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बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

⚜️️🔱3.प्रारब्ध के चक्र को कैसे समझें ? ।। Yug-Purush।। How to understand the cycle of destiny? ⚜️️🔱

 3.प्रारब्ध के चक्र को कैसे समझें ? ।। Yug-Purush।। How to understand the cycle of destiny?


 कई बार बीज को देखकर भी यह पता नहीं चलता कि इस बीज में क्या छिपा हुआ है ? बीज को भी पता नहीं होता है , बीज को देखके दूसरे लोग भी नहीं जान सकते कि बिज में क्या छिपा हुआ है ? बचपन में मैं यमुना नदी में खड़े-खड़े जाप करता था। तब मुझे कुछ ज्ञान नहीं था , कुछ भी पता नहीं था। जैसे तुम्हारे बच्चे तुम्हें पूजा करते देखते हैं , तो वे भी आरती घुमाते हैं। वे भी पैर छूले ते हैं , मंदिर चले जाते हैं। ऐसे ही मैं भी कम बुद्धि वाला लड़का था। मुझे आता वाता कुछ नहीं था , पर सुना था कि भजन करना चाहिए, तप करना चाहिए (भगवान कृष्ण को भोग देना चाहिए , उनको प्रणाम करके सोना चाहिए) को तो करने लगे थे। कुछ अवतारी पुरुषों को छोड़कर बाकी सभी सामान्य साधक मेरी ही तरह के होते हैं। फिर गुरु महाराज (स्वामी विवेकानन्द) के विषय में सुना कि उनका दर्शन करने से आदमी तर जाता है।( दादा कहते थे - विवेक-दर्शन का अभ्यास करने से विवेक-स्रोत (source of wisdom) उद्घाटित हो जाता है!) तो तरने के चक्कर में फिर गुरुदेव के पास चले गए। तरने की जरूरत क्यों पड़ी ? ये भी भोन्दुपन के कारण। बचपन में सब चीजें बच्चा स्वीकार करता है। बचपन में आप को जब 'क' को मानना सिखाया गया था , तो क्या आप जानते थे कि 'क' को क ही मानना चाहिए ? क्या आप जानते थे - कि क , ख , ग ही क , ख , ग होता है ? नहीं जानते थे। जो कहा वो मान गए। बचपन में सबसे बड़ी अच्छाई है कि जो बड़े कहते हैं , घरवाले कहते हैं , सर्वोपरि माँ जो कहती हैं - जिनको अपना मानकर विश्वास करता है , वो जो कहती है , उसको मान लेता है। जाति -धर्म हमने कहने से माना। भगवान को प्रणाम करना हमने कहने से मानी। मैं और तुम कोई विशेष फर्क वाले नहीं हैं। मुझ्रे भी तुम अपनी तरह ही बुद्धू मानलो। या मैं अपनी तरह तुम्हें भी बुद्धू मानता हूँ। मैं अपने कोई ज्ञानी नहीं समझता , न तुम्हें ज्ञानी समझता हूँ। तरने की बात माननी पड़ी - कि हमने जानवरों को मारते देखा। सूअर को मारते देखा। मछली को मारते। दूध दूहने या , हल चलाते समय डंडे से पीटते। इक्के के घोड़े को देख कर इतना लगने लगा था कि इनको तकलीफ हो रही है। और घरवालों से, गाँव वालों से सुना था कि कर्मों का फल भोगना पड़ता है। बस इतनी सी बात थी , बच्चे थे मान गए। आप लोग तर्क करते होंगे , मेरे मन ने मान लिया कि अगर बुरा करेंगे तो हमको भी यही भोगना पड़ेगा (4:10) और जन्म आदि होते रहते हैं , जैसा करेंगे -वैसा भरेंगे। बचपन में ही यह बात मन में बैठ गयी। कि कुत्ता न बनें , मछली न बनें , गधा न बनें , घोड़ा न बनें। मारे न जाएं। बैल न बनें। बैल पर लाद दिया , चढ़ाई है। जीभ बाहर निकालता है , फिर भी उसे मारते हुए ले जाते हैं। ये हमने अपने आँखों से देखा था , वो बता दें। और जो सुनने से ठीक लगा वो बता दिया। बुरा काम न करें , तो भजन करने लगे। लेकिन जन्म पर जन्म लेंगे तो सुधार होता जायेगा। लेकिन मन तब शेखचिल्ली जैसा था , सोचने लगे जब जन्म पर जन्म लेते रहेंगे तो किसी जन्म में गड़बड़ी क्या नहीं होगी ? जब जन्म होगा तो हमसे पाप भी होगा। ऐसा तो मनमें बन गया था कि इस जन्म में पाप न करेंगे। लेकिन हर जन्म में क्या होगा ? ये तो नहीं जानते? ज्यादातर बड़े आदमी ही बुरा करते थे। बचपन में मैंने अनुमान लगाया जो (मुख्यमंत्री पुत्र, या धनी थे ) वे ज्यादा अत्याचार करते थे। जो ताकतवर थे ये ज्यादा अत्याचारी थे। तब लगा अच्छा काम करेंगे तो बड़े बनकर हमभी गड़बड़ करेंगे। तो दुदर्शा होगी , जिसका जन्म-मरण ही नहीं होता , वहाँ पहुँचने से ही बात बनेगी। वो कैसे होगा ? तो सुना की , जिसको भगवान मिल जाते हैं , उसको फिर जन्म-मरण के चक्कर में नहीं फँसना पड़ता। 

न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।15.6।।

जिनको परम धाम की प्राप्ति नहीं होती उनको आना-जाना पड़ता है। फिर सोचा भगवान कैसे मिलें ? तो सोंचा गुरु के मिलने से मिलते हैं। एक पुस्तक में पढ़ा गुरुदेव का नाम कि उनके दर्शन करें तो चित्त निर्मल हो जाता है , परमात्मा मिल जाता है। तो उनकी बातें सुनने चले गए। 
(विवेकानन्द जी से सुना कि गुरु ठोक-बजा कर करो, तो गुरु खोजने हरिद्वार चला गया। देवराहा बाबा से मिला। और वापस आकर गुरुदेव से दीक्षा लेने का फॉर्म भर दिया।)
 जब तुम्हें शादी की जरूरत थी तब तुमने यह कभी नहीं कहा कि विवाह पाखण्ड है , या बन्धन में बँधने जैसी बात है ? (6:33) फेरे लेने से , चक्कर लगाने से भी क्या कहीं शादी हो जाती है ? आपने भी चक्कर लगा के शादी की या नहीं ? आपने क्या किया था , क्या आपने चक्कर नहीं लगाए थे ? विवाह-बंधन को मान लिया था या नहीं ? जो जरूरत होती है आदमी मान जाता है। शादी की जरूरत होती है , तो पंडित चक्कर लगवा देते हैं , आप मान लेते हैं। विवाह हो गया , अब ये जिंदगी भर की परमानेंट पत्नी हो गयी। 
हमको भी ऐसा ही लगा कि अगर जन्म-मरण से मोक्ष चाहिए , तो गुरु से मिलने से होता है। इसलिए वहाँ गए। उनकी बातें बहुत अच्छी लगीं। यहाँ तक तो हमारी हालत बता दी। एक सम्माननीय साधक ने कहा अब आप आनंद लें। तब मैंने कहा भैया अभी मैं आनंद का ठेका नहीं लेता
 अस्पताल जब जाते हो , तो वहाँ ऑपरेशन के पहले और बाद में इंजेक्शन लगता है , बेड पे लेटना पड़ता है। ऑपरेशन के बाद रिकॉवरी रूम में जब तक हो - भारी कष्ट झेलना पड़ता है, उस समय भी क्या आनंद ही होता है ? आनंद के लिए ही ऑपरेशन तो होता है , पर उस समय भी आनंद होता है। यह कोई डॉक्टर नहीं कहता। अब तुम चाहो उसी दिन आनंद मिल जाये , तो ऐसा नहीं होता। पर यदि चाहते हो हॉस्पिटल से ठीक होकर घर लौट जाएँ , परमात्मा तक की यात्रा हमारी सुखद हो। तो अभी बैठे रहो। बाकी आज ही अच्छा लगे यह मैं नहीं कहता। कुछ बुरा-बुरा भी कहूँगा। सब अच्छा -अच्छा नहीं कहूंगा। शुरू -शुरू में लोगों को अच्छा कहकरके पटना पड़ता है। यदि डॉक्टर शुरू में ही बुरा बोल दे तो कई रोगी कहेंगे , भले ही मर जाएँ पर उस डॉक्टर के यहाँ नहीं जायेंगे। कई बार नाक के लिए घर में तलाक हो जाती है। मान-अपमान में तलाक की नौबत भी आ जाती है। हम तुम्हारा अपमान नहीं करेंगे , पर हर बात तुम्हें अच्छी ही लगे ये जरुरी नहीं है। डॉक्टर परहेज भी बताते हैं , पर रोगी परहेज करना नहीं चाहते। लेकिन अगर अपना इलाज चाहते हो तो सब स्वीकार करते हो। यदि आप मुक्त होना चाहते हैं , तब कुछ कहूंगा , तो मानना पड़ेगा। और यदि मुक्त होना नहीं चाहते , तो और जन्म होते रहेंगे। कभी न कभी जब तुम दुखी हो जाना और दूसरों की दुर्दशा देख लेना , फिर जब मन करे , तब इस रस्ते पर आना। दूसरे जन्मों में वर्तमान गुरु नहीं मिलेंगे ? लेकिन कोई न कोई गुरु हर जन्म में मिलता है। जब वर्तमान गुरु नहीं थे , तब पहले भी लोगों को गुरु मिलते रहे हैं। युगों -युगों से दुनिया चली आयी है , संत मिलते ही रहते हैं। गुरु तारते आये हैं , लोग तरते आये हैं। और सब कभी नहीं तरे। नहीं तो वर्तमान गुरु होते ही नहीं। कोई भी गुरु सबको तार नहीं पाया। (10:19) बहुत से लोग गुरुओं के उपदेश पर नहीं चलते , शास्त्र को नहीं मानते। तो इस जन्म में अगर न भोगना पड़े तो ,अगले जन्म में भोगना पड़ेगा। [बड़े घरन की स्त्रियाँ संतन से  शर्माये ,पिक्चर से न शर्माए ?? सेही कारण कुतियाँ भईं घर-घर डंटा खायें। ] सब यदि गुरु के पास आ जावें तो कुत्ता कौन बनेगा ? गधा कौन बनेगा ? वही बनेंगे जिनको गुरु के पास नहीं आने का मौका मिलता है। जिसको पाठचक्र में मन नहीं लगता ? आपने भी जरूर सुना होगा कि पाप जब ज्यादा होता है -तो कथा अच्छी नहीं लगती। लगता है ठाकुर के पास से उठकर भाग जाओ। पर मन लगने लग जाये तो समझो भक्ति आ गयी -
प्रथम भगति संतन कर संगा। 
दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।। 

पहले तो संत अच्छे लगें। फिर संत जो कथा सुनावें वो अच्छी लगे। 

गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान। 
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तज गान।। 

अभिमान छोड़के संतों की सेवा करें, तीसरी भक्ति अमान। बिना बड़पन्न दिखाए , विनम्र होके सन्तों की सेवा करें। 
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा |
पंचम भजन सो बेद प्रकासा ||

छठ दम सील बिरति बहु करमा |
निरत निरंतर सज्जन धर्मा ||

सातव सम मोहि मय जग देखा |
मोते संत अधिक करि लेखा ||

आठव जथा लाभ संतोषा |
सपनेहु नहिं देखहि परदोषा ||

नवम सरल सब सन छनहीना |
मम भरोस हिय हरष न दीना ||

नव महुं एकउ जिन्ह कें होई ।
नारि पुरूष सचराचर कोई ॥

मम दरसन फल परम अनूपा |
जीव पाइ निज सहज सरूपा ||

सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम |
ते नर प्राण समान मम जिन के द्विज पद प्रेम || 

यह पंक्तियाँ प्रभु श्रीराम ने माता शबरी को नवधा भक्ति (नौ प्रकार की भक्ति) का ज्ञान देते हुए कही थीं। "प्रथम भगति संतन्ह कर संगा" रामचरितमानस में वर्णित 'नवधा भक्ति' का पहला चरण है, जिसका अर्थ है ईश्वर (श्री राम) के भक्तों या संतों का सत्संग करना। इसका अर्थ है कि भगवान तक पहुँचने का सबसे पहला और मुख्य मार्ग सज्जनों की संगति है, जहाँ से भक्ति के भाव और ज्ञान प्राप्त होते हैं।  संतों के साथ रहने से मन शुद्ध होता है, आत्मा (ईश्वर, पवित्र त्रयी) के प्रति प्रेम जागृत होता है और सांसारिक मोह-माया कम होती है। बाकी लम्बी कथा आज नहीं करेंगे। तीन बातें सार रूप में बता देंगे। (12:07) बीजरूप में आज सब कहेंगे। फलफूल कल कहेंगे। 
आत्मविकास में सबसे बड़ी बाधा है -देहाध्यास M/F अपने को केवल स्त्री-पुरुष शरीर समझ लेना। मैं देह हूँ , इस मान्यता का नाम है , देहाध्यास। मैं स्त्री-पुरुष हूँ ऐसा लगना अध्यास है।
 
जीव जबतें हरितें बिलगान्यो।  तबतें देह गेह  निज जान्यो।  
मायाबस स्वरूप बिसरायो।  तेहि भ्रमतें दारुन दुख पायो।।
 
पायो  जो दारुन  दुख, सुख  लेस  सपनेहुँ नहिं  मिल्यो। 
भव  सूल, अनेक  जेहि,  तेहि  पंथ तू  हठि हठि  चल्यो।।  

बहु जोनि जनम,जरा, बपति, मतिमंद  !  हरि जान्यो नहीं। 
श्रीराम  बिनु  बिश्राम मूढ़  !  बिचार, लखि  पायो  कहीं।। 

------ श्रीश्रीविनयपत्रिका।  

"हे आत्मा! जब से तुम भगवान से अलग हुई हो, तुमने इस शरीर को अपना घर मान लिया है। माया के प्रभाव में आकर, तुम अपने सच्चे 'सत्-चित्-आनंद' स्वरूप को भूल गई हो, और इस भ्रम के कारण तुम्हें भयानक कष्ट सहने पड़े हैं। तुमने बार-बार जन्म और मृत्यु का असहनीय दर्द सहा है। सुख का तो नामोनिशान भी नहीं है, सपने में भी नहीं। तुम हठपूर्वक अनगिनत सांसारिक कष्टों और दुखों से भरे रास्ते पर चलती रही। तुमने कई जन्मों तक भटकती रही, बूढ़ी हुई, कई विपत्तियाँ सहीं, और मर गई, लेकिन हे मूर्ख! इन सबके बाद भी तुमने श्री हरि को (पवित्र त्रयी को ) नहीं पहचाना! हे भ्रमित बुद्धि /मूढ़बुद्धि / सम्मोहित बुद्धि! सोचो और देखो, क्या भगवान को छोड़कर किसी को कहीं भी सच्चा सुख और शांति मिली है?" || 

यह अंश श्री गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्री विनय पत्रिका से लिया गया है। यहाँ, श्री गोस्वामी जी, हम जैसे जीवों के दुख से द्रवित होकर, मार्गदर्शन देते हुए कहते हैं:
जब से जीव ने (अविवेकी मनुष्य ने) देह को अपना घर मान लिया , तभी से जीव (आत्मा) चैतन्य होकर भी जड़ प्रकृति (मूढ़बुद्धि) के पंजे में फंस गयी। देह को मैं मानने से जीवभाव - जीवभाव क्या है ? 
जीव धर्म अहमिति  अभिमाना ॥७॥ 

(बालकाण्ड) 

मैं M/F शरीर हूँ इस अभिमान का नाम जीव है। यदि जीव में यह अभिमान न रहे कि मैं जीव हूँ; तो वह मुक्त हो जाये। देह को ही 'मेरा' और 'मैं' मान लेता है। भगवान सारी सृष्टि में रहते हैं वे अहंता ममता से मुक्त हैं।  
मैं अरु मोर तोर तैं माया।

जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।

(रामचरितमानस : अरण्य कांड।)

श्री राम ने लक्ष्मण को समझाते हुए कहा : मैं और मेरा, तू और तेरा- यही माया है, जिसने समस्त जीवों को वश में कर रखा है। 
डरना मत ! पहले यह समझो देहाध्यास का हमारे लक्षण क्या हैं ? और इससे बचना कैसे है ? इसका उपाय है। लेकिन हम पहले यह स्वीकारें कि हमें M/F होने का भ्रम होता है। और जैसा हमको लगता है , यह हमारे ऋषियों को हमारे गुरुओं को पता था। इसलिए उन्होंने बताया -ऐसा जिसको लगता है , वे विवेकी-मनुष्य नहीं जीव कहलाते हैं। देहाध्यास होना परमत्मा की दैवी मायाशक्ति है। कोई जन्म-जन्मांतर से योगी हैं वे यहाँ मुक्त होकर आते हैं। (14:20) हमको तारने आते हैं। हमलोग तो वासनाओं में बंधे पशु हैं। कर्मों का फल भोगने आये हैं। शरीर का नाम ही भोगायतन है। यह शब्द याद रखने लायक है, भोग-आयतन। यह शरीर सुख-दुःख भोगने के लिए मिलता है। शादी के पहले यदि पत्नी यदि मर जाती , तो उसके दुःख से तुम दुखी नहीं होते। या पति मर जाता तो उसे पत्नी को दुःख न होता। जब प्रारब्ध खोटा होता है , तब वैसा ही संयोग मिल जाता है। जैसे -जैसे कर्म का फल भोगना होता है , वैसी -वैसी परिस्थिति आती है। अच्छी जगह शादी न होगी , जहाँ न होना चाहिए वहीँ हो जाएगी। देखोगे 100 जगह , पर पुत्र का और तुम्हारा जैसा ग्रहयोग होगा , शादी वहीं होगी। 30 -35 की लड़की को लड़का नहीं मिलेगा। बुढ़िया को लड़का कहाँ से मिलेगा ? बच्चियों की भी गलती नहीं है , उनका प्रारब्ध ऐसा ही था। नहीं मिलना था। 
तुलसी जस भवितव्यता, तैसी मिलै सहाय। 
आपु न आवै ताहि पै, ताहि तहाँ लै जाय।। 

गोस्वामी जी कहते हैं कि जैसी होनहार होती है मनुष्य को वैसी ही सहायता प्राप्त हो जाती है।  होनहार स्वयं मनुष्य के पास नहीं आती प्रत्युत उसे ही स्वयं खींच कर वहाँ ले जाती है। भाव यह है कि होनहार या भाग्य के आगे किसी का कुछ वश नहीं  चलता।   
जब राम का बनवास होना था , तब सरस्वरती ने मंथरा की बुद्धि फेर दी। मंथरा ने नौकरानी होकर भी मालिकन की बुद्धि फेर दी। जो सेवा में रहते हैं , वे बड़े खतरनाक होते हैं। नवनीदा के  PA, चेले या नौकर बड़े खतरनाक होते हैं। चौटाला ने एक बार हरियाणा में मंदिर गिरवा दी। जैसा प्रारब्ध होता है , वैसा सब योग मिल जाते हैं। हम जब जन्म लेते हैं , तो अपने कर्मों के अनुसार -स्थान , शरीर , परिवार सब मिलता है। गुरुदेव (स्वामी विवेकानन्द) ने पहले पहचाना, वे तो त्रिकालाज्ञ होते ही हैं। अंदर कुछ बीज अच्छा पड़ा होगा। मुझे इंगिलश नहीं आती है , विदेश चला गया। भारतीय मुझे नहीं मानते नहीं , और जिनको हिन्दी नहीं आती वे मेरे पीछे पड़े हैं। अभी हाल में 19 अमेरिका से आये थे , और 17 रूस से आये थे। 5 दिनों के ध्यान शिविर में भाग लिया। (19:08) जिनका जिनका प्रारब्ध है , उनका उनका जुगाड़ बैठ गया। घबड़ाओ मत , ज्योतिष को और प्रारब्ध को ठीक से समझ ले व्यक्ति तो दुखी नहीं होगा। मानलो बहु खोटी है बुरा बोलती है तो तुम दुखी हो जाते हो। बहु बनके तुम्हारे खोटे कर्म ही तुम्हारे सामने आये हैं। तुम्हारे कर्म दुःख दे रहे हैं , बहु थोड़े दे रही है। आरोप बहु पर लगाते हो , तुम्हारे कर्म कुछ नहीं थे ? ऐसे ही बहु आ गयी ? 
सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥171॥

मुनिनाथ ने बिलखकर (दुःखी होकर) कहा- हे भरत! विलाप न करो !  सुनो, भावी (होनहार) बड़ी बलवान है। हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-पयश, ये सब विधाता के हाथ हैं॥171॥  अभिनय में सब पहले से निश्चित रहता है।  कब उठना है , कब लड़ना है ? अभिनेता को पहले से पता होता है। तुम्हें अभी परसों क्या होगा ? पता नहीं है। जैसे प्रत्येक मनुष्य का मरना निश्चित है , मरना कच्चा है कि पक्का ? पर किस दिन मरना है ? और कहाँ मरना ? रोड में कि अस्पताल में, या कि घर में, नाव में , कि ट्रेन में , की जहाज में ?  ये किसीको नहीं पता। मुझे भी नहीं पता है। हमें पता नहीं है कि किस दिन क्या होगा ? लेकिन हम इतने ज्ञानी नहीं हैं। हमको ये पता नहीं है कि किस दिन क्या होगा ? लेकिन जो जो होगा , या होता जा रहा है , उसे स्वीकार कर रहे हैं। (22:00) जो होगा वो निश्चित है। वो होगा ! 

राजी हैं हम उसी में जिस में तेरी रजा है। 

जैसे प्रोड्यूसर ने रंगमंच बनाया , जो नाटक कम्पनी चलाता है वो जाने। अभिनेता को सिर्फ अपना अभिनय करना है। जो हमें पाठ दिया गया है करेंगे। हमलोग केवल अभिनेता हैं , हमारे पीछे निर्देशक है। हम सब ऐक्टर हैं , पर हमें ये पता नहीं है कि कल कौन सी एक्टिंग है ? रामकृष्ण मिशन के स्वामी आत्मानन्द जी हमारे सम्पर्क में थे। कानपूर के हमारे सम्मलेन में आये। पर इस साल के पहले हमने सोचा भी नहीं था कि रायपुर आएंगे। निश्चय किया था जिसने वही खिंच कर ले लाये हम नहीं आये। वही डॉयरेक्टर घुमाता रहता है। जिस दिन तुम ये जान जाओगे कि कोई डायरेक्टर है हम सिर्फ एक्टर हैं। और केवल ऐक्टर ही हैं , यहाँ कुछ लाभहानि नहीं है। एक्टिंग करने वाला मरने की एक्टिंग कर ? कि गरीबी की करे ? शादी की ऐक्टिंग करे। अमीर बन जाये , राजा बन जाये। वो एक्टिंग ही करेगा। होता -वोता कुछ नहीं है। क्यों ? क्योंकि वो एक्टर है , देहधारी M/F का अभिनय कर रहा है। हम भी कोई दुःख-सुख भोगने नहीं आये हैं , आप अपने को एक ऐक्टर मानकर एक्टिंग करोगे तो सुखी रहोगे। भगवान या ज्योतिष के अनुसार हमको काम सौंपा है , काम कर रहे हैं। 

ये ना पूछो के मरकर किधर जाएंगे वो जिधर भेज देंगे उधर जाएंगे ! 

कोई प्रवचन ऐसा नहीं जो तुम्हें थोड़ा आता न हो। (24:06 ) इधर (रायपुर) में भेज दिया तो इधर आना पड़ा। गोंदिया तो गुरुदेव आते थे। अब राजनन्द गाँव आये , रायपुर आये। भण्डारा आये और अभी बालाघाट जाना है। यहाँ जिनका समय आ गया होगा , वही मुझे प्रेम से सुनेंगे।          क्योंकि अगर यहाँ सबकुछ हमारे चाहने से हो , तुम्हारे चाहने से , तो तुम कभी बूढ़े न होते। कोई बूढ़ा होने की इच्छा नहीं करता , लेकिन होना पड़ता है। मेरे चाहने से मेरा शरीर जैसा चाहूँ वैसा नहीं रहता। हम केवल यही कर सकते हैं कि हम चाहना ही छोड़ दें। अभी भगवान जैसा अभिनय करवाएं करते रहें। जिस दिन शरीर छोड़वायें , छोड़ देंगे। बोरिया-विस्तरा बांध कर जाने के लिए हम तैयार रहें बस। 
     हम अपने कहें कि हम अभी नहीं जायेंगे। पर उनका निर्णय हो जाये तो लोग ऑक्सीजन (Oxygen) चढ़ाते रहें। यदि वो कह देंगे आ जाओ , तो गए। तो हम नहीं रोक सकते डॉक्टर नहीं रोक सकते। डॉक्टर अगर रोक सकते तो अपने घर वालों को तो रोक ही लेते। एक वैद्य का लड़का नहीं रहा। विवाह हो चुका था। मातायें उसको चूड़ी फोड़ने ले गयीं। एक जुलाहे की घरवाली ने पूछा ये क्या रिवाज है ? विधवा की चूड़ी फोड़ने जाना है , तो वो भी चली गयी। जब उसकी चूड़ी फोड़ी जा रही थी , तब जुलाहे की घरवाली ने अपनी चूड़ी फोडनी शुरू कर दी। तेरा कौन मर गया ? तू क्यों चूड़ी फोड़ रही है ? उसने कहा जब -वैद्य जी का लड़का मर गया तो मेरा तो मेरा मरा हुआ ही है। तो जब वैद्य नहीं बचा सका , तो हम भी तैयार हैं -चूड़ी फोड़ ही लेते हैं। समझदार लोग पहले से तैयार रहते हैं। (27:51) जब जुलाहा गर्मी में अंगीठी ताप रहे हैं , तो ठंढी में तो मर ही जायेंगे। तो आप क्या समझते हो ? यहाँ है कोई जो रह जायेगा ? क्या गुरुदेव बुढ़ापे को रोक लेंगे ? गुरुदेव की कथा सुनने से क्या होगा ? जो हमने समझा है , वो तुम भी समझ लो बस। अगर गुरुदेव अपने को बचाकर नमूना दिखाते , तो तुम मेरे शिष्य बनते तो ठीक है। गुरूजी ने बुढ़ापा नहीं आने दिया , तो इनका चेला बनना ठीक था। हम किसी को बचायेंगे नहीं - हाँ हम देहाध्यास ( जिवाध्यास जीवभाव M/F देहाभिमान) छुड़ा देंगे। तुमको ब्रह्माध्यास बतायेंगे। जिससे हम मुक्त हुए हैं , वही तुम्हें बतायेंगे। हम तुम्हारे सिर पर हाथ रखकर भाग्य बदल देंगे। मातायें बच्चे के सिर पर हाथ रखवाती हैं। हमारी माँ ने भी हाथ रखाया होगा। हम तो पैदा ही वरदान से हुए हैं। हमारी माँ के 11 -12 मर चुके थे। फिर देवी-देवता मनाया तो कोई देवी खुश हो गयी। फिर हम बचे हुए हैं। चलो बच गए। पर बकरे की मम्मी कब तक खैर मनाएगी ? हाँ हमभी अगर जल्दी मरते तो ठीक नहीं लगता। हम तो बूढ़े होकर जायेंगे। लकिन 

आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर। 
एक सिंहासन चढ़ी चले, एक बँधे जात जंजीर।। 

मैं वही कथा कहता हूँ , जो तुम्हें मालूम हैं। नई कथा कहने को साधु के पास कुछ है ही नहीं। कपड़ा फिसल गया नदी में तो एक पत्थर पर साबुन रगड़ रहा था। तुम यहाँ बैठे हो तो मन कहीं चला गया , तो नहीं समझोगे।  एकबार यदि समझ जाओ , तो मुक्त हो जाओ। 
रायपुर के कुछ लोग कहते हैं , हमें मुक्त कर दो। मैं इसी इरादे से आया भी हूँ कि मैं तुमको मुक्त ही कर दूँ। वही ग्रन्थ ,हैं वही उपनिषद हैं , वही गीता है। बस जहाँ तुम्हारा ध्यान नहीं जाता - वहाँ तुम्हारा ध्यान ले जाना चाहता हूँ। तुमको तुम्हारी बुद्धि फिर कभी धोखा नहीं दे सके तुम्हारा ध्यान वहाँ ले जाना चाहता हूँ। वैसे ही जवानी-बुढ़ापा नींद सबका होता रहता है। 
     फिरभी यदि मैं मुक्त हूँ , तो मैं तुम्हें मुक्त कर दूँगा। बस इतनी ही। पर यदि तुम्हारी समझ में मैं ही मुक्त नहीं हूँ , तो ये तुम्हारी समझ का मामला है , श्रद्धा इसी को कहते हैं। तुम्हारी समझ में यदि मैं मुक्त हूँ , तो तुम्हें बताऊँगा कि मुक्ति का अर्थ क्या है ? शादी के लिए पढ़ते हैं , मुक्त होने के लिए पढ़ते हैं ? सभी लोग मोक्ष भी नहीं पाना चाहते हैं। दर्शन करने आये हो , थोड़ा पुण्य हो जायेगा। 
 संत दरस जिमि पातक टरई॥3॥ 

संत के दर्शन से कुछ पाप कट जाते हैं। इसलिए जिसने संत नहीं देखा उसकी आँखे मोर के पंख जैसे हैं। भागवत कथा परीक्षित ने केवल एक बार सुना , वो तर गया। तुमने तो कई भागवत कथायें सुनी होगी ? जो भागवत तुमने सुनी , वही भागवत परीक्षित ने भी सुनी। वही गीता सुनके अर्जुन तर गए। 

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।

स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।।18.73।। 
 
गीता के वही श्लोक हैं , जिसको सुनकर अर्जुन कहता है मैं धन्य हो गया , मुझे स्मृति आ गयी । मैं अपने-आप में स्थित हो गया। (मेरी बुद्धि देहाध्यास छोड़कर आत्मा में स्थित हो गयी ?)

कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ॥.
कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा॥5॥

मैं न तो कवि हूँ, न चतुर कहलाता हूँ, अपनी बुद्धि के अनुसार श्री रामजी के गुण गाता हूँकहाँ तो श्री रघुनाथजी के अपार चरित्र, कहाँ संसार में आसक्त मेरी बुद्धि !॥5॥। (देह, इन्द्रिय, मन से सूक्ष्म बुद्धि उससे भी परे आत्मा है) अपनी समझ के अनुसार मैं चालाकी नहीं करता। बेईमानी नहीं करता , जितनी मेरी समझ है , ईमानदारी से मैं परमात्मा (अवतारवरिष्ठ) के गुण गाता हूँ। अपनी समझ में मैं बेईमानी नहीं करूँगा। जो जानता हूँ , दो टूक कहूँगा। जरा भी पर्दा नहीं। 
गूढ़उ तत्त्व न साधु दुरावहिं। आरत अधिकारी जहँ पावहिं॥  

संत लोग जहाँ आर्त अधिकारी पाते हैं, वहाँ गूढ़ तत्त्व भी उससे नहीं छिपाते। गूढ़ से गूढ़ रहस्य साधु नहीं छुपाते। कब ? जब आर्त अधिकारी , दुखी व्यक्ति मिल जाये , उसके लिए चाहने वाला मिले। तड़प रहा हो, बीमार हो तो वैद्य दवा देते हैं। साँप काटा हो तो झाड़ने वाला मंत्र से झाड़ते हैं नहीं तो उसकी विद्या नष्ट हो जाती है। इसीतरह कोई ब्रह्मज्ञानी अगर किसी जिज्ञासु को , जरूरत-मंद को यदि ब्रह्मविद्या नहीं सुनाता हो , तो उसकी ब्रह्मविद्या की शक्ति नष्ट हो जाएगी। इसलिए  (जिसका देहाध्यास चला गया हो और जो स्थित प्रज्ञ हो उसे )जिज्ञासु के साथ कपट नहीं करना चाहिए। लेकिन जो पात्र ही नहीं है , उसके लिए ज्ञानी भी क्या करेगा ? सुबह योग की क्लास है , उसमें बूढ़ा, बच्चा , स्त्रियाँ सभी आ सकता है। बूढ़ों के जैसा आसन -हम भी कर लेते हैं। ध्यान के लिए योगदर्शन के तीन सूत्र हैं - योगः चित्तवृत्ति निरोधः ! 'तदा द्रष्टुः स्वरूपे-ऽवस्थानम्' (योग सूत्र 1.3)-जब वृत्ति का निरोध होता है , तब द्रष्टा (=शुद्धबुद्धि) अपने स्वरुप में (आत्मा में या ईश्वर में) स्थित हो जाता है , अभी हमारी मूढ़बुद्धि, इन्द्रियों में स्थित है, विषयों में स्थित है। अभी  हमारी मूढ़बुद्धि (सम्मोहित बुद्धि) जीव-देह में (M/F शरीर में स्थित है) लेकिन  'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' ! जब वृत्तियों का निरोध होता है , तब जीव (अहं बुद्धि) अर्थात द्रष्टा अपने स्वरुप में अर्थात , अपने अधिष्ठान आत्मा में (परमात्मा, ईश्वर, ब्रह्म में) स्थित हो जाता है। तीसरा सूत्र है - यदि जीव चित्त वृत्तियों का निरोध नहीं करे , तो क्या होगा ? तो कहते हैं - 'वृत्ति सारूप्यम् इतरत्र' अन्य सभी अवस्थाओं में वृत्ति के अनुसार हो जाता है। तुम दुखी होते हो तो क्यों होते हो ? 'वृत्ति सारूप्यम् ! जैसी मति वैसी गति। वृत्ति दुःखाकार हो गयी है। तो दुःखी हो गए , निद्रा वृत्ति हो गयी तो सो गए। सुखानुभूति हो गयी तो सुखी हो गए। पैसा बढ़ गया , तो धनी हो गए।  ऐसा लगता है कि नहीं ? झूठ नहीं बोलना। धनी होने पर क्या होता है ? भूख ज्यादा लगती है ? हाजमा जायदा हो जाता है ? बुढ़ापा नहीं आता ? धनी होने का लाभ क्या है ? मुझे ये बताओ।  दिमाग में सिर्फ ये अहंकार का भूत चढ़ जाता है कि मैं बड़ा आदमी हो गया ! बड़े होने का एक मानसिक वृति बनती है। बाकी तो बड़े होने का कोई लाभ नहीं है। मैंने तो सन्तों से सुना था , जो ये दहीबड़े होते हैं न, जो उड़द की दाल से बनते हैं। हमारे सन्त कहते थे बड़े ऐसे नहीं बनते , पहले पीसा जाता है। फिर तले जाते हैं , फिर मट्ठे में डाले जाते हैं। ऐसे बड़े बनते हैं।  और बड़े बनने का लाभ क्या है ? (38:22) लोगों के बीच सिर्फ एक अभिमान के सिवा - कि मैं बड़ा हूँ ! जिमखाना का मेंबर, रोटरी का मेंबर को मरने में कुछ तो फर्क पड़ता होगा क्या ? अमीर आदमी कैसे मरता है ? और बड़े आराम से मरता है ? बल्कि गरीब शायद आराम से मरता हो , जितने बड़े हैं , वही ज्यादा चिन्ता से मरते हैं। गुरु ग्रंथ साहिब में कबीर जी का एक शब्द है"बड़े-बड़े जो दीसै लोग, तिन कउ व्यापे चिंता रोग"।  एक हँसी की बात बताऊँ ? मुझे लोग बिगड़ा नल कहते हैं - जो बहता ही रहता है। कोई प्यासा हो न हो , बह रहा है। आज भूमिका बना दी है।  अभ्यास कल कराउंगा। ध्यान में आइये -जिसका नहीं लगा उसका भी लगेगा उसका भी लगेगा ये हमारी जिम्मेदारी है। (39:32) तुम पढ़े हो या नहीं पढ़े हो , बल्कि बड़े बड़े सन्त अवतारी पुरुष ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं होते हैं। गुरुनानक देव जी कोई बहुत पढ़ेलिखे नहीं थे। ठाकुर देव भी पढ़े नहीं थे? हस्ताक्षर भी ठीक से नहीं कर पाते थे। उनके चेला (विवेकानन्द) के हम चेला हैं। तुम पढ़े हो या नहीं पढ़े हो हमारा काम है उधर ले चलना। कबीर साहेब के ऊपर phd होता है। ये कोई पढ़े की विद्या नहीं है। कबीर साहेब ने तो कह दिया -
 
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। 

 ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान (ब्रह्मविद)  न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप (देहदृष्टि नहीं -अद्वैत दृष्टी-एकत्व की दृष्टि , कोई पराया नहीं , सभी अपने हैं।) पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा। आप साधना में लग जाओगे तो आपका जीवन धन्य हो जायेगा। 
      आपका विश्वास यदि बच्चे की तरह होगा , तो पढ़ जाओगे। अधिक उम्र में पढ़ना बहुत मुश्किल है। इसीलिए कहते हैं - बूढ़े तोते या मिट्ठू को गुजराती में पोपट कहते हैं। तो बूढ़े तोते नहीं पढ़ते। नए नए को पढ़ाओ। पढ़ो मिट्ठू - दूधरोटी -चित्र-कोटि पढ़ो तो वो पढ़ने लगता है। जानवर के बच्चे भी जो पढ़ाओ पढ़ जायेगा। जब वो परिपक्व हो जाते है -एक भाषा में तो नहीं पढ़ते। मुश्किल ये है कि तुम देहाभिमान में (जीवभाव या M/F) अहं बुद्धि में परिपक्व हो गए हो। हम ये हैं , हम वो हैं , अब इसको सबको पोछना है। नए सीरे से तुम कौन हो ? ये तुमको बताना है। उसके लिए गीता और ग्रंथों के उदाहरण देंगे। देखो भगवान ने ये कहा। ये तुलसीदास ने कहा , अमुक संत ने ये कहा। और भारत के जितने भी संत हैं - किसी भी सम्प्रदाय के संत क्यों न हों ? रायपुर में सभी ने मिलजुलकर एक शोभायात्रा निकाली ये अच्छी बात है। आप अपनी बात को व्यावहारिक रूप से रखते हुए , व्यवहार में वही एकत्व का भाव -समाज और देश चलाने के लिए, ठीक है।  पर जब थोड़ा गहरी नींद में जाते हो , तब क्या होते हो ? ऐसे ही जब ध्यान -समाधि में जाओ तब तुम पुरुष नहीं स्त्री नहीं हो, उसको अमन दशा कहते हैं। संक्षेप में, यह एक ऐसा समय है जब जीवन में उथल-पुथल की जगह शांति, सकारात्मकता और संतुलन का अनुभव होता है। शंकराचार्य जी ने हस्तामलक स्तोत्र में कहा है- 
 
नाहं मनुष्यो न च देवयक्षौ,
न ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राः।

न ब्रम्हचारी न गृही वनस्थो,
भिक्षुर्न चाहं निजबोधरूपः ॥२॥

 - न मैं मनुष्य हूँ , न देवता अथवा यक्ष हूँ , न मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र हूँ, न ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ या सन्यासी हूँ , मैं केवल आत्मज्ञान स्वरुप हूँ॥२॥
शंकराचार्य ने यह किसके लिए कहा - नाहं मनुष्यो ! इसको क्या कोई पशु पढ़ेगा कि मनुष्य ही पढ़ेगा? माने विवेकी मनुष्यों को ये समझाना चाहते हैं कि तुम मनुष्य नहीं हो , 'वह' हो तत्त्वमसि ! देखो हमारा एक ग्रन्थ कहेगा तुम मनुष्य हो , तुम्हें पशुओं जैसा स्वार्थी नहीं रहना चाहिए। पहले तुम यह समझो कि तुम पशु नहीं हो , इसलिए मनुष्य की तरह ही चलो।
     पर जब तुमको देहाध्यास से मुक्त करना है , तब ये बताएंगे की तुम मनुष्य भी नहीं , हो पुरुष भी नहीं हो , स्त्री भी नहीं हो। और अंत में कहेंगे कि तुम जीव भी नहीं हो। जीवो ब्रह्मैव न अपरः ! ये तुम्हें अध्यास है , देहाध्यास , जिवाध्यास है , इन दो अध्यासों को छोड़कर तुम आत्मा हो ये जानने की कोशिश करो। कल इस पर विस्तार से बताएंगे आज यही पर समाप्त करते हैं। 
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