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सोमवार, 1 अगस्त 2016

'बी ऐंड मेक' का निहितार्थ [एक नया युवा आंदोलन- 6] .The implication of ' Be and Make' ]

 बी ऐंड मेक का निहितार्थ :'ब्रह्मविद शिक्षक बनो और बनाओ' ! 
चाहे हम अपने 'स्व' (यथार्थ स्वरूप) को गहराई से जानने की चेष्टा करें अथवा बाह्य प्रकृति को, दोनों अवस्थाओं में हमें उसी अनन्त-असीम (लिमिटलैस) का आह्वान सुनाई देता है। बाह्यजगत और अंतःजगत दोनों अथाह (fathomless) हैं, इनकी गहराई को मापा नहीं जा सकता। इसीलिये हम उस प्रत्येक बाधा को तोड़ देना चाहते हैं, जो हमें सीमाबद्ध करना चाहती है। 
हमें ऐसा महसूस होता है कि स्वयं को एकाकी (isolated) रखना एक पाप है, इसीलिये हम अपने को खो देना चाहते हैं,और दूसरों में- केवल जो हमारे अपने स्वजन (Kin या सगे-सम्बन्धी) हैं, उनमें स्वयं को  प्रसारित करना चाहते हैं। और तब हम पाते हैं कि हमारी सबसे बड़ी विजय तो स्वयं को जीत लेने में है, (अहंकार का मुण्डन कर देने में है) जिसके फलस्वरूप हम अपने कामोन्माद या अपने परिवेश के गुलाम न होकर स्वयं के स्वामी बन जाते हैं।
समाज के वर्तमान संकटपूर्ण अवस्था का मूल कारण यही है कि हमने स्वयं के ऊपर, अपनी महानता के ऊपर विश्वास को ही खो दिया है, इसके साथ ही साथ हमने अपनी अन्तर्निहित अनन्त शक्ति (आँखों में प्रेम का काजल लगाकर जगत को ब्रह्ममय देखने की शक्ति), साधुता (goodness,दयालुता या भगवान) की शक्ति से भरोसा भी खो दिया है। इस खोये हुए आत्मविश्वास और श्रद्धा को सशक्त करने से ही हम इस विकट समस्या पर विजय प्राप्त कर सकते हैं; और यहीं पर व्यक्तिगत प्रयास करने की आवश्यकता होती है।      
मुक्ति (स्वतंत्रता) ही हमारा स्वभाव है, एवं रक्त-सम्बन्ध में अपनापन की भावना रहने के कारण, दूसरों के प्रति हमारा प्रेम - उन सबों को मुक्त देखने के लिये अनुप्रेरित करता है। और यहीं पर व्यक्तिगत चेष्टा (इण्डिभिजुअल एफर्ट) एक सामाजिक प्रयास (सोशल एफर्ट) में रूपान्तरित हो जाती है। इसी सच्चाई को स्वामी विवेकानन्द ने अपने संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित वाणी (या महावाक्य)- 'BE AND MAKE' के माध्यम से अभिव्यक्त किया है।
उनके इसी विचार के साथ थोड़ा और आगे बढ़ने पर हम पाते हैं कि वे इसी बात को इंगित करते हुए कह रहे हैं -" भारत में हम 'सोशल कम्युनिज्म' अर्थात सामाजिक साम्यवाद पाते हैं, जिस पर और जिसके चारों ओर अद्वैत-वेदान्त अर्थात 'स्पिरिचुअल इंडिविजुलिज्म' या आध्यात्मिक व्यक्तिवाद का प्रकाश पड़ रहा है। " (सूक्तियाँ एवं सुभाषित -८/१३४) [भारत में अद्वैत वेदान्त (नॉन-डुअलिज्म, कोई पराया नहीं) की भावना के अनुसार सामाजिक साम्यवाद "सोशल कम्युनिज्म" है -उसी को आध्यात्मिक व्यक्तिवाद " स्पिरिचुअल इंडिविजुलिज्म"- (प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है) कहा जाता है।]  
इस आध्यात्मिक व्यक्तिवाद 'स्पिरिचुअल इंडिविजुअलिज्म' को सामाजिक प्रयत्न (सोशल एफर्ट) में 
अवस्थान्तरित (transit-संक्रांति) करने कार्य को सूचित करने के लिये ही उन्होंने भारत के जनसाधारण को 'विद्या एवं संस्कृति' प्रदान करने का सुझाव दिया था। क्योंकि वे जानते थे कि जनसाधारण की उन्नति किये बिना, हमारा सामूहिक अस्तित्व भी मिथ्या हो जाता है।  
उन्होंने बलपूर्वक भविष्यवाणी करते हुए कहा था - ('यथार्थ राष्ट्र जो झोपड़ियों बसता है, अर्थात) हमारी साधारण जनता अपनी अन्तर्निहित दिव्यता के प्रति ज्यों-ज्यों, जागृत-दर-जागृत होती जाएगी, और इसी जन-जागरण के दौरान वह यदि अपेक्षित विद्या और संस्कृति भी अर्जित कर लेती है, तो उस बाढ़ का हिलोरा उतर जाने के बाद, 'ह्यूमैन अल्लुवियम' अर्थात यथार्थ मनुष्य या  'ब्रह्मविद' मनुष्य रूपी जलोढ़क जमाव (एलुवियल डिपाजिट) द्वारा यह भारत भूमि अत्यन्त उपजाऊ बन जायेगी। और यह उर्वरता ऐसे हजारों सुंदर फूलों को खिला देगी, जो स्वयं मुरझा जाने से पहले, एक एक सर्वाधिक पुष्टिकर फलों (ब्रह्मविद्तर मनुष्यों-नोबल सिक्स हंड्रेड ) को जन्म देते जायेंगे। 
 [जलोढ़क-जमाव (alluvial deposit) कहते हैं - बाढ़ के पानी के बहाव से लायी हुई  मिट्टी, गाद जो प्रवाह के उतर जाने के बाद उस भूमि पर जमा होकर उसे उर्वरा बना देती है।] -
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'बनो और बनाओ'
('स्वामी विवेकानंद ए स्टडी' पृष्ठ 104-106) 
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - ' बनो और बनाओ'-- यही हमारा मूल-मन्त्र रहे ! "बी ऐंड मेक "- लेट दिस बी आवर मोटो! और महामण्डल ने इसी को अपने आदर्श-वाक्य के रूप में ग्रहण किया है। इस अति संक्षिप्त उक्ति (महावाक्य) का अर्थ क्या है ? इस सूत्र का अर्थ बहुत व्यापक है। यह उक्ति महान विचारों को जन्म देती है। इसीमें गीता -उपनिषदों का सार छिपा हुआ है। यदि कोई व्यक्ति केवल इसी एक विचार को संकल्प के रूप में ग्रहण कर ले, और उसे इसी जीवन में पूर्ण कर सके -तो कहा जा सकता है कि उसका मनुष्य-जीवन सार्थक हुआ है।         
कुछ लोगों के मन में यह शंका उठती है : क्या हमें पहले 'मनुष्य' शब्द का जो सही अर्थ है, वैसा-  यथार्थ मनुष्य बन जाना चाहिये, और केवल तभी दूसरों को मनुष्य बनने में सहायता करने की बात सोंचनी चाहिये ? यह बात कई बार दोहराई जा चुकी है कि यद्यपि दूसरों को मनुष्य बनने में सहायता करने से पहले स्वयं एक 'यथार्थ मनुष्य' बन जाना एक आदर्श बात होगी, किन्तु हमलोग स्वयं ' मनुष्य बनने' और दूसरों को महान मनुष्य बनाने की दोनों  पद्धतियों को साथ-साथ कार्यान्वित कर सकते हैं ।
'मनुष्य बनने'  का प्रयास करना ( अर्थात अपने जीवन और चरित्र को गठित करने के लिए उद्यम करना ); स्वयं ही दूसरों के लिए एक उदाहरण और प्रेरणा का एक स्रोत बन जाता है। और यदि हम अपने स्वरूप के प्रति जागृत होकर, इसी विषय में दूसरों की थोड़ी सी सहायता भी करते हैं, तो यह निःस्वार्थ-सेवा हमारे अपने आत्म-विकास के प्रयास को प्रोत्साहित (बूस्ट) करती है। इसलिए  'बनने' के साथ ही साथ यदि हम 'बनाने'  (Make =लोक-कल्याण) का भी थोड़ा प्रयास करते हैं, अपने  'बनने' (Being =आत्मकल्याण) के मामले हमें कुछ खोना नहीं पड़ता है। केवल एक सावधानी यहाँ आवश्यक हो जाती है। यदि हम मनुष्य बनने की दिशा में स्वयं कोई प्रयास नहीं करते, और इस विषय में केवल दूसरों को ही परामर्श देते रहते हैं, तो इससे किसी को  कोई लाभ न होगा। यह दूसरों के लिए अधिक सहायक तो नहीं ही होगा, मैं भी निश्चित रूप से उसका कोई लाभ नहीं उठा पाउँगा। मैं जहाँ था वहीँ रुका रहूंगा, या हो सकता है कि एक या दो सोपान नीचे भी उतर जाऊँ। क्योंकि, उस अवस्था में मुझे अपने विषय में यह 'खुशफहमी' हो सकती है कि मैं ऊँचे स्तर में पहुँच गया हूँ, जिससे मेरा अहंकार बढ़ जायेगा , (और गुरुगिरि करने के चक्कर में) और मैं अपने स्वभाव से नीचे गिर जाऊँगा। 
'मनुष्य बनने की प्रक्रिया' - एक अत्यन्त धीमी गति की प्रक्रिया है, इसमें अग्रगमन धीरे धीरे होता है।  यह किसी  निश्चित समयावधि में निश्चित सिलेबस (तीन साल का डिग्री-कोर्स) को पढ़कर एक दिन ग्रेजुएट बन जाने जैसी प्रक्रिया नहीं है। या जैसे कोई कली सुबह में अचानक खिल कर फूल बन जाती है, और जिसे देखने से बड़ा आनन्द होता है, चरित्र-कमल का खिल जाना भी उतनी सहज प्रक्रिया नहीं है। इस प्रक्रिया को आत्मसात करने में बहुत अधिक सावधान या सतर्क रहने, दृढ़ संकल्प , अविचलता, धैर्य और अध्यवसाय के साथ आजीवन प्रयासरत रहने की आवश्यकता होती है। ऐसा नहीं है कि किसी दिन मैं सुबह सुबह उठकर यह घोषणा कर दूँ -कि मैं तो मनुष्य कहा जाने योग्य 'मनुष्य' बन गया हूँ ! क्योंकि मानव-मन का स्वभाव किसी भी समय ठीक उसी प्रकार नीचे गिरने का होता है, जैसे पानी को नीचे गिरने के लिये जहाँ भी मार्ग मिल जाता है, वहीं से नीचे गिरने लगता है। 
इसी विषय में एक उपाख्यान को सुनना हमारे लिये लाभप्रद हो सकता है। वाराणसी के एक मठ में एक सन्यासी (महंत जी ) रहा करते थे। वे प्रतिदिन गंगा-स्नान करने के लिए जाया करते थे। वहाँ से वापस लौटते समय एक स्त्री प्रतिदिन उनके मार्ग में खड़ी होकर पूछती थी -'बाबा, मैं आपसे कुछ प्रश्न पूछना चाहती हूँ !' महंत जी कभी उसका कोई उत्तर नहीं देते थे, और बिना रुके अपने मार्ग पर आगे बढ़ जाते थे। इसी प्रकार अनेक वर्ष बीत गये और महंत जी के मृत्यु का समय आ गया। उन्होंने अपने शिष्यों से कहा कि उस स्त्री को बुला कर मेरे पास ले आओ। उन्होंने वैसा ही किया और सन्यासी ने उसके आध्यात्मिक जिज्ञासा का उचित देकर उसे संतुष्ट कर दिया। आश्चर्यचकित होकर शिष्यों ने पूछा - 'महाराज, आपने इतने दिनों तक उस स्त्री की आध्यात्मिक प्रश्नों का समाधान क्यों नहीं किया ? 
तब सन्यासी ने उत्तर दिया, ' अभी तक मेरे मन के नीचे उतरने का खतरा सदैव बना हुआ था। इसीलिये मैं आजीवन सतर्क रहता था, 'मैं अब यह जानता हूँ कि मैं जीवित नहीं रहूँगा'। हममें से बहुत से लोगों को ऐसी सावधानी अत्यधिक (टू मच या बेहद ज्यादा) प्रतीत हो सकती है। 'बट वी कैन लर्न अ लॉट फ्रॉम दिस' : किन्तु इस उपाख्यान से हमलोग आत्म-विकास के विषय में बहुत कुछ सीख सकते हैं - 'कॉशन ऐंड केयर मस्ट बी कॉन्सटेंट-अनरिलेटिंग'अर्थात 'मनुष्य बनने' के लिये विवेक-प्रयोग करने के प्रति सदैव कठोर सतर्कता और सावधानी बरतते रहनी चाहिये।       
उसी प्रकार ' मनुष्य बनाने' (मेकिंग) अवधारणा भी बहुत स्पष्ट होनी चाहिये। महामण्डल का पूरा कार्य ही मनुष्य-निर्माण करना है। किन्तु यह 'मनुष्य-बनाने' का कार्य 'Make' किसी भी अवस्था में 'मनुष्य बनने' के कार्य 'Be' से बिल्कुल भी पृथक नहीं है। महामण्डल के आदर्श वाक्य -"Be and Make" में हमें इसी धुन को इसका 'सॉस्टेनूटो' समझना चाहिये! (sostenuto= संगीत का एक धुन, 'वादी-स्वर' जिसे
 निरंतर या एक लंबे समय तक बजाया जाता है; a passage of music to be played in a sustained or prolonged manner.) स्वामी विवेकानन्द ऐसा विश्वास करते थे कि श्रीरामकृष्ण परमहंस देव मात्र अपने कृपाकटाक्ष से  मिट्टी के ढेले से भी हजारों विवेकानन्द का निर्माण कर सकते थे! 
[ श्री रामकृष्ण ने नरेन्द्रनाथ को जगतजननी माँ काली के विषय में बतलाया था कि " वे ही निरपेक्ष ज्ञान हैं, ब्रह्म की दिव्य (अगम्य) शक्ति हैं, और मात्र अपनी इच्छा से ही उन्होंने इस जगत को जन्म दिया है। किसी को कोई भी वस्तु प्रदान करने की शक्ति उनमें हैं। नरेन्द्र को तब अपने गुरु के शब्दों में विश्वास हो गया और अपने आर्थिक कष्ट को दूर करने के लिये उन्होंने माँ काली से प्रार्थना करने का निश्चय किया।
 'काली' को इष्टरूप में स्वीकार करने में अपने संशय के दिनों को स्मरण करते हुए उन्होंने कहा, " मैं 'काली' से कितनी घृणा करता था ! और उसके सभी हावभाव से ! वह मेरे छह वर्षों के संघर्ष की भूमि थी - कि मैं उसे स्वीकार नहीं करूँगा। पर मुझे अन्त में उसे स्वीकार करना पड़ा। रामकृष्ण परमहंस ने मुझे उसे अर्पित कर दिया था। और अब मुझे विश्वास है कि जो कुछ भी मैं करता हूँ, उस सब में वह मुझे पथ दिखलाती है और जो उसकी इच्छा होती है, वैसा मेरे साथ करती है। ... फिर भी मैं इतने दीर्घकाल तक लड़ा। मैं भगवान रामकृष्ण को प्यार करता था और बस इसी बात ने मुझे अविचल रखा। मैंने उनकी अद्भुत पवित्रता देखी। ...मैंने उनके अद्भुत प्रेम का अनुभव किया। तब तक उनकी महानता का भान मुझे नहीं हुआ था। वह सब बाद में हुआ, जब मैंने समर्पण कर दिया। उस समय मैं उन्हें दिव्य-दृश्य आदि देखने वाला एक विकृत-चित्त शिशु समझता था। मुझे इससे घृणा थी। और फिर तो मुझे उसे (काली को) स्वीकार करना पड़ा। " नहीं, जिस बात ने मुझे ऐसा करने के लिए बाध्य किया , वह एक रहस्य है जो मेरी मृत्यु के साथ चला जायेगा। उन दिनों मेरे ऊपर अनेक विपत्तियाँ आ पड़ी थीं। .... यह एक अवसर था ...उसने मुझे दास बना लिया। ये ही शब्द थे -'तुमको दास' ('a slave of you')! तब रामकृष्ण परमहंस ने मुझे उसको सौंप दिया ... आश्चर्यजनक ! 
ऐसा करने के बाद वे केवल दो वर्ष जीवित रहे और उनका अधिकांश समय कष्ट में बीता। वे छह महीने भी अपने स्वास्थ्य और ओज (health and brightness?) को सुरक्षित न रख सके। " जानते ही होंगे, गुरु नानक भी ऐसे ही थे, केवल इस बात की प्रतीक्षा में थे कि कोई शिष्य ऐसा मिले, जिसे वे अपनी शक्ति दे सकते। उन्होंने अपने परिवार वालों की उपेक्षा की -उनके बच्चे उनकी दृष्टि में बेकार थे -तब उन्हें एक बालक मिला, जिसे उन्होंने दिया। तब वे शान्ति से मर सके। " तुम कहते हो कि भविष्य रामकृष्ण को काली का अवतार कहेगा ? हाँ मैं समझता हूँ कि निस्सन्देह उसने अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही रामकृष्ण के शरीर का निर्माण किया था। "८/१३०] 
बाद में जगतजननी माँ काली के विषय में बोलते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा था-'शी कैन मेक हीरोज आउट ऑफ़ स्टोन !' अर्थात "माँ काली पत्थर को भी नायक (मानवजाति का मार्गदर्शक नेता) के रूप गढ़ सकती है !" किन्तु हमलोगों को जब अपने विषय में 'मेकिंग' या 'मनुष्य बनाने' का अर्थ समझना हो, तो 'बनाने' का अर्थ इस संदर्भ में नहीं समझना चाहिये। (वी शुड नॉट री ड दिस मीनिंग ऑफ 'मेकिंग', व्हेन वी आर कन्सर्न्ड।) 
हमारे लिये 'मनुष्य बनाने' 'Make' का अर्थ मनुष्य बनने 'Be'  की प्रक्रिया में स्वयं लाभ उठाते हुए अपने चारों ओर रहने वाले लोगो के साथ एकात्मता का अनुभव करने के प्रयास में एक अत्यन्त अदना सा सहायक (रामसेतु बन्धन में गिलहरी जैसा सहायक) बनने का सौभाग्य प्राप्त करना है ! (For us 'making' means to have the fortune of being infinitesimally instrumental in the process of being of every one around us, profiting in the way in the matter of our own striving to be men.) 
स्वामी विवेकानन्द का यह मानना था कि सम्पूर्ण विश्व की गतिशीलता 'मनुष्य निर्माण' की एक योजना है। उन्होंने ने कहा था -' और हमलोग केवल मनुष्यों को निर्मित होता हुआ देख रहे थे।' किन्तु हमारे लिये 'मनुष्य निर्माण' करने का तात्पर्य केवल दर्शक बनकर मनुष्य बनते हुए देखते रहना ही नहीं है, किन्तु हमें मनुष्यों का निर्माण करने वाले  इस विश्व-रंगमंच पर सतत चलते रहने वाले जीवन्त नाटक में एक छोटे से कलाकार की भूमिका भी निभानी है। महामण्डल पुस्तिका 'विवेकानन्द दर्शनम्' में कहा गया है - 
 नान्यदेका चित्रमाला जगदेतच्चराचरम् |  
 मानुषाः पूर्णतां यन्ति नान्या वार्त्ता तु वर्तते |   
' आफ्टर ऑल, दिस वर्ल्ड इज अ सीरीज ऑफ़ पिक्चर्स. ' दिस कलरफुल कांग्लोमेरैशन एक्सप्रेसेज वन   आईडिया ओनली. मैन इज मार्चिंग टुवर्ड्स परफेक्शन -दी ग्रेट इन्टरेस्ट रनिंग थ्रू। वी वेयर ऑल वाचिंग दी मेकिंग ऑफ़ मेन, ऐंड दैट अलोन। ' 
" सत्य-सा प्रतीत होते हुए भी, आखिरकार- यह चराचर जगत् सतत परिवर्तनशील छाया-चित्रों की एक श्रृंखला मात्र ही तो है। और जगत रूपी चलचित्रों के इस सतरंगी छटा-समुच्चय के माध्यम से केवल एक ही उद्देश्य अभिव्यक्त होता है।
 " अपने भ्रमों-भूलों को त्यागता हुआ - मनुष्य क्रमशः पूर्णत्व प्राप्ति (आदर्श) की ओर अग्रसर हो रहा है ! ' इस  संसार-चलचित्र रूपी धारावाहिक के माध्यम से हम सभी लोग अभी तक केवल मनुष्य को ' मानहूश ' अर्थात आप्त-पुरुष या ब्रह्मविद् ' मनुष्य ' बनते हुए देख रहे थे !
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यथार्थ नेता (ईश्वर के अवतार) अनुयायी नहीं बनाते , नेता बना देते हैं।
" हाँ मेरा अपना जीवन किसी एक महान व्यक्ति के उत्साह के द्वारा प्रेरित है, पर इससे क्या ? कभी भी एक व्यक्ति के द्वारा संसार भर को प्रेरणा नहीं मिली। मैं इस बात में विश्वास करता हूँ कि श्री रामकृष्ण परमहंस सचमुच ईश्वर-प्रेरित थे। परन्तु मैं भी प्रेरित किया गया हूँ और तुम भी प्रेरित किये गए हो! तुम्हारे शिष्य भी ऐसे ही होंगे, और उनके बाद उनके शिष्य भी । यही क्रम कालान्त तक चलता रहेगा। ८/१३६ 
" मुझे विश्वास हो चला है कि नेता का निर्माण एक जीवन में नहीं होता। उसे इसके लिये जन्म लेना पड़ता है!
क्योंकि कठिनाई संगठन और योजनाएं बनाने में नहीं होती; नेता की परीक्षा, वास्तविक परीक्षा विभिन्न अभिरुचि वाले लोगों को उनकी सर्वमान्य संवेदनाओं (दया-भाव) की दिशा में इकट्ठे रखने में है। यह केवल अनजान में किया जाना सम्भव है, प्रयत्न द्वारा कदापि नहीं। ८/१२८ 
आह ! कितना शान्तिपूर्ण हो जाता है उस व्यक्ति का कर्म जो मनुष्य की ईश्वरता से सचमुच अवगत हो जाता है ! ऐसे व्यक्ति को कुछ भी करना शेष नहीं रह जाता, सिवाय इसके कि वह लोगों की आँखें खोलता रहे। शेष सब अपने आप हो जाता है । " ८/१२५ 
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