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बुधवार, 27 सितंबर 2023

$$$$🔱🙏 श्री रामकृष्ण परमहंस को अवतार वरिष्ठ क्यों कहते हैं ? 🔱🙏

🔱🙏 श्री रामकृष्ण परमहंस को अवतार वरिष्ठ क्यों कहते हैं ?🔱🙏

[साभार https://www.youtube.com/watch?v=S34S9f8z7GU/(ट्रांस्क्रिप्ट के अनुसार लेखन : मंगलवार, 11 मार्च, 2025) ]

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
जैसी बात होती थी, सबसे महत्वपूर्ण हमारे पास जो चीज है, वो है मन ! जिसको ईश्वर, कहते हो, भगवान कहते हो ब्रह्म कहते हो, जो भी धारणा हमारी हो सकती है -सृष्टि 'वहीं' से शुरू हुई। सृष्टि कहाँ से शुरू हुई? उनके मन से,  सृष्टि करने की इच्छा से। 'इच्छा', मन में ही, आती है। और, हमलोगों के, मन से ही, सब कुछ बनता है। (2.26 m) 
[अर्थात हमारे दृष्टिकोण (attitude-नजरियामनोभाव या मन का रुझान) के अनुसार ही हम जगत को देखते हैं! उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत् सब सपना॥ हे उमा! मैं तुम्हें अपना अनुभव कहता हूँ- हरि का भजन ही सत्य है, यह सारा जगत् तो स्वप्न (की भाँति मिथ्या) है। आध्यात्मिकता के अभ्यास में मनोवृत्ति ही प्रमुख होती है न कि बाह्य गतिविधियाँ। यदि कोई वृंदावन  जैसे तीर्थ स्थान पर रह रहा है किन्तु उसका मन कोलकाता में रसगुल्ला खाने का चिन्तन करता है तब यह माना जाएगा कि वह कोलकाता में ही है। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति कोलकाता की भीड़-भाड़ में रहता है किन्तु अपने मन को वृंदावन (कृष्ण की लीलाभूमि और श्रीरामकृष्ण की लीलाभूमि दक्षिणेश्वर, बेलुड़ मठ, जयराम बाटी, कामारपुकुर) की दिव्य भूमि में तल्लीन रखता है तब वह वहाँ होने का लाभ पा सकता है। सभी वैदिक ग्रंथों में उल्लेख है कि हमारे मनोभावों के अनुसार ही हमारी 'चेतना' (Awareness -जागरूकता) का स्तर निर्धारित होता है। 
{Apparent Man and Real Man : हमारी दो पहचान है -(resume में देने वाला अपने नश्वर देह के नाम-रूप का संक्षिप्त परिचयप्रातिभासिक देह और मन का व्यावहारिक मनुष्य (Apparent Man) और अंतर्निहित दिव्यता या अविनाशी आत्मा और परमात्मा के Oneness के बोध वाला -वास्तविक मनुष्य (Real Man)!  जगत के प्रति हमारे दृष्टिकोण का स्तर 3'H' के  Simultaneous Awareness ' प्रातिभासिक देह, मन और वास्तविक आत्मा के प्रति युगपत जागरूकता के द्वारा निर्धारित होता है। ऐसे Apparent Man (मिथ्या-असत् नहीं ) संसार में, जो सिर्फ भासता है, इंद्रियों ने हमें उसे सच मानने का धोखा दिया है। अगर हमलोग आँख से नहीं - इंद्रियों के द्वारा देख सकें, और शिव-ज्ञान से जीव-सेवा करते समय अपने यथार्थ स्वरुप के  प्रति समान रूप से जागरूक  (Simultaneously Aware सचेत ) रह सकें तो हमारी धीरे-धीरे दृष्टि बदल जाएगी और जगत ब्रह्ममय मालूम पड़ने लगेगा।] 
एक लोकप्रिय श्लोक में, जो हनुमान रचित माना जाता है, कहा गया हैः “शरीर के दृष्टिकोण से मैं आपका सेवक हूँ, जीव के दृष्टिकोण से मैं आपका अंग हूँ और आत्मा के दृष्टिकोण से मैं स्वयं आप ही हूँ:, यह मेरा दृढ़ विश्वास है।”

दृष्टिं ज्ञानमयीं  कृत्वा पश्येद्  ब्रह्ममयं जगत्।  

सा दृष्टिः परमोदारा न नासाग्रावलोकिनी ॥

 (अपरोक्ष अनुभूति ११६)॥

"देहबुद्धया तु दासोऽहं,  जीवबुद्धया त्वदंशकः।   

आत्मबुद्धया  त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः ॥"/

[पाठ भेद है - ‘इति वेदान्तडिण्डिमः’

ज्ञानमय दृष्टि से संसार को ब्रह्ममय देखना चाहिए : देहबुद्धिसे तो मैं दास हूँ , जीवबुद्धि से आपका अंश ही हूँ और आत्मबुद्धि से में वही हूँ जो आप हैं, यही मेरी निश्चित मति है॥}]
  
इसीलिए कहा गया है - 

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।

 बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम् ॥

(ब्रह्मबिन्दु/अमृतबिन्दु उपनिषद्- श्लोक 2)

मन ही मनुष्यों के बन्धन का कारण होता है और मुक्ति (मोक्ष) का भी कारण होता है। विषयों में आसक्त मन बन्धन का और कामना-संकल्प से रहित मन को ही मोक्ष (मुक्ति) का कारण कहा गया है ॥
इसीलिए देह (शरीर) की भी जरूरत है, पर इससे बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है हमारा मन। अगर मन को पकड़ा नहीं गया, अर्थात मन को यदि वशीभूत नहीं किया गया, तो शरीर चाहे कितना भी बलवान हो उससे जीवन-गठन या (Be and Make) में कोई सहायता नहीं मिल पायेगा।
(3.11 m)
       उपनिषद में एक छोटी सी कहानी है - 'देवगुरु बृहस्पति आश्रम की प्रवेश परीक्षा'  बृहस्पति को कहा जाता है देव गुरु ! वे अपने गुरु-कुल आश्रम में मनुष्यों के साथ देव लोगों को भी शिक्षा देते थे। उनके ज्ञान और विवेकशीलता की वजह से उनकी  ख्याति दूर-दूर तक कई राज्यों में फैली हुई थी। देवता लोगउन से प्रभावित होकर बहुत दूर-दूर से उन्हें खोजते हुए उनके गुरुकुल आश्रम में शिक्षा लेने के लिए आया करते थे। 
       आजकल जैसे होता है न, बड़े बड़े यूनिवर्सिटी या कोटा -कोचिंग इंस्टीटूशन का विज्ञापन देखकर दूर-दूर के छात्र वहाँ ऐडमिशन लेने पहुँच जाते हैं।  tv के सामने बैठ कर न्यूज सुनने या सीरियल देखने का अभ्यास (आदत) तो नहीं है। लेकिन अख़बार में कभी -कभी यूनिवर्सिटी या एडुकेशनल कोचिंग इंस्टीटूशन को लेकर फुल-वन पेज एडवर्टिजमेंट देखने को मिलता है। Or whatever is there, a Full -page Advertisement, foreign Universities are coming to India, and India is trying to send its Universities to other countries. .... there is no demand, but it has to be thrust. Harvard and Oxford University are also going to have their centers in India now.  
     
   विदेशी यूनिवर्सिटी भारत में आ रही हैं, भारत अपने यूनिवर्सिटीज को विदेश  भेजने की चेष्टा कर रहा है। यहाँ उसकी कोई डिमाण्ड नहीं है, बल्कि उस शिक्षा को प्रचार के बल पर थोपा जाता है।  US का हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और इंग्लैण्ड का ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी भी भारत में अपना ब्रांच खोलना चाहते हैं। ... फिर भी ऐसा होता है - - वहाँ के कुछ स्टूडेन्ट्स हमलोगों के यहाँ अभी हाल में आये थे, केन्द्रीय सरकार में हमारे सबसे मजेदार मंत्री (हँसी के पात्र मंत्री) है - रेलवे मिनिस्टर हैं उनसे मिलने के लिए! अभी यहाँ आते समय रेल-इंजन की वंशीध्वनि कान में सुनाई दे रही थी, हमने सोचा कहीं श्रीकृष्ण जी तो नहीं बजा रहे हैं ! पूछा ये क्या है ? रेलवे इंजिन की सिटी/विश्ल का नया मॉडल है। सोचा अच्छा ऐसा व्हिसल भी बन सकता है क्या -श्रीकृष्ण की वंशी की तरह ! 
      They came all the way to India , just to listen to this minister, who had created something new.. revolution in the railway of India .So he talked to them in Hindi and they appreciated it very much! तो केवल उसी रेल-मंत्री से मिलने, उनसे कुछ नया क्रन्तिकारी मैनेजमेन्ट सीखने विदेश के कुछ स्टूडेंट्स भारत आये थे। रेल मंत्री ने  उन विदेशी स्टुडेंट्स को हिन्दी में ही समझा दिया। वहाँ के लड़के भी उनसे मिलकर बहुत खुश हुए, और उनकी बड़ी प्रशंसा भी किये। (5.13 m
          मन ! वास्तव में कोई भी नई खोज मन से ही होती है,मन को एकाग्र करके जिस विषय पर भी हम लगा देंगे , वो काम अच्छा होगा। लेकिन हमलोग मन को वश में किये बिना बाहर की दुनिया में बहुत भागदौड़ करते रहते हैं, लेकिन नहीं जानते हैं कितनी मूल्यवान वस्तु हमारे भीतर में है। इसलिए अब बाहर नहीं देखकर, नेत्रों को बाहर से घुमाकर भीतर की ओर मोड़ देना होगा।
" आवृत्तचक्षुः अमृतत्वम् इच्छन् " (बाहर की वस्तुओं को नहीं देखकर आँखों को घुमाना चाहिए , भीतर की ओर मोड़ देना चाहिए। सृष्टि करने -वंशविस्तार करने की इच्छा से नहीं -अमृतत्व को पाने की इच्छा से) हमारी सभी इन्द्रियाँ बहिर्मुखी हैं , बाहरी विषयों को देखती हैं। लेकिन उसको कभी कभी (दिन भर में दो बार) भीतर भी घुमाने की कोशिश करनी चाहिए। जब हम अपने ह्रदय-कमल में छिपे सम्पद को देखेंगे, तब समझेंगे कि भीतर कितना बड़ा खजाना छिपा हुआ है। भीतर में देखना यदि नहीं सीखे , तो बाहर देखकर हमेशा केवल मृगमरीचिका के पीछे ही भागते रह जायेंगे। किसी भी वस्तु का सही रूप से दर्शन (विवेक-दर्शन) नहीं होगा। (6.15 मिनट
          "क्योंकि हमारी दृष्टि- हमारा नजरिया, हमारा दृष्टिकोण किसी व्यक्ति या वस्तु को जो मूल्यबोध देती है, वह उस वस्तु या व्यक्ति की महत्ता को और भी उच्चतर बना देती है।" किसी व्यक्ति या वस्तु (नाम-रूप) के भीतर जो सत्ता है- जो अंतर्निहित दिव्यता है (Inherent Divinity) वो तो है! लेकिन हमलोग जितनी अधिक प्रशंसात्मक दृष्टि (admiring glance) से किसी भी व्यक्ति या वस्तु को देखते हैं, उससे उस व्यक्ति या वस्तु का जो भाव है, जो महात्म्य है - वो भी उतना ही अधिक बढ़ जाता है। मेरी दृष्टि से, मेरी दृष्टि बदल लेने से- ज्ञानमयी दृष्टि बना लेने से किसी व्यक्ति या वस्तु की महिमा और बढ़ जाती है - ऐसा होता है।  इसीलिए भीतर देखने में समर्थ होना बहुत जरुरी है। (6.48 मिनट)   [जैसे माँ सारदा देवी की स्नेह भरी दृष्टि से -Affectionate glance अमजद, भी अव्यक्त ब्रह्म है, उसमें जो अस्ति,भाति, प्रिय है, वो तो है! माँ की स्नेह भरी दृष्टि (नजर) से वह और भी बढ़ जाता है उसे और अधिक अच्छा बनने की प्रेरणा देती है !]  ये जो सृष्टि करने या वंशविस्तार करने की इच्छा से नहीं बल्कि अमृततत्व पाने की इच्छा से मन के भीतर देखने के लिए जो उपाय बताया गया है, मन को  अन्तर्मुखी करने का जो अभ्यास करना है, उसका सूत्र है -  'अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोधः ।'  (यो० सू० 1 / 12/ नजरें बदली तो नजारे बदल गए -कश्ती का मुख मोड़ा तो किनारे बदल गए।) -We have heard, Two things are necessary, मन को अंतर्मुखी करने या वश में करने के लिए दो चीजें जरुरी हैं पहली चीज है वैराग्य ! सूत्र के अनुसार पहले है अभ्यास, बाद में वैराग्य। लेकिन पहले मन में वैराग्य का भाव रहेगा, तभी आध्यात्मिकता का अभ्यास फलदायी होगा मन में यदि वैराग्य नहीं है, तो बहुत देर तक अभ्यास करने से भी कुछ नहीं होगा। बहुत अभ्यास करने से भी आसन पर आँख मूँद कर बैठा, -उठा, कुछ नहीं हुआ ! (7.39 मिनट) लेकिन यदि मन में वैराग्य का भाव रखते हुए सही रूप से केवल 5 या 10 मिनट बैठने से अभ्यास करने बाद, यदि उठा तो हमारी भी दृष्टि बिल्कुल बदल जाएगी । (हमारी दृष्टि भी माँ जैसी स्नेहमयी या ज्ञानमयी दृष्टि हो जाएगी !) इसीलिए मन जोर से - 'मैं एक चरित्रवान मनुष्य बनूँगा' के अटल  संकल्प ग्रहण की दृढ़ता से हमें ये आध्यात्मिक अभ्यास करते जाना चाहिए। यह अभ्यास कभी छूटना नहीं चाहिए। सुबह और शाम नहीं तो रात को सोने से पहले, आध्यात्मिकता का अभ्यास करने के लिए हम जरूर बैठेंगे । (8.11m
       लेकिन किस पर ध्यान रखेंगे ? (अर्थात प्रत्याहार-धारणा का अभ्यास करने करने के लिये किस आदर्श का चयन करेंगे ?) जैसा कहा जाता था हमारे नेता (guide) कहो, गुरु (teacher) कहो, शिक्षक कहो , बन्धु कहो (मित्रवत बड़े भैया) जो भी कहो - लेकिन हर हाल में  Swami Vivekananda is our friend,...Our Teacher, Our Guru ! (8.29 m) So if we Love Him, As it comes from my heart, I can't think otherwise, That Sri Ramakrishna, The Holy Mother (माँ सारदा देवी) , Swami Vivekananda- Devotion is alright, very good ! But devotion is also not so easy !  But Love, is spontaneousIf we can have somehow that Love for them in our Heart, then we will be nearer to them.  And as we come near to them, Very close to them, its influence will transform our soul ! Our Heart Our whole this human things -(sense organs etc) that we possess automatically, we do not how ? It will be transformed, it will changed , it will become a different thing. It will not be a physical body.  So for this we have to do some practice, and for that practice There are eight stages-According to Patanjali's Yoga sutra . We have heard about these things. (9.55m First is Control-आध्यात्मिकता के अभ्यास में पहला कदम है कंट्रोलिंग -शम और दम ! बाह्य कर्मेन्द्रिय तथा आंतरिक ज्ञानेन्द्रियों का संयम। मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण। बाह्य इन्द्रियों का (कर्मेन्द्रिय का-आँख,कान,नाक,जीभ और त्वचा) संयम और भीतर की इन्द्रियों का (रूप-रस-शब्द-गंध और स्पर्श ज्ञानेन्द्रियों का) संयम रहना चाहिए। सबसे पहले लालच को कम करना चाहिए। (10.06 m
     और उसके बाद (वैराग्य पूर्वक यम-नियम या शम -दम का अभ्यास 24X 7 करने के बाद) दो बार बैठने का तरीका को आसन कहा जाता है। प्रत्याहार-धारणा का अभ्यास करने के लिए कैसे बैठना है ? Spinal Cord -मेरुदण्ड या रीढ़ की हड्डी सीधी रखकर, एक पैर एक पैर के ऊपर रख कर बैठने को अर्ध पद्मासन कहा जाता है। पद्मासन भी बहुत अच्छा है , उसमें दोनों पैर को एक दूसरे पर चढ़ाकर बैठा जाता है , लेकिन बैठने का अभ्यास नहीं रहने से शरीर को थोड़ा कष्ट होता है। और शरीर को जब कष्ट अनुभव होगा तो क्या होगा ?  मन उधर ही चला जायेगा। लेकिन एक पैर को उठाकर अर्ध पद्मासन में बहुत देर तक बैठा जा सकता है , बहुत आराम से आधा घंटा -एक घंटा तक भी बैठ सकते हैं। उतना देर बैठना भी कुछ नहीं है। पढ़ते समय - जिस कुर्सी-टेबल पर बैठ कर पढ़ना, चौकी पर बैठकर पढ़ना, या जमीन पर बैठकर भी पढ़ा जा सकता है। लेकिन अर्धपद्मासन में बैठने से दो घंटा -तीन घंटा भी बैठा जा सकता है। शरीर में कष्ट भी अनुभव नहीं होगा, इसलिए शरीर की ओर मन नहीं जायेगा। इसलिए मन के द्वारा हम जो चीज पढ़ते हैं , सीखना चाहते हैं, जो सुनते हैं , जो आध्यात्मिक विचार मन में चलता है; उसमें कोई बाधा या कठिनाई नहीं आएगी। अतः अर्धपद्मासन में बैठकर फिर चिंतन-मनन करना चाहिए। 
     लेकिन किसका ध्यान करना चाहिए, किसका चिंतन करना चाहिए ? अभी देखिये - मनःसंयोग क्लास शुरू होने के पहले जो प्रार्थना हो रही थी, रामकृष्ण स्त्रोत्र चल रहा था, उसमें एक नाम रामकृष्ण, रामकृष्ण नाम बार-बार चलता था। उसके बारे में अभी -अभी मेरे मन में जो चल रहा था, वो बतलाता हूँ। (12.2m-रामकृष्ण नाम का मतलब क्या है?) रामकृष्ण ! राम के बारे में हम जानते हैं,  राम के बारे में रामायण से जानते हैं। कृष्ण के बारे में महाभारत, गीता, भगवत आदि बहुत से ग्रन्थ है। लेकिन 'रामकृष्ण' का क्या मतलब है?  Same thing , राम और कृष्ण  Same thing , वही जो राम का है, जो कृष्ण का है। इसमें राम का क्या मतलब है? ---"रमयति इति रामः " जो आनन्द देता है, वो है राम!" कृष्ण क्या है ? (12.38 m"कृषि भू वाचकः शब्दः णस्य तस्य निवृत्ति वाचकः"# कृषि का मतलब भू या पृथ्वी, और जो सम्पूर्ण पृथ्वी को भी आनन्द देता है- वो है कृष्ण । मन को जो आनन्द देता है,सभी मनुष्यों को जो आनंद देता है। सभी जीवों को जो आनन्द देता है , रमयति इति राम: (रामो) वे हैं राम।  और कृष्ण भी वही हैं। सब जीवों को जो 'आ '.... आनन्द देते हैं -means one who delights you." ये हैं राम, ये हैं कृष्ण ! एक व्यक्ति राम वहाँ का (अयोध्या का) राजा था, दूसरे कृष्ण द्वारिका के राजा थे। केवल इतना ही नहीं।  
[#‘कृषिर्भूवाचकः शब्दो णश्च निवृत्तिवाचकः। तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते।।’ (महाभारत, उद्योग-पर्व 71/4)  ‘कृष्’ धातु – भू अर्थात् सत्ता वाचक है; ‘ण’ – शब्द निवृत्ति अर्थात् परमानन्द वाचक है। ‘कृष्’-धातु में ‘ण’–प्रत्यय युक्त करके ‘कृष्ण’ शब्द में परमब्रह्म प्रतिपादित हुआ है। ‘कृष्ण’ शब्द से आनन्दमयी सत्ता को समझना चाहिए। ‘कृष्ण’ शब्द के अन्य अर्थ हैं – ‘कृष्’- आकर्षक सत्तावाचक, ‘ण’ आनन्दवाचक (अर्थात् ‘कृष्’ का अर्थ होता है आकर्षण और ‘ण’ का अर्थ आनन्द) – जो आकर्षण करके आनन्द देते हैं और स्वयं आनन्दित होते हैं, वे ही ‘कृष्ण’ हैं। अर्थात् कृष्ण का अर्थ है – सर्वाकर्षक, सर्वानन्ददायक। प्रत्येक विषय में सर्वोत्तम नहीं होने से वे सर्वाकर्षक नहीं हो सकते। रसो वै सः। रसं ह्ओवायं? लब्ध्वानन्दी भवति ।। (तैत्तिरीय उपनिषद् 2/7) वे (परम पुरुष कृष्ण) रस स्वरूप हैं। उस रस (आनन्द) का जो पान करते हैं, वे ‘आनन्दी’ होते हैं। उपनिषद् में ‘सः’ शब्द के द्वारा ‘कृष्ण’ (श्रीरामकृष्ण?) को ही इंगित किया गया है।]
             ये पुराण की पौराणिक कहानियां किस बात को इंगित करती हैं ? (13.18 m)  कहानियों के माध्यम से साधारण व्यक्तियों को शिक्षा देने के लिए प्राचीन राजाओं और उनके कार्यकाल का वर्णन किया जाता है। रामायण-महाभारत-भागवत  पुराण आदि कहानियों के माध्यम से ज्ञान को साधारण जनता तक शिक्षा पहुँचाते हैं। केवल ऐसे कोई व्यक्ति थे या नहीं ? इस पर बहस में न पड़कर, लेकिन इसके पीछे, उनके नाम के बीच में जो भाव है, उसको पकड़ना चाहिए ; वह बहुत सुन्दर है।  राम और कृष्ण इनके नाम के पीछे में जो भाव अंतर्निहित है , वो बहुत सुन्दर है। तो एक प्रतीक, मूर्ति या छवि पर चिंतन-मनन करने से साहचर्य के नियमानुसार यदि मेरे ह्रदय में कोई बड़ा भाव आ जाता है। उनको राम या कृष्ण को एक प्रतीक के रूप में - किसी Image को लेने से यदि हमारे भीतर बहुत सुन्दर कोई बड़ा भाव आ जाता है, जो बहुत आनन्द देता है, वह क्या helpful है या नहीं ? यह देखना है। It is very helpful ' - भले ही ये सब कहानियाँ बच्चों के लिए लिखी गयी हों। (14.02 m)
 So these stories ever written for children, we tell stories to them and they become very happy .They become very eager to listen more stories. Stories are very good tutors in earlier ages. In all countries of the world, 'Aesop's Fables of the West'; has such captivating power in it. (14.30 m) In India, also such stories went on for a long time,  I don't know  whether now children reads  'Aesop's Fables of the West' or not . But in our country So many stories are there, and most of the stories have their roots in the Puranas. -Description of the past and such educative ideas are nowhere have to found nowadays . (14.58)
      Now we have so many things , philosophy also proceedings, New philosophy modern philosophy they say....-Existentialism: (15.11 m) I don't know who understands these things.  New things , somebody thought about something, he wrote a few articles on that, and That becomes philosophy ! और वही नया फिलॉसफी बन गया। Nowadays I get information, in MA classes also in philosophy, just one article published in some journal sometime, --Xerox copy of that are given, and that becomes a part of New Syllabus of philosophy. Fantastic idea also they have a name of philosophy.But the oldest philosophy was born in India only .(15.49 m
The philosophy we get from the Vedas, Then the Upanishads are absolute philosophy ! Such philosophy has never come anywhere in the world till today ! (16.05) It's not there  - " भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः। प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति।।" कल शायद आया था !  कितना पुराना सिद्धान्त है ! 

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति। न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।

भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः। प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति।।
 
(केनोपनिषद- २. ५)

भारतीय फिलॉसफी (उपनिषद की) यह नैतिक शिक्षा कितनी पुरानी है! भूतेषु, भूतेषु- सब जीवों में,...  'विचित्य' उनको (ईश्वर को) देख कर-उनको समझकर; धीराः प्रेत्य अस्मात् लोकात् अमृता भवन्ति॥ 
After leaving behind this physical world-they become immortal - what a noble idea !  इस भौतिक संसार को पीछे छोड़ने के बाद वे - अमृता भवन्ति' -वे अमर हो जाते हैं - कितना अच्छा विचार है! We have all these teachings  , and these things come from those noble sources. (17.00)
      And we see in our own time, the understanding and application of these great ideas (चार महावाक्य) great ideas very beautifully in the lives of Sri Ramakrishna, The Holy Mother, Swami Vivekananda. There were so many other Saintly people, born in India particularly; In other countries also some came, but here it was plenty ! Sooo many great souls, 'But if we go to all there are some fine differences in their teaching and their life'  But here we have absolutely the oldest philosophy of Vedanta .(17.46m) 
'वेदान्त' शब्द का मतलब क्या है ? (17.50 m) -तात्पर्य क्या है? वेद का अर्थ है ज्ञान! (सत्य के दो प्रकार हैं -एक (इन्द्रियगोचर-सत्य)  को Science तथा इन्द्रियातीत सत्य का ज्ञान!  दूसरे को 'वेद' कहते हैं।) वेद का अर्थ कोई पुस्तक अथवा ग्रन्थ नहीं समझना चाहिए। Veda doesn't mean some books . They came in book form only the other day- पुस्तक के रूप में तो वे हाल में छापे गए। But they were orals, they came as orals from the mouth of teachers to the students They used to hear , and after hearing they used to memorize them, and recited again , that is how it has came, and therefore the another name of the Vedas is Shruti . (18.20 m)  
 सुनने से ज्ञान मिला -लेकिन वे वेद-वाक्य, महावाक्य या ज्ञान, गुरु के मुख से (अर्थात गुरु-शिष्य वेदान्त शिक्षक-प्रषिक्षण परम्परा में शिक्षकों के मुख से), विद्यार्थियों तक मौखिक भाषा के रूप में हजारों वर्ष पहले आये हैं । विद्यार्थी लोग उन सत्यों को सुनते थे - या उन महावाक्यों का श्रवण करते थे, और महान सत्य सिद्धान्तों को सुनने के बाद उन्हें याद कर लेते थे, और गा कर उसका पाठ करते थे।  और इसलिए वेदों का दूसरा नाम श्रुति है ! श्रुति - विद्या गुरुमुखी ! जो ज्ञान साक्षात् गुरु देव के मुख से सुनकर प्राप्त हुआ है, और सुनकर याद है! और फिर शिष्य उसे सुनकर अपने मुख से उच्चारण करता है। (इसलिए इसको श्रुति कहते हैं ) (महावाक्यों का श्रवण कर-तैत्तरीय उपनिषद में तो शिष्य लोग श्रवण के बाद पूरा उगल भी दिए थे।) इसीलिए वेदों को (महावाक्यों को) श्रुति कहा जाता है - शिष्यों ने इसे सुना है। सुनने से आया है। सुनकर याद है और फिर उसे अपने मुँह से निकालता है। इसलिए वेद का एक अर्थ श्रुति है! 
उपनिषद क्या है ? उसे वेदान्त भी कहा जाता है। वेदों का जो शास्त्र या ग्रन्थ है , उसके अन्त में जो अंश आता है, उसको। वेदों के अन्त में उपनिषद है। और गुरुमुख से सुने गए उन उपदेशों को अपने जीवन के द्वारा -अपने चरित्र के द्वारा अभिव्यक्त करने में समर्थ शिक्षकों का आविर्भाव हमेशा होता रहा है।
"It has been demonstrated so many times, in so many great lives(18.59 m) In our country And latest, in our own time -  We may say perhaps, it came to my mind- That I have a good fortune to see one person who saw Sri Ramakrishna deva! I have seen so many people who saw the holy mother -Sri Sarada Devi; and I have met at least one person who met Swami Vivekananda!
     So they are not historical personalities . They were of our own time. In our own time in this age ! This old ,very old Vedic Ideas , Upanishadic Ideas they were demonstrated to the fullest extent possible in a human life; in these three lives of our time ! and in the lives of their disciples ! So we are very fortunate ! God did not descend upon this earth as we say, Incarnation we say !
       But these three , The Trio- 'त्रयी'- त्रिमूर्ति जिसको कहते हैं -हमारे मन में आता है कभी -कभी, जैसे एक विल्वपत्र या बेल के पत्ते में तीन पत्ते जुड़े रहते हैं ; लेकिन उनकी गिनती एक विल्वपत्र की होती है। Three leaves are joined together, but it is considered in one stock . तीन पत्ते एक ही तने पर जुड़े होते हैं ! वैसे ही श्रीरामकृष्ण, माँ श्री सारदा देवी , स्वामी विवेकानन्द एक ही डाली के तीन विल्वपत्र हैं। और हमारे ज़माने के हैं।बिल्कुल हमारे युग में अवतरित ये तीनों- जिन्हें 'त्रयी' भी कहा जाता है। 
        वेदों का एक नाम त्रयी भी है। जैसे श्रुति भी वेदों का नाम है। वैसे वेद तो कहते है चार वेद हैं , ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद, फिर त्रयी  नाम क्यों हैं ? गद्य ,पद्य और संगीत की त्रयी है उसमें। Prose, Poetry and Music or Songs - गद्य, काव्य और संगीत या गीत- इसीलिए इसको त्रयी कहा जाता है। इसमें जो विद्या है, इसमें जो भाव है , ये अभीतक 'पुराना' नहीं हुआ ! (21.48 m) [ इसे नित्य नूतन-पुरातन विद्या कहते हैं ?]  चाहे कोई जितना भी बड़ा दार्शनिक हो, फिलॉस्फर हो , या तर्कवादी (Rationalist) हो, बुद्धिवादी हो, जो कुछ हो- इन वेदों में  (चार महावाक्यों में से) कोई भी सिद्धान्त गलत है, ऐसा अभी तक कोई साबित नहीं कर सके हैं। और भविष्य में भी इन महावाक्यों का कभी खण्डन करना सम्भव नहीं होगा। 
So it is our good fortune that we are born in a age -where this tryo - this three human lives; They 're-told' us the whole story of the development of the philosophical ideas ! So we will benefit very much if we try to make use of these ideas in our life. 

इसलिए यदि हम इन विचारों को (महावाक्यों को) अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करें तो हमें बहुत लाभ होगा। हमलोग इस युग में जन्में हैं -जब मानवशरीर में आकर ये तीनों का त्रयी -Three human lives retold us the whole philosophical idea. तीन मानव जीवनों ने हमें वेदों के संपूर्ण दार्शनिक विचार को पुनः अपने जीवन में उतार कर बताया। हमें इन सिद्धान्तों का उपयोग अपने जीवन में करना चाहिए। इसीलिए हमलोग सुबह शाम कहते हैं - We sing morning evening... 
"स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्मस्वरूपिणे ।
 अवतारवरिष्ठाय रामकृष्णाय ते नमः ॥ " 

श्री रामकृष्ण देव को अवतारवरिष्ठ  क्यों कहते हैं ? बहुत से लोग अपने अपने धर्म के अवतार को उत्तम  मानते हैं, कुछ लोग नहीं मानते हैं। ये अवतरवरिष्ठ कैसे हो गए ? ईसा मसीह भी अवतार हैं। पैगम्बर मोहम्मद अवतार हैं। हमलोग मानते हैं, मुसलमान लोग नहीं भी मान सकते हैं। हमें नहीं मालूम है, हमलोग पैगम्बर मोहम्मद को भी अवतार मानते हैं।  इस देश में कितने अवतार हैं। रामचन्द्र हैं। उनसे भी पूर्व में - उनसे पहले और भी कितने अवतार हुए हैं -दशावतार की  बात हमलोग जानते हैं। कितने अवतार हैं , बुद्ध एक अवतार हैं। दस अवतार हैं -आते आते हमारे जमाने में श्री रामकृष्णदेव आये थे। तो स्वामी विवेकानन्द उनको प्राणम -मंत्र में लिखते हैं, हमलोग बोलते हैं - 'अवतारवरिष्ठाय रामकृष्णाय ते नमः ! ' 
      -अवतार वरिष्ठ क्यों बोलते हैं ? क्या इसलिए कि वे हमारे गुरु हैं , हमारे भाषा बोलने वाले राज्य से हैं क्या इसलिए ? नहीं ! अवतार लोग क्या किये हैं? अवतार लोग धर्म को प्रतष्ठित करते हैं    ! They establish , propagate, teach a new form of religion -वे यथार्थ धर्म (Religion itself !) को एक नए रूप में स्थापित करते हैं, उसका प्रचार करते हैं, उसकी शिक्षा देते हैं। उनको समय -समय पर आना पड़ता है , from time to time ,क्योंकि  everything decays in time, with passage of time ! क्योंकि हर चीज़ समय के साथ, समय बीतने के साथ क्षय होती रहती है।
 but when dharma becomes weak,  remain not in not a so good form, so that people can practice them for their spiritual benefits,.. Then somebody comes ! A Giant comes ! And he pulls it up ! and 
propagate again in new - the old things ! Religion and Spirituality is the oldest thing ! That Spirit the highest spirit is called Brahman ! So there is a decay of everything, and this idea-also decay with the passage of time.  
     आत्मा ही परमात्मा है ; यह विचार भी समय के साथ मनुष्य के जीवन से क्षय होता जाता है। And therefore some Incarnation came upon earth ! to renew this vigor for spiritual attainment ! Because human beings are not simple beasts or animal. क्योंकि मनुष्य कोई चौपाया साधारण पशु या जानवर नहीं है। They have some higher purpose of life ! मनुष्य के जीवन का कोई उच्चतर उद्देश्य रहता है।       
      Normally animal goes on four legs,  सामान्यतः जानवर चार पैरों पर चलता है। Animals use four feet to go from one place to another place , Only man has the capacity to stand on two legs ! केवल मनुष्य में ही दो पैरों पर खड़े होने की क्षमता है! with hands free ! and they can only bend their head upwards!- They can see the sky ! The Blue Heaven, the stars excetra , but no animal can do that. 
     और वे केवल अपना सिर ऊपर की ओर उठाकर आसमान को देख सकते हैं! इसके अतिरक्त वे नीला आसमान का स्वर्ग या आसमान में बिखरे सितारों को निहार सकते , लेकिन कोई भी पशु अपने हाथों को मुक्त रखकर वैसा नहीं कर सकता। The form of human beings, therefore, seems to be for a higher purpose, for a greater purpose!  Who can strive to attain something,  greater, - much greater than anything which is achievable by any animal or any beast. or any jeeva! (26.09 m)

Sri Ramakrishna is the latest of the Incarnations , in our own age . 
स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्मस्वरूपिणे ।
 अवतारवरिष्ठाय रामकृष्णाय ते नमः ॥ 
Why swami ji Calls Him the Avatar Varishtha? All the Avatars should be same ! of the same Rank ! (34.28) Why did they come ? They come to re-establish Religion ! When religion decays in a society an Incarnation comes; To revive, to regenerate that religion . 
        But in the case of Sri Ramakrishna, the condition was different. ...." " यदा वै सर्वधर्मानाम ग्लानिर बभूव भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य......... " पर श्री रामकृष्ण के लिए कहना पड़ता है - दुनिया के सभी धर्मों में जब ग्लानि आ गयी -When All the great religions of the world they came down, they decayed-They didn't have that lifeforce, They had earlier! (35.17 m)----- तब, उस परिस्थिति में स्वयं श्री रामकृष्ण जी आविर्भूत हुए थे ! 
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:। 
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ 
(चतुर्थ अध्याय, श्लोक 7)


 यदा वै सर्व धर्मानां ग्लानि बभूव भारत , 
 अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं स स्रजस्य सः।
 तब सभी धर्मों को पुनः प्रतिष्ठित करने के उद्देश्य से, सत्ययुग लाने या  उठाने के लिए  - उस समय उन्होंने अपने को बनाया - प्रकट किया। वे अवतीर्ण हुए। 
'अवतार वरिष्ठः तत्'  रामकृष्णो ही केवलः इतिहास पुरानेषु समः कोऽपि न विद्यते! इसीलिए उनको अवतार वरिष्ठ कहा जाता है कि केवल भारत के धर्म में ही नहीं विश्व के सभी धर्मों में जब ग्लानि आ गयी थी , तब -रामकृष्णो ही केवलः ! तब सभी धर्मों को उठाने के लिए अपने को बनाया।  एक नया धर्म देने के लिए नहीं। 
      To revive, regenerate, every religion of the world not one, किसी एक धर्म को नहीं, दुनिया के हर धर्म को पुनर्जीवित करने, मुरझाये धर्म में जान डालने के लिए रामकृष्ण स्वयं अवतरित हुए।  जैसे गाँव कोई तालाब होता है - एक घाट से हिन्दू पानी लेता है, ईसाई वॉटर, जल, कोई एकवा  लेता है, लेकिन सब एक तालाब के पानी को अलग अलग नाम से -कोई अल्ला , गॉड , ईश्वर कहता है। यह एकत्व आया है रामकृष्ण जी से हुआ है । 
इसीलिए उनको "वतार वरिष्ठ रामकृष्णो ही केवलः- इतिहास पुरानेषु समः कोऽपि न विद्यते!" उनके बराबर का उदाहरण कोई इतिहास में नहीं है , पुराणों में नहीं है। श्री रामकृष्ण के बराबर कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। (37.20 m
कुछ साल पहले एक जर्मन लेखक ने एक पुस्तक लिखा था -A German author wrote a book  some year back- 'Ramakrishna and Christ or the Paradox of Incarnation' , wonderful book ! He describes the life of Jesus so beautifully, and the whole life of Sri Ramakrishna, so minutely, it is astonishing to read it !perhaps we have not read Sri Ramakrishna's life So deeply! Wonderful !! and the last sentence of the book is, he says about Sri Ramakrishna, in the last line that " He was a peruma - The absolute fullness to which nothing can be added. and where he meets Jesus Christ - He is Love! (38.21 m
  Wonderful !! not only Jesus Christ, he has told about-or the paradox of Incarnation, The name of the book is so big--- 'Ramakrishna and Jesus Christ or the Paradox of the Incarnations.' 'रामकृष्ण और ईसा मसीह अथवा  अवतार तत्व का विरोधाभास -पहेली ' ! अद्भुत पुस्तक है।  
अवतार तत्व की (Paradox -पहेली) क्या है ?  इसमें হেঁয়ালি' हम लोग बंगला में कहते है, जो आसानी से समझ में नहीं आता है - बुद्धि लगानी पड़ती है - जिसको हमलोग बुझउवल कहते हैं! apparently to contradict the something- जाहिरा तौर पर कुछ का खंडन करने के लिए- पहेली कही जाती है। -Paradox of the Incarnations --What is this?  " He was a peruma - it is a Greek Word, peru means fullness ! and he says Peruma -The absolute fullness to which nothing more can be added. 
     and where he meets Jesus Christ - He is Love! " We are very fortunate that we are born in this age, Where even if we don't read the Vedas and the Upanishads or other Shastras of different religions, If we look at this life - His life, Life of the Holy Mother , Life of Swami Vivekananda and their teachings in the simplest possible language, Even a child can understand if it tries. So we are very fortunate, Let us try hard, work hard , to make our life FULL, to such an extent that nothing more can be added to the quality of of life led so on . So we will live not for nothing , but for everything . (40.04 m)
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    कोई भी प्राणी-any being! इसीलिए शायद कल ही रूमी की ये सुंदर आयतें आई थी- जैसे धरती के नीचे कुछ खनिज पैदा होते हैं,वैसे ही मैं भी पैदा हुआ,...खनिज के रूप में मरा तब मैं पुनः घास के रूप में जन्मा,  yesterday, perhaps it came the verse of Rumi,... I was born, as some minerals under the ground, then I Was again born as a grass ! Then as trees , Then gradually I grew up , I grew up --Then gradually I grew up , I grew up --  I grew upas a Man !  फिर धीरे-धीरे मैं बड़ा हुआ, मैं बड़ा हुआ - और एक मनुष्य बन गया ! और दो पैरों पर खड़ा हो गया ! 
Then I Shored up to become a God -Deva ! but that is also not the last thing ! लेकिन यह भी आखिरी बात नहीं है ! We have to surpass the state of devas  ! हमें देवों की अवस्था से ही आगे बढ़ना है  !
     As we heard when Sri Ramakrishna had his vision the way to bring Swami Vivekananda from heaven upon earth  ! He left the earth and shord up in the air, and then went on up, on up and up ! And somewhere he saw so many Devas (प्रवृत्ति मार्ग के rishi) sitting ! (27.20 m) leaving them behind He shwoerd further up, to a higher stage, where he found seven Rishis sitting in meditation, One of them was this Narendra Nath! whom He brought, as He says! (27.35 मिनट) What a noble thing, we can shoer up to Infinity ! so to say! There is no limit of our shoring up ! So to say there is no limit of our shoring up ! Not only this earth , we can dive deep in the seas ! and again can go up ! (28.00 m)

(28.06 मिनट) There is very beautiful story in one of the Upanishads, It goes on like this in short .
       Some students came to a teacher as you know -Gurugriha-vasa was the method of education in those times . They used to live with the Guru or the Teacher in his house and did some little works for the family and the teacher taught them without any fees. 
    So a few children, a new batch of students came to the teacher and they were doing this or that for the family, but he was not teaching any thing. then after a few days, the students very politely asked the teacher, When will you will start teaching us ? ... yes, I will do that .

    today you do one thing, each of you take a pigeon in your hand, and take a sharp knife and go somewhere you like, and cut their necks . and bring the body to me back.  But take one care , let not any body see that you are chopping off their head.  They all took one pigeon and a knife and went to different directions. and long after their departure, one by one they started coming back. 
     Have you done that ? yes, yes sir, it is here .did anybody see ? no, no, no body could see .I went to a wide field, where there was nobody anywhere .So I have done . 
      The second person comes , have you done ? yes, yes , did any body see ? no , no, no nobody could see. I went into a deep jungle, there was nobody there. So silently I did this and came back .
   The third boy comes . Have you done that ? Yes sir, I have finished it. Did anybody see ? No, No , How any body could see ? I went to the Seashore , I took a deep in the water and their I cut its head. and then I came. So nobody has seen.
     Like that they came one after another, they came. One boy didn't turn up till evening. After evening he came back, with a pigeon without cutting its head. and felled before the feet of his Guru and said -......" कृपा करके मुझे क्षमा कर दीजिये।" - ये काम हमसे नहीं हो पाया। Sir I have failed to obey you , I could not cut its head, In a place where nobody can see . (31.11m)  Why, why, why ? they have all done that . Yes I went to a wide field, but there also I saw somebody was looking at us. I went into a deep jungle, I went into a deep jungle...... there also I saw ..somebody
was looking at us ! 
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपाद ।

स भूमिं विश्वतो वृत्तत्यतिष्ठदशाङुलम् ॥1॥

Millions of eyes, 'that -- Brahman' has , ...सहस्रशीर्षा Thousand head, सहस्राक्षः, उसकी हजारों आँखें हैं, सहस्रपाद- उस विराट पुरुष के हजार पैर हैं। So many legs, so many eyes ! so many heads... So I couldn't hide myself with this pigeon from their eyes ! (32.14 m) 
    Yes , we have learnt this story , but we forget all these things . We think we have come all here, and we are looked upon at here as a trainee or the Trainer, something like that . People at home think that they have gone to a good place. But instead of coming here,  you could have gone somewhere else. 
   As very recently there was a very sad thing ! A few students went to a place , a hillock in the West Bengal . Some of them lossed, they  died, How? It has not come to light yet .So many theories have come . Who knows ? 
         Nobody could see-where they went ? But we can't escape those eyes. It Is impossible, it is looking at everyone ! So We all must remember that we are always being watched! our movements , our talks, even our thoughts So always you should try to remain pure!  in thought, in body, in deeds , in words, In our Psyche even,  in our look also, we must always try to remain pure . Because He is the purest thing! So we are talking about these Incarnations. (34.02m)
      
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स्वामी विवेकानन्द हर परिस्थिति में युवाओं के मित्र बने रहते हैं। वे हमारे Teacher हैं! हमारे गुरु हैं। यदि तुम उनसे प्यार करते हो,....यह प्रेम शब्द मेरे दिल से आता है, मैं इसके अलावा कुछ नहीं सोच सकता।  भक्ति अच्छी बात है, लेकिन स्वामी विवेकानंद को अपना भैया, नेता (guide) गुरु (teacher) मानकर उनसे प्रेम करना स्वाभाविक (spontaneous) है। ভক্তি ভালো, কিন্তু স্বামী বিবেকানন্দকে আমাদের ভাই বা গুরু হিসেবে ভালোবাসা সহজ। Devotion is good, but it is easy to love Swami Vivekananda as our brother or guru. First is Control- शम, दम ! Control over mind and sense organs .के लिए मन में भक्ति का भाव रहना बहुत अच्छा है। भक्ति बहुत उच्च वस्तु है। लेकिन भक्ति भी इतनी आसान चीज नहीं है।  ठाकु-माँ-स्वामी जी की भक्ति करना बहुत अच्छी बात है; लेकिन भक्ति करना आसान नहीं है, और प्रेम बिल्कुल सहज है ! अगर हम किसी तरह अपने हृदय में उनके लिए प्रेम रख सकें, तो हम उनके अधिक निकट होंगे। यदि मित्र-और गाईड स्वामीजी तथा माँ और ठाकुर की दया को याद करके हमारे ह्रदय में भी स्वामीजी के प्रति वही प्रेम किसी प्रकार जाग्रत हो जाये , और जब हमलोग उनके बिल्कुल निकट आकर,  उनसे बिना कुछ छुपाये उनकी अपनी सन्तान, या एक मित्र के जैसा उनका चिंतन, उनसे बात-चीत, उनका ध्यान करने  लगेंगे तो हमलोगों का यह पूरा शरीर -मन और ह्रदय सब कुछ बदल जायेगा; सब कुछ रूपान्तरित हो जायेगा। तो हमलोग उनके और नजदीक आ जायेंगे। .  हमारी सभी मानवीय चीजें - इंद्रियां आदि जो हमें स्वतः - अपने आप प्राप्त हो जाती हैं, हम नहीं जानते कि कैसे; लेकिन यह सब बदल जाएगा, यह एक बिल्कुल अलग चीज बन जाएगी। यह अब केवल एक दृष्टिगोचर भौतिक शरीर (Physical Body) ही नहीं रह जायेगा। इसके लिए हमलोगों को जो अभ्यास करना होगा, पतंजलि योग सूत्र के अनुसार वह आठ चरणों में करना होगा। इसके बारे में हमने मनःसंयोग की कक्षा में विस्तार से सुना है।  पहला है मन और इंद्रियों पर नियंत्रण ! (या तीनों ऐषणाओं में आसक्ति को समाप्त कर देनाजाना चाहिए--पात्रता के अनुसार।) 


     

     


 वह एक पेरुमा थे - पूर्ण पूर्णता जिसमें कुछ भी नहीं जोड़ा जा सकता है।  

उन्होंने रामकृष्ण और ईसामसीह के जीवन को इतनी गहराई से देखा था कि हमलोग नहीं देख पाते। पुस्तक की अंतिम पंक्ति में श्री रामकृष्ण के बारे में वे कहते हैं कि - " श्रीरामकृष्ण देव एक 'पेरुमा' थे (लैटिन शब्द) का अर्थ होता है - पूर्ण परिपूर्णता {Entirety- Perfectness or Wholeness}  जिसमें कुछ भी नहीं जोड़ा जा सकता। और जहां वे यीशु मसीह से मिलते हैं - वे प्रेम है!"  -He says about Sri Ramakrishna, in the last line that -
 

 और कहीं उन्होंने बहुत से देवताओं को देखा , वहाँ देवलोक में भी नहीं रुके; वहाँ से भी और ऊपर उठते गए। अंत में एक स्थान पर 'निवृत्ति मार्ग' के सप्त ऋषियों को ध्यान बैठे हुए देखा ! (27. 23 मिनट)  और तब  इस शक्ति को नवीनीकृत करने के लिए; कोई अवतार धरती पर आता है !वे लोग धर्म प्रचार करते हुए, या किसी नए धर्म की शिक्षा देते हुए , अपने समय में धर्म को स्थापित किये हैं।  समय के प्रवाह में हर चीज में क्षरण होता है। जब धर्म में इतनी ग्लानि हो जाती है कि लोग अपने आध्यात्मिक लाभ के लिए उसका अनुसरण भी नहीं कर सकें , तब कोई शक्ति देह धारण कर अवतरित होती है। एक महामानव धरती पर आविर्भूत होता है , और धर्म को पुनः ऊपर उठाता है। अध्यात्म और धर्म कभी पुराना नहीं होता है, यह सबसे प्राचीन चीज है। आत्मा और परमात्मा दोनों एक हैं , परमात्मा या सर्वोच्च आत्मा को ही  ब्रह्म कहा जाता है-The highest spirit is called Brahman ! लेकिन यह विचार भी समय के प्रवाह क्षीण हो जाता है। तब कोई अवतार आते हैं क्योंकि - मनुष्य अपने आध्यात्मिक स्वरूप को भूलकर पशु हो जाते हैं। पर मनुष्य साधारण चौपाया जीव नहीं हैं। [(18.17- 20.47 मिनट- 25.24 मिनट गूढ़ बात ]
 उसमें से एक ऋषि थे - नरेन्द्रनाथ ! जिसको वो अपने साथ लाये थे - ऐसा उन्होंने स्वयं कहा था !  इस धरती पर ही नहीं, हम समुद्र की गहराई तक गोता लगा सकते हैं ! ऊपर से भी ऊपर तक उठ सकते हैं। मानव जीवन का एक उच्च उद्देश्य है - पशुओं जैसे रहने नहीं आया है। आम तौर पर जानवर चार पैरों से चलते हैं। पर मनुष्य अपने दो पैरों पर सीधा खड़ा हो सकता है, गर्दन उठाकर आसमान को देख सकता है। कोई भी पशु आकाश, तारे और स्वर्ग की तरफ नहीं देख सकता। मानव -शरीर ताजमहल है , ऊंचा उद्देश्य है। देवता भी ईश्वर लाभ नहीं कर सकते पर मनुष्य कर सकता है। कल फ़ारसी कवि रूमी की शायरी पर बात हो रही थी - मैं घास बन था, बढ़ता हुआ मनुष्य बन गया , अब देवता जाऊँगा ! देवता बन जाना ही अन्तिम पड़ाव नहीं है। उससे भी आगे जा सकते हो। हमें देव-शरीर को भी पार कर अनन्त में पहुँचना है। हमलोग कहानी सुनते हैं रामकृष्ण ने ध्यान में देखा था -स्वामीजी को वहाँ से लाये थे जहाँ 7 निवृत्तिमार्ग के ऋषि बैठे थे। हमलोग भी अनन्त तक उठ सकते हैं। ऊपर उठने की कोई सीमा नहीं है। वैसे ही इस मनुष्य अवस्था से गिरने की भी कोई सीमा नहीं हैं -पताल की गहराइयों में गिर भी सकते  सकते हैं। किन्तु फिर वहां से ऊपर भी उठ सकते हैं !
 बच्चे कहानियाँ सुनकर बहुत खुश हो जाते हैं।  वे इस तरह की कहानियाँ और सुनने के लिए आतुर हो जाते हैं।  विश्व के हर देश में हर युग में ऐसी कहानियाँ-  'Aesop's Fables of the West'-पाश्चत्य जगत में बच्चों को नैतिक शिक्षा देने वाली प्रसिद्द " ईसप की दंतकथाएँ " होती हैं। [ ईसप की दंतकथाओं में शामिल कई कहनियां, जैसे लोमड़ी और अंगूर (जिससे “अंगूर खट्टे हैं” मुहावरा निकला)] has some Captivating power in it (14.30 m) मुझे नहीं मालूम आजकल के बच्चे " ईसप की दंतकथाएँ" पढ़ते हैं नहीं। लेकिन  भारत में भी इस तरह की कई बच्चों को नैतिकता की शिक्षा देने वाली- जातक कथायें ,आदि   कई पुस्तकें बहुत प्राचीन काल से पढ़ी जाती हैं। उन सभी का जड़ किन्तु पुराणों में पाया जाता है। आजकल कुछ भी रिसर्च पेपर छाप कर उसको मॉडर्न फिलॉसफी , न्यू फिलॉसफी कहने का- Existentialism - 'अस्तित्ववाद का दर्शन' कहने का  चलन बढ़ गया है। मैं नहीं समझता कितने लोग इसका अर्थ समझते हैं। (15.14 m) ज़ेरॉक्स कॉपी दी जाती है जो न्यू फिलॉसफी का एक हिस्सा बन जाती है। लेकिन प्राचीन दर्शन तो सबसे पहले भारत में ही जन्में थे। वेदों में हम दर्शन पाते हैं - Then the Upanishads are absolute philosophy और हमारे उपनिषदों में हम परम दर्शन देखते हैं। आज तक वैसा दर्शन विश्व के किसी भी देश के पास आज तक तो नहीं है। उस तरह के आध्यात्मिक सिद्धांत किसी देश में नहीं है। कल ही शायद बात हो रही थी - कितना पुराना सिद्धान्त है !     
हमारे पास ये सभी शिक्षाएँ हैं, और ये चीज़ें उन्हीं प्राचीन महान स्रोतों से (वेदों -उपनिषदों से) आती हैं। और हम अपने समय में, हमारे युग में अवतरित श्री रामकृष्ण, पवित्र माता श्री सारदा देवी और स्वामीजी के जीवन में इन महान विचारों की समझ और अनुप्रयोग को बहुत सुंदर तरीके से अभिव्यक्त होते हुए देखते हैं। [17. 22 मिनट] उनके जैसे सन्त , महापुरुष और भी महान विभूतियाँ , खासकर हमारे देश में पहले भी आविर्भूत होती रही हैं। दूसरे देशों में भी कुछ लोग आये थे , But here it was plenty, So many great souls लेकिन हमारे देश में तो बहुत बड़ी संख्या में सन्त -महापुरुष, महान आत्माएं ,पैगम्बर या नेता आते रहे हैं। लेकिन उनकी शिक्षा तथा उनके जीवन में कुछ सूक्ष्म अंतर दिखाई देते हैं। लेकिन यहाँ हमारे पास बिल्कुल प्राचीनतम दर्शन - वेदान्त है!
हमलोग अवतार वरिष्ठ पर बात कर रहे थे - श्री रामकृष्ण हमारे युग के नवीनतम अवतार हैं-latest incarnation हैं ! सभी अवतार बराबर होने चाहिए थे , स्वामीजी ने श्री रामकृष्ण को अवतार वरिष्ठ क्यों कहा ? अवतारों का same rank - समान पद होना चाहिए , C-IN-C ऑफ़ अवतार क्यों कहा ? जब धर्म की हानि होती है , तब धर्म को पुनर्स्थापित करने के लिए अवतार को आना पड़ता है।   


यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:। 
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ 

(चतुर्थ अध्याय, श्लोक 7)

पर श्री रामकृष्ण के लिए कहना पड़ता है - दुनिया के सभी धर्मों में जब ग्लानि आ गयी -तब सभी धर्मों को उठाने के लिए यदा वै सर्व धर्मानं ग्लानि बभूव भारत , तदात्मानं स स्रजस्य स - उस समय उन्होंने अपने को प्रकट किया। वे अवतीर्ण हुए। इसीलिए उनको अवतार वरिष्ठ कहा जाता है कि केवल भारत के धर्म में ही नहीं विश्व के सभी धर्मों में जब ग्लानि आ गयी थी , तब -रामकृष्णो ही केवलः ! तब सभी धर्मों को उठाने के लिए अपने को बनाया।  एक नया धर्म देने के लिए नहीं। To revive, regenerate, every religion of the world not one, किसी एक धर्म को नहीं, दुनिया के हर धर्म को पुनर्जीवित करने, मुरझाये धर्म में जान डालने के लिए रामकृष्ण स्वयं अवतरित हुए। 
जैसे गाँव कोई तालाब होता है - एक घाट से हिन्दू पानी लेता है, ईसाई वॉटर, जल, कोई एकवा  लेता है, लेकिन सब एक तालाब के पानी को अलग अलग नाम से -कोई अल्ला , गॉड , ईश्वर कहता है। यह एकत्व आया है रामकृष्ण जी से। इसीलिए उनको अवतार वरिष्ठ रामकृष्णो ही केवलः- इतिहास पुरानेषु समः कोऽपि न विद्यते! उनके बराबर का उदाहरण कोई इतिहास में नहीं है , पुराणों में नहीं है। 
कुछ साल पहले एक जर्मन लेखक ने एक पुस्तक लिखा था -'रामकृष्ण और ईसा मसीह अथवा  अवतार तत्व का विरोधाभास' ! अद्भुत पुस्तक है।  

A German author wrote a book  some year back- 'Ramakrishna and Christ or the Paradox of Incarnation' , wonderful book ! उन्होंने रामकृष्ण और ईसामसीह के जीवन को इतनी गहराई से देखा था कि हमलोग नहीं देख पाते। पुस्तक की अंतिम पंक्ति में श्री रामकृष्ण के बारे में वे कहते हैं कि - " श्रीरामकृष्ण देव एक 'पेरुमा' थे (लैटिन शब्द) का अर्थ होता है - पूर्ण परिपूर्णता {Entirety- Perfectness or Wholeness}  जिसमें कुछ भी नहीं जोड़ा जा सकता। और जहां वे यीशु मसीह से मिलते हैं - वे प्रेम है!"  -He says about Sri Ramakrishna, in the last line that - " He was a peruma - The absolute fullness to which nothing can be added. and where he meets Jesus Christ - He is Love! " वह एक पेरुमा थे - पूर्ण पूर्णता जिसमें कुछ भी नहीं जोड़ा जा सकता है। 

इसलिए हमलोग बहुत भाग्यवान हैं जो हमलोग इस युग में जन्म लिए , कि यदि हमलोग वेद-उपनिषद आदि शास्त्र या अन्य किसी भी धर्म का धार्मिक ग्रन्थ नहीं भी पढ़ें -इन तीनों के जीवन और शिक्षाओं को देखें तो बड़े सरल शब्दों में सभी धर्मों के शास्त्रों की शिक्षा मिलेगी। कि अगर कोई बच्चा भी समझने की कोशिश करे तो समझ सकता हैं। इसलिए हमलोग बड़े भाग्यवान हैं , हमलोगों को कठोर परिश्रम करना होगा, ताकि हम भी अपने जीवन को इतने परिपूर्णता से गढ़ सकें कि हमारे जीवन की परिपूर्णता में और कुछ जोड़ा नहीं जा सके।  

जो सहस्रों सिर वाले, सहस्रों नेत्रवाले और सहस्रों चरण वाले विराट पुरुष हैं, वे सारे ब्रह्माण्ड को आवृत करके भी दस अंगुल ऊपर ही शेष रहते हैं ।।1।।
पुरुष (सार्वभौमिक सत्ता) के हजारों सिर, हजारों आंखें और हजारों पैर हैं ( हजारों का मतलब असंख्य है जो सार्वभौमिक सत्ता की सर्वव्यापकता की ओर इशारा करता है। इसलिए मैं इस कबूतर की गर्दन नहीं काट सका , क्योंकि हर जगह उस विराट पुरुष की ऑंखें मुझे देख रही थी।[32.33 मिनट]


 लेकिन हम लोग इन बातों को याद नहीं रखते हैं। 
हमलोग सोचते हैं कि हम यहाँ कैम्प में ट्रेनी या ट्रेनर बनकर आ गए हैं - घर के लोग तो देख नहीं रहे कि हम कहाँ जा रहे हैं। किसी कैम्प में ? (?) कुछ लड़के यहाँ आने के बदले बंगाल के पहाड़ी क्षेत्र में चले गए, कुछ मारे गए पर कैसे ? ये अभी तक पता नहीं चला है। कोई नहीं जान सका कि वे कहाँ गए थे ? पर एक आँख है - जो हर जगह हमें देखती है। 
हम उन नजरों से बच नहीं सकते. हम सभी को यह याद रखना चाहिए कि हम पर हमेशा नजर रखी जा रही है ! हमारी हरकतें, हमारी बातें, यहां तक कि हमारे विचार भी कोई हर समय देख रहा है। अतएव हमें सदैव पवित्र रहने का प्रयत्न करना चाहिए! तो सदैव पवित्र रहने का प्रयत्न करना चाहिए! विचारों में, शरीर में, कर्मों में, शब्दों में, अंतर्दृष्टि में, यहाँ तक कि अपनी दृष्टि में भी, हमें सदैव पवित्र रहने का प्रयास करना चाहिए। क्योंकि आत्मा पवित्रतम वस्तु है। 
जब मैंने यह सुनिश्चित कर लिया कि बाहरी दुनिया में मुझे कोई देख नहीं रहा है तब भी मेरी अंतरात्मा और वह परमात्मा मुझे देख रहा था इसलिए मैं इस परीक्षा में पूरी तरह असफल हो गया। 

उपनिषद में एक कहानी है - पहले की शिक्षा व्यवस्था में गुरु गृह वास की शिक्षा पद्धति थी। वे गुरु के घर में उनके साथ रहते थे और गुरु जी के परिवार के लिए थोड़ा काम भी करते थे। और शिक्षक उन्हें बिना कोई शुल्क या फ़ीस लिए ही पढ़ाते थे। तो विद्यार्थियों का एक नया बैच शिक्षक के पास पढ़ने के लिए आया। एक दिन दो युवक इन महात्मा की खोज में इस जंगल में आ पहुंचे जहां एक बड़े ही सुंदर रमणीय स्थल पर महात्मा अपना गुरुकुल बना कर रहा करते थे। वे दोनों ही इन महात्मा को अपना गुरु स्वीकार कर उनसे शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे।
 परिवार के कुछ काम भी कर रहे थे , किन्तु शिक्षक उन्हें कुछ भी पढ़ा नहीं रहे थे। महात्मा कई युवकों को शिक्षा दे चुके थे लेकिन वे किसी भी युवक को शिक्षा देने से पहले उसकी कसौटी किया करते थे। इन दोनों युवकों को महात्मा ने देखा तो वे उन्हें अच्छे घर से लगे और उनकी परीक्षा लेने की महात्मा ने तय किया। कुछ दिनों बाद उन्होंने बड़ी विनम्रता से पूछा आप हमें कब से पढ़ाना शुरू करेंगे ? महात्मा ने दोनों युवकों से कहा कि मैं तुम्हें अपना शिष्य जरूर बना लूंगा लेकिन उसके लिए तुम्हें मेरी एक शर्त पूरी करनी पड़ेगी। युवको ने महात्मा से कहा कि आप जो भी कहेंगे हमें मान्य हैं।
महात्मा ने गुरुकुल के कमरे में रख्खि दो कबूतरो की मूर्तियां लाकर चारों युवकों को 1-1 तेज छुरी थमांते हुए कहा इन कबूतरों की मूर्तियों को तुम जीवित कबूतर ही मानो और तुम्हें यह करना है कि जब तुम्हें कोई देख ना रहा हो तब तुम्हें इन कबूतरों की गर्दन काट देनी है, और शरीर को लेकर वापस आना है! लेकिन एक सावधानी रखनी है कि कबूतरों की गर्दन काटते समय कोई तुम्हें देख नहीं सके। जब तुम ऐसा करने में सफल हो जाओ तो मेरे पास चले आना।
चारो  युवकों ने अपने-अपने कबूतरों को ध्यान से देखा। चारो ही कबूतर बहुत सुंदर से और उन पर बहुत अच्छे से रंग और आकृतियां बनी हुई थी। चारो  के मन में ख्याल आया कि इतनी आसान और सरल परीक्षा से गुरु जी हमें क्या सीखना चाहते होंगे? चारो  ने अपने अपने कबूतर लिए और अलग-अलग दिशा में जंगल में चले गए। एक युवक जंगल में थोड़ी दूर गया जहां एक सुनसान मैदान उसे दिखा उसने चारों तरफ अपनी नजरें घुमा कर देखा और यह निश्चित करने के बाद की उसे कोई भी नहीं देख रहा है उसने अपने साथ लाए कबूतर की गर्दन काट दी। वह वापस गुरु के पास चला गया।
दूसरा युवक भी जंगल में दूसरी तरफ एक सुनसान जगह पर पहुंचा और एक पेड़ के नीचे खड़ा रहकर हर तरफ से नजरें घुमा कर देखने के बाद जब वह  कबूतर की गर्दन काटने ने लगा तब उसकी नजरें अचानक पेड़ के ऊपर बैठे अन्य पक्षियों पर पड़ी। क्यूकी उसे ऐसा करते हुए वे पक्षी देख रहे थे इसलिए उसने कबूतर की गर्दन नहीं काटी ।
युवक थोड़ी देर सोचने के बाद झाड़ियों में छिप गया और वहां पर कबूतर की गर्दन काटने  की कोशिश करने लगा। लेकिन वहां पर भी उसकी नजर झाड़ियों पर बैठी कीट पतंगे और मक्खियों पड़ गई और वहां पर भी वह यह काम पूरा न कर पाया।
फिर कुछ सोचने के बाद युवक ने एक जमीन में बड़ा सा गड्ढा बनाया और उसमें उतर कर कबूतर की गर्दन तोड़ने लगा। कबूतर की मूर्ति को छूते ही उसने देखा कि कबूतर की आंखें उसे देख रही है इसलिए उसने कबूतर की मूर्ति की आंखें ढक दी। 
फिर उसने सोचा कि वह खुद तो अपने आप को ऐसा करते हुए देख ही रहा है इसलिए उसने अपनी आंखों पर भी पट्टी बांधी ली! अब वह निश्चिंत हो गया कि ना ही कोई अन्य प्राणी या कबूतर की मूर्ति या वो खुद भी उसको ऐसा करते हुए देख पा रहा है। वह कबूतर की गर्दन पर हाथ रख कर काटने ने ही वाला था कि उसके अंदर से एक आवाज आई, वह आवाज उसके अंतरात्मा की थी! युवक अब अच्छे से समझ गया था कि गुरु जी इस छोटी सी सरल सी दिख रही परीक्षा से उन्हें क्या शिक्षा देना चाहते थे!
युवक बिना उस कबूतर की गर्दन मरोड़े ही गुरु के पास पहुंचा! गुरु के पास जाकर युवक ने गुरु से माफी मांगते हुए कहा कि गुरु जी मुझे क्षमा कर दीजिए। मैं आपका दिया यह काम पूरा नहीं कर पाया क्योंकि जब भी मैं ऐसा करने की कोशिश करता तो मुझे कोई ना कोई देख रहा होता!


कहानी की शिक्षा 
महात्मा ने उस युवक को शाबाशी देते हुए कहा कि तुम इस कसौटी में असफल नहीं बल्कि पूरी तरह से सफल हुए हो! इस कसौटी से मैं तुम दोनों को यही सिखाना चाहता था कि हम जो भी कार्य करते हैं वह उस परमात्मा से, उस परम शक्ति से कभी छुपा नहीं सकते! इसलिए हमे कोई भी कार्य (अपनी अहं -बुद्धि के पीछे स्थित) उस परमात्मा (आत्मा) को ध्यान में रखकर की करना चाहिए और जब हम ऐसा करते हैं तो हम कभी गलत कार्य नहीं कर पाते। 



स्वामी विवेकानन्द से जुड़ी किसी भी संस्था के नाम को देखकर, महामण्डल के कुछ पुराने और वरिष्ठ सदस्य लोग भी यही समझते हैं कि यह महामण्डल भी मिशन की तरह कोई रिलीफ वर्क चैरिटी करने वाला एक संगठन है।  परन्तु महामण्डल का मुख्य काम -'Be and Make' द्वारा या मनुष्य बनने और बनाने के आन्दोलन द्वारा, स्वयं भारत के राष्ट्रीय आदर्श त्याग और सेवा में तीव्रता लाने के अभिप्राय को समझकर 'वैराग्य और अभ्यास' का मुख्य कार्य को पीछे छोड़कर,यदि समाज सेवा करने जायेंगे , कम्प्यूटर ट्रेनिंग स्कूल या अस्पताल खोलेंगे तो वहां भी वैराग्य का भाव नहीं रहने से लालच आएगा। और सारा कार्य बदनाम हो जायेगा। 
"put the cart before the horse": घोड़े के आगे गाड़ी लगाने का क्या मतलब है? यदि आप कहते हैं कि कोई घोड़े के आगे गाड़ी रख रहा है, तो आपका मतलब है कि वे गलत क्रम में काम कर रहे हैं । उदाहरणार्थ  सरकार ने बड़े सुधार करने से पहले (चरित्रवान मनुष्य का निर्माण करने से पहले) भारी निवेश करके गाड़ी को घोड़े के आगे रख दिया। >कठोपनिषद के अनुसार यदि शरीर रथ और इन्द्रियाँ घोड़े हैं तो 'रथ के आगे घोड़ा लगाना उचित होता है, या घोड़ा के आगे रथ लगाना उचित होता है? "

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति। न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।

भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः। प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति

(केनोपनिषद- २. ५)

भारतीय फिलॉसफी (उपनिषद की) यह नैतिक शिक्षा कितनी पुरानी है! भूतेषु भूतेषु- सब जीवों में, 'विचित्य' उनको (ईश्वर को) देख कर-उनको समझकर; धीराः प्रेत्य अस्मात् लोकात् अमृता भवन्ति॥ After leaving behind this physical world-they become immortal - what a noble idea !  इस भौतिक संसार को पीछे छोड़ने के बाद वे - अमृता भवन्ति' -वे अमर हो जाते हैं - कितना अच्छा विचार है!
 We have all these teachings  , and these things come from that noble sources. हमारे पास ये सभी शिक्षाएँ हैं, और ये चीज़ें उन्हीं प्राचीन महान स्रोतों से (वेदों -उपनिषदों से) आती हैं। और हम अपने समय में, हमारे युग में अवतरित श्री रामकृष्ण, पवित्र माता सारदा देवी और स्वामीजी के जीवन में इन महान विचारों की समझ और अनुप्रयोग को बहुत सुंदर तरीके से देखते हैं।
  
[क 16. 22मिनट] 
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  गुरु मुख से सुनी शिक्षाओं या उपदेशों को अपने जीवन से demonstrate करने वाले महापुरुषों (मार्गदर्शक नेताओं) का भारत में कई बार अवतरण हुआ है। और इनमें से सब से अर्वाचीन हैं - हमारे युग के हैं , आधुनिक काल में जो अवतरित हुए हैं , वे हैं -श्री रामकृष्ण। 
 
 तो ये सब मन को एकाग्र करने से ही होता है। हमलोग मूल्यवान वस्तु (सोना-चाँदी?) की खोज में इधर-उधर बहुत दौड़ते हैं, पर नहीं जानते कि हमारे भीतर ही सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है हमारा मन। हमलोग बाहर में ढूँढ़ते हैं- लेकिन जब हमलोग " आवृत्त चक्षु: अमृतत्वं इच्छन् " आँखों को बाहर से मोड़कर भीतर की ओर घुमाना चाहिए । 
[पराञ्चिखानि व्यतृणत्स्वयंभूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्‌।
कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैषदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्‌ ॥ 
(कठोपनिषद -२.१.१)
अन्वय : स्वयम्भूः खानि पराञ्चि व्यतृणत् तस्मात् पराङ् पश्यति न अन्तरान्मन्। कश्चित् धीरः आवृत्तचक्षुः अमृतत्वम् इच्छन् प्रत्यगात्मानम् ऐक्षत् ॥
'स्वयंभू' ने देह के द्वारों को, समस्त इन्द्रियों को बहिर्मुखी बनाया है, इसीलिए मनुष्य की आत्मा बाहर की ओर- (कामिनी -कांचन की ओर) देखती है, 'अन्तरात्मा' को नहीं। यत्र-तत्र विरला ही कोई ज्ञानी पुरुष (धीर पुरुष) होता है जो अमृतत्व की इच्छा करते हुए अपनी दृष्टि को अन्तर्मुखी करके 'अन्तरात्मा' को देखता है।] 
मन पर विजय पाने के लिए दो चीजें आवश्यक हैं: वैराग्य और अभ्यास ! 
 
>>> साहचर्य का नियम (Law of association):

श्रीमद्भागवत में कहा गया है –   यदि देहधारी जीव प्रेम, द्वेष या भयवश अपने मन को बुद्धि तथा पूर्ण एकाग्रता के साथ किसी विशेष शारीरिक स्वरूप में स्थिर कर दे, तो वह उस स्वरूप को अवश्य प्राप्त करेगा, जिसका वह ध्यान करता है।
यत्र यत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया ।
स्‍नेहाद् द्वेषाद् भयाद् वापि याति तत्तत्स्वरूपताम् ॥ २२ ॥
शब्दार्थ-यत्र यत्र—जहाँ जहाँ; मन:—मन को; देही—बद्धजीव; धारयेत्—स्थिर करता है; सकलम्—पूर्ण एकाग्रता के साथ; धिया— बुद्धि से; स्नेहात्—स्नेहवश; द्वेषात्—द्वेष के कारण; भयात्—भयवश; वा अपि—अथवा; याति—जाता है; तत्-तत्—उस उस; स्वरूपताम्—विशेष अवस्था को।
तात्पर्य- इस श्लोक से यह समझना कठिन नहीं है कि यदि कोई व्यक्ति निरन्तर भगवान् का ध्यान करता है, तो उसे भगवान् जैसा ही आध्यात्मिक शरीर प्राप्त होगा। धिया शब्द विशेष अर्थ में पूर्ण बौद्धिक संकल्प [Auto-suggestion- a miracle that obeys you.] को सूचित करता है। इसी तरह सकलम् शब्द मन की एकाग्रता का सूचक है। चेतना की ऐसी तल्लीनता से मनुष्य को अगले जीवन में वैसा ही स्वरूप प्राप्त होगा, जिसका वह चिन्तन करता रहता है। यह अन्य शिक्षा है, जो कीट-जगत से सीखी जा सकती है, जैसाकि अगले श्लोक में बतलाया गया है।
यदि प्राणी स्नेह द्वेष या भय से भी जान-बूझकर एकाग्रता से अपना मन किसी में लगा दे तो उसे उसी वस्तु का रूप प्राप्त हो जाता हैं । हे राजन् ! जैसे भृंगी एक कीड़े को पकड़ कर दीवाल पर अपने रहने के स्थान पर बन्द कर देती हैं, और वह कीड़ा भय से उसी का चिन्तन करते-करते अपने पहले शरीर को बिना त्यागे ही भृंगी के स्वरूप को प्राप्त हो जाता हैं । इसी तरह मनुष्य को अन्य का चिन्तन छोड़कर परमात्मा का ही चिन्तन करना चाहिये ।  
अपने मन की वृत्ति को परमात्मा के ध्यान में ऐसी लगानी चाहिये कि विषयों के स्फुरित होने पर भी मन की वृत्ति विषयों में न जा सके और कभी भी हरि के स्मरण को न छोड़ सके । जैसे माता अपने बच्चे को प्रतिक्षण याद करती रहती हैं और घर के कार्यों में व्यासक्त होने पर भी उसको नहीं भूलती । 
जैसे योगी प्रतिक्षण संयम के द्वारा अपने वीर्य बिन्दु की रक्षा का ध्यान रखता है । जैसे कुरुपा नारी सुन्दर रूप का स्मरण करती रहती हैं, जैसे रस्सी पर चढ़ी हुई नटणी पतन के भय से उस पर चलती हुई रस्सी का ध्यान नहीं भूलती । जैसे कच्छपी अपने अण्डों को नेत्र से देखती रहती हैं । जैसे चातक पक्षी स्वाति नक्षत्र के जल की बूंद से प्रेम करता हैं ।
जैसे कीड़ा भृंगी का ध्यान करता हुआ, भृंग बन जाता हैं उसी शरीर में रहता हुआ । जैसे मृग बाँसुरी के नाद को सुनता हुआ प्रेम से अपने प्राण त्याग देता हैं । जैसे पतंग अग्नि में पड़कर शरीर जला देता हैं । जैसे मछली जल के बिना मर जाती हैं । इसी प्रकार भगवान् का भक्त भी प्रेम से भगवान् को भजता हैं । ऐसा स्मरण ही सर्वोत्तम स्मरण कहलाता हैं । 
हमारी सभी इन्द्रियाँ बहिर्मुखी हैं, लेकिन इसको कभी कभी भीतर भी लेने की कोशिश करनी चाहिये। हमारे भीतर और भी बहुमूल्य सम्पत है। हमारी दृष्टि किसी वस्तु के भीतर जो है, वो तो है; लेकिन हम जिस दृष्टि से उसको देखते हैं - -उससे उसका भाव, उसका महात्म्य भी बढ़ जाता है।"
जब हम आँखों को मूँदकर अर्थात (बाह्य नेत्रों को मूँदकर और भीतर के नेत्रों को खोलकर) जिस दृष्टि से हम किसी वस्तु को देखते हैं -उससे  उसका महत्व और भी बढ़ जाता है। उसका भाव, उसका महात्म्य भी बढ़ जाता है।" मेरी दृष्टि से ऐसा होता है। इसलिए अब हमलोगों को भीतर देखने का अभ्यास करना है - 'अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोधः ।'  यो० सू० 1 / 12/ 
दो चीज की जरूरत है -Two things are necessary' - पहला है वैराग्य ! यहाँ सूत्र में अभ्यास पहले है , और वैराग्य बाद में है। लेकिन व्यवहार में पहले वैराग्य का भाव रहेगा तब अभ्यास फलदायी होगा। वैराग्य नहीं रहने से कुछ नहीं होगा, अभ्यास बहुत करने से भी कुछ नहीं होगा। बैठा --उठा !  कुछ नहीं हुआ। लेकिन विधिवत 5 -10 मिनट बैठने -उठने से, सही रूप से बैठकर उठने से दृष्टि भी बदल जाएगी- बिलकुल। इसलिए हमें मन के जोर से - संकल्प की दृढ़ता से ये अभ्यास हमें करते जाना चाहिए। कभी इसे बन्द नहीं करना चाहिए। सुबह-शाम नहीं हुआ तो रात को जरूर हम अभ्यास करने बैठेंगे; और किस पर ध्यान रखेंगे 
>>>तो 'रामोकृष्णो' (रामकृष्ण)  का क्या मतलब है ?  {भगवान् (श्रीरामकृष्ण) की आराधना करने के लिये भगवद्-तत्त्व को समझने की जरुरत है।}

जैसे यहाँ कहा जाता था , स्वामी विवेकानन्द को हमारा बंधु कहो ,गुरु कहो, शिक्षक कहो, जो भी हो -Swami Vivekananda is our friend, teacher or  Guru; so if we love him, That comes from my heart, I can't think otherwise.
      ठाकु-माँ-स्वामी जी की भक्ति करना बहुत अच्छी बात है; लेकिन भक्ति करना आसान नहीं है, और प्रेम बिल्कुल सहज है !  Devotion is alright, Very good!  But devotion is also not so easy. -But Love is spontaneous ! यदि मित्र-और गाईड स्वामीजी, माँ और ठाकुर की दया को याद करके हमारे ह्रदय में भी स्वामीजी के प्रति वही प्रेम किसी प्रकार जाग्रत हो जाये , तो हमलोग उनके और नजदीक आ जायेंगे। और जब हमलोग उनके बिल्कुल निकट आकर, बिना कुछ उनसे छुपाये उनका चिंतन करने कलगेंगे तो हमलोगों का यह पूरा शरीर -मन और ह्रदय सब कुछ बदल जायेगा; सब कुछ रूपान्तरित हो जायेगा। यह अब स्थूल शरीर (Physical Body) भी नहीं रह जायेगा। इसके लिए हमलोगों को जो अभ्यास करना होगा, पतंजलि योग सूत्र के अनुसार वह आठ चरणों में करना होगा।
पहला है कंट्रोलिंग - शम-दम बाह्य संयम और भीतर का संयम रहना चाहिए, लालच को कम करते जाना चाहिए। आसन - मेरुदण्ड या रीढ़ की हड्डी सीधी रखकर अर्ध पद्मासन में बैठना चाहिए। पद्मासन का अभ्यास नहीं रहने से शरीर को थोड़ा कष्ट होगा तो मन उधर चला जायेगा। अर्ध पद्मासन में बहुत देर तक बैठा जा सकता है , आधा घंटा -एक घंटा भी बैठ सकते हैं।  शरीर की ओर मन नहीं जायेगा। अर्धपद्मासन में बैठकर फिर चिंतन करना चाहिए। प्रत्याहार -धारणा का अभ्यास करने से -ध्यान होगा। लेकिन किसका चिंतन किसकी धारणा  ? 

क्या चिन्तन, किसका चिंतन करना, किसका ध्यान करना चाहिए ? अभी देखिये - मनःसंयोग के पहले जो रामकृष्ण स्त्रोत्र चल रहा था, उसके बारे में अभी मेरे मन में जो चल रहा था, वो बतलाता हूँ। उसमें रामकृष्ण -रामकृष्ण बार-बार चलता था। रामकृष्ण नाम का  मतलब क्या है?
 राम के बारे में रामायण से जानते हैं। कृष्ण के बारे में महाभारत आदि बहुत से ग्रन्थ है। लेकिन 'रामकृष्ण' का क्या मतलब है ? 
     वही जो राम का है, जो कृष्ण का है। इसमें राम नाम का क्या मतलब है? "जो आकर्षित करे वही राम है।" ---"रमयति इति रामः " means one who delights you. जो तुम्हारे ह्रदय को आनन्द से भर दे, यह राम दशरथ के पुत्र ही नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक शक्ति भी हैं- 'आत्मा-राम' हैं (आत्म-ज्योति दर्शन के समय का ब्रह्मानन्द है, वही राम है !) जो प्रत्येक ह्रदय में निवास करते हैं ! आत्मा का आनन्द एक सार्वभौमिक चुंबक है जो हर चीज़ को आकर्षित करती है।"  कृषि का अर्थ है भू जो भू भी आनन्द देता है।  "One who attracts is Rama." -
>>>तो 'रामोकृष्णो' (रामकृष्ण)  का क्या मतलब है ?  
 Same thing - राम और कृष्ण , Same thing - रमयति इति राम: (रामो) – जो (परम्)-आनन्द देता है, वो है राम। कृष्ण क्या है -"कृषि भू वाचकः शब्दः णस्य तस्य निवृत्ति वाचकः" कृषि का मतलब भू या पृथ्वी, जो भू को भी आनन्द देता है- वो है कृष्ण । सभी मनुष्यों के मन को जो आनन्द देते हैं, सभी जीवों को जो आनन्द देते हैं -राम  - रमयति इति राम: (रामो) वे हैं राम। और कृष्ण भी वही हैं। सब जीवों को जो 'आ ' आनन्द देते हैं - ये हैं राम, ये हैं कृष्ण ! एक व्यक्ति राम वहाँ का (अयोध्या का) राजा था, दूसरे कृष्ण द्वारिका के राजा थे। केवल इतना ही नहीं।  रामायण-महाभारत पुराण आदि कहानियों के माध्यम से ज्ञान को साधारण जनता तक शिक्षा पहुँचाते हैं। केवल ऐसे कोई व्यक्ति थे या नहीं ? इस पर बहस में न पड़कर, लेकिन इसके पीछे, उनके नाम के बीच में जो भाव है, उसको पकड़ना चाहिए ; वह बहुत सुन्दर है। उनको राम या कृष्ण को एक प्रतीक के रूप में - किसी Image को लेने से यदि हमारे भीतर बहुत सुन्दर कोई बड़ा भाव आ जाता है, जो बहुत आनन्द देता है, वह क्या helpful है या नहीं ? यह देखना है। It is very helpful ' - भले ही ये सब कहानियाँ बच्चों के लिए लिखी गयी हों। 
बच्चे कहानियाँ सुनकर बहुत खुश हो जाते हैं। Stories are very good tutors .in earlier ages  वे इस तरह की कहानियाँ और सुनने के लिए आतुर हो जाते हैं। विश्व के हर देश में हर युग में ऐसी कहानियाँ-  'Aesop's Fables of the West'-पाश्चत्य जगत में बच्चों को नैतिक शिक्षा देने वाली प्रसिद्द " ईसप की दंतकथाएँ " होती हैं। [ ईसप की दंतकथाओं में शामिल कई कहनियां, जैसे लोमड़ी और अंगूर (जिससे “अंगूर खट्टे हैं” मुहावरा निकला)] भारत में भी इस तरह की कई बच्चों को नैतिकता की शिक्षा देने वाली पुस्तकें पढ़ी जाती हैं। उन सभी का जड़ किन्तु पुराणों में पाया जाता है। आजकल कुछ भी रिसर्च पेपर छाप कर उसको न्यू फिलॉसफी कहने का चलन बढ़ गया है। लेकिन प्राचीन दर्शन तो सबसे पहले भारत में ही जन्में थे। वेदों और उपनिषदों में हम वास्तविक दर्शन देखते हैं। 
 (and we see in our own time , the understanding and application of these great ideas shown very beautiful in the life of Sri Ramakrishna, Holy Mother Sarada devi and Swamiji.)  भारत ऐसे सन्त -महात्मा लोग बहुत बड़ी संख्या में आते रहते हैं। और भी देशों में आते हैं -लेकिन इक्के-दुक्के लोग ही आते हैं। भारत में और भी कई महान महापुरुष हुए हैं।  पर यदि हम उनके पास शिक्षा लेने जायेंगे -तो हमलोग उनकी शिक्षाओं और उनके जीवन में थोड़ा अन्तर दिखाई देगा। (Difference in their teachings and their life, Here we have the oldest philosophy) पर ठाकुर-माँ -स्वामीजी के जीवन में ही हमको सबसे प्राचीन दर्शन, 'वेदान्त -दर्शन'  दिखाई देखा। वेदान्त का मतलब क्या है? वेद का अर्थ है ज्ञान ! Veda doesn't mean some books . वेद का अर्थ पुस्तक/ग्रन्थ नहीं समझना चाहिए। They came in book form only the other day- पुस्तक के रूप में तो वे हाल में छापे गए। But they were orals, they came as orals from the mouth of teachers to the students . They used to hear , and after hearing they used to memorize themand recited  again , that is how it has came . लेकिन वे वेद-वाक्य, महावाक्य या ज्ञान शिक्षकों के मुख से विद्यार्थियों तक मौखिक भाषा के रूप में हजारों वर्ष पहले आये हैं । विद्यार्थी लोग उसे सुनते थे और सुनने के बाद उन्हें याद कर लेते थे, और गा कर उसका पाठ करते थे। (तैत्तरीय उपनिषद में तो उगल भी दिए थे)
इसीलिए वेदों को (महावाक्यों को) श्रुति कहा जाता है - शिष्यों ने इसे सुना है। सुनने से आया है। सुनकर याद है और फिर उसे अपने मुँह से निकालता है। उपनिषद क्या है ? उसे वेदान्त भी कहा जाता है। वेदों का जो शास्त्र है , उसके अन्त में जो है। वेदों के अन्त में उपनिषद है। और उसकी शिक्षाओं को अपने जीवन से demonstrate करने वाले महापुरुषों (मार्गदर्शक नेताओं) का भारत में कई बार अवतरण हुआ है। और इनमें से सब से अर्वाचीन हैं - हमारे युग के हैं , आधुनिक काल में जो अवतरित हुए हैं , वे हैं -श्री रामकृष्ण। 
मुझे एक ऐसे व्यक्ति को देखने का सौभाग्य मिला है -जिन्होंने श्रीरामकृष्ण को देखा था। मैंने ऐसे कई लोगों को देखा है , जिन्होंने माँ सारदा देवी को देखा था। और मैं कमसे कम एक व्यक्ति से मिला हूँ जिन्होंने स्वामी विवेकानन्द को देखा था। इसलिए वे कोई पौराणिक कहानी के पात्र नहीं थे , उनका जन्म हमारे युग में ही हुआ था। हमारे युग में ही वेदों के सिद्धान्त को, उपनिषदों के दर्शन को अपने जीवन से प्रदर्शित करने में पूर्ण सक्षम ठाकु-माँ -स्वामीजी में और उनके १२ शिष्यों में आविर्भूत हुए थे। 
भगवान धरती पर अवतरित हुए होंगे या नहीं, उस युग में हमलोग नहीं थे। पर इस युग में हमारे टाइम में तो ये तीनो - जिनको हमलोग बेलपत्तर का तीन पत्तों वाला त्रयी कहते हैं। वेदों का एक नाम त्रयी भी है। जैसे श्रुति भी वेदों का नाम है , वैसे वेद तो चार हैं , ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद , अथर्व वेद, फिर त्रयी  नाम क्यों हैं ? गद्य ,पद्य और संगीत की त्रयी है उसमें। इन वेदों में कुछ गलत है, ऐसा अभी तक कोई साबित नहीं कर सके हैं। हमलोग इस युग में जन्में हैं -जब मानवशरीर में आकर ये तीनों का त्रयी -Three human lives retold us the whole philosophical idea. तीन मानव जीवनों ने हमें वेदों के संपूर्ण दार्शनिक विचार को पुनः अपने जीवन में उतार कर बताया। हमें इन सिद्धान्तों का उपयोग अपने जीवन में करना चाहिए। इसीलिए हमलोग सुबह शाम कहते हैं - 
"स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्मस्वरूपिणे ।
 अवतारवरिष्ठाय रामकृष्णाय ते नमः ॥ " 

श्री रामकृष्ण देव को अवतारवरिष्ठ  क्यों कहते हैं ? बहुत से लोग अपने अपने धर्म के अवतार को मानते हैं, कुछ लोग नहीं मानते हैं। ये अवतरवरिष्ठ कैसे हो गए ? ईसा मसीह भी अवतार हैं। पैगम्बर मोहम्मद अवतार हैं। हमलोग मानते हैं, मुसलमान लोग नहीं भी मान सकते हैं। हमें नहीं मालूम है, हमलोग उनको भी अवतार मानते हैं।  इस देश में कितने अवतार हैं। रामचन्द्र हैं। उनसे भी पहले हुए हैं -दशावतार की बात हमलोग जानते हैं। कितने अवतार हैं , बुद्ध एक अवतार हैं। दस अवतार हैं -आते आते हमारे जमाने में श्री रामकृष्णदेव आये थे। तो स्वामी विवेकानन्द उनको प्राणम -मंत्र में बोलते हैं - अवतारवरिष्ठाय रामकृष्णाय ते नमः ! अवतार वरिष्ठ क्यों बोलते हैं ? क्या इसलिए कि वे हमारे गुरु हैं , हमारे भाषा बोलने वाले राज्य से हैं क्या इसलिए ? नहीं ! अवतार लोग क्या किये हैं? वे लोग धर्म प्रचार करते हुए, या किसी नए धर्म की शिक्षा देते हुए , अपने समय में धर्म को स्थापित किये हैं।  समय के प्रवाह में हर चीज में क्षरण होता है। जब धर्म में इतनी ग्लानि हो जाती है कि लोग अपने आध्यात्मिक लाभ के लिए उसका अनुसरण भी नहीं कर सकें , तब कोई शक्ति देह धारण कर अवतरित होती है। एक महामानव धरती पर आविर्भूत होता है , और धर्म को पुनः ऊपर उठाता है। अध्यात्म और धर्म कभी पुराना नहीं होता है, यह सबसे प्राचीन चीज है। सर्वोच्च आत्मा को ब्रह्म कहा जाता है-The highest spirit is called Brahman ! लेकिन यह विचार भी समय के प्रवाह क्षीण हो जाता है। तब कोई अवतार आते हैं क्योंकि - मनुष्य अपने आध्यात्मिक स्वरूप को भूलकर पशु हो जाते हैं। पर मनुष्य साधारण चौपाया जीव नहीं हैं। [25.24मिनट गूढ़ बात ]  मानव जीवन का एक उच्च उद्देश्य है - पशुओं जैसे रहने नहीं आया है। आम तौर पर जानवर चार पैरों से चलते हैं। पर मनुष्य अपने दो पैरों पर सीधा खड़ा हो सकता है, गर्दन उठाकर आसमान को देख सकता है। कोई भी पशु आकाश, तारे और स्वर्ग की तरफ नहीं देख सकता। मानव -शरीर ताजमहल है , ऊंचा उद्देश्य है। देवता भी ईश्वर लाभ नहीं कर सकते पर मनुष्य कर सकता है। कल फ़ारसी कवि रूमी की शायरी पर बात हो रही थी - मैं घास बन था, बढ़ता हुआ मनुष्य बन गया , अब देवता जाऊँगा ! देवता बन जाना ही अन्तिम पड़ाव नहीं है। उससे भी आगे जा सकते हो। हमें देव-शरीर को भी पार कर अनन्त में पहुँचना है। हमलोग कहानी सुनते हैं रामकृष्ण ने ध्यान में देखा था -स्वामीजी को वहाँ से लाये थे जहाँ 7 निवृत्तिमार्ग के ऋषि बैठे थे। हमलोग भी अनन्त तक उठ सकते हैं। ऊपर उठने की कोई सीमा नहीं है। वैसे ही इस मनुष्य अवस्था से गिरने की भी कोई सीमा नहीं हैं -पताल की गहराइयों में भी जा सकते हैं।]
    
                         

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$$$$पुराना लिखा हुआ ### 

जैसी बात होती थी, सबसे महत्वपूर्ण हमारे पास जो चीज है, वो है मन ! सृष्टि कहाँ से शुरू हुई ? ईश्वर, कहते हो, भगवान कहते हो ब्रह्म कहते हो, जो भी धारणा हमारी हो सकती है -सृष्टि वहीं से शुरू हुई। और उनके मन से,  सृष्टि करने की इच्छा से, 'इच्छा' मन में ही आती है। उसी प्रकार हमलोगों के मन से ही सब कुछ बनता है। इसीलिए कहा गया है - 
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।

 बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम् ॥

(ब्रह्मबिन्दु/अमृतबिन्दु उपनिषद्- श्लोक 2)

मन ही सभी मनुष्यों के बन्धन एवं मोक्ष का कारण है। इन्द्रिय विषयों में आसक्त मन- अर्थात तीनों ऐषणाओं में आसक्त मन बन्धन का और इन्द्रिय विषयों से विरक्त मन मुक्ति (मोक्ष) का कारण कहा गया है।" अतः जो मन निरन्तर ठाकुर, माँ, स्वामीजी के चिंतन मेँ लगा रहता है, वही परम मुक्ति का कारण है। 
इसीलिए देह (शरीर) की भी जरूरत है, पर इससे बहुत महत्वपूर्ण है हमारा मन। अगर मन को पकड़ा नहीं गया, वशीभूत नहीं किया गया, तो शरीर चाहे कितना भी बलवान हो उससे कोई लाभ नहीं होगा। 
 तो ये सब मन को एकाग्र करने से ही होता है। हमलोग मूल्यवान वस्तु (सोना-चाँदी?) की खोज में इधर-उधर बहुत दौड़ते हैं, पर नहीं जानते कि हमारे भीतर ही सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है हमारा मन। हमलोग बाहर में ढूँढ़ते हैं- लेकिन जब हमलोग " आवृत्त चक्षु: अमृतत्वं इच्छन् " आँखों को बाहर से मोड़कर भीतर की ओर घुमाना चाहिए । 
[पराञ्चिखानि व्यतृणत्स्वयंभूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्‌।
कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैषदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्‌ ॥ 
(कठोपनिषद -२.१.१)
अन्वय : स्वयम्भूः खानि पराञ्चि व्यतृणत् तस्मात् पराङ् पश्यति न अन्तरान्मन्। कश्चित् धीरः आवृत्तचक्षुः अमृतत्वम् इच्छन् प्रत्यगात्मानम् ऐक्षत् ॥
'स्वयंभू' ने देह के द्वारों को, समस्त इन्द्रियों को बहिर्मुखी बनाया है, इसीलिए मनुष्य की आत्मा बाहर की ओर देखती है, 'अन्तरात्मा' को नहीं। यत्र-तत्र विरला ही कोई ज्ञानी पुरुष (धीर पुरुष) होता है जो अमृतत्व की इच्छा करते हुए अपनी दृष्टि को अन्तर्मुखी करके 'अन्तरात्मा' को देखता है।] 

 >>>Two things are necessary : Mind and Its Control: How to practice? मन और उसका नियंत्रण > अभ्यास कैसे करें? वैराग्य और अभ्यास दो चीजों की जरूरत है ! 'अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोधः ।' (यो० सू० 1.12) बाहरी आँखें बंद करके >'वैराग्य' और भीतरी आँखें खोलकर >'अभ्यास' कैसे करें?? 

 Mind and Its Control: How to practice? (Two things are necessary -By closing the outer eyes>'वैराग्य' (Renunciation) and opening the inner eyes > अभ्यास (Practice-Be and Make) कैसे करें??

 विवेकदर्शन या मनःसंयोग का अभ्यास करने के लिए,  मन पर विजय पाने के लिए - या पुनर्मृत्यु पर विजय पाने के लिए दो चीजें आवश्यक हैं: भारत के राष्ट्रीय आदर्श हैं- 'त्याग और अभ्यास ' आप इन दो धाराओं में तीव्रता उत्पन्न कीजिये - शेष सब कुछ अपने आप ठीक हो जायेगा। ( अर्थात वैराग्य के भाव के साथ सेवा >मनःसंयोग का प्रशिक्षण ..... देते जाइये)
 
>>> साहचर्य का नियम (Law of association):

श्रीमद्भागवत में कहा गया है –   यदि देहधारी जीव प्रेम, द्वेष या भयवश अपने मन को बुद्धि तथा पूर्ण एकाग्रता के साथ किसी विशेष शारीरिक स्वरूप में स्थिर कर दे, तो वह उस स्वरूप को अवश्य प्राप्त करेगा, जिसका वह ध्यान करता है।
यत्र यत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया ।
स्‍नेहाद् द्वेषाद् भयाद् वापि याति तत्तत्स्वरूपताम् ॥ २२ ॥
शब्दार्थ-यत्र यत्र—जहाँ जहाँ; मन:—मन को; देही—बद्धजीव; धारयेत्—स्थिर करता है; सकलम्—पूर्ण एकाग्रता के साथ; धिया— बुद्धि से; स्नेहात्—स्नेहवश; द्वेषात्—द्वेष के कारण; भयात्—भयवश; वा अपि—अथवा; याति—जाता है; तत्-तत्—उस उस; स्वरूपताम्—विशेष अवस्था को।
तात्पर्य- इस श्लोक से यह समझना कठिन नहीं है कि यदि कोई व्यक्ति निरन्तर भगवान् का ध्यान करता है, तो उसे भगवान् जैसा ही आध्यात्मिक शरीर प्राप्त होगा। धिया शब्द विशेष अर्थ में पूर्ण बौद्धिक संकल्प [Auto-suggestion- a miracle that obeys you.] को सूचित करता है। इसी तरह सकलम् शब्द मन की एकाग्रता का सूचक है। चेतना की ऐसी तल्लीनता से मनुष्य को अगले जीवन में वैसा ही स्वरूप प्राप्त होगा, जिसका वह चिन्तन करता रहता है। यह अन्य शिक्षा है, जो कीट-जगत से सीखी जा सकती है, जैसाकि अगले श्लोक में बतलाया गया है।
यदि प्राणी स्नेह द्वेष या भय से भी जान-बूझकर एकाग्रता से अपना मन किसी में लगा दे तो उसे उसी वस्तु का रूप प्राप्त हो जाता हैं । हे राजन् ! जैसे भृंगी एक कीड़े को पकड़ कर दीवाल पर अपने रहने के स्थान पर बन्द कर देती हैं, और वह कीड़ा भय से उसी का चिन्तन करते-करते अपने पहले शरीर को बिना त्यागे ही भृंगी के स्वरूप को प्राप्त हो जाता हैं । इसी तरह मनुष्य को अन्य का चिन्तन छोड़कर परमात्मा का ही चिन्तन करना चाहिये ।  
अपने मन की वृत्ति को परमात्मा के ध्यान में ऐसी लगानी चाहिये कि विषयों के स्फुरित होने पर भी मन की वृत्ति विषयों में न जा सके और कभी भी हरि के स्मरण को न छोड़ सके । जैसे माता अपने बच्चे को प्रतिक्षण याद करती रहती हैं और घर के कार्यों में व्यासक्त होने पर भी उसको नहीं भूलती । 
जैसे योगी प्रतिक्षण संयम के द्वारा अपने वीर्य बिन्दु की रक्षा का ध्यान रखता है । जैसे कुरुपा नारी सुन्दर रूप का स्मरण करती रहती हैं, जैसे रस्सी पर चढ़ी हुई नटणी पतन के भय से उस पर चलती हुई रस्सी का ध्यान नहीं भूलती । जैसे कच्छपी अपने अण्डों को नेत्र से देखती रहती हैं । जैसे चातक पक्षी स्वाति नक्षत्र के जल की बूंद से प्रेम करता हैं ।
जैसे कीड़ा भृंगी का ध्यान करता हुआ, भृंग बन जाता हैं उसी शरीर में रहता हुआ । जैसे मृग बाँसुरी के नाद को सुनता हुआ प्रेम से अपने प्राण त्याग देता हैं । जैसे पतंग अग्नि में पड़कर शरीर जला देता हैं । जैसे मछली जल के बिना मर जाती हैं । इसी प्रकार भगवान् का भक्त भी प्रेम से भगवान् को भजता हैं । ऐसा स्मरण ही सर्वोत्तम स्मरण कहलाता हैं । 
हमारी सभी इन्द्रियाँ बहिर्मुखी हैं, लेकिन इसको कभी कभी भीतर भी लेने की कोशिश करनी चाहिये। हमारे भीतर और भी बहुमूल्य सम्पत है। हमारी दृष्टि किसी वस्तु के भीतर जो है, वो तो है; लेकिन हम जिस दृष्टि से उसको देखते हैं - -उससे उसका भाव, उसका महात्म्य भी बढ़ जाता है।"
जब हम आँखों को मूँदकर अर्थात (बाह्य नेत्रों को मूँदकर और भीतर के नेत्रों को खोलकर) जिस दृष्टि से हम किसी वस्तु को देखते हैं -उससे  उसका महत्व और भी बढ़ जाता है। उसका भाव, उसका महात्म्य भी बढ़ जाता है।" मेरी दृष्टि से ऐसा होता है। इसलिए अब हमलोगों को भीतर देखने का अभ्यास करना है - 'अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोधः ।'  यो० सू० 1 / 12/ 
दो चीज की जरूरत है -Two things are necessary' - पहला है वैराग्य ! यहाँ सूत्र में अभ्यास पहले है , और वैराग्य बाद में है। लेकिन व्यवहार में पहले वैराग्य का भाव रहेगा तब अभ्यास फलदायी होगा। वैराग्य नहीं रहने से कुछ नहीं होगा, अभ्यास बहुत करने से भी कुछ नहीं होगा। बैठा --उठा !  कुछ नहीं हुआ। लेकिन विधिवत 5 -10 मिनट बैठने -उठने से, सही रूप से बैठकर उठने से दृष्टि भी बदल जाएगी- बिलकुल। इसलिए हमें मन के जोर से - संकल्प की दृढ़ता से ये अभ्यास हमें करते जाना चाहिए। कभी इसे बन्द नहीं करना चाहिए। सुबह-शाम नहीं हुआ तो रात को जरूर हम अभ्यास करने बैठेंगे; और किस पर ध्यान रखेंगे ? 
>>>तो 'रामोकृष्णो' (रामकृष्ण)  का क्या मतलब है ?  {भगवान् (श्रीरामकृष्ण) की आराधना करने के लिये भगवद्-तत्त्व को समझने की जरुरत है।}

जैसे यहाँ कहा जाता था , स्वामी विवेकानन्द को हमारा बंधु कहो ,गुरु कहो, शिक्षक कहो, जो भी हो -Swami Vivekananda is our friend, teacher or  Guru; so if we love him, That comes from my heart, I can't think otherwise.
      ठाकु-माँ-स्वामी जी की भक्ति करना बहुत अच्छी बात है; लेकिन भक्ति करना आसान नहीं है, और प्रेम बिल्कुल सहज है !  Devotion is alright, Very good!  But devotion is also not so easy. -But Love is spontaneous ! यदि मित्र-और गाईड स्वामीजी, माँ और ठाकुर की दया को याद करके हमारे ह्रदय में भी स्वामीजी के प्रति वही प्रेम किसी प्रकार जाग्रत हो जाये , तो हमलोग उनके और नजदीक आ जायेंगे। और जब हमलोग उनके बिल्कुल निकट आकर, बिना कुछ छुपाये उनका चिंतन करने कलगेंगे तो हमलोगों का यह पूरा शरीर -मन और ह्रदय सब कुछ बदल जायेगा; सब कुछ रूपान्तरित हो जायेगा। यह अब स्थूल शरीर (Physical Body) भी नहीं रह जायेगा। इसके लिए हमलोगों को जो अभ्यास करना होगा, पतंजलि योग सूत्र के अनुसार वह आठ चरणों में करना होगा।
पहला है कंट्रोलिंग - शम-दम बाह्य संयम और भीतर का संयम रहना चाहिए, लालच को कम करते जाना चाहिए। आसन - मेरुदण्ड या रीढ़ की हड्डी सीधी रखकर अर्ध पद्मासन में बैठना चाहिए। पद्मासन का अभ्यास नहीं रहने से शरीर को थोड़ा कष्ट होगा तो मन उधर चला जायेगा। अर्ध पद्मासन में बहुत देर तक बैठा जा सकता है , आधा घंटा -एक घंटा भी बैठ सकते हैं।  शरीर की ओर मन नहीं जायेगा। अर्धपद्मासन में बैठकर फिर चिंतन करना चाहिए। प्रत्याहार -धारणा का अभ्यास करने से -ध्यान होगा। लेकिन किसका चिंतन किसकी धारणा  ? 

क्या चिन्तन, किसका चिंतन करना, किसका ध्यान करना चाहिए ? अभी देखिये - मनःसंयोग के पहले जो रामकृष्ण स्त्रोत्र चल रहा था, उसके बारे में अभी मेरे मन में जो चल रहा था, वो बतलाता हूँ। उसमें रामकृष्ण -रामकृष्ण बार-बार चलता था। रामकृष्ण नाम का  मतलब क्या है?
 राम के बारे में रामायण से जानते हैं। कृष्ण के बारे में महाभारत आदि बहुत से ग्रन्थ है। लेकिन 'रामकृष्ण' का क्या मतलब है ? 
     वही जो राम का है, जो कृष्ण का है। इसमें राम नाम का क्या मतलब है? "जो आकर्षित करे वही राम है।" ---"रमयति इति रामः " means one who delights you. जो तुम्हारे ह्रदय को आनन्द से भर दे, यह राम दशरथ के पुत्र ही नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक शक्ति भी हैं- 'आत्मा-राम' हैं (आत्म-ज्योति दर्शन के समय का ब्रह्मानन्द है, वही राम है !) जो प्रत्येक ह्रदय में निवास करते हैं ! आत्मा का आनन्द एक सार्वभौमिक चुंबक है जो हर चीज़ को आकर्षित करती है।"  कृषि का अर्थ है भू जो भू भी आनन्द देता है।  "One who attracts is Rama." -
>>>तो 'रामोकृष्णो' (रामकृष्ण)  का क्या मतलब है ?  
 Same thing - राम और कृष्ण , Same thing - रमयति इति राम: (रामो) – जो (परम्)-आनन्द देता है, वो है राम। कृष्ण क्या है -"कृषि भू वाचकः शब्दः णस्य तस्य निवृत्ति वाचकः" कृषि का मतलब भू या पृथ्वी, जो भू को भी आनन्द देता है- वो है कृष्ण । सभी मनुष्यों के मन को जो आनन्द देते हैं, सभी जीवों को जो आनन्द देते हैं -राम  - रमयति इति राम: (रामो) वे हैं राम। और कृष्ण भी वही हैं। सब जीवों को जो 'आ ' आनन्द देते हैं - ये हैं राम, ये हैं कृष्ण ! एक व्यक्ति राम वहाँ का (अयोध्या का) राजा था, दूसरे कृष्ण द्वारिका के राजा थे। केवल इतना ही नहीं।  रामायण-महाभारत पुराण आदि कहानियों के माध्यम से ज्ञान को साधारण जनता तक शिक्षा पहुँचाते हैं। केवल ऐसे कोई व्यक्ति थे या नहीं ? इस पर बहस में न पड़कर, लेकिन इसके पीछे, उनके नाम के बीच में जो भाव है, उसको पकड़ना चाहिए ; वह बहुत सुन्दर है। उनको राम या कृष्ण को एक प्रतीक के रूप में - किसी Image को लेने से यदि हमारे भीतर बहुत सुन्दर कोई बड़ा भाव आ जाता है, जो बहुत आनन्द देता है, वह क्या helpful है या नहीं ? यह देखना है। It is very helpful ' - भले ही ये सब कहानियाँ बच्चों के लिए लिखी गयी हों। 
बच्चे कहानियाँ सुनकर बहुत खुश हो जाते हैं। Stories are very good tutors .in earlier ages  वे इस तरह की कहानियाँ और सुनने के लिए आतुर हो जाते हैं। विश्व के हर देश में हर युग में ऐसी कहानियाँ-  'Aesop's Fables of the West'-पाश्चत्य जगत में बच्चों को नैतिक शिक्षा देने वाली प्रसिद्द " ईसप की दंतकथाएँ " होती हैं। [ ईसप की दंतकथाओं में शामिल कई कहनियां, जैसे लोमड़ी और अंगूर (जिससे “अंगूर खट्टे हैं” मुहावरा निकला)] भारत में भी इस तरह की कई बच्चों को नैतिकता की शिक्षा देने वाली पुस्तकें पढ़ी जाती हैं। उन सभी का जड़ किन्तु पुराणों में पाया जाता है। आजकल कुछ भी रिसर्च पेपर छाप कर उसको न्यू फिलॉसफी कहने का चलन बढ़ गया है। लेकिन प्राचीन दर्शन तो सबसे पहले भारत में ही जन्में थे। वेदों और उपनिषदों में हम वास्तविक दर्शन देखते हैं। 
 (and we see in our own time , the understanding and application of these great ideas shown very beautiful in the life of Sri Ramakrishna, Holy Mother Sarada devi and Swamiji.)  भारत ऐसे सन्त -महात्मा लोग बहुत बड़ी संख्या में आते रहते हैं। और भी देशों में आते हैं -लेकिन इक्के-दुक्के लोग ही आते हैं। भारत में और भी कई महान महापुरुष हुए हैं।  पर यदि हम उनके पास शिक्षा लेने जायेंगे -तो हमलोग उनकी शिक्षाओं और उनके जीवन में थोड़ा अन्तर दिखाई देगा। (Difference in their teachings and their life, Here we have the oldest philosophy) पर ठाकुर-माँ -स्वामीजी के जीवन में ही हमको सबसे प्राचीन दर्शन, 'वेदान्त -दर्शन'  दिखाई देखा। वेदान्त का मतलब क्या है? वेद का अर्थ है ज्ञान ! Veda doesn't mean some books . वेद का अर्थ पुस्तक/ग्रन्थ नहीं समझना चाहिए। They came in book form only the other day- पुस्तक के रूप में तो वे हाल में छापे गए। But they were orals, they came as orals from the mouth of teachers to the students . They used to hear , and after hearing they used to memorize themand recited  again , that is how it has came . लेकिन वे वेद-वाक्य, महावाक्य या ज्ञान शिक्षकों के मुख से विद्यार्थियों तक मौखिक भाषा के रूप में हजारों वर्ष पहले आये हैं । विद्यार्थी लोग उसे सुनते थे और सुनने के बाद उन्हें याद कर लेते थे, और गा कर उसका पाठ करते थे। (तैत्तरीय उपनिषद में तो उगल भी दिए थे)
इसीलिए वेदों को (महावाक्यों को) श्रुति कहा जाता है - शिष्यों ने इसे सुना है। सुनने से आया है। सुनकर याद है और फिर उसे अपने मुँह से निकालता है। उपनिषद क्या है ? उसे वेदान्त भी कहा जाता है। वेदों का जो शास्त्र है , उसके अन्त में जो है। वेदों के अन्त में उपनिषद है। और उसकी शिक्षाओं को अपने जीवन से demonstrate करने वाले महापुरुषों (मार्गदर्शक नेताओं) का भारत में कई बार अवतरण हुआ है। और इनमें से सब से अर्वाचीन हैं - हमारे युग के हैं , आधुनिक काल में जो अवतरित हुए हैं , वे हैं -श्री रामकृष्ण। 
मुझे एक ऐसे व्यक्ति को देखने का सौभाग्य मिला है -जिन्होंने श्रीरामकृष्ण को देखा था। मैंने ऐसे कई लोगों को देखा है , जिन्होंने माँ सारदा देवी को देखा था। और मैं कमसे कम एक व्यक्ति से मिला हूँ जिन्होंने स्वामी विवेकानन्द को देखा था। इसलिए वे कोई पौराणिक कहानी के पात्र नहीं थे , उनका जन्म हमारे युग में ही हुआ था। हमारे युग में ही वेदों के सिद्धान्त को, उपनिषदों के दर्शन को अपने जीवन से प्रदर्शित करने में पूर्ण सक्षम ठाकु-माँ -स्वामीजी में और उनके १२ शिष्यों में आविर्भूत हुए थे। 
भगवान धरती पर अवतरित हुए होंगे या नहीं, उस युग में हमलोग नहीं थे। पर इस युग में हमारे टाइम में तो ये तीनो - जिनको हमलोग बेलपत्तर का तीन पत्तों वाला त्रयी कहते हैं। वेदों का एक नाम त्रयी भी है। जैसे श्रुति भी वेदों का नाम है , वैसे वेद तो चार हैं , ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद , अथर्व वेद, फिर त्रयी  नाम क्यों हैं ? गद्य ,पद्य और संगीत की त्रयी है उसमें। इन वेदों में कुछ गलत है, ऐसा अभी तक कोई साबित नहीं कर सके हैं। हमलोग इस युग में जन्में हैं -जब मानवशरीर में आकर ये तीनों का त्रयी -Three human lives retold us the whole philosophical idea. तीन मानव जीवनों ने हमें वेदों के संपूर्ण दार्शनिक विचार को पुनः अपने जीवन में उतार कर बताया। हमें इन सिद्धान्तों का उपयोग अपने जीवन में करना चाहिए। इसीलिए हमलोग सुबह शाम कहते हैं - 
"स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्मस्वरूपिणे ।
 अवतारवरिष्ठाय रामकृष्णाय ते नमः ॥ " 

श्री रामकृष्ण देव को अवतारवरिष्ठ  क्यों कहते हैं ? बहुत से लोग अपने अपने धर्म के अवतार को मानते हैं, कुछ लोग नहीं मानते हैं। ये अवतरवरिष्ठ कैसे हो गए ? ईसा मसीह भी अवतार हैं। पैगम्बर मोहम्मद अवतार हैं। हमलोग मानते हैं, मुसलमान लोग नहीं भी मान सकते हैं। हमें नहीं मालूम है, हमलोग उनको भी अवतार मानते हैं।  इस देश में कितने अवतार हैं। रामचन्द्र हैं। उनसे भी पहले हुए हैं -दशावतार की बात हमलोग जानते हैं। कितने अवतार हैं , बुद्ध एक अवतार हैं। दस अवतार हैं -आते आते हमारे जमाने में श्री रामकृष्णदेव आये थे। तो स्वामी विवेकानन्द उनको प्राणम -मंत्र में बोलते हैं - अवतारवरिष्ठाय रामकृष्णाय ते नमः ! अवतार वरिष्ठ क्यों बोलते हैं ? क्या इसलिए कि वे हमारे गुरु हैं , हमारे भाषा बोलने वाले राज्य से हैं क्या इसलिए ? नहीं ! अवतार लोग क्या किये हैं? वे लोग धर्म प्रचार करते हुए, या किसी नए धर्म की शिक्षा देते हुए , अपने समय में धर्म को स्थापित किये हैं।  समय के प्रवाह में हर चीज में क्षरण होता है। जब धर्म में इतनी ग्लानि हो जाती है कि लोग अपने आध्यात्मिक लाभ के लिए उसका अनुसरण भी नहीं कर सकें , तब कोई शक्ति देह धारण कर अवतरित होती है। एक महामानव धरती पर आविर्भूत होता है , और धर्म को पुनः ऊपर उठाता है। अध्यात्म और धर्म कभी पुराना नहीं होता है, यह सबसे प्राचीन चीज है। सर्वोच्च आत्मा को ब्रह्म कहा जाता है-The highest spirit is called Brahman ! लेकिन यह विचार भी समय के प्रवाह क्षीण हो जाता है। तब कोई अवतार आते हैं क्योंकि - मनुष्य अपने आध्यात्मिक स्वरूप को भूलकर पशु हो जाते हैं। पर मनुष्य साधारण चौपाया जीव नहीं हैं। [25.24मिनट गूढ़ बात ]  मानव जीवन का एक उच्च उद्देश्य है - पशुओं जैसे रहने नहीं आया है। आम तौर पर जानवर चार पैरों से चलते हैं। पर मनुष्य अपने दो पैरों पर सीधा खड़ा हो सकता है, गर्दन उठाकर आसमान को देख सकता है। कोई भी पशु आकाश, तारे और स्वर्ग की तरफ नहीं देख सकता। मानव -शरीर ताजमहल है , ऊंचा उद्देश्य है। देवता भी ईश्वर लाभ नहीं कर सकते पर मनुष्य कर सकता है। कल फ़ारसी कवि रूमी की शायरी पर बात हो रही थी - मैं घास बन था, बढ़ता हुआ मनुष्य बन गया , अब देवता जाऊँगा ! देवता बन जाना ही अन्तिम पड़ाव नहीं है। उससे भी आगे जा सकते हो। हमें देव-शरीर को भी पार कर अनन्त में पहुँचना है। हमलोग कहानी सुनते हैं रामकृष्ण ने ध्यान में देखा था -स्वामीजी को वहाँ से लाये थे जहाँ 7 निवृत्तिमार्ग के ऋषि बैठे थे। हमलोग भी अनन्त तक उठ सकते हैं। ऊपर उठने की कोई सीमा नहीं है। वैसे ही इस मनुष्य अवस्था से गिरने की भी कोई सीमा नहीं हैं -पताल की गहराइयों में भी जा सकते हैं।]
 
उपनिषद में एक छोटी सी कहानी है - 'गुरु बृहस्पति और एकान्त में कबूतर काटने की परीक्षा' बृहस्पति को कहा जाता है देव गुरु ! वे अपने जंगल के आश्रम में सभी देवता लोगों को भी शिक्षा देते थे। उनकी ख्याति दूर-दूर तक कई राज्यों में फैली हुई थी। देवता लोग उनके ज्ञान और समझदारी की वजह से उन से प्रभावित होकर बहुत दूर-दूर से उन्हें खोजते हुए इस जंगल में आ जाया करते थे।
tv के सामने बैठने का अभ्यास तो नहीं है। लेकिन अख़बार में कभी -कभी यूनिवर्सिटी या एडुकेशनल इंस्टीटूशन को लेकर फुल-वन पेज एडवर्टिजमेंट देखने को मिलता है। विदेशी यूनिवर्सिटी भारत में आती हैं, भारत की यूनिवर्सिटी विदेश में जाती है। यह कोई डिमाण्ड नहीं है, बल्कि उस शिक्षा को प्रचार के बल पर थोपा जाता है। हार्वर्ड और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी भी भारत में अपना ब्रांच खोलना चाहते हैं। [इंग्लैण्ड का ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, US के हार्वर्ड से काफी पुराना है क्योंकि इसकी स्थापना लगभग 900 साल पहले 1096 में हुई थी।] वहाँ के कुछ स्टूडेन्ट्स हमलोगों के यहाँ आये थे, सबसे हँसमुख मंत्री है - रेलवे मिनिस्टर द्वारा आविष्कृत कुछ नया क्रन्तिकारी मैनेजमेन्ट (जमीन के बदले नौकरी) सीखने आये थे। मंत्रीजी उनसे हिन्दी में बात किये। वहाँ के लड़के भी बहुत खुश हुए।उपनिषद में एक कहानी है - पहले की शिक्षा व्यवस्था में गुरु गृह वास की पद्धति थी। वे गुरु के घर में उनके साथ रहते थे और उनके परिवार के लिए काम भी करते थे। और शिक्षक उन्हें बिना फ़ीस लिए ही पढ़ाते थे। तो एक नया बैच उनके पास पढ़ने आया
 
1 दिन दो युवक इन महात्मा की खोज में इस जंगल में आ पहुंचे जहां एक बड़े ही सुंदर रमणीय स्थल पर महात्मा अपना गुरुकुल बना कर रहा करते थे। वे दोनों ही इन महात्मा को अपना गुरु स्वीकार कर उनसे शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे।
महात्मा कई युवकों को शिक्षा दे चुके थे लेकिन वे किसी भी युवक को शिक्षा देने से पहले उसकी कसौटी किया करते थे। इन दोनों युवकों को महात्मा ने देखा तो वे उन्हें अच्छे घर से लगे और उनकी परीक्षा लेने की महात्मा ने तय किया।
आप हमलोगों को पढ़ाना कब शुरू करेंगे 
महात्मा ने दोनों युवकों से कहा कि मैं तुम्हें अपना शिष्य जरूर बना लूंगा लेकिन उसके लिए तुम्हें मेरी एक शर्त पूरी करनी पड़ेगी। युवको ने महात्मा से कहा कि आप जो भी कहेंगे हमें मान्य हैं।

महात्मा ने गुरुकुल के कमरे में रख्खि दो कबूतरो की मूर्तियां लाकर चारों युवकों को 1-1 तेज छुरी थमांते हुए कहा इन कबूतरों की मूर्तियों को तुम जीवित कबूतर ही मानो और तुम्हें यह करना है कि जब तुम्हें कोई देख ना रहा हो तब तुम्हें इन कबूतरों की गर्दन काट देनी है! जब तुम ऐसा करने में सफल हो जाओ तो मेरे पास चले आना।

चारो  युवकों ने अपने-अपने कबूतरों को ध्यान से देखा। चारो ही कबूतर बहुत सुंदर से और उन पर बहुत अच्छे से रंग और आकृतियां बनी हुई थी। चारो  के मन में ख्याल आया कि इतनी आसान और सरल परीक्षा से गुरु जी हमें क्या सीखना चाहते होंगे? चारो  ने अपने अपने कबूतर लिए और अलग-अलग दिशा में जंगल में चले गए।
एक युवक जंगल में थोड़ी दूर गया जहां एक सुनसान मैदान उसे दिखा उसने चारों तरफ अपनी नजरें घुमा कर देखा और यह निश्चित करने के बाद की उसे कोई भी नहीं देख रहा है उसने अपने साथ लाए कबूतर की गर्दन काट दी। वह वापस गुरु के पास चला गया।
दूसरा युवक भी जंगल में दूसरी तरफ एक सुनसान जगह पर पहुंचा और एक पेड़ के नीचे खड़ा रहकर हर तरफ से नजरें घुमा कर देखने के बाद जब वह  कबूतर की गर्दन काटने ने लगा तब उसकी नजरें अचानक पेड़ के ऊपर बैठे अन्य पक्षियों पर पड़ी। क्यूकी उसे ऐसा करते हुए वे पक्षी देख रहे थे इसलिए उसने कबूतर की गर्दन नहीं काटी ।
युवक थोड़ी देर सोचने के बाद झाड़ियों में छिप गया और वहां पर कबूतर की गर्दन काटने  की कोशिश करने लगा। लेकिन वहां पर भी उसकी नजर झाड़ियों पर बैठी कीट पतंगे और मक्खियों पड़ गई और वहां पर भी वह यह काम पूरा न कर पाया।

फिर कुछ सोचने के बाद युवक ने एक जमीन में बड़ा सा गड्ढा बनाया और उसमें उतर कर कबूतर की गर्दन तोड़ने लगा। कबूतर की मूर्ति को छूते ही उसने देखा कि कबूतर की आंखें उसे देख रही है इसलिए उसने कबूतर की मूर्ति की आंखें ढक दी। 
फिर उसने सोचा कि वह खुद तो अपने आप को ऐसा करते हुए देख ही रहा है इसलिए उसने अपनी आंखों पर भी पट्टी बांधी ली! अब वह निश्चिंत हो गया कि ना ही कोई अन्य प्राणी या कबूतर की मूर्ति या वो खुद भी उसको ऐसा करते हुए देख पा रहा है। वह कबूतर की गर्दन पर हाथ रख कर काटने ने ही वाला था कि उसके अंदर से एक आवाज आई, वह आवाज उसके अंतरात्मा की थी! युवक अब अच्छे से समझ गया था कि गुरु जी इस छोटी सी सरल सी दिख रही परीक्षा से उन्हें क्या शिक्षा देना चाहते थे!
युवक बिना उस कबूतर की गर्दन मरोड़े ही गुरु के पास पहुंचा! गुरु के पास जाकर युवक ने गुरु से माफी मांगते हुए कहा कि गुरु जी मुझे क्षमा कर दीजिए। मैं आपका दिया यह काम पूरा नहीं कर पाया क्योंकि जब भी मैं ऐसा करने की कोशिश करता तो मुझे कोई ना कोई देख रहा होता!

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात ।

स भूमिं विश्वतो वृत्तत्यतिष्ठदशाङुलम् ॥1॥

 पुरुष(सार्वभौमिक सत्ता) के हजारों सिर, हजारों आंखें और हजारों पैर हैं ( हजारों का मतलब असंख्य है जो सार्वभौमिक सत्ता की सर्वव्यापकता की ओर इशारा करता है। 
[32.33 मिनट
हमलोग सोचते हैं कि हम यहाँ कैम्प में ट्रेनी या ट्रेनर बनकर आ गए हैं - घर के लोग तो देख नहीं रहे कि हम कहाँ जा रहे हैं। किसी कैम्प में ? (?) कुछ लड़के यहाँ आने के बदले बंगाल के पहाड़ी क्षेत्र में चले गए, कुछ मारे गए पर कैसे ? ये अभी तक पता नहीं चला है। कोई नहीं जान सका कि वे कहाँ गए थे ? पर एक आँख है - जो हर जगह हमें देखती है। 
We can't escape those eyes. We all must remember that we are always being watched! our movements , our talks , even our thoughts ! So always you should try to remain pure! So always you should try to remain pure! in thought, in body, in deeds , in words, insight even, in our looks also, we must always try to remain pure . 
हम उन नजरों से बच नहीं सकते. हम सभी को यह याद रखना चाहिए कि हम पर हमेशा नजर रखी जा रही है ! हमारी हरकतें, हमारी बातें, यहां तक कि हमारे विचार भी कोई हर समय देख रहा है। अतएव हमें सदैव पवित्र रहने का प्रयत्न करना चाहिए! तो सदैव पवित्र रहने का प्रयत्न करना चाहिए! विचारों में, शरीर में, कर्मों में, शब्दों में, अंतर्दृष्टि में, यहाँ तक कि अपनी दृष्टि में भी, हमें सदैव पवित्र रहने का प्रयास करना चाहिए। क्योंकि आत्मा पवित्रतम वस्तु है। 
जब मैंने यह सुनिश्चित कर लिया कि बाहरी दुनिया में मुझे कोई देख नहीं रहा है तब भी मेरी अंतरात्मा और वह परमात्मा मुझे देख रहा था इसलिए मैं इस परीक्षा में पूरी तरह असफल हो गया।
कहानी की शिक्षा 
महात्मा ने उस युवक को शाबाशी देते हुए कहा कि तुम इस कसौटी में असफल नहीं बल्कि पूरी तरह से सफल हुए हो! इस कसौटी से मैं तुम दोनों को यही सिखाना चाहता था कि हम जो भी कार्य करते हैं वह उस परमात्मा से, उस परम शक्ति से कभी छुपा नहीं सकते! इसलिए हमे कोई भी कार्य (अपनी अहं -बुद्धि के पीछे स्थित) उस परमात्मा (आत्मा) को ध्यान में रखकर की करना चाहिए और जब हम ऐसा करते हैं तो हम कभी गलत कार्य नहीं कर पाते। 
हमलोग अवतार वरिष्ठ पर बात कर रहे थे - श्री रामकृष्ण हमारे युग के नवीनतम अवतार हैं-latest incarnation हैं ! सभी अवतार बराबर होने चाहिए थे , स्वामीजी ने श्री रामकृष्ण को अवतार वरिष्ठ क्यों कहा ? अवतारों का same rank - समान पद होना चाहिए , C-IN-C ऑफ़ अवतार क्यों कहा ? जब धर्म की हानि होती है , तब धर्म को पुनर्स्थापित करने के लिए अवतार को आना पड़ता है।   
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:। 
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ 

(चतुर्थ अध्याय, श्लोक 7)

पर श्री रामकृष्ण के लिए कहना पड़ता है - दुनिया के सभी धर्मों में जब ग्लानि आ गयी -तब सभी धर्मों को उठाने के लिए यदा वै सर्व धर्मानं ग्लानि बभूव भारत , तदात्मानं स स्रजस्य स - उस समय उन्होंने अपने को प्रकट किया। वे अवतीर्ण हुए। इसीलिए उनको अवतार वरिष्ठ कहा जाता है कि केवल भारत के धर्म में ही नहीं विश्व के सभी धर्मों में जब ग्लानि आ गयी थी , तब -रामकृष्णो ही केवलः ! तब सभी धर्मों को उठाने के लिए अपने को बनाया।  एक नया धर्म देने के लिए नहीं। To revive, regenerate, every religion of the world not one, किसी एक धर्म को नहीं, दुनिया के हर धर्म को पुनर्जीवित करने, मुरझाये धर्म में जान डालने के लिए रामकृष्ण स्वयं अवतरित हुए। 
जैसे गाँव कोई तालाब होता है - एक घाट से हिन्दू पानी लेता है, ईसाई वॉटर, जल, कोई एकवा  लेता है, लेकिन सब एक तालाब के पानी को अलग अलग नाम से -कोई अल्ला , गॉड , ईश्वर कहता है। यह एकत्व आया है रामकृष्ण जी से। इसीलिए उनको अवतार वरिष्ठ रामकृष्णो ही केवलः- इतिहास पुरानेषु समः कोऽपि न विद्यते! उनके बराबर का उदाहरण कोई इतिहास में नहीं है , पुराणों में नहीं है। 
कुछ साल पहले एक जर्मन लेखक ने एक पुस्तक लिखा था -'रामकृष्ण और ईसा मसीह अथवा  अवतार तत्व का विरोधाभास' ! अद्भुत पुस्तक है।  A German author wrote a book  some year back- 'Ramakrishna and Christ or the Paradox of Incarnation' , wonderful book ! उन्होंने रामकृष्ण और ईसामसीह के जीवन को इतनी गहराई से देखा था कि हमलोग नहीं देख पाते। पुस्तक की अंतिम पंक्ति में श्री रामकृष्ण के बारे में वे कहते हैं कि - " श्रीरामकृष्ण देव एक 'पेरुमा' थे (लैटिन शब्द) का अर्थ होता है - पूर्ण परिपूर्णता {Entirety- Perfectness or Wholeness}  जिसमें कुछ भी नहीं जोड़ा जा सकता। और जहां वे यीशु मसीह से मिलते हैं - वे प्रेम है!"  -He says about Sri Ramakrishna, in the last line that - " He was a peruma - The absolute fullness to which nothing can be added. and where he meets Jesus Christ - He is Love! " वह एक पेरुमा थे - पूर्ण पूर्णता जिसमें कुछ भी नहीं जोड़ा जा सकता है। 
इसलिए हमलोग बहुत भाग्यवान हैं जो हमलोग इस युग में जन्म लिए , कि यदि हमलोग वेद-उपनिषद आदि शास्त्र या अन्य किसी भी धर्म का धार्मिक ग्रन्थ नहीं भी पढ़ें -इन तीनों के जीवन और शिक्षाओं को देखें तो बड़े सरल शब्दों में सभी धर्मों के शास्त्रों की शिक्षा मिलेगी। कि अगर कोई बच्चा भी समझने की कोशिश करे तो समझ सकता हैं। इसलिए हमलोग बड़े भाग्यवान हैं , हमलोगों को कठोर परिश्रम करना होगा, ताकि हम भी अपने जीवन को इतने परिपूर्णता से गढ़ सकें कि हमारे जीवन की परिपूर्णता में और कुछ जोड़ा नहीं जा सके।  

स्वामी विवेकानन्द से जुड़ी किसी भी संस्था के नाम को देखकर, महामण्डल के कुछ पुराने और वरिष्ठ सदस्य लोग भी यही समझते हैं कि यह महामण्डल भी मिशन की तरह कोई रिलीफ वर्क चैरिटी करने वाला एक संगठन है।  परन्तु महामण्डल का मुख्य काम -'Be and Make' द्वारा या मनुष्य बनने और बनाने के आन्दोलन द्वारा, स्वयं भारत के राष्ट्रीय आदर्श त्याग और सेवा में तीव्रता लाने के अभिप्राय को समझकर 'वैराग्य और अभ्यास' का मुख्य कार्य को पीछे छोड़कर,यदि समाज सेवा करने जायेंगे , कम्प्यूटर ट्रेनिंग स्कूल या अस्पताल खोलेंगे तो वहां भी वैराग्य का भाव नहीं रहने से लालच आएगा। और सारा कार्य बदनाम हो जायेगा। 
"put the cart before the horse": घोड़े के आगे गाड़ी लगाने का क्या मतलब है? यदि आप कहते हैं कि कोई घोड़े के आगे गाड़ी रख रहा है, तो आपका मतलब है कि वे गलत क्रम में काम कर रहे हैं । उदाहरणार्थ  सरकार ने बड़े सुधार करने से पहले (चरित्रवान मनुष्य का निर्माण करने से पहले) भारी निवेश करके गाड़ी को घोड़े के आगे रख दिया। >कठोपनिषद के अनुसार यदि शरीर रथ और इन्द्रियाँ घोड़े हैं तो 'रथ के आगे घोड़ा लगाना उचित होता है, या घोड़ा के आगे रथ लगाना उचित होता है? "

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति। न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।

भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः। प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति

(केनोपनिषद- २. ५)

भारतीय फिलॉसफी (उपनिषद की) यह नैतिक शिक्षा कितनी पुरानी है! भूतेषु भूतेषु- सब जीवों में, 'विचित्य' उनको (ईश्वर को) देख कर-उनको समझकर; धीराः प्रेत्य अस्मात् लोकात् अमृता भवन्ति॥ After leaving behind this physical world-they become immortal - what a noble idea !  इस भौतिक संसार को पीछे छोड़ने के बाद वे - अमृता भवन्ति' -वे अमर हो जाते हैं - कितना अच्छा विचार है!
 We have all these teachings  , and these things come from that noble sources. हमारे पास ये सभी शिक्षाएँ हैं, और ये चीज़ें उन्हीं प्राचीन महान स्रोतों से (वेदों -उपनिषदों से) आती हैं। और हम अपने समय में, हमारे युग में अवतरित श्री रामकृष्ण, पवित्र माता सारदा देवी और स्वामीजी के जीवन में इन महान विचारों की समझ और अनुप्रयोग को बहुत सुंदर तरीके से देखते हैं।
  
[क 16. 22मिनट] 
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अध्याय 4.2 - $$$$$उपनिषदों की शिक्षा योजना/ https://www.wisdomlib.org/hinduism/essay/social-message-of-the-upanishads/d/doc1196173.html
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