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शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

⚜️️🔱निःस्वार्थपरता देवत्व की ओर ले जाती है। ⚜️️🔱Selflessness leads to divinity.⚜️️🔱

युगाचार्य स्वामी विवेकानन्द  

मानवजाति के श्रेष्ठ शिक्षक 

निःस्वार्थपरता मनुष्य को क्रमशः देवत्व की ओर ले जाती है, और स्वार्थपरता ही मनुष्य को धीरे -धीरे कायरता (पशुत्व याबंधन) की ओर ले जाती है। तो क्या हमलोग स्वार्थशून्य होने का अभ्यास करके साहसी और वीर के जैसा जीवन व्यतीत नहीं कर सकते हैं ? अवश्य कर सकते हैं, जब महामण्डल के संस्थापक सचिव नवनीदा (रनेन दा , दीपक दा, बिरेन दा) आदि कई लोग गृहस्थ होकर भी निःस्वार्थपर होने का अभ्यास करके वीरों  के जैसा जीवन जी सकते हैं, तो हमलोग भी अवश्य कर सकते हैं। कायरता को अपना संगी बना से हमें कुछ भी प्राप्त नहीं होता; बल्कि हम अपना 'मान और हूँष' 'गौरव और आत्म-सम्मान' दोनों खो देते हैं, और अपमान भरी ज़िंदगी जीते हैं।

यद्यपि ऐसा लग सकता है कि समाज तो हमें स्वार्थी होने की शिक्षा देता है। लेकिन दूसरी ओर, समाज में निःस्वार्थपरता का पाठ भी है, जिसे हम बड़ी चालाकी से नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन दोनों दुख और पीड़ा से भर जाते हैं। पहली नज़र में यह कितना भी सुंदर और सुखद क्यों न लगे, असल में यह मुर्दा शरीर को खुशबूदार फूलों से सजाने जैसा है। जो कुछ ही दिनों बाद सड़- गल जाता है और समाज को प्रदूषित करता है।

साधारण लोगों के लिए पूरी तरह से निस्वार्थ होना बहुत मुश्किल है। किन्तु हमलोग थोड़ा थोड़ा करते हुए भी इसका अभ्यास तो कर सकते हैं। मृत्यु जब निश्चित है, तो किसी महान उद्देश्य के लिए ही शरीर का त्याग करना श्रेय है। जगत को ऐसे मनुष्यों की आवश्यकता है जिसका जीवन -प्रेमपूर्ण और निःस्वार्थ हो। मानवजाति के श्रेष्ठ शिक्षक स्वामी विवेकानन्द , सम्पूर्ण मानवजाति की शिक्षा के लिए जो हमलोगों को दिए हैं , उन्हीं में से केवल 5 उपदेशों के ऊपर इतने दिनों तक लगातार चर्चा हुई है। 

इस चर्चा में पारम्परिक शिक्षा के साथ साथ स्वामी विवेकानन्द की शिक्षा भी हमारा परिवार और समाज यदि ग्रहण करे तो देश में बहुत जल्दी अच्छे परिवर्तन होंगे और वह परिवर्तन अवश्य परिवार, समाज और देश को क्रमश विकास की दिशा में ले जायेगा। स्वामी विवेकानन्द द्वारा मानवजाति के लिए दी गयी समस्त शिक्षाओं में मुख्य शिक्षा थी - 'आदर्श मनुष्य निर्माण शिक्षा के साथ आदर्श चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा।'  इसीलिए हम सबों को यह स्मरण रखना होगा कि - स्वामीजी की शिक्षा -पद्धति 'Be and Make ' ग्रहण करने से ही हमारे परिवार , समाज और देश के प्रत्येक छात्र-छात्राएं , स्त्री-पुरुष एक आदर्श चरित्र का अधिकारी मनुष्य बन सकेंगे। और उन चरित्रवान मनुष्यों की युवा पीढ़ी  निर्माण के फलस्वरूप देश में बहुत जल्द सकारात्मक बदलाव आएंगे, और ये बदलाव निस्संदेह परिवार, समाज और राष्ट्र को लगातार प्रगति की ओर ले जाएंगे। 

इसलिए, आइए सबसे पहले हम मानव जाति के सबसे महान शिक्षक स्वामी विवेकानंद द्वारा सिखाई गई "आदर्श मनुष्य निर्माणकारी शिक्षा" (पवित्र-त्रयी जैसा जिसको जगत का कुछ भी नहीं चाहिए -3K में से नाम-यश भी नहीं चाहिए इस त्याग और सेवा की शिक्षा) को सम्पूर्ण रूप  से पहले अपने जीवन में अपनाएं और उसका पालन करें। इसके बाद ही  हम स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं को समाज में ज़्यादा लड़कों और लड़कियों तक, यानी और भी ज़्यादा लोगों तक फैला सकते हैं। और साथ ही, अपने चरित्र को बनाए रखकर, हम दूसरों को सिखा सकते हैं कि वे अपना चरित्र कैसे बनाएं। And at the same time, by maintaining our own character, we can teach others how to build their character.

अगर हम इस प्रकार एक -दूसरे के साथ परस्पर मिलजुल कर काम करें और  "आदर्श मनुष्य निर्माण और चरित्र-निर्माण कारी शिक्षा" का प्रचार-प्रसार परिवार , समाज और सम्पूर्ण भारत में कर सकें, तभी हम स्वामी विवेकानन्द द्वारा हमारे देश की उन्नति के निमित्त दी गयी सहायता के कर्ज को, कम से कम कुछ हद तक, अवश्य चुका पाएंगे।

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