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रविवार, 31 जुलाई 2016

११. ऑटोसजेशन : ' संकल्प-ग्रहण और संघबद्ध प्रयत्न' [5 'Will and Unite'एक नया युवा आंदोलन]

आत्म-सुधार के लिये  संकल्प ग्रहण (ऑटोसजेशन) और संघबद्ध प्रयत्न 
आज के भारत में - मूविंग अबाउट इन दी फॉर्म ऑफ़ मैन, बट विथ एनिमल स्टिल विदिन .’' मनुष्य  रूपेण मृगाश्चरन्ति'-  लोगों अर्थात मनुष्य के ढाँचे में भीतर से पाशविकता धारण करके विचरण करने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि होती दिख रही है ।  प्राचीन राजा-कवि भृतृहरि ने अपनी रचना 'नीतिशतक' बहुत सुंदर कहा है 
येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः  ।
 ते  मृत्युलोके  भुवि  भार भूता  मनुष्य  रूपेण मृगाश्चरन्ति ॥ 
जिन्होंने न विद्या प्राप्त की है, न तप किया है, न दान दिया है, न ज्ञान अर्जित किया है, न चरित्र-निर्माण करने की चेष्टा की, न गुण सीखे और न ही धर्मानुसार कर्तव्यों का पालन ही किया है- वे इस संसार में पृथ्वी का बोझ बढ़ाने वाले और मनुष्य की सूरत-शक्ल में पशु ही हैं।
इसी बात को वेदान्त आध्यात्मिक अंधापन, अज्ञानता या मायाबद्ध-जीव की अवस्था कहता है। माया (सेन्ट्रीफ्यूगल-फ़ोर्स) के बन्धन से मुक्त होकर, यदि यथार्थ मनुष्य (ब्रह्मविदः) बनना और बनाना यदि हम सभी भारतवासियों की तीव्र अभिलाषा बन चुकी हो, तो हमें इसके लिये महामण्डल द्वारा प्रस्तावित पाँच दैनन्दिन अभ्यासों को आत्मसात करने के लिये संघबद्ध होकर प्रयास करना चाहिये। हमारी पहली आवश्यकता है, अपने भीतर चरित्र के गुणों को संवर्धित करना, क्योंकि हममें से कई लोगों के पास सामान्य मानवोचित चारित्रिक गुण भी नहीं हैं। 
हमलोग अक्सर स्वामी विवेकानन्द के शब्दों को दुहराते हुए प्रार्थना करते हैं," माँ, मुझे मनुष्य बना दो !"  किन्तु क्या यह प्रार्थना हम शुद्ध मन से करते हैं? क्या हम सचमुच ईमानदारी से यह चाहते हैं, कि हमें 'मनुष्य' बन जाना चाहिये ? और यदि हम यथार्थ मनुष्य नहीं बनना चाहते, तो इस प्रकार से प्रार्थना करने की क्या आवश्यकता है ? ऐसी प्रार्थना का कोई मूल्य नहीं है। वास्तव में हमलोग मनुष्य कहलाने योग्य 'मनुष्य' नहीं बन सके हैं । समाज में कई लोग बिल्कुल पशु के समान हैं, वे बिल्कुल जानवरों की तरह व्यवहार करते हैं। समाज में यथार्थ मनुष्य कितने दिखाई देते हैं ? 
यही कारण है कि मानव-समाज की वर्तमान हालत ऐसी है। हर कहीं कितना अन्याय है, हमें सामाजिक जीवन के कामकाज के विषय में कितनी शिकायतें हैं। समय-समय पर हम प्रतिवाद करते रहते हैं, कभी कभी (निर्भया केस ?) तो हमारा गुस्सा फट पड़ता है, किन्तु क्या हम, कैंडल मार्च निकालने के सिवा इन बुराइयों को समाज से दूर करने के लिये अन्य कोई कार्रवाई करते हैं ?
 हमलोग समाज में हर बुराई के लिये दूसरों को जिम्मेदार ठहराते हैं, दूसरों पर आरोप लगाते हैं । किन्तु हम स्वयं कोई उत्तरदायित्व नहीं लेना चाहते। समाज और देश को महान बनाने के कार्य में हमलोग स्वयं कोई भूमिका नहीं, निभाना चाहते, इसको भी दूसरों के सिपुर्द कर ठेके पर करवाना चाहते हैं। हमलोग स्पष्ट रूप से देख रहे हैं  कि अब सामाजिक परिस्थिति ऐसी है, जो बुरी ही नहीं बल्कि इन्टॉलरेबल या असहनीय हो चुकी है। इससे समाज को बहुत ज्यादा नुकसान हो रहा है, फिर भी हम जानते हैं कि बहुत से बुद्धिजीवी इन घटनाओं को बहुत गंभीरता से नहीं लेते। वे ऐसा नहीं सोचते कि सामाजिक-स्थिति में बदलाव लाने के लिये उन्हें भी कुछ न कुछ अवश्य करना चाहिये। हममें से अधिकांश लोग ऐसा नहीं मानते कि इन- नारी अपमान, जुवनाइल जस्टिस या भ्रष्टाचार ' आदि समस्याओं  हल करने या इन्हें दूर हटाने में (कड़े कानून बनाने या लोकपाल बिल पास करवाने के आलावा) हमारी अपनी भी कोई भूमिका हो सकती है। इसीलिये सलाह देते हैं कि 'अब सरकार को इसके लिए कुछ न कुछ करना ही चाहिये !' 
किन्तु ऐसी खोखली हमदर्दी से समाज को क्या लाभ होगा ? इस कार्य को करेगा कौन ? समाज में बदलाओ लाने या मनुष्य के हृदय को परिवर्त्तित करने, मनुष्य  'बनने और बनाने  BE AND MAKE ' के आन्दोलन का नेतृत्व करने की  जिस  अत्यन्त महत्वपूर्ण जिम्मेदारी  को स्वामी विवेकानन्द ने युवाओं के ऊपर सौंपा था, उस जिम्मेवारी को  पूरा कौन करेगा ? केवल लिप सर्विस (दिखावटी-प्रेम) करने से काम नहीं चलेगा - 'इसके लिए कुछ करना चाहिये' या 'लेट इट बी डन' ऐसा गोल-गोल भाषण देना - एक अस्पष्ट और उभयार्थक वाणी  है। (स्वामी जी कहते थे - 'वी वान्ट बोल्ड वर्ड्स ऐंड बोल्डर डीड्स !'  यदि हम यह घोषित करें - " मैं इस कार्य को करने जा रहा हूँ' , और तुम्हें भी इस कार्य में मेरी सहायता करनी चाहिये" - तो यह स्पष्ट और निर्भीक वाणी है, जिसे  हर कोई समझ सकता है। किन्तु हम यदि दिखावटी देश-प्रेम प्रदर्शन करते हुए, केवल यही कहते रहें कि -'मनुष्य बनना और बनाने की चेष्टा करना, तो अच्छा काम है और इसे होना भी चाहिए - ' लेट इट बी डन'!; किन्तु इस अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य की जिम्मेदारी उठाने - कौन जा रहा है ? 
यदि हम केवल कहते रहें,' कुछ करना चाहिये, समाज को अच्छा होना चाहिये, समाज से सभी बुराइयों को समाप्त होना ही  चाहिये';- किन्तु स्वयं इसके लिए कुछ न करें, तो ऐसे दिखावटी बातों या  'लिप सर्विस' का समाज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।  यदि हम इस निर्णय पर नहीं पहुँचे हैं कि इस 'कार्य की शुरुआत मैं करूंगा या तुम करोगे- तो यह चरित्र-निर्माणकारी आन्दोलन आगे कैसे बढ़ेगा ?  मैं स्वयं इस कार्य में भागीदार नहीं बनना चाहता, किन्तु मैं इच्छा रखता हूँ, कि समाज में ऐसा बदलाव आना चाहिये, सभी युवाओं का चरित्र अच्छा होना चाहिए । मैं केवल इच्छा रखता हूँ, किन्तु इस प्रकार की इच्छा करने का कोई फल नहीं होता, यह बिल्कुल अर्थ-शून्य इच्छा है।
" इंस्टेड ऑफ़ विशिंग आइ शुड विल" : मात्र इच्छुक रहने या अभिलाषा रखने के बदले, (आत्मसुझाव-पद्धति के अनुसार) मैं संकल्प लूँगा कि,  ' मैं एक चरित्रवान मनुष्य बनूँगा !' यदि हम सदैव केवल इच्छुक ही बने रहते हैं, तो इसका अर्थ हुआ कि, चरित्रवान-मनुष्य बनना अभी मेरी 'बर्निग-डिज़ायर' या तीव्र इच्छा नहीं है, इसीलिये यह कभी मूर्त रूप नहीं ले सकेगी। किन्तु यदि इच्छुक बने रहने के बजाय, यदि हमलोग ऑटोसजेशन या मनोवैज्ञानिक पद्धति के अनुसार संकल्प लेना सीख जायें तो हमारे अवचेन मन में गहराई से बैठे संकल्प को मूर्त रूप लेने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।
 किसी लक्ष्य को प्राप्त करने की दृढ़ इच्छा-शक्ति को ही संकल्प कहते हैं , मैं अवश्य करूँगा - आई वील । यह विलिंग अर्थात- संकल्प उठा लेना सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। (स्वामी जी को प्रति-उत्तर दूँगा- " स्वामी जी, मैं लक्ष्य प्राप्त होने तक -रुकूँगा नहीं ! थकूँगा नहीं ! ") संकल्प उठा लेना ही , भविष्य में प्राप्त होने वाली सफलता का जनक, मुख्य कारण -या बीज स्वरूप है। बिना अपने संकल्प में अटल रहे, कोई लक्ष्य प्राप्त नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति अपने मन में ठान ले, भीष्म-प्रतिज्ञा के समान दृढ़ प्रतिज्ञा कर ले, वीर योद्धा के समान संकल्प उठा ले - तो किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है, किसी भी ऊँचाई तक पहुँचना सम्भव है, कोई भी वस्तु प्राप्त की जा सकती है !
  ['Autosuggestion'= a system for self-improvement, based on autosuggestion or self-hypnosis developed by Emile Coué   (a French psychologist and pharmacist/ 1857-1926) Most of us are familiar with the quote by Émile Coué,"Everyday,
 in every way, I am getting better and better." फ्रेंच मनो-वैज्ञानिक एमिल कॉओ द्वारा प्रस्तुत (आत्म-सुझाव,स्व-सम्मोहन या)  स्वपरामर्श-सूत्र  "डे बाइ डे, इन एव्री वे, ई एम गेटिंग बेटर एंड बेटर ";जिसे महामण्डल में 'आत्म-सुधार के लिये संकल्प ग्रहण' करने की मनोवैज्ञानिक पद्धति - -'चमत्कार जो आप कर सकते हैं' के नाम से जाना जाता है। (the hypnotic or subconscious adoption of an idea that one has originated oneself, e.g. through repetition of verbal statements to oneself in order to change behavior.) 
कहा भी गया है -' मन के हारे हार है, मन के जीते जीत !' यह कहावत बिल्कुल सत्य है अतः हमलोगों को चरित्रवान मनुष्य (ब्रह्मवेत्ता मनुष्य) बनने के लिये केवल इच्छुक ही नहीं बने रहना चाहिये  -बल्कि दृढ़ संकल्प लेना चाहिये।       
इस काम करने के लिये (अर्थात चरित्रवान मनुष्य बनने के लिए), हमें दूसरों को आदेश नहीं देना चाहिये, या दूसरों से इसकी अपेक्षा भी नहीं करनी चाहिये।  हमें इस बात को अस्पष्ट बिल्कुल नहीं छोड़ना चाहिये,  बल्कि निर्भीक होकर इस बात को कहना चाहिये चरित्रवान मनुष्य बनने और बनाने के कार्य को करने की जिम्मेवारी किसके ऊपर है; कौन इसकी शुरुआत करने जा रहा है ? मैं स्वयं इसका बीड़ा उठाता हूँ, आओ हमलोग मिलजुल कर इस काम को करें। तुम, मैं और अन्य सभी देशभक्त युवा  हमलोग संघबद्ध होकर इस कार्य में जुट जाएँ ।
अन्य जो कोई भी व्यक्ति अपने देशवासियों के कल्याण की चिन्ता करते हों, उन्हें एक साथ आना चाहिये, उन्हें कन्धे से कन्धा, सिर से सिर मिलाकर, बाँहों से बाहें और कदमों से कदम मिलाते हुए हम सबों को साथ-साथ आगे बढ़ना चाहिये। जब हमलोग अपना संघ-गीत- “संगच्छध्वम् संवदध्वम् सं वो मनांसि जानताम्।” गाते हैं, तो उसमें भी यही प्रार्थना करते हैं, " एक साथ चलेंगे, एक बात बोलेंगे, हम सबके मन को एक भाव से भरेंगे; देवगण जैसे हवि बाँट लेते हैं, हम सब सबकुछ बाँट कर ही लेंगे ! हमारे संकल्प समान, भावनायें भी समान, भावनाओं को एक करके परम् ऐक्य पायेंगे ! "
हमें अपनी बिखरी हुई इच्छाशक्ति को दृढ़ संकल्प में सम्नन्वित करके एक साथ आनन्द का उपभोग करना चाहिये। हमें सारे निर्णय या संकल्प एक मन होकर लेने चाहिये, यह राष्ट्रीय-एकता और मिलजुल कर संकल्प लेने की क्षमता ही सबसे अधिक महत्व की वस्तु है।
" मिलजुल कर एक साथ रहेंगे, और बढ़ेगी एकता ! 
उद्देश्य हमारा देश की सेवा, विवेकानन्द हमारे नेता ! "

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