इस ब्लॉग में व्यक्त कोई भी विचार किसी व्यक्ति विशेष के दिमाग में उठने वाले विचारों का बहिर्प्रवाह नहीं है! इस ब्लॉग में अभिव्यक्त प्रत्येक विचार स्वामी विवेकानन्द जी से उधार लिया गया है ! ब्लॉग में वर्णित विचारों को '' एप्लाइड विवेकानन्दा इन दी नेशनल कान्टेक्स्ट" कहा जा सकता है। एवं उनके शक्तिदायी विचारों को यहाँ उद्धृत करने का उद्देश्य- स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाओं को अपने व्यावहारिक जीवन में प्रयोग करने के लिए युवाओं को 'अनुप्राणित' करना है।
⚜️️🔱 अपनी बुद्धि से क्या आप 'मनुष्य' (विवेकी) हो ?⚜️️🔱
[जैसी 'मति' वैसी 'गति' ! या मति सा गतिर्भवेत !]
[मति के अनुसार ही भव चक्र चलता है ! #paramvani /
संसार नहीं बाँधता, देह मति बाँधती है !]
बुद्धिनाशात् प्रणश्यति। (0:11सेकंड) यदि आपकी ' विवेक सम्पन्न बुद्धि' का नाश हो गया -तो आपका हो गया। अर्थात आपने इस धोखेबाज बुद्धि के हार को अपनी हार समझ लिया - तो आप फिर नश्वर 'देहो अहं' के भाव को ही सच मानने लगोगे। अर्थात बंधन स्वकल्पित है। अपने नश्वर प्रातिभासिक मैं (Apparent I- आदम या हव्वा) को ही अविनाशी सच (Real I -आत्मा , ब्रह्म, ईश्वर, भगवान) समझने लगोगे।
जब कोई व्यक्ति किसी भी इद्रिय विषय-भोग को सुन्दर और सुख का साधन समझकर उसका निरन्तर चिन्तन करता रहता है, तब उस विषय या वस्तु (कामिनी-कांचन और कीर्ति) के प्रति आसक्ति पैदा हो जाती है। उस आसक्ति के अत्यधिक बढ़ जाने पर, उस वस्तु-विशेष के प्रति उसकी घोर आसक्ति (Love or Infatuation?) उसको पाने की उत्कट इच्छा या कामना (ऐषणा) का रूप ले लेती है ; जिसको पूर्ण किये बिना मनुष्य शान्ति से नहीं बैठ सकता। यदि कामना पूर्ति के मार्ग में कोई विघ्न आता है, या कोई व्यक्ति/वस्तु उस कामना -पूर्ति के मार्ग में विघ्न बनता है , तो उस व्यक्ति-विशेष को विघ्न का कारण समझकर, उसके प्रति मन (बुद्धि) ओर होने वाली प्रतिक्रिया को कहते हैं क्रोध। क्रोध से उत्पन्न होता है मोह ; और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति (remembrance) के भ्रमित होने पर 'बुद्धि' का नाश हो जाता है। बुद्धि का नाश होने से उस व्यक्ति का पतन हो जाता है।
मोह का अर्थ है अविवेक। मोह ही स्मृति (remembrance याद) के नाश का कारण है। कौन सी स्मृति ? अर्थात 'जीवो ब्रह्मैव न अपरः' -इस सच्चाई को मनुष्य भूल जाता है। ब्रह्मैव इदं सर्वं !- आत्मैव इदं सर्वं ! इस रहस्य को वह भ्रमित बुद्धि भूल जाती है। और 'विवेकज ज्ञान' से सम्पन्न बुद्धि -या जगत को ब्रह्ममय देखने में समर्थ ज्ञानमयी दृष्टि भी अपने सत्यस्वरूप को भूलकर या [महावाक्य "अहं ब्रह्मास्मि , तत्त्वमसि " को भूलकर (Real I अविनाशीआत्मा भूलकर)] पुनः (नश्वर) जगत (M/F देह या Apparent I) के साथ अपना रिश्ता जोड़ लेती है। क्रोध के आवेश में मनुष्य सभी सम्बन्ध भूलकर चाहें जैसा व्यवहार कर सकता है। श्रीशंकराचार्य लिखतें हैं कि क्रोधावेश में मनुष्य अपने पूज्य गुरु एवं मातापिता के ऋण को भूलकर उनका भी तिरस्कार करता है।
इस प्रकार स्वयं देह (M/F) समझकर मन में उठने वाले असद् विचारों से प्रारम्भ होकर आसक्ति (संग) इच्छा क्रोध, मोह और स्मृति के नाश तक जब मनुष्य का पतन हुआ तो अगली सीढ़ी है बुद्धि का नाश। बुद्धि में विवेक ही वह सार्मथ्य है जिससे हम शाश्वत-नश्वर , अच्छे-बुरे, धर्म-अधर्म का निर्णय कर सकते हैं। निषिद्ध कर्मों को करते समय विवेक-सम्पन्न बुद्धि ही हमें उससे परावृत्त करने का प्रयत्न करती है। यदि यह विवेक-सम्पन्न बुद्धि नष्ट हो जाये (ब्रह्मसत्यं जगतमिथ्या समझने वाली बुद्धि ही नष्ट हो जाय) तो मनुष्य का मनुष्यत्व (आत्मश्रद्धा , आत्मविश्वास , आत्मनिर्भरता ,निःस्वार्थपरता आदि चारित्रिक गुण) ही नष्ट हुआ समझना चाहिये। और बुद्धिनाश के बाद तो वह व्यक्ति पशु (घोर स्वार्थी) से भी हीन व्यवहार करता है और फिर कभी मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य , या श्रेष्ठ और उच्च ध्येय -'प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है ' को न समझ सकता है और न अपने सत्यस्वरूप को प्राप्त कर सकता है। यहाँ मनुष्य के पतन /ऩाश से तात्पर्य यह है कि अपने शुद्ध स्वरूप (Real I अविनाशी आत्मा )को पहचान कर वह मनुष्य जीवन का परमपुरुषार्थ मोक्ष (जीवनमुक्ति) को प्राप्त करने योग्य नहीं रह जाता।
[विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध से उत्पन्न होता है मोह और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति (महावाक्य जनित आत्मज्ञान -आदम और हव्वा देह तो चैतन्य का विवर्त है-देह रहने तक -) के भ्रमित होने पर बुद्धि (विवेक-सम्पन्न बुद्धि) का नाश होता है। और उस अन्तःकरणकी ( विवेक-शक्तिरूप ) बुद्धि का नाश होने से वह व्यक्ति पुरुषार्थ (जीवनमुक्ति या मोक्ष) के अयोग्य हो जाता है। [अपने चेतन आत्मा (अविनाशी) होकर भी अपने को जड़ (नश्वर) देह समझने वाला नित्य-अनित्य विवेक-सम्पन्न बुद्धि नष्ट होने से व्यक्ति (चेतन आत्मा से जड़ आदम हो या हव्वा शरीर हो जाता ) पुरुषार्थ करने के अयोग्य हो जाता है। अतएव गृहस्थ नेता को अपने आचरण को हमेशा पवित्र रखना होगा -चिपकना सख्त मना है। ]
यदि बुद्धि में तुम कर्ता हो गए - तो हो गए ! उसी तरह बुद्धि में तुम अकर्ता हो गए , अकर्ता हो गए ! (0:21 सेकंड) जो कुछ होना है बुद्धि में होना है। बुद्धि में मुक्त हो गए तो मुक्त हो गए। आत्मा तो कहते हैं सदा मुक्त है; पर क्या तुम्हारी बुद्धि मुक्त है ? तुम्हारी बुद्धि में ऐसा लगता है कि - हम मुक्त हैं ! - (बुद्धि से ऐसा लगता है कि मैं कौन हूँ ? दहोहं कि शिवो अहं ?) - हम मुक्त हैं ! इसी तरह से एक और वाक्य है - जिसकी जैसी मति -उसकी ? बोलो ! अर्थात ' जिसकी जैसी मति , उसकी वैसी गति। अब ये बात तो समझ में आ गई। अब मति/बुद्धि कल्पना नहीं है। मति इमेजिनेशन नहीं है। 'जिसकी जैसी मति , उसकी वैसी गति'।'अब आप पैदा हुए हो !'यह कोई 'आप' कोई कल्पना कर रहे हो क्या ? अपनेआप हो रही है। (1:12 मिनट) अभी तक आप अपनी मति में , अर्थात अपनी बुद्धि के अनुसार पैदा हुए हो। अपनी मति कर्ता हो। अपनी मति में अधूरे हो ? (1:20)अपनी मति में मुक्त नहीं हो। आप मुक्त नहीं हो, यह आपकी मति (दृष्टि) है , या मेरी ? और जब तुम मुक्त हों जाओगे , तब क्या तुम गुरु की मति से मुक्त होओगे ? मेरी दृष्टि में , या मेरी मति में तो तुम अभी मुक्त हो। अपनी मति बताओ। मेरी मति में तुम पहले से मुक्त हो। (गुरुदेव की दृष्टि में या गुरु मति के अनुसार दीक्षा-मंत्र लेने के पहले ही से तुम केवल जीव -M/F, मरण धर्म जड़ शरीर नहीं हो , नित्य-मुक्त , शुद्ध-बुद्ध अविनाशी चेतन आत्मा हो।) भगवान की मति में अर्जुन ब्रह्म ही है।(1:51) लेकिन अर्जुन अभी ब्रह्म नहीं है। अर्जुन अपनी मति में आज भी अर्जुन है; आदमी है, जीव है , कर्ता है ! अपनी मति में अर्जुन अभी मुक्त नहीं है।[अपनी दृष्टि में अर्जुन अभी ब्रह्म नहीं है। अपनी मति में अर्थात अपनी बुद्धि में अर्जुन आदमी है, जीव है -कर्ता है। अपनी मति में अर्जुन अभी -ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र है ? या अपनी मति में अर्जुन आत्मा (ईश्वर , भगवान या ब्रह्म) है ? अपनी मति में अर्जुन अभी अधूरा है, यानि अपनी आदम है या हव्वा है ? अर्जुन जीव है , कर्ता है ! विवाह-कर्म करके अधूरा से पूरा होने वाला है मनुष्य M/F है। क्योंकि जब आप पैदा हुए हो ऐसा मान चुके हो ? परिवार जनों से ,माँ से सुनी हुई बातों के अनुसार आपकी बुद्धि तो हमेशा यही कह रही है कि, आप दो बहनों के पैदा होने के बाद- अमुक तिथि में पैदा हुए थे। आप अमुक जाति के हो , या बंगाली -बिहारी -हिन्दू -मुसलमान सिख, जैन या बौद्ध हो ? आपकी बुद्धि यही कह रही है। अब यही देह के पैदा होने की बात को आपकी बुद्धि में जब यह बात बैठ गयी कि 'मैं पैदा' हुआ था ? तो बुद्धि को भी परिवर्तनशील 'देह' का पैदा होना ही मेरा, अपना अविनाशी 'आत्मा' का पैदा होना लग रहा है ? इसलिए जब भगवान अर्जुन को गीता के 18 अध्याय सुना देंगे , क्या अर्जुन तब वह मुक्त होगा? या पहले से आत्मा है -पर अभी उधर दृष्टि ही नहीं है ? या शुकदेव जी से हफ्ताभर भागवत सुनने के बाद परीक्षित मुक्त होगा ?](2:04)
अथवा इतने दिनों तक जब हम आपको लेक्चर सुनायेंगे तो, आपको - मतलब 'बद्ध मति' को, 'मूढ़ मति' को 'अमूढ़ मति ', 'बद्ध' मति को 'मुक्त' मति ,"मूढ़ मति को विवेक-संपन्न मती", 'देहो हम' मति को 'शिवो हम' मति , मति (या विवेक-दृष्टि) के आलावा गुरु और क्या दे सकता है ? गुरु (भगवान) के पास और क्या है ? और आप जानते हो केवल मति (यानि विवेक-दृष्टि, या विवेक-सम्पन्न दृष्टि) यदि मिल जाये , तो फिर कुछ पाना बाकी ही नहीं रह जाता। पर अभी तुम गुरु की मति पाने आये हो। गुरु की मति की बातें सुनते हो। आप अपनी मति (बुद्धि) से गुरु की मति (बुद्धि) को तौलते हो और जितना अनुकूल लगी उतनी ले लेते हो। बाकी गुरु की मति को कहते हो - 'अपने पास रखो'। [अपने को अनंत समुद्र (पानी-शाश्वत चैतन्य) नहीं समझकर उस पर पैदा होने और नष्ट होने वाला, तरंग या लहर तुल्य नश्वर ससीम M/F शरीर समझने वाली मूढ़ मति को अमूढ़ मति , 'बद्ध' मति को 'मुक्त' मति (लहर को पानी होने की बुद्धि), विवेक-मति , नित्य-अनित्य विवेक-सम्पन्न बुद्धि हम देंगे ? 'देहो हम मति को शिवो हम मति ' हम देंगे ? गुरु के पास और क्या है ? और आप जानते हो केवल यदि विवेक-मति मिल जाये , तो फिर कुछ पाना बाकी ही नहीं रह जाता। (और जब नाश मनुज पर छाता है - पहले विवेक मर जाता है !) पर अभी तुम गुरु की मति पाने आये हो। गुरु की मति की बातें सुनते हो।आप अपनी मति से गुरु की मति को तौलते हो और जितना अनुकूल लगी उतनी ले लेते हो। बाकी गुरु की मति कहते -अपने पास रखो।](3:07)
मति (बुद्धि) कहो , कि दृष्टि कहो। दृष्टि क्या है ? 'देह'-दृष्टि। 'देह मति ? दृष्टि माने ये दो चक्षुओं के गोलक नहीं। हमारे यहाँ - भारत में 'किसी' भी प्रकार के बोध का नाम दृष्टि है। खट्टा-मीठा, गर्मी-सर्दी, जिस प्रकार का भी 'बोध' या अनुभव हो रहा हो - उसका नाम दृष्टि है। इसी तरह से दृष्टि है - देह दृष्टि , माने देह मति। मैं देह (M/F आदम हूँ या हव्वा) हूँ -यह दृष्टि ! मैं देह हूँ , ये मति। मति-दृष्टि से देह हूँ !! मैं देह हूँ, यहाँ बैठा हूँ। यह भी आपकी मति ही है न ? अब जब देह बैठा हो उसी समय देखो, (आप उस मति को देखो) उस मति को गुरु की वाणी के द्वारा, उपनिषदों की वाणी के द्वारा (महावाक्य -अयं आत्मा ब्रह्म,जीव ब्रह्मैव न अपरः के द्वारा) अपनी मति(विवेकसम्पन्न बुद्धि) से पूछो कि तुम 'बैठे हो' या 'चेतन हो' ? चेतन नहीं हो तो तुम देह हो क्या?चेतन हुए बिना क्या तुम्हारी मति में- 'मैं देह हूँ' ऐसा विचार उठ सकता है ?[Without consciousness, what is the body?] (4:19)
'एक अर्थ में' तुम जब चेतन थे , उस समय यह मति आई - देह हूँ बैठा हूँ ! लेकिन जब सचमुच चेतन थे , तब तुम्हें -देह हूँ ' ये मति आई तो चेतन हूँ ये मति क्यों नहीं आई ? चेतन हुए बिना देह हूँ - ये मति आ नहीं सकती। किसी सोए आदमी को देह की मति, देह बुद्धि नहीं हो सकती। इसका मतलब तुम चेतन हो और बुद्धि है। लेकिन दुर्भाग्य से तुम चेतन हो - तुम्हारी बुद्धि ने यह निर्णय नहीं किया। इसलिए तुमने यह नहीं सोचा कि मैं चेतन हूँ। तुम्हारी बुद्धि ने तुम्हें धोखा दिया। (तुम्हारी बुद्धि विवेक-सम्पन्न नहीं है ? इसलिए-ठाकुर की तरह 'सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके' मंत्र नहीं पढ़ा ?'अविवेकी बुद्धि' ने तुम्हें धोखा दिया।) जबकि बुद्धि तुम्हारी है। कई बार अपने ही लोग अपनी खिलाफ पार्टी से मिल जाते हैं। चुनाव में तो अक्सर होता है। तुम्हारी मति तुम्हारे पक्ष में रहते हुए भी तुम्हारा कल्याण नहीं कर रही। तुम्हारा उद्धार नहीं कर रही। तुम्हें तरने नहीं दे रही है। तुम्हें (आत्मज्ञानी को ?)देह बुद्धि कराकर तुम्हें मृत्यु का दर्शन करा रही है। (5:33)
इसलिए 'देहो अहम'- मैं देह हूँ -'देहो अहम इति में बुद्धि पूर्व असि मधुसूदने',मैं देह हूँ, मैं दास हूँ, मैं गोपियाँ हूँ, मैं व्यक्ति हूँ (मैं M/F शरीर हूँ), ये (ठाकुर देव) मेरे भगवान हैं- मैं देह हूँ। ये मेरे स्वामी हैं। 'इति में बुद्धि ' ऐसी ही बुद्धि - 'पूर्व असि'मेरी भी पहले थी।गोपियों ने उद्धव जी से कहा -पहले हमारे अंदर 'देहो अहम इति में बुद्धि पूर्व असि मधुसूदने' - हमारी भी पहले देहबुद्धि थी। तब क्या सोचती थी ? ये मेरे स्वामी हैं - ऐसा सोचती थी। अद्वैत बुद्धि नहीं थी; तब इन्होंने क्या किया ? 'मैं देह हूँ' मेरी बुद्धि भी श्री कृष्ण से मिलने से पहले ऐसी थी ! मैं देह हूँ, मैं दास हूँ, मैं गोपियाँ हूँ, मैं व्यक्ति (आदम या हव्वा शरीर) हूँ, ये (ठाकुर देव) मेरे भगवान हैं- मैं देह हूँ। ये मेरे स्वामी हैं। ऐसी ही बुद्धि मेरी पहले थी। गोपियों ने उद्धव जी से कहा - 'देहो अहम इति में बुद्धि पूर्व असि मधुसूदने' - हमारी भी पहले देहबुद्धि थी। तब क्या सोचती थी ? ये मेरे स्वामी हैं - ऐसा सोचती थी।अद्वैत बुद्धि नहीं थी;तब इन्होंने क्या किया ? (6:27) 'द' आकारा -दासो अहं, दासो अहं बुद्धि , 'दासो अहं- देहो अहं इति में बुद्धि' पहले थी। 'पुर्वासि' - शुरू में थी जैसी आपकी अभी है । तो भगवान ने क्या किया ? ' दकारा अपहृतेन' उन्होंने 'दा' चुरा लिया। दासो अहं इति मे बुद्धि चुरा लिया। तब 'सो अहं' भावेन पूज्य। अब हम सोहम भाव में स्थित हो गए। देहो अहं -दासो अहं इति मे बुद्धि ' - ऐसी बुद्धि मेरी थी। इस 'देहो अहं' बुद्धि (दृष्टि) में 'शिवो अहं' बुद्धि कौन देगा ? 'मैं देह हूँ' इस बुद्धि में 'मैं शिव हूँ ' हूँ (आत्मा , ईश्वर या ब्रह्म हूँ) यह बुद्धि ! मेरी 'देहोंहम की दृष्टि' में 'शिवोहं की दृष्टि' कौन जाग्रत करेगा?(7:10)
[यह प्रसंग भक्त या जिज्ञासु की उस अवस्था को दर्शाती है जहाँ कृष्ण की कृपा से या आत्म-ज्ञान के प्रकाश से, 'मैं शरीर हूँ' वाला पुराना भ्रम (बुद्धि) नष्ट हो गया है और अब वह 'मैं शरीर नहीं, बल्कि आत्मा या ब्रह्म हूँ' के निश्चित ज्ञान (निश्चयात्मिका दृष्टि / बुद्धि) को प्राप्त कर चुका है। यह स्थिति भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में वर्णित स्थितप्रज्ञ के लक्षणों के समान है, जहाँ व्यक्ति देह और आत्मा के अंतर को समझकर परम शांति प्राप्त करता है।]
और क्या तुम अभी के अभी 'देहो अहं' बुद्धि को छोड़कर , 'शिवो अहं' ये बुद्धि लोगे ? ये 'शिवो अहं' वाली बुद्धि लेनी है कि नहीं लेनी है - इसका निर्णय भी आप अपनी ही बुद्धि से करते हो। तो इस समय आपकी बुद्धि तो 'देहो अहं' की है। तो जब तुम्हारे पास पहले से ही 'देहो अहं' [आदम या हव्वा अहं] वाली बुद्धि पहले से है , और आप मानते हो कि आप पैदा हुए हो (दो बहनों के बाद एक लड़का या लड़की पैदा हुए थे), इसलिए आपकी बुद्धि 100 % सही है। लेकिन जब गुरु (या शास्त्र) कहेंगे , तुम देह नहीं हो ; तो गुरु की बुद्धि कैसे लोगे आप ? आपकी बुद्धि (यदि आत्मश्रद्धा या मनो, बुद्धि , हंकार , चित्तानि नाहं में प्रतिष्ठित न हो तो।) आपकी बुद्धि बाधा बनेगी। स्वप्न देखते समय तुम मर रहे हो ; स्वप्न में कोई कहे भी कि ये तो स्वप्न है-तुम मर थोड़े रहे हो ? कोई स्वप्न में मानेगा ? आपकी ही 'देहो अहं बुद्धि' , 'दासो अहं बुद्धि ', 'अहंकर्ता बुद्धि- या कर्ता अहं बुद्धि' , 'जीवो अहं बुद्धि ' [आदम या हव्वा M/F शरीर में अहं बुद्धि], अब "जीवो अहं बुद्धि' त्याग कर 'शिवो अहं बुद्धि' में प्रतिष्ठित हो जाने के बाद परिवर्तन किसमें आएगा ? बुद्धि को बदलने या दृष्टि को बदलने से कौन बदलेगा ? देह बदलेगा क्या ? (8:16) देह नहीं बदलेगा , 'देहो अहं' ये समझ बदलेगी (या दृष्टि बदलेगी)। 'शिवो अहं' यह समझ आएगी। देह को कौन बदलेगा ? वह तो वैसे ही बदलता है। बदलेगा जब बदलेगा। लोग सोचते हैं कि बुद्धि के आलावा कोई और करामात है। जितने करामाती देह को बदलना चाह रहे हैं , सब हार गए। इसलिए सन्त (आत्मज्ञानी या ब्रह्मविद) तो पहले कहते हैं , संत , महात्मा , ज्ञानी महात्मा , 'गुरु' क्या करते हैं ? गुरु तुम्हारे देह को नहीं बदलते तुम्हारी दृष्टि को बदलते हैं , सोच को बदलते हैं ! "दृष्टिं ज्ञानमयीं कृत्वा पश्येद् ब्रह्ममयं जगत् " ज्ञानमय दृष्टि से संसार को ब्रह्ममय देखना चाहिए
देहबुद्धया तु दासोऽहं जीवबुद्धया त्वदंशक
आत्मबुद्धया त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः ॥
देहबुद्धिसे तो मैं दास हूँ, जीवबुद्धिसे आपका अंश ही हूँ और आत्मबुद्धिसे में वही हूँ जो आप हैं, यही मेरी निश्चित मति है॥ॐ !(9:07)
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⚜️️🔱जाग्रत अवस्था (मानवदेह) :अपने को ब्रह्म (आत्मा) समझने का अवसर है !⚜️️🔱
मैं ही सर्व का प्रकाशक हूं, कैसे जानें ?/YugPurush/
"साक्षी: अनुभव नहीं, अनुभवकर्ता है"
(अद्वैत तक पहुँचने के लिए ?) पहले यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि क्या 'मैं' सर्व का प्रकाशक हूँ ? हमें तो यही लगता है कि मैं इस देह (M/F देह) का प्रकाशक, इन्द्रियों का प्रकाशक , स्वप्न अवस्था और जाग्रत अवस्था का प्रकाशक हूँ ! सभी अवस्थाओं का- सर्व का प्रकाशक लगता ही नहीं हूँ। [अब जैसे एक ही पदार्थ की तीन अवस्थाएं -बर्फ, पानी , गैस। या ठोस, तरल और गैस, या 3'H' को उलट कर देखो। देह-मन और आत्मा। या स्थूल शरीर (Hand) -सूक्ष्म शरीर (मन -Head) और अतिसूक्ष्म , कारण शरीर (Heart -आत्मा) को उलटे क्रम आत्मा , मन और देह की दृष्टि से देखो। और अब अपने को स्थूल शरीर की दृष्टि से मैं कौन हूँ ?स्वयं को स्त्री-पुरुष (M/F) समझे बिना - पहले स्वयं को पूछता हूँ - " कौन सा मैं सर्व का प्रकाशक है ? यह जो जाग्रत अवस्था है , जाग्रत अवस्था वाला मैं - इन्द्रियों का प्रकाशक है। और जाग्रत अवस्था में अपनी इन नेत्र, कर्ण आदि 5 इन्द्रियों के द्वारा आप जगत को देखते हो। और जब जाग्रत अवस्था नहीं रहती , तब स्वप्नावस्था में जिन शरीरों और वस्तुओं को देखते हो , उन्हें तुम ही तो प्रकाशते हो। मन, इन्द्रियों और देह का प्रकाशक तुम (कारण शरीर आत्मा) से आलावा कोई और दूसरा नहीं है। अभी हमलोग जाग्रत अवस्था में हैं , यह कहने मतलब है -इन आँखों से जगत को देख रहे हैं। इन कानों से सुन रहे या, इस शरीर इन्द्रियों से जो कुछ देखते हो , करते हो , तब यह जाग्रत अवस्था है। जब यह देह और मन सोया पड़ा है। ये शरीर मरा जैसा पड़ा है। जब जो तुम शरीर -इन्द्रियाँ बनाकर देखते , सुनते करते हो ? उसको स्वप्नावस्था कहते हैं , स्वप्न के प्रकाशक भी तुम हो। (1:24) क्या तुमने कल रात को जो स्वप्न देखा - जिसमें कोई जैसे तुमको झकझोर कर उठा रहा था ? तो उसके प्रकाशक तुम तो नहीं ही थे ? थे तुम्हीं ? तो जाग्रत अवस्था में, इस जगत के प्रकाशक तुम। स्वप्नवस्था में जिस स्वप्न को तुम देख रहे थे , उस स्वप्न के , मन के दुःख और सुखों के क्रियाओं के प्रकाशक तुम। और सुषुप्ति में ज्ञान न रहने (होश -न रहने) के - अज्ञान के प्रकाशक (मैं अच्छी नींद में सोया पड़ा के प्रकाशक) भी तुम ही हो। ज्ञान न रहने के - अज्ञान (जागरूकता का आभाव) के प्रकाशक भी तुम। अज्ञान - असल में यदि लाईट है , तो आपको लाईट के साथ जगत भी दीखता है। यदि एकदम लाईट चली जाये - तो जगत नहीं दीखता। जैसे अमावस्या की रात में तारे नहीं दीखते। पर तारे तो रहते ही हैं ! तब आपको और कुछ नहीं दीखता केवल अँधेरा दीखता है। एक अवस्था है -जिसमें लाईट और लाईट में वस्तुयें दिखती हैं। जैसे चाँदनीरात में तारे दीखते हैं। और जब लाईट चली गयी -अमावस्या आ गयी। तब वस्तुएं नहीं दिखतीं। तारे नहीं दीखते पर अँधेरा तो दीखता है कि नहीं ? अन्धे को क्या अँधेरा दीखता होगा ? अँधा किसे कहते हैं ? जिसे अँधेरा न दिखे। (Who is called blind? Someone who cannot see the darkness.) यदि मुझे अँधेरा-उजाला दीखता है , (यदि मुझे इंजोरिया रात और अंधरिया रात का पता चलता है) तो आप मुझे क्या सकते हो कि मैं अँधा हूँ ? मुझे कुछ नहीं दीखता है। (2:57) इस शब्द की गहराई पकड़ो। अंधे को अँधेरा दीखता है क्या ? यानि अंधे को अंधरिया -इंजोरिया रात का पता चलता है क्या ? तो जिसे अँधेरा दीखता हो , उसे अँधा कहा जा सकता है क्या ? पर दो चीजें हैं पदार्थ नहीं दीखता , अँधेरा दीखता है। अमावस्या की रात्रि में मुझे तारे नहीं दीखते , अँधेरा दीखता है। (3:19) तो जागृत वृत्ति में और स्वप्न वृत्ति में - वृत्ति के होने से जगत दीखता है।तो जागृत वृत्ति में और स्वप्न वृत्ति में - वृत्ति (सहजवृत्ति) के होने से जगत दीखता है।] जब वृत्ति अँधेरे में या जड़ता में चली जाती है। माने उस समय वृत्तिज्ञान (instinctive knowledg) नहीं रहता। तो उस वृत्ति-ज्ञान के न रहने में उस अज्ञान को कौन जानता है ? यदि 'साक्षी मैं' न रहता, तो अज्ञानता का साक्षी कौन होता ? (3:45) इसलिए मैं सर्व का प्रकाशक हूँ , कहने का पहला अर्थ है , अन्य तीन अवस्थाओं (जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति) के अलावा (मृत्यु भी तीसरी अवस्था -नींद या सुषुप्ति में समाहित है।) तो तीन के अलावा और क्या है, जिसको देखा जा सकता हो ? सर्व में -जाग्रत , स्वप्न , सुषुप्ति आगयी , इसके अलावा ? तीन लोकों के अलावा -चौथा कोई लोक नहीं है ? यदि उसके बारे में कहना चाहो , तो तीन लोकों के बाद एक चौथा लोक है , उसको परलोक कहो। या अलोक कहो ? और सब लोक हैं परन्तु वो लोकातीत/ इन्द्रियातीत ?है। इसलिए सर्व लोकों का जो प्रकाशक है 'स्वयं' (Real I-साक्षी) कोई लोक नहीं है। (4 :40) वो परलोक भी नहीं है।
पर जो जो इस लोक में रहने वाले हैं , वो जब उसका अनुभव करते हैं -तो उन्हें (तुरीय) परलोक लगता है। असल में परलोक का मतलब है -जाग्रत लोक को उसी ने प्रकाशा है। स्वप्नलोक को उसी ने प्रकाशित किया। सुषुप्तिलोक को उसीने प्रकाशा। 'साक्षी' (आत्मा) कोई लोक नहीं है। साक्षी सर्व लोकों का आश्रय है - लोकातीत है। (5:14) इन तीन लोकों का (जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति का) आभाव और भाव होता रहता है। इसीलिए कोई उसे तुरीय कहते हैं। लेकिन 'मैं साक्षी हूँ' (मैं 'Apparent I' का भी साक्षी हूँ !) जाग्रत के प्रकाशक तुम हो , स्वप्न के प्रकाशक तुम हो , नींद के भी तुम प्रकाशक हूँ, क्या यह बात आप गाढ़ी नींद में या सुषुप्ति में सोंच सकते हो ? मैं तीनों का प्रकाशक हूँ, जाग्रत का भी स्वप्न का भी और सुषुप्ति का भी। यह बात तुम कब सोंच पाओगे? यह बात तुम जाग्रत में सोचोगे कि सुषुप्ति में ? सुषुप्ति में तुम सोच पाओगे कि मैं स्वप्न और जाग्रत का प्रकाशक हूँ ?
इसका मतलब 'साक्षी मैं' हूँ , सर्व लोकों का प्रकाशक हूँ। इसको समझने के लिए भी जागृत अवस्था जरुरी है। (6:19) समझने के बाद - सुषुप्ति में भी मैं रहता हूँ , क्या जरुरी है कि वहाँ मैं याद रखूं , तभी रहता हूँ ? सुषुप्ति में भी मैं रहता हूँ , ये जाग्रत में मैंने समझ लिया -बस। तो मृत्यु में भी 'मैं (साक्षी) रहता हूँ' -यह समझ लिया। बस ! और ; यही नहीं, सर्वत्र मैं रहता हूँ , यह समझ लिया। सर्वत्र रहने का अनुभव क्या दीवाल को हो सकता है ? दीवाल में भी मैं हूँ , सर्व में मैं हूँ, इस अनुभव के लिए भी'जागृत मनुष्य देह' चाहिए। (चारो अवस्थाओं मैं रहता हूँ -यह समझ लिया। सर्वत्र रहने का अनुभव कहाँ करोगे ? यह समझने के लिए भी 'जागृत मनुष्य देह' चाहिए।) (6 :55) जैसे तुम सर्वदा रहते हो , यह बात तुम सुषुप्ति में नहीं सोच सकते।
वैसे ही मनुष्य शरीर के आलावा अन्य सब देहो और वस्तुओं में तुम ब्रह्म (आत्मा) हो -ये नहीं सोच सकते। अन्य सब शरीरों में भी तुम ब्रह्म (आत्मा) तो हो, पर सोच नहीं सकते।(7 :09) पर मनुष्य शरीर की विशेष योग्यता -मन -बुद्धि, 'नित्य-अनित्य विवेक' , अन्य शरीरों में यह विवेक नहीं रहने के कारण, 'मैं ब्रह्म (आत्मा) हूँ' ऐसा सोच नहीं सकते। मानवदेह प्राप्त होना ही देवदुर्लभ है। मानव-शरीर, देव शरीर से भी दुर्लभ है। सीलिए मैं ब्रह्म (आत्मा, ईश्वर) से भी ज्यादा आपका (विवेकी-मनुष्य का) महत्व समझता हूँ। इसलिए ब्रह्म (आत्मा या देवशरीर ) से भी ज्यादा 'विवेकी मनुष्य' का महत्व है। यदि 'मनुष्य' के पास जाग्रत अवस्था और मनुष्य देह नहीं होता , तो 'अहं ब्रह्मास्मि' - मैं ब्रह्म हूँ , यह ब्रह्म भी नहीं समझ सकता। (7:23) दीवाल में ब्रह्म नहीं है? पर क्या दीवाल क्या यह समझ सकेगा-मैं ब्रह्म हूँ ? सुषुप्ति में भी तो ब्रह्म है , पर क्या सुषुप्ति में यह बोध हो सकता है ?? सुशुप्ति में भी तुम हो , ये कब समझते हो ? अच्छा स्वप्न में जब तुम थे , तो इस समय जाग्रत में तुम नहीं हो ? जागृत में ही तो तुमने सोंचा कि तुम स्वप्न में भी थे। अर्थात जागृत अवस्था -मानवदेह अपने को ब्रह्म (आत्मा , ईश्वर) समझने का अवसर है।(8:01) अपने को समझने का ( Real I') को समझने का अवसर है , इस मानवशरीर के आलावा और किसी शरीर में यह अवसर (श्रवण-मनन-निदिध्यासन करने का अवसर) नहीं है। (8:09)
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⚜️️🔱इंद्र भी तुम्हें गरीब लगना चाहिए।⚜️️🔱
शरीर जीवन नहीं है, जीवन समझने का अवसर है।/
Yugpurush/शरीर एक साधन है, उद्देश्य नहीं:
तुम अपनी महिमा को समझो ! तुम हो कौन ? इंद्र भी तुम्हें गरीब लगना चाहिए। (0:13) ब्रह्मा, विष्णु , महेश भी यदि वे आत्मनिष्ठ नहीं हैं , तो एक बहुत संसारी जीव-जन्तु हैं। ये बात समझ में आती ही नहीं है। कथा में ये विषय छूट जाते हैं। ब्रह्मा भी क्या है ? ज्यादा उम्र का है। तो उससे क्या हो जायेगा ? ये तो प्रकृति से किसी की आयु कम , किसी की ज्यादा होती है। जैसे कुत्ते-बिल्ली की 20 वर्ष , गाय -भैंस की 20 वर्ष। जन्म से ही आप (मनुष्य) ज्यादा आयु (100) लेकर आये हो ! पशु-पक्षियों की तुलना में मनुष्य की आयु , ज्यादा है। ऐसे भी कई जीव हैं जो 1000 साल की आयु लेकर आये हैं। तो आयु ज्यादा -कम होना - यह बड़ी बात नहीं है। क्योंकि वो तो मृत्यु से ग्रस्त है। ऐसे ही किसीको यदि सुख-सुविधा ज्यादा हैं , तो इसका क्या बड़ा महत्व है ? क्योंकि उनके भी दुःख का अन्त तो नहीं हुआ ? Inferiority (हीन-भावना), Superiority- बड़ा होने का घमंड यदि नहीं गया ? धन ज्यादा हो गया ? अकड़ गया ? धन कम हो गया -हीन भावना आ गयी ? (1:26) बस सुख-दुःख के झूले में झूलते रहते हो ? ये सुख-दुःख सम कैसे होंगे ? हानि-लाभ बराबर कैसे होंगे ? जीवन और मृत्यु समान कैसे होंगे ? एक दीर्घायु है - लम्बी उम्र का है। और एक उस अवस्था में प्रतिष्ठित है , जहाँ जन्म -मृत्यु दोनों उसके लिए सपना हो गया है। (1:43) दोनों में फर्क समझ लीजिये। दीर्घायु होना पसंद करोगे कि जन्म-मृत्यु की समझ से पार जाना चाहोगे ? तो ब्रह्मा भी यदि ज्ञानी नहीं है , तो मरेगा ! और एक आदमी देहदृष्टि यदि कम आयु का है , लेकिन यदि ब्रह्मज्ञ है - तो वह अमर है ! (2:04) इन दोनों का मौलिक भेद है। आपको किसी भौतिक वस्तु से सुख नहीं मिलेगा -ये मैं नहीं कहता। सुख तो खाने-पीने से मिलता है। लकिन वो टिकने वाला नहीं है।
एक देह (M/F) रहने के कारण मैं जी रहा हूँ , ये अनुभव आपको हो रहा है कि हम जिन्दा हैं। आप सब अभी जीवित (जिन्दा) ही हो न ? या यहाँ कोई मरा हुआ भी आया है ? सब जिन्दा हो। और जिसदिन शरीर नहीं रहने का समय आता है , उस दिन तुम्हें लगता है कि मरेंगे। अर्थात देह ही तुम्हारा जीवन है। इसका न होना तुम्हारी मृत्यु है। संसार की वस्तुएं सुख हैं। इनका आभाव दुःख है। पर ज्ञानी कहता है , शरीर जीवन नहीं है। (3:01) शरीर सिर्फ जीवन समझने का अवसर है। और अवसर गँवा दोगे , तो मरोगे। अवसर का उपयोग करोगे , तो मरने से बच जाओगे। इसी तरह विषय तुम्हें सुख के अनुभव का एक अवसर था , कि सुख चाहिए। गहरी नींद में तुम्हें सुख चाहिए ही नहीं था - वैसे ही तुम मुक्त थे। तो सुख का अनुभव , फिर सुख को रखने की इच्छा देता है। जब सुख को रखने की इच्छा हुई , पर जब सुख टिका नहीं तब , फिर आत्मानुसंधान किया ? अयं आत्मा ब्रह्म ? का अनुसन्धान। तत्व का अनुसन्धान , सत्य का अनुसन्धान , आत्मा का अनुसन्धान। ब्रह्म की खोज। नित्य-जीवन , नित्यानन्द। नित्य जीवन -जिस जीवन में मृत्यु है ही नहीं। जिस जीवन में दुःख नहीं है। जिस जीवन में मृत्यु नहीं है। जिस जीवन में दुःख नहीं है। जिस जीबन में चिंता नहीं है। ऐसा शाश्वत जीवन केवल मनुष्य ही खोज सकेगा। इसलिए ये सृष्टि क्यों हुई है ? इसके महत्व को भी समझो। (4:16) पेड़ में कोई दुःख नहीं , कीड़े -मकोड़ों में है , पशु -पक्षी में है। इसी तरह मनुष्य में है। परन्तु प्रभु सभी योनियाँ धीरे धीरे क्यों आगे क्यों ले जा रहे हैं ? प्रभु ले जा रहे हैं। यह सृष्टि प्रभु ने बनाई। तो क्यों बनाई ? प्रभु ने स्वयं अपने को ही सब जीवों में प्रकट किया। किन्तु प्रकट होने के बाद जीव हो गए। प्रभु प्रकट होके , जीव होके , मरने वाला हो गया। इसलिए जब उसने पहली बार अपने को जाना , तब वह ब्रह्म हुआ। जब वो ब्रह्म हुआ (आत्मा , ईश्वर हुआ) तो वो सबकुछ हो गया। उसने अपने को ब्रह्म जाना, और वो सबकुछ हो गया। इसी तरह , उनके बाद इस ज्ञान को (अहं ब्रह्मास्मि ? को) पहले देवताओं ने अपने अनुभव से जाना। कि हम ब्रह्म हैं , तो सब दुःख से मुक्त हो गए। सब कुछ हो गए। कुछ होना या खोना बाकि नहीं रह गया। पूर्ण हो गए। फिर उसी ज्ञान को मुनियों ने , ऋषियों ने जाना। फिर युग बदलते -बदलते उसी सत्य को 'मनुष्य ' (गुरु-शिष्य परम्परा में विवेकी मनुष्य ) जानने के योग्य हो गया। और आप वो मनुष्य हो , जो उस परमसत्य को जान सकते हो !(5:32)
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4.
'समाधि'
⚜️️🔱⚜️(जागरूकता की उच्चतम अवस्था)⚜️️🔱⚜️
में
आप देखोगे कि
'इन्द्रियों के बिना मैं मौजूद हूँ ! '
[In a state of heightened awareness,
you will see that I exist without the senses.]
साक्ष्य बाहर है, साक्षी भीतर है ! /YUGPURUSH/ "साक्ष्य माया है, साक्षी आत्मा है!"
जैसे स्वप्नों में शरीर भी होता है , लड़ाई भी होती है , प्यार भी होता है। शादियाँ भी होती हैं , बच्चे भी होते हैं। सुखानुभव भी होता है , और मरने तक की नौबत आ जाती है। स्वप्न में वो सब होता है - जो बाहर घटित हो रहा है। इसी तरह ध्यान में तुम्हें रंग दिखेगा , गुरुदेव , माँ , ठकुर , स्वामीजी भी दिख जायेंगे। आँख बंद होने पर दीखता है। हमें तो राम भगवान दिखे , सिद्ध पुरुष दिखे। दीखता है। जैसे तुम अभी दीखते हो , वैसे ही वो दीखते हैं। अच्छा स्वप्न में जब कोई किसी को देखता है , तो इससे अलग तरह का देखता है ? इसीतरह से ध्यान में भी गुरु, भगवान , रंग की रौशनी दिखती है। ध्वनियाँ सुनाई देती हैं , सुगंध मिलता है। और रस आने लगता है -स्वाद आता है। लेकिन ये सब इस आत्मा के और जगत में जाने की बीच की अवस्था है। और आगे जाओगे तो सुगंध भी चली जाएगी , गुरु भी चले जायेंगे, सूर्य-चंद्र -पृथ्वी सब चले जायेंगे । फिर वहाँ तुम चेतन अकेले रह जाओगे। (1:35)
उस अकेले चैतन्य को ही 'pure consciousness' शुद्ध चेतना कहते हैं। केवल चैतन्य - जिसमें न कोई इन्द्रियाँ हैं , न इन्द्रियों के विषय है। न स्थूल विषय हैं , न स्थूल इन्द्रियाँ हैं। न शुक्ष्म विषय या सूक्ष्म इन्द्रियां -मन और बुद्धि है। समाधि में केवल -चैतन्यता है, आत्मबोध है। आत्मानन्द है। समाधि में अन्य कोई सांसारिक विषय का सुख नहीं होगा कि मेरे धन का सुख है। पद का सुख है। रौशनी दिखी उसका आनंद नहीं रहेगा। चमत्कार दिखना बीच की अवस्था है। इसीलिए साधनपाद अलग है , सिद्धिपाद अलग है। वहाँ सिर्फ चैतन्यता होगी। (3:00) और तब तुम देखोगे बिना इन्द्रियों के मैं मौजूद हूँ ! मैं स्वयं एक प्रकाश हूँ। जिससे शब्द प्रकशित हुए हैं। जिससे और सब विषय प्रकट हुए। मन और इन्द्रियाँ प्रकट हुईं। वो अकेला चैतन्य मैं हूँ -जिससे सब उपजे हैं। आत्मा दिखेगी नहीं। पर बिना इन्द्रियों की आत्मा बचेगी , और तुम्हें लगेगा कि हाँ - मैं हूँ ! बिना मन का मैं हूँ ! बिना दिमाग का मैं हूँ। बिना 'दृश्य बने' ही 'मैं' हूँ ! अभी हमारा नाम-रूप दृश्य है। हम अपने को इस नाम-रूप वाला दृश्य कहते हैं। और सब जगत तो दृश्य है - और सब तो दिख रहे हैं। पर हम मनुष्य होकर भी कहते हैं - हम भी एक दृश्य ही हैं ? मोटे -दुबले ये सब कुछ नहीं रहेगा। सारे दृश्य बने रहें पर तुम इन से असंग हो जाओ। (4:23) सांख्य दर्शन कहता है - जड़ को जड़ समझकर इससे असंग हो जाओ। आत्मा का देह-मन से नजदीक होना ही एक होना नहीं है। (जैसे घड़ी और कपड़ा) एक जड़ है एक चेतन है। मन इस तरह तुमसे अलग नहीं होता जिस तरह कपड़ा और घड़ी है। लेकिन एक प्रकार से अलग अवश्य है - कि जैसे मिट्टी और घड़ा। घड़ा नहीं रहता , मिट्टी रहती है। घड़ा मिट्टी से अलग दीखता है , खत्म होता है। पर मिट्टी बनी रहती है। तो जो खत्म हो गया , नाम-रूप (घड़ा) , वो उपाधि है। जो नहीं खत्म हुआ वो सत्य है। (6:06) इसी तरह से स्वप्न खत्म हो जाता है। तुम्हारा जागना खत्म होता है। जिस जगने पर आप शरीर देखने लगते हो , ये जगना थोड़ी देर बाद सो जायेगा। फिर स्वप्ना खो जायेगा। नींद भी हमेशा नहीं बनी रहेगी। तो जो हमेशा न रहे , त्रिकाल में न रहे (M/F नाम-रूप) - वो अवस्था है , उपाधि है। इसलिए उपाधि या दृश्य (नाम-रूप) ये उपाधि हैं , अनित्य हैं - क्षणभंगुर हैं। साक्षी आत्मा नित्य है।
ये उपाधि -temporary है अस्थाई है। आत्मा नित्य है। दृश्य परिवर्तनशील हैं , वो अपरिवर्तनीय है। दृश्य , अवस्था , उपाधि , नाम-रूप ये साक्ष्य हैं। वो साक्षी है। ये जड़ है , वो चेतन है। ये जाने जाते हैं , वो जानता है। इसलिए द्रष्टा साक्षी और दृश्य एक नहीं हैं। पर बिना जाने इन होने वाले मिथ्या पहचान को मैं अपना सत्य स्वरुप मान लेता हूँ। जैसे बुद्धि-भ्रम की अवस्था में लगेगा कि मैं तो M/F हो गया। और ये दीखता है। दिखेगा ऐसा ही। जैसे कभी बड़े लम्बे-लम्बे पुलों को आपने पार किया होगा। तो जहाँ से आप पुल में घुस रहे होते हैं - वहाँ वो चौड़ा दीखता है। और दूसरी छोर पर कम चौड़ा हो जाता है ? नहीं , पर दिखाई तो देता है। जो नहीं जानते उन्हें , भ्रम और धोखा भी होगा। बच्चे सोंचेंगे - कि उस तरफ बैलगाड़ी कैसे निकलेगी ?
दिखने का नियम नहीं बदला , समझ (बुद्धि या दृष्टि) बदल गया। इसी तरहचिड़ियाँ आईने में परछाई देखकर मुंह मारती है। हम नहीं मारते। शीशा वही , ऑंखें वही दीखता भी वैसा ही , पर समझदार समझता है , नासमझ नहीं समझता है। कोई दुनिया बदल जाएगी ? ऐसा सोचना भी मूर्खता है। ज्ञान (समाधि या आत्मज्ञान) होने से क्या जगने-सोने के नियम बदल जायेंगे? नहीं (तुरीय -चतुर्थ अवस्था) ज्ञान होने के बाद भी तीनों अवस्थाएं - जाग्रत , स्वप्न , सुषुप्ति वैसे ही होगी। पर तब इसको हम सच्चा मानकर परेशान थे। अब जाग्रत के जगत को भी सपना समझकर अब परेशान नहीं होते। और कोई परिवर्तन नहीं होता है। पर बोध सच्चा हो - तो चिड़ियाँ चोंच मारेगी , हम नहीं मारेंगे। वो झाँकती हैं , फिर चोंच मारती हैं। मनुष्य तो आईना फोड़ के उसके पीछे नहीं देखता ? क्यों नहीं देखते ? आईना बदल गया क्या ? समझ बदल गयी हैं। समझ बदल गयी , तो सब बदल गया। तो गुरु और शास्त्र दृष्टि बदल देते हैं , समझ बदल देते हैं। और सब कुछ भगवान और प्रकृति परमेश शक्ति माया देती है। गुरु थोड़ी सी समझ देते हैं। इसलिए समझ , बुद्धि या दृष्टि का महत्व भगवान से भी ज्यादा है। उनका दिया हुआ तुम्हें चैन नहीं देता , पर गुरु जो समझ देते हैं , इष्टदेव का नाम-मंत्र देते हैं - उससे चैन आ जाता है। इसलिए गुरु न तजूँ हरि को तजि डारूँ॥
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5.
सूक्ष्म अंतर्जगत ही स्थूल बाह्यजगत बन गया है !
(The physical world is but the gross manifestation of the fine world.)
("बुद्धि का तप ही ब्रह्म की प्राप्ति का साधन"/
Param Vani/“जो सबको जानता है, वह कौन है?”)
जो बुद्धि अपने सत्यस्वरूप को जानने के लिए तप करती है , (Real I, आत्मा या ब्रह्म को जानने के लिए तप करती है।) जो बुद्धि आत्मा के साथ (ईश्वर या ब्रह्म के साथ) अपना रिश्ता मजबूत करने के लिए माता पार्वती की तरह तप करती है -बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥ -क्या है ?
जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु ,न त रहउँ कुआरी॥
तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू॥3॥
भावार्थ-
मेरा तो करोड़ जन्मों तक यही हठ रहेगा कि या तो शिवजी को वरूँगी, नहीं तो कुमारी ही रहूँगी। स्वयं शिवजी सौ बार कहें, तो भी नारदजी के उपदेश को न छोड़ूँगी॥3॥ (बालकाण्ड )
अर्थात किसी विवेकी मनुष्य की बुद्धि जब यह निश्चित कर लेती है - मैं देह के साथ रिश्ता नहीं करुँगी ! मैं इन्द्रियों से रिश्ता नहीं करुँगी ; करुँगी तो आत्मा (ब्रह्म या ईश्वर) से ही करुँगी ! ऐसे विवेक-सम्पन्न बुद्धि वाले मनुष्य को ही शिव (आत्मा) की प्राप्ति होती है। परन्तु इस समय के युवाओं की बुद्धि - 'Relationship ' बनाने या सम्बन्ध बनाने के बारे में क्या समझती हैं ? शरीर का सम्बन्ध इन्द्रियों से है, इन्द्रियों का सम्बन्ध जगत से है, अर्थात इन्द्रियों का सम्बन्ध मन से है (5 विषयों से है), और बुद्धि का सम्बन्ध मन से है ! अब साक्षी भाव से मन को ही देखो , हम उसकी परीक्षा भी ले सकते हैं , या वह हमें बरगला भी सकता है ? कई बार Love के चक्कर में लड़के-लड़कियाँ पड़ जाती हैं , उनको माता-पिता समझाते हैं - छोड़ो ये Love ! भलाई किसमें है -बुद्धि को सोचने दो।
उसी तरह हम सत्यार्थीयों का या आत्मान्वेषियों का (आत्मान्वेषियों की बुद्धि का ?) भी LOVE तो है, देह से ? इन्द्रियों से , विषय-सुखों से ? ये देह के साथ बुद्धि का यह Love Marriage है , इन्द्रिय विषयों के साथ , बुद्धि का यह प्रेम-विवाह है? और आज नहीं कल ये Love Marriage तुम्हें नरक में (दुःख-कष्ट में) ले जाएगी। इसलिए विवाह करो - पर Love Marriage' नहीं करो।
Marriage करना अलग है। (1:25 मिनट) और Love से Marriage करना अलग है। तुम जिससे प्यार करते हो, उससे शादी कर लेते हो , अपना बना लेते हो। गुरु और शास्त्र कहते हैं जो अपना बनाने लायक है , उससे प्यार करो। जो अपना बना लेने के योग्य है उससे प्यार करो। और जब तुम (ठाकुर -माँ स्वामीजी की कृपा से) यह समझ चुके हो कि-" ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर:।" तो ब्रह्म (आत्मा) के सिवा अपना बनाने लायक और कोई है क्या ? शिव (आत्मा) के अतिरिक्त जिसको अपना बनाओगे , देह और इन्द्रियों को अपना बनाओगे , तो इसके साथ तुम नहीं मरोगे ? (अविनाशी आत्मा होकर नश्वर) देह को अपना बनाओगे तो देह के साथ तुम मरो। जब देह-मन इन्द्रियाँ सुखी-दुःखी होंगी , तुमको भी सुखी-दुखी होना होगा। हममें से अधिकांश युवा Marriage करने के बाद ही स्वामी विवेकानन्द की मनुष्य-निर्माणऔर चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा को ग्रहण करने के योग्य बन सकते हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम से सीधा संन्यास आश्रम में प्रवेश करने की पात्रता बहुत इने-गिने व्यक्तियों में होती है। (बाकि लोगों को श्रीरामकृष्ण- स्वामी विवेकानन्द अद्वैत-वेदांत शिक्षक-प्रशिक्षण में प्रशिक्षित गुरु से मंत्र ग्रहण करने की चेष्टा करनी चाहिए। या महामण्डल द्वारा प्रकाशित पुस्तकों का अध्यन करना चाहिए। ) जन्म-जन्मांतर से हमारा अभिमान देह से (Apparent I या आदम और हव्वा शरीर) से जुड़ा रहा है। (2:12) अब अगर गुरु का दिया इष्टमंत्र का कोई जादू चले , और आप उसके अनुसार साधना करें , और जन्म-जन्म का रिश्ता तोड़कर गुरु जिससे रिश्ता करायें उससे (ठाकुर-माँ स्वामीजी से) सम्बन्ध बना लो। तो मनुष्य जीवन के चरम लक्ष्य तक पहुँच सकते हो। पर विवेक-सम्पन्न नहीं रहने के कारण, तुम्हारी बुद्धि जन्म-जन्म से भ्रमित होकर हर जन्म में मानवदेह प्राप्त करके भी -इस जन्म में भी नश्वर देह से रिश्ता तोडना नहीं चाहती। जरा सी नाराजगी हुई तो सास से न कहकर अपनी माँ को फोन करो ? सास तुम्हारी नहीं बनीं ? ससुर तुम्हारा नहीं बना ? जो तुम्हारी बुद्धि को परमात्मा की तरफ मोड़ने वाले हैं , उनपर तुम्हारा विश्वास नहीं हुआ ? बुद्धि जिसको अपना समझ लेती है - (देह,मन इन्द्रियों को) , बस उसीकी बात सुनती है। सारा लगाव रिश्ता नैहर से है ? गुरु से वैसा लगाव है ? लड़की का रिश्ता अपने से श्रेष्ठ वर से किया जाता है। देह से सूक्ष्म इन्द्रिय है , इन्द्रिय से श्रेष्ठ मन है , मन से सूक्ष्म इसलिए श्रेष्ठ बुद्धि है , और बुद्धि से सूक्ष्म और श्रेष्ठ आत्मा है। अब देखो जिन्होंने पार्वती/नचिकेता (बुद्धि) की परीक्षा ली थी , वो उसको भटकाना नहीं चाहते थे। वे यह परखना चाहते थे कि इसकी बुद्धि अभी 3K से अनासक्त हुई है कि नहीं ? कहीं ये भी वैसा ही तो नहीं है ? इसकी बुद्धि (पार्वती) शिव की भक्त (या आत्मा की भक्त) बनेगी, शिव से ही शादी करेगी , कि कहीं सुन्दर से तो नहीं कर लेगी, या वैभव से कर लेगी? (3:32) इसलिए ऋषियों ने एक तरफ सारी अच्छाइयाँ दिखा दीं। क्या -बढ़ियाँ बढ़िया चीजें हैं। किसी से भी शादी कर ले देवलोक में विष्णु , शिव कोई कम नहीं हैं। पर यहाँ तुमको -धन और वैभव जिससे लगाओ है। इसीलिए नचिकेता के प्रसंग में यमराज ने कहा - तुम चाहो जितनी उम्र माँग लो। चाहे जितना धन मांगलो। जो लोगों को इस जन्म में नहीं मिलता है , किसीको धन नहीं मिलता , किसी को पद नहीं मिलता। किसको प्रतिष्ठा नहीं मिलती। किसीको अनुकूल पतिपरिवार नहीं मिलता। एक न एक कमी रह ही जाती है। आपको भी अभी कोई न कोई कमी तो है न ? इसलिए गुरु के यहाँ या मंदिर में जाकर क्या माँगते हैं ? जिसका पति ठीक नहीं , पति। जिसको है नहीं , उसको मिल जाये। स्वास्थ्य ठीक नहीं , तो वो मिल जाये। इसलिए नचिकेता को यमराज ने पहले ही कहा - जो वस्तु जिनके पास बहुत है , वो माँगलो ! और तुम्हें ऐसा लगता है कि जिसके पास कोई चीज नहीं है , जिसकी उसको कमी है , वो भी तुम माँगलो। जो मनुष्यों को प्राप्त हो सकता हो, वो सब मैं तुम्हें दूँगा। परन्तु मृत्यु के बाद आत्मा रहती है , कि नहीं रहती ? इस बात को मत पूछो। (5:13) नचिकेता कहता है , मैं तो यही पूछूँगा।
इस कथा का अभिप्राय है , जब आपके जैसे नचिकेता पाठचक्र में आते हैं , तो जो कोई कमी है वो यहाँ पूछते हैं। आत्मा की कमी तो किसी को महसूस ही नहीं होती। आत्मनिष्ठा- आत्मनिर्भरता -आत्मविश्वास की कमी का तो ख्याल ही नहीं आता। कुछ लोग जरूर हैं - जो गुरुदेव के निर्देशानुसार मनुष्य जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त करने के मार्ग पर चले हैं। वे कहते हैं -हम सुनते हैं , फिरभी आत्मनिष्ठा नहीं बनती। 3K में अनासक्त, अलिप्त , detached होना चाह रहे हैं। कामिनी-कांचन से निर्लिप्त नहीं हो पा रहे हैं। हम आत्मा को जानना चाह रहे हैं , फिरभी स्पष्ट नहीं हो रही है। कुछ जिज्ञासु नचिकेता की तरह भी हैं। ऋषि भी विष्णु की महिमा गाते हैं। लेकिन पार्वती (बुद्धि) ने कहा -बरउँ संभु ,न त रहउँ कुआरी॥ मैं निर्धन रहना पसन्द करूँगा , मैं असुंदर रहना पसन्द करूँगा। मैं कोई भी पद पाए बिना रहने को तैयार हूँ पर मुझे आत्मा चाहिए ही चाहिए। मुझे आत्मा के रहस्य को समझना ही है। ऐसी दृढ़ जिज्ञासा हो , दृढ़ इच्छा हो, उसके बाद श्रवण किया जाये। बाकि जबतक बुद्धि है, मन है , इन्द्रियां हैं , तो जागते ही मन आ जायेगा , इन्द्रियाँ आ जायेंगी। जगत दिखने लग जायेगा। फिर भी बुद्धि को यदि एक बार यह समझ आ गयी - कि यह मेरा वर (आत्मा) नहीं है ! इनको मुझे बरना ही नहीं है। हैं बहुत अच्छे। (7:15) ये मेरे नहीं हो सकते। इनको मैं -'मेरा' बनाऊँगी ही नहीं। इनके साथ मेरा रिश्ता टिकेगा ही नहीं। लेकिन जिसकी बुद्धि ऐसी 'स्थित-प्रज्ञ ' नहीं हो सकी हो , क्या वे अपनी बुद्धि को 3K में टिकी रहकर उन्हें प्राप्त करके तृप्त हो जाएगी। करके देख लो। पहले ही मालूम हो जाये कि इसके साथ मेरा रिश्ता ही नहीं टिकेगा। पहले ही मालूम हो जाये की ये लड़का या लड़की मंगली है। लड़की मंगली है तो लड़का गया। लड़का मंगला है , तो लड़की गयी। तो इनसे रिश्ता करने वाला ठीक-ठीक रहेगा न ? मीरा ने कहा -
"ऐसे वर को क्या वरु, जो जन्मे और मर जाये ।
वरीये गिरिधर लाल को, चूड़लो अमर हो जाये ॥"
मीरा का पति खराब था ? ससुर खराब था ? सुख-सुविधा नहीं थी ? "ऐसे वर को क्या वरु, जो जन्मे और मर जाये । ऐसे वर को वरूँगी -जा से चूड़लो अमर हो जाये ॥" ऐसे को अपना वर बनाऊँगी जिसके मरने का दुःख मुझे न हो। अर्थात वर के मरने का दुःख - चूड़लो अमर हो जाये ॥" का मतलब क्या ? क्या कोई स्त्री धन जाने से विधवा हो जाती है ? पद जाने से कोई विधवा होती है ? विधवा होती है -पति के जाने से। जिसके जाने से तू विधवा हो जाओ -बिना मालिक के हो जाओ। अभी लगता है कि शरीर मर जायेगा - तो हम मर जायेंगे। (8:59) लेकिन यदि आपको आत्मा का पता नहीं है , तो आप मर जाओगे। न मरें , तो भी मरेंगे। बिना मौत मरेंगे। हमारे यहाँ जब कोई बहुत नाराज हो कर अभिशाप दे देता है। मौत से तो सब मर जाते हैं। और जितने भी अज्ञानी (अपने को देह समझने वाले) मर रहे हैं , सब बिना मौत ही मर रहे हैं। मौत-आदि है नहीं , बिना मौत मरते हैं। यदि श्राप कहीं है -तो अज्ञानी को ही लगता है , वो बिना मौत मरता है। मृत्यु कहाँ है ? जो मर जाओगे ? तुम मौत से नहीं मरते , अज्ञान (अविद्या) से मरते हो। (9:46) अज्ञानी आत्महत्यारा है। अज्ञानी आत्महत्या कर लेता है। कोई नहीं मारता , अज्ञानी अपने को मार लेता है। मनुष्य मरता है , तो आत्मा के अज्ञान से। तो पहले बुद्धि की सहायता लो। जिस बुद्धि के द्वारा , या जिस अज्ञानी बुद्धि के द्वारा - बुद्धि तो है पर उसे आत्मा का तो पता ही नहीं चला ? क्योंकि वो बुद्धि मन के साथ थी , इन्द्रियों के साथ थी , देह के साथ थी , संसार के साथ थी। तो उसे इन सबका पता चला। और जबतक हम पशु-पक्षी की योनियों में थे तब ये विवेकी बुद्धि नहीं थी। तब तक मन और यही सब चलता रहा। मनुष्य बुद्धि आई तो पहले इन्हीं लोगों के साथ रही थी , तो इन्हीं के साथ गयी। जैसे स्वामीजी एक कथा में कहते थे - एक शेर के बच्चे को गड़ेरिये ने पाल लिया। (10:50) छोटी उम्र में मिल गया। तो जब वो भेंड़ो को डण्डा मारे , तो वो शेर भी भागने लगे। बच्चा था। धीरे -धीरे वो बड़ा हो गया , आदत वही रही। तो हमलोगों की बुद्धि भी अभी लगभग उसी तरह की है। वो जिसके साथ रही डण्डे खाती रही। जैसे शेर भेंड़ बन बैठो भय मानत सिंघन से। सिंघों से डरता है , गड़ररिया से डरता है। जैसे भेंडे डरती हैं।
विचार करके देखो प्यारे, जगत बना है मन से।
जैसे शेर भेंड़ बन बैठो, भय मानत सिंघन से।।
ऐसे ही यह मन, देह बन बैठो, डरता फिरे यमन से ! (11:39) यमराज से डरता है ! मन (बुद्धि) ही देह बन गया है। यम से डरता रहता है। ये बुद्धि बहुत दिनों से मन -इन्द्रियों के साथ रही। उनकी आदत इस बुद्धि में आ गयी। उसी तरह से सोंचती है। इन्द्रिय विषयों के द्वारा मिले दुःखों -सुखों से बुद्धि सम्मोहित (deluded) है। बुद्धि देह से , इन्द्रियों से , मन से इन्द्रियों के द्वारा मिले सुख-दुःखों से सम्मोहित-बुद्धि, प्रभावित बुद्धि। वही सोच पाती है कि ये सब भोग की वस्तुएं 3K ही जीवन का सार है। उसमें सुख -दुःख भोगने वाली मैं -बुद्धि है। उसको कभी आत्मा के आनंद का स्वाद नहीं मिला है। प्रभावित है। कभी आत्मा के आनन्द को नहीं जानती। इसलिए बुद्धि -इन्द्रिय -मन में एक बार फूट डालना पड़ेगा। कई लोग लड़के -लड़कियों के सर से इश्क का भूत उतारने के लिए तरह तरह के उपाय करते हैं। कि कैसे इनका love खत्म हो जाये। पर
लड़कियाँ -लड़के love में पागल हो जाते हैं। जादू-टोने भी फेल हो जाते हैं। तब कई मातापिता गुरु के पास जाते हैं , कि क्या करें ? जब स्वाभाविक रूप से दुर्दशा होगी , जब इस जन्म में तुम भी अपने घर में नहीं रखोगे। तब इनको अक्ल आएगी। जब सारा सपना धराशाई होगा तब अक्ल आएगी। या अगले जन्म में सतसङ्ग और गुरु करोगे , तब होश आएगा। तब क्या लाभ ? इसलिए अभी इसी जन्म में तुम यह जान लो कि -वास्तव में तुम कौन हो ? "तुम्हारी बुद्धि " क्या कहती है? क्योंकि गीता (3.42) में भगवान ने कहा है -
इन्द्रियाणि पराणि आहुः, इन्द्रियेभ्यः परम् मनः।
मनसः तु परा बुद्धिः य बुद्धेः परतः तु सः।। (3.42)
अर्थात सूक्ष्म (या अधिक बलशाली) होने के कारण स्थूल शरीर से (Apparent I M/F आदि स्थूल शरीर से)इन्द्रियाँ पर (श्रेष्ठ)कही जाती हैं। इन्द्रियों से परे मन है और मन से परे बुद्धि है, और जो बुद्धि से भी परे है, वह है आत्मा।।बाह्य जगत् की वस्तुओं (स्त्री-पुरुष शरीर) की तुलना में इन्द्रियाँ अधिक महत्त्व की होती हैं। कर्मेन्द्रियों की अपेक्षा ज्ञानेन्द्रियाँ अधिक श्रेष्ठ और सूक्ष्म हैं। और उनसे भी सूक्ष्म है हमारा मन जो हमारे 10 इन्द्रियों को नियन्त्रित करता है। और मन से भी सूक्ष्म है बुद्धि , इसलिए वह मन से परे है। और बुद्धिवृत्तियों को प्रकाशित करने वाला चैतन्य बुद्धि से भी सूक्ष्म होना ही चाहिये, बुद्धि से भी सूक्ष्म या परे तत्त्व है उसे ही अपरिवर्तनीय (अविनाशी) आत्मा कहते हैं। उपनिषदों में कहा गया है कि इस चैतन्यस्वरूप आत्मा के परे और कुछ नहीं है। (शरीर रथ है , इन्द्रियाँ घोड़े हैं, मन लगाम है , बुद्धि सारथि है और आत्मा "Real I " रथी है !)
।।3.43।। इस प्रकार हे महाबाहु! बुद्धि से परे आत्मा को जानकर आत्मा (शुद्ध बुद्धि) के द्वारा आत्मा (इस मूढ़ बुद्धि को स्थूल शरीर को ही मैं समझने वाली बुद्धि को ) को वश में करके, हे महाबाहो ! तुम इस दुर्जेय (दुरासदम्-hard to corner) कामरूप शत्रु को मारो।।
एवम्-इस प्रकार आत्मा बुद्धेः-बुद्धि से भी परम है, श्रेष्ठ (superior) है ऐसा जानकर (बुद्ध्वा)
-जानकर संस्तभ्य-(restrain) उस बुद्धि को आत्मा के वश में या नियंत्रण में रखते हुए,
आत्मानम्-निम्न आत्मा (इन्द्रिय, मन और में विषयों में आसक्त मूढ़ बुद्धि) को ; आत्मना- सत्यनिष्ठ या आत्मनिष्ठ बुद्धि, या शुद्ध बुद्धि द्वारा; मूढ़बुद्धि को जहि-वध करदो यानि समाप्त कर दो। शत्रुम्-शत्रु का; महाबाहो-महाबलशाली; कामरूपम् (कामिनी-कांचन the form of desire) कामना रूपी; दुरासदम् (hard to corner) - काम से विमुख मोड़ना दुर्जेय।
इस श्लोक के साथ न केवल यह अध्याय समाप्त होता है किन्तु अर्जुन द्वारा मांगी गयी निश्चित सलाह भी इसमें दी गई है। कि केवल आत्मानुभव रूप ज्ञान के द्वारा ही हम आत्मअज्ञान (अविद्या) को नष्ट कर सकते हैं। इसलिए निष्कर्ष के रूप में श्रीकृष्ण इस पर बल देकर कहते हैं कि हमें आत्मज्ञान द्वारा काम-रूपी शत्रु का संहार करना चाहिए।
[क्योंकि एक आत्मा (ईश्वर , भगवान, ब्रह्म) ही अनेक जीव-जगत के रूप में भास रहा है। जो परमेश (ब्रह्म की) अव्यक्त माया शक्ति है। इसलिए संसार के सभी पदार्थ भौतिक हैं। ये भौतिक पदार्थ (कामिनी-कांचन विषय-भोग आसक्ति) में आत्मा की स्वाभाविक उत्कंठा को कभी तृप्त नहीं कर सकते , या पूरा नहीं कर सकते। इसलिए इन ऐषणाओं को प्राप्त करने की कामना करना मूढ़बुद्धि का काम है , इसलिए व्यर्थ ही है। इसलिए परिश्रम करते हुए हमें मूढ़ बुद्धि को प्रकृति के साथ नहीं जुड़कर , आत्मा के साथ जुड़े रहने का प्रशिक्षण (मनःसंयोग का प्रशिक्षण) देना चाहिए। और फिर मन और इन्द्रियों को नियंत्रित रखने के लिए इस शुद्ध बुद्धि या सत्यनिष्ठ बुद्धि प्रयोग (विवेक-प्रयोग) करना चाहिए।
अज्ञान (अविद्या ) का ही परिणाम है इच्छा (ऐषणा) जिसके निवास स्थान हैं इन्द्रियाँ मन और बुद्धि। ध्यान के अभ्यास से जब हम अपना ध्यान बाह्य विषय शरीर मन और बुद्धि से विलग करके स्वस्वरूप में स्थिर करते हैं तब इच्छा की जननी मूढ़ बुद्धि ही समाप्त हो जाती है।
स्थूल शरीर मन (M/F आदम और हव्वा ) आदि उपाधियों के साथ जब तक हमारा तादात्म्य बना रहता है तब तक हम अपने शुद्ध दिव्य स्वरूप को पहचान ही नहीं पाते। इतना ही नहीं बल्कि सदैव दुखी बद्ध परिच्छिन्न अहंकार को ही अपना स्वरूप समझते हैं। स्वस्वरूप के वैभव का साक्षात् अनुभव कर लेने पर हम अपने मन को पूर्णतया वश में रख सकेंगे। गौतम बुद्ध के समान ज्ञानी पुरुष (सच्चिदानन्द के बाद विवेकानन्द ) का मन किसी भी प्रकार उसके अन्तकरण में क्षोभ उत्पन्न नहीं कर सकता क्योंकि वह मन ज्ञानी पुरुष के पूर्ण नियन्त्रण में रहता है। यहाँ ध्यान देने की बात है कि गीता में प्रतिपादित तत्त्वज्ञान जीवन की विधेयात्मक संरचना करने की शिक्षा देता है न कि जीवन की सम्भावनाओं की उपेक्षा अथवा उनका नाश।कामना एक पीड़ादायक घाव है जिसको ठीक करने के लिए ज्ञानरूपी लेप का उपचार यहाँ बताया गया है। इस ज्ञान के उपयोग से सभी अन्तरबाह्य परिस्थितियों के स्वामी बनकर हम रह सकते हैं। जो इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है वही साधक ईश्वरीय पुरुष, नेता, ऋषि या पैगम्बर कहलाता है।
कठोपनिषद् में रथ के सादृश्य से इसे अति विशद ढंग से समझाया गया है:
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयां स्तेषु गोचरान्।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः।।
(कठोपनिषद्-1.3.3-4)
यह उपनिषद् अवगत कराती है कि एक रथ है जिसे पांच घोड़े हाँक रहे हैं। उन घोड़ों के मुख में लगाम पड़ी है। यह लगाम रथ के सारथी के हाथ में है और रथ के पीछे आसन पर यात्री बैठा हुआ है। यात्री को चाहिए कि वह सारथी को उचित निर्देश दे जो लगाम को नियंत्रित कर घोड़ों को उचित दिशा की ओर जाने में मार्गदर्शन दे सके। यदि यात्री सो जाता है तब घोड़े निरंकुश हो जाते हैं।
इस सादृश्य में रथ मनुष्य का शरीर है, घोड़े पाँच इन्द्रियाँ हैं और घोड़ों के मुख में पड़ी लगाम मन है और सारथी बुद्धि है और रथ में बैठा यात्री शरीर में वास करने वाली आत्मा है। इन्द्रियाँ (घोड़े) अपनी पसंद के पदार्थों की कामना करती हैं। मन (लगाम) इन्द्रियों को मनमानी करने से नहीं रोक पाती। बुद्धि (सारथी) मन (लगाम) के समक्ष आत्मसमर्पण कर देती है। इस प्रकार मायाबद्ध आत्मा बुद्धि को उचित दिशा में चलने का निर्देश नहीं देती। इसलिए रथ को किस दिशा की ओर ले जाना है, इसका निर्धारण इन्द्रियाँ अपनी मनमानी के अनुसार करती हैं। आत्मा इन्द्रियों के सुखों का अनुभव परोक्ष रूप में करती है किन्तु ये इन्द्रियाँ उसे तृप्त नहीं कर पाती। इसी कारण से रथ के आसन पर बैठी आत्मा (यात्री) इस भौतिक संसार में अनन्त काल से चक्कर लगा रही है। यदि आत्मा अपनी दिव्यता के बोध से जागृत हो जाती है और अपनी सक्रिय भूमिका का निर्वहन करने का निश्चय करती है तब वह बुद्धि को उचित दिशा की ओर ले जा सकती है। तब फिर बुद्धि अपने से निम्न मन और इन्द्रियों द्वारा शासित नहीं होगी और रथ आत्मिक उत्थान की दिशा में दौड़ने लगेगा। अतः आत्मा द्वारा इन्द्रियों, मन और बुद्धि को नियंत्रित करने का प्रयास करना चाहिए।]
इसलिए बुद्धि को मन और इन्द्रिय रूपी घोड़ों से सम्बन्ध न बनाकर , आत्मा से सम्बन्ध जोड़ना चाहिए। और आत्मा, ब्रह्म 'शिवोहं' की अनुभूति करने के लिए, 'विवेकानन्द की बुद्धि'- (व्यक्ति नरेन्द्र Apparent I की बुद्धि नहीं सच्चिदानन्द अवस्था "Real I " की बुद्धि) को भी माता पार्वती की तरह (कन्याकुमारी में) तप करके शुद्ध-बुद्धि (आत्मनिष्ठ बुद्धि-सत्यनिष्ठ बुद्धि ?) बनना पड़ता है-
जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥
तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू॥3॥
भावार्थ-
मेरा तो करोड़ जन्मों तक यही हठ रहेगा कि या तो शिवजी को वरूँगी, नहीं तो कुमारी ही रहूँगी। स्वयं शिवजी (इष्टदेव) सौ बार कहें, तो भी नारदजी (गुरुदेव) के उपदेश को न छोड़ूँगी॥3॥
जैसे नचिकेता ने यमराज से कहा था - "मैं निर्धन रहना पसन्द करूँगा , मैं असुंदर रहना पसन्द करूँगा। मैं कोई भी पद पाए बिना रहने को तैयार हूँ पर मुझे आत्मा चाहिए ही चाहिए। मुझे आत्मा के रहस्य को समझना ही है।" ऐसी दृढ़ जिज्ञासा हो , दृढ़ इच्छा हो, उसके बाद श्रवण किया जाये।
किन्तु जब तक स्थूल देह-बुद्धि (M/F शरीर) है, मन है , इन्द्रियां हैं , तो जागते ही मन आ जायेगा , इन्द्रियाँ आ जायेंगी। जगत दिखने लग जायेगा।फिर भी यदि एक बारबुद्धि को यह समझ आ गयी - कि यह मेरा वर (आत्मा) नहीं है ! इनको मुझे बरना ही नहीं है। हैं बहुत अच्छे। परन्तु ये मेरे नहीं हो सकते। इनको मैं -'मेरा' बनाऊँगी ही नहीं। इनके साथ मेरा रिश्ता टिकेगा ही नहीं। पहले ही मालूम हो जाये की ये लड़का या लड़की मंगली है।पहले ही मालूम हो जाये कि इसके साथ मेरा रिश्ता ही नहीं टिकेगा। लड़की मंगली है तो लड़का गया। लड़का मंगला है , तो लड़की गयी। तो इनसे रिश्ता करने वाला ठीक-ठीक रहेगा न?लेकिन जिसकी बुद्धि ऐसी 'स्थित-प्रज्ञ ' नहीं हो सकी हो , फिरभी वे आजीवन अपनी बुद्धि को तीनों ऐषणाओं 3K में आसक्ति लगाए रखें , तो क्या वह 'मूढ़ बुद्धि' (इन्द्रिय विषयों में आसक्त बुद्धि) कामिनी-कांचन के भोग से कभी तृप्त हो सकेगी ? यदि विश्वास नहीं हो तो -करके देख लो। इसीलिए मीरा ने कहा -
"ऐसे वर को क्या वरु, जो जन्मे और मर जाये ।
वरीये गिरिधर लाल को, चूड़लो अमर हो जाये ॥"
आओ मेरी सखियो मुझे मेहँदी लगा दो ।
मेहँदी लगा दो, मुझे सुन्दर सजा दो ।
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ॥
सत्संग मे मेरी बात चलायी,
सतगुरु ने मेरी किन्ही रे सगाई
उनको बुला के हथलेवा तो करा दो,
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ॥1॥
ऐसी पहनी चूड़ी जो कबहू ना टूटे
ऐसा वरु दूल्हा जो कबहू ना छूटे
अटल सुहाग की बिंदिया लगा दो,
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ॥2॥
भक्ति का सुरमा मैं आँख मे लगाउंगी
दुनिया से नाता तोड़ मैं उनकी हो जाऊंगी
सतगुरु को बुला के फेरे तो करवा दो,
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ॥3॥
बाँध के घुंगरु मै उनको रिझाऊँगी
ले के इकतारा मै श्याम श्याम गाऊँगी
सतगुरु को बुला के बिदा तो करा दो,
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ॥4॥
("मूढ़ बुद्धि और शुद्ध बुद्धि" :इन्द्रिय विषयों में आसक्त बुद्धि को मूढ़ बुद्धि कहते हैं और बुद्धि से परे सिर्फ आत्मा में आसक्त बुद्धि ,यानि आत्मनिष्ठ बुद्धि या सत्यनिष्ठ बुद्धि को ही शुद्ध बुद्धि कह सकते हैं। Apparent I को मैं M/F समझने वाली, या स्वयं को देह समझने वाली -'देहोहं' (M/F आदम और हव्वा) समझने वाली बुद्धि नहीं !यानि वह अविवेकी बुद्धि नहीं , जो अभीतकसद्गुरु और शास्त्र (वचनामृत -गीता -उपनिषद आदि) से प्रेरित बुद्धि न बनकर स्वयं को (M/F आदम और हव्वा समझकर) 'सेव खाना' श्रेय है ? कि प्रेय है? इसीका निर्णय करने में समर्थ नहीं हो सकी है, वह बुद्धि नहीं - सद्गुरु से मंत्र-प्रेरित होने के बाद ("Real I "-अवतार वरिष्ठ के श्रीचरणों में प्रतिष्ठित)"तुम्हारी शुद्ध बुद्धि" क्या कहती है ? -कि तुम देहमन नहीं ब्रह्म हो ? आत्मा हो ? क्या हो ? अर्थात सद्गुरु से प्रेरित होने के बाद ("Real I "-अवतार वरिष्ठ के श्रीचरणों में प्रतिष्ठित) "तुम्हारी बुद्धि" क्या कहती है ? -कि तुम देहमन नहीं ब्रह्म हो ? आत्मा हो ? क्या हो ?
[#नारद मुनि- हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक माने गये हैं। ये भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक माने जाते है।ये स्वयं वैष्णव हैं और वैष्णवों के परमाचार्य तथा मार्गदर्शक हैं। ये प्रत्येक युग में भगवान की भक्ति और उनकी महिमा का विस्तार करते हुए लोक-कल्याण के लिए सर्वदा सर्वत्र विचरण किया करते हैं। भक्ति तथा संकीर्तन के ये आद्य-आचार्य हैं। इनकी वीणा भगवन जप 'महती' के नाम से विख्यात है। उससे 'नारायण-नारायण' की ध्वनि निकलती रहती है। इनकी गति अव्याहत (त्रिकाल अबाधित) है।ये ब्रह्म-मुहूर्त में सभी जीवों के मन और बुद्धि की गति देखते हैं और अजर-अमर हैं। भगवद-भक्ति की स्थापना तथा प्रचार के लिए ही इनका आविर्भाव हुआ है।उन्होंने कठिन तपस्या से ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया है।देवर्षि नारद धर्म के प्रचार तथा लोक-कल्याण हेतु सदैव प्रयत्नशील रहते हैं। इसी कारण सभी युगों में, सब लोकों में, समस्त विद्याओं में, समाज के सभी वर्गो में नारद जी का सदा से प्रवेश रहा है। मात्र देवताओं ने ही नहीं, वरन् दानवों ने भी उन्हें सदैव आदर दिया है। समय-समय पर सभी ने उनसे परामर्श लिया है।]
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6."जीते जी मुक्ति " का रहस्य ! / #paramvani / भक्ति, ज्ञान और कर्म का सिद्धांत !
7. जगत में ब्रह्मज्ञानी का व्यवहार : #paramvani / संसार में रहते हुए भी मुक्त कैसे ?
8. संसार में रहकर मुक्त रहना ही सच्ची साधना है ! #paramvani / मुक्ति कहीं जाने में नहीं, जानने में है !
9. अविद्या ही देहाभिमान की जड़ है ! #paramvani / खुद को देह मानने की भूल...
10. How do we know we have reached enlightenment? —Swami Sarvadevananda