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सोमवार, 11 जुलाई 2016

" एक नया युवा आन्दोलन " -1 'प्रस्तावना एवं नियत-कार्य ' (A NEW YOUTH MOVEMENT)

प्रस्तावना 
महामण्डल की अंग्रेजी पुस्तिका 'A NEW YOYTH MOVEMENT'   प्रथम बार सितम्बर, १९८७ में प्रकाशित हुई थी। अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल द्वारा आयोजित 'वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर' में प्रशिक्षण का मूल विषय (theme) है- 'BE AND MAKE'. अर्थात तुम स्वयं यथार्थ मनुष्य बनो और दूसरों को भी उन्नततर मनुष्य बनने में सहायता करो !  महामण्डल शिविरों में इसी विशिष्ट-विषय के ऊपर होने वाले चर्चाओं को महामण्डल की द्विभाषी संवाद पत्रिका 'Vivek-Jivan' में सम्पादकीय निबन्धों के रूप में क्रमवार ढंग से प्रकाशित किया गया था। यह नया प्रकाशन उसी संवाद-पत्रिका में छपे कुछ सम्पादकीय लेखों का एक संकलन है। 
इन चुने हुए सम्पादकीय लेखों को एक साथ मिलाकर क्रमवार ढंग से पढ़ने पर  महामण्डल का वास्तविक स्वरूप एवं उसके आविर्भूत होने की तार्किक पृष्ठभूमि,उसका आदर्श एवं उद्देश्य, इसका 'नियत कार्य' (दी टास्क) और उसकी कार्यपद्धति आदि विषयों को आसानी से समझा जा सकता है। जो लोग महामण्डल और उसके कार्यों में रूचि रखते हैं, उन्हें इस पुस्तिका के प्रत्येक निबंध को बहुत ध्यान पूर्वक पढ़ना चाहिये। और प्रत्येक परिच्छेद (paragraph) को पढ़ने के बाद थोड़ा रुककर, जो पढ़ें हैं उसके मर्म पर चिंतन-मनन करके उसी प्रकार आत्मसात कर लेना चाहिये, जिस प्रकार एक गाय खाना खाने के बाद उसे अच्छी तरह से पागुर करके,'चिउ एंड डाइजेस्ट' करती है। तात्पर्य यह कि महामण्डल-आंदोलन के सभी कर्मियों, विशेष करके इस चरित्र-निर्माण आंदोलन के भावी नेताओं  या लोक-शिक्षकों को (वुडबी लीडर्स-जो कैम्पों में क्लास लेना चाहते हों, को ) इस पुस्तिका में प्रकाशित प्रत्येक निबंध का गंभीरता से अध्यन करके इसके विचारों को आत्मसात कर लेना चाहिये। 
उनके अतिरिक्त अन्य लोग जो इस 'अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल ' के उद्देश्य और कार्यपद्धति तथा उसके मुख्य विषय 'BE AND MAKE' के मर्म से परिचित नहीं होने के कारण, इस संगठन के साथ भले ही संयुक्त न हुए हों, किन्तु " श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा पर आधारित लीडरशिप ट्रेनिंग "; या गुरु-शिष्य पर आधारित भारत की प्राचीन शिक्षा-पद्धति में अभिरुचि रखते हों तथा विवेकानन्द साहित्य को बड़े चाव से पढ़ते हैं,-- आशा की जाती है कि यह पुस्तिका उनके लिये भी विशेष लाभप्रद सिद्ध होगी।
यदि हम 'मानव-समाज की सामान्य अवस्था' और विशेष रूप से हमारे युवा-वर्ग की वर्तमान अवस्था को गहराई से समझने का प्रयास करें, तो यह पुस्तिका हमारे युवाओं के मन में वैसे उपयोगी सकारात्मक विचारों को उन्मेषित (Provoke) कर देगी, जिन पर सभी शिक्षित युवाओं को अनिवार्य रूप से चिंतन -मनन करना चाहिये। किन्तु हमारा स्वार्थी समाज, आमतौर से अपने क्षुद्र लाभ (वोट बैंक पोलिटिक्स) के कारण वैसे विचारों को प्रोत्साहित नहीं करता है। प्रचलित सामाजिक व्यवस्था के किसी घिसे-पिटे विचार (कल्बों के समाज-सुधार या राजनैतिक आन्दोलनों) के अनुगामी न बनकर यदि हम लोग सचमुच किसी रचनात्मक कार्य के साथ जुड़ना चाहते हों, तो स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रदत्त इस भारत-निर्माणकारी सूत्र 
" BE AND MAKE " के ऊपर हमें नए सीरे से चिन्तन-मनन करना होगा। 
' नो आईडिया हियर इज ऐन आउटफ्लो ऑफ़ एनी पर्टिकुलर इंडिविजुअल ह्यूमन ब्रेन'- इन निबन्धों में व्यक्त कोई भी विचार किसी व्यक्ति विशेष के मानव-मस्तिष्क में उठने वाले विचारों का बहिर्प्रवाह नहीं है! इस पुस्तिका के लेखों में अभिव्यक्त प्रत्येक विचार स्वामी विवेकानन्द जी से उधार लिया गया है ! एवं उनके शक्तिदायी विचारों को यहाँ जोड़ने का उद्देश्य स्वयं के लिये नाम-यश या और कुछ कमाना नहीं है, बल्कि स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाओं का अपने व्यवहारिक जीवन में प्रयोग द्वारा 'एक नये भारत का निर्माण' करने हेतु युवाओं को अनुप्राणित करने का एक विनम्र प्रयास है। इसीलिये यदि किसी नए शब्द- निर्माण (coinage) की अनुमति दी जाये, तो इस पुस्तिका में वर्णित विचारों को '' एप्लाइड विवेकानन्दा इन दी नेशनल कान्टेक्स्ट " अथवा ' एक नये भारत का निर्माण करने के संदर्भ में प्रायौगिक विवेकानन्द " कहा जा सकता है। 

प्रथम हिन्दी प्रकाशन दिनांक -९ फ़रवरी २०१५

[First English Publication -September 1987 

Printed by 
P.K. Das
Pelican Press
(जलसिंह प्रेस ?)
85 B.B. Ganguli Street

Calcutta-12] 

अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल 
का 
हिन्दी प्रकाशन विभाग,
तारा टॉवर,
झुमरीतिलैया -825409
कोडरमा, झारखण्ड 
(मोबाईल : ९३८६६९९९ ४९ )
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एक नया युवा आंदोलन !
 [ A New Youth Movement] 
विषय-सूचि (कन्टेन्ट्स)


१. नियत कार्य (The Work)
२. उन्नततर मनुष्यों का उन्नततर समाज (Tend Individuals, Tend Society) 
३. आत्मा और हृदय (Heart and Soul) 
४. संगठन और लीडरशिप की अनिवार्यता (The Need of Organization and Leadership) 
५. बिखरी हुई इच्छाशक्ति का समन्वय  (Will and Unite)  
६. मनुष्य बनो और बनाओ का निहितार्थ (Implication of 'Be and Make')
७. शरीर-मन-हृदय का सामंजस्य पूर्ण विकास (For Total Development)
८. सौंपा हुआ कार्य तथा क्रियान्वन पद्धति (The Task and the Way)  
९. हमारी सीमा (Our Limitation)
१०. लक्ष्य (परम-सत्य) तक पहुँचने का मार्ग (The Object and the Way)
११. लक्ष्य और मार्ग की पुनर्व्याख्या (The Way Further Explained) 
१२. क्या आवश्यक है ? (What is Essential) 
१३. महामण्डल की भूमिका (The Role of the Mahamandal) 
१४. कार्य की योजना (The Plan of Work)
१५. उद्देश्य और कार्यपद्धति (The Idea and the Method)
१६. स्व-परामर्श (Speaking to Ourselves)
१७. हमारा कर्तव्य (Our Duties) 
१८. हमें क्या चाहिये ? (What is Wanted) 

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नियत कार्य 
(ॐ-The Work) 
 यह बात कई लोगों को समझ में नहीं आती कि- 'अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल' आखिर करना क्या चाहता है ? इस विषय पर विगत १८ वर्षों में (Vivek-Jivan १९६९ में प्रथम बार प्रकाशित हुई थी, तब से लेकर १९८७ तक) महामण्डल की द्विभाषी संवाद पत्रिका 'विवेक-जीवन' तथा अन्य दूसरी महामण्डल पुस्तिकाओं में बहुत कुछ लिखा गया है। इसी विषय के ऊपर कई युवा सम्मेलनों, प्रशिक्षण शिविरों एवं अन्यत्र - बहुत कुछ कहा भी गया है। उन सबकी पुनरावृत्ति तो यहाँ नहीं हो सकती, किन्तु जो लोग महामण्डल के चरित्र-निर्माण और मनुष्य-निर्माणकारी आन्दोलन के प्रचार-प्रसार में 'नेता' (लोक-शिक्षक) की भूमिका निभाना चाहते हैं, उनके लाभ के लिये मुख्य बिंदुओं को संक्षेप में दोहराया जा सकता है। इस पुस्तिका में छपे निबन्धों को दूसरे लोग जो महामण्डल के सदस्य तो नहीं हैं, किन्तु नेतृत्व -प्रशिक्षण के श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा (गुरु-शिष्य परम्परा) के विषय में बेहतर समझ रखते हैं, यदि वे भी इसे पढ़ें तो इसे इस पुस्तिका की अतिरिक्त उपलब्धि मानी जाएगी। भारत के कल्याण के लिये जितना कुछ किए जाने की जरूरत है, वह सब पूरा कर देने का उत्तरदायित्व कोई व्यक्ति या अकेला संगठन नहीं उठा सकता। गीता १८.२५  में विवेक-प्रयोग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है -

अनुबन्धं क्षयं हिंसाम् अनपेक्ष्य च पौरुषम्।

         मोहात् आरभ्यते कर्म यत् तत् तामसम् उच्यते  ।। १८.२५ 


जो कर्म अनुबन्धं (consequence) या परिणाम, हानि, हिंसा और सार्मथ्य (पौरुषम्) का विचार न करके केवल मोहवश आरम्भ किया जाता है, वह कर्म तामस कहलाता है। और तामसिक कर्म सदैव दूसरों के लिये क्षति कारक होता है। 
[व्याख्या : तमोगुणी पुरुष कर्म प्रारम्भ करने के पूर्व विवेक-प्रयोग नहीं करता, वह इस बात का विचार ही नहीं करता कि उस कर्म का परिणाम (अनुबन्ध) क्या होगा तथा उसके करने में कितनी शारीरिक, आर्थिक आदि शक्तियों का क्षय अर्थात् ह्रास होगा? उसे इस बात की भी कोई चिन्ता नहीं होती कि उसके कर्म के कारण कितनी हिंसा हो रही है अथवा लोगों को कष्ट हो रहा है। ऐसे प्रमादी और उत्तरदायित्वहीन लोगों के कर्म मोहवश अर्थात् किसी भ्रान्त धारणा और हीन उद्देश्य से प्रेरित होते हैं। उदाहरणार्थ- मद्यपान, दुस्साहस पूर्ण जुआ, भ्रष्टाचार आदि ये सब तामस कर्म हैं। ऐसे कर्मों के कर्ता केवल क्षणभर के वैषयिक सुख की संवेदना ही चाहते हैं। रजोगुणी व्यक्ति का राजस कर्म, करते समय तो सुख देता है, जैसे खुजली -पश्चात महापीड़ा ,  का फल भी निराशा और दुख ही होता है पर इस फल को प्राप्त होने में कुछ काल की आवश्यकता होती है।  परन्तु तामस कर्म का दुखरूप फल तो तत्काल ही प्राप्त होता है। जबकि सात्त्विक कर्म का फल सदैव आनन्द ही होता है। साभार http://www.gitasupersite.iitk.ac.in/]

अतएव किसी कार्य में उसके नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पहलुओं (pros and cons) को समझे बिना, तथा सफलता की सम्भावना आदि विषयों का गहराई से विवेक-विचार किये बिना ही - उसे क्रियान्वित करने में कूद पड़ने को  बुद्धिमानी का कार्य नहीं कहा जा सकता। (इसलिए हमें यह ध्यान रखना चाहिये कि इस आन्दोलन से जुड़ने का हमारा निर्णय- कहीं किसी क्षणिक आवेश का परिणाम तो नहीं है ?) 
छान्दोग्य उपनिषद्  (१.१. १०)*** में भी बड़े सुन्दर ढंग से कहा गया है --' नाना तु विद्या चाविद्या च यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति। '
" वही कार्य अधिक फलोत्पादक (efficient या प्रभावशाली) होता है, या उसी कार्य में सफलता मिलने की सम्भावना अधिक होती है, जिस कार्य को इस जगत (ब्रह्ममय जगत) के विषय में पर्याप्त समझ, श्रद्धा, विश्वास और सत्य-निष्ठा तथा रिक्वायर्ड नो-हाउ, (दृष्टि को ज्ञानमयी बनाकर जगत को 'ब्रह्ममय' अनुभव करने की तकनीकी जानकारी) के साथ प्रारम्भ किया जाता है।"   
इसलिए महामण्डल ने भारत की  बेरोजगारी और निरक्षरता को दूर करने, या देश की जनसंख्या में वृद्धि के साथ लाखों लोगों के अच्छे स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने जैसी बड़ी बड़ी योजनाओं की जिम्मेवारी को स्वयं के ऊपर नहीं सौंपा है।  इतने बड़े-बड़े कार्य को करने के बजाय इसने, कार्य के एक छोटे से क्षेत्र, विशेष रूप से युवाओं के - 'जीवन-गठन' के कार्य को चुन लिया है। क्योंकि हमलोग आज (जुवेनाइल जस्टिस, भ्रष्टाचार, आतंकवाद आदि) जिन बड़ी बड़ी समस्याओं - से जूझ रहे हैं, उन सबको हल करने की एकमात्र कुंजी है, व्यक्ति-जीवन का निर्माण करते हुए, विशेष रूप से युवाओं का चरित्र-निर्माण करते हुए  देश में क्रमशः 'चरित्रवान- मनुष्यों' की संख्या में वृद्धि करने का कार्य !'
और यह कार्ययोजना -('BE AND MAKE ' आन्दोलन के माध्यम से भारत के पुनर्निर्माण की योजना) अन्य किसी के द्वारा नहीं, बल्कि स्वयं स्वामी विवेकानन्द के द्वारा ही बनाई गई है। वे हमेशा जड़ को मजबूत बनाने पर विशेष ध्यान देते हैं। स्वामी विवेकानन्द का मानना है  कि 'केवल पत्ते सींचने से पेड़ की सेहत नही संभलती, उपचार को जड़तक पहुँचाना जरुरी है।' जब तक मनुष्य के स्वभाव को, उसके चरित्र को किसी 'देवतुल्य मनुष्य' के अनुरुप नही बनाया जायेगा तब तक बात बनेगी नहीं। यदि हमें धरती पर स्वर्ग चाहिए, तो हमें अपने  चिन्तन, व्यवहार, (आदत और प्रोपेनसिटीज) चरित्र को भी देवता जैसा बनाना होगा।
[क्योंकि वे भी पत्तों को नहीं जड़ को सींचने में विश्वास करते थे, यदि हम भारत को श्रेष्ठ भारत बनाने के लिये भारत की आर्थिक या राजनीतिक 'व्यवस्था' में आमूलचूल परिवर्तन लाने के इच्छुक हों, या जैसा आजकल कहा जाता है- 'सिस्टम को ही चेन्ज करना' चाहते हों; तो इन समस्त व्यवस्थाओं के संचालन में जो मनुष्य लगे हुए हैं -उनके चरित्र को बदलना अनिवार्य होगा। और इसके लिए तरुणों और युवाओं को प्रचलित रोजगार-उन्मुखी शिक्षा (अपार -विद्या) के साथ साथ, 'चरित्रवान मनुष्य', यथार्थ मनुष्य, या 'ब्रह्ममय जगत ' का अनुभव करने में सक्षम देश-प्रेमी मनुष्य बनने की शिक्षा (परा-विद्या) में प्रशिक्षण या ट्रेनिंग भी प्राप्त करना होगा।]
और 'भावी युग का मनुष्य' कैसा होगा - उसका एक प्रारूप, (देवोपम मनुष्य श्रीरामकृष्ण का साँचा) भी उन्होंने हमारे सामने रखा है!  तथा '3H- निर्माण' - अर्थात मनुष्य के तीन प्रमुख अवयव -शरीर,मन और हृदय के सुसमन्वित विकास के द्वारा  भावी युग के उन्नत मनुष्यों का निर्माण करने की पद्धति भी हमें प्रदान की है। एवं  इस योजना को सफल करने की जिम्मेदारी भी उन्होंने भारत के युवाओं के ऊपर  ही सौंप दी है। इसीलिये युवा महामण्डल केवल स्वामी विवेकानन्द को अपना नेता मानता है,तथा उन्हीं के द्वारा दिखाये गये मार्ग का अनुसरण करने की कोशिश कर रहा है।
महामण्डल अपने ४९ वर्षों के अनुभव ('3H'- विकास के प्रशिक्षण) द्वारा युवाओं के जीवन में आये हुए परिवर्तन को देख कर यह विश्वास पूर्वक कह सकता है, कि स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रदत्त "मनुष्य बनो और बनाओ" की पद्धति - के अतिरिक्त किसी अन्य पद्धति से देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, नारी-अपमान आदि बुराइयों को अन्ततोगत्वा दूर नहीं किया जा सकता है।
इसिलये, दूसरे तथाकथित समाज-सेवी संगठन की तरह केवल युवा-शक्ति क नियंत्रित रखने के उद्देश्य से, किन्तु प्रकट रूप से युवा-कल्याण के नाम से, जिस प्रकार के आयोजन (युवा-महोत्स्व, ऑडियो-भिडियो परिचर्चा, IPL क्रिकेट मैच-चीयर-गर्ल, आदि) किये जाते हैं, (ताकि युवा-आक्रोश कुर्सी पर खतरा न बन जाये) महामण्डल भी किसी अन्य देश से या जिस-तिस व्यक्ति से -किसी भी तरह की नई नई योजनाओं की भीख माँगने का कोई ईरादा नहीं रखता। महामण्डल केवल स्वामी विवेकानन्द द्वारा निर्देशित मार्ग का ही अनुसरण करना चाहता है ! 
[ इसीलिये महामण्डल-आन्दोलन के कुछ स्लोगन या ' रणहुंकार ' इस प्रकार हैं -'चरैवेति चरैवेति - हूँकारो स्माकम ! विवेकानन्दो नेतानः , विभिः म कस्मद वयम् ?  'स्लीप नो मोर अराइज अवेक, कॉल स्वामी जी- 'बी ऐंड मेक !' "जान लिया है हमने राज, चरित्र से बनता देश-समाज "!,  मिलजुल कर एक साथ रहेंगे, और बढ़ेगी एकता, उद्देश्य हमारा देश की सेवा-विवेकानन्द हमारे नेता !]
निस्संदेह यह कार्य सबसे कठिन कार्यों में से एक है, जिसे करने का जोखिम कोई विरला व्यक्ति ही उठा सकता है। यह कार्य (गणपति बप्पा मोरिया, छठ-पूजा में रोड-घाट पर झालर लटका देने आदि से बिपरीत) एक ऐसा असामान्य कार्य है, जो किसी का ध्यान अपनी ओर नहीं खींचता, लोगों से सहानुभूति या प्रशंसा भी नहीं मिलती। किन्तु महामण्डल का जो सच्चा कर्मी (या नेता) है और यदि वह स्वयं के द्वारा चुने हुए कठिन कार्य के गुरुत्व को समझता है, तो वह निश्चित रूप से दूसरों की वाहवाही प्राप्त करने को एक निरर्थक वस्तु समझता है। वह जानता है कि सभी की भलाई के लिए पहले 'अपने जीवन को सुन्दर ढंग से गढ़ लेना'- सबसे बड़ी देश सेवा है। स्वयं मनुष्य बनकर दूसरों को मनुष्यत्व अर्जित करने में सहायता करना, देश पर केवल मर-मिटना ही नहीं बल्कि सिर्फ अपने देश के लिये जीना-- से बढ़कर अन्य कोई समाज- सेवा नहीं है।
यदि किसी युवक के पास एक स्वस्थ-सबल शरीर और सभी का कल्याण करने की दृढ़ इच्छाशक्ति के आलावा अन्य  कोई जमा-पूंजी न भी हो, किन्तु उसे अपने आदर्श और उद्देश्य तथा अपने निर्भीक प्रयास के विषय में अटल विश्वास हो, तो वह उसी ठोस बुनियाद पर अपने जीवन का निर्माण कर सकता है। और अपना सुन्दर चरित्र गढ़ लेने के बाद, वह चाह ले तो बिना कोईअन्य पूँजी निवेश किये ही दूसरों को भी मनुष्यत्व अर्जित करने में सहायता प्रदान कर सकता है। और यदि कोई युवा पूरी ईमानदारी के साथ 'बनो और बनाओ' की प्रक्रिया को निरंतर जारी रखता हो तो उतने से ही  समाज को अंततोगत्वा बहुत बड़ी सेवा प्राप्त होगी।
हमें अदूरदर्शी नहीं होना चाहिए और दूसरे तथाकथित समाज-सेवी संगठनों के जैसा समाज सेवा के विषय में संकीर्ण विचार नहीं रखना चाहिए। यदि हम पहले इस कार्य (चरित्रवान-मनुष्य बनने का कार्य) को पहले किये बिना सीधा समाज-सेवा कार्य में कूद पड़ेंगे तो वह समाज सेवा- निम्न कोटि की समाज-सेवा होगी। गीता २. ४९ में कहा गया है - 
 दूरेण ही अवरं कर्म बुद्धियोगात्  धनंजय।
बुद्धौ शरणम् अन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः।।

- इस बुद्धियोग की तुलना में, (एनी एक्शन विथ अ सेल्फ़िश मोटिव इज फार इन्फीरियर.) (सकाम-) कर्म अत्यन्त निकृष्ट हैं, इसलिये हे धनंजय तुम बद्धि की शरण लो फल की इच्छा करनेवाले कृपण (दीन) हैं।।
कारण कि बुद्धियोग (निष्काम कर्म)  तो परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला है और सकाम कर्म जन्म-मरण देने वाला है। 
यदि हम अपने जीवन का निर्माण ठीक ठीक ढंग से कर लेते हैं, तो हमें हमारे अंतर्निहित पवित्रता और शक्ति के बारे में अधिक स्पष्ट धारणा हो जायेगी। फिर यह जान लेने के बाद कि वही पवित्रता और शक्ति सर्वत्र सभी के भीतर विद्यमान है, हमारा निःस्वार्थ कर्म सबों के भीतर विद्यमान 'पवित्रता और शक्ति' की पूजा (सेवा) बन जाएगी। और ऐसा ही कर्म मनुष्य जीवन को सार्थक बना सकता है। गीता: (१८.४६) में कहा गया है -
यतः प्रवृत्तिः भूतानां येन सर्वं इदं ततम्।
स्वकर्मणा तम् अभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।।

जिस (परमात्मा) से भूतमात्र की प्रवृत्ति अर्थात् उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उस (परमात्मा) की स्वकर्म द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है।।
[ व्याख्या :  'मानवः' पद का तात्पर्य केवल ब्राह्मण या हिन्दू ही नहीं होता इसके अंतर्गत सभी जाती (जैसे दलित, आदिवासी) और सभी धर्म (मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, पारसी, यहूदी आदि) के मनुष्य से है। इसीलिए जब कोई भी मनुष्य अपने स्वभाव (वर्ण- देहाध्यास की प्रोपेन्सिटीज) तथा स्वधर्म (आश्रम= जैसे ब्रह्मचर्य, गृहस्थ आदि) के अनुसार कर्म करता है तब उसकी पूर्वार्जित वासनाओं का क्षय होता जाता है। यह वासना निवृत्ति तथा इसके फलस्वरूप प्राप्त होने वाली चित्त की शुद्धि और शान्ति तभी संभव होती है, जब मनुष्य अपने अहंकार को त्यागकर ईश्वरार्पण की भावना से कर्म करना सीख लेता है। ईश्वरार्पण की भावना से कार्य करने में अहंकार सर्वथा लुप्त हो जाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि अपने कर्म के पालन में पूजन की भावना आ जाने पर हमारा कार्यक्षेत्र ही मन्दिर या तीर्थस्थान बन सकता है। (शिव-ज्ञान से जीव-सेवा  करके मनुष्य "सिद्धि " अर्थात 'ज्ञानमयी दृष्टि से जगत को ब्रह्ममय देखने' की योग्यता रूपी
'सिद्धि' या  'वामन-पंगु' में भी भगवान को देखने की योग्यता रूप अभेद-दृष्टि को प्राप्त होता है।]    
{साभार http://www.gitasupersite.iitk.ac.in/} 

साधारण मनुष्य जैसे ही स्वामी विवेकानन्द के नाम से जुड़े किसी संगठन के विषय में सुनते हैं, तो उनकी कल्पना-शक्ति उन्हें समाज के अंतिम छोर में बसे पददलित और दीन-हीन श्रेणी के मनुष्यों की सेवा के कार्य-क्षेत्र (अन्त्योदय ?) में ले जाती है। यह सच है कि स्वामी जी वैसे कार्य होते हुए देखना भी चाहते थे।
किन्तु हमें स्वामी जी ने इस प्रकार के कार्यों को करने से पहले आत्म-विकास करके इन कार्यों को सम्पादित करने योग्य बनने (चरित्रवान मनुष्य बनने) का जो निर्देश दिया था, अक्सर हम उनके उस निर्देश को ही भूल जाते हैं। [प्रारम्भिक तैयारी के 'आदेश' - अर्थात 'दृष्टि को ज्ञानमयी बनकर जगत को ब्रह्ममय देखने की योग्यता (सिद्धि) प्राप्त कर लेने ' के आदेश को ही भूल जाते हैं !]
' वी वान्ट टु रश टु दी कॉलेज, बिफोर वी फिनिश दी स्कूल'- अपनी प्राथमिक शिक्षा या स्कूली शिक्षा समाप्त किये बिना ही, हमलोग कॉलेज में नाम लिखाने के लिये दौड़ पड़ते हैं।  'देयर आवर बुद्धि फेल्स अस' - यहीं पर हमारी बुद्धि हमें धोखा दे जाती है!  इसीलिये भगवान श्रीकृष्ण हमें - 'बुद्धौ शरणम् अन्विच्छ' - तुम बुद्धि की समता (poised reason) की शरण लो" का उपदेश देते हैं। और उपनिषद के ऋषि हमें विद्या की शरण में जाने की (विद्या = विज्ञान या विशेष ज्ञान = श्रीरामकृष्ण ही आधुनिक युग के अवतार हैं, उनकी शरण में जाने की) सीख देते हैं !  
स्वामी विवेकानन्द की योजना (Be and Make) गीता और उपनिषद द्वारा निर्देशित उपरोक्त प्रस्तावों का
(in Toto) पूर्णतः अनुसरण करती है! और यही कारण है कि उनके द्वारा निर्देशित समाज सेवा, अन्य सभी प्रकार की समाज-सेवा से बिल्कुल भिन्न होती है। इसीलिये महामण्डल थोक-भाव में विदेशों से आयातित समाज-सुधार के सिद्धान्तों एवं समाजसेवी क्लबों की कार्य-पद्धति का अनुसरण नहीं करता, बल्कि स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रदत्त योजना का ही अनुसरण करना चाहता है। क्योंकि "दी आर्गूमेन्ट फॉर क्विक ऐकशन इज लेम" - अर्थात " समस्याओं का तत्काल निदान या (क्यूरेटिव ट्रीटमेन्ट ) करने के पक्ष में दिया गया तर्क बहुत कमजोर है"; तथा ऐसी सोच समत्व बुद्धि (equanimity) की कमी के कारण उत्पन्न होती है।"
 वन मस्ट बी रेडी टु पे दी राइट प्राईस फॉर दी वैल्युड कमॉडिटी"-  कोई मूलयवान वस्तु प्राप्त करनी हो, तो हमें उसका उचित मूल्य चुकाने के लिए भी अवश्य तैयार रहना चाहिए। साधारण मनुष्य केवल जिस स्थूल समाज सेवा - (इन्द्रिय-गम्य समाजसेवा जैसे -अन्नदान, वस्त्रदान, रिलीफ-वर्क, या मोतियाबिंद का ऑपरेशन आदि) को समझ पाते हैं, वे सभी अच्छे कार्य हैं, किन्तु महामण्डल समस्त पीड़ित मानवता की दशा को सुधारने के लिए, बहुत बड़े पैमाने पर उस प्रकार के कार्यों को करने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर कभी नहीं लेगा। 
क्योंकि हमारी बुद्धि ही हमें बता देगी कि बड़े पैमाने पर किये जाने वाले समाज-सेवा (रिलिफ-वर्क, भवन और हॉस्पिटल आदि बनवाने) से अपने को अलग रखना, हमारी विफलता तो कत्तई नहीं है। यदि कार्य करने के सीमित क्षेत्र का चयन कर - 'इफ़ प्रॉपर स्कूलिंग ऑफ़ यूथ्स'--यदि केवल युवाओं को सही प्राथमिक शिक्षा देने का कार्य किया जा सके; तो सही प्रथमिक शिक्षा (चरित्रवान मनुष्य बनने और बनाने का प्रशिक्षण) प्राप्त युवा जब अपनी आजीविका के लिए या स्वैच्छिक सेवा के लिए जिस किसी भी कार्य-क्षेत्र में जायेंगे, वहाँ वे विभिन्न तरीकों से हज़ार गुना अधिक सच्ची समाज-सेवा करने में समर्थ होंगे। 
किन्तु इस प्राथमिक कार्य (चरित्र-निर्माण की सही स्कूली शिक्षा) को पूर्ण किये बिना कोई भी समाज- सेवा का कार्य अंततोगत्वा सफल सिद्ध नहीं हो सकेगा। 
इसीलिए महामण्डल ने अपनी अल्प-क्षमता के अनुसार समाज-सेवा करने के कार्य को, केवल अपने साध्य को पाने का एक साधन (अद्वैत के सिद्धान्त में उपनीत होने का उपाय ) के रूप में ही ग्रहण करता है। इसने जिस कार्य को अपने लक्ष्य के रूप में चुना है, इसके पास उसे पूरा करने की तकनीकी जानकारी भी है, और अब तो उसका परिणाम भी साफ साफ दिखाई पड़ने लगा है। इसीलिये महामंडल ने केवल स्वामी विवेकानंद के परामर्श पर और एकमात्र उन्हीं के बताये रास्ते पर चलने का निर्णय ले लिया है !    
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तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद । 
नाना तु विद्या चाविद्या च यदेव विद्यया करोति 
श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति 
खल्वेतस्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति ॥  
***छान्दोग्य उपनिषद्  (१.१. १०)॥
[{i}. तेन उभौ कुरुतः यश् च एतद् एवं वेद यश् च न वेद । {ii}. नाना तु विद्या च अ-विद्या च ।
{iii}. यद् एव विद्यया करोति श्रद्धया उपनिषदा तद् एव वीर्यवत्तरं भवति (विद्यया=विज्ञानेन= विशेष-विज्ञानेन सन् यदेव करोति, श्रद्धया=आस्तिक्यबुद्ध्या, उपनिषदा = उपासनेन चोपलक्षितः; तदेव कर्म वीर्यवत्तरं भवति ।) {iv}. इति खल्व् एतस्य एव अ-क्षरस्य उपव्याख्यानं भवति ॥] "
 - अर्थात कोई ऐसा सोच सकता है कि ओम के रहस्य को जाने वाला (अर्थात ब्रह्मवेत्ता मनुष्य= इस युग के अवतार भगवान श्रीरामकृष्ण देव ही आधुनिक युग में ब्रह्म केअवतार  हैं ***- इस रहस्य को जानने वाला) और दूसरा ओम के रहस्य को नहीं जानने वाला अगर एक ही तरह का यज्ञ- "BE AND MAKE" करे तो उसमें दोनों को समान फल मिलेंगे। लेकिन नहीं, ऐसा नहीं है। विद्या और अविद्या दोनों भिन्न हैं, अतः ब्रह्म का ज्ञान होने से और ज्ञान नहीं होने से फल भिन्न होते हैं। ओम  के ज्ञान, श्रद्धा और देवताओं ( deities = ईश्वर की मूर्ति पर मनःसंयोग) की साधना से बहुत अधिक उत्तम फल प्राप्त होते हैं। यह ओम की विस्तृत व्याख्या है।"
[अब प्रश्न उठता है कि 'ब्रह्ममय जगत ' का अनुभव करने की तकनीकी जानकारी - या रिक्वायर्ड नो-हाउ क्या है ? रामचरित मानस बालकाण्ड में गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है -
" राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी, मत हमार अस सुनहु सायानी  "

[ ये तो साधारण बुद्धि से भी समझा जा सकता है कि इन्द्रिय, मन, बुद्धि वहाँ (देश-काल-निमित्त के परे) नहीं जा सकते। क्योंकि वेद कह रहा है - अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति। (अन्यः = दूसरा ऊपर वाला पक्षी, अनशन्न= न खाता हुआ, अभिचाकशीति = केवल देखता रहता है ! (श्वेता : ४-६ ,और मुण्डक: ३-१-१)
नीचे वाला पक्षी जो खाता है? जो ब्रह्म है वो कुछ नहीं करता- वो खाली देखता रहता है, मानो ऊपर वाला पक्षी ठुट्ठा भगवान जगन्नाथ जी हैं,जो बड़ी बड़ी आँखों से देखते रहते हैं, कर्म कुछ नहीं करते । सब कुछ करते हुये भी वह कुछ नहीं करते। केवल नोट करते हैं -कौन मेरी तरफ आ रहा है ?  प्राचीन युग में सिद्धार्थ का गौतम बुद्ध में रूपान्तरित हो जाना, और आधुनिक युग में नरेन्द्र का स्वामी विवेकानन्द में रूपान्तरित हो जाना ही 'अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति' का सही उदाहरण है ? ]
तब प्रश्न उठता है कि तो क्या हमलोग परम-सत्य, ब्रह्म या भगवान को कभी नहीं जान सकते ?  Then, question arises can we never see or know the Absolute Truth, Brahman or God ?
भगवान श्री कृष्ण ने गीता गीता (१८. ५५ ) में स्पष्ट रूप से कहा है कि इस  (Embodiment Element) मौलिक अवतार तत्व को समझने के लिए परा-भक्ति ही एकमात्र मार्ग है-

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्।।18.55।।
(भक्त्या  माम्  अभिजानाति  यावान्  यः  च  अस्मि  तत्त्वतः;  ततः  माम्  तत्त्वतः  ज्ञात्वा  विशते  तत्  अनन्तरम्)
- केवल उस 'परा-भक्ति' के द्वारा ही कोई साधक मुझे तत्त्वतः जान सकता है कि मैं कितना (व्यापक) हूँ तथा मैं क्या हूँ। (इस प्रकार) तत्त्वतः जान लेने के बाद वह तत्काल मुझमें प्रवेश कर जाता है; अर्थात् मेरे जैसा - 'मत्स्वरूप' बन जाता है।।
व्याख्या : परमात्मा से परम प्रेम अर्थात् पूर्ण तादात्म्य ही परा भक्ति है। उस परा भक्ति से ही साधक भक्त परमात्मा को तत्त्वत समझ सकता है। शास्त्र के श्रवण, अध्ययन आदि से प्राप्त किया गया ज्ञान प्रायः परोक्ष होता है। जब वह ज्ञान, विद्या या विज्ञान अर्थात् स्वानुभव बन जाता है;  केवल तभी परमात्मा का यथार्थ बोध होता है। यावान् (मैं कितना हूँ) इसका अर्थ यह है कि परा भक्ति के द्वारा एक भक्त भगवान् के उपाधिकृत विस्तार को समझ लेता है। यश्च अस्मि (मैं क्या हूँ) एक परम भक्त यह भी जान लेता है कि भगवान् का वास्तविक स्वरूप समस्त उपाधियों से वर्जित, निर्गुण, निर्विशेष है।
सारांशत, भगवान् को तत्त्वतः जानने का अर्थ उनके सर्वव्यापक एवं सर्वातीत इन दोनों ही स्वरूप को जानना है। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि सम्पूर्ण गीता में भगवान् श्रीकृष्ण अपने लिए जो मैं शब्द का प्रयोग करते हैं, वह अपने परमात्म स्वरूप की दृष्टि से ही कहते हैं, वसुदेव के पुत्र के रूप में नहीं। अत जब वे कहते हैं वह (साधक) मुझमें प्रवेश करता है- तब उसका अर्थ किसी गृह में प्रवेश के समान न होकर साधक की आत्मानुभूति से है। जैसे स्वप्न द्रष्टा का जाग्रत् पुरुष में प्रवेश करता है। यहाँ कथित प्रवेश ऐसा ही है। भक्त का आत्मस्वरूप भगवान् के परमात्मस्वरूप से भिन्न नहीं है। ('Knowing and Entering' ट्रान्सेंडैंटल (अतीन्द्रिय) आध्यात्मिक विषयों की स्पष्ट रूप से व्याख्या कर पाना बहुत कठिन कार्य है । क्योंकि वह - 'That' आत्मा या परमात्मा भावों की अभिव्यक्ति करने या उपमा देने वाले शब्दों के पहुँच से परे है। जब यह बात उपनिषद् और कुरआन एक साथ कह रहे हैं,  एकमेवाद्वितीयं = ला इलाह इल्लल्लाह, जो स्वयं अद्वैत हैं,अर्थात ईश्वर एक ही है और अद्वितीय है, तब उनकी उपमा किस वस्तु से दी जा सकती है? इसीलिए मानवजाति के मार्गदर्शक नेता (श्रीकृष्ण) द्वारा उपमान में कहे गए शब्द सत्य के जिज्ञासुओं के लिए अंधे की लाठी जैसा प्रारंभिक सहायता पहुँचाने के लिए दी जाती है। जब वह स्वयं आत्मसाक्षात्कार कर लेता है, उसके लिये फिर इन शब्दों का कोई मोल नहीं रह जाता। He himself becomes an embodiment of knowledge. ब्रह्मवेत्ता मनुष्य स्वयं ज्ञान का एक अवतार बन जाता है !( जानत तुम्हीं तुम्ह होई जाई -ब्रह्मविद ब्रह्मैव भवति !)
 इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि एक साधन सम्पन्न उत्तम अधिकारी निदिध्यासन के द्वारा परमात्मा का अनुभव आत्मरूप से ही करता है; उससे भिन्न रहकर नहीं। जिसकी निरन्तर ब्रह्मभूतअवस्था रहती है, उसके सात्त्विक ज्ञान में सब जगह ही अपने स्वरूपका बोध रहता है। वह उनमें प्रविष्ट हो सकता है और उनके दर्शन भी कर सकता है! (शिव-ज्ञान से जीव सेवा या) जगत् के प्राणियों की सेवा के बिना ईश्वर की सेवा पूर्ण नहीं होती।
साभार http://www.gitasupersite.iitk.ac.in/}
" व्हाई वरशिप (दी सोशल सर्विस ) शुड बी डन विथ विजडम?":  
स्वामी विवेकानन्द को जिन्होंने भली- भाँति देखा और समझा था, वही 'भगिनी निवेदिता' कहती हैं - " उनके लिये मानव की सेवा और ईश्वर की पूजा, पौरुष तथा श्रद्धा, सच्चे चारित्रिक बल और आध्यात्मिकता में कोई अन्तर नहीं है। लेकिन इसे समझने के लिये निश्चय ही हमें अद्वैत के सिद्धान्त [व्हाई वरशिप =दी सोशल सर्विस  शुड बी डन विथ विजडम?में उपनीत होना होगा।" 
{ii}. नाना तु विद्या च अ-विद्या च .... [But, knowledge (सेन्ट्रीपीटल पॉवर ) and ignorance (सेन्ट्रीफ्यूगल पॉवर ) are डिफरेंट.....] 
आचार्य शंकर, जैसे जिन विद्वानों, आचार्यों या मानवजाति के मार्गदर्शक नेताओं ने जगत को मिथ्या {?} कहा है, वे यह तब कह पाये जब उन्होंने आत्मसाक्षात्कार कर लिया। आत्मसाक्षात्कार का अनुभव कर लेने के बाद ही कोई कह सकता है - 'मैं सत्य (साश्वत आत्मा)  हूँ, मैं मुक्त हूँ असत्य (मृत्यु)  से!' अपने अज्ञान का ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है। 
ब्रह्म सत्य है जगत मिथ्या। इसे दर्शनशास्त्र में माया-वाद (या विवर्तवाद)  कहा गया है। ‘ अघटन घटना पटियसि माया'   अर्थात् ‘‘जो है, वह न होने और जो नहीं है, उसे होने जैसा अनुभव कराने वाली  सत्ता-  माया कहलाती है।"जो लोग मायावाद का अर्थ यह समझते हैं कि यह संसार माया है यानी असत् है, है ही नहीं, वे न तो माया का अर्थ जानते, नहीं, मायावाद का स्वरुप समझते हैं। 
वेदान्त के आचार्य अथवा दार्शनिक-ऋषि लोग इस 'दृष्टिगोचर जगत' को कभी 'असत्य' नहीं कहते हैं, वे इस विश्व-ब्रह्माण्ड को ‘सापेक्षिक सत्य‘ कहते हैं जो विद्यामाया और अविद्यामाया के (के नियमों के)  द्वारा अपना अस्तित्व (संतुलन?) बनाये रखता है। जगत की सत्ता है ही नहीं, ऐसा वेदान्तविद् (ब्रह्मवेत्ता मनुष्य ) कभी नहीं कहते । वे मात्र यही कहते हैं कि जगत की व्यावहारिक सत्ता है । निरपेक्ष दृष्टि से वह सत्य नहीं है, किन्तु वह असत्य भी नहीं है। यह सदा स्मरण रखना चाहिए कि वेदान्त में 'मिथ्या' का अर्थ ‘असत्’ नहीं, अपितु अनिर्वचनीय होता है । 
सामान्य अर्थो में जिसे सत्य कहा जाता है, वह वास्तव में सापेक्षिक सत्य (रिलेटिव ट्रुथ या कम्पैरटिव ट्रुथ)
 है। इस सापेक्षिक सत्य को निरपेक्ष सत्य के जैसा बोध कराने वाली शक्ति का नाम माया है  ‘सत्य‘ सदैव अपरिवर्तनशील होता है, प्रत्येक स्थिति में एक सा, एकरस। परन्तु सापेक्ष-सत्य या 'मिथ्या' निरंतर परिवर्तनशील होता है। जो अपरिर्विर्तत रहता है उसे निर्पेक्ष सत्य (ऐब्सलूट निरपेक्ष या पूर्ण सत्य - अविनाशी है) और जो परिवर्तित होता है उसे सापेक्षिक सत्य (नश्वर) कहते हैं।
स्वामी विवेकानन्द  कहते हैं, " इस जगत में कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं जो पूरी तरह से बुरा (शैतान ) हो, जिसे अच्छे मनुष्य या चरित्रवान मनुष्य में रूपान्तरित नहीं किया जा सकता हो; क्योंकि ब्रह्म  ही वह अंतिम सत्य हैं, जिनसे सम्पूर्ण जगत अभिव्यक्त हुआ है। नीचे दिये चित्र में- यह ब्रह्म (a) दी एब्सोल्यूट, (c) टाइम-स्पेस-कॉज़ेशन देश-काल-निमित्त (कारणत्व ; कारण-कार्य संबंध) में से होकर आने से (b) जगत या दी यूनिवर्स बन गया है। यही अद्वैतवाद की मूल बात है।
हम देश-काल-निमित्त रूपी चश्मे से ब्रह्म (प्रेम और पवित्रता की प्रतिमूर्ति श्रीरामकृष्ण के चित्र ) को देख रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि जहाँ ब्रह्म है, वहाँ देश-काल-निमित्त नहीं है। काल वहाँ रह नहीं सकता, क्योंकि वहाँ न मन है, न विचार। देश भी वहाँ नहीं रह सकता, क्योंकि वहाँ कोई बाह्य परिणाम नहीं है। और जहाँ सत्ता केवल एक है, वहाँ कार्य-कारणवाद भी नहीं  सकता; क्योंकि निमित्त ब्रह्म के नाम-रूप में अधःपतित होने के बाद ही होता है, उससे पहले नहीं। और हमारी इच्छा, वासना आदि जो कुछ है, वे सब उसके बाद ही आरम्भ होते हैं। " २/८५] 
इस सृष्टि का नाम जगत इसीलिये पड़ा कि यहाँ हर वस्तु निरन्तर गतिशील है। पारमार्थिक दृष्टि से जगत
सत्य नहीं है, न ही असत्य है अपितु वह ‘मिथ्या’ है । जैसे सर्कुलर मोशन (वृत्ताकार गति) करने वाले किसी पिंड पर संतुलन बनाये रखने के लिये तुरंत दो बल सक्रिय हो जाते हैं एक केन्द्र की ओर अर्थात् सेन्ट्रीपीटल और दूसरा केन्द्र के बाहर की ओर अर्थात् सेन्ट्रीफ्यूगल। ब्रह्माॅंड के केन्द्र में परमपुरुष (हृदय में श्रीरामकृष्ण देव) की ओर विद्यामाया (सेन्ट्रीपीटल पॉवर)  और बाहर की ओर अविद्यामाया (सेन्ट्रीफ्यूगल पॉवर) सक्रिय रहती है। ईशा.उपनिषद मंत्र ११ में कहा गया है - 
“विद्यां च अविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह ।
अविद्याया मृत्युँ तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥”
(विद्यां च अविद्यां च यः तद् उभयं सह वेद, सह अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्यया अमृतम् अश्नुते ।) 
अर्थात्-’जो विद्या और अविद्या, को साथ-साथ जानता है, वही अविद्या द्वारा मृत्यु को पार कर विद्या की शक्ति से अमृतत्व को प्राप्त करता है । 
अविद्या का अर्थ सांसारिक ज्ञान (सापेक्षिक सत्य या परिवर्तनशील सत्य का ज्ञान) होता है, तथा विद्या का अर्थ आत्म-ज्ञान ( निरपेक्ष सत्य या अपरिवर्तनशील सत्य का ज्ञान ) होता है। अविद्या से मृत्यु को पार करके हमे विद्या द्वारा अमृत या ज्ञान प्राप्ति करनी चाहिए। अर्थात  विद्या और अविद्या मे सामंजस्य रखते हुए, हमे विद्या से अमृत प्राप्ति करनी चाहिए। यह जगत सापेक्षिक सत्य है परंतु अज्ञानवश  हम इसे निर्पेक्ष सत्य मानकर उसके स्वाभाविक परिवर्तनों से प्रभावित होकर सुख दुख का अनुभव करते हैं और मैं- मेरा तथा तू - तेरा के चक्कर में पड़ जाते हैं।
हमें सम्यक रूपसे अविद्यामाया की मदद लेते हुए विद्यामाया का साथ देना चाहिये। यदि हम  केवल विद्या की उपासना करेंगे तो जीवन की मूलभूत आवश्यकतायें भोजन, वस्त्र ,आवास आदि कौन जुटायेगा? इन्हें आवश्यकतानुसार प्राप्त करने के लिये ही अविद्या का सहारा लेना पड़ता है । किन्तु यदि केवल अविद्या की उपासना करेंगे तो यहीं फंसे रहेंगे । सापेक्ष सत्य को स्थिर सत्य मान बैठने की प्रवृत्ति ही माया बन्धन है। व्यक्ति जब इस परिवर्तनशील जगत के किसी अनुभव विशेष को परम सत्य मान बैठता है, तो वह भ्रम में होता है, माया-पाश में बँधा होता है।  
ब्रह्म, परमात्मा या (ठाकुर देव ) की बीज-शक्ति, जिससे यह प्रकृति उत्पन्न है और जिसमें यह सृष्टि या प्रकृति अवस्थित है, उसी का नाम ‘माया’ है। “यथोर्णनाभिः सृजते गृह्यते च ......तथाक्षरात् सम्भवतीह विश्वम्॥ मुंडकोपनिषद ( खंड १- श्लोक ७ ) जैसे मकड़ी अपने ही शरीर से तन्तु उत्पन्न करती है और फिर उन्हें ही समेट कर गृहण कर लेती है,जैसे व्यक्ति के शरीर से बाल निकलते हैं, उसी प्रकार अविनाशी चैतन्य ऊर्जा से, पवित्र अक्षर ब्रह्म ॐ से यह (नाम-रूपात्मक) सृष्टि उत्पन्न होती है। 
माया को एक चकाचौंध, कहा जा सकता है, जो अपने तीव्र एवं चपल प्रकाश में आँखों में ऐसा प्रभाव डालती है कि उसमें वस्तुएँ दिखती तो हैं किन्तु ठीक से (उनके यथार्थ स्वरूप में)  नहीं देखी जा सकतीं।
श्रुतियों में कहा गया है- 'जो अविद्या के उपासक हैं वे गहन अन्धकार में जाते हैं, किन्तु जो केवल विद्या  की उपासना करते हैं, वे और भी गहन अन्धकार में जाते है ! 
 ‘‘ अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। 
                     ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाँ रताः ॥ ईशा.उपनिषद- ९" 
अतः स्पष्ट है कि सम्यक अविद्या का उपयोग कर विद्या की उपासना करने से ही हम अपनी आध्यात्मिक प्रगति कर सकते हैं। 
क्योंकि यह जगत असत नहीं मिथ्या है या परिवर्तनशील सापेक्षिक सत्य है। सत्‍य तो यह है कि उपनिषद को न तो मात्र ज्ञान इष्‍ट है और न केवल कर्म। ज्ञान और कर्म का सन्तुलित प्रयोक्‍ता पुरूष अमृतत्‍व का भागी होता है। 
न केवल जन्‍म का प्राधान्‍य है न मृत्‍यु का ये जीवन के दो महत्‍वपूर्ण छोर है दोनो के प्रति समन्‍वय दृ‍ष्‍टि सदा अपेक्षित है। न केवल व्‍यष्टि वाद (आत्मकल्याण Be) समाज का हित साध सकता है न समष्टि वाद (लोक-कल्याण या Make) से बल्कि ," परस्पर सहायता - BE AND MAKE" से ही एक सुखी सवस्‍थ मानव-सामाज की कल्‍पना आकार लेती है। जीवन के इस रहस्य को ग्रहण करने वाला कर्मी ही अमृत का अधिकारी होता है।
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