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मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

⚜️️🔱मनुष्य जीवन का गौण उद्देश्य क्या है एवं मनुष्य जीवन चरम उद्देश्य क्या है ?⚜️️🔱 "He who controls mind controls matter also ! ⚜️️🔱

 ⚜️️🔱मनुष्य जीवन का गौण उद्देश्य क्या है एवं मनुष्य जीवन चरम उद्देश्य क्या है ?⚜️️🔱 

“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत” Arise, awake, and stop not till the Goal is reached ! उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति ना हो जाए !

 मनुष्य जीवन का गौण लक्ष्य कई हो सकते हैं , होना भी चाहिए और पुरुषार्थ करके उन्हें प्राप्त भी करना चाहिए।  लेकिन 'Indian philosophy' के मतानुसार अनुसार मनुष्य जीवन का चरम-लक्ष्य है अपने सत्य-स्वरुप से - 'Real I' (आत्मा या ईश्वर) के साथ जुड़ जाना। और अपने 'Real I' सत्यस्वरुप, आत्मा या ईश्वर से जुड़ जाने की पद्धति को ही गीता में योग कहा गया है। श्रीमद्भवत गीता में कुल 18 अध्याय हैं  और वहां 700 श्लोकों में वर्णित आत्मा से जुड़ने की पद्धति को 18 प्रकार के योग का नाम दिया गया है।

 स्वामी विवेकानन्द ने भगवत गीता में वर्णित 18 प्रकार के योग को 4 योगों में विभक्त करके उन्हें "कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान" योग नाम देकर, उन सभी योग-मार्गों पर अपनी व्याख्या लिखी हैं। 4 योगों पर अपनी व्याख्या लिखने के बाद गीता, उपनिषदों और समस्त वैदिक सनातन धर्म में समाहित उपदेशों के निचोड़ को प्रस्तुत करते हुए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं -  "मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य तथा उसे प्राप्त करने के उपाय " पर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हुए लिखते हैं - 

" योगशास्त्र के मतानुसार, आत्मा 'अज्ञान' के कारण प्रकृति के साथ संयुक्त हो गयी है।    'प्रकृति के पंजे से  छुटकारा' पाना ही हमारा उद्देश्य है। यही सारे धर्मों का एकमात्र लक्ष्य है  प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है! बाह्य एवं अंतःप्रकृति को वशीभूत करके आत्मा के इस ब्रह्मभाव को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है। कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान, इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर अपने ब्रह्मभाव को व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ। बस, यही धर्म का सर्वस्व है। मत, अनुष्ठान – पद्धति, शास्त्र, मन्दिर अथवा अन्य बाह्य क्रिया – कलाप तो उसके गौण ब्यौरे मात्र है।"  योगी 'मनःसंयोग' (psychic control) के द्वारा मनुष्य जीवन के इस चरम लक्ष्य में पहुँचने का प्रयत्न करते हैं। (The Yogi tries to reach this goal through psychic control.) जब तक हम प्रकृति के हाथ से अपना उद्धार नहीं कर लेते तब तक हम गुलाम हैं ; प्रकृति जैसा कहती है , हम उसी प्रकार चलने को लाचार होते है। किन्तु 'योगी' यह दावा करते हैं कि जो मन को (सूक्ष्म को) वशीभूत कर सकते हैं , वे स्थूल पदार्थों को (पंचभूत- इन्द्रिय आदि को) भी वशीभूत कर सकते हैं (The Yogi claims that he who controls mind controls matter also !) बाह्य प्रकृति (देह-इन्द्रिय) की अपेक्षा अन्तः प्रकृति (मन) कहीं उच्चतर है, और उस पर विजय प्राप्त करके अपने वश में करना अत्यन्त कठिन है। (The internal nature is much higher than the external and much more difficult to grapple with, much more difficult to control.) 

[इसलिए आधुनिक युग के सर्वश्रेष्ठ अद्वैताचार्य स्वामी विवेकानन्द यहाँ हमलोगों को गीता के वचन - "तस्मात् योगी भव अर्जुन !" "इसलिए, हे अर्जुन ! तुम योगी बनो" (BG.6.46)- की महत्ता का स्मरण करा रहे हैं। क्योंकि युद्ध जैसे कठिन परिस्थितियों से जूझते हुए भी , कोई व्यक्ति योग के माध्यम से इन सभी गुणों को (नित्य-अनित्य विवेक और वैराग्य, षट्-संपत्ति, और मुमुक्षुत्व आदि को ) प्राप्त कर सकता है और अपने  'Real I' का अविनाशी और अपरिवर्तनशील आत्मा का साक्षात्कार करके आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त कर सकता है। क्योंकि (त्रिगुणात्मक अव्यक्त परमेश शक्ति द्वारा कई जन्मों में हुई माया-मोह के कारण) अपने परिवर्तनशील, नश्वर  'Apparent I' को  या 'देहो अहं' ('मैं देह हूँ ' नाम-रूप, M/F या आदम और हव्वा हूँ !)  समझने के भ्रम के कारण,साधन चतुष्टय कि सहायता से हमारे जैसे सामान्य मनुष्य जब तक    3K में मन की आसक्ति को त्याग नहीं देते, या इन्द्रिय-विषय भोगों से पूरीतरह अनासक्त नहीं हो जाते तब तक मन और इन्द्रियों के गुलाम होते हैं। और सिंह-शावक (अर्थात विवेकी मनुष्य)  होकर भी भेंड़ों की तरह घाँस चरते हैं , और शेर से तो क्या गड़रिया से भी डरते हैं। 

विचार करके देखो प्यारे जगत बना है मन से।  

जैसे शेर भेंड़ बन बैठो, भय मानत सिंघन से।

यह मन (बुद्धि) ही देह बन गया है। और यम से (मृत्यु के भय से) डरता रहता है। ये 'शुद्ध बुद्धि'  बहुत दिनों से मन -इन्द्रियों के साथ रही। उनकी आदत इस बुद्धि में आ गयी। उसी तरह से सोंचती है। इन्द्रियों के द्वारा मिले दुःखों -सुखों से बुद्धि सम्मोहित है। प्रभावित है। कभी आत्मा के आनन्द को नहीं जानती। इसलिए बुद्धि -इन्द्रिय -मन में फूट डालना पड़ेगालड़कियाँ -लड़के love में पागल हो जाते हैं। जब सारा सपना धराशाई होगा तब अक्ल आएगी। अगले जन्म में सतसङ्ग और गुरु करोगे, तब होश आएगा।

 ( मन जीते , जगत जीत- He who has conquered the internal nature controls the whole universe; it becomes his servant.) इसलिए जो अंतःप्रकृति (मन) को वशीभूत कर सकते हैं , सारा जगत उनके वशीभूत हो जाता है। जगत वैसे योगी का दास हो जाता है। राजयोग, प्रकृति को इस तरह वश में लाने का उपाय दिखला देता है। (Forces higher than we know in physical nature will have to be subdued.) भौतिक प्रकृति में जिन शक्तियों को हम जानते हैं, उनसे भी उच्चतर शक्तियों को वश में लाना पड़ेगा।  यह यह शरीर मन का एक बाहरी परत (crust छिलका) मात्र है शरीर और मन दो अलग अलग वस्तुएं नहीं हैं, वे तो सीप (oyster-घोंघा) और उसके खोल (shell) के समान हैं। वे एक ही वस्तु की दो विभिन्न अवस्थायें हैं। सीप के भीतर का जन्तु बाहर से नाना प्रकार के उपादान लेकर उस खोल को तैयार करता है। उसी प्रकार मन नामक यह आंतरिक सूक्ष्म -शक्ति समूह (मन-बुद्धि-चित्त -अहंकार) भी बाहर से स्थूल पंचभूत (आकाश,वायु , अग्नि, जल और पृथ्वी) को लेकर उससे इस शरीर रूपी ऊपरी खोल को तैयार कर रहा है।  

[ In the same way the internal fine forces which are called mind take up gross matter from outside, and from that manufacture this external shell, the body.जैसे सीप के भीतर का जन्तु बाहर से नाना प्रकार के उपादान लेकर उस खोल को तैयार करता है, तो जिस प्रकार पदार्थ की तीन अवस्थायें होती हैं -बर्फ , पानी और भाफ , ठोस-द्रव और गैस। वैसे ही मनुष्य के तीन प्रमुख अवयव- '3H' के देह , मन और आत्मा (चेतना) को उलट कर समझें - तो आसानी से समझ सकते हैं कि आत्मा (Heart-चेतना) ही , मन (Head-आसक्तिऔर देह (Hand -M/F या आदम और हव्वा) रूपी खोल को तैयार करता है। If, then, we have control of the internal, it is very easy to have control of the external. ]

इसलिए हम यदि 'अंतर्जगत' पर जय-लाभ कर सकें , तो 'बाह्य जगत' को जीतना फिर बड़ा आसान हो जायेगा। फिर ये शक्तियां अलग-अलग नहीं हैं। [दृष्टिगोचर बाह्य जगत की शक्ति (स्थूल देह और 5 कर्म -इन्द्रियों की शक्ति) और अदृश्य अंतर्जगत की शक्ति (अर्थात मन-बुद्धि -चित्त -अहंकार और मस्तिष्क में अवस्थित 5 Brain Centers -5 स्नायुकेन्द्रों या 5 विषयों की 5 ज्ञानेन्द्रियों की शक्ति) अलग अलग नहीं हैं ! यह इन्द्रियगोचर भौतिक जगत , अदृश्य सूक्ष्म अंतर्जगत की स्थूल अभिव्यक्ति मात्र है , उसी प्रकार भौतिक शक्तियाँ भी सूक्ष्म शक्तियों की स्थूल अभिव्यक्ति मात्र है। 

(Then again, these forces are not different. It is not that some forces are physical, and some mental; the physical forces are but the gross manifestations of the fine forces, just as the physical world is but the gross manifestation of the fine world.     

विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥२६॥

26. The means of destruction of ignorance is unbroken practice of discrimination.
    निरन्तर विवेक का अभ्यास करते रहना ही अज्ञान (अविद्या) नाश का अविप्लवा (दोष रहित और निश्चित) उपाय है। 

This is the real goal of practice — discrimination between the real and the unreal, knowing that the Purusha is not nature, that it is neither matter nor mind, and that because it is not nature, it cannot possibly change. It is only nature which changes, combining and re-combining, dissolving continually. When through constant practice we begin to discriminate, ignorance will vanish, and the Purusha will begin to shine in its real nature — omniscient, omnipotent, omnipresent.

अर्थात परिवर्तनीय 'Apparent I' and अपरिवर्तनीय साक्षी 'Real I', या नश्वर देह-मन और अविनाशी आत्मा में निरन्तर विवेक-प्रयोग का अभ्यास करते रहना,  '3H विकास के 5 अभ्यास ' करते रहनाही अविद्या को (3K में आसक्ति को) नष्ट करने का उपाय है। इसलिए महामण्डल आदर्शवाक्य -Be and Make ' विवेकी मनुष्य बनना और बनाना ही है। जब निरन्तर नित्य-अनित्य विवेक -प्रयोग के अभ्यास के द्वारा (साधनचतुष्टय के द्वारा) हम जब विवेकज ज्ञान लाभ करेंगे तब अज्ञान (अविद्या) चला जाएगा और आत्मा अपने 'सत्य- स्वरुप' में अर्थात सर्वज्ञ , सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी रूप ('Real I' विवेकानन्द अवस्था) में प्रतिष्ठित हो जायेगा।
 (पातंजल योगसूत्र : साधनपाद-25, 26 : राज-योग: वि.सा. खंड-१, पृष्ठ:१७३-१७४) 

तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥२७॥

27. His knowledge is of the sevenfold highest ground.

When this knowledge comes; it will come, as it were, in seven grades, one after the other; and when one of these begins, we know that we are getting knowledge. The first to appear will be that we have known what is to be known. 

The mind will cease to be dissatisfied. While we are aware of thirsting after knowledge, we begin to seek here and there, wherever we think we can get some truth, and failing to find it we become dissatisfied and seek in a fresh direction. All search is vain, until we begin to perceive that knowledge is within ourselves, that no one can help us, that we must help ourselves. When we begin to practise the power of discrimination, the first sign that we are getting near truth will be that that dissatisfied state will vanish. We shall feel quite sure that we have found the truth, and that it cannot be anything else but the truth. Then we may know that the sun is rising, that the morning is breaking for us, and taking courage, we must persevere until the goal is reached. The second grade will be the absence of all pains. It will be impossible for anything in the universe, external or internal, to give us pain. The third will be the attainment of full knowledge. Omniscience will be ours. The fourth will be the attainment of the end of all duty through discrimination. Next will come what is called freedom of the Chitta. We shall realise that all difficulties and struggles, all vacillations of the mind, have fallen down, just as a stone rolls from the mountain top into the valley and never comes up again. The next will be that the Chitta itself will realise that it melts away into its causes whenever we so desire. Lastly we shall find that we are established in our Self, that we have been alone throughout the universe, neither body nor mind was ever related, much less joined, to us. They were working their own way, and we, through ignorance, joined ourselves to them. But we have been alone, omnipotent, omnipresent, ever blessed; our own Self was so pure and perfect that we required none else. We required none else to make us happy, for we are happiness itself. We shall find that this knowledge does not depend on anything else; throughout the universe there can be nothing that will not become effulgent before our knowledge. This will be the last state, and the Yogi will become peaceful and calm, never to feel any more pain, never to be again deluded, never to be touched by misery. He will know he is ever blessed, ever perfect, almighty.

उनके (आत्मज्ञानी के) विवेकज-ज्ञान के सात उच्चतम सोपान हैं। जब इस ज्ञान (अद्वैत) की प्राप्ति होती है, तब मानो वह एक के बाद एक करके सात स्तरों में आती है। और जब उनमें से एक अवस्था आरम्भ हो जाती है , तब हम निश्चित रूप से जान सकते हैं कि हमें अब (Oneness के) ज्ञान की प्राप्ति हो रही है। पहली अवस्था आने पर मन में ऐसा लगने लगेगा कि जो कुछ जानने का है , जान लिया। (we have known what is to be known.)  मन में तब किसी प्रकार का असन्तोष (Dissatisfaction) नहीं रह जायेगा।  जब तक हमारी ज्ञान-पिपासा बनी रहती है , तब तक हम इधर-उधर ज्ञान की खोज में लगे रहते हैं। जहाँ से भी कुछ सत्य मिलने की सम्भावना रहती है , झट वहीँ दौड़ जाते हैं। जब वहाँ उसकी प्राप्ति नहीं होती , तब मन अशांत हो जाता है। फिर अन्य दिशा में हम सत्य की खोज में भटकते फिरते हैं। जब तक हम यह अनुभव नहीं कर लेते कि समस्त ज्ञान हमारे अंदर है , जब तक यह दृढ़ धारणा नहीं हो जाती कि कोई हमें सत्य प्राप्ति करने में सहायता नहीं पहुँचा सकता , हमें स्वयं ही अपनेआप की सहायता करनी होगी, तबतक सारा सत्यान्वेषण (आत्मनुसन्धान-अयं आत्मा ब्रह्म !) की खोज ही व्यर्थ है।
 जब हम विवेक का अभ्यास आरम्भ करेंगे , (ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर: का ब्रह्मैव सर्वं इदं, आत्मवै सर्वं इदं देखने का अभ्यास आरम्भ करेंगे) तो हमारे सत्य (आत्मा-ईश्वर -भगवान) के नजदीक आ जाने का पहला चिन्ह यह प्रकाशित होगा कि वह पूर्वोक्त असन्तोष की अवस्था चली जाएगी। हमारी यह निश्चित धारणा हो जाएगी कि हमने सत्य को पा लिया है - और वह सत्य के सिवा (सच्चिदानन्द -विवेकानन्द के सिवा) और कुछ नहीं हो सकता। तब हम यह जान लेते हैं कि सत्यस्वरुप सूर्य (Real I) उदित हो रहा है , हमारी अज्ञान-रजनी पर प्रभात की लाली छा रही है। और तब, ह्रदय में आशा भरकर , जब तक लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता , तब तक हमें अध्यवसाय के साथ (अमृत मिलने तक) लगे रहना होगा। (Then we may know that the sun is rising, that the morning is breaking for us, and taking courage, we must persevere until the goal is reached.

 दूसरी अवस्था में सारे दुःख चले जायेंगे। तब जगत का कोई बाहरी या भीतरी विषय हमें दुःख नहीं पहुँचा सकेगा। तीसरी अवस्था में हमें पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हो जाएगी। अर्थात हम सर्वज्ञ (Omniscient) हो जायेंगे। चौथी अवस्था में विवेक की सहायता से सारे कर्तव्यों का अंत हो जायेगा। उसके बाद चित्त-विमुक्ति की अवस्था (freedom of the Chitta)  आएगी। तब हम समझ सकेंगे कि हमारी सारी विघ्न-बाधाएँ चली गयी हैं। जिस प्रकार किसी पर्वत के शिखर से एक चट्टान को नीचे लुढ़का देने पर वह फिर ऊपर नहीं जा सकता , उसी प्रकार , मन की चंचलता , मनःसंयम की असमर्थता आदि सभी गिर जायेंगे, अर्थात नष्ट हो जायेंगे। छठी अवस्था में चित्त समझ लेगा कि इच्छा मात्र से वह अपने कारण (शरीर ईश्वर या आत्मा ) में लीन हो जा रहा है। (The next will be that the Chitta itself will realise that it melts away into its causes whenever we so desire. ) अंत में हम देख पाएंगे कि हम अपने स्वस्वरूप में (Real I) में प्रतिष्ठित हैं , और इतने दिनों तक जगत में एकमात्र हमीं अवस्थित थे। मन या शरीर के साथ हमारा कोई सम्बन्ध नहीं था - उनके साथ युक्त होने की बात तो दूर ही रहेवे अपना अपना काम कर रहे थे। और हमने अज्ञानवश अपनेआपको उनसे युक्त कर रखा था !!!??? पर हम तो सदा से अकेले ही रहे हैं। इस संसार में केवल हमीं सर्वशक्तिमान , सर्वव्यापी और सदानन्द -स्वरुप हैं।  हमारी अपनी आत्मा इतनी पवित्र और पूर्ण है कि हमें और किसी की आवश्यकता नहीं थी। हमें सुखी करने के लिए और कुछ भी आवश्यक नहीं था , क्योंकि हमीं सुखस्वरूप हैं। (We required none else to make us happy, for we are happiness itself.हम देख लेंगे कि ज्ञान किसीके ऊपर निर्भर नहीं रहता। जगत में ऐसा कुछ भी नहीं है , जो हमारे ज्ञानलोक से प्रकाशित न हो। यही योगी की अंतिम अवस्था हैतब योगी धीर और शांत हो जाते हैं , वे और कोई कष्ट अनुभव नहीं करते , वे फिर कभी अज्ञान-मोह से भ्रान्त नहीं होते , दुःख उन्हें छू नहीं सकता। वे जान लेते हैं कि मैं -' नित्यानन्दस्वरुप , नित्यपूर्णस्वरूप  और सर्वशक्तिमान हूँ !'

योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः ॥२८॥

28. By the practice of the different parts of Yoga the impurities being destroyed, knowledge becomes effulgent up to discrimination.
 
योग के विभिन्न अंगों का अनुष्ठान करते करते जब अपवित्रता का नाश हो जाता है (देहभाव दहोहं का नाश हो जाता है), तब ज्ञान (शिवोहं) प्रदीप्त हो उठता है ; उसकी अंतिम सीमा है विवेक-ख्याति। 
अब साधन की बात कही जा रही है। अभी तक जो कुछ कहा गया , वह अपेक्षाकृत उच्चतर है। वह अभी हमसे बहुत दूर है ; किन्तु वही हमारा आदर्श है , हमारा एकमात्र लक्ष्य है। उस लक्ष्य स्थल पर पहुँचने के लिए पहले शरीर और मन को संयत करना आवश्यक है। तभी उस आदर्श में हमारी अनुभूति स्थायी हो सकेगी। हमारा लक्ष्य क्या है , यह हमने जान लिया है, अब उसे प्राप्त करने के लिए साधनआवश्यक है। 
यम-नियमासन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा-ध्यान-समाधयोऽष्टावङ्गानि ॥२९॥
29. Yama, Niyama, Âsana, Prânâyâama, Pratyâhâra, Dhâranâ, Dhyâna, and Samâdhi are the eight limbs of Yoga.
अहिंसा-सत्यास्तेय-ब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥३०॥
30. Non-killing, truthfulness, non-stealing, continence, and nor-receiving are called Yamas.
एते जाति-देश-काल-समयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ॥३१॥
31. These, unbroken by time, place, purpose, and caste-rules, are (universal) great vows.
These practices — non-killing, truthfulness, non-stealing, chastity, and non-receiving — are to be practised by every man, woman, and child; by every soul, irrespective of nation, country, or position.
शौच-सन्तोष-तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥३२॥
32. Internal and external purification, contentment, mortification, study, and worship of God are the Niyamas.
वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ॥३३॥
33. To obstruct thoughts which are inimical to Yoga, contrary thoughts should be brought.
वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ॥३४॥
34. The obstructions to Yoga are killing, falsehood, etc., whether committed, caused, or approved; either through avarice, or anger, or ignorance; whether slight, middling, or great; and they result in infinite ignorance and misery. This is (the method of) thinking the contrary.
अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥३५॥
35. Non-killing being established, in his presence all enmities cease (in others).
सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ॥३६॥
36. By the establishment of truthfulness the Yogi gets the power of attaining for himself and others the fruits of work without the works.
अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ॥३७॥
37. By the establishment of non-stealing all wealth comes to the Yogi.
ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ॥३८॥
38. By the establishment of continence energy is gained.
अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः ॥३९॥
39. When he is fixed in non-receiving, he gets the memory of past life.
शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥४०॥
40. Internal and external cleanliness being established, there arises disgust for one's own body, and non-intercourse with others.
सत्त्वशुद्धि-सौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शन-योग्यत्वानि च ॥४१॥
41. There also arises purification of the Sattva, cheerfulness of the mind, concentration, conquest of the organs, and fitness for the realisation of the Self.
सन्तोषादनुत्तमः सुखलाभः ॥४२॥
42. From contentment comes superlative happiness.
कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ॥४३॥
43. The result of mortification is bringing powers to the organs and the body, by destroying the impurity.
स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः ॥४४॥
44. By the repetition of the Mantra comes the realisation of the intended deity.
समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥४५॥
45. By sacrificing all to Ishvara comes Samadhi.
स्थिरसुखमासनम् ॥४६॥
46. Posture is that which is firm and pleasant.
प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥४७॥
47. By lessening the natural tendency (for restlessness) and meditating on the unlimited, posture becomes firm and pleasant.
ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥४८॥
48. Seat being conquered, the dualities do not obstruct.
तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥४९॥
49. Controlling the motion of the exhalation and the inhalation follows after this.
बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिः देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्षमः ॥५०॥
50. Its modifications are either external or internal, or motionless, regulated by place, time, and number, either long or short.
बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥५१॥
51. The fourth is restraining the Prana by reflecting on external or internal object.
ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥५२॥
52. From that, the covering to the light of the Chitta is attenuated.
धारणासु च योग्यता मनसः ॥५३॥
53. The mind becomes fit for Dharana.
स्वस्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ॥५४॥
54. The drawing in of the organs is by their giving up their own objects and taking the form of the mind-stuff, as it were.
ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ॥५५॥
55. Thence arises supreme control of the organs.
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⚜️️🔱 धर्म और परमेश्वर के प्रति उत्कट श्रद्धा रहनी चाहिए⚜️️🔱 

   हमारे उपनिषदों का 'आत्म -अनुसन्धान महावाक्य' है- 'अयं आत्मा ब्रह्म !' उसीको अंग्रेजी में अनुवाद करके स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - 
आत्मा अविद्या के कारण (त्रिगुणात्मिका माया नामक परमेश शक्ति =अविद्या , अस्मिता , राग-द्वेष, अभिनिवेश -पंचक्लेश के साथ) संयुक्त हो गयी है। अतएव इस प्रकृति (मोह, आसक्ति, स्वार्थपरता) के पंजे से छुटकारा पाना ही हमारा (नित्य-अनित्य विवेकी मनुष्य के जीवन का) उद्देश्य है। यही सारे धर्मों /या शिक्षा का एकमात्र लक्ष्य है।
प्राचीन युग के सर्वश्रेष्ठ अद्वैताचार्य  आदिगुरु शंकराचार्यजी ने भी  आधुनिक युग के सर्वश्रेष्ठ अद्वैताचार्य स्वामी विवेकानन्द की तरह समस्त वैदिक ग्रंथों , शास्त्रों , उपनिषदों में वर्णित उपदेशों का निचोड़ देते हुए कहा था -  
श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रंथ कोटिभ: ।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर: ।
अर्थात जो अनेक ग्रंथों में लिखा है । उसे मैं आधे श्लोक में यहां कह रहा हूं - ब्रह्म सत्य है । जगत मिथ्या है । तथा जीव ब्रह्म ही है । कोई अन्य नहीं । "
 इस इन्द्रियगोचर या दृश्यमान जगत में सत्य क्या है ? मिथ्या क्या है ? तथा जीव (M/F) और ब्रह्म ( आत्मा , ईश्वर, भगवान) में परस्पर गूढ़ संबंध है । इस सम्पूर्ण सृष्टि में ब्रह्म (आत्मा, ईश्वर या भगवान) अनुस्यूत है। इसलिए हमलोग कहते हैं, 'कण-कण में भगवान। ' या कंकड़-कंकड़ में शंकर' ! क्योंकि हमारे उपनिषदों के ऋषियों ने सृष्टि के (M/F नाम-रूप के )  अधिष्ठान को ही आत्मा (ईश्वर, ब्रह्म या भगवान) कहा है। इसीलिए सृष्टि का अधिष्ठान ही ब्रह्म नाम से श्रुतियों द्वारा प्रतिपादित है । जो था । जो है । और जो सदैव रहेगा । वही तो - ब्रह्म है । " सत्य नाम " (अपरिवर्तनीय -अविनाशी) से ऋषियों मनीषियों द्वारा वही कहा जाता है । यहां मिथ्या शब्द " असत " से भिन्न है ! मिथ्या शब्द यहां प्रतीति होने वाली वस्तु सत्य सी लगती है । जबकि वह प्रतीति क्षण में नहीं । यही मिथ्यात्व है। इसमें संस्कारों तथा उसके परिणाम स्वरूप स्मृति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है । संसार के अस्तित्व को स्वीकार करने पर ही जीव है । संसार की संसार के नाम-रूप में प्रतीति के नष्ट होते ही " जीव " का अस्तित्व समाप्त हो जाता है । यह ऐसे ही है । जैसे जागने पर " स्वप्नकाल के द्रष्टा " और " दृश्य " का को लोप हो जाता है । वस्तुत: अन्तर्निहित दिव्यता के साथ यह 'एकत्व और अद्वैत ' ही परमार्थ है । सत्य का अर्थ है, त्रिकाल -अबाधित ! जिसका तीनों कालों में 'बाध' नहीं होता । अर्थात जो था । जो है । और जो रहेगा । इस दृष्टि से जगत ब्रह्म-सापेक्ष है । ब्रह्म को जगत के होने या न होने से कोई अंतर नहीं पड़ता । जिस प्रकार आभूषण के न रहने पर भी स्वर्ण की सत्ता निरपेक्ष भाव से रहती है । या 'घड़े' के न रहने से भी मिट्टी की सत्ता निरपेक्ष भाव से रहती है। उसी प्रकार सृष्टि से पूर्व भी 'सत्य' (आत्मा, ब्रह्म, ईश्वर या भगवान)  था । दूसरे शब्दों में ब्रह्म का अस्तित्व सदैव रहता है । श्रुति का वचन है - सदेव सोम्येदग्रमासीत, अर्थात - हे सौम्य ! सृष्टि से पूर्व सत्य ही था । सृष्टि का उपादान कारण और निमित्त कारण ब्रह्म या ईश्वर ही है। आदिगुरु शंकराचार्यजी द्वारा प्रतिपादित अद्वैत वेदान्त के अनुसार इस संपूर्ण जगत में जो कुछ भी इंद्रियों द्वारा गृहीत है । अर्थात जो कुछ भी दिखाई, सुनाई, सुंघाई या स्पर्श आदि में आता है । वह सब मात्र ब्रह्म (आत्मा, ईश्वर , भगवान, परमात्मा) ही है । इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं । जिस प्रकार मिट्टी से निर्मित पात्रों का अलग अलग  नाम रूप होने के पश्चात भी मूल रूप मिट्टी ही होती है । इसी प्रकार जो भी जड़ अथवा चेतन तत्व विभिन्न नाम-रूप से ज्ञात होते हैं । वे मूल रूप से ब्रह्म (परमेश शक्ति E=Mc2) ही हैं ।

"अद्वैतवाद का प्रचार साधारण लोगों में कभी होने नहीं दिया गया। संन्यासी लोग ही अरण्य (जंगलों) में उसकी साधना करते थे , इसी कारण वेदान्त का एक नाम 'आरण्यक' ("Forest Philosophy") भी हो गया। अन्त में भगवान की कृपा से बुद्धदेव ने आकर जब सर्वसाधारण के बीच इसका प्रचार किया , तब सारा देश बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गया। फिर बहुत समय बाद नास्तिकों (atheists-ईश्वर को न मानने वाले) और अज्ञेयवादियों (agnostics) ने जब सारे देश को ध्वंश करने की चेष्टा की, तब उस भौतिकवाद से भारत की रक्षा करने में पुनः एक बार अद्वैतवाद ही एकमात्र उपाय सिद्ध हुआ। इस प्रकार अद्वैत ने  दो बार भौतिवाद से भारत की रक्षाकी है।"  - स्वामी विवेकानन्द  ('ब्रह्म एवं जगत' : वि ० सा० /खंड-२./पृष्ठ- ९३)

  " This Advaita was never allowed to come to the people. At first some monks got hold of it and took it to the forests, and so it came to be called the "Forest Philosophy". By the mercy of the Lord, the Buddha came and preached it to the masses, and the whole nation became Buddhists. Long after that, when atheists and agnostics had destroyed the nation again, it was found out that Advaita was the only way to save India from materialism. Thus has Advaita twice saved India from materialism ! " -Swami Vivekananda : (The Absolute and Manifestation/ Volume-2/Jnana-Yoga/page -138)  

[अद्वैत #स्वामी विवेकानन्द जर्मिनी की कील शहर के यूनिवर्सिटी के संस्कृत प्रोफेसर पॉल डॉयसन के निमंत्रण पर सेवियर दम्पति के साथ नाश्ते के लिए उनके घर गए थे। प्रोफेसर ने अद्वैत वेदान्त पर स्वरचित एक ग्रन्थ- से कुछ अंश पढ़कर स्वामी जी को सुनाने लगे। प्रोफेसर ने कहा - " अद्वैत वेदान्त की मधुर मोहिनी -शक्ति क्षणभर में ही बाह्य जगत को भुला देती है। उसका अध्यन प्रारम्भ करते ही मन एक उच्चतम आध्यात्मिक भवराज्य में चला जाता है।  मनुष्य के मस्तिष्क ने सत्य (परम् सत्य) की खोज में रत होकर जिन सब विषयों का आविष्कार किया है , उसमें अद्वैत दर्शन और शांकरभाष्य सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। मेरी राय में अद्वैत (वेदान्त) केवल सूक्ष्म दर्शन ही नहीं है, बल्कि यह पूर्णतः नैतिक जीवन व्यतीत करने का प्रेरणाश्रोत है। " And so the Vedanta in its unfalsified form is the strongest support of pure morality, is the greatest consolation in the suffering of life and death. Indians ! Keep to it .और इसलिए अद्वैत वेदान्त अपने अविकृत रूप में , उच्चतम नैतिकता (pure morality) की सुदृढ़ नींव है, और जीवन में आने वाली  दुःख-कष्टों का (उतार-चढ़ाव का) साहस से सामना करने और मृत्यु-भय से मुक्ति के लिए सबसे बड़ा आश्वासन है ! हे भारतवासियो! इसे कभी न छोड़ना ! [ विवेकानन्द चरित:5 /आचार्य विवेकानन्द/174 -175) 

["युवा समस्या और स्वामी विवेकानन्द का मार्गदर्शन " (যুব সমস্যা ও স্বামী বিবেকানন্দ) 'ओजस ही मनुष्य का सच्चा मनुष्यत्व है !' [ SVHS- 3.4 स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना : खण्ड 3 -स्वामी विवेकानन्द और युवा समाज ]#युवाओं द्वारा पैदा की गई समस्या:  "Problems created by youth एवं  C-IN-C दादा का उपदेश ": सबको बताओ धर्म क्या है ? श्रद्धा क्या है ? नित्य-अनित्य विवेक-और बुद्धि में क्या अन्तर है ? पशुता से मनुष्यत्व , और मनुष्यत्व से देवत्व में कैसे उन्नत हुआ जाता है ? दादा (नवनी दा) युवाओं द्वारा पैदा की गई समस्याओं की ओर, यथा सीटी बजाना, हल्ला करना, तोड़फोड़ करना, रेल-बस का सीट फाड़ना, कुर्ता-फाड़ होली में भांग खाना आदि पर दृष्टिपात करने की जरुरत भी नहीं समझते थे। ]

>>>प्रश्न - आपने जिस अद्वैत-अवस्था के बारे में कहा है, वह क्या केवल आदर्श है, अथवा उसे लोग प्राप्त भी करते है ?

' यदि वह केवल थोथी बात हो, तब तो उसका कुछ भी मूल्य नहीं।  हम जानते हैं कि यह अवस्था ऋषि-मुनियों को उपलब्ध हुई थी, और उसी पद्धति से अनुसरण करने वाले सत्यार्थी को आज भी होती है। उस इन्द्रियातीत सत्य कि उपलब्धी करने के लिये वेदों में तीन उपाय बतलाये गये है- श्रवण, मनन और निदिध्यासन।  इस आत्म-तत्व के विषय में पहले श्रवण करना होगा।  श्रवण करने के बाद इस विषय पर विचार करना होगा- आँखें मूंदकर विश्वास न कर, अच्छी तरह तर्क की कसौटी पर कस कर, समझ-बूझकर उस पर विश्वास करना होगा।  इस प्रकार आपने सत्य-स्वरुप पर विचार करके उसके निरन्तर ध्यान में नियुक्त होना होगा, तब ( मृत्यु का सामना करते ही ) उसका साक्षात्कार होगा।  यह प्रत्यक्षानुभूति ही यथार्थ धर्म है।  केवल किसी मतवाद को स्वीकार कर लेना धर्म नहीं है।  हम तो कहते हैं यह समाधी या ज्ञानातीत अवस्था ही धर्म है ! ' (10 /387)

प्रश्न- उस इन्द्रियातीत सत्य को जानने की विशेष शिक्षा पद्धति कौन सी है?
 हमारे शास्त्रों में दो प्रणालियाँ कही गयी है- एक अस्ति-भाव द्योतक या प्रवृत्ति मार्ग है और दूसरी नास्ति-भाव द्योतक या निवृत्ति मार्ग है। प्रथमोक्त मार्ग से सारा विश्व चलता है- गृहस्थ लोग इसी पथ से प्रेम के द्वारा उस पूर्ण वस्तु को पाने का प्रयत्न कर रहे हैं, यदि इस प्रेम की परिधि को अनन्त गुनी बढ़ा ड़ी जाय, हम उसी विश्व-प्रेम में पहुँच जायेंगे। दुसरे पथ में 'नेति', 'नेति' अर्थात 'यह नहीं, यह नहीं' इस प्रकार की साधना करनी पडती है। इस साधना में चित्त की जो कोई तरंग (गाली या अपमान सूचक शब्द) मन को बहिर्मुखी बनाने की चेष्टा करती है, उसका निवारण करना पड़ता है। अंत में मन 
ही मानो मर जाता है, (अर्थात व्यष्टि अहम सर्वगत अहं में रूपांतरित हो जाता है), तब सत्य स्वयं प्रकाशित हो जाता है। हम इसी को आत्मसाक्षात्कार, समाधि या इन्द्रियातीत अवस्था या पूर्ण ज्ञानावस्था कहते हैं। यह अवस्था विषय (ज्ञेय-ठाकुर ) को विषयी (ज्ञाता -अहम) में लीन कर देने से प्राप्त होती है। वास्तव में यह जगत विलीन हो जाता है, केवल ' मैं ' रह जाता है- एकमात्र ' मैं ' ही वर्तमान रहता है. ' (10/384 ) 

श्रीमद्भगवत गीता में वर्णित अपने उस सत्य स्वरूप (Real I) आत्मा (ईश्वर, भगवान या ब्रह्म) को जानने के इन दोनों मार्गों का वर्णन करते हुए आदिगुरु शंकराचार्यजी अपने गीता भाष्य के प्रारम्भ में (श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्यम् ॥ उपोद्घातः ॥) ही कहते हैं -     

नारायणः परोऽव्यक्तात् अण्डमव्यक्तसम्भवम् ।

अण्डस्यान्तस्त्विमे लोकाः सप्तद्वीपा च मेदिनी ॥

अव्यक्त से अर्थात माया से श्री नारायण या आदिपुरुष सर्वथा अतीत है , (इन्द्रियतीत सत्य-अस्पष्ट) है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अव्यक्त प्रकृति से उत्पन्न हुआ है। ये भूः , भुवः , स्वः आदि सभी लोक और सात द्वीपों वाली पृथ्वी ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत ही है।  

सः भगवान् सृष्ट्वा-इदं जगत्, तस्य च स्थितिं चिकीर्षुः,

मरीचि-आदीन्-अग्रे सृष्ट्वा प्रजापतीन्, प्रवृत्ति-लक्षणं धर्मं

ग्राहयामास वेद-उक्तम् । 

इस जगत को रचकर इसका पालन करने की इच्छा वाले उस भगवान ने पहले मरीचि आदि प्रजापतियों को रचकर उसको वेदोक्त प्रवृत्ति रूप धर्म (कर्मयोग) ग्रहण करवाया।  

                         ततः अन्याण् च सनक-सनन्दन-आदीन् उत्पाद्य,

निवृत्ति-लक्षणं धर्मं ज्ञान-वैराग्य-लक्षणं ग्राहयामास । 

फिर उनसे अलग सनक , सनन्दन , सनातन आदि ऋषियों को उत्पन्न करके उनको ज्ञान और वैराग्य जिसके लक्षण हैं , ऐसे निवृत्ति रूप धर्म (ज्ञानयोग) ग्रहण करवाए।  

द्विविधः हि वेदोक्तः धर्मः, प्रवृत्ति-लक्षणः निवृत्ति-लक्षणः च ।

इस प्रकार वेदोक्त धर्म दो प्रकार का है - एक प्रवृत्ति रूप है, दूसरा निवृत्ति रूप है।  

 जगतः स्थिति-कारणं , प्राणिनां साक्षात्-अभ्युदय-निःश्रेयस-हेतुः

यः सः धर्मः ब्राह्मणाद्यैः वर्णिभिः आश्रमिभिः च श्रेयोर्थिभिः

अनुष्ठीयमानः ।

जो जगत की स्थिति का कारण , तथा प्राणियों की उन्नति का और मोक्ष का साक्षात् हेतु है। एवं कल्याणकामी ब्राह्मण आदि वर्णाश्रम अवलम्बियों द्वारा जिसका अनुष्ठान किया जाता है उसका नाम धर्म है। 

[द्विविधः हि वेदोक्तः धर्मः, प्रवृत्ति-लक्षणः निवृत्ति-लक्षणः च  जगतः स्थिति-कारणं , प्राणिनां साक्षात्-अभ्युदय-निःश्रेयस-हेतुः यः सः धर्मः ब्राह्मणाद्यैः वर्णिभिः आश्रमिभिः च श्रेयोर्थिभिः -अनुष्ठीयमानः। https://sanskritdocuments.org/doc_giitaa/gItAshAMkarabhAShya.html)]

>> 'मृत्युंजयी- श्रद्धा '   स्वामी जी 'मृत्युंजयी- श्रद्धा '  का अद्भुत उदाहरण, 'कमल और सूर्य'-से प्रस्तुत करते हुए कहते हैं - 'मृत्यु की समस्या का ही समाधान' -सर्वप्रथम भारत के ऋषि -मुनियों ने ही  आविष्कृत कर दिखाया था। प्राचीन युग के हमारे पूर्वज ऋषियों के मन में विचार उठा - वे जिन्होंने मेरे बचपन में मुझे पाल-पोस कर बड़ा किया, जिन्होंने  जीवनभर केवल मेरे लिये सबकुछ किया- मेरे माता-पिता; वे भी चले गये- कहाँ ? हर कोई, हर चीज चली गयी, जा रही है, और चली जायेगी। वे कहाँ चले जाते हैं ? प्रातः कालीन सूर्य जगत के लिये प्रकाश, ताप और हर्ष लाता है। वह मन्द गति से यात्रा करता है, शाम को नीचे गहराई में विलुप्त हो जाता है।  किन्तु कमल के अद्भुत पुष्प की श्रद्धा को देखो ! उसे दृढ़ -विश्वास है, उसमें आस्तिक्य-बुद्धि है कि यही सूर्य अगले दीन पुनः प्रकट होगा !  उतना ही गरिमामय, और सुन्दर ! और दूसरे दिन सुबह, जब सूर्य की किरणें उसकी बन्द पंखुड़ीयों को स्पर्श करती हैं, तो वह प्रस्फुटित हो जाता है, खुल जाता है और सूर्य ढलने पर पुनः बन्द हो जाता है। तात्पर्य  यह निकला गया कि जो लोग आते, और चले जाते हैं उनका पुनर्जन्म होता है यह पहला समाधान था। और इसीलिए सूर्य तथा कमल धर्म के प्रथम प्रतीक हुए। 'मृत्युंजयी- श्रद्धा '  का अद्भुत उदाहरण है - 'कमल और सूर्य'! 
         श्रद्धावान मनुष्य (हमारे पूर्वज ऋषियों) के मन में पुनः प्रश्न उठा - 'रात्री में भी चाँद-तारे अपना प्रकाश फैलाते रहते हैं, तब वे जिनसे मैं स्नेह करता हूँ, कहाँ चले जाते हैं? निश्चय ही नीचे तमसाच्छन्न स्थान को नहीं, वरन ऊपर, शाश्वत प्रकाश के राज्य में। ' यहाँ श्रद्धा के नये प्रतीक अग्नि हैंजो अपनी ज्वालाओं की अद्भुत भास्वर जिह्वाओं से युक्त है- पूरे वन को अल्प समय में खा सकते हैं, भोजन पकाने वाली, गर्मी देने वाली, और वन्य पशुओं को दूर भगा देने वाली अग्नि की ज्वाला- यह प्राण दायक, प्राणरक्षक अग्नि और उसकी लपटें - जो सब की सब ऊपर जाती हैं, नीचे कभी नहीं। यह अग्नि ही है जो उन्हें ज्योति के स्थलों में ऊपर ले जाने वाली है।
    आपके (मने युवाओं के) सामने है जनसमुदाय को उसका अधिकार देने की समस्या। आपके पास संसार का महानतम धर्म (चार महावाक्य) है, और आप जनसमुदाय को (गीता, उपनिषद)  सुनाने के बजाय सारहीन और निरर्थक बातों पर पालते हैं। आपके पास वेद-उपनिषद का चिरन्तन बहता हुआ स्रोत है, और आप उन्हें गन्दी नाली का पानी पिलाते हैं। विश्वास कीजिये की आत्मा अमर है, अनंत है और सर्वशक्तिमान है। मैं शिक्षा को गुरु (परमहंस) के साथ सम्पर्क -'गुरुगृह वास'- (कैम्प का प्रशिक्षण) समझता हूँ। गुरु  के व्यक्तिगत जीवन के अभाव में शिक्षा नहीं हो सकती। अपने विश्वविद्यालयों को लीजिये। उन्होंने एक भी मौलिक व्यक्ति पैदा नहीं किया। वे केवल परीक्षा लेने की संस्थायें हैं। सबके कल्याण के लिये अपने जीवन को न्योछावर कर देने की भावना का अभी हमारे राष्ट्र में विकास नहीं हुआ है।(4/261-62)]

"जिनके पास आँखें हैं, वे जानते हैं कि हमारा इतिहास कितना उज्जवल है, और वह देश को किस प्रकार जीवित रख रहा है...पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव से हमारे युवकों की बदली हुई विचारधारा और डगमग आत्मविश्वास को ध्यान में रख कर, आज उस गौरवमय  इतिहास को फिर से लिखना होगा, जिससे पाश्चात्य सभ्यता से चकित और चकाचौंध में भ्रमित हमारे युवक अपने अतीत पर गर्व करना सीखें ...हमें गुरुगृह-वास और उस जैसी अन्य शिक्षा प्रणालियों ( ३ दिवसीय, ६ दिवसीय युवा प्रशिक्षण शिविर ) को पुनः जीवित करना होगा. आज हमें आवश्यकता है वेदान्त युक्त पाश्चात्य विज्ञान की, ब्रहचर्य के आदर्श, और ' श्रद्धा '-जन्य अद्भुत आत्मविश्वास की. ..वेदान्त का सिद्धान्त है कि मनुष्य के ह्रदय में ज्ञान का समस्त भण्डार निहित है- एक अबोध शिशु में भी- केवल उसको जाग्रत कर देने की आवश्यकता है, और यही आचार्य का कार्य है.' 
आचार्यों में यह सामर्थ्य रहना चाहिए कि वह अपने शिष्यों को देश-कालातीत सत्य के बारे में इस प्रकार कह सके -  " मन और बाह्य प्रकृति की प्रत्येक वस्तु ( नाम-रूप ) देश-काल में हैं और कार्य-कारण के नियम से बँधे हैं. आत्मा सब देश, सब काल, सब कार्य-कारणों से परे है. जो बँधी है, वह प्रकृति है, आत्मा नहीं| ..तुम आत्मा हो, मुक्त और शाश्वत, चिर मुक्त, चिर पवित्र. केवल पर्याप्त श्रद्धा रखो और क्षण भर में तुम मुक्त हो जाओगे. इसलिए अपनी मुक्ति घोषित करो और जो हो, वह बनो !! - सदा मुक्त, सदा पवित्र !. देश, काल, कार्य-कारण को हम माया कहते हैं '. ( 10/25-26) 
[आज इस प्रकार की शिक्षा देने में समर्थ योग्य शिक्षकों (लीडर्स ) को प्रशिक्षित करना सबसे बड़ी चुनौती है, जिससे हजारो सिंगी जैसे गृहस्थ युवाओं को प्रशिक्षित किया जा सके। 
 यौवन ऊर्जा को राष्ट्रीय चरित्र-निर्माण में नियोजित करने से मनुष्य जीवन सार्थक होता है।  युवा-समस्या का समाधान वैक्तिक प्रचेष्टा (3H विकास के 5 अभ्यास ) पर निर्भर है ! [भावी नेता में इस निबन्ध के सार को उन्मेषित करना ही नेता-वरिष्ठ (C-IN-C) सिंह-द्वय का धर्म है ! It is the duty of  "C-IN-C " (नवनीदा Be and Make लीडरशिप ट्रेनिंग में प्रशिक्षित to teach the essence of this essay (5 practices of 3H development! ) to the would-be leader]"Human life becomes meaningful by employing youthful energy in national character building. The solution to youth problems depends on individual efforts .) "
 তারুণ্যের শক্তিকে জাতীয় চরিত্র গঠনে কাজে লাগিয়ে মানব জীবন সার্থক হয়। যুবকদের সমস্যার সমাধান ব্যক্তিগত প্রচেষ্টার  (3H বিকাশের 5 অনুশীলন!) উপর নির্ভর করে। ]  

स्वामीजी कहते थे ' थोड़ी धूम-धाम हुए बिना भगवान श्रीरामकृष्ण के नाम से लोग परिचित कैसे होंगे ? और उनसे प्रेरित कैसे होंगे ? ..अब लोग उन्हें क्रमशः जानेंगे, तभी तो देश का मंगल होगा। जो देश के मंगल के लिये ही, आविर्भूत हुए हैं, उनको जाने बिना देश का कल्याण किस प्रकार होगा ? उनको (श्रीरामकृष्ण को)   ठीक ठीक जान लेने से - ' मनुष्य ' तैयार होंगे. और ' मनुष्य ' यदि तैयार हो गये, तो दुर्भिक्ष आदि को दूर करना फिर कितनी देर की बात है ? ' ( ८/२५१)] 
     " जिस प्रकार लडकों को 30 वर्ष की उम्र तक ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर सत्य को जानने के विज्ञान की तकनीक या कौशल सीखना होगा, उसी तरह लड़कियों को भी यह तकनीक  सीखनी होगी। किन्तु प्रश्नकर्ता  ने फिर पुछा- ' पर आज की विश्वविद्यालय की शिक्षा में क्या दोष है? ' वेदान्त - ' वेद ' शब्द से बना है, और वेद का अर्थ है ज्ञान। समस्त ज्ञान वेद है और ईश्वर की भाँति अनन्त है। कोई व्यक्ति ज्ञान की कभी सृष्टि नहीं करता। क्या तुमने कभी ज्ञान का सृजन होते देखा है ? ज्ञान का अन्वेषण मात्र होता है- आवृत (सत्य) का अनावरण (उद्घाटन ) होता है। ज्ञान सदा यहीं सामने है, क्योंकि वह स्वयं ईश्वर है. अतीत, वर्तमान, अनागत इन तीनों का ज्ञान हम सब में विद्यमान है। हम उसका अनुसन्धान मात्र करते हैं और कुछ नहीं। ' (9/90)]
सत्य (आत्मा) का ज्ञान पहले स्वयं को होना चाहिये, और उसके बाद उसे तुम अनेक को सिखा सकते हो, बल्कि वे लोग स्वयं उसे सीखने आयेंगे।.... मैंने यह प्रत्यक्ष अनुभव कर लिया कि धर्म भी दूसरे को 'दिया' जा सकता है, केवल एक ही स्पर्श तथा एक ही दृष्टि में -(त्वं प्रत्यक्षम ब्रह्माSसि कहते हुए) सारा जीवन बदला जा सकता है। " (मेरे गुरुदेव 7 /258 -60)] 
[इसीलिए स्वामीजी का विचार था कि "..बाल्यावस्था से ही जाज्वल्यमान, उज्ज्वल चरित्र युक्त किसी तपस्वी महापुरुष (नवनीदा) के सहवास में रहना चाहिए, जिससे उच्चतम ज्ञान का जीवन्त आदर्श सदा दृष्टि के समक्ष रहे। ' झूठ बोलना पाप है '- केवल पढ़ भर लेने से क्या होगा ? हर एक छात्र को पूर्ण ब्रह्मचर्य पालन करने का व्रत लेना चाहिए, तभी ह्रदय में श्रद्धा और भक्ति का उदय होगा, नहीं तो, जिसमें श्रद्धा और भक्ति नहीं, वह झूठ क्यों नहीं बोलेगा?" (8/228 -32) 

 ' लोग बचपन से ही शिक्षा पाते हैं कि वे दुर्बल हैं, पापी हैं।  उनको सिखाओ कि वे सब उसी अमृत की सन्तान हैं- साहसी बनो, सत्य को जानो और उसे जीवन में परिणत करो।  चरम लक्ष्य भले ही बहुत दूर हो, पर उठो, जागो, जब तक ध्येय तक न पहुँचो, तब तक मत रुको।  ' (2/20)
" मनुष्य के (युवाओं के) मन में ही समस्त समस्याओं का समाधान मिल सकता है। कोई कानून किसी व्यक्ति से वह कार्य नहीं करा सकता जिसे वह करना नहीं चाहता है। अगर मनुष्य स्वयं अच्छा बनना चाहेगा, तभी वह अच्छा बन पायेगा। पूरा संविधान और संविधान के पण्डित मिलकर भी उसे अच्छा नहीं बना सकते। हम सब अच्छे बनें, यही समस्या का हल है। पूर्णत्व तभी सम्भव है,जब मनुष्य स्वेच्छा से मन को परिवर्तित कर सके, पर इसमें कठिनाई यह है कि वह मन के साथ जबरदस्ती नहीं कर सकता। शिक्षा का आदर्श है -मनरूपी उपकरण को (साधन) को योग्य बनाना और अपने मन पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करना।" (4/157) 
[" It is our privilege to be allowed to be charitable, For only so can we grow. The poor man suffers that we may be helped; let the giver kneel down and give thanks, let the receiver stand up and permit.  "
"हमलोग जो दूसरों के प्रति (ट्रेनी, प्रशिक्षणार्थी या शिष्य के प्रति) करुणा का भाव प्रकाशित कर पाते हैं,  यह हमारा एक विशेष सौभाग्य है-क्योंकि इस प्रकार के कार्यों द्वारा ही हमारी आत्मोन्नति होती है। दीन जन मानो इसीलिए कष्ट पाते हैं कि हमारा कल्याण हो ! अतएव दान करते समय दाता ग्रहीता के सामने घुटने टेके और धन्यवाद दे; ग्रहीता दाता के सम्मुख खड़ा हो जाय और अनुमति दे। सभी प्राणियों में विद्यमान प्रभु श्रीरामकृष्ण का दर्शन करते हुए, उन्हीं को दान दो। जब हम कुछ भी बुराई नहीं देख पाएंगे तब हमारे लिए जगत्प्रपंच भी नहीं रहेगा, क्योंकि प्रकृति का उद्देश्य ही है -हमें इस भ्रम से मुक्त करना (M/F देहाध्यास से डी-हिप्नोटाइज्ड करना।)" 7/82

(वार्ता एवं संलाप /खंड-६/ ३४/पेज-१७९/ १९०१) 

स्वामी जी - " ........ कोई धन की चिन्ता करते करते धनकुबेर बन जाता है, और कोई शास्त्र -चिंतन करते करते विद्वान्। पर दोनों ही बन्धन हैं। पराविद्या प्राप्त करके विद्या और अविद्या दोनों से परे चला जा। 

(Some perhaps thinking of money have become millionaires, whereas you have become a Pundit by thinking of scriptures. But both are bondages. Attain the supreme knowledge and go beyond Vidya and Avidya, relative knowledge and ignorance.)    

शिष्य -महाराज , आपकी कृपा से मैं सब समझता हूँ ; परन्तु कर्म के चक्कर में पड़कर धारणा नहीं कर सकता। 

(Disciple: Sir, through your grace I understand it all, but my past Karma does not allow me to assimilate these teachings.) 

स्वामी जी - कर्म-फर्म छोड़ दे। तूने ही पूर्व जन्म में कर्म करके इस देह को (आदम और हव्वा देह को) प्राप्त किया है , यह बात यदि सत्य है तो कर्म के द्वारा कर्म को काटकर, तू फिर इसी देह में जीवन्मुक्त बनने का प्रयत्न क्यों नहीं करता ? निश्चित रूप से समझ लो कि आत्मज्ञान और मुक्ति तुम्हारे अपने ही हाथ में है। ज्ञान में कर्म का लवलेश भी नहीं है। परन्तु जीवन्मुक्त होते हुए भी जो लोग कर्म करते हैं , समझ लेना, वे दूसरों के हित के लिए ही कर्म करते हैं। वे भले-बुरे परिणाम की ओर नहीं देखते। किसी भी वासना का बीज उनके मन में नहीं रहता। गृहस्थाश्रम में रहते हुए इस प्रकार यथार्थ परहित के लिए कर्म करना - लगभग असम्भव जैसा है ! (ईश्वरकोटि छोड़कर???)

Throw aside your Karma and all such stuff. If it is a truth that by your own past action you have got this body; then, nullifying the effects of evil works by good works, why should you not be a Jivanmukta in this very body? Know that freedom or Self - knowledge is in your own hands. In real knowledge there is no touch of work. But those who work after being Jivanmuktas do so for the good of others. They do not look to the results of works. No seed of desire finds any room in their mind. And strictly speaking it is almost impossible to work like that for the good of the world from the householder's position 

शिष्य - आप ऐसी कृपा कीजिये जिससे आत्मानुभूति की प्राप्ति इसी शरीर में हो जाये।

(Disciple: Please bless me that I may attain Self - realisation in this very life.) 

स्वामीजी - भय क्या है ? मन में अनन्यता रहने पर -इसी जन्म में आत्मनुभूति हो जाएगी। परन्तु पुरुषकार चाहिए। पुरुषकार क्या है , जानता है ? आत्मज्ञान प्राप्त करके ही रहूँगा , इसमें जो बाधा -विपत्ति सामने आएगी , उस पर अवश्य ही विजय प्राप्त करूँगा - इस प्रकार के दृढ़ संकल्प का नाम है पुरुषकार ! माँ , बाप , भाई , मित्र , स्त्री , पुत्र मरते हैं तो मरें। यह देह रहे तो रहे , न रहे तो न सही। मैं किसी भी तरह पीछे नहीं देखूँगा। जब तक आत्मसाक्षात्कार नहीं होता , तब तक इस प्रकार के सभी विषयों की उपेक्षा करके , एक मन-प्राण से अपने उद्देश्य की ओर अग्रसर होने की चेष्टा करने का नाम है -पुरुषकार ; नहीं तो दूसरे पुरुषकार तो पशु-पक्षी भी कर रहे हैं। मनुष्य ने इस शरीर को प्राप्त किया है केवल उसी आत्मज्ञान को प्राप्त करने के लिए। संसार में सब लोग जिस रास्ते से जा रहे हैं , क्या तू भी उसी स्रोत में बहकर चला जायेगा ? तो फिर तेरे पुरुषकार का मूल्य क्या ? सब लोग तो मरने बैठे हैं , पर तू तो मृत्यु को जीतने आया है। महावीर की तरह अग्रसर हो जा। किसी की परवाह न कर। कितने दिनों के लिए है यह शरीर ? कितने दिनों के लिए हैं ये सुख-दुःख ? यदि मानव-शरीर को प्राप्त कर ही लिया है , तो भीतर की आत्मा को जगा और बोल - 'मैंने अभयपद प्राप्त कर लिया है।  बोल - मैं वही आत्मा हूँ।  जिसमें मेरा क्षुद्र 'अहंकर्ता -भाव ' डूब गया है। इसी तरह सिद्ध बन जा। उसके बाद जितने दिन यह देह रहे , उतने दिन दूसरों को यह महा बलप्रद अभय वाणी सुना - " तत्वमसि! उत्तिष्ठत ! जाग्रत ! प्राप्य वरान्निबोधत ! (तू वही है ', 'उठो , जागो और लक्ष्य प्राप्त करने तक रुको नहीं !) यह होने पर तब जानूँगा कि तू वास्तव में एक सच्चा 'पूर्वी बंगाली' है। "  

Swamiji: What fear? If there is sincerity of spirit, I tell you, for a certainty, you will attain it in this very life. But manly endeavour is wanted. Do you know what it is? "I shall certainly attain Self - knowledge. Whatever obstacles may come, I shall certainly overcome them"-- a firm determination like this is Purushakara. 

"Whether my mother, father, friends, brothers, wife, and children live or die, whether this body remains or goes, I shall never turn back till I attain to the vision of the Atman"-- this resolute endeavour to advance towards one's goal, setting at naught all other considerations, is termed manly endeavour. Otherwise, endeavour for creature comforts even beasts and birds show. Man has got this body simply to realise Self - knowledge. If you follow the common run of people in the world and float with the general current, where then is your manliness? Well, the common people are going to the jaws of death! But you have come to conquer it! Advance like a hero. Don't be thwarted by anything. How many days will this body last, with its happiness and misery? 

" When you have got the human body, then rouse the Atman within and say — I have reached the state of fearlessness! Say — I am the Atman in which my lower ego has become merged for ever. Be perfect in this idea; and then as long as the body endures, speak unto others this message of fearlessness: “Thou art That”, “Arise, awake, and stop not till the goal is reached!”

 (The Complete Works of Swami Vivekananda/Volume 7/Conversations And Dialogues/XVII/1901)

>>>"महान यौन ऊर्जा या काम-शक्ति जब पशुसुलभ क्रिया से ऊपर उठकर मानव-प्रणाली के महान डाइनेमो (dynamo) मस्तिष्क (सहस्रार?) तक पहुँचती है, वहाँ संचित होने पर वह ओजस अर्थात महान आध्यात्मिक शक्ति बन जाती है। यह ओजस ही मनुष्य का सच्चा मनुष्यत्व है, और केवल मनुष्य शरीर में ही इस ओज -शक्ति का संग्रह सम्भव है। जिसकी समस्त पशुसुलभ काम-शक्ति ओजस में परिणत हो गयी है, वही देवता है। उसकी वाणी में शक्ति होती है और उसके वचन जगत को पुनरुज्जीवित करते हैं।  (४/८९)               
>>>No force can be created; it can only be directed. : 
"कोई भी शक्ति उत्पन्न नहीं की जा सकती; उसे केवल एक दिशा में परिचालित किया जा सकता है। अतः हमें चाहिए कि हम अपनी कामशक्ति को अपने वश में करना सीखें और अपनी इच्छा-शक्ति से उन्हें पशुवत रखने (निम्नकेन्द्रों) के बजाय (उर्ध्वमुखी) आध्यात्मिक बना दें।   
" जब तक मनुष्य अपनी सर्वोच्च शक्ति -' कामशक्ति ' को ओज में परिणत नहीं कर लेता, कोई भी स्त्री या पुरुष, वास्तविक रूप में अध्यात्मिक  (शिक्षक) नहीं हो सकता। अतः हमें चाहिये कि हम अपनी महती शक्तियों को अपने वश में करना सीखें और अपनी ' अदम्य इच्छाशक्ति ' के बल पर उन्हें पशुवत रखने के बजाय आध्यात्मिक बना दें। अतः यह स्पष्ट है कि पवित्रता ही समस्त धर्म और नीति की आधारशिला है ! 
[शिक्षा /https://estudantedavedanta.net/My-Idea-of-Education.pdf]

 " लेक्चर से इस देश में कुछ भी न होगा, भाईलोग सुनेंगे, वाह-वाह करेंगे, ताली पीटेंगे, बस और उसके बाद घर जा कर भात के साथ सब हजम कर जायेंगे।  पुराने जंग खाए लोहे को ...पहले आग में लाल करना करना होगा, तब कहीं हथौड़ी से पीट कर कोई वस्तु ( मनुष्य) बनाई जा सकेगी। इस देश में ज्वलन्त जीवन्त से उदाहरण दिखाये बिना कुछ भी न होगा। अनेक लडकों की आवश्यकता है, जो सारे इन्द्रिय भोगों को छोड़-छाड़ कर देश के लिये जिवनोत्सर्ग करें। पहले उनका जीवन-गठन (चरित्र - निर्माण) करना होगा, तब कहीं काम होगा। ' 8/252)]

'जागो, उठो और लक्ष पर पहुँचे बिना विश्राम मत लो।

  "सभी प्राणियों में अवस्थित यह आत्मा स्वयं को चक्षु या किसी अन्य इन्द्रिय के समक्ष स्वयं को प्रकट नहीं करता अपितु जिनका मन  शुद्ध और परिष्कृत (शुद्ध -चिद्रूप बुद्धि) हो गया है, वे ही उसे अनुभव (realize) करते हैं। जो पॉँचो इन्द्रियों- शब्द, स्पर्श, रूप,रस, और गंध से अतीत है (इन्द्रियातीत है), अपरिवर्तनीय है, जिसका आदि-अंत नहीं है, जो सिनेमा के पर्दे जैसा अपरिणामी है,  उसको जो प्राप्त करते हैं, वे मृत्यु मुख से मुक्त हो जाते हैं। "he who realises Him, frees himself from the jaws of death." किन्तु उसे पाना बहुत कठिन है; यह मार्ग तेज छुरी की धार पर चलने के समान अत्यन्त दुर्गम है। यह मार्ग बहुत लम्बा और जोखिम का है, किन्तु निराश मत होओ, ढृढ़तापूर्वक बढ़े चलो, Awake, arise, and stop not till the goal is reached. 'जागो, उठो और लक्ष पर पहुँचे बिना विश्राम मत लो। 
 (2/172)    
      "I will read to you from one of the Upanishads. It is called the Katha Upanishad. This book psychologically takes up that suggestion, questioning into the internal nature of man. It was first asked who created the external world, and how it came into being. Now the question is: What is that in man; which makes him live and move, and what becomes of that when he dies? (REALISATION/Volume 2, Jnana-Yoga)
" क्या यह कभी सम्भव है कि सृष्टि आदि काल से जिस देश की सन्तान अखिल विश्व को शिक्षा देती आ रही है, केवल इसीलिए मूर्ख बन जायगी कि ( भारत के तत्कालीन वाइसराय लार्ड कर्जन  उच्च शिक्षा को इतना महँगा कर देना चाहते थे मध्यम वर्ग उस शिक्षा से वंचित रह जाये ) लार्ड कर्जन उच्च शिक्षा बन्द कर रहे हैं ? क्या उच्च शिक्षा का अर्थ केवल भौतिक शास्त्रों का अध्यन, और दैनिक उपयोग की वस्तुओं का उत्पादन कर लेना भर है?  उच्च शिक्षा का उद्देश्य है - जीवन की समस्याओं को सुलझा लेने में समर्थ व्यक्ति बन जाना। और आज के तथाकथित सभ्य देश आज भी जिन समस्याओं में उलझा हुआ है (माया ,जीव-जगत और ईश्वरउन्ही पर गहन चिन्तन कर रहा है, किन्तु हमारे देश में सहस्रों वर्ष पूर्व (यम-नचिकेता कठोपनिषद युग में) ही ये गुत्थियाँ सुलझा ली गयीं हैं। ' ईश्वर रूप में सबकी उपासना करो- सारे आकार उसके मन्दिर हैं।  बाकी सब कुछ भ्रम है। बाकी सब कुछ भ्रम है। ' अन्तर्भेदी-दृष्टि प्राप्त कर लो '- हमेशा भीतर की ओर देखो, बाहर (शरीर) की ओर कदापि नहीं। '(9/89 ) 

२३ दिसंबर १९०० को श्रीमती मृणालिनी बसु को लिखित एक पत्र में कहते हैं -" विशालकाय रेल के इंजन को दूर से आते देखकर, नन्हा सा कीड़ा अपने जीवन की रक्षा के लिये रेल की पटरी से हट गया- क्योंकि वह बुद्धिमान है ? मशीन में इच्छाशक्ति का कोई प्रकाश नहीं है। यन्त्र कभी नियम को उल्लंघन करने की कोई इच्छा नहीं रखता। कीड़ा नियम का विरोध करना चाहता (स्वयं को डी -हिप्नोटाइज्ड करना चाहता है), और नियम के विरुद्ध जाता है, चाहे उस प्रयत्न में वह सिद्धि लाभ करे या असिद्धि; इसलिए वह बुद्धिमान है। जिस परिमाण में इच्छाशक्ति के प्रकट होने में सफलता होती है, उसी अंश में सुख अधिक होता है और जीव उतना ही ऊँचा होता है। परमात्मा की इच्छाशक्ति पूर्ण रूप से सफल होती है इसलिए वह उच्चतम है।  जिस संयम के द्वारा इच्छाशक्ति का प्रवाह और विकास वश में लाया जाता है और वह फलदायक होता है, वह शिक्षा कहलाती है। " २९ अक्टूबर १८९६ को लन्दन में अपरोक्षानुभूति (कठोपनिषद) पर व्याख्यान देते हुए कहते हैं -यदि मुझे फिर से अपनी शिक्षा आरम्भ करनी हो और इसमें मेरा वश चले, तो मैं तथ्यों का अध्ययन कदापि न करूँ। मैं मन की एकाग्रता और अनासक्ति का सामर्थ्य बढ़ाता और उपकरण के तैयार होने पर इच्छानुसार तथ्यों का संकलन करता। " (4.108) 

" अब उपाय है -शिक्षा का प्रसार। पहले आत्मज्ञान। ...जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य संसार-बंधन तक से छुटकारा पा जाता है, उससे क्या तुच्छ भौतिक उन्नति नहीं हो सकेगी ? अवश्य ही हो सकेगी। प्रत्येक जीवात्मा में अनंत शक्ति अव्यक्त भाव से निहित है।  वह (अविनाशी) आत्मा चींटी से लेकर ऊँचे से ऊँचे सिद्ध पुरुष तक सभी में  विराजमान है , अन्तर केवल उसके प्रकटीकरण के भेद में हैं। वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्। किसान जैसे खेतों की मेंड़ तोड़ देता है और एक खेत का पानी दूसरे खेत में चला जाता है, वैसे ही आवरण टूटते ही (मिथ्या अहं का आवरण टूटते ही) आत्मा भी प्रकट हो जाती है। इस शक्ति को सर्वत्र जा जा कर जगाना होगा। (कैवल्य पाद-४.३) (24 अप्रैल, 1897 को सरला घोषाल को लिखा पत्र 6/312)
> मनुष्य और ईसा (अवतार) में अन्तर : अभिव्यक्त प्राणियों में बहुत अन्तर होता है। अभिव्यक्त प्राणी के रूप में तुम ईसा कभी नहीं हो सकते। मिट्टी से एक मिट्टी का हाथी बना लो , उसी मिट्टी से एक मिट्टी का चूहा बना लो। उन्हें पानी में डालदो - वे एक बन जाते हैं। मिट्टी के रूप में वे निरंतर एक हैं , गढ़ी हुई वस्तुओं के रूप में निरंतर भिन्न हैं। ब्रह्म ही ईश्वर (भगवान-अवतार वरिष्ठ) तथा मनुष्य दोनों का उपादान है। पूर्ण सर्वव्यापी सत्ता के रूप में हम सब एक हैं, परन्तु वैयक्तिक प्राणियों के रूप में ईश्वर (भगवान) शाश्वत स्वामी हैं और हम शाश्वत सेवक हैं।
    "तुम्हारे पास तीन चीजें '3H'  हैं- 1. शरीर, 2. मन 3. आत्मा! आत्मा इन्द्रियातीत है मन (मिथ्या अहं) जन्म और मृत्यु का पात्र है और वही दशा शरीर की है। तुम वही (अजर-अमर-अविनाशी) आत्मा हो, पर बहुधा तुम सोचते हो की तुम (नश्वर) शरीर हो। जब मनुष्य कहता है- 'मैं यहाँ हूँ',  तो उस समय वह शरीर की बात सोचता है। फिर एक दूसरा क्षण आता है , जब तुम उच्चतम भूमिका में होते हो, तब तुम यह नहीं कहते - " मैं यहाँ हूँ ! (अभी मजा चखाता हूँ!)" किन्तु जब कोई तुम्हें गाली देता है, या तुम्हारा अपमान करता है, और तुम भीतर से क्रोधित नहीं हो जाते, तब तुम आत्मा हो "(खंड 10. पृष्ठ 40)
 
दृष्टिं ज्ञानमयीं  कृत्वा पश्येद्  ब्रह्ममयं जगत्।  
देहबुद्धया तु दासोऽहं  जीवबुद्धया त्वदंशक। 
आत्मबुद्धया  त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः ॥

  ज्ञानमय दृष्टि से संसार को ब्रह्ममय देखना चाहिए।  देहबुद्धि से तो मैं आपका दास हूँ, बताइये आपके लिए क्या कर सकता हूँ ?  जीवबुद्धि से आपका अंश ही हूँ और  आत्मबुद्धि से में वही हूँ जो आप हैं, यही मेरी निश्चित मति है॥ 
"जब मैं सोचता हूँ कि मैं शरीर (M/F) हूँ, तब उस देहबुद्धि से मैं आपका दास (भक्त) हूँ, बताइये आपके लिए मैं क्या कर सकता हूँ ? जब मैं सोचता हूँ कि मैं मन (अहं)हूँ, उस जीव बुध्दि से आपका अंश हूँ, या मैं उस अनंत अग्नि की एक स्फुलिंग हूँ , जो तुम हो। जब मैं यह अनुभव करता हूँ कि मैं हूँ , तुम और मैं एक हूँ - यह प्रभु के एक शाश्वत भक्त (हनुमान) का कथन है। क्या मन (जीवभाव) आत्मा से बढ़कर है ?         
[१०/४० ]

" हरि ॐ तत्सत् ,हरि ॐ तत्सत्, हरि ॐ तत्सत् !" 

महामंत्र है तू जपा कर इसी को, महामंत्र है तू जपा कर इसी को॥ 

>>>स्वामी विवेकानन्द कहते थे - " यदि मेरी कोई संतान होती तो मैं उसे जन्म से ही सुनाता- 'तत्वमसि निरंजनः।' तुमने अवश्य ही पुराणों में रानी मदालसा की वह सुन्दर कहानी पढ़ी होगी। उसके संतान होते ही वह उसको अपने हाथ से झूले पर रखकर उसको लोरी सुनाते हुए गाती थी- 'तुम हो मेरे लाल निरंजन अतिपावन निष्पाप, तुम हो सर्व-शक्तिमान, तेरा है अमित प्रताप।' इस कहानी में एक महान सत्य छिपा हुआ है- 'अपने को बचपन से ही महान समझो और तुम सचमुच महान हो जाओगे!" (५/१३८) 
        दादा यह कहानी अवश्य सुनाया करते थे कि भारत की मातायें प्राचीन काल अपनी सन्तानों को बचपन से ही आत्मश्रद्धा जागृत करने की कथायें सुनकर उन्हें, आत्मवेत्ता या  ब्रह्मविद मनुष्य बनने की शिक्षा देती थीं। इतिहास में इसका एकमात्र उदाहरण है- रानी मदालसा। इन्होंने अपने पुत्रों को परम ज्ञान का उपदेश देकर जीवन जीने की दिशा दिखाई थी। पुत्र से मां का मोह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन रानी मदालसा ने इस मोह से हटकर अपने चारों पुत्रों को ऎसी शिक्षा दी जिससे उनके कर्म के आधार पर उनकी पहचान हो। 
          वे मानतीं थी कि संसार में नाम की महिमा कुछ नहीं है। व्यक्ति को उसके नाम से नहीं बल्कि उसके कर्मो से पहचाना जाता है। जब राजा ऋतध्वज अपने पुत्रों का नामकरण करते थे तो मदालसा को हंसी आती थी। पहले तीन पुत्रों के जन्म के बाद राजा ने उनका नामकरण किया तो वे हर बार हंसी।
      अपने तीनों पुत्रों को मदालसा ने यही सिखाया। उन्हें नश्वर शरीर व भौतिक सुखों से मोह नहीं करने की शिक्षा दी। उन्होंने बताया कि विद्वान वही है जो सुखों को भी दुख समझकर जीवनयापन करें। उनके तीन पुत्र हुए। बड़े का नाम विक्रांत, दूसरे का नाम सुबाहु और तीसरे का नाम शत्रुमर्दन था। मदालसा ने उन्हें ब्रह्मज्ञान [आत्म-अनुसन्धान] की शिक्षा दी। अपने लड़के को पालने में रख कर, झुलाते झुलाते यह लोरी गा कर सुनाती थीं-

शुद्धोsसि रे तात न तेsस्ति नाम,

  कृतं हि ते कल्पनयाधुनैव ।

पंचात्मकम देहमिदं न तेsस्ति,

 नैवास्य त्वं रोदिषि कस्य हेतो: ॥

 हे तात! तू तो शुद्ध आत्मा है, तेरा कोई नाम नहीं है। यह कल्पित नाम तो तुझे अभी मिला है। वह शरीर भी पाँच भूतों का बना हुआ है। न यह तेरा है, न तू इसका है। फिर किसलिये रो रहा है? 
बचपन से ही वेदान्त सुनकर तीनों पुत्रों को वैराग्य हो गया और वे जंगल में तपस्या करने चले गए। तब मदालसा का चौथा पुत्र हुआ। तब राजा ने मदालसा से कहा कि कम से कम इस पुत्र को तो सांसारिक-ज्ञान की शिक्षा दो जिससे हमारा राजपाट चल सके।  
       रानी मदालसा ने अपने चौथे पुत्र नाम अलर्क (पगला कुत्ता ) रखा।  मदालसा की शिक्षा से वह बहुत ही शूरवीर, पराक्रमी राजा हुआ।  कुछ समय बाद राजा ऋतुध्वज अपनी पत्नी मदालसा के साथ अलर्क को राज्य सौंपकर जंगल में तपस्या करने चले गए। हालांकि राजा के कहने पर चौथे पुत्र को धर्म, अर्थ और काम शास्त्रों की भी शिक्षा दी। लेकिन तपस्या के लिए वन में जाते समय उसे भी यही उपदेश दिया कि आत्मा निराकार है। अंतत: मां की दी हुई यही शिक्षा पाकर चौथे पुत्र को भी आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई कि तू शुद्ध आत्मा है, तेरा कोई नाम नहीं है। इस प्रकार यह रानी मदालसा की ही शिक्षा थी कि जिससे सुबाहु, विक्रांत और शत्रुमर्दन जैसे ब्रह्मज्ञानी और अलर्क जैसे प्रतापी राजा हुए। मदालसा भारत की एक गौरवमयी माँ थीं।
माँ बनो तो आदर्श माता मदालसा जैसी
मदालसा देवी कहती हैं- "एक बार जो मेरे उदर से गुजरा वह यदि दूसरी स्त्री के उदर में जाय, मुक्त न होकर दूसरा जन्म ले,  तो मेरे गर्भधारण को धिक्कार है !वे जब अपने पुत्रों को पालने में सुलाती थीं, तब उनको आध्यात्मिक ज्ञान की लोरियाँ सुनाती थीं। जैसेः

शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरंजनोऽसि, संसारमायापरिवर्जितोऽसि ।

संसार-स्वपनं त्यज मोहनिद्रां,  मदालसा वाक्यमुवाच पुत्रम् ।।

'हे पुत्र, तू शुद्ध है, बुद्ध है, निरंजन है, तूँ तो संसार की माया से रहित है। यह संसार स्वपनमात्र है। उठ, जाग, मोहनिद्रा का त्याग कर ! तू सच्चिदानंद स्वरुप आत्मा है।' इन आर्य महिला ने, आदर्श माता ने अपने सभी पुत्रों को आत्मज्ञान से सम्पन्न बनाकर संसार-सागर से पार करा दिया।
माँ (महिला) बनो तो ऐसी बनो। बच्चों को आत्मज्ञान की लोरियाँ सुनाओ। घर में भी आत्मज्ञान की चर्चा करो। सुख-दुःख आये तो आत्मज्ञान की निगाहों से निहारो। इस संसार से कभी प्रभावित मत होओ। अपने परमात्मा की मस्ती में मस्त रहो। 

राजकुमारी मदालसा एक पौराणिक चरित्र है, जिसका उल्लेख पुराणों में मिलता है। वह गन्धर्वराज विश्वावसु की पुत्री थी। कालांतर में उसका विवाह राजकुमार ऋतुध्वज के साथ हुआ।
राजा ऋतुध्वज एक बार असुरों से युद्ध करने गए। इनकी सेना असुर पक्ष पर भारी पड़ रही थी। ऋतुध्वज की सेना का मनोबल टूट जाये इसलिये मायावी असुरों ने ये अफवाह फैला दी कि ऋतुध्वज मारे गये। यह सूचना रानी मदालसा तक पहुँची तो वह इस गम को सह नहीं कर सकी और उसने अपने प्राण त्याग दिए।
असुरों पर विजय प्राप्तकर जब ऋतुध्वज राजमहल लौटे तो वहां मदालसा को नहीं पाया। मदालसा के वियोग से राजा को बड़ा सदमा लगा और वे राज-काज छोड़कर विक्षिप्तों की तरह व्यवहार करने लगे।
मदालसा का पुनर्जीवन
ऋतुध्वज के प्रिय मित्र नागराज से अपने मित्र की ये अवस्था देखी न गई और वे हिमालय में तपस्या करने चले गए ताकि भगवान शिव को प्रसन्न कर सके। शिव प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा तो नागराज ने उनसे अपने लिए कुछ न मांगकर मित्र ऋतुध्वज के लिये मदालसा को पुनर्जीवित करने की मांग रख दी। शिवजी के वरदान से मदालसा अपनी उसी आयु के साथ मानव-जीवन में लौट आई और पुनः ऋतुध्वज को प्राप्त हुई।
मृत्यु के पश्चात मिले पुनर्जीवन ने मदालसा को मानव शरीर की नश्वरता और जीवन के सार-तत्व का ज्ञान करा दिया। अब वह पहले वाली मदालसा नहीं रही। विषय-भोग में उसकी रूचि समाप्त हो गई और वह आध्यात्मिक चिंतन में मग्न में रहने लगी। पति ने जब संतान प्राप्ति की इच्छा प्रकट की तो मदालसा ने कहा कि मैं संतान नहीं चाहती हूं। पति ने जब इसका कारण पूछा तो मदालसा बोली कि यदि संतान कुसंस्कारी या कुल का कलंक निकल जाए तो मैं उसे नहीं झेल सकती। पति ने कहा--"मैं और तुम दोनों ही धर्म के रास्ते पर चलनेवाले हैं तो हमारी संतान कुसंस्कारी क्यों होगी?" मदालसा ने उत्तर दिया--"कभी-कभी अच्छे मां-बाप की संतान भी बुरी हो जाती है और बुरे मां-बाप की संतान भी अच्छी हो जाती है। यह आवश्यक नहीं है कि अच्छे मां-बाप की संतान अच्छी ही हो।"
संतान प्राप्ति
बड़ी मुश्किल से मदालसा ने संतान उत्पन्न करना स्वीकार किया। पर, पति से वचन ले लिया कि होने वाली संतानों के लालन-पालन का दायित्व उसके ऊपर होगा और पति उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगें।
मदालसा गर्भवती हुई तो वह उपासना में अधिक समय देने लगी। समय पाकर संस्कारी पुत्र हुआ, जिसका पवित्रता के साथ वह लालन-पालन करने लगी। शिशु जब रोता था तो उसे वेदांत ज्ञान से पूर्ण लोरी सुनाते हुए कहती थी-- तू शुद्ध है तू बुद्ध है, तू है निरंजन सर्वदा। संसार माया से रहित, तू स्वरूप स्थित सर्वदा।।
पुत्रों का वैराग्य
समय बीतता गया, एक के बाद एक तीन पुत्र हुए-- विक्रांत, सुबाहू और शत्रुमर्दन। तीनों पुत्र मदालसा से संस्कारित थे। मदालसा ने उन्हें माया से निर्लिप्त निवृतिमार्ग का साधक बनाया था, इसलिये सबने राजमहल का त्यागकर संन्यास ले लिया। पिता ऋतुध्वज यह सोचकर दु:खी रहने लगे कि हमारा वंश कैसे चलेगा।
एक बार किसी सहेली ने रानी मदालसा से पूछा कि तुम कैसी मां हो, क्या तेरे अंदर ममता नहीं है? तुम कैसे अपने छोटे-छोटे बच्चे को संन्यासी बनाकर जंगल भेज देती हो? मदालसा ने उत्तर दिया--"जो जीव एक बार मेरी कोख में आ गया अगर दोबारा वह किसी दूसरी स्त्री के गंदे कोख में जाए तो यह मेरे जीवन के लिए धिक्कार है। मैं अपनी संतानों को जन्म-मरण रूपी महादुख में नहीं जाने देना चाहती।"
मदालसा फिर से गर्भवती हुई तो पति ने अनुरोध किया कि हमारी सभी संतानें अगर निवृतिमार्ग की पथिक बन गई तो ये विराट राज-पाट को कौन संभालेगा। इसलिये कम से कम इस पुत्र को तो राजकाज की शिक्षा दो। मदालसा ने पति की आज्ञा मान ली। जब चौथा पुत्र पैदा हुआ तो मदालसा ने उसका नाम अलर्क रखा और उसे राजधर्म और क्षत्रियधर्म की शिक्षा दी।
प्रतापी राजा अलर्क
अलर्क माता के दिव्य ज्ञान से संस्कारित होकर सर्वगुणसंपन्न हो गया। उसकी गिनती श्रेष्ठ राजाओं में होने लगी। उन्हें राजकाज की शिक्षा के साथ माँ ने न्याय, करुणा, दान इन सबकी भी शिक्षा दी थी। वाल्मीकि रामायण में आख्यान मिलता है कि एक नेत्रहीन ब्राह्मण राजा अलर्क के पास आया और अलर्क ने उसे अपने दोनों नेत्र दान कर दिये। इस तरह अलर्क विश्व के पहले नेत्रदानी हुए। इस अद्भुत त्याग की शिक्षा अलर्क को माँ मदालसा के संस्कारों से ही मिली थी।
माना जाता है कि बालक क्षत्रिय कुल में जन्मा हो तो ब्रह्मज्ञानी की जगह रणकौशल से युक्त होगा। नाम शूरवीरों जैसे होंगें तो उसी के अनुरूप आचरण करेगा। इन सब स्थापित मान्यताओं को मदालसा ने एक साथ ध्वस्त करते हुए दिखा दिया कि माँ अगर चाहे तो अपने बालक को शूरवीर और शत्रुंजय बना दे और वो अगर चाहे तो उसे धीर-गंभीर, महात्मा, ब्रह्मज्ञानी और तपस्वी बना दे। अपने पुत्र को एक साथ साधक और शासक दोनों गुणों से युक्त करने का दुर्लभ काम केवल माँ का संस्कार कर सकता है।
स्वामी विवेकानंद ने मदालसा के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर कहा था, "अगर मेरी कोई संतान होती तो मैं जन्म से ही उसे मदालसा की तरह लोरी सुनाते हुए कहता-- शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरंजनोऽसि। संसार माया परिवर्जितोऽसि। संसार स्वप्नं त्यज मोहनिद्रां।।"

" इच्छाशक्ति ही जगत में अमोघ शक्ति है। प्रबल इच्छाशक्ति का अधिकारी मनुष्य एक ऐसी ज्योतिर्मयी प्रभा अपने चारों ओर फैला देते हैं कि दूसरे लोग स्वतः उस प्रभा से प्रभावित होकर उसके भाव में भावित हो जाते हैं। " ५/१९१ 
" हम श्र्द्धा खो बैठे हैं, इसीलिये तुम्हारा रक्त पानी जैसा हो गया है, मस्तिष्क मुर्दार ओर शरीर दुर्बल! इस शरीर को बदलना होगा। शारीरिक दुर्बलता ही सब अनिष्टों की जड़ है और कुछ नहीं। तुम्हारा शरीर दुर्बल है, मन दुर्बल है, और अपने पर आत्मश्र्द्धा भी बिल्कुल नहीं है। ...जब काम करने का समय आता है तब तुम्हारा पता ही नहीं मिलता।
"मनुष्य में धर्म और परमेश्वर के प्रति उत्कट श्रद्धा रहनी चाहिये ..एक कमरे में चोर घुस आया और उसे पता लग गया कि दूसरे कमरे में सोने का ढेर रखा है, और वह उस ढेर तक पहुँच भी सकता है, तो क्या वह वहां पहुँचने के लिये पागल न हो जायेगा ? (अन्तर्निहित दिव्यता आत्मा या) 'ईश्वर में अटूट विश्वास और फलस्वरूप उसे पाने की तीव्र उत्सुकता का ही नाम है 'श्रद्धा।' (आत्मानुभूति के सोपान - ३/१०१)  
" मैं तुम लोगों से फिर एक बार कहना चाहता हूँ कि यह श्रद्धा ही मानव जाति के जीवन का और संसार के सब धर्मों का महत्वपूर्ण अंग है। सबसे पहले अपने आप पर विश्वास करने का अभ्यास करो। ऐ गरीब बंगालियों उठो और काम में लग जाओ, तुम लोगों के द्वारा ही भारत का उद्धार होनेवाला है!"५/३३५
  
" इन सब मूर्ति-पूजा जप, ध्यान  आदि की जड़ कहाँ है ?  [22 जनवरी 2024 को अयोध्या में राम लला की प्राण-प्रतिष्ठा, जप, ध्यान  आदि की जड़ कहाँ है ?] यह जड़ है श्रद्धा। संस्कृत भाषा के श्रद्धा शब्द को समझाने योग्य कोई शब्द हमारी भाषा में नहीं है। मेरे मत से संस्कृत शब्द श्रद्धा का निकटतम अर्थ 'एकाग्र-निष्ठा' शब्द द्वारा व्यक्त हो सकता है। "६/१३७

    " तुम लोग सोचते हो , मेरे बाद शायद और कोई विवेकानन्द नहीं होगा।  अरे ये जो नशाखोर लोग आकर कन्सर्ट (गाना-बजाना) करके चले गये, जिनसे तुम लोग इतनी घृणा करते हो , जिन्हें तुम लोग अत्यन्त तुच्छ समझते हो, ठाकुर की इच्छा होने पर उनमें से हर एक व्यक्ति विवेकानन्द हो सकता है। आवश्यकता होने पर विवेकानन्द का आभाव न रहेगा। कहाँ से कोटि कोटि विवेकानन्द आकर उपस्थित हो जायेंगे, यह कौन जनता है ? यह  विवेकानन्द का काम नहीं है रे; यह तो उनका काम है-ठाकुर का स्वयं प्रभु का। एक गवर्नर जनरल के जाने के बाद उसके स्थान पर दूसरा आएगा ही! तुम लोग चाहे कितने भी तमोगुणी क्यों न रहो, मन और वाणी को एक करके उनकी (ठाकुरदेव की) शरण में जाने पर सभी अन्धकार (तमोगुण) दूर हो जायेगा। अभी उस रोग को हटाने वाले वैद्यराज जो आये हैं ! उनका नाम लेकर कार्य में लग जाने पर वे स्वयं ही सबकुछ कर लेंगे। तब यही तमोगुण सत्त्वगुण में परिवर्तित हो जायेगा।" (श्री प्रियनाथ सिन्हा द्वारा आलिखित वार्ता एवं संलाप -२ :खंड ८/२५५-५६) [अवतार वरिष्ठ श्रीरामकृष्ण देव की इच्छा, माँ श्री सारदा देवी की आशीर्वादऔर स्वामी विवेकानन्दजी की प्रेरणा से अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल, सारदा नारी संगठन या विवेकानन्द ज्ञान मंदिर जैसे जन-कल्याकारी युवा संगठन जानी बिगहा में युवाओं के द्वारा स्थापित होते हैं।] 

      "मेरी इच्छा है -तुम लोगों के भीतर भी इसी श्रद्धा का आविर्भाव हो, तुममें से हर एक आदमी खड़ा होकर इशारे से संसार को हिला देनेवाला प्रतिभा सम्पन्न महापुरुष हो, हर प्रकार से अनन्त ईश्वरतुल्य हो। मैं तुम लोगों को ऐसा ही देखना चाहता हूँ। उपनिषदों से तुमको ऐसी ही शक्ति प्राप्त होगी। और वहीं से तुमको ऐसा विश्वास प्राप्त होगा। गृही मनुष्य भी उपनिषदों का अध्यन कर सकते हैं,इससे उनका कल्याण ही होगा, कोई अनिष्ट न होगा। वेदान्त के इन सब महान तत्वों का प्रचार अवश्यक है, ये केवल अरण्य मे अथवा गिरि-गुहाओं मे आबद्ध नहीं रहेंगे। कीलों और न्यायधीशों मे, प्रार्थना-मंदिरों मे, दरिद्रों की कुटियों में, मछुओं के घरों में, छत्रों के अध्यन स्थानों में -सर्वत्र ही इन तत्वों की चर्चा होगी और ये काम मे लाये जायेंगे।" 
कठोपनिषद का आरंभ कितने मनोहर रीति से किया गया है ! उस छोटे से बालक नचिकेता के हृदय में श्रद्धा का अविर्भाव, उसकी यमदर्शन की अभिलाषा और और सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो यह है कि यम स्वयं उसे जीवन और मृत्यु का महान पाठ पढ़ा रहे हैं। और वह बालक उनसे क्या जानना चाहता है ? -मृत्यु का रहस्य। " ५/२२४
" ऐसा दृढ़ संकल्प हरेक भारतीय बालक को करना चाहिए।  मैं चाहता हूँ कि तूँ कठोपनिषद को कंठस्थ कर ले ! उपनिषदों में ऐसा सुन्दर ग्रन्थ और कोई नहीं है। नचिकेता के समान श्रद्धा, साहस, विवेक और वैराग्य अपने जीवन में लाने की चेष्टा कर, केवल पढ़ने से क्या होगा ? "६/१५
 " इस जीवात्मा में अनन्त शक्ति अव्यक्त भाव से निहित है; चींटी से लेकर ऊँचे से ऊँचे सिद्ध पुरुष तक, सभी में वह आत्मा विराजमान है, अंतर केवल उसके प्रत्यक्षीकरण के भेद में  है। वरण भेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत -(कैवल्य पाद)-किसान जैसे खेतों की मेंड़ तोड़ देता है और एक खेत का पानी दुसरे खेत में चला जाता है। वैसे ही आत्मा भी आवरण टूटते ही प्रकट हो जाती है। 
परन्तु चाहे विकसित हुई हो या नहीं, वह शक्ति प्रत्येक जीव -ब्रह्मा से लेकर घास तक में -विद्द्यमान है। इसीलिये आत्मानुभूति करने का एक अवसर सभी को मिलता है, सभी ब्रह्म जो हैं।  इस शक्ति को सर्वत्र जा जाकर जगाना होगा। " ६/३१२  
स्वामीजी कहते हैं --  "क्षीणाः स्म दीनाः सकरुणा जल्पन्ति मूढ़ा जना (जो हिप्नोटाइज्ड स्टेट ऑफ़ माइंड में हैं) -जो लोग देह को ही आत्मा मानते हैं, वे ही मिमियाते हुए करुण कण्ठ से कहते हैं --हम क्षीण हैं, हम दीन हैं, और यही नास्तिकता है! प्राप्ता:स्म वीरा गतभया अभयं प्रतिष्ठां यदा--जब हमलोग अभयपद (डी-हिप्नोटाइज्ड स्टेट ऑफ़ माइंड) को प्राप्त हो चुके हों; तब हमलोग अभिः (भयरहित) और वीर (क्षात्रवीर्य और ब्रह्मतेज से सम्पन्न) क्यों न हों?--रामकृष्णदासा वयम्-यही आस्तिकता है ! त्यागी हुए बिना (५ अभ्यास किये बिना) तेजस्विता नहीं आने की ! कार्य आरम्भ कर दो। "त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः — एकमात्र त्याग के द्वारा ही कुछ चुने हुए लोग  -'रेयर वन्स'- अमृतत्व की प्राप्ति कर लेते हैं! [ 'रेयर वन्स'- जो नियमित रूप से  महामण्डल द्वारा निर्देशित ५ अभ्यास करते हुए इस 'BE AND MAKE' आन्दोलन से जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त किये  हैं, वे ) अमृतत्व प्राप्त कर लेते हैं । थ्रू रिनन्सीऐशन अलोन सम (रेयर वन्स) अटेंड इमॉर्टैलिटी.] बुजदिली करोगे, तो हमेशा पिसते रहोगे ! आत्मा में भी कहीं लिंग भेद है ? स्त्री और पुरुष का भाव दूर करो, सब आत्मा हैं। शरीराभिमान छोड़ कर खड़े हो जाओ। छाती पर हाथ रखकर कहो --इट इज, इट इज -"अस्ति अस्ति",नास्ति नास्ति करके तो देश गया१! "सोऽहं सोऽहं,"चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं"।  हर एक आत्मा में अनन्त शक्ति है। अरे, नहीं नहीं करके क्या तुम क्या कुत्ता-बिल्ली हो जाओगे? नहीं है ? क्या नहीं है ? किसके भीतर नहीं है ? नहीं नहीं सुनने पर मेरे सिर पर वज्रपात होता है। यह जो दीन -हीन भाव है, यह एक बीमारी है -क्या यही दीनता है ?-यह झूठी विनयशीलता है, गुप्त अहंकार है।"न लिङ्गम् धर्मकारणं, समता सर्वभूतेषु एतन्मुक्तस्य लक्षणम्—'बाहरी चिन्ह धारण कर लेना धार्मिक होना नहीं है । सभी के प्रति साम्यभाव रखना ही मुक्त पुरुषों का लक्षण है।" निर्गच्छति जगज्जालात् पिञ्जरादिव केशरी—He frees himself from the meshes of this world as a lion from its cage!"  "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः" दुर्बल मनुष्य इस आत्मा को प्राप्त नहीं कर सकता। उद्धरेदात्मनात्मानम्- अपने ही सहारे अपना उद्धार करना पड़ेगा। कुर्मस्तारकचर्वणं- हम तारों को अपने दाँतों से पीस सकते हैं,त्रिभुवनमुत्पाटयामो बलात्,-तीनों लोकों को बलपूर्वक उखाड़ सकते हैं! किं भो न विजानास्यस्मान् रामकृष्णदासा वयम्— हमें नहीं जानते ? हम आधुनिक युग में ब्रह्म के अवतार परमहंस श्रीरामकृष्ण के दास के दास के दास हैं ।   (पत्रावली/२५ सितंबर/ १८९४)]

June 26, 1895.

" Our best work is done, our greatest influence is exerted, when we are without thought of self. All great geniuses know this. Let us open ourselves to the one Divine Actor, and let Him act, and do nothing ourselves."

" जब हमारा 'अहंकर्ता -भाव ' (Apparent I-काचा आमि, तुच्छ अहं -आदम और हव्वा जैसा तादात्म्य) नहीं रहता, तभी हम अपना सर्वोत्तम कार्य कर सकते हैं, दूसरों को सर्वाधिक प्रभावित कर पाते हैं। सभी महान विवेकी (प्रतिभाशाली -genius) व्यक्ति इस बात को जानते हैं। ह्रदय में पहले से विद्यमान उस 'दिव्य-कर्ता ' (Real I-Divine Actor-पुरुषोत्तम) के प्रति अपना ह्रदय खोल दो, तुम स्वयं कुछ भी करने मत जाओ।" 

["O Arjuna! I have no duty in the whole world", says Krishna. Be perfectly resigned, perfectly unconcerned; then alone can you do any true work. No eyes can see the real forces, we can only see the results. Put out self, lose it, forget it; just let God work, it is His business. We have nothing to do but stand aside and let God work. The more we go away, the more God comes in. Get rid of the little "I", and let only the great "I" live. " (Volume 7, Inspired Talks/page-14) 

 श्री कृष्ण गीता में कहते हैं - 'हे अर्जुन , त्रिलोक में मेरे लिए कर्तव्य नामक कुछ भी नहीं है। ' उनके ऊपर सम्पूर्णतया निर्भर रहो, सम्पूर्ण रूप से अनासक्त होओ, ऐसा होने पर ही तुम्हारे द्वारा कुछ यथार्थ कार्य हो सकता है। जिस शक्ति के द्वारा ये सभी कार्य होते हैं, उसे हम देख नहीं पाते, हम केवल उसका फलमात्र देख पाते हैं। 'अहंकर्ता -भाव' को निकाल डालो, उसे भूल जाओ; अपने द्वारा ईश्वर (आत्मा , भगवान, ब्रह्म) को कार्य करने दो - यह उन्हींका कार्य है, उन्हें करने दो।]

 हमें और कुछ नहीं करना होगा -केवल स्वयं हटकर उन्हें काम करने देना होगा। हम जितना दूर हटते जायेंगे , ईश्वर उतना ही हमारे भीतर से अभिव्यक्त होगा। 'व्यावहारिक अहं ' (Apparent I-काचा आमि, तुच्छ अहं) से ऊपर उठ जाओ -केवल 'वास्तविक अहं' (Real I-पाका आमि,आत्मा, प्रबुद्ध -विवेकी विवेकानन्द ,सच्चिदानन्द, प्रबुद्ध-'महत अहं') को रहने दो। हम अभी जो कुछ हैं, वह सब अपने चिंतन का ही फल है। इसलिए तुम क्या चिंतन करते हो , इस विषय में विशेष ध्यान रखो। [('जीव' अपने मित्र -शत्रु को ब्रह्ममैव इदं सर्वं, आत्मवै इदं सर्वं ? अपने और मेरे- बारे -जगत और ईश्वर में अद्वैत -अभेद देखते हो या नहीं इस पर ध्यान रखो !हम जो कुछ चिंतन करते हैं , उसमें हमारे चरित्र की छाप लग जाती है। [जगत को अद्वैत दृष्टि या ज्ञानमयी दृष्टि से देखकर M/F के प्रति सियाराम मय व्यवहार है या नहीं ,हमारे व्यवहार पर हमारे चरित्र की छाप लग जाती है।

[The begging monks (or A Householder Leader of a social service -organization) who carry religion to every man's door; If they should eat of the tree of knowledge, they would become egoists, and all the good they do would fly awayThey are all principle, no personality.

  गृहत्यागी संन्यासी हों या किसी वानप्रस्थी सामाजिक सेवा संगठन के गृहस्थ नेता हों जो कोई भी व्यक्ति 'प्रबुद्ध भारत अभियान' के वैसे कर्मी [C-IN-C /शिक्षक] होंगे जो द्वार -द्वार पर धर्म (मनुष्य -निर्माणकारी शिक्षा) का सन्देश लेकर जाते हैं, यदि वे यदि ऐहिक (आदम और हव्वा जैसा) ज्ञानरूपी वृक्ष का फल खायेंगे तो उनमें भी दैहिक 'अहंकर्ता-भाव' चला आएगा, फिर वे जो कुछ भी लोक-कल्याण करेंगे -सब नष्ट हो जायेगा। जब हम 'मैं मैं' कहते हैं, तब हम मूर्ख से बन जाते हैं। पहले अपने को जीत लो (3K से अनासक्त हो जाओ), फिर सम्पूर्ण जगत तुम्हारे पैरों के नीचे आ जायेगा। (देववाणी -26 जून , 1895/ खंड ७/२२-२३) 

They never say "me" and "mine"; they are only blessed in being instruments. Such men are the makers of Christs and Buddhas, ever living fully identified with God, ideal existences, asking nothing, and not consciously doing anything. They are the real movers, the Jivanmuktas, (Literally, free even while living.) absolutely selfless, the little personality entirely blown away, ambition non-existent. They are all principle, no personality.

मानवजाति के मार्गदर्शक नेता कभी भी 'मैं , मेरा ' नहीं कहते। वे अपने को ईश्वर का यंत्र समझकर ही अपने को धन्य मानते हैं। ऐसे व्यक्ति ईसा और बुद्ध आदि के निर्माता हैं। वे सदैव ईश्वर (आत्मा) के साथ सम्पूर्ण भाव से तादाम्य लाभ करके एक आदर्श जगत में निवास करते हैं। वे कुछ नहीं चाहते और अहंकर्ता -भाव से कुछ भी नहीं करते। वे ही वस्तुतः प्रेरकस्वरूप हैं - वे जीवनमुक्त एवं बिल्कुल अहंशून्य हैं। उनका क्षुद्र अहंकार पूर्ण रूप से नष्ट हो गया है , उन्हें महत्वाकांक्षा बिल्कुल नहीं है। उनका व्यक्तित्व पूर्ण रूप से लुप्त हो गया है , वे निराकार तत्वस्वरूप हैं। (देववाणी ७/२४)  

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अर्थात योगशास्त्र के मतानुसार 'प्रत्येक आत्मा (जीव) अव्यक्त ब्रह्म है'![अर्थात आत्मा (Heart अपरिवर्तनीय ,अविनाशी चेतना) अज्ञान के कारण (परमेश शक्ति माया -अविद्या -अस्मिता पंचक्लेश के कारण) प्रकृति के साथ (अर्थात परिवर्तनशील नश्वर -देह 'Hand' और 'Head' के साथ) संयुक्त हो गयी है। ]  

अर्थात योगशास्त्र के मतानुसार 'प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है'! अर्थात 'दिव्यता' मनुष्य मात्र में छिपी हुई है, अन्तर्निहित है। जीवमात्र में विशेष रूप 'मनुष्य' (विवेकी) में 'दिव्यता' Divinity छिपी हुई है, अन्तर्निहित है।  किन्तु 'अज्ञान' के कारण (यानि अविद्या >अस्मिता,राग -द्वेष , अभिनिवेश पंचक्लेश के कारण) प्रत्येक जीव M/F 'आदम और हव्वा' प्रवृत्ति (Bundle Of habits) के सेव खायें कि नहीं ? 'Adam and Eve Syndrome : Should I eat an apple or not?' व्याधि लक्षण से  ग्रस्त हो गया है! इसलिए गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताये गए चार योगमार्ग - कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान, इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर उस  'M/F भाव, 'आदम और हव्वा मनोभाव' से छुटकारा पाना तथा  अपनी अंतर्निहित दिव्यता या -उस "Inherent Divinity" को अपने चरित्र में अभिव्यक्त करना ही मनुष्य-जीवन का चरम लक्ष्य है। यानि 'मैं', 'तुम' और 'वह'  या जीव (M/F), जगत और ईश्वर में (3H में) अद्वैत का (Oneness) का अनुभव करना - यही यही सारे धर्मों का /(शिक्षा का) एकमात्र लक्ष्य है।]



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