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शनिवार, 4 जून 2016

" अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल सम्बन्धी ज्ञातव्य तथ्य" (1.)

 महामण्डल अस्तित्व में कैसे आया ? 
( How the Mahamandal came into being ?)
स्वाधीनता प्राप्ति के पूर्व आम जनता के मन में यह धारणा घर कर गई थी कि हमारा देश अभी,' दरिद्रता, अनाहार, अशिक्षा' आदि जिन समस्यायों से जूझ रहा है, उन सारी समस्याओं का मूल कारण केवल पराधीनता ही है। स्वाधीनता-संग्राम के सेनानी अपने प्राणों की आहुति इसीलिये दे रहे थे कि भारत जब अंग्रेजों कि दासता से मुक्त हो कर राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर लेगा, वैसे ही यहाँ कि सारी समस्याएँ मिट जाएँगी और देश में समृद्धि का ज्वार आ जाएगा ! यही सोचकर सम्पूर्ण भारतवर्ष  'एक मन' होकर 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' -आंदोलन में कूद गया और १९४७ में अंग्रेजों को यहाँ से भागना पड़ा।         
परन्तु स्वाधीनता प्राप्ति के बाद, एक-एक कर २० वर्ष बीत जाने के बाद १९६७ ई० आ गई, किन्तु तब भी 
दरिद्रता, अशिक्षा, अनाहार, बेरोजगारी आदि समस्याएँ वैसे ही मुँह फैलाए खडी थीं, अब भी लोग भूख के कारण मर रहे थे। इन समस्याओं में थोडी भी कमी नहीं हो रही थी, देश समृद्ध बन जाने के बजाये हर क्षेत्र में पिछड़ा हुआ दिखाई लगा तो- सारे देशवासी, विशेष रूप से पढ़ा-लिखा युवा समुदाय 'स्वप्न-भंग' कि वेदना से विक्षुब्ध हो उठा था। उन्हें इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं मिल पा रहा था कि, राजनैतिक दृष्टि से स्वाधीन हो जाने के बाद भी हमलोग अपने राष्ट्र की  मूल समस्याओं का समाधान अभी तक क्यों नहीं कर पाए हैं ? भी तक देश के गाँव-गाँव तक सड़क, बिजली, पानी, चिकत्सा, शिक्षा आदि मूलभूत सुविधाएँ क्यों नहीं पहुंचाई जा सकी हैं? इतना सारा धन खर्च करने के बाद भी सारी पंचवर्षीय योजनायें व्यर्थ क्यों हो रही हैं ? जब अंग्रेज भारत छोड़ कर जा चुके हैं, तो अब स्वतंत्रता के शुभ्र-प्रकाश में भी देशवासी स्वयं को छला हुआ सा क्यों अनुभव कर रहे हैं? विलम्ब से भी सही, पर आज किस उपाय से हमलोग अपना तथा अपने देशवासियों का यथार्थ कल्याणकर सकते हैं ? 
स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् हमने नैतिक मूल्यों के ह्रास को रोकने के लिये, चरित्र-निर्माणकारी मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा के प्रचार-प्रसार पर कोई ध्यान नहीं दिया। हमारे राजनैतिक नेताओं ने युक्ति-तर्क के द्वारा युवाओं को यह समझाने की कोई चेष्टा नहीं की - कि जिन एक दर्जन बुद्धों या 'निःस्वार्थ नर नारियों का निर्माण' करने का परामर्श स्वामी विवेकानन्द ने दिया था, उनके परामर्श पर कोई ध्यान नहीं दिया, इसलिये भारत में 'चरित्रवान मनुष्य' का घोर अभाव  गया है, और कहीं यही तो भारत की वर्तमान समस्त अशुभ - भ्रष्टाचार, नारी जाति का अपमान आदि का मूल कारण नहीं है? 
जब सभी विचारशील देशप्रेमी युवाओं का मन ऐसे प्रश्नों से आलोडित हो रहा था, उस समय कुछ स्वार्थान्ध राजनीतिज्ञों ने इस युवा-विक्षोभ को सत्ता की कुर्सी प्राप्त करने का सुनहरा मौका समझा। मनुष्य बनने और बनाने की जो पद्धति स्वामी विवेकानन्द ने दी थी उसके विषय में उचित मार्गदर्शन देने के बजाय, वे 
जान-बूझ कर या अनजाने ही युवाओं के मन में विध्वंसात्मक और नेतिवाचक भावनाओं को भड़का कर, उन्हें और ज्यादा अशांत और उन्मादी बनाने का प्रयास करने लगे। जब स्वार्थी तत्त्व, पढे-लिखे युवा वर्ग को ध्वंसात्मक और सर्वनाशी हिंसक आन्दोलनों (नक्सल वाद,उग्रवाद) में झोंक कर देश को और भी पतन की गर्त में धकेलने का षड्यंत्र करने लगे, उस समय देश के ऊपर संकट के घोर काले बादल छा गये थे। 
ऐसी विषम परिस्थिति में महामण्डल अस्तित्व में कैसे आया, यदि हमें इस बात को समझना हो तो स्वामी विवेकानन्द के हृदय से निकले निम्नलिखित आह्वनों को सुनना और समझना पड़ेगा, वे कहते हैं :
" किन्तु वर्तमान गम्भीर विषाद -रात्रि के जैसा और किसी भी अमानिशा ने इस पूण्य भूमि को इतना घोर रूप से आछन्न नहीं किया था । इस पतन की गहराई के सामने पहले के सब पतन गोष्पद के समान जान पड़ते हैं।" (१०/१४१ )
स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था - "आगामी पचास वर्ष के लिए यह जननी जन्मभूमि भारतमाता ही मानो आराध्य देवी बन जाय। तब तक के लिए हमारे मस्तिष्क से व्यर्थ के देवी-देवताओं के हट जाने में कुछ भी हानि नहीं हे। अपना सारा ध्यान इसी एक र्इश्वर पर लगाओ, हमारा देश ही हमारी जाग्रत देवी है। सर्वत्र उसके हाथ हैं, सर्वत्र उसके पैर हैं और सर्वत्र उसके कान हैं। समझ लो कि दूसरे देवी-देवता सो रहे हैं। जिन व्यर्थ के देवी-देवताओं को हम देख नहीं पाते, उनके पीछे तो हम बेकार दौड़ें और  जिस विराट देवता को हम अपने चारों ओर देख रहे हैं, उसकी पूजा ही न करें? जब हम इस प्रत्यक्ष देवता की पूजा कर लेंगें, तभी हम दूसरे देव-देवियों की पूजा करने योग्य होंगे, अन्यथा नहीं। 
अब प्रश्न उठेगा कि इस प्रत्यक्ष देवता की पूजा किस विधान के अनुसार करनी होगी? इसका एक मात्र विधान है -मनुष्य बनो और बनाओ ! और इस कार्य को एक आंदोलन के रूप में सर्वत्र फैला देने के लिए कठोर परिश्रम ही पूजा पद्धति होगी, स्वामी जी कहते हैं - " हे भार्इयो, हम सभी लोगों को इस समय कठिन परिश्रम करना होगा। अब सोने का समय नहीं है। हमारे कार्यों पर भारत का भविष्य निर्भर है। देखिए वह तत्परता से प्रतीक्षा कर रही है। वह केवल सो रही है। उसे जगाइए, और पहले की अपेक्षा और भी गौरवमंडित और अभिनव “शक्तिशाली बनाकर भाक्तिभाव से उसे उसके चिरन्तन सिंहासन पर प्रतिष्ठित  कर दीजिए।" 
स्वामीजी के मतानुसार- 'प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है'--अर्थात मानवमात्र में सिद्धार्थ गौतम से गौतम बुद्ध बन जाने की सम्भावना विद्यमान है ! इसलिये उनकी दृष्टि में, जाति-धर्म-भाषा-लिंग में गुण-दोष के आधार पर (exclusion) बहिष्कार कर देने योग्य कोई मनुष्य है ही नहीं ! अतः स्वयं से पूछना चाहिये - 'यदि मैं नाना प्रकार के दोषों और कमियों के रहने बावजूद स्वयं से प्रेम कर सकता हूँ, तो दूसरों की गलतियों को देखने और जानने के बाद उनसे भी, मैं अपने ही जैसा प्रेम क्यों नहीं कर पाता हूँ ? '
अतः युवा वर्ग अभी चाहे जिस अवस्था में हो, उन सभी को अंगीकार करना होगा।
 किन्तु यह जो सभी युवाओं को ग्रहण करके स्वामीजी की चरित्रनिर्माण और मनुष्यनिर्माण की शिक्षाओं को प्राथमिक रूप से सुनाने के काम है, उसे करेगा कौन? दावानल की तरह कोने-कोने में सर्वत्र जा-जाकर ग्रामों,शहरों, शिक्षितों, अशिक्षितों, छात्रों, श्रमजीवियों, बेरोजगारों युवाओं के पास स्वामीजी के उपदेशों को सुनायेगा कौन ? जिन सुदूरवर्ती ग्रामों में धर्म, मंदिर, मठ तथा सन्यासियों की छाया भी देखने को नहीं मिलती उन्हें सुनायेगा कौन? केवल सुनायेगा ही नहीं, उन्हें वेदान्त के अमोघ मंत्र 'उत्तिष्ठत जाग्रत' से डीहिप्नोटाइज्ड करके इस 'BE AND MAKE -आंदोलन' का नेतृत्व ग्रहण करने के कार्य में खींचेगा कौन? क्योंकि इस कार्य (चरित्र-निर्माण आंदोलन)  में उतरने से ही तो अपना चरित्र गठित होगा और देश की उन्नति होगी !
धर्म विशेष का चिन्ह, धर्म-विशेष में विश्वास, ग्रन्थ-विशेष के प्रति भक्ति और श्रद्धा आदि के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव किये बिना, स्वामीजी के अमोघ वेदान्त वाणी 'उत्तिष्ठत जाग्रत' को सभी मनुष्यों के बीच -नहीं पहुँचाने से क्या हमारी मातृभूमि अपनी खोई हुई गरिमा को पुनः प्राप्त कर सकती है ? क्या हमारा देश अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है ? आज हमारे देश के युवा वर्ग की जैसी हालत है, देश के नैतिक मानदण्ड में क्रमशः जो अधः पतन दिखाई दे रहा है, प्रचलित शिक्षा व्यवस्था के भीतर नैतिक मूल्य और चरित्र-गठन के उपादानों को प्रविष्ट करने की प्रबल अनिवार्यता को देखकर भी इस दिशा में होता हुआ कोई प्रयास नहीं दिख रहा है, तथाकथित जन नेताओं की बुद्धि पर उदासीनता का पर्दा पड़ गया है, अति प्रचण्ड भौतिकवादी सभ्यता की देन स्वरूप छात्र-जीवन में ही सर्वसुख-भोग पाने की जो उत्कट लालसा युवा वर्ग  निगल लेने को आतुर है, इन सबसे उन्हें बचा लेने का जो एकमात्र पथ -  'BE AND MAKE' है, उस पथ की जानकारी उन युवाओं तक कौन पहुँचायेगा ? 
हो सकता है कि सभी युवा धर्म को नहीं मानते हों, पूजा-पाठ नहीं समझते हों ! किन्तु, जो व्यस्क लोग यह दावा करते हैं कि हम धर्म को मानते हैं, नियमित रूप से पूजा-पाठ करते हैं, क्या इनमें से सभी लोग सचमुच पूजा तथा धर्म का ठीक ठीक अर्थ भी समझते हैं ? आज के समाज में तो धर्म-विद्वेषी, ईश्वर-विद्वेषी लोगों को भी ट्रक-बस से जबरन चन्दा वसूल कर पूजा करते देखा जा रहा है, क्या इसे हम पूजा कह सकते हैं ? अतः धर्म और पूजा के सम्बन्ध में इस तरह की कट्टर मानसिकता के कारण स्वामी जी की शिक्षाओं को भी किसी वर्ग विशेष तक ही क्यों सीमित रखना चाहिये ? जिस व्यक्ति या संगठन को यह दृढ़ विश्वास है कि जो व्यक्ति वेदान्त-केसरी स्वामी विवेकानन्द की वाणी- 'उठो ! जागो ' को एक बार सुन लगा, और उसके मर्म को समझ लेगा वह अवश्य ही मोहनिद्रा से जाग उठेगा,  फिर वह कैसे स्वामी जी की शिक्षाओं को किसी संगठन-विशेष की संपत्ति बना कर रखेगा ? वह कैसे पञ्चाङ्ग देखकर किसी दिन विशेष को चुनकर स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाओं पर 'युवा -सम्मेलन ' आयोजित करेगा और शेष दिन संसार को भोगों को अर्जित करने की होड़ में लगा रहेगा ? जो लोग स्वामीजी के दिखावटी भक्त नहीं हैं, सचमुच उनको अपना आदर्श मानते हैं, वे निश्चित रूप से महामण्डल के चरित्र-निर्माण आंदोलन में सहयोग देने के लिये आगे आएंगे। 
इसी प्राथमिक कार्य को करने की चुनौती या उत्तरदायित्व को महामण्डल ने आगे बढ़कर स्वयं अपने कन्धों पर उठा लिया है। इसीलिए बार बार कहा जाता है कि महामण्डल एक प्रारंभिक शिक्षा केन्द्र (प्राइमेरी स्कूल) है। जो लोग आध्यात्मिक जीवन में प्रारंभिक तौर से उन्नत हो जायेंगे उनके लिए उच्च विद्यालय, महाविद्यालय और विश्व-विद्यालय आदि तो पहले से ही हैं। स्वामी विवेकानन्द जी कल्पना के अनुसार गठित 
'रामकृष्ण मिशन ' इसी प्रकार का एक विश्वविद्यालय है। किन्तु उस सर्वोच्च शिक्षा केन्द्र में प्रवेश लेने के पहले महाविद्यालय की पढाई पूरी करनी होगी। और महाविद्यालय में प्रवेश पाने के लिये एंट्रेंस की परीक्षा, या मैट्रिकुलेशन की जो परीक्षा होती है, जिसे उच्च शिक्षा प्राप्त करने का प्रवेश-पत्र कहा जाता है, उस सर्टिफिकेट को भी तो प्राप्त करना होगा। किन्तु उस सर्टिफिकेट को प्राप्त करने के पहले जिस वर्णमाला या ककहरा (Alphabet) से परिचय होना जरुरी हो जाता है, उसी ककहरा से युवाओं को परिचित करा देना महामण्डल का उद्देश्य है। महामण्डल वह प्राथमिक शिक्षा केन्द्र है, जहाँ 'मनुष्य-जीवन' को प्राप्त करने के लिए, अ-आ, क-ख सीखा जाता है। अ-आ, क-ख से परिचय प्राप्त कर लेने के बाद महामण्डल की जिम्मेवारी समाप्त हो जाती है। उसके बाद शाश्वत जीवन को पाने के अनेक मार्ग हैं - जो युवा जिस मार्ग से जाना चाहें, उसी मार्ग पर जाने को स्वततंत्र हैं। 
इसीलिये महामण्डल किसी प्रकार की संकीर्णता या मतान्धता का पक्षधर नहीं है, हमलोग सभी जाति और धर्म के मनुष्यों को स्वीकार करने की इच्छा रखते हैं। यदि भारत के विभिन्न भाषा-भाषी और सभी जाति-धर्म के विचारशील युवाओं के पास स्वामी जी की शिक्षाओं को नहीं प्रसारित किया जाये, यदि उनके भीतर विद्यमान अनन्त शक्ति और सम्भावनाओं की जानकारी नहीं दी जाय,तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे अभिव्यक्त करने का उपाय नहीं बताया जाय, तो सबों के हृदय में जो प्रेम की ज्योति जल रही है -उसका प्रकाश बाहर कैसे आयेगा ?  भारत के सभी युवा अपने 'सच्चे दिव्य स्वरुप' के प्रति जाग्रत कैसे होंगे ? 
भारत को उसकी निद्रा से जगाना होगा, किन्तु उसकी निन्दा करते हुए नहीं; बल्कि उसे जगाना होगा -प्राणप्रद, जीवनप्रद, आशाप्रद, शक्तिप्रद, महिमाप्रद- वेदान्त वाणी, बुद्धोअसि-शुद्धोअसि-निरजनोंअसि को सुनाते हुए। वेदान्त वाणी का केवल श्रवण ही नहीं, अपितु मनन और निदिध्यासन के लिये भी अनुप्रेरित करना होगा।  इसी जागरण-मंत्र का प्रचार-प्रसार द्वारा अपना कल्याण, और सम्पूर्ण भारत का कल्याण करने  के कार्य में लगे रहने के लिये ही महामण्डल की स्थापना हुई है। विशेष रूप से युवाओं को इस कार्य -भारत कल्याण के कार्य में लगने की प्रेरणा देने के लिए ही महामण्डल को आविर्भूत होना पड़ा है। महामण्डल का आदर्श वाक्य है -बनो और बनाओ -तुम स्वयं एक चरित्रवान मनुष्य बनो और दूसरों को भी चरित्रवान मनुष्य बनने में सहायता करो। 
'डाइनैमिक रिलिजन' या गत्यात्मक धर्म के विषय पर बोलते हुए स्वामी जी ने अपने २२ अक्टूबर,१८९४ को अपने अमेरिका में दिए एक भाषण में कहा था - " बुद्ध मत किसी नये धर्म का प्रवर्तन नहीं था, वरन एक सुधार आन्दोलन था। बुद्ध ने बताया कि संसार में जो अशुभ दिखाई देता है, उसका मूल कारण मनुष्य की दूसरों से ऊँचे चढ़ जाने की इच्छा में है। यह वह दोष है, जिसका निवारण निःस्वार्थपरता से किया जा सकता है,और इस अशुभ का इलाज भी निःस्वार्थ बनकर ही किया किया जा सकता है। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि कड़ा कानून बनाकर या बल-प्रयोग द्वारा इसका निवारण नहीं किया जा सकता; कीचड़ को कीचड़ से नहीं धोया जा सकता; घृणा से घृणा को नहीं मिटाया जा सकता। एकमात्र उपाय है- "निःस्वार्थ नर-नारियों का निर्माण करना'! 
तुम वर्तमान अशुभ को दूर करने के लिये कड़े कानून (लोकपाल बिल आदि) बना सकते हो, पर उनसे कोई लाभ नहीं होगा। वे सदा इस बात पर बल देते हैं कि -हम स्वयं शुद्ध और पवित्र बनें और हम दूसरों को पवित्र बनने में सहायता दें। उनका यह विश्वास था कि, संसार में सदा से ही सिद्धान्त तो आवश्यकता से अधिक रहा है, किन्तु उन सिद्धान्तों का अपने जीवन में व्यवहार अत्यन्त अल्प मात्रा में होता है। हमें अपनी आत्मा को दूसरों में पाना चाहिये, अपने जीवन को दूसरों में पाना चाहिये। दूसरों के प्रति भलाई करना ही अपने प्रति भलाई करने का एकमात्र उपाय है। वर्तमान समय में भारत में एक दर्जन बुद्ध होने से बहुत अच्छा होगा, और इस देश (अमेरिका) में भी एक बुद्ध का आविर्भाव लाभदायक सिद्ध होगा। " (वि ० सा ० १०/२९२)  
[सम्पूर्ण भारतवर्ष में उन युवा सिंहों (चार दिशाओं के ४ वेदान्त-केसरी) को दहाड़ने दो जिनका जीवन 
ब्रह्मतेज और क्षात्रवीर्य से सम्पन्न मानव जाति के भावी मार्गदर्शक नेता (बुद्ध के रूप में) गठित हुआ है; सारे सियार (ढोंगी परमानन्द जैसे ठग-वैद्य) अपने अपने बिलों में छिप जायेंगे!] किन्तु उस समय (१९६७) तक भी युवाओं के जीवन को गठित करने के उद्देश्य से, विशेष तौर पर स्वामी विवेकानन्द के भावादर्श के अनुरुप वैसे 'निःस्वार्थ युवाओं का निर्माण', 'बुद्ध सदृश्य युवाओं का' या 'चरित्र-निर्माण' को एक आंदोलन के रूप में सम्पूर्ण भारत वर्ष में फैला देने के उद्देश्य से महामण्डल के पहले अन्य कोई दूसरा युवा संगठन बना हो, तो उसकी जानकारी हमें नहीं है। हमें तो ऐसा लगता है कि यह एक
ऐतिहासिक अनिवार्यता थी, जिसके कारण महामण्डल को अस्तित्व में आना पड़ा ! स्वामी विवेकानंद का 
वेदान्त- वेदान्तियों की उस शाखा के अन्तर्गत आता है जिनका यह विश्वास है, कि जब तक सभी मनुष्य मुक्त नहीं हो जाते, मुझे अपनी मुक्ति भी नहीं चाहिये! तथा केवल दूसरों की मुक्ति के लिए अथक परिश्रम करते रहना ही प्रबुद्ध (बुद्ध) व्यक्ति की सच्ची पहचान है।' 
अतः महामण्डल यह विश्वास करता है कि इस मनुष्य बनो और बनाओ के कार्य में कूद पड़ने से ही युवाओं का चरित्र गठित होगा और देश की उन्नति होगी ! और अपने ४९ वर्ष के अनुभव से हम कह सकते हैं कि -स्वामी जी द्वारा प्रदत्त भारत पुनर्निर्माण का सूत्र- 'BE AND MAKE' ही भारत की सर्वरोग नाशक औषधि (Panacea रामबाण दवा) है ! 
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महामण्डल समाचार : 
स्वामी विवेकानंद के साथ खेतड़ी के राजा अजीत सिंह का  नाम भी जरूर याद किया जाता है... स्वामीजी का विवेकानन्द नाम भी राजा अजीत सिंह की देन है। अजीत सिंह अपने समय के बहुत ही प्रतिभावान राजा थे। समकालीन राजा, प्रजा व अंग्रेज उन्हें बहुत सम्मान देते थे। स्वामी जी लम्बे समय तक खेतड़ी में रहे। उस समय राजाजी ने कहा कि स्वामी जी आप का नाम तो विवेकानंद होना चाहिए क्यों कि 'विविदिषा ' का अर्थ है जिज्ञासा काल जो कि खत्म हो चूका है। आप तो महान विवेकी हैं सो आप विविकानन्द नाम धारण करो , स्वामीजी ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। स्वामीजी जब खेतड़ी आए थे, तब वे राजा के साथ जीण माता के दर्शन करने भी गए थे। उन्होंने रात को एक गांव में विश्राम भी किया था। उस गांव का नाम सिंगनोर है, जो नवलगढ़-गुढ़ा मार्ग पर स्थित है। स्वामीजी इस क्षेत्र के कई गांवों का भ्रमण भी करते थे।
राजा अजीत सिंह का जन्म १६ अक्टूबर १८६१ को राजस्थान के झुंझुनूं जिले में स्थित अलसीसर नामक स्थान पर हुआ था।  वे स्वामीजी से उम्र में करीब दो साल बड़े थे। जब खेतड़ी के तत्कालीन राजा फतेह सिंह का देहांत हुआ तो अजीत सिंह १८७० में खेतड़ी के राजा बने। उन्हें गोद लिया गया था। साल १८७६ में उनका विवाह रानी चंपावतजी साहिबा के साथ हुआ। उनके एक बेटा और दो बेटियां थीं। 
भारत माता के महान सपूत इस राजा का जीवन चरित्र भी बहुत महान है। राजा अजीत सिंह हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत और राजस्थानी के सुयोग्य विद्वान और कवि थे। राजा अजीतसिंह संगीत के भी बड़े ज्ञाता थे। जब वे वीणा वादन करते थे तब स्वामी विवेकानन्द “प्रभु मोरे अवगुन चित्त न धरो” पद को बार-बार घंटों गाते रहते थे और दोनों अभिन्न हृदय झूम उठते थे। राजा अजीतसिंह एक न्याय प्रिय शासक ही नहीं अपितु, भक्त एवं दार्शनिक विद्वान थे। स्वामी विवेकानन्द ने खेतड़ी के राज पंडित नारायणदास से अष्टाध्यायी व महा भाष्य का अध्यन किया। स्वामीजी पंडित जी को अपना अध्यापक मानते थे।
जब स्वामीजी विश्वधर्म सम्मेलन में भाग लेने अमेरिका जा रहे थे तो राजा अजीत सिंह ने फैसला किया कि वे भी भारत माता के इस महान सपूत की सहायता में भागीदार बनेंगे। उन्होंने अपने सचिव मुंशी जगमोहन लाल को मद्रास रवाना किया और स्वामीजी को सादर खेतड़ी बुलाया। उनके लिए राशि की व्यवस्था की और मुंशी जगमोहन लाल उन्हें बंबई तक छोडऩे आए। यहां से स्वामीजी जहाज से अमेरिका रवाना हुए। 
जब स्वामीजी ने अपने व्याख्यान से अमेरिका में विजय परचम फहराया तो सबसे ज्यादा प्रसन्नता राजा अजीत सिंह को हुई। इस खुशी में खेतड़ी में घी के दीपक जलाए गए और दीपावली मनाई गई। 
अजीत सिंह स्वामी विवेकानन्द के प्रिय शिष्य ही नहीं बल्कि उनके सबसे करीबी मित्र भी थे। राजा अजीत सिंह ने ही स्वामीजी को साफा बांधना सिखाया था और इसे हम उनकी कई तस्वीरों में भी देख सकते हैं। स्वामीजी के पिता का देहांत होने के बाद उनके परिवार को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा था। इस स्थिति में राजा अजीत सिंह हर माह उनके परिवार को १०० रुपए भेजा करते थे, लेकिन उन्होंने कभी इसका जिक्र नहीं किया। स्वामीजी ने २२ नवम्बर १८९८ को एक पत्र में लिखा था - [ " I have not the least shame in opening my mind to you, and that I consider you as my only friend in this life."] 
स्वामीजी अपने जीवन में तीन बार खेतड़ी आए। पहले १८९१ में, फिर विश्वधर्म सम्मेलन में जाने से पहले १८९३ में और आखिरी बार १८९७ में। राजा अजीत सिंह की आयु अधिक नहीं रही। 18 जनवरी 1901 को उत्तरप्रदेश के सिकंदरा में उनका देहांत हो गया। अगले ही साल स्वामीजी भी (4 जुलाई 1902) ब्रह्मलीन हो गए। जब भी स्वामीजी की कीर्ति और यश का जिक्र किया जाएगा, राजा अजीत सिंह का नाम अवश्य आएगा।
[ http://rajasthanpatrika.patrika.com]


 [उसी खेतड़ी (राजपूतना ) के रामकृष्ण मिशन में  पश्चिम बंगाल के बाहर महामण्डल गतिविधियों को मॉनिटर करने वाली ऑफिसियल ११ सदस्यीय कोर कमिटी के उपाध्यक्ष श्री कुमार जीतेन्द्र नारायण सिंह (बाएं से तीसरे ) एवं कार्यकारिणी सदस्य श्री रजत मिश्रा (दायें से प्रथम)
साभार http://www.rkmissionkhetri.org/न्यूज़ ]

1 टिप्पणी:

  1. आप राजपूत लोग ही प्राचीन भारत के गौरवस्वरूप रहे हैं । आप लोगों की अवनति के साथ ही जातीय अवनति आरम्भ हो गयी; और भारत का उत्थान केवल तभी हो सकता है, जब क्षत्रियों के वंशज ब्राह्मणों के वंशजों के साथ समवेत प्रयत्न में कटिबद्ध होंगे, लूटे हुए वैभव और शक्ति का बटवारा करने के लिये नहीं, वरन 'टू एनलाइटेन दी इग्नोरेन्ट'- (अविद्या ग्रस्त लोगों को विद्या-अविद्या दोनों के महत्व को समझाने के लिये), एवं अपने पूर्वज ऋषि-मुनियों की पवित्र निवास भूमि की खोई हुई महिमा को पुनः-प्रतिष्ठित करने के लिये।

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