🔴 LIVE | Day 03 | श्रीरामकृष्ण विश्व सद्भावना निकेतन | लोकार्पण एवं प्राणप्रतिष्ठा | 19 जनवरी 2026
स्वामी विष्णुपादानन्द जी महाराज, सभा के अध्यक्ष का सम्बोधन -
(3:38:33)
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
आज के सभा चर्चा का विषय है - "श्री सारदा देवी , उनका दिव्य जीवन और उनका सन्देश।" अबतक अपने चार अन्य विद्वान् और अनुभवी वक्ताओं को आपने सुना। आप उनकी वाणी का आनन्द ले रहे थे। उन सबने माताजी के जीवन की महानता, सरलता , सहजता इन सारे पहलुओं पर अपने विचार रखे और हम सब को अभिभूत कर दिया। मुग्ध कर दिया। माताजी का जीवन सुनाते हुए ये लोग इतने भावपूर्ण थे मानों वे उन बातों को अपने हृदय के अन्तःकरण से कह रहे हैं।
वे केवल बुद्धि द्वारा नहीं ,केवल अपनी स्मरण शक्ति का उपयोग करके नहीं। उसका उपयोग तो खैर करना ही पड़ता है। माँ का जीवन उनके अपने ह्रदय के भीतर कितना प्रविष्ट हुआ है , उनकी बातों को कहते समय वे अपने के भावों को ह्रदय की भावुकता के साथ प्रकट कर रहे थे। जब हम माँ का जीवन चरित्र सुन रहे थे , तो माँ के जीवन के माध्यम से , हम ठाकुर जी को भी समझ रहे हैं। और स्वामी विवेकानन्द जी को भी सुन रहे हैं। तीनों विभूतियों का जीवन एक ही है। ये हम अनुभव कर रहे हैं।
महापुरुषों के जीवन की दिव्यता स्वतः प्रमाणित है। वे हमारे ह्रदय को स्पर्श करती है। क्योंकि उनकी दिव्यता सहज और स्वाभाविक होती है। जैसे हम अनेक रूपों में देवी की पूजा करते हैं। सभी रूपों में प्रकृति , सृष्टि और मातृशक्ति की जो बात है , माँ की कृपा करुणा हमलोगों तक पहुँचती है। हम सन्तानों के प्रति माँ का प्रेम। माँ चाहती हैं कि उनकी सन्तान सुख में रहे, आनन्द में रहे और आगे बढ़े। पुत्र कैसा भी हो , माँ का प्रेम उसके प्रति हमेशा बना रहता है। (https://www.facebook.com/groups/925716234695876/posts/1965143047419851/)
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति,
सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं
तव सुतः।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव,
शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता
न भवति॥३॥
[अर्थात: माँ ! इस पृथ्वी पर तुम्हारे सीधे सादे पुत्र तो बहुत से हैं। किन्तु उन सब में ही अत्यंत चपल तुम्हारा बालक हूँ। मेरे जैसे चंचल कोई विरला ही होगा। शिवे ! मेरा जो यह त्याग हुआ है,यह तुम्हारे लिए कदापि उचित नहीं है। क्योंकि संसार में कुपुत्र का होना संभव है किन्तु माता कभी कुमाता नहीं हो सकती।"]
शंकराचार्यजी कहते हैं -' कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति' माता के कुमाता होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। और ये माँ श्री सारदा देवी तो हमारे लिए संघ -जननी हैं। और हम सभी भक्तो की भी जननी है , क्योंकि हम संन्यासी संघ के अटूट अंग हैं। संघ से एकाकार हुए हैं। और गृही आप सभी भक्त लोग भी रामकृष्ण मठ और मिशन, स्वामी जी द्वारा निर्धारित जिसका जुड़वाँ आदर्श वाक्य है-"आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च" (हिन्दी अर्थ : स्वयं के मोक्ष के लिए तथा जगत के कल्याण के लिए), के अभिन्न अंग हैं। [ विवेकानन्द युवा महामण्डल (विवेकानन्द ज्ञानमन्दिर स्कूल चरित्र-निर्माणकारी) आन्दोलन जिसका स्वरुप प्राथमिक विद्यालय जैसा है और जिसका आदर्श वाक्य भी स्वामी विवेकानन्द द्वारा ही निर्धारित है- 'Be and Make' (और पूज्य दादा के अनुसार 'मनुष्य बनो और बनाओ' आन्दोलन की स्थापना भी ठाकुर की इच्छा , माँ का आशीर्वाद और स्वामी विवेकानन्द की प्रेरणा से किसी न किसी को निमित्त बनाकर ही हुई है।] अतएव इन संगठनों से जुड़े हम सभी लोग संघ के ही अटूट अंग हैं, इसलिए ठाकुर -माँ -स्वामीजी की कृपा के पात्र हैं। इसलिए श्रीरामकृष्ण देव , श्री माँ और स्वामी विवेकानन्द इस संघ के माध्यम से , हम सबके ऊपर कृपा वर्षण कर रहे हैं। इसका स्पष्ट आभास शायद हर समय हमें न होता हो , क्योंकि उतनी क्षमता या योग्यता हममें नहीं है। जिस मनुष्योचित विवेक का विकास जितनी गति से और जितनी मात्रा में होनी चाहिए , उस मात्रा में हमारे भीतर शायद न हुआ हो। लेकिन माँ का प्रेम सन्तानों के लिए एकतरफा प्रेम होती है। माँ की कृपा का वैशिष्ट्य यह है कि वो एकतरफा होती है। पुत्र , सन्तान, बच्चा माँ को चाहे न चाहे; माँ की कृपा का अनुभव , उनका प्रभाव क्या होता है , पुत्र न समझ पाए ,यह हो सकता है। लेकिन माँ अपने बच्चों से प्रेम पाने की अपेक्षा नहीं करती हैं। उनका प्रेम एक तरफा होता है , क्योंकि वह माँ हैं, संतान को जन्म देने वाली जननी है, अपनी सृष्टि की बात है। (3:46:00)
सन्तान माता से बहुत प्रेम करता है। जब माता आँखों के सामने नहीं होती है , तो उसे सब तरफ अँधेरा दीखता है। वो माँ , माँ करके रोता है। लेकिन यह अवस्था बालक की होती है , जब वो छोटा होता है। श्रीरामकृष्ण देव ने बड़ा सुंदर उदाहरण दिया है , कि माँ किंवाड़ के पीछे छिपी हुई है , और बच्चा माँ को देख नहीं पाता। चारों तरफ , इधर-उधर खोजता है , माँ कहीं दिखाई नहीं दे रही है। तो उसको रोना आ जाता है , और उसकी आँखों से अश्रु की धारा बहने लगती हैं। जोर से रोने लगता है , तो अबतक जो माँ दरवाजे के पीछे छिपी हुई है , वो सामने आती है। और उस बालक को या बालिका को ऊपर गोद में उठा लेती है। उसे चूमते हुए अपने प्रेम को दर्शाती हैं। माँ को जब अपने बच्चे से इतना प्रेम है , तो उसकी आँखों से ओझल होने की आवश्यकता ही क्या है ? (3:47:34)
कोई जरुरी नहीं है। लेकिन वो माता का प्रेम है , उसे मालूम है कि मेरे बिना मेरी सन्तान नहीं रह सकती है। उसको परीक्षा लेने की भी आवश्यकता नहीं है , परखने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन फिर भी वे परीक्षा लेती हैं। क्योंकि परीक्षा उसका पुत्र के प्रति प्रेम है , पुत्र का उसका प्रति प्रेम है - उसका अनुभव वो बार -बार करना चाहती है। इसलिए माँ थोड़ा सा परेशान करती हैं हमें। उनकी इच्छा कष्ट देने की नहीं है , हमें परेशान करने की नहीं है। मेरे बिना मेरी सन्तान एक क्षण भी नहीं रह सकती है , उस आनंद का अनुभव करने के लिए छिपती है। वही बालक जब बड़ा होता है। माता-पिता के प्रति दुर्व्यवहार करता है। और वह माँ के प्रेम को भूल जाता है। जो बच्चा माँ के बिना कुछ पल भी नहीं रह सकता था। और वही माँ मानो है ही नहीं , इस प्रकार से आचरण करता है। अपनी माँ के पास कुछ पल भी बैठ नहीं सकता। माँ से बात करने के लिए समय नहीं है , बाकि सब चीजों के लिए समय है। बाकि सबको अपना कर्तव्य और महत्वपूर्ण बात समझता है। लेकिन जिस माँ ने उसका प्रेम से पालन-पोषण किया, उसकी याद उसका महत्व अब उसे याद नहीं आता। माँ से बात करने का समय नहीं रहता।
लेकिन हमारी जो माँ जगदम्बा हैं , उन्होंने अपने संसार को छोड़ दिया , अपने मर्त्य शरीर को त्याग दिया। कई साल हो गए , लेकिन हम अब भी माँ को भूल नहीं पाए हैं , और न कभी भूल सकेंगे। क्योंकि माँ की कृपा का जो प्रवाह है , वह बिना रुके चल रहा है। और इसका अनुभव सभी भक्तों को होता है। शास्त्र कहता है कि अविनाशी आत्मा (ईश्वर, भगवान,सत्य, ब्रह्म, सच्चिदानन्द ) के लिए समय (काल या मृत्यु) कोई बाधा ही नहीं है। वैसे संसार की अन्य सब चीजें समय/काल से बाधित होती हैं। (3: 50:28) इसीलिए कहा जाता है - कालाय तस्मै नमः ! (वैराग्य शतक)
[सा रम्या नगरी महान्स नृपतिः सामन्तचक्रं च तत्
पार्श्वे तस्य च सा विदग्धपरिषत्ताश्चन्द्रबिम्बाननाः ।
उद्वृत्तः स च राजपुत्रनिवहस्ते बन्दिनस्ताः कथाः
सर्वं यस्य वशादगात्स्मृतिपथं कालाय तस्मै नमः ॥ ४१॥
वह रम्य नगरी, उसके महान् राजा, उसके दरबार में बैठे वह सामन्त-समूह और उसके चतुर मंत्री, वे चन्द्रमुखी नृत्यांगनायें, वे सनकी, मनमौजी (whimsical) राजकुमार, वे भाट-चारण और उनकी गाथाएँ। यह सब जिस समय के बल से मात्र स्मृति बन कर रह गए उस काल को, नमन है।वैराग्य शतकम् - Part 1॥ वैराग्य शतकम् भर्तृहरिविरचितम् ॥ कालमहिमानुवर्णनम् ।]
ऐसा जो काल है - सब चीजों को बाधित करता है। व्यक्ति का महत्व कम हो जाता है , और लोग उसे भूल जाते हैं। लेकिन माँ की विस्मृति होना बहुत ही सामान्य बात है। माता-पिता को भूलना , दादा-दादी को भूलना , सबको भूल जाता है। कृतज्ञता का जो महान गुण हैं , उसको हम अपने जीवन में उतार नहीं पाते हैं। ये हमारी भूल है , और हमारे दुखों का एक प्रमुख कारण है। हम मनुष्यों में कृतज्ञता नहीं है। क्योंकि हममें अहंकार (जीव का अहं M/F ) है हममें राग-द्वेष आसक्ति है। अनेक प्रकार की वासनाओं (3K में आसक्ति) ने हमारे जीवन में स्थान बना लिया है। इसीलिए वास्तव में जो हमारे अपने हैं , जिहोंने हम पर प्रेम वर्षण किया है -हमें सब कुछ माना है। माँ सारदा के लिए (गुरुदेव और नवनीदा के लिए) बच्चा तो आँख की पुतली होता है। एक समय में हम पर कितना प्रेम , वर्षण किया है , पर वह प्रेम हमें याद नहीं आता। पुरानी बात हो गयी है।
लेकिन जो हमारी अपनी माँ नहीं हो , तो भी अपनी माँ से कई गुना अधिक प्रेम देने वाली हमारी जगतजननी है , जगदम्बा है। हमारी अपनी हो जाती है। क्यों ? क्योंकि उस प्रेम का रूप सम्पूर्णतया अलग है। वह प्रेम लौकिक नहीं है। वो प्रेम साधारण नहीं है , वो प्रेम दिव्य है। माँ का प्रेम बहुत अद्भुत चीज होती है। लेकिन उस प्रेम की दिव्यता का स्पर्श हम केवल इस प्रकार के अवतार पुरुष , भगवान जो स्वयं पुरुष देह धारण करके आते हैं। भगवान कभी स्त्री शरीर धारण करते हैं। (3:52:56) स्त्री शरीर और पुरुष शरीर अलग नहीं होते हैं। एक ही हैं! माँ हर प्राणी में मातृ रूप में स्थित हैं। इसलिए हमारी परम्परा में , अर्धनारीश्वर का भाव है। कैसे दिखाएंगे? एक आधार में नारी भी है , नर भी है। शिव भी है शक्ति भी है। उसको कल्पना से चित्रित करना पड़ेगा।
लेकिन जब हम श्री रामकृष्ण और श्री माँ का जीवन देखते हैं , और उसमें हम स्वामी विवेकानन्द को भी जोड़ देते हैं। तब हम देखते हैं इन त्रयी की मूर्ति का जो सार है , वो प्रेम है। इनके प्रेम में किसी प्रकार की लौकिकता नहीं है। लौकिक दीखता है, लेकिन प्रेम अलौकिक है। भोजन के बाद जो पान का बीड़ा माँ बनाती हैं , वो अपने सन्तानों के लिए अलग बनाती हैं। भक्त सन्तानों के लिए अलग बनाती हैं। उसका कारण भी देती हैं। ये तो अपने ही हैं , उनको तो अपना बनाना है। ये तो लैकिक बात है , सब जानते हैं। इसमें कौन सी अलौकिकता है ? सब माँ जानती है -अपना बच्चा अपना होता है , पराया बच्चा पराया होता है। लेकिन माँ का प्रेम के पीछे उसके जो संन्यासी संतान हैं उनके लिए थोड़ा ज्यादा प्रेम है, और गृहस्थ भक्तों के लिए कम है , ऐसी बात नहीं है। लेकिन माँ का जो व्यवहार है , उस व्यवहार में भी मधुरता है। ये जो व्यावहारिक दिव्यता (Practical divinity) है, उसका वर्णन चारो वक्ताओं ने उसका वर्णन स्वयं को भूल कर किया है। माता जी के दिव्य जीवन की इतने प्रसंग बताये हैं , श्रीरामकृष्ण के जीवन में व्यावहारिक दिव्यता के कितने ही प्रसंग हैं। एक-एक प्रसंग हमारे जीवन को पवित्र बनाता है , हमें पावन करता है। स्वामी विवेकानन्द जी के जीवन में भी कितने ऐसे प्रसंग हैं , जिनको हम जब पढ़ते हैं , तो हमारे जीवन में विकास होता है , हमारा जीवन उन्नत होता है। स्वामी जी के जीवन में उनकी व्यावहारिक दिव्यता को देखने से , हमारे विचारों में पवित्रता आती है। हमारी बुद्धि में (दृष्टिकोण या मति में) शुद्धता आती है। पवित्र जीवन जीने के लिए जो प्रेरणा चाहिए , बल चाहिए , वह शक्ति हमें प्राप्त होती है।
आज हमने इन वक्ताओं के मुख से जितनी घटनाओं को सुना - वो हमें अनेक किताबों से पढ़कर मालूम थीं। 'शतरूपे सारदा ' कृपा करने के लिए 'माँ सारदा के सैकड़ों रूप हैं !' आदि के बारे में जब हम सुनते हैं , तो अलग आनंद होता है। लेकिन वह आनन्द हमारे मानव जीवन को धन्य बनाने वाली हैं। हमें कृत-कृत्य और कृतार्थ बनाने वाली बात है। क्योंकि अवतार पुरुषों का जन्म साधारण नहीं होता है। हमलोगों का जीवन साधारण होता है , लौकिक होता है। उसमें कोई विशेषता नहीं होती है। लेकिन अवतार पुरुषों (ईश्वरकोटि?) का जीवन असाधारण होता है। असाधारण मतलब -दिव्य होता है। भगवत गीता के चौथे अध्याय का वह श्लोक -
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।4.9।।
।।4.9।। हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। इस प्रकार (मेरे जन्म और कर्म को) जो मनुष्य तत्त्व से जान लेता अर्थात् दृढ़तापूर्वक मान लेता है, वह शरीर का त्याग करके पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, प्रत्युत मुझे प्राप्त होता है। (4:03:48)
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया।।4.6।।
।।4.6।। यद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी ब्रह्म स्वरूप हूँ और भूतमात्र का ईश्वर हूँ (तथापि) अपनी प्रकृति को अपने अधीन रखकर (अधिष्ठाय) मैं अपनी माया से जन्म लेता हूँ।।
मानो उनका जन्म हुआ है। मानो उन्होंने देह धारण किया है। मानो लोगों के ऊपर वो कृपा कर रहे हैं , अनुकम्पा, करुणा , दया दिखा रहे हैं। लेकिन उनकी दया, कृपा हमलोगों के जैसे नहीं है , गीता में भगवान ने स्वयं कहा है। अवतार का कर्म क्या है ? वो भी स्पष्ट कहा गया है -कि धर्मसंस्थापनार्थाय -
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।4.8।।
।।4.8।। साधुओं-(भक्तों-) की रक्षा करनेके लिये, पापकर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और धर्मकी भलीभाँति स्थापना करनेके लिये मैं युग-युगमें प्रकट हुआ करता हूँ।
ताकि जो लोग मनुष्य होकर भी (विवेक सोया रहने के कारण) अपने मार्ग से किस प्रकार भटके हुए हैं, उनको किस प्रकार फिर से 'मनुष्य का धर्म' अर्थात मनुष्य की विशेष योग्यता , या उसकी विशेष पहचान जो नित्य-अनित्य विवेक-प्रयोग क्षमता है , उस विवेक-प्रयोग के मार्ग पर किस तरह लाया जाये? इस धर्म की स्थापना कैसे की जाये ?
प्रवृत्ति धर्म क्या है ? साथ-साथ निवृत्ति धर्म क्या है ? वह भी उन अवतारों के जीवन को देखने से हमें पता चलता है। वेदों में बताये गए इन दोनों मार्गों का वर्णन करते हुए आदिगुरु शंकराचार्यजी अपने गीता भाष्य के प्रारम्भ में (श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्यम् ॥ उपोद्घातः ॥) ही कहते हैं -
[ वेदोक्त धर्म दो प्रकार का है - एक प्रवृत्ति रूप है, दूसरा निवृत्ति रूप है। जो जगत की स्थिति का कारण , तथा प्राणियों की उन्नति का और मोक्ष का साक्षात् हेतु है। एवं कल्याणकामी ब्राह्मण आदि वर्णाश्रम अवलम्बियों द्वारा जिसका अनुष्ठान किया जाता है उसका नाम धर्म है।
सः भगवान् सृष्ट्वा-इदं जगत्, तस्य च स्थितिं चिकीर्षुः,
मरीचि-आदीन्-अग्रे सृष्ट्वा प्रजापतीन्, प्रवृत्ति-लक्षणं धर्मं
ग्राहयामास वेद-उक्तम् ।
इस जगत को रचकर इसका पालन करने की इच्छा वाले उस भगवान ने पहले मरीचि आदि प्रजापतियों को रचकर उसको वेदोक्त प्रवृत्ति रूप धर्म (कर्मयोग) ग्रहण करवाया।
ततः अन्याण् च सनक-सनन्दन-आदीन् उत्पाद्य,
निवृत्ति-लक्षणं धर्मं ज्ञान-वैराग्य-लक्षणं ग्राहयामास ।
फिर उनसे अलग सनक , सनन्दन , सनातन आदि ऋषियों को उत्पन्न करके उनको ज्ञान और वैराग्य जिसके लक्षण हैं , ऐसे निवृत्ति रूप धर्म (ज्ञानयोग) ग्रहण करवाए।]
" द्विविधः हि वेदोक्तः धर्मः, प्रवृत्ति-लक्षणः निवृत्ति-लक्षणः च । जगतः स्थिति-कारणं , प्राणिनां साक्षात्-अभ्युदय-निःश्रेयस-हेतुः यः सः धर्मः ब्राह्मणाद्यैः वर्णिभिः आश्रमिभिः च श्रेयोर्थिभिः -अनुष्ठीयमानः ॥"
आचार्य शंकर कहते हैं - वेदों के द्वारा धर्म के दो रूप कहे गए हैं - "प्रवृत्ति-लक्षणो निवृत्ति-लक्षणो च। " जगत का मतलब : एक यह जो दृश्यमान लौकिक जगत है और दूसरा 'हमारा' - साधाकों का, मुमुक्षुओं का , विवेकी -मनुष्यों का , उपासकों का , भक्तों का या संयासियों का जो जगत है। उसमें प्रवृत्ति और निवृत्ति का सन्तुलन किस प्रकार से रहे ? गृहस्थों और संन्यासियों में समन्वय किस प्रकार रहे ? यह तरीका हम किस से सीखेंगे ? यह केवल अवतार पुरुषों से ही सीखा जा सकता है। (3:59)
माँ और ठाकुर के जीवन में दोनों का अद्भुत संतुलन है। क्योंकि उनका आना ही -धर्मसंस्थापनार्थाय ' हुआ है। (नवनीदा जैसे 'नेता' -उस पार से लौटे ही हैं केवल -'विवेकज-आनंद ' के धर्म को स्थापित करने हेतु।) अवतारों से हम हमेशा सीखने का प्रयास करते हैं। जिस तरह माँ ने कहा - " अगर शान्ति चाहो , तो दूसरों का दुर्गुण मत देखो - किसी का दोष मत देखना !" विवेक-सोया है ? ये देखो ? सन्त तुकाराम ने भी यही कहा है - मैं दूसरों के दुर्गुणों को क्या गिनवा सकता हूँ ? उसकी क्या आवश्यकता है ? क्या दूसरों में जिन दोषों कस मैं बखान कर रहा हूँ , वो दोष मुझमें कम हैं ? माँ कहती है - मैं दूसरों के दोष देख ही नहीं सकती। गौरी माँ शिकायत करती हैं , तुम सबको क्यों अपना लेती हो ? उनका आचरण क्यों नहीं देखती ? माँ ने कहा मैं नहीं देख सकती। हमें मालूम है कि यह गुण हममें बहुत कम है। इतना तो मालूम कि यह अविचलता, सहनशीलता भी गुण है। इस गुण की परिपूर्णता हम माँ के जीवन में देखते हैं।यही हमारे लिए बहुत बड़ा सम्बल है। उनको अपना आदर्श मानकर हम अपने जीवन में आगे बढ़ सकते हैं। अपना व्यक्तिगत जीवन मधुर बना सकते हैं। और दूसरों के जीवन में भी हम मधुरता का कुछ संचार कर सकते हैं। योगदान कर सकते हैं। ये कठिन लगता है। लेकिन माँ का जीवन तो मधुर था। अभी है , और सब समय आदर्श उदाहरण बना रहेगा। माँ का जो अद्भुत जीवन है , उसमें सकारात्मक क्या है ? positive क्या है ? उसका उदाहरण देखें - दुर्गापूजा विसर्जन में लोग नाच रहे थे। माँ से किसी ब्रह्मचारी ने शिकायत कर दी। ये ठीक नहीं हो रहा है - बेढंगा नाचता है ? माँ कहती है - अरे ऐसा ही होना चाहिए। माँ को खुश करने के लिए बच्चा ऐसे ही नाचता है। माँ की दृष्टि कितनी उदार है - ये देखने की चीज है। माँ के जीवन की जितनी भी घटनाएं हमने आज सुनी हैं। माँ का जन्म दिव्य है , माँ कर्म कितना दिव्य है। हमलोग माँ के दिव्य जीवन को - 'तत्वतः' जानेंगे- मतलब जैसा है , वैसा दिव्य जीवन को ठीक से जानेंगे। अवतार के जीवन को यथार्थतः जानने का फल बहुत बड़ा होता है,संसार-चक्र से मोक्ष। इसलिए तीन दिन का ये जो यज्ञ चल रहा है। भगवान स्वयं गीता में कहते हैं -
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः।।18.70।।
।।18.70।। जो मनुष्य हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा -- ऐसा मेरा मत है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - हम दोनों में जो 'धर्ममय संवाद' चल रहा है, वह धर्म से भरा हुआ है।अरे अर्जुन , यहाँ ज्ञान-यज्ञ चल रहा है , और मेरी पूजा चल रही है। यह मेरी मति - भगवान की बुद्धि ऐसा कहती है। भगवान का ऐसा विचार है तो उनके कथन को प्रमाण की क्या आवश्यकता है ? हम दोनों में जो संवाद हुआ है , वो धर्म से परिपूर्ण है।
उसी प्रकार यहाँ जो ज्ञान यज्ञ चल रहा है , यह ठाकुर , माँ स्वामी जी की उपासना ही चल रही हैं। ताकि हमलोगों में भी मातृभक्ति का विकास हो। मातृभक्ति से व्यक्ति महान बनता है ! भगवान राम मातृभक्त थे। भगवान कृष्ण मातृ भक्त थे। व्यास मातृभक्त थे। उनको सत्यवती नन्दन कहा जाता है। शंकराचार्यजी मातृ भक्त थे। पाण्डव मातृभक्त थे। भीमसेन तो बहुत बड़ा मातृभक्त था। विवेकानन्द मातृभक्त थे। शिवाजी महाराज मातृभक्त थे। माँ ने कहा शिवा ये किला जीतना है। कोई बहस नहीं। माँ ने कहा है - होना ही है। माँ की आज्ञा का पालन होना ही चाहिए। इसको कहा जाता है मातृभक्ति। स्वामी जी ठाकुर की बात पर शंका करते थे , लेकिन माँ जब आदेश दे दिया तो - किला जीतना ही है। [गाड़ी लेना है - तो लेना है ! ] इसे कहा जाता है -मातृभक्ति। स्वामीजी कभी ठाकुर के आदेश पर तर्क करते थे , लेकिन माँ आदेश अकाट्य था। माँ सुप्रीम कोर्ट है। लास्ट आदेश ! ये मातृभक्ति है। श्री रामकृष्ण के सभी संन्यासी सन्तानों की मातृभक्ति देखने के लायक है। सभी ने माँ को बहुत स्नेह दिया , पर से उन्होंने बहुत अधिक स्नेह पाया था। हमलोग भी माँ से दूर नहीं हैं , ये जो झण्डाचौक पर आयोजन हुआ है - माँ की कृपा से , नवनीदा की प्रेरणा से हुआ है। इस आयोजन के माध्यम से तिलैया -कोडरमा -डोमचांच -बिहार के सभी नागरिकों को मातृप्रेम , पितृप्रेम , माँ का आशीर्वाद , पिता का प्रेम ,स्वामीजी का भ्रातृप्रेम। माँ सारदा संघजननि हैं। गृहस्थ भक्त और ठाकुर के संन्यासी भक्त संघ के अटूट अंग हैं। हमें यदि मातृभक्ति हो तो , हमारी मातृभक्ति कैसी होनी चाहिए ? उसका अनुभव आज हुआ होगा। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था - " आधुनिकता हमें सुखी बनाती है। वैज्ञानिक आविष्कार से शरीर को सुख बढ़ता है। हमारे Comforts बढ़ जाते हैं। माईक है तो आप सभी सुन रहे हैं। लेकिन मशीनें हमें गुलाम बना देती है। संसार को सुखी बनाने प्रयास हजारों सालों से किया जा रहा है। लेकिन हमारा अनुभव है - वास्तव में कितने सुखी हुए हैं हमलोग ? उसको तो हम नहीं बता सकते हैं। लेकिन दुखी कितने हुए हैं - यह हम बोल सकते हैं। हमलोग बोलते हैं -मोबाइल तो बहुत जरुरी है , उसके बिना तो हम रह नहीं सकते हैं। लेकिन हम बोल सकते हैं कि इसने हमें बहुत दुखी बना दिया है। क्योंकि इस मोबाईल की जकड़ से युवा -बच्चा -बूढ़ा सभी गुलाम हैं।
स्वामीजी कहते हैं 1000 वर्षों से जगत को सुखी बनाने का जितना प्रयास किया गया है - उतना ही प्रयास यदि मनुष्य को चरित्र के गुणों से विभूषित करने में - अविचलता , सहशीलता आदि गुणों को व्यक्त करने का प्रयास किया जाता ,यदि मनुष्य को " Pure , Gentle and Tolerant " पवित्र , सभ्य और सहनशील बनाने में किया जाता , तो आज मनुष्य जितना सुखी है , उससे हजारों गुना अधिक सुखी हो जाता।
सभ्यता या शिष्टाचार (gentleness) क्या है ? जरा विचार करके देखें यदि 'क्षात्र वीर्य और ब्रह्मतेज से विभूषित' कोई भी स्त्री हो या पुरुष- दोनों यदि ज्ञानदायिनी 'माँ श्री सारदा देवी" की 'पवित्रता, शिष्टाचार (सभ्यता) और सहनशीलता' जैसी 'व्यावहारिक दिव्यता' (Practical Divinity)का उदाहरण "यदि शांति चाहते हो तो किसी का दोष मत देखो' के इस सिद्धान्त पर चलने के साथ-साथ अन्य व्यावहारिक उपदेशों (Practical teachings), जैसे "जब जैसा- तब तैसा, जहाँ जैसा -तहाँ तैसा, जिसको जैसा उसको वैसा", का पालन करते हुए भी श्री माँ (नवनीदा या भारती दीदी) के जैसा-"मेरे मन, वाणी और आचरण से किसी को कष्ट न हो'-को अपने जीवन और आचरण से प्रस्तुत कर सके, ऐसा विवेकी मनुष्य बनने और बनाने का प्रशिक्षण देना ही 'स्वामी विवेकानन्द की मनुष्यनिर्माण और चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा' है। आज यदि 'पवित्रता, सभ्यता और सहनशीलता ' के गुणों का सम्पूर्ण आदर्श यदि कहीं सच्चे रूप में देखते हैं , तो किसमें देखते हैं ? ये सारे गुण हम माँ के जीवन में पूरा देखते हैं।
पवित्रं चरितं यस्या: पवित्रं जीवनं तथा ।
पवित्रतास्वरूपिण्यै तस्यै कुर्मो नमो नम: ।।
माँ श्री सारदा देवी पवित्रता की जीवन्त मूर्ति थीं। सहनशील बनो - स्वामीजी कहते थे। दादा कहते थे - वीर हो धीर बनो। लेकिन सहनशील होना कितना कठिन है ? पर हुआ जा सकता है। यह हमें माँ के जीवन में देखते हैं। और Gentleness ' (सभ्यता-भद्रता) का आदर्श किसे कहते हैं ? कभी अपनी वाणी से , आचरण से या विचारों से दूसरों को कष्ट नहीं हो , इसका ख्याल हर समय रखने वाला सभ्य , भद्र माना जाता है। माँ कितनी सभ्य थी यह हम माँ के जीवन के द्वारा ही हम समझ सकते हैं। क्योंकि व्यावहारिक दिव्यता की साक्षात् उदाहरण श्री माँ हैं !! भारत का आदर्श वाक्य है - "कृण्वन्तो विश्वं आर्यम्" ! सारे संसार को हम सभ्य बना देंगे। "आर्य" का अर्थ: यहां "आर्य" किसी नस्ल या पंथ से नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति से है जो चरित्रवान मनुष्य है प्रशंसनीय कार्य करता है, सच्चाई का पालन करता है, और दूसरों के प्रति दयालु होता है.वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना: यह वाक्यांश 'पूरी पृथ्वी एक परिवार है' (वसुधैव कुटुम्बकम्) के विचार से भी जुड़ा है, जो सभी के उत्थान की बात करता है। कैसे सभ्य बना देंगे ? माँ का व्याहारिक दिव्य जीवन इसका उदाहरण है। माँ सभ्यता , पवित्रता , सहनशीलता की प्रतिमूर्ति थी। आज हमने चार वक्ताओं द्वारा प्रस्तुत अनेक उदाहरणों के माध्यम से माँ का दिव्य जीवन हमने सुना। जितनी भी घटनायें सुनी इसका प्रभाव बहुत बड़ा होता है।
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।4.9।।
।।4.9।। हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। इस प्रकार (मेरे जन्म और कर्मको) जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता अर्थात् दृढ़तापूर्वक मान लेता है, वह शरीरका त्याग करके पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होता, प्रत्युत मुझे प्राप्त होता है।
जो पैदा हुआ है , उसके देह का त्याग तो ध्रुव है। निश्चित है। लेकिन जो मुझे तत्व से जान लेता है - उस मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता - पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ! माँ के गर्भ में फिर न जाना पड़े , पुनर्गभवास को टालने के लिए अनेक जन्मों तक , साधना -तपस्या करनी पड़ती है। वह केवल अवतार पुरुषों वरिष्ठ के दिव्य जीवन और जन्म का यथार्थ तत्व जान लेने से -मनुष्य का जीवन सार्थक हो जाता है। वह सफल हो जाता है , वह मुक्त हो जाता है। पुनर्जन्म नैति' मतलब वह जन्म-मरण के चक्कर से छूट जाता है।
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति।।2.72।
।।2.72।। हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है।। गीता कहती है - ऋषियों को ब्रह्मनिर्वाण की प्राप्ति होती है।
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।।5.25।।
।।5.25।। वे ऋषिगण मोक्ष को प्राप्त होते हैं - जिनके पाप नष्ट हो गये हैं, जो छिन्नसंशय, संयमी और भूतमात्र के हित में रमने वाले हैं।।
ऋषियों को ब्रह्मनिर्वाण की प्राप्ति हुई थी , उन्होंने बहुत तपस्या की थी। बहुत परिश्रम किये थे , बहुत साधना की थी। तब उनको ब्रह्म निर्वाण की प्राप्ति हुई थी। हम लोग न तो साधना कर सकते हैं , न तपस्या कर सकते हैं। माँ कहती है - कलयुग में तो और भी कठिन है। लेकिन केवल माँ के जीवन की घटना है। उनका जन्म , उनका कर्म सबकुछ दिव्य है। उनके जीवन को पढ़ें , सुनें तो भी हमलोगों को - "त्यक्त्वा देहम् पुनः जन्म नः एति gets !" वो मुझे प्राप्त होता है- माम् एति सः अर्जुन ! ब्रह्म के साथ एकाकार हो जाता है। हम भगवान की , माँ जगदम्बा की बात पढ़ें , सुनें उस पर चिंतन -मनन करें। निदिध्यासन करें। तो हमारा यह मनुष्य जीवन - जो बहुत कम उम्र का है। Life is short ' स्वामीजी कहते हैं - इस छोटे से जीवन में हमें जिस महान कर्तव्य को पूरा करना है। वो बड़ी आसानी से हो जाता है। यह आज हमने इन सभी वक्ताओं से सुना। तो माँ के जीवन की घटनाएं बहुत महत्वपूर्ण हैं। आप सब लोगों ने मुझे शांति के साथ सुना , मैं आपका अत्यंत आभारी हूँ धन्यवाद। नमस्कार ! (4 :12 :57)
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" Man is made up of three qualities — brutal, human, and godly. That which tends to increase the divinity in you is virtue, and that which tends to increase brutality in you is vice. You must kill the brutal nature and become human, that is, loving and charitable. You must transcend that too and become pure bliss. Sachchidânanda, fire without burning, wonderfully loving, but without the weakness of human love, without the feeling of misery." [Volume 6, p. 112/ Notes taken down in Madras - 1892-93 Swami Vivekananda.]
" मनुष्य तीन प्रकार के गुणों से निर्मित है,पाशविक, मानवीय और दैवी। जो तुममें दैवी गुण बढ़ाता है वह पूण्य है और जो तुममें पशुता बढ़ाता है वह पाप है। तुमको पाशविक वृत्ति को समाप्त कर 'मनुष्य ' बनना चाहिये -अर्थात प्रेममय तथा उदार होना चाहिये। इससे भी उपर उठकर तुम्हें शुद्ध आनन्द, सच्चिदानन्द, अदाहक अग्नि के समान, अद्भुत प्रेममय किन्तु मानवीय प्रेम की दुर्बलता से रहित, दुःख की भावना से रहित (मनुष्य) बनना चाहिये।"
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[ (19 अगस्त, 1883) परिच्छेद ~ 49, श्रीरामकृष्ण वचनामृत]
श्रीरामकृष्ण (मास्टर से)- देखो, ‘अष्टावक्र-संहिता’ में आत्मज्ञान की बातें हैं । आत्मज्ञानी कहते हैं, ‘सोऽहम् अर्थात् मैं ही वह परमात्मा हूँ । यह वेदान्तवादी संन्यासियों का मत है । गृहस्थ व्यक्तियों के लिए यह मत ठीक नहीं है । सब कुछ किया जा रहा है, फिर भी ‘मैं ही वह निष्क्रिय परमात्मा हूँ’ यह कैसे हो सकता है ? वेदान्तवादी कहते हैं कि आत्मा निर्लिप्त है । सुख-दुःख, पाप-पुण्य –ये सब आत्मा का कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते; परन्तु देहाभिमानी व्यक्तियों को कष्ट दे सकते हैं । धुआँ दीवार को मैला करता है, पर आकाश का कुछ नहीं कर सकता । कृष्णकिशोर ज्ञानियों की तरह कहा करता था कि मैं ‘ख’ अर्थात् आकाशवत् हूँ । वह परम भक्त था; उसके मुँह से यह बात भले ही शोभा दे, पर सब के मुँह में यह शोभा नहीं देती ।
[या मति सा गतिर्भवेत्' जैसी बुद्धि , दृष्टि या मति वैसी गति ! ]
“पर ‘मैं मुक्त हूँ’ यह अभिमान बड़ा अच्छा है । ‘मैं मुक्त हूँ’ कहते रहने से कहनेवाला मुक्त हो जाता है। और ‘मैं बद्ध हूँ’ कहते रहने से कहनेवाला बद्ध ही रह जाता है । जो केवल यह कहता है कि ‘मैं पापी हूँ’ वही सचमुच गिरता है । कहते यही रहना चाहिए – ‘मैंने उनका नाम लिया है, अब मेरे पाप कहाँ ? मेरा बन्धन कैसा ?’
[শ্রীরামকৃষ্ণ (মাস্টারের প্রতি) — দেখ, অষ্টাবক্রসংহিতায় আত্মজ্ঞানের কথা আছে। আত্মজ্ঞানীরা বলে, ‘সোঽহম্’ অর্থাৎ “আমিই সেই পরমাত্মা।” এ-সব বেদান্তবাদী সন্ন্যাসীর মত, সংসারীর পক্ষে এ-মত ঠিক নয়। সবই করা যাচ্ছে, অথচ “আমিই সেই নিষ্ক্রিয় পরমাত্মা” — এ কিরূপে হতে পারে? বেদান্তবাদীরা বলে, আত্মা নির্লিপ্ত। সুখ-দুঃখ, পাপ-পুণ্য — এ-সব আত্মার কোনও অপকার করতে পারে না; তবে দেহাভিমানী লোকদের কষ্ট দিতে পারে। ধোঁয়া দেওয়াল ময়লা করে, আকাশের কিছু করতে পারে না। কৃষ্ণকিশোর জ্ঞানীদের মতো বলত, আমি ‘খ’ — অর্থাৎ আকাশবৎ। তা সে পরমভক্ত; তার মুখে ওকথা বরং সাজে, কিন্তু সকলের মুখে নয়।
“কিন্তু ‘আমি মুক্ত’ এ-অভিমান খুব ভাল। ‘আমি মুক্ত’ এ-কথা বলতে বলতে সে মুক্ত হয়ে যায়। আবার ‘আমি বদ্ধ’ ‘আমি বদ্ধ’ এ-কথা বলতে বলতে সে ব্যক্তি বদ্ধই হয়ে যায়। যে কেবল বলে ‘আমি পাপী’ ‘আমি পাপী’ সেই সালাই পড়ে যায়! বরং বলতে হয়, আমি তাঁর নাম করেছি, আমার পাপ কি, বন্ধন কি!”
"जिसमें विश्वास है उसमें सब है ; विश्वास नहीं तो कुछ भी नहीं। "-- श्रीरामकृष्ण
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" सबसे पहले संकीर्ण धारणाओं का त्याग करो, और हर व्यक्ति में ईश्वर (आत्मा) का दर्शन करो - वे सब हाथों से काम कर रहे हैं , सब पैरों से चल रहे हैं , सब मुखों से भोजन कर रहे हैं ! हर व्यक्ति में वे निवास करते हैं , हर व्यक्ति में वे निवास करते हैं, सब मनों से वे सोचते हैं। वे (आत्मा-ईश्वर -इष्टदेव) स्वतः प्रमाण हैं , वे हमसे भी हमारे अधिक निकटवर्ती हैं। इसे जानना ही धर्म है - यही विश्वास है, प्रभु हमें यह विश्वास दें। जब हम इस समग्र संसार में इस एकत्व का अनुभव करेंगे , तब हम अमर हो जायेंगे।'
[Get rid, in the first place, of all these limited ideas and see God in every person — working through all hands, walking through all feet, and eating through every mouth. 'In every being He lives, through all minds He thinks. He is self-evident, nearer unto us than ourselves. To know this is religion, is faith, and may it please the Lord to give us this faith!' When we shall feel that oneness, we shall be immortal.]
भौतिक दृष्टि से देखने पर भी हम अमर हैं, सारे संसार के साथ एक हैं। जब तक इस संसार में एक व्यक्ति भी श्वास ले रहा है, मैं उसके भीतर जीवित हूँ। मैं यह संकीर्ण क्षुद्र व्यष्टि जीव नहीं हूँ, मैं समष्टिस्वरूप हूँ। मैं सर्वमय हूँ।
[ We are physically immortal even, one with the universe. So long as there is one that breathes throughout the universe, I live in that one. I am not this limited little being, I am the universal.]
अतएव उठो - यही श्रेष्ठ पूजा है। तुम स्वयं समग्र जगत के साथ अभिन्न हो। यही यथार्थ विनय है - घुटने टेककर 'मैं पापी हूँ, मैं पापी हूँ ' कहकर चिल्लाने का नाम विनय नहीं है।
[Stand up then; this is the highest worship. You are one with the universe. That only is humility — not crawling upon all fours and calling yourself a sinner. ]
जब इस भेद-बुद्धि का आवरण छिन्न-विच्छिन्न हो जाता है , तभी सर्वोच्च उन्नति समझनी होगी। समस्त जगत का एकत्व -यही श्रेष्ठ धर्ममत है। मैं अमुक हूँ - व्यक्तिविशेष - यह बहुत संकीर्ण भाव है, सच्चे 'अहम' के लिए यह सत्य नहीं है। मैं विश्वव्यापक हूँ -इस धारणा पर प्रतिष्ठित हो जाओ -और श्रेष्ठ की उपासना सदा श्रेष्ठ रूप में करो; कारण , ईश्वर चैतन्य -स्वरुप है, आत्मस्वरूप है, चैतन्य और सत्य में ही उसकी उपासना करनी होगी।
[The highest creed is Oneness. I am so-and-so is a limited idea, not true of the real "I". I am the universal; stand upon that and ever worship the Highest through the highest form, for God is Spirit and should be worshipped in spirit and in truth. ]
...जो कुछ ससीम (नश्वर) है, वह जड़ है। चैतन्य (आत्मा) ही केवल अनन्तस्वरुप (अविनाशी ,त्रिकाल अबाधित सत्य-भगवान) है। मानव चैतन्यस्वरूप है (कारण - सभी प्राणियों में केवल मनुष्य ही नित्य-अनित्य का विवेक कर सकता है) और इसलिए मानव भी अनन्त है, और केवल अनन्त ही अनन्त की उपासना में (विवेक-दर्शन का अभ्यास करने में) समर्थ है। हम अनन्त की उपासना करेंगे ; वही सर्वोच्च आध्यात्मिक उपासना है।
[That which is limited is material. The Spirit alone is infinite. God is Spirit, is infinite; man is Spirit and, therefore, infinite, and the Infinite alone can worship the Infinite. We will worship the Infinite; that is the highest spiritual worship. ]
इन सब भावों के माहात्म्य का अनुभव करना कितना कठिन है ! मैं स्वमत की प्रतिष्ठा के लिए दार्शनिक विचार करता हूँ , कितनी बातें करता हूँ; इतने में कोई मेरे प्रतिकूल घटना घटती है - मैं अनजाने ही क्रुद्ध हो उठता हूँ ; भूल जाता हूँ कि -इस विश्व में क्षुद्र ससीम मेरे इस (नश्वर कच्चा 'अहम') अस्तित्व को छोड़कर और भी कुछ है। (मेरा एक सच्चा 'अहम' भी है।) मैं कहना भूल जाता हूँ, " मैं चैतन्य स्वरुप हूँ - इस अकिंचितकर बात से मेरा क्या बिगड़ता है - मैं तो चैतन्यस्वरुप हूँ। ' मैं भूल जाता हूँ कि यह सब मेरी ही लीला है; मैं ईश्वर (आत्मा या इष्टदेव) को भूल जाता हूँ, मैं मुक्ति की बात भी भूल जाता हूँ।
[The grandeur of realising these ideas, how difficult it is! I theorise, talk, philosophize; and the next moment something comes against me, and I unconsciously become angry, I forget there is anything in the universe but this little limited self, I forget to say, "I am the Spirit, what is this trifle to me? I am the Spirit." I forget it is all myself playing, I forget God, I forget freedom.]
ऋषियों ने बार बार घोषणा की है -क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति' - -मुक्ति का पथ उस्तरे की धार की भाँति तीक्ष्ण , दीर्घ और कठिन है - इसका अतिक्रमण करना कठिन है। किन्तु इन दुर्बलताओं और विफलताओं से अपने को बँधने न दो। उपनिषदों की घोषणा है - उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। - 'उठो , जागो , जब तक लक्ष्य पर नहीं पहुँचते , रुको नहीं। यद्यपि वह पथ उस्तरे की धार की तरह तीक्ष्ण है - यद्यपि वह पथ दीर्घ है , दूरवर्ती और कठिन है , किन्तु हम उस पथ का अवश्य ही अतिक्रमण करेंगे।
[Sharp as the blade of a razor, long and difficult and hard to cross, is the way to freedom. The sages have declared this again and again. Yet do not let these weaknesses and failures bind you. The Upanishads have declared, "Arise ! Awake ! and stop not until the goal is reached." We will then certainly cross the path, sharp as it is like the razor, and long and distant and difficult though it be.]
मनुष्य देवताओं और असुरों का प्रभु होता है। हमारे दुःखों के लिए स्वयं हमारे सिवा और कोई उत्तरदायी नहीं है। क्या तुम समझते हो कि यदि मनुष्य अमृत की चेष्टा करे, तो उसे बदले में सिर्फ विष का प्याला ही मिलेगा ? नहीं , अमृत है और है उसकी प्राप्ति के निमित्त प्रयत्नशील प्रत्येक मनुष्य के लिए। प्रभु ने स्वयं कहा है -
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ॥ 66 ॥
सर्वधर्मान - इन सभी धर्मों का, सभी उद्यमों का परित्याग कर एक मेरी शरण में आ। मैं तुझे समस्त पापों के पार लगा दूँगा। भय न कर। हम जगत के सभी शास्त्रों में इसी वाणी की घोषणा सुनते हैं।
[Man becomes the master of gods and demons. No one is to blame for our miseries but ourselves. Do you think there is only a dark cup of poison if man goes to look for nectar? The nectar is there and is for every man who strives to reach it. The Lord Himself tells us, "Give up all these paths and struggles. Do thou take refuge in Me. I will take thee to the other shore, be not afraid." We hear that from all the scriptures of the world that come to us.]
यह उपदेश ही हमसे यह कहने की शिक्षा देती है - 'स्वर्गलोक के सदृश इस पृथ्वी पर भी तेरी इच्छा ही पूर्ण हो।' कारण, 'सर्वत्र तेरा ही राज्य है, तेरी ही शक्ति और तेरी ही महिमा है। ' पर इसी विश्वास में प्रतिष्ठित हो जाना- कठिन, बड़ी कठिन बात है। अभी कहा - " हे प्रभु , मैंने अभी तेरी शरण ली - प्रेममय ! तेरे प्रेम पर सर्वस्व समर्पण किया - तेरी वेदी पर , जो कुछ भला है , जो कुछ भी पुण्यमय है, सभी कुछ स्थापन किया। मेरे पाप-ताप , भले-बुरे कार्य सब कुछ तेरे ही चरणों पर मैं समर्पण करता हूँ - तू सब ग्रहण कर - मैं अब तुझे कभी न भूलूँगा। " अभी कहा 'तेरी इच्छा पूर्ण हो ! ' पर दूसरे ही क्षण जब एक परीक्षा में पड़ गया -तब मैं क्रोध से उछल पड़ा।
[The same voice teaches us to say, "Thy will be done upon earth, as it is in heaven," for "Thine is the kingdom and the power and the glory." It is difficult, all very difficult. I say to myself, "This moment I will take refuge in Thee, O Lord. Unto Thy love I will sacrifice all, and on Thine altar I will place all that is good and virtuous. My sins, my sorrows, my actions, good and evil, I will offer unto Thee; do Thou take them and I will never forget." One moment I say, "Thy will be done," and the next moment something comes to try me and I spring up in a rage. ]
सब धर्मों का एक ही लक्ष्य है ,परन्तु विभिन्न आचार्य विभिन्न भाषाओँ का व्यवहार करते रहते हैं। सबकी चेष्टा इस झूठे 'अहम' या कच्चे 'अहम' का विनाश करना है। जिसके फलस्वरूप इस सच्चे 'अहम' (Real-I) का, एकमात्र इस प्रभु का ही राज्य होगा। हिब्रू धर्मशास्त्रों में कहा गया है - ' मैं तेरा प्रभु , तेरा ईश्वर एक ईर्ष्यालु ईश्वर हूँ। मेरे सिवा तू किसी अन्य ईश्वर को नहीं रख सकता। ' केवल ईश्वर ही रह जाना चाहिए। हमें कहना होगा , 'मैं नहीं , तू।' और उस प्रभु के सिवा हमें सर्वस्व त्यागना होगा; केवल वे ही राज्य करेंगे। मानों हमने खूब कठोर साधना की - परन्तु दूसरे ही मुहूर्त में हमारा पैर फिसल गया- और तब हमने माँ की ओर हाथ बढ़ाने की चेष्टा की -समझ गया कि अपनी चेष्टा से हम खड़े नहीं रह सकते। जीवन अनन्त है, जिसका एक अध्याय है - 'तेरी इच्छा पूर्ण हो '! यदि हम उस जीवन-ग्रन्थ के सब अध्यायों का मर्म ग्रहण न करें , तो समुदय जीवन का अनुभव नहीं कर सकते।
[The goal of all religions is the same, but the language of the teachers differs. The attempt is to kill the false "I", so that the real "I", the Lord, will reign. "I the Lord thy God am a jealous God. Thou shalt have no other gods before me," say the Hebrew scriptures. God must be there all alone. We must say, "Not I, but Thou," and then we should give up everything but the Lord. He, and He alone, should reign. Perhaps we struggle hard, and yet the next moment our feet slip, and then we try to stretch out our hands to Mother. We find we cannot stand alone. Life is infinite, one chapter of which is, "Thy will be done," and unless we realise all the chapters we cannot realise the whole. ]
मुख से कहते हैं - ' तेरी इच्छा पूर्ण हो '- लेकिन विश्वासघाती मन प्रतिमुहूर्त इन भावों का विरोध करता है, परन्तु हमें यदि इस कच्चे 'अहम ' को जीतना हो , तो बारम्बार इसी बात की (इसी जीवन-मुक्ति सूत्र की) आवृत्ति करनी होगी। हम एक विश्वासघाती की सेवा करें और परित्राण पा जायें - यह कभी नहीं हो सकता। सबका परित्राण है , केवल विश्वासघाती का परित्राण नहीं है - और हम विश्वासघाती के रूप में एकदम निन्दित हैं।जब हम अपनी आत्मा की ध्वनि की अवज्ञा करते हैं , तब हम अपनी आत्मा के विरुद्ध विश्वासघात करते हैं , हम उस जगतजननी की महिमा के विरुद्ध विश्वासघात करते हैं। अतएव चाहे जो कुछ भी हो , हमें अपने तन और मन को उस परम इच्छामयी की इच्छा में मिला देना पड़ेगा।
"Thy will be done" — every moment the traitor mind rebels against it, yet it must be said, again and again, if we are to conquer the lower self. We cannot serve a traitor and yet be saved. There is salvation for all except the traitor and we stand condemned as traitors, traitors against our own selves, against the majesty of Mother, when we refuse to obey the voice of our higher Self. Come what will, we must give our bodies and minds up to the Supreme Will.
किसी हिन्दू विद्वान् ने ठीक कहा कि यदि मनुष्य - 'तेरी इच्छा पूर्ण हो ', यह बात दो बार उच्चारण करे , तो वह पाप करता है। 'तेरी इच्छा पूर्ण हो '- बस और क्या प्रयोजन है ? इसे दो बार कहने की आवश्यकता ही क्या है ? जो अच्छा है , वह तो अच्छा है ही। एक बार जब कह दिया 'तेरी इच्छा पूर्ण हो ', तब तो वह बात लौटाई नहीं जा सकती। 'स्वर्ग के भाँति मृत्युलोक में भी तेरी इच्छा पूर्ण हो , क्योंकि राज्य तो तेरा ही है , शक्ति और महिमा भी सदा तेरी ही है। ' " [धर्म क्या है ? खंड 2,प.300-303]
Well has it been said by the Hindu philosopher, "If man says twice, 'Thy will be done,' he commits sin." "Thy will be done," what more is needed, why say it twice? What is good is good. No more shall we take it back. "Thy will be done on earth as it is in heaven, for Thine is the kingdom and the power and the glory for evermore."{ What Is Religion? (Volume 1)}
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चौथे पूर्व वक्ता का सम्बोधन -
गृहस्थ जीवन का क्या आदर्श है ?
ब्रह्मनिष्ठो गृहस्थ: स्यात् ब्रह्मज्ञानपरायण:।
यत यत कर्म प्रकुर्वीत तद् ब्रम्हणि समर्पयेत्।।
गृहस्थ को ब्रह्मनिष्ठ होना चाहिए तथा ब्रह्म ज्ञान का लाभ ही उसके जीवन का चरम लक्ष्य होना चाहिए। परंतु फिर भी उसे निरंतर अपने सब कर्म करते रहना चाहिए - अपने कर्तव्यों का पालन करते रहना चाहिए, और अपने समस्त कर्मों के फलों को ईश्वर के चरणों में समर्पित करना चाहिए।
कर्म करके कर्मफल की आकांक्षा न करना, किसी मनुष्य की सहायता करके उसे किसी प्रकार की कृतज्ञता की आशा न रखना, कोई सत्कर्म करके भी इस बात की ओर नजर तक न देना कि वह हमें यश और कीर्ति देगा अथवा नहीं, इस संसार में सबसे कठिन बात है।
संसार जब तारीफ करने लगता है, तब एक निहायत बुजदिल भी बहादुर बन जाता है। समाज के समर्थन तथा प्रशंसा से एक मूर्ख भी वीरोचित कार्य कर सकता है; परंतु अपने आसपास के लोगों की निंदा- स्तुति की बिल्कुल परवाह न करते हुए सर्वदा सत्य कार्य में लगे रहना वास्तव में सबसे बड़ा त्याग है। [गृहस्थ हो या संन्यासी - "हरेक अपने क्षेत्र में महान है। " (खण्ड -३ /१७) में]
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[ खंड?? विवेक-जीवन ब्लॉग - July 16, 2013/ धर्म क्या है ? [What Is Religion? (Vol-1, p.333) एक लाख लोगों में से कोई एक व्यक्ति भी समझ ले तो बहुत है ! 1.कैम्प नोट 2005 सरीसा आश्रम| रनेन दा का शरीर त्याग आज - 27 जनवरी, 2026 को 1. 30 pm हुआ / प्रबाल मोहन्ती का फोन - 3 pm./दीपक दा का फोन 3:30 pm/ गजानन्द पाठक का फोन महामण्डल फेस-बुक में -4:14 pm]
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