कुल पेज दृश्य

मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

⚜️️🔱मनुष्य जीवन का गौण उद्देश्य क्या है एवं मनुष्य जीवन चरम उद्देश्य क्या है ?⚜️️🔱 "He who controls mind controls matter also ! ⚜️️🔱

 ⚜️️🔱मनुष्य जीवन का गौण उद्देश्य क्या है एवं मनुष्य जीवन चरम उद्देश्य क्या है ?⚜️️🔱 

“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत” Arise, awake, and stop not till the Goal is reached ! उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति ना हो जाए !

मैं कौन हूँ ? यह जानना ही मनुष्य जीवन का वास्तविक लक्ष्य है ! 

 साधारण मनुष्य के जीवन का गौण लक्ष्य कई हो सकते हैं , होना भी चाहिए और पुरुषार्थ करके उन्हें प्राप्त भी करना चाहिए।  लेकिन 'Indian philosophy' के मतानुसार विवेकी मनुष्य के जीवन का चरम-लक्ष्य है अपने सत्य-स्वरुप से - 'Real I' (आत्मा या ईश्वर) के साथ जुड़ जाना।


  संसार के सम्पूर्ण दुःखों के मूल में सुख की इच्छा है । बिना सुखेच्छा के कोई दुःख होता ही नहीं । ऐसा होना चाहिये और ऐसा नहीं होना चाहिये–इस इच्छा में ही सम्पूर्ण दुःख हैं । 

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।

                        तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र   न   मुह्यति ॥   (२/१३)

         ‘देहधारीके इस मनुष्यशरीरमें जैसे बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, ऐसे ही देहान्तरकी प्राप्ति होती है । उस विषयमें धीर मनुष्य मोहित नहीं होता ।’

 शरीरमें अध्यास अर्थात् मैंपन और मेरापन होनेसे ही जीनेकी इच्छा और मृत्युका भय होता है । कारण कि शरीर तो नाशवान् है, पर आत्मा अमर (अविनाशी) है और इसका विनाश कोई कर ही नहीं सकता–‘विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति’ (गीता २/१७), ‘न हन्यते हन्यमाने शरीरे’ (गीता २/२०) ।

राम मरे तो मैं मरुँ , नहिं तो मरे बलाय। 

अविनाशी का बालका , मरे न मारा जाय।।

  शरीर प्रतिक्षण मरता है, एक क्षण भी टिकता नहीं और आत्मा नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहता है, एक क्षण भी बदलता नहीं । अतः जीनेकी इच्छा और मृत्युका भय न हो तो शरीरको होता है और न आत्माको होता है; प्रत्युत उसको होता है, जिसने स्वयं अविनाशी होते हुए भी नाशवान् शरीरको अपना स्वरूप (मैं और मेरा) मान लिया है । शरीर को मैं और मेरा मानना मूढ़मति का अविवेक है, प्रकृतिजान्गुणान्’ (गीता १३/२१) । पुरुष प्रकृतिमें स्थित होता है–अविवेक से । स्वरूप को शरीर और शरीरको अपना स्वरूप मानना अविवेक है । यह अविवेक ही दुःखका कारण है । तात्पर्य है कि मनुष्य नाशवान्‌को रखना चाहता है और अविनाशीको जानना नहीं चाहता, इस कारण दुःख होता है । अगर वह नाशवान्‌को अपना स्वरूप न समझे और स्वरूपको ठीक जान जाय तो फिर दुःख नहीं होगा । 

इस प्रकार हिन्दू वैदिक सनातन धर्म के शास्त्र और स्वामी विवेकानन्द जैसे सद्गुरु हमारे शरीर को नहीं बदलते, बल्कि 'जीव, जगत और ईश्वर' को देखने के प्रति हमारी बुद्धि, मति, सोंच या दृष्टि को बदलने की शिक्षा देते हैं। स्वयं शंकराचार्यजी कहते हैं -"दृष्टिं ज्ञानमयीं  कृत्वा पश्येद्  ब्रह्ममयं जगत् " अर्थात विवेकी मनुष्य को अपनी 'बुद्धि' को व्यावहारिक मैं (Apparent I) के साथ नहीं जोड़कर, (परिवर्तनशील होने के कारण नश्वर देह, मन और इन्द्रियों से न जोड़कर), बुद्धि से भी श्रेष्ठ और हृदय में ही विद्यमान आत्मा (ईश्वर, ब्रह्म या भगवान) से, अपने अविनाशी 'सत्य-स्वरुप'   (Real I) से जोड़ना चाहिए। और इस प्रकार अपनी बुद्धि (मति या 'दृष्टि') को ज्ञानमयी बनाकर जगत को (अपना -पराया नहीं) ब्रह्ममय देखना चाहिए। क्योंकि हमारे शास्त्रों (अष्टावक्र गीता) में कहा गया है -

मुक्ताभिमानी मुक्तो हि, बद्धो बद्धाभिमान्यपि।

किवदन्तीह सत्येयं, या मतिः सा गतिर्भवेत्॥१-११॥ 

स्वयं को मुक्त (अविनाशी आत्मा) मानने वाला मुक्त (आत्मा , ईश्वर, ब्रह्म या भगवान) ही है। और स्वयं को बद्ध (पशु -नश्वर देह M/F) मानने वाला बंधा हुआ ही है, यह कहावत सत्य ही है कि जैसी 'मति' वैसी गति , (यानि जिसकी मति, बुद्धि या दृष्टि जैसी होती है) उसकी वैसी ही गति होती है॥११॥  

"तुम्हारे पास तीन चीजें '3H'  हैं- 1. शरीर, 2. मन 3. आत्मा! आत्मा इन्द्रियातीत है। मन (मिथ्या अहं) जन्म और मृत्यु का पात्र है और वही दशा शरीर की है। तुम वही (अजर-अमर-अविनाशी) आत्मा हो, पर बहुधा तुम सोचते हो की तुम (नश्वर) शरीर हो। 

जब मनुष्य कहता है- 'मैं यहाँ हूँ',  तो उस समय वह शरीर की बात सोचता है। फिर एक दूसरा क्षण आता है , जब तुम उच्चतम भूमिका में होते हो, तब तुम यह नहीं कहते - " मैं यहाँ हूँ ! (अभी मजा चखाता हूँ!)" किन्तु जब कोई तुम्हें गाली देता है, या तुम्हारा अपमान करता है, और तुम भीतर से क्रोधित नहीं हो जाते, तब तुम आत्मा हो जब मैं सोचता हूँ कि मैं मन हूँ , मैं उस अनन्त अग्नि का एक स्फुलिंग हूँ , जो तुम हो। जब मैं यह अनुभव करता हूँ कि मैं आत्मा हूँ , तब तुम और मैं एक हूँ -यह एक प्रभु के भक्त (हनुमानजी) का कथन है। क्या 'मन' (बुद्धि) आत्मा से भी श्रेष्ठ है या परे है ? " (खंड 10. पृष्ठ 40) 

सिद्धान्त है कि स्थूल से अधिक शक्ति सूक्ष्म में होती है। मनुष्य की 5 ज्ञाननेद्रिय , और 5 कर्मेन्द्रिय होती हैं , और इन्द्रियाँ शरीर से अधिक सूक्ष्म होने के कारण, शरीर से अधिक बलशाली हैं। इन्द्रियों से भी सूक्ष्म है मन। इसलिए मन इन्द्रियों से अधिक बलशाली है। मन से भी सूक्ष्म है -बुद्धि।  इसलिए बुद्धि मन से अधिक शक्तिशाली। बुद्धि भी परिवर्तनशील है , इसलिए नश्वर है।  इस बुद्धि से भी सूक्ष्म है आत्मा। आत्मा अपरिवर्तनशील है और बुद्धि का भी साक्षी है। इसलिए आत्मा बुद्धि से श्रेष्ठ है , और अविनाशी है। गीता में और कठोपनिषद शरीर के तुलना रथ से गयी है। शरीर रथ है , इन्द्रियाँ घोड़े हैं , मन लगाम है , बुद्धि सारथि है और मन लगाम है। आत्मा रथी है। यदि सारथि मूढ़बुद्धि (मूढ़मति) हो और आत्मा (ईश्वर, भगवान या इष्टदेव, ब्रह्म या सच्चिदानन्द) को धोखा देकर मन के लगाम को ढीला छोड़कर, इन्द्रियों और शरीर से जुड़ी जाएगी ,तो रथी आत्मा अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पायेगा। और जैसी मती वैसी गति होती है। इसलिए हनुमानजी कहते हैं -

देहबुद्धया तु दासोऽहं  जीवबुद्धया त्वदंशक। 

आत्मबुद्धया  त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः ॥ 

देह-बुद्धि से तो मैं आपका दास हूँ। जीव-बुद्धि से (जब मैं अपने को M/F या जीव को दृष्टि से देखता हूँ) तो आप पूर्ण हैं और मैं आपका अंश ही हूँ ! और आत्म-बुद्धि से में वही हूँ जो आप हैं, यही मेरी निश्चित मति है॥ यह प्रभु श्रीराम के महान भक्त हनुमानजी का कथन है।  ॐ !]

बुद्धि और विवेक में क्या अन्तर है ?  

मनुष्य के तीन प्रमुख अवयव हैं- 3H (Hand) शरीर, (Head) मन और (Heart-आत्मा या ) ह्रदय। स्थूल शरीर और मन (सूक्ष्मशरीर-अन्तःकरण -चित्त , मन , अहंकार और बुद्धि) निरंतर परिवर्तनशील होने से जड़ है,  निरंतर बदलता रहता है, इसलिए नश्वर है । लेकिन नित्य-अनित्य विवेक यदि एक बार जाग्रत हो जाये, तो फिर वह कभी नहीं बदलता। मनुष्य की विशेषता (विशेष योग्यता) यही है कि, वह किसी शिक्षा के द्वारा आत्मविश्वास को जागृत करके अपने सोये हुए विवेक को जाग्रत कर सकता है। तथा गुरु-शिष्य परम्परा में (या Be and Make - लीडरशिप ट्रेनिंग द्वारा)  श्रेय-प्रेय विवेक में निर्णय मूढ़बुद्धि (मूढ़मति) क्या लेगी ? और शुद्धबुद्धि -आत्मा (ईश्वर , भगवान या इष्टदेव से सम्बन्ध बनाने या जुड़ने वाली मति या दृष्टि) क्या निर्णय लेगी?  और नित्य-अनित्य विवेक का श्रवण, मनन निदिध्यासन करने के बाद समझ में आता है  हमारे दो पहचान हैं।  हमारा जो वास्तविक मैं (Real I, सत्य-स्वरुप आत्मा , ब्रह्म) अविनाशी है, और प्रातिभासिक मैं (Apparent I M/F देह ) परिवर्तनशील, नश्वर होने से मिथ्या है , और जीव भी ब्रह्म ही है, दूसरा नहीं ! 

इसलिए सनातन हिन्दू वैदिक धर्म के समस्त ग्रंथ , गीता , शास्त्र और सद्गुरु क्या करते हैं? शास्त्र और सद्गुरु अर्थात शंकराचार्यजी जैसे परमज्ञानी, ब्रह्मविद सद्गुरु "जीव, जगत और ईश्वर " के एकत्व या अद्वैत बारे में हमारी दृष्टि (मति, बुद्धि या सोंच) को बदलने के लिए हमें यह शिक्षा देते हैं कि - 

श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रंथ कोटिभिः।

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।। 

जो अनेक ग्रंथों में लिखा है । उसे मैं आधे श्लोक में यहां कह रहा हूं - ब्रह्म सत्य है । जगत मिथ्या है । तथा जीव ब्रह्म ही है । कोई अन्य नहीं । 

वर्तमान युग के सर्वश्रेष्ठ अद्वैताचार्य स्वामी विवेकानन्द, आदि गुरु शंकराचार्यजी के इसी अद्वैत वेदान्त को  'व्यावहारिक वेदान्त' के रूप में ढालकर यह शिक्षा देते हैं कि - " योगशास्त्र के मतानुसार, आत्मा 'अज्ञान' (अविद्या-अस्मिता) के कारण प्रकृति के साथ संयुक्त हो गयी है। इस 'प्रकृति' के पंजे से छुटकारा पाना ही हमारा उद्देश्य है। यही सारे धर्मों का एकमात्र लक्ष्य है। प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है! बाह्य एवं अंतःप्रकृति को वशीभूत करके आत्मा के इस अंतर्निहित ब्रह्मत्व (Inherent Divinity) को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है। कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान, इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर अपने ब्रह्मभाव को व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ। बस, यही धर्म का सर्वस्व है। मत, अनुष्ठान – पद्धति, शास्त्र, मन्दिर अथवा अन्य बाह्य क्रिया कलाप तो उसके गौण ब्यौरे मात्र है।" 

जब कोई सद्गुरु कृपा करके भगवान को पुकारने का नाम (महावाक्य) तथा उन्हें अपने ह्रदय में ही देखने की पद्धति, सिखला देते हैं, तब सद्गुरु की कृपा से यह अनुभव होता है, यह समझ में आता है कि " सचमुच ! सृष्टि, स्थिति और प्रलय करने वाली माँ काली (निर्गुण ब्रह्म की शक्ति) ही मनुष्य देह धारण करके भी सगुण प्रभु श्रीराम, श्रीकृष्ण, भगवान बुद्ध, ईसा और श्रीरामकृष्ण  के रूप में अवतार लेती हैं! [ प्राणियों की उन्नति और परम कल्याण का जो साधन है 'वर्णाश्रम धर्म ' है  उस धर्म की जब-जब हानि होती है, और अधर्म का अभ्युत्थान अर्थात् उन्नति होती है, तब-तब ही मैं माया से अपने स्वरूप को रचता हूँ। 'यदा यदा हि धर्मस्य' का अर्थ हुआ की निर्गुण ब्रह्म के सगुण ईश्वर के रूप अवतार लेती हैं!]  

एक बार अमेरिका में स्वामी विवेकानन्द से पूछा गया कि - " ईसा का पुनरागमन कब होगा ?" उत्तर में उन्होंने कहा " मैं ऐसी बातों पर विशेष ध्यान नहीं देता। मुझे तो (सनातन) सिद्धान्तों -का विवेचन करना है।  मुझे तो केवल इसी बात की शिक्षा देनी है कि - ईश्वर बार बार आता है वह भारत में राम , कृष्ण और बुद्ध के रूप में आया था और पुनः आयेगा ! (नहीं ,श्रीरामकृष्ण के रूप में अवतीर्ण हो चुका है।) यह देखा जा सकता है कि प्रत्येक 500 वर्षों के पश्चात दुनिया नीचे जाती है, (धर्म का पतन होता है), और एक महान आध्यात्मिक लहर आती है और उस लहर के शिखर पर एक 'ईसा' होता है। 

समस्त संसार में एक बड़ा परिवर्तन होनेवाला है और यह एक चक्र जैसा है। लोग अनुभव करते हैं कि जीवन पकड़ से बाहर होता जा रहा है। वे किधर जायेंगे ? वे किधर जायेंगे ? नीचे या ऊपर ? निस्सन्देह, ऊपर। नीचे कैसे ? खाई में कूद पड़ो। उसे अपने शरीर से , जीवन से पाट दो। जब तक तुम जीवित हो , दुनिया को नीचे क्यों जाने दो ? (१०/४०)    

" अभिव्यक्त प्राणियों में बहुत अन्तर होता है। अभिव्यक्त प्राणी के रूप में तुम ईसा कभी नहीं हो सकते। मिट्टी से एक मिट्टी का हाथी बना लो , उसी मिट्टी से एक मिट्टी का चूहा बना लो। उन्हें पानी में डाल दो - वे एक बन जाते हैं। मिट्टी के रूप में वे निरन्तर एक हैं, गढ़ी हुई वस्तुओं के रूप में वे निरन्तर भिन्न हैं। ब्रह्म (आत्मा) ईश्वर तथा मनुष्य (चित्त) दोनों का उपादान है। पूर्ण सर्वव्यापी सत्ता के रूप में हम सब एक हैं , परन्तु वैयक्तिक प्राणियों के रूप में ईश्वर अनन्त स्वामी हैं और हम शाश्वत सेवक हैं।  [ दूसरे शब्दों में आत्मा, ब्रह्म या उनकी माया शक्ति ही ईश्वर और मनुष्य (स्थूल और सूक्ष्म शरीर)  दोनों का कारण-शरीर है !!]  

[When Will Christ Come Again? I never take much notice of these things. I have come to deal with principles. I have only to preach that God comes again and again, and that He came in India as Krishna, Rama, and Buddha, and that He will come again. It can almost be demonstrated that after each 500 years the world sinks, and a tremendous spiritual wave comes, and on the top of the wave is a Christ.

There is a great change now coming all over the world, and this is a cycle. Men are finding that they are losing hold of life; which way will they turn, down or up? Up, certainly. How can it be down? Plunge into the breach; fill up the breach with your body, your life. How should you allow the world to go down when you are living? [Volume 8, Notes Of Class Talks And Lectures/ 180 -181]}  (There is much difference in manifested beings. As a manifested being you will never be Christ. Out of clay, manufacture a clay elephant, out of the same clay, manufacture a clay mouse. Soak them in water, they become one. As clay, they are eternally one; as fashioned things, they are eternally different. The Absolute is the material of both God and man. As Absolute, Omnipresent Being, we are all one; and as personal beings, God is the eternal master, and we are the eternal servants.)      

   "When I think I am the mind, I am one spark of that eternal fire which Thou art; and when I feel that I am the spirit, Thou and I are one"-- so says a devotee to the Lord. Is the mind in advance of the spirit? (Volume 8- page 181)  

देहबुद्धया तु दासोऽहं  जीवबुद्धया त्वदंशक

आत्मबुद्धया  त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः ॥ 

देह-बुद्धि से (मूढ़बुद्धि या सम्मोहित बुद्धि) तो मैं दास हूँ, जीव-बुद्धि से आपका अंश ही हूँ और आत्म-बुद्धि से में वही हूँ जो आप हैं, यही मेरी निश्चित मति है॥ यह प्रभु श्रीराम के महान भक्त हनुमानजी का कथन है।  ॐ !  

और अपने 'Real I' सत्यस्वरुप, आत्मा या ईश्वर से जुड़ जाने की पद्धति को ही गीता में योग कहा गया है। श्रीमद्भवत गीता में कुल 18 अध्याय हैं  और वहां 700 श्लोकों में मूढ़ बुद्धि (सम्मोहित बुद्धि- जो अपने को M/F मानकर नश्वर शरीर आदम और हव्वा समझ रही है, उस सम्मोहित बुद्धि) को शुद्धबुद्धि बनाकर अविनाशी आत्मा से सम्बन्ध बनाने, या बुद्धि को आत्मा से जोड़ने  की पद्धति को 18 प्रकार के योग का नाम दिया गया है। 

स्वामी विवेकानन्द ने भगवत गीता में वर्णित 18 प्रकार के योग को 4 योगों में विभक्त करके उन्हें "कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान" योग नाम देकर, उन सभी योग-मार्गों पर अपनी व्याख्या लिखी हैं। 4 योगों पर अपनी व्याख्या लिखने के बाद गीता, उपनिषदों और समस्त वैदिक सनातन धर्म में समाहित उपदेशों के निचोड़ को प्रस्तुत करते हुए स्वामी विवेकानन्द  "मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य तथा उसे प्राप्त करने के उपाय " पर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हुए लिखते हैं-  (https://patanjaliyogasutra.in/sadhana-pada-2-25/) 

तदभावात् संयोगाभावो हानं तद् दृशेः कैवल्यम्।। 

25. There being absence of that (ignorance) there is absence of junction, which is the thing-to-be avoided; that is the independence of the seer.

According to Yoga philosophy, it is through ignorance that the soul has been joined with nature. The aim is to get rid of nature's control over us. That is the goal of all religions. Each soul is potentially divine. The goal is to manifest this Divinity within, by controlling nature, external and internal. Do this either by work, or worship, or psychic control, or philosophy — by one or more or all of these — and be free. This is the whole of religion. Doctrines, or dogmas, or rituals, or books, or temples, or forms, are but secondary details. The Yogi tries to reach this goal through psychic control. Until we can free ourselves from nature, we are slaves; as she dictates so we must go. The Yogi claims that he who controls mind controls matter also. The internal nature is much higher than the external and much more difficult to grapple with, much more difficult to control. Therefore he who has conquered the internal nature controls the whole universe; it becomes his servant. Raja-Yoga propounds the methods of gaining this control. Forces higher than we know in physical nature will have to be subdued. This body is just the external crust of the mind. They are not two different things; they are just as the oyster and its shell. They are but two aspects of one thing; the internal substance of the oyster takes up matter from outside, and manufactures the shell. In the same way the internal fine forces which are called mind take up gross matter from outside, and from that manufacture this external shell, the body. If, then, we have control of the internal, it is very easy to have control of the external. Then again, these forces are not different. It is not that some forces are physical, and some mental; the physical forces are but the gross manifestations of the fine forces, just as the physical world is but the gross manifestation of the fine world.]

भवरोग क्या है ?भवरोग की व्याख्या करते हुए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं -

[तत् - उस (अविद्या के), अभावत् - अभाव से,  संयोग - आत्मा का (प्रकृति) मूढ़ बुद्धि के साथ संयोग का अभावः -मूढ़बुद्धि यानि वह बुद्धि जो M/F स्थूल शरीर, इन्द्रिय, मन (Apparent I) को, देहाध्यास को मैं समझती थी और भ्रमित बुद्धि थी उसका अभाव (हो जाता है, यही), हानम् - हान (अज्ञान का परित्याग है, और) तत् - वही, दृशे: - द्रष्टा (चेतन आत्मा का) , कैवल्यम् - 'कैवल्य' अर्थात् मोक्ष है ।] 

तदभावात् संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम् ॥२५॥

(पतंजलि योगसूत्र -साधनपाद-25 )

" योगशास्त्र के मतानुसार,आत्मा 'अज्ञान' के कारण प्रकृति के साथ संयुक्त हो गयी है। इस 'प्रकृति' के पंजे से छुटकारा पाना ही हमारा उद्देश्य है। यही सारे धर्मों का एकमात्र लक्ष्य है। उस अज्ञान का अभाव (अविद्या का अभाव) होते ही, पुरुष-प्रकृति के संयोग का अभाव हो जाता है।(अर्थात आत्मा का मूढ़ बुद्धि के साथ संयोग 'junction-गाँठ, चिज्जड़ग्रंथि का अभाव) हो जाता है, यही 'हान' यानि अज्ञान (अविद्या) का परित्याग है, और वही द्रष्टा चेतन आत्मा (साक्षी) का 'कैवल्य' अर्थात् मोक्ष है ।

⚜️️🔱"योगशास्त्र के मतानुसार,आत्मा 'अज्ञान' के कारण प्रकृति के साथ संयुक्त हो गयी है।" 
[ "According to Yoga philosophy, it is through ignorance that the soul has been joined with nature.
अर्थात योगशास्त्र के मतानुसार अर्थात हिन्दू वैदिक सनातन धर्म या उपनिषदों के ऋषियों के मतानुसार हमारी अपरिवर्तनशील, अविनाशी, कूटस्थ, यथार्थ सत्ता-आत्मा (Real I, एकमेवा-द्वितीय ब्रह्म, ईश्वर या राम') ने 'अज्ञान' के कारण (अविद्या, अस्मिता,राग-द्वेष,अभिनिवेश के कारण या 'महाअद्भुतं अनिर्वचनीयं माया मरीचिका'-भ्रम के कारण) या जन्म-जन्म से चले आ रहे देहध्यास के कारण अपना सम्बन्ध परिवर्तनशील नश्वर शरीर (Apparent I) या प्रकृति के साथ बना लिया है, और यही है भवरोग।]
⚜️️🔱 इस 'प्रकृति' (Apparent I) के पंजे से छुटकारा पाना ही हमारा उद्देश्य है।  
"The aim is to get rid of nature's control over us." 
[यानि 3H में सर्वश्रेष्ठ होने के बावजूद अज्ञान के कारण (नादानी के कारण) आत्मा ने अपना सम्बन्ध खुद को (Apparent I' M/F) 'आदम और हव्वा'-समझने वाली सम्मोहित या मूढ़-बुद्धि  के साथ बना लिया है। the soul has been joined with nature ज्ञानस्वरूप अविनाशी आत्मा' ने अज्ञान (माया-मरीचिका) के कारण स्वयं को नश्वर देह (M/F) समझने वाली या 'सम्मोहित बुद्धि' के साथ 'Love Marriage' कर लिया है ! उस देहभाव (M/F) से सम्मोहित बुद्धि या मूढ़बुद्धि के साथ, Living Relation में रह रहे, आत्मा का सम्बन्ध -विच्छेद करने या छुटकारा पाने के लिए निरंतर नित्यानित्य विवेक-प्रयोग करने की पद्धति सीखना और उसका लक्ष्य प्राप्त होने तक अध्यवसाय पूर्वक अभ्यास करते रहना ही हमारा मुख्य उद्देश्य है।          
⚜️️🔱यही सारे धर्मों का एकमात्र लक्ष्य है।      
"That is the goal of all religions." अर्थात  यही सारे धर्मो का (शास्त्रों का और गुरुओं का) यानि विवेकानन्द की मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा - 'Be and Make' तुम स्वयं 'विवेकी मनुष्य बनो और दूसरों को विवेकी मनुष्य' बनाने में सहायता करो में निहित 'चरैवेति, चरैवेति' अभियान का एकमात्र लक्ष्य है। 
⚜️️🔱 Conclusion :  तो निष्कर्ष क्या निकला ?   

" प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है! बाह्य एवं अंतःप्रकृति को वशीभूत करके आत्मा के इस ब्रह्मभाव को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है। कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान, इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर अपने ब्रह्मभाव को व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ। बस, यही धर्म का सर्वस्व है। मत, अनुष्ठान – पद्धति, शास्त्र, मन्दिर अथवा अन्य बाह्य क्रिया कलाप तो उसके गौण ब्यौरे मात्र है।

("Each soul is potentially divine. The goal is to manifest this Divinity within, by controlling nature, external and internal. Do this either by work, or worship, or psychic control, or philosophy — by one or more or all of these — and be free. This is the whole of religion. Doctrines, or dogmas, or rituals, or books, or temples, or forms, are but secondary details.")

 योगी 'मनःसंयोग' (psychic control) के द्वारा इस चरम लक्ष्य में पहुँचने का प्रयत्न करते हैं। जब तक हम प्रकृति के हाथ से अपना (आत्मा का) उद्धार नहीं कर लेते तब तक हम गुलाम हैं ; प्रकृति जैसा कहती है, हम उसी प्रकार चलने को लाचार होते है। इसलिए जो अन्तःप्रकृति को वशीभूत कर सकते हैं (आत्मा की शक्ति से अन्तः प्रकृति मन और मूढ़बुद्धि को वशीभूत कर सकते हैं, सारा जगत (M/F देह-इन्द्रिय) उनके वशीभूत हो जाता है। वह उनका दास हो जाता है। राजयोग , प्रकृति को इस तरह वश में लाने का उपाय दिखला देता है। ....यह यह शरीर मन का एक बाहरी परत (crust छिलका) मात्र है शरीर और मन दो अलग अलग वस्तुएं नहीं हैं, वे तो सीप (oyster-घोंघा) और उसके खोल (shell) के समान हैं। वे एक ही वस्तु की दो विभिन्न अवस्थायें हैं। सीप के भीतर का जन्तु बाहर से नाना प्रकार के उपादान लेकर उस खोल को तैयार करता है। उसी प्रकार मन नामक यह आंतरिक सूक्ष्म -शक्ति समूह (अन्तःकरण) भी बाहर से स्थूल पंचभूत (आकाश,वायु , अग्नि, जल और पृथ्वी) को लेकर उससे इस शरीर रूपी ऊपरी खोल को तैयार कर रहा है। अतः हम यदि अन्तर्जगत पर विजय प्राप्त कर सकें, तो बाह्य जगत को जितना फिर बड़ा आसान हो जायेगा। फिर ये दो शक्तियाँ अलग अलग नहीं हैं !ऐसी बात नहीं है कि कुछ शक्तियाँ भौतिक हैं , और कुछ मानसिक। जैसे यह दृश्यमान भौतिक जगत सूक्ष्म जगत की स्थूल अभिव्यक्ति मात्र है, उसी प्रकार भौतिक शक्तियाँ भी सूक्ष्म शक्तियों की स्थूल अभिव्यक्ति मात्र है। 

[conclusion : निष्कर्ष पर आते हुए 'भारत के राष्ट्रीय युवा' -आदर्श, आधुनिक युग के सर्वश्रेष्ठ अद्वैताचार्यस्वामी विवेकानन्द कहते हैं - 

तात्पर्य यह हुआ कि  जिस प्रकार पदार्थ की तीन अवस्थायें होती हैं -बर्फ , पानी और भाफ , ठोस-द्रव और गैस। वैसे ही मनुष्य के तीन प्रमुख अवयव- '3H' के देह (Hand) , मन (Head) और आत्मा (Heart: समानुभूति या चेतना) को उलट कर समझें - तो आसानी से समझ सकते हैं कि मनुष्य का स्थूल शरीर, (Hand-M/F देह-इन्द्रियों) तथा मन (Head-सूक्ष्म शरीर, अन्तःकरण) भी आत्मा (Heart, ह्रदय -शुद्धबुद्धि, कारणशरीर) की स्थूल अभिव्यक्ति मात्र है जीव, जगत और आत्मा या मूढ़बुद्धि और शुद्धबुद्धि (नित्य-अनित्यविवेक-सम्पन्न बुद्धि) अलग -अलग नहीं हैं, एक ही बुद्धि की दो अवस्थायें  (E=Mc2हैं। If, then, we have control of the internal, it is very easy to have control of the external.]

स्वामीजी और ठाकुर दोनों अक्सर सिंह-शावक (आत्मा) के खुद को भेंड़ (नश्वर शरीर-Apparent I) समझने की मूढ़बुद्धि का उदाहरण देते थे। कि कैसे हमलोग सिंह-शावक होकर भी भेंड़ों की तरह घाँस चरते हैं , (अर्थात विवेकी मनुष्य होकर भी मूढ़बुद्धि की गुलामी करते हैंऔर बाघ से तो क्या गड़रिया से भी डरते हैं। 

विचार करके देखो प्यारे, जगत बना है मन से।  

जैसे शेर भेंड़ बन बैठो, भय मानत सिंघन से।।

यह मन (बुद्धि) ही देह बन गया है। और यम से (मृत्यु के भय से) डरता रहता है। ये 'शुद्ध बुद्धि'  बहुत दिनों से मन -इन्द्रियों के साथ रही। उनकी आदत इस बुद्धि में आ गयी। उसी तरह से सोंचती है। इन्द्रियों के द्वारा मिले दुःखों -सुखों से बुद्धि सम्मोहित है। प्रभावित है। कभी आत्मा के आनन्द को नहीं जानती। 

स्वामी विवेकानन्द अपने गुरुभाई स्वामी अखण्डानन्द को , 13 नवंबर, 1895 को लिखित एक पत्र में कहते हैं - " जबरदस्त उत्साह, अदम्य साहस , अद्भुत ऊर्जा , और सर्वोपरि गुरु (युवा आदर्श स्वामी विवेकानन्द) की आज्ञा का पालन यही वे गुण हैं, जो किसी व्यक्ति या राष्ट्र को महान बना सकते हैं !" (४/३६०)  

 " Great enterprise, boundless courage, tremendous energy, and, above all, perfect obedience — these are the only traits that lead to individual and national regeneration. " 

==============




कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें