🔱🙏 भारत में भक्ति का मार्ग दक्षिण से उत्तर की ओर जाता है 🔱🙏
The path of devotion in India goes from south to north.
🔱 देशप्रेमियों के लिए एक उत्साहवर्धक समाचार : Unveiling of 'Statue of Equality' :श्री रामानुजाचार्य सहस्राब्दी समारोह :'समता की मूर्ति का अनावरण। शनिवार, 5 फरवरी, 2022 को हैदराबाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी’ (Statue of Equality) समानता (समता) की प्रतिमा का अनावरण किया। उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 13 फरवरी को 120 किलो सोने की प्रतिमा का अनावरण करेंगे। 'समता की मूर्ति' का उद्घाटन स्वामी रामानुजाचार्य की वर्तमान में जारी 1000 वीं जयंती के अवसर पर आयोजित होने वाले 'बारह दिवसीय सहस्राब्दी समारोह' का का हिस्सा है। इस दौरान उनके साथ श्री चिन्ना जीयर स्वामी भी मौजूद रहे।
प्रधानमंत्री मोदी ने भक्ति शाखा के संत श्री रामानुजाचार्य की सोने की मूर्ति के चरणों में पुष्पांजलि देते हुए कहा कि “मनुष्य के जीवन में गुरु की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है”- उन्होंने कहा कि इसीलिए हम गुरु की तुलना ईश्वर के साथ करते हैं --यह हमारे भारत की महानता है।"
ध्याम मूलं गुरुर मूर्ति, पूजा मूलं गुरु पदम्।
मन्त्र मूलं गुरुर वाक्यं, मोक्ष मूलं गुरु कृपा॥
अर्थ: ध्यान का मूल गुरु के रूप पर मन को एकाग्र रखने का अभ्यास करना है। पत्र-पुष्प से गुरु की पूजा कहाँ करें ? तो कहा पूजा-ध्यान करने का मूल स्थान श्री गुरु के चरण हैं। और मंत्र का मूल है- गुरु के मुख से निकला ईश्वर के अवतार वरिष्ठ के उच्चारण को गुरु-परम्परा में सीखकर - हिन्दी में नहीं पुकार कर बंगाली भाषा में तीन बार पुकारो - रामोकृष्णो! और मोक्ष -अर्थात 'भेंड़त्व के भ्रम से मुक्ति' का मूल गुरु/नेता-वरिष्ठ की कृपा है।
आज मां सरस्वती की आराधना के पावन पर्व, बसंत पंचमी का शुभ अवसर है। माँ सारदा के विशेष कृपा अवतार श्री रामानुजाचार्य जी की प्रतिमा का अनावरण इस अवसर पर किया जा रहा है ! मैं आप सभी को बसंत पंचमी की विशेष शुभकामनाएं देता हूं। श्री रामानुजाचार्य का ज्ञान , सम्पूर्ण दुनिया का मार्गदर्शन करे !
अतः हमारे लिए जरूरी ये है कि हम अपनी प्राचीन सर्वसमावेशी भारतीय संस्कृति से जुड़ें , अपने असली जड़ो से जुड़ें और अपनी वास्तविक शक्ति से परिचित हों। आज जब दुनिया में सामाजिक सुधारों की बात होती है, प्रगतिशीलता की बात होती है, तो माना जाता है कि सुधार जड़ों से दूर जाकर होगा. लेकिन, जब हम रामानुजाचार्य जी को देखते हैं, तो हमें अहसास होता है कि प्रगतिशीलता और प्राचीनता में कोई विरोध नहीं है। रामानुजाचार्य जी ने दलितों को पूजा का हक दिया। उन्होंने दलितों और पिछड़ों को गले लगाया। पीएम मोदी ने कहा, भारत एक ऐसा देश है, जिसके मनीषियों ने ज्ञान को खंडन-मंडन, स्वीकृति-अस्वीकृति से ऊपर उठकर देखा है। हमारे यहां अद्वैत भी है, द्वैत भी है। और, इन द्वैत-अद्वैत को समाहित करते हुये श्री रामानुजाचार्य जी का विशिष्टा-द्वैत भी है।
रामानुजाचार्य जी का प्रभाव पूरे देश में : लोगों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, रामानुजाचार्य जी भारत की एकता और अखंडता का भी एक प्रदीप्त प्रेरणा हैं। रामानुजाचार्य ने राष्ट्रीयता, लिंग, नस्ल, जाति या पंथ की परवाह किए बिना हर इंसान की भावना के साथ लोगों के उत्थान के लिए अथक प्रयास किया था। उन्होंने श्री रामानुजाचार्य को भारत की एकता और अखंडता की प्रेरणा करार देते हुए कहा कि उनका जन्म भले ही देश के दक्षिणी हिस्से में हुआ हो लेकिन उनका प्रभाव पूरे भारत पर है। आज रामानुजाचार्य जी की विशाल मूर्ति स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी के रूप में हमें समानता का संदेश दे रही है। एक ओर रामानुजाचार्य जी के भाष्यों में ज्ञान की पराकाष्ठा है, तो दूसरी ओर वो भक्तिमार्ग के जनक भी हैं। एक ओर वो समृद्ध सन्यास परंपरा (निवृत्ति मार्ग) के संत भी हैं, और दूसरी ओर गीता भाष्य में कर्म (प्रवृत्ति मार्ग) के महत्व को भी प्रस्तुत करते हैं। स्वामी विवेकानन्द की तरह वो खुद भी अपना पूरा जीवन (120 वर्ष) कर्म के लिए समर्पित करते हैं।
आज का बदलता हुआ भारत, एकजुट प्रयास कर रहा : विकास हो, सबका हो, बिना भेदभाव हो. सामाजिक न्याय, सबको मिले, बिना भेदभाव मिले। जिन्हें सदियों तक प्रताड़ित किया गया, वो पूरी गरिमा के साथ विकास के भागीदार बनें, इसके लिए आज का बदलता हुआ भारत, एकजुट प्रयास कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 फरवरी को 216 फीट की इस मूर्ति का अनावरण किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि , श्री रामानुजाचार्य ने हजारों साल पहले वेदान्ती समानता या (साम्यभाव) की अवधारणा बताई थी। कई सदियों पहले संत रामानुजाचार्य ने सभी मनुष्यों के बीच समानता स्थापित करने का पाठ पढ़ाया। क्योंकि संत रामानुजाचार्य समानता पर ज़ोर देते थे, दृढ़ विश्वास करते थे इसीलिये उनकी मूर्ति का नाम स्टैच्यू ऑफ़ इक्वैलिटी रखा गया है। आज भी भारतवर्ष जाति की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है और सैंकड़ों वर्ष पूर्व ही संत रामानुजाचार्य ने सभी जातियों के लिए मंदिर के दरवाज़ें खोलने पर ज़ोर दिया। हर तरह से विभाजित देशवासियों को उन्होंने 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का मतलब समझाया। संत रामानुजाचार्य मंदिरों से लोगों को भाईचारे का ज्ञान देते। उन्होंने राजवंशों को अर्थात क्षत्रियों को भी सबसे पिछड़े लोगों को अपनाने की सीख दी। उन्होंने जातिगत-भेदभाव के खिलाफ आध्यात्मिक आंदोलन को बढ़ावा दिया और हजारों वर्ष पहले ही बता दिया कि ईश्वर ही मानवरूप में हैं, जीव ही शिव है! दार्शनिक संत रामानुजाचार्य का कहना था कि हम एक-दूसरे को सम्मान देकर, एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सौहार्द की भावना रखकर ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं।
>>>'Colonial Mindset' and 'Live and Let Live - Mindset' : पाश्चात्य शिक्षा के गुलामों की मानसिकता- survival of the fittest' और 'सनातन मानसिकता - जीओ और जीनेदो ! समानता की मूर्ति का अनावरण करते हुए, पी.एम. मोदी ने कहा कि भारत का स्वाधीनता संग्राम केवल अपनी सत्ता और अपने अधिकारों की लड़ाई भर नहीं था। भारत के स्वाधीनता संग्राम दो विचारधारा -'Colonial Mindset तथा Live and let Live' के बीच संघर्ष था। इस लड़ाई में एक तरफ ‘औपनिवेशिक मानसिकता’ (Colonial Mindset) थी, तो दूसरी ओर ‘जियो और जीने दो’ (Live and let Live) की अवधारणा थी। भारत का स्वाधीनता संग्राम केवल अधिकारों की लड़ाई भर नहीं था ; इसमें एक ओर, ये 'Survival of the fittest ' योग्यतम की उत्तरजीविता का समर्थन करने वाली पाश्चात्य नस्लीय श्रेष्ठता और भौतिकवाद या चार्वाक*दर्शन की विलासी मानसिकता का उन्माद था, तो दूसरी ओर मानवता और आध्यात्म (spirituality-पुनर्जन्म) में आस्था थी !
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि, जब-जब धर्म की हानि होती है , उस समय जो सुधार निकलता है , वह समाज के लोगों के बीच से ही निकलता है। ये जरूरी नहीं है कि गुलामी की मानसिकता से प्रेरित होकर सुधार के लिए अपनी जड़ों से दूर जाकर पाश्चात्य देशों का अनुकरण करना पड़े। बुराई से लड़ने वालों को ही सम्मान मिलता है। सुधार समाज के लोगों से ही निकलता है।
भारतीय संस्कृति की गुरु-शिष्य परम्परा तथा पुनर्जन्म पर आस्था रखने वाले हजारों युवाओं ने भारतमाता की बलिवेदी पर अपना बलिदान दिया और इस लड़ाई में भारत विजयी हुआ ! भारत की आध्यात्मिक परंपरा विजयी हुई।
भारत के एक अन्य आचार्य (भगवान) महावीर स्वामी ने ‘जियो और जीने दो’ (Live and let Live) की शिक्षा देते हुए कहा था -"इस पृत्वी पर मनुष्य जीवन सर्वोपरि है, क्योंकि उसके पास विवेक - प्रयोग शक्ति है, इसलिए केवल उसे ही स्वतंत्र इच्छा से कर्म करने का अधिकार प्राप्त हुआ है। मनुष्य को विवेक -विचार से ऐसा कर्म करना चाहिए जिसके अच्छे कर्मों से ईश्वर खुश हो जाते हैं। सभी मनुष्यों व जीवों को जीने का समानाधिकार है ! अतः इस शरीर का प्रयोग निर्बल जीवों की रक्षा करने हेतु किया जाना चाहिए। ईश्वर द्वारा दिए गए इस जीवन को किस तरह व्यतीत करना है यह सबका निजी अधिकार है। हमें उन्हें दुःख पहुँचाकर इस अधिकार का हनन नही करना है, इसके विपरीत हमें स्वयं के जीवन पर ध्यान केंद्रित करना है। अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाने हेतु प्रयत्नशील होना है। स्वयं जीना है और अन्य जीवों को स्वतंत्र रूप से जीने देना है। किसी से कोई ईर्ष्या द्वेष न रखकर आत्म विकास पर केंद्रित होना है। जब सभी मनुष्य ऐसा कर सकने में समर्थ हो जाएंगे, तो सम्पूर्ण संसार मे शांति होगी व सब जीव धरती पर ही स्वर्ग का >रामराज्य का अनुभव करने लगेंगे!"
>>> राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद (President Ram Nath Kovind) ने रविवार को रामानुजाचार्य जी की स्वर्ण प्रतिमा का अनावरण किया। मुचिन्तल में रामानुजाचार्य सहस्राब्दी का भव्य समारोह 12वें दिन चल रहा है। राष्ट्रपति ने स्वर्ण प्रतिमा के अनावरण पर प्रसन्नता व्यक्त की है और लोगों को बधाई दी।
चिन्ना जीयर स्वामी ने किया राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का स्वागत : श्री श्री त्रिदंडी चिन्ना जीयर स्वामी ने कहा, ‘मैं राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का हृदय पूर्वक स्वागत करते हैं। इस देश में वेदों को बुनियाद बनाकर जितने प्रकार के लोग रहते हैं वे एक ही भगवान की संतान हैं। सब लोगों को भगवान का मंत्र मिलना चाहिए, केवल श्रद्धा की जरूरत है। यह बात 1000 साल पहले रामानुजाचार्य स्वामी ने कही थी और यही उन्होंने सिद्धांत दिया।
उन्होंने कहा कि भविष्य में मुचिन्तल आध्यात्मिक स्थल बनेगा। श्रीराम नगरम अद्वैत और समानता के केंद्र के रूप में चमकेगा। इस दौरान उन्होंने कहा कि रामानुजाचार्य जी की स्वर्णिम प्रतिमा का अनावरण करना मेरा परम सौभाग्य है। राष्ट्रपति ने कहा कि इस देश में रामानुजाचार्य जी की भव्य प्रतिमा को स्थापित कर चिन्ना जीयर स्वामी ने इतिहास रचा है। भारत के गौरवशाली इतिहास में भक्ति और समता के सबसे महान ध्वजवाहक भगवत श्री रामानुजाचार्य सहस्राब्दी स्मृति महामहोत्सव के शुभअवसर पर सभी देशवासियों को हार्दिक बधाई देता हूं। बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां वसंत पंचमी के दिन पांच फरवरी, 2022 को, 11वीं सदी के संत श्री रामानुजाचार्य की 216 फुट ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया था; जिसे ‘स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी’ कहा जाता है।
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा, ‘यह भव्य और विशाल प्रतिमा पंच धातु से निर्मित एक मूर्ति मात्र नहीं है। यह प्रतिमा भारत की संत परंपरा (गुरु-शिष्य परम्परा) का मूर्तिमान स्वरूप है। यह प्रतिमा भारत के समता मूलक समाज, 'वसुधैव कुटुंबकम' के स्वप्न का मूर्तिमान स्वरूप है। उन्होंने कहा, ‘लोगों में भक्ति और समानता का संदेश प्रसारित करने के लिए श्री रामानुजाचार्य ने श्री रंगम कांचीपुरम, तिरुपति, सिघांचलम और आंध्र प्रदेश के अन्य क्षेत्रों के साथ बद्रीनाथ, नैमशारण्य, द्वारिका, प्रयाग, मथुरा, अयोध्या, गया, पुष्कर और नेपाल तक की यात्रा की। श्री रामानुजाचार्य ने दक्षिण की भक्ति परंपरा को बौद्धिक आधार प्रदान किया है। ’
हैदराबाद में 11वीं सदी के संत रामानुजाचार्य की सहस्राब्दि जयंती समारोह में शामिल होने के बाद एक सभा को संबोधित करते हुए कोविंद ने कहा कि रामानुजाचार्य जैसे संतों ने सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित राष्ट्र की अवधारणा का निर्माण किया। कोविंद ने कहा कि भारत वर्ष की यह संस्कृति-आधारित राष्ट्र की अवधारणा पश्चिमी विचारों में परिभाषित तरीके से भिन्न है। सदियों पहले एक सूत्र में भारत को एकजुट करने वाली भक्ति परंपरा के संदर्भ पुराणों में पाए जाते हैं।
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा, ‘स्वामी रामानुज जी की प्रतिमा से इस क्षेत्र में विशेष अध्यात्मिक ऊर्जा का सदैव संचार होता रहेगा। यह एक दैवीय संयोग है कि इस क्षेत्र का नाम "राम नगर" है , यह क्षेत्र भक्ति भूमि है। श्री रामानुजाचार्य के 100 वर्षों से अधिक अपनी जीवन यात्रा के दौरान स्वामी जी ने आध्यात्मिक और सामाजिक स्वरूप को वैभव प्रदान किया।
रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत न केवल दर्शन में एक योगदान है, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में भी इसकी प्रासंगिकता को दर्शाता है। राष्ट्रपति ने कहा कि जिसे पश्चिम में दर्शनशास्त्र कहा जाता है, वह केवल अध्ययन के विषय में सिमट गया है। हालांकि, जिसे हम दर्शन कहते हैं, वह केवल शुष्क विश्लेषण का विषय नहीं बल्कि दुनिया और जीवन को देखने का एक तरीका भी है।
उन्होंने कहा कि इस प्रकार, समानता की हमारी अवधारणा पश्चिमी देशों से नहीं ली गई है। यह भारत की सांस्कृतिक मिट्टी में विकसित हुई है। रामानुजाचार्य ने समाज में असमानता को मिटाने के प्रयास किए थे। उन्होंने मंदिरों में निचली जातियों को अनुमति दी थी। रामानुजाचार्य ने लोगों में समानता फैलाई थी। रामानुजाचार्य ने लोगों के बीच भक्ति और समानता के लिए काम किया और अपने संदेशों से देश के कई हिस्सों को प्रेरित किया।
"वसुधैव कुटुम्बकम" का हमारा दृष्टिकोण समानता पर आधारित है। समानता हमारे लोकतंत्र की आधारशिला है। राष्ट्रपति ने कहा कि रामानुजाचार्य का महात्मा गांधी पर भी प्रभाव था। उन्होंने टिप्पणी की है कि भारत में भक्ति का मार्ग दक्षिण से उत्तर की ओर जाता है। भारत में यह हमेशा प्रासंगिक रहा है, जिसके लिए रामानुजाचार्य जैसे दार्शनिक-संतों का आभार। बाबा साहेब आंबेडकर ने भी रामानुजाचार्य के समतावादी आदर्शों का पूरे सम्मान के साथ उल्लेख किया था। संत-कवियों और दार्शनिकों ने सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित राष्ट्र की अवधारणा का निर्माण किया है।
वैष्णव परंपरा में सबके कल्याण के लिए काम करने को सर्वाधिक महत्व दिया गया है- राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा, ‘वैष्णव परंपरा में लोक संग्रह अर्थात सबके कल्याण के लिए काम करने को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। मैं चाहूंगा कि जिस निष्ठा के साथ आप सबने इस मूर्ति का निर्माण किया है, उसी भावना के साथ आप सब नर-नारयणी की सेवा तथा कल्याण हेतु देशव्यापी योजनाओं की परिकल्पना करें। मुझे विश्वास है कि इस संस्था द्वारा लोक कल्याण के प्रभावशाली कार्य किए जा रहे हैं और आगे भी किए जाएंगे। ऐसे कामों से समता मूलक समाज के हमारे राष्ट्रीय प्रयासों को बल मिलेगा।
>>>हैदराबाद (प्राचीन नाम भाग्य नगर)> का नया आकर्षण केन्द्र :अपने संबोधन में पीएम मोदी ने कहा, आज विशेष रूप से हैदराबाद (प्राचीन नाम भाग्य नगर) देश में एक ओर सरदार साहब की ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ (Statue of Unity) जहाँ राष्ट्रिय एकता और अखण्डता की शपथ दोहरा रही है, तो रामानुजाचार्य जी की ‘स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी’ (Statue of Equality) हमें समानता का संदेश दे रही है। वैष्णव परम्परा में भगवान विष्णु के 108 अवतार : हैदराबाद आने वाले पर्यटकों का लिए रामानुजम की प्रतिमा एक नया आकर्षण होगी।
>>>‘स्टैच्यू ऑफ इक्वलिटी’ हैदराबाद के बाहरी इलाके शमशाबाद के मुचिन्तल में 200 एकड़ से अधिक भूमि पर बनाई गई है। ‘स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी’ मेगा प्रोजेक्ट पर 1000 करोड़ रुपये की लागत आई है। आयोजकों का कहना है कि इस मूर्ति में 7000 टन पंच धातुओं का इस्तेमाल किया गया है। इसमें सोना, चांदी, तांबा, पीतल और जस्ते का इस्तेमाल भी किया गया है। जिसमें 120 किलो सोना लगा है। 120 किलो सोना लेने की वजह ये है कि रामानुजाचार्य 120 सालों तक जीवित रहे थे।
वैष्णव परंपरा के मुताबिक भगवान विष्णु के 108 अवतार (प्रेम स्वरुप भगवान शाक्य मुनि जैसे अवतार) और मंदिर माने जाते हैं। इसीलिये इस मूर्ति के साथ-साथ परिसर में चारों ओर स्मारक तिरुमाला, श्रीरंगम, कांची, अहोभिलम, बद्री नाथ, मुक्तिनाथ, अयोध्या, बृंदावन, कुंभकोणम के जैसे और श्री वैष्णववाद परंपरा अन्य 108 दिव्य देशम (सजावटी रूप से नक्काशीदार मंदिर या मॉडल मंदिर) बनाए गए हैं। परिसर में बने 108 मंदिर इन्ही दिव्यदेशों के प्रतिरूप हैं। इनका निर्माण होयसल शैली में किया गया है। इसमें कुल 468 स्तंभ हैं। विभिन्न स्थानों के मूर्तिकारों और विशेषज्ञों ने इसके लिए काम किया है। पत्थर के खंभों को राजस्थान में विशेष रूप से तराशा गया है।
>>>समता (पूर्णता) की प्रतिमा का 9 से है खास कनेक्शन : (पूर्णत्व की यानि 100 % निःस्वार्थपरता की प्रतिमा का 9 से है खास कनेक्शन :) ‘स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी’ को संत रामानुजाचार्य के जन्म के 1,000 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में बनाया गया है। नीचे की सतह को मिलाकर इस मूर्ति की कुल ऊँचाई 216 फीट है। 216 के अंकों को आप जोड़ेंगे तो 2+1+6 बराबर 9 होगा। 9 को पूर्ण अंक कहा जाता है और सनातन परंपरा में इसे शुभ अंक भी माना जाता है।
ये प्रतिमा 11वीं सदी के भक्ति शाखा (विशिष्टाद्वैत मार्ग) के संत श्री रामानुजाचार्य की स्मृति में तैयार की गई है। अब यहीं पर आपको यह बता दें कि इस प्रतिमा का 9 अंक से गहरा सम्बद्ध है। यह भद्रवेदी नामक 54 फीट ऊंचे भवन (पूर्णांक 9) पर निर्मित की गयी है। जिस सतह पर मूर्ति बनी है उसकी ऊंचाई 54 फीट है। पद्म (कमल) पीतम /पीठम जिस पर मूर्ति बनाई गई है, उसकी ऊंचाई 27 फीट है।उस कमल में 54 पंखुड़ियां हैं और उसके नीचे 36 हाथियों की मूर्तियाँ बनी हुई हैं। कमल की पत्तियों पर 18 शंख और 18 चक्र बने हैं। इस मूर्ति तक पहुंचने के लिए 108 सीढ़ियां हैं। इस सतह को भद्र पीतम के नाम से जाना जाता है। मूर्ति की ऊँचाई 108 फीट है। पद्मासन पर बैठने की मुद्रा में निर्मित यह मूर्ति दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है। उनके हाथ में लिया गया त्रिदण्डम (जिसे वैष्णव पीठाधिपति अपने साथ रखते हैं) 135 फीट ऊंचा है। श्री रामानुजाचार्य का जन्म 1017 में श्रीपेरुंबदूर में हुआ। उनके जन्म वर्ष का भी योग निकालेंगे तो 1+0+1+7 बराबर 9 निकलता है।
आर्किटेक्ट आनंद साईं इस मंदिर के आर्किटेक्ट हैं। यदाद्रि मंदिर के अलावा यह प्रतिमा विष्णु भक्तों और अन्य पर्यटकों को आर्कषित करेगी। इस वजह से हैदराबाद में पर्यटकों की तादाद भी बढ़ेगी। प्रतिमा की ऊंचाई 216 फुट है। रामानुजाचार्य की यह प्रतिमा पांच धातुओं सोना, चांदी, तांबा, पीतल और जस्ता से बनी है। पांच धातुओं से बनी यह मूर्ति दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मूर्ति है। इस मूर्ति में विभिन्न द्रविड़ साम्राज्यों की मूर्तिकला से जुड़ी चित्रकारी की गई है।
मूर्ति के नाखूनों से लेकर त्रिदंडम तक को बहुत सावधानी से बनाया गया है। इस मूर्ति में रामानुजाचार्य ध्यान-मुद्रा में बैठे हैं। इसके अलावा, ये प्रतिमा दुनिया में बैठी अवस्था में सबसे ऊंची धातु की प्रतिमाओं में से एक है। इस मूर्ति को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी शामिल किया गया है।
यह प्रतिमा 54-फीट ऊंचे आधार भवन पर स्थापित है, जिसका नाम ‘भद्र वेदी’ है। मूर्ति और मंदिरों के अलावा यहां रामानुजम की ज़िंदगी को दिखाती एक शैक्षणिक -गैलरी भी है , जिसमें एक डिजिटल वैदिक पुस्तकालय और प्राचीन भारतीय लेखन -अनुसंधान केंद्र, सेमिनार के लिए ऑडिटोरियम और विशेषज्ञों की बैठकें और एक ओमनिमैक्स थियेटर भी है। यहां पर एक संगीतमय फव्वारा भी लगाया गया है। यहां हर दिन नित्य अभिषेक की व्यवस्था भी की गयी है।
>>>त्रिदंडी चिन्ना जीयर स्वामी (Chinna Jeeyar Swami) :इस भव्य मूर्ति को तेलुगू भाषी राज्यों में लोकप्रिय वैष्णव संप्रदाय के संन्यासी त्रिदंडी चिन्ना जीयर स्वामी के आश्रम में लगाया गया है। रामानुजाचार्य की प्रतिमा की कल्पना रामानुजाचार्य आश्रम के सचिव श्री चिन्ना जियर स्वामी ने ही की थी। चिन्ना जियार स्वामी ने ने बताया कि , " हम रामानुजाचार्य की 1000वीं जयंती इस तरह मना रहे हैं ताकि वसुधैव कुटुंबकम का विचार आगे बढ़ सके। रामानुजम ने सामाजिक असमानता से लाखों लोगों को आज़ाद करवाया था। श्री रामानुजाचार्य ने राष्ट्रीयता, लिंग, नस्ल, जाति या पंथ की परवाह किए बिना हर इंसान की भावना के साथ लोगों के उत्थान के लिए अथक प्रयास किया था। इसीलिए इस मूर्ति का नाम समता मूर्ति (अंग्रेज़ी में स्टैच्यू ऑफ़ इक्वैलिटी) रखा गया है। 'हम इस समानता की मूर्ति को सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में भव्य रूप से बनाए रखने की योजना बना रहे हैं; ताकि दुनिया को सभी के लिए बराबरी वाली जगह को बनाने के लिए प्रेरित किया जा सके।
>>>Zeer Integrated Vedic Academics (Jiva)" : "जीवा " जीयर इंटीग्रेटेड वैदिक एकेडमिक के आयोजनकर्ता ने बताया कि इस परियोजना पर कुल 1000 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। तथा यह पूरी राशि- 1000 करोड़ रुपये उन्होंने भक्त जनों के द्वारा दिये दान से एकत्रित किये हैं। जीयर इंटीग्रेटेड वैदिक एकेडमिक (जीवा) का पूरा परिसर 45 एकड़ के इलाके में फैला हुआ है। जाने-माने उद्योगपति ''My Homes'' समूह के मालिक जुपल्ली रामेश्वर राव ने ये ज़मीन दान की है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि 'माय होम्स' समूह के मालिक श्री जुपल्ली रामेश्वर राव, राज्य की सत्ताधारी पार्टी के काफ़ी करीबी हैं।
समता मूर्ति की अनावरण के बाद मुचितल में चिन्ना जियर स्वामी ने कहा कि भगवान श्रीराम सत्यवचन -व्रत के धनी थे। श्रीराम की तरह ही मोदी भी सभी गुणों से संपन्न है। जब से मोदी प्रधानमंत्री बने हैं , तब से देश के लोग गर्व से कह रहे है कि वे हिंदू हैं। मोदी जब प्रधानमंत्री बने तो कश्मीर में 370 धारा के हटने से भारत माता सिर उठकर मुस्कुरा रही है।
>>>लक्ष्मी नारायण महायज्ञ~ : मूर्ति के उद्घाटन के दौरान एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। इसे आधुनिक समय का सबसे बड़ा यज्ञ माना जा रहा है। यहां लक्ष्मी नारायण महायज्ञ हो रहा है। इसके लिए 144 होमशालाएं, 1035 वेदियां बनाई गई हैं। 500 पंडित मंत्रोच्चार और यज्ञ कराएंगे। यज्ञ 14 दिनों तक चलेगा। इस दौरान 9 स्कूलों के छात्र वेद मंत्र पढ़ेंगे। वे एक करोड़ बार अष्टाक्षरी मंत्र पढ़ेंगे। यज्ञ का आयोजन करने वालों ने डेढ़ लाख किलो गाय के शुद्ध घी का इंतजाम किया है। यह घी राजस्थान के पथमेढ़ा से मंगाया जा रहा है। घी जुटाने में छह महीने का समय लगा , यज्ञ के लिए चार तरह के पेड़ों की लकड़ी से समिधा इकट्ठा की गई है। इन पेड़ों की लकड़ियां सिर्फ यज्ञ के लिए ही इस्तेमाल होती हैं।
रामानुजाचार्य सहस्राब्दी समारोह का आज 12वां दिन : श्री रामानुजाचार्य सहस्राब्दी समारोह का आज बारहवां दिन था। इस महीने की 7 तारीख को 32 मंदिरों, 10 तारीख को 36 मंदिरों , 11 तारीख को 19 मंदिरों और आज 21 मंदिरों का प्राणप्रतिष्ठा किया गया। आज श्री श्री श्री त्रिदंडी चिन्नाजियार स्वामीजी ने 21 मंदिरों में मूर्तियों का प्राणप्रतिष्ठा, कुम्भाभिषेक, महा संप्रोक्षण किया। इस कार्यक्रम में होम ग्रुप कंपनियों के चेयरमैन डॉक्टर जुपल्ली रामेश्वर राव ने भाग लिया। वहीं, टीटीडी के अध्यक्ष वाई.वी सुब्बारेड्डी ने तिरुमाला क्षेत्र प्राणप्रतिष्ठा कार्यक्रम में मौजूद रहे।
>>>विशाल मूर्ति पर 1000 करोड़ खर्च करने को लेकर सोशल मीडिया में चर्चा :
मूर्ति बनवाने वाले चिन्ना जीयर अपनी पिछली कुछ प्रतिक्रियाओं में कह चुके हैं, '' वर्णाश्रम व्यवस्था खत्म नहीं होनी चाहिए। उन्हें यहां बरकरार रहना चाहिए। हर जाति अपना-अपना काम करे, उसी से उनकी आध्यात्मिक उन्नति होगी। '' उनकी इन टिप्पणियों से खासा विवाद हो गया था। भारी खर्च कर इतनी बड़ी मूर्ति स्थापित करने के मुद्दे पर कई राजनितिक दलों के मत भी बंटे हुए हैं।
हालांकि इस मूर्ति को लेकर 'औपनिवेशिक मानसिकता' (Colonial Mindset) से ग्रस्त सोशल मीडिया में काफी बहस चल रही है। कई वामपंथी लोगों ने इतनी बड़ी मूर्ति स्थापित करने और इसे समानता की मूर्ति कहने पर प्रतिक्रिया जताई है। कुछ लोगों ने अपने पोस्ट में लिखा है कि रामानुजम ने भले ही कुछ प्रगतिशील मूल्यों की शिक्षा दी होगी लेकिन वे ऐसी नहीं थी, जिनसे जाति व्यवस्था पर कोई असर पड़ा।
>>>ओस्मानिया यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफेसर के श्रीनिवासुलु ने बीबीसी ?? से कहा, "मूर्ति बनाना ठीक है। कोई किसी समाज सुधारक या समाज की बेहतरी करने वालों की मूर्ति बनवा सकता है। लेकिन इतनी बड़ी मूर्ति इतने ताम-झाम और हजारों करोड़ रुपयों के साजोसामान के साथ स्थापित करने से अच्छा होता कि रामानुजम के नाम से कोई यूनिवर्सिटी बना दी जाती। " 'उन्होंने कहा, ''अच्छा होता अगर 1000 करोड़ रुपये से समाज को सीधे फायदा पहुंचाया जाता। "
"किसी यूनिवर्सिटी से इस पैसे से रामानुजम फंड या रिसर्च सेंटर स्थापित किया जा सकता था। अमेरिका और यूरोप में अमीर लोग ऐसा करते हैं। यह रिसर्च उनके नाम से होती है। रामानुजम के समय में उनके सिद्धांत पर समाज की क्या प्रतिक्रिया थी, इसके अध्ययन पर 1000 करोड़ रुपये किए जा सकते थे। यह जानना ज्यादा लाभकारी होता कि इन सिद्धांतों में क्या परिवर्तन किए गए। पिछले 1000 साल में यह कैसे विकसित हुआ और उनके दर्शन से क्या सामाजिक बदलाव हुए।"
इसी क्रम में केंद्रीय मंत्री किशन रेड्डी ने कहा कि -' अनेकता में एकता की खोज करना भारत की विशेषता है', संपूर्ण मानवता के बीच सिर्फ भाईचारा ही नहीं 'वसुधैव कुटुम्बकम ', मानवजाति एक परिवार है। उन्होंने कहा कि चिन्ना जियर स्वामी ने दिव्यक्षेत्र के लिए सभी भक्तों को एकजुट किया।
आयोजित समारोह में , प्रधानमंत्री के साथ तेलंगाना की माननीय राज्यपाल डॉक्टर श्रीमती तमिलिसाई सौंदरराजन, केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी और अन्य मौजूद थे। इसके साथ अलावा भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना, उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू, केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह, नीतिन गडकरी और, प्रल्हाद जोशी, आर.एस.एस प्रमुख मोहन भागवत भी इस 14 दिनों के समारोह में हिस्सा ले रहे हैं।
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