in honor of the distinguished visitor on Sunday, where he met Assistant Bishop Thomas F. Gailor, Rev. Dr. George Patterson and a number of other clergymen.
Yesterday afternoon he lectured before a large and fashionable audience composed of the members of the Nineteenth Century Club in the rooms of the club in the Randolph Building. Tonight he will be heard at the Auditorium on “Hindooism”.
---VivekaVani/https://vivekavani.com/
1.5 IN A SOUTHERN CITY
https://englishbooks.rkmm.org/s/lsv/m/swami-vivekananda-in-the-west-new-discoveries/a/1-5-in-a-southern-city
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>>> द्वैत के कारण ही भय होता है : तैत्तिरीयोपनिषद २/७/१ में कहा गया है है - " उदरम् अन्तरम् कुरुते अथ तस्य भयम् भवति ।" अर्थात जो व्यक्ति ब्रह्म और अपने अथवा दूसरों में -' उदरम् ' थोड़ा-सा भी, अन्तरम् कुरुते - अन्तर समझता है, उसको भय होता है।'