कुल पेज दृश्य

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

कालाय तस्मै नमः !


🔴 LIVE | Day 03 | श्रीरामकृष्ण विश्व सद्भावना निकेतन | लोकार्पण एवं प्राणप्रतिष्ठा | 19 जनवरी 2026

स्वामी विष्णुपादानन्द जी महाराज, सभा के अध्यक्ष का सम्बोधन -  

(3:38:33

 या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ 

आज के सभा चर्चा का विषय है - "श्री सारदा देवी , उनका दिव्य जीवन और उनका सन्देश।" अबतक अपने चार अन्य विद्वान् और अनुभवी वक्ताओं को आपने सुना। आप उनकी वाणी का आनन्द ले रहे थे। उन सबने माताजी के जीवन की महानता, सरलता , सहजता इन सारे पहलुओं पर अपने विचार रखे और हम सब को अभिभूत कर दिया। मुग्ध कर दिया। माताजी का जीवन सुनाते हुए ये लोग इतने भावपूर्ण थे मानों वे उन बातों को अपने हृदय के अन्तःकरण से कह रहे हैं। 

वे केवल बुद्धि द्वारा नहीं ,केवल अपनी स्मरण शक्ति का उपयोग करके नहीं। उसका उपयोग तो खैर करना ही पड़ता है। माँ का जीवन उनके अपने ह्रदय के भीतर कितना प्रविष्ट हुआ है , उनकी बातों को कहते समय वे अपने के भावों को ह्रदय की भावुकता के साथ प्रकट कर रहे थे। जब हम माँ का जीवन चरित्र सुन रहे थे , तो माँ के जीवन के माध्यम से , हम ठाकुर जी को भी समझ रहे हैं। और स्वामी विवेकानन्द जी को भी सुन रहे हैं। तीनों विभूतियों का जीवन एक ही है। ये हम अनुभव कर रहे हैं। 

    महापुरुषों के जीवन की दिव्यता स्वतः प्रमाणित है। वे हमारे ह्रदय को स्पर्श करती है। क्योंकि उनकी दिव्यता सहज और स्वाभाविक होती है। जैसे हम अनेक रूपों में देवी की पूजा करते हैं। सभी रूपों में प्रकृति , सृष्टि और मातृशक्ति की जो बात है , माँ की कृपा करुणा हमलोगों तक पहुँचती है। हम सन्तानों के प्रति माँ का प्रेम। माँ चाहती हैं कि उनकी सन्तान सुख में रहे, आनन्द में रहे और आगे बढ़े। पुत्र कैसा भी हो , माँ का प्रेम उसके प्रति हमेशा बना रहता है।  (https://www.facebook.com/groups/925716234695876/posts/1965143047419851/)

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति, 

सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं

तव सुतः।

मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव, 

शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता

न भवति॥३॥  

[अर्थात: माँ ! इस पृथ्वी पर तुम्हारे सीधे सादे पुत्र तो बहुत से हैं।  किन्तु उन सब में ही अत्यंत चपल तुम्हारा बालक हूँ। मेरे जैसे चंचल कोई विरला ही होगा। शिवे ! मेरा जो यह त्याग हुआ है,यह तुम्हारे लिए कदापि उचित नहीं है। क्योंकि संसार में कुपुत्र का होना संभव है किन्तु माता कभी कुमाता नहीं हो सकती।"]

शंकराचार्यजी कहते हैं -कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति'  माता के कुमाता होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।  और ये माँ श्री सारदा देवी तो हमारे लिए संघ -जननी हैं। और हम सभी भक्तो की भी जननी है , क्योंकि हम संन्यासी संघ के अटूट अंग हैं। संघ से एकाकार हुए हैं। और गृही आप सभी भक्त लोग भी रामकृष्ण मठ और मिशन, स्वामी जी द्वारा निर्धारित जिसका जुड़वाँ आदर्श वाक्य है-"आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च" (हिन्दी अर्थ : स्वयं के मोक्ष के लिए तथा जगत के कल्याण के लिए), के अभिन्न अंग हैं। अतएव इन संगठनों से जुड़े हम सभी लोग संघ के ही अटूट अंग हैं, इसलिए ठाकुर -माँ -स्वामीजी की कृपा के पात्र हैं। इसलिए श्रीरामकृष्ण देव , श्री माँ और स्वामी विवेकानन्द इस संघ के माध्यम से , हम सबके ऊपर कृपा वर्षण कर रहे हैं। इसका स्पष्ट आभास शायद हर समय हमें न होता हो , क्योंकि उतनी क्षमता या योग्यता हममें नहीं है। जिस मनुष्योचित विवेक का विकास जितनी गति से और जितनी मात्रा में होनी चाहिए , उस मात्रा में हमारे भीतर शायद न हुआ हो। लेकिन माँ का प्रेम सन्तानों के लिए एकतरफा प्रेम होती है। माँ की कृपा का वैशिष्ट्य यह है कि वो एकतरफा होती है। पुत्र , सन्तान,  बच्चा माँ को चाहे न चाहे; माँ की कृपा का अनुभव , उनका प्रभाव क्या होता है , पुत्र न समझ पाए ,यह  हो सकता है। लेकिन माँ अपने बच्चों से प्रेम पाने की अपेक्षा नहीं करती हैं। उनका प्रेम एक तरफा होता है , क्योंकि वह माँ हैं, संतान को जन्म देने वाली जननी है, अपनी सृष्टि की बात है। (3:46:00)

     सन्तान माता से बहुत प्रेम करता है। जब माता आँखों के सामने नहीं होती है , तो उसे सब तरफ अँधेरा दीखता है। वो माँ , माँ करके रोता है। लेकिन यह अवस्था बालक की होती है , जब वो छोटा होता है। श्रीरामकृष्ण देव ने बड़ा सुंदर उदाहरण दिया है , कि माँ किंवाड़ के पीछे छिपी हुई है , और बच्चा माँ को देख नहीं पाता।  चारों तरफ , इधर-उधर खोजता है , माँ कहीं दिखाई नहीं दे रही है। तो उसको रोना आ जाता है , और उसकी आँखों से अश्रु की धारा बहने लगती  हैं। जोर से रोने लगता है , तो अबतक जो माँ दरवाजे के पीछे छिपी हुई है , वो सामने आती है। और उस बालक को या बालिका को ऊपर गोद में उठा लेती है। उसे चूमते हुए अपने प्रेम को दर्शाती हैं। माँ को जब अपने बच्चे से इतना प्रेम है , तो उसकी आँखों से ओझल होने की आवश्यकता ही क्या है ? (3:47:34)    

      कोई जरुरी नहीं है। लेकिन वो माता का प्रेम है , उसे मालूम है कि मेरे बिना मेरी सन्तान नहीं रह सकती है। उसको परीक्षा लेने की भी आवश्यकता नहीं है , परखने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन फिर भी वे परीक्षा लेती हैं। क्योंकि परीक्षा उसका पुत्र के प्रति प्रेम है , पुत्र का उसका प्रति प्रेम है - उसका अनुभव वो बार -बार करना चाहती है। इसलिए माँ थोड़ा सा परेशान करती हैं हमें। उनकी इच्छा कष्ट देने की नहीं है , हमें परेशान करने की नहीं है। मेरे बिना मेरी सन्तान एक क्षण भी नहीं रह सकती है , उस आनंद का अनुभव करने के लिए छिपती है। वही बालक जब बड़ा होता है। माता-पिता के प्रति दुर्व्यवहार करता है। और वह माँ के प्रेम को भूल जाता है। जो बच्चा माँ के बिना कुछ पल भी नहीं रह सकता था। और वही माँ मानो है ही नहीं , इस प्रकार से आचरण करता है। अपनी माँ के पास कुछ पल भी बैठ नहीं सकता। माँ से बात करने के लिए समय नहीं है , बाकि सब चीजों के लिए समय है। बाकि सबको अपना कर्तव्य और महत्वपूर्ण बात समझता है।  लेकिन जिस माँ ने उसका प्रेम से पालन-पोषण किया, उसकी याद उसका महत्व अब उसे याद नहीं आता। माँ से बात करने का समय नहीं रहता।

    लेकिन हमारी जो माँ जगदम्बा हैं , उन्होंने अपने संसार को छोड़ दिया , अपने मर्त्य शरीर को त्याग दिया। कई साल हो गए , लेकिन हम अब भी माँ को भूल नहीं पाए हैं , और न कभी भूल सकेंगे। क्योंकि माँ की कृपा का जो प्रवाह है , वह बिना रुके चल रहा है। और इसका अनुभव सभी भक्तों को होता है। शास्त्र कहता है कि अविनाशी आत्मा (ईश्वर, भगवान,सत्य, ब्रह्म, सच्चिदानन्द ) के लिए समय (काल या मृत्यु) कोई बाधा ही नहीं है। वैसे संसार की अन्य  सब चीजें समय/काल से बाधित होती हैं (3: 50:28) इसीलिए कहा जाता है - कालाय तस्मै नमः ! (वैराग्य शतक) 

सा रम्या नगरी महान्स नृपतिः सामन्तचक्रं च तत्

      पार्श्वे तस्य च सा विदग्धपरिषत्ताश्चन्द्रबिम्बाननाः ।

उद्वृत्तः स च राजपुत्रनिवहस्ते बन्दिनस्ताः कथाः

      सर्वं यस्य वशादगात्स्मृतिपथं कालाय तस्मै नमः ॥ ४१॥ 

वह रम्य नगरी, उसके महान् राजा, उसके दरबार में बैठे वह सामन्त-समूह और उसके चतुर मंत्री, वे चन्द्रमुखी नृत्यांगनायें, वे सनकी, मनमौजी (whimsical) राजकुमारवे भाट-चारण और उनकी गाथाएँ। यह सब जिस समय के बल से मात्र स्मृति बन कर रह गए उस काल को, नमन है।वैराग्य शतकम् - Part 1॥ वैराग्य शतकम् भर्तृहरिविरचितम् ॥ कालमहिमानुवर्णनम् ।] 

ऐसा जो काल है - सब चीजों को बाधित करता है। व्यक्ति का महत्व कम हो जाता है , और लोग उसे भूल जाते हैं। लेकिन माँ की विस्मृति होना बहुत ही सामान्य बात है। माता-पिता को भूलना , दादा-दादी को भूलना , सबको भूल जाता है। कृतज्ञता का जो महान गुण हैं , उसको हम अपने जीवन में उतार नहीं पाते हैं। ये हमारी भूल है , और हमारे दुखों का एक प्रमुख कारण है। हम मनुष्यों में कृतज्ञता नहीं है। क्योंकि हममें अहंकार (जीव का अहं M/F ) है हममें राग-द्वेष आसक्ति है। अनेक प्रकार की वासनाओं (3K में आसक्ति) ने हमारे जीवन में स्थान बना लिया है। इसीलिए वास्तव में जो हमारे अपने हैं , जिहोंने हम पर प्रेम वर्षण किया है -हमें सब कुछ माना है। माँ सारदा के लिए (गुरुदेव और नवनीदा के लिए) बच्चा तो आँख की पुतली होता है। एक समय में हम पर कितना प्रेम , वर्षण किया है , पर वह प्रेम हमें याद नहीं आता। पुरानी बात हो गयी है।

लेकिन जो हमारी अपनी माँ नहीं हो , तो भी अपनी माँ से कई गुना अधिक प्रेम देने वाली हमारी जगतजननी है , जगदम्बा है। हमारी अपनी हो जाती है। क्यों ? क्योंकि उस प्रेम का रूप सम्पूर्णतया अलग है। वह प्रेम लौकिक नहीं है। वो प्रेम साधारण नहीं है , वो प्रेम दिव्य है। माँ का प्रेम बहुत अद्भुत चीज होती है। लेकिन उस प्रेम की दिव्यता का स्पर्श हम केवल इस प्रकार के अवतार पुरुष , भगवान जो स्वयं पुरुष देह धारण करके आते हैं। भगवान कभी स्त्री शरीर धारण करते हैं। (3:52:56) स्त्री शरीर और पुरुष शरीर अलग नहीं होते हैं। एक ही हैं!  माँ हर प्राणी में मातृ रूप में स्थित हैं। इसलिए हमारी परम्परा में , अर्धनारीश्वर का भाव है। कैसे दिखाएंगे? एक आधार में नारी भी है , नर भी है। शिव भी है शक्ति भी है। उसको कल्पना से चित्रित करना पड़ेगा।

लेकिन जब हम श्री रामकृष्ण और श्री माँ का जीवन देखते हैं , और उसमें हम स्वामी विवेकानन्द को भी जोड़ देते हैं। तब हम देखते हैं इन त्रयी की मूर्ति का जो सार है , वो प्रेम है। इनके प्रेम में किसी प्रकार की लौकिकता नहीं है। लौकिक दीखता है, लेकिन प्रेम अलौकिक है।  भोजन के बाद जो पान का बीड़ा माँ बनाती हैं , वो अपने सन्तानों के लिए अलग बनाती हैं। भक्त सन्तानों के लिए अलग बनाती हैं। उसका कारण भी देती हैं। ये तो अपने ही हैं , उनको तो अपना बनाना है। ये तो लैकिक बात है , सब जानते हैं। इसमें कौन सी अलौकिकता है ? सब माँ जानती है -अपना बच्चा अपना होता है , पराया बच्चा पराया होता है। लेकिन माँ का प्रेम के पीछे उसके जो संन्यासी संतान हैं उनके लिए थोड़ा ज्यादा प्रेम है, और गृहस्थ भक्तों के लिए कम है , ऐसी बात नहीं है। लेकिन माँ का जो व्यवहार है , उस व्यवहार में भी मधुरता है। ये जो व्यावहारिक दिव्यता (Practical divinityहै, उसका वर्णन चारो वक्ताओं ने उसका वर्णन स्वयं को भूल कर किया है। माता जी के दिव्य जीवन की इतने प्रसंग बताये हैं , श्रीरामकृष्ण के जीवन में व्यावहारिक दिव्यता के कितने ही प्रसंग हैं। एक-एक प्रसंग हमारे जीवन को पवित्र बनाता है , हमें पावन करता है। स्वामी विवेकानन्द जी के जीवन में भी कितने ऐसे प्रसंग हैं , जिनको हम जब पढ़ते हैं , तो हमारे जीवन में विकास होता है , हमारा जीवन उन्नत होता है। स्वामी जी के जीवन में उनकी व्यावहारिक दिव्यता को देखने से , हमारे विचारों में पवित्रता आती है।  हमारी बुद्धि में (दृष्टिकोण या मति में) शुद्धता आती है। पवित्र जीवन जीने के लिए जो प्रेरणा चाहिए , बल चाहिए , वह शक्ति हमें प्राप्त होती है

आज हमने इन वक्ताओं के मुख से जितनी घटनाओं को सुना - वो हमें अनेक किताबों से पढ़कर मालूम थीं। 'शतरूपे सारदा ' कृपा करने के लिए 'माँ सारदा के सैकड़ों रूप हैं !' आदि के बारे में जब हम सुनते हैं , तो अलग आनंद होता है। लेकिन वह आनन्द हमारे मानव जीवन को धन्य बनाने वाली हैं। हमें कृत-कृत्य और कृतार्थ बनाने वाली बात है। क्योंकि अवतार पुरुषों का जन्म साधारण नहीं होता है। हमलोगों का जीवन साधारण होता है , लौकिक होता है। उसमें कोई विशेषता नहीं होती है। लेकिन अवतार पुरुषों (ईश्वरकोटि?) का जीवन असाधारण होता है। असाधारण मतलब -दिव्य होता है। भगवत गीता के चौथे अध्याय का वह श्लोक - 

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया।।4.6।।

।।4.6।। यद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप हूँ और भूतमात्र का ईश्वर हूँ (तथापि) अपनी प्रकृति को अपने अधीन रखकर (अधिष्ठाय) मैं अपनी माया से जन्म लेता हूँ।।
 

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।4.9।।

।।4.9।। हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। इस प्रकार (मेरे जन्म और कर्म को) जो मनुष्य तत्त्व से जान लेता अर्थात् दृढ़तापूर्वक मान लेता है, वह शरीर का त्याग करके पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, प्रत्युत मुझे प्राप्त होता है। (4:03:48

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया।।4.6।।

।।4.6।। यद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी ब्रह्म स्वरूप हूँ और भूतमात्र का ईश्वर हूँ (तथापि) अपनी प्रकृति को अपने अधीन रखकर (अधिष्ठाय) मैं अपनी माया से जन्म लेता हूँ।।

मानो उनका जन्म हुआ है। मानो उन्होंने देह धारण किया है। मानो लोगों के ऊपर वो कृपा कर रहे हैं , अनुकम्पा, करुणा , दया  दिखा रहे हैं। लेकिन उनकी दया, कृपा हमलोगों के जैसे नहीं है , गीता में भगवान ने स्वयं कहा है। अवतार का कर्म क्या है ? वो भी स्पष्ट कहा गया है -कि धर्मसंस्थापनार्थाय - 

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।4.8।।

।।4.8।। साधुओं-(भक्तों-) की रक्षा करनेके लिये, पापकर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और धर्मकी भलीभाँति स्थापना करनेके लिये मैं युग-युगमें प्रकट हुआ करता हूँ। 

ताकि जो लोग मनुष्य होकर भी (विवेक सोया रहने के कारणअपने मार्ग से किस प्रकार भटके हुए हैं, उनको किस प्रकार फिर से 'मनुष्य का धर्म' अर्थात मनुष्य की विशेष योग्यता , या उसकी विशेष पहचान जो नित्य-अनित्य विवेक-प्रयोग क्षमता है , उस विवेक-प्रयोग के मार्ग पर किस तरह लाया जाये? इस धर्म की स्थापना कैसे की जाये ?  

प्रवृत्ति धर्म क्या है ? साथ-साथ  निवृत्ति धर्म क्या है ? वह भी उन अवतारों के जीवन को देखने से हमें पता चलता है। वेदों में बताये गए इन दोनों मार्गों का वर्णन करते हुए आदिगुरु शंकराचार्यजी अपने गीता भाष्य के प्रारम्भ में (श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्यम् ॥ उपोद्घातः ॥) ही कहते हैं - 

[ वेदोक्त धर्म दो प्रकार का है - एक प्रवृत्ति रूप है, दूसरा निवृत्ति रूप है।   जो जगत की स्थिति का कारण , तथा प्राणियों की उन्नति का और मोक्ष का साक्षात् हेतु है। एवं कल्याणकामी ब्राह्मण आदि वर्णाश्रम अवलम्बियों द्वारा जिसका अनुष्ठान किया जाता है उसका नाम धर्म है। 

सः भगवान् सृष्ट्वा-इदं जगत्, तस्य च स्थितिं चिकीर्षुः,

मरीचि-आदीन्-अग्रे सृष्ट्वा प्रजापतीन्, प्रवृत्ति-लक्षणं धर्मं

ग्राहयामास वेद-उक्तम् । 

इस जगत को रचकर इसका पालन करने की इच्छा वाले उस भगवान ने पहले मरीचि आदि प्रजापतियों को रचकर उसको वेदोक्त प्रवृत्ति रूप धर्म (कर्मयोग) ग्रहण करवाया।  

                         ततः अन्याण् च सनक-सनन्दन-आदीन् उत्पाद्य,

                         निवृत्ति-लक्षणं धर्मं ज्ञान-वैराग्य-लक्षणं ग्राहयामास । 

फिर उनसे अलग सनक , सनन्दन , सनातन आदि ऋषियों को उत्पन्न करके उनको ज्ञान और वैराग्य जिसके लक्षण हैं , ऐसे निवृत्ति रूप धर्म (ज्ञानयोग) ग्रहण करवाए।]  

" द्विविधः हि वेदोक्तः धर्मः, प्रवृत्ति-लक्षणः निवृत्ति-लक्षणः च जगतः स्थिति-कारणं , प्राणिनां साक्षात्-अभ्युदय-निःश्रेयस-हेतुः यः सः धर्मः ब्राह्मणाद्यैः वर्णिभिः आश्रमिभिः च श्रेयोर्थिभिः -अनुष्ठीयमानः ॥" 

आचार्य शंकर कहते हैं - वेदों के द्वारा धर्म के दो रूप कहे गए हैं - "प्रवृत्ति-लक्षणो निवृत्ति-लक्षणो च। " जगत का मतलब : एक यह जो दृश्यमान लौकिक जगत है और दूसरा 'हमारा' - साधाकों का, मुमुक्षुओं का , विवेकी -मनुष्यों का , उपासकों का , भक्तों का या संयासियों का जो जगत है। उसमें प्रवृत्ति और निवृत्ति का सन्तुलन किस प्रकार से रहे ? गृहस्थों और संन्यासियों में समन्वय किस प्रकार रहे ? यह तरीका हम किस से सीखेंगे ? यह केवल अवतार पुरुषों से ही सीखा जा सकता है (3:59) 

माँ और ठाकुर के जीवन में दोनों का अद्भुत संतुलन है। क्योंकि उनका आना ही -धर्मसंस्थापनार्थाय ' हुआ है। (नवनीदा जैसे 'नेता' -उस पार से लौटे ही हैं केवल  -'विवेकज-आनंद ' के धर्म को स्थापित करने हेतु।) अवतारों से हम हमेशा सीखने का प्रयास करते हैं। जिस तरह माँ ने कहा - " अगर शान्ति चाहो , तो दूसरों का दुर्गुण मत देखो - किसी का दोष मत देखना !" विवेक-सोया है ? ये देखो ? सन्त तुकाराम ने भी यही कहा है - मैं दूसरों के दुर्गुणों को क्या गिनवा सकता हूँ ? उसकी क्या आवश्यकता है ? क्या दूसरों में जिन दोषों कस मैं बखान कर रहा हूँ , वो दोष मुझमें कम हैं ? माँ कहती है - मैं दूसरों के दोष देख ही नहीं सकती गौरी माँ शिकायत करती हैं , तुम सबको क्यों अपना लेती हो ? उनका आचरण क्यों नहीं देखती ? माँ ने कहा मैं नहीं देख सकती। हमें मालूम है कि यह गुण हममें बहुत कम है। इतना तो मालूम कि यह अविचलता, सहनशीलता भी गुण है। इस गुण की परिपूर्णता हम माँ के जीवन में देखते हैं।यही हमारे लिए बहुत बड़ा सम्बल है। उनको अपना आदर्श मानकर हम अपने जीवन में आगे बढ़ सकते हैं। अपना व्यक्तिगत जीवन मधुर बना सकते हैं। और दूसरों के जीवन में भी हम मधुरता का कुछ संचार कर सकते हैं। योगदान कर सकते हैं। ये कठिन लगता है। लेकिन माँ का जीवन तो मधुर था। अभी है , और सब समय आदर्श उदाहरण बना रहेगा। माँ का जो अद्भुत जीवन है , उसमें सकारात्मक क्या है ? positive क्या है ? उसका उदाहरण देखें - दुर्गापूजा विसर्जन में लोग नाच रहे थे। माँ से किसी ब्रह्मचारी ने शिकायत कर दी। ये ठीक नहीं हो रहा है - बेढंगा  नाचता है ? माँ कहती है - अरे ऐसा ही होना चाहिए। माँ को खुश करने के लिए बच्चा ऐसे ही नाचता है। माँ की दृष्टि कितनी उदार है - ये देखने की चीज है। माँ के जीवन की जितनी भी घटनाएं हमने आज सुनी हैं। माँ का जन्म दिव्य है , माँ कर्म कितना दिव्य है। हमलोग माँ के दिव्य जीवन को - 'तत्वतः' जानेंगे- मतलब जैसा है , वैसा दिव्य जीवन को ठीक से जानेंगे। अवतार के जीवन को यथार्थतः जानने का फल बहुत बड़ा होता है,संसार-चक्र से मोक्ष। इसलिए तीन दिन का ये जो यज्ञ चल रहा है। भगवान स्वयं गीता में कहते हैं -   

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।

ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः।।18.70।।

।।18.70।। जो मनुष्य हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा -- ऐसा मेरा मत है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - हम दोनों में जो 'धर्ममय संवाद' चल रहा है, वह धर्म से भरा हुआ है।अरे अर्जुन , यहाँ ज्ञान-यज्ञ चल रहा है , और मेरी पूजा चल रही है। यह मेरी मति - भगवान की बुद्धि ऐसा कहती है। भगवान का ऐसा विचार है तो उनके कथन को प्रमाण की क्या आवश्यकता है ?   हम दोनों में जो संवाद हुआ है , वो धर्म से परिपूर्ण है।

उसी प्रकार यहाँ जो ज्ञान यज्ञ चल रहा है , यह ठाकुर , माँ स्वामी जी की उपासना ही चल रही हैं। ताकि हमलोगों में भी मातृभक्ति का विकास हो।  मातृभक्ति से व्यक्ति महान बनता है ! भगवान राम मातृभक्त थे। भगवान कृष्ण मातृ भक्त थे। व्यास मातृभक्त थे। उनको सत्यवती नन्दन कहा जाता है। शंकराचार्यजी मातृ भक्त थे। पाण्डव मातृभक्त थे। भीमसेन तो बहुत बड़ा मातृभक्त था। विवेकानन्द मातृभक्त थे। शिवाजी महाराज मातृभक्त थे। माँ ने कहा शिवा ये किला जीतना है। कोई बहस नहीं। माँ ने कहा है - होना ही है। माँ की आज्ञा का पालन होना ही चाहिए। इसको कहा जाता है मातृभक्ति। स्वामी जी ठाकुर की बात पर शंका करते थे , लेकिन माँ जब आदेश दे दिया तो - किला जीतना ही है। [गाड़ी लेना है - तो लेना है ! ] इसे कहा जाता है -मातृभक्ति। स्वामीजी कभी ठाकुर के आदेश पर तर्क करते थे , लेकिन माँ आदेश अकाट्य था। माँ सुप्रीम कोर्ट है। लास्ट आदेश ! ये मातृभक्ति है। श्री रामकृष्ण के सभी संन्यासी सन्तानों की मातृभक्ति देखने के लायक है। सभी ने माँ को बहुत स्नेह दिया , पर से उन्होंने बहुत अधिक स्नेह पाया था। हमलोग भी माँ से दूर नहीं हैं , ये जो आयोजन हुआ है - माँ की कृपा से हुआ है। इस आयोजन के माध्यम से नागरिकों को मातृप्रेम , पितृप्रेम , माँ का आशीर्वाद , पिता का प्रेम ,स्वामीजी का भ्रातृप्रेम। माँ सारदा संघजननि हैंगृहस्थ भक्त और ठाकुर के संन्यासी भक्त संघ के अटूट अंग हैं। हमें यदि मातृभक्ति हो तो , हमारी मातृभक्ति कैसी होनी चाहिए ? उसका अनुभव आज हुआ होगा। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था - " आधुनिकता हमें सुखी बनाती है। वैज्ञानिक आविष्कार से शरीर को सुख बढ़ता है। हमारे Comforts बढ़ जाते हैं। माईक है तो आप सभी सुन रहे हैं। लेकिन मशीनें हमें गुलाम बना देती है। संसार को सुखी बनाने प्रयास हजारों सालों से किया जा रहा है। लेकिन हमारा अनुभव है - वास्तव में कितने सुखी हुए हैं हमलोग ? उसको तो हम नहीं बता सकते हैं। लेकिन दुखी कितने हुए हैं - यह हम बोल सकते हैं। हमलोग बोलते हैं -मोबाइल तो बहुत जरुरी है , उसके बिना तो हम रह नहीं सकते हैं। लेकिन हम बोल सकते हैं कि इसने हमें बहुत दुखी बना दिया है। क्योंकि इस मोबाईल की जकड़ से युवा -बच्चा -बूढ़ा सभी गुलाम हैं।

स्वामीजी कहते हैं 1000 वर्षों से जगत को सुखी बनाने का जितना प्रयास किया गया है - उतना ही प्रयास यदि मनुष्य को चरित्र के गुणों से विभूषित करने में - अविचलता , सहशीलता आदि गुणों को व्यक्त करने का प्रयास किया जाता ,यदि मनुष्य को Pure , Gentle and Tolerant " पवित्र , सभ्य और सहनशील बनाने में किया जाता , तो आज मनुष्य जितना सुखी है , उससे हजारों गुना अधिक सुखी हो जाता।

सभ्यता या शिष्टाचार (gentleness) क्या है ?  जरा विचार करके देखें यदि 'क्षात्र वीर्य और ब्रह्मतेज से विभूषित' कोई भी स्त्री हो या पुरुष- दोनों यदि ज्ञानदायिनी 'माँ श्री सारदा देवी" की   'पवित्रता, शिष्टाचार (सभ्यता) और सहनशीलता' जैसी 'व्यावहारिक दिव्यता' (Practical Divinity)का उदाहरण  "यदि शांति चाहते हो तो किसी का दोष मत देखो' के इस सिद्धान्त पर चलने के साथ-साथ अन्य व्यावहारिक उपदेशों (Practical teachings), जैसे "जब जैसा- तब तैसा, जहाँ जैसा -तहाँ तैसा, जिसको जैसा उसको वैसा", का पालन करते हुए भी श्री माँ (नवनीदा या भारती दीदीके जैसा-"मेरे मन, वाणी और आचरण से किसी को कष्ट न हो'-को अपने जीवन और आचरण से प्रस्तुत कर सके, ऐसा विवेकी मनुष्य बनने और बनाने का प्रशिक्षण देना ही 'स्वामी विवेकानन्द की मनुष्यनिर्माण और चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा' है। आज यदि 'पवित्रता, सभ्यता और सहनशीलता ' के गुणों का सम्पूर्ण आदर्श यदि कहीं सच्चे रूप में देखते हैं , तो किसमें देखते हैं ? ये सारे गुण हम माँ के जीवन में पूरा देखते हैं। 

पवित्रं चरितं यस्या: पवित्रं जीवनं तथा ।

पवित्रतास्वरूपिण्यै तस्यै कुर्मो नमो नम: ।।

माँ श्री सारदा देवी पवित्रता की जीवन्त मूर्ति थीं। सहनशील बनो - स्वामीजी कहते थे। दादा कहते थे - वीर हो धीर बनो। लेकिन सहनशील होना कितना कठिन है ? पर हुआ जा सकता है। यह हमें माँ के जीवन में देखते हैं। और Gentleness ' (सभ्यता-भद्रता) का आदर्श किसे कहते हैं ? कभी अपनी वाणी से , आचरण से या विचारों से दूसरों को कष्ट नहीं हो , इसका ख्याल हर समय रखने वाला सभ्य , भद्र माना जाता है। माँ कितनी सभ्य थी यह हम माँ के जीवन के द्वारा ही हम समझ सकते हैं। क्योंकि व्यावहारिक दिव्यता की साक्षात् उदाहरण श्री माँ हैं !! भारत का आदर्श वाक्य है - "कृण्वन्तो विश्वं आर्यम्" ! सारे संसार को हम सभ्य बना देंगे। "आर्य" का अर्थ: यहां "आर्य" किसी नस्ल या पंथ से नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति से है जो चरित्रवान मनुष्य है प्रशंसनीय कार्य करता है, सच्चाई का पालन करता है, और दूसरों के प्रति दयालु होता है.वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना: यह वाक्यांश 'पूरी पृथ्वी एक परिवार है' (वसुधैव कुटुम्बकम्) के विचार से भी जुड़ा है, जो सभी के उत्थान की बात करता है।  कैसे सभ्य बना देंगे ? माँ का व्याहारिक दिव्य जीवन इसका उदाहरण है। माँ सभ्यता , पवित्रता , सहनशीलता की प्रतिमूर्ति थी। आज हमने चार वक्ताओं द्वारा प्रस्तुत अनेक उदाहरणों के माध्यम से माँ का दिव्य जीवन हमने सुना। जितनी भी घटनायें सुनी इसका प्रभाव बहुत बड़ा होता है। 

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।4.9।।

।।4.9।। हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। इस प्रकार (मेरे जन्म और कर्मको) जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता अर्थात् दृढ़तापूर्वक मान लेता है, वह शरीरका त्याग करके पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होता, प्रत्युत मुझे प्राप्त होता है।

जो पैदा हुआ है , उसके देह का त्याग तो ध्रुव है। निश्चित है। लेकिन जो मुझे तत्व से जान लेता है - उस मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता - पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ! माँ के गर्भ में फिर न जाना पड़े , पुनर्गभवास को टालने के लिए अनेक जन्मों तक , साधना -तपस्या करनी पड़ती है। वह केवल अवतार पुरुषों वरिष्ठ के दिव्य जीवन और जन्म का यथार्थ तत्व जान लेने से -मनुष्य का जीवन सार्थक हो जाता है। वह सफल हो जाता है , वह मुक्त हो जाता है। पुनर्जन्म नैति' मतलब वह जन्म-मरण के चक्कर से छूट जाता है। 

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।

स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति।।2.72।

।।2.72।। हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है।। गीता कहती है - ऋषियों को ब्रह्मनिर्वाण की प्राप्ति होती है। 

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।

छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।।5.25।।

।।5.25।। वे ऋषिगण मोक्ष को प्राप्त होते हैं - जिनके पाप नष्ट हो गये हैं, जो छिन्नसंशय, संयमी और भूतमात्र के हित में रमने वाले हैं।।

ऋषियों को ब्रह्मनिर्वाण की प्राप्ति हुई थी , उन्होंने बहुत तपस्या की थी। बहुत परिश्रम किये थे , बहुत साधना की थी। तब उनको ब्रह्म निर्वाण की प्राप्ति हुई थी। हम लोग न तो साधना कर सकते हैं , न तपस्या कर सकते हैं। माँ कहती है - कलयुग में तो और भी कठिन है। लेकिन केवल माँ के जीवन की घटना है। उनका जन्म , उनका कर्म सबकुछ दिव्य है। उनके जीवन को पढ़ें , सुनें तो भी हमलोगों को - "त्यक्त्वा  देहम्  पुनः  जन्म नः एति gets !" वो मुझे प्राप्त होता है- माम् एति सः अर्जुन ! ब्रह्म के साथ एकाकार हो जाता है। हम भगवान की , माँ जगदम्बा की बात पढ़ें , सुनें उस पर चिंतन -मनन करें। निदिध्यासन करें। तो हमारा यह मनुष्य जीवन - जो बहुत कम उम्र का है। Life is short ' स्वामीजी कहते हैं - इस छोटे से जीवन में हमें जिस महान कर्तव्य को पूरा करना है।  वो बड़ी आसानी से हो जाता है। यह आज हमने इन सभी वक्ताओं से सुना। तो माँ के जीवन की घटनाएं बहुत महत्वपूर्ण हैं। आप सब लोगों ने मुझे शांति के साथ सुना , मैं आपका अत्यंत आभारी हूँ धन्यवाद। नमस्कार ! (4 :12 :57

================

" Man is made up of three qualities — brutal, human, and godly. That which tends to increase the divinity in you is virtue, and that which tends to increase brutality in you is vice. You must kill the brutal nature and become human, that is, loving and charitable. You must transcend that too and become pure bliss. Sachchidânanda, fire without burning, wonderfully loving, but without the weakness of human love, without the feeling of misery." [Volume 6, p. 112/ Notes taken down in Madras - 1892-93 Swami Vivekananda.]

" मनुष्य तीन प्रकार के गुणों से निर्मित है,पाशविक, मानवीय और दैवी। जो तुममें दैवी गुण बढ़ाता है वह पूण्य है और जो तुममें पशुता बढ़ाता है वह पाप है।  तुमको पाशविक वृत्ति को समाप्त कर 'मनुष्य ' बनना चाहिये -अर्थात प्रेममय तथा उदार होना चाहिये। इससे भी उपर उठकर तुम्हें शुद्ध आनन्द, सच्चिदानन्द, अदाहक अग्नि के समान, अद्भुत प्रेममय किन्तु मानवीय प्रेम की दुर्बलता से रहित, दुःख की भावना से रहित (मनुष्य) बनना चाहिये।" 

===========

[ (19 अगस्त, 1883) परिच्छेद ~ 49, श्रीरामकृष्ण वचनामृत]

श्रीरामकृष्ण (मास्टर से)- देखो, ‘अष्टावक्र-संहिता’ में आत्मज्ञान की बातें हैं । आत्मज्ञानी कहते हैं, ‘सोऽहम् अर्थात् मैं ही वह परमात्मा हूँ । यह वेदान्तवादी संन्यासियों का मत है । गृहस्थ व्यक्तियों के लिए यह मत ठीक नहीं है । सब कुछ किया जा रहा है, फिर भी ‘मैं ही वह निष्क्रिय परमात्मा हूँ’ यह कैसे हो सकता है ? वेदान्तवादी कहते हैं कि आत्मा निर्लिप्त है । सुख-दुःख, पाप-पुण्य –ये सब आत्मा का कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते; परन्तु देहाभिमानी व्यक्तियों को कष्ट दे सकते हैं । धुआँ दीवार को मैला करता है, पर आकाश का कुछ नहीं कर सकता । कृष्णकिशोर ज्ञानियों की तरह कहा करता था कि मैं ‘ख’ अर्थात् आकाशवत् हूँ वह परम भक्त था; उसके मुँह से यह बात भले ही शोभा दे, पर सब के मुँह में यह शोभा नहीं देती

[या मति सा गतिर्भवेत्' जैसी बुद्धि , दृष्टि या मति वैसी गति ! ] 

 “पर ‘मैं मुक्त हूँ’ यह अभिमान बड़ा अच्छा है । ‘मैं मुक्त हूँ’ कहते रहने से कहनेवाला मुक्त हो जाता है। और ‘मैं बद्ध हूँ’ कहते रहने से कहनेवाला बद्ध ही रह जाता है । जो केवल यह कहता है कि ‘मैं पापी हूँ’ वही सचमुच गिरता है । कहते यही रहना चाहिए – ‘मैंने उनका नाम लिया है, अब मेरे पाप कहाँ ? मेरा बन्धन कैसा ?’

[শ্রীরামকৃষ্ণ (মাস্টারের প্রতি) — দেখ, অষ্টাবক্রসংহিতায় আত্মজ্ঞানের কথা আছে। আত্মজ্ঞানীরা বলে, ‘সোঽহম্‌’ অর্থাৎ “আমিই সেই পরমাত্মা।” এ-সব বেদান্তবাদী সন্ন্যাসীর মত, সংসারীর পক্ষে এ-মত ঠিক নয়। সবই করা যাচ্ছে, অথচ “আমিই সেই নিষ্ক্রিয় পরমাত্মা” — এ কিরূপে হতে পারে? বেদান্তবাদীরা বলে, আত্মা নির্লিপ্ত। সুখ-দুঃখ, পাপ-পুণ্য — এ-সব আত্মার কোনও অপকার করতে পারে না; তবে দেহাভিমানী লোকদের কষ্ট দিতে পারে। ধোঁয়া দেওয়াল ময়লা করে, আকাশের কিছু করতে পারে না। কৃষ্ণকিশোর জ্ঞানীদের মতো বলত, আমি ‘খ’ — অর্থাৎ আকাশবৎ। তা সে পরমভক্ত; তার মুখে ওকথা বরং সাজে, কিন্তু সকলের মুখে নয়।

“কিন্তু ‘আমি মুক্ত’ এ-অভিমান খুব ভাল। ‘আমি মুক্ত’ এ-কথা বলতে বলতে সে মুক্ত হয়ে যায়। আবার ‘আমি বদ্ধ’ ‘আমি বদ্ধ’ এ-কথা বলতে বলতে সে ব্যক্তি বদ্ধই হয়ে যায়। যে কেবল বলে ‘আমি পাপী’ ‘আমি পাপী’ সেই সালাই পড়ে যায়! বরং বলতে হয়, আমি তাঁর নাম করেছি, আমার পাপ কি, বন্ধন কি!”

"जिसमें विश्वास है उसमें सब है ; विश्वास नहीं तो कुछ भी नहीं। "-- श्रीरामकृष्ण  

=============

" सबसे पहले संकीर्ण धारणाओं का त्याग करो, और हर व्यक्ति में ईश्वर (आत्मा) का दर्शन करो - वे सब हाथों से काम कर रहे हैं , सब पैरों से चल रहे हैं , सब मुखों से भोजन कर रहे हैं ! हर व्यक्ति में वे निवास करते हैं , हर व्यक्ति में वे निवास करते हैं, सब मनों से वे सोचते हैं। वे (आत्मा-ईश्वर -इष्टदेव)  स्वतः प्रमाण हैं , वे हमसे भी हमारे अधिक निकटवर्ती हैं। इसे जानना ही धर्म है यही विश्वास है, प्रभु हमें यह विश्वास दें जब हम इस समग्र संसार में इस एकत्व का अनुभव करेंगे , तब हम अमर हो जायेंगे।' 

[Get rid, in the first place, of all these limited ideas and see God in every person — working through all hands, walking through all feet, and eating through every mouth. 'In every being He lives, through all minds He thinks. He is self-evident, nearer unto us than ourselves. To know this is religion, is faith, and may it please the Lord to give us this faith!' When we shall feel that oneness, we shall be immortal.]

भौतिक दृष्टि से देखने पर भी हम अमर हैं, सारे संसार के साथ एक हैं। जब तक इस संसार में एक व्यक्ति भी श्वास ले रहा है, मैं उसके भीतर जीवित हूँ। मैं यह संकीर्ण क्षुद्र व्यष्टि जीव नहीं हूँ, मैं समष्टिस्वरूप हूँ। मैं सर्वमय हूँ। 

[ We are physically immortal even, one with the universe. So long as there is one that breathes throughout the universe, I live in that one. I am not this limited little being, I am the universal.]  

अतएव उठो - यही श्रेष्ठ पूजा है। तुम स्वयं समग्र जगत के साथ अभिन्न हो। यही यथार्थ विनय है - घुटने टेककर 'मैं पापी हूँ, मैं पापी हूँ ' कहकर चिल्लाने का नाम विनय नहीं है।

[Stand up then; this is the highest worship. You are one with the universe. That only is humility — not crawling upon all fours and calling yourself a sinner. ] 

जब इस भेद-बुद्धि का आवरण छिन्न-विच्छिन्न हो जाता है , तभी सर्वोच्च उन्नति समझनी होगी। समस्त जगत का एकत्व -यही श्रेष्ठ धर्ममत है। मैं अमुक हूँ - व्यक्तिविशेष - यह बहुत संकीर्ण भाव है, सच्चे 'अहम' के लिए यह सत्य नहीं है। मैं विश्वव्यापक हूँ -इस धारणा पर प्रतिष्ठित हो जाओ -और श्रेष्ठ की उपासना सदा श्रेष्ठ रूप में करो; कारण , ईश्वर चैतन्य -स्वरुप है, आत्मस्वरूप है, चैतन्य और सत्य में ही उसकी उपासना करनी होगी। 

[The highest creed is Oneness. I am so-and-so is a limited idea, not true of the real "I". I am the universal; stand upon that and ever worship the Highest through the highest form, for God is Spirit and should be worshipped in spirit and in truth. ]

...जो कुछ ससीम (नश्वर) है, वह जड़ है। चैतन्य (आत्मा) ही केवल अनन्तस्वरुप (अविनाशी ,त्रिकाल अबाधित सत्य-भगवान) है। मानव चैतन्यस्वरूप है (कारण - सभी प्राणियों में केवल मनुष्य ही नित्य-अनित्य का विवेक कर सकता है) और इसलिए मानव भी अनन्त है, और केवल अनन्त ही अनन्त की उपासना में (विवेक-दर्शन का अभ्यास करने में) समर्थ है। हम अनन्त की उपासना करेंगे ; वही सर्वोच्च आध्यात्मिक उपासना है।     

[That which is limited is material. The Spirit alone is infinite. God is Spirit, is infinite; man is Spirit and, therefore, infinite, and the Infinite alone can worship the Infinite. We will worship the Infinite; that is the highest spiritual worship. ] 

इन सब भावों के माहात्म्य का अनुभव करना कितना कठिन है ! मैं स्वमत की प्रतिष्ठा के लिए दार्शनिक विचार करता हूँ , कितनी बातें करता हूँ; इतने में कोई मेरे प्रतिकूल घटना घटती है - मैं अनजाने ही क्रुद्ध हो उठता हूँ ; भूल जाता हूँ कि -इस विश्व में क्षुद्र ससीम मेरे इस (नश्वर कच्चा 'अहम') अस्तित्व को छोड़कर और भी कुछ है। (मेरा एक सच्चा 'अहम'  भी है।) मैं कहना भूल जाता हूँ, " मैं चैतन्य स्वरुप हूँ - इस अकिंचितकर बात से मेरा क्या बिगड़ता है - मैं तो चैतन्यस्वरुप हूँ। ' मैं भूल जाता हूँ कि यह सब मेरी ही लीला है; मैं ईश्वर (आत्मा या इष्टदेव) को भूल जाता हूँ, मैं मुक्ति की बात भी भूल जाता हूँ।  

[The grandeur of realising these ideas, how difficult it is! I theorise, talk, philosophize; and the next moment something comes against me, and I unconsciously become angry, I forget there is anything in the universe but this little limited self, I forget to say, "I am the Spirit, what is this trifle to me? I am the Spirit." I forget it is all myself playing, I forget God, I forget freedom.                         

 ऋषियों ने बार बार घोषणा की है -क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति' -    -मुक्ति का पथ उस्तरे की धार की भाँति तीक्ष्ण , दीर्घ और कठिन है - इसका अतिक्रमण करना कठिन है। किन्तु इन दुर्बलताओं और विफलताओं से अपने को बँधने न दो। उपनिषदों की घोषणा है -  उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। - 'उठो , जागो , जब तक लक्ष्य पर नहीं पहुँचते , रुको नहीं। यद्यपि वह पथ उस्तरे की धार की तरह तीक्ष्ण है - यद्यपि वह पथ दीर्घ है , दूरवर्ती और कठिन है , किन्तु हम उस पथ का अवश्य ही अतिक्रमण करेंगे। 

[Sharp as the blade of a razor, long and difficult and hard to cross, is the way to freedom. The sages have declared this again and again. Yet do not let these weaknesses and failures bind you. The Upanishads have declared, "Arise ! Awake ! and stop not until the goal is reached." We will then certainly cross the path, sharp as it is like the razor, and long and distant and difficult though it be.]  

मनुष्य देवताओं और असुरों का प्रभु होता है। हमारे दुःखों के लिए स्वयं हमारे सिवा और कोई उत्तरदायी नहीं है। क्या तुम समझते हो कि यदि मनुष्य अमृत की चेष्टा करे, तो उसे बदले में सिर्फ विष का प्याला ही मिलेगा ? नहीं , अमृत है और है उसकी प्राप्ति के निमित्त प्रयत्नशील प्रत्येक मनुष्य के लिए। प्रभु ने स्वयं कहा है - 

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। 

अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ॥ 66 ॥

सर्वधर्मान - इन सभी धर्मों का, सभी उद्यमों का परित्याग कर एक मेरी शरण में आ। मैं तुझे समस्त पापों के पार लगा दूँगा। भय न कर।  हम जगत के सभी शास्त्रों में इसी वाणी की घोषणा सुनते हैं।

 [Man becomes the master of gods and demons. No one is to blame for our miseries but ourselves. Do you think there is only a dark cup of poison if man goes to look for nectar? The nectar is there and is for every man who strives to reach it. The Lord Himself tells us, "Give up all these paths and struggles. Do thou take refuge in Me. I will take thee to the other shore, be not afraid." We hear that from all the scriptures of the world that come to us.] 

 यह उपदेश ही हमसे यह कहने की शिक्षा देती है - 'स्वर्गलोक के सदृश इस पृथ्वी पर भी तेरी इच्छा ही पूर्ण हो।' कारण, 'सर्वत्र तेरा ही राज्य है, तेरी ही शक्ति और तेरी ही महिमा है। ' पर इसी विश्वास में प्रतिष्ठित हो जाना- कठिन, बड़ी कठिन बात है। अभी कहा - " हे प्रभु , मैंने अभी तेरी शरण ली - प्रेममय ! तेरे प्रेम पर सर्वस्व समर्पण किया - तेरी वेदी पर , जो कुछ भला है , जो कुछ भी पुण्यमय है, सभी कुछ स्थापन किया। मेरे पाप-ताप , भले-बुरे कार्य सब कुछ तेरे ही चरणों पर मैं समर्पण करता हूँ - तू सब ग्रहण कर - मैं अब तुझे कभी न भूलूँगा। " अभी कहा  'तेरी इच्छा पूर्ण हो ! ' पर दूसरे ही क्षण जब एक परीक्षा में पड़ गया -तब मैं क्रोध से उछल पड़ा।

[The same voice teaches us to say, "Thy will be done upon earth, as it is in heaven," for "Thine is the kingdom and the power and the glory." It is difficult, all very difficult. I say to myself, "This moment I will take refuge in Thee, O Lord. Unto Thy love I will sacrifice all, and on Thine altar I will place all that is good and virtuous. My sins, my sorrows, my actions, good and evil, I will offer unto Thee; do Thou take them and I will never forget." One moment I say, "Thy will be done," and the next moment something comes to try me and I spring up in a rage. ] 

 सब धर्मों का एक ही लक्ष्य है ,परन्तु विभिन्न आचार्य विभिन्न भाषाओँ का व्यवहार करते रहते हैं। सबकी चेष्टा इस झूठे 'अहम'  या कच्चे 'अहम' का विनाश करना है। जिसके फलस्वरूप इस सच्चे 'अहम' (Real-I) का, एकमात्र इस प्रभु का ही राज्य होगा। हिब्रू धर्मशास्त्रों में कहा गया है - ' मैं तेरा प्रभु , तेरा ईश्वर एक ईर्ष्यालु ईश्वर हूँ। मेरे सिवा तू किसी अन्य ईश्वर को नहीं रख सकता। ' केवल ईश्वर ही रह जाना चाहिए।  हमें कहना होगा , 'मैं नहीं , तू।' और उस प्रभु के सिवा हमें सर्वस्व त्यागना होगा; केवल वे ही राज्य करेंगे। मानों हमने खूब कठोर साधना की - परन्तु दूसरे ही मुहूर्त में हमारा पैर फिसल गया- और तब हमने माँ की ओर हाथ बढ़ाने की चेष्टा की -समझ गया कि अपनी चेष्टा से हम खड़े नहीं रह सकते। जीवन अनन्त है, जिसका एक अध्याय है - 'तेरी इच्छा पूर्ण हो '! यदि हम उस जीवन-ग्रन्थ के सब अध्यायों का मर्म ग्रहण न करें , तो समुदय जीवन का अनुभव नहीं कर सकते। 

[The goal of all religions is the same, but the language of the teachers differs. The attempt is to kill the false "I", so that the real "I", the Lord, will reign. "I the Lord thy God am a jealous God. Thou shalt have no other gods before me," say the Hebrew scriptures. God must be there all alone. We must say, "Not I, but Thou," and then we should give up everything but the Lord. He, and He alone, should reign. Perhaps we struggle hard, and yet the next moment our feet slip, and then we try to stretch out our hands to Mother. We find we cannot stand alone. Life is infinite, one chapter of which is, "Thy will be done," and unless we realise all the chapters we cannot realise the whole. ] 

मुख से कहते हैं - ' तेरी इच्छा पूर्ण हो '- लेकिन विश्वासघाती मन प्रतिमुहूर्त इन भावों का विरोध करता है, परन्तु हमें यदि इस कच्चे 'अहम ' को जीतना हो , तो बारम्बार इसी बात की (इसी जीवन-मुक्ति सूत्र की) आवृत्ति करनी होगी। हम एक विश्वासघाती की सेवा करें और परित्राण पा जायें - यह कभी नहीं हो सकता। सबका परित्राण है , केवल विश्वासघाती का परित्राण नहीं है - और हम विश्वासघाती के रूप में एकदम निन्दित हैं।जब हम अपनी आत्मा की ध्वनि की अवज्ञा करते हैं , तब हम अपनी आत्मा के विरुद्ध विश्वासघात करते हैं , हम उस जगतजननी की महिमा के विरुद्ध विश्वासघात करते हैं। अतएव चाहे जो कुछ भी हो , हमें अपने तन और मन को उस परम इच्छामयी की इच्छा में मिला देना पड़ेगा। 

"Thy will be done" — every moment the traitor mind rebels against it, yet it must be said, again and again, if we are to conquer the lower self. We cannot serve a traitor and yet be saved. There is salvation for all except the traitor and we stand condemned as traitors, traitors against our own selves, against the majesty of Mother, when we refuse to obey the voice of our higher Self. Come what will, we must give our bodies and minds up to the Supreme Will.

किसी हिन्दू विद्वान् ने ठीक कहा कि यदि मनुष्य - 'तेरी इच्छा पूर्ण हो ', यह बात दो बार उच्चारण करे , तो वह पाप करता है। 'तेरी इच्छा पूर्ण हो '- बस और क्या प्रयोजन है ? इसे दो बार कहने की आवश्यकता ही क्या है ? जो अच्छा है , वह तो अच्छा है ही। एक बार जब कह दिया 'तेरी इच्छा पूर्ण हो ', तब तो वह बात लौटाई नहीं जा सकती। 'स्वर्ग के भाँति मृत्युलोक में भी तेरी इच्छा पूर्ण हो , क्योंकि राज्य तो तेरा ही है , शक्ति और महिमा भी सदा तेरी ही है। ' " [धर्म क्या है ? खंड 2,प.300-303]

 Well has it been said by the Hindu philosopher, "If man says twice, 'Thy will be done,' he commits sin." "Thy will be done," what more is needed, why say it twice? What is good is good. No more shall we take it back. "Thy will be done on earth as it is in heaven, for Thine is the kingdom and the power and the glory for evermore."{ What Is Religion? (Volume 1)

===========

चौथे पूर्व वक्ता का सम्बोधन - 

गृहस्थ जीवन का क्या आदर्श है ? 

 ब्रह्मनिष्ठो  गृहस्थ: स्यात्  ब्रह्मज्ञानपरायण:।

यत यत कर्म प्रकुर्वीत तद् ब्रम्हणि समर्पयेत्।।

      गृहस्थ को ब्रह्मनिष्ठ होना चाहिए तथा ब्रह्म ज्ञान का लाभ ही उसके जीवन का चरम लक्ष्य होना चाहिए। परंतु फिर भी उसे निरंतर अपने सब कर्म करते रहना चाहिए - अपने कर्तव्यों का पालन करते रहना चाहिए, और अपने समस्त कर्मों के फलों को ईश्वर के चरणों में समर्पित करना  चाहिए।  

        कर्म करके कर्मफल की आकांक्षा न करना, किसी मनुष्य की सहायता करके उसे किसी प्रकार की कृतज्ञता की आशा न रखना, कोई सत्कर्म करके भी इस बात की ओर नजर तक न देना कि वह हमें यश और कीर्ति देगा अथवा नहीं, इस संसार में सबसे कठिन बात है।

  संसार जब तारीफ करने लगता है, तब एक निहायत बुजदिल भी बहादुर बन जाता है। समाज के समर्थन तथा प्रशंसा से एक मूर्ख भी वीरोचित कार्य कर सकता है; परंतु अपने आसपास के लोगों की निंदा- स्तुति की बिल्कुल परवाह न करते हुए सर्वदा सत्य कार्य में लगे रहना वास्तव में सबसे बड़ा त्याग है। [गृहस्थ हो या संन्यासी - "हरेक अपने क्षेत्र में महान है। " (खण्ड -३ /१७) में] 

====================

[ खंड?? विवेक-जीवन ब्लॉग - July 16, 2013धर्म क्या है ? [What Is Religion? (Vol-1, p.333एक लाख लोगों में से कोई एक व्यक्ति भी समझ ले तो बहुत है ! 1.कैम्प नोट 2005 सरीसा आश्रम| रनेन दा का शरीर त्याग आज - 27 जनवरी, 2026 को 1. 30 pm हुआ / प्रबाल मोहन्ती का फोन - 3 pm./दीपक दा का फोन 3:30 pm/ गजानन्द पाठक का फोन महामण्डल फेस-बुक में -4:14 pm] 

=================






              

मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

⚜️️🔱⚜️ स्वामी विवेकानंद जयंती (Swami Vivekananda Jayanti) 🔱⚜️


स्वामी विवेकानंद जयंती (Swami Vivekananda Jayanti) :  

>>>युवाओं में देश का शक्तिपुंज देखने वाले संत थे स्‍वामी विवेकानंद। 

 आज के युवा समाज को जिसमें देश का भविष्य निहित है और जिसमें जागरण के चिन्ह दिखाई दे रहे हैं। आज के युवाओं को अपने जीवन का एक उद्देश्य (गौण उद्देश्य और चरम उद्देश्य) ढूंढ़ लेना चाहिए।

युवा शक्ति को राष्ट्र की सबसे बड़ी धरोहर मानने वाले शायद भारत के पहले संत थे स्वामी विवेकानंद। उनका कहना था कि आज के युवा समाज को, जिसमें देश का भविष्य निहित है और जिसमें जागरण के चिन्ह दिखाई दे रहे हैं, उन्हें अपने जीवन का एक उद्देश्य ढूंढ़ लेना चाहिए। हमें ऐसे प्रयास करना चाहिए जिससे हमारे अंदर की जगी हुई प्रेरणा और उत्साह सही मार्ग पर चले। नहीं तो युवा शक्ति का अपव्यय और दुरुपयोग हो सकता है। युवा शक्ति को उठकर जागना होगा और राष्ट्र कल्याण के लिए संघर्ष करना होगा। तभी भारत का कल्याण संभव है।

स्वामी विवेकानंद युवाओं के लिए आज भी एक प्रेरणा के स्रोत हैं। उन्होंने आज से 150 वर्ष पहले ऐसी बातें कही थीं जो आज भी प्रासंगिक हैं। युवा जागृति के लिए उन्होंने एक मूल मंत्र दिया था, उठो जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाए। उनके इस संदेश में गौर करने की बात है कि स्वामी विवेकानंद ने पहले उठने का संदेश दिया है। इसके बाद फिर जागने का, इसका अर्थ है कि हमें जीत के लिए पहले खुद प्रयत्न करना होगा। इसके बाद ही जाग कर समस्या के उपाय खोजने होंगे।

उन्होंने युवाओं को ललकारते हुए कहा था-YOU ARE THE CREATOR OF YOUR OWN DESTINY. कि हर युवा के हाथों में उसका भविष्य है। उन्हें अपने हाथों से अपना भविष्य गढ़ना होगा। 

स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि 'गतस्य शोचना नास्ति- सारा भविष्य तुम्हारे सामने पड़ा हुआ है।'  तुम सदैव ये बात स्मरण रखो की तुम्हारा प्रत्येक विचार, प्रत्येक कार्य संचित रहेगा। जिस प्रकार तुम्हारे असत विचार और असत कार्य तुम्हारे सामने कूद पड़ने को तैयार हैं। उसी प्रकार तुम्हारे सद्कार्य और सद्विचार हजारों देवी-देवता की शक्ति लेकर सर्वदा तुम्हारी रक्षा के लिए तैयार हैं।

 एकाग्रता  के लिए जरूरी है ध्यान (मनःसंयम)  

स्वामी जी ने बताया था कि पढ़ने के लिए युवाओं में एकाग्रता जरूरी है। एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान। ध्यान से ही हम इंद्रियों पर संयम रखकर एकाग्रता प्राप्त कर सकते हैं। विवेकानंद खुद भी प्रतिदिन ध्यान करते थे। वो कहते थे कि ध्यान के बल से ही वो जो कुछ भी एक बार पढ़ते हैं उसे याद रख पाते हैं। इसके साथ ही वो शिक्षा को एक अलग आयाम से देखते थे। उन्होंने कहा कि जो शिक्षा साधारण व्यक्ति को जीवन-संग्राम में समर्थ नहीं बना सकती, जो मनुष्य में चरित्र बल, परहित भावना तथा सिंह के समान साहस नहीं ला सकती, वह भी कोई शिक्षा है। जिस शिक्षा के द्वारा मनुष्य जीवन में आदर्श के साथ अपने पैरों पर खड़ा रह सके वो शिक्षा है।

[प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति (पातंजल अष्टांग योग दर्शन) के अनुसार मन की शक्ति को विकसित करने हेतु एकाग्रता अनिवार्य है और एकाग्रता के लिए जरुरी है- 'ध्यान' अर्थात 'मनःसंयोग'। इस मनःसंयम के 8 चरण इस प्रकार हैं :यम-नियम -आसन -प्राणायाम -प्रत्याहार -धारणा -ध्यान और समाधि। इसमें से विद्यार्थियों के लिए 5 चरणों का अभ्यास यथेष्ट है। यम और नियम का अभ्यास 24 X 7 तथा आसन-प्रत्याहार -धारणा का अभ्यास दिन भर में 2 बार -प्रातः और संध्या में। प्राणायाम-ध्यान और समाधि को  केवल पुस्तक पढ़कर ही नहीं  किसी अनुभवी योगाचार्य से ही सीखना जरुरी है।   

धर्म -अर्थात 'सेवाधर्म' का पहला साधन शरीर ही है

विवेकानंद का खेल से विशेष प्रेम था। उनका मानना था कि खेल से शरीर को बल मिलता है। शरीर में शक्ति का प्रवाह को हमेशा सही दिशा देने की जरूरत हैं। उन्होंने कहा था कि यह बड़ा सत्य है कि बल ही जीवन है और दुर्बलता मरण। बल ही अन्नत सुख है। वो हर युवक को एक बात जरूर कहते थे कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का निवास होता है। दूसरों की शिव-ज्ञान से जीव सेवा ही ईश्वर की सेवा है। समाज में उन्होंने लोगों को हमेशा दूसरों की सेवा के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने कहा कि परहित सेवा ही ईश्वर की सेवा है। दूसरों के प्रति हमारा कर्तव्य है कि सहायता और संसार का भला करना। कई लोग ये पूछते हैं कि वो संसार का भला क्यों करें?  ऐसे में मैं उनसे कहना चाहता हूं कि ये देखने में लगता है कि हम संसार का उपकार कर रहे हैं। मगर असल में हम हमारा ही उपकार करते हैं। ये (सेवाधर्म) हमें पवित्र और पूर्ण (चरित्रवान मनुष्य) होने का अवसर देता है। स्वामी विवेकानंद के द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन में आज भी इस बात का अनुशरण किया जाता है।

स्वामी विवेकानंद की कुछ प्रमुख उक्तियां

1.उठो और जागो और तब तक रुको नहीं जब तक कि तुम अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लेते।

2.ज्ञान (आत्मज्ञान) स्वयं में वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है।

3.जब तक जीना, तब तक सीखना, अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है।

4.पवित्रता, धैर्य और उद्यम- ये तीनों गुण मैं एक साथ चाहता हूं।

5.लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दा, लक्ष्य तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो, तुम्हारा देहात आज हो या युग में, तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो

6.जिस समय जिस काम के लिए प्रतिज्ञा करो, ठीक उसी समय पर उसे करना ही चाहिए, नहीं तो लोगों का विश्वास उठ जाता है।

7.जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते तब तक आप भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते।

8.एक समय में एक काम करो , और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमें डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ। जितना बड़ा संघर्ष होगा जीत उतनी ही शानदार होगी।

=========

विवेक-जीवन ब्लॉग : September 12, 2012 🔱🔆🙏युवा समस्या और स्वामी विवेकानन्द का मार्गदर्शन 🔱🔆🙏'मनुष्य बनने के लिए श्रद्धा अनिवार्य है !' (যুব সমস্যা ও স্বামী বিবেকানন্দ) 🔱🔆🙏 [ SVHS- 3.4 स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना : खण्ड 3 -स्वामी विवेकानन्द और युवा समाज ]*

[Kali is none other than Brahman. That which is called Brahman is really Kali. she is the primal energy .Whem that energy remains inactive , I call it brahman , and when it creates, preserves or destroys , I call it shakti or Kali . What you call Brahman I call Kali ."

 Sri Ramkrishna ~ जम्मू RKM 7.12.2025] 

ठाकुर देव का अद्वैत सिद्धान्त - "काली (ब्रह्म)  सत्यं जगत मिथ्या !" 

[ (19 अक्टूबर, 1884) श्रीरामकृष्ण वचनामृत-9 ] 

श्रीरामकृष्ण - जो ब्रह्म है, वही काली भी हैं । जब निष्क्रिय हैं, तब उन्हें ब्रह्म कहते हैं । जब सृष्टि, स्थिति, प्रलय, यह सब काम करते हैं, तब उन्हें शक्ति  कहते हैं। स्थिर (निश्चल-Still) जल से ब्रह्म की उपमा हो सकती है । वही पानी जब हिलता-डुलता है (The same water, moving in waves),तब वह शक्ति की - काली की उपमा है। 

MASTER: "That which is Brahman is also Kali, the Mother, the Primal Energy. When inactive It is called Brahman. Again, when creating, preserving, and destroying, It is called Sakti. Still water is an illustration of Brahman. The same water, moving in waves, may be compared to Sakti, Kali.

[শ্রীরামকৃষ্ণ — যিনি ব্রহ্ম, তিনি কালী (মা আদ্যাশক্তি)। যখন নিষ্ক্রিয়, তাঁকে ব্রহ্ম বলে কই। যখন সৃষ্টি, স্থিতি, প্রলয় — এই সব কাজ করেন, তাঁকে শক্তি বলে কই। স্থির জল ব্রহ্মের উপমা। জল হেলচে দুলচে, শক্তি বা কালীর উপমা। 

 [ঈশ্বরই বস্তু আর সব অবস্তু। তাঁকে লাভ হলে আবার বোধ হয়, তিনিই কর্তা আমরা অকর্তা। (15 जून ,1884) श्रीरामकृष्ण वचनामृत](6) ⚜️️🔱जीवन का उद्देश्य - कर्म अथवा ईश्वरलाभ ? ⚜️️🔱 " ঈশ্বরই বস্তু আর সব অবস্তু। "एकमात्र ईश्वर वस्तु है, और सब अवस्तु ।God alone is real and all else unreal.

P.M. Modi Wonderful Interview with Rajat Sharma - Sunday 7-12-2025 / Work of Swami Vivekananda and Maharshi Arvind till 2047     

"मैं दीया हूँ,मेरी दुश्मनी अंधेरे से है। 

हवा तो बेवजह ही मेरे ख़िलाफ़ है ! 

हवा से कह दो- कि खुद को आज़मा के दिखाए; 

बहुत चिराग बुझाती है, एक जला के दिखाए ! "


আমার চেতনা চৈতন্য করে দে মা চৈতন্যময়ী /Amar Chetana Chaitanya Kore | Devotional Songs | Pannalal Bhattacharya | Audio

अद्वैत तत्व श्रीरामकृष्ण देव की प्रार्थना -

ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके  |

   शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते ||

(ॐ सर्व मंगल मांगल्ये= सभी मंगलों में मंगलमयी/ शिवे= कल्याणकारी/ सर्व अर्थ साधिके= सभी मनोरथों को सिद्ध करने वाली/ शरण्ये = शरणागत वत्सला , शरण ग्रहण करने योग्य/ त्रयम्बके= तीन नेत्रों वाली/ गौरी= शिव पत्नी/ नारायणी= विष्णु की पत्नी/ नमः अस्तु ते = तुम्हे नमस्कार हैं। ) 

सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी, कल्याण करने वाली, सब के मनोरथ को पूरा करने वाली, तुम्हीं शरण ग्रहण करने योग्य हो, तीन नेत्रों वाली यानी भूत भविष्य वर्तमान को प्रत्यक्ष देखने वाली हो, तुम्ही शिव पत्नी, तुम्ही नारायण पत्नी अर्थात भगवान के सभी स्वरूपों के साथ तुम्हीं जुडी हो, आप को नमस्कार है। 

[साभार ૐ~Sri Lalita Tripura Sundari~ૐ's post]

- विवेकदर्शनाभ्यासेन विवेकस्रोत उद्धाटयत " इसे पढने से ऐसा प्रतीत होता है, मानो  व्यासदेव हजारों साल पहले जान चुके थे, कि 'नित्य-अनित्य विवेक' ही सभी के ह्रदय में विद्यमान अन्तर्यामी गुरु है ! तथा एक दिन  (१२ जनवरी १८६३) को वे स्वयं ही स्वामी विवेकानन्द के रूप में आविर्भूत होंगे; तब उनके मूर्त रूप पर मन को धारण करने से ही ' विवेक-स्रोत ' उदघाटित हो जायेगा ! (विवेक-जीवन ब्लॉग : Monday, January 17, 2011/ विवेकानन्द का दर्शन करने के अभ्यास से - ' विवेक स्रोत ' उदघाटित होता है !)

{ तो निष्कर्ष रूप से ' ब्रह्म और जगत' [सत्यम और मिथ्या  या "Equation between The Absolute and Manifestation "(अभिव्यक्ति) 'परमसत्ता और स्वरुप- प्रकाश' या ब्रह्म और शक्ति के बीच समीकरण क्या निकला ? इस 'ब्रह्म और जगत' के बीच समीकरण के बारे में हमारे ऋषि या उपनिषद क्या कहते हैं, यह उन्हीं की वाणी में समझना अत्यंत आवश्यक है। 

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।

  पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

                                              (-वृहदारण्यक उपनिषद/ ईशावास्योपनिषद)

अर्थ : अर्थात वह सच्चिदानंदघन परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत भी उस परब्रह्म से पूर्ण ही है, क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम (अवतार वरिष्ठ) से ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है। उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है। [अनंत -अनंत = अनंत / coordinate geometry/अर्थात जगत ब्रह्म का परिणाम नहीं विवर्त है। 

    यह जगत सत्य जैसा विद्यमान या प्रतीत होते हुए भी ब्रह्म के समान शाश्वत और पूर्ण (The Absolute-परम सत्य) नहीं है। यह जगत-ब्रह्माण्ड एक मिथ्या वस्तु का वास्तविक जैसा अनुभव है, पर अंतिम सत्य नहीं, जैसे रस्सी को साँप समझना। या मृगमरीचिका में जल का एक बून्द भी न होना। अथवा सिनेमा के पर्दे पर चल रहे महाभारत फिल्म के श्रीकृष्ण और अर्जुन को हाथ से पकड़ने की कोशिश !

 इस कथन के मुख्य बिन्दु Key points of this statement: 

1.  ब्रह्म सत्यं: ब्रह्म ही एकमात्र परम, शाश्वत और अपरिवर्तनीय सत्य है। जगत मिथ्या/विवर्त: जगत सत्य (पूर्ण) नहीं है, बल्कि एक आभास (मिथ्या या विवर्त) है। यह ब्रह्म से उत्पन्न होता है, लेकिन ब्रह्म जैसा पूर्ण और नित्य नहीं है।

2.माया का सिद्धांत: जगत माया के कारण ब्रह्म पर आरोपित होता है। यह दिखता है, महसूस होता है, पर इसकी अपनी स्वतंत्र सत्ता नहीं है; यह ब्रह्म के अधीन है।

3. विवर्त का अर्थ: 'विवर्त' का मतलब होता है जहाँ कोई वस्तु किसी और वस्तु के रूप में दिखाई दे, जबकि वह वास्तव में वह न हो (जैसे सोने के गहने सोने के ही होते हैं, पर दिखते अलग-अलग हैं, वैसे ही जगत ब्रह्म का ही प्रकटीकरण है, पर पूर्ण ब्रह्म नहीं)। 

4. निष्कर्ष: यह कथन हमें यह समझने में मदद करता है कि हमारा यह संसार, जिसमें हम रहते हैं, वह अंतिम सत्य नहीं है। यह जगत ईश्वर (आत्मा, ब्रह्म) की ही एक अभिव्यक्ति है, जिसे हम अपनी अज्ञानता (अविद्या-अस्मिता M/F देहाध्यास -राग-द्वेष -अभिनिवेश) के कारण अलग-अलग और 'मिथ्या' (अस्थायी या मायावी) समझते हैं, लेकिन ज्ञान (आत्मज्ञान) होने पर यह बोध होता है कि सब कुछ एक ही परम तत्व (आत्मा, ब्रह्म या ईश्वर) का प्रकटीकरण है 

[(यह ऐसे ही है । जैसे जागने पर " स्वप्नकाल के द्रष्टा " और " दृश्य " का लोप हो जाता है । इसीलिए इसको मिथ्या कहा जाता है।  यह रस्सी को सांप समझने जैसी भ्रांति के समान है, मृगमरीचिका के समान है, जहाँ सत्य से परे कुछ और दिखाई देता है। इसीलिए सन्त तुलसी दास जी कहते हैं -* गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥ तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ॥2॥ भावार्थ : इंद्रियों के विषयों को और जहाँ तक मन जाता है, हे भाई! उन सबको माया जानना। उसके भी एक विद्या और दूसरी अविद्या, इन दोनों भेदों को तुम सुनो-॥2॥ (अरण्यकाण्ड)]

(जैसे पर्दे पर गंगा नदी बह रही है , किन्तु हम उससे एक ग्लास पानी भी नहीं ले सकते !) (जो स्त्री-पुरुष की भेद-दृष्टि से परे 'मनुष्य (माँ) बनना और बनाना ' चाहते हों, उनके लिए)

=============

- विवेकदर्शनाभ्यासेन विवेकस्रोत उद्धाटयत " इसे पढने से ऐसा प्रतीत होता है, मानो  व्यासदेव हजारों साल पहले जान चुके थे, कि 'नित्य-अनित्य विवेक' ही सभी के ह्रदय में विद्यमान अन्तर्यामी गुरु है ! तथा एक दिन  (१२ जनवरी १८६३) को वे स्वयं ही स्वामी विवेकानन्द के रूप में आविर्भूत होंगे; तब उनके मूर्त रूप पर मन को धारण करने से ही ' विवेक-स्रोत ' उदघाटित हो जायेगा ! (विवेक-जीवन ब्लॉग : Monday, January 17, 2011/ विवेकानन्द का दर्शन करने के अभ्यास से - ' विवेक स्रोत ' उदघाटित होता है !)

{ तो निष्कर्ष रूप से ' ब्रह्म और जगत' [सत्यम और मिथ्या  या "Equation between The Absolute and Manifestation "(अभिव्यक्ति) 'परमसत्ता और स्वरुप- प्रकाश' या ब्रह्म और शक्ति के बीच समीकरण क्या निकला ? इस 'ब्रह्म और जगत' के बीच समीकरण के बारे में हमारे ऋषि या उपनिषद क्या कहते हैं, यह उन्हीं की वाणी में समझना अत्यंत आवश्यक है। 

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।

  पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

                                              (-वृहदारण्यक उपनिषद/ ईशावास्योपनिषद)

अर्थ : अर्थात वह सच्चिदानंदघन परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत भी उस परब्रह्म से पूर्ण ही है, क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम (अवतार वरिष्ठ) से ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है। उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है। [अनंत -अनंत = अनंत / coordinate geometry/अर्थात जगत ब्रह्म का परिणाम नहीं विवर्त है। 

    यह जगत सत्य जैसा विद्यमान या प्रतीत होते हुए भी ब्रह्म के समान शाश्वत और पूर्ण (The Absolute-परम सत्य) नहीं है। यह जगत-ब्रह्माण्ड एक मिथ्या वस्तु का वास्तविक जैसा अनुभव है, पर अंतिम सत्य नहीं, जैसे रस्सी को साँप समझना। या मृगमरीचिका में जल का एक बून्द भी न होना। अथवा सिनेमा के पर्दे पर चल रहे महाभारत फिल्म के श्रीकृष्ण और अर्जुन को हाथ से पकड़ने की कोशिश !

 इस कथन के मुख्य बिन्दु Key points of this statement: 

1.  ब्रह्म सत्यं: ब्रह्म ही एकमात्र परम, शाश्वत और अपरिवर्तनीय सत्य है। जगत मिथ्या/विवर्त: जगत सत्य (पूर्ण) नहीं है, बल्कि एक आभास (मिथ्या या विवर्त) है। यह ब्रह्म से उत्पन्न होता है, लेकिन ब्रह्म जैसा पूर्ण और नित्य नहीं है।

2.माया का सिद्धांत: जगत माया के कारण ब्रह्म पर आरोपित होता है। यह दिखता है, महसूस होता है, पर इसकी अपनी स्वतंत्र सत्ता नहीं है; यह ब्रह्म के अधीन है।

3. विवर्त का अर्थ: 'विवर्त' का मतलब होता है जहाँ कोई वस्तु किसी और वस्तु के रूप में दिखाई दे, जबकि वह वास्तव में वह न हो (जैसे सोने के गहने सोने के ही होते हैं, पर दिखते अलग-अलग हैं, वैसे ही जगत ब्रह्म का ही प्रकटीकरण है, पर पूर्ण ब्रह्म नहीं)। 

4. निष्कर्ष: यह कथन हमें यह समझने में मदद करता है कि हमारा यह संसार, जिसमें हम रहते हैं, वह अंतिम सत्य नहीं है। यह जगत ईश्वर (आत्मा, ब्रह्म) की ही एक अभिव्यक्ति है, जिसे हम अपनी अज्ञानता (अविद्या-अस्मिता M/F देहाध्यास -राग-द्वेष -अभिनिवेश) के कारण अलग-अलग और 'मिथ्या' (अस्थायी या मायावी) समझते हैं, लेकिन ज्ञान (आत्मज्ञान) होने पर यह बोध होता है कि सब कुछ एक ही परम तत्व (आत्मा, ब्रह्म या ईश्वर) का प्रकटीकरण है 

[(यह ऐसे ही है । जैसे जागने पर " स्वप्नकाल के द्रष्टा " और " दृश्य " का लोप हो जाता है । इसीलिए इसको मिथ्या कहा जाता है।  यह रस्सी को सांप समझने जैसी भ्रांति के समान है, मृगमरीचिका के समान है, जहाँ सत्य से परे कुछ और दिखाई देता है। इसीलिए सन्त तुलसी दास जी कहते हैं -* गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥ तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ॥2॥ भावार्थ : इंद्रियों के विषयों को और जहाँ तक मन जाता है, हे भाई! उन सबको माया जानना। उसके भी एक विद्या और दूसरी अविद्या, इन दोनों भेदों को तुम सुनो-॥2॥ (अरण्यकाण्ड)]

(जैसे पर्दे पर गंगा नदी बह रही है , किन्तु हम उससे एक ग्लास पानी भी नहीं ले सकते !) (जो स्त्री-पुरुष की भेद-दृष्टि से परे 'मनुष्य (माँ) बनना और बनाना ' चाहते हों, उनके लिए)

=============

Sri Sarada Devi

(1853 - 1920)

Endearingly known as ‘Holy Mother’, Sri Sarada Devi, the spiritual consort of Sri Ramakrishna, was born on 22 December 1853 in a poor Brahmin family in Jayrambati, a village adjoining Kamarpukur in West Bengal. Her father, Ramachandra Mukhopadhyay, was a pious and kind-hearted person, and her mother, Shyama Sundari Devi, was a loving and hard-working woman.

Marriage

As a child Sarada was devoted to God, and spent most of her time helping her mother in various household chores like caring for younger children, looking after cattle and carrying food to her father and others engaged in work in the field. She had no formal schooling, but managed to learn the Bengali alphabet. When she was about six years old, she was married to Sri Ramakrishna, according to the custom prevalent in India in those days. However, after the event, she continued to live with her parents, while Sri Ramakrishna lived a God-intoxicated life at Dakshineshwar.

Visit to Dakshineshwar

At the age of eighteen she walked all the way to Dakshineshwar to meet her husband. Sri Ramakrishna, who had immersed himself in the intense practice of several spiritual disciplines for more than twelve years, had reached the highest state of realization in which he saw God in all beings. He received Sarada Devi with great affection, and allowed her to stay with him. He taught her how to lead a spiritual life while discharging her household duties. They led absolutely pure lives, and Sarada Devi served Sri Ramakrishna as his devoted wife and disciple, while remaining a virgin nun and following the spiritual path.

Life at Dakshineshwar

Sri Ramakrishna looked upon Sarada Devi as a special manifestation of Divine Mother of the universe. In 1872, on the night of the Phala-harini-Kali-puja, he ritualistically worshipped Sarada Devi as the Divine Mother, thereby awakening universal Motherhood latent in her. When disciples began to gather around Sri Ramakrishna, Sarada Devi learned to look upon them as her own children. The room in which she stayed at Dakshineshwar was too small to live in and had hardly any amenities; and on many days she did not get the opportunity of meeting Sri Ramakrishna. But she bore all difficulties silently and lived in contentment and peace, serving the increasing number of devotees who came to see Sri Ramakrishna.

Worship by Sri Ramakrishna

In 1872, his wife Sarada, now nineteen years old, came from the village to meet him. He received her cordially, and taught her how to attend to household duties and at the same time lead an intensely spiritual life. One night he worshipped her as the Divine Mother in his room at the Dakshineswar temple. Although Sarada continued to stay with him, they lived immaculately pure lives, and their marital relationship was purely spiritual. It should be mentioned here that Sri Ramakrishna had been ordained a Sannyasin (Hindu monk), and he observed the basic vows of a monk to perfection. But outwardly he lived like a lay man, humble, loving and with childlike simplicity. During Sri Ramakrishna’s stay at Dakshineswar, Rani Rasmani first acted as his patron. After her death, her son-in-law Mathur Nath Biswas took care of his needs.

Leading the Sangha after the Master’s Passing

After Sri Ramakrishna’s passing away in 1886, Sarada Devi spent some months in pilgrimage, and then went to Kamarpukur where she lived in great privation. Coming to know of this, the disciples of Sri Ramakrishna brought her to Kolkata. This marked a turning point in her life. She now began to accept spiritual seekers as her disciples, and became the open portal to immortality for hundreds of people. Her great universal mother-heart, endowed with boundless love and compassion, embraced all people without any distinction, including many who had lived sinful lives.

When the Western women disciples of Swami Vivekananda came to Kolkata, the Holy Mother accepted them with open arms as her daughters, ignoring the restrictions of the orthodox society of those days. Although she had grown up in a conservative rural society without any access to modern education, she held progressive views, and whole-heartedly supported Swami Vivekananda in his plans for rejuvenation of India and the uplift of the masses and women. She was closely associated with the school for girls started by Sister Nivedita.

She spent her life partly in Kolkata and partly in her native village Jayrambati. During the early years of her stay in Kolkata, her needs were looked after by Swami Yogananda, a disciple of Sri Ramakrishna. In later years her needs were looked after by another disciple of Sri Ramakrishna, Swami Saradananda, who built a new house for her in Kolkata.

Simplicity and Forbearance

Although she was highly venerated for her spiritual status, and literally worshipped as the Divine Mother, she continued to live like a simple village mother, washing clothes, sweeping the floor, bringing water from the pond, dressing vegetables, cooking and serving food. At Jayrambati she lived with her brothers and their families. They gave her endless troubles but, established as she was in the awareness of God and in Divine Motherhood, she always remained calm and self-possessed, showering love and blessings on all who came into contact with her. As Sister Nivedita stated, “Her life was one long stillness of prayer.”

Mother of All

In the history of humanity there has never been another woman who looked upon herself as the Mother of all beings, including animals and birds, and spent her whole life in serving them as her children, undergoing unending sacrifice and self-denial. About her role in the mission of Sri Ramakrishna on earth, she stated: “My son, you know the Master had a maternal attitude (matri-bhava) towards every one. He has left me behind to manifest that Divine Motherhood in the world.”

Ideal Woman

On account of her immaculate purity, extraordinary forbearance, selfless service, unconditional love, wisdom and spiritual illumination, Swami Vivekananda regarded Sri Sarada Devi as the ideal for women in the modern age. He believed that with the advent of Holy Mother, the spiritual awakening of women in modern times had begun.

Last Days

Under the strain of constant physical work and self-denial and repeated attacks of malaria, her health deteriorated in the closing years of her life, and she left the mortal world on 21 July 1920.

==============

Ramakrishna Advaita Ashram, Varanasi

श्रीमाँ सारदा और श्रीश्रीकाली

अपने पिता के साथ दक्षिणेश्वर जाते समय (मार्च 1872) रास्ते में सारदा को तीव्र ज्वर ( तेज़ बुखार) हो गया और उन्हें राह की एक धर्मशाला में रुकना पड़ा। शारीरिक और मानसिक रूप से थकी वे लगभग अचेतन अवस्था में जब बिस्तर पर लेटी कि तभी उन्होंने देखा कि दैवी सौंदर्य से युक्त एक स्त्री ने उनके कमरे में प्रवेश किया और उनके निकट बैठ गयी। आगंतुक स्त्री का रंग माँ काली के समान ही गहरा काला था। जैसे ही उस स्त्री ने सारदा को सहलाया मानो सारा दर्द और पीड़ा रोम-कूपों से बहकर बाहर निकल गयी। उन्होंने आगंतुक स्त्री से पूछा कि वो कहाँ से आयी हैं ? 

- दक्षिणेश्वर से , उत्तर मिला। तब सारदा ने आश्चर्यपूर्वक कहा - सच में ! मैं भी वहाँ जाना चाहती थी, उन्हें देखने, उनकी सेवा करने। पर लगता है दुर्भाग्यवश ऐसा नही हो सकेगा। 

- आगंतुक स्त्री : ऐसा मत कहो। तुम निश्चित ही दक्षिणेश्वर जाओगी। तुम स्वस्थ हो जाओगी और उन्हें देखोगी। तुम्हारे लिए ही तो मैंने उन्हें वहाँ रखा है। 

- सारदा : क्या यह सच है ? तुम कौन हो ? क्या हमारा कोई सम्बंध है ? 

- आगंतुक स्त्री : मैं तुम्हारी बहन हूँ। 

- सारदा : ऐसा है ? शायद इसीलिए तुम आयी हो। 

- सारदा ने देखा कि उस अजनबी महिला के पैर मिट्टी से सने थे, जैसा कि वह बहुत चलकर आयी हो। और उन्होंने पूछा भी कि किसी ने उन्हें पैर धोने के लिए पानी नही दिया। अजनबी स्त्री ने कहा कि उसे तुरन्त ही जाना होगा और वो अदृश्य हो गयी। 

जय श्रीश्रीकाली माई की जय

दक्षिणेश्वर में श्री सारदा मठ (Sri Sarada Math), रामकृष्ण मठ और मिशन (Ramakrishna Math and Mission) से जुड़ी एक महत्वपूर्ण महिला मठवासी संस्था है, जिसकी स्थापना 2 दिसंबर, 1954 को हुई थी, जिसका उद्देश्य रामकृष्ण दर्शन और श्री शारदा देवी के मातृत्व आदर्शों का प्रचार करना, शिक्षा, संस्कृति और परोपकार के माध्यम से सेवा करना है।

[সকলি তোমারি ইচ্ছা,ইচ্ছাময়ী তারা তুমি।তোমার কর্ম তুমি করমা লোকে বলে করি আমি।পঙ্কে বদ্ধ করাও করি,পঙ্গুরে লঙ্ঘাও গিরি কারে দাও মা ব্রহ্মপদ,কারে কর অধোগামী ।আমি যন্ত্র , তুমি যন্ত্রী ,আমি ঘর , তুমি ঘরণী। আমি রথ , তুমি রথী , যেমন চালাও তেমনি চলি ।।

सकलि तोमारि इच्छा इच्छामयी तारा तुमि ।

तोमार कर्म तुमि करो माँ, लोके बोले करि आमि।।

पंके बद्ध करो करि, पंगुरे लंघाओ गिरि,

कारे दाओ माँ ब्रह्मपद, कारे करो अधोगामी ।।

आमि यंत्र तुमि यंत्री, आमि घर तुमि घरनी,

आमि रथ तुमि रथी, जेमन चालाओ तेमनि चलि ।।

भावानुवाद

सभी तेरी इच्छा है माँ इच्छामयी तारा तुम्हीं ।

अपना कर्म तुम्हीं करती माँ लोग कहते करते हमहीं ।।

फँसाती कीच में हाथी, लंघाती पंगु को गिरि ।

देती हो किसी को ब्रह्मपद माँ, करती किसी को अधोगामी ।।

मैं हूँ यंत्र तुम हो यंत्री, मैं हूँ घर तुम हो घरनी ।

मैं हूँ रथ तुम हो रथी माँ, चलता जैसा चलाती माँ ।।

written by Ramdulal Nandy.The song belongs to the genre of Shyama Sangeet or Bhaktigeeti (Bengali devotional song), dedicated to Goddess Kali/Tara.The central theme is the concept of complete surrender (non-doership) to the Divine Mother, stating that all actions are performed by Her will. 

>>>Autosuggestion: आत्मसुझाव या संकल्प-ग्रहण द्वारा श्रद्धा जागरण :  “मैं ॠषि-मुनियों की संतान हूँ। भीष्म पितामह जैसे दृढ़प्रतिज्ञ पुरुषों की परम्परा में मेरा जन्म हुआ है।  गंगा को पृथ्वी पर उतारनेवाले राजा भगीरथ जैसे दृढ़निश्चयी महापुरुष का रक्त मुझमें बह रहा है। समुद्र को भी चुल्लू में पी जानेवाले अगस्त्य ॠषि का मैं वंशज हूँ।  श्री राम, श्रीकृष्ण, अवतार वरिष्ठ श्रीरामकृष्ण  की अवतरण -भूमि भारत में, जहाँ देवता भी जन्म लेने को तरसते हैं वहाँ मेरा जन्म हुआ है, फिर मैं ऐसा दीन-हीन क्यों रहूँगा ? मैं जो चाहूँ सो कर सकता हूँ।  आत्मा की अमरता का, दिव्य ज्ञान का, परम निर्भयता का संदेश सारे संसार को जिन ॠषियों ने दिया, उनका वंशज होकर मैं दीन-हीन नहीं रह सकता। -मैं अपने रक्त के निर्भयता के संस्कारों को जगाकर रहूँगा। मैं वीर्यवान् बनकर रहूँगा। ”  
"सिर्फ इच्छा होने से ही कोई बड़ा नहीं बन जाता, जिसे वे उठाते हैं वही उठता है, --जिसे वे गिराते हैं वह गिर जाता है। हमलोग सार्वभौमिक धर्म का प्रचार कर रहे हैं -गुट्टबाजी करके ? ईर्ष्या गुलाम जाति का स्वभाव है, उसे उखाड़ फेंकने  चेष्टा करनी चाहिये। मुझे नाम की आवश्यकता नहीं- I want to be a voice without form! मैं निराकार की वाणी हो जाना चाहता हूँ । " (पत्रावली /स्वामी ब्रह्मानन्द/सितंबर १८९४)
>>>अथर्व वेद में मानव (साधु युवा) की महिमा का वर्णन  (Description of human glory in Atharva Veda) इस प्रकार मिलता है -

" ॐ अहमस्मि सहमान उत्तरो नाम भूम्याम्‌।
                 अभीषाडस्मि विश्वाषाडाशामाशां विषासहिः।। अथर्ववेद 12/1/54 -
(अहम्‌ भूम्याम्‌) मैं पृथिवी पर (उत्तरः नाम अस्मि) सर्वोत्कृष्ट प्रसिद्ध हूँ। क्योंकि मैं (सहमानः) अत्यन्त साहसी हूँ। (अभीषाट्‌ अस्मि) मैं सबसे अधिक सहनशील हूँ, (आशाम्‌-आशाम्‌ ) प्रत्येक दिशा में (विषासहिः) अच्छी प्रकार विजयी हूँ। इसीलिये  (विश्वषाट्‌) सर्वत्र विजयी हूँ। 
अर्थात मैं स्वभावतः विजयशील हूँ (प्रत्येक आत्मा स्वभावतः विजयशील है !), पृथ्वी पर मेरा उत्कृष्ट पद है। मैं विरोधी शक्तियों को परास्त कर समस्त विघ्न-बाधाओं को दबाकर प्रत्येक दिशा में सफलता पाने वाला हूँ। भावार्थ- सहनशील मनुष्य संसार में प्रसिद्ध हो जाता है। अपनी आलोचना सुनकर भी सहनशील ही रहना चाहिए। शत्रु के सम्मुख आ जाने पर भी सहनशीलता को हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। हॉं, देश के शत्रुओं का डटकर मुकाबला कर उसे परास्त कर देना चाहिए। परन्तु हमारी सहनशीलता में न्यूनता नहीं आनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को सहनशील बनने का प्रयत्न करना चाहिए। प्यास जो मेरी बुझ गयी होती। ज़िन्दगी फिर न ज़िन्दगी होती।  कहते हैं -  ”अदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्“ यजुर्वेद 36/24 अर्थात् हम सौ वर्ष तक जियें और उससे भी अधिक समय तक दैन्य भाव से दूर रहें। "
इसका अर्थ है:  " युवा रहो; अच्छे आचरण वाले युवा बनें; अध्ययनशील, विनम्र, दृढ़निश्चयी और मजबूत बनें। इस स्तोत्र का प्रत्येक शब्द सारगर्भित है। आइए इस पर गौर करें। 

युवा स्यात् -  ऋषि कहते हैं कि मनुष्य को सच्चे अर्थों में युवा बनना चाहिए। युवा आयु स्वाभाविक रूप से रचनात्मक ऊर्जा से भरपूर होती है। जिन लोगों में कुछ नया करने का जज्बा होता है वही सही मायने में युवा होते हैं। इससे कम कुछ भी युवा होने की कसौटी पर खरा नहीं उतर सकता।
साधु युवा-  एक युवा को अच्छे आचरण वाला और कानून का पालन करने वाला व्यक्ति होना चाहिए ताकि वह बुरे रास्ते पर न भटके। इसके लिए प्रत्येक युवा को निम्नलिखित चार गुणों को विकसित करते रहने की आवश्यकता है:
अध्यायकः > स्वाध्याय :  - युवाओं को अयोग्य विचारों से दूर रहने में मदद करने के लिए नियमित रूप से अच्छे विचारों का अध्ययन करते रहना चाहिए।
आशिष्ठो  - युवा को पूरी तरह से विनम्र होना चाहिए (उसे सोच, आचरण और भाषण में शिष्टाचार व्यक्त करना चाहिए और दूसरों के प्रति सम्मानजनक होना चाहिए।)
दृढिष्ठो  - परिपक्व सोच के आधार पर लिए गए निर्णय को दृढ़ संकल्प के साथ क्रियान्वित किया जाना चाहिए।
बलिष्ठः  - युवाओं को अपने कर्तव्यों को पूरा करने और बुराई के खिलाफ संघर्ष करने में सक्षम होने के लिए मजबूत होना चाहिए।
हमारे अभियान को बढ़ावा देने के लिए सभी पुनर्निर्माण गतिविधियों को वास्तव में हमेशा की तरह शामिल किया जाएगा लेकिन हमें हमेशा उपर्युक्त ऋषि के मार्गदर्शक सिद्धांतों के अनुरूप होने का प्रयास करना चाहिए।
बनो, वैसा बन जाने पर तुम्हारे अपवित्र विचार बिल्कुल चले जायेंगे। इसी प्रकार सम्पूर्ण विश्व परिवर्तित हो जायेगा। यही समाज का बहुत बड़ा लाभ है। समग्र मानव-जाति के लिये यही महत्वपूर्ण लाभ है।"
[सर्वे भवन्तु सुखिनः प्रार्थना से सभी के प्रति मित्रवत दृष्टि सम्पन्न मनुष्यधर्म के तीनो स्कंध का पालक ब्रह्मचारी ,सत - चरित्रवान मनुष्य बनो और बनाओ।]  
--------------------------------------------
>>>'शी'-क्षा # (= आत्मसंयम का अभ्यास) अष्टांगयोग की सहायता से साधु युवा कैसे बनें और बनायें  ? 
आचरण में लाए जाने योग्य जो विषय (शीक्षा#)  हैं, उनको पतञ्जलि ने आठ भागों में बांटा है । ये हैं - यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि । इनमें से पहले पांच तो हम सभी को प्रयत्न करके करने चाहिए । बचे तीन के लिए पहले पांच में थोड़ा पारङ्गत होना पड़ता है । अन्तिम अङ्ग तक पहुंचने पर आत्म- और परमात्म-दर्शन हो जाते हैं । इन अङ्गों का विवरण इस प्रकार है -

>>>१) यम - ये दूसरे के साथ व्यवहार में प्रयोग होते हैं । वस्तुतः, ये मानव-मात्र के लिए महाव्रत हैं । पतञ्जलि ने कहा है कि ये जाति (ब्राह्मण, शूद्र, म्लेच्छ, आदि), देश (स्थान - मन्दिर, विदेश, आदि), काल (तिथि, मुहूर्त, आदि), और समय (विशेष समय - "क्षत्रिय केवल युद्ध में मारेगा", या शिष्टाचार - "केवल ब्राह्मण से सत्य बोलो") - इन सभी से बाधित नहीं है । अर्थात् ये यम सार्वजनिक, सार्वभौम और सार्वकालिक हैं । ये पांच इस प्रकार हैं -

क) अहिंसा - कभी भी, किसी भी प्रकार से, किसी भी प्राणी को पीड़ा न देने की भावना । वेद का यह मन्त्र इस का सरल उपाय बताता है - "मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे (यजु० ३६।१८)" - सब प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखो ।
    इसका फल है, पतञ्जलि बताते हैं, कि योगी के सान्निध्य में आने वाले प्राणी का, चाहे वह कितना ही हिंस्र क्यों न हो, वैर समाप्त हो जाता है । महाभारत आदि में हम पढ़ते हैं कि अमुक ऋषि के आश्रम में शेर और हिरण भी मैत्री से विचरते थे । ये ऋषि की अहिंसा-प्रवित्ति के उदाहरण हैं ।
ख) सत्य - जो जैसा है, उसे वैसा ही मानना व बोलने को सत्य कहते हैं । प्रधानतया यह वाणी के लिए है । व्यास जोड़ते हैं कि योगी की वाणी, सत्य होने के साथ-साथ, कटु न हो, ठगने वाली न हो और संशय उत्पन्न न करे; प्रत्युत सबके लिए हितकारी हो । सच्चे योगी तो केवल वही बोलते हैं जो हितकारी होता है, gossip, आदि वे नहीं करते ! अर्थात् वे सत्, हित और मित (कम) बोलते हैं । इसका फल है - योगी सत्य-सङ्कल्प हो जाता है - जो वह निश्चय करता है, जिसके लिए प्रयत्न करता है, वह सफल होकर ही रहता है ।

ग) अस्तेय - किसी पदार्थ के स्वामी की आज्ञा के बिना उसका उपयोग करना या छीन लेना, यहां तक इच्छा भी करने को ’स्तेय’ = चोरी कहते हैं । इस चोरी को मन, वचन व कर्म से त्याग देने को ’अस्तेय’ कहते हैं । इसका फल है - अमूल्य पदार्थों की उपलब्धि होने लगती है ।

घ) ब्रह्मचर्य - गुप्तेन्द्रिय का संयम है । इसका फल - शरीर और बुद्धि का बल बढ़ जाता है ।

ङ) अपरिग्रह - भौतिक पदार्थों के सङ्ग्रह करने का नाम परिग्रह है । इसमें यह दोष है कि उनके सङ्ग्रह में धन का व्यय और उनसे लगाव होता है । साथ-साथ, उनके रक्षण में समय, श्रम व धन का व्यय होता है । ऊपर से, इनके कारण हम हिंसा, असत्य और स्तेय का आश्रय भी ले सकते हैं । इसलिए पतञ्जलि इन्हें त्यागते जाने का उपदेश देते हैं । इसका फल बहुते ही विचित्र है - यह जन्म क्यों हुआ है, अगला जन्म क्या होगा - इसका ज्ञान हो जाना । सम्भवतः, यह इतना कठिन व्रत है कि इसका फल भी अधिक है !

>>>२) नियम - योग के इस दूसरे अङ्ग को हम personal discipline के रूप में समझ सकते हैं । ये हमें यमों को करने में सहायता भी देते हैं । ये भी पांच हैं -

च) शौच - शरीर की अन्दर और बाहर से स्वच्छता, और मन की शुद्धी । शरीर की बाहरी शुद्धी के लिए हम साबुन, आदि लगाते हैं । आन्तरिक शुद्धि के लिए हमें भोजन में अभक्ष्य का आहार नहीं करना चाहिए, जैसे - मांस, मदिरा, सड़े पदार्थ, आदि । मानसिक शुद्धि के लिए हमें राग-द्वेष को प्रयत्न से अपने मन से निकाल देना चाहिए । इसका फल है - अपने शरीर से घृणा और दूसरों के शरीरों से दूर रहना । यह अजीब-सा फल लगता है, लेकिन इसका एक प्रयोजन है । जब हम अपने शरीर को मल का भण्डार जानने लगेंगे तब हम में मोक्ष की इच्छा और तीव्र हो जायेगी । इसके अन्य फल भी हैं - मन का प्रसन्न और एकाग्र हो जाना, इन्द्रियों पर वश हो जाना । इनसे योगी आत्म-दर्शन के योग्य हो जाता है ।

छ) सन्तोष - अर्थात् जितना प्रयत्न से प्राप्त हुआ है, उससे अधिक की लालसा न करना । यह भौतिक पदार्थों के लिए - परिवार, धन, आदि - के लिए ही है, क्योंकि आध्यात्मिक स्तर पर तो आत्मा को सदैव परमात्मा के और अधिक पास आने की लालसा रहनी चाहिए !  इसका फल है अत्यन्त सुख की प्राप्ति । महर्षि ने तो इसे मोक्ष-तुल्य सुख कहा है !

ज) तप - द्वन्द्वों (ठण्डी-गर्मी, भूख-प्यास, आदि) को सहन करना, उपवास करना ।    इसका फल - शरीर और इन्द्रियों की अशुद्धियों का क्षय होना, उनका दृढ़ और स्वस्थ होना ।

झ) स्वाध्याय - मोक्षपरक शास्त्रों का अध्ययन करना और ओम् का जप करना । इसके फलस्वरूप, परमात्मा और विद्वानों का सहायता  मिलता है, जिससे मुक्ति का पथ प्रशस्त होता है ।

ञ) ईश्वरप्रणिधान - अर्थात् अपने सब कर्मों को परमात्मा को अर्पित कर देना । इसका फल
 है - समाधि की सिद्धि सरलता से होना । व्यास के अनुसार, जीवात्मा सब पदार्थों को ठीक- ठीक जानने लगता है, चाहे वे दूसरे स्थान, दूसरी देह या दूसरे काल में क्यों न हों ।
 
>>>३) आसन - यह जो हम योगासन के रूप में - शरीर को विभिन्न प्रकार से कठिन मुद्राओं में ढालना - समझते हैं, वह नहीं है, प्रत्युत समाधि के लिए इस प्रकार बैठना है, जिससे कि हमारे किसी भी अङ्ग में tension न रहे और हम लम्बे समय तक बिना किसी कष्ट के बैठ सकें । सब प्रकार से शरीर को शिथिल करके, चित्त को अनन्त में लीन कर देना चाहिए ।  आसन की सिद्धि हो जाने पर द्वन्द्व बाधित नहीं करते ।

आसन के बाद, प्राणायाम आता है , किन्तु स्वामीजी ने बिना योग्य गुरु के सानिध्य में रहे इसे करने से मना किया है। अतएव हमलोग भी इसे नहीं करेंगे।  ध्यान से समाधि होता है , इसी लिए ध्यान -समाधि में जाने से ठाकुर ने विवेकानन्द को मना किया था इसलिए हमलोग ध्यान-समाधि का अभ्यास नहीं करेंगे। 

>>>4. प्रत्याहार : - इन्द्रियों को अपने विषयों से निकालकर, अन्दर संकुचित कर लेना । इससे वे ’चित्त के आकार’ की हो जाती हैं । प्रत्याहार के अभ्यास से पूर्ण जितेन्द्रियता प्राप्त हो जाती है । फिर हम जिसको देखना चाहे, उसको छोड़ हमें और कुछ नहीं दिखेगा । अर्थात् पूर्ण focus प्राप्त हो जाता है ।

>>>5. धारणा - एक देश (point) पर - ह्रदय में अपने पूर्व-निर्धारित आदर्श -स्वामी विवेकानन्द की छवि पर चित्त को स्थिर करना । ये शरीर का कोई भी भाग हो सकते हैं, जैसे - नाभि, हृदय, मस्तक, आज्ञाचक्र  ।

    इस प्रकार योग के आठ अङ्ग में से सिर्फ 5 अंग का अभ्यास छात्रों को पशुत्व से मनुष्यत्व में और फिर साधारण मनुष्य से देवत्व (100 % निःस्वार्थपरता अभिव्यक्त करने) की ओर ले जाते हैं, और अन्त में मोक्ष के भागी (De-Hypnotized)  बना देते हैं । यदि हम इनका पूरा पालन न भी कर पाएं, हम अपनी शक्ति-अनुसार इनका अभ्यास प्रतिदिन बढ़ाते रहना चाहिए, क्योंकि बूंद-बूंद से ही घड़ा भरता है...साधु युवा अर्थात राजर्षि -'राजा+ ऋषि ' !! 
"श्रद्धा सामान्य नारी नहीं वे तो विश्व मंगला मातृ-मूर्ति हैं !"   
 
सहज विश्वास अथवा अन्धविश्वास का नाम श्रद्धा नहीं है। सत्य को निश्चय पूर्वक जानकर, उसे दृढ़ता के साथ हृदय में धारण कर लेना श्रद्धा है।  श्रद्धा=श्रत्+धा,  सत्य+धारणा,  सत्य+धारण,   आत्म+विश्वास। धर्ता"- सत्य धारणा अथवा निष्ठा के साथ, अभीष्ट की साधना में लगे रहना  श्रद्धा है। आत्मविश्वास के साथ साध्य की साधना में जुट जाना श्रद्धा है। हृदयसंकल्प के साथ लक्ष्य की ओर प्रवृत्त रहना श्रद्धा है। हृदय की गहन भावना के साथ साधना करना श्रद्धा है।          
      छन्दोबद्ध मन्त्रों को ऋक् या ऋचा कहते हैं। वेद शब्द विद् ज्ञाने (जानना) धातु से बना है , अतः वेद शब्द का अर्थ है---ज्ञान । संहिता शब्द का अर्थ संकलन होता है । इस प्रकार ऋग्वेद-संहिता का अर्थ हुआ---छन्दोबद्ध ज्ञान का संग्रह । ऋग्वेद के दशम मंडल के १५१ वें सूक्त को श्रद्धा सूक्त कहते है इसकी रिषिका श्रद्धा कामायनी है, इस सूक्त में श्रद्धा का आवाहन देवी के रूप में करते हुए कहा है कि वह हमारे हृदय में श्रद्धा उत्पन्न करे। ऋग्वेदः (१०-१५१-४) में कहा गया है -
श्रद्धां देवा यजमाना वायुगोपा उपासते।
श्रद्धा हृदय्ययाकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु।।
(देवाः) देवजन, (यजमानाः) यज्ञानुष्ठानी, यज्ञशील जन और (वायु-गोपाः) प्राणरक्षक जन (हृदय्यया आकूत्या) हृदय भावना द्वारा (श्रद्धाम् श्रद्धाम्) अभीष्ट को प्राप्त कराने वाली श्रद्धा को (उपासते) उपासते हैं। वे (श्रद्धया) श्रद्धा से ही (वसु) धन, अभीष्ट (विन्दते) प्राप्त करते हैं।
       देवजनों ने श्रद्धा के द्वारा ही देवत्व को प्राप्त किया था । यज्ञानुष्ठानी श्रद्धा द्वारा ही यज्ञफल {सुखैश्वर्य} प्राप्त करते हैं। यज्ञशील श्रद्धा द्वारा ही श्रेष्ठतम कर्मों की साध में निरत रहते हैं। वीर श्रद्धा द्वारा ही विजयलाभ  करते हैं। योगी भी श्रद्धा द्वारा ही योगसाधना में सिद्धि प्राप्त करते हैं। हृदय-संकल्प में ही श्रद्धा का निवास है। निस्सन्देह हृदय की भावना ही श्रद्धा है। श्रद्धा से प्रत्येक धन प्राप्त होता है। श्रद्धावान् व्यक्ति किसी भी ऐश्वर्य को प्राप्त कर सकता है। श्रद्धा के साथ, दृढ़संकल्प और निश्चय के साथ योगपथ {महामण्डल द्वारा निर्देशित 3H विकास के 5 अभ्यास के पथ} पर आरूढ़ होइये। आप बहुत शीघ्र सफल होंगे। विश्वास रखिए और प्रसन्नता के साथ योगानुष्ठान प्रारम्भ कीजिए। 
[ साभार :स्वामी विद्यानंद जी 'विदेह'/
http://rishivichar.blogspot.com/2013/02/blog-post_5.html]

श्रद्धा का अर्थ है -आस्तिक्य बुद्धि, अर्थात आत्म-विश्वास और आत्म विश्वास का अर्थ है ईश्वर (ठाकुर) पर विश्वास। इसलिए  ऋग्वेद के दशम् मण्डल १/१२४ में श्द्धा की स्तुति देवता रूप में इस प्रकार की गई है-
श्रद्धां प्रातर्हवामहे श्रद्धां मध्यंदिनं परि ।
श्रद्धां सूर्यस्य निम्रुचि श्रद्धे श्रद्धापयेह नः ॥५॥

अर्थात 'हम प्रातः मध्याह्न और सांयकाल में श्रद्धा का आह्नान करते हैं, हे श्रद्धे! तू हमें इस लोक में भी श्रद्धायुक्त कर। 
छान्दोग्योपनिषद् ७/१९-२० में श्रद्धा की दो प्रमुख विशेषताएं वर्णित हैं - मनुष्य के हृदय में निष्ठा या आस्तिक्य बुद्धि जाग्रत कराना व मनन कराना। श्रद्धा हृदय की उच्च भावना का प्रतीक है। इससे मनुष्य का आध्यात्मिक जीवन सफल होता है और धन प्राप्त कर सुखी होता है। नारदपुराण में कहा गया है - 

श्रद्धावाल्लभते धर्मान् श्रद्धावानर्थमाप्नुयात्। 

श्रद्धया साध्यते कामः श्रद्धावान् मोक्षमाप्नुयात ॥ 

-नारदपुराण>पूर्वभाग 4/6 श्रद्धालु पुरुष को धर्म का लाभ होता है। श्रद्धालु ही धन पाता है, श्रद्धा से ही कामनाओं की सिद्धि होती है तथा श्रद्धालु ही मोक्ष पाता है। 

" श्रद्धया विन्दते वसु "


जयशंकर प्रसाद के ‘कामायनी’ की रचना 'ऋग्वेद' में वर्णित इसी सूक्त  श्रद्धां हृदय्ययाकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु ॥-ऋग्वेदः १०-१५१-४॥- के आधार पर हुई है-अर्थात सब लोग हृदय के दृढ़ संकल्प से श्रद्धा की उपासना करते हैं क्योंकि श्रद्धा से ही ‘वसु’ (भौतिक कल्याण -धन वैभव,या अभ्युदय ) और आध्यात्मिक कल्याण (अमरत्व या निःश्रेयस) दोनों प्रकार के ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। कामयानी महाकाव्य वस्तुतः अपूर्ण मानव (कच्चा मैं,द्वैत ) को परिपूर्णता (पक्का मैं-अद्वैत ) की ओर ले जाने वाली विकास-यात्रा की दिशा व अन्तिम पड़ाव दोनों ही है।

श्रद्धा वाले सूक्त में सायण ने श्रद्धा का परिचय देते हुए लिखा है-‘काम-गोत्रजा श्रद्धानपामर्षिका’ इसीलिए श्रद्धा नाम के साथ उसे कामायनी भी कहा जाता है।  श्रद्धा काम-गोत्रजा अथवा काम की संतति है, इसीलिए तो महाकाव्य का नाम ‘कामायनी’ पड़ा है। सृष्टि-रचना का मूल भी वह प्रबल ‘काम’ ही है।  नासदीय सूक्त में सृष्टि-व्युत्पत्ति की प्रक्रिया कुछ इस प्रकार वर्णित हैः 

"कामस्तदग्रे    समवर्तताधि   मनसो   रेतः प्रथमं यदासीत्। 

स  तो  बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि  प्रतीष्या  कवयो  मनीषा। "

सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व ‘काम’ विद्यमान था यहां ‘काम’ का अर्थ ‘सिसृक्षा’ अर्थात् सृजन की इच्छा से है। परमात्मा ने ‘ईक्षण’ (आलौकिक इच्छा) से ‘एकोऽहं बहुस्याम्’ का संकल्प लिया। यह ‘काम’ अथवा कामना सृष्टिकर्ता ब्रह्म के मन में बीज रूप में पूर्व से ही विद्यमान थी। 
           इस काव्य की कथावस्तु वेद,  उपनिषद, पुराण आदि से प्रेरित है। कामायनीकार के अनुसार काम के दो स्वरुप हैं - 'संभोगात्मक (प्रवृत्ति) तथा प्रगतिशील (निवृत्ति)' और दोनों ही स्वरूप मांगलिक है। किन्तु अपने प्रथम रूप तक  ही सीमित रहने के कारण वह मनुष्य-जीवन को वात्याचक्र (बवंडर - Whirlwind cycle) के समान जीवन को भटकाता रहता है। भोगवादी काम का यही परिणाम है। देव सृष्टि के विनाश का भी यही कारण था। देवगण के उच्छृंखल स्वभाव, निर्बाध आत्मतुष्टि में अंतिम अध्याय लगा और मानवीय भाव अर्थात् श्रद्धा और मनन का समन्वय होकर प्राणी को नए युग की सूचना मिली। दूसरी ओर जो प्रवृत्ति मार्ग के अधिकारी हैं, उनके लिए काम के इस संभोगात्मक रूप का पूर्णतया परित्याग जीवन-शक्ति की इच्छा का विरोध है, विकास का बाधक है। उससे जीवन का सम्पूर्ण आनन्द समाप्त हो जाता है। इसीलिए कामायनी में राग-विराग समर्पित काम को (विवाह संस्कार को) स्वीकार किया गया है।“ 
कामायनी में ‘श्रद्धा’ के माध्यम से एक सन्तुलित जीवन जीने की प्रेरणा है जहाँ न तो घोर विलासितापूर्ण सतत वासनामय ऐहिक जीवन की तलाश है और न ही एकान्तिक वैराग्य धारण करना ही अभीष्ट है। एक समन्वय का मार्ग विदुषी ‘श्रद्धा’ से प्राप्त होता है। श्रद्धा मनु को निर्भयता का पाठ पढ़ाती है। मनु जो दृष्टा है, वह चेतन है। अतः जल एवं मनु दोनों ही एक हैं। लेकिन अभी इसमें श्रद्धा का प्रवेश नहीं हुआ है अतः वह समरसी भाव को प्राप्त नहीं हुआ है। वह दृश्य (हिम और जल) तो जड़  है, किन्तु उस दृश्य का द्रष्टा जो मनु है वह तो चेतन है। श्रद्धा मनु के भीतर के द्वैत को अद्वैत में बदलने में अपनी भूमिका निभाती है
          ‘कामायनी’ के नायक मनु और नायिका श्रद्धा हैं। कामायनी में मनु मन का प्रतीक है और श्रद्धा हृदय तथा इड़ा बुद्धि का प्रतीक है। अपने आंतरिक मनोविकारों से संघर्ष करता हुआ मनु श्रद्धा याने आस्तिक्यबुद्धि की सहायता से आनन्द लोक तक पहुँचता है। जीवन का अंतिम भाव आनंद है । आनंद की उपलब्धि के लिए प्रयत्नशील मानव अनेक संघर्षों से गुजरता है। शैवदर्शन के अनुसार शिव आनंदस्वरूप हैं। कामायनी में श्रद्धा की शक्ति के रूप में परिकल्पना की गई।           ऋषि दयानन्द जी  लिखते हैं कि जब जीव शरीर से निकलता है उसी का नाम ‘मृत्यु’ और शरीर के साथ संयोग होने का नाम ‘जन्म’ है। जब शरीर छोड़ता है तब यमालय अर्थात् आकाशस्थ वायु में रहता है क्योंकि ‘यमेन वायुना’ वेद में लिखा है कि यम नाम वायु का है।  मृत्यु होने के साथ वा बाद शरीर से जो जीवात्मा निकलती है वह आकाशस्थ वायु में रहती है। इस जीवात्मा को धर्मराज अर्थात् परमेश्वर उसके पाप पुण्यानुसार जन्म देता है।  नाना प्रकार के जन्म मरण में तब तक जीव पड़ा रहता है  जब तक उत्तम कर्मोपासना ज्ञान को प्राप्त करके मुक्ति को नहीं पाता। क्योंकि उत्तम कर्मादि करने से मनुष्यों में उत्तम जन्म और मुक्ति में महाकल्प पर्यन्त जन्म मरण दुःखों से रहित होकर आनन्द में रहता है
     यह जगत्‌ कल्याणभूमि है, यही श्रद्धा की मूल स्थापना है। इस कल्याणभूमि में एकमात्र प्रेम ही  श्रेय और प्रेय दोनों है। प्रेम मानव और केवल मानव की विभूति है। मानवेतर प्राणी, चाहे वे चिरविलासी देव हों, चाहे असुर हों, चाहे दैत्य या दानव हों, चाहे पशु हों, प्रेम की कला और महिमा वे नहीं जानते, प्रेम की प्रतिष्ठा केवल मानव ने की है। कामायनी काव्य का मूलबिंदु है- पहले श्रद्धा को पत्नी रूप में ग्रहण करना। फिर उसे अकेली छोड़कर इड़ा के साथ मनु का रहना। इड़ा को दासी या वंदिनी बनाने का प्रयास करने पर देवों का कोपभाजन बनना। 
           प्रसाद की रचना कामायनी का प्रमुख पात्र मनु उस विनाश का साक्षी है, जहाँ देवताओं की घोर भौतिकता-वादी प्रवृत्ति भोग, विलास और उनके द्वारा प्रकृति के अनियन्त्रित दोहन के परिणामस्वरूप पूरी सभ्यता का विनाश हो जाता है। जल-प्लावन का वर्णन शतपथ ब्राह्मण के प्रथम कांड के आठवें अध्याय से आरम्भ होता है। जल-प्लावन देवों की उच्छृंखल भोग-वृत्ति और निर्बाध आत्मतुष्टि का प्रकृति के द्वारा प्रतिकार था। पृथ्वी पर घोर जलप्लावन आया और उसमें सिवाय मनु के कोई भी नहीं बचता है। वे देवसृष्टि के अंतिम अवशेष थे। मनु भारतीय इतिहास के आदि पुरुष हैं। 'मनु' ही मानव-जाति के प्रथम पथ-प्रदर्शक या ' नेता ' हैं ! और अग्निहोत्र प्रज्वलित करने वाले तथा अन्य कई वैदिक कथाओं के नायक हैं। भागवत में इन्हीं वैवस्वत मनु और श्रद्धा (शतरूपा) से मानवीय सृष्टि का प्रारम्भ माना गया है। इस मन्वंतर के प्रवर्त्तक मनु हुए।  राम, कृष्ण और बुद्ध और अवतार वरिष्ठ  श्रीरामकृष्ण भी इन्हीं (मनु) के वंशज हैं।
         देव सभ्यता के प्रलय के बाद नए जीवन की उधेड़-बुन में लगे मनु के जीवन में श्रद्धा और इड़ा नामक दो स्त्रियाँ आती हैं। मनु अर्थात् मन के दोनों पक्ष हृदय और मस्तिष्क का संबंध क्रमश: श्रद्धा और इड़ा (मस्तिष्क में अवस्थित इन्द्रिय-केन्द्र) से भी सरलता से लगाया जाता है। इड़ा के संबंध में शतपथ में कहा गया है कि उसकी उत्पत्ति या पुष्टि पाक यज्ञ से हुई और उस पूर्णयोषिता को देखकर मनु ने पूछा कि ‘‘तुम कौन हो ?’’ इड़ा ने कहा, ‘तुम्हारी दुहिता हूं।’ मनु ने पूछा कि ‘मेरी दुहिता कैसे ?’ उसने कहा, ‘तुम्हारे दही, घी इत्यादि के हवियों से ही मेरा पोषण हुआ है।’ ‘तां ह’ मनुरुवाच-‘का असि’ इति, ‘तव दुहिता’ इति। ‘कथं भगवति ? मम दुहिता’ इति। (शतपथ 6 प्र.3 ब्रा.) श्रद्धा मनु को अहिंसक तथा प्रकृति प्रेमी बनाती है, जबकि इड़ा उसे घोर भौतिकतावाद में उलझा देती है और एतमाम लिप्साओं को ही मनु जीवन का उद्देश्य समझने लग जाता है। फिर एक दिन ऐसा आता है, जब उसे अपनी तमाम गलतियों का अहसास होता है और उसके बुरे समय में श्रद्धा उसकी रक्षा करती है। श्रद्धा जो कि अहिंसा, सात्विकता और प्रकृति प्रेम की परिचायक है। इड़ा को मेघसवाहिनी नाड़ी भी कहा गया है। ऋग्वेद में इड़ा को धी, बुद्धि का साधन करने वाली; मनुष्य को चेतना प्रदान करने वाली कहा है। इड़ा के लिए मनु को अत्यधिक आकर्षण हुआ और श्रद्धा से वे कुछ खिंचे।
यह इड़ा और श्रद्धा का एक तरह का बहनापे का भाव है। तभी अपनी संतान को इड़ा  के भरोसे छोड़ कर वह (श्रद्धा) मनु की खोज में चल देती है। वह उसे चिर चढी कहती अवश्य है पर इड़ा  के प्रति किसी विश्वास के कारण ही अपने पुत्र को उसके हवाले भी कर पाती है। यहाँ इस बात पर ग़ौर करना चाहिए कि अंत में जब इड़ा  उस स्थान पर जाती है जहां श्रद्धा और मनु है , तब भी मनु के प्रति किए गए व्यवहार के लिए वह शर्मिन्दा नहीं है पर जहाँ मानव श्रद्धा के अंक में समाता है वहीं इड़ा  श्रद्धा के चरणों में यह कहकर गिरती है कि उससे मिल कर वह कितनी कृतार्थ हुई है। श्रद्धा के प्रति कृतार्थता  का बोध और अपने बचपने के प्रति सजगता तथा उसका श्रेय श्रद्धा को देना – एक अद्भुत बहनापे का बोध प्रकट करता है। अकेलेपन की चिंता और देव-सृष्टि के विलास की स्मृतियां मनु की बेचैनी का मुख्य कारण है। 'श्रद्धा' के द्वारा किया गया निम्नोक्त प्रश्न, 'मनु' की भीरुता के कारण ही व्याख्या चाहता है- 
तपस्वी ! क्यों इतने हो क्लांत? वेदना का यह कैसा वेग?
आह! तुम कितने अधिक हताश-बताओं यह कैसा उद्वेग।56
श्रद्धा मनु को भयभीत देखकर आश्चर्यचकित है- ‘आह! तुम कितने अधिक हताश!’ इस वाक्य में श्रद्धा के  मन में करुणा का आवेग है क्योंकि वह जानती है कि मानव तो अमरता की कृति है-अरे तुम इतने हुए अधीर; हार बैठे जीवन का दाँव, जीतते मरकर जिसको वीर। वेद के सदृश ही श्रद्धा के ये वाक्य महान आशावादी संदेश देते प्रतीत होते हैं। श्रद्धा उन्हें पुनः प्रवृत्ति मार्ग की ओर उन्मुख करती हुई अनवरत कर्म का सन्देश देती है। कामायनी की श्रद्धा  यथा समय मनु के मन में आशा का संचार करती प्रतीत होती है-
और यह क्या तुम सुनते नहीं, विधाता का मंगल वरदान ?
शक्तिशाल हो, विजयी बनो विश्व में गूँज रहा जय-गान।
डरो मत, अरे अमृत संतान। अग्रसर है मंगलमय वृद्धि,
पूर्ण आकर्षण जीवन-केन्द्र, खिंची आवेगी सकल समृद्धि

 -श्रद्धा सामान्य नारी नहीं वह तो विश्व मंगला मातृ-मूर्ति के रूप में सामने आई है-

तुम देवि! आह कितनी उदार, वह मातृ-मूर्ति है निर्विकार;
हे सर्वमंगले! तुम महती, सबका दुख अपने पर सहती।
”बनो संसृति के मूल रहस्य, तुम्हीं से फैलेगी वह बेल,
विश्व भर सौरभ से भर जाय सुमन के खेलो सुंदर खेल।“
       मनुष्य  का चरम लक्ष्य अपने यथार्थ स्वरूप को पाना है। इसे पाने के लिए उसे जगत के आकर्षण से भागना नहीं है- निरंतर लक्ष्य की ओर बढ़ना है। अभ्यास और वैराग्य के द्वारा मन को नियंत्रण में रखने का प्रशिक्षण प्राप्त करके, समस्त जागतिक कार्य निष्पादित करना है, और निरंतर लक्ष्य (नश्वर वस्तुओं में आसक्ति का पूर्ण-त्याग ) की ओर बढ़ते रहना है। अपने लक्ष्य तक पहुँचे बिना विश्राम नहीं लेना है !  यह कौशल (तकनीक) प्रसाद जी की कामायनी को भली-भाँति आती है- नायिका के रूप में ' श्रद्धा ' नायक 'मनु' की प्रतिपग सहायिका बनी, उसकी दुर्बलताओं को क्षमा करती हुई, निराशा के मध्य आशा के दीप प्रज्ज्वलित करती हुई, असफलताओं को नकार अनवरत प्रोत्साहन द्वारा जीवन का ध्येय बताने वाली मार्गदर्शिका भी है। श्रद्धा के साथ मनु का मिलन होने के बाद उसी निर्जन प्रदेश में उजड़ी हुई सृष्टि को फिर से आरंभ करने का प्रयत्न हुआ। जीवन के जितने भी नैतिक आदर्श हैं उनका आधार मनुष्य का सत्य-स्वरूप या यथार्थ स्वरूप ही है। अपने वास्तविक स्वरूप के प्रति जागरूक बने रहना ही वास्तविक धर्म है। सत्य मार्ग को उन्मुख व्यक्ति ही वास्तव में सदाचारी है। हमारे वेद सदा सत्य और ऋत के मार्ग में चलने की आज्ञा देते आए हैं। ‘यतो अभ्युदय निःश्रेयस सिद्धिः स धर्मः’ के सिद्धान्त का अनुपालन करती हुई ‘श्रद्धा’ प्रथमतः मनु को कर्म की ओर प्रेरित करके ऐहिक जीवन की प्रेरणा प्रदान करती है। लेकिन वह मानव के वास्तविक उद्देश्य को भी भूली नहीं है। इसीलिए तो मनु को कैलास पर ले जाकर उसके जीवन में सात्त्विकता और समरसता का समावेश करती है। समाज में व्यक्ति यदि अधिकार की माँग रखता है तो उसके कुछ कर्तव्य भी हैं। व्यक्ति का समाज के प्रति समर्पण ही उसे स्वीकार्य है।
अपने में सब कुछ भर, कैसे व्यक्ति विकास करेगा?
यह एकांत स्वार्थ भीषण है अपना नाश करेगा।
औरों को हँसते देखो मनु- हँसो और सुख पाओ,
अपने सुख को विस्तृत कर लो सब को सुखी बनाओ!
स्वार्थ में लीन आत्मकेन्द्रित व्यक्ति श्रद्धा दृष्टि में महनीय नहीं है। समग्र समाज की भलाई व प्रसन्नता हेतु कार्यरत व्यक्ति, समस्त मानवजाति का मार्गदर्शक नेता (श्रीरामकृष्ण, स्वामी विवेकानन्द, माँ सारदा पूज्य नवनी दा ---) ही उसके लिए श्रद्धेय है- ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः (ऋ.9/सू.73/6) - प्रार्थना और यज्ञ करने वाला सदाचारी होना चाहिए। नहीं तो उसकी पूजा-प्रार्थना का कोई अर्थ नहीं है। सदाचारी लोग ही तरते हैं, दुराचारी नहीं। अज्ञानी लोग जो हितोपदेश को भी नहीं सुन सकते वे सच्चाई के मार्ग को छोड़ देते हैं, वे दुष्टाचारी इस भवसागर की लहर को नहीं तर सकते।
        कामायनी में जब मनु सत्य के मार्ग में न चलने का दुष्परिणाम भोगकर मुमूर्षु दशा में पहुँचते हैं तो वह श्रद्धा ही है जो उन्हें सत्य के मार्ग की ओर पुनः प्रवृत्त करा आनन्द उपलब्ध कराती है। 'ऋत' अर्थात महत् - महा चित्त की शक्ति ही विश्व को एक नियम एक कानून-व्यवस्था (इन्द्रिय-विषयों के प्रति आसक्ति का त्याग) में स्थापित रखती है और जो अपने कर्मों से इस नियम में व्याघात पहुँचाता है उसे वह नष्ट कर देती है। मनु ने स्वेच्छाचारिता में इस नियमन को नहीं माना था। यही उसके समूचे वंश के सर्वनाश का कारण बना। श्रद्धा ऋृत की इस महान व्यवस्था से परिचित है। और सर्वत्र उसी एक सत्य की उपस्थिति पाती है-‘श्रद्धा देवी प्रथमजा ऋतस्य’, तै.ब्रा. 3/12/1-2| जिसके आधार से सब चल रहा हैं , सब ठहरा हैं , जिसके कारण अराजकता नहीं हैं।  बसंत आता हैं और फूल खिलते हैं। पतझड़ आता हैं और पत्ते गिर जाते हैं।  वह अदृश्य नियम , जो बसंत को लाता हैं और पतझड़ को।  सूरज हैं , चाँद हैं , तारे हैं ।  यह विराट विश्व हैं और कही कोई अराजकता नहीं ।  सब सुसंबद्ध हैं। सब एक तारतम्य में हैं।  सब संगीतपूर्ण हैं।  इस लयबद्धता का ही नाम ऋत हैं । न तो वृक्षों से कोई कह रहा हैं कि हरे हो जाओ , न ही पत्तो को कोई खीच खीच कर उगा रहा हैं ….बीज से वृक्ष पैदा होते हैं , वृक्षों में फूल लग जाते हैं । सुबह होती हैं, पंक्षी गीत गाने लगते हैं । सब कुछ समायोजित ढंग से हो रहा हैं ।  कही कोई संघर्ष नहीं हैं , सहयोग हैं – ऋत शब्द में यह सब समाया हुआ हैं । सृजन की नियत व्यवस्था होने के कारण ही नारी ‘ऋतुमती’ कहलायी हैं। 
          सायण भाष्य आदि में ऋत को सत्य का पर्यायवाची माना जाता है । ऋत और सत्य में अन्तर बताते हुए प्रायः सायण भाष्य में कहा जाता है कि जो मानसिक स्तर पर सत्य है वह ऋत है और जो वाचिक स्तर का सत्य है, वह सत्य है। पुराणों में अनृत (अन्- ऋत) को मृत कहा गया है । अनृत अवस्था में केवल जीवन के रक्षण भर के लिए ऊर्जा विद्यमान है, जीवन को क्रियाशील बनाने के लिए नहीं । ऋत अवस्था जीवन में क्रियाशीलता लाती है, पुष्प, फल उत्पन्न कर सकती है । जीवन में जो भी कामना हो, वह सब ऋतम् का भरण करने से पूर्ण होगी। जब हम सोए रहते हैं तो वह अनृत अवस्था कही जा सकती है । उसके पश्चात् उषा काल की प्राप्ति होने पर सब प्राणी जाग जाते हैं ।  ऋग्वेद में श्रद्धा हेतु प्रशंसासूचक वाणी में कहा गया कि जिस प्रकार सूर्य की पुत्री उषा मनुष्यों के हृदय में आह्लाद उत्पन्न करती है, ठीक उसी प्रकार जिन मनुष्यों के हृदय में 'श्रद्धा-देवी' का निवास है वे लोग उसी देवी के समान सभी मनुष्यों में आह्लाद जन्य सौम्य स्वभाव उत्पन्न करते हैं। तत्त्वज्ञ ऋषि तो मनुष्य ही नहीं प्राणि मात्र में समत्व दृष्टि रखते थे। उनका तो उद्घोष थाः " मित्र स्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।" वैदिक ऋषि समाज में एकता व समन्वय की अपेक्षा रखते थे। एक ऐसे आदर्श समाज की परिकल्प उनके मन में थी जहाँ सभी के संकल्प, सोच, भावनाएँ, खान-पान, मंत्र, यज्ञ-भावना एक सी हों। पारस्परिक सौहार्द और सहयोग की उदान्त भावना से सम्पृक्त समाज ही उन्हें काम्य था। मनु का यह कथन-
देखो कि यहाँ पर कोई भी नहीं पराया,
हम अन्य न और कुटुंबी हम केवल एक हमीं हैं,
तुम सब मेरे अवयव हो जिसमें कुछ नहीं कमी है।
शापित न यहाँ कोई है तापित पापी न यहाँ हैं,
जीवन-वसुधा समतल है समरस है जो कि जहाँ है।
श्रद्धा की उदात्त चेतना समूची सृष्टि से तादात्म्यीकरण की स्थिति में है। यहाँ मनुष्येत्तर पशु-पक्षी भी उसी की सत्ता के पर्याय है। सचमुच यहाँ श्रद्धा की उपस्थिति एक ऋषिका सी ही है। प्राणी मात्र पर कष्ट उसके हृदय में शर-सा प्रहार करता है। आकुलि-किलात से मिलकर मनु हिंसा का जो आयोजन करते हैं, श्रद्धा उसमें हिस्सा नहीं लेती। वह 'एलियनेशन' का अनुभव करती है और आधुनिक मानव की हिंसा वृत्ति पर सवाल दागती है—
यह विराग सम्बन्ध हृदय का कैसी यह मानवता!
प्राणी को प्राणी के प्रति बस बची रही निर्ममता!
जीवन का संतोष अन्य का रोदन बन हँसता क्यों?
एक-एक विश्राम प्रगति को परिकर-सा कसता क्यों?]
=======================================

$$$$ वेदों में परस्पर मित्रता की अवधारणा :

    भारतीय संस्कृति में मैत्री की अवधारणा बहुत ही गहरे सम्बन्धों को इंगित करती है। यद्यपि मैत्री के कई रूप हैं, जिनमें कुछ स्थानीय भिन्नता हो सकते हैं। ऐसे कई बन्धनों में कुछ विशेषताएँ होती हैं। एक दूसरे के साथ रहना, एक साथ बिताए समय का आनन्द लेना और एक दूसरे के लिए सकारात्मक और सहायक भूमिका निभाने में सक्षम होना आदि मित्रता की विशेषताओं में शामिल है। 
 ‘मेद्यति, स्निह्यति स्निह्यते वा स मित्रः’ जो सब से स्नेह करके और सब को प्रीति करने योग्य है, इससे उस परमेश्वर का नाम ‘मित्र’ है। वेदों में अंकित शन्नो मित्रः शं व०…. आदि मंत्रों में जो मित्र आदि  नाम आये हैं, वे भी परमेश्वर के हैं, क्योंकि स्तुति, प्रार्थना, उपासना श्रेष्ठ ही की की जाती है। श्रेष्ठ उसको कहते हैं जो अपने गुण, कर्म, स्वभाव और सत्य-सत्य व्यवहारों में सब से अधिक हो। उन सब श्रेष्ठों में भी जो अत्यन्त श्रेष्ठ उसको परमेश्वर (अवतार वरिष्ठ श्रीरामकृष्ण परमहंस देव) कहते हैं। जिसके तुल्य न कोई हुआ, न है और न होगा। जब तुल्य नहीं तो उससे अधिक क्योंकर हो सकता है? जैसे परमेश्वर के सत्य, न्याय, दया, सर्वसामर्थ्य और सर्वज्ञत्वादि अनन्त गुण हैं, वैसे अन्य किसी जड़ पदार्थ वा जीव के नहीं हैं। जो पदार्थ सत्य है, उसके गुण, कर्म्म, स्वभाव भी सत्य ही होते हैं। इसलिए सब मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर ही की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करें, उससे भिन्न की कभी न करें। 

मित्र आदि नामों से सखा और इन्द्रादि देवों के प्रसिद्ध व्यवहार देखने से उन्हीं का ग्रहण करना योग्य नहीं, क्योंकि जो मनुष्य किसी का मित्र है, वही अन्य का शत्रु और किसी से उदासीन भी देखने में आता है। इससे मुख्यार्थ में सखा आदि का ग्रहण नहीं हो सकता क्योंकि परमेश्वर के जैसा सब जगत् का निश्चित मित्र, न किसी का शत्रु और न किसी से उदासीन है, इससे भिन्न कोई भी जीव इस प्रकार का कभी नहीं हो सकता, इसलिये परमात्मा ही का ग्रहण यहाँ होता है। हाँ, गौण अर्थ में मित्रदि शब्द से सुहृदादि मनुष्यों का ग्रहण होता है
    विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ वेदों में भी मित्रता की अवधारणा है। मित्रता के गुण की महिमा परमेश्वरोक्त ग्रन्थ वेद में भी गाये गये हैं, और मनुष्यों के मध्य परस्पर मित्रता की कामना की गई है। अथर्ववेद 7/36/1 में परस्पर मित्रता होने की कामना करते हुए कहा गया है कि हम दोनों मित्रों की दोनों आँखें ज्ञान का प्रकाश करने वाली हों। हम दोनों का मुख यथावत विकास वाला होवे। हमें अपने हृदय के भीतर कर लो। हम दोनों का मन भी एकमेव हो। अर्थात् हम सदा ही प्रीति पूर्वक रहें। यजुर्वेद 36/18 में सभी के प्रति मित्रभाव होने की प्रार्थना परमात्मा से करते हुए कहा गया है कि तुम मुझे दृढ़ बनाओ। सर्वभूत मुझे मित्र की दृष्टि से देखें। मैं भी सर्वभूतों को मित्र की ही दृष्टि से देखूँ। हम परस्पर मित्र की दृष्टि से देखें। मित्रता में मनुष्यों के मध्य एकमत होना सबका विचार एक होना आवश्यक है, अन्यथा यह सम्बन्ध प्रगाढ़ नहीं हो सकती। इसलिए परमेश्वर स्वयं सभी को एकमत होने का सन्देश देते हुए ऋग्वेद 10/191/2 में कहता है-हे स्तीताओं ! तुम मिलकर रहो। एक साथ स्तोत्र पढ़ो और तुम लोगों का मन एक सा हो। प्राचीन देवताओं के एकमत होकर अपना हविर्भाग स्वीकार करने की भांति ही तुम लोग भी एकमत होकर रहो। इसका अगला मन्त्र ऋग्वेद 10/191/3 सबके विचार एक होने की कामना करते हुए कहता है कि इन पुरोहितों की स्तुति एक सी हो, इनका आगमन एक साथ हो और इनके मन (अन्तःकरण) तथा चित्त (विचारजन्य ज्ञान) एकविध हों। ऋग्वेद 6/45/6 में परमात्मा से द्वेषभाव न होने की प्रार्थना करते हुए कहा गया है कि हे प्रभु ! तू द्वेष करने वाले के द्वेषभाव को निश्चय ही निकाल डालता है। तू उन्हें अपना प्रशंसक बना देता है। सच्चे मनुष्यों से तू सुवीर कहलाता है। >>>ईर्ष्या मित्रता की सबसे बड़ी बाधक है। इसीलिए ईर्ष्या से मुक्त होने का संदेश देते हुए अथर्ववेद 6/18/1 में परमात्मा की वाणी है कि, " हे ईर्ष्या संतप्त मनुष्य ! हम ईर्ष्या की पहली और उसके बाद वाली अर्थात् दूसरी वेगवती गति को, ज्वाला को बुझाते हैं। इस तरह तेरी उस हृदय में जलने वाली अग्नि को तथा उसके शोक संताप को बिल्कुल शान्त कर देते हैं। अर्थात् मनुष्य को  दूसरे की वृद्धि देख कर कभी ईर्ष्या नहीं करना चाहिए। द्वेष की परम्परा का अवसान करने के लिए अथर्ववेद 19/41/1 में कहा गया है कि " हे भाई ! मैं ही तेरे साथ द्वेष करना छोड़ देता हूँ। अब यही कल्याणकर है कि मैं स्वयं ही अब इस मूछों की लड़ाई की समाप्ति पर आ जाऊँ, शत्रुता की परम्परा का विराम कर दूँ। द्यौ और पृथ्वी भी मेरे लिए अब कल्याण-कारी हो जाएँ। सभी दिशाएँ मेरे लिए शत्रुरहित हो जाएँ। मेरे लिए अब अभय ही अभय हो जाए। अथर्ववेद 6/40/3 में परमात्मा इंद्र से प्रार्थना करते हुए हुए कहा गया है कि हमारे लिए नीचे से निर्वैरता, ऊपर से, पीछे से और आगे से निर्वैरता तू हमारे लिए कर दे। अर्थात् हम सदा निर्वैर हो कर रहें। 
    अथर्ववेद 14/1/22 में आपसी प्रेम व संयुक्त परिवार का संदेश देते हुए वर-वधू से परिवार में सबके मिलकर रहने की आकांक्षा की गई है, कि यहाँ गृहस्थाश्रम के नियमों में ही तुम दोनों  रहो। कभी अलग मत होओ। पुत्रों के साथ तथा नातियों के साथ क्रीड़ा करते हुए, हर्ष मनाते हुए और उत्तम घर वाले तुम दोनों सम्पूर्ण आयु को प्राप्त होओ। अथर्ववेद 3/30/2 में कामना की गई है कि पुत्र पिता के अनुकूल व्रती हो कर माता के साथ एक मन वाला होवे। पत्नी-पति से मधुवत अर्थात् मधु के समान और और शान्तिप्रद वाणी बोले। सन्तान माता-पिता की आज्ञाकारी और माता-पिता सन्तानों के हितकारी हों। पति-पत्नी आपस में मधुरभाषी और मित्र हों। 

   यजुर्वेद 2/34 में पितरों को अनेक प्रकार के उत्तम-उत्तम रस, स्वादिष्ट जल, अमृतमय औषधि, दूध घी, स्वादिष्ट भोजन, रस से भरे हुए फलों को दे कर तृप्त करने के लिए आदेश देते हुए कहा गया है कि परधन का त्याग करके अपने को प्राप्त धन का उपयोग करने वाले होओ। अर्थात् जिस प्रकार पितर अर्थात माता-पिता आदि ने हमारा पालन-पोषण किया है, उसी प्रकार हमें भी उनकी सेवा व सत्कार करना चाहिए। अथर्ववेद 3/30/3 में भाई, भाई से और बहन, बहन से द्वेष नहीं करने, एकमत वाले और एकव्रती होकर कल्याणी रीति से वाणी बोलने अर्थात परिवार में सबके प्रेमपूर्वक रहने के लिए कहा गया है
 अथर्ववेद 20/128/2 स्त्रियों को सम्मान देने की आज्ञा देते हुए कहता है कि कुलस्त्री को गिराने, मित्र को मारने की इच्छा रखने वाले मनुष्य अतिवृद्ध हो कर भी अज्ञानी है। ऐसा मनुष्य परमात्मा को नहीं भजता और अधोगति को प्राप्त होता है। अथर्ववेद 14/1/44 में बधू को अपने श्वसुर, सास देवरों तथा ननदों के मध्य सम्राज्ञी होने की घोषणा करते हुए उसे ससुराल पक्ष के लोगों को सम्मान देने की आज्ञा देते हुए कहा गया है कि वधू ! तुम अपने विद्या और बुद्धि के बल से तथा अपने कर्तव्यों से छोटे-बड़े सबके मध्य प्रतिष्ठित हो।  इसी प्रकार अथर्ववेद 14/2/17 में वधू से कहा गया है कि तू घर वालों के लिए प्रिय दृष्टि वाली, पति को न सताने वाली, सुखदायिनी, कार्यकुशला, सुन्दर सेवा वाली, सुन्दर मनवाली, वीरों को उत्पन्न करने वाली और प्रसन्न चित्त वाली हो। तेरे साथ मिल कर हम सब घर वाले बढ़ते रहें। इस प्रकार स्पष्ट है कि वैदिक ग्रन्थों में मित्रता की महिमागान करते हुए घर-परिवार से लेकर समाज और विश्व में मित्रता, मैत्री व विश्व बन्धुत्व की कामना की गई है। 
एक मित्र होने का अर्थ है अपने सच्चे और ईमानदार हिस्से को साझा करना। मित्रता महज एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक बड़ा उत्तरदायित्व है, जिसे दोनों पक्षों को स्वेच्छा से ग्रहण करना पड़ता है। एक मित्र का कर्तव्य उच्च और महान कार्य में इस प्रकार सहायता देना, मन बढ़ाना और साहस दिलाना है कि मित्र अपनी निज की सामर्थ्य से बाहर का कार्य कर गुजरे।  ऐसे व्यक्तियों से सुग्रीव के द्वारा श्रीराम से मित्रता का बंधन बंधाये जाने के समान मित्रता का बंधन बना लेना चाहिए। मित्र प्रतिष्ठित और शुद्ध हृदय के होने चाहिए। मित्र मृदुल और पुरुषार्थी हों, शिष्ट और सत्यनिष्ठ हों, जिससे उन पर भरोसा और यह विश्वास कर सके कि उनसे किसी प्रकार का धोखा न होगा। इसीलिए मित्रों के चुनाव को सचेत कर्म समझकर हमें अपने से अधिक आत्मबल वाले व्यक्तियों को मित्र के रूप में ढूंढना चाहिए
एक व्यक्ति के कई मित्र हो सकते हैं, और प्रायः एक या दो लोगों के साथ अधिक गहन सम्बन्ध हो सकते हैं, जिन्हें अच्छे या सबसे अच्छे मित्र कहा जा सकता है। दो मित्रों के बीच मित्रता की अनेक कथाएं प्रचलित हैं। मैत्री अर्थात् मित्रता अथवा बन्धुत्व लोगों के मध्य पारस्परिक स्नेह का एक मधुर सम्बन्ध है। यह एक सहपाठी, पड़ोसी अथवा सहकर्मी जैसे परिचित अथवा सहचर की तुलना में पारस्परिक बन्धन का एक मजबूत व शक्तिशाली रूप है। 
अन्तःप्रजातीय मैत्री :  मैत्री की भावना उच्च बुद्धि वाले उच्च स्तनधारी पशुओं और कुछ पक्षियों में पाई जाती है। अन्तःप्रजातीय मैत्री मनुष्यों और पालतू पशुओं यथा, पालतू सर्प के बीच सामान्य है। मनुष्यों और पशुओं के बीच भी मैत्री हो सकती है। एक मनुष्य और एक गिलहरी अथवा बन्दर की मैत्री के दृश्य तो अक्सर ही दृष्टिगोचर होते रहते हैं। मैत्री दो पशुओं, जैसे कुत्तों और बिल्लियों के बीच भी हो सकती है। 
-अशोक “प्रवृद्ध”-सु
>>>'मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे।' (यजुर्वेद 36/18)  सभी प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखना चाहिए, लेकिन 'गृहस्थ-नेता' (राजर्षि) को हाथी नारायण है तो महावत भी नारायण है। साँप को काटने के लिए मना किया था , फुँफकारना जरूर याद रखते हुए, दूसरा गाल आगे करने के बजाये, भीतर से क्रोधित हुए बिना 'न आँख उठाकर , न आँख झुका कर , आँख से आँख मिलाकर' डिप्लोमैटिकली मुँहतोड़ उत्तर भी देना चाहिए,साथ-साथ निरंतर " सर्वेभवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया ' तथा "मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे।' (यजुर्वेद 36/18) की प्रार्थना भी जारी रहनी चाहिये। जैसे जयशंकर ने पन्नू खालिस्तानी और पाकिस्तानी का साथ देने पर अमेरिका और कनाडा को सुनाया है।  लेकिन लीडर को अपना संतुलन बनाये रखने के लिए, यह याद रखने के लिए मैं देह नहीं आत्मा हूँ और - यहाँ x  का पति, भाई, पिता  और, होने का ऐक्टिंग कर रहा हूँ। वेद सुझाते हैं कि हम सबको परस्पर "मित्र की दृष्टि" से देखना चाहिए। मित्र (नवनीदा की दृष्टि -सूर्य निर्लिप्त भाव से) सबको समान दृष्टि से देखता है। (2020- 2023) > जीवन का स्वर्णिम काल है जब मैंने 'सर्वेभवन्तु मंत्र और वेदों के मित्रस्य चक्षु समीक्षामहे' का (अर्थ - हमें विश्व के सभी प्राणी मित्र दृष्टि से नित मुझे देखें, और सभी प्राणियों मित्रों को हम भी मित्र दृष्टि से नित देखें। poise या शिष्टता,या शाप ? का टेस्ट तुलनात्मक अध्यन किया - तो समझा ब्रह्म ही जगत बन गया हैं - इसलिए कोई बुरा नहीं है।  समझने पर व्यष्टि अहं सर्वगत अहं में रूपान्तरित  हो गया है, या नहीं ? इसके Test का इंतजाम माँ ने  पर सौंपा था ?
द्रते दिह मा मित्रस्य म चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षान्तम्। मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षा । मित्रस्य चक्षु शा समीक्षामहे ॥ -यजु0 36.18
हे ( द्रते )= अविद्यान्धकार के चिकित्सक, जगदीश्वर (ठाकुरदेव माँ काली) ! ( दुंहा मा ) मुझे मजबूती प्रदान करें। (मित्रस्य चक्षुषा) मित्र की आँख से (मा) मुझे (सर्वाणि भूतानि) सब प्राणी (समीक्षान्ताम्) देखें। (मित्रस्य चक्षुषा) मित्र की आँख से (अहं) मैं (सर्वाणिभूतानि) सब प्राणियों को (समीक्षे) देखें। (मित्रस्य चक्षुषा) मित्र की आँख से (समीक्षकहे) हम सब एक-दूसरे को देखते हैं।
 व्याख्या अविद्या-अस्मिता पंचक्लेश के अंधकार में पीड़ित बने रहने के कारण हमें यह नहीं पता कि समाज में अन्य छात्रों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, एक-दूसरे को जैसी दृष्टि से देखना चाहिए। हम एकता कलह, विद्वेष, असन्तोष, उपद्रव, मार-काट में ही जीना चाहते हैं, भय के वातावरण में ही रहना पसंद करते हैं, चोरी-डकैती, अतिवाद और हिंसा के नग्न तांडव और अर्तनाद में ही जीना चाहते हैं। पता नहीं कब कोई किसी की जान ले लेगा, पता नहीं कब किस पर वज्रपात हो जाएगा और उसके आश्रय में रहने वाले की शिकायत कर उठेंगे, पता नहीं कब कोई अनाधिकृत विधवा हो जाएगी और उसके तथा उसकी अस्थि-पंजर के विलाप से दिशा करने लगेगी, पता नहीं कब राजमहलों रहनेवाले परिवार में खण्डहरों के निवासी हो जायेंगे, पता नहीं कब अच्छे घरों के लोग पर बसेरा करने को बसेरे हो जायेंगे। ऐसी भीषण परिस्थितियाँ पैदा होने वाले आतंकवादी हमले को, वेदना को, अनुभव क्यों नहीं करतीं? वे शांति को भंग करने और हँसी-मज़ाक करने वालों में ही सुखी क्यों होते हैं?
आओ इस परस्पर के ईर्ष्या-द्वेष, घृणा की संहार-लीला को खत्म करें हम आपसी प्रेम और भाईचारे से रहना सीखें हम जिनका घर लूटते हैं, वे अगर हमारा घर लूटेंगे  हैं तो हमें कैसा लगेगा ? थोड़ी देर के लिए यह भी तोड़ दें। हम स्टूडियो जान लेते हैं, वे अगर हमारी जान फिल्म में उतारू हों, तो हम कैसा अनुभव लेंगे, यह भी स्टूडियो। एक दिन आएगा जब हम हिंसा, मार-धाड़, व्यंग्य, हाहाकार, विलाप के माहौल से तांग ज्ञान शांति और प्रेम के माहौल की आवश्यकता अनुभव करने के लिए। तब बन्दूकों, तलवारों और बम के गोलों से हमारा विश्वास उठेगा। कराहती बधियाँ हमें प्रेम, स्मारक और मैत्री का वातावरण जन्म लेने को मिला।
जब मनुष्य में अहिंसा प्रतिष्ठित हो जाती है, तब सिंह, व्याघ्र आदि हिंसक जीव भी वैरभाव को ठीक मित्र बन जाते हैं। क्या आपने सच्ची कहानी नहीं सुनी है कि एक शेर बंदूक  की गोली से आहत हो गया था, उसकी मरहम पट्टी एक बौद्ध साधु ने किया था और उस साधु के मंच पर सिर झुकाने वह शेर रोजाना नियत समय पर आता था। सभी प्राणी हमें मित्र की आंख से देखें, हम सभी प्राणी हमें मित्र की आंख से देखें। मित्रता और शांति के साम्राज्य में हम रहते हैं। एक-दूसरे के सुख-दु:ख में हम साझी हैं। दूसरे का आनंद लेने पर हम भी आनंदित होते हैं, दूसरे का आनंद लेने पर हम भी आनंद लेते हैं। हे जगदीश्वर हमें ऐसा दिन देखने का सौभाग्य प्रदान करो।       >>>विषय : परस्पर मेल का उपदेश।

Atharvaveda / 3 / 30 / 1
सहृ॑दयं सांमन॒स्यमवि॑द्वेषं कृणोमि वः। अ॒न्यो अ॒न्यम॒भि ह॑र्यत व॒त्सं जा॒तमि॑वा॒घ्न्या ॥ 1॥
पदार्थ : (सहृदयम्) एकहृदयता, (सांमनस्यम्) एकमनता और (अविद्वेषम्) निर्वैरता (वः) तुम्हारे लिये (कृणोमि) मैं करता हूँ। (अन्यो अन्यम्) एक दूसरे को (अभि) सब ओर से (हर्यत) तुम प्रीति से चाहो (अघ्न्या इव) जैसे न मारने योग्य, गौ (जातम्) उत्पन्न हुए (वत्सम्) बछड़े को [प्यार करती है] ॥१॥"
भावार्थ : ईश्वर उपदेश करता है, सब मनुष्य वेदानुगामी होकर सत्य ग्रहण करके एकमतता करें और आपा छोड़कर (अर्थात मिथ्या अहं को सर्वगत अहं में रूपान्तरित कर) सच्चे प्रेम से एक दूसरे को सुधारें, जैसे गौ आपा छोड़कर तद्रूप होकर पूर्ण प्रीति से उत्पन्न हुए बच्चे को जीभ से चाटकर शुद्ध करती और खड़ा करके दूध पिलाती और पुष्ट करती है ॥१॥
टिप्पणी :१−तैत्तिरीयारण्यक में पाठ है−ओ३म्। सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। तैत्ति० आ० १०।१ ॥ ओ३म्। (सह) वही (नौ) हम दोनों को (अवतु) बचावे। (सह) वही (नौ) हम दोनों को (भुनक्तु) पाले। हम दोनों (सह) मिलकर (वीर्यम्) उत्साह (करवावहै) करें। (नौ) हम दोनों का (अधीतम्) पढ़ा हुआ (तेजस्वि) तेजस्वी (अस्तु) होवे। (मा विद्विषावहै) हम दोनों झगड़ा न करें ॥ भगवान् यास्क मुनि कहते हैं। (अघ्न्या) गौ का नाम है−निघ० २।११। वह अहन्तव्या, [अवध्या न मारने योग्य] अथवा, अघघ्नी [पाप अर्थात् शारीरिक दुःख अथवा दुर्भिक्षादि पीड़ा नाश करनेवाली] होती है−निरुक्त ११।४३ ॥ श्रीमान् महीधर यजुर्वेदभाष्य अ० १ म० १ में लिखते हैं−अघ्न्या गौएँ हैं। गोवध उपपातक ‘भारी पाप’ है, इसलिये वे न मारने योग्य ‘अघ्न्या’ कही जाती हैं ॥ १−(सहृदयम्) वृह्रोः षुग्दुकौ च। उ० ४।१०। इति हृञ् हरणे=स्वीकारे कयन्, दुक् च। सहस्य सभावः। सहग्रहणम्। सहवीर्यम्। (सांमनस्यम्) सम्+मनस्-भावे ष्यञ्। समानमननत्वम्। ऐकमत्यम् (अविद्वेषम्)। द्विष वैरे-घञ्। अशत्रुताम्। सख्यम् (कृणोमि) उत्पादयामि। (वः) युष्मभ्यम्। (अन्यो अन्यम्) छान्दसं द्विपदत्वम्। परस्परम्। (अभि) सर्वतः। (हर्यत) हर्य गतिकान्त्योः। कामयध्वम्। (वत्सम्) अ० ३।१२।३। गोशिशुम्। (जातम्) नवोत्पन्नम्। (इव) यथा। (अघ्न्या) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२।

2॥ अनु॑व्रतः पि॒तुः पु॒त्रो मा॒त्रा भ॑वतु॒ संम॑नाः। जा॒या पत्ये॒ मधु॑मतीं॒ वाचं॑ वदतु शन्ति॒वाम् ॥ 
पदपाठ : अनु॑ऽव्रत: । पि॒तु: । पु॒त्र । मा॒त्रा । भ॒व॒तु॒ । सम्ऽम॑ना: । जा॒या । पत्ये॑ । मधु॑ऽमतीम् । वाच॑म् । व॒द॒तु॒ । श॒न्ति॒ऽवाम् ॥३०.२॥
पदार्थ : (पुत्रः) कुलशोधक पवित्र, बहुरक्षक वा नरक से बचानेवाला पुत्र [सन्तान] (पितुः) पिता के (अनुव्रतः) अनुकूल व्रती होकर (मात्रा) माता के साथ (संमनाः) एक मनवाला (भवतु) होवे। (जाया) पत्नी (पत्ये) पति से (मधुमतीम्) जैसे मधु में सनी और (शन्तिवाम्) शान्ति से भरी (वाचम्) वाणी (वदतु) बोले ॥२॥"
भावार्थ : सन्तान माता पिता के आज्ञाकारी, और माता पिता सन्तानों के हितकारी, पत्नी और पति आपस में मधुरभाषी तथा सुखदायी हों। यही वैदिक कर्म आनन्दमूल है। मन्त्र १ देखो ॥२॥
विषय : एकता मेल का उपदेश।
माँ भ्राता॒ भ्रात्॑रं द्विक्ष॒न्मा स्वसा॑रमु॒त स्वसा॑। स॒म्यञ्चः सवृता भू॒त्व वाचं॑ वदत भ॒द्रय॑ ॥ अथर्ववेद | कांड : 3 | सूक्त : 30 | मंत्र क्रमांक : 3
पदार्थ : (भ्राता) भ्राता (भ्रातरम्) भ्राता से (मा द्वितीय) द्वेष न करे (उत्) और (स्वसा) बहिन (स्वसारम्) बहिन से भी (मा) नहीं। (सम्यञ्चः) एक मत वाले और (सवृताः) एकव्रती (भूत्वा) अकार (भद्राया) कल्याणी रीति से (वाचम्) वाणी (वदत) बोलो 3॥"
भावार्थ: भाई-भाई, बहिन-बहिन और सब कुटुम्बी नियम डिक मेल से वैदिक रीति पर सुख भोगें ॥3॥
भावार्थ: भाई-भाई, बहिन-बहिन और सब कुटुम्बी नियम आदि  मेल से वैदिक रीति पर सुख भोगें ॥3॥

येन॑ देवा न वि॒यन्ति॒ नो च॑ विद्विषते॑ मि॒थाः। तत्कृ॑नमो॒ ब्रह्म॑ वो गृहे सं॒ज्ञानं॒ पुरु॑शेभ्यः ॥ 4॥
पदार्थ: (येन) जिस [वेद पथ] से (देवाः) विजय सामान्यवाले पुरुष (न) नहीं (वियन्ति) साथ में रहते हैं (च) और (नो) न कभी (मिथः) अपने में (विद्विष्टे) विद्वेष करते हैं। (तत्) उस (ब्रह्म) वेद पथ को (वः)फाइ (गृहे) घर में (पुरुषेभ्यः) सब पुरुषों के लिए (संज्ञानम्) ठीक-ठीक ज्ञान का कारण (कृण्मः) हम करते हैं ॥4॥" 
भावार्थ :सर्वभौम हितकारी वेदमार्ग घर के सभी लोग आनंद भोगें ॥4॥
ज्याय॑स्वन्तश्चि॒त्तिनो॒ मा वि यौ॑ष्ट संरा॒धाय॑न्तः॒ साधु॑रा॒श्चर॑न्तः। अ॒न्यो अ॒न्यस्मै॑ व॒लगु वद॑न्त॒ एत॑ साध्रि॒चीना॑न्वः॒ संम॑नसस्कृणोमि॥ 5॥
पदार्थ : (ज्यायसंतः) बड़ों का मन रखेवाले (चित्तिनः) उत्तम चित्तवाले, (संराध्यायन्तः) समृद्धि [धन-धान्य की वृद्धि] करते रहे और (सधुराः) एक धुरा भरा (चरन्तः) बचे रहे तुम लोग (मा वि यौष्ट) अलग-अलग होओ, और (अन्यो अन्यस्मै) एक दूसरे से (वल्गु) मनोहर (वदंतः) टूटे हुए (एट) आओ। (वः) तुमको (सदृचिनान्) साथ-साथ गति [उद्योग वा विज्ञान] वाले और (संमानसः) एक मनवले (कृणोमि) मैं करता हूं ॥5॥"
भावार्थ: वेदानुयायी मनुष्य विद्यावृद्ध, धनवृद्ध, आयुवृद्धों का आदर्श बनाकर उत्तम गुणों की प्राप्ति, और समूह उद्योग से, धन धान्य राज आदि आनंद और भोगते हैं। 
अथर्ववेद/3/31/1 वि देवा ज॒रसा॑वृत॒नवि त्वम्॑ग्ने॒ अर॑त्या। व्य॒॑हं सर्वे॑ण प॒पमना॒ वि यक्ष्मे॑ण॒ समयौषा॥ 1॥
विषय: आयु वृद्धि का उपदेश।
पदार्थ : (देवः) विजय सामान्यवाले पुरुष (जरसा) आयु के घटेव से (वि) भिन्न (अवृतन्) रह रहे हैं। (अग्ने) हे विद्वान् पुरुष (त्वम्) तू (अरात्या) कंजूसी वा शत्रुता से (वि=वि वर्तस्व) भिन्न रह। (अहम्) मैं (सर्वेण) सब (पाप्मना) पाप कर्म से (वि) अलग और (यक्ष्मेण) राजरोग, क्षयी आदि से (वि=विवर्त्तै) अलग रहूं और (आयुषा) जीवन [उत्साः] से (सम्=सम् वर्तै) मिला रहौं ॥1॥"
भावार्थ : पुरुषार्थी लोग ब्रह्मचर्य आदि के सेवन से सदा बलवान रहते हैं, इसी प्रकार सभी मनुष्य मानसिक पाप और शारीरिक रोग के त्याग और शुभ लक्षण के सेवन बल से अपना जीवन सफल करते हैं ॥॥ 
साभार https://www.vedyog.net/mantra_atharvaveda.php?id=10081
=========================