परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं,
निरीहं निराकारमोङ्कारवेद्यम्।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं,
तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्॥
(वेदसार शिवस्तव स्तोत्र)
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शांति, शांति, शांतिः
विगत सत्र में हमने जो कारण शरीर पर विचार किया था , वह हमें बिल्कुल सृष्टि के मूल में ही ले गई है। आप अपने स्थूल शरीर का विश्लेषण शुरू कर दिए थे। स्थूल से आप सूक्ष्म शरीर में पहुँचे थे। फिर हमने देखा था कि स्थूल और सूक्ष्म शरीर दोनों ही अनात्मा हैं या अनित्य हैं। यहाँ पर सबकुछ बदल रहा है , सब कुछ अन्यथा स्वभाव है। और स्थूल -सूक्ष्म शरीर के पीछे और उसके भीतर कारण शरीर है। और जैसे ही हम कारण शरीर में प्रवेश करते हैं , आप केवल अपने व्यक्तित्व के कारण में ही नहीं पहुँचते हो , बल्कि आप सृष्टि के ही मूल में पहुँच जाते हो। हर जीव का जो कारण शरीर है , कारण है , वो पूरी सृष्टि का ही कारण है। You land up in the very source of this creation itself. It is tremendous step. That's why, That is why I said this is a critical dimension . आप इस सृष्टि के मूल में पहुँच जाते हैं। यह एक बहुत बड़ा कदम है। इसीलिए, मैंने कहा कि यह एक महत्वपूर्ण आयाम है। आप सीधे व्यक्ति से यानि व्यष्टि से समष्टि में पैर रख रहे हो। ये दो शब्द व्यष्टि और समष्टि आपने सुना होगा। व्यष्टि माने व्यक्ति - Individual, यहाँ जो दिखाई दे रहा है - There is a dimension called Individual dimension, and there is a cosmic dimension. एक वैक्तिक आयाम है , और एक ब्रह्माण्डीय -विराट आयाम है। समष्टि हुआ cosmic, व्यक्ति या एक जीव जो है वह व्यष्टि है। और जितने भी जीव हैं , सब इस समष्टि के अंतर्गत हैं। प्रत्येक व्यक्ति का जो शरीर है , वह उसके भीतर रहने वाले जो असंख्य कीट -कीटाणु हैं उसके लिए विराट है -ब्रह्माण्ड है। उस छोटे छोटे जीव के लिए एक व्यक्ति ही समष्टि है , और उसके अंदर रहने वाले छोटे छोटे असंख्य जीव व्यष्टि है। उसी प्रकार हम जितने भी छोटे -छोटे प्राणी है सब एक समष्टि या एक 'Cosmic being' ब्रह्माण्डीय प्राणी के अंतर्गत हैं। किसी अमुक व्यक्ति के भीतर जो एक छोटा सा कीटाणु है , उस कीटाणु का एक स्थूल शरीर है, और उस कीटाणु का एक सूक्ष्म शरीर है। वो कीटाणु यह समझ के रखा है कि मैं यही स्थूल और सूक्ष्म शरीर हूँ। लेकिन वो कीटाणु जब अपने कारण शरीर में पहुँचेगा, तो वह उस समष्टि रूपी अमुक व्यक्ति में पहुँच जायेगा। क्योंकि सच्चाई यह है कि वो समष्टिरूपी अमुक व्यक्ति ही है। उस कीटाणु का समष्टि रूपी अमुक व्यक्ति से कोई भिन्न अस्तित्व है क्या ? हम जो अपने को अलग अलग जीव समझ रहे हैं , हमारा इस समष्टि से भिन्न कोई अस्तित्व है ही नहीं। (5.57) उस समष्टि में ये छोटे -छोटे बुलबुले (व्यष्टि) प्रकट हो रहे हैं, अदृश्य हो रहे हैं। हर व्यक्ति के शरीर में छोटे -छोटे कीटाणु प्रकट और अदृश्य होते रहते हैं। उसी प्रकार इस समष्टि में कितने असंख्य बुलबुले प्रकट हो रहे हैं, नष्ट हो रहे हैं ,अदृश्य हो रहे हैं।
जब किसी जीव के स्थूल शरीर का अन्वेषण करते हैं , उसके माध्यम से हम सूक्ष्म शरीर में पहुँच जाते हैं। और जैसे ही सूक्ष्म से कारण में हम पैर रखते हैं , हम पूरी सृष्टि के कारण में पहुँच जाते हैं। और उस सृष्टि के मूल को ही हमलोग ईश्वर कहते हैं। जो सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड को संचालित करते हैं। उसी को हम माया भी कहते हैं ! और यह माया (ईश्वर) जो हैं, वे शक्ति हैं ! आचार्य शंकर सृष्टि की इस वास्तविकता (सत्य) को शक्ति कहते हैं। ये किसकी शक्ति है ? यह उस परमात्मा की अपनी शक्ति है। परमात्मा की अपनी शक्ति ही जगत के रूप में प्रकट हो रही है। हमलोग एक बार कारणशरीर के उस परिभाषा को एक बार फिर से पढ़ें, तो यह चित्र धीरे-धीरे और भी स्पष्ट होने लगेगा - "अव्यक्तनाम्नी परमेशशक्ति:/ अनाद्यविद्या त्रिगुणात्मिका परा/ कार्यानुमेया सुधिया एव माया/ यया जगत् सर्वम् इदं प्रसूयते/" इस बात को रीढ़ की हड्डी सीधी रखकर ध्यान से सुनिए। एकदम सचेतन होकर इस बात को सुनिए।
तो ये कारण शरीर क्या है ? इसको अव्यक्त कहा गया है- अव्यक्तनाम्नी । अव्यक्त क्यों कहा गया ? क्योंकि वो अदृश्य है। जो दीखता है -वो व्यक्त है ; जो दीखता नहीं है -वो अव्यक्त है। लेकिन है ! जैसे बरगद के एक छोटे से बीज के भीतर पूरा बरगद का पेंड़ है। बृक्ष दीखता है -बीज नहीं दीखता है। बृक्ष के मूल में बीज है , जो अव्यक्त है। उसी प्रकार यह जो विश्व-प्रपंच हमें दिखाई दे रही है और हमें मोहित कर रही है। इसके मूल में एक बीज है , जो की अव्यक्त है। और यह जो अव्यक्तात्मक बीज है , वह 'परमेश -शक्ति ' है। इस विशेषण को पकड़ लेना चाहिए। बीज के अंदर शक्ति छिपी हुई है या नहीं ? एक बरगद का विशाल पेड़ एक छोटे से कण जैसे बीज में पुर बरगद का पेड़ समाया हुआ है। उसी प्रकार ये कारण शरीर एक बीज है , जिसके अंदर ये पूरा विश्व-ब्रह्माण्ड समाया हुआ है। कारण शरीर एक शक्ति है , उस शक्ति की अभिव्यक्ति है ये सारा विश्व-प्रपंच। और वो शक्ति किसकी शक्ति है ? परमात्मा की अपनी ही शक्ति है। इसलिए उसको परमेश शक्ति कहते हैं। और यह माया जो है वह - अनादि अविद्या है। माने वह अविद्या जिसकी आदि का निर्णय कोई नहीं कर सकता। ये कब शुरू हुई ? इसका निर्णय कोई नहीं कर सकता। यह माया जो अनादि अविद्या है , अर्थात अज्ञान है , ये कब शुरू हुई ? इसके आदि का निर्णय कोई नहीं कर सकता। ऐसी ये माया (अज्ञान) है ! और ये माया त्रिगुणात्मिक है। माया तीन गुणों से बनी हुई है। यह विश्व प्रपंच उस माया का ही कार्य है। माया इस जगत का कारण -हमारे स्थूल -सूक्ष्म शरीर का का कारण है। हम कारण शरीर को समझने का प्रयास कर रहे हैं। माया कारण है , माया त्रिगुणात्मिक है - इसलिए माया का जो कार्य है - वह भी त्रिगुणात्मिक है। माया का कार्य क्या है ? ये पूरा विश्व-प्रपंच, जो दिख रहा है, वह माया का ही कार्य है। तो जब कारण त्रिगुणात्मिक है तो कार्य भी त्रिगुणात्मिक है। यहाँ सबकुछ त्रिगुणात्मिक है -ये तीन गुणों का खेल चल रहा है , यहाँ पर। कारण यदि त्रिगुणात्मिक होगा तो कार्य भी त्रिगुणात्मिक ही होगा। तो यह माया जो है - वह अनादि अविद्या है , वह त्रिगुणात्मिक है , और वो परा है - यानि श्रेष्ठ है। किससे श्रेष्ठ है ? माया तो कारण है , वह अपने कार्य से श्रेष्ठ है। माया का कार्य क्या है ? जोर से बोलिये - पूरे आत्मविश्वास पूर्वक बोलिये - माया का कार्य क्या है ? यह जगत माया का कार्य है ! कोई संदेह ? इस जगत का मूल क्या है ? माया का कार्य क्या है ? जगत का कारण क्या है ? माया ! और माया का कार्य क्या है ? जगत। और जगत का कारण क्या है ? माया ! ये संबन्ध पहले समझ लीजिये। कारण यदि त्रिगुणात्मिक होगा तो कार्य भी त्रिगुणात्मक होगा। माया अपने कार्य से श्रेष्ठ है। कारण सब समय कार्य से श्रेष्ठ होता है या नहीं ? कोई शंका? कार्य सब समय स्थूल होता है, और कारण सूक्ष्म होता है। पेंड़ स्थूल है या नहीं ? लेकिन पेंड़ का बीज सूक्ष्म है। और पेंड़ श्रेष्ठ है ? या बीज श्रेष्ठ है ? बीज श्रेष्ठ है ! क्यों -बीज के बिना पेंड़ नहीं आ सकता है। पूरा पेंड़ उस बीज के भीतर अंतर्निहित है। त्रिगुणात्मिका के साथ -परा शब्द आता है। पूरे विश्व-प्रपंच का जो कारण है -माया , श्रेष्ठ है। किससे श्रेष्ठ है ? अपने कार्य जगत से श्रेष्ठ है। जगत का कारण क्या है ? माया। और यह माया - यानि कारणशरीर जो हमलोग पढ़ रहे हैं - यह कार्यानुमेय है। अर्थात कार्य को देखकर हम कारण का अनुमान लगा सकते हैं। कार्य क्या है ? जगत प्रपंच ! इस जगत प्रपंच को देख करके हम उसके कारण का अनुमान लगा सकते हैं। इस जगत के मूल में कुछ है , लेकिन वो क्या है ? अभी वो हमको पता नहीं है। लेकिन ऋषि लोग ही हमें बता सकते हैं , और शास्त्र ही हमें बता सकते हैं। तो कार्यात्मक जगत को देखकरके हम इसके कारण जो माया है , उसका अनुमान लगा सकते हैं। इसी शक्ति को ऋषियों ने -माया कहा है - 'सुधिया एव माया' - सुधि जनों ने , ऋषियों ने महापुरुषों ने, इस कारण शरीर को ही माया कहा है। और यह माया क्या है ? यया जगत् सर्वम् इदं प्रसूयते ! जहाँ से इस पूरे विश्व प्रपंच की प्रसूति होती है। जिस प्रकार कोई माता अपने गर्भ से सन्तान को प्रसव कराती है। उसी प्रकार ये पूरा विश्व प्रपंच जो है, माया रूपी गर्भ से इसकी प्रसूति होती है। (15:00) अतः माया की जो वस्तुस्थिति होगी वही जगत की भी वस्तुस्थिति है। क्यों ? क्योंकि माया कारण है , और जगत उसका कार्य है। यह धारणा बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए। जगत तो माया ही है। क्यों ? क्योंकि यह माया से उत्पन्न हुआ है। माया कारण है , और जगत उसका कार्य है। तो माया की जो वस्तु स्थिति होगी , वही जगत की वस्तु स्थिति है। तो माया की वस्तुस्थिति-status क्या है ?
क्या हम यह कह सकते हैं कि क्या माया सचमुच विद्यमान है ? ये - माया सत्य है, ऐसा कह सकते हो क्या? माया कारण है और इसका कार्य जगत है, तो क्या आप जगत के विषय में भी ऐसा कह सकते हो कि यह सत्य है ? क्योंकि जगत और माया का सम्बन्ध क्या है ? जो माया की वस्तुस्थिति होगी वही जगत की वस्तुस्थिति होगी। क्या जगत के विषय में हम ऐसा कह सकते हैं कि -ये सत्य है ? ये विद्यमान है ? ऐसा नहीं कह सकते। तो इसका मतलब क्या यह जगत विद्यमान नहीं है ? नहीं, ऐसा भी आप नहीं कह सकते हो। दोनों एक साथ सत्य है - ऐसा भी नहीं कह सकते। परस्पर विरोधी है। तो इस जगत को हम क्या कह सकते हैं ? महा अद्भुतं अनिर्वचनीयं ! यह एक ऐसे वस्तु की अनुभूति है , जो वास्तव में विद्यमान नहीं है , लेकिन विद्यमान सा हमें प्रतीत होता है।
(17.00) इसके उदाहरण हमने देखे हैं, अब फिर से माया के उदाहरण द्वारा उसकी धारणा हमें ठीक से करनी होगी। यह एक ऐसे वस्तु की अनुभूति है , जो वास्तव में न होते हुए भी हमें अनुभव हो रही है। तो इसके विषय में हम ऐसा नहीं कह सकते कि ये विद्यमान है। तो क्या ये जगत विद्यमान नहीं है ? ऐसा भी नहीं का सकते। तो क्या कहोगे इसके बारे में ? महा अद्भुतं अनिर्वचनीयं !
(17:31) दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा - ये माया ब्रह्म से भिन्न है क्या ? भिन्नाप्यभिन्नाप्युभयात्मिका नो ? ऐसा भी हम नहीं कह सकते। क्यों नहीं कह सकते ? ऋषियों की यह अंतिम अनुभूति है कि यहाँ -एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म से भिन्न कुछ है ही नहीं। यहाँ द्वितीय वस्तु हो ही नहीं सकता। ये परम् सत्य है। उपनिषदों में सभी ऋषियों की जो अनुभूति है वह यही है कि यहाँ ब्रह्म से अतिरिक्त कुछ हो ही नहीं सकता , असम्भव। तो फिर ये माया क्या ब्रह्म से भिन्न कोई द्वितीय वस्तु है क्या ? नहीं ब्रह्म से भिन्न कुछ हो ही नहीं सकता। तो फिर क्या माया ब्रह्म से अभिन्न है ? ब्रह्म से एक रूप है ? ऐसा भी हम इसको नहीं कह सकते। क्यों ? क्योंकि माया एक ऐसी अद्भुत चीज है , जो कि चली जाती है। यदि माया ब्रह्म से अभिन्न हो , तो माया जा कैसे सकती है ? क्योंकि ब्रह्म तो सब समय विद्यमान है। लेकिन माया तो चली जाती है। तो ब्रह्म के साथ माया अभिन्न है ? ऐसा भी हम नहीं कह सकते। ब्रह्म से भिन्न है -ऐसा भी नहीं कह सकते। तो क्या कहेंगे माया को ? माया ब्रह्म से भिन्न है , ऐसा पूछने का तात्पर्य हुआ कि जगत ब्रह्म से भिन्न है क्या ? ये प्रश्न है। माया के साथ हर समय जगत को जोड़िये। क्योंकि जगत माया का कार्य है , और माया इस जगत का कारण है। माया और जगत का अभिन्न सम्बन्ध है। जगत माया ही है। यहाँ हम जो भी देख रहे हैं -ये माया है। और उसीको हम जगत कह रहे हैं। यह जगत जो माया है , वह इस ब्रह्म से भिन्न है क्या? यही है -ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः। जीव को आप जगत के साथ ही जोड़ कर देखिये कि वो भी ब्रह्म ही है , दूसरा कुछ नहीं है। ये हमलोग अभी We are touching in climax ! हम चरमोत्कर्ष पर पहुँच रहे हैं ; परम् सत्य तक लगभग पहुँच गए हैं। क्या माया ब्रह्म से भिन्न है ? यह पूछने का तात्पर्य यह हुआ कि क्या जगत ब्रह्म से भिन्न है ? जगत नामक कोई ब्रह्म से भिन्न वस्तु विद्यमान है ? जगत एक वस्तु है , और ब्रह्म दूसरा वस्तु है ? ऐसा हो ही नहीं सकता। तो यह जगत ब्रह्म से अभिन्न है क्या ? ऐसा भी नहीं हो सकता , क्योंकि जगत (सूर्य,चंद्र -पृथ्वी सब) तो चला जाता है ! और ब्रह्म सब समय विद्यमान है। यह जगत जो माया है , ब्रह्म से भिन्न भी नहीं है , ब्रह्म से अभिन्न भी नहीं है। तो क्या कहें इस जगत के बारे में ? क्या कहें इस जगत रूपी माया के बारे में ? महा अद्भुतं -अनिर्वचनीयं ! यह शंकराचार्य जी की माया के बारे अतुलनीय परिभाषा है। शंकराचार्यजी की माया पर दी गयी इस परिभाषा के बारे में स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - पूरे इतिहास में माया की ऐसी परिभाषा और कहीं नहीं मिलती।
फिर तीसरा मुद्दा लीजिये -साङ्गाप्यनङ्गाप्युभयात्मिका। (21.04) माया क्या अंग युक्त है ? ऐसा भी नहीं कह सकते क्योंकि माया तो अनादि है। अनादि है यानि जिसकी शुरुआत ही नहीं है। माया एक ऐसी अद्भुत चीज है जो कभी शुरू हुई ही नहीं। जो चीज शुरू ही नहीं हुई -उसका अंग कैसे हो सकता है ? तो फिर यह माया अंगहीन है क्या ? ऐसा भी नहीं कह सकते। क्योंकि माया का जो कार्य है -यह जगत , वह तो पूरे विचित्रताओं से भरा हुआ है। माया अङ्गयुक्त है -ऐसा भी नहीं कह सकते , माया अङ्गविहीन है, ऐसा भी नहीं कह सकते। तो माया के बारे में क्या कहेंगे ? क्या कहेंगे -इस जगत के बारे में ? यही कि यह जगत महा अद्भुतं ,अनिर्वचनीयं रूपा। अगली बार जब आप इस हिमालय को देखोगे , तो फोटो खींचने के पहले यह महसूस कीजिये कि क्या महा अद्भुत चीज है - यह हिमालय पर्वत ! जो वास्तविक रूप में विद्यमान नहीं है - लेकिन इसकी बर्फ से ढँकी चोटियाँ दिखती हैं ?
यदि सत्य में प्रतिष्ठित होना ही हमारा उद्देश्य हो तो एक बार पुनः, माया कैसी अद्भुत शक्ति है , इस पर एक बार पुनः चर्चा करके स्पष्ट धारणा बनानी चाहिए। हमने रेगिस्तान में दिखने वाली मरू मरीचिका का एक उदाहरण स्वामीजी के अपने जीवन में घटित घटना में देखा था। वहाँ के तपते रेगिस्तान में वृक्षों से घिरे झील के बारे में क्या कहोगे -जिसके जल में वृक्षों की कम्पन करती परछाईं दिखती है। क्या कहोगे उस mirage (मृगतृष्णा) के बारे में ? क्या आप ऐसा कह सकते हो कि तप्ति हुई रेत पर जल विद्यमान है ? नहीं कह सकते हो , क्योंकि जब आपको यह समझ में आ जायेगा कि ये मरु -मरीचिका है , तब निर्मल जल से भरी झील दीखते हुए भी आपको पता होगा कि -वहाँ एक बून्द भी जल नहीं है। जब आपको एक बार यह समझ में आ गया कि दिखने वाला जल केवल मरू-मरीचिका है , तब आप जान लोगे कि वहाँ एक बून्द भी जल नहीं है। जब तक हमें यह पता नहीं होता कि वह मृग मरीचिका है ,तब तक हमको वहां जल सचमुच ही दीखता है , और जल के प्रति हमारी सत्यत्व बुद्धि होती है। उस जल के प्रति हमारी सत्यत्व बुद्धि होती है कि , वो जल सत्य है। लेकिन जब हमको झील के जल में वृक्ष की परछाईं कपंन करती दिख रही होती है , उस समय भी जल सत्य है क्या ? और जब हम जान जाते हैं कि यह मरू -मरीचिका है -वहाँ एक बून्द पानी नहीं है ; उसके बाद भी हमको जल दिखाई देता है ; यह जान जाने के बाद भी कि यह मरू मरीचिका है , आपकी इन्द्रियों को जल दिखाई देगा। लेकिन अब आपका बोध क्या होगा ? आप को अब भी मरु मरीचिका दिखेगी , लेकिन साथ ही साथ यह बोध भी जगा रहेगा कि वहाँ एक बूँद जल नहीं है। ये दीखता है , लेकिन वहाँ जल नहीं है , ये रेत मात्र ही है। अब क्या कहोगे आप इस मरू-मरीचिका के विषय में ? यह महा अद्भुतं अनिर्वचनीयं है ! एक ऐसे वस्तु की अनुभूति है , जो वास्तव में विद्यमान नहीं है। जो पानी वहाँ दिखाई दे रहा है , वह रेत से भिन्न है क्या ? क्योंकि रेत अतिरिक्त वहाँ कुछ है ही नहीं। तो महद्भुतं अनिर्वचनीयं।
दूसरा माया से सत्य में प्रतिष्ठित होने का दूसरा उदाहरण है, रज्जु-सर्प का उदाहरण। संध्या समय के धुँधले प्रकाश में आप रास्ते में एक पड़ी हुई एक रस्सी को सर्प समझ लेते हैं। जब तक आपको पता नहीं चला कि वहाँ रस्सी है -तब तक आप उसको सर्प ही समझते हो। यही अज्ञान है -अविद्या है -जो सच्चाई को ढँक देती है। अब सर्प की सृष्टि कहाँ से हुई ? अज्ञान से। यह अज्ञान ही माया है। सर्प जो वहाँ वास्तव में विद्यमान न होते हुए भी आपको लगता है कि सर्प है , इसके मूल में क्या है ? अज्ञान। और अज्ञान को ही माया कहते हैं। टॉर्च के प्रकाश में जब यह अज्ञान हट जाता है ,तब आप देख पाते हो कि वहाँ पर सर्प तो है ही नहीं, रज्जु है। जब तक आप अज्ञान में थे - तब तक आप नहीं कह सकते थे कि सर्प सचमुच विद्यमान नहीं है। जब ज्ञान होगा -तब भी अँधेरे में आपको वह सर्प जैसा दिखाई देगा , लेकिन आपको पता होगा कि वो सर्प नहीं है रस्सी है। क्या आप ऐसा कह सकते हो कि सर्प विद्यमान है ? ऐसा नहीं कह सकते , क्योंकि सर्प तो चला जाता है। लेकिन जब तक आप अज्ञान में हैं , तबतक आप नहीं कह सकते कि सर्प विद्यमान नहीं है। आप उस रज्जु को सर्प समझकर सचमुच भयभीत हो जाते हो। तो क्या कहोगे इस अनुभूति के बारे में - महा अद्भुतं , अनिर्वचनीयं। क्योंकि यह एक ऐसे वस्तु की अनुभूति है -जो न होते हुए भी हमें अनुभव हो रहा है।
माया के ऊपर तीसरा महत्वपूर्ण दृष्टान्त है स्वप्न का। जो हर रोज हमारे साथ हो रहा है। रज्जु-सर्प का उदाहरण , या मरू मरीचिका का उदाहरण तो हमसे बाहर किसी चीज की अनुभूति है , जो बाहर विद्यमान न होते हुए भी हमें दिखती है। लेकिन जब स्वप्न चल रहा होता है , तो वह तो आपके भीतर चल रहा होता है। आप पहले बताइये स्वप्न कहाँ चल रहा होता है ? यह आपके भीतर चलता है या नहीं ? ये जो सारा स्वप्न-सृष्टि है, स्वप्न में दिखाई देने वाला जो पूरा ब्रह्माण्ड है -ये कहाँ दिखाई दे रहा है ? आपके भीतर दिखाई दे रहा है या आपके बाहर दिखाई दे रहा है ? देखिये एक पिण्ड में सारा ब्रह्माण्ड है। (28.03) अभी भी, इस समय भी वही हो रहा है। हमको समझ में नहीं आ रहा है , अज्ञान के कारण। स्वप्न कहा दिखाई देता है , आपके भीतर दिखाई देता है। स्वप्न सृष्टि जो है वहां तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है। स्वप्न में दिखाई देने वाले -सूर्य, चंद्र , पर्वत , नदियाँ सबकुछ अभी की तरह सजीव लग रही होती हैं या नहीं ? जैसा अभी है , वैसा ही स्वप्न में भी स्थूल सृष्टि है। आप वहाँ गिरते हो चोट लगती है। स्वप्न में पूरा समष्टि भी है -व्यष्टि भी है। आप भी स्वप्न में रहते हो। स्वप्न के अंदर पूरा एक cosmos भी है , और एक individual भी है। आप स्वप्न में उस स्वप्न सृष्टि के एक पात्र हो। और स्वप्न में तरह तरह के कार्य कर रहे हो। स्वप्न देख कौन रहा है ? That is something to be discovered . यह खोज का विषय है। जब स्वप्न की अनुभूति होती है , तो बिल्कुल आपको सत्य जैसा ही लगता है या नहीं ? जिस समय स्वप्न चलता रहता है , उस समय किसीको पता होता है कि -ये स्वप्न है ? उस वक्त वही सत्य है , तब यह नहीं होता। वह स्वप्न चला गया, यह चलता है। थोड़ी देर बाद ये चला जायेगा , वो प्रकट हो जायेगा। यह भी जो प्रकट हो रहा है , आपके भीतर ही प्रकट हो रहा है। जब तक स्वप्न चलता है , तब तक स्वप्न सृष्टि सत्य सा प्रतीत होता है। तो स्वप्न में सबकुछ विद्यमान है क्या ? स्वप्न के विषय में क्या आप ऐसा कह सकते हो कि ये सत्य है ? क्योकि स्वप्न जब टूटता है , तो स्वप्न सृष्टि कहाँ चली जाती है ? आज तक किसी व्यक्ति को मैंने नहीं देखा जो स्वप्न से उठने के बाद स्वप्नों को सत्य मानने वाला हो। उठते ही हमको ये पता होता है कि अरे वो तो एक सपना था। स्वप्न में जो कुछ हो रहा था -तब हम सबकुछ को बहुत seriously ले रहे थे, लेकिन स्वप्न टूटने पर, क्या आप फिर से उसको seriously लोगे ? यहाँ पर जो राजा है , वो स्वप्न में भिखारी बन जाता है। अब जब राजा जनक स्वप्न में भिखारी बन गया है , तो तरह तरह के कष्टों से गुजर रहा है। और स्वप्न जबतक वो कष्टों से गुजर रहा होता है , तब तक वो सत्य सा ही लगता है कि नहीं ? लेकिन जब स्वप्न टूट गया और फिर आप राजा की कुर्सी पर बैठ जाते हो , तब क्या उस समय भी स्वप्न को सत्य मानोगे ? तो जब स्वप्न चल रहा था , उस समय स्वप्न में जो भोजन के लाले पड़े थे और कष्ट की अनुभूति हो रही थी , वो अनुभूति क्या थी ? उस समय एकदम सत्य सा लग रहा था। लेकिन सचमुच वैसा था क्या ? उसी तरह न होते हुए भी हम सम्पूर्ण सृष्टि को अनुभव कर रहे हैं। स्वप्न में ये सृष्टि सचमुच में है क्या ? प्रश्न है। वहाँ पर कुछ भी विद्यमान नहीं है , वहाँ पर एकमात्र ब्रह्म-आत्मा ही विद्यमान है। सृष्टि न होते हुए भी सम्पूर्ण सृष्टि को जो हम अनुभव करते हैं , उसके विषय में क्या कहोगे ? महा अद्भुतं -अनिर्वचनीयं ! यहाँ भी उसी प्रकार सबकुछ चल रहा है , पर हमको समझ में नहीं आ रहा है। जिस प्रकार जब स्वप्न चल रहा होता है, तब स्वप्न देखने वाले उस व्यक्ति को यह पता नहीं होता कि ये स्वप्न है। अगर स्वप्न देखते समय किसी को ये पता चल जाये कि ये स्वप्न है , तो उसकी समस्याओं का हल हो गया। जब स्वप्न चल रहा होता है , उस समय स्वप्न देखने वाले व्यक्ति को ये पता नहीं होता कि यह स्वप्न है। वो विभिन्न प्रकार के कष्टों से गुजर रहा है। अगर उस स्वप्नावस्था में उसको यह बोध हो जाता है कि यह तो सपना है , तो उसके बाद क्या होगा ? उसकी सारी समस्यायों का सम्पूर्ण हल वहीं पर हो जायेगा। उसी प्रकार यहाँ जो खुली आँखों से XYZ -XYzटॉवर-XYZ शिविर आदि का जो सपना चल रहा है , आपकी समझ में आ गया कि यह भी एक स्वप्न ही चल रहा है। तो आपके सारे समस्याओं का अंत वहीं पर हो जाता है।
उस माया की परिभाषा में देखिये शंकराचार्यजी क्या अद्भुत बात कह रहे हैं। माया क्या है? अव्यक्तनाम्नी परमेशशक्ति: अनाद्यविद्या त्रिगुणात्मिका परा । कार्यानुमेया सुधियैव माया, यया जगत्सर्वमिदं प्रसूयते ॥ ११०॥ ये माया क्या है ? अनादि अविद्या है। इसके आदि का निर्णय कोई नहीं कर सकता। अब कल रात को तुमने कोई सपना देखा ? कुछ तो देखा था -पर अब याद नहीं है ? तो मुझे बताओ कितने बजे तुमने वह स्वप्न देखा था ? मुझे बताओ वह सपना कितने बजे शुरू हुआ ? सपने का आरम्भ कब हुआ ? कोई यह बता सकता है ? कल रात में ही आपने जो सपना देखा , वह कितने बजे देखा ? कोई बता सकता है ? उसके आदि का निर्णय कोई कर सकता है ? इसीलिए उस माया को अनादि कहते हैं , वो माया ऐसी एक चीज है, जिसके आदि का निर्णय कभी हो ही नहीं सकता। (33:54) क्योंकि वो वास्तविक में होता तो आप निर्णय करोगे न ? इसीलिए तो इस जगत रूपी माया को कहा -अद्भुतं अनिर्वचनीयं।
आज का भौतिक विज्ञान जगत के शुरुआत को जानने का प्रयास - सिर पटक पटककर करने में लगी हुई है। 14 अरब वर्ष पहले एक बहुत बड़ा धमाका हुआ था?और फिर सृष्टि शुरू हुई ?> There was a big bang 14 billion years ago ? and then creation started > और फिर सृष्टि शुरू हुई ? ऐसा कहना - ये सब छोटे बच्चों को फुसलाने के लिए कहना अच्छा है ! क्या इसको मान लेना अतिश्योक्ति नहीं है ? क्यों इसको वैज्ञानिक अन्धविश्वास कहना पड़ता है ? पूरी विनम्रता से हम वेदांती लोग 'modern science' या modern physics को स्वीकार करते हैं , इसके बहुत मानवोपयोगी पहलू हैं। काफी प्रगति की है। आधुनिक विज्ञान को Underestimate नहीं किया जा सकता। फिर भी इस 'modern science' के मूल में ही -fallacy है यानि भ्रान्ति है। चंद्रयान -मंगल यान सब तरक्की ठीक है। लेकिन उसके मूल में एक भयंकर fallacy या झूठा तर्क है। वो झूठा तर्क क्या है ? ये पूरा भौतिक विज्ञान है वो पूरा का पूरा ही आपके स्थूल शरीर में केंद्रित है या नहीं ? हम जिसको भौतिक विज्ञान कहते हैं , ये आपके स्थूल-शरीर केंद्रित मात्र ही तो है ? स्थूल शरीर के पीछे और भीतर कितनी चीजें हैं , परन्तु वे उसको मानते ही नहीं है। कुछ दशकों पहले तक तो भौतिक विज्ञानी मन को भी नहीं मानते थे। Western science आज भी मन को समझ नहीं सका है। पाश्चात्य विज्ञान brain को मानता है , mind को आज भी नहीं मानता है। वो कहते हैं - इस मन की रचना तो ब्रेन कर रहा हैं। सब उल्टा है उनकी बुद्धि में। वे कहते हैं - मस्तिष्क ही मन का निर्माण करता है - Brain creates the mind and they equate mind with brain. लेकिन हमलोग बचपन से उन्हीं के भौतिक विज्ञान को सच मानकर पढ़े हैं - इसलिए हमलोग भी भ्रमित हो गए हैं , और सबकुछ को उसी दृष्टिकोण से देखते हैं। लेकिन इसके मूल में ही ऐसा एक fallacy या भूल है। पहला भूल तो यह है कि आधुनिक विज्ञान सिर्फ स्थूल शरीर को ही सत्य मानकर चलता है , उस पाश्चात्य विज्ञान को 'सूक्ष्म और कारण शरीर' का कोई अंदाजा भी है क्या? इस स्थूल शरीर और स्थूल इन्द्रियों से जितना यह विश्वप्रपंच दिखाई देता है , इतने को ही वह सम्पूर्ण सृष्टि समझता है। जबकि वेदांत की दृष्टि में यह दृष्टिगोचर जगत या सृष्टि विश्वप्रपंच की एक बूँद भी नहीं है। एक बूँद को भी एक लाखवां भाग करें तो यह इन्द्रियगोचर सृष्टि उतना भी नहीं है। हमारे शास्त्रों में चतुर्दश भुवनानि की बात है।
अस्तित्व के 14 स्तर हैं; There Are 14 planes of existence ! आपलोगों ने सुना होगा - भूर्भुवः स्वः मह तपसः अतल, वितल, रसातल, महातल और पाताल। ऐसे चतुर्दश भुवनानि। [शिरोमध्ये महादेवः सर्वभूतमयः स्थितिः।गवामंगेषु निष्ठान्ति भुवनानि चतुर्दश॥] उसमें जो भूलोक है , वही ये मनुष्य लोक है। यह अस्तित्व का केवल छोटा सा तल है। इस भूलोक में बैठकर कोई भौतिक वादी - Materialist- गर्व के साथ कहता है कि मैं अपनी प्रयोगशाला में बैठकर मैं पूरी सृष्टि के शुरुआत का निर्णय कर लूंगा - तो इस प्रयास में वह क्या करता है ? सृष्टि के आदि को समझने के लिए वह एक स्थूल वस्तु को तोड़ता है तो Molecules, तक या अणुओं तक पहुँचता है , फिर Molecules को तोड़ता है , तो Atoms तक या परमाणु तक पहुँचता है। Atoms को तोड़ेगा तो Subatomic particles तक पहुँचेगा, उसको भी तोड़ेगा तो कहीं भी नहीं पहुँचेगा। क्योंकि ये सारी चीजें इन्द्रिय-गोचर जगत की चीजें है। ये 'Basic Fallacy' है -मूल भ्रान्ति है , इसको 'Reductionism' कहते हैं -You are reducing everything to sensory data ! The data which is investigated by the physical science , it is all sensory data. any doubt ? भौतिक विज्ञान द्वारा जितने डेटा की जांच की जाती है, वह सभी संवेदी डेटा है। केवल वही जो इंद्रियाँ प्रकट करती हैं ; कोई संदेह ? Only whatever the senses reveal, any doubt ? That Is what their investigation. सत्य को लेकर भौतिक विज्ञान की खोज बस इन्द्रियों तक है। आप परमाणुओं को तोड़ सकते हैं ! आप एक के बाद एक परमाणु तोड़ सकते हैं, एक के बाद एक कई परमाणुओं को विघटित कर सकते हैं, You can break Atoms! You can break Atoms after atoms , Atoms after atoms , आप पदार्थ को Accelerator में डालिये (त्वरक) में डालिये , उसको LHC में डालिये , उसको तोड़ -तोड़ कर देखते रहिये। लेकिन सिर्फ बच्चों के खेल जैसा होकर रह जायेगा , पहुँचोगे कहीं नहीं ! क्योंकि उसका 'Basic Fallacy' है -मूल भ्रान्ति ये है कि आप यह समझ रहे हो कि इस स्थूल शरीर द्वारा इन्द्रियों से जितना कुछ जगत दिख रहा है , जगत बस इतना मात्र ही है ? और इसकी शुरुआत कब हुई इसके निर्णय करने में आप सिर पटक पटक कर प्रयास कर रहे हो ? और कुछ कुछ अंदाजा लगाकर -वैज्ञानिक सिद्धांत देने की चेष्टा कर रहे हो ? 14 अरब वर्ष पहले एक बहुत बड़ा धमाका हुआ था? और फिर सृष्टि शुरू हुई ? इसीको स्वामी विववेकानन्द वैज्ञानिक अंधविश्वास'Scientific superstition' कहते हैं। वैज्ञानिक सोचते हैं कि वे सबसे अधिक तर्कसंगत लोग हैं, लेकिन यह सोचना सबसे बड़ा अंधविश्वास है कि केवल इन्द्रिय गोचर पदार्थ ही अस्तित्व में है! Scientists think that they are the most rational people , but this is the biggest superstition to think that matter alone exists ! This is the biggest superstition to think that world is only this much ! Whatever the scenes revealed ? आँखों से जितना दिख रहा है ,जो भी दृश्य सामने आए दुनिया को बस इतना ही समझना सबसे बड़ा अंधविश्वास है! भौतिक विज्ञान के मूल में ही भयंकर-fallacy भ्रान्ति है! तो देखिये जैसे सपने की शुरुआत कब हुई ? उसका निर्णय कौन कर सकता है ? उसी प्रकार इस पंचेन्द्रिय जगत जितना भी दिख रहा है - सब सपना ही चल रहा है। इस सृष्टि की शुरुआत का निर्णय असम्भव है। ये मैं नहीं कह रहा हूँ , यह 'Once and for all times' एक बार और हमेशा के लिए - सनातन सत्य है , यह हमारे महान पूर्वज ऋषियों की वाणी है। ये भौतिक विज्ञानी लोग कितना भी हिसाब लगाते रहें , 'सत्य' को इन इन्द्रियों से सीमित नहीं देख सकते। इनका हिसाब हर छः महीने में बदलता रहता है। ये अनादि है। तो जैसे माया अनादि है , वैसे ही जगत माया ही है , इसलिए जगत अनादि है !! ये अनादि है , अनंत है ये चलता रहता है -जब तक ज्ञान नहीं होता। ये अनादि अनंत है , लेकिन ज्ञान होने पर ये सम्पूर्ण सृष्टि लुप्त हो जाती है।जो व्यक्ति सपने में राजा से भिखारी बन गया था , उसको अगर ज्ञान हो गया कि यह सपना है , तो कहाँ गया स्वप्न सृष्टि ? वह जो सपने में भिखारी होने के कष्ट या राजा होने के सुख का अनुभव कर रहा था; वह स्वप्न सृष्टि कहाँ गयी ? जो सपना देखने वाला बुलबुला था उसको जब ज्ञान होगा, तो क्या होगा ? उसको यही ज्ञान होगा कि मैं देह नहीं -आत्मा हूँ ! (39:08)
ये माया सृष्टि जो हमको दिखाई दे रही है वो अनादि है। ये ऐसी एक अद्भुत अनुभूति (नाम-रूप) है जो कि वास्तविक रूप में विद्यमान ही नहीं है। इस इन्द्रियगोचर जगत के मूल में ही माया है। और यह माया जो है - वह शक्ति है। ये किसकी शक्ति है ? ये सच्चिदानन्द ब्रह्म या आत्मा की अपनी ही शक्ति है ? सच्चिदानन्द , ब्रह्म या या आत्मा अपनी ही शक्ति से अपने-आप को ढँक रहे हैं , और ढंक करके ये अद्भुत दृश्य खड़ा कर रहे हैं। बहुत से लोग अभी यह सोच रहे होंगे कि आखिर सच्चिदानन्द स्वरुप ब्रह्म को यह सब करने की क्या जरूरत थी ? (40.05) बहुत से लोगों के मन में ये प्रश्न चल रहा होगा। लेकिन ये क्यों का प्रश्न नहीं है , यह वास्तविकता है। स्वामी जी कहते है -'It is a statement of fact !' यह वेदांत का एक तथ्यात्मक घोषणा /बयान है! It is a maya , It is a statement of fact ! ये स्वामी जी की दी हुई जगत की परिभाषा है। यह जगत क्या है ? यह जगत माया है। माया क्या है ? It is a statement of fact ! ये वस्तुस्थिति है , वस्तुस्थिति क्या है ? What we are and what we are seeing around us ,Maya is a statement of fact ! जो हम लोग हैं और अपने आस-पास जो कुछ देख रहे हैं, यह सब माया है। आज हम अपने आप को जीव रूप में (M/F) रूप में पा रहे हैं , माया इसके मूल में है। जीव और जगत जो दिखाई दे रहा है , इसकी उत्पत्ति माया से हुई है।What we are and what we are seeing around us , हमको लगता है कि जो कुछ हम देख रहे हैं वो जगत है। यह माया के कारण है ,माया सत्य को ढँक रही है। और माया ही सत्य को दिखा भी देती है। (40.55)
अभी हम माया के दूसरे पक्ष में आने वाले हैं। माया एक ऐसी चीज है जो सत्य को ढँकती भी है , और सत्य को प्रकट भी करती है। इसलिए माया पर शंकराचार्य जी की एक और रचना है माया पञ्चकं। वहाँ पर कहते हैं - अघटन घटन पटियसी माया। अर्थात माया वो चीज है , जो असम्भव को सम्भव बना देती है। असम्भव क्या है ? ब्रह्म से भिन्न कुछ हो ही नहीं सकता। लेकिन माया वो शक्ति है जो ब्रह्म से भिन्न जैसा कुछ अस्तित्व में है - ऐसा प्रकट करा देती है। असम्भव को जैसे कि सम्भव बना देती है। उसमें निपुण है -पटियसी' माने निपुणता ये माया का कार्य है। जहाँ कुछ भी नहीं है , वो पूरे ब्रह्माण्ड को सृष्ट करती है। जैसे कि स्वप्न में हो रहा है। कुछ है क्या वहाँ पर ? जगने पर कहाँ चला गया वो सारा सृष्टि ? यहाँ पर भी बिल्कुल उसी प्रकार है , ये स्वप्न ही चल रहा है। कुछ न होते हुए भी हमें यहाँ सबकुछ सत्य जैसा लग रहा है। आपलोगों ने राम-नाम चैटिंग किया होगा ? उसमे एक श्लोक है -
यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा
यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः ।
यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम् ॥
(श्रीरामचरितमानस बा॰ श्लोक ६)
जिनकी माया के वशीभूत सम्पूर्ण विश्व, ब्रह्मादि देवता और असुर हैं, जिनकी सत्ता से रस्सी में सर्प के भ्रम की भाँति यह सारा दृश्य जगत् सत्य ही प्रतीत होता है और जिनके केवल चरण ही भवसागर से तरने की इच्छा वालों के लिए एकमात्र नौका हैं, उन समस्त कारणों से परे (सब कारणों के कारण और सबसे श्रेष्ठ) राम कहलाने वाले भगवान हरि की मैं वंदना करता हूँ ॥
ये सारा जगत माया के वशवर्ती है - माया के वश में है , सब माया के अंतर्गत है। यहाँ जितने नाम रूप हैं सब माया के अंतर्गत हैं। ब्रह्मादि देवता और असुर के नाम-रूप भी, झूठ को सच समझता है। माया के कारण जो झूठ है , वो सत्य सा लगता है ? जिस प्रकार अज्ञान के कारण रज्जु में सर्प हमको सत्य सा लगता है। उसी प्रकार ये पूरा विश्व प्रपंच वास्तव में विद्यमान नहीं है। लेकिन हमको लगता है कि सचमुच ही विद्यमान है। ये जगत माया शक्ति का काम है।
इस माया शक्ति का सबसे सुंदर प्रतीक क्या है ? (44.00) अब ये माया या कारण-शरीर बुद्धि के परे की चीज है न ? क्यों ? ये सब परस्पर विरोधी चीजें हैं। ये सब Logic, reasoning आदि की बात है वह 'सत्य ' परम् सत्य के लिए फिट नहीं बैठेगी। Logic और reasoning तो बहुत छोटा सा आयाम है - जो केवल स्थूल चीजों से जुड़ा हुआ है। जब आप सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर में जाओगे तो ,आज Physics भी यही कहने लगा है। जब आप Subatomic level, या उप-परमाणु स्तर पर जाओगे , Causality collapse ! कारण-कार्य सिद्धांत भी ध्वस्त हो जाता है। आज भौतिकी भी इसी विचार को प्रतिध्वनित कर रही है,जो ऋषियों ने युगों पहले बता दिया था!Today physics is echoing the same idea, which the rishis had told ages ago! कार्य-कारण संबंध कहाँ लागु होता है? Where is causality ? causality तो स्थूल स्तर पर लागु होता है। आप जितना सूक्ष्म स्तर पर जाओगे , यह causality आदि सबकुछ Breakdown हो जाता है ,टूट - फूट जाता है। Breakdown of causality is the development of the modern Physics today .कार्य-कारण के टूटने को ही आज आधुनिक भौतिकी का विकास कहा जा रहा है। और वह भी अभी बहुत स्थूल ही है। आज physics भी यही भाषा बोल रहा है। Physics में 'Uncertainty principle' का सिद्धान्त है। जो कहता है -आप जब Subatomic level, पर जाओगे तो वहाँ सबकुछ Uncertain है -वहाँ सारी Certainty - निश्चितता, अवश्यंभाविता खत्म हो जाती है।आप एक ही समय में किसी कण की स्थिति और संवेग दोनों का निर्धारण नहीं कर सकते। और कण हमेशा एक ही समय में अलग-अलग स्थानों पर दिखाई देता है। भौतिकी में जिसको 'अनिश्चितता का सिद्धांत' कहते हैं ,You cannot determine the position as well as the momentum of a particle , at the same time . Either you know one or other thing you are not knowing. and the particle is always is appearing in different places at the same time .या तो आप एक बात जानते हैं या दूसरी बात नहीं जानते हैं। It is all errotic, You have gone beyond the logic and reasoning .आप तर्क और विवेक से परे चले गए हैं। तो जितना भी Subatomic particles है वह एक ही समय में बहुत जगह पर दिखाई दे रहा है। एक ही पार्टिकल है , लेकिन मनुष्य की बुद्धि के पर चला गया न ? ये physics ही वह भाषा बोल रहा है ,जो हमारे ऋषियों अनादि काल से घोषित करते आ रहे हैं। तो जितना आप सूक्ष्म से कारण में जाओगे ये सारा causality टूट-फुट जाता है। आज physics यह प्रश्न कैसे कर सकता है, कि एक ही पार्टिकल चार जगह पर क्यों दिखाई देता है ? ये क्यों की बात नहीं है। ये वास्तविकता है - महा अद्भुतं अनिर्वचनीयं ! इसको आप बुद्धि से नहीं समझ पाओगे। But it is matter of experience ! similarly आप यहाँ पर भी कारणशरीर को या माया को बुद्धि से नहीं समझ पाओगे। क्यों ऐसा हो रहा है , ये प्रश्न हम अज्ञान में कर रहे हैं। ये प्रश्न जो उठा कि XYZe में ऐसा क्यों हुआ ? ये अज्ञान में उठता है। जब ज्ञान होगा , स्वप्न से जग जाओगे तो देखोगे कि स्वप्न सृष्टि तो है ही नहीं ! तो क्यों पूछने का क्या मतलब है ? आप स्वप्न में बैठकर के यह प्रश्न कर रहे हो कि ये स्वप्न क्यों ? लेकिन स्वप्न सृष्टि सच में है क्या ? स्वप्न के भीतर बैठकर तुम यह पूछो कि मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ ? या ऐसा क्यों हो रहा है ? लेकिन जब सपना टूट जाता है , तब वो प्रश्न फिर उठेगा ? प्रश्न ही निराधार होगया न ? निरर्थक हो गया। जब तक स्वप्न चल रहा था , हम अज्ञान में थे , तबतक हमारे मन में ये प्रश्न उठता है - ये क्यों ? लेकिन जिस दिन ये सपना टूटेगा , तब ये प्रश्न निरर्थक होगा की नहीं ? ये माया ये ऐसी एक वस्तुस्थिति है , It is phenomenon- यह एक घटना है , ये जगत माया का ही सारा खेल चल रहा है। ये मैं -तुम भेद , ये सृष्टि का भेद , ये सब माया की ही सृष्टि है। अब इसका सबसे सुंदर प्रतीक हमारी आँखों के लिए क्या है ? अब माया तो एक Abstract Idea ' हो गया -अमूर्त विचार' हो गया ! जिसको समझना बड़ा कठिन है।
इसका सबसे सुंदर दृश्यमान प्रतीक - सबसे सुंदर !! ये प्रतीक ऋषियों की अनुभूति है , ये ऋषियों का ही बनाया हुआ है। इसका सबसे सुन्दर दृश्यमान प्रतीक है - माँ भवतारिणी काली ! (47.40) आप सोचेंगे मैं ये क्या बोल रहा हूँ ? काली माता का रूप देखा है न ? देखिये अब हमलोग एक शक्ति की बात कर रहे हैं। कारण शरीर शक्ति है , किसकी शक्ति है परमात्मा क़ी? इसी शक्ति की उपासना- विभिन्न रूपों में होती है। क्योंकि यह शक्ति जो है -यह जगतजननी है। ये जगतधात्री है ! ये सारा विश्वप्रपंच आया कहाँ से ? माया से ! माया शक्ति से। इसको धारित कौन कर रही है , यही शक्ति धारित कर रही है। और इसका पालन के साथ संहार कौन कर रही है ? वही शक्ति कर रही है। शक्ति ही सृष्ट कर रही है , शक्ति ही सृष्टि को बचा के रख रही है -स्थिति दे रही है। और वही शक्ति उसका संहार और नाश भी कर रही है। ये सृष्टि, स्थिति और विनाश का खेल यह शक्ति का खेल है , और उसका सबसे सुंदर जो प्रतीक है वह काली, भवतारिणी काली है, जगतजननी है , जगतधात्री है , जगत प्रसविनी है । सृष्टिकर्ता है -सृष्टिकर्तृ है ! क्योंकि शक्ति सब समय स्त्रीलिंगी ही होती है ! शक्ति कभी पुलिंग नहीं होती। The Shakti, the power is always feminine, इसलिए देखिये जिसको हमलोग लड़की या महिला कहते हैं , वे सभी महिलाएं शक्ति की विशेष रूप हैं ! हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति में हम महिलाओं को देवी के रूप में देखते हैं। सभी शक्ति हैं - पुरुष भी शक्ति ही हैं। लेकिन महलाएं उनकी विशेष manifestation या अभिव्यक्ति हैं ! तो शक्ति सब समय स्त्रीलिंग ही होती है। ये जो काली के रूप में शक्ति का प्रतीक है। The image of Kali, It is a complete picture of Reality ! काली की छवि, यह वास्तविकता की -सत्य की एक पूर्ण तस्वीर है!आप लोग किसी कालीमंदिर में जरूर गए होंगे ? अच्छा कलकत्ते में जो दक्षिणेश्वर काली मंदिर है। जहाँ पर श्रीरामकृष्ण परमहंस देव का जो लीला स्थान है , कलकत्ते जब आप जाएँ तो और कहीं जायें या न जाएँ लेकिन दक्षिणेश्वर काली मंदिर जरूर जाइएगा। किसी भी कालीमंदिर में जब हम प्रवेश करते हैं , वहाँ सामने दृश्यमान क्या है ? एक निर्वस्त्र महिला खड़ी हुई है ! है कि नहीं ? काली तो निर्वस्त्र हैं। उसके बाल खुले हुए हैं। उसके चार हाथ हैं। और देखिये वो काली खड़ी हुई हैं शिव की छाती के उपर ! अच्छा हमलोगों को यह पता है कि वे शिवजी के छाती के ऊपर खड़ी हैं। लेकिन किसी अनजान व्यक्ति को आप काली की मूर्ति के सामने ले जाओ , हम जरूर कह सकते हैं कि उसकी नजर शिवजी पर पड़ेगी ही नहीं। उसकी नजर सिर्फ काली पर ही पड़ेगी। उसको पता भी नहीं चलेगा कि काली शिव के छाती पर खड़ी है। वो भाव मूर्ति किस चीज की प्रतीक हे ? ये काली जो है , वह शिव जो ब्रह्म हैं , वह उन ब्रह्म को ढँक रही है। ये काली क्या है ? अज्ञान है न ? काली तो अनादि अविद्या है-माया है! यह माया वह पर्दा है जो सत्य को ढँक देती है। और शिव क्या हैं ? सच्चिदानन्द ब्रह्म हैं ! सच्चिदानन्द ब्रह्म को ये काली जो है ,काली यानि माया जो है , और माया यानि जगत। जगत और माया एक हो गया न ? उसीका प्रतीक है ,ये निर्वस्त्र महिला जो जगत हैं ; ये क्या कर रही हैं ? ब्रह्म रूपी सत्य को ढँक रही हैं कि नहीं ? इस जगत रूपी काली के रहते हुए हमको ब्रह्म दिखाई नहीं देता। काली के रहते हुए शिवजी दिखाई नहीं देते। शिवजी जैसे कि ढँक गए हैं। क्योंकि काली उनके छाती पर खड़ी हुई हैं। और यहाँ जो भी चल रहा है , यह सब काली का -उसका नृत्य चल रहा है। वो नृत्य कर रही है। उसके चार हाथ हैं , और वो परब्रह्म रूपी शिवजी के छाती पर वो नृत्य कर रही हैं। और देखिये यहाँ पर सारा कुछ जो चल रहा है , हमलोग यह पहले दिन से कह रहे हैं। इसी क्षण कितने बुलबुले प्रकट हुए ? और कितने बुलबुले नष्ट हुए ? मुझे बताइये आप। ये काली का नृत्य चल रहा है। The dance of creation , preservation , and destruction ! सृष्टि -स्थिति -प्रलय का ही यहाँ पर नृत्य चल रहा है। काली शक्ति का नृत्य चल रहा है। कोई शंका ? ये क्यों ? कैसे ? ये बुलबुला क्यों टुटा ? बुलबुला टूटने की बात मैं इसलिए कह रहा हूँ कि - हमारे आस पास का कोई बुलबुला यदि टूट जाये , तो हम तुरंत प्रश्न कर देते हैं , ये क्यों मरा ? इसी सृष्टि में कितने रोज मर रहरे हैं , हम प्रश्न करते हैं क्या ? देखिये दृष्टि स्पष्ट होनी चाहिए। ये काली का नृत्य चल रहा है यहाँ पर। ये सृष्टि -स्थिति -प्रलय हो रहा है। वो सृष्टि भी करती है , बुलबुलों को वो निर्मित करती है। बुलबुलों को वह बचा कर भी रखती है , थोड़ी देर के लिए। और वो स्वयं उस बुलबुले को खत्म भी करती है।There is no rhyme and reason! इसके नृत्य में कोई कोई तुक और कारण नहीं है। logic चला गया। क्यों का प्रश्न नहीं है ! ये ऐसा ही है ! It is a dance of creation , preservation and destruction !यह सृजन, संरक्षण और विनाश का नृत्य है! यह सृष्टि ,स्थिति और प्रलय का एक नृत्य चल रहा है। उसी की प्रतीक है -काली ! और इसके पीछे ब्रह्म छिपा हुआ है। सामने जो मूर्ति -जगत दिखाई दे रही है , हम इसीसे आकृष्ट हैं। इसी जगत या माया से जब तक हम आकृष्ट रहेंगे , तब तक सत्य स्वरूप जो ब्रह्म हैं , शिव हैं , वो हमको कभी भी समझ में नहीं आएंगे। तो ये काली क्या कर रही है ? ये काली सत्य को ढंक भी रही है। लेकिन जिस दिन हम माँ , माँ , माँ पुकारते हुए काली की शरण में जायेंगे ; (53:51) ये काली शिव को प्रकट भी कर देती हैं। दुबारा सुनिए - जिस दिन हम इस शक्ति के शरण में जायेंगे , काली के शरण में जाना ? यानि इस माया शक्ति के शरण में जिस दिन हम जायेंगे ? अब यहाँ भक्ति आ गयी। अद्वैत विचार अब भक्ति में पहुँच रही है। अति सुंदर यही सही भक्ति है। आप सृष्टि के मूल में जा रहे हो न ? सृष्टि के मूल में तो यही शक्ति है। सृष्टि के मूल में नहीं - ये सृष्टि तो शक्ति ही है। यह विश्व ब्रह्माण्ड शक्ति की ही अभिव्यक्त दशा है। मूल में तो यही शक्ति है। यही शक्ति ईश्वर है ! जब आप इस शक्ति के शरण में जाओगे , इस काली की शरण में जाओगे , तब यही काली जो अब तक सत्य को ढँक कर रखी हुई थी , वो सत्य को प्रकट भी कर देती है। आप लोगों ने भगवान शंकराचार्य जी का अन्नपूर्णा स्त्रोत्रं पढ़ा होगा ? (54:47)
नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी
निर्धूताखिलघोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी ।
प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥१॥
हे माता अन्नपूर्णा ! आप सदैव सबका आनन्द बढ़ाया करती हो, आपने अपने हाथ में वर तथा अभय मुद्रा धारण की हैं, आप ही सौंदर्य रूप रत्नों की खान हो, आप ही भक्तजनों के समस्त पाप विनाश करके उनको पवित्र करती हो, आप साक्षात् माहेश्वरी हो और आपने ही हिमालय का वंश पवित्र किया है, आप काशीपुर की अधीश्वरी देवी हो, आप अन्नपूर्णेश्वरी और जगत् की माता हो, कृपा करके मुझको भिक्षा प्रदान करो।
नानारत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरी
मुक्ताहारविलम्बमानविलसद्वक्षोजकुम्भान्तरी ।
काश्मीरागरुवासिताङ्गरुचिरे काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥२॥
हे देवि ! आप अनेक प्रकार के विचित्र रत्नों से जड़े हुए आभूषण धारण करती हो, आप ही ने स्वर्ण-रचित वस्त्र पहन कर मुक्ता माय हार द्वारा दोनों स्तन सुशोभित किए हैं, सारे शरीर पर कुंकुम और अगर का लेपन करके अपनी शोभा बढ़ाई है, आप काशीपुर की अधीश्वरी देवी हो, आप ही अन्नपूर्णेश्वरी और जगत् की माता हो, हे भगवती अन्नपूर्णा आप कृपा करके मुझको भिक्षा प्रदान करो।
योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्मार्थनिष्ठाकरी
चन्द्रार्कानलभासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी ।
सर्वैश्वर्यसमस्तवाञ्छितकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥३॥
हे देवि ! आप योगीजनों को आनंद प्रदान करती हो, आप ही भक्तजनों के शत्रुओं का विनाश करती हो, आप ही धर्मार्थ साधन में प्रीति बढ़ाती हो, आपने ही चन्द्र, सूर्य और अग्नि की आभा धारण कर रखी है, आप ही त्रिलोक अर्थात तीनों भुवनों की रक्षा करती हो, आपके भक्तगण जो इच्छा करते हैं, आप उनको वही सब ऐश्वर्य प्रदान करती हो, हे माता भगवती अन्नपूर्णा ! आप काशीपुर की अधीश्वरी देवी और जगत् की माता हो, कृपा करके मुझको भिक्षा प्रदान करो।
कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी उमा शङ्करी
कौमारी निगमार्थगोचरकरी ओङ्कारबीजाक्षरी ।
मोक्षद्वारकपाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥४॥
हे अन्नपूर्णे ! आप ही ने कैलाश पर्वत की कंदरा में अपना निवास स्थापित किया है। हे माता ! आप ही गौरी, आप ही उमा और आप ही शंकरी हो, आप ही कौमारी हो, वेद के गूढ़ अर्थ को बताने वाली हो, आप ही बीज मंत्र ओंकार की देवी हो और आप मोक्ष के दरवाजे खोलती हो, आप काशीपुर की अधीश्वरी देवी और जगत् की माता हो, हे जननी भगवती अन्नपूर्णा ! कृपा करके मुझको भिक्षा प्रदान करो।
दृश्यादृश्यविभूतिवाहनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरी
लीलानाटकसूत्रभेदनकरी विज्ञानदीपाङ्कुरी ।
श्रीविश्वेशमनःप्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥५॥
हे देवि! आप ही स्थूल और सूक्ष्म-समस्त जीवों को पवित्रता प्रदान करती हो, यह ब्रह्माण्ड आपके ही उदर में स्थित है, आपकी लीला में सम्पूर्ण जीव अपना-अपना कार्य करते हैं, आप ही ज्ञानरूप प्रदीप का स्वरूप हो, आप श्री विश्वनाथ का संतोष वर्धन करती हो। हे माता अन्नपूर्णेश्वरी ! आप काशीपुर की अधीश्वरी देवी और जगत् की माता हो, कृपा करके मुझको भिक्षा प्रदान करो।
उर्वीसर्वजनेश्वरी भगवती मातान्नपूर्णेश्वरी
वेणीनीलसमानकुन्तलहरी नित्यान्नदानेश्वरी ।
सर्वानन्दकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥६॥
हे अन्नपूर्णे! आप पृथ्वी मंडल पर उपस्थित जनसमूह की ईश्वरी हो, आप षडेश्वर्यशालिनी हो, आप ही जगत् की माता हो, आप सबको अन्न प्रदान करती हो। आपके नीलवर्ण केश वेणी रूप से शोभा पाते हैं, आप ही प्राणीगण को नित्य अन्न प्रदान करती हो और आप ही लोकों को अवस्था की उन्नति प्रदान करती हो। हे माता ! आप ही काशीपुर की अधीश्वरी देवी और जगत् की माता हो, कृपा करके मुझको भिक्षा प्रदान करो।
आदिक्षान्तसमस्तवर्णनकरी शम्भोस्त्रिभावाकरी
काश्मीरात्रिजलेश्वरी त्रिलहरी नित्याङ्कुरा शर्वरी ।
कामाकाङ्क्षकरी जनोदयकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥७॥
हे देवी अन्नपूर्णा! लोग तंत्र विद्या में दीक्षित होकर जो कुछ शिक्षा करते हैं, वह आप ही ने वर्णन करके उपदेश प्रदान किया है। आप ही ने सदाशिव के तीनों भाव (सत्, रज, तम) का विधान किया है, आप ही काश्मीर वासिनी शारदा, अम्बा, भगवती हो, आप ही स्वर्ग, मर्त्य और पाताल इन तीनों लोकों में ईश्वर रूप से विद्यमान रहती हो।
देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुन्दरी
वामं स्वादुपयोधरप्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी ।
भक्ताभीष्टकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥८॥
हे देवी! आप सर्व प्रकार के विचित्र रत्नों से विभूषित हुई हो, आप ही दक्षराज के गृह में पुत्री रूप से प्रकट हुई थीं, आप ही केवल जगत की सुन्दरी हो, आप ही अपने सुस्वादु पयोधर प्रदान करके जगत का प्रिय कार्य करती हो, आप सबको सौभाग्य प्रदान करके माहेश्वरी रूप में विदित हुई हो, आप ही भक्तगणों को वांछित फल प्रदान करती हो और उनकी बुरी अवस्था को शुभ रूप में बदल देती हो। हे माता! केवल आप ही काशीपुर की अधीश्वरी देवी हो, आप अन्नपूर्णेश्वरी और जगत् की माता हो, कृपा करके मुझको भिक्षा प्रदान करो।
चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशा चन्द्रांशुबिम्बाधरी
चन्द्रार्काग्निसमानकुन्तलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी ।
मालापुस्तकपाशासाङ्कुशधरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥९॥
हे देवी! आप कोटि-कोटि चन्द्र, सूर्य और अग्नि के समान उज्ज्वल प्रभाशालिनी हो, आप चन्द्र किरणों के तथा बिम्ब फल के समान अधरों से युक्त हो, आप ही चन्द्र, सूर्य और अग्नि के समान उज्ज्वल कुण्डलधारिणी हो, आपने ही चन्द्र, सूर्य के समान वर्ण धारण किया है, हे माता! आप ही चतुर्भुजा हो, आपने चारों हाथों में माला, पुस्तक, पाश और अंकुश धारण किया है। हे अन्नपूर्णे! आप काशीपुर की अधीश्वरी देवी और जगत की माता हो, कृपा करके मुझको भिक्षा प्रदान करो।
क्षत्रत्राणकरी महाऽभयकरी माता कृपासागरी
साक्षान्मोक्षकरी सदा शिवकरी विश्वेश्वरश्रीधरी ।
दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥१०॥
हे माता अन्नपूर्णा! आप क्षत्रिय कुल की रक्षा करती हो, आप सबको अभय प्रदान करती हो, प्राणियों की माता हो आप कृपा का सागर हो, आप ही भक्तजनों को मोक्ष प्रदान करती हो, और सर्वदा सभी का कल्याण करती हो। हे माता! आप ही विश्वेश्वरी हो, आप ही संपूर्ण श्री को धारण करती हो, आप ही ने दक्ष का नाश किया है और आप ही भक्तों का रोग नाश करती हो। हे अन्नपूर्णे! आप ही काशीपुर की अधीश्वरी और जगत् की माता हो, कृपा करके मुझको भिक्षा प्रदान करो।
अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे ।
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥११॥
हे अन्नपूर्णे! आप सर्वदा पूर्ण रूप से हो, आप ही महादेव की प्राणों के समान प्रिय पत्नी हो। हे पार्वती! आप ही ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के निमित्त भिक्षा प्रदान करो, जिसके द्वारा मैं संसार से प्रीति त्याग कर मुक्ति प्राप्त कर सकूं, मुझको यही भिक्षा प्रदान करो।
माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः ।
बान्धवाः शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥१२॥
हे जननी! पार्वती देवी मेरी माता, देवाधिदेव महेश्वर मेरे पिता शिवभक्त गण मेरे बांधव और तीनों भुवन मेरा स्वदेश है। इस प्रकार का ज्ञान सदा मेरे मन में विद्यमान रहे, यही प्रार्थना है।
- श्री शङ्कराचार्य कृतं
उसमें एक पंक्ति बहुत सुंदर आता है - मोक्षद्वारकपाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी, भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥४॥ ये माता अन्नपूर्णा क्या हैं ? ये सब एक ही शक्ति हैं ! यह काली शक्ति माता अन्नपूर्णा भी हैं। काली भी है , सरस्वती भी है लक्ष्मी भी है। आप देख लीजिये हमारी हिन्दू संस्कृति क्या है !! ये जितने मंदिर हैं उन सब में शक्ति की ही उपासना हो रही है। जितने भी नाम-रूप हैं ये सब माया ही सृष्ट करती हैं। जितने मंदिरों में जिसकी भी पूजा हो रही है , यह किसकी उपासना है ? इसी महामाया शक्ति की उपासना है। क्योंकि की इसके अनुग्रह से माँ सारदा देवी की कृपा के बिना आप सत्य को जान नहीं पाओगे। ये सत्य को ढँकती भी है और सत्य को प्रकट भी करती है। जब वो सत्य को प्रकट करती है , तब हमलोग उसको अनुग्रह - या कृपा कहते हैं। जब माया सत्य को ढँक लेती है , हम अज्ञान में हैं , हम कष्ट में हैं। जब शास्त्र की कृपा से गुरु की कृपा से - गुरु बताते हैं कि देखो भाई तुम माँ काली की शरण में जाओ , माँ भवतारिणी के शरण में जाओ , जब आप इस माया शक्ति के शरणापन्न होते हो , तो माया स्वयं दरवाजा खोल देती है। और आपका जो आत्मस्वरूप है म वह प्रकट हो जाता है। इसका एक सुंदर उदाहरण हम रामायण में देखते हैं , जब प्रभु राम बनवास के लिए चले गए , तो राम जी के पीछे सीता जी हैं , उनके पीछे लक्ष्मण हैं। सामने रामजी हैं , रामजी के पीछे माँ जानकी हैं , और माँ जानकी के पीछे लक्ष्मण जी हैं। सीधे एक कतार में ये तीनों चल रहे हैं। अब जीव लक्ष्मण जी को बहुत व्याकुलता होती है श्रीराम को देखने की। लेकिन बीच में सीताजी खड़ी हैं , देखिये ये सब प्रतीकात्मक है। सीताजी शक्ति हैं। जैसे की राम को वो ढँक रही हैं। लक्ष्मण जीव है -आप और हमारी तरह। जीव सत्य को जानना चाहता है। आत्मा को पहचानना चाहता है , ब्रह्म को जानना चाहता है। जब वो व्याकुल होता है , जब तक सीताजी बीच में हैं , लक्ष्मण राम को देख नहीं पाते हैं। लेकिन जब सीताजी जान जाती हैं कि लक्ष्मण श्रीराम को देखने के लिए बहुत व्याकुल हो रहा है ,राम को देखने के लिए तो स्वयं वो हट जाती हैं। वो जब हट जाती हैं तब लक्ष्मण को प्रभु राम के दर्शन हो जाते हैं। उसी प्रकार ये जीव जब व्याकुल होगा , हमलोग यहाँ बैठे किस लिए हैं ? आपको शायद लग रहा होगा कि हमलोग वैसे ही बैठे हैं ? ये क्या हो रहा है यहाँ ? अगर यहाँ बैठकर सुनने से हमारे मन में थोड़ी सी भी स्पष्टता आ रही है , तो जान लीजिये कि यह शक्ति माँ सारदा स्वयं करा कर दे रही हैं। आपके अन्तःकरण में यदि इस शटर पथ के द्वारा अगर थोड़ी सी भी आ गयी हो , या आए रही है , तो यह उसी शक्ति काली का अनुग्रह है। वो स्वयं यह करा रही हैं , इसको हमलोग अनुग्रह कहते हैं। आज आपके अन्तःकरण में अगर थोड़ी सी भी स्पष्टता आ रही हो , तो उसकी की हुई है -हमारा कुछ भी नहीं है। इसमें। हम कुछ भी नहीं हैं ! ये समझने की पहली बात है। हमारा सारा अहंकार इसको हम side में रखते हैं। हम हैं ही क्या ? जीव है क्या ? वो जीव तो वास्तविक रूप में है नहीं न ? फिर भी हमारा अहंकार है , हम अहंकार में क्या क्या बोल जाते हैं ? हम अपने आप को बहुत बड़ा समझते हैं; ये जीव है ही क्या ? अगर खोजो तो जीव चला जाता है , ईश्वर प्रकट हो जाते हैं। जीव के अंदर खोजो तो जीव चला गया ,ईश्वर प्रकट हो गए। सृष्टि को खोजो तो सृष्टि चली गयी ईश्वर प्रकट हो गए। यह काली ऐसी है जो सत्य को ढँक रही है। शिव को ढँक रही है , उसका नृत्य चल रहा है। यहाँ पर सृष्टि, स्थिति प्रलय का नृत्य चल रहा है। और इस काली को पगली कहा गया है। (59:21) ये पागल महिला हैं , ऐसा ही उनका वर्णन है। पागल क्यों ? किसी व्यक्ति को हम पागल कब कहेंगे ?जब उसका behavior तर्कसंगत या Rational नहीं होता है ? तभी तो उसको पागल कहते हैं। When Somebody's behaviour does not fit into rational behaviour ,किसी का व्यवहार जब तर्कसंगत व्यवहार में फिट नहीं बैठता, पागल लोग irrational होतेहैं न कुछ भी कर बैइठते हैं ? Any one who crosses the bounds of rationality, we stand that person to be pagal, जो भी व्यक्ति तर्क की सीमा लांघता है, हम उसे पागल मानते हैं। काली को भी पागल कहते हैं। क्यों ? वो बुद्धि के परे की चीज है। वो हमारे लॉजिक से चलने वाली नहीं हैं। आप पूछोगे काली ऐसा क्यों करती हैं ? यह प्रश्न ही तुम अज्ञान में पूछ रहे हो। इसलिए काली को पगली कहा गया है। ये उसकी महिमा है , हम जो भी देख रहे हैं यहाँ पर। और देखिये इस काली रूपी प्रतीक को यह कितना अद्भुत है ? ये सब ऋषियों की Discovery है। ये निर्वस्त्र महिला वहां पर खड़ी हुई है। उसके एक हाथ में खड्ग है /कटार है , कैसा खड्ग है ? उसमें से रक्त टपक रहा है। बहुत भयानक चित्र है। लोग समझते नहीं हैं। पाश्चात्य जगत के लोग कहेंगे , कि ये लोग किसकी पूजा कर रहे हैं ? उनका पता ही नहीं है -इससे बढ़कर परम् सत्य की छवि हो नहीं सकती। उनका भौतिक विज्ञान बचकानी बातें हैं। This is a real symbol of reality ! यह काली वास्तविकता की सच्चा प्रतीक है! सत्य क्या है ? यह कार्य ही सत्य है - सृष्टि, स्थिति प्रलय का का कार्य ही सत्य है। तो क्या है ये ? उसके एक हाथ में खड्ग है , जिसमें से रक्त टपक रहा है। ताजा ताजा रक्त टपक रहा है। अब देखिये पगली क्यों कहते हैं इसको ? देखिये एक हाथ से रक्त टपक रहा है , मतलब वो यहाँ पर सबका संहार कर रही हैं। और हम सब बुलबुले हैं , ये बुलबुले प्रकट हो रहे हैं और , नष्ट हो रहे हैं कि नहीं ? हर रोज आप प्रकृति को आंख खोलकर देखिये। हो रहा है कि नहीं हमारी आँखों के सामने। हम सब उसके अंतर्गत हैं। उसका संहार चल रहा है , और ये भयानक है , सभी लोग भयभीत है। ये पगली एक हाथ से आपका गला भी काट रही है , और दूसरे हाथ से कह रही है -बेटा तूँ डर मत। दूसरा हाथ अभयदान की मुद्रा में हे न ? पगली है कि नहीं ? पूरी पगली है। एक हाथ से डरा रही है , दूसरे हाथ से कहती है तूँ डर मत। तीसरे हाथ में एक कटा हुआ मुण्डू है। और चौथे हाथ में वर दे रही है। तूँ मांग तुझे क्या चाहिए ? कहने का अर्थ है कि यह छवि सृष्टि की वर्णना है। यहाँ पर क्यों कैसे की बात नहीं है। सृष्टि , स्थिति , प्रलय अविरत चल रहा है , यहाँ क्यों कैसे की बात नहीं है। यह सत्य है। यही वास्तविकता है। This is kali's play which is going on ! यह काली का खेल है जो चल रहा है! अब देखिये हमारी दृष्टि भी बदल रही है। हम क्या देख रहे हैं यहा पर ? ये शक्ति का खेल चल रहा है , ये काली का खेल चल रहा है। यहाँ पर काली का नृत्य चल रहा है। और वो कटा हुआ मुण्ड क्या है ? वो हमारे अहंकार को काट रही है। वो कटा हुआ मुण्ड उसकी कृपा है। जिस दिन हमारा अहंकार कटता है , उसी दिन हम मुक्त होंगे। ये जीव का अहंकार तो मिथ्या अहंकार है न ? हम हैं ही क्या ? इस स्थूल शरीर को लेकर हम जो मैं मैं करते रहते हैं , इस मैं का तो कोई आधार ही नहीं है। और वह काली स्वयं इस मिथ्या अहं को सृष्ट भी करती है , और इस मिथ्या अहं को काट भी वही देती है। और जब ये मिथ्या अहंकार कट जायेगा , उस दिन हम सत्य में क्या है, ये हम समझेंगे ? और वो उसका शुद्ध अनुग्रह ही है। ये जो काली प्रतीक में Picturization है , इससे सुंदर सत्य का कोई प्रतीक नहीं हो सकता। यह शक्ति किस प्रकार ब्रह्म को ढँक रही है , शिव को ढँक रही है , शिव का ज्ञान यानि ब्रह्म का ज्ञान यानि आत्मा का ज्ञान तब तक नहीं होगा , जबतक माया कृपा करके दरवाजा नहीं खोलती है। जब तक ये शक्ति दरवाजा नहीं खोलती तबतक हम सत्य को जान नहीं पाएंगे।
इसलिए इस शक्ति के शरणापन्न होना यह अनिवार्य है। इसकी शरण में गए बिना कोई सत्य को नहीं जान सकता। इसलिए देखिये जितने भी बड़े बड़े महापुरुष ऋषि लोग हुए हैं , सभी शक्ति के पूजक थे। शंकराचार्यजी सबसे बड़े शक्तिपूजक थे ,उनके बनाये हुए सभी मठों में क्या होता है ? शारदा माँ की पूजा होती है , शक्ति की उपासना होती है। शक्ति की उपासना किये बगैर सत्य को कौन जान सकता है ?
रामकृष्ण परमहंस की कहानी आप जानते ही हैं। ये शक्ति अद्भुत है। ये शक्ति हमारी बुद्धि और युक्ति के परे है। इसलिए इसे अपने अहंकार के स्तर तक लाने की कोशिश मत करो ! Shakti is Beyond human logic and reasons ! So don't try to bring it down to your level of arrogance ! यह हमारा (सत्यार्थी का) अहंकार है कि हम सत्य को तर्क और कारण के दायरे में फिट करना चाहते हैं। It is your arrogance that we want to fit the Reality into the plane of logic and reason. यह हमारा अहंकार है, (एथेंस के प्रत्येक सत्यार्थी -देवकुलिश का अहंकार है) -कि मैं बिना माँ काली की शरण में गए ही परम् सत्य को जान लूँगा। इसलिए (व्यष्टि) अहंकार को पूर्णतः समर्पित करना पड़ता है। मिथ्या (व्यष्टि) अहंकार जब कटेगा , वो उसीकी अनुग्रह से होगा। (1:o4:38)
तो इस प्रकार विवेकचूड़ामणि शास्त्र में और सद्गुरु के मार्गदर्शन में अभी-अभी हमने कारण शरीर के बारे में जो पढ़ा, उस कारण शरीर ने हमको कहाँ लाकर छोड़ दिया !! हमने शुरू किया था स्थूल शरीर से। स्थूल शरीर के पीछे और भीतर जो सूक्ष्म शरीर है , सूक्ष्म शरीर के भीतर और पीछे मूल में जो कारण शरीर है जो माया शक्ति है। अब बताइये आपका स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर कौन संचालित कर रहा है ? यही पगली संचालित कर रही है। समझ में आया ? हम क्या अहंकार कर रहे हैं ? आप एक साँस नहीं ले पाओगे , इस शक्ति के अनुग्रह के बगैर। आपके स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर कौन संचालित कर रहा है ? सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड को संचालित करने वाली शक्ति क्या है ? हम जो भी देख रहे हैं ये काली का नृत्य चल रहा है। उस महामाया शक्ति का नृत्य चल रहा है। सृष्टि , स्थिति, प्रलय का खेल अविरत चल रहा है। वह हमें बांध कर रख देती है , वही हमें मुक्त भी कराती है। वही मृत्यु के रूप में आती है , वही जीवन के रूप में आती है। वही दुःख के रूप में आती है ,वही सुख के रूप में आती है। वही बीमारी के रूप में आती है , और वही दवाई के रूप में आती है। वही स्वास्थ है , वही बीमारी है। सब वही है। यहाँ शक्ति से अतिरिक्त कुछ है ही नहीं।
वो महा माया किसकी शक्ति है ? वो परमेश की शक्ति है। सच्चिदानन्द शिव , ब्रह्म की अपनी ही शक्ति है माँ काली। शिव ही काली है , काली ही शिव है। ये दो अलग नहीं है। ब्रह्म ही शक्ति है , शक्ति ही ब्रह्म है। ब्रह्म (श्रीरामकृष्ण) स्वयं अपनी शक्ति से इस रूप में-प्रकट हो रहे हैं! पर ब्रह्म परमेश्वर ही अपनी शक्ति से जीव और जगत के रूप में प्रकट हो रहे हैं। और ऐसा दृश्य सृष्ट कर रहे हैं जो वातविक में न होते हुए भी हमें दीखता है। सो सच्चाई में यहाँ क्या विद्यमान है ? यहाँ पर परमेश शक्ति ही विद्यमान है , जीव और जगत कहाँ है ? आप बताइये ?
हम अपनी आँखों से यहाँ जगत के रूप में जो भी देख रहे हैं, ये सब क्या हैं ? जगत के रूप में जो कुछ भी दिख रहा है , सभी ब्रह्म (श्रीरामकृष्ण) और ब्रह्म की शक्ति (माँ श्री सारदा) ही तो है न ? (1:06:52) ये सब परमेश शक्ति ही है। उससे अतिरिक्त कुछ है ? हम अज्ञान में कहते हैं कि ये जीव है, ये जगत है। दृष्टिगोचर जगत ब्रह्म और ब्रह्म की शक्ति ही तो है न ? उसके अतिरिक्त कुछ है ? हम अज्ञान में कहते हैं कि ये जीव है , ये जगत है। जीव -जगत कहाँ है ? ये स्थूल शरीर है , और इसके पीछे सूक्ष्म शरीर है। सूक्ष्म शरीर के पीछे कारण शरीर है। उसी प्रकार यह स्थूल जगत हैं , उसके पीछे सूक्ष्म जगत है। सूक्ष्म जगत के मूल में कारण है। कारण शक्ति है। ये स्थूल , सूक्ष्म सब वही कारण है। कारण शक्ति है , कार्य भी शक्ति है। सब दिव्य है। सब परमेश शक्ति है। ब्रह्म की ही अपनी शक्ति है।
इसीको हम सभी मंदिरों में पूजते हैं। सनातन संस्कृति में हम इसके अनगिनत रूप की उपासना करते हैं। वही लक्ष्मी है , वही सरस्वती है। वही शिव है , वही राम है , वही कृष्ण है। वही दुर्गा है। आप जिस किसी भी रूप में उसकी उपासना कीजिये लेकिन जानिए कि यह सब वही शक्ति है। अब बताइये जीव क्या उससे पृथक है ? ब्रह्मसत्यं जगत मिथ्या , जीव क्या है ? वो तो यह परमेश शक्ति ही है। उससे पृथक उसका कोई अस्तित्व है ? ब्रह्म ही सत्य है , जगत तो मिथ्या है , जीव क्या है ? जिव ब्रह्म ही है। ये जगत परमेश शक्ति ही तो है। अब देखिये शंकराचार्यजी ने केवल इन दो लाइनों में ही सृष्टि के रहस्य को कैसे प्रकट कर दिया है ! आपको जो लगता है कि जगत अलग सा है , ऐसा जगत तो मिथ्या है। ब्रह्म ही सत्य है। जगत और जीव है क्या ? [माया तुम्हारी राम -जीव भी तुम्हारा ! ] जीव क्या ? - ब्रह्म एव ! जगत क्या है ? ये जो दिखाई दे रहा है , वह परमेश शक्ति ही तो है। उससे पृथक जगत का कोई अस्तित्व है ? हो ही नहीं सकता। तो देखिये -देखते देखते हम कहाँ से कहाँ पहुंच गए ? जैसे कि कोई माँ अपने बच्चे को उसका ऊँगली पकड़ कर धीरे धीरे ले जाती है , बेटा चल मैं तुझे दिखा देती हूँ कि सत्य क्या है ? ऐसे ही शास्त्र और गुरु ऊँगली पकड़ कर हम अज्ञानी जीवों को धीरे धीरे सत्य तक पंहुचा देती है। बता देती है सत्य ये है। अब इस सत्य में प्रतिष्ठित होना ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। (1:9:13) ये मनुष्य मात्र ही कर सकता है। कोई गाय कर सकती है क्या ? कोई बकरी या कोई घोडा कर सकता है? नहीं कर सकता है। सत्य में प्रतिष्ठित होने की योग्यता केवल मनुष्य में ही है। यह योग्यता रहने पर भी यदि हम सत्य में प्रतिष्ठित रहने का प्रयास नहीं करें , तो यह अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।
अब देखिये मन मुक्त हो रहा है कि नहीं ? कितने भ्रांतियों से मन मुक्त हो रहा है। मन जैसे की आजाद हो रहा हैं। जैसे कि सारी बेड़ियाँ टूट रही हैं। जैसे हम जंजीरों से श्रृंखलाबद्ध थे -की हम जंजीरों में जकड़े हुए थे। वो जगन्माता ही स्वयं हमें पहले बांधकर रख देती है , फिर स्वयं हमारी बेड़ियाँ खोल देति हैं। पगली है वो ?? तो ये सच्चाई है। तो अभी और कोई प्रश्न नहीं लेंगे, अब खुद सोचिये। No Question now ! इसको यही पर समाप्त करते हैं - आज आप इसमें डूबिये। हमने जो अभी पढ़ा है , इसमें अपने मन को डुबो दीजिये। जान लीजिये कि सत्य क्या है ? सत्य को जानना ये ध्यान का विषय है। ॐ शांति !ॐ शांति !ॐ शांति !
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माया पञ्चकं :
(श्री शंकराचार्य द्वारा रचित स्तोत्रम् : हिन्दी व्याख्या :साभार : स्वामी तत्तविदानन्द सरस्वती जी- )
निरुपमनित्यनिरंशकेऽप्यखण्डे –
मयि चिति सर्वविकल्पनादिशून्ये ।
घटयति जगदीशजीवभेदं –
त्वघटितघटनापटीयसी माया ॥ 1 ॥
मैं तुलना से परे, कालातीत, खंड-रहित, विभाजन-रहित, पूर्ण-अद्वितीय हूँ। मुझमें सभी प्रकार की कल्पनाएँ (अध्यारोपण) आदि अनुपस्थित हैं। फिर भी, माया, जो असंभव को संभव करने में सक्षम है, मुझमें ब्रह्मांड, ईश्वर और व्यक्ति का विभाजन उत्पन्न करती है।
श्रुतिशतनिगमान्तशोधकान-
प्यहह धनादिनिदर्शनेन सद्यः ।
कलुषयति चतुष्पदाद्यभिन्ना-
नघटितघटनापटीयसी माया ॥ 2 ॥
प्रेम करो और देखो! माया की शक्ति असंभव को संभव बना देती है। यह असंख्य उपनिषदों के विद्वानों को भी कलंकित कर देती है [यहाँ तक कि जो वेदों की सैकड़ों शाखाओं के उपनिषदों का अन्वेषण करते हैं] और उन्हें भी धन आदि देकर तुरंत लुभाती है, और वे भी पशुओं से भिन्न नहीं हैं।
जो लोग आसानी से भ्रमित हो जाते हैं और सांसारिक वस्तुओं (कामिनी -कांचन और कीर्ति ) से आसक्त हो जाते हैं, वे अपनी विद्वता के बावजूद, पशुओं से बहुत भिन्न नहीं हैं। विचार यह है कि हमें इस बात से अवगत होना चाहिए कि जो कुछ भी विद्यमान है, वह एक है, भले ही वह विपरीत प्रतीत हो। न कोई मित्र है, न कोई शत्रु; केवल ईश्वरत्व है। जीव अनेक हैं, परन्तु जीवन एक है। यदि शास्त्रों के अध्ययन के बावजूद एकत्व के दर्शन का अभाव है, तो फिर हम बेचारे पशुओं से किस प्रकार भिन्न हैं?
सुखचिदखण्डविबोधमद्वितीयं –
वियदनलादिविनिर्मिते नियोज्य ।
भ्रमयति भवसागरे नितान्तं –
त्वघटितघटनापटीयसी माया ॥ 3 ॥
माया असंभव को भी संभव कर सकती है। यह आत्मा, जो आनंद, जागरूकता और अविभेदित ज्ञान है, को आकाश, अग्नि आदि की संरचना (भौतिक शरीर) के साथ एकाकार कर देती है, और उसे सांसारिकता के सागर में निरंतर घेरे रहती है।
मन की सभी कल्पनाएँ शरीर के साथ तादात्म्य पर आधारित हैं, और इच्छा इसी तादात्म्य का परिणाम है। हम भ्रमित हैं क्योंकि हम मानते हैं कि हम इसी संसार में जन्मे हैं।
सच्चाई इसके ठीक विपरीत है: आप शरीर नहीं हैं; भौतिक शरीर मन में एक विचार मात्र है, और मन स्वयं चेतना में एक गति मात्र है। आप स्वयं हैं, उस जाग्रत चेतना के मूल स्रोत। इस प्रकार आप न तो शरीर हैं और न ही इस संसार के। जब तक आप यह कल्पना करते रहेंगे कि आपका जन्म किसी निश्चित स्थान और समय पर हुआ है और आप शरीर, नाम और पद के साथ तादात्म्य बनाए रखेंगे, तब तक संसार का संकट समाप्त नहीं होगा।
[अतएव हमें अपने स्थूल-सूक्ष्म शरीर की पहचान- बड़ा भाई ,रूपी व्यष्टि अहं को, माँ जगतजननी काली के मातृहृदय के सर्वव्यापी विराट 'मैं' के चरणों में पूर्णतः समर्पित करना पड़ता है ! अद्भुत 7 सितम्बर, 2025 के चंद्रग्रहण के दिन और एक दिन पहले -रेणु -विधि -कल्पना -अपराजिता, और सर्वोपरि शास्त्र-विवेकचूड़ामणि और सद्गुरुदेव की सहायता से व्यष्टि अहं' बिना आत्मश्रद्धा को नष्ट किये माँ काली के अनुग्रह से खण्डित हो जाता है।]
अपगतगुणवर्णजातिभेदे –
सुखचिति विप्रविडाद्यहङ्कृतिं च ।
स्फुटयति सुतदारगेहमोहं –
त्वघटितघटनापटीयसी माया ॥ 4 ॥
असंभव को संभव बनाने में सक्षम माया, वास्तव में ब्राह्मणत्व, व्यापारीत्व आदि के अहंकार को आनंदमय चेतना में प्रकट कर देती है, जो गुणों, जाति-पदनामों और जन्म-आधारित विभाजनों से रहित है।
समाज और परिवार द्वारा पोषित और सुदृढ़ किए गए सामूहिक मानसिक ढाँचे ही जाति और पंथ के विभाजन को जन्म देते हैं। आत्मा की वास्तविकता को जानने के लिए, व्यक्ति को इन वंशानुगत मानसिक ढाँचों से मुक्त होना होगा, अन्यथा ये हमें जीवन भर बंधन में रखेंगे।
हमें असत्य को असत्य के रूप में पहचानना सीखना होगा। ऐसा करने के लिए बहुत साहस की आवश्यकता होती है। जब तक हम ऐसे विभाजनों से ऊपर नहीं उठेंगे, हृदय में स्थायी परिवर्तन नहीं हो सकता। ऐसे परिवर्तन के बिना, कोई सत्य को जानने की आशा नहीं कर सकता।
यह विचार कि मैं एक मनुष्य हूँ, एक आरोपण है; व्यक्ति केवल एक जीवित प्राणी है, या, बेहतर होगा कि, सत्व है।
मान लीजिए मैं कहता हूँ कि मैं एक डच व्यक्ति हूँ, तो डेढ़ सौ से अधिक राष्ट्रीयताएँ मेरे विरुद्ध खड़ी हो जाती हैं, और यदि मैं कहता हूँ कि मैं एक ईसाई हूँ, तो पचास प्रतिशत से अधिक मानवता दूसरी हो जाती है। व्यक्ति को केवल एक जागरूक प्राणी होना चाहिए जो अविचल शांति का आनंद प्रसारित करता हो।
यह निश्चित रूप से दुनिया की किसी भी चीज़ से बढ़कर है। केवल इसी में जन्म और लिंग या जाति और पंथ पर आधारित सभी विभाजन अनुपस्थित हैं। इस ब्रह्मांड में, हर चीज़ इसलिए है क्योंकि बाकी सब कुछ है। अगर आप इस पर गौर से विचार करें, तो आप पाएंगे कि किसी भी चीज़ के होने के अनगिनत कारण होते हैं।
विधिहरिहरविभेदमप्यखण्डे –
बत विरचय्य बुधानपि प्रकामम् ।
भ्रमयति हरिहरभेदभावा-
नघटितघटनापटीयसी माया ॥ 5 ॥
हाय! माया असंभव को संभव बना देती है। यह अविभाजित ब्रह्म में भी ब्रह्मदेव, विष्णु और रुद्र का विभाजन कर देती है। यह विद्वानों को भी इतना भ्रमित कर देती है कि वे विष्णु और रुद्र में विभाजित होकर भक्ति करते हैं।
उपनिषद वास्तविकता (सत्य) को स्पष्ट रूप से "अखंड विजातीय सज्जाय स्वागत भेद रहितम्" के रूप में प्रस्तुत करते हैं, दुर्भाग्य से, विद्वान भी इस बारे में न केवल भ्रमित हैं, बल्कि पूरी तरह से भ्रमित भी हैं। उनमें से कुछ रुद्र के विपरीत विष्णु की भक्ति को मानते हैं, और इसके विपरीत। "इस भगवान की पूजा करो," "नहीं, उस भगवान की पूजा करो।"
वेदांत ऐसे सभी विभाजनों से ऊपर है। ब्रह्मसूत्रों में हमें एक भी ऐसा शब्द नहीं मिलता जो इस विभाजन का समर्थन करता हो। जो लोग विभाजन में डूबी भक्ति का अनुसरण या प्रचार करते हैं, वे दार्शनिक नहीं; वे केवल धर्मशास्त्री हैं और पूरी तरह से भ्रमित हैं। वे सत्य को जानते ही नहीं।
इस प्रकार का अति द्वैतवाद उपनिषदों की भावना के विरुद्ध है। एकता का सत्य केवल अपने आंतरिक अस्तित्व में स्थित रहकर ही प्राप्त किया जा सकता है।
इन श्लोकों में शंकराचार्य अविभाज्य और अविभाज्य सत्य के अपने दर्शन को स्पष्ट शब्दों में प्रस्तुत करते हैं। सारगर्भित वाक्यांश "अघटितघटनापटीयसी माया" का निरंतर उच्चारण हमें याद दिलाता है कि प्रतीत होने वाला प्रत्येक विरोधाभास असत्य है और इसका पूर्णतः माया की शक्ति पर ही प्रभाव हो सकता है, जो विद्वानों और ज्ञानियों को भी भ्रमित, भ्रमित और पथभ्रष्ट कर सकती है।
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