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मंगलवार, 4 नवंबर 2025

⚜️️⚜️️द्वैत -विशिष्टाद्वैत से होते हुए अद्वैत में पहुँच जाना ही श्री रामकृष्ण का मुख्य सन्देश है ⚜️️"अद्वैत ही रामकृष्ण मिशन और रामकृष्ण मठ की मूल विचारधारा है !" ⚜️️(स्वामी शुद्धिदानन्द जी महाराज, अध्य्क्ष, अद्वैत आश्रम , मायावती !) (Sri Ramakrishna's teaching, Swami Shuddhidananda)/https://www.youtube.com/watch?v=gSc8mbKK6ik/

⚜️️अद्वैत ही श्री रामकृष्ण का मुख्य सन्देश है ⚜️️

(-स्वामी शुद्धिदानन्द जी महाराज, अध्य्क्ष, अद्वैत आश्रम , मायावती !)  


श्री रामकृष्ण का मुख्य सन्देश, स्वामी शुद्धिदानंद

 (Sri Ramakrishna's teaching, Swami Shuddhidananda)

स्वामी विवेकानन्द ने कहा था - "अद्वैतवाद का प्रचार साधारण लोगों में कभी होने नहीं दिया गया। संन्यासी लोग ही अरण्य (जंगलों) में उसकी साधना करते थे , इसी कारण वेदान्त का एक नाम 'आरण्यक' ("Forest Philosophy") भी हो गया। अन्त में भगवान की कृपा से बुद्धदेव ने आकर जब सर्वसाधारण के बीच इसका प्रचार किया , तब सारा देश बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गया। फिर बहुत समय बाद नास्तिकों (atheists-ईश्वर को न मानने वाले) और अज्ञेयवादियों (agnostics) ने जब सारे देश को ध्वंश करने की चेष्टा की, तब उस भौतिकवाद से भारत की रक्षा करने में पुनः एक बार अद्वैतवाद ही एकमात्र उपाय सिद्ध हुआ। इस प्रकार अद्वैत ने  दो बार भौतिवाद से भारत की रक्षाकी है।"  - स्वामी विवेकानन्द  ('ब्रह्म एवं जगत' : वि ० सा० /खंड-२./पृष्ठ- ९३)
[" This Advaita was never allowed to come to the people. At first some monks got hold of it and took it to the forests, and so it came to be called the "Forest Philosophy". By the mercy of the Lord, the Buddha came and preached it to the masses, and the whole nation became Buddhists. Long after that, when atheists and agnostics had destroyed the nation again, it was found out that Advaita was the only way to save India from materialism. Thus has Advaita twice saved India from materialism ! " -Swami Vivekananda : (The Absolute and Manifestation/ Volume-2/Jnana-Yoga/page -138/] 

       हमलोग देखते हैं कि जीवन को जीने का तरीका , जीवन के प्रति हमारी जो दृष्टिकोण है वह दो प्रकार की हो सकती है। और ये जो दो प्रकार का दृष्टिकोण है, यह हमें स्वामी विवेकानन्द और राबर्ट इंगरसोल, इन दोनों के संवाद में देखने को मिलता है। एक घटना है , उसको पहले मैं आपके सामने रखता हूँ। स्वामी विवेकानन्द हम जानते हैं की 1893 में अमेरिका चले गए थे, और वहाँ पर जो विश्व-महाधर्म सभा जो हुई थी, शिकागो वक्तृता जो वहाँ पर उनका हुआ था। जिसको हमलोग युग-आरम्भिक वक्तृता मानते हैं ! (2:33
       उस वक्तृता के बाद कई बार स्वामी विवेकानन्द का रॉबर्ट इंगरसोल के साथ मुलाकात हुआ। अब देखिये विवेकानन्द और रॉबर्ट इंगरसोल दोनों को अगर हम वैचारिक दृष्टि से देखें , या दर्शनशास्त्र के दृष्टिकोण से देखें, तो ये दोनों व्यक्ति बिल्कुल विपरीत छोरों पर खड़े हुए हम पाते हैं। क्योंकि रॉबर्ट इंगरसोल अमेरिका के तथाकथित वक्ताओं में से सबसे प्रसिद्द वक्ताओं में से एक वक्ता थे और वे अज्ञेयवादी थे। और इस दर्शन शास्त्र के अनुसार उनका मूल विचार ये है कि- यह जो इन्द्रियों से दिखने वाला जो जगत है, इसके अतीत कोई 'सत्ता' है या नहीं, कोई परम सत्य वस्तु है या नहीं ? इसको कोई भी नहीं जान सकता। हम नहीं जान सकते की वो सत्य क्या है? यही इस अज्ञेय वाद का मूल सोच (सिद्धात) है। वे इस इन्द्रियों से दिखने वाले जगत को ही परम् सत्य वस्तु मान करके चलते हैं। (3:52)   
      और इसके ठीक विपरीत हम स्वामी विवेकानन्द के विचारों को पाते हैं, जो हमारे हिन्दू वैदिक सनातन धर्म के मूर्त स्वरूप हैं, थे। और हमारे हिन्दू सनातन वैदिक धर्म का मूल विचार यह है कि यह जो इन्द्रियों से दिखने वाला जगत है, इसके अतीत और इसका आधारभूत एक चेतन सत्ता है, जो कि इस जगत में ओत-प्रोत व्याप्त है। और वही इस जगत को सत्ता प्रदान करती है। उस चेतन सत्ता या चैतन्य को हम भगवान भी कहते हैं , ईश्वर, परमेश्वर , परब्रह्म, आत्मा इन सारे शब्दों से हम उसको सम्बोधित करते हैं। और जो हम सभी का, प्रत्येक मनुष्य का और प्रत्येक जीव का भी स्वरुप है(4:47)   
     तो स्वामी विवेकानद इस सनातन हिन्दू वैदिक विचारधारा के मूर्तमान स्वरुप थे। और रॉबर्ट इंगरसोल इस सनातन दर्शन के बिल्कुल बिपरीत इस इन्द्रिय जगत को ही सर्वस्व मानने वाले, एक दार्शनिक थे। तो इन दोनों में अक्सर ऐसे विचारों का, आदान-प्रदान हुआ करता था। शिकागो वक्तृता के बाद कई बार यह दो व्यक्ति एक दूसरे से मिले। और उनका वार्तालाप होता था। तो एक प्रसंग में हम देखते हैं रॉबर्ट इंगरसोल और स्वामी विवेकानन्द आपस में चर्चा कर रहे थे तो वहाँ रॉबर्ट इंगरसोल अपने वक्तव्य को रखते हैं, और कहते हैं कि - " मैं इस संसार का अत्यधिक उपभोग करना चाहता हूँ। कैसे उपभोग करूँगा ? जिस प्रकार से हम एक सन्तरे को निचोड़ करके , उसका पूरा रस निकालते हैं। बिल्कुल उसी प्रकार यह जो विश्व है, यह जो जगत है, यह जो संसार हम देख रहे हैं, उसका पूरी तरह से उपभोग करके उसके पूरे रस को मुझे निचोड़ लेना है। क्यों ? क्योंकि इन्द्रियों से दिखने वाला ये जो जगत है, यही सर्वस्व है। इसके अतीत कुछ है या नहीं, यह कोई भी नहीं जानता। तो इन्द्रियों से दिखने वाला ये जो जगत है , इसका अत्यधिक उपभोग करना - यही मेरे जीवन का परम लक्ष्य है। (6:31)  
 
    तो इसके उत्तर में सर्वप्रथम स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, कि " मैं इस जगत का उपभोग करने का या इस जगत को निचोड़ने का, निचोड़ कर के इसमें से रस निकालने का और एक दूसरी प्रक्रिया जानता हूँ। और उस प्रक्रिया के द्वारा मैं इस जगत में से और भी अधिक रस मैं निचोड़ सकता हूँ। और वह प्रक्रिया है, प्रथमतः स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " मैं जानता हूँ !" शब्द बहुत ही महत्व पूर्ण है -स्वामी विवेकानन्द कहते हैं कि-" मैं जानता हूँ " यह ज्ञान का विषय है ! विवेकानन्द कहते हैं कि " मैं जानता हूँ, कि मैं अमर हूँ !" कि मेरी मृत्यु नहीं है। और जब मैं जानता हूँ कि मेरी मृत्यु नहीं है, मृत्यु मझे ग्रास नहीं कर सकती। तो मुझमें कोई हड़बड़ी नहीं है, कोई जल्द-बाजी नहीं है। मैं आराम से मैं इस संसार का उपभोग कर सकता हूँ। बिल्कुल निश्चिन्त होकर के संसार का उपभोग कर सकता हूँ। (7:45)  
     दूसरी बात- 'मेरे अन्दर भय नहीं है, मैं भयमुक्त हूँ !' जब मृत्यु ही नहीं है, तो भय किसका?
सारा संसार तो मृत्युग्रस्त है, इसीलिए भयग्रस्त भी है। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, कि मेरी मृत्यु नहीं है, इसलिए मेरे अंदर मृत्यु का भय भी नहीं है। और मृत्यु का भय न होने के कारण मैं आराम से इस संसार का उपभोग कर सकता हूँ। मैं निश्चिन्त होकर के (8:19)  
    तीसरी बात स्वामी जी कहते हैं - कि मेरे सर के ऊपर पत्नी, सन्तान, सम्पत्ति इन सब चीजों का बोझ भी मेरे ऊपर नहीं है। मेरे ऊपर कर्तव्य का कोई भार नहीं है। और जब मेरे ऊपर इस प्रकार स्त्री, संतान और सम्पत्ति इन सब चीजों का जब मेरे ऊपर भार नहीं है। तो मैं सभी मनुष्यो को, प्रत्येक जीव को , प्रत्येक प्राणी को समभाव से 'प्रेम' कर सकता हूँ ! उनके अंदर भगवान , ईश्वर को, ('आत्मा' को) देखकर के मैं सबके प्रति समभाव से प्रेम का भाव रख सकता हूँ।" जरा सोच कर देखिये प्रत्येक जीव के अंदर प्रभु परमेश्वर को देखकर, उनसे समभाव से प्रेम करने में सक्षम हो पाना कितना आनंद-दायक हो सकता है ? जरा सोच करके देखिये। तो स्वामी जी कहते हैं ," तुम इस प्रकार से संसार को निचोड़ कर देखो, तुम जिस प्रकार से संसार को निचोड़ना चाहते हो उससे भी एक हजार गुना ज्यादा रस इस प्रकार संसार को निचोड़ने से तुम निकाल पाओगे। "  (9:34  
     तो इस संवाद में हम देखते हैं, दो प्रकार की बिल्कुल परस्पर विरोधी विचार धारायें हैं। रॉबर्ट इंगरसोल की जो विचारधारा है, जो कि संसार के सर्व साधारण मनुष्यों की विचारधारा भी बिल्कुल वही होती है।  कि यह जो इन्द्रियों से दिखने वाला जगत है , बस यही सर्वस्व है। इतना ही सब कुछ है। तो हमें क्या करना है ?  यहाँ पर अपनी इन्द्रियों के द्वारा या इन्द्रियों से दिखने वाली जो भी इष्ट वस्तुयें हैं, विषय हैं उसका सेवन करना, उसका उपभोग करके आनंद प्राप्त करने का प्रयास करते रहना। संसार के सर्वसाधारण मनुष्य की यही विचार धारा होती है। (10:25)  
     लेकिन इसमें एक त्रुटि है। इस प्रकार जब हम इस संसार में अपनी इन्द्रियों के द्वारा, अपने-आप को विषय-भोगों में डुबो देते हैं, तो उसकी अंतिम गति क्या होती है ? उसकी अंतिम गति यही होती है कि, 'जरा -व्याधि -मृत्यु -दुःख- हताशा -अपूर्णता  और अतृप्ति का भाव !' और ऐसा होना अनिवार्य है। जो कोई भी व्यक्ति इस संसार रूपी सागर में अपने शरीर, मन और इन्द्रियों को डुबो देगा , तो वो सीधा मृत्यु के मुख में ही प्रवेश कर रहा है। कठोपनिषद का एक बहुत सुन्दर मंत्र है - 
"पराचः कामान अनुयन्ति बालाः ते मृत्योः यान्ति वित तस्य पाशम्।" 

(कठोपनिषद २/ २/https://shlokam.org/texts/katha-2-1-2)

जो अज्ञ पुरुष हैं (जिनका विवेक ढँका हुआ है) वे बाहर के विषयों के पीछे दौड़ते रहते हैं, और जब तक वे विषय-भोगों के पीछे दौड़ते रहते हैं, तो सीधे मृत्यु के मुख में प्रवेश करते हैं। ये  सच्चाई है। तो इस प्रकार हम देखते हैं कि जो रॉबर्ट इंगरसोल की जो विचारधारा है, उसकी अंतिम परिणति, उसकी जो अंतिम गति है - उसका जो गंतव्य स्थान है, सिर्फ दुःख, हताशा, अपूर्णता, और अतृप्ति ही हो सकती है। (12:00
  और इसके ठीक विपरीत, स्वामी विवेकानन्द ने इंगरसोल से जिस प्रक्रिया का उल्लेख किया, वह है हमारी आध्यात्म की प्रक्रिया। उस प्रक्रिया के अनुसार स्वामी जी कहते हैं, कि 'पहले जानो' ! ये 'ज्ञान' का विषय है। क्या जानना है ? यह जानना है कि हम मृत्यु के परे हैं! हम सब। हम सभी मनुष्य मृत्यु के परे हैं। हमारा जो स्वरुप है, वह कभी नहीं मरता। मृत्यु सिर्फ शरीर की होती है, हमारी जो आत्मा है, जो हमारा स्वरुप है-वह शरीर-इन्द्रिय और मन से परे है। इस जड़ देह और मन के भीतर और पीछे उसकी जो आधारभूत सत्ता है, वह चेतन सत्ता है, वह कभी नहीं मरती।  इस बात को पहले जानना है, ज्ञान के द्वारा, अनुभूति के द्वारा- इसको पहचानना है। जब हम यह जान जायेंगे कि 'हम अमर हैं'! तब, पहले 'वह जानकर के', उस ज्ञान (आत्म -ज्ञान) को प्राप्त करके -  फिर हम इस संसार के साथ सम्बन्ध बना सकते हैं। (12 :56
     और फिर, निर्लिप्त होकर के, मुक्त होकर के, बंधन-मुक्त होकर के कहने के लिए हम कह सकते हैं कि इस संसार का हम ठीक-ठीक आस्वादन ले सकते हैं। तो इस प्रकार पहले अपने स्वरुप को पहले पहचान करके, निर्लिप्त होकर के, मुक्त होकर के, बंधन-मुक्त होकर के,  इस संसार का परिपूर्ण आनन्द लेना है। तो यह स्वामी विवेकानन्द की बताई हुई प्रक्रिया (शिक्षा) है,  कि पहले निष्काम कर्म, योग, भक्ति और ज्ञान के द्वारा हमारे हृदय में बैठे हुए भगवान को जानना है। (आत्मा या ठाकुरदेव -जन्माद्यस्य यतः को जानना है।) पहले अपने आत्मस्वरूप को जान करके, फिर संसार के साथ निर्लिप्त होकर व्यवहार करना है। (13:57

    इसी बात को श्रीरामकृष्ण, भगवान श्रीरामकृष्ण एक सुंदर कहानी के माध्यम से हमारे सामने रखते हैं। बहुत ही सुन्दर ये कहानी है , जिसको हमलोग वचनामृत में पढ़ते हैं। वहाँ पर श्रीरामकृष्ण कहते हैं, इसी विषय को हमारे सामने रखते हुए श्री रामकृष्ण कहते हैं, कि एक व्यक्ति था जो कि एक बार वह अपने गाँव से शहर की ओर चल पड़ा। उसको शहर में कुछ काम था। और शहर काफी दूर था तो अपने ग्राम से अपने गाँव से, अपना सामान लेकर के वो शहर की ओर चल पड़ा। क्योंकि उस शहर में उसको कई दिनों तक रुकने की बात थी, इसलिए उसके पास काफी सामान था , जिसे उसने सर के ऊपर उठा रखा था। तो बोझा लेकर के वो शहर की ओर चल पड़ा। काफी दिनों के सफर के बाद वो शहर पहूँचा। शहर पहुँच कर के, शहर का जो  चकाचौंध , झकमक करने वाला जो दृश्य था, उस दृश्य को देखकर के वो मोहित होने लगा। (15:06)  

    लेकिन, उसके अंदर एक विचार आया ; कि पहले मैं अपना डेरा का व्यवस्था कर लूँ। पहले मैं अपना निवास स्थान खोज लूँ। पहले एक कमरे की व्यवस्था कर लूँ , जहाँ पर अपने सामान को मैं रख पाऊँ। और अपने आप को भी थोड़ा हाथ-पैर-मुँह धोकर के थोड़ा सा तजा होकर के फिर मैं इस शहर को देखने के लिए बाहर जाऊँगा। तो पहले ऐसे एक निवास स्थान को खोज लूँ। तो इस विचार से (उचित-अनुचित) यह व्यक्ति पहले यहाँ-वहाँ  खोज करके, काफी प्रयास करके उसको एक डेरा मिल जाता है। एक निवास स्थान मिल जाता है; उस निवास स्थान में वह अपना सामान रख देता है। और तरोताजा होकर के , फिर दुबारा उस निवास स्थान से बाहर निकलता है, इस शहर के अच्छी- अच्छी चीजों को देखने के लिए। बिल्कुल मुक्त होकर के, उसके हाथ में जो सामान था , वो सब कुछ वह अपने निवास स्थान में रख चुका था। और अब बिल्कुल मुक्त होकर के, निश्चिन्त होकर के , निर्लिप्त होकर के उस शहर में वो घूमने लगा-  शहर के अच्छे-अच्छे दृश्यों को देखने के लिए(16:27)   

    तो इस प्रकार से जब वो शहर में घूम रहा था तब उसी समय उसका एक मित्र वहां पर मिला। वह मित्र भी अपने गाँव से वहाँ पर पहुँचा था, जिसके हाथ में काफी सामान था। और वह भी उसी दिन वहाँ पर आया था। लेकिन वो मित्र शहर के इन दृश्यों को देख रहा था ; सर के ऊपर सामान को ढोते हुए। काफी कष्ट में, काफी मुसीबत में वह एक निवास स्थान को पाये बगैर , इस सामान को अपने सर पर लिए हुए। उस शहर के विभिन्न दृश्यों को देखने में लगा हुआ था। तो उस वक्त ये जो पहला व्यक्ति है, वह इस मित्र से कहता है- 'अरे भाई ! पहले अपने डेरा का व्यक्स्था कर लो। पहले अपने निवास स्थान को खोज लो। सामान को वहाँ रख दो। और फिर ताजा होकर के इस शहर को देखने के लिए बाहर निकलो। ये सामान का जो बोझ अपने सर पर लेकर के जो तुम यहाँ वहाँ घूम रहे हो , कैसे तुम इस शहर का उपभोग कर पाओगे? तो पहले अपने निवास स्थान को खोज लो।' तो ये कहानी है। (17:45)    

     तो इस कहानी का मर्म क्या है ? इस कहानी के माध्यम से श्रीरामकृष्ण हम सभी को यह सन्देश देते हैं कि - देखिये, यह जो संसार है यह बिल्कुल उसी शहर के समान है। और यह जो शहर है। यह जो संसार है , यह जो विश्व है, यह हमारा स्थाई निवास स्थान नहीं हैहम यहाँ सिर्फ एक पर्यटक के समान हैं। थोड़ी देर के लिए हम यहाँ पर आये हैं। सिर्फ भ्रमण करने के लिए , यह हमारा स्थाई निवास स्थान नहीं है। हमारा जो स्थाई निवास स्थान है - वो बिल्कुल हमारे ह्रदय में हैजहाँ पर प्रभु परमेश्वर, भगवान, ईश्वर, आत्मा बसते हैं। (18:33)  

      तो श्रीरामकृष्ण कहते हैं , इस शहर में आये हो , तो पहले अपने हृदय में जो प्रभु का निवास स्थान है पहले, वहाँ पर डेरा जमा लो। वहाँ पर पहले प्रभु के चरण को स्पर्श कर लो। पहले अपने निवास स्थान को खोज लो। अपने हृदय के भीतर जो निवास स्थान है पहले उसको खोज लो।उसको खोजने के पश्चात् ; ईश्वर के चरण को स्पर्श करने के पश्चात्; फिर इस संसार रूपी शहर को देखने के लिए, या इससे व्यवहार करने के लिए तुम लग सकते हो। ईश्वर के चरणों को स्पर्श किये बगैर, अपने हृदय में, अपने उस स्थाई निवास स्थान को खोजे बगैर, अगर हम इस संसार के साथ व्यवहार शुरू कर देते हैं; इसके साथ अगर हम उलझना शुरू कर देते हैं , तो हम यहाँ पर खो जायेंगे। गुम हो जायेंगे। यही श्रीरामकृष्ण का मुख्य उपदेश है। (19:43

    तो वचनामृत में हम अक्सर हर दूसरे या तीसरे पन्ने पर श्री रामकृष्ण को ये कहते हुए देखते हैं कि, पहला भगवान फिर संसार। पहले भगवान, फिर संसार। भगवान को पहले पाना -श्रद्धा के द्वारा, भक्ति के द्वारा , ज्ञान के द्वारा।  किसी भी तरीके से ; भगवान के साथ पहले संपर्क बना लेना, और उसके पश्चात् संसार के साथ व्यवहार करने से , हमें कोई चिंता नहीं है। लेकिन इस प्रभु परमेश्वर रूपी हमारी जो स्थाई निवास स्थान हैउस निवास स्थान को पाए बगैर अगर , हम संसार के साथ व्यवहार करना शुरू कर देते हैं, तो हमारा यहाँ पर गुम हो जाना यह निश्चित है। (20:37तो ये श्रीरामकृष्ण का मुख्य उपदेश है, बार बार उनके वचनामृत में हम देखते हैं। 

भग्वत गीता में एक श्लोक है, प्रसिद्द श्लोक है , यहाँ पर भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- क्या कहते हैं? 

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।

प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्।।

    9.18।।

कृष्ण कहते हैं - यह जो भगवान, प्रभु परमेश्वर हैं, वे कैसे हैं ? वे ही हमारी गति हैं। गति हैं , वो भर्ता हैं, वही हमारा भरण-पोषण करने वाले हैं। वो गति हैं, भर्ता हैं, फिर क्या हैं ? -वे ही हमारे प्रभु हैं। वही साक्षी हैं। वही हमारे अंदर बैठे हुए अन्तर्यामी साक्षी हैं। और वही हमारा निवास है, स्थाई निवास स्थान वही हैं। और शरणं सुहृत - वही हमारा शरण हैं ,और वही हमारा स्थाई मित्र हैं। और क्या ? ये भगवान जो हैं, वे प्रभव प्रलय स्थान हैं। वही प्रभव स्थान हैं , वहीं से ये पूरी जो जगत , संसार है , जो सृष्टि है , उसकी उत्पत्ति भी वहीं से होती है और उसका प्रलय भी वहीं पर होता है। प्रभवः प्रलयः स्थानं, और क्या ? यही  सबसे बड़ी सम्पत्ति है। निधानं- तथा पूरे सृष्टि का बीज वही है। तो पहले इस प्रकार का जो भगवत गीता में वर्णित प्रभु परमेश्वर, जो हमारे ह्रदय में बैठे हैं , पहले उसके साथ सम्पर्क बना लेना। यह अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यही जीवन का मुख्य उद्देश्य है(22:31)        

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति

न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।  

 केन उपनिषद में कहा गया है , 'यह' प्रभु परमेश्वर का ज्ञान अगर  हम पा लेते हैं या उसके  साथ हमारा अगर सम्बन्ध बन जाता है। तो मनुष्य जीवन का जो मुख्य उद्देश्य है , वह सफल हो गया। और अगर इसके साथ हम सम्बन्ध नहीं बना पाते हैं; सम्बन्ध न बनाकर के विश्व के साथ , जगत के साथ अगर हम उलझ जाते हैं, तो महती विनष्टि - तो महान विनाश हमारे सामने होगा। ये केन उपनिषद कहती है। (23:09)  

 इसी बात को भगवान शंकराचार्यजी भी बहुत ही सुन्दर तरीके से कहते हैं, उनका जो मोहमुद्गर बहुत सुन्दर है, वहाँ पर वे कहते हैं - यह जीवन कितना अल्प है , मनुष्य जीवन कितना छोटा है? इस छोटे से मनुष्य जीवन में अगर हम इस महत उद्देश्य को एक रूप न दें, तो बहुत गलती हमलोग  कर रहे हैं। वे कहते हैं - ये जीवन कैसा है ? 

नलिनी दल गत जलम अति तरलम् - 

तद्वद जीवितम् अतिशय चपलम्।  

-  ये जो जीवन है -अतिशय चपलम्। ये अत्यंत ही चपल है - ये कभी भी खत्म हो सकता है। तो इसका उदाहरण वे देते हैं, जिस प्रकार से कमल का जो फूल होता है, और उसके जो पत्ते होते हैं, पत्तों पर पानी की जो छींटे होते हैं , पानी की जो बूँदें होती हैं, वह बिल्कुल कैसे चपल होता है। एक हल्की सी, एक मंद हवा भी अगर आ जाती है , तो वह बूँद जो है वह पत्ते पर से बिल्कुल फिसल करके गिर जाती है। उसी प्रकार है मनुष्य जीवन - अतिशय चपलम्। कब यह खत्म हो जाये यह कोई भी नहीं कह सकता। इसीलिए यह मनुष्य जीवन खत्म होने से पहले क्या करना है? भगवान श्रीशंकराचार्यजी कहते हैं - 

भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्,

गोविन्दं भज मूढ़मते।

संप्राप्ते सन्निहिते मरणे ,

न हि न हि रक्षति डुकृञ् करणे॥१॥

मृत्यु बिल्कुल सामने खड़ी हुई है , हमें और कोई भी नहीं बचा सकता , इसलिए भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्, अर्थात भगवान को जान लो! भगवान के साथ सम्पर्क बना लो! यह जीवन खत्म होने पहले ईश्वर का ज्ञान प्राप्त कर लो। श्रद्धा के द्वारा , भक्ति के द्वारा और ज्ञान के द्वारा। तो ये है मूल सन्देश ! भगवान श्री रामकृष्ण का मूल सन्देश यही है, कि मनुष्य जीवन का जो मुख्य उद्देश्य वो है ईश्वर के साथ सम्बन्ध बना लेना अपने 'ईश्वर स्वरूप' को पहचान लेना ! अपने भगवत स्वरुप को पहचान लेना। पहचान करके फिर इस संसार के साथ अगर हम व्यवहार करें, तब कोई चिंता की बात नहीं है। (25:37)

आज चारों और ये जो कोरोना का महामारी हम देख रहे हैं, सारा मानवजाति , सारा विश्व इससे ग्रस्त है। सभी पीड़ित हैं, कितने लोगों की जानें चली गईं हैं इसमें। लोग भयग्रस्त हैं, चारों ओर लोग चिंतित हैं। पीड़ित हैं। ऐसी परिस्थिति में एक दृष्टिकोण यह है कि हम यह जानें कि इस शरीर के अतीत, इस मन के अतीत, इस बुद्धि के अतीत, हमारे ही भीतर एक ऐसी सत्ता है, जो कि अमर है। हमारी जो भगवत सत्ता है, उस भगवत सत्ता पर श्रद्धा रखें , उसके प्रति हमारा प्रेम हो।   और उसके दृष्टिकोण से अगर हम इस महामारी को देखें, तो हम इस महामारी को भयमुक्त होकर के हम इसका सामना कर पायेंगे और वह तभी सम्भव होगा , जब हमें , हमारे भीतर बैठे हुए इस प्रभु परमेश्वर पर, श्रद्धा हो। भक्ति हो। और उस आत्मा की अमरता के विषय में हमारे पास ज्ञान हो(26:45

    तो भगवान श्रीरामकृष्णदेव का मुख्य सन्देश यही है। कि मनुष्य जीवन का जो मूल लक्ष्य है - वो भगवत प्राप्ति है। और प्राप्त करने का मार्ग - श्रद्धा , भक्ति, और ज्ञान ये मार्ग हैं। और मनुष्य जीवन जीवन इसी के लिए ही है। इसको भूलकर के अगर हम इससे उलझ जाते हैं , तो हम इस संसार में खो जाते हैं। (27:13)   

   तो मैं भगवान श्रीरामकृष्ण से यही प्रार्थना करता हूँ कि वे हमारे अंदर उस प्रकार की श्रद्धा को निर्मित करें। हमें कृपाकर के हम सब के अंदर भक्ति का संचार करे, वह प्रेम भर दे -ईश्वर प्रेम भर दे! और हमारे अंदर और उसके स्वरुप का ज्ञान हमारे अंदर उस ज्ञान का उदय करा दे। यही हमारी उनसे प्रार्थना है ! धन्यवाद !! (27:40)  

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