कुल पेज दृश्य

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

वेदान्त का अधिकारी कौन है ? Who is qualified to study Vedanta?

1. वेदान्त का अधिकारी कौन है ? - अहं , इदं , त्वम् की गम नहीं जहाँ पर ! वहाँ सिर्फ चैतन्य है। जितने परिवर्तन होते हैं -वे सब 'मैं ' में , मुझमें माने मन में। मझमें माने अहंकार में , जगना-सोना अहंकार में , होता है। वास्तविक मुझमें real "I" कोई परिवर्तन नहीं होता। 

2. माया से कैसे बचें

जो मिलता है , वो भाता नहीं। जो भाता है , वो रहता नहीं। जिसको जो मिला है , वो पूरा नहीं। जो मिला है , वो हमारे लिए पर्याप्त नहीं , इसलिए और चाहिये। और जो मिलता है , वो भी बेकार हो जाता है।  किसी में प्रियता टिकती नहीं है। पहले दिन बेटा जितना प्यारा लगा था , अब उतना प्यारा नहीं है। गुरु पहले दिन जितने अच्छे लगे थे , अब थोड़ा कम लगते हैं। Personality का प्रेम चमड़ी का प्रेम है , फिर बुढ़ापा आ जाता है। जवानी का प्यार होता है -कोई चमड़ी का कोई दमड़ी का। द्वैत में भोग है। द्वैत चाहे सांसारिक हो , या आध्यात्मिक हो - चाहे भक्ति हो , चाहे विषय हो। इसलिए भक्त मोक्ष भी नहीं चाहता। सेवक -सेव्य रहे , भक्त-भगवान रहे। दर्शन से भोग हो गया। दर्शन-से मोक्ष नहीं होता। प्रियता का सुख-दुःख मिलता है। जहाँ दूसरा है , बंधन है , भोग है। जहाँ दूसरा नहीं है , वहाँ मोक्ष है। दो प्रकार को दृष्टि/ बुद्धि / मति - द्वैत दृष्टि और अद्वैत दृष्टि। द्वैत वासना -अद्वैत वासना। कोई सन्त ही जानते हैं -इस धूर्त मन की चाल को। अपनी ही बुद्धि , अपना ही मन कैसे गुमराह/ पथभ्रष्ट / mislead करता है, कोई समझ नहीं पाता। आपके दुःख का कारण यदि बुद्धि न समझ पाए , तो इससे जायदा न समझी क्या होगी ? जैसे आप पड़ोसी से बात करते हैं , वैसे अपने मन -बुद्धि से, अहंकार से बात करो ! तुम वहाँ क्यों जाते हो ? क्या मिला ? मन से बातचीत नहीं होती। मेरा मन, मेरा यंत्र हैं यही हम भूल गए हैं - मन और हम एक हो गए हैं। इतनी दोस्ती की भिन्नता ही मालूम नहीं पड़ती। विषयों में जो सुख है यही माया है। विषय बंधन में नहीं डालते , उसमे जो सुख का आभास है , वो बंधन है। रूप, रस , गंध , शब्द और स्पर्श एक विषय जिसमें फंसा जीव नष्ट हो जाता है। अली-मृग-मीन -पतंग गज -तो मनुष्य के तो पाँच इन्द्रिय हैं ? मुख्य विषय एक है -स्पर्श ! रूप भी उसी का  जीववभाव , M/F आदम और हव्वा का आकर्षण। एक मात्र इस स्पर्श सुख को छोड़ दिया तो लक्ष्य मिल गया। यही बंधन का जड़ है। काम का सुख ही सबसे गहरा सुख है। 'काम' छोड़ने का सुख स्वर्ग की प्राप्ति है। जैसे पाने -कामिनी भोगने सुख आपको मालूम है , वैसे छोड़ने का सुख मालूम पड़ जाए। फिर अद्वैत सुलभ हो जायेगा। क्योंकि हमें आत्मसुख भी मालूम है , काम-सुख भी मालूम है।बंधन भी सुख मालूम पड़ता है ? तभी तो कहते हैं - " प्रेम के बंधन में -विवाह के बंधन में बंधने जा रहे हैं।" बंधन भी कहते हैं , और अच्छा भी मानते हैं। 5 kg सोना गले में लटका कर 2 km जाओ , सोना तुम्हारा। कितने लोग जाने को तैयार नहीं होंगे ? साधु के लिए , पत्थर , मिट्टी और सोना बराबर। साधु को भी सोने की कीमत मालूम है। साधु सुख-दुःख , मान-अपमान को बराबर क्यों समझता है ? वो जानता है -मान भी अहंकार बढ़ाकर बाँधने वाला है। मान ही अपमान कराता है। अभी मिथ्या अहंकार (M/F) भाव को हम दुःख नहीं समझते। मनुष्य ने पशुओं से ज्यादा भौतिक सुख-सुविधा जुटाई है , पर सुखी नहीं हुआ। (31:00 मिनट

पहले तलाक प्रथा नहीं थी तो क्या स्त्रियाँ पराधीनता का दुःख अधिक भोगती थीं ? दयालु नेताओं ने स्त्रियों के कष्ट को दूर करने के लिए तलाक की सुविधा दे दी ? ताकि अब गुलामी और डण्डे के जोर पर उनको गुलामी से बचाकर स्वतंत्र कर दिया। पर अब स्वतंत्रता का भी दुःख हो रहा है। कोई जानवर तलाक से परेशान नहीं हुआ , मनुष्यों में ही ये रोग लगा है। अभी विवाह होना समस्या है , फिर विवाह न होना समस्या हो जायेगा। विदेशों में विवाह समस्या है। विवाह को लोग अब झंझट समझ रहे हैं। ये सब दुःख मनुष्य पैदा करता है। पर मूल दुःख तो अज्ञान से है , इसी क्षण मैं कौन हूँ, मैं क्या हूँ , जीव क्या है , जगत क्या है यह विवेक-विचार निरंतर चलते रहना चाहिए ? इस सबको और स्वयं को आत्मा (ईश्वर, इष्टदेव, ब्रह्म , सच्चिदानन्द की लीला शक्ति) न समझकर मेरा भाई , मेरी पत्नी , मेरा बेटा, मेरी दाई -नौकर , पड़ोसी , मित्र-शत्रु , अपना -पराया समझने से है। मूल समस्या स्वयं को चैतन्य आत्मा सच्चिदानन्द न मानकर,  M/F जीव होने के अहंकार को को चैतन्य (आत्मा)  और जड़ (बुद्धि) की गाँठ यह शरीर M/F मान लेने के कारण , आत्मा को भी शरीर की तरह पैदा होने वाला -मरने वाला मान लेने के कारण है। और मूल दुःख तो अज्ञान (अविद्या माया) नित्य आत्मा का अनित्य प्रकृति से संयुक्त हो जाने के कारण है। जड़ प्रकृति (जड़ बुद्धि) ने आत्मा (चैतन्य आत्मा) को आबद्ध कैसे कर लिया ? 3K की कामना में भोग में सुख होगा - इस मोह में मोहित कर दिया - चौतन्य आत्मा या ब्रह्म मोहित हो गया ? भगवान कृष्ण भी इसको बोलते हैं, कि ये मेरी माया है। "दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया" (Daivi hyesha gunamayi mama maya duratyaya) श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 7, श्लोक 14) का एक प्रसिद्ध श्लोक है, जिसका अर्थ है कि "यह मेरी (ईश्वर की) दिव्य, त्रिगुणमयी (सत्त्व, रज, तम) माया बड़ी दुरत्यय (जिससे पार पाना कठिन है) है, लेकिन जो केवल मेरी ही शरण में आते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं। 

(32:43) माया मेरी प्रकृति है - अर्थात मेरी पत्नी है वो ! पर ये प्रकृति (माँ काली ? त्रिगुणात्मक माया) ऐसा जाल रचती है कि ये अपने बेटों को ही फँसाती है। अपने पुत्रों को ये जन्म देती है , संसार में फँसायें रखती है। (बेटा को खूब सुंदर पत्नी मिले इसकी चेष्टा करती है ?) अपने से पार नहीं जाने देती , बाप तक नहीं जाने देती। अपने पिता (परमात्मा-ठाकुर) तक नहीं जाने देती। अपने पेट में रखती है , अपने गोद में रखती है। अपने पैदा करती है , अपने दूध पिलाती है , अपने पालती- पोषती है। अपने मारती भी है। ये खुद ही पैदा करती है , खुद ही खा जाती है। (ठाकुर ने यह स्पष्ट देखा था ? मैंने सुना है , पढ़ी हुई बात है , मैंने देखा नहीं है। पर सुना है सभी माताओं में एक 'सांपनी' (अजगर) ऐसी होती है , जो अपने बच्चों को भी खा जाती है। ये माया भी वैसी ही है - खुद ही पैदा करती है , खुद ही खा भी जाती है। एक को भी नहीं बचाती। अब तुम बताओ - पैदा होने की ख़ुशी हुई। अब मरने में भी ख़ुशी होगी क्या ? पैदा माया ने किया , तो बुढ़ापा किसको आएगा ? जिस प्रकृति ने जन्म दिया , वही दुखी कर रही है। अब इस प्रकृति को कौन पार करेगा ? माया के पार कौन जायेगा ? तो भगवान ने कहा - मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।7.14।। हम अपने चैतन्य आत्म-स्वरूप को, real "I" को भूलकर संसारी जीवभाव (M/F) को प्राप्त हो गये हैं। रोग तथा उपचार को बताकर भगवान् श्रीकृष्ण पूर्ण स्वास्थ्य का आश्वासन भी देते हैं। जो साधक मेरी शरण में आते हैं, अर्थात सत्य की शरण में जाते हैं (सत्य की सुमिरण में जाते हैं , इन्द्रियातीत सत्य की शरण -इष्टदेव नाम सुमिरण की शरण जाते हैं।) वे माया को तर जाते हैं। माया के पार चले जाते हैं। बाकि तो इसी माया के चँगुल फँसे हुए हैं -इसीके कहे पर चलते रहते हैं। माया जैसा नचाती है , वैसा नाचते हैं; इसका मतलब समझते हो ? जिस M/F शरीर में इन्द्रियों ने सुख दिखाया , प्रकृति ने जहाँ सुख दिखाया , वहीं जा रहे हैं , वहीं खा रहे हैं। प्रकृति के इशारे पर गुणों के इसारे पर नाचते जा रहे हो  भगवान की शक्ति (माया) से निकलना बहुत मुश्किल है, पर ईश्वर (इष्टदेव या आत्मा) पर पूर्ण विश्वास और शरणागति से ही यह संभव है।  भगवान की शरण में जाने से तात्पर्य भगवान् (इष्टदेव) के स्वरूप- नाम को गुरुमुख से श्रवण करके उन्हें पहचान कर तत्स्वरूप बन जाना है।   

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।

निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्।।2.45।।

।।2.45।। वेद तीनों गुणोंके कार्यका ही वर्णन करनेवाले हैं; हे अर्जुन! तू तीनों गुणोंसे रहित हो जा, निर्द्वन्द्व हो जा, निरन्तर नित्य वस्तु परमात्मा में स्थित हो जा, योग-क्षेमकी चाहना भी मत रख और आत्मस्वरूप (इष्टदेव) में प्रतिष्ठित हो जा। इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में त्रिगुणों के ऊपर उठकर असीम आनन्द में स्थित होने की साधना बतायी गयी है। 

ज्ञान, क्रिया और निष्क्रियता ये क्रमश सत्त्व रज और तमोगुण के लक्षण हैं। परस्पर भिन्न एवं विपरीत लक्षणों वाले सुख-दुख, शीत-उष्ण, लाभ-हानि, जय -पराजय इत्यादि जीवन के द्वन्द्वात्मक अनुभव हैं। इन सब में समभाव में रहने का अर्थ ही निर्द्वन्द्व होना ही इनसे मुक्त होना है।

मोह का अर्थ है वस्तु (आत्मा) को यथार्थ रूप में न पहचानना (M/F आवरण) को ही सत्य समझ लेना। जिसके कारण वस्तु (आत्मा) का अनुभव किसी अन्य रूप (भाई , पत्नी , पुत्र , बहन , बहनोई के रूप में ) ही होता है।  जिसे विक्षेप कहते हैं और जिसका परिणाम है शोक। अत सत्वगुण में स्थित होने का अर्थ विवेकज-ज्ञान जनित शान्ति में स्थित होना है। सत्त्व में स्थित रहने  के लिए सतत् सजग प्रयत्न की अपेक्षा है। 'निर्योगक्षेम' में यहाँ योग का अर्थ है अप्राप्त वस्तु को प्राप्त करना। और प्राप्त वस्तु के रक्षण का नाम है क्षेम। मनुष्य के सभी प्रयत्न योग और क्षेम के लिये होते हैं।

अत इन दो शब्दों में विश्व के सभी प्राणियों के कर्म समाविष्ट हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अहंकार (M/F) और स्वार्थ-बुद्धि से प्रेरित कर्मों का निर्देश योग और क्षेम के द्वारा किया गया है। मनुष्य की चिन्ताओं और विक्षेपों का कारण भी ये दो ही हैं। निर्योग-क्षेम बनने का अर्थ है इन दोनों को त्याग देना जिससे चिन्ताओं से मुक्ति तत्काल ही मिलती हैं।  साधक के लिये तत्त्वज्ञान का उपयोग तभी है जब इस ज्ञान को जीवन में उतारने की व्यावहारिक विधि का भी उपदेश दिया गया हो। इस श्लोक में ऐसी विधि का निर्देश आत्मवान भव अर्जुन इन शब्दों में किया गया है। जब हमारी मति, बुद्धि या दृष्टि का तादात्म्य - रथी आत्मा के साथ न होकर (रथ) शरीर (लगाम) मन और (सारथि ) बुद्धि के साथ होकर अहंकार (M/F) और स्वार्थ की अधिकता होती है, केवल उसी देहाध्यास से बुद्धि या मति जुड़ने पर ही  सुख-दुःख तथा द्वन्द्वों तथा योगक्षेम के कारण उत्पन्न दुख और पीड़ा केवल तभी सताते हैं । इन अनात्म उपाधियों (M/F आदम और हव्वा ) के साथ विद्यमान तादात्म्य को छोड़कर इनसे भिन्न अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप real "I"  के प्रति सतत जागरूक रहने का अभ्यास ही आत्मवान अर्थात् आत्मस्वरूप में स्थित होने का उपाय है। इसकी सिद्धि होने पर अहंकार नष्ट हो जाता है और वह साधक त्रिगुणों के परे आत्मा में स्थित हो जाता है। ऐसे सिद्ध पुरुष को वेदों का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। वास्तव में ज्ञानी पुरुष के होने के कारण वेद-वाक्यों (महावाक्यों) का प्रामाण्य सिद्ध होता है(34:54)  

गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते।।3.28।। ये गुण ही गुणों में फँसाये रखते हैं , पर अविवेकी जीव ये समझता ही नहीं। जीव माया के भ्रम में फँसा है। जैसे स्वप्न में सुख-दुःख सब सच मालूम पड़ता है। नींद खुलने पर झूठा लगता है। ऐसे ही प्रकृति जो दिखा रही है , सो हम देख रहे हैं। जो करा रही है हम कर रहे हैं। प्रकृति जो जना रही है , वही जान रहे हैं। हम जान रहे हैं , हम पैदा हुए हैं। हम जान रहे हैं , हम मर जायेंगे। हम -बुद्धि जान रहे हैं , छोटे हैं या बड़े हैं। हम ये जानेंगे ही नहीं। आत्मा सदा अलेप है। आत्मज्ञानी - ब्रह्मवेत्ता सदा निर्लेप रहता है। लेकिन हमारी मूढ़ बुद्धि अपने को निर्लिप्त नहीं लिप्त समझती है। मोक्ष (जीवनमुक्ति क्या है ?) लिप्त न होना। ब्रह्मज्ञानी क्या पाता है ? सुख-दुःख भी नहीं पाता। आत्मज्ञानी न सुख से लिप्त होता है , न दुःख से। आत्मज्ञानी को सुख-दुःख स्पर्श नहीं करते। 

    जैसे कमल का पत्ता पानी में अलेप रहता है। इसका मतलब ज्ञानी सुख-दुःख से प्रभावित नहीं होता। इसीको मुक्त होना कहते हैं। अभी हम सुख -दुःख, मान -अपमान, लाभ-हानि से भी लिप्त हो जाते हैं। जय-पराजय , जन्म-मृत्यु से भी प्रभावित हो जाते हैं। ब्रह्मज्ञानी या आत्मज्ञानी प्रभावित नहीं होता। यही उसका आत्मवान होना है। हमलोग तो सुख-दुःख से प्रभावित होकर ही कर्म करते हैं। पुण्य करते हो स्वर्ग जाने के लिए ? जो कुछ अभी हम करते हैं - कुछ (3K में कामिनी-कांचन या नाम-यश) मिलने के लिए ! हम कूटस्थ रहें -हम पर कोई प्रभाव न पड़े। तो आत्मवान होना ही होगा। हम पर किसी भी खबर का कोई प्रभाव न पड़े। धन के लाभ-हानि का, जन्म का मृत्यु का , मिलने का बिछुड़ने का। मान-अपमान का हम पर कोई प्रभाव न पड़े। ऐसा हम सोचते ही नहीं हैं। न अपमान से डरें , न मान के लिए दौड़ें। हम दुःख से प्रभावित ही नहीं होना चाहते - ये हम सोचते ही नहीं हैं। इस प्रकार बन्धनों से मुक्त हुआ ज्ञानी पुरुष एक सच्चे खिलाड़ी के समान कार्य करता है जिसका आनन्द केवल खेल में ही हैं अंक जीतने में नहीं। 

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः।

एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ २॥

     - ईशावास्योपनिषद्

तूँ 100 वर्ष तक कर्म करते हुए जीने की इच्छा कर। तुम में कर्म का बंधन न होगा। अज्ञानता के कारण अपने को दास मानकर कर्म नहीं करने से , अहंकर्ता होकर कर्म करने से ही कर्म बाँधता है। इसलिए वेदांत -कर्तापन या भोक्तापन की भ्रान्ति कहता है। आत्मा साक्षी है - मूढ़बुद्धि / शुद्ध मति/ ज्ञानमयी दृष्टि - जगत को ब्रह्ममय देखने में समर्थ दृष्टि ,जैसी होगी , वैसी गति होगी। स्वयं को कर्ता (उपाधि से तादात्म्य पति- भाई- पार्टनर) समझने की भ्रान्ति तुम्हें कर्म में लिप्त करती है। और दिनरात इसी भ्रान्ति में लिप्त रहने में तुम लगे हुए हो। मुझे लाभ-हानि के ख्याल से छुटकारा मिल जाये। मान -अपमान का पता ही न चले। जन्म और मृत्यु के ख्याल से छुटकारा मिल जाये। बड़ा- छोटा होने की मनोग्रंथि से (Complex-अहंकार से) छुटकारा मिल जाये (तो देह-बुद्ध्या दासो अहं कह ! अभी तो हम मान-अपमान में अहं-भाव निर्मित करने में लगे हैं। हम असल में गाँठों (M/F) उपाधि में जीते हैं , अस्तित्व में नहीं। रुमाल अस्तित्व है , M/F नाते -रिश्ते गाँठ है। कपड़ा (आत्मा) गाँठे बनकर जिए। एक गाँठ कहे मैं छोटी हूँ , दूसरी कहे मैं बड़ी हूँ। यही है गाँठ ! गाँठें तो कई हैं - कपड़ा कितना है ? यदि कपड़ा एक ही है -तो तुलना किससे करेगा ? छोटा -बड़ा घड़ा है , मिट्टी तो एक है। मिट्टी घड़े का अस्तित्व है - नाम-रूप छोटा बड़ा घड़ा है। निर्ग्रन्थि हो जाएँ। ग्रंथि मुक्त हो जाएँ। लहर छोटी या बड़ी हो। बने और मिटे पर पानी तो हमेशा रहता है। तुम आत्मा के सिवा -कोई व्यक्ति (individual -M/F) ही नहीं हो। इसलिए अद्वैत है उपाय। द्वैत है गाँठ। हम द्वैत में ही जीते रहते हैं। आज है परिचय - तीन दिन पढाई होगी। उसी दिन -चौथे दिन परीक्षा भी ले लेंगे। बीच बीच में परीक्षा की तैयारी भी।

    आँख और कान तुम्हारे यंत्र हैं - वे देखने और सुनने में स्वतंत्र नहीं हैं। तुम्हारा होना जरुरी है। तुम सोये हो , आँख नहीं देख सकते। तुम नहीं हो - यदि मर गए हो , तो तुम्हारे शरीर को इसकी कोई चिंता नहीं है। तुम coma या प्रगाढ़ बेहोशी की अवस्था में हो , इसको कोई मार डाले। कोई चिंता इसको नहीं है। शरीर नहीं डरता। इन्द्रियों को कोई चीज या विषय नहीं चाहिए। विषयों का भोक्ता न अकेली इन्द्रियाँ हैं , न आत्मा। मूढ़बुद्धि से युक्त होने के बाद हो अहंकार जगता है। चेतन आत्मा और जड़ बुद्धि -जब मिले 'चिज्जड़ग्रंथि' बन गयी। यही भोक्ता पना है , यही सुख-दुःख है। आंख और चेतन आत्मा यदि न मिले तो आंख को विषयों में आसक्ति है  न चेतन को विषयों में आसक्ति है। सारथि बुद्धि यदि देह-इन्द्रियों से मिल जाये तो रथी आत्मा लक्ष्य से भटक जायेगा। एक बार चावल को धान से अलग कर दो - फिर पौधा नहीं होगा। एक बार आत्मा को जड़ बुद्धि / मति / दृष्टि से अलग कर दिया जाये , तो जन्म -मरण , सुख -दुःख के भ्रम टूट जायेंगे। जब तक जड़ शरीर (M/F-जीव बुद्धि) से तादात्म्य बना हुआ है , तभी तक कर्ता हो भोक्ता हो। तभी तक सारे बंधन हैं। इसलिए चिज्जड़ ग्रंथि का भेदन कैसा करना है - इसे गुरु से श्रवण-मनन -निदिध्यासन में सीखो। कठिन है क्योंकि लोग विवेक-वैराग्य नहीं चाहते , आसन इसलिए है कि विधिवत आगे बढ़ने से एक क्षण में विवेकज-ज्ञान हो जाता है। यदि ब्रह्मानुभूति , आत्मानुभूति हो जाये तो समझो कि तुम्हारा सितारा चमक गया। ॐ शांति , शांति ,शांति ! (44 :42)                  

मनुष्य को सौ वर्षों तक कर्म करते हुए ही जीने की इच्छा करनी चाहिए, क्योंकि हे मानव - तेरे लिए इस मार्ग के अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं है। यदि तू ऐसे ही कर्म करता है (निष्काम भाव से), तो कर्म तुझसे चिपकता नहीं, अर्थात् तुझे बन्धन में नहीं डालता।  जिस प्रकार कमल का पत्ता जल में रहते हुए भी जल से अछूता रहता है, उसी प्रकार निष्कामी कर्मी भी संसार में रहते हुए कर्म से लिप्त नहीं होता।

===========

🔴 LIVE | Day 03 | श्रीरामकृष्ण विश्व सद्भावना निकेतन | लोकार्पण एवं प्राणप्रतिष्ठा | 19 जनवरी 2026

गृहस्थ जीवन का क्या आदर्श है ? 

 ब्रह्मनिष्ठो  गृहस्थ: स्यात्  ब्रह्मज्ञानपरायण:।

यत यत कर्म प्रकुर्वीत तद् ब्रम्हणि समर्पयेत्।।

      गृहस्थ को ब्रह्मनिष्ठ होना चाहिए तथा ब्रह्म ज्ञान का लाभ ही उसके जीवन का चरम लक्ष्य होना चाहिए। परंतु फिर भी उसे निरंतर अपने सब कर्म करते रहना चाहिए - अपने कर्तव्यों का पालन करते रहना चाहिए, और अपने समस्त कर्मों के फलों को ईश्वर के चरणों में समर्पित करना  चाहिए।  

        कर्म करके कर्मफल की आकांक्षा न करना, किसी मनुष्य की सहायता करके उसे किसी प्रकार की कृतज्ञता की आशा न रखना, कोई सत्कर्म करके भी इस बात की ओर नजर तक न देना कि वह हमें यश और कीर्ति देगा अथवा नहीं, इस संसार में सबसे कठिन बात है।

  संसार जब तारीफ करने लगता है, तब एक निहायत बुजदिल भी बहादुर बन जाता है। समाज के समर्थन तथा प्रशंसा से एक मूर्ख भी वीरोचित कार्य कर सकता है; परंतु अपने आसपास के लोगों की निंदा- स्तुति की बिल्कुल परवाह न करते हुए सर्वदा सत्य कार्य में लगे रहना वास्तव में सबसे बड़ा त्याग है। [गृहस्थ हो या संन्यासी - "हरेक अपने क्षेत्र में महान है। " (खण्ड -३ /१७) में] 


(3:38:33) विषय है - "श्री सारदा देवी , उनका दिव्य जीवन और उनका सन्देश।" चार अन्य विद्वान् और अनुभवी वक्ताओं को आपने सुना। वे केवल बुद्धि द्वारा नहीं , अपनी स्मरण शक्ति का केवल उपयोग करके नहीं। उसका उपयोग तो खैर करना ही पड़ता है। माँ का जीवन उनके अपने ह्रदय के भीतर कितना प्रविष्ट हुआ है , उनकी बातों को कहते समय वे अपने के भावों को ह्रदय की भावुकता के साथ प्रकट कर रहे थे। जब हम माँ का जीवन चरित्र सुन रहे थे , तो माँ के जीवन के माध्यम से , हम ठाकुर जी को भी समझ रहे हैं। और स्वामी विवेकानन्द जी को भी सुन रहे हैं। तीनों विभूतियों का जीवन एक ही है। ये हम अनुभव कर रहे हैं। महापुरुषों के जीवन की दिव्यता स्वतः प्रमाणित है। वे हमारे ह्रदय को स्पर्श करती है। क्योंकि उनकी दिव्यता सहज और स्वाभाविक होती है। जैसे हम अनेक रूपों में देवी की पूजा करते हैं। सभी रूपों में प्रकृति , सृष्टि और मातृशक्ति की जो बात है , माँ की कृपा करुणा हमलोगों तक पहुँचती है। हम सन्तानों के प्रति माँ का प्रेम। माँ चाहती हैं कि उनकी सन्तान सुख में रहे, आनन्द में रहे और आगे बढ़े। पुत्र कैसा भी हो , माँ का प्रेम उसके प्रति हमेशा बना रहता है।  (https://www.facebook.com/groups/925716234695876/posts/1965143047419851/)

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति, 

सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं

तव सुतः।

मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव, 

शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता

न भवति॥३॥  

अर्थात: माँ ! इस पृथ्वी पर तुम्हारे सीधे सादे पुत्र तो बहुत से हैं।  किन्तु उन सब में ही अत्यंत चपल तुम्हारा बालक हूँ। मेरे जैसे चंचल कोई बिडला ही होगा। शिवे ! मेरा जो यह त्याग हुआ है,यह तुम्हारे लिए कदापि उचित नहीं है। क्योंकि संसार में कुपुत्र का होना संभव है किन्तु माता कभी कुमाता नहीं हो सकती।"

माता का कभी कुमाता होना सम्भव नहीं है। और ये माँ श्री सारदा देवी तो संघ -जननी हैं। और हम सभी भक्तो की भी जननी है , क्योंकि हम संघ के अटूट अंग हैं। संघ से एकाकार हुए हैं। और आप सभी दीक्षित भक्त लोग रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन के अभिन्न अंग हैं। (विवेकानन्द युवा महामण्डल में दीक्षा लेना अनिवार्य न होते हुए भी, संघ के अटूट अंग हैं ? हम जैसे संन्यासी  संघ की कृपा से हम उससे अलग नहीं हैं। उसी प्रकार आप भक्त लोग भी संघ के अभिन्न अंग हैं। और ठाकुर , माँ स्वामीजी की कृपा के पात्र हैं। इसलिए श्रीरामकृष्ण देव , श्री माँ और स्वामी विवेकानन्द इस संघ के माध्यम से , हम सबके ऊपर कृपा वर्षण कर रहे हैं। इसका स्पष्ट आभास शायद हर समय हमें न होता हो , क्योंकि उतनी क्षमता या योग्यता हममें नहीं है। उस योग्यता (विवेक) का विकास जितनी गति से और जितनी मात्रा में होनी चाहिए , उस मात्रा में शायद न हो। लेकिन माँ का प्रेम सन्तानों के लिए एकतरफा प्रेम होती है। माँ की कृपा का वैशिष्ट्य यह है कि वो एकतरफा होती है। पुत्र , सन्तान,  बच्चा माँ को चाहे न चाहे। माँ की कृपा का अनुभव , उनका प्रभाव क्या होता है , पुत्र न समझ पाए , हो सकता है। लेकिन माँ उसकी अपेक्षा नहीं करती हैं। उनका प्रेम एकतरफा होता है , क्योंकि वह सृष्टि की बात है। (3:46:00) सन्तान माता से बहुत प्रेम करता है। जब माता आँखों के सामने नहीं होती है , तो उसे सब तरफ अँधेरा दीखता है। वो माँ , माँ करके रोता है। लेकिन यह अवस्था बालक की होती है , जब वो छोटा होता है। श्रीरामकृष्ण देव ने बड़ा सुंदर उदाहरण दिया है , कि माँ किंवाड़ के पीछे छिपी हुई है , और बच्चा माँ को देख नहीं पाता।  चारों तरफ , इधर-उधर खोजता है , माँ कहीं दिखाई नहीं दे रही है। तो उसको रोना आ जाता है , और उसकी आँखों से अश्रु गिरने लगते हैं। जोर से रोने लगता है , तो अबतक जो माँ दरवाजे के पीछे छिपी हुई है , वो सामने आती है। और उस बालक को या बालिका को ऊपर उठा लेती है। उसे चूमते हुए अपने प्रेम को दर्शाती हैं। तो जब माँ को इतना प्रेम है , तो उसकी आँखों से ओझल होने की आवश्यकता ही क्या है ? कोई जरुरी नहीं है। लेकिन वो माता का प्रेम है , उसे मालूम है कि मेरे बिना मेरी सन्तान नहीं रह सकती है। उसको परीक्षा लेने की भी आवश्यकता नहीं है , परखने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन फिर भी वे परीक्षा लेती हैं। क्योंकि परीक्षा उसका पुत्र के प्रति प्रेम है , पुत्र का उसका प्रति प्रेम है - उसका अनुभव वो बार -बार करना चाहती है। इसलिए माँ थोड़ा सा परेशान करती हैं हमें। उनकी इच्छा कष्ट देने की नहीं है , हमें परेशान करने की नहीं है। मेरे बिना मेरी सन्तान एक क्षण भी नहीं रह सकती है , उस आनंद का अनुभव करने के लिए छिपती है। वही बालक जब बड़ा होता है। माता-पिता के प्रति दुर्व्यवहार करता है। और वह माँ के प्रेम को भूल जाता है। जो बच्चा माँ के बिना कुछ पल भी नहीं रह सकता था। और वही माँ मानो है ही नहीं , इस प्रकार से आचरण करता है। अपनी माँ के पास कुछ पल भी बैठ नहीं सकता। माँ से बात करने के लिए समय नहीं है , बाकि सब चीजों के लिए समय है। बाकि सबको अपना कर्तव्य और महत्वपूर्ण बात समझता है।  लेकिन जिस माँ ने उसका प्रेम से पालन-पोषण किया, उसकी याद उसका महत्व अब उसे याद नहीं आता। माँ से बात करने का समय नहीं रहता। लेकिन हमारी जो माँ जगदम्बा हैं , उन्होंने अपने संसार को छोड़ दिया , अपने मर्त्य शरीर को त्याग दिया। कई साल हो गए , लेकिन हम अब भी माँ को भूल नहीं पाए हैं , और न कभी भूल सकेंगे। क्योंकि उनकी कृपा का जो प्रवाह है , वह बिना रुके चल रहा है। और इसका अनुभव सभी भक्तों को होता है। समय कोई बाधा ही नहीं है। वैसे शास्त्र कहता है कि सब चीजें समय से बाधित होती हैं (3: 50:28) इसीलिए कहा जाता है - कालाय तस्मै नमः ! (Kalaya Tasmai Namah) अर्थात  उस काल (समय या मृत्यु) को  लिए नमस्कार है या "उस काल को प्रणाम" है, जो समय की परम शक्ति और अपरिवर्तनीयता को दर्शाता है। यह वाक्यांश भर्तृहरि के प्रसिद्ध ग्रंथ वैराग्य शतक (Vairagya Shatakam) के श्लोकों में पाया जाता है, जहाँ यह दुनिया की नश्वरता और समय के प्रभाव का वर्णन करता है। यह बताता है कि समय सबसे शक्तिशाली है; कोई भी समय से ऊपर नहीं है। और समय सभी चीज़ों को बदल देता है, इसलिए हमें समय का सम्मान करना चाहिए और उसके प्रवाह को स्वीकार करना चाहिए। जब कोई राजा /व्यक्ति धन या पद के कारण पहले बहुत शक्तिशाली या घमंडी था लेकिन अब उसकी स्थिति बदल गई है या वह सामान्य हो गया है। तो इस वाक्यांश का उपयोग किया जाता है, यह दर्शाते हुए कि समय ने सब कुछ बदल दिया है। यह स्वीकार करता है कि समय (काल या मृत्यु) ही सब कुछ नियंत्रित करता है। सभी का परिवर्तन करता है, और जो कल शक्तिशाली था वह आज सामान्य हो सकता है, जो जीवन की क्षणभंगुरता और नियति को दर्शाता है।  ऐसा जो काल है - सब चीजों को बाधित करता है। व्यक्ति का महत्व कम हो जाता है , और लोग उसे भूल जाते हैं। लेकिन माँ की विस्मृति होना बहुत ही सामान्य बात है। माता-पिता को भूलना , दादा-दादी को भूलना , सबको भूल जाता है। कृतज्ञता का जो महान गुण हैं , उसको हम अपने जीवन में उतार नहीं पाते हैं। ये हमारी भूल है , और हमारे दुखों का एक प्रमुख कारण है। हम मनुष्यों में कृतज्ञता नहीं है। क्योंकि हममें अहंकार है (3K-पद और धन का अहंकार) हममें आसक्ति है। अनेक प्रकार की वासनाओं (3K में आसक्ति) ने हमारे जीवन में स्थान बना लिया है। इसीलिए वास्तव में जो हमारे अपने हैं , जिहोंने हम पर प्रेम वर्षण किया है -हमें सब कुछ माना है। (गुरुदेव और नवनीदा) माँ सारदा के लिए बच्चा तो आँख की पुतली होता है। एक समय में हम पर कितना प्रेम , वर्षण किया है , पर वह प्रेम हमें याद नहीं आता। पुरानी बात हो गयी है। (10 साल ?) लेकिन जो हमारी अपनी माँ नहीं हो , तो भी अपनी माँ से कई गुना अधिक प्रेम देने वाली हमारी जगतजननी है , जगदम्बा है। हमारी अपनी हो जाती है। क्यों ? क्योंकि उस प्रेम का रूप सम्पूर्णतया अलग है। वह प्रेम लौकिक नहीं है। वो प्रेम साधारण नहीं है , वो प्रेम दिव्य है। माँ का प्रेम बहुत अद्भुत चीज होती है। लेकिन उस प्रेम की दिव्यता का स्पर्श हम केवल इस प्रकार के अवतार पुरुष , भगवान जो स्वयं पुरुष देह धारण करके आते हैं। कभी स्त्री शरीर धारण करते हैं। (3:52:56) स्त्री शरीर और पुरुष शरीर अलग नहीं होते हैं। एक ही हैं!  इसलिए हमारी परम्परा में , अर्धनारीश्वर का भाव है। कैसे दिखाएंगे ? एक आधार में नारी भी है , नर भी है। शिव भी है शक्ति भी है। उसको कल्पना से चित्रित करना पड़ेगा। लेकिन जब हम श्री रामकृष्ण और श्री माँ का जीवन देखते हैं , और उसमें हम स्वामी विवेकानन्द को भी जोड़ देते हैं। तब हम देखते हैं इन त्रयी की मूर्ति का जो सार है , वो प्रेम है। इनके प्रेम में किसी प्रकार की लौकिकता नहीं है। लौकिक दीखता है, लेकिन प्रेम अलौकिक है।  भोजन के बाद जो पान का बीड़ा माँ बनाती हैं , वो अपने सन्तानों के लिए अलग बनाती हैं। भक्त सन्तानों के लिए अलग बनाती हैं। उसका कारण भी देती हैं। ये तो अपने ही हैं , उनको तो अपना बनाना है। ये तो लैकिक बात है , सब जानते हैं। इसमें कौन सी अलौकिकता है ? सब माँ जानती है -अपना बच्चा अपना होता है , पराया बच्चा पराया होता है। लेकिन माँ का प्रेम के पीछे उसके जो संन्यासी संतान हैं उनके लिए थोड़ा ज्यादा प्रेम है, और गृहस्थ भक्तों के लिए कम है , ऐसी बात नहीं है। लेकिन माँ का जो व्यवहार है , उस व्यवहार में भी मधुरता है। ये जो व्यावहारिक दिव्यता (Practical divinityहै, उसका वर्णन चारो वक्ताओं ने उसका वर्णन स्वयं को भूल कर किया है। माता जी के दिव्य जीवन की इतने प्रसंग बताये हैं , श्रीरामकृष्ण के जीवन में व्यावहारिक दिव्यता के कितने ही प्रसंग हैं। एक प्रसंग हमारे जीवन को पवित्र बनाता है , हमें पावन करता है। स्वामी विवेकानन्द जी के जीवन में भी कितने ऐसे प्रसंग हैं , जिनको हम जब पढ़ते हैं , तो हमारे जीवन में विकास होता है , हमारा जीवन उन्नत होता है। स्वामी जी के जीवन में उनकी व्यावहारिक दिव्यता को देखने से , हमारे विचारों में पवित्रता आती है।  हमारी बुद्धि में (दृष्टिकोण या मति में) शुद्धता आती है। पवित्र जीवन जीने के लिए जो प्रेरणा चाहिए , बल चाहिए , वह शक्ति हमें प्राप्त होती है। आज हमने इन वक्ताओं के मुख से जितनी घटनाओं को सुना - वो हमें अनेक किताबों से पढ़कर मालूम थीं। 'शतरूपे सारदा ' कृपा करने के लिए 'माँ सारदा के सैकड़ों रूप हैं !' आदि के बारे में जब हम सुनते हैं , तो अलग आनंद होता है। लेकिन वह आनन्द हमारे मानव जीवन को धन्य बनाने वाली हैं। हमें कृत-कृत्य और कृतार्थ बनाने वाली बात है। क्योंकि अवतार पुरुषों का जन्म साधारण नहीं होता है।हमलोगों का जीवन साधारण होता है , लौकिक होता है। उसमें कोई विशेषता नहीं होती है। लेकिन अवतार पुरुषों (ईश्वरकोटि?) का जीवन असाधारण होता है। असाधारण मतलब -दिव्य होता है। भगवत गीता के चौथे अध्याय का वह श्लोक -   

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।4.9।।

।।4.9।। हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। इस प्रकार (मेरे जन्म और कर्म को) जो मनुष्य तत्त्व से जान लेता अर्थात् दृढ़तापूर्वक मान लेता है, वह शरीर का त्याग करके पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, प्रत्युत मुझे प्राप्त होता है। (4:03:48

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया।।4.6।।

।।4.6।। यद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी ब्रह्म स्वरूप हूँ और भूतमात्र का ईश्वर हूँ (तथापि) अपनी प्रकृति को अपने अधीन रखकर (अधिष्ठाय) मैं अपनी माया से जन्म लेता हूँ।।

मानो उनका जन्म हुआ है। मानो उन्होंने देह धारण किया है। मानो लोगों के ऊपर वो कृपा कर रहे हैं , अनुकम्पा, करुणा , दया  दिखा रहे हैं। लेकिन उनकी दया, कृपा हमलोगों के जैसे नहीं है , गीता में भगवान ने स्वयं कहा है। उनका कर्म क्या है ? वो भी स्पष्ट कहा गया है -कि धर्मसंस्थापनार्थाय - 

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।4.8।।

।।4.8।। साधुओं-(भक्तों-) की रक्षा करनेके लिये, पापकर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और धर्मकी भलीभाँति स्थापना करनेके लिये मैं युग-युगमें प्रकट हुआ करता हूँ। 

ताकि जो लोग मनुष्य होकर भी (विवेक सोया रहने के कारणअपने मार्ग से किस प्रकार भटके हुए हैं, उनको किस प्रकार फिर से 'मनुष्य का धर्म' अर्थात मनुष्य की विशेष योग्यता , या उसकी विशेष पहचान जो नित्य-अनित्य विवेक-प्रयोग क्षमता है , उस विवेक-प्रयोग के मार्ग पर किस तरह लाया जाये? इस धर्म की स्थापना कैसे की जाये ?  

प्रवृत्ति धर्म क्या है ? निवृत्ति धर्म क्या है ? वह भी उन अवतारों के जीवन को देखने से हमें पता चलता है। साथ-साथ निवृत्ति धर्म क्या है ? वह भी उनके जीवन को देखने से पता चलता है।  

 वेदों में बताये गए इन दोनों मार्गों का वर्णन करते हुए आदिगुरु शंकराचार्यजी अपने गीता भाष्य के प्रारम्भ में (श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्यम् ॥ उपोद्घातः ॥) ही कहते हैं -  

" द्विविधः हि वेदोक्तः धर्मः, प्रवृत्ति-लक्षणः निवृत्ति-लक्षणः च । जगतः स्थिति-कारणं , प्राणिनां साक्षात्-अभ्युदय-निःश्रेयस-हेतुः यः सः धर्मः ब्राह्मणाद्यैः वर्णिभिः आश्रमिभिः च श्रेयोर्थिभिः -अनुष्ठीयमानः ॥" 

अर्थात वेदोक्त धर्म दो प्रकार का है - एक प्रवृत्ति रूप है, दूसरा निवृत्ति रूप है।   जो जगत की स्थिति का कारण , तथा प्राणियों की उन्नति का और मोक्ष का साक्षात् हेतु है। एवं कल्याणकामी ब्राह्मण आदि वर्णाश्रम अवलम्बियों द्वारा जिसका अनुष्ठान किया जाता है उसका नाम धर्म है। 

सः भगवान् सृष्ट्वा-इदं जगत्, तस्य च स्थितिं चिकीर्षुः,

मरीचि-आदीन्-अग्रे सृष्ट्वा प्रजापतीन्, प्रवृत्ति-लक्षणं धर्मं

ग्राहयामास वेद-उक्तम् । 

इस जगत को रचकर इसका पालन करने की इच्छा वाले उस भगवान ने पहले मरीचि आदि प्रजापतियों को रचकर उसको वेदोक्त प्रवृत्ति रूप धर्म (कर्मयोग) ग्रहण करवाया।  

                         ततः अन्याण् च सनक-सनन्दन-आदीन् उत्पाद्य,

                         निवृत्ति-लक्षणं धर्मं ज्ञान-वैराग्य-लक्षणं ग्राहयामास । 

फिर उनसे अलग सनक , सनन्दन , सनातन आदि ऋषियों को उत्पन्न करके उनको ज्ञान और वैराग्य जिसके लक्षण हैं , ऐसे निवृत्ति रूप धर्म (ज्ञानयोग) ग्रहण करवाए। 

आचार्य शंकर कहते हैं - वेदों के द्वारा धर्म के दो रूप कहे गए हैं - "प्रवृत्ति-लक्षणो निवृत्ति-लक्षणो च। " जगत का मतलब : एक यह जो दृश्यमान लौकिक जगत है और दूसरा 'हमारा' - साधाकों का, मुमुक्षुओं का , विवेकी -मनुष्यों का , उपासकों का , भक्तों का या संयासियों का जो जगत है। उसमें प्रवृत्ति और निवृत्ति का सन्तुलन किस प्रकार से रहे ? गृहस्थों और संन्यासियों में समन्वय किस प्रकार रहे ? यह तरीका हम किस से सीखेंगे ? यह केवल अवतार पुरुषों से ही सीखा जा सकता है(3:59) माँ और ठाकुर के जीवन में दोनों का अद्भुत संतुलन है। क्योंकि उनका आना ही -धर्मसंस्थापनार्थाय ' हुआ है। (नवनीदा जैसे 'नेता' -उस पार से लौटे ही हैं केवल  -'विवेकज-आनंद ' के धर्म को स्थापित करने हेतु।) अवतारों से हम हमेशा सीखने का प्रयास करते हैं। जिस तरह माँ ने कहा - " अगर शान्ति चाहो , तो दूसरों का दुर्गुण मत देखो - किसी का दोष मत देखना !" विवेक-सोया है ? ये देखो ? सन्त तुकाराम ने भी यही कहा है - मैं दूसरों के दुर्गुणों को क्या गिनवा सकता हूँ ? उसकी क्या आवश्यकता है ? क्या दूसरों में जिन दोषों कस मैं बखान कर रहा हूँ , वो दोष मुझमें कम हैं ? माँ कहती है - मैं दूसरों के दोष देख ही नहीं सकती। गौरी माँ शिकायत करती हैं , तुम सबको क्यों अपना लेती हो ? उनका आचरण क्यों नहीं देखती ? माँ ने कहा मैं नहीं देख सकती। हमें मालूम है कि यह गुण हममें बहुत कम है। इतना तो मालूम कि यह अविचलता, सहनशीलता भी गुण है। इस गुण की परिपूर्णता हम माँ के जीवन में देखते हैं।यही हमारे लिए बहुत बड़ा सम्बल है। उनको अपना आदर्श मानकर हम अपने जीवन में आगे बढ़ सकते हैं। अपना व्यक्तिगत जीवन मधुर बना सकते हैं। और दूसरों के जीवन में भी हम मधुरता का कुछ संचार कर सकते हैं। योगदान कर सकते हैं। ये कठिन लगता है। लेकिन माँ का जीवन तो मधुर था। अभी है , और सब समय आदर्श उदाहरण बना रहेगा। माँ का जो अद्भुत जीवन है , उसमें सकारात्मक क्या है ? positive क्या है ? उसका उदाहरण देखें - दुर्गापूजा विसर्जन में लोग नाच रहे थे। माँ से किसी ब्रह्मचारी ने शिकायत कर दी। ये ठीक नहीं हो रहा है - बेढंगा  नाचता है ? माँ कहती है - अरे ऐसा ही होना चाहिए। माँ को खुश करने के लिए बच्चा ऐसे ही नाचता है। माँ की दृष्टि कितनी उदार है - ये देखने की चीज है। माँ के जीवन की जितनी भी घटनाएं हमने आज सुनी हैं। माँ का जन्म दिव्य है , माँ कर्म कितना दिव्य है। हमलोग माँ के दिव्य जीवन को - 'तत्वतः' जानेंगे- मतलब जैसा है , वैसा दिव्य जीवन को ठीक से जानेंगे। अवतार के जीवन को यथार्थतः जानने का फल बहुत बड़ा होता है,संसार-चक्र से मोक्ष। इसलिए तीन दिन का ये जो यज्ञ चल रहा है। भगवान स्वयं गीता में कहते हैं -   

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।

ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः।।18.70।।

।।18.70।। जो मनुष्य हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा -- ऐसा मेरा मत है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - हम दोनों में जो 'धर्ममय संवाद' चल रहा है, वह धर्म से भरा हुआ है।अरे अर्जुन , यहाँ ज्ञान-यज्ञ चल रहा है , और मेरी पूजा चल रही है। यह मेरी मति - भगवान की बुद्धि ऐसा कहती है। भगवान का ऐसा विचार है तो उनके कथन को प्रमाण की क्या आवश्यकता है ?   हम दोनों में जो संवाद हुआ है , वो धर्म से परिपूर्ण है।

उसी प्रकार यहाँ जो ज्ञान यज्ञ चल रहा है , यह ठाकुर , माँ स्वामी जी की उपासना ही चल रही हैं। ताकि हमलोगों में भी मातृभक्ति का विकास हो।  मातृभक्ति से व्यक्ति महान बनता है ! भगवान राम मातृभक्त थे। भगवान कृष्ण मातृ भक्त थे। व्यास मातृभक्त थे। उनको सत्यवती नन्दन कहा जाता है। शंकराचार्यजी मातृ भक्त थे। पाण्डव मातृभक्त थे। भीमसेन तो बहुत बड़ा मातृभक्त था। विवेकानन्द मातृभक्त थे। शिवाजी महाराज मातृभक्त थे। माँ ने कहा शिवा ये किला जीतना है। कोई बहस नहीं। माँ ने कहा है - होना ही है। माँ की आज्ञा का पालन होना ही चाहिए। इसको कहा जाता है मातृभक्ति। स्वामी जी ठाकुर की बात पर शंका करते थे , लेकिन माँ जब आदेश दे दिया तो - किला जीतना ही है। [गाड़ी लेना है - तो लेना है ! ] इसे कहा जाता है -मातृभक्ति। स्वामीजी कभी ठाकुर के आदेश पर तर्क करते थे , लेकिन माँ आदेश अकाट्य था। माँ सुप्रीम कोर्ट है। लास्ट आदेश ! ये मातृभक्ति है। श्री रामकृष्ण के सभी संन्यासी सन्तानों की मातृभक्ति देखने के लायक है। सभी ने माँ को बहुत स्नेह दिया , पर से उन्होंने बहुत अधिक स्नेह पाया था। हमलोग भी माँ से दूर नहीं हैं , ये जो झण्डाचौक पर आयोजन हुआ है - माँ की कृपा से , नवनीदा की प्रेरणा से हुआ है। इस आयोजन के माध्यम से तिलैया -कोडरमा -डोमचांच -बिहार के सभी नागरिकों को मातृप्रेम , पितृप्रेम , माँ का आशीर्वाद , पिता का प्रेम ,स्वामीजी का भ्रातृप्रेम। माँ सारदा संघजननि हैंगृहस्थ भक्त और ठाकुर के संन्यासी भक्त संघ के अटूट अंग हैं। हमें यदि मातृभक्ति हो तो , हमारी मातृभक्ति कैसी होनी चाहिए ? उसका अनुभव आज हुआ होगा। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था - " आधुनिकता हमें सुखी बनाती है। वैज्ञानिक आविष्कार से शरीर को सुख बढ़ता है। हमारे Comforts बढ़ जाते हैं। माईक है तो आप सभी सुन रहे हैं। लेकिन मशीनें हमें गुलाम बना देती है। संसार को सुखी बनाने प्रयास हजारों सालों से किया जा रहा है। लेकिन हमारा अनुभव है - वास्तव में कितने सुखी हुए हैं हमलोग ? उसको तो हम नहीं बता सकते हैं। लेकिन दुखी कितने हुए हैं - यह हम बोल सकते हैं। हमलोग बोलते हैं -मोबाइल तो बहुत जरुरी है , उसके बिना तो हम रह नहीं सकते हैं। लेकिन हम बोल सकते हैं कि इसने हमें बहुत दुखी बना दिया है। क्योंकि इस मोबाईल की जकड़ से युवा -बच्चा -बूढ़ा सभी गुलाम हैं।

स्वामीजी कहते हैं 1000 वर्षों से जगत को सुखी बनाने का जितना प्रयास किया गया है - उतना ही प्रयास यदि मनुष्य को चरित्र के गुणों से विभूषित करने में - अविचलता , सहशीलता आदि गुणों को व्यक्त करने का प्रयास किया जाता ,यदि मनुष्य को Pure , Gentle and Tolerant " पवित्र , सभ्य और सहनशील बनाने में किया जाता , तो आज मनुष्य जितना सुखी है , उससे हजारों गुना अधिक सुखी हो जाता।

सभ्यता (gentleness) क्या होती है ?  जरा विचार करके देखें यदि पुरुष और स्त्री दोनों "ज्ञानदायिनी माँ सारदा" के जीवन और आचरण से व्यक्त होने वाली 'व्यावहारिक दिव्यता' (Practical Divinity) अर्थात माँ के दोनों व्यावहारिक उपदेश (Practical teachings) - " बिना किसी का दोष देखे , जब जैसा- तब तैसा , जहाँ जैसा -तहाँ तैसा, जिसको जैसा , उसको वैसा।" के सिद्धान्त पर चलते हुए कोई पुरुष यदि (माँ जैसे सहनशील गुरुदेव या नवनीदा) और कोई स्त्री (भारती दीदी के जैसी क्षात्र वीर्य और ब्रह्मतेज से विभूषित स्त्री) बन जाये और दूसरों को भी वैसा बनाने में सहायता करे     

 'पवित्रता , सभ्यता और सहनशीलता' का उदाहरण     

कोई पुरुष (माँ के जैसा पुरुष नवनीदा) और (भारती दीदी के जैसा क्षात्र वीर्य और ब्रह्मतेज से विभूषित कोई स्त्री) 


अपने जीवन को "ज्ञानदायिनी माँ सारदा का जीवन" के जैसा 

अपने जीवन को भी शुद्ध -पवित्र बना ले और साथ ही (भारती दीदी जैसा क्षात्र वीर्य और ब्रह्मतेज से विभूषित होकर) हुए माँ सारदा के जीवन साथ उस दिव्यता [पवित्रता , सभ्यता -चरित्र, और सहनशीलता) को    अभिव्यक्त करके सभ्य बन जाये 

शुद्ध , सभ्य और सहनशील मनुष्य बनने  (मनुष्य को माँ सारदा के जैसा शुद्ध-पवित्र , सभ्य (सभ्यता क्या है ? मेरी वाणी और आचरण से किसी को कष्ट न हो।) और सहनशील की आदर्श बनने और बनाने हैं की शिक्षा देनी चाहिए)    


शुद्ध -सभ्य और सहनशील ' आज हम देखते हैं कि शुद्ध , सभ्य और सहनशीलता का सम्पूर्ण आदर्श यदि कहीं सच्चे रूप में देखते हैं , तो किसमें देखते हैं ? ये सारे गुण हम माँ के जीवन में पूरा देखते हैं। 

पवित्रं चरितं यस्या: पवित्रं जीवनं तथा ।

पवित्रतास्वरूपिण्यै तस्यै कुर्मो नमो नम: ।।

माँ श्री सारदा देवी पवित्रता की जीवन्त मूर्ति थीं। सहनशील बनो - स्वामीजी कहते थे। दादा कहते थे - वीर हो धीर बनो। लेकिन सहनशील होना कितना कठिन है ? पर हुआ जा सकता है। यह हमें माँ के जीवन में देखते हैं। और Gentleness ' (सभ्यता-भद्रता) का आदर्श किसे कहते हैं ? कभी अपनी वाणी से , आचरण से या विचारों से दूसरों को कष्ट नहीं हो , इसका ख्याल हर समय रखने वाला सभ्य , भद्र माना जाता है। माँ कितनी सभ्य थी यह हम माँ के जीवन के द्वारा ही हम समझ सकते हैं। क्योंकि व्यावहारिक दिव्यता की साक्षात् उदाहरण श्री माँ हैं !! भारत का आदर्श वाक्य है - "कृण्वन्तो विश्वं आर्यम्" ! सारे संसार को हम सभ्य बना देंगे। "आर्य" का अर्थ: यहां "आर्य" किसी नस्ल या पंथ से नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति से है जो चरित्रवान मनुष्य है प्रशंसनीय कार्य करता है, सच्चाई का पालन करता है, और दूसरों के प्रति दयालु होता है.वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना: यह वाक्यांश 'पूरी पृथ्वी एक परिवार है' (वसुधैव कुटुम्बकम्) के विचार से भी जुड़ा है, जो सभी के उत्थान की बात करता है।  कैसे सभ्य बना देंगे ? माँ का व्याहारिक दिव्य जीवन इसका उदाहरण है। माँ सभ्यता , पवित्रता , सहनशीलता की प्रतिमूर्ति थी। आज हमने चार वक्ताओं द्वारा प्रस्तुत अनेक उदाहरणों के माध्यम से माँ का दिव्य जीवन हमने सुना। जितनी भी घटनायें सुनी इसका प्रभाव बहुत बड़ा होता है। 

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।4.9।।

।।4.9।। हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। इस प्रकार (मेरे जन्म और कर्मको) जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता अर्थात् दृढ़तापूर्वक मान लेता है, वह शरीरका त्याग करके पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होता, प्रत्युत मुझे प्राप्त होता है।

जो पैदा हुआ है , उसके देह का त्याग तो ध्रुव है। निश्चित है। लेकिन जो मुझे तत्व से जान लेता है - उस मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता - पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ! माँ के गर्भ में फिर न जाना पड़े , पुनर्गभवास को टालने के लिए अनेक जन्मों तक , साधना -तपस्या करनी पड़ती है। वह केवल अवतार पुरुषों वरिष्ठ के दिव्य जीवन और जन्म का यथार्थ तत्व जान लेने से -मनुष्य का जीवन सार्थक हो जाता है। वह सफल हो जाता है , वह मुक्त हो जाता है। पुनर्जन्म नैति' मतलब वह जन्म-मरण के चक्कर से छूट जाता है। 

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।

स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति।।2.72।

।।2.72।। हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है।। गीता कहती है - ऋषियों को ब्रह्मनिर्वाण की प्राप्ति होती है। 

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।

छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।।5.25।।

।।5.25।। वे ऋषिगण मोक्ष को प्राप्त होते हैं - जिनके पाप नष्ट हो गये हैं, जो छिन्नसंशय, संयमी और भूतमात्र के हित में रमने वाले हैं।।

ऋषियों को ब्रह्मनिर्वाण की प्राप्ति हुई थी , उन्होंने बहुत तपस्या की थी। बहुत परिश्रम किये थे , बहुत साधना की थी। तब उनको ब्रह्म निर्वाण की प्राप्ति हुई थी। हम लोग न तो साधना कर सकते हैं , न तपस्या कर सकते हैं। माँ कहती है - कलयुग में तो और भी कठिन है। लेकिन केवल माँ के जीवन की घटना है। उनका जन्म , उनका कर्म सबकुछ दिव्य है। उनके जीवन को पढ़ें , सुनें तो भी हमलोगों को - "त्यक्त्वा  देहम्  पुनः  जन्म नः एति gets !" वो मुझे प्राप्त होता है- माम् एति सः अर्जुन ! ब्रह्म के साथ एकाकार हो जाता है। हम भगवान की , माँ जगदम्बा की बात पढ़ें , सुनें उस पर चिंतन -मनन करें। निदिध्यासन करें। तो हमारा यह मनुष्य जीवन - जो बहुत कम उम्र का है। Life is short ' स्वामीजी कहते हैं - इस छोटे से जीवन में हमें जिस महान कर्तव्य को पूरा करना है।  वो बड़ी आसानी से हो जाता है। यह आज हमने इन सभी वक्ताओं से सुना। तो माँ के जीवन की घटनाएं बहुत महत्वपूर्ण हैं। आप सब लोगों ने मुझे शांति के साथ सुना , मैं आपका अत्यंत आभारी हूँ धन्यवाद। नमस्कार ! (4 :12 :57

================