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मंगलवार, 8 अगस्त 2023

🔱" श्री रामानुजाचार्य सहस्राब्दी समारोह " (Sri Ramanujacharya Millennium Celebrations!) के अवसर पर 'समता की मूर्ति' (statue of equality) का अनावरण !🙏भारत में भक्ति का मार्ग दक्षिण से उत्तर की ओर जाता है 🔱🙏 सनातन धर्म का पनुर्जागरण - 1

 🔱🙏 भारत में भक्ति का मार्ग दक्षिण से उत्तर की ओर जाता है 🔱🙏 

The path of devotion in India goes from south to north.

🔱 देशप्रेमियों के लिए एक उत्साहवर्धक समाचार : Unveiling of 'Statue of Equality' :श्री रामानुजाचार्य सहस्राब्दी समारोह :'समता की मूर्ति का अनावरण। शनिवार, 5 फरवरी, 2022 को हैदराबाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘स्टैच्यू ऑफ इक्‍वालिटी’ (Statue of Equality) समानता (समता) की प्रतिमा का अनावरण किया। उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 13 फरवरी को 120 किलो सोने की प्रतिमा का अनावरण करेंगे। 'समता  की मूर्ति' का उद्घाटन स्वामी रामानुजाचार्य की वर्तमान में जारी 1000 वीं जयंती के अवसर पर आयोजित होने वाले 'बारह दिवसीय सहस्राब्दी समारोह' का का हिस्सा है। इस दौरान उनके साथ श्री चिन्ना जीयर स्वामी भी मौजूद रहे। 

प्रधानमंत्री मोदी ने भक्ति शाखा के संत श्री रामानुजाचार्य की सोने की मूर्ति के चरणों में पुष्पांजलि देते हुए कहा कि “मनुष्य के जीवन में गुरु की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है”-  उन्होंने कहा कि इसीलिए  हम गुरु की तुलना ईश्वर के साथ करते  हैं --यह हमारे भारत की महानता है।" 

ध्याम मूलं गुरुर मूर्ति, पूजा मूलं गुरु पदम्।

मन्त्र मूलं गुरुर वाक्यं, मोक्ष मूलं गुरु कृपा॥  

अर्थ: ध्यान का मूल गुरु के  रूप पर मन को एकाग्र रखने का अभ्यास करना है।  पत्र-पुष्प से गुरु की पूजा कहाँ करें ? तो कहा पूजा-ध्यान करने का मूल स्थान श्री    गुरु के चरण हैं। और मंत्र का मूल है- गुरु के मुख से निकला ईश्वर के अवतार वरिष्ठ के उच्चारण को गुरु-परम्परा में सीखकर - हिन्दी में नहीं पुकार कर बंगाली भाषा में तीन बार पुकारो - रामोकृष्णो! और मोक्ष -अर्थात 'भेंड़त्व के भ्रम से मुक्ति' का मूल गुरु/नेता-वरिष्ठ की कृपा है

 आज मां सरस्वती की आराधना के पावन पर्व, बसंत पंचमी का शुभ अवसर है।  माँ  सारदा के विशेष कृपा अवतार श्री रामानुजाचार्य जी की प्रतिमा का अनावरण इस अवसर पर किया जा रहा है !  मैं आप सभी को बसंत पंचमी की विशेष शुभकामनाएं देता हूं। श्री रामानुजाचार्य का ज्ञान , सम्पूर्ण दुनिया का मार्गदर्शन करे ! 

अतः हमारे लिए जरूरी ये है कि हम अपनी प्राचीन सर्वसमावेशी भारतीय संस्कृति से जुड़ें , अपने असली जड़ो से जुड़ें और  अपनी वास्तविक शक्ति से परिचित हों।  आज जब दुनिया में सामाजिक सुधारों की बात होती है, प्रगतिशीलता की बात होती है, तो माना जाता है कि सुधार जड़ों से दूर जाकर होगा. लेकिन, जब हम रामानुजाचार्य जी को देखते हैं, तो हमें अहसास होता है कि प्रगतिशीलता और प्राचीनता में कोई विरोध नहीं है। रामानुजाचार्य जी ने दलितों को पूजा का हक दिया।  उन्होंने दलितों और पिछड़ों को गले लगाया। पीएम मोदी ने कहा, भारत एक ऐसा देश है, जिसके मनीषियों ने ज्ञान को खंडन-मंडन, स्वीकृति-अस्वीकृति से ऊपर उठकर देखा है।  हमारे यहां अद्वैत भी है, द्वैत भी है।  और, इन द्वैत-अद्वैत को समाहित करते हुये श्री रामानुजाचार्य जी का विशिष्टा-द्वैत भी है। 

रामानुजाचार्य जी का प्रभाव पूरे देश में : लोगों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, रामानुजाचार्य जी भारत की एकता और अखंडता का भी एक प्रदीप्त प्रेरणा हैं। रामानुजाचार्य ने राष्ट्रीयता, लिंग, नस्ल, जाति या पंथ की परवाह किए बिना हर इंसान की भावना के साथ लोगों के उत्थान के लिए अथक प्रयास किया था। उन्होंने श्री रामानुजाचार्य को भारत की एकता और अखंडता की प्रेरणा करार देते हुए कहा कि उनका जन्म भले ही देश के दक्षिणी हिस्से में हुआ हो लेकिन उनका प्रभाव पूरे भारत पर है। आज रामानुजाचार्य जी की विशाल मूर्ति स्टैच्यू ऑफ इक्‍वालिटी के रूप में हमें समानता का संदेश दे रही है। एक ओर रामानुजाचार्य जी के भाष्यों में ज्ञान की पराकाष्ठा है, तो दूसरी ओर वो भक्तिमार्ग के जनक भी हैं।  एक ओर वो समृद्ध सन्यास परंपरा (निवृत्ति मार्ग)  के संत भी हैं, और दूसरी ओर गीता भाष्य में कर्म (प्रवृत्ति मार्ग) के महत्व को भी प्रस्तुत करते हैं। स्वामी विवेकानन्द की तरह वो खुद भी अपना पूरा जीवन (120 वर्ष)  कर्म के लिए समर्पित करते हैं

आज का बदलता हुआ भारत, एकजुट प्रयास कर रहा : विकास हो, सबका हो, बिना भेदभाव हो. सामाजिक न्याय, सबको मिले, बिना भेदभाव मिले।  जिन्हें सदियों तक प्रताड़ित किया गया, वो पूरी गरिमा के साथ विकास के भागीदार बनें, इसके लिए आज का बदलता हुआ भारत, एकजुट प्रयास कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 फरवरी को 216 फीट की इस मूर्ति का अनावरण किया। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि , श्री रामानुजाचार्य ने हजारों साल पहले वेदान्ती समानता या (साम्यभाव) की अवधारणा बताई थी। कई सदियों पहले संत रामानुजाचार्य ने सभी मनुष्यों के बीच समानता स्थापित करने का पाठ पढ़ाया। क्योंकि संत रामानुजाचार्य समानता पर ज़ोर देते थे, दृढ़ विश्वास करते थे इसीलिये उनकी मूर्ति का नाम स्टैच्यू ऑफ़ इक्वैलिटी रखा गया है। आज भी भारतवर्ष जाति की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है और सैंकड़ों वर्ष पूर्व ही संत रामानुजाचार्य ने सभी जातियों के लिए मंदिर के दरवाज़ें खोलने पर ज़ोर दिया। हर तरह से विभाजित देशवासियों को  उन्होंने 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का मतलब समझाया। संत रामानुजाचार्य मंदिरों से लोगों को भाईचारे का ज्ञान देते।  उन्होंने राजवंशों को अर्थात क्षत्रियों को भी सबसे पिछड़े लोगों को अपनाने की सीख दी।  उन्होंने जातिगत-भेदभाव के खिलाफ आध्यात्मिक आंदोलन को बढ़ावा दिया और हजारों वर्ष पहले ही बता दिया कि ईश्वर ही मानवरूप में हैं, जीव ही शिव है! दार्शनिक संत रामानुजाचार्य का कहना था कि हम एक-दूसरे को सम्मान देकर, एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सौहार्द की भावना रखकर ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं। 

>>>'Colonial Mindset' and  'Live and Let Live - Mindset' : पाश्चात्य शिक्षा के गुलामों की मानसिकता- survival of the fittest' और 'सनातन मानसिकता - जीओ और जीनेदो !   समानता की मूर्ति का अनावरण करते हुए, पी.एम. मोदी ने कहा कि भारत का स्वाधीनता संग्राम केवल अपनी सत्ता और अपने अधिकारों की लड़ाई भर नहीं था। भारत के स्वाधीनता संग्राम दो विचारधारा -'Colonial Mindset तथा Live and let Live' के बीच संघर्ष था। इस लड़ाई में एक तरफ ‘औपनिवेशिक मानसिकता’ (Colonial Mindset) थी, तो दूसरी ओर ‘जियो और जीने दो’ (Live and let Live) की अवधारणा थी। भारत का स्वाधीनता संग्राम केवल अधिकारों की लड़ाई भर नहीं था ; इसमें एक ओर, ये  'Survival of the fittest ' योग्यतम की उत्तरजीविता का समर्थन करने वाली पाश्चात्य नस्लीय श्रेष्ठता और भौतिकवाद या चार्वाक*दर्शन की विलासी मानसिकता का उन्माद था, तो दूसरी ओर मानवता और आध्यात्म (spirituality-पुनर्जन्म) में आस्था थी !

 प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि, जब-जब धर्म की हानि होती है , उस समय जो सुधार निकलता है , वह समाज के लोगों के बीच से ही निकलता है।  ये जरूरी नहीं है कि गुलामी की मानसिकता से प्रेरित होकर सुधार के लिए अपनी जड़ों से दूर जाकर पाश्चात्य देशों का अनुकरण करना पड़े। बुराई से लड़ने वालों को ही सम्मान मिलता है।  सुधार समाज के लोगों से ही निकलता है।

भारतीय संस्कृति की गुरु-शिष्य परम्परा तथा पुनर्जन्म पर आस्था रखने वाले हजारों युवाओं ने भारतमाता की बलिवेदी पर अपना बलिदान दिया और इस लड़ाई में भारत विजयी हुआ ! भारत की आध्यात्मिक परंपरा विजयी हुई।

भारत के एक अन्य आचार्य (भगवान) महावीर स्वामी ने ‘जियो और जीने दो’ (Live and let Live) की शिक्षा देते हुए कहा था -"इस पृत्वी  पर मनुष्य जीवन सर्वोपरि है, क्योंकि  उसके पास विवेक - प्रयोग शक्ति है, इसलिए केवल उसे ही स्वतंत्र इच्छा से कर्म करने का अधिकार प्राप्त हुआ है। मनुष्य को विवेक -विचार से ऐसा कर्म करना चाहिए जिसके अच्छे कर्मों से ईश्वर खुश हो जाते हैं। सभी मनुष्यों व जीवों को जीने का समानाधिकार है ! अतः इस शरीर का प्रयोग निर्बल जीवों की रक्षा करने हेतु किया जाना चाहिए।  ईश्वर द्वारा दिए गए इस जीवन को किस तरह व्यतीत करना है यह सबका निजी अधिकार है। हमें उन्हें दुःख पहुँचाकर इस अधिकार का हनन नही करना है,  इसके विपरीत हमें स्वयं के जीवन पर ध्यान केंद्रित करना है। अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाने हेतु प्रयत्नशील होना है। स्वयं जीना है और अन्य जीवों को स्वतंत्र रूप से जीने देना है। किसी से कोई ईर्ष्या द्वेष न रखकर आत्म विकास पर केंद्रित होना है। जब सभी मनुष्य ऐसा कर सकने में समर्थ हो जाएंगे, तो सम्पूर्ण संसार मे शांति होगी व सब जीव धरती पर ही स्वर्ग का >रामराज्य का अनुभव करने लगेंगे!"

>>> राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद (President Ram Nath Kovind) ने रविवार को रामानुजाचार्य जी की स्वर्ण प्रतिमा का अनावरण किया। मुचिन्तल में रामानुजाचार्य सहस्राब्दी का भव्य समारोह 12वें दिन चल रहा है।  राष्ट्रपति ने स्वर्ण प्रतिमा के अनावरण पर प्रसन्नता व्यक्त की है और लोगों को बधाई दी।

चिन्ना जीयर स्वामी ने किया राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का स्वागत : श्री श्री त्रिदंडी चिन्ना जीयर स्वामी ने कहा, ‘मैं राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का हृदय पूर्वक स्वागत करते हैं।  इस देश में वेदों को बुनियाद बनाकर जितने प्रकार के लोग रहते हैं वे एक ही भगवान की संतान हैं।  सब लोगों को भगवान का मंत्र मिलना चाहिए, केवल श्रद्धा की जरूरत है।  यह बात 1000 साल पहले रामानुजाचार्य स्वामी ने कही थी और यही उन्होंने सिद्धांत दिया। 

  उन्होंने कहा कि भविष्य में मुचिन्तल आध्यात्मिक स्थल बनेगा।  श्रीराम नगरम अद्वैत और समानता के केंद्र के रूप में चमकेगा।  इस दौरान उन्होंने कहा कि रामानुजाचार्य जी की स्वर्णिम प्रतिमा का अनावरण करना मेरा परम सौभाग्य है।  राष्ट्रपति ने कहा कि इस देश में रामानुजाचार्य जी की भव्य प्रतिमा को स्थापित कर चिन्ना जीयर स्वामी ने इतिहास रचा है। भारत के गौरवशाली इतिहास में भक्ति और समता के सबसे महान ध्वजवाहक भगवत श्री रामानुजाचार्य सहस्राब्दी स्मृति महामहोत्सव के शुभअवसर पर सभी देशवासियों को हार्दिक बधाई देता हूं।  बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां वसंत पंचमी के दिन पांच फरवरी, 2022 को, 11वीं सदी के संत श्री रामानुजाचार्य की 216 फुट ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया था; जिसे ‘स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी’ कहा जाता है। 

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा, ‘यह भव्य और विशाल प्रतिमा पंच धातु से निर्मित एक मूर्ति मात्र नहीं है।  यह प्रतिमा भारत की संत परंपरा (गुरु-शिष्य परम्परा) का मूर्तिमान स्वरूप है।  यह प्रतिमा भारत के समता मूलक समाज, 'वसुधैव कुटुंबकम' के स्वप्न का मूर्तिमान स्वरूप है। उन्होंने कहा, ‘लोगों में भक्ति और समानता का संदेश प्रसारित करने के लिए श्री रामानुजाचार्य ने श्री रंगम कांचीपुरम, तिरुपति, सिघांचलम और आंध्र प्रदेश के अन्य क्षेत्रों के साथ बद्रीनाथ, नैमशारण्य, द्वारिका, प्रयाग, मथुरा, अयोध्या, गया, पुष्कर और नेपाल तक की यात्रा की।  श्री रामानुजाचार्य ने दक्षिण की भक्ति परंपरा को बौद्धिक आधार प्रदान किया है। ’

 हैदराबाद में 11वीं सदी के संत रामानुजाचार्य की सहस्राब्दि जयंती समारोह  में शामिल होने के बाद एक सभा को संबोधित करते हुए कोविंद ने कहा कि रामानुजाचार्य जैसे संतों ने सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित राष्ट्र की अवधारणा का निर्माण किया।  कोविंद ने कहा कि भारत वर्ष की यह संस्कृति-आधारित राष्ट्र की अवधारणा पश्चिमी विचारों में परिभाषित तरीके से भिन्न है।  सदियों पहले एक सूत्र में भारत को एकजुट करने वाली भक्ति परंपरा के संदर्भ पुराणों में पाए जाते हैं। 

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा, ‘स्वामी रामानुज जी की प्रतिमा से इस क्षेत्र में विशेष अध्यात्मिक ऊर्जा का सदैव संचार होता रहेगा।  यह एक दैवीय संयोग है कि इस क्षेत्र का नाम "राम नगर" है , यह क्षेत्र भक्ति भूमि है। श्री रामानुजाचार्य के 100 वर्षों से अधिक अपनी जीवन यात्रा के दौरान स्वामी जी ने आध्यात्मिक और सामाजिक स्वरूप को वैभव प्रदान किया। 

रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत न केवल दर्शन में एक योगदान है, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में भी इसकी प्रासंगिकता को दर्शाता है। राष्ट्रपति ने कहा कि जिसे पश्चिम में दर्शनशास्त्र कहा जाता है, वह केवल अध्ययन के विषय में सिमट गया है।  हालांकि, जिसे हम दर्शन कहते हैं, वह केवल शुष्क विश्लेषण का विषय नहीं बल्कि दुनिया और जीवन को देखने का एक तरीका भी है। 

उन्होंने कहा कि इस प्रकार, समानता की हमारी अवधारणा पश्चिमी देशों से नहीं ली गई है।  यह भारत की सांस्कृतिक मिट्टी में विकसित हुई है। रामानुजाचार्य ने समाज में असमानता को मिटाने के प्रयास किए थे।  उन्होंने मंदिरों में निचली जातियों को अनुमति दी थी। रामानुजाचार्य ने लोगों में समानता फैलाई थी।  रामानुजाचार्य ने लोगों के बीच भक्ति और समानता के लिए काम किया और अपने संदेशों से देश के कई हिस्सों को प्रेरित किया।

"वसुधैव कुटुम्बकम" का हमारा दृष्टिकोण समानता पर आधारित है।  समानता हमारे लोकतंत्र की आधारशिला है। राष्ट्रपति ने कहा कि  रामानुजाचार्य का महात्मा गांधी पर भी प्रभाव था।  उन्होंने टिप्पणी की है कि भारत में भक्ति का मार्ग दक्षिण से उत्तर की ओर जाता है।  भारत में यह हमेशा प्रासंगिक रहा है, जिसके लिए रामानुजाचार्य जैसे दार्शनिक-संतों का आभार।  बाबा साहेब आंबेडकर ने भी रामानुजाचार्य के समतावादी आदर्शों का पूरे सम्मान के साथ उल्लेख किया था। संत-कवियों और दार्शनिकों ने सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित राष्ट्र की अवधारणा का निर्माण किया है। 

वैष्णव परंपरा में सबके कल्याण के लिए काम करने को सर्वाधिक महत्व दिया गया है- राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा, ‘वैष्णव परंपरा में लोक संग्रह अर्थात सबके कल्याण के लिए काम करने को सर्वाधिक महत्व दिया गया है।  मैं चाहूंगा कि जिस निष्ठा के साथ आप सबने इस मूर्ति का निर्माण किया है, उसी भावना के साथ आप सब नर-नारयणी की सेवा तथा कल्याण हेतु देशव्यापी योजनाओं की परिकल्पना करें।  मुझे विश्वास है कि इस संस्था द्वारा लोक कल्याण के प्रभावशाली कार्य किए जा रहे हैं और आगे भी किए जाएंगे।  ऐसे कामों से समता मूलक समाज के हमारे राष्ट्रीय प्रयासों को बल मिलेगा। 


>>>हैदराबाद (प्राचीन नाम भाग्य नगर)> का नया आकर्षण केन्द्र :अपने संबोधन में पीएम मोदी ने कहा, आज विशेष रूप से हैदराबाद (प्राचीन नाम भाग्य नगर) देश में एक ओर सरदार साहब की ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ (Statue of Unity) जहाँ राष्ट्रिय एकता और अखण्डता की शपथ दोहरा रही है, तो रामानुजाचार्य जी की ‘स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी’ (Statue of Equality) हमें समानता का संदेश दे रही है। वैष्णव परम्परा में भगवान विष्णु के 108 अवतार :  हैदराबाद आने वाले पर्यटकों का लिए रामानुजम की प्रतिमा एक नया आकर्षण होगी।

>>>‘स्टैच्यू ऑफ इक्वलिटी’ हैदराबाद के बाहरी इलाके शमशाबाद के मुचिन्तल में 200 एकड़ से अधिक भूमि पर बनाई गई है।  ‘स्टैच्यू ऑफ इक्‍वालिटी’ मेगा प्रोजेक्ट पर 1000 करोड़ रुपये की लागत आई है। आयोजकों का कहना है कि इस मूर्ति में 7000 टन पंच धातुओं का इस्तेमाल किया गया है। इसमें सोना, चांदी, तांबा, पीतल और जस्ते का इस्तेमाल भी किया गया है। जिसमें 120 किलो सोना लगा है। 120 किलो सोना लेने की वजह ये है कि रामानुजाचार्य 120 सालों तक जीवित रहे थे। 

वैष्णव परंपरा के मुताबिक भगवान विष्णु के 108 अवतार (प्रेम स्वरुप भगवान शाक्य मुनि जैसे अवतार) और मंदिर माने जाते हैं। इसीलिये इस मूर्ति के साथ-साथ परिसर में चारों ओर स्मारक तिरुमाला, श्रीरंगम, कांची, अहोभिलम, बद्री नाथ, मुक्तिनाथ, अयोध्या, बृंदावन, कुंभकोणम के जैसे और श्री वैष्णववाद परंपरा अन्य 108 दिव्य देशम (सजावटी रूप से नक्काशीदार मंदिर या मॉडल मंदिर) बनाए गए हैं।  परिसर में बने 108 मंदिर इन्ही दिव्यदेशों के प्रतिरूप हैं। इनका निर्माण होयसल शैली में किया गया है। इसमें कुल 468 स्तंभ हैं। विभिन्न स्थानों के मूर्तिकारों और विशेषज्ञों ने इसके लिए काम किया है। पत्थर के खंभों को राजस्थान में विशेष रूप से तराशा गया है। 

 >>>समता (पूर्णता) की प्रतिमा का 9 से है खास कनेक्शन : (पूर्णत्व की यानि 100 % निःस्वार्थपरता की प्रतिमा का 9 से है खास कनेक्शन :)  ‘स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी’ को संत रामानुजाचार्य के जन्म के 1,000 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में बनाया गया है। नीचे की सतह को मिलाकर इस मूर्ति की कुल ऊँचाई 216 फीट है। 216 के अंकों को आप जोड़ेंगे तो 2+1+6 बराबर 9 होगा।  9 को पूर्ण अंक कहा जाता है और सनातन परंपरा में इसे शुभ अंक भी माना जाता है। 

ये प्रतिमा 11वीं सदी के भक्ति शाखा (विशिष्टाद्वैत मार्ग) के संत श्री रामानुजाचार्य की स्मृति में तैयार की गई है। अब यहीं पर आपको यह बता दें कि इस प्रतिमा का 9 अंक से गहरा सम्बद्ध है। यह भद्रवेदी नामक 54 फीट ऊंचे भवन (पूर्णांक 9) पर निर्मित की गयी है।  जिस सतह पर मूर्ति बनी है उसकी ऊंचाई 54 फीट है। पद्म (कमल) पीतम /पीठम जिस पर मूर्ति बनाई गई है, उसकी ऊंचाई 27 फीट है।उस कमल में 54 पंखुड़ियां हैं और उसके नीचे 36 हाथियों की मूर्तियाँ बनी हुई हैं। कमल की पत्तियों पर 18 शंख और 18 चक्र बने हैं। इस मूर्ति तक पहुंचने के लिए 108 सीढ़ियां हैं। इस सतह को भद्र पीतम के नाम से जाना जाता है। मूर्ति की ऊँचाई 108 फीट है। पद्मासन पर बैठने की मुद्रा में निर्मित यह मूर्ति दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है।  उनके हाथ में लिया गया त्रिदण्डम (जिसे वैष्णव पीठाधिपति अपने साथ रखते हैं) 135 फीट ऊंचा है।   श्री रामानुजाचार्य का जन्म 1017 में श्रीपेरुंबदूर में हुआ। उनके जन्म वर्ष का भी योग निकालेंगे तो 1+0+1+7 बराबर 9 निकलता है। 

आर्किटेक्ट आनंद साईं इस मंदिर के आर्किटेक्ट हैं।  यदाद्रि मंदिर के अलावा यह प्रतिमा विष्णु भक्तों और अन्य पर्यटकों को आर्कषित करेगी।  इस वजह से हैदराबाद में पर्यटकों की तादाद भी बढ़ेगी। प्रतिमा की ऊंचाई 216 फुट है। रामानुजाचार्य की यह प्रतिमा पांच धातुओं सोना, चांदी, तांबा, पीतल और जस्ता से बनी है। पांच धातुओं से बनी यह मूर्ति दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मूर्ति है। इस मूर्ति में विभिन्न द्रविड़ साम्राज्यों की मूर्तिकला से जुड़ी चित्रकारी की गई है। 

 मूर्ति के नाखूनों से लेकर त्रिदंडम तक को बहुत सावधानी से बनाया गया है। इस मूर्ति में रामानुजाचार्य ध्यान-मुद्रा में बैठे हैं।  इसके अलावा, ये प्रतिमा दुनिया में बैठी अवस्था में सबसे ऊंची धातु की प्रतिमाओं में से एक है।  इस मूर्ति को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी  शामिल किया गया है।

 यह प्रतिमा 54-फीट ऊंचे आधार भवन पर स्थापित है, जिसका नाम ‘भद्र वेदी’ है। मूर्ति और मंदिरों के अलावा यहां रामानुजम की ज़िंदगी को दिखाती एक शैक्षणिक -गैलरी भी है , जिसमें  एक डिजिटल वैदिक पुस्तकालय और प्राचीन भारतीय लेखन -अनुसंधान केंद्र, सेमिनार के लिए ऑडिटोरियम और विशेषज्ञों की बैठकें और एक ओमनिमैक्स थियेटर भी है।  यहां पर एक संगीतमय फव्वारा भी लगाया गया है।  यहां हर दिन नित्य अभिषेक की व्यवस्था भी की गयी है।

>>>त्रिदंडी चिन्ना जीयर स्वामी (Chinna Jeeyar Swami) :इस भव्य मूर्ति को तेलुगू भाषी राज्यों में लोकप्रिय वैष्णव संप्रदाय के संन्यासी त्रिदंडी चिन्ना जीयर स्वामी के आश्रम में  लगाया गया है। रामानुजाचार्य की प्रतिमा की कल्पना रामानुजाचार्य आश्रम के सचिव श्री चिन्ना जियर स्वामी ने ही की थी।  चिन्ना जियार स्वामी  ने ने बताया कि , " हम रामानुजाचार्य की 1000वीं जयंती इस तरह मना रहे हैं ताकि वसुधैव कुटुंबकम का विचार आगे बढ़ सके।  रामानुजम ने सामाजिक असमानता से लाखों लोगों को आज़ाद करवाया था। श्री रामानुजाचार्य ने राष्ट्रीयता, लिंग, नस्ल, जाति या पंथ की परवाह किए बिना हर इंसान की भावना के साथ लोगों के उत्थान के लिए अथक प्रयास किया था। इसीलिए इस मूर्ति का नाम समता मूर्ति (अंग्रेज़ी में स्टैच्यू ऑफ़ इक्वैलिटी) रखा गया है। 'हम इस समानता की मूर्ति को सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में भव्य रूप से बनाए रखने की योजना बना रहे हैं;  ताकि दुनिया को सभी के लिए बराबरी वाली जगह को बनाने के लिए प्रेरित किया जा सके।

>>>Zeer Integrated Vedic Academics (Jiva)" : "जीवा " जीयर इंटीग्रेटेड वैदिक एकेडमिक  के आयोजनकर्ता ने बताया कि  इस परियोजना पर कुल 1000 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। तथा यह पूरी राशि- 1000 करोड़ रुपये उन्होंने भक्त जनों के द्वारा दिये दान से एकत्रित किये हैं। जीयर इंटीग्रेटेड वैदिक एकेडमिक (जीवा) का पूरा परिसर 45 एकड़ के इलाके में फैला हुआ   है। जाने-माने उद्योगपति ''My Homes'' समूह के मालिक जुपल्ली रामेश्वर राव ने ये ज़मीन दान की है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि 'माय होम्स' समूह के मालिक श्री जुपल्ली रामेश्वर राव, राज्य की सत्ताधारी पार्टी के काफ़ी करीबी हैं

 समता मूर्ति की अनावरण के बाद मुचितल में  चिन्ना जियर स्वामी ने कहा कि भगवान श्रीराम सत्यवचन -व्रत के धनी थे। श्रीराम की तरह ही मोदी भी सभी गुणों से संपन्न है। जब से मोदी प्रधानमंत्री बने हैं , तब से देश के लोग गर्व से कह रहे है कि वे हिंदू हैं। मोदी जब प्रधानमंत्री बने तो कश्मीर में 370 धारा के हटने से भारत माता सिर उठकर मुस्कुरा रही है। 

>>>लक्ष्मी नारायण महायज्ञ~ : मूर्ति के उद्घाटन के दौरान एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। इसे आधुनिक समय का सबसे बड़ा यज्ञ माना जा रहा है।  यहां लक्ष्मी नारायण महायज्ञ हो रहा है।  इसके लिए 144 होमशालाएं, 1035 वेदियां बनाई गई हैं।  500 पंडित मंत्रोच्चार और यज्ञ कराएंगे।  यज्ञ 14 दिनों तक चलेगा। इस दौरान 9 स्कूलों के छात्र वेद मंत्र पढ़ेंगे।  वे एक करोड़ बार अष्टाक्षरी मंत्र पढ़ेंगे।  यज्ञ का आयोजन करने वालों ने डेढ़ लाख किलो गाय के शुद्ध घी का इंतजाम किया है।  यह घी राजस्थान के पथमेढ़ा से मंगाया जा रहा है। घी जुटाने में छह महीने का समय लगा , यज्ञ के लिए चार तरह के पेड़ों की लकड़ी से समिधा इकट्ठा की गई है।  इन पेड़ों की लकड़ियां सिर्फ यज्ञ के लिए ही इस्तेमाल होती हैं। 

रामानुजाचार्य सहस्राब्दी समारोह का आज 12वां दिन : श्री रामानुजाचार्य सहस्राब्दी समारोह का आज बारहवां दिन था।  इस महीने की 7 तारीख को 32 मंदिरों, 10 तारीख को 36 मंदिरों , 11 तारीख को 19 मंदिरों और आज 21 मंदिरों का प्राणप्रतिष्ठा किया गया।  आज श्री श्री श्री त्रिदंडी चिन्नाजियार स्वामीजी ने 21 मंदिरों में मूर्तियों का प्राणप्रतिष्ठा, कुम्भाभिषेक, महा संप्रोक्षण किया।  इस कार्यक्रम में होम ग्रुप कंपनियों के चेयरमैन डॉक्टर जुपल्ली रामेश्वर राव ने भाग लिया।  वहीं, टीटीडी के अध्यक्ष वाई.वी सुब्बारेड्डी ने तिरुमाला क्षेत्र प्राणप्रतिष्ठा कार्यक्रम में मौजूद रहे। 

>>>विशाल मूर्ति पर 1000 करोड़ खर्च करने को लेकर सोशल मीडिया में चर्चा : 

मूर्ति बनवाने वाले चिन्ना जीयर अपनी पिछली कुछ प्रतिक्रियाओं में कह चुके हैं, '' वर्णाश्रम व्यवस्था खत्म नहीं होनी चाहिए।  उन्हें यहां बरकरार रहना चाहिए।  हर जाति अपना-अपना काम करे, उसी से उनकी आध्यात्मिक उन्नति होगी। '' उनकी इन टिप्पणियों से खासा विवाद हो गया था। भारी खर्च कर इतनी बड़ी मूर्ति स्थापित करने के मुद्दे पर कई राजनितिक दलों के मत भी बंटे हुए हैं। 

हालांकि इस मूर्ति को लेकर 'औपनिवेशिक मानसिकता' (Colonial Mindset) से ग्रस्त सोशल मीडिया में काफी बहस चल रही है। कई वामपंथी लोगों ने इतनी बड़ी मूर्ति स्थापित करने और इसे समानता की मूर्ति कहने पर प्रतिक्रिया जताई है। कुछ लोगों ने अपने पोस्ट में लिखा है कि रामानुजम ने भले ही कुछ प्रगतिशील मूल्यों की शिक्षा दी होगी लेकिन वे ऐसी नहीं थी, जिनसे जाति व्यवस्था पर कोई असर पड़ा।

>>>ओस्मानिया यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफेसर के श्रीनिवासुलु ने बीबीसी ?? से कहा, "मूर्ति बनाना ठीक है।  कोई किसी समाज सुधारक या समाज की बेहतरी करने वालों की मूर्ति बनवा सकता है।  लेकिन इतनी बड़ी मूर्ति इतने ताम-झाम और हजारों करोड़ रुपयों के साजोसामान के साथ स्थापित करने से अच्छा होता कि रामानुजम के नाम से कोई यूनिवर्सिटी बना दी जाती। "  'उन्होंने कहा, ''अच्छा होता अगर 1000 करोड़ रुपये से समाज को सीधे फायदा पहुंचाया जाता। "  

"किसी यूनिवर्सिटी से इस पैसे से रामानुजम फंड या रिसर्च सेंटर स्थापित किया जा सकता था।  अमेरिका और यूरोप में अमीर लोग ऐसा करते हैं। यह रिसर्च उनके नाम से होती है। रामानुजम के समय में उनके सिद्धांत पर समाज की क्या प्रतिक्रिया थी, इसके अध्ययन पर 1000 करोड़ रुपये किए जा सकते थे।  यह जानना ज्यादा लाभकारी होता कि इन सिद्धांतों में क्या परिवर्तन किए गए।  पिछले 1000 साल में यह कैसे विकसित हुआ और उनके दर्शन से क्या सामाजिक बदलाव हुए।"

 इसी क्रम में केंद्रीय मंत्री किशन रेड्डी ने कहा कि -' अनेकता में एकता की खोज करना भारत की विशेषता है', संपूर्ण मानवता के बीच सिर्फ भाईचारा ही नहीं 'वसुधैव कुटुम्बकम ', मानवजाति एक परिवार है। उन्होंने कहा कि चिन्ना जियर स्वामी ने दिव्यक्षेत्र के लिए सभी भक्तों को एकजुट किया।

आयोजित समारोह में , प्रधानमंत्री के साथ तेलंगाना की  माननीय राज्यपाल डॉक्टर श्रीमती तमिलिसाई सौंदरराजन, केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी और अन्य मौजूद थे। इसके साथ अलावा भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना, उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू, केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह, नीतिन गडकरी और, प्रल्हाद जोशी, आर.एस.एस प्रमुख मोहन भागवत भी इस 14 दिनों के समारोह में हिस्सा ले रहे हैं। 

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गुरुवार, 20 जुलाई 2023

राजयोग अष्टम अध्याय [हिन्दी में] संक्षिप्त राजयोग | कूर्म पुराण से देवर्षि नारद के वैकुण्ठ जाने की कथा

  राजयोग 

अष्टम अध्याय 

 संक्षिप्त राजयोग 

[CHAPTER VIII/RAJA-YOGA IN BRIEF]

राजयोग का सारांश : कूर्म-पुराण से अनुवादित 

[साभार @@@@https://www.khabardailyupdate.com/2022/06/rajyog-chapter-eighth-in-hindi.html]

>>>Yoga is divided into two parts. योगाग्नि मनुष्य के पापपिंजर को दग्ध कर देती है। तब सत्त्वशुद्धि होती है और साक्षात् निर्वाण की प्राप्ति होती है। योग से ज्ञानलाभ होता है; ज्ञान फिर योगी की मुक्ति के पथ का सहायक है। जिनमें योग और ज्ञान, दोनों ही वर्तमान हैं, ईश्वर उनके प्रति प्रसन्न होता है। जो लोग प्रतिदिन एक बार, दो बार, तीन बार या सारे समय महायोग का अभ्यास करते हैं, उन्हें देवता समझना चाहिए। योग दो प्रकार के हैं; जैसे- अभावयोग और महायोग। 

जब शून्य तथा सब प्रकार के गुण से रहित (निर्गुण-निराकार) रूप से अपना चिन्तन किया जाता है, (meditated upon as zero) तब उसे अभावयोग कहते हैं; और जिस योग के द्वारा आत्मा आनन्दपूर्ण, पवित्र और ब्रह्म के अभिन्न रूप (अवतार वरिष्ठ के नामरूप) से चिन्तन किया जाता है, उसे महायोग कहते हैं। योगी इनमें से प्रत्येक के द्वारा ही आत्मसाक्षात्कार कर लेते हैं। हम दूसरे जिन योगों के बारे में शास्त्रों में पढ़ते या सुनते हैं, वे सब योग इस उत्तम महायोग जिसमें योगी अपने को तथा सारे जगत् को साक्षात् भगवत्स्वरूप देखते हैं के साथ एक श्रेणी में शामिल नहीं हो सकते। यह सारे योगों में श्रेष्ठ है।

यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि, ये राजयोग के विभिन्न अंग या सोपान हैं। यम का अर्थ है- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। इस यम से चित्तशुद्धि होती है। शरीर, मन और वचन के द्वारा कभी किसी प्राणी की हिंसा न करना या उन्हें क्लेश न देना- यह अहिंसा कहलाता है। अहिंसा से बढ़कर और धर्म नहीं। मनुष्य के लिए जीव के प्रति यह अहिंसाभाव रखने से अधिक और कोई उच्चतर सुख नहीं है। सत्य के द्वारा हम कर्मफल के भागी होते हैं; सत्य से सब कुछ मिलता है; सत्य में सब कुछ प्रतिष्ठित है। यथार्थ कथन को ही सत्य कहते हैं। 

चोरी से या बलपूर्वक दूसरे की चीज को न लेने का नाम है अस्तेय तन मन वचन से सर्वदा सब अवस्थाओं में मैथुन का त्याग ही ब्रह्मचर्य है। अत्यन्त कष्ट के समय में भी किसी मनुष्य से कोई उपहार ग्रहण न करने को अपरिग्रह कहते हैं। अपरिग्रह साधना के पीछे यह कारण है कि किसी से कुछ लेने से हृदय अपवित्र हो जाता है, लेनेवाला हीन हो जाता है, वह अपनी स्वतन्त्रता खो बैठता है और बद्ध एवं आसक्त हो जाता है। निम्नलिखित साधन भी योग में सफलता के लिए सहायक हैं और वे हैं नियम अर्थात् नियमित अभ्यास और व्रतपरिपालन तप, स्वाध्याय, सन्तोष, शौच और ईश्वरप्रणिधान- इन्हें नियम कहते हैं। व्रत उपवास या अन्य उपायों से देहसंयम करना शारीरिक तपस्या कहलाता है। 

वेदपाठ या दूसरे किसी मन्त्रोच्चारण को सत्त्वशुद्धिकर स्वाध्याय कहते हैं। मन्त्र जपने के लिए तीन प्रकार के नियम हैं- वाचिक, उपांशु और मानस। वाचिक से उपांशु जप श्रेष्ठ है और उपांशु से मानस जप। जो जप इतने ऊँचे स्वर से किया जाता है कि सभी सुन सकते हैं, उसे वाचिक जप कहते हैं। जिस जप में ओठों का स्पन्दन मात्र होता है, पर पास रहनेवाला कोई मनुष्य सुन नहीं सकता, उसे उपांशु कहते हैं। और जिसमें किसी शब्द का उच्चारण नहीं होता, केवल मन ही मन जप किया जाता है और उसके साथ उस मन्त्र का अर्थ स्मरण किया जाता है , उसे मानसिक जप कहते हैं। यह मानसिक जप ही सब से श्रेष्ठ है।

ऋषियों ने कहा है- शौच दो प्रकार के हैं, बाह्य और आभ्यन्तर। मिट्टी, जल या दूसरी वस्तुओं से शरीर को शुद्ध करना बाह्य शौच कहलाता है, जैसे- स्नानादि। सत्य एवं अन्यान्य धर्मों के पालन के द्वारा मन की शुद्धि को आभ्यन्तर शौच कहते हैं। बाह्य और आभ्यन्तर, दोनों ही शुद्धि आवश्यक हैं। केवल भीतर पवित्र रहकर बाहर अशुचि रहने से शौच पूरा नहीं हुआ। जब कभी दोनों प्रकार के शौच का अनुष्ठान करना सम्भव न हो, तब आभ्यन्तर शौच का वलम्बन ही श्रेयस्कर है। पर ये दोनों शौच हुए बिना कोई भी योगी नहीं बन सकता। ईश्वर की स्तुति, स्मरण और पूजाअर्चनारूप भक्ति का नाम ईश्वरप्रणिधान है। 

यह तो यम और नियम के बारे में हुआ। उसके बाद है आसन। आसन के बारे में इतना ही समझ लेना चाहिए कि वक्षःस्थल, ग्रीवा और सिर को सीधे रखकर शरीर को स्वच्छन्द रीति से रखना होगा। 

अब प्राणायाम के बारे में कहा जाएगा। प्राण का अर्थ है, अपने शरीर के भीतर रहनेवाली जीवनीशक्ति, और आयाम का अर्थ है, उसका संयम प्राणायाम तीन प्रकार के हैं- अधम, मध्यम, और उत्तम। वह तीन भागों में विभक्त हैं, जैसे- पूरक, कुम्भक और रेचक। जिस प्राणायाम बारह सेकण्ड तक वायु का पूरण किया जाता है, उसे अधम प्राणायाम कहते हैं। जिसमें चौबीस सेकण्ड तक वायु का पूरण किया जाता है उसे मध्यम प्राणायाम और जिसमें छत्तीस सेंकण्ड तक वायु का पूरण किया जाता है उसे उत्तम प्राणायाम कहते हैं। 

अधम प्राणायाम से पसीना, मध्यम प्राणायाम से कम्पन और उत्तम प्रणायाम से उच्छ्वास अर्थात् शरीर का हल्कापन एवं चित्त की प्रसन्नता होती है। गायत्री वेद का पवित्रतम मन्त्र है। उसका अर्थ है, 'हम इस जगत् के जन्मदाता परम देवता के तेज का ध्यान करते हैं, वे हमारी बुद्धि में ज्ञान का विकास कर दें।' इस मन्त्र के आदि और अन्त में प्रणव यानी ओंकार लगा हुआ है। एक प्राणायाम में गायत्री का तीन बार मन ही मन उच्चारण करना पड़ता है। प्रत्येक शास्त्र में कहा गया है कि प्राणायाम तीन अंशों में विभक्त है- जैसे, रेचक अर्थात् श्वासत्याग, पूरक अर्थात् श्वासग्रहण और कुम्भक अर्थात् श्वास की स्थिति या श्वासधारण अनुभवशक्तियुक्त इन्द्रियाँ लगातार बहिर्मुखी होकर काम कर रही हैं और बाहर की वस्तुओं के सम्पर्क में आ रही हैं। उनको अपने वश में लाने को प्रत्याहार कहते हैं। अपनी ओर खींचना या आहरण करना यही प्रत्याहार शब्द का प्रकृत अर्थ है।

  >>>Mind fixed for twelve seconds it will be a Dharana :  हृत्कमल में या सिर के ठीक मध्यदेश में या शरीर के अन्य किसी स्थान में मन को धारण करने का नाम है धारणा। मन को एक स्थान में संलग्न करके, फिर उस एकमात्र स्थान को अवलम्बनस्वरूप मानकर एक विशिष्ट प्रकार के वृत्तिप्रवाह उठाये जाते हैं; दूसरे प्रकार के वृत्तिप्रवाहों से उनको बचाने का प्रयत्न करते करते वे प्रथमोक्त वृत्तिप्रवाह क्रमशः प्रबल आकार धारण कर लेते हैं और ये दूसरे वृत्तिप्रवाह कम होते होते अन्त में बिलकुल चले जाते हैं, फिर बाद में उन प्रथमोक्त वृत्तियों का भी नाश हो जाता है और केवल एक वृत्ति वर्तमान रह जाती है। इसे 'ध्यान' कहते हैं। 

और जब इस अवलम्बन की भी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती, सम्पूर्ण मन जब एक तरंग के रूप में परिणत हो जाता है, तब मन की इस एकरूपता का नाम है समाधि। तब किसी विशेष प्रदेश या चक्रविशेष का अवलम्बन करके ध्यानप्रवाह उत्थापित नहीं होता, केवल ध्येय वस्तु का भाव (अर्थ-अवतार वरिष्ठ का अर्थ =सच्चिदानन्द !) मात्र अवशिष्ट रहता है। यदि मन को किसी स्थान में बारह सेकण्ड धारण किया जाए, तो उससे एक धारणा होगी; यह धारणा द्वादशगुणित होने पर एक ध्यान, और यह ध्यान द्वादशगुणित होने पर एक समाधि होगी। 

सूखे पत्तों से ढकी हुई जमीन पर, चौराहे पर, अत्यन्त कोलाहलपूर्ण या डरावने स्थान में, दीमक के ढेर के समीप, अथवा जहाँ अग्नि या जल से किसी भय की आशंका हो, जहाँ जंगली जानवर हों, जो स्थान दुष्ट लोगों से भरा हो- ऐसे स्थानों में योग की साधना करना उचित नहीं। यह बात विशेषकर भारत के बारे में लागू होती है। 

जब शरीर अत्यन्त आलसी या बीमार मालूम होता है अथवा जब मन अत्यन्त दुःखपूर्ण रहता हो, तब भी साधना नहीं करनी चाहिए। किसी गुप्त और निर्जन स्थान में जाकर साधना करो, जहाँ लोग तुम्हें बाधा पहुँचाने न आ सकें। अपवित्र जगह में बैठकर साधना मत करना, वरन् सुन्दर दृश्यवाले स्थान में या अपने घर के एक सुन्दर कमरे में बैठकर साधना करना। साधना में प्रवृत्त होने के पहले समस्त प्राचीन योगियों, अपने गुरुदेव तथा भगवान् को प्रणाम करना और फिर साधना में प्रवृत्त होना। 

ध्यान का विषय पहले ही कहा जा चुका है। अब ध्यान की कुछ प्रणालियाँ वर्णित की जाती हैं। सीधे बैठकर अपनी नाक के ऊपरी भाग पर दृष्टि रखो। तुम देखोगे कि उससे मन की स्थिरता में विशेष रूप से सहायता मिलती है। आँख के दो स्नायुओं को वश में लाने (त्राटक ?) से प्रतिक्रिया के केन्द्रस्थल को काफी वश में लाया जा सकता है, अतः उससे इच्छाशक्ति भी बहुत अधीन हो जाती है। अब ध्यान के कुछ प्रकार कहे जाते हैं। सोचो, सिर के कुछ ऊपर एक कमल है- धर्म उसका मध्यभाग है, ज्ञान उसकी नाल है, योगी की अष्टसिद्धियाँ उस कमल के आठ दलों के समान हैं और वैराग्य उसके अन्दर की कर्णिका यानी बीजकोश है। जो योगी अष्टसिद्धियाँ आने पर भी उनको छोड़ सकते हैं, वे ही मुक्ति प्राप्त करते हैं। 

इसीलिए अष्टसिद्धियों का बाहर के आठ दलों के रूप में, तथा अन्दर की कर्णिका का परवैराग्य अर्थात् अष्टसिद्धियाँ आने पर भी उनके प्रति वैराग्य के रूप में वर्णन किया गया है। इस कमल के अन्दर हिरण्मय, सर्वशक्तिमान, अस्पर्श, ओंकारवाच्य, अव्यक्त, किरणों से परिव्याप्त परम ज्योति का चिन्तन करो। पर ध्यान करो।  

और एक प्रकार के ध्यान का विषय बताया जाता है सोचो कि तुम्हारे हृदय में एक आकाश है, और उस आकाश के अन्दर अग्निशिखा के समान एक ज्योति उद्भासित हो रही है उस ज्योतिशिखा का अपनी आत्मा के रूप में चिन्तन करो फिर उस ज्योति के अन्दर और एक ज्योतिर्मय आकाश की भावना करो; वही तुम्हारी आत्मा की आत्मा है- परमात्मास्वरूप ईश्वर है। उसका (अवतार वरिष्ठ का)   ध्यान करो। 

ब्रह्मचर्य, अहिंसा, महाशत्रु को भी क्षमा कर देना, सत्य, आस्तिक्य ये सब विभिन्न व्रत हैं। यदि इन सब में तुम सिद्ध न रहो, तो भी दुःखित या भयभीत मत होना। प्रयत्न करो, धीरे धीरे सब हो जाएगा। विषय की लालसा, भय और क्रोध छोड़कर जो भगवान् का शरणागत हुआ है, उनमें तन्मय हो गया है, जिसका हृदय पवित्र हो गया है वह भगवान् के पास जो कुछ चाहता है, भगवान् उसी समय उसकी पूर्ति कर देते हैं  अतः ज्ञान, भक्ति या वैराग्य के माध्यम से उनकी उपासना करो। 

जो किसी से घृणा नहीं करता, जो सब का मित्र है, जो सब के प्रति करुणासम्पन्न है, जिसका अहंकार चला गया है, जो सदैव सन्तुष्ट है, जो सर्वदा योगयुक्त, यतात्मा और दृढ़ निश्चयवाला है, जिसका मन और बुद्धि मुझमें अर्पित हो गयी है, वही मेरा प्रिय भक्त है। जिससे लोग उद्विग्न नहीं होते, जो लोगों से उद्विग्न नहीं होता, जिसने अतिरिक्त हर्ष, दुःख, भय और उद्वेग त्याग दिया है, ऐसा भक्त ही मेरा प्रिय है। 

जो किसी का भरोसा नहीं करता, जो शुचि और दक्ष है, सुख और दुःख में उदासीन है, जिसका दुःख चला गया है, जो निन्दा और स्तुति में समभावापन्न है, मौनी है, जो कुछ पाता है, उसी में सन्तुष्ट रहता है, जिसके कोई निर्दिष्ट घर बार नहीं, सारा जगत् ही जिसका घर है, जिसकी बुद्धि स्थिर है, ऐसा व्यक्ति ही मेरा प्रिय भक्त है। "ऐसे व्यक्ति ही योगी हो सकते हैं। 

नारद नामक एक महान् देवर्षि थे। जैसे मनुष्यों में ऋषि या बड़े बड़े योगी रहते हैं, वैसे ही देवताओं में भी बड़े बड़े योगी हैं। नारद भी वैसे ही एक अच्छे और अत्यन्त महान् योगी थे। वे सर्वत्र भ्रमण किया करते थे। एक दिन एक वन में से जाते हुए उन्होंने देखा कि एक मनुष्य ध्यान में इतना मग्न है और दिनों से एक ही आसन पर बैठा है कि उसके चारों ओर दीमक का ढेर लग गया है। उसने नारद से पूछा, “प्रभो, आप कहाँ जा रहे हैं? " नारदजी ने उत्तर दिया, “ मैं वैकुण्ठ जा रहा हूँ।" तब उसने कहा, अच्छा आप भगवान् से पूछते आएँ, वे मुझ पर कब कृपा करेंगे, मैं कब मुक्ति प्राप्त करूँगा। फिर कुछ दूर और जाने पर नारदजी ने एक दूसरे मनुष्य को देखा। वह कूदफाँद रहा था, कभी नाचता था, तो कभी गाता था। उसने भी नारदजी से वही प्रश्न किया। 

उस व्यक्ति का कण्ठस्वर, चालढाल आदि सभी उन्मत्त के समान थे। नारदजी ने उसे भी पहले के समान उत्तर दिया। वह बोला, “अच्छा, तो भगवान् से पूछते आएँ, मैं कब मुक्त होऊँगा। ”लौटते समय नारदजी ने दीमक के ढेर के अन्दर रहनेवाले उस ध्यानस्थ योगी को देखा। उस योगी ने पूछा, “देवर्षे, क्या आपने मेरी बात पूछी थी? ”नारदजी बोले, “हाँ, पूछी थी।” योगी ने पूछा, "तो उन्होंने क्या कहा? ”नारदजी ने उत्तर दिया, “भगवान् ने कहा, 'मुझको पाने के लिए उसे और चार जन्म लगेंगे।" तब तो वह योगी घोर विलाप करते हुए कहने लगा, "मैंने इतना ध्यान किया है कि मेरे चारों ओर दीमक का ढेर लग गया, फिर भी मुझे और चार जन्म लेने पड़ेंगे। 

नारदजी तब दूसरे व्यक्ति के पास गये। उसने भी पूछा, "क्या आपने मेरी बात भगवान् से पूछी थी? "नारदजी बोले, "हाँ, भगवान् ने कहा है, उसके सामने जो इमली का पेड़ है, उसके जितने पत्ते हैं, उतनी बार उसको जन्म ग्रहण करना पड़ेगा।" यह बात सुनकर वह व्यक्ति आनन्द से नृत्य करने लगा और बोला, "मैं इतने कम समय में मुक्ति प्राप्त करूँगा! "तब एक देववाणी हुई “मेरे बच्चे, तुम इसी क्षण मुक्ति प्राप्त करोगे। "

वह दूसरा व्यक्ति इतना अध्यवसायसम्पन्न था ! इसीलिए उसे वह पुरस्कार मिला। वह इतने जन्म साधना करने के लिए तैयार था। कुछ भी उसे उद्योगशून्य न कर सका। परन्तु वह प्रथमोक्त व्यक्ति चार जन्मों की ही बात सुनकर घबड़ा गया। जो व्यक्ति मुक्ति के लिए सैकड़ों युग तक बाट जोहने को तैयार था, उसके समान अध्यवसायसम्पन्न होने पर ही उच्चतम फल प्राप्त होता है

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राजयोग [सप्तम अध्याय] ध्यान और समाधि | Swami Vivekanand Rajyog Chapter-7

[RAJA YOGA : CHAPTER VII : DHYANA AND SAMADHI]

 राजयोग

सप्तम अध्याय

ध्यान और समाधि 

[साभार @@@@https://www.khabardailyupdate.com/2022/05/swami-vivekananda-rajyog-adhyay-seventh-dhyaan-aur-samadhi.html]

>>>All our rational knowledge is subject to ego perception.

अब तक हम राजयोग के अन्तरंग साधनों  को छोड़ शेष सभी अंगों के संक्षिप्त विवरण समाप्त कर चुके हैं। इन अन्तरंग साधनों का लक्ष्य पूर्ण एकाग्रता (समाधि या योग) की प्राप्ति है। इस एकाग्रता-शक्ति को घटित करना ही राजयोग का चरम लक्ष्य हैं। हम मानव के नाते, देखते हैं कि हमारा समस्त तर्कसंगत ज्ञान अहंबोध के अधीन है। मुझे इस मेज का बोध हो रहा है, तुम्हारे अस्तित्व का बोध हो रहा है; और इस अहंबोध के कारण ही मैं जान पा रहा हूँ कि मेज यहाँ है और तुम यहाँ हो! यह तो हुई एक ओर की बात। फिर एक दूसरी ओर यह भी देख रहा हूँ कि मेरी सत्ता कहने से जो बोध होता है, उसका अधिकांश में अनुभव नहीं कर सकता। शरीर के भीतर के सारे यन्त्र, मस्तिष्क के विभिन्न अंश- इन सब के प्रति हम सचेत नहीं हैं। 

जब हम भोजन करते हैं, तब वह ज्ञानपूर्वक करते हैं, परन्तु जब हम उसका सारभाग भीतर ग्रहण करते हैं, तब हम वह अज्ञातरीति से करते हैं। जब वह खून के रूप में परिणत होता है, तब भी वह हमारे बिना जाने ही होता है। और जब इस खून से शरीर के भिन्न भिन्न अंश गठित होते हैं, तो वह भी हमारी जानकारी के बिना ही होता है। किन्तु यह सारा काम हमारे द्वारा ही होता है। इस शरीर के भीतर कोई अन्य दस-बीस लोग तो बैठे नहीं हैं, जो यह काम कर देते हों। पर यह किस तरह हमें मालूम हुआ कि हमीं इनको कर रहे हैं, दूसरा कोई नहीं? इस सम्बन्ध में अनायास ही यह कहा जा सकता है कि आहार करना ही हमारा काम है और खाना पचाने और खाद्य से शरीर को पुष्ट करने का काम तो हमारे लिए दूसरा कोई कर दे रहा है। पर यह हो नहीं सकता क्योंकि यह प्रमाणित किया जा सकता है कि अभी जो काम हमारे बिना जाने हो रहे हैं, वे लगभग सभी साधना के बल से हमारे जाने साधित हो सकते हैं। 

>>>If my heart is beating without my control? ऐसा मालूम होता है कि हमारा हृदययन्त्र अपने आप ही चल रहा है, हममें से कोई उसको अपनी इच्छानुसार नहीं चला सकता, वह अपने ख्याल से आप ही चल रहा है। परन्तु इस हृदय के कार्य भी अभ्यास के बल से इस प्रकार इच्छाधीन किये जा सकते हैं कि वे इच्छा मात्र से शीघ्र या धीरे चलने लगेंगे, या लगभग बन्द हो जाएँगे। हमारे शरीर के प्रायः सभी अंश वश में लाये जा सकते हैं। इससे क्या ज्ञात होता है? यही कि इस समय जो काम हमारे बिना जाने हो रहे हैं, उन्हें भी हमीं कर रहे हैं, पर हाँ, हम उन्हें अज्ञातरीति से कर रहे हैं, बस, इतना ही। 

>>> Human mind works on two planes ~ (चेतनभूमि और अचेतन भूमि) :अतएव हम देखते हैं कि मानव मन दो अवस्थाओं में रहकर कार्य करता है। पहली अवस्था को ज्ञान या चेतन भूमि कह सकते हैं। जिन कामों को करते समय साथ साथ, 'मैं कर रहा हूँ' यह ज्ञान (अहं- बोध ~ feeling of egoism) सदा विद्यमान रहता है, वे कार्य ज्ञान (या चेतन भूमि--conscious planeसे साधित हो रहे हैं, ऐसा कहा जा सकता है। दूसरी भूमि को अज्ञान या अचेतन भूमि कह सकते हैं। जो सब कार्य ज्ञान की निम्न भूमि से साधित होते हैं, जिसमें ‘मैं ज्ञान नहीं रहता', (अहंबोध नहीं रहता) उसे अज्ञान या अचेतन भूमि (unconscious plane) कह सकते हैं। 

>>>Conscious work, Unconscious work and Instinct :हमारे कार्य-कलापों में से जिनमें 'अहं' मिला रहता है, उन्हें ज्ञानयुक्त या चेतन क्रिया (conscious work) और जिनमें 'अहं' का लगाव नहीं, उन्हें ज्ञानरहित या अचेतन क्रिया (unconscious work) कहते हैं। निम्न जाति के प्राणियों में यह ज्ञानरहित क्रिया जन्मजात प्रवृत्ति (instinct) कहलाती है। उनकी अपेक्षा उच्चतर जीवों में और सब से उच्च जीव, मनुष्य (Highest of all animals ~  man) में यह दूसरे प्रकार की क्रिया, जिसमें अहंबोध रहता है, अधिक दीख पड़ती है- इसी को ज्ञानयुक्त क्रिया कहते हैं।  

>>>The feeling of egoism is only on the middle plane.जन्मजातप्रवृत्ति की अवस्था के जैसा समाधि (अतिचेतन) अवस्था में भी अहंबोध नहीं रहता :  परन्तु इतने से ही सारी भूमियों का उल्लेख नहीं होता। मन इन दोनों से उच्च भूमि पर विचरण कर सकता है। मन ज्ञान की भी अतीत अवस्था में जा सकता है। जिस प्रकार अज्ञानभूमि से जो कार्य होता है, वह ज्ञान की निम्न भूमि का कार्य है, वैसे ही ज्ञान की उच्च भूमि से भी ज्ञानातीत भूमि से भी कार्य होता है। उसमें भी किसी प्रकार का अहंबोध नहीं रहता। यह अहंबोध केवल बीच की अवस्था में रहता है। जब मन इस रेखा के ऊपर या नीचे विचरण करता है, तब किसी प्रकार का अहंबोध (feeling of egoism) नहीं रहता, किन्तु तब भी मन की क्रिया चलती रहती है। जब मन इस अहं-बोध की रेखा (line of self-consciousness) के परे अर्थात् इन्द्रियातीत प्रदेश (ज्ञानभूमि के अतीत प्रदेश में) गमन करता है, तब उसे अतिचेतनसमाधि  या (superconsciousness)  ज्ञानातीत भूमि  कहते हैं। 

>>>अब हम यह किस तरह समझें कि जो मनुष्य समाधि अवस्था में जाता है, वह ज्ञानभूमि के निम्न स्तर (below consciousness) में नहीं चला जाता, बिलकुल हीनदशापत्र नहीं हो जाता, वरन् ज्ञानातीत भूमि में चला जाता है? इन दोनों ही अवस्थाओं में (समाधि और सुषुप्ति दोनों अवस्थाओं में) तो अहंबोध नहीं रहता! इसका उत्तर यह है कि कौन ज्ञानभूमि के निम्न देश में और कौन ऊर्ध्व देश में गया, इसका निर्णय फल देखने पर ही हो सकता है। जब कोई गहरी नींद में (सुषुप्ति या deep sleep) सोया रहता है, तब वह ज्ञान या चेतन की निम्न भूमि में चला जाता है। तब वह अज्ञात भाव से ही शरीर की सारी क्रियाएँ, श्वास प्रश्वास, यहाँ तक कि शरीरसंचालन-क्रिया भी करता रहता है; उसके इन सब कामों में अहंबोध का कोई लगाव नहीं रहता; तब वह अज्ञान से ढका रहता है। वह जब नींद से उठता है, तब वह सोने के पहले जैसा था, वैसा ही रहता है, उसमें कुछ भी परिवर्तन नहीं होता।  उसके सोने से पहले उसकी जो ज्ञानसमष्टि थी, नींद टूटने के बाद भी ठीक वही रहती है, उसमें कुछ भी वृद्धि नहीं होती। उसे कोई प्रकाश नहीं मिलता। 

किन्तु जब मनुष्य समाधिस्थ होता है, तो समाधि प्राप्त करने के पहले यदि वह महामूर्ख रहा हो, अज्ञानी रहा हो, तो समाधि से वह महाज्ञानी होकर व्युत्थित होता है। इस भिन्नता का कारण क्या है? एक अवस्था से, मनुष्य जैसा गया था, वैसा ही लौट आया, और दूसरी अवस्था से- समाधि से लौटा मनुष्य बुद्धत्व को प्राप्त होगया ? ब्रह्मविद, आत्मज्ञानी, (enlightened from within)  पैगम्बर,मानवजाति का मार्गदर्शक नेता, एक महान् साधु, एक सिद्ध पुरुष के रूप में परिणत हो गया, उसका स्वभाव बिलकुल बदल गया, उसके जीवन ने बिलकुल दूसरा रूप धारण कर लिया दोनों अवस्थाओं के ये दो विभिन्न फल (two effects) हैं। 

>>> Now the effects being different, the causes must be different. अब बात यह है कि फल अलग अलग होने पर कारण भी अवश्य अलग अलग होगा। और चूँकि समाधि-अवस्था से लब्ध यह ज्ञानालोक (illumination-अहंब्रह्मास्मि) , अज्ञानावस्था से लौटने के बाद की अवस्था में जो ज्ञान प्राप्त होता है अथवा साधारण ज्ञानावस्था में युक्ति-विचार द्वारा जो ज्ञान उपलब्ध होता है, उन दोनों से अत्यन्त उच्चतर है, इसीलिए अवश्य वह ज्ञानातीत या अतिचेतन भूमि से आता है। इसीलिए समाधि को मैंने (superconscious state) या ज्ञानातीत भूमि  के नाम से अभिहित किया है। संक्षेप में समाधि का तात्पर्य यही है। हमारे जीवन में इस समाधि की उपयोगिता कहाँ है?

>>>The immortality that humanity holds most dear.  (मनुष्य अपने मन की चहारदिवारी को लाँघकर ब्रह्मविद बन जाता है)  समाधि की विशेष उपयोगिता है। विचार का क्षेत्र या जिस क्षेत्र में हमारा मन ज्ञानपूर्वक कार्य करता है, वह संकीर्ण और सीमित है। मनुष्य का युक्तितर्क एक छोटे से वृत्त में ही भ्रमण कर सकता है, वह कभी उसके में बाहर नहीं जा सकता। हम जितना ही उसके बाहर जाने का प्रयत्न करते हैं, उतना ही वह असम्भव सा जान पड़ता है। ऐसा होते हुए भी, मनुष्य जिसे (आत्मा के अमरत्व को) अत्यन्त कीमती और सब से प्रिय समझता है, वह तो उस युक्ति या तर्क के राज्य के बाहर ही है। अविनाशी आत्मा (immortal soul) है या नहीं, ईश्वर है या नहीं, इस जगत् के नियन्ता, या जगतजननी जगदम्बा 'कोई ज्ञानस्वरूप सत्ता' (supreme intelligence) हैं या नहीं- इन सब तत्त्वों का निर्णय करने में तर्क असमर्थ है। इन सब प्रश्नों का उत्तर तर्क कभी नहीं दे सकता। तर्क क्या कहता है? वह कहता है "मैं अज्ञेयवादी हूँ। मैं किसी विषय में 'हाँ' भी नहीं कह सकता और 'ना' भी नहीं।” What does reason say? It says, "I am agnostic; I do not know either yea or nay."

फिर भी इन सब प्रश्नों का समाधान तो हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक है। इन प्रश्नों के ठीक ठीक उत्तर बिना मानवजीवन (human life) उद्देश्यविहीन (purposeless) हो जाएगा।  इस तर्करूप वृत्त के बाहर से प्राप्त हुए समाधान -(अतिचेतन के अनुभव से प्राप्त समाधान) ही हमारे सारे नैतिक सिद्धान्त  (ethical theories) , सारे नैतिक भाव ( moral attitudes) , यही नहीं, बल्कि मानवस्वभाव में जो कुछ सुन्दर तथा महान् है, उस सब की नींव है। अतएव यह सब से आवश्यक है कि हम इन प्रश्नों के यथार्थ उत्तर पा लें। 

>>> Why should there be mercy, justice, or fellow feeling? यदि मनुष्यजीवन केवल पाँच मिनट की चीज हो, और जगत् कुछ परमाणुओं का आकस्मिक मिलन मात्र हो, तो फिर दूसरे का उपकार मैं क्यों करूँ? दया, न्यायपरता या सहानुभूति दुनिया में फिर क्यों रहे? तब तो हम लोगों का यही एकमात्र कर्तव्य हो जाता है कि जिसकी जो इच्छा हो, वही करे, सब अपना अपना देखें। तब तो यही कहावत चरितार्थ होने लगती है - "यावत् जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।"  यदि हम लोगों के भविष्य अस्तित्व की आशा ही न रहे, तो मैं अपने भाई को क्यों प्यार करूँ, मैं उसका गला क्यों न काट दूँ ? यदि जगत् के परे कोई सत्ता (ब्रह्म) न हो, यदि मुक्ति नामक कोई चीज न हो, यदि कुछ कठोर, अभेद्य, जड़ नियम (rigorous dead laws) ही सर्वस्व हों, तब तो हमें इहलोक में ही सुखी होने की प्राणपण से चेष्टा करनी चाहिए। आजकल बहुत से लोगों के मतानुसार उपयोगितावाद (utility) ही नीति की नींव है, अर्थात् जिससे अधिक लोगों को अधिक परिमाण में सुख स्वाच्छन्द्य मिले, वही नीति की नींव है। इन लोगों से मैं पूछता हूँ, हम इस नींव पर खड़े होकर नीति का पालन क्यों करें ? क्यों?यदि अधिक मनुष्यों का अधिक मात्रा में अनिष्ट करने से मेरा मतलब सधता हो, तो मैं वैसा क्यों न करूँ? 

उपयोगितावादी इस प्रश्न का क्या जवाब देंगे? कौन अच्छा है और कौन बुरा, यह तुम कैसे जानोगे? मैं अपनी सुख की वासना से परिचालित होकर उसकी तृप्ति करता हूँ ऐसा करना मेरा स्वभाव है; मैं उससे अधिक कुछ नहीं जानता। मेरी ये वासनाएँ हैं, और मैं उनकी तृप्ति करूँगा ही, तुम्हें उसमें आपत्ति करने का क्या अधिकार है? मानवजीवन के ये सब महान् सत्य, जैसे- नीति, आत्मा का अमरत्व, ईश्वर, प्रेम, सहानुभूति, साधुत्व और सर्वोपरि, सब से महान् सत्य निःस्वार्थता- ये सब भाव (चारित्रिक गुण) हमें कहाँ से मिले हैं? 

>>>why I should not be selfish ? सारा नीतिशास्त्र, मनुष्य के सारे काम, मनुष्य के सारे विचार इस निःस्वार्थता रूप एकमात्र नींव पर आधारित हैं। मानवजीवन के सारे भाव इस निःस्वार्थता रूप एकमात्र भाव के अन्दर डाले जा सकते हैं। मैं क्यों स्वार्थशून्य होऊँ? निःस्वार्थी होने की आवश्यकता क्या? और किस शक्ति के बल से मैं निःस्वार्थी होऊँ? तुम कहते हो, "मैं युक्तिवादी हूँ, मैं उपयोगितावादी हूँ,” लेकिन यदि तुम मुझे इस उपयोगिता की युक्ति न दिखला सको, तो मैं तुम्हें अयौक्तिक कहूँगा। मैं क्यों निःस्वार्थी होऊँ, कारण बताओ; क्यों न मैं बुद्धिहीन पशु के समान आचरण करूँ

निःस्वार्थता कवित्व के हिसाब से अवश्य बहुत सुन्दर हो सकती है, किन्तु कवित्व तो युक्ति नहीं है। मुझे युक्ति दिखलाओ, मैं क्यों निःस्वार्थी होऊँ? क्यों मैं भला बनूँ? यदि कहो, "अमुक यह बात कहते हैं, इसलिए ऐसा करो " -तो यह कोई जवाब नहीं है, मैं ऐसे किसी व्यक्तिविशेष की बात नहीं मानता। मेरे निःस्वार्थी होने से मेरा कल्याण कहाँ? यदि कल्याण 'से अधिक परिमाण में सुख समझा जाए, तो स्वार्थी होने में ही मेरा कल्याण है। उपयोगितावादी इसका क्या उत्तर देंगे? वे इसका कुछ भी उत्तर नहीं दे सकते।

>>> this world is only one drop in an infinite ocean :  इसका यथार्थ उत्तर यह है कि यह परिदृश्यमान जगत् अनन्त समुद्र में एक छोटा सा बुलबुला है- अनन्त शृंखला की एक छोटी सी कड़ी है। जिन्होंने जगत् में निःस्वार्थता का प्रचार किया था और मानवजाति को उसकी शिक्षा दी थी, उन्होंने यह तत्त्व कहाँ से पाया? हम जानते हैं कि यह जन्मजात प्रवृत्तियों द्वारा नहीं प्राप्त हो सकता। जन्मजात प्रवृत्तियों से युक्त पशु तो इसे नहीं जानते। विचार बुद्धि से भी यह नहीं मिल सकता उससे इन सब तत्त्वों का कुछ भी नहीं जाना जाता। तो फिर वे सब तत्त्व उन्होंने कहाँ से पाये? 

इतिहास के अध्ययन से मालूम होता है, संसार के सभी धर्मशिक्षक तथा धर्मप्रचारक कह गये हैं कि हमने ये सब सत्य जगत् के अतीत प्रदेश से पाये हैं। उनमें से बहुतेरे इस सम्बन्ध में अज्ञ थे कि उन्होंने यह सत्य ठीक कहाँ से पाया। किसी ने कहा, “एक देवदूत ने पंखयुक्त मनुष्य के रूप में मेरे पास आकर मुझसे कहा, 'हे मानव, सुनो, मैं स्वर्ग से यह शुभ समाचार लाया हूँ, ग्रहण करो।” दूसरे ने कहा, “तेजपुंजकाय एक देवता ने मेरे सामने आविर्भूत होकर मुझे उपदेश दिया है।” तीसरे ने कहा, “मैंने स्वप्न में अपने एक पूर्वज को देखा, उन्होंने मुझे इन तत्त्वों का उपदेश दिया।” इसके आगे वे और कुछ न कह सके। इस तरह विभिन्न उपायों से तत्त्वलाभ की बात कहने पर भी उन सभी का इस विषय में यही मत है कि उन्होंने यह ज्ञान युक्ति तर्क से नहीं पाया, वरन् उसके अतीत प्रदेश (beyond reasoning) से ही उसे पाया है। 

>>>What does the science of Yoga teach? इसके बारे में योगशास्त्र का मत क्या है? उसका मत यह है कि वे जो कहते हैं कि युक्तितर्क के अतीत प्रदेश से उन्होंने उस ज्ञान को पाया है, यह सही है; किन्तु उनके अपने अन्तर से ही वह ज्ञान उनके पास आया है। योगी कहते हैं, इस मन की ही ऐसी एक उच्च अवस्था है, जो युक्ति तर्क के परे है, जो अतिचेतन (superconscious state) है। उस उच्चावस्था में पहुँचने पर मनुष्य तर्क के अगम्य ज्ञान को प्राप्त कर लेता है, और ऐसे मनुष्य को ही समस्त विषयज्ञान के अतीत पारमार्थिक ज्ञान या अतीन्द्रिय ज्ञान (beyond reasoning) की प्राप्ति होती है। 

साधारण मानवी स्वभाव के परे, समस्त युक्ति तर्क के परे की यह अतीन्द्रिय अवस्था कभी कभी ऐसे व्यक्ति को अचानक प्राप्त हो जाती है, जो उसका विज्ञान नहीं जानता। वह मानो उस ज्ञानातीत राज्य में ढकेल दिया जाता है। और जब इस प्रकार अचानक अतीन्द्रिय ज्ञान (Metaphysical and transcendental knowledge) की प्राप्ति होती है, तो वह साधारणतः सोचता है कि वह ज्ञान कहीं बाहर से आया है। इसी से यह स्पष्ट है कि यह पारमार्थिक ज्ञान सारे देशों में वस्तुतः एक होने पर भी, किसी देश में वह देवदूत से, किसी देश में देवविशेष से, अथवा फिर कहीं साक्षात् भगवान् से प्राप्त हुआ सुना जाता है। इसका तात्पर्य क्या है?  यही कि मन ने अपनी प्रकृति के अनुसार ही अपने भीतर से उस ज्ञान को प्राप्त किया है, किन्तु जिन्होंने उसे पाया है, उन्होंने अपनी अपनी शिक्षा और विश्वास के अनुसार इस बात का वर्णन किया है कि उन्हें वह ज्ञान कैसे मिला। असल बात तो यह है कि ये सभी उस ज्ञानातीत अवस्था में अचानक जा पड़े थे। 

>>>great danger in stumbling upon this state : योगी कहते हैं कि उस ज्ञानातीत अवस्था में अचानक जा पड़ने से एक भारी खतरे की आशंका रहती है। अनेक स्थलों में तो मस्तिष्क के बिलकुल नष्ट हो जाने की सम्भावना रहती है। और भी देखोगे, जिन सब मनुष्यों ने अचानक इस अतीन्द्रिय ज्ञान को पाया है, पर उसके वैज्ञानिक तत्त्व को नहीं समझा, वे कितने भी बड़े क्यों न हों, सच पूछा जाए, तो उन्होंने अँधेरे में टटोला है, और उनके उस ज्ञान के साथ कुछ न कुछ विचित्र अन्धविश्वास मिला हुआ है ही। उन्होंने अपने आपको भ्रान्तियों (hallucinations) के लिए खोल रखा था। मुहम्मद ने घोषणा की कि एक दिन फ़रिश्ता गैब्रिल (Angel Gabriel-जिब्राईल)  पर्वत की गुफा में उनके पास आया और उन्हें स्वर्गीय अश्व हैरक (heavenly horse, Harak) पर बिठा स्वर्गराज्य के दर्शन को ले गया। किन्तु, यह सब होते हुए भी, मुहम्मद ने कई आश्चर्यजनक सत्यों का उद्घाटन किया। [ इसके अलावा जिब्रील ने और भी कई बार, अल्लाह की बात विभिन्न नबियों तक पहुंचाई है। मुस्लिम समुदाय की मान्यता के अनुसार जिब्रील, अल्लाह के द्वारा सृष्टि किया गया एक मलक या फ़रिश्ता है। इस मलक का काम यह था कि अल्लाह के आदेशानुसार  नबी के पास अल्लाह का आदेश या दिव्या वाणी लेकर जाता है।] 

यदि तुम कुरान का अध्ययन करो, तो तुम पाओगे कि उसमें आश्चर्यजनक सत्यों के साथ ही कुछ अन्धविश्वास (wonderful truths mixed with superstitions) भी मिले-जुले हैं। इसकी व्याख्या तुम कैसे करोगे? वे अवश्य ही दिव्य प्रेरणा से प्रेरित थे, किन्तु यह अन्तःप्रेरणा उन्हें अनजान में ही अचानक मिल गयी थी। वे कोई [गुरु-शिष्य परम्परा में प्रशिक्षित योगी (trained Yogi)] न थे। अतः अपने क्रिया-कलापों को न समझ ने सके। मुहम्मद ने संसार का क्या उपकार किया और उनके शिष्यों की धर्मान्धता (fanaticism) ने संसार की कितनी क्षति की जरा इस पर विचार करो। उनकी कुछ शिक्षाओं पर गलत जोर देने के कारण लाखों की हत्याएँ हुईं, लाखों माताओं ने अपनी सन्तानें खोयीं, लाखों मातृपितृविहीन बने और कितने ही देशों का सर्वनाश ही हो गया- इन्हें जरा सोचो तो।

जो हो, हम मुहम्मद तथा अन्य कई महापुरुषों के जीवनचरित्र का अध्ययन करने पर देखते हैं कि अचानक इन्द्रियातीत राज्य में जा पड़ने से उपर्युक्त प्रकार के खतरे की आशंका रहती है। किन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि वे सभी दिव्य प्रेरणा से प्रेरित थे। जब कभी कोई महापुरुष केवल भावुकता के बल से इस अतीन्द्रिय अवस्था में जा पड़े हैं, तो वे उस अवस्था से कुछ सत्य ही नहीं लाये, पर साथ ही अन्धविश्वास, धर्मान्धता, ये सब भी लेते आये। उनकी शिक्षा में जो उत्कृष्ट अंश है, उससे जगत् का जैसा उपकार हुआ है, उन सब धर्मान्धता और अन्धविश्वासों से वैसे ही क्षति भी हुई है। 

>>>We have to transcend our reason scientifically, slowly, by regular practice : मानवजीवन नाना प्रकार के विपरीत भावों से ग्रस्त होने के कारण असामंजस्यपूर्ण है। इस असामंजस्य में कुछ सामंजस्य और सत्य प्राप्त करने के लिए हमें युक्तितर्क के अतीत जाना पड़ेगा। पर वह धीरे धीरे करना होगा, नियमित साधना के द्वारा ठीक वैज्ञानिक उपाय से उसमें पहुँचना होगा, और सारे अन्धविश्वास को भी हमें छोड़ देना होगा। अन्य कोई विज्ञान सीखने के समय जैसा हम लोग करते हैं, इस अतिचेतन अवस्था के अध्ययन के लिए ठीक उसी धारा का अनुसरण करना होगा। युक्ति तर्क को ही अपनी नींव बनाना होगा। युक्तितर्क हमें जितनी दूर ले जा सकता है, हम उतनी दूर जाएँगे और जब युक्ति तर्क नहीं चलेगा, तब वही हमें उस सर्वोच्च अवस्था की प्राप्ति का रास्ता दिखला देगा। 

>>>Waking, dream, deep sleep and superconscious state are the four states of the same mind :  अतः यदि कोई अपने को दिव्य प्रेरणा से प्रेरित कहकर दावा करे, फिर साथ ही युक्ति के विरुद्ध भी अटपट बोलता रहे, तो उसकी बात मत सुनना। क्यों? इसलिए कि जिन तीन भूमियों की बात कही गयी है, जैसे जन्मजात प्रवृत्ति, चेतन या तर्कजात ज्ञान और अतिचेतन या ज्ञानातीत भूमि- ये तीनों एक ही मन की विभिन्न अवस्थाएँ हैं। एक मनुष्य के तीन मन नहीं हैं, वरन् उस एक ही मन की एक अवस्था दूसरी अवस्थाओं में परिवर्तित हो जाती है।  

>>>Real inspiration never contradicts reason, but fulfils it. 

जन्मजात प्रवृत्ति चेतन या तर्कजात ज्ञान में और तर्कजात ज्ञान अतिचेतन या जगदतीत ज्ञान में परिणत होता है।अतः इन अवस्थाओं में से कोई भी अवस्था दूसरी अवस्थाओं की विरोधी नहीं है। यथार्थ दिव्य प्रेरणा, तर्कजात ज्ञान की अपूर्णता को पूर्ण मात्र करती है। पूर्वकालीन महापुरुषों ने जैसा कहा है, " हम विनाश करने नहीं आये, वरन् पूर्ण करने आये हैं," "I come not to destroy but to fulfil," इसी प्रकार दिव्य प्रेरणा भी तर्कजात ज्ञान का पूरक है और उसके साथ उसका पूर्ण समन्वय है। 

ठीक वैज्ञानिक उपाय से उपर्युक्त अतिचेतन या समाधि अवस्था प्राप्तः करने के लिए ही पूर्वकथित सारे योगांग उपदिष्ट हुए हैं। यह भी समझ लेना विशेष आवश्यक है कि इस दिव्य प्रेरणा को प्राप्त करने की शक्ति प्राचीन पैगम्बरों के समान प्रत्येक मनुष्य के स्वभाव में है। वे पैगम्बर कोई अद्वितीय नहीं थे, वे हमारे तुम्हारे समान ही मनुष्य थे। वे अत्यन्त उच्च कोटि के योगी थे।उन्होंने पूर्वोक्त अतिचेतन अवस्था प्राप्त कर ली थी, और प्रयत्न करने पर तुम और हम भी उसकी प्राप्ति कर ले सकते हैं। वे कोई विशेष प्रकार के अद्भुत मनुष्य नहीं हैं। यदि एक मनुष्य ने उस अवस्था की प्राप्ति की है, तो इसी से प्रमाणित होता है कि प्रत्येक मनुष्य के लिए ही इस अवस्था को प्राप्त करना सम्भव है। 

यह केवल सम्भव ही नहीं, वरन् समय आने पर सभी इस अवस्था की प्राप्ति कर लेंगे। इस अवस्था को प्राप्त करना ही धर्म है। केवल प्रत्यक्ष अनुभव के द्वारा यथार्थ शिक्षा प्राप्त होती है। हम लोग भले ही सारे जीवन भर तर्क विचार करते रहें, पर स्वयं प्रत्यक्ष अनुभव किये बिना हम सत्य का कण मात्र भी न समझ सकेंगे। कुछ पुस्तकें पढ़ाकर तुम किसी मनुष्य से शल्यचिकित्सक (surgeon)  बनने की आशा नहीं कर सकते। तुम केवल एक नक्शा दिखाकर देश देखने का मेरा कौतूहल पूरा नहीं कर सकते। स्वयं वहाँ जाकर उस देश को प्रत्यक्ष देखने पर ही मेरा कौतूहल पूरा होगा। नक्शा केवल इतना कर सकता है कि वह देश के बारे में और भी अधिक अच्छी तरह से जानने की इच्छा उत्पन्न कर देगा। बस, इसके अतिरिक्त उसका और कोई मूल्य नहीं। 

सिर्फ पुस्तकों पर निर्भर रहने से मानवमन अवनति की ओर जाता है।यह कहने की अपेक्षा और घोर ईशनिन्दा क्या हो सकती है कि ईश्वरीय ज्ञान केवल इस ग्रन्थ या उस शास्त्र में आबद्ध है? मनुष्य इधर तो भगवान् को अनन्त कहता है, और उधर एक छोटे से ग्रन्थ में उन्हें आबद्ध कर रखना चाहता है। क्या गर्व ग्रन्थ पर विश्वास नहीं किया , इसलिए लाखों आदमी मार डाले गये! एक ही ग्रन्थ में सारा ईश्वरीय ज्ञान निबद्ध है, इस पर विश्वास न करने से सहस्रों लोग मौत के घाट उतार दिये गये। भले ही आज उस हत्या आदि का समय नहीं रहा, पर फिर भी अभी तक जगत् इस ग्रन्थनिष्ठा में प्रबल रूप से आबद्ध है! 

प्रत्याहार और धारणा के बाद ध्यान और समाधि 

ठीक वैज्ञानिक उपाय (scientific manner) से अतिचेतन अवस्था को प्राप्त करने के लिए, मैं तुम्हें राजयोग के जो विविध साधन बतला रहा हूँ, उनके माध्यम से तुम्हें जाना पड़ेगा। प्रत्याहार और धारणा के बाद अब ध्यान के बारे में चर्चा करूँगा। 

जब मन को देह के भीतर या उसके बाहर किसी स्थान में कुछ समय तक स्थिर रखने के निमित्त प्रशिक्षित किया जाता है, तब उसको उस दिशा में अविच्छिन्न गति से प्रवाहित होने की शक्ति प्राप्त होती है। इस अवस्था का नाम है ध्यान। जब ध्यान शक्ति इतनी तीव्र हो जाती है कि मन अनुभूति के बाहरी भाग को छोड़कर केवल उसके अन्तर्भाग या अर्थ की ही ओर एकाग्र हो जाता है, तब उस अवस्था को समाधि कहते हैं।

 >>>The three — Dharana, Dhyana, and Samadhi — together, are called Samyama. 

धारणा, ध्यान और समाधि, इन तीनों को एक साथ मिलाकर संयम कहते हैं । अर्थात् यदि किसी का मन पहले किसी वस्तु में एकाग्र हो सकता है, फिर उस एकाग्रतां की अवस्था में कुछ समय तक रह सकता है, और उसके बाद ऐसी दीर्घ एकाग्रता की अवस्था में वह अनुभूति के केवल आभ्यन्तरिक भाग पर, जिसका, ध्येय वस्तु केवल कार्य है, अपने आपको लगाए रख सकता है, तो सभी कुछ ऐसे शक्तिसम्पन्न मन के वशीभूत हो जाता है। 

जीव की जितने प्रकार की अवस्थाएँ हैं, उनमें यह ध्यानावस्था ही सर्वोच्च है। जब तक वासना रहती है, तब तक यथार्थ सुख नहीं आ सकता। केवल जब कोई व्यक्ति इस ध्यानावस्था से, साक्षिभाव से सारी वस्तुओं का परिशीलन कर सकता है, तभी उसे यथार्थ सुख और आनन्द प्राप्त होता है। अन्य प्राणी इन्द्रियों में सुख पाते हैं, मनुष्य बुद्धि में, और देवमानव आध्यात्मिक ध्यान में जो ऐसी ध्यानावस्था को प्राप्त हो चुके हैं, उनके पास यह जगत् सचमुच अत्यन्त सुन्दर रूप से प्रतीयमान होता है। जिसमें वासना नहीं हैं, जो सर्व विषयों में निर्लिप्त है, उसके पास प्रकृति के ये विभिन्न परिवर्तन एक महान् सौन्दर्य और उदात्त भाव की छबि मात्र हैं। 

>>>This meditative state is the highest state of existence.

 जीव की जितने प्रकार की अवस्थाएँ हैं, उनमें यह ध्यानावस्था ही सर्वोच्च है। जब तक वासना रहती है, तब तक यथार्थ सुख नहीं आ सकता। केवल जब कोई व्यक्ति इस ध्यानावस्था से, साक्षिभाव से सारी वस्तुओं का परिशीलन कर सकता है, तभी उसे यथार्थ सुख और आनन्द प्राप्त होता है। अन्य प्राणी इन्द्रियों में सुख पाते हैं, मनुष्य बुद्धि में, और देवमानव आध्यात्मिक ध्यान में जो ऐसी ध्यानावस्था को प्राप्त हो चुके हैं, उनके पास यह जगत् सचमुच अत्यन्त सुन्दर रूप से प्रतीयमान होता है। जिसमें वासना नहीं हैं, जो सर्व विषयों में निर्लिप्त है, उसके पास प्रकृति के ये विभिन्न परिवर्तन (manifold changes of nature) एक महान् सौन्दर्य और उदात्त भाव की छबि मात्र हैं। 

>>>Every act of perception includes these three : इन तत्त्वों को ध्यान में जान लेना आवश्यक है। मान लो, मैंने एक शब्द सुना। पहले बाहर से एक कम्पन ( external vibration) आया, उसके बाद स्नायविक गति (nerve motion) उस कम्पन को मन के पास ले गयी, फिर मन से एक प्रतिक्रिया हुई ( reaction from the mind) और उसके साथ ही साथ मुझे बाह्य वस्तु का ज्ञान (knowledge) हुआ। यह बाह्य वस्तु ही आकाश कम्पन ( ethereal vibrations) से लेकर मानसिक प्रतिक्रिया (mental reactions) तक सब भिन्न भिन्न परिवर्तनों का कारण है। योगशास्त्र की भाषा में इन तीनों को क्रमशः शब्द (sound), अर्थ (meaning) और ज्ञान (knowledge) कहते हैं। भौतिक विज्ञान (physics) और शरीरशास्त्र (physiology) की भाषा में उन्हें आकाश कम्पन, (ethereal vibration) स्नायु और मस्तिष्क में गति तथा मानसिक प्रतिक्रिया कहते हैं। ये तीनों प्रतिक्रियाएँ सम्पूर्ण अलग होने पर भी इस समय इस तरह मिली हुई हैं कि उनका भेद समझा नहीं जाता। हम यथार्थ में अभी उन तीनों में से किसी का भी अनुभव नहीं कर सकते; अभी तो उनके सम्मिलन के फलस्वरूप केवल बाह्य वस्तु का अनुभव करते हैंप्रत्येक अनुभवक्रिया में ये तीन व्यापार होते हैं। हम भला उन्हें अलग क्यों न कर सकेंगे? 

प्रथमोक्त योगांगों के अभ्यास से मन जब दृढ़ और संयत (strong and controlled) हो जाता है । तथा सूक्ष्मतर अनुभव की शक्ति प्राप्त करता है, तब उसे ध्यान में लगाना चाहिए। पहले पहल स्थूल वस्तु (gross objects)  को लेकर ध्यान करना चाहिए। फिर क्रमशः सूक्ष्म से सूक्ष्मतर ध्यान में हमारा अधिकार होगा, और अन्त में हम विषयशून्य अर्थात् निर्विकल्प (objectless) ध्यान सफल हो जाएँगे। मन को पहले अनुभूति के बाह्य कारण (external causes of sensations) अर्थात् विषय का, फिर स्नायुओं में होनेवाली गति (internal motions) का और उसके बाद उसकी अपनी प्रतिक्रियाओं (own reaction) का अनुभव करने के लिए नियुक्त करना होगा। जब मन अनुभूति के बाह्य उपकरणों अर्थात् विषयों को पृथक् रूप से जान सकेगा, तब उसमें समस्त सूक्ष्म भौतिक पदार्थों, सारे सूक्ष्म शरीरों और सूक्ष्म रूपों को जानने की शक्ति आ जाएगी। 

जब वह भीतर होनेवाली गतियों को दूसरे सभी विषयों से अलग करके, उनके अपने स्वरूप में, जानने में समर्थ होगा, तब वह सारी चित्तवृत्तियों पर उनके भौतिक शक्ति के रूप में परिणत होने से पूर्व ही अधिकार चला सकेगा, फिर वे चित्तवृत्तियाँ चाहे स्वयं अपनी हों, चाहे दूसरों की। और जब योगी केवल मानसिक प्रतिक्रिया का उसके अपने स्वरूप में अनुभव करने में समर्थ होंगे, तब वे सर्व पदार्थों का ज्ञान प्राप्त कर लेंगे, क्योंकि इन्द्रियगोचर प्रत्येक वस्तु, यहाँ तक कि प्रत्येक विचार भी इस मानसिक प्रतिक्रिया का ही फल है। ऐसी अवस्था प्राप्त होने पर योगी अपने मन की मानो नींव तक का अनुभव कर लेते हैं, और तब मन उनके सम्पूर्ण वश में आ जाता है। 

>>> Reject even these miraculous powers : योगियों के पास तब नाना प्रकार की अलौकिक शक्तियाँ (सिद्धियाँ) आने लगती हैं, पर यदि वे इन सब शक्तियों को प्राप्त करने के लिए लालायित हो उठें, तो उनकी भविष्य की उन्नति का रास्ता रुक जाता है। भोग के पीछे दौड़ने से इतना अनर्थ होता है! किन्तु यदि वे इन सब अलौकिक शक्तियों को भी छोड़ सकें, तो वे मनरूप समुद्र में उठनेवाले वृत्तिप्रवाहों को पूर्णतया रोकने में समर्थ हो सकेंगे। और यही योग का चरम लक्ष्य है। तभी, मन के नाना प्रकार के विक्षेप एवं नाना प्रकार की दैहिक गतियों से विचलित न होकर आत्मा की महिमा अपनी पूर्ण ज्योति से प्रकाशित होगी। तब योगी ज्ञानघन, अविनाशी और सर्वव्यापी रूप से अपने स्वरूप की उपलब्धि करेंगे, और जान लेंगे कि वे अनादि काल से ऐसे ही हैं। 

इस समाधि में प्रत्येक मनुष्य का, यही नहीं, प्रत्येक प्राणी का अधिकार है। सब से निम्नतर प्राणी से लेकर अत्यन्त उन्नत देवता तक सभी, कभी न कभी, इस अवस्था को अवश्य प्राप्त करेंगे, और जब किसी को यह अवस्था प्राप्त हो जाएगी, तभी और सिर्फ तभी हम कहेंगे कि उसने यथार्थ धर्म की प्राप्ति की है। इससे पहले हम उसकी ओर जाने के लिए केवल संघर्ष करते हैं। जो धर्म नहीं मानता, उसमें और हममें अभी कोई विशेष अन्तर नहीं, क्योंकि हमें आत्मसाक्षात्कार नहीं हुआ। इस आत्मसाक्षात्कार तक हमें पहुँचाने के बिना एकाग्रता का और क्या शुभ उद्देश्य है?

इस समाधि को प्राप्त करने के प्रत्येक अंग पर गम्भीर रूप से विचार किया गया है, उसे विशेष रूप से नियमित, श्रेणीबद्ध और वैज्ञानिक प्रणाली में सम्बद्ध किया गया है। यदि साधना ठीक ठीक हो और पूर्ण निष्ठा के साथ की जाए, तो वह अवश्य हमें अभीष्ट लक्ष्य पर पहुँचा देगी। और तब सारे दुःख कष्टों का अन्त हो जाएगा, कर्म का बीज दग्ध हो जाएगा और आत्मा चिरकाल के लिए मुक्त हो जाएगी

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