Q - 'ज्ञान हुआ… फिर भी टिक क्यों नहीं रहा ?'
#paramvani / जो हमेशा है,(चैतन्य -सच्चिदानन्द ) उसे कैसे टिकाओगे ?
प्रश्न-- श्री महाराज जी; 'मुझे ' ज्ञान तो हो चुका है , पर टिकता नहीं है। इसका क्या कारण है ? साधना करूँ ? या क्या करूँ ? कृपया निवारण कीजिये।
उत्तर - ज्ञान हो चुका है ; पर आप कौन हैं ? (3H में क्या हैं ?) जरा विचार कीजिये - 'ज्ञान' हुआ , तो जिसको आप ज्ञान कहते हैं , जिसका ज्ञान हुआ वो टिकेगा -कि ज्ञान टिकेगा ? जैसे 'मैं देह हूँ '(M/F), (उनको मैं समझा रहा हूँ।)' मैं देह हूँ -अभी जाग्रत में , यह ज्ञान हुआ। 'मैं देह हूँ' यह ज्ञान हुआ, और देह टिका भी रहता है ,पर क्या आपका ज्ञान टिका नहीं रहता ? सुषुप्ति में 'मैं देह हूँ ' यह ज्ञान नहीं टिका। पर देह टिका है ! यह दुनिया टिकी रही पर नींद में तुम्हारा यह ज्ञान चला जाता है। तो जगने के बाद आप घबराते हो क्या ? दूसरी एक समस्या है कि जिस देह को (M/F शरीर को) तुम 'मैं' के रूप में अभी जानते हो , ज्ञान न भी टिका रहे तो तुम्हें चिंता नहीं होती। चिंता तुम्हारी यह है कि जिस देह को तुम अभी मैं रूप से जानते हो; वही टिका नहीं रहता ! ज्ञान भी टिका रहे , पर देह टिका ही नहीं रहता ! पर यहाँ उल्टा है। वहाँ ज्ञान नहीं टिका रहता। परन्तु ब्रह्म तो टिका रहता है ! इसलिए खो जाने का भय चला गया। यही अच्छी बात है - ज्ञान टिका रहे या न टिका रहे। ज्ञाता टिके या न टिके !! पर एक बार जान लिया है कि मैं सदा रहता हूँ ! (अविनाशी आत्मा, इष्टदेव ) ! फिर आपको ज्ञान टिकाने की क्या जरूरत ? (2 :07 मिनट)
सुषुप्ति में ज्ञान नहीं टिका ; पर जब आपको देह का ज्ञान होता है ; तब क्या चिंता होने लगती है ? काहे की चिंता ? देह टिक नहीं रहा , बूढ़ा हो रहा है। ज्ञान टिका है , फिर भी देह नहीं टिका मालूम पड़ता है। इसलिए भय होता है। जब उसका ज्ञान हो तो वह टिका ही है। और जब ज्ञान ना रहे तो हमें और कुछ सोचने की जरूरत ही नहीं ! पर अभी समस्या यह है कि , देह ज्ञान टिका नहीं रहता , उससे जो तुम्हारा पुराना भ्रम है (M/F) होने का वो आ जाता है ! (2 : 45) ज्ञान न टिकने से भी अब कोई खतरा नहीं। पर दुनिया ख्याल आये , मरना ख्याल आये , दुःख ख्याल आये , उस समय ज्ञान न हो। ये समस्या है। देह का ज्ञान बिल्कुल चला जाये कोई खतरा नहीं। पर 'मैं ब्रह्म हूँ ' या ज्ञान हुआ वो टिका नहीं। मौत का ख्याल फिर आ गया , बुढ़ापा फिर आ गया। और ज्ञान से खतरा है , उसके अज्ञान से अब कोई खतरा नहीं। शायद ध्यान दो , या तो मैं अविविनाशी आत्मा (इष्टदेव , भगवान) मुक्त हूँ ! यह ज्ञान रहे। और वो ज्ञान नहीं रहा , नहीं टिका तो फिर क्या आ गया ? यदि मिथ्या ज्ञान ना आये। यदि विपरीत ज्ञान न आये।
देखो रस्सी का ज्ञान हो गया , तो अब आपको फिर डर लगता है ? तो वो रस्सी का ज्ञान नहीं टिका और सर्प का ज्ञान हावी हो गया। तो इसका अर्थ यह हुआ कि 'मैं देह हूँ ' यह अभिमान अभी तक पूरा नहीं गिरा ! मैं देह हूँ ', अधूरा हूँ ' , पापी हूँ ', छोटा हूँ'। वो जो समझ थी , उसे थोड़ी देर को भूल गए थे। पर अभी वो झूठी नहीं हुई है। इसलिए पहले जितना ज्ञान है , वो झूठा न हो जाये। सर्प ज्ञान झूठा है और रस्सी का ज्ञान सदा बना रहे। लेकिन अभी तुम्हारी हालत ऐसी है कि जैसे सर्प भी है और वैसी रस्सी भी है। लेकिन मुझे रस्सी मिल गयी। रस्सी भूले कि सर्प आ जायेगा। सर्प जब तक झूठा नहीं होगा , तब तक उसकी याद भी दुःख देगी ! इसलिए आपको जगत का मिथ्यात्व - ये झूठा है। ये माया मात्र है। (अहं जाने वाला नहीं है , तो उसको इष्टदेव का दास बना लो ! ) और जो तुम स्वयं रस्सी हो वो सच है। तो जो ज्ञान है वो सच है। (5: 03) जो अभी तक ज्ञान होता रहा - (M/F नाते , रिश्ते) ये भ्रम था। यदि जगने पर स्वप्न खो गया , ठीक है। पर यदि स्वप्न भी सच है , और जाग्रत भी सच है , तो गड़बड़ है। इसलिए स्वप्न सामने न रहे ये काफी नहीं है। स्वप्न झूठा था। ये पक्का बोध होना चाहिए। कई लोगों को स्वप्ना होता है , और उस स्वप्न को जिन्होंने झाड़ी में भूत समझा -भीरु लोग , वे जग जाने पर भी उसकी याद से डरते हैं। और वही स्वप्ना रोज हो , पर उसको मालूम है कि यह स्वप्न ही था ।यदि कोई ये बता दे ये स्व्प्न नहीं था , वे पाप थे , झाड़ी में छिपा भूत था - किसी ने जादू-टोना करा दिया होगा --झाड़ी में भूत से कायर लोग ही डरते हैं। इसलिए ये समस्या झूठी है। माया क्या है ? जो झूठ को सच दिखाती है,बस ! (6 : 28 ) और नींद आ जाये , तब भी जग के नहीं मानते ? ये माया ऐसा विचित्र सपना है , कि झूठा नहीं लगता। यदि तेरे अतिरिक्त सब झूठा है , यह जब समाधि में स्पष्ट हो जायेगा ; तब बात बनेगी। इसलिए अभी लगे रहो। (6:45 )
ब्रह्म को जानना ही, ब्रह्म हो जाना है। #paramvani /जो कुछ घट रहा है, वह उसी की योजना है !
ब्रह्मविद ब्रह्मवै भवति '
[নেতা হওয়ার পরিবর্তে, আপনার এলাকা ও অঞ্চলের একজন যোগ্য সন্তান হিসেবে উঠে দাঁড়ান। যোগ্যতা ক্ষণস্থায়ী, কিন্তু ব্যক্তিত্ব ও সম্মান চিরস্থায়ী।]
नेता नहीं बनकर अपने क्षेत्र का, अपने इलाके का सुयोग्य सन्तान के रूप में उठ कर खड़े हो जाइये , क्षमता क्षणभंगुर है , किन्तु व्यक्तित्व और और सम्मान चिरस्थायी है !
===========
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें