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गुरुवार, 4 अगस्त 2016

'नेशनल वील या राष्ट्रीय -इच्छाशक्ति ' का आविर्भाव ! [एक नया युवा आंदोलन-10.'The Object and the Way ']

' जनसाधारण की समन्वित इच्छाशक्ति की फलोत्पादकता '
जो कार्य अत्यन्त महत्वपूर्ण और करने योग्य प्रतीत होते हों, ऐसे किसी भी कार्य में कूद पड़ने से पहले उस कार्य के उद्देश्य को बिल्कुल स्पष्ट रूप से समझ लेना आवश्यक है। चूँकि हम काम किये बिना रह ही नहीं सकते, इसीलिये किसी भी काम में भिड़ जाना- बुद्धिमानी नहीं है। फिर भी हममें से अधिकांश लोग, ऐसे ही कार्यों में व्यस्त रहते हैं, फलस्वरूप उनकी समय और ऊर्जा तो नष्ट होती ही है, और  इस तरह के कार्यों से आम आदमी को भी कुछ लाभ प्राप्त हो, ऐसा कोई परिणाम भी देखने में नहीं आता । अतः यह स्वाभाविक है कि, कार्य के परिणाम पर नजर रखते हुए हमें सर्वप्रथम यह निर्णय करना होगा कि वह कार्य बहुतों के लिये लाभकारी है नहीं ? अतः पहले हमें यह जान लेना चाहिये कि आज भारत के जन-साधारण की मूल आवश्यकता क्या है, ततपश्चात अपने समस्त कार्यों की योजनायें हमें उसी आवश्यकता को परिपूर्ण करने की दिशा में बनानी चाहिये।
 हमारे देशवासी बहुत लम्बे समय से वर्षों से, नहीं सदियों से अज्ञानता (अविद्या), दुःख और गरीबी में रहते आ रहे हैं। आज भारत के जनसाधारण के कल्याण के लिए जो सर्वाधिक जरूरी चीज है, वह है समस्त
देशवासियों का 'समग्र विकास एवं समृद्धि'! इसलिए, हमारी शिक्षा, अर्थव्यवस्था, साहित्य, संगीत, ललित कला, राजनीती , दर्शन, धर्म, सामाजिक रीति-रिवाज, देश का कानून, उद्योग, वाणिज्य, विदेश व्यापार, कृषि,आदि नीतियों और योजनाओं को इस प्रकार निर्देशित करना चाहिये, कि सभी कार्य-व्यवस्थायें,
एक ही लक्ष्य- भारत के जन साधारण को समृद्ध और खुशहाल बनाने की दिशा में अभिविन्यस्त और विकासोन्मुख हो जायें ! 
यही वह आदर्श स्थिति है जिसकी घोषणा सभी राजनितिक पार्टियाँ अपने मेनिफेस्टो में करती रहतीं हैं ;
लेकिन हम शायद ही कभी इसे वास्तविकता में रूपायित होते हुए देख पाते हैं। हमारे देश में इन धाराओं-(कथनी और करनी ) के बीच सत्ता-दल और विपक्ष के बीच असहमति अत्यंत स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। और आसानी किसी को यह विश्वास नहीं होता कि क्या भारत- कल्याण के उद्देश्य की एकजूटता को अक्षुण्ण रखने का कोई सच्चा प्रयास कभी सम्भव भी हो सकता है? 'जन-साधारण और जन-नेताओं की संयुक्त इच्छाशक्ति'  को एकमात्र भारत को समृद्ध और खुशहाल बनाने के संकल्प में नियोजित कर देने का उपाय क्या है ? और क्या ऐसा करना सम्भव भी है?
निस्सन्देह यह किया जा सकता है, और इसका उपाय है -" टु विल टु डू सो"- अर्थात ऐसा करने की दृढ़ इच्छाशक्ति या दृढ़-संकल्प ! किन्तु कोई अकेला व्यक्ति ऐसा करने का संकल्प ले तो यह कभी नहीं होगा, किन्तु यदि यही उद्देश्य -'भारत का कल्याण - बहुतों का संकल्प बन जाय' केवल तभी इस उद्देश्य को कार्य में रूपायित करना सम्भव हो जायेगा। किन्तु प्रश्न यह है कि इतने सारे लोग, ऐसा संकल्प ले कैसे सकते हैं ? जन साधारण को, या प्रत्येक व्यक्ति को  संकल्प लेने की पद्धति (ऑटोसजेशन) का महत्व 
समझा देने से ऐसा हो सकता है। यदि तुम स्वयं संकल्प लेने का तरीका सीख लो, और दूसरे को भी उसी प्रकार सिखा दो, तो संकल्पों  का समन्वय हो जायेगा। और यही जन-समुदाय (बड़े समूह या संघ) को शिक्षित करने का यह सबसे महत्वपूर्ण सोपान है। राष्ट्र-कल्याण के उद्देश्य से जन-समुदाय को 'एक-मन' हो जाने या अलग अलग व्यक्तियों की इच्छाशक्ति को समन्वित करने की पद्धति - ऋग्वेद,अथर्ववेद तथा उपनिषदों में और बाद के ग्रन्थों में भी - सिखाई जाती थी। किन्तु आज हम इस अनूठी शिक्षा-पद्धति को भूल गए हैं, यही वजह है कि हमलोग इतना दुःख-कष्ट सह रहे हैं! 
किसी बहुमत पार्टी को वोट देकर सत्ता की कुर्सी सौंप देना, जन-साधारण के समन्वित इच्छाशक्ति के भव्य सिद्धान्त का एक बहुत ही कमजोर उदाहरण है। इस तरह का अनुशासन तो राजनैतिक कौशल (डिवाइड ऐंड रूल) के द्वारा पुनर्प्राप्त (reacquire) किया जा सकता है। सुस्पष्ट रूप से इच्छाशक्ति को समन्वित करना- एक पोलिटिकल (a political) कार्य है। किन्तु यहाँ, 'अ पोलिटिकल' को 'Apolitical' के रूप में पढ़ना होगा, जिसका का अर्थ होता है- राजनैतिक दलों की संकीर्ण विचारधारा से अलग (जात -धर्म के नामपर वोटबैंक की राजनीति से), अ-राजनैतिक होना या राजनीति से तटस्थ रहना। 
जन-शिक्षा (मैस एजुकेशन) के इस सारतत्व (जन-साधारण के समन्वित इच्छाशक्ति के भव्य सिद्धान्त)
को, सभी जन-शिक्षक या जन-नेता पहले स्वयं 'A-politically' - अर्थात राजनीति से तठस्थ रहते हुए अनुभव कर सकें, तो आज जितने संकटों का सामना हम कर रहे हैं, उनमें से अधिकांश पर काबू पाया जा सकता है
यदि देशवासियों के 'समग्र विकास एवं समृद्धि'! "जेनरल ऐंड ओवरआल प्रास्पेरिटी " को ध्यान में रखकर,जन-साधारण की इच्छाशक्ति  को समन्वित करने के कार्य का प्रारम्भ करना चाहते हों, तो  
सर्वप्रथम हमारे भीतर " दी  एफिकैसी ऑफ़  कोऑर्डिनेटेड- विल ऑफ़ दी पीपल " - ' जनसाधारण की समन्वित इच्छाशक्ति की फलोत्पादकता ' (efficacy) के विषय में अदम्य विश्वास और "निर्भीक श्रद्धा" रहनी चाहिये ! फिर इसके बाद इस योजना को कार्य-रूप देने का दृढ़ संकल्प भी हमारे भीतर होना चाहिये।    
अब चूँकि हममें से प्रत्येक व्यक्ति को 'देश के समग्र विकास और समृद्धि' के उद्देश्य से संकल्प-ग्रहण की पद्धति (ऑटोसजेशन) को सीखना है, और दूसरों को भी उसी पद्धति के अनुसार  संकल्प-ग्रहण करने के लिये अनुप्रेरित करना है। इसीलिये सभी ऐसे देश-प्रेमी व्यक्तियों को परस्पर जुड़ जाना चाहिये और आत्मीय-सम्बन्ध स्थापित करते हुए एक 'यूनाइटेड फ्रन्ट' -या  संयुक्त-मोर्चा बनाकर आगे बढ़ना चाहिये, ताकि एक 'नेशनल वील' या  'राष्ट्रीय -इच्छाशक्ति ' का आविर्भाव हो सके।  
यदि हमने अपने देश को विकसित और समृद्ध राष्ट्र बना देने की  'राष्ट्रीय -इच्छाशक्ति' को पूरी तरह से निष्कपट होकर निर्मित किया है, तो यह 'समन्वित इच्छाशक्ति' ही हमें अपने तुच्छ स्वार्थ को दूर हटाने, और पूर्व में कहे गये राजनीति समेत देश की उन्नति के लिये आवश्यक सभी क्षेत्रों में अपना सर्वस्व त्याग देने की शक्ति [कविसम्मेलन से मिलने वाला तुच्छ सुख ही नहीं, निर्विकल्प समाधी से मिलने वाले 'भूमा आनंद जैसे अमृत के महासुख' को भी त्याग देने की शक्ति] प्रदान करेगी। और तब इस समन्वित इच्छा-शक्ति के द्वारा देश की अवस्था में परिवर्तन होना निश्चित है । 
अब प्रश्न उठता है कि इस अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य को रूपायित कैसे किया जाय ? यहीं पर संगठन की आवश्यकता होती है। और महामण्डल देश को समृद्ध और खुशहाल बनाने की इच्छा रखने वाले समस्त देश-प्रेमी संगठनों का 'नूक्लीअस' (ह्रदय) है, जो देश के कोने कोने तक प्रसारित हो जायेगा। और यह व्यक्ति-जीवन या 'इंडिविजुअल लाइव्स' को इस प्रकार से गठित कर देगा, कि महामण्डल रूपी मनुष्य- निर्माणकारी कारखाने में निर्मित (विकसित) खाँटी मनुष्य, किसी मानव-मस्तिष्क द्वारा अभिकल्पित किसी भी मशीन की तुलना में अधिक फलोत्पादक कार्यकुशल (efficient) सिद्ध होगा ! 
स्वामी विवेकानन्द ने कहा था - " इच्छाशक्ति ही जगत में अमोघ शक्ति है। प्रबल इच्छाशक्ति का अधिकारी मनुष्य एक ऐसी ज्योतिर्मयी प्रभा अपने चारों ओर फैला देता है कि दूसरे लोग स्वतः उस प्रभा से प्रभावित होकर उसके भाव से भावित हो जाते हैं। इच्छा-शक्ति का संचय और उनका समन्वय कर उन्हें एकमुखी करना ही वह सारा रहस्य है। "  
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" आगामी पचास वर्षों के लिये यह जननी जन्मभूमि भारतमाता ही मानो आराध्य देवी बन जाय। तब तक के लिये हमारे मस्तिष्क से व्यर्थ के देवी-देवताओं के हट जाने में कुछ भी हानि नहीं है। अपना सारा ध्यान इसी एक ईश्वर पर लगाओ, हमारा देश ही हमारा जाग्रत देवता है। सर्वत्र उसके हाथ हैं, सर्वत्र उसके पैर हैं, और सर्वत्र उसके कान हैं। समझ लो कि दूसरे देवी-देवता सो रहे हैं। जिन व्यर्थ के देवी-देवताओं को हम देख नहीं पाते, उनके पीछे तो हम बेकार दौड़ें और जिस विराट देवता को हम अपने चारों ओर देख रहे हैं, उसकी पूजा ही न करें ? जब हम इस प्रत्यक्ष देवता की पूजा कर लेंगे, तभी हम दूसरे देव-देवियों की पूजा करने योग्य होंगे, अन्यथा नहीं। " ५/१९३] 
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